Gen Z: हर रिश्ते को निभाना जरूरी न समझने वाली जेनजी पीढ़ी क्या हर रिश्ते को नफानुकसान के तराजू पर तोल कर अपना व्यवहार तय करती है . इस सवाल का जवाब ढूंढ पाना आसान नहीं है. 1997 और 2012 के बीच पैदा हुई इस अनूठी पीढ़ी पर भी उतने ही दबाव हैं जितने हर दौर की युवा पीढ़ी पर होते थे . लेकिन वे पीढ़ियां तालमेल बैठाने में माहिर होती थीं, वजह, वे औफलाइन जनरेशन थीं और यह औनलाइन जनरेशन है. यह औनलाइन जनरेशन भीड़ से कतराती है और कभी भीड़ में पड़ भी जाए तो वहां भी एकांत ढूंढ़ ही लेती है.
लेकिन भीड़ से अलग रहते भी भीड़ का ध्यान यह अपनी तरफ खींच ही लेती है. इस के लिए इसे अलग से कोई कोशिश नहीं करनी पड़ती, वजह, यह नाजुक पीढ़ी सुंदर है, आकर्षक है, स्मार्ट है और सभ्य व शिष्ट भी है. पहले की पीढ़ियों की तरह जेनजी पर भी कई दबाव हैं जिन्हें मैनेज करने में वह गच्चा खा रही है जिस की इकलौती वजह यह है कि इस को पढ़ने में जितना कष्ट होता है उतनी ही सहूलियत देखने में होती है.
एक स्मार्टफोन ही इस पीढ़ी की किताब है, टीचर है, पेरैंट है जिस में छपा हुआ या देखा हुआ तात्कालिक असर छोड़ कर बेताल की तरह इस की पीठ छोड़ कर अपने पेड़ पर जा कर टंग जाता है जबकि कागज पर छपा हुआ हमेशा के लिए दिमाग को ही अपना अड्डा बना लेता है. उस में जानकारियों के साथसाथ अकाट्य तर्क भी होते हैं, इसलिए ये पुरानी पीढ़ी से कतराते हुए कहीं दूर खड़े हो जाते हैं. यह नजारा शादीब्याह की पार्टियों में आम है. खुद को हर विषय का जानकार समझने वाली यह जनरेशन जब पिछली पीढ़ियों के साथ खड़ी होती है तो बातचीत में जल्द ही दाएंबाएं झांकने लगती है.
अपनी ही अपेक्षाओं का दबाव
बिलाशक जेनजी की परवरिश बेहतर सुविधाओं और साधनों में हुई है. पिछली पीढ़ियों के मुकाबले इसे बित्ता भर भी स्ट्रगल नहीं करना पड़ा है. छोटीमोटी बातों को ही लें तो इसे कभी राशन की लाइन में नहीं लगना पड़ा, बाजार से ग्रौसरी का सामन नहीं लाना पड़ा, बिजली या नल का बिल भरने के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ा. और तो और, सिनेमा के टिकट की लाइन की धक्कामुक्की का लुत्फ भी इस के हिस्से में नहीं आया. सबकुछ स्मार्टफोन की एक क्लिक पर मिल जाता है. लेकिन इस की कितनी कीमत पेरैंट्स को चुकानी पड़ती है और उस से भी ज्यादा खुद यह चुका रही है, इस का एहसास इस जनरेशन को नहीं.
हां, भविष्य और कैरियर को ले कर सब से ज्यादा दबाव में यही जनरेशन है जिसे नहीं मालूम कि उसे क्या चुनना और क्या बनना है. यह पीढ़ी बहुत से विकल्प अपने पास रखती है मगर एकएक कर वे उस के हाथ से फिसलते जाते हैं. आखिर में जो एक बचता है वह सब से छोटा और सस्ता होता है. आईएएस से ले कर सेल्समैन या सेल्स गर्ल तक के सफर में इन की उम्मीदें एकएक कर टूटती हैं जो इन्हें तोड़ भी जाती हैं.
विकल्प बदलना इस के लिए खेल जैसा है. सिविल सर्विसेज के बाद आईआईटियन बनने का ख्वाब भी पूरा नहीं होता तो यह जनरेशन एकदम से बिजनैस मेनेजमैंट की तरफ मुड़ जाती है. और वहां भी असहजता महसूसती है तो अपना खुद का छोटामोटा बिजनैस शुरू कर देती है. यहीं से टूटता है खुद के अलग और सुपीरियर होने का भ्रम क्योंकि लोगों से घुलनेमिलने के वक्त में यह पीढ़ी अलग खड़ी थी. अब बिना उन के न तो कारोबार करना आसान रह जाता और न ही अपनी जगह व पहचान बना पाना आसान होता. अब उसे आभासी काल्पनिक और वास्तविक दुनिया में फर्क समझ आता है लेकिन देर तो तब तक हो ही चुकी होती है.
धुंधलाते रिश्ते
जेनजी के लिए इकलौता और अहम रिश्ता सिर्फ पेरैंट्स होते हैं शायद इसलिए भी कि वे ही फायनैंसर होते हैं. बाकी सब रिश्तेनाते इन के लिए सैकंडरी होते हैं. इन की नजर से देखें तो इन बेमतलब के रिश्तों को ढोने से कोई फायदा नहीं. हाल तो यह है कि आजकल कभीकभार ही घर आए मेहमानों को भी ये झेल नहीं पाते. सब से ज्यादा तनाव इन्हें इस बात का रहता है कि कहीं किसी गेस्ट के साथ रूम शेयर न करना पड़ जाए. इस के बाद इस बात पर झल्लाहट कि आने वाला ज्यादा सवालजवाब न करे. यहां तक कि यह भी न पूछे कि क्या पढ़ रहे हो और आगे के लिए क्या प्लान है.
चाचा, ताऊ, मौसा, मामा तो दूर की बात हैं, ये अपने ही हमउम्र कजन्स से भी ज्यादा घुलनेमिलने से कतराते हैं. इन्हें लगता है कि औपचारिक सम्मान या बातचीत भी क्यों की जाए, इस से हासिल क्या होगा. ये रिश्ते तो दिखावा हैं, स्वार्थ हैं और कुछ तो बहुत टौक्सिक हैं. जो मेहमान लाज छोड़ कर घर आ कर रुका है वह कोई रिश्ता नहीं निभा रहा बल्कि अपने पैसे बचा रहा है. इसी मानसिकता के चलते ये भी किसी और के यहां न ठहर कर लाज वगैरह ही प्रैफर करते हैं. जिस का प्राइवेसी के बाद दूसरा मतलब या फायदा यह है कि किसी का सामना करने से बच गए. बिलाशक यह एक कुंठित सोच है लेकिन है, तो है.
कमजोर दोस्ती
जेनजी की दोस्ती बहुत ज्यादा पुख्ता नहीं होती, क्यों नहीं होती, इस बारे में भोपाल के एक युवा नक्षत्र का कहना है कि 15 फीसदी ही लगन से पढ़ाई करते हैं, बाकी 85 फीसदी क्लबों, चौराहों और होटलों में धींगडमस्ती करते नजर आते हैं. इन दोनों ही तरह के युवाओं को दोस्तों की जरूरत सिर्फ टाइमपास करने के लिए होती है. यह पहले की तरह जज्बाती और पारिवारिक रिश्ता नहीं रह गया है. प्रैक्टिकल और प्रोफैशनल हो गया है.
दोस्ती अब एक तरह का कौन्ट्रैक्ट हो गई है जिसे कभी भी कोई तोड़ सकता है. वह दिल से नहीं, दिमाग से निभाई जाती है. इसलिए कमजोर भी पड़ रही है. हम में से किसी के भी बहुत सारे दोस्त नहीं हैं, दोचार ही हैं और उन के बारे में भी पेरैंट्स बहुत ज्यादा जानते हों, यह जरूरी नहीं. हमारी जनरेशन खुद की तरह दोस्तों और दोस्ती को भी छिपा कर रखना चाहती है.
22 वर्षीया रिया कहती है, दोस्ती के माने तेजी से बदल रहे हैं और वैसे तो कतई नहीं रह गए हैं और न आगे रहने वाले जैसे पेरैंट्स के हैं कि सालोंसाल पुराने दोस्त और सहेलियां अभी भी मिलने आ जाते हैं या ये खुद जा कर मिल आते हैं. इन की बातों को सुन लगता है कि इन की जिंदगी सालों पहले कहीं ठहरी हुई है और वही इन का सुख है. ये ठहरे हुए पानी की तरह हैं जबकि हम बहते हुए पानी के मानिंद हैं.
झट अफेयर पट ब्रेकअप
समाज रिश्तों और दोस्ती की तरह ही जेनजी का प्यार है यानी बिलकुल टिकाऊ नहीं है. उस में कमिटमैंट नहीं है. कसमेवादे नहीं हैं. है अगर तो बस सैक्स जिस में कोई हिचक दोनों पक्षों को नहीं होती. इस जनरेशन के लिए शायद प्यार का मतलब ही स्वीकृत और सहमत तरीके से शरीरसुख का स्वाद चख लेना होता है जो हर्ज की बात है या नहीं, यह तय कर पाना आसान नहीं. वह दौर गया जब एक से ही प्यार करने में लोग अधेड़ हो जाते थे लेकिन अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाते थे, फिर सैक्सवैक्स तो बाद की बात है.
इस जनरेशन ने प्यार के किस्सेकहानी नहीं पढ़े. अगर ये चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उस ने कहा था’ पढ़ लें तो तय है उस का नायक लहना सिंह इन्हें दब्बू और बेवकूफ ही लगेगा. अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी कौन हैं और उन का प्यार कैसा था, यह भी इन्हें नहीं मालूम क्योंकि न तो ये साहिर को जानते और न ही अमृता को. इन सब से दूर जेनजी की प्यार की अपनी परिभाषा है कि जब तक पटरी बैठे तब तक ठीक वरना ब्रेकअप लो और दूसरा ढूंढ़ लो. किसी की याद में न तो किलपना है, न ही आहें भरना है. प्यार से इन का मतलब है मौजमस्ती, खानापीना और सैरसपाटा. बिरले ही गंभीर इस जनरेशन के प्यार करने वाले मिलेंगे. हर्ज है
यह ठीक है कि कई जगह जेनजी ठीक भी है लेकिन हर जगह नहीं. वह डिप्रैस भी है क्योंकि इस ने जिंदगी सहित हर चीज के अपने पैमाने और माने तय कर रखे हैं. जेनजी वाले स्मार्टफोन के सिवा किसी और की सुनने को तैयार ही नहीं. इसलिए, इन के लिए कुछ किया भी नहीं जा सकता. यह पहली पीढ़ी है जो खासतौर से साहित्यिक पढ़ाईलिखाई से कोसों दूर है. इसलिए, यह अकसर खोखले तर्क करती है. महत्त्वाकांक्षी यह पीढ़ी होती तो हर्ज की कोई बात न होती लेकिन यह जिद्दी पीढ़ी है जो न तो बड़ों के अनुभवों से कुछ सीखना चाहती और न ही पत्रपत्रिकाओं व किताबों से ज्ञान हासिल करना चाहती.
जिस जनरेशन ने स्मार्टफोन को ही सबकुछ मान लिया हो वह परेशान तो रहेगी. लेकिन समाज में बने रहने लायक सर्वाइव इसलिए कर जाएगी कि पेरैंट्स उस के लिए वह सबकुछ कर रहे हैं जो 25 की उम्र के बाद खुद इसे हासिल करना चाहिए था. Gen Z




