21 अप्रैल, रविवार  की शाम एक न्यूज चैनल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू प्रसारित हो रहा था. इस इंटरव्यू के दौरान एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप मौजूदा राजनेताओं में से किसे चुनौती मानते हैं. इस बाबत उन्हें कुछ विपक्षी नेताओं के नाम भी दिये गए. इस पर नरेंद्र मोदी का जवाब बड़ा दिलचस्प था कि नरेंद्र मोदी के लिए चुनौती सिर्फ नरेंद्र मोदी ही हैं. फिर बात को विस्तार देते वे खुद को देश की चिंता में डूबा हुआ बताते रहें कि मोदी ही कैसे मोदी के लिए चुनौती हैं. गोया की विपक्षी नेता भिनभिनाती हुईं मक्खियां हो जिनसे उनकी तुलना होना या करना जिल्लत या जलालत की बात है.

इस दृश्य ने बरबस ही शोले फिल्म के उस सीन की याद दिला दी, जिसमें गब्बर सिंह रामगढ़ बालों को धौंस नुमा समझाइश दे रहा है कि गब्बर के ताप से तुम्हें एक ही आदमी बचा सकता है खुद गब्बर.

बंगाल में क्यों गरमा रही है राजनीति

क्या है मौजूदा चुनाव प्रचार में इस जवाब के मायने, और क्यों और कैसे. यह नरेंद्र मोदी की हीन भावना और अहंकार है, जो तरह-तरह से बौखलाहट की शक्ल में प्रदर्शित भी हो रही है. इसे समझने के लिए भोपाल सीट का उदाहरण काफी है, जहां से भाजपा (दरअसल में आरएसएस) ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को मैदान में उतारकर यह गलतफहमी दूर कर दी है कि 17वीं लोकसभा के लिए चुनाव कट्टर हिन्दुत्व के नाम पर नहीं लड़ा जा रहा. इस सीट से कांग्रेस कोई एक महीना पहले ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को उम्मीदवार घोषित कर चुकी थी. प्रज्ञा भारती मालेगांव बम ब्लास्ट की आरोपी हैं और हाल फिलहाल जमानत पर हैं. उनकी उम्मीदवारी की घोषणा के बाद देश भर में जो बवंडर मचा, उसमें लोग भूल गए कि उन्हें अपना और देश का भविष्य तय करना है. न कि यह, हिन्दू और भगवा आतंकवाद जैसे शब्द देने वाले कांग्रेसी दिग्विजय सिंह के सही गलत होने का फैसला 12 मई को मतदान के जरिए करना है.

बात को उलट कर देखें तो भोपाल के वोटर्स को यह भी तय करना भड़काया जा रहा है कि वे प्रज्ञा भारती के साथ इंसाफ करें जिन्हें कथित तौर पर पुलिस हिरासत में अमानवीय तरह से प्रताड़ित किया गया है. 24 घंटों में भोपालवासी दहशत में आ गए कि आखिरकार यह हो क्या रहा है और प्रज्ञा भारती के आने का आगाज ऐसा है तो अंजाम कैसा होगा. प्रज्ञा भारती ने शहीद कहे जाने वाले आईपीएस अधिकारी हेमंत करकरे की आतंकियों द्वारा हत्या की वजह अपना श्राप बताया तो ऐसा लगा कि बात बात पर श्राप देने के लिए कुख्यात ऋषि दुर्वासा इस बार स्त्री रूप में अवतरित हो गए हैं और हम लोग यानि कि जनता लोकतंत्र से निकलकर सीधे त्रेता और द्वापर युग में पहुंच गए हैं जिनमें सत्ता और समाज के फैसले वोट और संविधान से नहीं बल्कि ऋषि मुनियों के आशीर्वादों और श्रापों से तय होते हैं. प्रज्ञा भारती ने दिग्विजय सिंह को महिषासुर नाम का राक्षस बताते उनके वध का उद्घोष सा भी कर दिया तो लोगों को समझ आ गया कि अब चुनाव नहीं बल्कि मजाक होने लगा है .

नेताओं के बिगड़े बोल कह दी गंदी बात

दो दौर की वोटिंग के बाद ही भाजपा को समझ आ गया था कि मोदी का जादू उतर चला है और हिन्दुत्व का करंट कहीं नहीं है, खासतौर से हिन्दी भाषी राज्यों में जो उसका गढ़ रहे हैं . ऐसे में हिन्दुत्व को मुद्दा बनाने उसे भोपाल सीट मुफीद लगी क्योंकि दिग्विजय सिंह हमेशा आरएसएस और कट्टर हिन्दुत्व को अपने निशाने पर रखते रहे हैं. दिग्विजय सिंह खुद भी कट्टर हिन्दू हैं लेकिन उनका हिन्दुत्व भाजपा और आरएसएस के हिन्दुत्व से अलग है, जो यह कहता है कि ये दोनों हिंसा और बम धमाकों में भरोसा करते हैं जबकि वे सिर्फ कर्मकांड करते अहिंसक हिन्दुत्व में भरोसा करते हैं.

एक महीने में भोपाल के तमाम छोटे बड़े मंदिरों में जाकर देवी देवताओं के सामने माथा टेकने वाले दिग्विजय सिंह के बारे में आम राय यह है कि वे हिंदुओं से ज्यादा मुसलमानों के करीबी और हितैषी हैं. यह बात एक हद तक सच भी है, जिसका फायदा उठाते ही भगवा खेमे ने प्रज्ञा भारती पर दांव खेलते देश भर में मैसेज दे दिया कि अब उसके पास कुछ नहीं बचा है लिहाजा बाकी चरणों के मतदान में लोग उसके इस नए पुराने एजेंडे को जेहन में रखते वोट करें. भाजपा के पास उपलब्धियों के नाम पर कुछ नहीं है बेरोजगार, किसान, महिला सुरक्षा, विकास, शिक्षा और स्वास्थ बगैरह के नाम पर वह जो गिना रही है. उसका खोखलापन आंकड़ों की चादर से ढक नहीं पा रहा .

कहने का मतलब यह नहीं की आतंकवाद को सहज स्वीकार लिया जाए बल्कि यह है कि इसके नाम पर डर और दहशत फैलाने की अव्यवहारिक राजनीति न की जाये. नरेंद्र मोदी की खोखली होती दहाड़ उसी सूरत में प्रभावी होती जब वे वादे के मुताबिक गरीबी, बेरोजगारी, किसान आत्महत्याएं, कालाधन, भ्रष्टाचार वगैरह वगैरह खत्म नहीं तो थोड़ा बहुत कम ही कर चुके होते.

चुनावी जंग में क्यों भाजपा से पिछड़ रही कांग्रेस?

भाजपा का प्रचार नरेंद्र मोदी के इर्द गिर्द सिमट कर रह जाना कतई हैरत या हर्ज की बात नही है. एतराज की बात है कि उनका धर्म को देश और देश को धर्म बताना जिसके झांसे में 8–10 फीसदी लोग हैं भी. ये लोग ऊंची जातियों के हैं जिन्होंने कभी भूख, अभाव, गरीबी, भेदभाव और छुआछूत का न दंश सहा है और न ही इसका दर्द भोगा है. उल्टे ये लोग चाहते हैं कि वह सुनहरा दौर फिर से आए जिसमें शूद्र उनकी सेवा करता रहता था जिसकी औरते इनकी हवस मिटाने सहज उपलब्ध रहतीं थीं. छोटी जाति वाले ये लोग  गुलामों की तरह इनके खेतों में काम करते रहते थे और ये लोग अय्याशी में डूबे या तो हवेली में मुजरा देखते हुक्का गुडगुड़ाते रहते थे या फिर मंदिरों में पसरे दक्षिणा के पैसे गिनते रहते थे .

क्या करेंगे भोपाली –

प्रज्ञा भारती की भोपाल से उम्मीदवारी इसी काल को आधुनिक तरीके से लाने का आश्वासन है कि यूं ही भगवाधारियों को चुनते रहो धीरे धीरे जातिगत आरक्षण और एट्रोसिटी एक्ट वगैरह बंद कर दिये जाएंगे. भोपाल में न तो प्रज्ञा भारती की जीत गारंटेड है और न ही दिग्विजय सिंह की क्योंकि दोनों ही हिन्दुत्व की राजनीति कर रहे हैं. साढ़े चार लाख मुसलमान वोटरों का तो कांग्रेस में जाना तय है लेकिन 15 लाख के लगभग हिन्दू  वोटर असमंजस हैं कि क्या करें .

भोपाल के मतदाताओं के सामने एक तरफ कुआ है तो दूसरी तरफ खाई है.  एक नपीतुली साजिश के तहत भाजपा की तरफ से अंदरूनी तौर पर प्रचार यह किया जा रहा है कि अगर दिग्विजय सिंह जीते तो मुसलमान हावी हो जाएंगे और राज्य सरकार में उनका दखल और रुतबा बढ़ जाएगा जिससे प्रदेश फिर उनके कार्यकाल की तरह पिछड़ जाएगा. कांग्रेस जिस हिन्दुत्व पर लड़ रही है वह शायद ही लोगों को रास आए. दिग्विजय सिंह की इमेज भाजपा ने एक पाखंडी और छद्म हिन्दू की बना दी हैं, जिससे उबर पाने का कोई टोटका दिग्विजय सिंह जैसे तजुर्बेकार नेता के पास नहीं है. जिसके विकास के दावे और विजन पर लोग यकीन नहीं कर पा रहें .

लोग वोट तो प्रज्ञा भारती को भी नहीं करना चाह रहे. पुराने भोपाल के चौक स्थित भाजपा समर्थित एक सर्राफा व्यापारी की मानें तो साध्वी को नहीं मालूम कि भोपाल लोकसभा कहाँ से शुरू होकर कहाँ खत्म होती है. उन्हें राजनीति की भी समझ और तमीज नहीं है इसके अलावा उनका अतीत भी अच्छा नहीं है उन्हें अगर आतंकवादी कहा जाता है तो इसमें गलत क्या है . ऐसे में लोग उन्हें भी चुनने से कतरा रहे हैं.

राफेल पर फ्रेंच मीडिया ने बढ़ायी मोदी की मुश्किल

अब 23 मई की गिनती में क्या होगा यह देखना कम सस्पेंस और कम दिलचस्पी की बात नहीं होगी क्योंकि दांव पर भोपालियों की बुद्धि और समझ भी लगी है. दिग्विजय सिंह हारे तो उनका सियासी कैरियर बिलकुल खत्म हो जाएगा और साध्वी प्रज्ञा हारीं तो वे अपना डेरा डंगर समेटकर सूरत स्थित अपने आश्रम चली जाएंगी.  उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है. जिस मंशा से उन्हें मैदान में उतारा गया है वह बेहद साफ है कि जनता मोदी और उनकी सरकार का आकलन किस आधार पर करती है, पांच साल के लचर काम काज पर या फिर थोपे जा रहे कट्टर हिन्दुत्व पर जिससे पंडों के अलावा कभी किसी को कुछ नहीं मिला और न आगे कभी मिलेगा. बात सिर्फ इतनी सी है कि नरेंद्र मोदी नकारे जाने लगे हैं लेकिन वही जैसे तैसे भाजपा को सत्ता की दौड़ में रखे हुये भी हैं. लेकिन धर्म और कट्टर हिन्दुत्व उनकी नैया पार लगा पाएगा यह जरूर मुमकिन नहीं.

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