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पलपल दिमाग भटकाते नोटिफिकेशन

Smartphone Addiction: आज के डिजिटल युग में हमारा अधिकांश समय स्मार्टफोन, लैपटौप और अन्य तकनीकी उपकरणों के साथ गुजरता है. स्मार्टफोन पर रातदिन हर पल आते नोटिफिकेशन जहां हम को अपडेट रखते हैं वही हमारे ध्यान को भटकाने का भी काम करते हैं, इसलिए इन से दूरी बनाना आवश्यक है ताकि जो भी काम आप कर रहे हों वह पूरा हो सके.

ये अनावश्यक अलर्ट्स व इन्फौर्मेशन कई बार नैगेटिविटी से दिमाग को भर देते हैं जोकि हमारी काम करने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं क्योंकि ये हमारी एकाग्रता को भंग करते हैं, किसी भी काम के ऊपर केंद्रित होने ही नहीं देते. ऐसे में हम को इस के ऊपर ध्यान देने की जरूरत है ताकि हम बारबार आते सोशल मीडिया न्यूज, ईमेल, न्यूज ऐप्स, चैट, गेम्स और दर्जनों अन्य ऐप्स से आते अलर्ट नोटिफिकेशन से बचे रहें. ये नोटिफिकेशन चाहे छोटे हों लेकिन ये हमारे ध्यान, मानसिक स्वास्थ्य और उत्पादकता पर गहरा असर डालते हैं.

जैसे आप किसी जरूरी काम में पूरी तरह डूबे हैं, पढ़ाई कर रहे हैं या किसी मीटिंग में हैं या कोई रिपोर्ट लिख रहे हैं, तभी मोबाइल की स्क्रीन चमकती है, एक ‘टिंग’ की आवाज आती है और ध्यान वहीं खिंच जाता है कि क्या और किस का मैसेज या नोटिफिकेशन आया? बिना देखे मन नहीं मानता और फिर देखने के लिए एक बार फोन उठाया तो व्हाट्सऐप से इंस्टाग्राम, फेसबुक फिर यूट्यूब की सैर करने लगते हैं और 10-15 मिनट बाद आप भूल जाते हैं कि असल में क्या कर रहे थे और फिर दोबारा उसी काम पर ध्यान केंद्रित करने में थोड़ा समय लगता है.

मानसिक स्वास्थ्य पर असर :नोटिफिकेशन हमारी डोपामिन प्रणाली को सक्रिय करते हैं. यह वही रसायन है जो हमें पुरस्कार मिलने पर खुशी देता है. हर लाइक, कमैंट, या मैसेज एक छोटा इनाम होता है, जिस से हम बारबार फोन चैक करने के आदी हो जाते हैं. यह प्रक्रिया धीरेधीरे अधीरता, बेचैनी और मानसिक थकान को जन्म देती है.

रचनात्मकता में कमी : गहराई से सोचने में बाधा आती है, बारबार ध्यान भटकने से हम गहरी सोच और रचनात्मकता की स्थिति में नहीं पहुंच पाते.

फोकस में कमी : हम हर समय सतही ध्यान देते हैं पर किसी चीज में पूरी तरह फोकस या अटैंशन नहीं दे पाते.

कोई भी काम पूरा नहीं होता : बारबार रुकावट के कारण कार्य अधूरे रह जाते हैं. कोई भी काम पूरा नहीं होता. हर काम अधूरा छूटता जाता है और फिर काम पूरा न होने का तनाव बढ़ने लगता है तो हम उन्हें टालने लगते हैं. इस से आत्मविश्वास में कमी आती है.

दूरी के लिए अपनाएं ये कदम

1. नोटिफिकेशन अलर्ट को साइलैंट मोड पर रखें.

2. कुछ समय मोबाइल से दूरी बनाएं. इस के लिए डिजिटल डिटौक्स करें. हर दिन कुछ घंटे बिना स्क्रीन के बिताएं.

3. काम करते समय मोबाइल से दूरी बनाएं क्योंकि कई बार आवश्यकता न होने पर भी हम हर 10-15 मिनट में अपने मोबाइल को चैक करने लग जाते हैं. हर बार फोन उठाते समय खुद से पूछें, क्या यह जरूरी है?

4. ऐसी ऐप्स जो अलर्ट मैसेजेस भेजती हैं उन को अनइंस्टौल कर दें ताकि अपने काम पर फोकस कर सकें.

5. नोटिफिकेशन सीमित करें, केवल जरूरी ऐप्स के नोटिफिकेशन चालू रखें, बाकी को बंद करना बेहतर है.

6. फोकस मोड या डू नौट डिस्टर्ब मोड को औन करें, काम करते समय यह फीचर बेहद उपयोगी है. Smartphone Addiction

 

 

कौर्पोरेट कल्चर में इश्क

Modern Relationships: कौर्पोरेट कल्चर सिर्फ लड़कों की बपौती नहीं है. इस पर लड़कियों का भी बराबर का हक होना चाहिए. लड़कियों को दोस्ती, प्यार और सैक्स के मामले में अपनी मरजी से जीने का पूरा हक होना चाहिए क्योंकि आजादी बिना जिंदगी अधूरी है. जो लड़की अपनी मेहनत और स्ट्रगल से औफिस में अपना कैरियर खुद तय कर रही है वह प्यार भी करे, दोस्ती भी निभाए और सैक्स का फैसला भी खुद ले.

आ जकल कौर्पोरेट कल्चर में इश्क होना सामान्य सी बात है. यहां इश्क भी होते हैं और रिलेशनशिप भी बनते हैं. कौर्पोरेट कल्चर में कई रिश्ते दोस्ती के रूप में लंबे वक्त तक चलते हैं, कई रिश्ते दोस्ती से शुरू हो कर प्यार और फिर शादी तक पहुंचते हैं तो कई रिश्ते सिर्फ सैक्स तक ही सीमित रहते हैं. कौर्पोरेट कल्चर असल में लड़कियों की आजादी का नया अध्याय है लेकिन कई बार लड़कियों को इस आजादी की कीमत चुकानी पड़ती है.

आजकल कौर्पोरेट दुनिया लड़कियों की आजादी का नया अध्याय बन गई है. घर की चारदीवारों में बंधी लड़कियों की जिंदगी अब औफिस, मीटिंग्स, प्रोजैक्ट्स और कैरियर के साथ बदल रही है. कौर्पोरेट कल्चर ने लड़कियों को आर्थिक आजादी, आत्मविश्वास और फैसले लेने की ताकत दी है लेकिन कई बार लड़कियों को इस आजादी की कीमत भी चुकानी पड़ती है. काम का तनाव, घर व औफिस का दोहरा बोझ, यौन उत्पीड़न और वेतन में भेदभाव आदि सब लड़कियां झेलती हैं, फिर भी यह सच है कि वर्क कल्चर ने लड़कियों की जिंदगी बदली हैं. कौर्पोरेट जौब्स ने लड़कियों को घर से बाहर निकाल कर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया है.

पहले लड़कियां या औरतें परिवार पर आश्रित रहती थीं, इसलिए परिवार में उन के फैसलों की कोई अहमियत नहीं थी. आज वे आत्मनिर्भर हैं तो खुद फैसले ले रही हैं. घर खरीदना, घूमनाफिरना या अपनी मरजी से अपनी जिंदगी के उसूल तय करना आदि सब इसी कौर्पोरेट कल्चर से मुमकिन हुआ है. पैसे कमाने से लड़कियों को आर्थिक और शारीरिक आजादी तो मिलती ही है, साथ ही, उन में फैसला लेने की क्षमता बढ़ती भी है और ऐसी ताकतवर लड़कियों को समाज में सम्मान भी मिलता है.

भारत में औरतों की कामकाजी भागीदारी तेजी से बढ़ रही है. आर्थिक सर्वे 2025-26 के अनुसार, 2018 में औरतों की महिला श्रम भागीदारी दर सिर्फ 23 फीसदी थी जो 2025 में बढ़ कर 41 फीसदी हो गई.

आजादी की कीमत चुकाती लड़कियां

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. कई लड़कियां इस आजादी के लिए भारी कीमत भी चुकाती हैं. कौर्पोरेट कल्चर में सब से बड़ा मुद्दा यौन उत्पीड़न है. एनएसई के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में 500 कंपनियों में 1,779 शिकायतें आईं जो 2025 में बढ़ कर 2,583 हो गईं. यानी, जागरूकता बढ़ रही है लेकिन समस्या खत्म नहीं हो रही. 43 फीसदी महिलाएं काम पर माइक्रो-एग्रेशन यानी छोटीछोटी बदतमीजी का सामना करती हैं. वर्कप्लेस पर कानूनी सुरक्षा के लिए कानून है लेकिन इस का कोई खास असर नहीं है. इस में कई केस लंबे समय तक पैंडिंग रहते हैं.

लड़कियों के साथ वेतन में भेदभाव होना भी एक आम समस्या है. कौर्पोरेट में पुरुष डायरैक्टर महिलाओं से 3.6 गुना ज्यादा कमाते हैं. कई जगह कर्मचारी स्तर पर भी महिला और पुरुष के वेतन में अंतर होता है.

नौकरीपेशा लड़कियां हों, औरतें हों, घर की जिम्मेदारियां भी संभालती हैं जिस से उन पर काम का बो?ा डबल हो जाता है. यही कारण है कि 67 प्रतिशत औरतें वर्कलाइफ बैलेंस नहीं बना पातीं. वे औफिस के 9-10 घंटे के बाद घर आ कर खाना, बच्चों की देखभाल और सारे घरेलू काम करती हैं. लड़कियों में यह बोझ थोड़ा कम होता है. वहीं पुरुष 123 मिनट अनपेड काम करते हैं तो महिलाएं 363 मिनट. इस से औरतों में तनाव, थकान और बर्नआउट बढ़ता है. 48 फीसदी भारतीय औरतें पुरुषों से ज्यादा स्ट्रैस और बर्नआउट में जीती है.

तमाम मुश्किलों के बावजूद कौर्पोरेट कल्चर लड़कियों या औरतों के हित में है. चुनौतियां जरूर हैं लेकिन औरतों या लड़कियों की आजादी का एकमात्र जरिया भी यही है. कौर्पोरेट कल्चर ने औरतों को पैसा, आत्मसम्मान और आजादी दी है. इस से औरतें परंपराओं की बेडि़यों से बाहर निकल रही हैं.

कौर्पोरेट कल्चर में इश्क स्वाभाविक

आज के कौर्पोरेट औफिस में सुबह के 10 बजते ही लैपटौप खुलता है, मीटिंग शुरू होती है और शाम 7 बजे तक टारगेट अचीव करने की दौड़ चलती है. इन सब के बीच कुछ और भी चीजें चलती हैं. दिल की धड़कनें, नजरों की मुलाकातें, चाय के कप के साथ हलकीहलकी बातें और कई बार ये बातें, मुलाकातें और नजदीकियां इश्क में बदल जाती हैं. बहुत से लोग इसे अनप्रोफैशनल कहते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि कौर्पोरेट कल्चर में इश्क होना कोई आश्चर्य की बात नहीं रह गई है. यह इंसानी जिंदगी का हिस्सा है.

जब लोग रोज 8-10 घंटे एक ही छत के नीचे काम करते हैं तो दोस्ती होती है, प्यार होता है. कभीकभी दोस्ती और प्यार का यह रिश्ता जिस्मानी रिश्ते में भी बदल जाता है. कौर्पोरेट औफिस आजकल दूसरा घर बन चुका है. यहां लोग सिर्फ काम नहीं करते, अपनी कहानियां शेयर करते हैं. कोई स्ट्रैस की बात करता है कोई खुशियों की. उसी दौरान 2 लोग एकदूसरे को सम?ाने लगते हैं.

कुछ रिश्ते दोस्ती तक सीमित रहते हैं जहां दिल की बातें शेयर होती हैं तो कई रिश्ते इस से आगे पहुंच जाते हैं. बात बैड शेयरिंग तक पहुंच जाती है. 2 लोगों में आपसी सहमति से सैक्स होता है. दोनों को पता होता है कि ये शारीरिक सुख, बस, तनावमुक्ति के लिए ही है. दोनों ओर कोई गिल्ट नहीं होता. ऐसे रिश्ते तब तक बिलकुल सही हैं जब तक दोनों के बीच आपसी सहमति हो और इस से प्रोफैशनल काम पर असर न पड़े.

सभी पुरुषों को एक तराजू में मत तोलिए

कौर्पोरेट कल्चर में कई मर्द अपनी जूनियर लड़कियों को ले कर गलत मानसिकता रखते हैं लेकिन सारे मर्द एकजैसे नहीं होते. आज की युवा लड़कियों को दोस्त के रूप में स्वीकार करते हैं, उन की मदद करते हैं और दोस्ती का सम्मान करते हैं. वहीं कई लोग लड़कियों को संस्कारी या प्रोफैशनल रहने का उपदेश देते हैं. औफिस में किसी लड़के से अच्छी दोस्ती हो सकती है. लंच साथ खाना, प्रोजैक्ट पर घंटों बात करना, वीकैंड पर कौफी पीना ये सब नौर्मल बातें है. यह दोस्ती न तो कैरियर खाती है, न इज्जत घटाती है. बल्कि इस से लड़की को कौन्फिडैंस और नया नजरिया मिलता है. ऐसे में अगर दो दिल मिलते हैं तो इस में क्या गलत है?

औफिस लव अफेयर्स आजकल आम हैं. कई जोड़े औफिस से ही मिले और बाद में शादी कर ली लेकिन यह जरूरी नहीं कि औफिस में बना हर रिश्ता शादी तक पहुंचे. प्यार का मतलब हमेशा फौरेवर नहीं होता. कभीकभी ये सिर्फ खुशी के कुछ दिन, सप्ताह या कुछ महीने के लिए ही हो सकते हैं. लड़की को अपनी दोस्ती और प्यार चुनने का पूरा हक है.

अगर 2 वयस्क लोग सहमति से शारीरिक रिश्ता बनाना चाहें तो यह उन की निजी जिंदगी है. कौर्पोरेट कल्चर में इसे स्कैंडल बनाना बंद होना चाहिए. सैक्स कोई पाप नहीं. यह इंसानी जरूरत और सुख का मामला है. लड़की अगर चाहे तो यह फैसला ले सकती है. बस, ऐसे रिश्तों में सहमति, सम्मान और सेफ्टी जरूरी है. वहीं, कौर्पोरेट कल्चर में शोषण भी आम बात है लेकिन यह तभी तक है जब तक कौर्पोरेट में लड़कियां माइनौरिटी में हैं. इश्क कोई अपराध नहीं बल्कि यह एक खूबसूरत एहसास है. लड़कियों को दोस्ती, प्यार और सैक्स के मामले में अपनी मरजी से जीने का पूरा हक होना चाहिए क्योंकि आजादी बिना जिंदगी अधूरी है. यहां सिर्फ काम करना ही नहीं, जिंदगी जीनी भी है.

अगर दोस्ती अच्छी है तो फिर दोस्त को दोस्त ही रहने दीजिए. अगर दोस्ती में इमोशन्स, केयरिंग और लौयल्टी भी शामिल हैं तो इस दोस्ती को रिलेशनशिप में बदलने में कोई हर्ज नहीं. Modern Relationships

वरियताओं के क्रम बदलना चाहती हूं

Motivational Poem: कह सकी न बात अब तक, खुद से कहना चाहती हूं
अव्यक्त जो कब से रहा, अब व्यक्त करना चाहती हूं !!

एक रीत थी तो बंध गई मैं, आवाज़ दी तो थम गई मैं
अब तोड़ बंध मजबूरियों के, आज बहना चाहती हूं !!

घर संवारा-जग संभाला, खुद का मन पढ़ न सकी मैं
काश रो सकती मैं जी भर,कितना बिखरना चाहती हूं !!

अपने उजाले पास रख लो, अपने सहारे साथ रख लो
अब अंधेरी राह में भी, बस अकेले ही चलना चाहती हूं !!

कितना कहा-किसको सुना, कितना सहा-किसको पता ?
बेख़ौफ़ जिससे कह सकूं सब, वो साथी बनाना चाहती हूं !!

मांगी दुआ सबके लिए, धूप बारिश हवा सब सलामत रहे
अबकी प्रार्थनाओं में अपनी, खुद को भी कहना चाहती हूं !!

एक साज जो धूमिल पड़ा था, काम जो अधूरा रहा था
आज वरियताओं के आज सारे, क्रम बदलना चाहती हूं !! Motivational Poem

लेखिका – नमिता गुप्ता “मनसी”

जब ईवीएम में बस 2 ही बटन होंगे नए भारत का नया लोकतंत्र

EVM Controversy: भारतीय लोकतंत्र अब अपनी जटिलताओं से बाहर निकल रहा है. आने वाले समय में यह इतना सरल हो जाएगा कि देश में सैकड़ों पार्टियों, नेताओं, विचारधाराओं और कार्यकर्ताओं की अब कोई ज़रूरत ही नहीं बचेगी. एक ही पार्टी होगी, वही राष्ट्र होगी, वही सरकार होगी, वही नैतिकता तय करेगी और वही देशभक्ति का सर्टिफिकेट भी बांटेगी. बाकी सब, बस, वोटर रह जाएंगे.

इस नए लोकतंत्र में पार्टी का कैडर भी अलग होगा. ब्लौक लैवल पर गलीगली घूमते, भाषण देते, सड़कों पर उतरे उद्दंड कार्यकर्त्ता वोट की जद्दोजेहद करते नजर नहीं आएंगे. कैडर का यह पुराना तरीका ओल्डफैशन हो जाएगा. नए भारत के नए कैडर का नया नाम होगा ईसी. चुनाव कराने वाली इस संस्था का खर्च जनता के टैक्स से चलेगा लेकिन जनता से उस का रिश्ता खत्म होता जाएगा. चुनाव आयोग पर उन ऊंचे लोगों और ऊंची जातियों के नैटवर्क का कब्जा होगा जो हमेशा से सत्ता के साथ रहे हैं. लोकतंत्र का चौकीदार ही सत्ता का दरबारी बन जाएगा.

फिर चुनाव भी कितने आसान हो जाएंगे. बड़ीबड़ी ईवीएम मशीनों का झंझट खत्म. न दर्जनों पार्टियों के निशान, न बहस, न विचार और न कोई विकल्प. मशीन में बस 2 ही बटन होंगे. पहला बटन सत्ताधारी पार्टी का उम्मीदवार और दूसरा बटन जेल. 2014 से पहले चुनाव आयोग अंपायर था. अब 12वां खिलाड़ी बन कर भाजपा की तरफ से बैटिंग करता है. चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में सीजेआई को हटा कर जो कानून बनाया वह इसी नए भारत के नए कैडर सिस्टम की नींव थी.

धीरेधीरे संसद बहस का मंच नहीं, बल्कि ताली बजाने का स्टूडियो बन जाएगी. न्यूज़ चैनल पत्रकारिता नहीं, सरकारी भजनमंडली बन जाएंगे. एंकर सवाल नहीं पूछेंगे बल्कि हर रात जनता को बताएंगे कि हमारा देश दुनिया में सब से महान है और जो असहमत है वह या तो देशद्रोही है या विदेशी एजेंट. सब से दिलचस्प बात यह होगी कि इस पूरी प्रक्रिया को लोकतंत्र की जीत बताया जाएगा. लोकतंत्र फिर भी जिंदा ही रहेगा. संविधान की तसवीरें लगेंगी, डा. अंबेडकर और महात्मा गांधी के नाम के नारे भी लगेंगे, चुनाव भी होंगे लेकिन चुनाव का अर्थ बदल जाएगा. तब भी एनसीईआरटी की किताबों में पढ़ाया जाएगा कि भारत दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र है.

नए लोकतंत्र में कागज पर यूपीएससी जिंदा रहेगी लेकिन हकीकत में तो यह अपरकास्ट और अपरक्लास लौबी बन जाएगी. रिटायर होते ही राज्यपाल बनाया जाएगा और फिर राज्यसभा के जरिए दिल्ली में आलीशान बंगला अलौट हो जाएगा. वफादारी का इनाम तो पक्का मिलेगा.

ईवीएम में बस 2 ही बटन होंगे. एक पर भाजपा का फूल छपा होगा. दबाते ही विकास की गंगा बहेगी. दूसरा बटन विरोधियों के लिए होगा. ममता, स्टालिन, केजरीवाल, राहुल का बटन दबाओ, सीधे ईडी, सीबीआई और जेल. वीवीपैट की परची का क्या होगा? वह तो पहले ही 2 प्रतिशत बची है, अब तो, बस, विश्वास रखो. मशीन बोलेगी बीप, मीडिया बोलेगा 500 पार. महाराष्ट्र, चंडीगढ़, सूरत, इंदौर में तो पहले ही सिंगल बटन ईवीएम का ट्रायल हो चुका है. चुनाव आयोग का बजट 2024-25 में 370 करोड़ रुपए रहा.

चुनाव आयोग को पैसा जनता ने दिया और जनता के पैसों का सदुपयोग करते हुए ईसी ने बीजेपी को भारी बहुमत से जीत दिला दी. ईडी-सीबीआई-आईटी भी जनता के पैसों से चलते हैं और बड़ी ईमानदारी से दिनरात छापे मारते हैं. सत्ता पक्ष के ईमानदार नेताओं के बंगले से बच कर निकलते हुए 95 फीसदी केस विपक्ष पर करते हैं. इलैक्टोरल बौंड के नाम पर 6,500 करोड़ का 55 परसैंट चंदा अकेले भाजपा को मिलता है.  देने वाला अपरक्लास रिच होता है, इसलिए इन पर ईडी-सीबीआई की कृपा बनी रहती है. Vote Theft

आजादी के बाद गांधीजी कुछ साल और जीते तो आज का भारत कैसा होता ?

Gandhi Ideology: गांधी जी की दिली ख्वाहिश थी कि वह सवा सौ साल तक जीयें.एक ऐसे दौर में जब पुरुषों की औसत आयु महज 40 साल थी,यह काफी बड़ी महत्वाकांक्षा समझी जा सकती थी.लेकिन इसे शेखचिल्ली की चाहत तो कतई नहीं कहा जा सकता था ; क्योंकि अस्वाभाविक मौत मरने के बाद भी वह औसत से लगभग दो गुना जीये. जनवरी 1948 में जब उनकी हत्या हुई वह 78 साल 3 महीने के थे.इसलिए अगर वह स्वाभाविक मौत करते तो यह कहना कतई अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वह कम से कम 10 साल तो और जीते ही.क्योंकि जब उनकी हत्या हुई उन दिनों वह भावनात्मक रूप से जरूर काफी आहत थे,इस कारण कमजोर भी काफी दिखते थे,लेकिन उन दिनों भी वह 5-5 दिनों का उपवास कर लेते थे,हर दिन 10-10 लोगों को चिट्ठियां लिखवा लेते थे.दिन में दर्जनों लोगों से बातें करते थे (शाम-सुबह की अपनी नियमित प्रार्थनाओं के बावजूद). इस सबसे पता चलता है कि गांधी उन दिनों शारीरिक और मानसिक, दोनों ही तरह से पूर्ण स्वस्थ थे.

लेकिन अगर एक मिनट को मान लें कि गांधी अपनी इच्छानुसार 125 साल तक जीते तो वह आजाद भारत में करीब 47 साल तक रहते.इस तरह वह नेहरू से लेकर नरसिंह राव तक की सरकारें देखते.वह आजाद भारत के 7 प्रधानमंत्रियों को देखते. मगर ऐसा हो न सका.आजाद भारत में वह 47 साल क्या 47 महीने भी न जी सके.वह आजाद भारत में महज 168 दिन तक ही जिंदा रहे. सवाल है अगर 47 साल न सही,आजाद भारत में गांधी महज 10 साल और जीते तो क्या आज का हिन्दुस्तान ऐसा ही होता जैसा की यह है ? न …बिलकुल ऐसा नहीं होता. सवाल है तब आज का भारत कैसा होता ? यानी वह मौजूदा हिन्दुस्तान से कैसे और कितना भिन्न होता ? इस अनुमान को अगर महज दो शब्दों में कहें तो तब आज का भारत ज्यादा और वास्तविक लोकतंत्र होता.तब हम सम्पन्न इतने भले न हुए होते लेकिन हमारी नागरिक चेतना बहुत सम्पन्न होती. अगर गांधीजी महज 1957-58 तक ही जी जाते तो आज जो तमाम समस्याएं भारत के लिए नासूर बनी हुई हैं, तब शायद इनमें से कई या कोई भी नहीं होती.

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आजादी के सात दशकों बाद भारत आज जिन समस्याओं से घिरा है वे हैं-गरीबी, भ्रष्टाचार, उजड़ते गांव,कश्मीर और ढीठ पाकिस्तान. गांधीजी ने अगस्त 1947 में ही घोषणा कर दी थी कि वह लाहौर जायेंगे, रावलपिंडी जायेंगे. क्योंकि 1946 में ही बंगाल, बिहार, पंजाब और सिंध भयानक साम्प्रदायिक हिंसा में डूब गए थे. इस कारण उनका जनवरी 1946 से लेकर जनवरी 1948 तक का ज्यादातर समय इस आग को बुझाने में ही खर्च हुआ. कभी नोआखाली, कभी कलकत्ता, कभी भागलपुर और कभी दिल्ली में वह साम्प्रदायिक आग ही बुझाते रहे.इसके अगले पड़ाव अमृतसर, लाहौर और रावलपिंडी थे.लेकिन दिल्ली ने उन्हें आगे नहीं जाने दिया.

गांधीजी सितम्बर 1947 में ही लाहौर जाना चाहते थे.लेकिन पहले बंगाल और बाद में दिल्ली की आग बुझाते हुए 1947 का पूरा साल गुजर गया. इसलिए उन्होंने 16 जनवरी 1948 के बाद पाकिस्तान जाना तय किया था.उन्होंने इस सम्बन्ध में जिन्ना को खत भी लिख दिया था और जिन्ना उनका इंतजार भी कर रहे थे.सवाल है उनके पाकिस्तान जाने से होता क्या ? ..और यह भी कि गांधीजी आखिर पाकिस्तान जाना ही क्यों चाहते थे ? दरअसल वह नहीं चाहते थे कि लोगों का इस किस्म से विस्थापन हो जिस तरह से भारत और पाकिस्तान से हो रहा था. गांधीजी भारत आये लाखों हिन्दुओं को अपने साथ लेकर पाकिस्तान जाना चाहते थे और उधर से वापसी में अपने साथ उन लाखों मुसलामानों को लेकर आना चाहते थे,जो हिंदुस्तान छोड़कर गए थे.वह इन अपनी अपनी जगह से उजड़े लोगों को फिर से उनकी जमीन में ही बसाना चाहते थे.उनके घर, उनकी जायदाद, वापस दिलवाना चाहते थे.

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पता नहीं यह होता या नहीं होता,लेकिन गांधी जी जिस तरह हर असंभव को संभव कर डालते थे,उससे अगर मान लें कि ऐसा हो जाता तो यह दुनिया के विस्थापन इतिहास की एक नई घटना होती. यह असंभव इसलिए नहीं था क्योंकि हम तमाम ऐतिहासिक बयानों और दस्तावेजों में देख सकते हैं कि गांधीजी का पाकिस्तान में सम्मान था.उन्होंने भारत से पाकिस्तान के हिस्से के 55 करोड़ रूपये दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया था.खुद की जिंदगी को दांव में लगाकर पाकिस्तान को यह रकम दिलवाई थी.इसलिए भी न केवल पाकिस्तान में बल्कि पूरी इस्लामिक दुनिया में गांधीजी का कद बहुत बड़ा हो गया था.इस कद की पृष्ठभूमि में लगता है पाकिस्तान उनकी बात मान लेता.अगर शरणार्थियों की अपने-अपने देश वापसी हो जाती तो बंटवारा लगभग बेमतलब हो जाता.क्योंकि तब दोनों ही देशों में दोनों समुदाय के लोग होते.तब पाकिस्तान आज की तरह न तो कट्टर इस्लामिक देश बनता और न ही भारत में हिंदुओं के ध्रुवीकरण की कोशिश होती.

यह असंभव इसलिए नहीं लगता क्योंकि आखिरकार उन्होंने इस असम्भव से लगने वाले फार्मूले को नोआखाली में प्रयोग किया था.वहां मुसलमानों ने तमाम हिन्दुओं के जलाए गए मकान और पूजास्थल अपने हाथों से बनाये थे,इसी तरह हिन्दुओं ने भी तमाम मस्जिदों को अपने श्रम और पैसे से बनवाया था. इसलिए अगर गांधीजी आजादी के कुछ सालों बाद तक जिंदा रहते तो भारत-पाकिस्तान दो दुश्मन देशों के रूप में उभर ही नहीं सकते थे. उनके रहते पाकिस्तान और भारत दो देश होते हुए भी एक ढीले ढाले संघ में बदल जाते और वह दोनों देशों में बारी बारी से रहते.क्योंकि उन्होंने कभी भी भारत को अपना और पाकिस्तान को पराया देश नहीं माना था. वह हमेशा दोनों देशों को अपनी दो आंखों जैसा समझते थे.

अगर गांधीजी 1957-58 तक भी जिंदा रहते तो गांवों की वह दुर्दशा नहीं होती जो आज दिख रही है. गांधीजी का समूचा आर्थिक दर्शन गांवों को आत्मनिर्भर ईकाई के रूप में विकसित करना था,जबकि आजादी के बाद जो योजना आयोग बना वह महानगरीय ढांचे वाले औद्योगिक विकास के सपने को समर्पित था. वास्तव में यह नेहरू जी के सपनों के भारत की रूपरेखा को मूर्त रूप देने के लिए था.जाहिर है उसमें नगर केन्द्रित यूरोपीय मॉडल को ज्यादा तरजीह दी गयी थी. लेकिन जिद्दी बुड्ढा गांधी जिंदा होता तो गांवों से इस तरह अनाथों वाला सलूक नहीं होने पाता. तब हमारा औद्योगिक सपना कुटीर और हाथ उद्योग से खाद पानी हासिल करता. नतीजे में आज खुशहाल गांवों वाला भारत होता.इस तरह अगर आजादी के बाद एक दशक तक गांधी जीते तो यह संभव था कि आज देश में उतने करोड़पति नहीं होते जितने हैं. लेकिन तब निश्चित रूप से देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले इतने लोग भी नहीं होते जितने आज हैं. भारत में अमीरी और गरीबी में इतना अंतर नहीं होता.

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आजाद भारत में कम से कम 10 साल गांधी और रहते तो हम नैतिक रूप से एक मजबूत समाज होते. भ्रष्टाचार को तब हम बेशर्म होकर गले नहीं लगा रहे होते जैसा कि इन दिनों कर रहे हैं. ऐसा इसलिए होता क्योंकि तब सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की इतनी खातिर नहीं हुई होती.गांधीजी ने भारत के आजाद होने के बाद कांग्रेस के भंग किये जाने की वकालत की थी,यह बात तो बहुत लोग जानते हैं.लेकिन शायद बहुत लोग उनके यह कहने की पृष्ठभूमि न जानते हों. दरअसल इसकी तात्कालिक वजह यह थी कि उन्हें तमिलनाडु के एक व्यक्ति कोंडी वेंकटप्पैय्या ने पत्र लिखा था, जिसमें कहा गया था कि वहां कांग्रेस का स्थानीय विधायक न्याय के साथ बेईमानी कर रहा है और इससे कमाई कर रहा है.

इस सूचना से गांधीजी के कान खड़े हुए थे और उन्होंने तुरंत सरदार पटेल तथा नेहरू को बकायदा बुलाकर कांग्रेस को भंग किये जाने का मशवरा दिया था, जो सरदार पटेल को बुरा भी लगा था.लेकिन अगर गांधीजी जिंदा रहते तो कांग्रेस को भंग होना ही पड़ता क्योंकि कोई और नहीं करता तो वह खुद ही इसकी सार्वजनिक घोषणा कर देते.ऐसे में नेहरू पटेल जैसे नेता उनके साथ आ जाते और मोरारजी देसाई व श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे कांग्रेसी दूसरा खेमा बना लेते.इससे कांग्रेस इतनी मजबूत नहीं रह पाती कि आजादी के बाद कई दशकों तक लगातार शासन में रहती याकि देश में इमरजेंसी लगा सकती. सिर्फ देश के स्तर पर ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी गांधीजी के जिंदा होने से बहुत फर्क पड़ता.सन 1950-51 में कोरिया को जिस तरह अमरीका की दादागीरी झेलनी पडी,वैसा नहीं होता.हैरी एस ट्रूमैन गांधीजी की इज्जत करते थे,गांधीजी उन्हें पत्र लिखते और कोरिया को युद्ध की विभीषिका नहीं झेलनी पड़ती. गांधीजी के जिंदा रहने से यूरोपीय युवा विश्वयुद्ध के बाद साठ के दशक में उतने अवसाद से नहीं गुजरते जितने अवसाद से वे गुजरे. क्योंकि तब नैतिकता, अहिंसा और शान्ति की जिंदा मिसाल के रूप में दुनिया में गांधी मौजूद होते. …और सबसे बड़ी बात यह होती कि हम आत्मविश्वास से भरे भारतीय होते जिसके कारण हमारा नागरिक बोध, हमारी नागरिक चेतना और हमारी नागरिक आजादी बहुत मजबूत होती.

चुनाव आयोग के धुएं में बंगाल हारा

SIR Process: संविधान ने वोटर को वोट देने का कानूनी हक दे रखा  है. एसआईआर प्रक्रिया के जरिए उन को वोट देने से रोक दिया गया. एसआईआर बिहार से ले कर पश्चिम बंगाल तक विवादों के घेरे में रही है. ऐसे में चुनाव आयोग की भूमिका निष्पक्ष कैसे मानी जा सकती है? अदालत तक चुनाव आयोग की इस मनमानी पर मूकदर्शक बनी रही और नतीजा, चुनाव आयोग के धुएं में बंगाल हार गया.

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरलम और पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने चुनाव प्रक्रिया की खामियों को उजागर कर दिया है. संविधान बनाने वालों ने कभी सोचा नहीं होगा कि सत्ता के प्रभाव में चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं सरकार के इशारे पर इस तरह की मनमानी करेंगी. पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की जीत पर जब भी बात होगी, वोटर लिस्ट की एसआईआर यानी विशेष गहन समीक्षा में मनमानी और केंद्र सरकार द्वारा 2 लाख, 50 हजार अर्धसैनिक बलों की तैनाती का औचित्य जैसे सवाल सामने खड़े होंगे. चुनाव परिणामों पर इन के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता. संविधान निर्माताओं ने भय के वातावरण में नहीं बल्कि खुले आसमान व निडर माहौल में चुनाव कराए जाने की कल्पना की थी.

चुनाव पार्टियों के कैडर द्वारा लड़े जाते हैं पर बंगाल में चुनाव तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी ने नहीं, चुनाव आयोग ने लड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने कोई दखल नहीं दिया कि चुनाव आयोग के मतदाता सूची तैयार करने की आड़ में असल में बाहरी कार्यकर्ता या चुने हुए अफसर घरघर जा कर वोटरों से मिल रहे थे. इस के पीछे एक छिपा डर स्पष्ट था कि जो केंद्र सरकार चाहती है वह करोगे तो ठीक, वरना न जाने क्या होगा. सरकारी खर्च और सरकारी बंदूक के साए में मतदाता सूची तैयार करने में ही बता दिया गया कि अब तृणमूल कांग्रेस का पत्ता साफ करना है.

जो मशीनरी चुनाव आयोग ने बंगाल में झोंकी वह बड़ी से बड़ी पार्टी नहीं तैयार कर सकती. चुनाव आयोग ने थानेदार बदल दिए , जिलाधीश बदल दिए, सचिव बदल दिए. यह काम कभी कोई पार्टी नहीं कर पाती. चुनाव आयोग के पास वोट काटने से ले कर वोटर को वोट देने और गिनने तक के अपार अधिकार जमा कर दिए गए हैं. चुनाव आयोग अपने अधिकार की मनमानी परिभाषा गढ़ रहा था और उस का एक ही उद्देश्य था कि ममता बनर्जी को हटाना है. इस काम में भाजपा के छिपे कैडर,. जो हर सरकारी दफ्तर में बहुतायत में हैं, ने भी पूरी सहायता दी. सरकारी बाबू जानता है कि जनता की कमजोर नब्ज को कैसे दबाया जाए. वर्णव्यवस्था को फिर से वापस लाने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए इस सरकारी कैडर ने तनमन से साथ दिया.

शुरुआत में चुनावों से ठीक पहले पश्चिम बंगाल की एसआईआर प्रक्रिया के तहत 91 लाख वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे. उन में से 64 लाख वोटरों के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया गया और उन में 27 लाख नामों को ‘जांच के धीन’ रख कर वोट देने से वंचित रखा गया जबकि इन लोगों ने सत्यापन के लिए दस्तावेज जमा किए थे. चुनाव आयोग के अफसरों के अनुसार, उन में तकनीकी गलतियां थीं. उन 27 लाख वोटरों के कानूनी अधिकारों का खुल्लमखुल्ला हनन हुआ. यह संदेश था कि जो कहते हैं वही करना वरना हिंदू हो या मुसलमान, मतदान का अधिकार ही छीन लिया जाएगा.

यह आरोप ही भयावह है कि एसआईआर प्रक्रिया के जरिए उन लोगों को वोट डालने के मौलिक अधिकार से वंचित रखा गया जिन से केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी को विरोध की आशंका थी. संविधान का अनुच्छेद 326 देश के हर उस नागरिक को वोट देने का अधिकार देता है जिस की उम्र 18 साल से अधिक हो. वोट देने की प्रक्रिया और नियम को ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951’ में विस्तार से बताया गया है. वोट देने को लोकतंत्र का सब से बड़ा अधिकार माना जाता है. 1947 से पहले के अंगरेजों के राज और फिर स्वतंत्रता के राज में आम आदमी को जो मिला उन में वोट दे कर अपने जनप्रतिनिधि को चुनने का हक सब से बड़ा था.

कहां गया 27 लाख वोटरों का हक

वोटरों के वोट देने के अधिकार पर फैसला करने से पहले चुनाव कराए ही क्यों गए? बात केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है. असम में एसआईआर प्रक्रिया विवादों में रही है. उस से पहले बिहार में भी वह विवादों में घिरी रही. चुनाव आयोग की तानाशाही के बीच पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में करीब 92 फीसदी मतदान हुआ था. जब कुल वोटरों की संख्या कम हो जाती है तो वोट देने का प्रतिशत अपनेआप बढ़ जाता है. सो, बढ़े हुए मतदान पर चुनाव आयोग की पीठ ठोंकने का कोई मतलब नहीं है.

असम में चुनाव आयोग की खलनायकी भूमिका एसआईआर की वजह से नहीं बल्कि दोषपूर्ण परिसीमन की वजह से थी. असम में निर्वाचन क्षेत्रों को इस तरह डिजाइन किया गया ताकि भाजपा को ही लाभ पहुंचे. नतीजतन, सत्तारूढ़ भाजपा फिर अपनी सरकार बनाने में कामयाब हो गई. चुनाव आयोग इस शिकायत की अनदेखी करता रहा कि चुनाव से पहले और चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद केंद्र सरकार ने बंगाल की टीएमसी सरकार के हर काम में अड़ंगा लगाया.

चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले जिस तरह से भाजपा की पसंद के अफ़सरों को तैनात करने में तरजीह दी उस पर भी सवाल उठ रहे हैं. टीएमसी सरकार के मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती को हटा कर दुष्यंत नारियाला को नया मुख्य सचिव नियुक्त किया. गृह सचिव जगदीश प्रसाद मीणा की जगह संघमित्रा घोष को राज्य का नया गृह सचिव बनाया गया. चुनाव आयोग ने कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर एवं दक्षिण 24 परगना जैसे महत्त्वपूर्ण जिलों सहित 13 जिला मजिस्ट्रेटों का तबादला किया.

प्रशासन के अफ़सरों के साथ ही साथ पुलिस महकमे में बड़े पैमाने पर बदलाव किये गए. डीजीपी पीयूष पांडे को हटा कर सिद्धनाथ गुप्ता को पश्चिम बंगाल का नया कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त किया गया. कोलकाता में पुलिस कमिश्नर सुप्रतिम सरकार की जगह अजय कुमार नंद को नया कमिश्नर बनाया गया. एडीजी विनीत गोयल को हटा कर अजय मुकुंद रानाडे को कानून व्यवस्था का नया अतिरिक्त महानिदेशक बनाया गया.

अफसरों के अलावा राज्यभर के 170 पुलिस थानों के प्रभारियों सहित कुल 184 पुलिस अधिकारियों के तबादले किए गए. चुनाव आयोग ने राज्य की 294 सीटों में से 73 रिटर्निंग औफिसर्स को भी बदल दिया था. इस में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का निर्वाचन क्षेत्रभवानीपुर भी शामिल था.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जो 27 लाख वोट काटे गए थे, उस के पहले किसी और राज्य में ऐसा नहीं किया गया. कहीं और इतनी बड़ी संख्या में वोट नहीं कटे थे. यह कुल वोट का 4.3 प्रतिशत होता है. ममता बनर्जी का दावा है कि ये ज्यादातर मुसलिम थे या टीएमसी समर्थक थे. पश्चिम बंगाल की 48 ऐसी सीटें हैं जिन में वोटरों की संख्या 2021 के चुनाव के मुकाबले कम थी, जबकि जनसंख्या बढ़ चुकी थी. साफ है कि नाम कटने से वोटर मतदान नहीं कर पाए. यह चुनाव संविधान के अधिकार का खुला मजाक दिखता रहा. लोकतंत्र में न केवल दिखना चाहिए कि मतदान हो रहा है, असल में बिना डरे, बिना हक छीने चुनाव हो तो ही चुनाव माने जाएंगे.

बंगाल में चुनाव आयोग ही जीता है, इस का एक सुबूत नए मुख्यमंत्री द्वारा सुब्रतो गुप्ता के मुख्यमंत्री के निजी सचिव की नियुक्ति है. सुब्रतो को चुनाव आयोग ने स्पैशल औब्जर्वर के पद पर सिर्फ चुनाव के लिए नियुक्त किया था.

चुनाव आयोग चाहता तो सभी काटे वोटरों को अस्थायी रूप से वोट डालने का अधिकार दे सकता था क्योंकि उंगली पर लगे निशान से कोई दोबारा वोट नहीं दे सकता. जिन के नाम कटे वे भारतीय नागरिक हैं और इन सब ने पिछले कई चुनावों में मतदान किया था. इन सब के तो राज्य में 2002 की वोटर लिस्ट में भी नाम थे. 27 लाख मतदाताओं में से किसी को भी न्यायिक अधिकारियों द्वारा वोटर लिस्ट से अभी तक बाहर नहीं किया गया है. इस के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने 6 अप्रैल, 2026 को मतदाता सूची के लिए बनाई गई अपीलीय न्यायाधिकरणों द्वारा अपीलों के निबटारे के लिए कोई समयसीमा निर्धारित करने से इनकार कर दिया था.

भाजपा को भाया एसआईआर का गणित

चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर ने ममता बनर्जी की हार में कैसे भूमिका निभाई, इस को समझने के लिए भाजपा और टीएमसी को मिले वोट शेयर को देखना होगा. पश्चिम बंगाल में विधानसभा की 294 सीटें हैं. 2021 के विधानसभा में टीएमसी को 2 करोड़, 89 लाख, 68 हजार, 281 वोट लगभग 48.02 फीसदी वोट और 215 सीटें मिली थीं. वहीं भाजपा को 2 करोड़, 28 लाख, 50 हजार, 710 वोट यानी 37.97 फीसदी वोट और 77 सीटें मिली थीं. दोनों के बीच वोटों का अंतर 60.6 लाख था.

2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 2 करोड़, 92 लाख, 18 हजार, 815 वोट यानी लगभग 45.85 फीसदी वोट और 206 सीटें मिलीं. दूसरी तरफ टीएमसी को 2 करोड़, 60 लाख, 02 हजार, 017 वोट यानी लगभग 40.80 फीसदी और 81 सीटें मिलीं. टीएमसी और भाजपा के बीच वोट का अंतर करीब 32.17 लाख वोट का रहा. भाजपा के वोट 8 फीसदी बढ़े तो टीएससी के वोट 7 फीसदी गिर गए.

पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद मतदाता सूची से 91 लाख नाम हटाए गए थे. इन में पहले चरण में 27 लाख वोटरों को जांच के दायरे में रख कर वोट डालने की अनुमति नहीं दी गई. इस के बाद कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घट कर 6.75 करोड़ रह गई थी. जिन सीटों पर 5,000 से कम वोट डिलीट हुए हैं, वहां की 13 में से 12 सीटें भाजपा ने जीती हैं. इसी तरह जहां 5,000 से 15,000 वोट कटे हैं, वहां की 64 में से भाजपा ने 46, जहां 15,000 से 25,000 वोट कटे हैं, वहां की 69 में से भाजपा ने 44 और जहां 25,000 से ज्यादा वोट कटे हैं, वहां की 147 सीटों में से 88 सीटें भाजपा ने जीती हैं.

इस तरह से देखा जा सकता है कि भाजपा की जीत में एक भूमिका एसआईआर से मुसलिम मतदाताओं की घटी संख्या भी है. यह केवल व्यावहारिक राजनीति का मामला नहीं है, बल्कि दुनिया में लोकतंत्र पर होने वाली बहसों का हिस्सा बनने वाला है. एसआईआर के बाद हटाए गए नामों में 57.47 लाख हिंदू (63 प्रतिशत) और 31.1 लाख मुसलिम (34 प्रतिशत) हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक, राज्य में मुसलिम आबादी 27 प्रतिशत है. पश्चिम बंगाल के चुनावी आंकडे इस बात को सही साबित करते हैं कि टीएमसी की हार के पीछे एसआईआर एक प्रमुख कारण रहा है. इस के लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार है और यह चुनाव कम, थोपा गया निर्णय ज्यादा नजर आने लगा है.

ममता ने हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ा

जैसी कि उम्मीद थी कि टीएमसी नेता और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस तरह का चुनाव अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखा. उन के मुताबिक, उन के साथ मारपीट की गई. ममता बनर्जी ने कहा है कि अब उन का लक्ष्य इंडिया गठबंधन को मजबूत करना है. वे एक छोटे कार्यकर्ता के रूप में इसे मजबूत बनाने का काम करेंगी. अब तो उन के पास कुरसी भी नहीं है, इसलिए एक आम इंसान की तरह काम करेंगी. अब वे आजाद हैं. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लोगों की सेवा में बिता दी है. अपनी 15 साल की सरकार में उन्होंने न तो एक पैसा सैलरी ली और न ही पैंशन ली है. अब वे आजाद हैं तो वे काम करेंगी, जो उन्हें करना है.

तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी पर भ्रष्टाचार और आपराधिक गतिविधियों से संबंधित कई गंभीर आरोप हैं जिन की जांच केंद्रीय एजेंसियां ईडी और सीबीआई कर रही हैं. इन में कोयला घोटाला, मनीलौन्ड्रिंग और अवैध खनन के आरोप शामिल हैं. इस में एक पश्चिम बंगाल के आसनसोल क्षेत्र में ईस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड की खदानों से अवैध रूप से कोयला निकाले जाने का आरोप है. ईडी के अनुसार, इस अवैध व्यापार से हुई कमाई के मुख्य लाभार्थियों में अभिषेक बनर्जी और उन के करीबी शामिल हैं. जांच एजेंसियां उन की पत्नी रुजिरा बनर्जी के बैंकौक और लंदन स्थित विदेशी खातों की जांच कर रही हैं, जिन में करोड़ों रुपए के लेनदेन का संदेह है. पश्चिम बंगाल शिक्षक भरती घोटाला भी मुद्दा बन गया था.

सीबीआई ने अपनी पूरक चार्जशीट में एक ‘अभिषेक बनर्जी’ का नाम लिया है, जिस ने कथित तौर पर अवैध नियुक्तियों के लिए 15 करोड़ रुपए की मांग की थी. पशु तस्करी और 2026 के चुनावों में हुई हिंसा में भी अन्य लोगों का हाथ बताया जा रहा है. मई 2026 में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा नेताओं ने अर्जुन सिंह व अभिषेक बनर्जी पर शुभेंदु अधिकारी के पीए चंद्रनाथरथ की हत्या करवाने का सीधा आरोप लगाया है. यह बात दूसरी कि जांच एजेंसियां सैकड़ों गवाहों को अदालतों में पेश कर के मामले बना कर ममता बनर्जी को जेल में नहीं तो अदालतों के गलियारों में तो बैठा ही सकती हैं.

आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह कहते हैं, ‘देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरुपयोग किया जा रहा है और यदि यही स्थिति जारी रही तो लोकतंत्र खत्म  हो जाएगा. पश्चिम बंगाल में यदि मतदाताओं को मतदान से वंचित नहीं किया गया होता तो चुनाव के परिणाम पूरी तरह अलग होते. यह लोकतंत्र की जीत नहीं, बल्कि लूटतंत्र की जीत है.’

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी संजय सिंह ने कहा, ‘यदि समय रहते सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया होता तो लाखों मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते थे. यह वोटरों के लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ न्याय नहीं है. देश में जिस तरह से लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरुपयोग हो रहा है और यदि यही स्थिति जारी रही तो लोकतंत्र कमजोर होता जाएगा. इतिहास में उन लोगों को भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा, जो इन परिस्थितियों में चुप रहते हैं.’

अपनी प्रतिक्रिया देते वरिष्ठ पत्रकार विष्णु नागर अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं, ‘इन्होंने लोकतांत्रिक विधि को इतना भ्रष्ट कर दिया है कि आज पश्चिम बंगाल उस का शिकार है. कल केरल हो सकता है. जहां आज उस का कोई अस्तित्व नहीं है. कल संसद में ये 400 के पार जा सकते हैं. अगली बार 543 में से 500 भी ला सकते हैं. चुनाव लूटने में तो बेशर्मी ही इन का एकमात्र आसरा है.’

वे आगे लिखते हैं, ‘भ्रष्ट चुनावी व्यवस्था को सुधारना क्या संभव रह गया है? जनता में गहरा अंसतोष है. मगर उस को प्रशासनिक और न्यायिक मशीनरी के जरिए प्रतिबंधित करने की अनैतिक गैरकानूनी विधियां इन के पास हैं. सारी वैधानिक संस्थाएं इन के सामने हथियार डाल चुकी हैं या खरीद कर अपहर्त कर ली गई हैं. इन्होंने नैतिक बोध की लगभग पूरी तरह से हत्या कर दी है.’

राजद यानी राष्ट्रीय जनता दल की नेता कंचना यादव ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते लिखा कि ‘बिहार के बाद पश्चिम बंगाल का चुनाव भाजपा ने जीता नहीं, बल्कि लूटा है. केंद्रीय बलों, सीबीआई, धनबल और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मदद से यह किया गया है. इसलिए भाजपा इसे चाहे जितनी भी जीत के रूप में मनाए, लेकिन इतिहास में इसे लोकतंत्र की हत्या के रूप में याद रखा जाएगा.’

जो तरीका भाजपा ने अपनाया है, वह एक विदेशी शासक का नई जमीन हथियाने का है जिस में टैंक, मिसाइल छोड़ कर सबकुछ इस्तेमाल किया गया. भाजपा को अपनी नीतियों के प्रचार करने की जरूरत ही नहीं थी जैसे पहले के आक्रमण करने वाले राजा नहीं करते थे. एक धर्मभीरु, गरीब, समाज इस तरह की चुनौती का सामना नहीं कर सकता क्योंकि एक तरफ बंदूकें थीं और दूसरी तरफ पार्टियों के झंडे. 1947 में जो आजादी मिली और 1950 में जो संविधान मिला वह अब समाप्त सा ही है. अब अगर रिजर्वेशन पर गाज गिरे, अब अगर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ परिवारों की महिलाओं के अधिकार, जिन,में अब अगर सत्ता का केंद्र पास के मंदिर का पुजारी हो जो पौराणिक सोच थोपे, तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि अब भाजपा का कैडर नहीं बल्कि  चुनाव आयोग का कैडर अगले सभी चुनाव लड़ेगा,

तुनकमिजाज ममता में क्या बदलाव आएगा

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरलम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों में सब से बड़ी लड़ाई पश्चिम बंगाल में लड़ी गई. पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की हार का प्रभाव पूरे विपक्ष पर पड़ा है. ममता बनर्जी को सब से मजबूत विपक्षी नेता माना जाता था. लोकसभा में उन की कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बाद तीसरी सब से बड़ी पार्टी है. सब से बड़ा सवाल यही है कि तुनकमिजाज स्वभाव की ममता बनर्जी अपने बयान पर कब तक कायम रह पाएंगी?

2024 के लोकसभा चुनाव के पहले इंडिया ब्लौक बनाने के समय ममता बनर्जी सब से अधिक सक्रिय थीं. जद (यू) के नेता नीतीश कुमार को ले कर सभी विपक्षी नेताओं से बात कराने का काम ममता बनर्जी ने किया. जब इंडिया ब्लौक का संयोजक चुनने का नंबर आया तो ममता बनर्जी नीतीश कुमार के खिलाफ हो गईं. ममता बनर्जी के खराब व्यवहार के चलते नीतीश कुमार इंडिया ब्लौक छोड़ कर चले गए. अगर यह गलती विपक्ष से न हुई होती तो 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना संभव ही न होता. जब इंडिया ब्लौक को दोबारा मजबूत करने की बात हो रही है तब सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी अपनी तुनकमिजाजी छोड़ पाएंगी?

भाजपा के खिलाफ एकजुट होगा विपक्ष

दूसरी ओर 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 240 सीटें मिली थीं. विपक्ष में कांग्रेस को 99, समाजवादी पार्टी को 37 और टीएमसी को 29 सीटें मिली थीं. लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने अपनी गलतियों में सुधार किया. इस के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में विपक्ष को हरा कर दिखा दिया. तब भी ममता बनर्जी को लग रहा था कि भाजपा पश्चिम बंगाल का चुनाव नहीं हरा पाएगी. पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी कांग्रेस या किसी और के साथ समझौता करने को तैयार न थीं. अब अपना किला गंवाने के बाद उन की समझ में विपक्षी एकता का महत्त्व आया है. यह गुस्सा अब निरर्थक है. लोकतंत्र की लुटिया तो उन्होंने ही डुबो दी जिन्हें इस से लाभ मिल रहा था.

क्षेत्रीय पार्टियां

आज के दौर में चुनावी हार के बाद क्षेत्रीय पार्टियों के लिए अपनी पार्टी को टूट से बचा पाना मुश्किल होता है. दिल्ली की हार के बाद आम आदमी पार्टी टूट गई. इस बार चुनावी हार में एसआईआर एक प्रमुख मुद्दा है लेकिन इस के अलावा भी कई कारण होते हैं जिन को विपक्षी दल स्वीकार नहीं करते. ममता बनर्जी जैसे ही देश की राजनीति में अपना समय देंगी, पश्चिम बंगाल में उन की रहीसही पार्टी खतरे में पड़ जाएगी. भाजपा जिस तरह से धर्म की राजनीति कर रही है, दूसरे दलों के पास उस का विकल्प नहीं है. विपक्षी दलों में एकता नहीं है. सारे दल वैचारिक तौर पर अलगअलग हैं. इन का जन्म ही कांग्रेस के विरोध में हुआ था. ममता बनर्जी को अपने दल में पूजापाठी मन से हिंदूमुसलिम करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है, भाजपा उन्हें तुरंत ले जाएगी.

विपक्ष को एकजुट करना सब से बड़ी परेशानी है. 2027 में सब से बड़ा विधानसभा का चुनाव उत्तर प्रदेश में है. उत्तर प्रदेश की राजनीति भाजपा बनाम छोटेछोटे दलों की बची हुई है. यहां भी बसपा को विपक्ष के खेमे में शामिल करना बहुत मुश्किल है, क्योंकि वह अभी तक गैस्ट हाउस कांड को भुला नहीं सकी है. यह लोकतंत्र के लिए बहुत ही दुखद है. पश्चिम बंगाल में वामदल, एआईएमआईएम, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस थे, जिन में धर्मनिरपेक्ष भाजपा विरोधी  वोट बंट जाता है, जबकि भाजपा बहुसंख्यकों की राजनीति करती है और उस का वोट किसी पार्टी में नहीं बंटता.

विपक्ष की एकता और चुनावी रणनीति केवल कागजों पर बनती है. अगर कांग्रेस ने तमिलनाडु में विजय की पार्टी से समझौता कर लिया होता तो उस के लिए वह बड़ा फायदेमंद होता. लेकिन कांग्रेसी नेता पी चिदंबरम ने मना किया तो कांग्रेस साथ नहीं गई. इसी तरह की तमाम गलतियां विपक्ष ने 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले और बाद में की हैं, जिन से भाजपा को जीत मिलती जा रही है. लगातार चुनाव आयोग, सीबीआई, ईवीएम और ईडी पर आरोप लगाने से जनता को समझ आ जाता है कि विपक्ष अपना नकारापन छिपा रहा है. देश में जो व्यवस्था बनी है उसी के हिसाब से काम करना पडता है. इसी राह पर चलते हुए भाजपा को हराया जा सकता है. भाजपा को हराने के लिए विपक्ष अब कोई दूसरा चुनाव आयोग तो नहीं बना सकता.

पश्चिम बंगाल की हार के बाद अगर विपक्ष एकजुट हो सकेगा तब उसे आगे सफलता मिल सकती है. अगर बिहार की तरह चुनाव में हार के बाद निष्क्रिय हो कर बैठ जाएगा तो उस का भला नहीं हो सकता. विपक्ष के लिए जरूरी है कि वह अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए सही तरह से चुनावी रणनीति तैयार करे. सो, ही वह लड़ाई में वापस आ पाएगा. जब राहुल गांधी और तेजस्वी यादव बिहार में वोट अधिकार रैली कर रहे थे, तब इस में ममता बनर्जी शामिल नहीं हुईं. इस के चलते ही जब पश्चिम बंगाल में एसआईआर हो रहा था तब भी विपक्षी दलों ने पूरी ताकत से इस मुद्दे पर उन का साथ नहीं दिया.

विपक्ष को यह मान लेना चाहिए कि भाजपा से मुकाबला केवल कांग्रेस कर सकती है. ऐसे में वह कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करे और कांग्रेस भी बड़ा दिल दिखाए. वह क्षेत्रीय दलों को खुलेदिल से अपनाए, तभी विपक्ष भाजपा का मुकाबला करने के लिए मजबूती से खड़ा हो पाएगा. विपक्षी दलों को वैसे ही एकजुट होना पड़ेगा जैसे कांग्रेस के खिलाफ 1975 में एकजुट हुआ था. यह काम आज के दौर में मुश्किल है, क्योंकि हर पार्टी के नेताओं ने भ्रष्टाचार किया है. उन की इस कमजोर नस को दबा कर केंद्र की भाजपा सरकार उन की एकजुटता को तोड़ सकती है.

’80 बनाम 20′ का मुद्दा विकास में बाधक है

’80 बनाम 20′ का मुद्दा भले ही भाजपा को चुनाव जीतने में मदद कर रहा हो, पर देश का विकास तभी होगा जब 100 फीसदी लोग आपस में मिलजुल कर आगे चलेंगे. ’80 बनाम 20′ का मुद्दा धार्मिक विभाजन की बात करता है. महाराष्ट्र में ‘बंटोगे तो कटोगे’ का नारा खूब चला था और भाजपा को इस का लाभ मिला. पश्चिम बंगाल में भी यह मुद्दा भाजपा की जीत का बड़ा कारण बना. भाजपा ने ममता बनर्जी को एंटी हिंदू साबित कर के जीत हासिल कर ली. यह देश के विकास में रोड़ा अटकाने वाला काम है.

धर्म पर राजनीति करने वाले दल धर्म के आसपास ही अपना विकास देखते हैं. यह बात केवल भारत की ही नहीं है, दुनिया के तमाम देश अब धर्म की राजनीति पर आगे बढ़ रहे हैं. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के पीछे धर्म की राजनीति का प्रभाव रहा है. नेपाल, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, श्रीलंका और भारत एक ही तरह के राजकाज से चल रहे हैं. दक्षिण एशिया के सभी देशों में धार्मिक कट्टरता और संकीर्णता एक नया खतरा बन कर मंडरा रही है.

नेपाल ने राजशाही को खत्म कर के अपने लिए एक लोकतांत्रिक व्यवस्था चुनी थी. अब फिर नेपाल को एक हिंदू राज्य में बदलने की कोशिश हो रही है. यही हाल बंगलादेश का हुआ है. श्रीलंका में लोकतंत्र खत्म हो गया है. भारत के आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदू समर्थक दलों के लोग भारत और नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं. श्रीलंका में अहिंसा में विश्वास रखने वाले बौद्ध धर्म के कई भिक्षुओं ने मुसलिमों के खिलाफ आंदोलन चला रखा है. मुसलिमों के धार्मिक स्थलों और उन की बस्तियों पर अकसर हमले किए जाते हैं. देश में मुसलिमों के खिलाफ नफरत में तेजी से वृद्धि हुई है.

म्यांमार में तो बौद्ध भिक्षु ही नहीं, वहां की सरकार भी रोहिंग्या मुसलिमों के खिलाफ है. सैकड़ों रोहिंग्या मुसलिम मारे जा चुके हैं और उन की कई बस्तियां जला कर खाक कर दी गई हैं. हजारों रोहिंग्या भाग कर दूसरे देशों में शरण ले रहे हैं. पाकिस्तान में कहने को बने हुए लोकतंत्र को सब से बड़ा खतरा ही वहां के धार्मिक कट्टरपंथियों से है. धार्मिक कट्टरपंथ का मुकाबला करने में वहां का लोकतंत्र फेल ही हो गया है. ईशनिंदा जैसे विषयों से जुड़े कानूनों ने धार्मिक चरमपंथ को बढ़ावा दिया है और अल्पसंख्यक पहले से अधिक असहाय व असुरक्षित हो गए हैं. धार्मिक कट्टरपंथी देश के लोकतांत्रिक संस्थानों पर भी असर डालने लगे हैं. राजनीतिक दलों में धार्मिक कट्टरता का मुकाबला करने का संकल्प खत्म हो गया है.

धार्मिक कट्टरपंथ भी एक तरह की राजनीतिक पार्टी है जो थोड़े से लोगों के बल पर राजनीति में अपना बड़ा हिस्सा हासिल करना चाहता है. ये कट्टरपंथी लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते. इन के लिए जनता के मौलिक अधिकारों का मतलब नहीं है. इन्हें सिर्फ पूजापाठ से मतलब है. दक्षिण एशियाई देशों में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और पिछड़ापन है. इस की सब से बड़ी वजह धार्मिक कट्टरवाद ही है. निर्माण और सुप्रबंध धर्म से नहीं होता, बुद्धि से होता है. देश का माहौल स्थायी, सुरक्षा, स्वतंत्रताओं का हो तो भविष्य के लिए काम करने की प्रेरणा जागती है. लोकतंत्र में सरकार का काम देश चलाने का होता है. मंदिर चलाना सरकार का काम नहीं होता. लोकतंत्र में सरकारें बदलती रहती हैं पर तंत्र स्थायी होता है, नीतियां धीरेधीरे बदलती हैं, रातोंरात नहीं.

भाजपा सरकार मंदिर चलाने में जुटी है. इस का सब से बड़ा कारण यह है कि मंदिर से पार्टी को पैसा और प्रचार दोनों मिलते हैं. सालभर देश में छोटेबड़े धार्मिक आयोजन होते रहते हैं, जो धर्म का प्रचार करते हैं. धर्म और राजनीति के बीच एक बहुत ही महीन रेखा खिंची है, जिस का भेद अब धीरेधीरे मिट गया है. अब विपक्षी दल भी धर्म की तरफ बढ़ने का प्रयास करते हैं पर वहीं उन के सामने ’80 बनाम 20′ का खतरा बढ़ जाता है. ममता बनर्जी ने एक और जगन्नाथ मंदिर दीघा में बनाया, इस के बाद भी उन की हार हो गई. राजनीति और धर्म के बीच रेखा के धुंधला होने से पक्ष और विपक्ष दोनों ही धार्मिक राजनीति की तरफ बढ़ रहे हैं जिस से देश का विकास प्रभावित हो रहा है. SIR Process

असम चुनाव में परिसीमन का असर

पश्चिम बंगाल में जहां एसआईआर के जरिए 27 लाख वोटरों को वोट देने नहीं दिया गया, वहीं असम में चुनाव आयोग के परिसीमन पर सवाल उठ रहे हैं. असम में हिंदुमुसलिम ध्रुवीकरण का लाभ भी मिला. हिंदुमुसलिम मुद्दा खूब चलाया गया और चुनाव आयोग तमाशा देखता रहा. अगर चुनाव आयोग इस तरह खामोश रहेगा तो संविधान की मंशा के अनुरूप चुनाव कैसे होंगे? 2023 में चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं के परिसीमन करने के बाद हुए असम के विधानसभा चुनाव में इस का प्रभाव देखने को मिला. मुसलिम बाहुल्य सीटों के वोट तितरबितर हो गए. परिसीमन के कारण मुसलिम बहुल वोट वाली सीटों की संख्या 35 से घट कर 22 रह गई, जिस से कांग्रेस और एआईयूडीएफ को बड़ा नुकसान हुआ. परिसीमन के बाद भी विधानसभा सीटों की संख्या 126 ही रही. आमतौर पर चुनावों में मुसलिम बहुल और हिंदू बहुल की गिनती होनी ही नहीं चाहिए पर जब एक दल ने धर्म को सफल चुनावी हथियार बना लिया तो परसीमन का सवाल बड़ा हो जाता है.

परिसीमन के जरिए प्रतिनिधित्व के समीकरण को बदल दिया गया, जिस से मुसलिम विधायकों की संख्या 25 से कम रही. बहुसंख्यक वर्ग के हिस्से में 90 सीटों के मुकाबले 103 सीटें आ गईं. नए परिसीमन में बंगाली मूल के मुसलिम वोटरों का दबदबा कम हो गया. नए परिसीमन में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 16 से बढ़ा कर 19 हो गई. अनुसूचित जाति की सीटें एक बढ़ कर 9 हो गईं. परिसीमन से निचले, मध्य और दक्षिणी असम के कांग्रेस के प्रभाव वाली सीटों को भी खत्म कर दिया गया.

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा शुरू से ही हिंदूमुसलिम करते रहे. भाजपा की अगुआई वाले एनडीए ने असम में 102 सीटों पर जीत हासिल की. इस में भाजपा को 82, असम गण परिषद और बीपीएफ को 10-10 सीटें मिलीं. कांग्रेस गठबंधन को 29 सीटें ही मिल सकीं. मुसलिम बहुल सीटों पर मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट दिया. इस वजह से विधायकों में हिंदूमुसलिम का फर्क साफ दिखने लगा है. विपक्ष की 29 सीटों में से 22 विधायक मुसलिम वर्ग से हैं. विपक्ष में हिंदू विधायकों की संख्या बेहद कम हो गई. ’80 बनाम 20′ की जो लड़ाई धर्म की राजनीति को बढ़ावा दे रही है वह असम के चुनाव परिणामों में साफतौर पर देखी जा सकती है.

तमिलनाडु में राष्ट्रीय दल फेल

तमिलनाडु में विधानसभा की 234 सीटें हैं. 2021 के विधानसभा चुनाव में द्रमुक को 159 सीटें मिली थीं और अन्नाद्रमुक को 75 सीटें ही मिली थीं. द्रमुक पार्टी के नेता एम के स्टालिन मुख्यमंत्री थे. 2026 के विधानसभा चुनाव में फिल्म स्टार विजय  की पार्टी टीवीके यानी तमिलगा वेट्री कषगम को 108 सीटों पर सफलता मिली. यह बात और है कि बडी जीत हासिल करने वाली टीवीके बहुमत के आंकड़े 118 से 10 सीटें पीछे रह गई.

तमिलनाडु में द्रविड़ इस चुनाव में टूट गया. युवाओं ने भारी संख्या में फिल्मस्टार से नेता बने चंद्रशेखर जोसेफ विजय को वोट दिया. तमिलनाडु में पहले भी फिल्मी कलाकारों एम जी रामचंद्रन और जे जयललिता ने राज किया है. विजय साउथ सिनेमा के एक और ऐसे सुपरस्टार हैं जिन के हाथों में तमिलनाडु  की कमान है.  एम के स्टालिन का चुनाव हारना बड़ा झटका माना जा रहा है. यहां भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल केवल तमाशा देखते रह गए.

केरलम में कांग्रेस को लगा मरहम

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरलम और पुडुचेरी 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में केरलम अकेला ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस को मरहम लगा. कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ गठबंधन ने केरलम में जीत हासिल की. भारतीय जनता पार्टी भी 3 सीटें जीतने में कामयाब रही. दक्षिण भारत में उस को सफलता मिलने लगी है. केरलम में विधानसभा की 140 सीटों में से यूडीएफ को 102 सीटें मिली हैं. इन में कांग्रेस ने 63 सीटें, आईयूएमएल ने 22 सीटें जीती. एलडीएफ 35 सीट ही जीत सकी.

केरल में मिली हार के बाद देश के किसी भी राज्य में अब वामदलों की सरकार नहीं बची है. भारत के पिछले 50 साल के इतिहास में पहली बार हुआ है. कांग्रेस के लिए सब से बड़ी चुनौती होगी कि वह किस तरह से सरकार चलाती है. कांग्रेस ने केरल में जीत हासिल की है और जिन सीटों पर उस ने चुनाव लड़ा, उन में सब से ज्यादा सीटें जीतने का रिकौर्ड बनाया है, जो राज्य के राजनीतिक इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था. कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए यह जीत नए रास्ते खोलने का काम कर सकती है. 5 राज्यों में केरलम ने ही कांग्रेस को ऊर्जा देने का काम किया है.

पुडुचेरी में एनडीए सरकार

केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा की 30 सीटें हैं. बहुमत के लिए 16 सीटों की जरूरत होती है. औल इंडिया एन आर कांग्रेस के नेतृत्व में बीजेपी के साथ वाले गठबंधन एनडीए को 18 सीटें मिलीं. कांग्रेस और दूसरे दलों को 6-6 सीटें मिल सकीं. मुख्यमंत्री एन रंगासामी असम के बाद दूसरे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अपनी कुरसी बचाने में सफलता हासिल कर ली. बाकी के 3 मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी, तमिलनाडु में एम के स्टालिन और केरल में पी विजयन अपनी मुख्यमंत्री की कुरसी नहीं बचा पाए.

पश्चिम बंगाल चुनाव को ले कर तरहतरह के जोक्स बन रहे हैं, एक नमूना –

एक समय ऐसा आ सकता है जब देश में सिर्फ एक ही पार्टी बची रह जाए. उस का कैडर पार्टी कार्यकर्ता नहीं, बल्कि चुनाव आयोग कहा जाएगा.  जो जनता के टैक्स के पैसों से चलेगा और जिस पर अमीर तथा ऊंची जातियों का प्रभाव होगा.

तब ईवीएम मशीनें भी छोटी हो जाएंगी.

उन में सिर्फ दो बटन होंगे:

‘चुना हुआ उम्मीदवार’

‘जेल’

वोट छीन कर लोकतंत्र की हत्या

कोलकाता में ममता बनर्जी से मुलाकात करने के बाद अखिलेश यादव ने कहा कि बीजेपी चुनाव आयोग से मिल कर वोट चोरी कर रही है. उत्तर प्रदेश की जनता जागरूक हो कर भाजपा का जवाब देगी. जब सुप्रीम कोर्ट की प्रोसीडिंग लाइव हो सकती है तो बंगाल में जनता की वोटिंग की सीसीटीवी क्यों नहीं हो सकती. इस से तो लोकतंत्र मजबूत होगा. बीजेपी के लोग सीसीटीवी से बहुत घबराते हैं. अगर इलैक्शन कमीशन निष्पक्ष है तो उत्तर प्रदेश की कुंदरकी विधानसभा सीट में जो वोट डाले गए हैं उस की सीसीटीवी फुटेज वह जनता को दिखा दे. भाजपा वोट छीन कर आम लोगों, खासकर पीडीए समाज, के लोगों के अधिकार छीनना चाहती है. बीजेपी के लोग लोकतंत्र की हत्या कर रहे हैं.

 

 

फिल्म स्टार विजय बने युवाओं की पसंद, स्टालिन को लगा बड़ा झटका

South India Politics: तमिलनाडु में विधानसभा की 234 सीटें हैं. 2021 के विधानसभा चुनाव में द्रमुक को 159 सीटें मिली थीं और अन्नाद्रमुक को 75 सीटें ही मिली थीं. द्रमुक पार्टी के नेता एम के स्टालिन मुख्यमंत्री थे. 2026 के विधानसभा चुनाव में फिल्म स्टार विजय की पार्टी टीवीके यानी तमिलगा वेट्री कषगम को 108 सीटों पर सफलता मिली. यह बात और है कि बडी जीत हासिल करने वाली टीवीके बहुमत के आंकड़े 118 से 10 सीटें पीछे रह गई.

तमिलनाडु में द्रविड़ इस चुनाव में टूट गया. युवाओं ने भारी संख्या में फिल्मस्टार से नेता बने चंद्रशेखर जोसेफ विजय को वोट दिया. तमिलनाडु में पहले भी फिल्मी कलाकारों एम जी रामचंद्रन और जे जयललिता ने राज किया है. विजय साउथ सिनेमा के एक और ऐसे सुपरस्टार हैं जिन के हाथों में तमिलनाडु  की कमान है.  एम के स्टालिन का चुनाव हारना बड़ा झटका माना जा रहा है. यहां भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल केवल तमाशा देखते रह गए.

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केरलम में कांग्रेस को लगा मरहम

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरलम और पुडुचेरी 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में केरलम अकेला ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस को मरहम लगा. कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ गठबंधन ने केरलम में जीत हासिल की. भारतीय जनता पार्टी भी 3 सीटें जीतने में कामयाब रही. दक्षिण भारत में उस को सफलता मिलने लगी है. केरलम में विधानसभा की 140 सीटों में से यूडीएफ को 102 सीटें मिली हैं. इन में कांग्रेस ने 63 सीटें, आईयूएमएल ने 22 सीटें जीती. एलडीएफ 35 सीट ही जीत सकी.

केरल में मिली हार के बाद देश के किसी भी राज्य में अब वामदलों की सरकार नहीं बची है. भारत के पिछले 50 साल के इतिहास में पहली बार हुआ है. कांग्रेस के लिए सब से बड़ी चुनौती होगी कि वह किस तरह से सरकार चलाती है. कांग्रेस ने केरल में जीत हासिल की है और जिन सीटों पर उस ने चुनाव लड़ा, उन में सब से ज्यादा सीटें जीतने का रिकौर्ड बनाया है, जो राज्य के राजनीतिक इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था. कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए यह जीत नए रास्ते खोलने का काम कर सकती है. 5 राज्यों में केरलम ने ही कांग्रेस को ऊर्जा देने का काम किया है.

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पुडुचेरी में एनडीए सरकार

केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा की 30 सीटें हैं. बहुमत के लिए 16 सीटों की जरूरत होती है. औल इंडिया एन आर कांग्रेस के नेतृत्व में बीजेपी के साथ वाले गठबंधन एनडीए को 18 सीटें मिलीं. कांग्रेस और दूसरे दलों को 6-6 सीटें मिल सकीं. मुख्यमंत्री एन रंगासामी असम के बाद दूसरे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अपनी कुरसी बचाने में सफलता हासिल कर ली. बाकी के 3 मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी, तमिलनाडु में एम के स्टालिन और केरल में पी विजयन अपनी मुख्यमंत्री की कुरसी नहीं बचा पाए. South India politics

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पश्चिम बंगाल चुनाव को ले कर तरहतरह के जोक्स बन रहे हैं, एक नमूना –

एक समय ऐसा आ सकता है जब देश में सिर्फ एक ही पार्टी बची रह जाए. उस का कैडर पार्टी कार्यकर्ता नहीं, बल्कि चुनाव आयोग कहा जाएगा.  जो जनता के टैक्स के पैसों से चलेगा और जिस पर अमीर तथा ऊंची जातियों का प्रभाव होगा.

तब ईवीएम मशीनें भी छोटी हो जाएंगी.

उन में सिर्फ दो बटन होंगे:

‘चुना हुआ उम्मीदवार’

‘जेल’

 

 

 

 

 

 

 

 

क्या `नार्सिसिज्म` के शिकार हुए राघव चड्डा

Political Defection: अब से कुछ ही साल पहले कांग्रेस और भाजपा के विकल्प के तौर पर उभरी आम आदमी पार्टी की एक बड़ी खूबी यह थी कि उस में गैरराजनीतिक लोगों की भरमार थी. इस से जुड़े युवाओं में अधिकतर मध्यवर्गीय थे जिन के दिलों में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा था. ये युवा अमीरीगरीबी, धर्म और जातपांत की मानसिकता से कोसों दूर थे. लेकिन चंद सालों में ही आप से जुड़े अधिकतर नेता अपने सिद्धांतों से भटक कर चमकदमक की गिरफ्त में आ गए. राघव चड्डा सहित 7 सांसदों का आप छोड़ कर भाजपा में शामिल होना इस का एक उदाहरण है.

भाजपा की एक बड़ी खूबी यह है कि वह कई मोरचों पर एकसाथ काम कर सकती है क्योंकि उस के कर्मठ कार्यकर्ता पौराणिक युग के कर्मकांडी, वर्णव्यवस्था वाला माहौल फिर से जमाने में कभी भी कहीं भी और हर जगह भी लगे रहते हैं. एक तरफ पश्चिम बंगाल में भाजपा ममता बनर्जी के किले को ध्वस्त करने लगी थी तो वहीं वह दिल्ली और पंजाब में नार्सिस्ट राघव चड्ढा को फोड़ कर आम आदमी पार्टी के चीथड़े करने में लगी हुई थी. उस समय अरविंद केजरीवाल जज के सामने खुद जिरह करने में व्यस्त थे.

नार्सिसस ग्रीक पौराणिक कथाओं का एक पात्र है जो बहुत सुंदर युवक था जैसा कि ज्यादा स्मार्ट और सुंदर लोगों के साथ अकसर होता है वही नार्सिसस के साथ हुआ. वह आत्ममुग्धता, स्वार्थ और अकड़ का शिकार हो गया जिसे अपने मुकाबले अपने वाले ही तुच्छ यानी घटिया, मामूली, बेकार और छोटे नजर आने लगे.

यही आम आदमी पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए खूबसूरत, महत्तवाकांक्षी और स्वार्थी सांसद राघव चड्डा के साथ हुआ जिसे आप में घुटन होने लगी थी, तमाम पार्टी भ्रष्ट और जहरीली नजर आने लगी थी. उसे लग रहा था कि आप में उस का कोई भविष्य नहीं है और अपनी काबिलीयत के मुताबिक वह कुछ ज्यादा डिजर्व करता है. सो, वह एक ऐसी पार्टी में चला गया जो पावर में है, साफ़सुथरी है, भ्रष्ट नहीं है, उस में जहरीले लोग नहीं हैं, वह पार्टी व्यक्तिवादी नहीं है और कुछ स्वार्थी लोगों के शिकंजे में नहीं है.

नार्सिसस शब्द या व्यवहार से पैदा हुए नार्सिसिज्म नाम के दिमागी नुक्स की सब से पहले मशहूर मनोवैज्ञानिक सिंगमड फ्रायड ने परिभाषा दी. इस के बाद वक्तवक्त पर कई मनोवैज्ञानिकों ने इस पर शोध किए लेकिन सभी इस बात पर सहमत थे कि कई लोगों में आत्ममुग्धता का रोग होता है और यह सामान्य अवस्था में कोई बहुत बड़ा खतरा नहीं . बाद में इस बीमारी की लपेट में आए लोगों को नार्सिसिटिक कहा जाने लगा.

नार्सिसिटिक आदमी हमेशा बेचैन और परेशान रहता है. उसे लगता रहता है कि वह सब से काबिल और खूबसूरत है. बाकी उस के आसपास के लोग भोंदू, निकम्मे, गंवार और नाकाबिल हैं जिन के साथ रहना अपनी जिंदगी बरबाद करना है. लिहाजा, ऐसे लोगों में रहा जाए जो उस की कद्र करें और महत्तवाकांक्षाएं पूरी कर पाएं. यानी, नार्सिसिटिक आदमी स्वार्थी और लालची भी हो जाता है जिसे स्वीकारने में उसे कोफ़्त होने लगती है. यही कोफ़्त कुंठा में तबदील हो जाती है जिसे मनोविज्ञान की भाषा में सुपीरियौरिटी कौम्पलैक्स कहा जाता है.

यही राघव चड्डा ने किया तो सियासी लिहाज और रिवाज के मुताबिक नया कुछ नहीं किया.  देश में दलबदल बहुत आम है और अकसर छोटेमोटेमझोले नेता सब से पहले उसी सीढ़ी को धक्का दे कर गिराते हैं जिस पर से हो कर वे छत पर पहुंचे होते हैं.

कहानी छत पर पहुंचने की

साल 2011-12  में समाजसेवी अन्ना हजारे के इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन ने देशभर के युवाओ को एकजुट करने में कामयाबी हासिल कर ली थी. अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से प्रभावित युवाओं को लगने लगा था कि अब शिक्षित युवाओं को अपना कैरियर और कामधंधा छोड़ कर कांग्रेस के खिलाफ राजनीति में आ जाना चाहिए, तभी देश सुधरेगा.

ऐसे ही हजारों नौजवानों में से एक थे गोरेचिट्टे राघव चड्डा जो दिल्ली के लगभग उच्चवर्गीय गैरराजनीतिक पंजाबी खत्री परिवार से थे. पेशे से चार्टर अकाउंटैंट राघव को आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने शुरू से ही मुंह लगाए रखा क्योंकि उन में वे खूबियां थीं जो मौजूदा दौर के युवाओं में होनी चाहिए. फर्राटे से इंग्लिश बोल लेना इन खूबियों में सब से अहम थी. यह वह दौर था जब मीडिया आप को हाथोंहाथ ले रहा था.

आप को भी वाकपटु नेताओं की जरूरत थी जो टीबी डिबेट्स में जा कर पार्टी का पक्ष मजबूती से रख सकें. यह काम चूंकि राघव चड्डा बखूबी कर रहे थे, इसलिए आम लोग उन्हें जाननेपहचानने भी लगे थे. 2012 में ही जब लोकपाल बिल का मसौदा तैयार हो रहा था तब केजरीवाल ने राघव को भी इस टीम में शामिल किया था. इस के बाद उन्हें आप का राष्ट्रीय प्रवक्ता भी बना दिया गया. साल 2015 में महज 26 साल के इस युवा को आप के कोषाध्यक्ष जैसे अहम पद से भी नवाजा गया.

इस दौरान आप में टूटफूट भी जम कर हुई. अन्ना के आंदोलन के दौरान कई नामी पत्रकार, साहित्यकार और बुद्धिजीवी आप से जुड़े थे. वे एकएक कर खिसक लिए, मसलन योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, शाजिया इल्मी, एंकर आशुतोष और कैप्टन जी आर गोपीनाथ वगैरह.

आप छोड़ कर जाने वालों में से कुछ तो वे थे जो भगवावादी सरकार को पिछले दरवाजे से लाने की जुगत में थे तो कुछ बेहद लोकतांत्रिक हार्डकोर थे. दूसरे वर्ग को लगता था कि भले ही आईआरएस हों, `अरविंद` उन के सामने कुछ नहीं जो देखते ही देखते दिल्ली का मुख्यमंत्री बन बैठा और वाकई में अपने वादों व इरादों के मुताबिक आम लोगों के भले के काम ईमानदारी से करने लगा. इन में शिक्षा और सेहत से जुड़े कामों की तो आज भी मिसाल दी जाती है कि जो काम दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने किए वे पहले कोई और नहीं कर पाया था. पहला वर्ग तो 2014 में भाजपा सरकार बनते ही आम आदमी आंदोलन से अलग हो गया जिन में किरण बेदी, अनुपम खेर, कुमार विश्वास थे.

तब तक राघव चड्डा की हैसियत दोयम दर्जे की थी. लेकिन केजरीवाल उन्हें बराबर भाव देते रहे. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें दक्षिणी दिल्ली से टिकट दिया गया जिस में वे भाजपा के रमेश बिधूडी के मुकाबले हार गए. 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्हें दिल्ली के राजिंदरनगर सीट से लड़ाया गया. आप की प्रचंड लहर की वजह से वे जीत गए. इस के बाद राघव को दिल्ली जल बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया.

साल 2022 राघव के लिए एक बड़ी सौगात ले कर आया जब अरविंद केजरीवाल ने उन्हें राज्यसभा भेजने का फैसला लिया. किसी भी 33 साल के युवा के लिए यह किसी सपने के पूरे होने जैसी बात थी. वे देश के सब से कम उम्र के राज्यसभा सांसद कहलाए. यह, दरअसल, इनाम था क्योंकि 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में सह प्रभारी के रूप में राघव ने काफी मेहनत की थी. आप तब 117 में से 92 सीटें जीत कर न केवल सत्ता पर काबिज हुई थी बल्कि देश की पहली ऐसी छोटी क्षेत्रीय पार्टी बन गई थी जिसे 2 राज्यों में बहुमत मिला हुआ था.

शायद यही वह मुकाम था जहां से राघव के अंदर का नार्सिसस सिर उठाने लगा था. पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता निभाने के लिए उन्होंने खासतौर से भाजपा पर हमले जारी रखे. ‘भाजपा अनपढ़ गुंडों की पार्टी है’ उन का यह बयान काफी सुर्ख़ियों में रहा था.

जैसे ही राज्यसभा में आप के नेता संजय सिंह की शराब घोटाले में गिरफ्तारी हुई तो यह पद उन्हें सौंप दिया गया. गुजरात विधानसभा चुनाव का प्रभारी बनाने सहित कई छोटीमोटी उपलब्धियां राघव के खाते में दर्ज हुईं. यह सिर्फ और सिर्फ अरविंद केजरीवाल की मेहरबानियां और भरोसा दोनों थे जिसे तोड़ने से पहले राघव ने कुछ नहीं सोचा, वे अपनी काल्पनिक उपलब्धियों में डूबतेइतराते रहे.

मुमकिन है अरविंद अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर उन्हें देखने लगे हों हालांकि सार्वजनिक तौर पर ऐसा कोई इशारा उन्होंने कभी नहीं किया. मुमकिन यह भी है कि राघव को ही ऐसा लगने लगा हो कि अब पार्टी में वही साफ़सुथरे और काबिल नेता बचे हैं जो कुछ कर गुजरने की कूवत रखता है. वरना तो अधिकतर अधेड़, फूहड़, बूढ़े हैं जो समय की खा रहे हैं और जिन पर आएदिन भाजपा और कांग्रेस भ्रष्टाचार के आरोप लगाती रहती हैं. हालांकि इस वक्त तक वे खुद 35-40 करोड़ के आसामी हो गए थे. इतना पैसा वे सीए रहते तो नहीं कमा सकते थे.

परिणीति से शादी ने दिलाई शोहरत

अब तक इस में भी कोई शक नहीं रह गया था कि राघव चड्डा युवाओं के एक बड़े वर्ग में लोकप्रिय हो चले थे. लेकिन अरविंद केजरीवाल की तरह रोलमौडल नहीं बन पाए थे. जेन जी स्वाभाविक तौर पर अपनी उम्रजनित उत्सुकता के चलते उन में दिलचस्पी लेने लगी थी और सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर उन्हें फौलो भी करने लगी थी. इस शोहरत को चारचांद लगाए अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा से उन की शादी ने जो काफी चर्चित रही थी.

यह शादी सितंबर 2023 में उदयपुर के महंगे होटल लीला पैलेस में हुई थी. मेहमानों को एक दूसरे महंगे होटल ताज लेक पैलेस में ठहराया गया था. इस होटल के सौ से भी ज्यादा कमरे दो दिनों के लिए बुक किए गए थे. इस राजसी टाइप की शादी में करोड़ों रुपए खर्च हुए थे जो आप की सादगी के सिद्धांत के चिथड़े उड़ाते हुए थे.

इस न्यू कपल के मेहमानों में खास थे अरविंद केजरीवाल, भगवंत मान, आदित्य ठाकरे, संजय सिंह, आतिशी और संजय सिंह सहित सौरभ भारद्वाज यानी आप की पूरी टीम ने शिरकत की थी. टैनिस स्टार सानिया मिर्जा भी इस शादी में परिणीति की सहेली होने के नाते शामिल हुईं थीं. पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह और मशहूर फैशन डिजायनर मनीष मल्होत्रा भी खास मेहमानों में शुमार थे. शादी कुछ विवादों से भी घिरी रही थी जिन के कोई खास माने नहीं लेकिन इतना तय है कि खर्च ने राघव को नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी के सादगी के दावे को जरूर कठघरे में खड़ा कर दिया था.

जिस तरह राघव चड्डा राजनीति में कोई बहुत बड़ा नाम नहीं है उसी तरह परिणीति भी बहुत बड़ी ऐक्ट्रेस नहीं हैं जिन के हिस्से में बी और सी ग्रेड की फ़िल्में ज्यादा आईं, मसलन ‘लेडीज वर्सेज रिकी बहल’, ‘इश्कजादे’, ‘हंसी तो फंसी’ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’. सिर्फ ‘गोलमाल अगेन’ इकलौती फिल्म थी जिस ने बौक्स औफिस पर कमाई की थी. बाकी दर्जनभर फिल्मों ने तो बौक्स औफिस पर पानी भी नहीं मांगा था.

शादी के बाद बदले

शादी के बाद पत्नी और गृहस्थी में तो राघव का मन लग गया और जल्द ही वे एक बेटे के पिता भी बन गये लेकिन राजनीति और आप में अपनी भूमिका को ले कर वे एक छटपटाहट   का शिकार होने लगे. दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार से पहले ईडी, सीबीआई जैसी एजेंसिया आप के पीछे लगा ही दी गई थीं. हार के बाद भाजपा के अरविंद केजरीवाल और दूसरे नेताओं पर ताबड़तोड़ हमले लगातार बढ़ते जा रहे थे. नेताओं को तरहतरह से परेशान कर जेल भेजा जा रहा था तब राघव की तटस्थता और ख़ामोशी को हर किसी ने नोटिस किया था. मार्च 2021 में जब शराब नीति घोटाले में अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार किया गया था तब आप के प्रमुख नेता आतिशी, सौरभ भारद्वाज, संदीप पाठक और गोपाल राय तो सड़कों पर विरोध करते दिखे थे लेकिन राघव के अतेपते नहीं थे.

असल नार्सिसस यहीं से शुरू हुआ लगता है कि तथाकथित रूप से काबिल होने के बाद भी उन्हें कामचलाऊ मुख्यमंत्री पद क्यों नहीं दिया गया और आतिशी को क्यों दिया गया. इस के बाद राघव पार्टी के अहम कार्यक्रमों से गैरहाजिर रह कर अपना विरोध जताने लगे. इस का दूसरा पहलू फंस जाने का डर भी था क्योंकि ईडी ने नोटिस  उन्हें भी दिया था.

लेकिन अब तक भाजपा राघव के डर, कमजोरी और महत्त्वाकांक्षाओं की रीडिंग ले चुकी थी, लिहाजा, उस ने उन पर डोरे डालना शुरू कर दिए. साम, दाम, दंड, भेद में माहिर भाजपा की ग्रिप में आने से राघव खुद को बचा नहीं पा रहे थे. जहां उन्हें सुरक्षा और इनाम दोनों मिलना तय दिख रहे थे ठीक वैसे ही जैसे वक्तवक्त पर कांग्रेस के दर्जनभर नेताओं को दिखने लगे थे. इन में ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम सब से उपर है जो 22 विधायकों सहित भाजपा में शामिल हो गए थे और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार गिर गई थी. जिस के एवज में सिंधिया इन दिनों केंद्रीय मंत्री हैं.

कल तक तेजतर्रार आवाज में बोलते रहने वाले राघव ने खासतौर से भाजपा के खिलाफ  राज्यसभा में भी बोलना बंद कर दिया तो अरविंद केजरीवाल का माथा ठनकना कुदरती बात थी. हालांकि गुपचुप पक रही खिचड़ी की गंध हर किसी को आई थी पर इसे गंभीरता से किसी ने नहीं लिया था. इस की 2 वजहें थीं. पहली तो यह कि राघव कोई बड़ा खतरा पार्टी के लिए नहीं थे, दूसरी वजह थी पार्टी का उन पर अटूट भरोसा.

लेकिन आप का भरोसा तोड़ने में राघव ने देर नहीं लगाई. हद उस वक्त हो गई जब उन्होंने दलबदल कानून से बचने यानी अपनी सांसदी सलामत रखने के लिए दूसरे सांसदों को पटाना व घेरना शुरू कर दिया. ये खबरें जैसे ही केजरीवाल तक पहुंचीं, उन्होंने बीती 2 अप्रैल को उन्हें राज्यसभा के उपनेता पद से हटा दिया.

यही राघव चाहते थे क्योंकि वे खुद पार्टी छोड़ने की हिम्मत तब नहीं जुटा पा रहे थे. अंदर का गिल्ट उन्हें रोक रहा था. आप और केजरीवाल के एहसान भी दबाब का काम कर रहे थे जिस से वे 24 अप्रैल को मुक्त हो कर भगवा खेमे में जा बैठे. पार्टी छोड़ने के लिए उन्होंने वही घिसेपिटे बहाने बनाए और गिनाए जिन का जिक्र ऊपर किया गया है. इस दिन उन्होंने खुद सहित सात सांसदों के आप छोड़ भाजपा जौइन करने की घोषणा की. बाकी 6 सांसद संदीप पाठक, अशोक मित्तल, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता और विक्रमजीत सहनी भी उन्हीं के जैसे महत्त्वाकांक्षी और कभी के लो प्रोफाइल नेता हैं. देशभर के लोगों ने इस टूटफूट को गौर से देखा और यह मान लिया कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह का जवाव नहीं जिन्होंने कोई दर्जनभर छोटी पार्टियां मिटा कर रख दी हैं.

युवाओं ने निकाली भड़ास

राघव का यह कदम आम आदमी से जुड़े युवाओं को रास नहीं आया और उन्होंने धड़ाधड़ सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स पर उन्हें अनफौलो करना शुरू कर दिया. 23 अप्रैल तक सोशल मीडिया पर उन के 1.46 करोड़ फौलोअर्स थे जिन में से कोई 11 लाख ने तो 24 घंटे के अंदर उन्हें अनफौलो कर दिया था. जेनजी ने उन्हें धिक्कारते और विश्वासघाती कहते अपनी फीलिंग्स शेयर कीं. 30 अप्रैल तक उन्हें नापसंद करने वालों की तादाद 30 लाख तक जा पहुंची. यह सिलसिला अभी भी जारी है. युवाओं ने उन्हें गद्दार, धोखेबाज और बिकाऊ कहते उन के वे वीडियो शेयर किए जिन में वे भाजपा को कोसते नजर आ रहे हैं. भाजपा में राघव चड्ढा के लिए कुछ ख़ास करने को नहीं होगा, यह पक्का है. अब उत्तर भारत में भाजपा दलबदलुओं को पनाह दे रही है, ओहदे नहीं.

भाजपा जौइन करते वक्त प्रैस कौन्फ्रैंस में राघव चड्डा ने वजह यह बताई थी कि आप अपने मूल आदर्शों, मूल्यों और नैतिकता से भटक गई है. बकौल राघव, ऐसे में उन के पास 3 विकल्प बचे थे, पहला यह कि वे राजनीति छोड़ दें, दूसरा यह कि पार्टी को सुधारें और तीसरा यह कि नया रास्ता चुन लें. तीसरा रास्ता चुन उन्होंने साबित कर दिया कि देश हिंदू राष्ट्र होना चाहिए जिस में वर्णव्यवस्था सब से उपर होती है.

हालिया विधानसभा चुनाव नतीजों ने यह साबित भी कर दिया क्योंकि असम में हिमंत बिस्वा सरमा कांग्रेस से और पश्चिम बंगाल में सुभेंदु अधिकारी टीएमसी से आयात किए गए थे. अब पंजाब के मद्देनजर राघव ले लिए गए जो इन दोनों राज्यों के नतीजे देख अपने फैसले की टाइमिंग पर खुश हो सकने का पूरा हक रखते हैं. पर लगता नहीं कि भाजपा उन्हें कोई बड़ा इनाम देगी. कोई छोटामोटा पद दे कर गाड़ीबंगला दे सकती है.

दरअसल, कास्ट और क्लास के कौम्पलैक्स से ग्रस्त इस युवा को आप के देशी लोग वैसे ही लगने लगे थे जैसे साफ़सुथरे शहरियों को देहाती लगते हैं, जैसे सवर्णों को दलित और जैसे पैसे वालों को गरीब लगते हैं. श्रेष्टता की इस ग्रन्थि से नार्सिसस भी ग्रस्त था जिस का अंत बेहद दुखद हुआ था. कहानी के मुताबिक, वह नदी के पानी में अपना प्रतिबिंब देखदेख कर मुग्ध होता रहता था और आखिर में कमजोर हो कर मर गया था.

श्रेष्ठता का भाव बहुत से देशों में है और कुछ इस भाव को ले कर सफल भी हुए हैं पर कुछ ने इस के बावजूद लोकतंत्र, नैतिकता, स्वतंत्रताओं और मौलिक अधिकारों को पूरी जगह दी. भारत से ये सब धीरेधीरे समाप्त हो रहे हैं. Political Defection

मैं चुप ही रहूंगा : आपसी कलह में पिसता गया सुधीर का परिवार

Hindi Stories: ‘‘मां, कल रश्मि का बर्थडे है. उसे रात को 12 बजे केक काटने का बहुत शौक है, इसलिए आज आप को थोड़ा ऐडजस्ट करना पड़ेगा. मैं औफिस से आता हुआ केक ले आऊंगा, आप उसे फ्रिज में छिपा देना. आज शायद आप को सोने में थोड़ी देर हो जाए. उसे रात को सरप्राइज देंगे,’’ पवन की आवाज में जो उत्साह था, वह एक पल में ही खत्म हो गया जब माया ने कहा, ‘‘यह 12 बजे केक काटने का नाटक मुझे बिलकुल पसंद नहीं है. दिन में भी तो बर्थडे मना सकते हो. यह सब नहीं चलेगा. बेवजह मेरी नींद खराब होगी.’’

वहीं बैठे हुए सुधीर ने कहा, ‘‘माया, बहू का पहला बर्थडे है हमारे साथ, बच्चों को अच्छी तरह से जन्मदिन मनाने दो. एक दिन थोड़ी देर से सोएंगे, तो क्या हो जाएगा.’’ माया दहाड़ी, ‘‘तुम तो चुप ही रहो. खुद तो सो जाओगे, मेरी नींद डिस्टर्ब होती है. नहीं, यह सब शुरू ही मत करो वरना हर साल यह ड्रामा होगा.’’ पवन को बहुत बुरा लगा. वह बोला, ‘‘ठीक है मां, फिर मैं शाम को ही रश्मि को बाहर ले जाता हूं. बाहर ही डिनर कर के वहीं केक भी काट लेंगे. आप सो जाना अपने टाइम पर.’’

माया को झटका लगा, बोली, ‘‘साल भी नहीं हुआ शादी हुए, इतने गुलाम बन गए हो.’’ पवन को गुस्सा आ गया, ‘‘आप क्या समझेंगी पतिपत्नी की आपसी समझ को?’’

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माया चिल्लाई, ‘‘क्यों नहीं समझूंगी, मैं क्या पत्नी नहीं हूं तुम्हारे पिता की, इतने सालों से मैं क्या झक मार रही हूं?’’

‘‘आप कैसी पत्नी हैं, आप अच्छी तरह जानती होंगी?’’

माया के गुस्से का ठिकाना नहीं था. पर बेटा कहीं हाथ से न निकल जाए, इस बात का ध्यान गुस्से में भी था. स्वर को संयत करते हुए बोली, ‘‘ठीक है, जैसी मरजी हो, कर लो, हम ने कभी घर में न यह सब नाटक किया, न देखा, इसलिए हमारे लिए थोड़ा नया ही है यह सब. खैर, ले आना केक.’’ सब डाइनिंग टेबल पर बैठे थे. रश्मि औफिस के लिए जल्दी निकलती थी. वह जा चुकी थी. सुधीर ने कहा, ‘‘पवन, रश्मि की पसंद का ‘ब्लू बेरी चीज’ केक लाओगे न? उसे यही फ्लेवर पसंद है.’’ पवन मुसकरा दिया, ‘‘वाह पापा, आप को याद है?’’

‘‘हां, मेरे बर्थडे पर वह यही लाई थी, तभी उस ने बताया था. बहुत प्यारी बच्ची है.’’

माया को बहू की तारीफ सुन कर गुस्सा आ गया, ‘‘तुम चुप नहीं रह सकते. चुपचाप नाश्ता करो. तुम से किसी ने उस की तारीफ का सर्टिफिकेट मांगा है क्या.’’ कर्कशा, मुंहफट पत्नी को देखते हुए सुधीर ने दुख से कहा, ‘‘चुप ही तो हूं सालों से.’’

‘‘पापा, अब मैं चलता हूं, बाय,’’ कह कर पवन भी औफिस के लिए निकल गया. सुधीर सब से बाद में निकलते थे. उन का औफिस घर के पास ही था. वे चुपचाप अपना बैग ले कर निकल रहे थे. माया का बड़बड़ाना उन के कानों में पड़ ही रहा था, ‘सालभर नहीं हुआ है घर में आए हुए, पता नहीं यह लड़की क्या जादू जानती है, पति को पहले दिन से ही गुलाम बना कर रखा है.’

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सुधीर चले गए, सामान इधर से उधर रखती हुई माया गुस्से में तपी घूम रही थी. इकलौता बेटा है पवन, उस से उलझना भी नहीं चाहती. कहीं बहू को ले कर अलग हो गया तो क्या करेगी. बेटे को भी दूर नहीं होने देना है, बहू को भी दबा कर रखना है. क्या करे, यह लड़की तो हाथ ही नहीं आती. सुबह ही निकल जाती है, शाम को लगभग सुधीर के साथ ही आती है. पवन भी तभी आ जाता है. घर में काम के लिए कोई क्लेश न हो, यह सोच कर बहूरानी ने पहले दिन से कुक रख ली है. दलील दी थी, ‘मां, औफिस के काम के चक्कर में किचन में आप का हाथ ज्यादा नहीं बंटा पाऊंगी तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा कि आप पर ही सब काम रहे. यह लता अच्छी कुक है. दोनों टाइम जो खाना बनवाना हो, इस से बनवा लेना. आप को भी आराम मिलेगा.’ सुधीर और पवन ने भी इस बात का समर्थन किया था. माया जब अकेली पड़ गई तो तीनों के सामने क्या कहती. बात माननी पड़ी. सफाईबरतन का काम राधा कर ही जाती थी. अब बचा क्या जिसे ले कर रश्मि की क्लास ले. मौका ही नहीं देती. मांमां करती घर में घुसती है, सुबह मांमां करती निकल जाती है.

आज सुधीर भी औफिस में माया के बारे में ही सोच रहे थे. इतने सुशिक्षित, सभ्य इंसान हो कर भी कैसी कर्कशा, क्लेशप्रिया पत्नी मिली है उन्हें. नारी के हृदय की कोमलता तो उसे छू कर भी नहीं गुजरी कभी. यह उन के पिता ने कैसी लड़की उन के पल्ले बांध दी जिस के साथ निभातेनिभाते वे थक गए हैं. वह तो अब उन के घर में रश्मि बहू बन कर ताजी हवा के झोंके की तरह आई है, तो घर, घर लगने लगा है. कितनी अच्छी बच्ची है. कितनी पढ़ीलिखी, कितनी शालीन पर माया के स्वभाव के कारण किसी दिन बेटेबहू दूर न हो जाएं, यह बात उन के मन को अकसर उदास कर देती थी.

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शाम को रश्मि औफिस से आई. पवन को आज आने में थोड़ा टाइम था. उसे रश्मि के बर्थडे के लिए केक और गिफ्ट लेना था. रश्मि ने पूछा, ‘‘पापा, डिनर लगा दूं?’’

‘‘पवन को आने दो.’’

‘‘उन्हें थोड़ी देर होगी, कहा है सब लोग खाना खा लेना.’’

सुधीर ने कहा, ‘‘ठीक है, फिर लगा दो.’’ रश्मि डिनर लगाने लगी, माया वहीं बैठी टैलीविजन देख रही थी. रश्मि ने खाना लगाते हुए कहा, ‘‘मां, आप ने फिर कोफ्ते बनवाए हैं? अभी तो बने थे.’’

‘‘हां, मुझे बहुत पसंद हैं, लता अच्छे बनाती है.’’

‘‘पर मां, पापा ने तो कल दाल और करेले बनवाने के लिए कहा था.’’

‘‘मेरा मन नहीं था वह सब खाने का.’’

‘‘ठीक है मां, पर कल जरा पापा की पसंद का खाना बनवा लेना.’’

सुधीर ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं बेटा, जो बना है ठीक है.’’

माया ने फटकार लगाई, ‘‘तुम चुप रहो. ज्यादा शरीफ बन कर दिखाने की जरूरत नहीं है.’’ सुधीर के चेहरे का रंग अपमान से काला पड़ गया. वे पत्नी का मुंह देखते रह गए. क्या यह औरत कभी नहीं सुधरेगी. वह उन की शराफत, शालीनता का सारी उम्र फायदा उठाती रही है. अब बेटेबहू के सामने भी क्या उन का अपमान करती रहेगी? क्या वही अच्छा रहता कि इस की बदतमीजी पर एक थप्पड़ शुरू में ही लगा देता? क्या ऐसी औरतें तभी ठीक रहती हैं. क्या उन का अपने क्रोध पर संयम रखना ही उन की कमजोरी बन गया है? घर में, बेटे के जीवन में सुखशांति के लिए हमेशा चुप रहना ही क्या उन की नियति है? रश्मि ने सुधीर का उदास चेहरा देखा तो सब समझ गई. उसे बहुत दुख हुआ. वह बहुत ही समझदार लड़की थी. कई बार उस ने पवन से अकेले में मजाक भी किया था, ‘पुरानी ब्लैक ऐंड व्हाइट फिल्में ज्यादा तो नहीं देखीं पर जितनी भी देखी और सुनी हैं, मां को देख कर ललिता पवार याद आ जाती है.’ पवन ने घूरने के बाद फिर स्वीकारा था, ‘हां, रश्मि, पापा जितने शांत हैं, मां उतना ही गुस्से वाली. बेचारे पापा, मैं ने उन्हें ही हमेशा सामंजस्य बिठाते देखा है.’

रश्मि ने खूब उत्साह से 12 बजे केक काटा. पवन उस के लिए एक सुंदर साड़ी भी लाया था. सुधीर ने भी एक लिफाफा रश्मि को देते हुए सिर पर प्यारभरा हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटा, हमारी तरफ से अपनी पसंद का कुछ ले लेना कल.’’ इस पर माया चौंकी, पर बोली कुछ नहीं. रश्मि बहुत खुश हुई. पवन ने कहा, ‘‘मां, कल हम दोनों ने छुट्टी ली है. कल सब मूवी देखने चलेंगे.’’ सुधीर को फिल्मों का बहुत शौक था, उत्साह से पूछा, ‘‘हांहां, बिलकुल, कौनसी?’’

रश्मि ने कहा, ‘‘जो आप कहें, पापा.’’

माया ने कहा, ‘‘मेरा मन नहीं है, मुझे नहीं जाना.’’

सुधीर ने कहा, ‘‘चलो न माया, बच्चों के साथ तो कभी गए ही नहीं अब तक.’’

‘‘नहीं, मेरा मूड नहीं है.’’

पवन ने कहा, ‘‘मां, मूवी देखेंगे, डिनर करेंगे, कल खूब एंजौय करेंगे सब.’’

रश्मि तो बहुत ही उत्साहित थी, बोली, ‘‘हां मां, बर्थडे है मेरा, खूब मजा आएगा, चलिए न.’’

‘‘नहीं, अब मुझे नींद आ रही है. पहले ही इतनी देर हो गई सोने में,’’ कह कर माया बैडरूम में चली गई तो सुधीर भी एक ठंडी सांस ले कर ‘गुडनाइट’ कह कर सोने चले गए. रश्मि ने बैडरूम में पवन से कहा, ‘‘पवन, बुरा मत मानना, मुझे मां की कई बातें पसंद नहीं हैं.’’

‘‘हां, रश्मि, मां शुरू से ही ऐसी हैं. मुझे भी बहुत दुख होता है.’’

‘‘पर मैं मां का यह व्यवहार ज्यादा सहन नहीं करूंगी, अभी बता देती हूं.’’ पवन चुप ही रहा, वह तो बचपन से ही मां का जिद्दी, गुस्सैल स्वभाव देखता आ रहा था. सुबह जब रश्मि सो कर उठी तो देखा सुधीर ड्राइंगरूम में रखे दीवान पर सो रहे थे. आहट से उठे तो रश्मि ने पूछा, ‘‘पापा, आप यहां क्यों सोए?’’

‘‘सोने में माया को देर हो गई तो वह मेरे करवट बदलने से डिस्टर्ब हो रही थी, उसे परेशानी हो रही थी.’’

‘‘पर इस गद्दे पर सोने से आप को गरदन में दर्द होता है न.’’

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‘‘हां, पर ठीक है, कोई बात नहीं.’’

‘‘कोई बात कैसे नहीं पापा, आप को तकलीफ होगी तो यह क्या अच्छी बात है?’’ सुधीर बिना कुछ बोले फ्रैश होने चले गए. सुधीर की इच्छा देखते हुए भी माया मूवी देखने नहीं गई. सुधीर ने ही पवन और रश्मि को भेजते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं, हम तुम्हें डिनर पर जौइन करेंगे, बता देना, कहां आना है.’’ डिनर पर माया आराम से तैयार हो कर गई. चारों ने अच्छे मूड में डिनर किया और लौट आए. आज रश्मि मन ही मन बहुत सारी बातें सोच चुकी थी. घर आते ही सुधीर का मोबाइल बजा. बात करने के बाद उन्होंने बताया, ‘‘माया, अगले महीने मुग्धा आ रही है, संजीव भी साथ आएगा.’’

माया गुर्राई, ‘‘क्यों?’’

‘‘अरे, उस के भाई का घर है, एक ही तो बहन है मेरी, उस का रश्मि से मिलने का मन है.’’

रश्मि खुश हुई, ‘‘वाह, बूआजी आ रही हैं. मजा आएगा. विवाह के समय भी वे मुझे बहुत अच्छी लगी थीं.’’

‘‘हां, बहुत खुशमिजाज है मेरी बहन.’’

‘‘तुम तो चुप ही रहो,’’ माया चिढ़ गई, ‘‘क्या मजा आएगा. गरमी में किसी के आने पर कितनी परेशानी होती है, तुम्हें क्या पता.’’ रश्मि आज चुप नहीं रह पाई, बोली, ‘‘मां, पापा ही हमेशा क्यों चुप रहें. उन की बहन है, अपनी बहन के आने पर वे खुश क्यों न हों?’’

माया ने रश्मि को डांट दिया, ‘‘मुझ से बहस करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हो रही है?’’

‘‘मां, बहस कहां कर रही हूं. जब से आई हूं यही तो देख रही हूं कि पापा कुछ बोल ही नहीं सकते.’’

माया के गुस्से की सीमा नहीं थी, ‘‘पवन, देख रहा है? इस की इतनी हिम्मत?’’

रश्मि ने बहुत मधुर स्वर में कहा, ‘‘मां, मुझे अच्छा नहीं लगता आप पापा को बोलने ही नहीं देतीं. मैं ने अपने घर में अपने मम्मीपापा का एकदूसरे के लिए बहुत ही प्यार और आदरभरा रिश्ता देखा है और वैसे ही पवन के साथ रहने की इच्छा है. यहां मुझे और कोई कमी नहीं है, बस, आप का पापा के साथ जो रवैया है, वह खटकता है. पापा का स्वभाव कितना अच्छा है.’’ पवन ने रश्मि के कंधे पर हाथ रख कर उसे शांत रहने का इशारा किया तो माया ने तेज आवाज में कहा, ‘‘सुन रहा है इस की बातें?’’

‘‘मां, रश्मि ठीक ही तो कह रही है. मैं और पापा सालों से आप का जिद्दी और गुस्सैल स्वभाव सहते आ रहे हैं पर अपने घर का अच्छा माहौल देख कर आने वाली लड़की को तो आप का स्वभाव अजीब ही लगेगा.’’ माया को तो आज झटके पर झटके लग रहे थे. उस ने सुधीर से कहा, ‘‘मेरी शक्ल क्या देख रहे हो, तुम कुछ बोलते क्यों नहीं?’’ सुधीर का चेहरा तो बच्चों की बातें सुन कर अलग ही खुशी से चमक रहा था. हंसते हुए बोले, ‘‘भई, मैं तो आज भी चुप ही रहूंगा.’’ पवन और रश्मि ने भी खुल कर उन की उन्मुक्त हंसी में उन का साथ दिया तो माया का चेहरा देखने लायक था. Hindi Stories

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