भारतीय मनोरंजन चाहे वह सिनेमा का हो या टीवी का या फिर वीडियो स्ट्रीमिंग का, दिलचस्प दौर में पहुंचता जा रहा है. एक समय ऐसा था जब बौलीवुड या हिंदी सिनेमा और टीवी के कार्यक्रमों को राष्ट्रीय मनोरंजन माना जाता है. मगर अब सारी क्षेत्रीय भाषाओं का इंद्रधनुष अपने सारे रंगों के साथ आसमान पर छा रहा है. पहली बार क्षेत्रीय भाषाओं का मनोरंजन अपनी भौगोलिक सीमाओं को तोड़ कर राष्ट्रीय पहचान बना रहा है. यह सुखद आश्चर्य की बात है कि वैश्वीकरण के दौर में लोग अपने क्षेत्र से बहुत दूर दुनियाभर में बसते हैं मगर वहां भी वे अपनी जड़ों से जुड़ने को लालायित रहते हैं.

वर्ष 2017 मनोरंजन की दुनिया में भारी उथलपुथल का दौर रहा, क्षेत्रीय सिनेमा के लिए तो यह महत्त्वपूर्ण मोड़ है. कथ्य और विषयवस्तु के लिहाज से दक्षिण भारतीय भाषाएं इतनी लोकप्रिय थीं कि दक्षिण भारत में जितने सिनेमाघर हैं उतने हिंदीभाषी इलाकों में नहीं हैं.

यह भी हकीकत है कि दक्षिण में सिनेमा इतना लोकप्रिय रहा है कि तेलुगू और मलयालम में हिंदी से ज्यादा फिल्में बनती रही हैं. मगर अब सिनेमा के बौक्सऔफिस और टीवी व वीडियो स्ट्रीमिंग की दर्शक संख्या के आंकड़े बताते हैं कि क्षेत्रीय मनोरंजन का अच्छा दौर तो अब आया है.

अब केवल बौलीवुड या केवल हिंदी सिनेमा या टीवी को ही राष्ट्रीय मनोरंजन मानने का जमाना लद गया. आज मनोरंजन की दुनिया में भारतीय भाषाओं के इंद्रधनुष का हर रंग महत्त्वपूर्ण है.

भारतीय भाषाओं का मनोरंजन न केवल अपने पैरों पर खड़ा हो गया है बल्कि फलफूल रहा है. अब तक भले ही फिल्मों का मतलब हिंदी सिनेमा समझा जाता हो, पर पिछले साल की सब से ज्यादा कमाई वाली फिल्म ‘बाहुबली’ थी जो मूल रूप से तेलुगू और तमिल में बनी. फिर उसे हिंदी के अलावा मलयालम तथा फ्रैंच में डब किया गया.

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