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नास्तिकता की ओर बढ़ रही है दुनिया

ईश्वर, अल्लाह, खुदा एक ऐसी परिकल्पना है, जिसके होने या न होने की कोई सटीक जानकारी इन्सान को कभी उपलब्ध नहीं हुई. फिर भी इस परिकल्पना में विश्वास रखने वाले लोग अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा उससे जुड़े विभिन्न अनुष्ठानों, धार्मिक क्रियाकलापों, व्रत, त्योहार, तीर्थयात्राओं, दान-पुण्य इत्यादि में व्यतीत कर देते हैं. अधिकांश चीजें तो हम इस डर से करते हैं कि न किया तो लोग क्या कहेंगे? इन चीजों में मनुष्य का बहुत सारा धन, समय और संसाधन लगते हैं. इन्सान हमेशा से अपनी ऊर्जा, धन और जीवन उस चीज के लिए खपा रहा है, जिसके बारे में यह गारन्टी आज तक नहीं मिली कि सचमुच में वह है भी, या नहीं. हम बात कर रहे हैं ‘ईश्वर’ की.

सुसाइड : अवसाद और बीमारी है आत्महत्या का बड़ा कारण

विज्ञान मानता है कि धरती पर इन्सान की उत्पत्ति कोई तीन लाख साल पहले हुई है, मगर इस लम्बे समय-काल में एक भी ऐसी प्रमाणिक घटना सामने नहीं आयी, जब किसी मनुष्य ने ईश्वर से मुलाकात की कोई सटीक और प्रमाणिक जानकारी दी हो. न जन्म लेकर आने वाले किसी मनुष्य ने कहा कि वह ईश्वर से मिल कर आ रहा है और न मृत्यु के बाद किसी ने लौट कर बताया कि उसने ईश्वर को या उसके सदृश्य किसी को देखा. ईश्वर है या नहीं, इस पर सदियों से संशय बना हुआ है. उसके बारे में असंख्य सवाल हैं कि वह है तो कैसा है? वह कहां है? उसने सृष्टि की रचना क्यों की? उसने मनुष्य की रचना क्यों की? उसने अन्य जीवों की रचना क्यों की? जीवन और मृत्यु का रहस्य क्या है? ईश्वर के नाम पर जो धार्मिक कर्म हम करते हैं क्या उन्हें करने का आदेश ईश्वर ने स्वयं दिया है? दिया तो कब और किसको दिया? अगर हम उस आदेश का पालन न करें तो क्या वह हमें दण्डित करता है? इस धरती पर सिर्फ मनुष्य ही ईश्वर के नाम पर अराधना, भक्ति, पूजा-पाठ, दान-पुण्य, लड़ाई-झगड़ा, जंग या कत्लेआम क्यों करता है, अन्य जीव-जन्तु ईश्वर के नाम पर यह सारे कर्म क्यों नहीं करते? क्या उनको यह छूट ईश्वर ने प्रदान की है? आदि, आदि.

पुरुषों के लिए घातक धंधेवालियां

आश्चर्यजनक है कि यदि सृष्टि की रचना ईश्वर ने की है तो मनुष्य को छोड़कर अन्य कोई भी पशु, पक्षी या वनस्पति ईश्वर के नाम पर कोई धार्मिक कर्मकाण्ड क्यों नहीं करती? ईश्वर का नाम लेकर कोई जीव दूसरे जीव से नहीं लड़ता. उनके बीच धर्म के नाम पर कोई बंटवारा नहीं होता. उनके बीच लड़ाई सिर्फ भोजन, सेक्स और इलाके पर अपने वर्चस्व को लेकर ही होती है, जो जीवन को जीने के सिद्धान्त पर आधारित है.

आस्था ने फैलायी नफरत

दुनिया का हर धर्म और सम्प्रदाय खंगाल लीजिए, उनमें मूल बातें लगभग एक जैसी ही हैं. मुख्य बात यह है कि हर धर्मग्रन्थ कहता है कि ईश्वर एक है. जब ईश्वर एक है तो दुनिया में धर्म भी एक ही होना चाहिए था, मगर ऐसा नहीं है. सैकड़ों धर्म और हजारों सम्प्रदाय हैं और हरेक ने अपने-अपने ईश्वर गढ़ रखे हैं. यानि धार्मिक और आस्थावान लोग धर्मग्रन्थों में कही इस मूल बात को ही नहीं मानते कि ‘ईश्वर एक है.’

सुसाइड-आखिर क्यों जीना नहीं चाहती नई पीढ़ी

यही नहीं, अलग-अलग धर्म और सम्प्रदाय के मानने वाले लोग अपने-अपने ईश्वर को लेकर दूसरे धर्म और सम्प्रदाय के लोगों से सदियों से लड़ते आये हैं. दुनिया की अब तक की तमाम लड़ाईयां धर्म के नाम पर ही हुई हैं. यहूदियों, ईसाईयों और मुसलमानों के बीच जो जंग सदियों से चली आ रही है उसके मूल में सिर्फ धर्म है. हिन्दू और मुसलमानों के बीच लड़ाई का कारण धर्म है. करोड़ों-अरबों लोग धर्म के नाम पर कत्ल कर दिये गये. सच पूछें तो धर्म और ईश्वर ने सदा से इन्सान की इन्सान से जंग करवायी है. धर्म ने इन्सान के अन्दर डर, कट्टरता, उन्माद, नफरत, नकारात्मक सोच और हिंसा पैदा की है. यानी धर्म एक विध्वंसकारी तत्व है, जो सृष्टि का नाश कर रहा है, न कि विकास. सोचिए अगर धर्म और ईश्वर जैसी अवधारणा इस धरती पर न होती तो न तो धरती के इतने टुकड़े होते और न इन्सान के.

मुझे बचपन की घटना याद आती है. डॉ. जुनैद आलम का परिवार तब हमारे पड़ोस के घर में रमजान के महीने में शिफ्ट हुआ था. ईद वाली सुबह मैं सिंवई का कटोरा लेकर उनके घर पहुंची कि उनकी अम्मा को सिवंई दे आऊं, तो जुनैद भाई को घर पर देखकर मैंने हैरानी जतायी. दरअसल वह नमाज का वक्त था और तमाम घरों के पुरुष मोहल्ले की मस्जिद में ईद की नमाज के लिए गये हुए थे, मगर ये जनाब हाफ पैंट पहने पानी का ट्यूब हाथ में लिए अपने कुत्ते को नहलाने में मशगूल थे.

मैंने पूछा कि आप नमाज के लिए नहीं गये, तो हंसते हुए बोले, ‘नहीं, मेरी इबादत अलग ढंग की है. क्यूपिड (उनका पालतू कुत्ता) के साथ मुझे ज्यादा सुकून मिलता है. यही मेरी इबादत है.’
ईद के रोज कोई मुसलमान नमाज न पढ़े, यह बहुत बड़ा गुनाह था, ऐसा मुझे हमेशा से बताया गया था और इस पर मैं गहरा विश्वास करती थी, मगर उस दिन जुनैद भाई के जवाब ने मेरे विश्वास को बहुत धक्का पहुंचाया. एक मुसलमान ईद के रोज नमाज अता न करे, यह बात मेरे गले से नहीं उतर रही थी. मगर जैसे-जैसे मैं उनके विचारों से रूबरू होती गयी, ऐसे बहुत से सवाल मेरे जेहन में उभरने लगे, जिनका कोई माकूल जवाब किसी मुल्ला, किसी पंडित या किसी धर्मगुरु के पास मैंने नहीं पाया. जुनैद का कहना था, ‘अव्वल तो मैं यह मानता ही नहीं हूं कि अल्लाह जैसी कोई चीज मौजूद है और अगर मान लूं कि है, और मरने के बाद उससे भेंट होनी है, तो एक बार भेंट हो जाए फिर मैं उससे ही पूछ लूंगा कि नमाज पढ़ना, हज करना, रोजा रखना जरूरी है, या नहीं और अगर जरूरी है तो क्यों है?’ वो कहते, ‘मैं उस चीज पर विश्वास करता हूं जिसे मैं अपनी आंखों के सामने देखता हूं, जिसे मैं महसूस करता हूं, जिसे मैं छू सकता हूं और जिससे मैं अपनी भावनाओं को बांट सकता हूं. जैसे मेरा यह क्यूपिड (उनका पालतू कुत्ता), जिसका साथ मुझे हमेशा प्यार और सुकून से भर देता है.’

पहलवानी के नाम पर दहशतगर्दी

जुनैद भाई मेडिकल की पढ़ाई के बाद आज एक सफल सर्जन हैं. उन्होंने एक दलित डॉक्टर लड़की से शादी की और अपने दो बच्चों के छोटे से परिवार में बेहद खुश हैं. वे और उनकी पत्नी दोनों नास्तिक हैं और बेहद सुखी हैं. उनका सारा समय मानवता की भलाई में गुजरता है. जुनैद या उन जैसे नास्तिक लोगों को कम से कम धर्म के नाम पर कोई उकसा नहीं सकता, ईश्वर के नाम पर कोई उनको हिंसा के लिए मजबूर नहीं कर सकता. किसी दंगे-फसाद, धार्मिक उन्माद फैलाने या इन्सानियत का खून बहाने में उनकी कोई भूमिका नहीं होती. जुनैद भाई के सानिध्य ने मेरे सामने यह बात आइने की तरह साफ कर दी कि हम धर्म और ईश्वर के नाम पर ताउम्र जो कुछ भी करते रहते हैं, उनका कोई मतलब नहीं है. हम अपनी जिन्दगी का बड़ा हिस्सा और बड़ा पैसा बेमतलब की चीजों में गंवा रहे हैँ. यह समय और पैसा मानवता की भलाई में लगाया जाये तो धरती का रूप निखर जाये.

इसी कड़ी में कल आगे पढ़िए-मैं नास्तिक क्यों हूं…………….

खतरे में है व्यक्तिगत स्वतंत्रता

व्हाट्सऐप, ट्विटर, फेसबुक आजकल दुनियाभर में सरकारों और समाजों के निशाने पर हैं. जब से फेसबुक का कैंब्रिज एनालिटिक्स को अपने से जुड़े लोगों के व्यवहार के बारे में डेटा बेच कर पैसा कमाने की बात सामने आई है, तब से लगातार डिजिटल मीडिया, डिजिटल संवादों पर सवाल उठ रहे हैं. गूगल के सुंदर पिचाई ने अमेरिकी संसद कोबताया है कि गूगल चाहे तो मुफ्त भेजे जाने वाले जीमेल अकाउंटों के संवाद भी वे पढ़ सकता है.

असल में डिजिटल क्रांति दुनिया के लिए खतरनाक साबित हो रही है कुछ हद तक परमाणु बमों की तरह. परमाणु परीक्षणों का विनाशकारी उदाहरण बाद में देखने को मिला पर उस दौरान किए गए शोध का फायदा बहुत से अन्य क्षेत्रों में बहुत हद तक हुआ है और आजकल जो रैडिएशन के दुष्प्रभाव की बात हो रही है वह परमाणु परीक्षणों से ही जुड़ी है. डिजिटल क्रांति में उलटा हुआ है. पहले लाभ हुआ है, अब नुकसान दिख रहे हैं.

दलितों की बदहाली

न केवल आज डिजिटल मीडिया या सुविधा से अपनी बात मित्रों, संबंधियों, ग्राहकों तक पहुंचाई जा सकती है, इस का जम कर फेक न्यूज फैलाने में भी इस्तेमाल हो सकता है.

दुनियाभर में फेक मैसेज भेजे जा रहे हैं. स्क्रीनों के पीछे कौन छिपा बैठा है यह नहीं मालूम इसलिए करोड़ों को मूर्ख बनाया जा रहा है और लाखों को लूटा भी जा रहा है. लोग फेसबुक, व्हाट्सऐप केजरीए प्रेम करने लगते हैं जबकि असलियत पता ही नहीं होती. जो बात 2 जनों में गुप्त रहनी चाहिए वह सैकड़ों में कब बंट जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. पीठ पीछे की आप की बात कहां से कहां तक जाएगी आप को पता भी नहीं चलेगा.

पंडों की सरकार, जनता है बेहाल

सरकारों के लिए ये प्लैटफौर्म बहुत काम के हैं. वे कान मरोड़ कर उन से अपने विरोधियों के मेल, मैसेज, बातें सब पता कर लेती हैं.

आज मोबाइल पर कही गई बात भी सुरक्षित नहीं है, क्योंकि उस का रिकौर्ड कहीं रखा जा रहा. न केवल आप ने कहां से किस को फोन किया यह रिकौर्डेड है, क्या बात की यह भी रिकौर्डेड है. हां, उसे सुनना आसान नहीं यह बात दूसरी है. पर खास विरोधी का हर कदम सरकार जान सकती है. टैक कंपनियां असल में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सब से बड़ा अंकुश बन गई हैं. पहले लगा था कि इनसे अपनी बात लाखोंकरोड़ों तक पहुंचाई जा सकती है.

सोशल मीडिया और झूठ

आप कागज पर ही लिखें,यह तो नहीं कहा जा सकता पर यह जरूर ध्यान में रखें कि सरकारी शिकंजा आप के गले में तो है ही आप व्यापारियों के लिए भी टारगेट बन रहे हैं. वे आप की सोच, आप के खरीदने के व्यवहार को भी नियंत्रित कर रहे हैं.

बालों की परेशानियों से बचने के लिए रखें इन 5 बातों का ध्यान

अगर आप अपनी बालों को लेकर हमेशा परेशानी रहती हैं. तो इसमें बालों की परेशानी आपकी खुद की लापरवाही भी होती है. अक्सर आप छोटी-छोटी गलतियां कर बैठती है, जिससे आपके बाल खराब हो जाते हैं. पर आप कुछ बातों का ख्याल रखकर भी इन परेशानीयों से राहत पा सकती हैं.

  1. ज्यादा कंघी न करें

बालों में बहुत ज्यादा कंघी करने से भी बाल टूटते हैं. अपने स्कैल्प पर धीरे से मालिश करें और फिर कंघी करें.

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2. तौलिए से बालों को ज्यादा न रगड़ें

गीले बालों को तौलिए से बहुत ज्यादा न रगड़ें. गीले बालों को सूखे तौलिए से एक बार पोंछकर छोड़ देना चाहिए और हवा से सूखने देने के बाद ही उसमें कुछ लगाना चाहिए.

3. हर दिन शैंपू करना

हर रोज बालों में शैंपू न करें इससे बाल कमजोर होते हैं और टूटने लगते हैं. अच्छे से अच्छे प्रोडक्ट में भी केमिकल होते हैं, जिसके चलते बाल ड्राई होने लगते हैं.

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4.  बालों में बहुत हीट न लगाएं

बालों में बहुत हीट के इस्तेमाल से भी बाल टूटते-झड़ते हैं. अगर आपको हेयर स्टालिंग करना बहुत पसंद है तो नियमित रूप से बालों की अच्छी कंडिश्निंग करें.

5. नियमित हेयर ट्रीमिंग करवाएं

ट्रीमिंग करवाने में हम कई बार लापरवाही बरतते हैं, लेकिन बहुत जरूरी है कि बाल खराब होने से पहले नियमित रूप से ट्रीमिंग करवाते रहें.

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posted by- saloni

जानें कैसे बनाएं कीमा मटर

कीमा मटर को आप आसानी से घर पर बना सकती हैं. इसे आप लंच या डिनर में चावल और रोटी के साथ सर्व कर सकती हैं. कीमा मटर बनाने के लिए कई सारे मसालों का  भी इस्तेमाल  किया जाता है. तो चलिए जानते हैं कैसे बनाएं मटर कीमा.

घर पर बनाएं लजीज ‘पनीर कौर्न कबाब’

सामग्री

– प्याज (1 कप कद्दूकस किया हुआ)

– अदरक पेस्ट (1 टी स्पून)

– लहसुन पेस्ट (1 टी स्पून)

– टुकड़ों में कटा हुआ (2 कप टमाटर)

– नमक (स्वादानुसार)

– धनिया पाउडर (1 टेबल स्पून)

जानें बिस्किट बनाने के रेसिपी

– हल्दी (1/2 टी स्पून)

– लाल मिर्च पाउडर (1/2 टी स्पून)

– 1 टेबल स्पून हरा धनिया (टुकड़ों में कटा हुआ)

– मीट कीमा (1/2 kg)

– हरे मटर (1 कप)

– घी (1/2 कप)

– जीरा (2 टी स्पून)

– लौंग (4)

– दालचीनी (1 टुकड़े)

– कालीमिर्च (4)

– 1 बड़ी इलाइची

– 2 तेजपत्ता

क्रिस्पी अंडा पराठा की रेसिपी

बनाने की वि​धि

– पैन में घी गर्म करें और इसमें जीरा, लौंग, दालचीनी, कालीमिर्च, इलाइची और तेजपत्ता डालें.

– जब साबुत मसाले चटकने लगे तो इसमें लहसुन, अदरक और प्याज डालें, इसे तब तक फ्राई करें जब तक तेल अलग न हो जाए.

– इसमें टमाटर, नमक, धनिया पाउडर, हल्दी और लाल मिर्च पाउडर डालें.

– इसे चलाते रहें जब तक इसका तेल अलग नहीं हो जाता है और इसकी आंच बढ़ा दें, इसमें कीमा और     मटर डालें.

– इसे थोड़ी देर चलाते रहे जब तक कीमा फ्राई नहीं हो जाता, इसके बाद आंच हल्की कर दें और इसे तक पकाएं जब तक तेल अलग न हो जाए.

– हरे धनिए से गार्निश करके इसे सर्व करें.

इस तरह बनाएं लजीज ‘पनीर टिक्का’

 

posted by- saloni

वजन कम करने के लिए सौंफ का इन 3 तरीको से करें इस्तेमाल

आमतौर पर सौंफ आपके घर में मिल जाती है. और इसका इस्तेमाल मसाले के तौर पर किया जाता है. सौंफ में काफी पोषक तत्व होते हैं. सौंफ कैल्शियम के साथ-साथ आयरन और सोडियम का अच्छा सोर्स है. सौंफ में पोटैशियम जैसे खनिज तत्व भी होते है.

बता दें कि सौंफ के कई फायदे होते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि सौंफ वजन कम करने में या मोटापा घटाने में भी मददगार है? जी हां, सौंफ में कई ऐसे पोषक तत्व हैं जो आपकी वजन कम करने और मोटापा दूर करने में मदद कर सकते हैं..सौंफ में काफी मात्रा में फाइबर होते हैं. जो आपको पेट भरा होने का अहसास करता है. इससे आप ज्यादा कैलोरी लेने से बच जाते हैं और वजन कम करने में मदद करता है. इसे खाने से आप अपने मोटापे को नियंत्रण में कर सकते हैं.

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सौंफ फैट को शरीर पर जमने नहीं देती और यह मोटापे को कम करने में मददगार साबित हो सकती है. तो चलिए जानते हैं कि सौंफ कैसे वजन कम करने या मोटापा घटाने में मदद आती है.

  1. अगर आप वजन या मोटापा कम करना चाहते हैं और इसमें सौंफ से लाभ लेना चाहते हैं तो आपको सौंफ को अपने आहार में शामिल करना होगा. इसे आप सौंफ की चाय बनाकर या सौंफ का पानी लेकर आहार में शामिल कर सकते हैं.

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2. एक या दो चम्मच सौंफ को एक गिलास पानी में रातभर के लिए भिगो दें. सुबह उठते ही सबसे पहले इसे पी लें.

3. एक चम्मच सौंफ या फेनल सीड्स लें. इन्हें गर्म पानी में डालें. इस बात का ध्यान रखें कि आप इन्हें उबाले न. ज्यादा उबालने से इनके पोषक तत्व खत्म हो सकते हैं. अब इसे तकरीबन दर मिनट तक ढ़क कर रख दें. इसे दिन में दो से तीन बार पीएं.

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स्लीपिंग पार्टनर

पूर्व कथा

मनु को एक दिन पत्र मिलता है जिसे देख कर वह चौंक जाती है कि उस की भाभी यानी अनुपम भैया की पत्नी नहीं रहीं. वह भैया, जो उसे बचपन में ‘डोर कीपर’ कह कर चिढ़ाया करते थे.

पत्र पढ़ते ही मनु अतीत के गलियारे में भटकती हुई पुराने घर में जा पहुंचती है, जहां उस का बचपन बीता था, लेकिन पति दिवाकर की आवाज सुन कर वह वर्तमान में लौट आती है. वह अनुपम भैया के पत्र के बारे में दिवाकर को बताती है और फिर अतीत में खो जाती है कि उस की मौसी अपनी बेटी की शादी के लिए कुछ दिन सपरिवार रहने आ रही हैं. और सारा इंतजाम उन्हें करने को कहती हैं.

आखिर वह दिन भी आ जाता है जब मौसी आ जाती हैं. घर में आते ही वह पूरे घर का निरीक्षण करना शुरू कर देती हैं और पूरे घर की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले लेती हैं. पूरे घर में उन का हुक्म चलता है.

बातबात पर वह अपनी बहू रजनी (अनुपम भैया की पत्नी) को अपमानित करती हैं, जबकि वह दिनरात घर वालों की सेवा में हाजिर रहती है और मौसी का पक्ष लेती है. एक दिन अचानक बड़ी मौसी, रजनी को मनु की मां के साथ खाना खाने पर डांटना शुरू कर देती है तो रजनी खाना छोड़ कर चली जाती है. फिर मनु की मां भी नहीं खाती. मौसी, मां से खाना न खाने का कारण पूछती है, और अब आगे…

गतांक से आगे…

अंतिम भाग

मां की आवाज भर्रा गई थी, ‘दीदी, मेरी रसोई से कोई रो कर थाली छोड़ कर उठ जाए, तो मेरे गले से कौर कैसे उतरेगा?’

‘पागल है तू भी, उस की क्या फिक्र करनी, वह तो यों ही फूहड़ मेरे पल्ले पड़ी है, मैं ही जानती हूं कि कैसे इसे निभा रही हूं.’

शादी के दिन पास आते जा रहे थे. मां ने मुझे सब के कपड़े एक अटैची में रखने को कहा तो मैं बक्सों की कोठरी में कपड़े छांटने के लिए बैठ गई. कोठरी से लगा हुआ बड़ा कमरा था. अनजाने ही मेरे कानों में फुसफुसाहट के स्वर आने लगे.

प्रमिला दीदी का दांत पीसते हुए स्वर सुनाई पड़ा, ‘बड़ी भली बनने की कोशिश कर रही हो न? सब जानती हूं मैं, मौसी तो गुस्से से आग हो रही थीं, क्यों सब के सामने बेचारी बनने का नाटक करती हो, क्या चाहती हो, सब के सामने हमारी बदनामी हो? खुश हो जाओगी न तब? जबान खोली तो खींच लूंगी.’

मुझे लगा कि वहां काफी लोग खडे़ हैं, जो इस बात से अनजान हैं कि मैं वहां हूं, थोड़ा झांक कर देखने की कोशिश की तो अनुपम भैया भी वहीं खडे़ थे. एक के बाद एक आश्चर्य के द्वार मेरे सामने खुल रहे थे कि किसी घर के लोग अपनी बहू का इतना अपमान कर सकते हैं और वहीं खड़ा हुआ उस का पति इस अपमान का साक्षी बना हुआ है. छि:, घृणा से मेरा तनबदन जलने लगा पर मैं वहां से उठ कर बाहर आने का साहस नहीं जुटा सकी और घृणा, क्रोध, आक्रोश की बरसात उस एक अकेली जान पर न जाने कब तक चलती रहती अगर तभी निर्मला दीदी न आ गई होतीं.

‘क्या हो गया है तुम सब को? वहां मेरे सासससुर ने अगर इस झगडे़ की जरा सी भी भनक पा ली तो मेरा ससुराल में जीना मुश्किल हो जाएगा. इन्हें पहले से ही समझाबुझा कर लाना चाहिए था मां, अब तमाशा करने से क्या फायदा?’

सब चुपचाप कमरे से चले गए थे. यह सोच कर मैं अंदर के कमरे से बाहर निकल आई, पर रजनी भाभी वहां अभी भी आंसू बहाती बैठी हैं, यह मुझे पता नहीं था. अचानक मुझे देख कर वह चौंक उठीं. कोई एक जब उन के इतने अपमान का साक्षी बन गया, यह उन की सोच से बाहर की बात थी. ‘आप? आप कहां थीं दीदी.’

पर मेरा सवाल दूसरा था, ‘क्यों सहती हैं आप इतना?’

‘क्या?  सहना कैसा? मैं तो हूं ही इतनी बेककूफ, क्या करूं? मुझ से अपने बच्चे तक नहीं संभलते. अम्मांजी जैसी होशियार तो बहुत कम औरतें होती हैं, पर छोडि़ए, यह सब तो चलता ही रहता है, कह कर वह बाहर निकल गईं.

आज की घटना ने मुझे पूरी तरह झकझोर दिया था. बारबार मन में यह सवाल उठ रहा था, छि:, इतने बडे़ शहर के लोग, और इतनी संकीर्ण सोच?

सब से ज्यादा खीज मुझे अनुपम भैया पर आ रही थी, उन का स्वभाव घर के सब सदस्यों से अलग था. कभी वह रसोई में व्यस्त मां को बाहर बैठा कर गप्पें मारने लगते. मेरी तो हरपल की उन्हें खबर रहती. अचानक ही कहीं से आ कर मेरे सिर पर स्नेह से हाथ रख देते, ‘चाय पिएगी? या खाना नहीं खाया अभी तक, चल साथसाथ खाएंगे.’

मेरा ही मन अनुपम भैया से ज्यादा बात करने को नहीं होता. यही लगता कि जो आदमी दूसरों से अपनी पत्नी को अपमानित होते हुए देखता रह सकता है वह कैसे एक अच्छा इनसान हो सकता है. पर वह सचमुच एक अच्छे इनसान थे, जो व्यस्त रहने के बावजूद समय निकाल कर अपने उपेक्षित पिता से भी कुछ बातें कर लेते, होने वाले प्रबंध के बारे में भी उन्हें जानकारी दे देते थे.

घर का आर्थिक ढांचा पूरी तरह चरमरा रहा था. मां किसी हद तक खुद को ही दोषी मान रही थीं पर वह अपनी कृष्णा बहन से कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थीं. जिंदगी में संघर्षों को झेलते हुए मौसी इतनी कठोर हो गई थीं कि मां की भावुकता और संवेदनशीलता को वह बेकार की सोच समझती थीं.

शादी के स्थान और बाकी सबकुछ का प्रबंध बाबूजी से उन के बेटों ने समझ लिया था और पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी. अब यहां पर बाबूजी एक महत्त्वहीन मेहमान बन कर रह गए थे. मां को तो यहां आ कर भी रसोई से मुक्ति नहीं मिली थी और हम भाईबहन अपने में ही व्यस्त रहने लगे थे.

बहुत हिम्मत कर के एक दिन मैं ने अनुपम भैया को तब पकड़ लिया जब वह अपनी छिपी हुई बिटिया को ढूंढ़ते हुए हमारे कमरे में आ गए थे. मुझे देख कर खुश हो गए और बोले, ‘अब प्रमिला की शादी से छुट्टी पा कर तेरे लिए देखता हूं कोई अच्छा लड़का…’

‘मुझे नहीं करनी शादीवादी,’ गुस्से से भड़क उठी मैं.

चेहरे पर बेहद हैरानी का भाव आ गया, फिर नकली गंभीरता दिखाते हुए बोले, ‘हां, ठीक है…मत करना, वैसे भी तेरी जैसी लड़की के लिए लड़का ढूंढ़ना होगा भी खासा मुश्किल काम.’

‘मुझ से फालतू बात मत कीजिए, मैं आप से कुछ गंभीर बात करना चाहती हूं, मुझे यह बताइए कि आप रजनी भाभी के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं?’ मैं जल्दीजल्दी उन से अपनी बात कह देना चाहती थी.

‘कैसा व्यवहार?’

‘मुझ से मत छिपाइए, क्यों, आप के सामने ही सब आप की पत्नी की इस तरह बेइज्जती करते हैं, क्या उन के लिए आप की कोई जिम्मेदारी नहीं है? मौसी तो खैर बड़ी हैं, उन का सम्मान करना आप का कर्तव्य है, पर आप से छोटे अजय भैया, सुधीर भैया और प्रमिला दीदी भी जब चाहें उन्हें डांटफटकार देती हैं. क्या वह कोई नौकरानी हैं?’ मेरा चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था.

वह कुछ देर तक मुझे गौर से देखते रहे, ‘लगता है, बड़ी हो गई है मेरी नन्ही- मुन्नी बहन.’

‘बात को टालिए मत…’ मैं ने बीच में ही बात काट कर कहा.

‘तेरी बात का क्या जवाब दूं, यही सोच रहा हूं. आज तक किसी ने उस के और मेरे मन की व्यथा को महसूस नहीं किया. धीरेधीरे उस व्यथा पर वक्त ने ऐसी चादर डाली कि अब कुछ महसूस ही नहीं होता. आज तू ने जो सवाल पूछा है, किसी दिन उस का उत्तर ढूंढ़ सका तो जरूर दूंगा, पर इतने सारे लोगों और घर के इतने सदस्यों के होते हुए भी वह अब सुरक्षित है, तू कुछ कर सके या नहीं पर उस की तकलीफ को समझेगी यही उस के लिए बहुत बड़ी बात होगी. बस, किसी तरह उसे यह बात समझा देनी होगी…’

बाहर भैया के नाम की आवाजें लगने लगी थीं, सो वह बात को बीच में ही छोड़ कर चले गए थे…

शादी ठीकठाक तरह से बीत गई थी.

प्रमिला दीदी विदा हो कर चली गईं. उस के बाद तो जैसे जाने वालों का तांता ही लग गया. धीरेधीरे कर के सभी लोग चले गए. किसी तरह की कृतज्ञता  की उम्मीद तो उन की ओर से किसी ने की भी नहीं थी पर जातेजाते भी बाबूजी पर सब आरोप लगा ही गए. कुछ दिन तो लग गए घर के ढांचे को ठीक करने में, फिर सबकुछ स्वाभाविक गति से चलने लगा.

फिर एक दिन एक बड़ा सा लिफाफा आया, वह भी मेरे नाम. आज के दौर की लड़कियां मेरी स्थिति का अनुभव नहीं लगा सकेंगी कि संयुक्त परिवार में किसी कुंआरी लड़की के नाम का लिफाफा आना कितने आश्चर्य की बात होती है. गनीमत यह रही कि वह लिफाफा मां के हाथ लगा. नीचे का पता देख कर मां खुश हो गईं, ‘अरे, यह तो अनुपम का पत्र है पर उस ने तुझे क्यों पत्र लिखा है?’

‘जब तक मैं खोल कर पढ़ूंगी नहीं तो कैसे बता सकती हूं कि उन्होंने मुझे पत्र क्यों लिखा है.’

मेरे हाथ में लिफाफा दे कर मां अपने घरेलू कामों में व्यस्त हो गईं.

मैं भी अपनी किताब बंद कर के लिफाफा खोल कर पढ़ने लगी.

‘मनु,

ताज्जुब होगा, मेरा पत्र देख कर, पर मेरी बहन, इतने दिनों बाद बहुत सोच कर तुझे लिखने की हिम्मत जुटा पाया हूं. तेरा सवाल मुझे वहां उस व्यस्तता  में भी मथता रहा और यहां आ कर भी. उसे मन से निकाल नहीं पाया हूं. अपने इस अपराधबोध से उबरना चाहता हूं पर तुझे भी विश्वास दिलाना होगा कि मेरे मन के गुबार को किसी और तक नहीं पहुंचने देगी क्योंकि कैसी भी है वह मेरी मां हैं और मौसी मेरी मां की बहन है, जो अपनी बहन के खिलाफ कुछ भी सहन नहीं कर पाएंगी. हां, तुझे मैं वह सब बताना चाहता हूं जो आजतक मैं किसी से भी नहीं कह पाया.

अपनी मां से तू ने मेरी मां के बारे में कितना कुछ सुना है, मैं नहीं जानता पर मैं और मेरे दूसरे सभी भाईबहन उन के अंधभक्त हैं. हम सभी मां के कहे हुए कटु वचनों को भी अमृत की तरह ग्रहण करते हैं. बहुत संघर्षों और कठिनाइयों के बीच मां ने अपने परिवार को संभाला है. बाबूजी ने आर्थिक रूप से कभी कोई सहायता नहीं की इसलिए उन पर मां के आक्रोश का अंत नहीं था. घर की गरीबी का जिम्मेदार मां बाबूजी को ही मानती थीं और उन्हें नकारा, बेगैरत जैसे शब्दों से हर दम चोट पहुंचातीं, जिसे गुजरते समय के साथ बाबूजी ने ओढ़ लिया था.

बचपन से मां को कठिनाइयां झेलते देख कर ही मैं बड़ा हुआ सो मन में एक उत्साह था कि किसी लायक हुआ तो मां के साथ ही इस आर्थिक भार को अपने कंधों पर ले लूंगा. बड़ा हूं, यही मेरा कर्तव्य है, पर मेरे उत्साह पर मां ने तब पानी फेर दिया जब 10वीं करते ही भागदौड़ कर के अपनी पहुंच का पूरा इस्तेमाल कर उन्होंने मुझे एक दफ्तर में क्लर्क की नौकरी दिलवा दी.

कच्ची उम्र में इतने बड़े बोझे को संभालना मेरे लिए तो खासा मुश्किल था पर मैं ने महसूस किया कि मां किसी को भी मेरी सहायता का काम करने को कोई खास महत्त्व नहीं देना चाहती थीं. कभी कोई पड़ोसिन कहती कि अरी, काहे की चिंता करती है, अब तो तेरा बेटा कमाऊ हो गया तो झल्ला कर मां कहतीं कि तो मुझे कौन से सोने के कौर खिलाएगा, अब तक हाड़ तोड़ कर इन सब का पेट पालती आई हूं, अब भी कर लूंगी.

मैं समझ गया था कि मां अब तक अपनी आत्मप्रशंसा की इतनी आदी हो गई थीं कि अपने बेटे की प्रशंसा से उन्हें ईर्ष्या होने लगी थी. इसीलिए उन्होंने मेरा विवाह ठेठ ग्रामीण लड़की से किया ताकि कभी भी वह सिर उठा कर उन के सामने बोल न सके. अपनी सत्ता के प्रति उन की सतर्कता देख सकने में समर्थ होते हुए भी मैं उन का विरोध नहीं कर सका.

शुरू से ही उस के फूहड़पन, बेवकूफी की बातों को ले कर मां के साथ छोटे भाईबहन भी व्यंग्यपूर्वक हंसते, मजाक उड़ाते और बेवजह उस को अपमानित कर के नीचा दिखाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते.

मनु, मुझे शायद शुरू से ही इतना दबा कर रखा गया था कि मैं दब्बू प्रवृत्ति का हो गया. स्वभाव में किसी प्रकार की तेजी या अपने अस्तित्व का आभास मुझे था ही नहीं, फिर भी मैं ने एकआध बार अपने छोटे भाईबहनों को समझाने की कोशिश की थी पर उस का नतीजा जान कर तू चकित रह जाएगी.

मां ने सभी के सामने मुझे अपने ही छोटे भाईबहनों से माफी मांगने को मजबूर किया था, वरना वह खाने को हाथ नहीं लगाएंगी. मां खाना नहीं खाएंगी, यह बात मुझे मंजूर नहीं थी, मुश्किल से तो कोशिश की थी अपनी केंचुल से बाहर निकलने की, पर जल्दी ही फिर उसी केंचुल में घुस गया.

जिंदगी फिर उसी ढर्र्रे पर चल निकली. रजनी भी इस अपमान की आदी हो गई. मेरी विवशता को वह शायद समझ गई थी. आज घर में मेरे सभी भाईबहन अच्छे पदों पर हैं और मां इस का सारा के्रडिट गर्व से खुद ले लेती हैं. वह भूल जाती हैं कि एक कम उम्र लड़के ने भी उन के कंधे का जुआ उठाने में उन की मदद की थी या उस लड़की को जिस के योगदान का एहसास किसी को नहीं है.

एक शब्द है मनु ‘स्लीपिंग पार्टनर’ यानी वह साझीदार जिस कोएहसास ही न हो कि इस तरक्की में उस का भी कोई योगदान है और न जानने वाले जान सके कि उन्होंने उस का कितना फायदा उठाया है. सो रानी बहन, ऐसी ही है तेरी भाभी, एक ‘स्लीपिंग पार्टनर.’

तेरा भाई, अनुपम.’

मनु ने कितनी बार वह पत्र पढ़ा पर अंत तक वह यह नहीं समझ पाई कि किसे दोषी माने, अपनी मौसी को, जो किसी रूप में भी मौसी जैसी स्नेहमयी नहीं लगती थीं. अपनी ही अनुशंसा से अभिभूत वह किसी को भी अपनी सत्ता के आसपास नहीं फटकने देती थीं, जिस से भी उन्हें यह भय हुआ उसी को अपनी कूटनीति द्वारा सब की निगाहों में नकारा साबित करने में एक पल भी देर नहीं लगाई, चाहे वह उन के पति रहे हों या उन्हीं की संतान या बहू. बच्चों की मातृभक्ति का भी दुरुपयोग किया उन्होंने.

दूसरे अभियोगी खुद अनुपमभैया हैं, जो पराए घर से लाई हुई लड़की को उस का उचित मानसम्मान नहीं दिला सके, मां की छत्रछाया में एक दब्बू, डरपोक मातृभक्त पुत्र बन सके, पर एक अच्छे पति नहीं बने.

तीसरी अभियोगी तो स्वयं भाभी ही थीं, जिन्होंने बारबार अपने पर लगने वाले आरोपों को सिरमाथे लगाया कि खुद को फूहड़, नकारा समझने लगीं. उन के मन में ये बातें इतने गहरे तक बैठ गईं कि उन्हें बारबार उन के अस्तित्व के प्रति सचेत कराना नामुमकिन ही था और यही सब सोचतेसोचते मैं ने पत्र रख दिया था.

इनसान चाहे कितना कुछ भूल जाए, पर वक्त अपनी चाल चलना नहीं भूलता. कितना पानी गुजर गया पुल के नीचे से. अब मैं खुद भी एक विवाहिता और बालबच्चों वाली औरत हूं. घर परिवार में हर पल व्यस्त रहते मैं रजनी भाभी के अस्तित्व को भी भूल गई थी.

आज इस पत्र ने कितनी बीती बातों को आंखों के सामने चलचित्र की भांति ला खड़ा किया और सचमुच ही उन रजनी भाभी के लिए मेरी आंखों में आंसू उमड़ पडे़.

विदा भाभी अलविदा, तुम्हें मेरी श्रद्धांजलि स्वीकार हो.

क्यों बनाता है गुनहगार मुझे

किस तरह हो ये एतबार मुझे
कोई चाहे दीवानावार मुझे
सबकी नज़रों से बचा कर नज़रें
देखता है वो बार बार मुझे
तू मेरे नाम पे सजदा करके
क्यों बनाता है गुनहगार मुझे
उन निगाहों की कशिश मत पूछो
न रहा खुद पे इख़्तियार मुझे
वो मिला था क़रार-ए-जां की तरह
चल दिया करके बेक़रार मुझे….

मंजिलों से दिल लगाया नहीं कभी और रास्तों से नहीं की बेवफाई…

ना खुद से शिकवा ना अपनों से उम्मीद, जिंदगी मेरी जद्दोजहद है, हर कदम कांटे और ठोकरें खुद चुनी हैं, ये सफर मेरी जद्दोजहद है.

मेरी मुश्किलों को मेरी तकदीर से जोड़कर आसान बनाता है जमाना, मेरी सांसों का सबब हैं ये परेशानियां, धड़कन भी मेरी जद्दोजहद है.

ना मदद को हाथ बढ़ाए कोई, ना दे कोई बाजू अपना आंसू बहाने को, अश्कों के समंदर पीने का हुनर पाया है, यही प्यास मेरी जद्दोजहद है.

अपने अरमान अपनी ख्वाहिशों को हमेशा खुद से बढ़कर चाहा है मैंने, ना पहाड़ पार किए, ना दर दर सजदे किए, मेरी इबादत मेरी जद्दोजहद है.

मंजिलों से दिल लगाया नहीं कभी और रास्तों नहीं की बेवफाई मैने, किनारों से परखा नहीं समंदर का मिजाज, बीच मझदार मेरी जद्दोजहद है.

दुनिया कैसे समझे मेरी मोहब्बत, बर्बादियों को शिद्दत से चाहा है मैंने, ए मरूधर दूर तलक वीराना मेरा अपना है, ये आंधी मेरी जद्दोजहद है…

दीपिका ने लक्ष्मी अग्रवाल के साथ किया लंच

दीपिका पादुकोण ने आने वाली फिल्म ‘छपाक’ की शूटिंग से  वक्त निकाल कर फिल्म के सेट पर लक्ष्मी अग्रवाल के साथ लंच का किया.दीपिका पादुकोण इन दिनों ‘छपाक’ की शूटिंग में व्यस्त हैं. लेकिन दीपिका ने अपने व्यस्त शेड्यूल में से समय निकाल कर दिल्ली में ‘छपाक’ के सेट पर लक्ष्मी अग्रवाल के साथ लंच का भी आनंद लिया.

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आपको बता दें कि लक्ष्मी अग्रवाल एसिड अटैक सर्वाइवर हैं और ‘छपाक’ इनके जीवन पर आधारित फिल्म है. इस फिल्म का दिल्ली शेड्यूल पूरा हो गया है. इसकी जानकारी मेघना गुलजार ने सोशल मीडिया पर एक खास तस्वीर के जरिए दी है. इस फिल्म का निर्देशन मेघना गुलजार कर रही हैं. दीपिका ने 25 मार्च 2019 दिल्ली में ‘छपाक’ की शूटिंग का आगाज किया था और हाल ही में ‘छपाक’ की टीम ने दिल्ली में अपना पहला शेड्यूल पूरा किया.

 

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मर्द को दर्द नहीं होता है: प्रयोगात्मक हास्य व एक्शन फिल्म

दीपिका इन दिनों मालती के किरदार में ढलने का कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं. एक एसिड अटैक पीड़ित के किरदार को निभा रहीं अभिनेत्री ने ‘छपाक’ के साथ एक भावनात्मक सफर शुरू किया है. ‘छपाक’ में एक एसिड अटैक सर्वाइवर के जीवन को पेश किया जाएगा और उन लोगों के लिए वह एक प्रेरणा हैं जिन्होंने इस तरह की स्थिति का सामना किया है. यह फिल्म 10 जनवरी 2020 को रिलीज होगी.

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जानें दोस्ती और प्यार में फर्क

दोस्ती को परिभाषित करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन प्यार क्या है ये समझना उससे भी कहीं ज्यादा मुश्किल. दोस्ती दो लोगों को जोड़ती है और प्यार दो दिलों को. अपने दोस्त को प्यार करना स्वभाविक है लेकिन आप इस बात को कैसे पहचानेंगे कि ये प्यार रोमांटिक लव नहीं है. कई बार दोस्ती और प्यार के बीच फर्क करना बहुत मुश्किल हो जाता है.

अगर आप इस विषय को लेकर चिंतित हैं तो थोड़ा समय लें और अपने रिश्ते को अच्छे से परखें कि आपका किसी इंसान के साथ सम्बंध केवल दोस्ती है या इससे कहीं ज्यादा. कुछ तरीके हैं जिनकी मदद से आप जान सकती हैं कि प्यार और दोस्ती में क्या फर्क है ताकि आपको प्यार के लिए अपनी दोस्ती ना खोनी पड़े.

पहले मिलन को बनाएं यादगार

पसंद और विचार – अगर दोस्ती की बात करें तो वो लोग जो दोस्त होते हैं उनके बीच काफी चीजें समान होती है. उनकी पसंद और उनके विचार मिलते-जुलते हैं. लेकिन प्यार में होते वक्त ऐसा नहीं होता. अगर आप किसी के साथ प्यार में हैं तो आप दोनों के विचार और पसंद अधिकतर एक-दूसरे से अलग होते हैं और यही चीज है जो आप दोनों को एक-दूसरे की तरफ आकर्षित करती है.

अपनी भावनाओं की गहराई से समझें – थोड़ा समय लेकर अपनी भावनाओं को परखें और जानें कि आपके जज़्बात कितने गहरे हैं. बहुत सी चीजें ऐसी है जिन्हें आप अपने दोस्त और प्रेमी दोनों के लिए महसूस कर सकते हैं. लेकिन आप कितनी गहराई और कितनी बार वो चीजें किसी के लिए महसूस कर रहे हैं उससे पता चलता है कि आप किसी से प्यार करते हैं या उसे सिर्फ अपना दोस्त मानते हैं.

युवती भी बन जाए कभी युवक

बात करने का तरीका – आपका बात करने का तरीका आपके दोस्त और लव्ड वन के साथ अलग-अलग होता है. दोस्त आपस में बात करते वक्त बहुत सामान्य होते हैं. वो एक दूसरे को कुछ निक नेम्स से बुला सकते हैं, जैसे- बडी, फ्रेंड आदि अगर आप किसी से बात करते वक्त इस तरह के निक नेम्स इस्तेमाल करते हैं तो आप उसे अपना दोस्त मानते हैं. जबकि जिससे आप प्यार करते हैं उससे बात करने का लहजा आपका अलग होता है.

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