Download App

कंप्यूटर जगत के सम्राट गूगल पर लगा अरबों डॉलर का झटका

Google Fine: गूगल को यूरोप की सर्वोच्च अदालत ने बड़ा झटका दिया है. गूगल यूरोपियन यूनियन द्वारा लगाए गए €4.1 अरब (लगभग ₹40,000 करोड़ से अधिक) के एंटीट्रस्ट जुर्माने के खिलाफ अपनी अंतिम अपील भी हार गया है. यूरोप की सर्वोच्च अदालत ‘यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस’ ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए गूगल की चुनौती को खारिज कर दिया है.

यूरोप की सर्वोच्च अदालत द्वारा गूगल की अंतिम अपील खारिज किया जाना केवल एक कंपनी की कानूनी हार नहीं है, बल्कि यह डिजिटल अर्थव्यवस्था में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के पक्ष में दिया गया एक ऐतिहासिक संदेश है. अदालत ने स्पष्ट कर किया है कि चाहे कोई कंपनी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, बाजार पर उसका प्रभुत्व कानून से ऊपर नहीं हो सकता.

यह मामला 2018 का है, जब यूरोपियन कमीशन ने गूगल पर एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम के जरिए बाजार में अपने प्रभुत्व का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया था. उस समय कंपनी पर €4.34 अरब का रिकॉर्ड जुर्माना लगाया गया था, जिसे बाद में घटाकर €4.1 अरब कर दिया गया था.

यूरोपियन कमीशन के अनुसार गूगल ने स्मार्टफोन निर्माताओं पर अपने सर्च इंजन ‘क्रोम ब्राउज़र’ और ‘प्ले स्टोर’ को पहले से इंस्टॉल करने का दबाव बनाया. आयोग का कहना था कि इस रणनीति से प्रतिस्पर्धी सर्च इंजन, वेब ब्राउज़र और एंड्रॉयड आधारित वैकल्पिक प्लेटफॉर्म बाजार में बराबरी से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाए, जिससे यूजर्स के लिए विकल्प बहुत सीमित हो गए.

यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस के ताजा फैसले के साथ यह लंबी कानूनी लड़ाई समाप्त हो गई है और अब गूगल को €4.1 अरब का जुर्माना अदा करना होगा. इस फैसले को डिजिटल बाजार में बड़ी टेक कंपनियों के वर्चस्व पर लगाम लगाने की दिशा में यूरोपियन यूनियन की एक महत्वपूर्ण जीत माना जा रहा है.

यह फैसला केवल गूगल तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी वैश्विक टेक कंपनियों के लिए चेतावनी है जो अपने विशाल नेटवर्क और बाजार हिस्सेदारी का उपयोग प्रतिस्पर्धा को कमजोर करने के लिए करती हैं.

आम एंड्रोयड यूजर को गूगल ही जबरन यूज करना पड़ता है. गूगल बाद में इसकी कीमत तरह तरह से वसूलता है. यह वैसा ही है जैसे पैदा होते ही बच्चे पर घरवालों का धर्म डाउनलोड कर दिया जाता है. Google Fine

अमेरिका : सबसे ताकतवर देश अब चर्च के हवाले

USA Reality: क्योंकि वहां का शासन अब चर्च और गन रखने वाले मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के नारे की तरह आरएसएस जैसा अनरजिस्टर्ड कट्टर लोगों का समूह)का राज चल रहा है जिनकी पहुंच व्यापारों, उद्योगों, विधान सभाओं, सुप्रीम कोर्ट, पोपुलर मीडिया तक जम कर है.

यह वही महाशक्ति है जहां हर रात लाखों लोग खुले आसमान के नीचे सोते हैं. एक आंकड़े के अनुसार अमेरिका में कोई छह लाख लोग सड़कों पर रात बिताते हैं. करोड़ों नागरिक इतनी आर्थिक असुरक्षा में जीते हैं कि मामूली आपातकाल भी उन्हें कर्ज के दलदल में धकेल देता है. दुनिया भर में अरबों डौलर के हथियार बांटने वाला देश अपने नागरिकों को सस्ती इंसुलिन तक उपलब्ध नहीं करा पाता है.

जिस देश की सरकार दूसरों को मानवाधिकारों का प्रमाणपत्र बांटती है, वहीं खुद के अस्पतालों में अपने ही नागरिकों के इलाज से पहले उनके पास बीमा कार्ड होने के बारे में पूछती है, न हो तो आम आदमी का इलाज ही मुश्किल हो जाता है. मेडिकल बिल लाखों परिवारों को दिवालिया बना देते हैं और गर्भपात कानूनों के डर से डॉक्टर कई बार महिलाओं का समय पर इलाज करने से भी हिचकते हैं, वे मिसकैरिज का इलाज भी नहीं करते और अनेक गर्भवती औरतें अस्पतालों की पार्किंग में दम तोड़ देती हैं.

कानून का राज ऐसा कि अमेरिकी जेलों में दुनिया की किसी भी जेल से ज्यादा लोग बंद हैं. लाखों लोग बिना दोष सिद्ध हुए सालों से केवल इसलिए सलाखों के पीछे हैं क्योंकि उनके पास जमानत भरने लायक पैसे नहीं हैं. कोई 20 लाख कैदियों में से एक चौथाई लोग ऐसे हैं जो गरीबी की वजह से अपनी जमानत नहीं करवा पाए.

अमेरिकी स्कूलों में बच्चों को गणित और विज्ञान से पहले गोलीबारी से बचने की ट्रेनिंग दी जाती है. क्योंकि वहां बच्चों के हाथों में भी आसानी से गन आ जाती है और वे आये दिन स्कूल में गोलीबारी करते रहते हैं. दूसरी ओर, भविष्य गढ़ने वाले शिक्षक सम्मानजनक वेतन के अभाव में दो-दो नौकरियां करने को मजबूर हैं. सवाल यह है कि जब शिक्षा व्यवस्था का प्रहरी ही आर्थिक असुरक्षा से जूझ रहा हो, तो दुनिया को आदर्श शिक्षा और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने का नैतिक अधिकार आखिर किस आधार पर तय होता है?

अमेरिका के अनेक पूर्व सैनिक, जिन्होंने कभी देश के लिए मोर्चे पर जान जोखिम में डाली, आज बेघर होकर पुलों के नीचे रात गुजारने को मजबूर हैं. दूसरी ओर संसद में राजनेता रक्षा बजट बढ़ाने पर तालियां पीटते हैं, मानो हथियारों पर खर्च ही राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण है. यह अजब महाशक्ति है जहाँ युद्धों के लिए खरबों डौलर निकालना आसान है, लेकिन अपने सैनिकों को सम्मानजनक जीवन, नागरिकों को सस्ती चिकित्सा और बेघरों को सिर पर छत देने में सरकार की कोई रुचि नहीं है.

यह ऐसी महाशक्ति है जहाँ बंदूक खरीदना इलाज करवाने से आसान है और युद्ध छेड़ना अपने नागरिकों का जीवन सुधारने से अधिक सरल है? वैश्विक स्तर पर सैन्य शक्ति दिखाने में अरबों डॉलर खर्च करने वाला अमेरिका अपने ही नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में लड़खड़ा रहा है. यही नहीं अन्य देशों में जहां लोगों की औसत आयु बढ़ रही है, अमेरिका में लोगों की औसत उम्र घटनी शुरू हो गई है. अमेरिका में शिशु मृत्यु दर क्यूबा से भी खराब है.

विडंबना यह कि दुनिया को बचाने निकला अमेरिका अपने ही समाज को टूटने से नहीं बचा पा रहा है. बाहर लोकतंत्र का झंडा बुलंद है, भीतर असमानता, महंगी चिकित्सा, बेघर नागरिक और भय से भरा जीवन है. दुनिया को स्वर्ग बनाने की महत्वाकांक्षा जबकि अपने ही घर में नरक पनप रहा है. चर्च को भरपूर दान मिल रहा है और व्हाइट हाउस में डिपार्टमेंट ऑफ फेथ बन गया है जिसकी मुखिया पौला व्हाइट है. USA Reality

अमेरिका और भारत में कुछ समानताएं दिखतीं हैं क्या?

जीएसटी बड़ी लूट है

GST Collection: रमेश तलवार निर्देशित साल 1984 में प्रदर्शित फिल्म `दुनिया` थी तो पूरी तरह मसाला मूवी जिसका दिलीप कुमार से कहलवाया एक डोयलोग तब बहुत मशहूर हुआ था,`ये जिस्म बहुत कमजोर चीज है, ये जितनी तकलीफ बर्दाश्त कर सकता है, तकलीफ उससे ज्यादा दी जा सकती है`. फिल्म का मकसद दर्जन भर नामी और दिग्गज सितारों के दम पर पैसे कमाना था जिसमें वह कामयाब रही थी.

यही हाल 2017 में लागू की गई जीएसटी का है. सरकार इससे, उससे ज्यादा मुनाफा कमा रही है जितना कि इससे कमाया जा सकता था. दूसरे लफ्जों में कहें तो. व्यापारी नहीं असल में जनता उससे कहीं ज्यादा टेक्स देने मजबूर हैं जितना वे दे सकते हैं. जीएसटी से ताल्लुक रखती रुटीनी ताज़ी खबर यह है कि जून 2026 में देश के ग्रास जीएसटी कलेक्शन में 13.9 फीसदी का जोरदार उछाल दर्ज किया गया. यह कलेक्शन 1 ,94 ,812 करोड़ हो गया है जो कि पिछले यानी मई के महीने में 1.71 लाख करोड़ रु था.

वित्त मंत्रालय के`अ(न)र्थशास्त्र` की मार झेल रहे महंगाई से त्रस्त और कराहते आम लोगों के लिए इस खबर के कोई माने नहीं हैं. लेकिन गोदी मीडिया ने इसे यों प्रचारित किया मानो सरकार ने चीन से अक्साई चिन खाली करा लिया अब राहतों और सस्ताई की बरसात होने बाली है. अब भला कौन लोगों को यह दो टूक हकीकत समझाए कि इस 13.7 फीसदी बढ़ोतरी का मतलब यह है कि सरकार उनका पहले से ज्यादा खून चूस रही है क्योंकि पिछले एक साल में न तो देश की जीडीपी इतनी बढ़ी है और न ही लोगों की आमदनी में इस तरह का इजाफा हुआ है.

आमदनी वही पर टेक्स पहले से ज्यादा.

इसका सीधा कारण है कि उत्पादकों को लागत में बढ़ोतरी होने पर जो दाम बढ़ाने पड़े, उससे जीएसटी भी बढ़ गया और टैक्स रेवेन्यू राम मंदिर चंदा और पीएम केयर फंड की तरह बढ़ रहा है और सरकारी लोगों की जेबों में जा रहा है.

2017 से अब तक जीएसटी 85000 करोड़ से बढ़कर 2,20,000 करोड़ हो गया है. क्या 8 सालों में आम आदमी की आय ढाई तीन गुना बढ़ी है?

इस खबर का दूसरा पहलू यह है कि राज्यों के सीजीएसटी कलेक्शन में महज 6.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है जो इस तरफ इशारा करती है कि लोगों की खरीददारी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ है 13.7 फीसदी का बड़ा हिस्सा दरअसल में आईजीएसटी यानी इंट्रीग्रेटेड जीएसटी का है.

जिसका मतलब यह कि देश में केंद्र सरकार का शिकंजा वैसे ही बढ़ रहा है जैसे विंस्टन चर्चिल ने सेकेंड वर्ल्ड वार में भारत में टैक्स बढ़ा कर और जबरन अनाज वसूली करके भारत को लूटा था. मंत्रों की तरह आंकड़ेबाजी में माहिर सरकार के लिए तो जीएसटी बड़े मुनाफे वाले अनुष्ठान की तरह की चीज है ही. GST Collection

.

सनसनीखेज शर्मिंदा करने वाली बात – ब्रिटेन की महिला के भारत यात्रा के बाद ब्रेन में मिले 38 टेपवर्म

British Woman: ब्रिटेन की रहने वाली एक औरत ने दावा किया है कि भारत यात्रा के बाद उनके शरीर में टेपवर्म का संक्रमण हुआ और बाद में उनके दिमाग़ में 38 परजीवी पाए गए. डॉक्टरों ने इसे न्यूरोसिस्टिसरकोसिस नाम की बीमारी बताया. हालाँकि यह साबित नहीं हुआ है कि ब्रिटिश महिला को दिमागी संक्रमण भारत में ही हुआ था लेकिन अगर यह सच है तो इस घटना से भारत के हेल्थ केयर सिस्टम, पोल्लुशन और गंदगी से भरे वातावरण को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं.

किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है कि लोगों को साफ़ पीने का पानी मिले, खाना हेल्दी हो, खुले में गंदगी न फैले और सीवर व्यवस्था ठीक हो. जहाँ यह व्यवस्थाएं गड़बड़ाती हैं वहां टाइफाइड, हैजा, हेपेटाइटिस, डायरिया और परजीवी संक्रमण जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. भारत के कई इलाकों में आज भी साफ पानी की कमी है. हाईजीन मेंटेन करने वाले नियम कमजोर है. सड़क किनारे बिकने वाले फूड की जांच नहीं होती. लगभग हर शहर में सीवर और कचरे की व्यवस्था बेहद खराब है. गरीब इलाकों का हेल्थ केयर सिस्टम तो लगभग दम तोड़ चुका है.

अगर इस घटना को गलत मान भी लिया जाये तो भी सरकार को टूरिज्म बढ़ाने के साथ-साथ पब्लिक हेल्थ केयर, साफ सफाई और पोल्लुशन कंट्रोल की व्यवस्था पर ध्यान तो देना ही होगा क्योंकि किसी भी देश का मूल्यांकन इसी आधार पर होता है कि वह अपने नागरिकों को कितना सुरक्षित वातावरण उपलब्ध करा पाता है. अगर नागरिक ही सुरक्षित नहीं तो टूरिस्टों के लिए सेफ इंडिया कैसे संभव है? हम खुद गंदे जानवरों की तरह रहने के आदी हैं और हर 100मीटर पर एक मंदिर बना कर सोचते हैं कि दुनिया में सबसे महान “शुद्ध” देश हैं. British Woman

Hindi Stories: कुल्हाड़ा क्रांति

Hindi Stories: ‘‘आनंद, तुम कहीं नहीं जाओगे. मुझे डर लगता है. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो?’’ आनंद की पे्रयेसी सुमित्रा ने उसे आंदोलन में जाने से रोकते हुए कहा.

‘‘सुमित्रा, तुम बेवजह डरती हो. यदि मेरे जैसा पढ़ालिखा नवयुवक आगे नहीं बढ़ेगा तो फिर कौन नेतृत्व करेगा इस आंदोलन का? क्या पहाड़ के इन भले और कम पढ़ेलिखे लोगों को यों ही बरबाद और मरने के लिए छोड़ दिया जाए?’’

‘‘नहींनहीं, आनंद. मैं यह बिलकुल नहीं चाहती कि गढ़वाल की चौथान पट्टी के 72 गांव के लोग इस सदी में भी पिछड़े के पिछड़े ही रहें. फिर भी तुम्हारे वहां जाने से न जाने मु?ो क्यों डर लगता है?’’

‘‘सुमित्रा, तुम डरो नहीं. यदि बूंगीधार से देहघाट तक की 24 किलोमीटर की पक्की सड़क बन जाए तो चौथान पट्टी के कितने लोगों के लिए सुविधा हो जाएगी और फिर दूसरी सड़कों को बनाने के लिए भी रास्ता निकल आएगा. इसलिए इस आंदोलन की सफलता आवश्यक है.’’

‘‘आनंद, तुम्हारी बातें सुन कर मेरे अंदर भी हिम्मत का ज्वार उठने लगा है. इसलिए अब मैं तुम्हें रोकूंगी नहीं. जाओ मेरे क्रांतिवीर, जाओ और विजय पताका फहरा कर आओ,’’ सुमित्रा ने कुछ नाटकीय अंदाज जोड़ कर कहा.

सुमित्रा ने हमेशा आनंद का हौसला बढ़ाया था. वह सुमित्रा को याद कर अकसर पुराने दिनों में खो जाता था. जब सुमित्रा से उस की पहली मुलाकात कालेज कैंटीन में हुई थी. समोसा खाते हुए मिर्ची उस के मुंह में चली गई थी और वह पानीपानी चिल्लाया था. तब पास की मेज पर बैठी सुमित्रा उस के लिए पानी ले कर आई थी. उस के बाद तो दोनों का मिलनाजुलना लगभग रोज होने लगा था.

पहाड़ों में प्रेम को जैसे प्रकृति भी अपनी मूक सहमति ही न देती हो बल्कि उसे भड़काने का काम भी करती हो. सुंदर वादियां, ऊंचे हरेभरे पहाड़, नदियों और ?ारनों का संगीतमय प्रवाह सब के सब जैसे प्रेम की आग को भड़काने के लिए हों. आनंद और सुमित्रा जैसे प्रेम की इन वादियों में ही खो जाने के लिए ही बने हों. वे एकदूसरे को अपना तनमन दे चुके थे.

लेकिन इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. जब दोनों परिवारों को उन के प्रेमपुजारी होने का पता चला तो बवंडर उठ खड़ा हुआ. पहाड़ों में जातिवाद पहाड़ों जैसा ऊंचा ही था. ऊंचनीच का भेदभाव सच्चे प्रेम में रोड़ा बन कर खड़ा हो गया. तब एक दिन दोनों मौका देख कर कोटद्वार चले गए. दोनों ने गुजारा करने के लिए अनपढ़ बन कर मजदूरी की लेकिन जल्दी ही उन के वहां होने का पता चल गया. तब दोनों परिवार उन के सच्चे प्रेम के आगे झुक गए थे.

आंदोलन में भाग लेने के लिए मंगरों गांव के महेंद्र बिष्ट, थान गांव के रामधन नेगी, गड़ी गांव के देवेंद्र रमोला और मासों गांव के धनसिंह थापा भी आ चुके थे. इन सब ने दूसरे गांव के लोगों को भी इकट्ठा किया और सब ने मिल कर बूंगीधार की प्राथमिक पाठशाला में सभा की. सब बूंगीधार से देहघाट तक की सड़क बनाने के आंदोलन को आगे बढ़ाने के पक्ष में थे.

आनंद गुसाई ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘भाइयो, जब से यह वन अधिनियम सरकार ने हम पहाडि़यों पर थोपा है, तब से हम अपने इन सीढ़ीदार खेतों में उगे एक पेड़ को भी बिना सरकारी अनुमति के काट नहीं सकते. नदी से एक तसला रेत नहीं ले सकते. अब देहघाट तक सड़क बनने की बारी आई है तो इसी अधिनियम के कारण वन विभाग पेड़ काटने की अनुमति नहीं दे रहा है. वन विभाग को पहाड़ के लोगों की पहाड़ सी परेशानियों से कोई सरोकार नहीं.’’

ढोंड गांव से चौथान पट्टी में आए देवीप्रसाद ढोंडियाल बोले, ‘‘बेटा आनंद, हमें देहघाट तक जाने के लिए रात के 1-2 बजे टौर्च ले कर पैदल निकलना पड़ता है जिस से हम रामनगर जाने के लिए बस पकड़ सकें. हम बीमारियों से सड़ जाएं या मर जाएं, किसी को इस बात से कोई मतलब नहीं. हमारी कितनी ही औरतें सही इलाज नहीं मिलने के कारण प्रसवकाल में ही दम तोड़ देती हैं. कितने ही नवजात शिशुओं को इलाज से बचाया जा सकता है लेकिन सरकार के कारिंदों को इस से कोई मतलब नहीं कि रात में चाहे हमें जंगली सूअर मार डाले या हमें बाघ खा जाए या हम पहाड़ी बीमारियों से मर जाएं.’’

तब आनंद ने कहा, ‘‘चाचाजी, इस का एक ही इलाज है कि हम सब चौथान पट्टी निवासी मिल कर रास्ते के पेड़ काटने और सड़क बनाने का बीड़ा उठाएं. हमें खुद ही पेड़ों पर कुल्हाड़ें चलाने होंगे और सड़क बनानी होगी. यह काम हमें अपने लिए करना ही होगा. दर्द, कष्ट और तकलीफ हमारी है, इन्हें दूर करने के उपाय हमें ही करने होंगे. हमें साहस दिखाना ही होगा, पेड़ों को काटना ही होगा.’’

‘‘यह कितने अचंभे की बात है कि पर्यटन स्थलों, तीर्थ स्थलों आदि पर होटलों और बाजारों के लिए पेड़ों का कटान सरकार खुद कराती है लेकिन जब आम जनता और वह भी पहाड़ी समस्याओं से त्रस्त जनता अपने लिए किसी सड़क की मांग करती है तो पेड़ कटान से ले कर हजारों समस्याएं खड़ी की जाती हैं,’’ एक नौजवान संजीव रौतेला ने कहा.

ग्वाल्थी गांव के मोहन रावत बोले, ‘‘लेकिन आनंद, हम खुद पेड़ काटें, इस में खतरा ही खतरा है. ऐसा करने पर सरकार हम पर जुल्म ढा सकती है. हमें गिरफ्तार कर सकती है. हम पर कितने ही मुकदमे ठोंक सकती है. हमें जेलों में सड़ा सकती है.’’

आनंद ने कहा, ‘‘मोहन भाई, वैसे भी तो हम मर ही रहे हैं. चौथान पट्टी में न तो कोई पर्यटन स्थल है और न ही कोई उद्योग. लेदे कर बिंदेश्वर महादेव का मंदिर है, वह भी इतनी ऊंचाई पर है कि वहां दर्शन के लिए बाहर का इक्कादुक्का व्यक्ति ही आता है. वहां जो आता है और चढ़ावा जो चढ़ाता है वह पंडित और उस के घर वाले जेब में रख लेते हैं. हमारी सारी खेती बारिश के भरोसे है. यहां पहाड़ों में मैदानों की तरह कोई नलकूप या नहर तो है नहीं. और तो और, हम पहाड़ी नदियों के पानी से सिंचाई भी नहीं कर सकते. नदी का पानी ऊपर सीढ़ीदार खेतों में नहीं ले जाया जा सकता. लेदे कर दूध के मवेशी बचते हैं, उन से कितनी कम कमाई होती है, हम सब जानते हैं. हमें कुछ पाना है तो कुछ खोना भी पड़ेगा.’’

‘‘तो आनंद, क्या तुम क्रांति का आगाज करोगे? तुम्हारे तेवर तो किसी क्रांतिकारी जैसे ही लग रहे हैं,’’ मोहन रावत ने पूछा.

‘‘देखो भाइयो, मैं सब से बता देना चाहता हूं कि क्रांतियां केवल रक्तपात करने के लिए नहीं होती हैं. हमारी क्रांति अपने क्षेत्र के विकास और अपने लोगों के लिए सुविधाएं हासिल करने के लिए होगी. हम पहाडि़यों के लिए सड़कें श्वास नली की तरह हैं. सड़कें होगीं तो हमारे क्षेत्र का विकास होगा वरना हम पिछड़े के पिछड़े ही रहेंगे. वैसे भी, पहाड़ी आदमी की आधी जिंदगी पहाड़ उतरने और चढ़ने में ही गुजर जाती है,’’ आनंद ने सम?ाया.

डडोली के कुलदीप थापा बोले, ‘‘आनंद, यदि हम पेड़ काट डालें तो फिर पर्यावरण संरक्षकों के ‘चिपको आंदोलन’ का क्या होगा. वे तो पेड़ों और जंगलों को बचाने की मुहिम चलाए हुए हैं.’’

आनंद ने इस पर कुछ देर विचार किया और फिर कहा, ‘‘देखो भाई, पर्यावरणविद और समाजसेवी अपना काम करें, हमारा उन से कोई विरोध नहीं. सरकार और दूसरी संस्थाओं से खूब पुरस्कार और सम्मान बटोरें, नाम कमाएं, अखबारों की सुर्खियों में छाए रहें, हमें इस पर भी कोई एतराज नहीं. लेकिन एक बात बताओ, सरकार और संस्थाओं से पुरस्कार और सम्मान बटोरने वाले क्या उन के जड़ गुलाम नहीं बन जाते? क्या वे किसी क्रांति के लायक रह जाते हैं?’’

‘‘वाह आनंद, वाह, बात तो तुम ने खरी और बड़े पते की कही,’’ कुलदीप थापा ने ताली बजाते हुए कहा.

‘‘एक बात और, हम भी इन पेड़ों, पहाड़ों और जंगलों से उतना ही प्यार करते हैं बल्कि ज्यादा करते हैं जितना दिल्ली जैसे महानगरों में बैठे, मुखौटे लगाए, मीडिया में छाए रहने के लिए बेताब पर्यावरणविद् करते हैं. खैर, हमारे पहाड़ों पर पेड़ों की कोई कमी नहीं. हम इन्हें कोई नुकसान भी नहीं पहुंचाते, बाहरी लोगों से इन की सुरक्षा भी करते हैं. हम तो केवल अपने जीवन और विकास के लिए एक सड़क मांग रहे हैं. हम सरकार के वन अधिनियम का सीधेसीधे उल्लंघन भी नहीं कर रहे हैं. आखिर, एक दिन वन विभाग को भी इस की अनुमति देनी ही होगी. हम तो वन विभाग की लेटलतीफी के खिलाफ आंदोलनरत हैं.’’

एक बुजुर्ग अनुसूईया पंत बोले,

‘‘अरे साथियो, मैं आप सब को

एक बात याद दिला देना चाहता हूं कि यह वन अधिनियम राज्य के एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा चिढ़ कर हमारे खिलाफ लाया गया था. उस का एक रिश्तेदार धड़ल्ले से जंगल के पेड़ काट रहा था और पहाड़ की नदियों में बड़े पैमाने पर खनन कर रहा था.

‘‘जब हम पहाडि़यों ने इस का विरोध किया तब उस ने हम पहाडि़यों से चिढ़ कर यह वन अधिनियम बना दिया कि उन का रिश्तेदार पेड़ नहीं काटेगा तो कोई पहाड़ी अपनी जरूरत में भी पेड़ नहीं काटेगा. वाह, गांव का आदमी अपने खेत में पेड़ लगाए और उस के काटने की अनुमति भी घूस दे कर सरकारी कारिंदों से ले जिन्होंने जिंदगी में कोई पेड़ भी न लगाया हो. बहुत से नियमकानून तो बनाए ही घूसखोरी के लिए गए हैं. आने वाले दिनों में कहीं फसल काटने की अनुमति कहीं सरकार से ही न लेनी पड़े.’’

यह सुन कर सब हंस पड़े.

‘‘अरे दादा, यह सब देखसुन कर तो यही लगता है कि सरकार तो हम पहाडि़यों से दुश्मनी निकाल रही है,’’ आनंद ने कहा.

‘‘बिलकुल आनंद बेटा, वन अधिनियम लाने का उस समय कोई और उद्देश्य ही नहीं था. वे पेड़ काटें तो कुछ नहीं, हम काटें तो अपराध,’’ उन बुजुर्ग ने कहा.

‘‘तो फिर अब क्या किया जाए, आनंद, तुम्हीं बताओ. तुम ही पढ़ेलिखे साहसी नौजवान हो,’’ हरीश नेगी ने पूछा.

‘‘मेरा तो भाइयो, यही कहना है कि समस्या हमारी है तो इस का हल भी हमीं को निकालना पड़ेगा. सरकार आंदोलन और क्रांति से ?ाकती है. हमें कुल्हाड़ी-कुल्हाड़े ले कर इन पेड़ों को खुद ही काटना होगा और जरूरत पड़ी तो सड़क भी खुद ही बनानी होगी. इस में पुरुषमहिला सब का सहयोग चाहिए. कोई पीछे न हटे,’’ आनंद ने जोश में कहा.

अब तो भीड़ में भी जोश आ गया था. सब हाथ उठाउठा कर कहने लगे, ‘‘हम इस क्रांति के लिए तैयार हैं. मैं भी, मैं भी…’’

तभी एक जनाना आवाज ने सब को चौंका दिया, ‘‘मैं भी.’’

सब ने देखा यहां औरत तो कोई है नहीं, फिर यह जनाना आवाज कहां से आई.

सब ने आवाज की तरफ मुड़ कर देखा.

‘‘अरे, यह तो सुमित्रा है, आनंद की…’’ किसी ने सुमित्रा को पहचानते हुए कहा.

फिर तो पेड़ों के पीछे छिपी 3-4 महिलाएं ‘मैं भी, मैं भी’ का नारा लगाते हुए सामने आ गईं. तब सुमित्रा ने कहा, ‘‘मैं अपनी इन सहेलियों के साथ आनंद के पीछेपीछे आ गई थी. हम चीड़ के पेड़ों के पीछे छिप कर आप लोगों की बात सुन रही थीं. अगर आप लोग क्रांति करने के लिए तैयार हैं तो हम महिलाएं भी किसी से कम नहीं. हम आप से आगे चल कर इस क्रांति को अंजाम देंगे. हम महिलाओं को आनंद और आप पुरुषों पर गर्व है

कि आप ने साहसिक फैसला लिया, कायरतापूर्ण नहीं.’’

सुमित्रा की बात सुन कर भीड़ में चारगुना उत्साह बढ़ गया. अब किसी को यह पूछने की जरूरत नहीं थी कि यह क्रांति कब शुरू होगी और पहल कौन करेगा. तभी किसी ने नारा लगा दिया, ‘‘कुल्हाड़ा क्रांति, जिंदाबाद, जिंदाबाद.’’

फिर तो पूरी चौथान घाटी इस नारे से गूंज उठी. चौथान पट्टी के 72 गांवों में से कोई घर ऐसा नहीं था जहां से कोई कुल्हाड़ा ले कर न निकला हो. पहाड़ पर कोई घर ऐसा नहीं होता जिस घर में कुल्हाड़ा न हो.

दनादन रास्ते के पेड़ काटे जाने लगे. सोया हुआ सरकारी महकमा सोते से जागा. बड़ेबड़े अधिकारी और भारी पुलिस बल वहां पहुंचा लेकिन पहाडि़यों के हाथों में तेज कुल्हाड़े और उन के उग्र तेवर देख कर अधिकारियों के हाथपांव फूल गए. पुलिस बल आदेश की प्रतीक्षा करता रहा. राजनेताओं तक बात पहुंची. सरकार कोई फैसला तुरंत न ले सकी. राजनेताओं को अगले चुनाव में इसी जनता से वोट पाने की चिंता थी. बल प्रयोग को तो बिलकुल मना ही कर दिया लेकिन कानूनी कार्यवाही तो दिखानी थी, इसलिए कुछ मुकदमे लगाए गए जिन्हें बाद में वोट पाने के चक्कर में वापस ले लिया गया.

कुछ ही दिनों में रास्ते के पेड़ काट डाले गए. जनक्रांति की जीत हुई. दूधातोली पहाड़ भी पहाडि़यों के संघर्ष पर मुसकरा उठा. बाद में सरकार ने इसी रास्ते पर पक्की सड़क का निर्माण शुरू कर दिया. आनंद गुसाईं क्रांतिकारी नेता बन कर उभरे. नेताओं को घबराहट हुई कि कहीं आनंद पहाडि़यों का नेता न बन जाए. उस की लोकप्रियता कितनों को ही खटकने लगी और फिर एक दिन 42 साल की उम्र में उन की रहस्यमयी मौत की खबर आई. एक उभरते नायक का अंत हो गया.

जनता में आक्रोश था. सरकार ने उस आक्रोश को दबाने के लिए बूंगीधार में उन का स्मारक बनवा दिया. उन की प्रतिमा के नीचे लिखा- क्रांतिकारी आनंद सिंह गुसाईं. मुख्यमंत्री ने अपने एक दौरे में उस पर फूलमाला चढ़ाई और अपनी पार्टी का कर्मठ शहीद घोषित कर दिया. सुमित्रा इन दिनों 500 रुपए महीने के भत्ते पर गुजरबसर कर रही है. Hindi Stories

आप के हकों को ध्वस्त करती बुलडोजरी व्यवस्था

Bulldozer Politics: बुलडोजर अब केवल एक मशीन नहीं, बल्कि शासन की राजनीतिक पहचान बन चुका है. बुलडोजर यानी जो सरकार के खिलाफ विरोध का स्वर उठाए, जो अपने अधिकारों की मांग करे, जो न्याय चाहे, जो शिक्षा व रोजगार पर  सवाल पूछे, उसे कुचल दो. भारतीय जनता पार्टी की बुलडोजरी व्यवस्था ने संविधान के मूल सिद्धांतों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर नए प्रश्न खड़े कर दिए ह

84 वर्षीय जेसुइट पादरी और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी को 2020 में भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किया गया था. पार्किंसन रोग से पीडि़त होने के बावजूद उन्हें लंबे समय तक जेल में रखा गया. जमानत की उन की याचिकाएं लगातार खारिज होती रहीं. आखिरकार जुलाई 2021 में मुंबई के एक अस्पताल में उपचार के दौरान उन का निधन हो गया. उन के समर्थकों, संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों ने इसे ‘संस्थागत विफलता’ और पर्याप्त चिकित्सा सुविधा न मिलने का मामला बताया जबकि सरकार और जांच एजेंसियों ने इन आरोपों से साफ इनकार कर दिया. यह आम आदमी के हकों को छीनने का एक उदाहरण मात्र है.

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि उन संस्थाओं से जीवित रहता है जो नागरिकों को न्याय, समानता और संवैधानिक सुरक्षा का भरोसा देती हैं. जब न्यायालयों की जगह प्रशासनिक आदेश लेने लगें, जब आरोप ही सजा में बदल जाएं, जब बुलडोजर अदालतों से पहले फैसला सुनाने लगे और जब महत्त्वपूर्ण सुबूत रहस्यमय परिस्थितियों में नष्ट होने लगें, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश कानून के शासन से चल रहा है या जनता पर सत्ता की मनमरजी हावी है?

पश्चिम बंगाल के चुनावों के ठीक पहले मतदाता सूचियों का गहन परीक्षण शुरू किया गया जिस में मतदान के अधिकार को ही छीन कर चुनाव आयोग ने अपनी फाइलों में दिल्ली के इशारे पर कर लिया. इस बुलडोजरी परीक्षण में किसी की सुनी नहीं गई. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता बेहद तानाशाही अंदाज में प्रैस कौन्फ्रैंसों और सुप्रीम कोर्ट में कहते नजर आए कि कानून उन के साथ है क्योंकि कानून को जैसे पढ़ेंगे, वही अंतिम सच है, जनता को वही मानना होगा.

कोलकाता में हजारों ईवीएम मशीनों के जलने की घटना से ले कर उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में आरोपियों के घरों पर चल रहे बुलडोजरों तक, बीते 12 वर्षों में ऐसी अनेक घटनाएं सामने आई हैं जिन्होंने संविधान, न्यायिक प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों को ले कर गंभीर चिंता पैदा कर दी है. भारतीय जनता पार्टी सरकार की बुलडोजरी व्यवस्था ने त्वरित दंड की संस्कृति स्थापित कर के संविधान के मूल सिद्धांतों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं.

उत्तर प्रदेश से शुरू कर के पूरे देश में भाजपा सरकार द्वारा अपराधियों, माफियाओं और अवैध निर्माणों के विरुद्ध चलाए गए अभियानों ने बुलडोजर को प्रशासनिक कार्रवाई के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया है. समर्थक इसे अपराध के खिलाफ कठोर शासन का प्रमाण बताने में लगे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि यह संवैधानिक प्रक्रिया और विधि के शासन के पूरी तरह खिलाफ है.

भाजपा चुनावी सभाओं में बुलडोजर को ‘अपराधियों के खिलाफ सरकार की ताकत’ के रूप में प्रस्तुत करती है और विपक्ष को डराती है. अब बुलडोजर का अर्थ केवल एक निर्माण मशीन नहीं है, बल्कि वह भारतीय राजनीति का प्रतीक है.

बुलडोजर राज्य शक्ति के आक्रामक प्रयोग और नागरिक अधिकारों को खत्म करने का प्रतीक है. बुलडोजर यानी जो भी विरोध का स्वर उठाए उसे कुचल दो. उन अखबारों, टीवी चैनलों को बंद कर दो जो सरकार विरोधी चीजें लिखें या दिखाएं. उन पत्रकारों का दमन करो जो सच लिखें, बोलें और दिखाएं. उन युवाओं को जेल में ठूंस दो जो शिक्षा और रोजगार की मांग करें. उन सुबूतों में आग लगा दो जो कोर्ट में सरकार के खिलाफ जाएं.

अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों, मदरसों और मकबरों को अतिक्रमण के नाम पर ढहा कर वहां मंदिरों का निर्माण करो. इस नई बुलडोजरी व्यवस्था को स्थापित करने में भाजपा और संघ पूरी शिद्दत से लगे हैं.

लोकतंत्र के सुबूतों को निगल गई आग

10 जून, 2026 की रात पश्चिम बंगाल के कोलकाता में अलीपुर स्थित दक्षिण 24 परगना जिला परिषद की इमारत में भीषण आग लगने से लगभग 4,000 ईवीएम और वीवी पैट मशीनें जल कर राख हो गईं. ये वही ईवीएम थीं जिन का उपयोग राज्य के 10 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव के दौरान किया गया था. इस सरकारी इमारत में दक्षिण 24 परगना जिला परिषद सहित कई सरकारी विभाग हैं. हैरानी की बात यह है कि आग बीच की मंजिलों यानी चौथी, 5वीं और 6ठी मंजिल को प्रभावित किए बिना सीधे ऊपर की 7वीं और 9वीं मंजिल पर पहुंच गई, जहां चुनाव कार्यालय और स्ट्रौंग रूम था, जिस में ये ईवीएम मशीनें सुरक्षित रखी गई थीं.

यह हादसा नहीं है. यह तो लोकतंत्र के साथ छेड़छाड़ के बाद बेहद अहम सुबूतों को नष्ट करने का एक सुनियोजित सफल काम है. न्याय या सुबूत मिटाने की साजिश भारत के चुनावी नियमों के तहतचुनाव खत्म होने के बाद भी एक निश्चित समय तक ईवीएम को स्ट्रौंग रूम में पूरी तरह सुरक्षित सील कर के रखा जाता है, ताकि यदि कोई उम्मीदवार नतीजों को कोर्ट में चुनौती दे तो इन मशीनों की दोबारा जांच या रीकाउंटिंग की जा सके. अचानक इन मशीनों के जल जाने से कानूनी और न्यायिक हस्तक्षेप का रास्ता हमेशा के लिए बंद होने का खतरा पैदा हो गया है.

आगे अनेक राज्यों में चुनाव होने हैं. खासकर अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव और 2029 में लोकसभा चुनाव अहम है. यदि इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति होती है तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक साबित होगी.

देश को बताया जाता है कि लोकतंत्र सुरक्षित है. मगर सवाल यह है कि जब सुबूत ही नहीं बचेंगे तो न्याय किस आधार पर होगा? जब मशीनें जल जाएंगी तो पुन: जांच कौन करेगा? जब रिकौर्ड नष्ट हो जाएंगे तो अदालत किसे परखेगी? और जब सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाएगा तो जवाबदेही की मांग कौन करेगा?

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले से ही चुनावी नतीजों पर सवाल उठा रही थीं. उन का आरोप है कि कम से कम डेढ़ सौ सीटों पर गड़बड़ी की गई है. आग की घटना ने अब इस बात पर विराम लगा दिया है कि कोई व्यक्ति कोर्ट में ईवीएम और वीवीपैट मशीनों की पुन:जांच के लिए आवेदन कर सके. यह मोदी सरकार की नई बुलडोजर न्याय प्रणाली है जो मनमाफिक न हो उसे ध्वस्त कर दो. कोर्ट जाने की जरूरत नहीं. सरकार का फैसला ही सुप्रीम फैसला है. इसी छल से पश्चिमी बंगाल का चुनाव ही नहीं जीत लिया गया अब संविधान को कुचलते हुए तृणमूल कांग्रेस के विधायकों, सांसदों, पार्षदों के दलबदल कानून को तोड़मरोड़ कर वोटरों की इच्छा की चिंता किए बिना संविधान को रौंदा जा रहा है.

संविधान क्या कहता है, यह फैसला करने का अधिकार सिर्फ सुप्रीम कोर्ट का है पर वह खुद क्या बन गया है, यह कहना भी भय पैदा करता है. वकीलों की दलीलें बेकार गईं, अखबार (थोड़े से ही हैं जो कुछ कह सकते हैं) की बात नकार दी गई. सुप्रीम कोर्ट के लिए जनता कौकरोच और परजीवी है कि वह सरकार के फैसलों को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाती है.

सुप्रीम कोर्ट एक तरफ बुलडोजर व्यवस्था को अंसवैधानिक कहती है पर असल में उस पर मोहर लगाती रहती है. 2024 में सुप्रीम कोर्ट की एक बैंच ने बुलडोजर कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का अधिकार अदालत का है, प्रशासन का नहीं. अदालत ने बिना उचित प्रक्रिया अपनाए किसी आरोपी का मकान गिराने पर चिंता व्यक्त की थी और कई मामलों में राज्यों से जवाब मांगा था. मगर सुप्रीम कोर्ट की सुनता और मानता कौन है?

राज्यों की भाजपा सरकारें अब सीधे न्याय करती हैं. सरकार कहती है कि भूमाफिया, अतिक्रमणवादियों, अवैध निर्माण और जघन्य अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है, जो कानून के दायरे में है. वे देश की अदालतों में भी यही कह कर बच रहे हैं कि घरदुकान अवैध तरीके से बनाई थी इसलिए ढहा दी गई, पर सवाल यह कि जब इतने साल से घरदुकान बने खड़े थे, तो पहले नजर क्यों नहीं आए?

नगर निगम बाकायदा हाउस टैक्स, वाटर टैक्स और सीवर टैक्स ले रहा है, फिर वे अवैध कैसे हो गए? फिर जब इलाके का एक मकान सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर के बना है तो उस के आसपास के मकान भी तो अतिक्रमण की गई जमीन पर ही बने हैं, तो सिर्फ आरोपी का मकान ही क्यों ढहाया गया?

मगर यह सवाल कौन उठाए? कोई सच्चाई बयां करने अदालतों में नहीं आ रहा है क्योंकि जो गरीब परिवार मकान ढह जाने के बाद सड़क पर आ गया हो, जिस के सामने पेट भरने और जिंदा बचने की चुनौती हो वह वकील करने और कोर्ट जाने की बात भी कैसे कर सकता है? फिर पुलिस का खौफ अलग है. एनकाउंटर में मार दिए जाने की दहशत है.

जैसे लोगों के घरों को गिराया जा रहा है, वैसे ही हर संस्था को तोड़ा जा रहा है. जो भी सरकार के धार्मिक और तानाशाही राज के रास्ते में आ रहा है उस पर उसी तरह बुलडोजर चल रहा है जैसा लोगों के पुराने घरों पर चलता है.

संविधान बनाम बुलडोजर

भारत का कानून कहता है कि कोई व्यक्ति तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक अदालत में उस का दोष सिद्ध न हो जाए. यदि केवल आरोप लगते ही किसी का घर गिरा दिया जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि दंड देने का अधिकार अदालत के पास है या प्रशासन के पास?

भारत का संविधान इस सिद्धांत पर आधारित है कि किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने और दंडित करने का अधिकार केवल कानून और न्यायालयों को है. संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की गारंटी देता है परंतु 2014 के बाद से देश के कई राज्यों में जिस प्रकार की ‘बुलडोजर न्याय व्यवस्था’ स्थापित हो गई है, उस ने संवैधानिक मूल्यों, विधि के शासन और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं. सिर्फ मकान, दुकान, प्याऊ, मसजिद ही नहीं, हर कानून, हर संवैधानिक प्रावधान, हर परंपरा जो सरकार के आड़े आ रही है, सरकारी शासन की बुलडोजरी व्यवस्था की चपेट में.

गरीबों पर बुलडोजर

बुलडोजर कार्रवाई का सब से चिंताजनक पहलू यह है कि इस का प्रभाव केवल आरोपी तक सीमित नहीं रहता. एक घर में मातापिता, पत्नी, बच्चे, बुजुर्ग और अन्य सदस्य भी रहते हैं. यदि किसी एक व्यक्ति पर आरोप है तो पूरे परिवार को बेघर कर देना किस न्याय सिद्धांत के अंतर्गत उचित ठहराया जा सकता है? जब किसी आरोपी का घर मुकदमे से पहले ही गिरा दिया जाता है तो व्यवहारिक रूप से उसे दोषी मान लिया जाता है. यह स्थिति न्यायिक प्रक्रिया की आत्मा के विपरीत है.

यदि बाद में अदालत आरोपी को निर्दोष घोषित कर दे तो क्या उस का ध्वस्त घर, बिखरा परिवार और समाप्त हो चुकी आजीविका वापस लौटाई जा सकती है? क्या किसी आरोपी का घर गिराना वास्तव में कानून का शासन है या फिर कानून की प्रक्रिया को दरकिनार कर के त्वरित दंड देने की एक राजनीतिक संस्कृति?

अपनों पर खामोशी

दूसरी तरफ योगी का बुलडोजरी न्याय अमीरों, नेताओं के करीबियों या सियासत में बैठे लोगों के लिए नहीं है. भारतीय जनता पार्टी के किसी नेता के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज होता है तो वर्षों तक उस का निबटारा नहीं हो पाता है. गवाहों पर दबाव, धमकी, हमले, हत्याओं की खबरें आने लगती हैं. तब आरोपी पर बुलडोजर नहीं गरजता, उलटे, आरोपी को पुलिस संरक्षण दिया जाता है.

पीडि़त को पैसे का लालच दे कर उस का मामला रफादफा करने की कोशिश की जाती है. आरोप सही हों या गलत, यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि सत्ता के करीब रहने वालों के लिए कानून का व्यवहार अलग है तो यह लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक संकेत है.

उन्नाव कांड : जहां पीडि़ता ने की आत्मदाह की कोशिश

उत्तर प्रदेश के भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने देश की न्याय व्यवस्था का खूब मखौल उड़ाया. सेंगर ने अपने आवास पर एक नाबालिग बच्ची का बलात्कार किया. जब नाबालिग और उस का परिवार न्याय की आस में पुलिस के पास गया तो पुलिस ने उन की एक न सुनी क्योंकि मामला विधायक से जुड़ा था. 8 अप्रैल, 2018 को पीडि़ता ने लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह की कोशिश की.

मीडिया में बात उछली तो पुलिस को केस रजिस्टर करना पड़ा. मगर अगले ही दिन 9 अप्रैल को पुलिस हिरासत में नाबालिग बच्ची के पिता की हत्या हो गई क्योंकि पहले सेंगर के समर्थकों ने उस के साथ मारपीट की थी बाद में हवालात में पुलिस ने उस की पिटाई की.

विपक्ष ने मोरचा खोला और जन दबाव बढ़ा तो मामला सीबीआई को सौंपा गया. मगर सेंगर की हिम्मत देखिए. 28 जुलाई, 2019 को पीडि़ता, उस की मौसी, चाची तथा वकील जब एक कार में जा रहे थे, एक ट्रक ने उस में जबरदस्त टक्कर मारी. इरादा था पीडि़ता को खत्म करने का.

इस दुर्घटना में पीडि़ता की चाची और मौसी की मौत हो गई, जबकि पीडि़ता और उस के वकील गंभीर रूप से घायल हुए. सुप्रीम कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया, तब जा कर कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ कार्रवाई हुई. केस आगे बढ़ा  और 16 दिसंबर, 2019 को दिल्ली की एक अदालत ने उसे बलात्कार और हत्या का दोषी मान कर आजीवन कारावास की सजा सुनाई.

जो काम कुलदीप सिंह सेंगर ने किया वह प्रधानमंत्री व गृहमंत्री के कार्यालय का हर अफसर कर सकता है. संविधान का बलात्कार अब आम हो चला है. संविधान की रक्षा के लिए जनता के पास उतना न साहस है, न पैसा है, न इच्छा है कि इस का विरोध करे, बहुतों को तो हिंदूहिंदू और हिंदूमुसलिम चश्मे के कारण ये काम दिखते ही नहीं हैं.

लखीमपुर खीरी : किसानों पर चढ़ी सत्ता की गाड़ी

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी और उन के बेटे आशीष मिश्रा की करतूत भी कोई भूल नहीं सकता है. 3 अक्तूबर, 2021 को किसान रैली से लौटते किसानों पर टेनी और उस के बेटे ने कार चढ़ा कर उन्हें रौंद कर मारा था. लखीमपुर खीरी में हुए इस कांड में 4 किसानों और एक पत्रकार की मौत हुई थी.

इस मामले में अभी भी अदालत में ट्रायल चल रहा है. मगर इस मामले में योगी सरकार ने अपना बुलडोजरी न्याय नहीं दिया. 5 लोगों के हत्यारे के न तो आवास पर बुलडोजर चला और न ही संपत्ति जब्त हुई. यह गाड़ी सिर्फ किसानों पर नहीं चढ़ी थी. यह गाड़ी जनता के अधिकारों पर चढ़ी थी.

स्वामी चिन्मयानंद मामला

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में गृह राज्यमंत्री और भाजपा सांसद रहे स्वामी चिन्मयानंद का मामला भी काफी चर्चित रहा. शाहजहांपुर में चिन्मयानंद का शिक्षा संस्थान और आश्रमों का बड़ा नैटवर्क है. चिन्मयानंद पर उस के ही कानून कालेज की एक छात्रा ने 2019 ने यौन शोषण का आरोप लगाया था.

इस छात्रा के साथ लंबे समय तक बलात्कार हुआ, उस के वीडियो बना कर उसे मानसिक दबाव में रखा गया, राजनीतिक और सामाजिक ताकत का इस्तेमाल कर के उसे डरायाधमकाया गया. छात्रा डर के मारे कुछ समय के लिए अंडरग्राउंड भी हो गई. बाद में उस ने पुलिस को अपने साथ हुई ज्यादतियों के कुछ वीडियो दिए.

उधर चिन्मयानंद ने छात्रा पर आरोप लगाया कि वह उस से 5 करोड़ रुपए की उगाही करना चाहती थी. केस चलता रहा और अंतत: मार्च 2021 में शाहजहांपुर की एमपी-एमएलए अदालत ने सम?ाते और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर चिन्मयानंद को इस मामले में बरी कर दिया.

गौरतलब है कि चुनाव आयोग में प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार भाजपा के 54 निर्वाचित प्रतिनिधियों ने महिलाओं के विरुद्ध अपराध से संबंधित मामलों का उल्लेख किया है, जिन में से 5 मामले बलात्कार के आरोपों से संबंधित हैं, मगर बुलडोजर की कार्रवाई किसी पर नहीं हुई. किसी की संपत्ति जब्त नहीं की गई क्योंकि ये लोग सत्ता में बैठे हैं. ये धर्म की रक्षा कर रहे है इसलिए सब गुनाह माफ हैं.

हर युवा का संवैधानिक अधिकार है कि वह अपना भविष्य अपनी क्षमता व इच्छा के अनुसार संवार सके. इस अधिकार पर बुलडोजर बैठ गए हैं. नैशनल टैस्ंिटग एजेंसी और सीबीआई की शक्ल में. इन संस्थाओं को एग्जाम लेने की ठेकेदारी दे दी गई है पर कहीं कोई सुनवाई नहीं है.

युवाओं के सपनों पर पेपर लीक का बुलडोजर

मोदी सरकार दावा करती है कि वह देश की 80 करोड़ जनता को मुफ्त राशन दे रही है. देना ही पड़ेगा क्योंकि सरकार रोजगार जो दे नहीं पा रही है. युवाओं को नौकरी न देनी पड़े, लिहाजा, आएदिन परीक्षाओं के पेपर लीक करवा दिए जाते हैं और फिर इम्तिहान रद्द हो जाता है. करोड़ों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियां करते हैं. मांबाप अपना पेट काट कर, जमीन बेच कर, गहने गिरवी रख कर उसे कोचिंग करवाते हैं, इस आशा में कि बेटा प्रतियोगी परीक्षा में निकल जाएगा, सरकारी नौकर हो जाएगा तो गरीबी के दिन दूर हो जाएंगे. मगर वह सरकारी मुलाजिम बने तो बने कैसे? पेपर ही लीक हो जा रहे हैं. परीक्षाएं ही रद्द हुई जा रही हैं.

सोचिए उस युवक की मानसिक हालत क्या होगी जिस ने 5 वर्ष तैयारी में लगा दिए हों और परीक्षा से कुछ घंटे पहले प्रश्नपत्र बाजार में बिकने लगे, फिर परीक्षा रद्द हो जाए. उस का सारा परिश्रम एक झटके में अर्थहीन हो जाता है.

हाल ही में नीट का पेपर रद्द होने के बाद अब तक नीट में सफल होने का सपना पालने वाले कोई 14 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं. सोचिए उन जवान और होनहार बच्चों के मांबाप के दिल पर क्या बीत रही होगी? वे कहीं जा कर दुहाई नहीं दे सकते. सुप्रीम कोर्ट संविधान के नौकरी, व्यवसाय व जीने के हक की रक्षा करने में हिचक रही है क्योंकि सरकार को नाराज नहीं कर सकती.

जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है आमजन के लिए न्याय की परिभाषा बदल गई है. न्याय अब उसी को माना जाता है जो सत्ता शीर्ष पर बैठे व्यक्ति ने सुना दिया. अब न्याय के लिए कोर्टकचहरी का दरवाजा खटखटाने की जरूरत कतई नहीं है. बुलडोजरी न्याय प्रणाली में सबकुछ खटाखट हो रहा है. उत्तर प्रदेश में बुलडोजर बाबा लोगों को तुरंत न्याय दे रहे हैं. किसी मुसलमान पर आरोप लगा नहीं कि बुलडोजर बाबा उस के सीने पर चढ़ गए. जब तक उस का घरदुकान नेस्तनाबूद न कर दें, उस के परिवार को सड़क पर खड़ा न कर दें, उसे जेल में न ठूंस दें या उस का एनकाउंटर न कर दें, तब तक बुलडोजर का गरजना नहीं रुकता.

संविधान से टकराती व्यवस्था

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने कानून गढ़ लिए हैं. इन से प्रेरित हो कर कई अन्य राज्यों में भी आरोपियों के मकानों और दुकानों पर बुलडोजर चल रहे हैं. जब तक आरोपी का पूरा घर गिरा नहीं देते, उस के बूढ़े मांबाप को, छोटे भाईबहनों को, बीवीबच्चों को सड़क पर नहीं बैठा देते, तब तक बुलडोजर की कार्रवाई चलती रहती है. बुलडोजर बाबा अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों को भी खूब रौंद रहे हैं. तर्क यह कि इस से अपराधियों में भय पैदा होता है और कानून व्यवस्था मजबूत होती है.

हालफिलहाल की बात करें तो जून 2025 में रामपुर और संभल में 2 मसजिदें, एक दरगाह व मजार तथा कई दुकानें सरकारी भूमि पर अतिक्रमण बता कर ढहा दी गईं. 2025 में ही फतेहपुर की 180 साल पुरानी नूरी जामा मसजिद के हिस्से को सड़क चौड़ीकरण परियोजना में ढहा दिया गया. आगे भी गिराना जारी रहता मगर समय रहते हाईकोर्ट ने रोक लगा दी. फरवरी 2026 में संभल में ग्राम समाज की भूमि पर बरसों से बने एक मदरसे को ध्वस्त किया गया. इस के अलावा, नेपाल सीमा से लगे जिलों में 429 धार्मिक ढांचे अवैध बता कर ढहा दिए गए. इन में मदरसे, मसजिदें, ईदगाह और अन्य धार्मिक संरचनाएं शामिल थीं.

राम मंदिर में बुलडोजरी लूट

भारतीय जनता पार्टी राममंदिर का मुद्दा उछाल कर सत्ता में आई. जिस तरह कुरुक्षेत्र के मैदान में हर तरह का छलकपट किया गया था वैसा ही राममंदिर के निर्माण में किया गया. अदालतों के निर्णयों को अपने मतलब का लिखाया गया. देशभर में दंगे कराए गए. धार्मिक भेदभाव बढ़ाया गया. भक्तों को बताया गया कि इस से हिंदू इतिहास गौरवशाली हो जाएगा. घरों में सोना बरसने लगेगा. सोना घरों में तो नहीं बरसा पर राममंदिर से जुड़े लोगों के घरों में जरूर बरस रहा है. बुलडोजर जब चलता है तो घरों और दफ्तरों की संपत्ति की लूट भी खूब होती है. वैसी ही राम मंदिर में दिख रही है.

महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर लूटा था. वह तो बाहर से आया था और दूसरे धर्म का होने के नाते उस की कोई आस्था उस मंदिर में नहीं थी. उस ने संपत्ति लूटी और ले कर चला गया. मगर यहां तो आस्थावानों ने अपने ही मंदिर में डकैती डाल दी. अपने ही भगवान को लूट लिया. मंदिर के रक्षक ही भक्षक बन गए. लंबे समय से अयोध्या के राम मंदिर में लूट मची हुई है.

गौरतलब है कि जब से मंदिर बना है वहां प्रतिदिन श्रद्धालुओं द्वारा बड़ी मात्रा में नकद दान, सोनाचांदी और अन्य चढ़ावे चढ़ाए जाते रहे हैं. अब खबर आई है कि उस चढ़ावे पर मंदिर के रखवालों ने ही डाका डाल दिया है. 200 करोड़ रुपए से अधिक के दान की लूट हो गई है. दान में चढ़ाई गई 60 किलो चांदी का कोई अतापता नहीं है. भगवान राम के नाम की सोने और हीरे जडि़त शिलाएं गायब हैं और लूट का यह खेल लंबे समय से जारी है.

योगी सरकार के कानों में भनक भी नहीं पड़ी और अब जो मामला उछला है तो एसआईटी जांच का खेल खेला जा रहा है, जबकि सीधे एफआईआर होनी चाहिए थी और ट्रस्ट के संचालकों सहित जितने लोग कैश गिनने और दान सहेजने के काम में लगे थे, सब को अरैस्ट कर के जेल में डाल दिया जाना चाहिए था.

एक अनुमान के मुताबिक, मंदिर में प्रतिमाह कोई 7 करोड़ रुपए से ज्यादा का कैश आता था. इस के अलावा आभूषण और रत्नजडि़त शिलाएं अलग थीं. मजे की बात है कि 1,500 रुपए माह पर काम करने वाले मंदिर के कर्मचारियों ने अपनी करोड़ों की कोठियां खड़ी कर लीं. बड़ीबड़ी जमीने खरीद लीं और सरकार को आज तक कुछ नजर नहीं आया. उन को सिर्फ मुसलमान, उन की मसजिदें और मजारें ही दिखती रहीं. जिन पर उन के बुलडोजर गरजते रहे. अब मंदिर में डकैती मामले में आवाज रुंध गई है.

चंदे के पैसे से चलने वाले मदरसों में आय का ब्योरा ढूंढ़ने वालों ने कभी राममंदिर के संचालकों से आय का ब्योरा क्यों नहीं तलब किया? जनता को तो यह जानने का अधिकार ही नहीं है कि मंदिरों में प्रतिदिन कितना चढ़ावा चढ़ता है और वह कहां जाता है? किस काम में खपाया जाता है? आखिर भगवान तो उस चढ़ावे का इस्तेमाल अपने निजी काम के लिए करते नहीं हैं, फिर जनता के उन अरबोंखरबों रुपयों का होता क्या है?

धार्मिक आयोजनों में अलगअलग पैमाने

गौरतलब है कि सड़के, फुटपाथ, पार्क, चौराहे और अन्य सार्वजनिक स्थल किसी एक धर्म, समुदाय या संगठन की संपत्ति नहीं होते हैं. वे सभी नागरिकों के सा?ा उपयोग के लिए बनाए जाते हैं. यदि किसी धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक आयोजन के कारण आम जनता को असुविधा होती है तो उस पर समान नियम लागू होने चाहिए पर क्या सभी मामलों में एकजैसी कठोरता दिखाई जाती है? बिलकुल नहीं, क्योंकि बुलडोजर न्याय व्यवस्था सिर्फ अल्पसंख्यकों और गरीबों के लिए है.

कांवड़ यात्रा, नमाज और समानता का प्रश्न

ध्यान दीजिए, हर वर्ष सावन के महीने में लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा में भाग लेते हैं. यह भारत की सब से बड़ी धार्मिक यात्राओं में से एक है. कई राज्यों में कांवड़ यात्रियों के लिए विशेष मार्ग बनाए जाते हैं, बैरिकेटिंग की जाती है, यातायात डाइवर्ट किया जाता है और प्रशासन अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था करता है.

कई बार स्थानीय लोगों से कांवडि़यों की भिड़ंत हो जाती है. युवा कांवडिए उग्र हो कर दुकानों में तोड़फोड़ करते हैं. गाडि़यों के शीशे तोड़ डालते हैं. ऐसे में कानून व्यवस्था को संभालना पुलिस के लिए भी मुश्किल हो जाता है क्योंकि कांवडि़यों को सत्ता का संरक्षण मिला हुआ है. जिन पर सत्ता पुष्प वर्षा करती हो उन पर पुलिस डंडा कैसे चलाए, ये बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो जाता है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो मुसलमानों को शुक्रवार को आधा घंटे के लिए सड़क पर नमाज पढ़ने तक की इजाजत नहीं देते. कहते हैं, ‘मसजिद के अंदर जगह नहीं है तो शिफ्टों में नमाज पढ़ो. जनसंख्या ज्यादा हो गई है तो उस को नियंत्रित करो. सड़कें धार्मिक गतिविधियों के लिए नहीं हैं और इस से यातायात तथा आम नागरिकों को परेशानी होती है.’

ऐसे में प्रश्न केवल कांवड़ यात्रा का नहीं, बल्कि समानता के सिद्धांत का है. एक तरफ किसी एक दिन आधा घंटा कोई सड़क पर नमाज पढ़ ले तो कयामत आ जाती है, किसी सार्वजानिक स्थल, पार्क के किसी कोने में कोई नमाज पढ़ता दिख जाए तो जिहादी घोषित हो जाता है और महीनों सड़कों का बड़ा हिस्सा कांवडि़यों के लिए घेर दिया जाए तो वह श्रद्धा का मामला होता है. उन पर फूलों की वर्षा की जाती है.

रामनवमी, गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा, मोहर्रम, ईद मिलादुन्नबी और अन्य धार्मिक अवसरों पर देशभर में जुलूस निकलते हैं. इन के कारण कई बार यातायात प्रभावित होता है, बाजार बंद होते हैं और आम नागरिकों को असुविधा का सामना करना पड़ता है. बड़े शहरों में गणेश विसर्जन के दौरान कई घंटे तक ट्रैफिक प्रभावित रहता है. दुर्गापूजा पंडालों के लिए पार्कों, मैदानों और कभीकभी सड़कों के हिस्सों का उपयोग किया जाता है. रामनवमी और अन्य जुलूसों के दौरान कई मार्गों पर यातायात रोकना पड़ता है.

इन आयोजनों को प्रशासनिक अनुमति हाथोंहाथ मिल जाती है. कुछ मिनटों के लिए सड़क पर नमाज गलत है तो फिर घंटों या दिनों तक चलने वाले अन्य धार्मिक आयोजनों के लिए अलग दृष्टिकोण क्यों है? यदि सड़क घेरना गलत है तो वह सभी के लिए गलत होना चाहिए. संविधान सब के लिए बराबर है.

संविधान सिर्फ एक दस्तावेज बन कर न रह जाए

संविधान का मूल विचार यह था कि राज्य नागरिकों का सेवक होगा, स्वामी नहीं. अदालतें अंतिम निर्णायक होंगी, प्रशासन नहीं. लेकिन यदि आरोप ही सजा बन जाए और बुलडोजर ही फैसला करे तो फिर संविधान की किताबें केवल पुस्तकालयों की शोभा बन कर रह जाएंगी. लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं है कि सरकार अपने समर्थकों के साथ कैसा व्यवहार करती है. असली परीक्षा यह है कि वह अपने आलोचकों, विरोधियों और सब से कमजोर नागरिकों के अधिकारों की कितनी रक्षा करती है.

जिस दिन बुलडोजर अदालत से बड़ा हो जाएगा, उस दिन संविधान केवल एक दस्तावेज बन कर रह जाएगा, जीवित व्यवस्था नहीं. इस से पहले कि पूरे देश में बुलडोजर व्यवस्था स्थापित हो जाए, इस का पुरजोर विरोध और जल्द से जल्द इस का दमन लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है.                       .

क्या महान संस्कृति के ढोल की खुल रही है पोल

Indian Politics: नरेंद्र मोदी के 12 साल के प्रधानमंत्रित्व काल का खूब प्रचार चल रहा है. टाइम्स औफ इंडिया जैसे बड़ेबड़े तमाम अखबारों में फ्रंट पेज पर 12 वर्षों की उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटा गया. राम मंदिर, धारा 370 जैसे कामों को गिनाया जा रहा है जबकि नोटबंदी, बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, बढ़ती सांप्रदायिकता, शिक्षा का लगातार गिरता स्तर और रुपए की लगातार गिरती वैल्यू जैसी विफलताओं को छिपाया जा रहा है. जिन उपलब्धियों का ढोल पीटा जा रहा है, उन की जमीनी हकीकत क्या है, आइए जानते हैं.

सारे धर्मों ने हमेशा अपनी महानता का ढोल पीटा है. हमारे देश में आज की राजनीति भी ढोल पीटने पर टिकी है. जब आप के पास तथ्य न हों तो महानता का ढोल पीटना बहुत आसान काम है. गौरव का ढोल तो कभी संस्कृति और सभ्यता का ढोल धर्म से सीखें. बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ, यह किसी ने नहीं देखा, लोगों को बुद्ध ने बताया. मूसा को 10 कमांडैंट मिले, लोगों ने नहीं देखा, मूसा ने खुद ही ढोल पीटा. हजरत मुहम्मद को गुफा में जिब्रील मिले, किसी ने नहीं देखा, हजरत मुहम्मद ने ही कहा.

असल में ढोल पीटने का यह खेल बेहद पुराना है. राजा अपने चक्रवर्ती होने का ढोल पीटते रहे. पुरुष अपनी मर्दानगी का ढोल पीटते रहे. ऊंची जाति अपनी श्रेष्ठता का तो अमीर अपने रुतबे का ढोल पीटते रहे. असल में ढोल वही पीटता है जो अंदर से खोखला होता है. सच को ढोल की जरूरत नहीं होती लेकिन ?ाठ के लिए ढोल पीटना जरूरी होता है. थौमस अल्वा एडिसन के नाम पर कोई ढोल नहीं पीटा जा रहा जिन्होंने बिजली ईजाद की. आज नरेंद्र मोदी अपने

12 साल का ढोल पीट रहे हैं. ढोल पीटने की यह संस्कृति असल में खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की मानसिकता की उपज है. सभी धर्मों में ढोल पीटने की परंपरा सदियों पुरानी है. कोई चमत्कार चाहे हुआ भी न हो, बस, गुरु या पैगंबर ने खुद कहा, तो लोग मान गए. आम जनता को सुबूतों की जरूरत नहीं होती. विश्वास और प्रचार काम करता है. ढोल पीटने से ?ाठ भी सच हो जाता है. यही ढोल आज राजनीति में खूब बज रहा है. पुराने समय में राजा चक्रवर्ती होने का ढोल पीटते थे. आज के नेता अपने विकास का ढोल पीटते हैं. ढोल पीटना ?ाठों की परंपरा का हिस्सा है क्योंकि इस में सिर्फ ढोंग और दिखावा होता है.

धर्म अंधविश्वास पर टिका है. चमत्कार, स्वर्गनर्क, पुनर्जन्म का ढोल पीटे बिना कोई भी धर्म जिंदा नहीं रह सकता. आज राजनीति भी इसी रास्ते पर चल रही है. राम मंदिर, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद का प्रचार आदि सब वोट बटोरने के हथियार बन गए हैं. क्या राम मंदिर से गरीबी, बेरोजगारी या शिक्षा की समस्या हल हुई? क्या मंदिरमसजिद के मुद्दे से जनता के संस्थान मजबूत हुए? फिर 12 साल लगातार राज करते रहने का ढोल पीटने का क्या अर्थ है?

जब डैमोक्रेसी तर्क और सुबूत पर चलती है तभी वह जनता के हित में बनी रहती है. डैमोक्रेसी के लिए न तो भगवान मायने रखता है, न चमत्कार, नेता भी चमत्कारी नहीं होते लेकिन राजनीति में भगवान भी होता है और चमत्कार भी होते हैं और कई बार नेता ही अवतार बना दिए जाते हैं. डैमोक्रेसी में नेता के काम देखे जाते हैं. वह कितने साल सत्ता में रहा, यह नहीं गिना जाता. नेता के कामों से देश की जनता को क्या लाभ मिला, यह आंका जाता है, उस के दिन या फेरे नहीं गिने जाते.

बड़े दावों के लिए सुबूत भी बड़ा चाहिए

असाधारण दावों के लिए असाधारण सुबूतों की जरूरत होती है. लोकतंत्र और विज्ञान इसी सिद्धांत पर चलते हैं. मगर मानव इतिहास में समाज को हमेशा चमत्कारों, महानता के दावों और उन के जबरदस्त प्रचार के सहारे नियंत्रित किया गया है. चाहे वह हिंदुओं के ग्रंथों का पौराणिक काल हो, मध्यकाल हो या आज के अमेरिका का आधुनिक दौर, ढोल पीटने यानी खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की यह संस्कृति हमेशा कायम रहती है.

विज्ञान और लोकतंत्र की खूबी यह है कि जब तक किसी घटना को प्रयोगशाला या स्वतंत्र गवाहों द्वारा परखा न जा सके, उसे अंधविश्वास या व्यक्तिगत दावा ही माना जाता है लेकिन विज्ञान और डैमोक्रेसी से उलट राजनीति में अंधविश्वास और दावे ही मायने रखते हैं. नेता खुद को चुनौती से परे दिखाने के लिए अवतार होने का ढोल पीटते हैं. अपने बारे में बड़ीबड़ी बातें करना और फिर उन्हें बारबार दोहरा कर लोगों के मन में स्थापित कर देना राजनीति का तरीका बन रहा है. धर्मों ने भी यह किया और राजाओं ने भी.

आज की राजनीति भी इस से अलग नहीं है. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले ढोल पीटने का यह काम कथाओं, पुराणों और धार्मिक ग्रंथों से होता था, आज टीवी, सोशल मीडिया और सरकारी प्रचार के माध्यम से होता है. पहले हर राजा स्वयं को महान, विजेता और जनता का रक्षक बताता था और दरबारी कवि उस की प्रशंसा में ग्रंथ लिखते थे.

आज लोकतंत्र का युग है लेकिन प्रचार की संस्कृति खत्म नहीं हुई है. बस, तरीके हाईटैक हो गए हैं. अब दरबारी कवियों की जगह टीवी चैनल, आईटी सैल, विज्ञापन एजेंसियों और सोशल मीडिया अभियान ने ले ली है. भारत के आज तक, इंडिया टीवी, एबीपी न्यूज और अमेरिका का फौक्स न्यूज चैनल्स एक जैसे हैं. एक नरेंद्र मोदी में अवतार देखता है, दूसरा डोनाल्ड ट्रंप में.

जवाहरलाल नेहरू ने कितना ढोल पीटा

ढोल पीटना आसान है लेकिन सच का सामना करना बेहद मुश्किल. मोदी के काल में प्रचार और पार्टी संगठन खूब मजबूत हुआ क्योंकि धर्मकथाओं से धर्म के प्रचार एयर ढोल पीटने की आदत और मजबूत हुई और इसी मजबूती के साथ उन संस्थाओं की बरबादी हुई जिन से जनता को हक मिले थे. साथ ही, विभाजनकारी राजनीति का दौर भी शुरू हुआ है.

मोदी के 12 साल में यूपीआई, कुछ डिजिटल सुविधाएं आईं लेकिन देखा जाए तो ये सभी या तो नेहरू की वैज्ञानिक सोच पर आधारित हैं या फिर पश्चिमी देशों की कंपनियों की तकनीक का कमाल हैं. प्रचार मशीन ने इन्हें मोदी का चमत्कार बना दिया है. स्टीम इंजन, बिजली, टैलीफोन, ट्रांजिस्टर, माइक्रोचिप क्या वर्ष 2014 के बाद पैदा हुए थे और क्या ये भारत की ईजाद हैं?

नेहरू ने आधुनिक भारत की नींव रखी. उन्होंने आईआईटी की शृंखला 1950 से ही शुरू कर दी. आईआईटी खड़गपुर 1951 में शुरू हुआ. आईआईएम और एम्स जैसे संस्थान 1956 में बने. 1969 में आईएसआरओ जैसी संस्थाएं बनीं. ये संस्थान आज भी भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का आधार हैं. इन संस्थाओं के अलावा जवाहरलाल नेहरू ने लोकतंत्र, संसदीय व्यवस्था, वैज्ञानिक सोच और धर्मनिरपेक्षता को मजबूत किया.

नेहरू ने कोई ऐसा काम नहीं किया जो दुनिया में पहली बार हुआ हो लेकिन उन्होंने जो किया, उस का ढोल न उन्होंने खुद न ही उन की पार्टी कांग्रेस ने कभी पीटा. बात कांग्रेस और नेहरू के प्रशंसा की नहीं, सिर्फ प्रचार से अपने को महान कहने की है.

1947 में जब देश आजाद हुआ, तब भारत बेहद गरीबी, अशिक्षा और सांप्रदायिक हिंसा से जू?ा रहा था. उस दौर में नेहरू ने किसी चमत्कार का दावा करने के बजाय देश को मजबूत संस्थान दिए. चुनाव आयोग, स्वतंत्र न्यायपालिका और योजना आयोग को खड़ा किया ताकि सत्ता किसी एक व्यक्ति के हाथ में केंद्रित न रहे. नेहरू के दौर में भारत की साक्षरता दर जो 1947 में मात्र 12 प्रतिशत थी, वह उन के कार्यकाल के अंत तक बढ़ कर लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंची.

यह बदलाव बिना ढोल पीटे हुआ. नेहरू को अपने काम गिनाने के लिए भारीभरकम पीआर और विज्ञापनों की जरूरत ही नहीं पड़ी. नेहरू ने संस्थान बनाए, लेकिन मोदी सरकार ने कई संस्थानों की आजादी और विश्वसनीयता खत्म कर दी. सीबीआई, ईडी, चुनाव आयोग, मीडिया और न्यायपालिका जैसे स्वतंत्र संस्थान राजनीति का शिकार हो कर पार्टी दफ्तर के हुक्म पर चलने लगे.

यह ध्यान रखना चाहिए कि निरक्षरता को चाहती तो ब्रिटिश सरकार भी खत्म कर सकती थी और उस समय की हिंदू रियासतों के राजा भी खत्म कर सकते थे. किताबों की सुविधा 18वीं सदी में आ चुकी थी. स्कूलकालेज खुलने लगे थे लेकिन हरेक के लिए दरवाजे तो बाद में 1947 में खुले. पहले उन को कौन रोक रहा था जो हिंदू धर्म की महानता के गुण गाए जा रहे थे.

विकास का ढोल ह्यकितना कारगर

मोदी सरकार का दावा है कि 12 सालों के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग 91,000 किलोमीटर से बढ़ कर 1.46 लाख किलोमीटर हो गए, एयरपोर्ट 74 से 160 हो गए और इस बीच रेलवे इलैक्ट्रिफिकेशन भी बढ़ा है लेकिन सच्चाई यही है कि नरेंद्र मोदी की ये उपलब्धियां पुरानी नींव पर ही बनी हैं. मोदी सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर का ढोल खूब पीटती है लेकिन बीजेपी का असली इंफ्रास्ट्रक्चर हर जिले में बीजेपी के पार्टी कार्यालय हैं. कांग्रेस के दफ्तर 70 साल के शासन के बावजूद मैली, खंडहरनुमा बिल्ंिडगों में हैं.

12 सालों में कोई नया हौस्पिटल, यूनिवर्सिटी या संस्थान बना हो या न, लेकिन बीजेपी ने पूरे देश में 500 से ज्यादा जिला स्तर के अपने भव्य कार्यालय बना कर खड़े जरूर कर दिए हैं. हर जिला कार्यालय पर 1.5 से 3 करोड़ रुपए खर्च हुआ है. हजारों करोड़ रुपए सिर्फ इन कार्यालयों पर खर्च हुए हैं, जबकि आम लोग आज भी स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के लिए तरस रहे हैं.

इन सब के अलावा अगर बीजेपी के पिछले एक दशक के शासन को तार्किक और आर्थिक आंकड़ों की कसौटी पर कसा जाए तो प्रचार और जमीनी हकीकत में अंतर साफ दिखता है. पिछले कुछ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, सीबीआई और ईडी जैसी संस्थाओं की निष्पक्षता पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठे हैं. ‘वी डेम’ जैसी इंटरनैशनल संस्थाओं ने तो भारत को इलैक्टोरल औटोक्रेसी की श्रेणी में रखा है.

सरकार डिजिटल इंडिया और मजबूत अर्थव्यवस्था का भी खूब ढोल पीटती है लेकिन अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और सैंशस के डाटा बताते हैं कि भारत में ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी दर ऐतिहासिक रूप से बढ़ी है. यह एक कड़वा सच है कि सरकारी स्कूलों, अस्पतालों और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बुनियादी ढांचे को बरबाद किया गया.

मोदी के विकास के दावे को आंख मूंद कर स्वीकार करवाने में मीडिया जुटी हुई है. सच यह है कि देश का निर्माण आत्मप्रशंसा से नहीं, बल्कि मजबूत, स्वतंत्र और पारदर्शी संस्थाओं से होता है. मीडिया को गोदी मीडिया कहना क्या यह साबित नहीं करता कि भारत में ढोल की ही पूजा होती है.

वैसे तो हर सरकार अपनी उपलब्धियों का प्रचार करती है, यह लोकतंत्र का हिस्सा भी है लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब प्रचार असलियत के बिलकुल उलट हो जाता है और सत्ता की आलोचना को देशद्रोह या विरोधी राजनीति बता कर खारिज किया जाने लगता है. लोकतंत्र की मजबूती के लिए संस्थाओं की स्वतंत्रता, प्रैस की आजादी, विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक सद्भाव भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं और इन्हीं बिंदुओं पर मोदी सरकार की आलोचना होती है क्योंकि इन 12 सालों में स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता कमजोर हुई है और राजनीतिक धु्रवीकरण बढ़ा है.

लोकतंत्र से निर्माण सीधेसीधे जुड़ा है. सोवियत रूस में जम कर ढोल पीटा जाता था कि मजदूरो व किसानों की सरकार है, उत्तर कोरिया में खूब ढोल पीटा जाता है कि किम जोंग उन के वारिसों ने बहुत दूर मार कर सकने वाली मिसाइल बना ली हैं लेकिन जनता को क्या मिला है? दोनों देशों की जनता भारत की जनता की तरह भूखीनंगी है, लड़ाई में मरने को मजबूर है.

12 साल का विकास या सिर्फ ढोल

देश में मोदी सरकार के 12 साल पूरे हो चुके हैं. अखबारों के फ्रंट पेज पर राम मंदिर, अनुच्छेद 370 की समाप्ति जैसी उपलब्धियों का खूब प्रचार हो रहा है. इंफ्रास्ट्रक्चर, यूपीआई, आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं को भी हाईलाइट किया जा रहा है लेकिन नोटबंदी, सांप्रदायिक तनाव, रुपए की गिरती कीमत और बेरोजगारी जैसी समस्याओं पर चुप्पी साध ली गई है.

राम मंदिर बना. यह हिंदू भावनाओं के लिए बड़ा प्रतीक है. प्राण प्रतिष्ठा 2024 में हुई और निर्माण लागत करीब 19 सौ करोड़ रुपए आई. यह पूरी रकम दान से आई लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पूरे देश की प्रगति का मापदंड है? मंदिर से उत्तर प्रदेश के एक जिले अयोध्या में पर्यटन जरूर बढ़ा लेकिन उसी उत्तर प्रदेश के हजारों गांवों में आज भी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं. असल में एक धार्मिक प्रोजैक्ट को राष्ट्रीय उपलब्धि बता कर आर्थिक व सामाजिक मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है.

बीजेपी अपने 12 सालों के शासन की दूसरी सब से बड़ी उपलब्धि अनुच्छेद 370 की समाप्ति को बताती है. 2019 में अनुच्छेद 370 हटाया गया. सरकार का दावा था कि इस से कश्मीर में आतंकवाद कम होगा, विकास बढ़ेगा, घाटी में शांति आएगी लेकिन कश्मीर में स्थानीय लोगों में असंतोष आज भी बरकरार है. राज्य का दर्जा अभी तक बहाल नहीं हुआ. विकास के दावे ?ाठे साबित हुए. बेरोजगारी जस की तस है. 370 हटाए जाने के बाद भी आतंकवाद में कोई कमी नहीं आई. पुलवामा और पहलगाम जैसे आतंकी हमले 370 हटाए जाने के बाद ही हुए. 370 को हटाने का एकतरफा फैसला लोकतंत्र की भावना के खिलाफ था. भले ही सुप्रीम कोर्ट ने इसे वैध ठहराया हो.

नरेंद्र मोदी सरकार के 12 सालों का सब से बड़ा फैलियर नोटबंदी थी जिस पर सरकार बात तक नहीं करती. हालांकि नोटबंदी को राष्ट्रहित में बताने के लिए ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों का सहारा लिया गया लेकिन फिल्में कल्पनाओं के नाम पर भीड़ इकट्ठा कर सकती हैं इन्हें सही नहीं ठहरा सकतीं.

8 नवंबर, 2016 को कालाधन, फेक नोट और आतंकवादी फंडिंग खत्म करने के नाम पर देश की करंसी को ही रद्द कर दिया गया. आरबीआई के अनुसार, 99 प्रतिशत नोट बैंक में वापस आ गए. इस से बीजेपी के तमाम नैरेटिव गलत साबित हुए. अर्थव्यवस्था को ?ाटका लगा. छोटे कारोबार, किसान और मजदूर सब से ज्यादा प्रभावित हुए. लाखों नौकरियां चली गईं. जीडीपी ग्रोथ में गिरावट आई.

कालाधन कैश में कम ही होता है. असली कालाधन प्रौपर्टी, सोना, विदेशी खातों में ही रहे जिस पर कोई असर नहीं पड़ा. यह एपिक फैलियर था जिस ने आम आदमी को परेशान किया और इकोनौमी को भारी नुकसान पहुंचाया.

सरकार दावा करती है कि सांप्रदायिक दंगे कम हुए लेकिन रिपोर्ट्स उलट कहानी बताती हैं. एनसीआरबी के अनुसार 2014 से 2016 के बीच ही ऐसी हजारों घटनाएं हुई हैं. 2017 से 2022 के बीच सांप्रदायिक तनाव और दंगों की 2,900 से ज्यादा घटनाएं दर्ज की गई हैं. लिंचिंग, धर्मांतरण विवाद और मंदिर, मसजिद जैसे बेबुनियादी मुद्दे बढ़े हैं. इस दौरान अल्पसंख्यकों पर हमले की सब से ज्यादा घटनाएं रिपोर्ट हुई हैं. हालांकि दंगे तो पिछली सरकारों में भी हुए हैं लेकिन मोदी काल में ध्रुवीकरण की राजनीति को खूब बढ़ावा मिला, इसलिए सरकार के शांति के दावे बिलकुल सतही हैं.

अगर विकास का आकलन आम आदमी की जिंदगी से किया जाए तो तसवीर उतनी चमकदार नहीं दिखती जितनी विज्ञापनों में दिखाई जाती है. आज भी लाखों किलोमीटर ग्रामीण सड़कें पक्की नहीं हो पाईं. भारत का कुल सड़क नैटवर्क लगभग 66 लाख किलोमीटर है, जिस में सब से बड़ा हिस्सा ग्रामीण सड़कों का है. सरकार ने पीएमजीएसवाई के तहत लाखों किलोमीटर सड़कें बनाई हैं, लेकिन आज भी कई राज्यों में गांवों को जोड़ने वाली सड़कें कच्ची हैं या बरसात में खराब हो जाती हैं.

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रोजगार रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कुल बेरोजगारों में युवाओं की हिस्सेदारी लगभग 83 प्रतिशत है. 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 25 से 29 साल के युवाओं में बेरोजगारी दर लगभग 20 प्रतिशत है. 20 से 29 वर्ष के कुल 6.3 करोड़ स्नातकों में से लगभग 1.1 करोड़ बेरोजगार हैं.

12 साल में डिजिटल इंडिया, इंफ्रास्ट्रक्चर, कुछ वैलफेयर स्कीम्स जैसे कुछ अच्छे काम जरूर हुए हैं लेकिन हर साल 2 करोड़ नौकरियां, अच्छे दिन और विकसित भारत जैसे बड़ेबड़े दावों की तुलना में हकीकत बिलकुल उलट है. बीजेपी की प्रचार मशीनरी इन कुछ उपलब्धियों का बखान तो खूब करती है जबकि महंगाई, बेरोजगारी, किसान संकट, स्वास्थ्य और शिक्षा के गिरते स्तर जैसी खामियों को छिपाती है.

लगातार धाराशायी होता विकास

इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करें तो पिछले 4-5 सालों में ही सैकड़ों पुल गिरे. 2021-2025 के बीच 170 ब्रिज ढहे, जिन में 200 से ज्यादा मौतें हुईं. बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र में लगातार पुल टूटने की घटनाएं हुईं.

2022 में मोरबी ब्रिज हादसा हुआ जिस में 141 मौतें हुईं. गुजरात में हाल ही में गंभीरा ब्रिज गिरा, जिस में 9 मौतें हुईं. उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में हाल ही में अंडरकंस्ट्रक्शन ब्रिज गिरा, कई मजदूर मरे. बिहार में 2023 से 24 के बीच 13 नए ब्रिज गिरे. भ्रष्टाचार और घटिया कंस्ट्रक्शन की वजह से पुलों का गिरना नए रिकौर्ड बना रहा है लेकिन किसी की कोई जवाबदेही नहीं. नई सड़कें बनते ही गड्ढे और दरारें नजर आने लगती हैं. मानसून में सड़कें बह जाती हैं. पौटहोल्स से 2020 से 24 के बीच 9,000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं.

जिस अयोध्या को बीजेपी अपनी सब से बड़ी उपलब्धियों में गिनती है उसी आयोध्या की नई सड़कें, राम मंदिर के रास्ते पहली बारिश में ही खराब हो गए. मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक में दरारें आईं. राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी 21 ब्रिज पिछले 3 सालों में गिरे हैं. ग्रामीण सड़कें 40 प्रतिशत तक अभी भी कच्ची हैं. इन का रखरखाव जीरो है और क्वालिटी तो बिलकुल घटिया स्तर की है.

दरभंगा में एम्स बनाने की 2015 में घोषणा हुई. 2020 में मंजूरी मिली.

10 साल से ज्यादा बीत गए, 1,200 करोड़ खर्च हो गए लेकिन अस्पताल के नाम पर सिर्फ मुख्य गेट और बाउंड्री वाल बनी है. पूरा अस्पताल, डाक्टर्स, बैड्स आदि सब कागजों पर चल रहे हैं. बिहार जैसे पिछड़े इलाके में स्वास्थ्य सुविधा का ऐसा मजाक सिर्फ बीजेपी ही कर सकती है. यह प्रतीक है कि बीजेपी के 12 सालों में प्रचार तो भारी रहा लेकिन असली काम शून्य ही साबित हुए.

विकास की बत्ती गुल

झूठ का कितना ही ढिंढोरा पीटा जाए, कई बार वक्त भी आईना दिखा देता है. जयपुर में बीजेपी प्रदेश कार्यालय में मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने का जश्न मनाया जा रहा था. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव मंच पर मोदी सरकार की उपलब्धियां गिना रहे थे. उन के सामने राजस्थान के ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर भी बैठे थे लेकिन 15 मिनट में 3 बार बिजली गुल हो गई. आखिरकार मोबाइल फोन की टौर्च और कैमरों की लाइट जला कर विकास का बखान किया गया.

यह घटना कोई मजाक नहीं बल्कि बीजेपी के विकास मौडल की असली तसवीर है. जितना ढोल पीटा जाता है, हकीकत उतनी ही कड़वी होती है. जयपुर वाली घटना बीजेपी की पूरी राजनीति को उजागर करती है. ऊर्जा मंत्री के सामने बिजली गुल होना संयोग नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी है. 12 साल में विकसित भारत का सपना दिखाया गया लेकिन बिजली, पानी, नौकरी और बुनियादी समस्याएं जस की तस हैं.

बिजली की ही बात करें तो केंद्र सरकार दावा करती है कि 2012 वाले बड़े ब्लैकआउट से अब सुधार हुआ है. पीक डिमांड 270 जीडब्लू तक पहुंची है लेकिन राज्यों में, खासकर गरमी में, पावर कट आम हैं. दिल्लीएनसीआर, चेन्नई, राजस्थान जैसे कई राज्यों में लोडशेडिंग होती रहती है. इस से छोटे उद्योग और किसान सब से ज्यादा प्रभावित होते हैं. आज जगहजगह जेनरेटर लगे हैं क्योंकि बिजली उत्पादन और वितरण भरोसेमंद नहीं हैं.

सीएमआईई और पीएलएफएस डेटा के अनुसार बेरोजगारी 5-8 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है. शिक्षित युवाओं में तो यह और भी ऊंची है. लाखों युवा नौकरी की तलाश में बेरोजगार घूम रहे हैं. छोटे उद्योगों पर संकट के बादल गहरा रहे हैं. लाखों यूनिट बंद हो चुकी हैं. इस से करोड़ों नौकरियां गईं. डीमौनिटाइजेशन और जीएसटी के बाद रिकवरी धीमी रही.

महंगाई लगातार बढ़ी है. टमाटर, प्याज, दाल जैसी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं. आम आदमी की थाली महंगी हो गई. किसानों की आय दोगुनी करने का वादा 2022 तक था लेकिन आज तक पूरा नहीं हुआ. किसान आंदोलन में 700 लोग मारे गए, किसानों का कर्ज और आत्महत्याएं जारी रहीं. कई राज्यों में फसलें सड़ गईं, मुआवजा नहीं मिला.

इन 12 सालों में अमीरों और कौर्पोरेट्स को फायदा हुआ. शेयर मार्केट, इंफ्रा प्रोजैक्ट्स बढ़े लेकिन गरीब और मध्य वर्ग पर बो?ा भी बढ़ा जिस से असमानता बढ़ी. जीडीपी ग्रोथ के दावे किए गए लेकिन जौब क्रिएशन और रियल वेज ग्रोथ कम हुई.

इंफ्रास्ट्रक्चर में कुछ कम हुआ लेकिन गुणवत्ता और रखरखाव पर सवाल भी खड़े हुए. कई प्रोजैक्ट्स में देरी हुई और भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे. कोविड लौकडाउन के दौरान मजदूरों का संकट गहराया. बिना तैयारी के नीतियां बनीं जिस से हजारों लोग मारे गए लेकिन कोई जवाबदेही तय नहीं हुई.

नेहरू का सब से बड़ा योगदान संस्थानों का निर्माण था. किसी भी सरकार का मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि उस ने संस्थाओं को मजबूत किया या कमजोर. हर जिले में शानदार पार्टी कार्यालय बन जाना पार्टी के विकास का प्रमाण तो है, देश का नहीं. विकास का अर्थ है बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार, वैज्ञानिक सोच, सामाजिक समानता और नागरिक स्वतंत्रता. अगर किसी देश में विशाल इमारतें खड़ी हो जाएं लेकिन बेरोजगारी, असमानता और सामाजिक तनाव बने रहें तो ऐसा विकास अधूरा ही माना जाएगा. नेहरू के 12 साल की तुलना मोदी के

12 साल से करना तो सूरज को दीया दिखाने जैसा है. 12 साल के विकास का ढोल बजाने की जरूरत ही न पड़ती अगर सच में बीजेपी की नीति और नीयत साफ होती.

 

Hindi Stories: अंधेर नगरी – सेसिया राजा

Hindi Stories: लोकतंत्र का राजा मस्त था. वह अपने अंधाधुंध राजसी खर्चे पूरे करने और विदेशी बैंकों में खुलवाए अपने खाते भरने के लिए जनता पर सेस पर सेस लगा रहा था. बेरोजगारी, महंगाई से त्रस्त जनता को अमीरी के सपने दिखाने के लिए कभी वह आलू से सोना बनाने की विधि बताता तो कभी अपने राज्य के दो जून की रोटी तक न पकने वाले घरों में जलेबियां बनाने की फैक्टरियां लगवा नीलाम जनता को उन्हें दुनियाभर को सप्लाई करवाने का ?झांसा दे अंबानी, अडानी, टाटा, बिरला बनने का सपने दिखाता.

कभी वह गरीब जनता को गरीबी से छुटकारा दिलवाने के लिए विगत राजा द्वारा स्विस बैंकों से कालाधन ला जनता के खातों में 20-20 लाख रुपए डालने का वादा कर जनता के बैंकों में खाते खुलवाता तो कभी महंगी एलपीजी न खरीद पाने वाली जनता को गटर के सड़े पानी से सर्वोत्तम रसोई गैस बनाने की विधि बताता.

रसरंग में मस्त राजा का खजाना जब बिलकुल खाली हो गया तो एक राजहितैषी मंत्री ने राजा से दबी जबान में कहा, ‘राजा साहब, राजा साहब, सरकारी खजाना बिलकुल खाली हो गया है. कहीं से कर्ज मिलने की भी संभावना नहीं. सरकारी कर्मचारियों को वेतन देना तो छोड़ो, पैंशनधारियों को पैंशन देने तक को खजाने में पैसा नहीं. सरकार का दिवालिया पिट गया है. ऐसे में जो आप चाहें तो…’

‘तो क्या, लोकतंत्रीय राजकोष घाटे के लिए ही होता है. किसी एक भी राजा के राजकाल को बताओ जब उस के राजकाल में लोकतंत्रीय राजकोष लाभ में रहा हो. सो, हम भी अपवाद होना नहीं चाहते, सब की तरह विवाद होना चाहते हैं, ’ राजा ने अपना राजमुकुट सीधा करते कहा.

‘महाराज, आप का परमहितैषी होने के नाते आप से करबद्ध निवेदन है कि जनता को दिखाने को ही सही, राजकीय फुजूलखर्ची पर तनिक लगाम लगाइए ताकि जनता को भी लगे कि आर्थिक मंदी की मार जनता ही नहीं, उन का राजा भी ?ोल रहा है. बेरोजगारी से वे ही नहीं खेल रहे, उन का राजा भी खेल रहा है. महंगाई की मार से आलूप्याज उन को ही नहीं, राजा को भी झेलना पड़ रहा है. तभी आप अगली बार भी लोकतंत्र के राजा बन पाएंगे.

‘लोक का विश्वास नहीं तो कम से कम उन का वोट तो जीतिए, महाराज. लोकतंत्रीय और पारिवारिक राजा में एक ही अंतर होता है, महाराज. और वह यह कि पारिवारिक राजा पुश्त दर पुश्त जनता पर अत्याचार करता है लेकिन लोकंतत्र का राजा 5 साल ही राज कर पाता है.’

‘मतलब, हम अगले चुनाव में राजा नहीं बन पाएंगे? लेकिन अभी तो चुनाव में

3 साल बाकी हैं. चुनाव के आखिरी साल में हर डैंटपेंट कर लेंगे,’ राजा ने बेपरवाह होते राजगद्दी पर बैठे मंत्री को आंखें तरेरीं तो वफादार मंत्री ने कहा, ‘ऐसा मैं कब कह रहा हूं, जनाब. बंदा तो चाहता है आप अमर हों, हर चुनाव के बाद इस गद्दी का सौंदर्य बढ़ाते रहें. पर असल में बात यह है कि जनता का महंगाई से बुरा हाल है. राज्य की सड़कें फटेहाल हैं. पता ही नहीं चल रहा कि गड्ढों के बीच सड़कें हैं या सड़कों के बीच गड्ढे. अब तो जनता ने सड़कों के गड्ढों के बीच मत्स्यपालन शुरू कर दिया है.

‘आप की स्पेस तकनीक से बने ठेकेदारों को समर्पित पुल उद्घाटन के तुरंत बाद भगवान को प्यारे हो रहे हैं. बचे पुलों पर से जनता जाने से कतरा रही है. उसे नदी में बहने का डर नहीं, लेकिन पुल से सहीसलामत नदी पार करने में डर है.’

‘मतलब?’

‘अब राजकोष के लिए कुछ कठोर कदम उठाने होंगे, महाराज.’

‘कुछ कदम बोले तो?’ राजा ने मंत्री को सिर से पांव तक घूरते पूछा.

‘सरकारी धन बचाने के लिए जैसे अपना सरकारी अमला कम कर दीजिए. अपने अमले के दिमाग में नकेल डालिए. फुजूलखर्ची को रोकिए. सरकारी राशन की दुकानों में जनता को आटे का कोटा बढ़ाइए. बाजार में तो आटा 45 रुपए प्रति किलोग्राम हो गया है. जनता में विश्वास जगाइए कि आप केवल राजा नहीं, उस के सच्ची हितैषी भी हैं, अपने भाईभतीजों के नहीं. अपने अफसरों को छोड़ अब चुनाव जीतने को जनता से की गारंटियों की ओर नजर घुमाइए.’

‘पर वैसी झूठी गारंटियां तो चुनाव जीतने के लिए राजा बनने को हर पार्टी देती आई है. फिर हम ने कौन सा जनता को झूठी गारंटियां दे कर अनर्थ किया है?’ राजा ने वफादार मंत्री को घेरने की सोची. उसे मंत्रिमंडल से निकालने की तो वे सोच ही चुके थे. ऐसा मंत्री किस काम का जो राजा को सच से अवगत करवाए. हर राजा के वफादार मंत्री का काम होता है कि वह हर वक्त राजा को अंधेरे में नहीं, घुप्प अंधेरे में रखे और अपनी रोटियां सेंकता रहे. अपने राजा की प्रशंसा के महाकाव्य रचता रहे.

कुछ देर तक राजा ने सोचने के बाद कहा, ‘तो ऐसा करो, हवा पर सेस लगा दो.’

‘जनाब, वह तो पहले ही लगा चुके हैं’, मंत्री ने सिर झुकाए कहा.

फिर कुछ देर तक राजा ने सोचने के बाद कहा, ‘तो ऐसा करो, जल न आने वाले नल पर भी सेस लगा दो.’

‘जनाब, वह तो पहले ही लगा चुके हैं,’ मंत्री ने सिर ?ाकाए कहा.

फिर कुछ देर तक राजा ने सोचने के बाद कहा, ‘तो ऐसा करो, नल में न आने वाले जल पर सेस लगा दो.’

‘जनाब, वह तो पहले ही लगा चुके हैं,’ मंत्री ने सिर झुकाए ही कहा.

फिर कुछ देर तक राजा ने सोचने के बाद कहा, ‘तो ऐसा करो, जनता की सोच पर सेस लगा दो.’

‘जनाब, वह सोचती ही कब है? फिर भी हम वह बहुत पहले ही लगा चुके हैं,’ मंत्री ने सिर झुकाए कहा. फिर कुछ देर तक राजा ने सोचने के बाद कहा, ‘तो ऐसा करो, धूप पर सेस लगा दो.’

‘जनाब, वह तो लगातार प्रदूषण बढ़ने से आ ही नहीं रही, फिर भी हम उस पर भी सेस लगा चुके हैं,’ मंत्री ने सिर झुकाए कहा.

फिर कुछ देर तक राजा ने सोचने के बाद कहा, ‘तो ऐसा करो, जनता के घरों के आसपास के पेड़पौधों पर सेस लगा दो.’

‘जनाब, वह तो जनता के घरों के आसपास तो छोडि़ए, जंगलों में भी पेड़ न होने के बाद भी पहले ही लगा चुके हैं,’ मंत्री ने सिर ?ाकाए कहा.

फिर कुछ देर तक राजा ने सोचने के बाद कहा, ‘तो ऐसा करो, जनता के जूतों पर सेस लगा दो.’

‘जनाब, जनता के नंगेपांव चलने पर भी तो वह हम पहले ही लगा चुके हैं,’ मंत्री ने सिर झुकाए कहा. फिर कुछ देर तक राजा ने सोचने के बाद कहा, ‘तो ऐसा करो, जनता के पीने पर सेस लगा दो.’

‘जनाब, पीने वालों पर तो छोड़ो, वह तो हम गटर का पानी पीने वालों पर भी पहले ही लगा चुके हैं,’ मंत्री ने सिर झुकाए कहा.

फिर कुछ देर तक राजा ने सोचने के बाद कहा, ‘तो ऐसा करो, जनता के सोने पर सेस लगा दो.’

‘जनाब, वह तो हम रातरातभर नींद न आने वाली जनता पर भी पहले ही लगा चुके हैं,’ मंत्री ने सिर ?ाकाए कहा.

फिर कुछ देर तक राजा ने सोचने के बाद कहा, ‘तो ऐसा करो, जनता की हर सांस पर 10 रुपए का सांस सेस लगा दो.’

‘जनाब, वह तो हम आप के कहने से पहले ही लगा चुके हैं. गुस्ताखी माफ हो महाराज, जनता है कि अब एक सांस 10-10 मिनट बाद लेने लगी है,’ मंत्री ने सिर झुकाए कहा.

‘कमाल है, हम राजकोष भरने के लिए तुम्हें शासकीय सु?ाव दे रहे हैं और एक तुम हो कि…’ जनहित में राजा का गुस्सा बढ़ने लगा.

‘सच बोलना माफ हो सरकार, अब जनता पर कहीं से भी सेस नहीं लगाया जा सकता. वह चारों ओर से सेसों से घिर चुकी है.’

फिर बड़ी देर तक चिंतनमनन करने के बाद राजा ने आदेश दिया, ‘तो कल से जनता के जीने पर ही सेस लगा दिया जाए. इसे राजा का आदेश मान तत्काल प्रभावी ढंग से लागू किया जाए. जो भी हमारे राज में कल के सूर्य की पहली किरण के बाद बिन सेस दिए जीने का अपराध करेगा उस से उस का आधार कार्ड छीन लिया जाएगा.’

‘पर जनाब, आजकल एकएक नागरिक के पास चारचार आधार कार्ड हैं,’ मंत्री ने सिर झुकाए कहा तो राजा ने तुरंत उस का पद कलम कर चैन की सांस ली. Hindi Stories

आमिर खान या निकाह खान

Aamir Khan Marriage: देश में दूसरी शादियां बहुत बड़े पैमाने पर नहीं होतीं पर पहले जैसी उत्सुकता, चर्चा और हैरानी का विषय नहीं रह गईं हैं. हां, किसी की भी तीसरी शादी जरूर हैरान करती है क्योंकि यह असामान्य और अपवाद की श्रेणी में आती है. खासतौर से उस वक्त जब पहली 2 पत्नियों को आपसी सहमति से तलाक दिया गया हो. कामयाब अभिनेता आमिर खान की गौरी स्प्रैट से शादी करने के फैसले को चिंता का विषय कहा जा सकता है.

अभिनेता आमिर खान की शादियों और तलाकों की दास्तां से पहले यह बात भी कम दिलचस्पी और उत्सुकता वाली नहीं कि आखिर अब ये गौरी स्पै्रट हैं कौन और क्यों बुढ़ाते आमिर खान का दिल उन पर आ गया. 47 वर्षीय गौरी मुंबई में अपना ‘बी ब्लंट’ सैलून चलाती हैं, पहले पति से उन्हें एक 7 साल का बेटा है.

गौरी की पारिवारिक पृष्ठभूमि काफी दिलचस्प है. उन के ग्रैंडफादर फिलिप स्पै्रट अब से कोई 100 साल पहले भारत आए थे, मकसद था भारत में कम्युनिज्म को बढ़ावा देना. इस के लिए उन्हें कम्युनिस्ट इंटरनैशनल की ब्रिटिश शाखा ने बतौर एजेंट भेजा था. भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से वे एक थे. फिलिप अच्छे लेखक और वामपंथी विचारक भी थे. अमेरिकी इमदाद से प्रकाशित होने वाली मैगजीन ‘माइस इंडिया’ का संपादन भी उन्होंने किया था जो अमेरिका और उस के पूंजीवाद की घनघोर समर्थक पत्रिका थी.

जल्द ही वे महात्मा गांधी के प्रभाव में आ गए और साम्यवादी से उदारवादी हो गए. फिलिप उन गिनेचुने अंगरेजों में से एक थे जिन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी और जेल भी गए. उन की लिखी किताबों में से साल 1939 में गांधीजी पर लिखी किताब ‘गांधी अ एनालिसिस’ काफी लोकप्रिय हुई थी. देश की आजादी के बाद फिलिप भारत में ही बस गए थे और शादी एक तमिलियन महिला सीता से की थी.

इसी तर्ज पर गौरी के पिता रौबर्ट स्पै्रट ने भी पंजाबी आयरिश मूल की रीता स्पै्रट से शादी की जो बेंगलुरु में अपना सैलून चलाती थीं जिसे अब गौरी संभाल रही हैं. अपने दादा की तरह गौरी भी पढ़ाकू रही और ऊटी के ब्लू माउंटेन स्कूल से पढ़ाई करने के बाद लंदन चली गईं जहां उन्होंने यूनिवर्सिटी औफ आर्ट्स से डिग्री कोर्स पूरा किया. गौरी और आमिर की पहली मुलाकात लगभग 25 साल पहले हुई थी जो अब जा कर प्यार, डेट और शादी में तबदील हुई.

इस में कोई शक नहीं कि इस मिडिल एज में भी गौरी आकर्षक लगती हैं. कंधे तक ?ालते स्टाइलिश बाल उन्हें और आकर्षक बनाते हैं. दूसरी पत्नी से तलाक के बाद जब आमिर को तीसरी पत्नी की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने अपनी 25 साल पुरानी इस गर्लफ्रैंड को रीकौल किया. मार्च 2025 में दोनों ने मीडिया के सामने खुल कर अपने रिश्ते का इजहार किया था जो अब औपचारिक शादी में तबदील हो रहा है.

अब हालांकि आमिर खान का दौर लद रहा है लेकिन उन के चाहने वाले यह उम्मीद तो उन से रखते हैं कि इस तीसरी शादी का हश्र तलाक में न हो. वजह, हर किसी का यह अनुभव है कि शादी की तरह तलाक के बाबत भी आमिर काफी उदार हैं. फैमिनिस्टों का यह कहने का पूरा हक है कि शादी और तलाक को इस तरह खेल नहीं बनने देना चाहिए क्योंकि इस से नुकसान औरतों का ही होता है.

किरण से तलाक

अगर तलाक इतनी आसानी से हो जाए जितना कि अभिनेता आमिर खान और उन की दूसरी पत्नी किरण राव के बीच हुआ था तो तलाक प्रक्रिया पर सवाल उठाने के कोई माने नहीं क्योंकि यह परिपक्व पतिपत्नी का आपसी सहमति से लिया गया फैसला था जिस के अपने अलग माने हैं.

15 साल का अरसा एकदूसरे को सम?ाने और एकदूसरे में ढल जाने के लिए मुकम्मल होता है लेकिन इस तलाक को जिस का मसौदा दोनों ने संयुक्त रूप से जाहिर सूचना की तरह पेश किया था, कई नहीं तो कुछ सवाल तो खड़े करता ही है. लोग एक बार फिर पूछ रहे थे कि अब फिर क्यों? और दिलचस्प बात यह कि जवाब भी खुद ही दे रहे थे जो महज मीडियाई खबरों और अटकलों पर आधारित था.

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो फिल्म इंडस्ट्री में शादी और तलाक हमेशा से चर्चाओं और सुर्खियों में रहे हैं, खासतौर से उस वक्त जब पतिपत्नी दूसरे धर्म के हों. अपने दौर के मशहूर अभिनेता सुनील दत्त और अभिनेत्री नर्गिस की शादी सहज ढंग से नहीं ली गई थी. तब भी खूब होहल्ला देशभर में कट्टरपंथियों ने मचाया था लेकिन अच्छी बात उस का बेअसर हो जाना रहा था. फिर हिंदू हीरो की मुसलिम हीरोइन से और मुसलिम हीरो की हिंदू हीरोइन से शादी कोई अजूबा नहीं रह गई.

यह फिल्म इंडस्ट्री ही थी जिस ने धर्म और जातपांत की बेडि़यों को काटना शुरू किया और हर दौर में युवाओं को अपनी मरजी से शादी करने की प्रेरणा दी.

कयामत बन कर गिरी थीं रीना

साल 1973 में प्रदर्शित नासिर हुसैन की फिल्म ‘यादों की बारात’ ने बौक्स औफिस पर कामयाबी के झडे गाड़ दिए थे जिस की बड़ी वजह नायक धर्मेंद्र की एक्टिंग और 3 भाइयों के बिछुड़ने व एक गाने के जरिए मिलने की कहानी थी जो लीक से हट कर थी.

आमिर खान इस फिल्म में बाल कलाकार की भूमिका में थे. गौरतलब है कि नासिर हुसैन, आमिर के पिता ताहिर हुसैन के भाई हैं, न इस फिल्म के जरिए दरअसल तारिक को ब्रेक देने की कोशिश की थी लेकिन तारिक खूबसूरत और चौकलेटी होने के बाद भी चले नहीं.

लेकिन ठीक तारिक सरीखे चिकने चेहरेमोहरे वाले उन के चचेरे भाई आमिर खान साल 1988 में प्रदर्शित फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ के जरिए ऐसे चले कि फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. इस फिल्म के निर्माता भी नासिर हुसैन थे. उन के बेटे मंसूर खान द्वारा निर्देशित इस फिल्म में आमिर की एंट्री ठीक वैसे ही दिखाई गई थी जैसे ‘यादों की बारात’ में तारिक की दिखाई गई थी.

इस फिल्म में नायिका जूही चावला ने भी कयामत ढाई थी जो तब बड़ा नाम नहीं था. ठाकुरों की आपसी दुश्मनी पर बनी इस फिल्म में दर्शकों ने आमिर और जूही को हाथोंहाथ लिया था और दोनों को रातोंरात स्टार बना कर सिर पर बैठा लिया था. फिर एक के बाद एक आमिर की कई फिल्में हिट हुईं जिन में ‘दिल’, ‘जो जीता वही सिकंदर’, ‘दिल है कि मानता नहीं’, ‘हम हैं रही प्यार के’, ‘अंदाज अपनाअपना’ से ले कर ‘लगान’, ‘थ्री इडियट्स’, ‘राजा हिंदुस्तानी’, ‘इश्क’, ‘सरफरोश’, ‘रंग दे बसंती’ और ‘मंगल पांडे’ सहित ‘तारे जमीं पर’ उल्लेखनीय हैं. ‘दंगल’ ने भी तहलका मचाया था.

लेकिन ‘कयामत से कयामत’ की बात और थी जिस के गाने ‘पापा कहते हैं…’ में थोड़ी देर के लिए एक्स्ट्रा के रूप में रीना दत्ता भी दिखाई दी थीं. यों पड़ोसी होने के नाते रीना दिखाई तो उन्हें रोज देती थीं और आमिर उन से बचपन से ही प्यार करते थे जोकि शुद्ध एकतरफा था.

यह फिल्म फ्लोर पर थी, इस के काफी पहले से ही वे रीना पर लट्टू थे लेकिन प्यार का इजहार नहीं कर पा रहे थे क्योंकि रीना उन्हें घास नहीं डालती थीं. वे एक परंपरावादी हिंदू परिवार से थीं. आमिर ने हिम्मत नहीं हारी और उम्र के मुताबिक सड़कछाप मजनूं की तरह उन के पीछे पड़े रहे.

यह आमिर की दीवानगी की हद ही कही जाएगी कि 80 के दशक के प्यार के तौरतरीकों और चलन के मुताबिक उन्होंने रीना को अपने खून से लिखा लव लैटर भेज दिया. अब रीना कोई पत्थर की बनी तो थीं नहीं जो इस अदा पर फिदा न हो जातीं. एक सामान्य भारतीय लड़की की तरह उन्होंने आमिर का प्यार कुबूल कर लिया लेकिन धर्म की दीवार इतनी मजबूत थी कि दोनों ने चोरीछिपे 18 अप्रैल, 1986 में कोर्ट में शादी करने की हिम्मत तो कर ली पर मारे डर के अपनेअपने घरों में नहीं बता पाए.

शादी करने के लिए आमिर ने खुद के 21 साल का होने का इंतजार पूरे सब्र से किया था. आमिर की साल 1984 में रिलीज हुई केतन मेहता की पहली फिल्म ‘होली’ चूंकि फ्लौप हो चुकी थी, इसलिए भी वे कोई जोखिम नहीं उठाना चाह रहे थे.

जब शादी की बात रीना की छोटी बहन को पता चली तो वह सीधे आमिर के घर जा धमकी और शादी की बात उजागर कर दी. इस पर आमिर के पिता ताहिर हुसैन ने सम?ादारी और मौके की नजाकत देखते कोई एतराज नहीं जताया और पूरे सम्मान के साथ बहू रीना को घर ले आए.

लेकिन रीना के पिता को यह सदमा बरदाश्त नहीं हुआ और वे इतने बीमार पड़ गए कि उन्हें अस्पताल में भरती करना पड़ा. इस दौरान आमिर ने उन का खूब खयाल रखा और बेटे की तरह उन की देखभाल की तो उन का दिल भी फिल्मी स्टाइल में पसीज गया. फिर आमिर के सामने कोई दिक्कत नहीं रह गई थी.

लगान से बिगड़ी बात

इस के बाद के दिन आमिर की जिंदगी के सुनहरे दिन थे. कामयाबी, दौलत और शोहरत सब एकसाथ उन के कदम चूम रहे थे. जितने अच्छे आशिक थे उतने ही अच्छे पति भी वे साबित हुए. उसी दौरान उन्होंने अपने नाम से ही अपनी प्रोडक्शन कंपनी भी बना ली थी जिस के बैनर तले 2001 में ऐतिहासिक फिल्म ‘लगान’ रिलीज हुई थी.

इस फिल्म को कई पुरस्कार मिले थे. यह फिल्म औस्कर के लिए भी नौमिनेट हुई थी. रीना एक सफल और समर्पित पत्नी साबित हुईं जो आमिर की दूसरी कई फिल्मों की यूनिट के सदस्य रहते ‘लगान’ की असिस्टैंट डायरैक्टर भी थीं. अब तक दोनों की फैमिली परफैक्ट हो चुकी थी. बेटी का नाम इरा खान और बेटे का नाम जुनैद खान रखा.

अब तक आमिर इंडस्ट्री में अपने अभिनय के साथसाथ व्यावसायिक प्रतिभा का भी लोहा मनवा चुके थे. उन की लगभग हर फिल्म हिट होती थी. यह आमिर की खूबी ही है कि उन्होंने औसतन एक साल में एक ही फिल्म की, लेकिन पूरे डूब कर की. ‘लगान’ के बाद ‘पीके’ फिल्म इस बात की गवाह भी है.

इसी ‘लगान’ फिल्म की शूटिंग के दौरान उन का परिचय एक साधारण सी दिखने वाली दक्षिण भारतीय युवती किरण राव से हुआ जो इस फिल्म की प्रोडक्शन यूनिट का हिस्सा थी. किरण को देखते ही आमिर के दिल में वही कुछकुछ हुआ जो किशोर उम्र में रीना को देख कर होता था.

फिर जो हुआ उस की उम्मीद किसी को भी नहीं थी. आमिर ने रीना को तलाक देने का फैसला कर लिया जो उतना ही चौंकाने वाला था जितना 15 साल पहले उन से ड्रामाई तरीके से शादी कर लेने का था. शादी गुपचुप हुई थी लेकिन आमिर और रीना का तलाक एक मुकम्मल हंगामे के बीच 2005 में इस सवाल के साथ हुआ कि आखिर क्यों? इस सवाल का जवाब अगर कोई दे सकता था तो वे ये दोनों ही थे जो रहस्यमय खामोशी ओढ़े रहे.

15 साल एक छत के नीचे एक शानदार जिंदगी जीने के बाद दोनों साल 2002 में अलगअलग हो गए. शर्तों और सम?ाते के मुताबिक इरा और जुनैद को रीना अपने साथ ले गईं. बतौर गुजाराभत्ता कह लें या हक, मेहर की रकम या फिर तलाक के लिए राजी होने की राशि कह लें आमिर ने रीना को 50 करोड़ रुपए अदा किए थे.

फिल्म इंडस्ट्री का यह पहला बड़ा तलाक था जिस में पतिपत्नी ने एकदूसरे के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाए थे. बस, दोनों ने चाहा और तलाक हो गया. हालांकि, कहा यह भी गया कि तलाक रीना की जिद के चलते हुआ. ‘लगान’ सुपरडुपर हिट हुई लेकिन आमिर की जिंदगी से रीना को छीन ले गई, इस के बजाय यह कहना ज्यादा बेहतर होगा कि रीना की जिंदगी से आमिर को छीन ले गई. कुछ दिन मीडिया ने शोर मचाया लेकिन फिर सब भूल गए. फिल्म इंडस्ट्री में रोज नई खबरें पैदा होती और मरती हैं, यह तलाक इस रिवाज का अपवाद साबित नहीं हुआ.

फिर 2005 में एक सनसनाती खबर आई कि तलाकशुदा अधेड़ उम्र के आमिर ने किरण राव से शादी कर ली. फिल्म इंडस्ट्री के लिहाज से यह कोई हैरान कर देने वाली बात नहीं थी और जानने वालों के लिए अपेक्षित भी थी. हल्ला मचा और फिर शांत हो गया.

सुनीसुनी सी दास्तां

उम्र के इस फर्क ने इन के वैवाहिक जीवन पर कोई खास फर्क नहीं डाला. किरण के लिए सबकुछ नया था लेकिन आमिर की स्थिति ‘निकाह’ फिल्म की सलमा आगा सरीखी थी जो दूसरे पति राज बब्बर के साथ भी उसी शहर में उसी होटल में उसी कमरे में हनीमून मनाने जाती है जिस में कभी पहले पति दीपक पाराशर के साथ आई थी. आमिर के लिए हुआ इतनाभर था कि रीना की जगह किरण ने ले ली थी जो तेलंगाना के एक प्रतिष्ठित और संपन्न परिवार से ताल्लुक रखती थीं.

वक्त गुजरता गया और एक बार फिर आमिर खान खुद को एक ईमानदार पति साबित करने में जुट गए. इस का उदाहरण किरण की एक शारीरिक कमजोरी के वक्त देखने में आया था कि वे सामान्य ढंग से गर्भधारण नहीं कर पा रही थीं चिकित्सीय भाषा में कहें तो कंसीव नहीं कर पा रहीं थीं. तब इन दोनों ने कृत्रिम तरीके का सहारा लिया जिस से बेटा आजाद पैदा हुआ. किरण और आमिर उतने ही खुश थे जितने कभी रीना और आमिर हुआ करते थे. किरण भी फिल्ममेकिंग में आ गईं जिस से आमिर को काफी सहूलियत रही.

एक तलाक और सही

सबकुछ ठीकठाक चल रहा था कि बीती 3 जुलाई, 2021 को आमिर और किरण के तलाक की खबर बेहद साधारण तरीके से आई. एक संयुक्त पत्र में दोनों ने एकदूसरे के प्रति प्रतिबद्धता जताते कुछ दार्शनिक किस्म की बातें भी कहीं जो जिंदगी और दुनिया से ज्यादा किताबों में अच्छी लगती हैं मगर हकीकत में बहुत बेढंगी और कड़वी होती हैं. प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने तो आमिर के इस आग्रह को मान लिया था कि तलाक का मसला चूंकि व्यक्तिगत है इसलिए बात का बतंगड़ न बनाया जाए लेकिन सोशल मीडिया ने आमिर पर कोई रहम नहीं दिखाया.

किसी ने यह कहा था कि यह आदमी हिंदू लड़कियों से शादी कर उन्हें तलाक दे देता है तो किसी ने उन के इस बयान पर ताना मारा था कि अब हिंदुस्तान में डर नहीं लगता क्या. किसी ने इसे लव जिहाद बताया और किसी ने ट्वीट किया, ‘इन का सही है कि शादी करो, 2-3 बच्चे पैदा करो और फिर बीवी को छोड़ दो.’

इन बातों और भड़ास के कोई तात्कालिक या दीर्घकालिक माने नहीं हैं लेकिन आमिर की शादियों और तलाकों में कई समानताएं काफीकुछ सोचने को मजबूर करती हैं, मसलन हिंदू लड़की से ही प्यार होना, उन के साथ लगभग 15-15 साल गुजारना. दोनों बीवियों को बेइंतहा चाहना और फिर तलाक के साथसाथ मोटी रकम दे देना.

इसी दौरान उन का नाम ‘दंगल’ फिल्म में उन की बेटी गीता फोगाट का रोल कर चुकी फातिमा सना शेख के साथ जुड़ रहा था जो ‘ठग्स औफ हिंदुस्तान’ फिल्म में भी थीं. अब अंदाजा लगाया जा रहा था कि वे अब तीसरी शादी उस के साथ करेंगे लेकिन जब राज खुला तो नाम और चेहरा गौरी स्पै्रट का सामने आया. Aamir Khan Marriage

Hindi Stories: आईना

सरिता, बीस साल पहले, जुलाई (प्रथम) 2006

Hindi Stories: शोभा दीदी की चालबाजियों को अच्छी तरह समझती थी मैं. छोटी बहन थी मैं, बचपन से उन की चालाकी, दोगलेपन का शिकार बनती आई थी लेकिन अब उन की बहू चारू को उन के ‘‘कितना दिखावा करती है न वह, एक बात भी मन से नहीं करती. आखिर कोई कितनी बनावट कर सकता है. कोई तो सीमा होनी चाहिए. बिना गहराई के कोई भी भाव प्रभावहीन सा लगता है. पता नहीं, लोग इतना अभिनय कैसे कर लेते हैं.’’

आंखें फाड़फाड़ कर मैं उस का चेहरा देखती रह गई. शोभा के मुंह से ऐसी बातें कितनी विचित्र और बेतुकी सी लग रही हैं, मैं सोचने लगी. जिस औरत ने पूरी उम्र दिखावा किया, अभिनय किया, किसी भी भाव में गहराई नहीं दर्शा पाई, उसी को आज गहराई दरकार क्योंकर हुई? यह वही शोभा है जो बिना स्वार्थ के किसी को नमस्कार तक नहीं करती थी.

‘‘देखो न, अभी उस दिन सोमेश मेरे लिए शौल लाए तो वह इतनी तारीफ करने लगी कि क्या बताऊं. पापा इतनी सुंदर शाल लाए, पापा की पसंद कितनी कमाल की है. पापा यह, पापा वह,’’ शोभा अपनी बहू चारू के बारे में कह रही थी.

सोमेश खुश हुए और कहने लगे कि शोभा, तुम यह शाल चारू को ही दे दो. मैं ने कहा कि इस में देनेलेने वाली क्या बात है. मिलबांट कर पहन लेंगी. लेकिन सोमेश माने ही नहीं, कहने लगे, दे दो.

‘‘मेरा मन देने को नहीं था लेकिन सोमेश के बारबार कहने पर मैं उसे देने गई तो चारू कहने लगी, ‘मम्मी, मु?ो नहीं चाहिए, यह शेड मु?ा पर थोड़े न जंचेगा, आप पर ज्यादा जंचेगा.’

‘‘मैं उस की बातें सुन कर हैरान रह गई. सोमेश को खुश करने के लिए इतनी तारीफ कर दी कि वह भी इतराते फिरे.’’

भला तारीफ करने का अर्थ यह तो नहीं होता कि आप को वह चीज चाहिए ही. मु?ो याद है, शोभा स्वयं जो चीज हासिल करना चाहती थी उस की दिल खोल कर तारीफ किया करती थी और फिर आशा किया करती थी कि हम अपनेआप ही वह चीज उसे दे दें.

हम 3 भाईबहन हैं. सब से छोटा भाई, शोभा सब से बड़ी और बीच में मैं. मु?ो सदा प्रिय वस्तु का त्याग करना पड़ता था. मैं छोटी बहन बन कर अपनी इच्छा मारती रही पर शोभा ने कभी बड़ी बहन बन कर त्याग करने का पाठ न पढ़ा.

अनजाने जराजरा मन मारती मैं इतनी परिपक्व होती गई कि मु?ो उसी में सुख मिलने लगा. कुछ नया आता घर में तो मैं पुलकित न होती, पता होता था अगर अच्छी चीज हुई तो किसी भी दशा में नहीं मिलेगी.

‘‘एक ही बहू है मेरी,’’ शोभा कहती, ‘‘क्याक्या सोचती थी मैं. मगर इस के तो रंग ही न्यारे हैं. कोई भी चीज दो, इसे पसंद ही नहीं आती. एक तरफ सरका देगी और कहेगी, नहीं चाहिए.’’

शोभा मेरी बड़ी बहन है. रक्त का रिश्ता है हम दोनों में मगर सत्य यह है कि जितना स्वार्थ और दोगलापन शोभा में है उस के रहते वह अपनी बहू से कितना अपनापन सहेज पाई होगी, मैं अंदाजा लगा सकती हूं.

चारू कैसी है और उसे कैसी चीजें पसंद आती हैं, यह भी मैं जानती हूं. मैं जब पहली बार चारू से मिली थी तभी बड़ा सुखद सा लगा था उस का व्यवहार. बड़े अपनेपन से वह मुझ से बतियाती रही थी.

‘चारू, शादी में पहना हुआ तुम्हारा वह हार और बुंदे बहुत सुंदर थे. कौन से सुनार से लिए थे?’

‘अरे नहीं, मौसीजी, वे तो नकली थे. चांदी पर सोने का पानी चढ़े. मेरे पापा बहुत डरते हैं न, कहते थे कि शादी में भीड़भाड़ में गहने खो जाने का डर होता है. आप को पसंद आया तो मैं ला दूंगी.’

कहतीकहती सहसा चारू चुप हो गई थी. मेरे साथ बैठी शोभा की आंखों को पढ़तीपढ़ती सकपका सी गई थी चारू. बेचारी कुशल अभिनेत्री तो थी नहीं जो झूट से चेहरे पर आए भाव बदल लेती. ?ां?ालाहट के भाव तैर आए थे चेहरे पर, उस से कहां भूल हुई है जो सास घूर रही है. मौसी अपनी ही तो हैं. उन से खुल कर बात करने में भला कैसा संकोच.

‘जाओ चारू, उधर तुम्हारे पापा बुला रहे हैं. जरा पूछना, उन्हें क्या चाहिए?’ यह कहते हुए शोभा ने चारू को मेरे पास से उठा दिया था. बुरा लगा था चारू को. चारू के उठ कर जाने के बाद शोभा बोली, ‘मेरी दी हुई सारी साडि़यां और सारे गहने चारू मेरे कमरे में रख गई है. कहती है कि बहुत महंगी हैं और इतनी महंगी साडि़यां वह नहीं पहनेगी. अपनी मां की ही सस्ती साडि़यां उसे पसंद हैं. सारे गहने उतार दिए हैं. कहती है, उसे गहनों से एलर्जी है.’

शोभा सुनाती रही. मैं क्या कहती. एक पढ़ीलिखी और सम?ादार बहू को उस ने फूहड़ और नासमझ प्रमाणित कर दिया था. नाश्ता बनाने का प्रयास करती तो शोभा सब के सामने बड़े व्यंग्य से कहती, ‘नहीं, नहीं बेटा, तुम्हें हमारे ढंग का खाना बनाना नहीं आएगा.’

‘हर घर का अपनाअपना ढंग होता है, मम्मी. आप अपना ढंग बताइए, मैं उसी ढंग से बनाती हूं,’ चारू शालीनता से उत्तर देती.

‘नहीं बेटा, सम?ा करो. तुम्हारे पापा  और अनुराग मेरे ही हाथ का खाना पसंद करते हैं.’

अपने चारों तरफ शोभा ने जाने कैसी दीवार खड़ी कर रखी थी जिसे चारू ने पहले तो भेदने का प्रयास किया और जब नहीं भेद पाई तो पूरी तरह उसे सिरे से ही नकार दिया.

‘‘कोई भी काम नहीं करती. न खाना बनाती है न नाश्ता. यहां तक कि सजतीसंवरती भी नहीं है. अनुराग शाम को थकाहारा आता है, सुबह जैसी छोड़ कर जाता है वैसी ही शाम को पाता है. मेरे हिस्से में ऐसी ही बहू मिलने को थी,’’ शोभा कहती.

‘‘कल चारू को मेरे पास भेजना. मैं बात करूंगी.’’

‘‘तुम क्या बात करोगी, रहने दो.’’

‘‘किसी भी समस्या का हल बात किए बिना तो नहीं निकलेगा न.’’

शोभा ने साफ शब्दों में मना कर दिया. वह यह भी तो नहीं चाहती थी कि उस की बहू किसी से बात करे. मैं जानती हूं, चारू शोभा के व्यवहार की वजह से ही ऐसी हो गई है.

‘‘बस भी कीजिए, मम्मी. मुझे भी पता है कहां कैसी बात करनी चाहिए. आप के साथ दम घुटता है मेरा. क्या एक कप चाय बनाना भी मुझे आप से सीखना पड़ेगा. हद होती है हर चीज की.’’

चारू एक बार हम सब के सामने ही बौखला कर शोभा पर चीख उठी थी. उस के बाद घर में अच्छाखासा तांडव हुआ था. जीजाजी और शोभा ने जो रोनाधोना शुरू किया कि उसी रात चारू अवसाद में चली गई थी.

अनुराग भी हतप्रभ रह गया था कि उस की मां चारू को कितना प्यार करती हैं. यहां तक कि चाय भी उसे नहीं बनाने देतीं. नाश्ता तक मां ही बनाती हैं. बचपन से मां के रंग में रचाबसा अनुराग पत्नी की बात सम?ाता भी तो कैसे.

अस्पताल रह कर चारू लौटी तो अपने ही कमरे में कैद हो कर रह गई. परेशान हो गया था अनुराग. एक दिन मैं ने फोन किया तो बेचारा रो पड़ा था.

‘‘अच्छीभली हमारे घर आई थी. मायके में सारा घर चारू ही संभालती थी. मैं इस सच को अच्छी तरह जानता हूं. हमारे घर आई तो एक कप चाय बनाते भी उस के हाथ कांपते हैं. ऐसा क्यों हो रहा है, मौसी?’’

‘‘उसे दीदी से दूर ले जा. मेरी बात मान, बेटा.’’

‘‘मम्मी तो उस की देखभाल करती हैं. बेचारी चारू की चिंता में आधी हो गई हैं.’’

‘‘यही तो समस्या है, अनुराग बेटा. शोभा तेरी मां हैं तो मेरी बड़ी बहन भी हैं, जिन्हें मैं बचपन से जानती हूं. मेरी बात मान तो तू चारू को कहीं और ले जा या कुछ दिनों के लिए मेरे घर छोड़ दे. कुछ भी कर अगर चारू को बचाना चाहता है तो, चाहे अपनी मां से झूठ ही बोल.’’

अनुराग असमंजस में था मगर बचपन से मेरे करीब होने की वजह से मु?ा पर विश्वास भी करता था. टूर पर ले जाने के बहाने वह चारू को अपने साथ मेरे घर पर ले आया तो चारू को मैले कपड़ों में देख कर मु?ो अफसोफ हुआ था.

‘‘मौसी, आप क्या समझना चाहती हैं, मेरे दिमाग में कुछ नहीं आ रहा है.’’ अनुराग के चेहरे पर उदासी साफ नजर आ रही थी.

‘‘बस, अब तुम चिंता मत करो. तुम्हारा 15 दिन का टूर है और दीदी को यही पता है कि चारू तुम्हारे साथ है,

15 दिन बाद चारू को यहां से ले जाना.’’

अनुराग चला गया. जाते समय वह मुड़मुड़ कर चारू को देखता रहा पर वह उसे छोड़ने भी नहीं गई. 6-7 महीने ही तो हुए थे शादी को पर पति के विछोह की कोई भी पीड़ा चारू के चेहरे पर नहीं थी. चूंकि मेरे दोनों बेटे बाहर पढ़ते हैं और पति शाम को ही घर पर आने वाले थे, इसीलिए हम दोनों उस समय अकेली ही थीं.

‘‘चारू, बेटा क्या लेगी? ठंडा या गरम, कुछ नाश्ता करेगी न मेरी बच्ची?’’

स्नेह से सिर पर हाथ फेरा तो मेरी मुझ से लिपट कर वह चीखचीख कर रोने लगी. मैं प्यार से उसे सहलाती रही.

‘‘ऐसा लगता है मौसी कि मैं मर जाऊंगी. मुझे  बहुत डर लगता है. कुछ नहीं होता मुझ से.’’

‘‘होता है बेटा, होता क्यों नहीं. तुम्हें तो सबकुछ आता है. चारू इतनी सम?ादार, इतनी पढ़ीलिखी, इतनी सुंदर बहू है हमारी.’’

मैं ने बिस्तर पर चारू को लिटा दिया. चारू ?मेरा हाथ कस कर पकड़े रही जब तक पूरी तरह सो नहीं गई. एक प्रश्नचिह्न थी मेरी बहन सदा मेरे सामने, और आज भी वह वैसी ही है. एक उल?ा हुआ चरित्र जिसे स्वयं ही नहीं पता, उसे क्या चाहिए. जिस का अहं इतना ऊंचा है कि हर रिश्ता उस के आगे बौना है.

शाम को मेरे पति घर आए तब उन्हें मेरे इस कदम का पता चला. घबरा गए वह कि कहीं दीदी को पता चला तो क्या होगा. कहीं रिश्ता ही न टूट जाए.

‘‘टूटता है तो टूट जाए. उम्रभर हम ने दीदी की चालबाजी सही है. अब मैं बच्चों को तो दीदी की आदतों की बलि नहीं चढ़ने दे सकती. जो होगा, हो जाएगा. कभी तो आईना दिखाना पड़ेगा न दीदी को.’’

चारू की हालत देख कर मैं सुबकने लगी थी. चारू उठी ही नहीं. सुबह का नाश्ता किया हुआ था. खाना सामने आया तो पति का मन भी भर आया.

‘‘बच्ची भूखी है. मुझ से तो नहीं खाया जाएगा. तुम जरा जगाने की कोशिश तो करो. आओ, चलो मेरे साथ.’’

रिश्ते की नजाकत तो थी ही लेकिन सर्वोपरि थी मानवता. हमारी अपनी बच्ची होती तो क्या करते, जगाते नहीं उसे. जबरदस्ती जगाया उसे, किसी तरह हाथमुंह धुला मेज तक ले आए. आधी रोटी ही खा कर वह चली गई.

‘‘सोना मत, चारू. अभी तो हमें बातें करनी हैं,’’ मैं चारू को बहाने से जगाना चाहती थी. पहले से ही खरीदी साड़ी उठा लाई.

‘‘चारू, देखना तुम्हारे मौसाजी मेरे लिए साड़ी लाए हैं, कैसी है? तुम्हारी पसंद बहुत अच्छी है. तुम्हारी साडि़यां देखी थीं न शादी में, जरा पसंद कर के दे दो. यही ले लूं या बदल लूं.’’

चारू ने तनिक आंखें खोलीं और सामने पड़ी साड़ी को उस ने गौर से देखा फिर कहने लगी, ‘‘मौसाजी आप के लिए इतने प्यार से लाए हैं तो इसे ही पहनना चाहिए. कीमत साड़ी की नहीं,्र कीमत तो प्यार की होती है. किसी के प्यार को दुत्कारना नहीं चाहिए. बहुत तकलीफ होती है. आप इसे बदलना मत, इसे ही पहनना.’’

शब्दों में सुलह कम प्रार्थना ज्यादा थी. स्नेह से माथा सहला दिया मैं ने चारू का.

‘‘बड़ी समझदार हो तुम, इतनी अच्छी बातें कहां से सीखीं.’’

‘‘अपने पापा से, लेकिन शादी के बाद मेरी हर अच्छाई पता नहीं कहां चली गई, मौसी. मैं नाकाम साबित हुई हूं, घर में भी और नातेरिश्तेदारों में भी. मु?ो कुछ आता ही नहीं.’’

‘‘आता क्यों नहीं? मेरी बच्ची को तो बहुतकुछ आता है. याद है, तुम्हारे मौसाजी के जन्मदिन पर तुम ने उपमा और पकौड़े बनाए थे, जब तुम अनुराग के साथ पहली बार हमारे घर आई थीं. आज भी हमें वह स्वाद नहीं भूलता.’’

‘‘लेकिन मम्मी तो कहती हैं कि आप लोग अभी तक मेरा मजाक उड़ाते हैं. इतना गंदा उपमा आप ने पहली बार खाया था.’’

यह सुन कर मेरे पति अवाक रह गए थे. फिर बोले, ‘‘नहीं, चारू बेटा, मैं अपने बच्चों की सौगंध खा कर कहता हूं, इतना अच्छा उपमा हम ने पहली बार खाया था.’’

शोभा दीदी ने बहू से इस तरह क्यों कहा? इसीलिए उस के बाद यह कभी हमारे घर नहीं आई. आंखें फाड़फाड़ कर ये मेरा मुंह देखने लगे. इतना ?ाठ क्यों बोलती है यह शोभा? रिश्तों में इतना जहर क्यों घोलती है यह शोभा? अगर सुंदर, सुशील बहू आ गई है तो उस को नालायक प्रमाणित करने पर क्यों तुली है? इस से क्या लाभ मिलेगा शोभा को?

‘‘तुम, तुम मेरी बेटी हो, चारू. अगर मेरी कोई बेटी होती तो शायद तुम जैसी होती. तुम से अच्छी न होती. मैं तो सदा तुम्हारे अपनेपन से भरे व्यवहार की प्रशंसा करता रहा हूं. लगता ही नहीं कि घर में किसी नए सदस्य का आगमन हुआ था. अपनी मौसी से पूछो, उस दिन मैं ने क्या कहा था? मैं ने कहा था, हमें भी ऐसी ही बहू मिल जाए तो जीवन में कोई भी कमी न रह जाए. मैं सच कह रहा हूं बेटी, तुम बहुत अच्छी हो, मेरा विश्वास करो.’’

मेरे सामने सब साफ होता गया. शोभा अपने पुत्र और पति के सामने भी खुद को बहू से कम सुंदर, कम समझदार प्रमाणित नहीं करना चाहती.

दूसरी सुबह ही मैं ने पूरा घर चारू को सौंप दिया. मेरे पति ने ही मुझे समझाया कि एक बार इसे अपने मन की करने तो दो, खोया आत्मविश्वास अपनेआप लौट आएगा. बच्ची पर भरोसा तो करो, कुछ नया होगा तो उसे स्वीकारना तो सीखो. इस का जो जी चाहे करे, रसोई में जो बनाना चाहे बनाए. कल को हमारी भी बहुएं आएंगी तो उन्हें स्वीकार करना है न हमें.

चाय बनाने में चारू के हाथ कांप रहे थे. वह डर रही थी तो मैं ने उस का हौसला बढ़ाने के लिए कहा, ‘‘कोई बात नहीं, कुछ कमी होगी तो हम पूरी कर लेंगे. तुम बनाओ तो सही. बनाओ, शाबाश.’’

मेरे इस अभियान में पति भी मेरे साथ हो गए थे. उन्हें विश्वास था कि चारू अच्छी हो जाएगी. शाम को घर आए तो पता चला कि 15 दिन की छुट््टी पर हैं. पूछा तो हंसने लगे, ‘‘क्या करता, आज शोभा का फोन आया था. कहती थी

2 दिन के लिए यहां आना चाहती है. उसे मैं ने टाल दिया. मैं ने कह दिया कि कल से बनारस जा रहे हैं हम, मिल नहीं पाएंगे. इसलिए क्षमा करें.’’

‘‘अच्छा? यह तो मैं ने सोचा ही न था,’’ पति की सम?ादारी पर भरोसा था मुझे.

‘‘अब चारू के बहाने मैं भी घर पर रह कर आराम करूंगा. चारू नएनए पकवान बनाएगी, है न बिटिया.’’

‘‘मेरी खातिर आप को कितना झूठ बोलना पड़ रहा है.’’

15 दिन कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला. सब बदल गया, मानो हमें बेटी मिल गई हो. सुबह नाश्ते से ले कर रात खाने तक सब चारू ही करती रही. मेरे कितने काम रुके पड़े थे जो मैं गरदन में दर्द की वजह से टालती जा रही थी. चारू ने निबटा दिए थे. घर की सब अलमारियां करीने से सजा दीं और बेकार सामान अलग करवा दिया.

घर की साजसज्जा का भी चारू को शौक है. फैब्रिक पेंट और औयल पेंट से हमारा अतिथि कक्ष अलग ही तरह का लगने लगा. नई सोच और नई ऊर्जा पर मेरी थक चुकी उंगलियां संतुष्ट एवं प्रसन्न थीं. काश, ऐसी ही बहू मुझे भी मिल जाए. क्या दीदी को ऐसा नहीं लगता? फिर सोचती हूं उस की उंगलियां थकी ही कब थीं जो बहू में सहारा खोजतीं. उस ने तो आज तक सदा अभिनय किया और दांवपेच खेल कर अपना काम चलाया है. मेरी बनाई पाककला पर बड़ी सहजता से अपना नाम चिपकाना, बनीबनाई चीज और पराई मेहनत का सारा श्रेय खुद ले जाना दीदी का सदा का शौक रहा है. भला इस में मेहनत कैसी जो वह थक जाती और बहू का सहारा उसे मीठा लगता.

अनुराग का फोन अकसर आता रहता. चारू उस से बात करने से भी कतराती. पूछने पर बताने लगी, ‘‘बहुत परेशान किया है मुझे अनुराग ने भी. कम से कम इन्हें तो मेरा साथ देना चाहिए. मेरा मन नहीं है बात करने का.’’

एक दिन चारू बोली, ‘‘मौसी, मैं अपने मायके पापा के पास भाग जाना चाहती थी लेकिन डरती हूं कि पापा को मेरी हालत देख कर धक्का लगेगा. उन्हें भी तो दुखी नहीं करना चाहती.’’

‘‘इस घर को अपने पापा का ही घर सम?ो, मैं हूं न,’’ भावविह्वल हो कर मेरे पति बोले थे. बरसों से मन में बेटी की साध थी. चारू से इन की अच्छी दोस्ती हो गई थी. दोनों किसी भी विषय पर अच्छीखासी चर्चा कर बैठते.

‘‘बहुत समझदार और बड़ी सूझबूझ वाली है चारू, इसीलिए तुम्हारी बहन के गले में कांटे की तरह फंस गई. यह तो होना ही था. भला शोभा जैसी औरत इसे कैसे बरदाश्त करती?’’ मेरे पति बोले.

15 दिन बाद अनुराग आया और उस के सभी प्रश्नों के उत्तर उस के सामने थे. मेरे घर की नई साजसज्जा, दीवार पर टंगी खूबसूरत पेंटिंग, सोफों पर पड़े सुंदर कुशन, मेज पर सजा स्वादिष्ठ नाश्ता, सब चारू का ही तो कियाधरा था.

‘‘पता चला, मैं क्यों कहती थी कि चारू को मेरे पास छोड़ जा. कुछ नहीं किया मैं ने, सिर्फ उसे मनचाहा करने की आजादी दी है. पिछले 15 दिन से मैं ने पलट कर भी नहीं देखा कि वह क्या कर रही है. जो लड़की मेरा घर सजासंवार सकती है, क्या अपने घर में निपट गंवार होगी? क्या एक कप चाय भी वह तुम्हें नहीं पिला सकती होगी? अपनी मां का इलाज कराओ अनुराग, चारू तो अच्छीभली है. जाओ, जा कर मिलो उस से, अंदर है वह.’’

शाम तक अनुराग हमारे ही साथ रहा. घर जाने का समय आया तो हम दोनों का भी मन डूबने लगा. अपने मौसा की छाती से लग कर चारू फूटफूट कर रो पड़ी.

‘‘नहीं बिटिया, रोना नहीं. तुम्हारा अपना घर तो वही है न. अब तुम्हें उसी को सजानासंवारना है. जब भी याद आए, मत सोचना तुम्हारे पापा का घर दूर है. नहीं तो एक फोन ही घुमा देना, हम अपनी बच्ची से मिलने आ जाएंगे.’’

हाथ में पकड़ी सुंदर टौप्स की डब्बी इन्होंने चारू को थमा दी.

‘‘पापा के घर से बिटिया खाली हाथ नहीं न जाती. जाओ बच्ची, फलोफूलो, खुश रहो.’’

दोनों चले गए. हम उदास भी थे और संतुष्ट भी. पूरी रात अपने कदम का निकलने वाला नतीजा कैसा होगा, सोचते रहे. सुबहसुबह इन्होंने शोभा दीदी के घर फोन किया.

‘‘दीदी, हम बनारस से लौट आए हैं. आप आइए न, कुछ दिन हमारे पास,’’ और कुछ देर इधरउधर की बात करने के बाद हंसते हुए फोन रख दिया.

‘‘सुनो, अब तुम्हारी बहन परेशान हैं. क्या उन्हें भी बुला लें. कह रही हैं, चारू अनुराग के साथ कुछ दिनों के लिए टूर पर गई थी और अब लौटी है तो मेमसाहब के रंगढंग ही बदले हुए हैं. कह रही हैं कि अपना और अनुराग का नाश्ता वह खुद ही बनाएगी.’’

हैरान रह गई मैं, ‘‘तो क्या बहू की चुगली दीदी आप से कर रही हैं. उन्हें शर्म है कि नहीं?’’

मेरे पति खिलखिला कर हंस पडे़ थे. हमारा प्रयोग सफल रहा था. चारू संभल गई थी. अब भोगने की बारी दीदी की थी. कभी न कभी तो उसे अपना बोया काटना ही पड़ता न, सो उस का समय शुरू होता है अब.

अब अकसर ऐसा होता है, दीदी आती हैं और घंटों चारू के उसी अभिनय को कोसती रहती हैं जिस के सहारे दीदी ने खुद अपनी उम्र गुजारी है. कौन कहे दीदी से कि उसे आईना दिखाया जा रहा है, यह उसी पेड़ का कड़वा फल है जिस का बीज उस ने हमेशा बोया है. कभी सोचती हूं कि दीदी को समझाऊं लेकिन जानती हूं वह समझेगी नहीं.

भूल जाता है मनुष्य अपने ओछे कर्म को. अपने संताप का कारण कभीकभी वह स्वयं ही होता है. जरा सा संतुलन अगर रिश्तों में शोभा भी बना लेने का प्रयास करती तो न वह कल औरों को दुखी करती और न ही आज स्वयं परेशान होती. Hindi Stories

 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें