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कागरः क्या राजनीतिक बदलाव रक्त क्रांति के बिना संभव नहीं

रेटिंग:तीन स्टार

कागर का हिंदी में अर्थ हुआ अंकुरित/पल्लवित होता प्यार.पर यह प्रेम अंकुरित होता है राज्य में राजनीतिक बदलाव के लिए रक्तरंजित क्रांति के बीच, जिसमें प्रेमिका के पिता की राजनीतिक महत्वाकांक्षा, राजनीतिक व शतरंजी चालों की भेंट चढ़ता है प्रेमी को.

मराठी फिल्म‘‘रिंगणे’’के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्मकार मकरंद माने इस बार देश की कुल्सित राजनीति के चेहरे और रक्तरंजित राजनीति के चेहेरे को बेनकाब करती फिल्म ‘‘कागर’’ लेकर आए हैं. इसमें चुनाव के चलते राजनीतिक प्रचार, कार्यकर्ताओं द्वारा किया जा रहा प्रचार, राजनीतिक उठापटक, राजनीतिक शत्रुता, शतरंजी चालें और गुरू जी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते बहते रक्त के बीच रानी व युवराज की प्रेम कहानी भी है. मगर गुरूजी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते अंततः युवराज का भी रक्त बहता है.

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कहानीः

फिल्म की कहानी का केंद्र महाराष्ट्र का ग्रामीण इलाका वीराई नगर है. जहां वर्तमन विधायक भावदया के राजनीतिक गुरू प्रभाकर देशमुख उर्फ गुरूजी (शशांक शिंदेे) पिछले 15 साल से भावदया के साथ हैं, पर किसी को नहीं पता कि राजनीतिक शतरंज के माहिर खिलाड़ी प्रभाकर देशमुख उर्फ गुरूजी (शशांक शिंदे) की अपनी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा है. फिल्म की कहानी ज्यों ज्यों आगे बढ़ती है. त्यों त्यों पता चलता है कि गुरू जी इस बार भावदया की बजाय अपनी बेटी प्रियदर्शनी देशमुख उर्फ रानी (रिंकू राज गुरू) को अपनी पार्टी से विधायक बनाना चाहते हैं. इसके लिए वह साफ्ट वेअर इंजीनियर और गन्ना किसानों के प्रति हमदर्दी रखने वाले युवक युवराज (शुभंकर तावड़े) को अपना मोहरा बनाते हैं. युवराज के मन में भावदा के प्रति नफरत यह बताकर करते हैं कि उनके पिता के वह हत्यारे हैं. युवराज और रानी एक दूसरे से सच्चा प्यार करते हैं. रानी तो युवराज के प्यार में मरने को भी तैयार है. शातिर राजनीतिज्ञ की तरह गुरू जी पार्टी के नेतृत्व को बता देते है कि इस बार वह अपनी बेटी प्रियदर्शनी देशमुख उर्फ रानी को विधायक का चुनाव लड़वाना चाहते हैं. मगर भावदया व लोगों के सामने अपने मोहरे के रूप में भैयाजी (शांतनु गांगने) में उतारते हैं. भैयाजी के चुनाव प्रचार शुरू करते ही भावदया और गुरूजी दुश्मन बन जाते हैं. फिर दोनों के बीच शीतयुद्ध शुरू हो जाता है. जिस दिन गुरू जी को पता चलता है कि रानी और युवराज मंदिर में देशादी करने जा रहे हैं, उसी दिन गुरूजी अपनी शतंरजी चाल में युवराज को ऐसा फंसाते हैं कि युवराज शादी भूलकर गुरूजी की मदद के लिए दौड़ता है, उधर मंदिर में रानी इंतजार करती रह जाती है. इसके बाद गुरूजी की चाल के अनुसार ही युवराज भैयाजी की हत्या कर देता हैं, भैयाजी की हत्या के जुर्म में विधायक भावदया जेल चले जाते हैं और गुरूजी नाटकीय तरीके से अपनी बेटी रानी को विधायक के चुनाव में खड़ा कर देते हैं. चुनाव प्रचार के दौरान रानी को अपने पिता की असलियत पता चल जाती है. रानी, युवराज मिलकर उसे जुर्म कबूल करने के लिए कहती है. रानी कहती है कि वह सजा काटकर आने तक युवराज का इंतजार करेगी, पर तभी गुरूजी अपने दलबल के साथ पहुंच जाते हैं. फिर कई लोग मौत के घाट उतारे जाते हैं. अंततः रानी के विरोध के बावजूद युवराज को भी गुरूजी मौत दे देते हैं. रानी को गुरूजी समझाते हैं कि वह जो खुद नहीं बन सके. वह उसे बनाना चाहते हैं. रानी अपनी कलाई काटकर आत्महत्या करने का असफल प्रयास करती है. अंततः चुनाव के दिन वोट देने के लिए जाते समय रानी अपने पिता से कहती है कि वह इस बात को कभी नहीं भूलेगी कि उसके पिता हत्यारे हैं. बेटी की बातों से आहत गुरूजी आत्महत्या कर लेते हैं. रानी विधायक बन जाती है. पर वह अपने प्यार व युवराज को भुला नही पायी हैं.

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लेखन व निर्देशनः

चुनाव के वक्त राजनीतिक दलों के अंदर होने वाली उठा पटक, एक ही दल से जुड़े लोगों के बीच एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाने की हद तक की आपसी दुश्मनी, चुनाव प्रचार, चुनाव प्रचार रैली सहित जिस तरह से लोग अपनी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और अपनी अपनी कुर्सी बचाने के लिए दूसरों का खून बहाने पर आमादा रहते हैं, उसका यथार्थपरक चित्रण करने में फिल्मकार मकरंद माने पूर्ण रूपेण सफल रहे हैं. मगर लेखक के तौर पर वह दिग्भ्रमित सा लगते हैं. इसी के चलते इंटरवल तक यह फिल्म पूर्णरूपेण प्रेम कहानी नजर आती है. इंटरवल के बाद अचानक यह रोमांचक और राजनीतिक फिल्म बन जाती है. परिणामतः प्रेम की हार होती है और स्वार्थपूर्ण रक्त रंजित राजनीति की विजय होती है. निर्देशक के तौर पर मकरंद माने फिल्म के क्लाइमैक्स को गढ़ने में मात खा गए. फिल्म के कुछ दृश्यों को जिस तरह से गन्ने के खेतों ,गांव आदि जगहों पर फिल्माया गया है, उससे फिल्म सुंदर बन जाती है. फिल्म के कुछ संवाद काफी अच्छे बन पड़े हैं. निर्देशक के तौर पर महारास्ट्र में खुरदरी ग्रामीण राजनीति के साथ ही छोटे शहर के रोजमर्रा के जीवन का सटीक चित्रण करने में मकरंद माने सफल रहे हैं. फिल्म को एडीटिंग टेबल पर कसे जाने की भी जरुरत थी.

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अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है तो प्रियदर्शनी देशमुख उर्फ रानी के किरदार को परदे पर जीवंतता प्रदान कर रिंकू राजगुरू ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि अभिनय में उनका कोई सानी नहीं है. मगर वह प्रतिभाशाली अभिनेत्री रिंकू राजगुरू की प्रतिभा का सही ढंग से उपयोग नहीं कर पाए. यह उनके लेखन व निर्देशन दोनो कमियों को उजागर करता है. एक चतुर राजनीतिज्ञ के हाथों की कठपुतली बने युवराज के किरदार में नवोदित अभिनेता शुभंकर तावडे़ में काफी संभावना नजर आती हैं. गुरूजी के किरदार में शशांक शिंदे की भी तारीफ की जानी चाहिए. अन्य कलाकारों ने भी ठीक ठाक काम किया है.

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फिल्म का गीत संगीत उत्कृष्ट होने के साथ ही सही जगह पर उपयोग किया गया है. दो घटे दस मिनट की अवधि वाली फिल्म‘‘कागर’’ का निर्माण ‘‘वौयकाम 18 मोशन पिक्चर्स’’ ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक मकरंद माने तथा कलाकार हैं- रिंकू राजगुरू, शुभांकर तावड़े, शशांक शिंदे, शांतनु गांगने व अन्य.

कहीं आप भी तो नहीं करती हैं ये 6 ब्यूटी मिस्टेक्स

सुंदर दिखना हर महिलाओं को खूब भाता है. सुंदरता को निखारने में सबसे अहम रोल मेकअप का होता है. लेकिन सुंदरता के चक्कर में अधिकतर महिलाएं ऐसी गलतियां कर बैठती हैं कि उनका चेहरा सुंदर दिखने के बजाय ओल्ड या डल दिखने लगता है. मेकअप के बाद भी डल दिखने के पीछे ऐसी कौन सी गलतियां हैं, जो अधिकतर महिलाएं दोहराती है आइए जानते हैं-

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  1. मौइस्चराइजर

मेकअप की शुरुआत हम सभी मौइस्चराइजर से करते हैं. जब मौइस्चराइजर अच्छे से ड्राई हो जाता है, उसके बाद फाउंडेशन अप्लाई करते हैं. लेकिन अधिकतर महिलाएं मौइस्चराइजर लगाने के तुरंत बाद ही फाउंडेशन अप्लाई कर लेती हैं. मौइश्‍चराइज़र की नमी के कारण चेहरे पर मेकअप की पतली परत साफ दिखती है. इसलिए जब स्किन अच्छी तरह से मौइश्‍चराइज़र को सोख ले, तभी फाउंडेशन का इस्तेमाल करें, नहीं तो चेहरे पर फाउंडेशन साफ नजर आता है.

 2. फाउंडेशन

कई बार देखा जाता है कि मेकअप के बाद चेहरा स्किन टोन से ज्यादा ब्राइट या ज्यादा डार्क नजर आता है, जिससे चेहरा बहुत ओवर दिखता है. फाउंडेशन के गलत चयन से पर्फेक्ट लुक नहीं आ पाता. इसलिए जब भी फाउंडेशन खरीदें तो अपनी स्किन टोन से मैच कर लें. यदि आप रेगुलर यूज के लिए फाउंडेशन ले रही हैं तो अपने स्किन टोन का ही फाउंडेशन खरीदें. किसी पार्टी-फंकशन में यूज के लिए एक शेड लाइट फाउंडेशन खरीदें.

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3. काजल

हर महिलाओं के मेकअप किट में काजल जरूर होता है. काजल लगाने से आंखों और चेहरे दोनों की खूबसूरती निखर जाती है. लेकिन काजल का सही यूज न किया जाए तो ये आपकी खूबसूरती बिगाड़ भी सकता है.  अगर आपके आंखों के नीचे डार्क सर्कल्स है तो आप काजल न लगाएं. काजल लगाने से डार्क सर्कल्स ज्यादा हाईलाइट हो जाते हैं, जिससे आपका लुक डल दिखने लगता है.अगर आपकी आंखें बड़ी हैं तो आप काजल ज्यादा मोटा न लगाएं.काजल हमेशा वाटरलाइन के अंदर ही लगाएं.

4.  कंसीलर

कंसीलर लगाते समय बहुत सी महिलाएं पूरे चेहरे पर ही कंसीलर लगा लेती हैं. लेकिन कंसीलर सिर्फ चेहरे के खास भाग पर ही लगाया जाता है. कंसीलर का इस्तेमाल चेहरे पर स्पौट, पिंपल्समार्क, मुहांसे, डार्क सर्कल्स को छिपाने के लिए किया जाता है. कंसीलर को पूरे चेहरे पर लगाना सही नहीं है. ऐसा करने से आपका चेहरा ज्यादा व्हाइट नजर आने लगता है. कंसीलर हमेशा अपनी स्किन टोन से एक शेड हल्का खरीदें.

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5. लिपस्टिक और लिपलाइनर 

लिपस्टिक मेकअप का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है. लिपस्टिक और लिपलाइनर को लगाने में अक्सर लड़कियां व महिलाएं गलतीयां कर बैठती हैं. लिपस्टिक लगाने से पहले मैचिंग लिपलाइनर का इस्तेमाल करें. यदि लिपस्टिक और लिपलाइनर अलग शेड के होंगे तो आपका चेहरा सबसे अलग और अजीब दिखेगा. कई बार ड्रेस और लिपस्टिक का मैच नहीं हो पाता, जिससे आपका पूरा लुक बिगड़ जाता है इसलिए लिपस्टिक लगाते वक्त कपड़ों का खास ध्यान रखें. अगर आप ज्यादा डार्क कलर का ड्रेस पहनने वाली हैं तो उसके साथ डार्क शेड का लिपस्टिक का ही इस्तेमाल करें. और अगर आपका आउटफिट ज्यादा लाइट कलर का है तो आप न्यूड या पिंक शेड का लिपस्टिक का यूज कर सकती हैं.

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6. मेकअप रिमूव

मेकअप रिमूव करना ब्यूटी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. खुद को सुंदर दिखाने के लिए हम तरह-तरह के ब्यूटी प्रौडक्ट का तो इस्तेमाल करते हैं लेकिन इन्हें सही तरीके से रिमूव नहीं किया गया तो ये हमारी त्वचा को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं. मेकअप रिमूव करने से चेहरे की सुंदरता बरकरार रहती है. रात को सोने से पहले मेकअप क्लीन करना बहुत जरूरी होता है. लेकिन कुछ महिलाएं इसे बिना रिमूव किए ही सो जाती हैं. मेकअप रिमूव न करने से त्वचा पर मुंहासे, पिंपल्स, रूखापन जैसी दिक्कतें होना शुरू हो जाती है. कई बार हम मेकअप फेशवाश से रिमूव कर लेते हैं जिससे हमारा चेहरा काफी डल और ड्राई नजर आने लगता है. मेकअप हमेशा रिमूवर से ही रिमूव करना चाहिए. यदि रिमूवर नहीं है तो आप नारियल के तेल से भी रिमूव कर सकती हैं.

5 टिप्स: स्किन को लेमन बनाएगा सौफ्ट और ब्यूटीफुल

हमारी स्किन अलग-अलग तरह की होती है कोई ड्राई तो कोई औयली. जिसके लिए मार्केट में कईं प्रोडक्ट मिलते है, लेकिन इन प्रोडक्टस के साइड इफेक्ट भी होते हैं. लेकिन होममेड चीजों के साइड इफेक्ट कम देखने को मिलते हैं. लेमन उन्हीं होममेड तरीकों में से है. इसमें विटामिन सी और विटामिन बी काफी मात्रा में होते है. जिससे यह हमारे बालों से लेकर स्किन की खूबसूरती को बढ़ती है. डेड स्‍किन, ब्‍लैकहेड को साफ करने के साथ यह खुले हुए पोर्स को भी ठीक करने में मददगार होता है. और अगर आप इसे कभी पैक में मिलाकर या कभी अलग अलग चीजों के साथ मिक्स करके या सीधे ही स्किन पर लगाएं तो यह आपकी स्किन को और भी खूबसुरत बना देगा.

  1. चेहरे में शाइन लाने के लिए लेमन

अंडे के सफेद भाग में लेमन की कुछ बूंदे मिलाकर इसे चेहरे पर लगाएं और सूखने दें, फिर इसे पील की तरह चेहरे से निकाल लें और चेहरे को ठंडे पानी से धो लें, इससे आपका चेहरा शाइन करेगा.

  1. झुर्रियों को खत्म करने के लिए लेमन

उम्र बढ़ने के साथ-साथ स्किन पर झुर्रियां पड़ने लगती है जिससे उनके निशान दिखने लगते हैं. लेमन एक अच्छा एंटीऔक्सीडेंट भी है, जो स्किन की झुर्रियों को खत्म करता है.

  1. औयली स्किन के लिए लेमन

औयली स्किन के लिए लेमन काफी कारगर साबित होता है. लेमन को पानी में मिला लें और रूई की मदद से चेहरे पर लगाएं. इससे पिंपल और ब्लैकहेड्स जैसी कई समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है.

  1. सौफ्ट स्किन के लिए लेमन

ताजे लेमन के रस से स्किन नर्म और मुलायम होती है. यदि घुटने और कोहनी की स्किन को मुलायम और साफ करना है तो इसके रस को सीधे स्किन पर रगड़ने से काफी मदद मिलती है.

  1. सूखे और फटे होंठ के लिए लेमन

सूखे और फटे होंठ पर लेमन का रस लगाने से काफी फायदा पहुंचता है. आप मलाई और शहद में लेमन का रस मिलाकर प्राकृतिक लिप बाम भी बना सकते हैं. इसे लगाने से आपके होंठों की नमी बरकरार रहेगी.

edited by-rosy

आलू का रायता बनाने की विधि

खाने के साथ जब रायता मिलता है, तो खाना बेहद  टेस्टी हो जाता है. और वो भी अगर आलू का रायता. आलू का रायता बहुत टेस्‍टी होता है और बनाने में भी बेहद आसान होता है. तो फिर चलिए आलू का रायता बनाने की विधि जानते हैं.

घर में बनाएं भरवां करेला

सामग्री :

आलू  (04 नग)

दही  02 कप (फेंटा हुआ)

हरी मिर्च  01 नग (कटी हुई)

भुना जीरा पाउडर ( 01 चम्मच)

लज्जतदार केले बेसन की सब्जी

चाट मसाला ( 01 चम्मच)

काली मिर्च पाउडर ( चुटकी भर)

काला नमक ( 1/2 चम्मच)

लाल मिर्च पाउडर (स्वादानुसार)

धनिया पत्ती ( आवश्यकतानुसार)

नमक ( स्वादानुसार)

पनीर मसाला बनाने की आसान रेसिपी

बनाने की विधि :

सबसे पहले आलू धो कर उबाल लें.

उबले आलुओं को ठंडा करके इन्हें छील लें और चाकू की मदद से छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें.

अब एक कटोरे में सभी सामग्री को अच्छे से मिला लें और ऊपर से भुने हुए जीरे का पाउडर, काली मिर्च का पाउडर, काला नमक और नमक छिड़कें.

चाप रोल रेसिपी

अगर आप रायता को स्पाइसी बनाना चाहें, तो थोड़ा सा पिसा हुआ लाल मिर्च भी मिला सकती हैं.

लीजिए आपकी आलू का रायता बनाने की विधि कम्‍प्‍लीट हुई.

इसे हरी धनिया से गार्निश करें और खाने के साथ परोसें.

posted by- saloni

अच्छी नींद के लिए खाएं ये 4 चीजें

अक्सर ऐसा होता है कि हमें न कोई तनाव होती है और न ही कोई परेशानी, फिर भी हमें नींद नही आती. और इसकी वजह हम समझ नहीं पाते. पर क्या आप जानते हैं कि आपका खानपान भी आपके नींद को प्रभावित करता है. जी हां आप डिनर में क्या खा रहे हैं यह इस बात को तय कर सकता है कि आपको आने वाली नींद गहरी होगी या नहीं. तो आइए जानते हैं कि अच्छी नींद पाने के लिए डिनर में क्या खाना चाहिए.

  1. बादाम

बादाम अच्छी नींद की इच्छा को पूरा करने में कारगर है. अगर आपको नींद नहीं आ रही तो बादाम अच्छा विकल्प साबित हो सकता हैं. इससे तेज नींद आने में मदद मिलती है और साथ ही नींद गहरी भी आती है. आप चाहें तो बादाम को शहद के साथ ले सकते हैं या फिर एक ग्लास गर्म दूध के साथ भी.

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2. केले

केले में भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं. कार्बोहाइड्रेट्स ट्रिप्टोफेन बनाने में मदद करता है जो दिमाग को अच्छी नींद दिलाता है. इसके अलावा केले में काफी अच्छी मात्रा में मैग्नेशियम भी पाया जाता है, जो मसल्स और नसों को आराम दिलाता है.

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3. शहद

सोने से पहले शहद लेना अच्छा विकल्प माना जाता है. शहद का पौजिटिव असर पूरे शरीर पर रहता है. शहद एंटी बैक्टीरियल, एंटी फंगल और एंटी ऑक्सीडेंट्स है. शहद भी ट्रिप्टोफेन के प्रोडक्शन का काम करता है.

4. दलिया

दलिया हमेशा एक अच्छा आहार माना गया है. यह हल्का होता है इसलिए इसे पचाने में दिक्कत नहीं होती. एक कटोरी दलिया रात के समय एक अच्छा मील साबित हो सकता है. दूध, शहर, केले या बादाम के साथ दलिया रात के समय में लिया जा सकता है. यह हल्का होता है इसलिए पचाने में आसानी होती है.

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सैक्स संबंधों में उदासीनता क्यों

बिना सैक्स के आदमी और औरत का संबंध अधूरा है.कुछ लोग चाहे जितना गुणगान कर लें कि सैक्स गंदा है, असल में आदमीऔरत में पूरा प्यार या लगाव सैक्स से ही होता है. यह बात दूसरी है कि कुछ मामलों में यह प्यार व लगाव कुछ मिनटों तक सिमट कर रह जाता है और शारीरिक प्रक्रिया पूरी होते ही दोनों अपनेअपने काम में व्यस्त हो जाते हैं. सैक्स के बराबर ही पेट भरना जरूरी है. शायद सैक्स से ज्यादा दूसरे मनोरंजन भी भारी पड़ते हैं.

खतरे में है व्यक्तिगत स्वतंत्रता

एक संस्थान जो लगातार अमेरिकी लोगों पर शोध कर रही है ने पता किया है कि अमेरिकियों में भी सैक्स की चाहत कम हो रही है और वे सैक्स की जगह वीडियो गेम्स या अपने कैरियरों पर समय और शक्ति अधिक लगाने लगे हैं. युवा लड़कियों में 18% और युवा लड़कों में 23% ने कहा कि उन्हें पिछले 1 साल में एक बार भी सैक्स सुख नहीं मिला. 60 वर्ष की आयु से अधिक के 50% लोग सैक्स से दूर रहते हैं.

सावधान, आप बेचे जा रहे हैं

बिना सैक्स के जीवन की बहुत महिमा गाई जाती है पर यह है गलत. आदमी-औरत का संबंध प्राकृतिक है, चाहे प्रकृति ने इस में आनंद डाला था या नहीं, कहा नहीं जा सकता. सभ्य समाज सैक्स पर आधारित है, क्योंकि सुरक्षित सैक्स और पार्टनर की ग्रांटेड मौजूदगी ने ही विवाह संस्था को जन्म दिया है. विवाह है तो घर है, घर है तो गांव है, गांव है तो शहर है, शहर है तो देश है. बिना सैक्स के लोग अकेले पड़ जाएंगे और जीवन के प्रति उन का नजरिया ही बदल जाएगा.

सभ्यता की जड़ में जो सुख पाने की बलवती इच्छा है उस के पीछे सैक्स सुख है चाहे इस सैक्स सुख को पाने के लिए धर्म के सहारे औरतों को गुलाम बनाया गया, आश्रमों, मठों में औरतों को जमा किया गया, राजाओं ने महलों में हरमों का निर्माण किया. अगर सैक्स की चाहत न होती तो वह बहुत कुछ नहीं दिखता जो आज दिख रहा है.

साजिश की शिकार शिक्षा

आज डिजिटल क्रांति के पीछे पोर्न और औरतों का व्यापार भी बहुत छिपा है. असल पैसा यहीं से आता है चाहे लोग इस की चर्चा कम करते हों. पहले लोग सैक्स को ज्यादा बुरा मानते थे पर जम कर सैक्सुअली ऐक्टिव रहते थे. तब समय भी था और पार्टनर भी. अब समय भी कम है और पार्टनरों के नखरे भी बढ़ गए हैं.

लड़कों को सैक्स सुख पाने के लिए बहुत कुछ कुरबान करना पड़ता है और लड़कियां मुफ्त में सैक्स सुख नहीं देना चाहतीं. जब दोनों तरफ से हिचकिचाहट होगी तो सैक्स संबंध तो कम बनेंगे ही. हमारे यहां क्या हो रहा है, पता नहीं पर बढ़ते तनाव और तलाकों का एक कारण सैक्स अभाव हो सकता है.

आज की नैतिकता पुरानी नैतिकता से अच्छी

मैं नास्तिक क्यों हूं…

नास्तिकता की ओर बढ़ रही है दुनिया

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मैं नास्तिक क्यों हूं

वीर क्रान्तिकारी शहीद भगत सिंह ने अपनी मौत से पहले लाहौर सेंट्रल जेल में कैद के दौरान एक लेख लिखा था – ‘मैं नास्तिक क्यों हूं. इस लेख का प्रथम प्रकाशन लाहौर से छपने वाले अखबार ‘दि पीपल’ में 27 सितम्बर 1931 में हुआ था. यह लेख भगत सिंह के द्वारा लिखित साहित्य के सर्वाधिक चर्चित और प्रभावशाली हिस्सों में गिना जाता है और बाद में इसका कई बार प्रकाशन हुआ. इस लेख में भगत सिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता, उसके शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है.

उन्होंने मनुष्य द्वारा ईश्वर की परिकल्पना के सम्बन्ध में लिखा है- ‘विश्वास’ कष्टों को हलका कर देता है. यहां तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है. ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सान्त्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है. उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर करना पड़ता है. तूफान और झंझावात के बीच अपने पांवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है.

प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं

उन्होंने लिखा – ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म होने पर राजा होने की आशा कर सकता है. एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनन्द की तथा अपने कष्टों और बलिदान के लिए पुरस्कार की कल्पना कर सकता है. किन्तु मैं क्या आशा करूं? मैं जानता हूं कि जिस क्षण रस्सी का फन्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा. वह अन्तिम क्षण होगा. मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जाएगी. आगे कुछ न रहेगा. एक छोटी सी जूझती हुई जिन्दगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक पुरस्कार होगी. यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस हो. बिना किसी स्वार्थ के यहां या यहां के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को स्वतन्त्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है, क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था. जिस दिन हमें इस मनोवृत्ति के बहुत-से पुरुष और महिलाएं मिल जाएंगे, जो अपने जीवन को मनुष्य की सेवा और पीड़ित मानवता के उद्धार के अतिरिक्त कहीं समर्पित कर ही नहीं सकते, उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारम्भ होगा.

और भी हैं नास्तिक

शहीद भगत सिंह ही नहीं, तर्क की कसौटी पर धर्म और आस्था को कसने वाले और उसे हर लिहाज से कमजोर पाने वाले बुद्धिजीवियों की बात करें तो इस फेहरिस्त में बड़े-बड़े नाम शामिल हैं, जिन्होंने ईश्वर, धर्म और कर्मकांडों को अपनी जीवन से पूरी तरह खारिज कर दिया.

यूज ऐंड थ्रो के दौर में जानवर

इरोड वेंकट नायकर रामासामी ‘पेरियार’(1879-1973) बीसवीं सदी के तमिलनाडु के एक प्रमुख राजनेता थे. भारतीय तथा विशेषकर दक्षिण भारतीय समाज के शोषित वर्ग के लोगों की स्थिति सुधारने में इनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है. स्व-सम्मान आंदोलन के इस नास्तिक और बुद्धिवादी नेता ने जस्टिस पार्टी का गठन किया, जिसका सिद्धान्त रूढ़िवादी हिन्दुत्व का विरोध था. असम्बद्धता पर उनके विचार जाति व्यवस्था के उन्मूलन पर आधारित हैं. उनका मानना था कि अगर जाति व्यवस्था से निजात पानी है तो धर्म जैसी चीज का अंत होना आवश्यक है.

पेरियार का जन्म 17 सितम्बर 1879 को पश्चिमी तमिलनाडु के इरोड में एक सम्पन्न, परम्परावादी हिन्दू परिवार में हुआ था. 1885 में उन्होंने एक स्थानीय प्राथमिक विद्यालय में दाखिला लिया. कोई पांच साल से कम की औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद ही उन्हें अपने पिता के व्यवसाय से जुड़ना पड़ा. उनके घर पर भजन तथा उपदेशों का सिलसिला चलता ही रहता था. बचपन से ही वे इन उपदशों में कही बातों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते रहते थे. हिन्दू महाकाव्यों तथा पुराणों में कही बातों की परस्पर विरोधी तथा बेतुकी बातें उनकी तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती थीं. वे बाल विवाह, देवदासी प्रथा, विधवा पुनर्विवाह के विरुद्ध अवधारणा, स्त्रियों तथा दलितों के शोषण के पूर्ण विरोधी थे. उन्होंने हिन्दू वर्ण व्यवस्था का भी बहिष्कार किया था.

आस्था पर अर्थ का चढ़ा आवरण

विनायक दामोदर सावरकर (1883-1966) को कौन नहीं जानता. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रख्यात हिन्दू राष्ट्रवादी नेता के बारे में यह बात कम लोग जानते हैं कि सावरकर पूरी तरह नास्तिक और एक कट्टर तर्कसंगत व्यक्ति थे. वे रूढ़िवादी हिन्दू विश्वास के घोर विरोधी थे. गाय की पूजा को घोर अंधविश्वास मानते थे.

सत्येंद्र नाथ बोस (189 4-1974) एक भौतिक विज्ञानी थे, जो गणितीय भौतिकी में विशेषज्ञता रखते थे. जर्मनी के ख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन और सत्येंद्र नाथ बोस ने मिल कर बोस-आइंस्टीन स्टैटिस्टिक्स की खोज की थी. अपने वैज्ञानिक योगदान के लिए याद किये जाने वाले बोस पूरी तरह एक नास्तिक व्यक्ति थे.

मेघनाद साहा (189 3 – 1956) एक नास्तिक खगोल-भौतिकवादी थे जो कि साहा समीकरण के विकास के लिए याद किये जाते हैं, जो सितारों में रासायनिक और भौतिक स्थितियों का वर्णन करता था.

जवाहरलाल नेहरू (188 9 -1964), भारत के पहले प्रधानमंत्री भी कुछ हद तक नास्तिक थे. उन्होंने अपनी आत्मकथा, टावर्ड फ्रीडम (1936), में धर्म और अंधविश्वास पर अपने विचारों के बारे में लिखा था.

सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर (1910-1995), खगोल-भौतिकीविद थे, जो सितारों की संरचना और विकास पर अपने सैद्धांतिक काम के लिए जाने जाते हैं. उन्हें 1983 में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. चंद्रशेखर पूरी तरह नास्तिक थे. उनका ईश्वर या धर्म जैसी किसी बात पर विश्वास नहीं था.

गलती गुरतेज की

गोपाराजू रामचंद्र राव (1902-1975), जिनका उपनाम ‘गोरा’ था और वह अपने उपनाम से ही अधिक ख्यात हुए, एक समाज सुधारक, जाति-विरोधी कार्यकर्ता और नास्तिक थे. वह और उनकी पत्नी, सरस्वती गोरा (1912-2007) भी एक नास्तिक और समाज सुधारक महिला थीं. उन्होंने वर्ष 1940 में बकायदा एक नास्तिक केन्द्र  की स्थापना की. इस नास्तिक केन्द्र ने सामाजिक परिवर्तन के लिए उल्लेखनीय कार्य किये. गोरा ने वर्ष 1972 में लिखी अपनी किताब में सकारात्मक नास्तिक के बारे में विस्तार से लिखा. उन्होंने सन् 1972 में पहले विश्व नास्तिक सम्मेलन का भी आयोजन किया. इसके बाद, नास्तिक केन्द्र ने विजयवाड़ा और अन्य स्थानों में कई विश्व नास्तिक सम्मेलनों का आयोजन किया.

खुशवंत सिंह (1915-2014), सिख निष्कर्षण के एक प्रमुख और विपुल लेखक, स्पष्ट रूप से गैर-धार्मिक थे.

इसी कड़ी में कल आगे पढ़िए- बौद्ध धर्म काल्पनिक ईश्वर में विश्वास नहीं करता

फिल्म समीक्षा: गंभीर विषय पर एक कमजोर फिल्म ‘तर्पण’

फिल्म: तर्पण

निर्देशक: नीलम आर सिंह

कलाकार: नंद किशोर पंत, नीलम कुमारी, संजय कुमार, अरूण शेखर और अन्य

अवधि: दो घंटे, छह मिनट

रेटिंग: ढाई स्टार

डिजिटल युग में पहुंचने के बावजूद हमारे देश में लड़कियों और औरतों को वह सम्मान नहीं मिल पाया है, जिसकी वह हकदार हैं. इस मुद्दे को उठाने के लिए लेखक व निर्देशक नीलम आर सिंह ने शिवमूर्ति के उपन्यास ‘‘तर्पण’’ पर इसी नाम की फिल्म बना डाली, जिसमें जात-पात के भेदभाव और उसके लिए होते संघर्ष के बीच फंसी एक नारी की पीड़ा की मार्मिक दास्तान है.

बौलीवुड ही नहीं है भारतीय सिनेमा

कहानीः

शिवमूर्ति के उपन्यास ‘तर्पण’ पर आधारित फिल्म ‘‘तर्पण’’ की कहानी युगों से भारत में चले आ रहे जातिगत संघर्ष और सामाजिक विसंगतियों की गाथा है. ग्रामीण परिवेश की यह कहानी उत्तर प्रदेश के एक गांव की है, जो कि दो टोलों में बंटा हुआ है. एक टोला ब्राम्हणों का यानी कि ऊंची जाति का है तो दूसरा टोला हरिजनों यानी नीच जाति का है. हरिजन टोला में रहने वाली रजपतिया (नीलम कुमारी) एक दिन घूमते-घूमते गन्ना चूसने के लिए गांव के रसूखदार ब्राम्हण धर्मदत्त उपाध्याय( राहुल चैहाण) के खेतों के अंदर चलीजाती है, जहां धर्मदत्त के बेटे चंदर उपाध्याय (अभिषेक मदरेचा)उसका शारीरिक शोषण करने का प्रयास करता है. पर गांव की दो औरतों के आ जाने से वह रजपतिया को छोड़ देता है. जब इस घटना की खबर भीम पार्टी के भाई जी (संजय कुमार) तक पहुंचती है, तो वह अपने स्वार्थ के चलते गांव पहुंचकर रजपतिया के पिता प्यारे (नंद किशोर पंत) को समझाकर पुलिस में रपट लिखाने के लिए कहते हैं. भीम पार्टी के नेता खुद साथ में पुलिस स्टेशन जाते हैं. फिर शुरू होता है जातिगत संघर्ष को उजागर करने वाला बदसूरत शीतयुद्ध.

20 साल बाद फिर लौट रहा है ‘छम्मा-छम्मा’

निर्देशन…

फिल्म की निर्देशक नीलम आर सिंह ने इस फिल्म को डाक्यू ड्रामा और यथार्थवादी दृष्टिकोण के साथ बनाया है. कहीं कोई बेवजह कामेलो ड्रामा या छाती पीट-पीटकर रूदन नहीं है. पूर्वाग्रह से बचते हुए दो समुदायों के बीच संतुलन बनाए रखना एक फिल्मकार के लिए टेढ़ी खीर होती है, इसमें नीलम आर सिंह पूरी तरह से सफल रही हैं. फिल्म इस बात को उकेरने में सफल रहती है कि समाज में किस तरह राजनेता अपनी नेतागीरी को चमकाने के लिए दो जातियों व समुदायों के बीच संघर्ष कराते रहते हैं.

फिल्म की कमियां…

जाति गत संघर्ष और स्वार्थी नेता द्वारा बदले की आग में विवश करने पर होने वाले जातिगत संघर्ष में फंसी हरिजन लड़की रजपतिया की पीड़ा बेहतर ढंग से उभरने की बजाय बहुत सतही रह जाती है. फिल्म भावनात्मक स्तर पर बहुत शुष्क है. यदि निर्देशक ने जातिगत विभाजन व राजनीति को समझकर आधुनिकता के साथ पेश किया होता तो यह एक बेहतरीन फिल्म बन सकती थी. एक पीड़ित लड़की का दर्द दर्शको के दिलों तक न पहुंचने के लिए लेखक व निर्देशक ही दोषी कहे जाएंगे.

इस में अबराम की गलती नहीं

 एक्टिंग…

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अपराध बोध और भाग्य के बीच फंसे रजपतिया के पिता प्यारे के किरदार में नंद किशोर पंत ने अपने अभिनय से फिल्म में जान डाल दी है. लालच व सम्मान के बीच फंसकर पीड़ित होने वाली मासूम लड़की राजपतिया का दर्द दर्शकों तक ठीक से नही पहुंच पाता, इसमें नीलम कुमारी के अभिनय की कमी की बनिस्बत लेखक व निर्देशक की कमी उभर कर आती है. रजपतिया के चरित्र को ठीक से लिखा ही नहीं गया. उसकी पीड़ा/दर्द को उभारने वाले सीन्स की कमी है. नेता के किरदार में संजय कुमार भी प्रभावित करते हैं. पुरूषत्व और उंची जाति के पोषक चंदर के किरदार में अभिषेक मंदरेचा जमे हैं. लेकिन धर्मदत्त के घर में नौकरानी के रूप में कार्यरत हरिजन टोला की महिला लवंगिया के किरदार में पद्मजा रौय हर किसी पर भारी पड़ जाती हैं.

धार्मिक ढोंग के साए में हुई रणवीर-दीपिका की शादी 

Edited by- Nisha Rai

‘प्यार का पंचनामा’ एक्ट्रेस की आंखों में क्यों आए आंसू

डायरेक्टर लव रंजन की फिल्में ‘प्यार का पंचनामा’ सीरीज में नजर आने वाली हीरोइन सोनाली सहगल आपको जरूर याद होगी. बता दें कुछ समय पहले ही आई ‘प्यार का पंचनामा 2’ में ‘दीदी तेरा देवर दीवाना’ वाला सीन कौन भूल सकता है, जिसे देख दर्शक हंस-हंसकर लोट-पोट हो गए थे.

फोटोग्राफ : अति धीमी गति से सरकती फिल्म

हाल ही में सोनाली सहगल ने मीडिया को  इंटरव्यू दिया हैं, जिसमें उन्होंने नकारी दी हैं कि कुछ समय पहले वो एक फिल्म के औडिशन पर गई थीं, जिसमें उनसे शरीर में कुछ अप्राकृतिक बदलाव करने को कहा गया था. ये सुनकर सोनाली सहगल का रो-रो कर बुरा हाल हो गया था.

मेेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर : उंची दुकान फीका पकवान

सोनाली ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बताया, ‘मैं उस डायरेक्टर का नाम नहीं लेना चाहती क्योंकि यह गलत होगा. उनकी एक सोच थी, जिसमें मैं फिट नहीं बैठ रही थी लेकिन मैं अपनी शरीर में कोई बदलाव केवल फिल्म के लिए नहीं कराना चाहती थी. ‘मैं एक भावुक इंसान हूं, इसलिए जब मैं घर आई तो मैं बहुत रोई. मेरे हाथ से एक बड़ी फिल्म निकल चुकी थी.

हामिद : कश्मीर के वर्तमान हालातों का सजीव चित्रण…

सोनाली ने इंडस्ट्री में व्याप्त सोच पर बात करते हुए कहा, कई सारे लोग इसी सोच के साथ बड़े होते हैं कि महिलाओं को ऐसा दिखना चाहिए, ऐसा लगना चाहिए. हीरोइन है तो उसकी बौडी इस तरह की होनी चाहिए.

डिग्री और पत्नी त्याग पर खामोशी क्यों ?

‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ महात्मा गांधी की गैरमामूली किताब इस लिहाज से भी है कि इसमें उन्होंने वाकई खुद को उद्घाटित कर के रख दिया है. अपनी निजता सार्वजनिक करने पर गांधी कहीं हिचके या लड़खड़ाए नहीं हैं. यहां तक कि पत्नी के साथ अपने यौन व्यवहार,  किशोरावस्था में छुपकर धूम्रपान और हस्तमैथुन के साथ साथ मांसाहार करने का जिक्र भी उन्होंने बिना किसी संकोच या पूर्वाग्रह के किया हैं. अपने बारे में इस स्तर तक सच बोलने का दुसाहस हर कोई नहीं कर सकता. लोग बहुत कुछ छिपा जाते हैं इस दोहरेपन से गांधी ने खुद को बचाए रखा शायद इसीलिए उन्हें महात्मा की उपाधि मिली और राष्ट्रपिता के खिताब से भी वें नवाजे गए.

भोपाल में होगा हिंदुत्व का लिटमस टेस्ट

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या किसी अन्य की तुलना गांधी से करना उनका अनादर और अपमान करना ही है. लेकिन मोदी द्वारा फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार को दिये गए चर्चित  अंतरंग साक्षात्कार में कई ऐसी बातें और पहलू गायब थे, जिनके प्रति जिज्ञासा आम लोगों में है. इनमें से अहम बात ये  है, नरेंद्र मोदी की संदिग्ध शैक्षणिक योग्यता और उनका अपनी पत्नी जसोदाबेन को बेवजह छोड़ देना जिसकी त्रासदी और मानसिक व सामाजिक यंत्रणा वें आज तक भुगत रहीं हैं.

इस प्रायोजित इंटरव्यू में मोदी खुद को महान ही बताते दिखे जो अहम की पराकाष्ठा ही कही जाएगी. इस देश और परिवेश में खुद को महान और अवतार बताने का पहला पुराना टोटका है कि अपने जीवन वृत को राम और कृष्ण की लीलाओं की तरह प्रस्तुत करो. मोदी के पास आम खाने पैसे नहीं होते थे तो वे आम तोड़कर खाते थे, जैसी बातें उनके प्रति तात्कालिक सहानुभूति तो उत्पन्न करती हैं. लेकिन उनके प्रति आदर या सम्मान का भाव पैदा नहीं करतीं क्योंकि आज भी यानि उनके राज में करोड़ों लोग भूख और अभावों से ग्रस्त और त्रस्त हैं. जिनके बाबत भव्य लान या वातानुकूलित ड्राइंग रूम में बैठकर बतियाने से वे डरते हैं. इनके प्रति उनकी संवेदना शुद्ध राजनैतिक है. जो वोट जुगाड़ने का जरिया मात्र है नहीं तो लाल बहादुर शास्त्री की सादगी और दो धोतियों में प्रधानमंत्रित्व काल गुजार देने का प्रसंग कभी उनके लिए आत्म प्रचार या ब्रांडिंग का हथियार या जरिया नहीं बना.

बंगाल में क्यों गरमा रही है राजनीति

नरेंद्र मोदी अगर अपनी आत्ममुग्धता के लिए मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह उनकी जरूरत भी हो गई है, और मजबूरी भी क्योंकि उनकी 2014 बाली छवि को कभी का पलीता लग चुका है. इसमें कोई शक नहीं कि 5 फीसदी के लगभग एक प्रशंसक वर्ग उनका तैयार हो चुका है, जो उनकी हर अदा पर नई-नई प्रेयसी की तरह फिदा रहता है लेकिन इससे दस गुना ज्यादा एक और वर्ग भी निर्मित हो चुका है. जिसे इन बातों से या बातों में कोई दिलचस्पी नहीं कि वे अपनी मां को प्यार करते हैं और उनकी मां भी उन्हें चाहती हैं.

ये और इस तरह की बातें वोट करने का आधार नहीं हैं. आधार है उनका पांच साल का कार्यकाल जिसका मूल्यांकन 23 मई को होगा जिसमें वे फेल भी हो सकते हैं. मैं पहाड़ों पर गया था… मैंने ये पढ़ा वो पढ़ा… स्कूली जीवन में मैं यह करता था, वो करता था…. ये बातें भक्तों को रास आ रहीं हैं क्योंकि इस इंटरव्यू में अक्षय कुमार का रोल, बस शरीर होने भर का था नहीं तो मोदी खुद ही सवाल कर रहे थे और खुद ही जबाब दे रहे थे. किसी पेशेवर पत्रकार के सामने तो मोदी का लड़खड़ा जाना तय था. क्योंकि वह उन्हें आदर्श, महात्मा या अवतार नहीं मानता और पूछता कि आपने एमए की डिग्री किस कालेज से और कब ली हैं और यही मोदी नहीं चाहते.

चुनावी जंग में क्यों भाजपा से पिछड़ रही कांग्रेस?

कम पढ़े लिखे होना गुनाह नहीं है, गुनाह है जनता से सच छिपाना.  इन्दिरा गांधी भी कम  शिक्षित थीं लेकिन उनकी शिक्षा कभी विवादों या शक के दायरे में नहीं रही. पति फिरोज गांधी से उनका अलगाव भी कभी बहुत ज्यादा चर्चा का विषय नहीं बना. इन्दिरा गांधी या और किसी प्रधानमंत्री ने कभी ऐसे साक्षात्कार नहीं दिये जिसमें सिर्फ वें ही वें और उनकी अतिमानव बाली छवि प्रदर्शित होती हो. बात जहां तक अपनी भूतपूर्व गरीबी का हवाला देकर वाहवाही लूटने की है तो कम ही लोग जानते हैं कि मनमोहन सिंह मोदी से ज्यादा अभावों में पढ़े लिखे हैं. पर उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से इसका रोना चुनावी फायदे के लिए नहीं रोया.

नरेंद्र मोदी में अगर सच बोलने की हिम्मत और माद्दा है तो उन्हें अपनी रहस्मय पोशाक उतारनी ही होगी. जिसके चलते विरोधी हर कभी उनकी बोलती बंद कर देते हैं और यह सच उन्हें रियल हीरो भी बना सकता है, नहीं तो उनकी इमेज अभी एक ऐसे नेता की है जो काल्पनिक बातें भी इस तरह करता है मानों वे घटित हुई ही हो.

मुद्दों की बात, जातिधर्म का साथ

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