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Gen Z: असमाजिक नहीं तो सामाजिक भी नहीं है जेनजी का जीवन

Gen Z: हर रिश्ते को निभाना जरूरी न समझने वाली जेनजी पीढ़ी क्या हर रिश्ते को नफानुकसान के तराजू पर तोल कर अपना व्यवहार तय करती है . इस सवाल का जवाब ढूंढ पाना आसान नहीं है. 1997 और 2012 के बीच पैदा हुई इस अनूठी पीढ़ी पर भी उतने ही दबाव हैं जितने हर दौर की युवा पीढ़ी पर होते थे . लेकिन वे पीढ़ियां तालमेल बैठाने में माहिर होती थीं, वजह, वे औफलाइन जनरेशन थीं और यह औनलाइन जनरेशन है. यह औनलाइन जनरेशन भीड़ से कतराती है और कभी भीड़ में पड़ भी जाए तो वहां भी एकांत ढूंढ़ ही लेती है.

लेकिन भीड़ से अलग रहते भी भीड़ का ध्यान यह अपनी तरफ खींच ही लेती है. इस के लिए इसे अलग से कोई कोशिश नहीं करनी पड़ती, वजह, यह नाजुक पीढ़ी सुंदर है, आकर्षक है, स्मार्ट है और सभ्य व शिष्ट भी है. पहले की पीढ़ियों की तरह जेनजी पर भी कई दबाव हैं जिन्हें मैनेज करने में वह गच्चा खा रही है जिस की इकलौती वजह यह है कि इस को पढ़ने में जितना कष्ट होता है उतनी ही सहूलियत देखने में होती है.

एक स्मार्टफोन ही इस पीढ़ी की किताब है, टीचर है, पेरैंट है जिस में छपा हुआ या देखा हुआ तात्कालिक असर छोड़ कर बेताल की तरह इस की पीठ छोड़ कर अपने पेड़ पर जा कर टंग जाता है जबकि कागज पर छपा हुआ हमेशा के लिए दिमाग को ही अपना अड्डा बना लेता है. उस में जानकारियों के साथसाथ अकाट्य तर्क भी होते हैं, इसलिए ये पुरानी पीढ़ी से कतराते हुए कहीं दूर खड़े हो जाते हैं. यह नजारा शादीब्याह की पार्टियों में आम है. खुद को हर विषय का जानकार समझने वाली यह जनरेशन जब पिछली पीढ़ियों के साथ खड़ी होती है तो बातचीत में जल्द ही दाएंबाएं झांकने लगती है.

अपनी ही अपेक्षाओं का दबाव

बिलाशक जेनजी की परवरिश बेहतर सुविधाओं और साधनों में हुई है. पिछली पीढ़ियों के मुकाबले इसे बित्ता भर भी स्ट्रगल नहीं करना पड़ा है. छोटीमोटी बातों को ही लें तो इसे कभी राशन की लाइन में नहीं लगना पड़ा, बाजार से ग्रौसरी का सामन नहीं लाना पड़ा, बिजली या नल का बिल भरने के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ा. और तो और, सिनेमा के टिकट की लाइन की धक्कामुक्की का लुत्फ भी इस के हिस्से में नहीं आया. सबकुछ स्मार्टफोन की एक क्लिक पर मिल जाता है. लेकिन इस की कितनी कीमत पेरैंट्स को चुकानी पड़ती है और उस से भी ज्यादा खुद यह चुका रही है, इस का एहसास इस जनरेशन को नहीं.

हां, भविष्य और कैरियर को ले कर सब से ज्यादा दबाव में यही जनरेशन है जिसे नहीं मालूम कि उसे क्या चुनना और क्या बनना है. यह पीढ़ी बहुत से विकल्प अपने पास रखती है मगर एकएक कर वे उस के हाथ से फिसलते जाते हैं. आखिर में जो एक बचता है वह सब से छोटा और सस्ता होता है. आईएएस से ले कर सेल्समैन या सेल्स गर्ल तक के सफर में इन की उम्मीदें एकएक कर टूटती हैं जो इन्हें तोड़ भी जाती हैं.

विकल्प बदलना इस के लिए खेल जैसा है. सिविल सर्विसेज के बाद आईआईटियन बनने का ख्वाब भी पूरा नहीं होता तो यह जनरेशन एकदम से बिजनैस मेनेजमैंट की तरफ मुड़ जाती है. और वहां भी असहजता महसूसती है तो अपना खुद का छोटामोटा बिजनैस शुरू कर देती है. यहीं से टूटता है खुद के अलग और सुपीरियर होने का भ्रम क्योंकि लोगों से घुलनेमिलने के वक्त में यह पीढ़ी अलग खड़ी थी. अब बिना उन के न तो कारोबार करना आसान रह जाता और न ही अपनी जगह व पहचान बना पाना आसान होता. अब उसे आभासी काल्पनिक और वास्तविक दुनिया में फर्क समझ आता है लेकिन देर तो तब तक हो ही चुकी होती है.

धुंधलाते रिश्ते

जेनजी के लिए इकलौता और अहम रिश्ता सिर्फ पेरैंट्स होते हैं शायद इसलिए भी कि वे ही फायनैंसर होते हैं. बाकी सब रिश्तेनाते इन के लिए सैकंडरी होते हैं. इन की नजर से देखें तो इन बेमतलब के रिश्तों को ढोने से कोई फायदा नहीं. हाल तो यह है कि आजकल कभीकभार ही घर आए मेहमानों को भी ये झेल नहीं पाते. सब से ज्यादा तनाव इन्हें इस बात का रहता है कि कहीं किसी गेस्ट के साथ रूम शेयर न करना पड़ जाए. इस के बाद इस बात पर झल्लाहट कि आने वाला ज्यादा सवालजवाब न करे. यहां तक कि यह भी न पूछे कि क्या पढ़ रहे हो और आगे के लिए क्या प्लान है.

चाचा, ताऊ, मौसा, मामा तो दूर की बात हैं, ये अपने ही हमउम्र कजन्स से भी ज्यादा घुलनेमिलने से कतराते हैं. इन्हें लगता है कि औपचारिक सम्मान या बातचीत भी क्यों की जाए, इस से हासिल क्या होगा. ये रिश्ते तो दिखावा हैं, स्वार्थ हैं और कुछ तो बहुत टौक्सिक हैं. जो मेहमान लाज छोड़ कर घर आ कर रुका है वह कोई रिश्ता नहीं निभा रहा बल्कि अपने पैसे बचा रहा है. इसी मानसिकता के चलते ये भी किसी और के यहां न ठहर कर लाज वगैरह ही प्रैफर करते हैं. जिस का प्राइवेसी के बाद दूसरा मतलब या फायदा यह है कि किसी का सामना करने से बच गए. बिलाशक यह एक कुंठित सोच है लेकिन है, तो है.

कमजोर दोस्ती

जेनजी की दोस्ती बहुत ज्यादा पुख्ता नहीं होती, क्यों नहीं होती, इस बारे में भोपाल के एक युवा नक्षत्र का कहना है कि 15 फीसदी ही लगन से पढ़ाई करते हैं, बाकी 85 फीसदी क्लबों, चौराहों और होटलों में धींगडमस्ती करते नजर आते हैं. इन दोनों ही तरह के युवाओं को दोस्तों की जरूरत सिर्फ टाइमपास करने के लिए होती है. यह पहले की तरह जज्बाती और पारिवारिक रिश्ता नहीं रह गया है. प्रैक्टिकल और प्रोफैशनल हो गया है.

दोस्ती अब एक तरह का कौन्ट्रैक्ट हो गई है जिसे कभी भी कोई तोड़ सकता है. वह दिल से नहीं, दिमाग से निभाई जाती है. इसलिए कमजोर भी पड़ रही है. हम में से किसी के भी बहुत सारे दोस्त नहीं हैं, दोचार ही हैं और उन के बारे में भी पेरैंट्स बहुत ज्यादा जानते हों, यह जरूरी नहीं. हमारी जनरेशन खुद की तरह दोस्तों और दोस्ती को भी छिपा कर रखना चाहती है.

22 वर्षीया रिया कहती है, दोस्ती के माने तेजी से बदल रहे हैं और वैसे तो कतई नहीं रह गए हैं और न आगे रहने वाले जैसे पेरैंट्स के हैं कि सालोंसाल पुराने दोस्त और सहेलियां अभी भी मिलने आ जाते हैं या ये खुद जा कर मिल आते हैं. इन की बातों को सुन लगता है कि इन की जिंदगी सालों पहले कहीं ठहरी हुई है और वही इन का सुख है. ये ठहरे हुए पानी की तरह हैं जबकि हम बहते हुए पानी के मानिंद हैं.

झट अफेयर पट ब्रेकअप

समाज रिश्तों और दोस्ती की तरह ही जेनजी का प्यार है यानी बिलकुल टिकाऊ नहीं है. उस में कमिटमैंट नहीं है. कसमेवादे नहीं हैं. है अगर तो बस सैक्स जिस में कोई हिचक दोनों पक्षों को नहीं होती. इस जनरेशन के लिए शायद प्यार का मतलब ही स्वीकृत और सहमत तरीके से शरीरसुख का स्वाद चख लेना होता है जो हर्ज की बात है या नहीं, यह तय कर पाना आसान नहीं. वह दौर गया जब एक से ही प्यार करने में लोग अधेड़ हो जाते थे लेकिन अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाते थे, फिर सैक्सवैक्स तो बाद की बात है.

इस जनरेशन ने प्यार के किस्सेकहानी नहीं पढ़े. अगर ये चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उस ने कहा था’ पढ़ लें तो तय है उस का नायक लहना सिंह इन्हें दब्बू और बेवकूफ ही लगेगा. अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी कौन हैं और उन का प्यार कैसा था, यह भी इन्हें नहीं मालूम क्योंकि न तो ये साहिर को जानते और न ही अमृता को. इन सब से दूर जेनजी की प्यार की अपनी परिभाषा है कि जब तक पटरी बैठे तब तक ठीक वरना ब्रेकअप लो और दूसरा ढूंढ़ लो. किसी की याद में न तो किलपना है, न ही आहें भरना है. प्यार से इन का मतलब है मौजमस्ती, खानापीना और सैरसपाटा. बिरले ही गंभीर इस जनरेशन के प्यार करने वाले मिलेंगे. हर्ज है

यह ठीक है कि कई जगह जेनजी ठीक भी है लेकिन हर जगह नहीं. वह डिप्रैस भी है क्योंकि इस ने जिंदगी सहित हर चीज के अपने पैमाने और माने तय कर रखे हैं. जेनजी वाले स्मार्टफोन के सिवा किसी और की सुनने को तैयार ही नहीं. इसलिए, इन के लिए कुछ किया भी नहीं जा सकता. यह पहली पीढ़ी है जो खासतौर से साहित्यिक पढ़ाईलिखाई से कोसों दूर है. इसलिए, यह अकसर खोखले तर्क करती है. महत्त्वाकांक्षी यह पीढ़ी होती तो हर्ज की कोई बात न होती लेकिन यह जिद्दी पीढ़ी है जो न तो बड़ों के अनुभवों से कुछ सीखना चाहती और न ही पत्रपत्रिकाओं व किताबों से ज्ञान हासिल करना चाहती.

जिस जनरेशन ने स्मार्टफोन को ही सबकुछ मान लिया हो वह परेशान तो रहेगी. लेकिन समाज में बने रहने लायक सर्वाइव इसलिए कर जाएगी कि पेरैंट्स उस के लिए वह सबकुछ कर रहे हैं जो 25 की उम्र के बाद खुद इसे हासिल करना चाहिए था. Gen Z

Gen Z youth: कार, कपड़े, कंप्यूटर, क्रैडिट कार्ड पर पैसा फूंक रहे जेनजी युवा 

Gen Z youth: दिल्ली के द्वारका इलाके में एक अमीर आदमी के 17 साल के बेटे ने अपनी तेज रफ्तार एसयूवी कार से 23 वर्षीय साहिल धनेश्रा को ऐसी जोरदार टक्कर मारी कि वह अपनी बाइक से उछल कर कई फुट ऊपर उछल गया और नीचे गिरते ही मौके पर उस की मौत हो गई. यह घटना 3 फरवरी, 2026 की है. साहिल बीबीए के अंतिम सैमेस्टर में था और उस की आंखों में विदेश में पढ़ाई करने का सपना था. अपनी मां का अकेला बेटा था वह. उस की मां की चीखें और रुदन कई दिनों तक सोशल मीडिया पर दिखाई दिए.

घटना के बाद उस नाबालिग लड़के को पुलिस ने अरैस्ट किया मगर 10वीं की परीक्षा के मद्देनजर कोर्ट ने उसे जमानत दे दी. उस पर केस चलेगा और सजा भी जरूर मिलेगी. इस नाबालिग के पिता इस बात का अफसोस कर रहे हैं कि बेटे की जिद्द पर उन्होंने उस के हाथ में नई एसयूवी गाड़ी दे दी.

आईफोन का भूत भी आज के युवाओं के सिर पर इस कदर सवार है कि उस के लिए वे कुछ भी करने को तैयार हैं. नागपुर में एक 28 साल के लड़के ने मोबाइल फोन के लिए अपनी मां की हत्या कर दी. आरोपी का नाम रामनाथ बडवाइक है. मां व बेटे के बीच मोबाइल फोन को ले कर झगड़ा हुआ, जिस के बाद बेटे ने संत गजानन महाराज नगर स्थित अपने आवास पर अपनी मां कमला की रूमाल से गला घोंट कर हत्या कर दी. बाद में रामनाथ ने इसे प्राकृतिक मौत बता कर उस का अंतिम संस्कार करने की कोशिश की, लेकिन उस के छोटे भाई दीपक ने पुलिस के सामने उस की पोल खोल दी.

शिवांश शर्मा अपने 25 साल के बेटे रूपेंद्र की मांगों से त्रस्त हैं. 2 साल में 3 नौकरियां बदल चुके रूपेंद्र ने पहले तो बाप की भविष्य निधि का पैसा गुड़गांव में अपने लिए नया फ्लैट खरीदने में लगा दिया. उस के बाद मां पर दबाव बना कर उन की सोने की चूड़ियां बिकवा कर अपने लिए महंगा आईफोन खरीद लिया और अब वह उन्हें नई कार दिलाने के लिए परेशान कर रहा है क्योंकि उस की कंपनी में ज्यादातर कलीग अपनी महंगी गाड़ियों से औफिस आते हैं. रूपेंद्र गुड़गांव की जिस कंपनी में कार्यरत है वह बच्चों के लिए औनलाइन गेम और कार्टून कार्यक्रम बनाती है. इस से पहले वह 2 अन्य कंपनियों में काम कर चुका है. पिछली कंपनी में उस ने मात्र 3 महीने ही काम किया, मगर जब सैलरी में 5000 रुपए अधिक का औफर दूसरी कंपनी से मिला तो उस ने तुरंत वहां जौइन कर लिया.

शिवांश शर्मा कहते हैं- ”मैं 20 साल की उम्र में सरकारी पोस्ट औफिस में क्लर्क की नौकरी पर लगा था. 40 साल एक ही दफ्तर में नौकरी की. 3 बार प्रमोशन हुआ. सैलरी बढ़ती गई. काम का अनुभव हासिल हुआ. सैलरी से हर महीने प्रोविडैंट फंड कटता था. आज मुझे पैंशन मिलती है. एक ही दफ्तर में लंबे समय तक रहा तो कलीग्स से गहरे दोस्ताना संबंध बने. आज वही दुखतकलीफ और जरूरत के समय में हमारे साथ होते हैं, एक फोन पर दौड़े चले आते हैं, जबकि अधिकांश बार बेटा नहीं आ पाता है.”

शिवांश शर्मा को दुख इस बात का है कि काम का जो अनुभव उन्होंने पाया और जो आर्थिक मजबूती उन्होंने हासिल की, वह उन के परिवार के बच्चे नहीं कर पा रहे हैं. चाहे उन का अपना बेटा शिवांश हो या बहन और भाई के बच्चे. सब का एक जैसा हाल है. वे शिकायत करते हैं- ”धैर्य रख कर नौकरी करना इस जनेरशन के स्वभाव में ही नहीं है. जल्दी से जल्दी ज्यादा पैसा कमा लेने की चाह और उस पैसे को उलटीसीधी चीजों पर उड़ा देना, बस, यही कर रहे हैं वे. मेरी पूरी भविष्य निधि, जो हमारे बुढ़ापे में काम आनी थी, को मेरे बेटे ने गुड़गांव में फ्लैट खरीदने में लगा दी. यहां जबलपुर में हमारा अपना मकान है. यह तो अच्छा है कि मुझे पैंशन मिलती है तो दोवक्त खाना मिल रहा है, वरना बेटे ने तो बुढ़ापे में हमें भूखा मारने की पूरी तैयारी कर दी थी.

नई से नई कारों की चमक, ब्रैंडेड कपड़ों का आकर्षण, महंगे गैजेट्स की होड़ और क्रैडिट कार्ड की आसान उपलब्धता मिल कर एक ऐसी जीवनशैली गढ़ रहे हैं, जो बाहर से जितनी आकर्षक दिखती है, भीतर से उतनी ही अस्थिर और खोखली है. भविष्य की अनिश्चितताओं, जिम्मेदारियों और आर्थिक सुरक्षा जैसे विषय जेनजी की सोच में नहीं हैं. दिखावे और उपभोग की अंधी दौड़ में बचत की पारंपरिक सोच लगभग लुप्त हो चुकी है. पहले जहां परिवारों में ‘बुरे वक्त के लिए बचत’ एक संस्कार की तरह सिखाई जाती थी, वहीं आज ‘अभी जी लो’ का मंत्र अधिक प्रभावी हो गया है. नतीजा, युवा अपनी आय से अधिक खर्च कर रहे हैं.

अनुराधा नागर सिंगल मदर हैं. जब उन की बेटी श्वेता महज दो साल की थी, पति का देहांत हो गया. ससुराल वालों ने अनुराधा का साथ नहीं दिया तो वे बेटी को ले कर किराए के मकान में रहने लगीं. अनुराधा के पति कानपुर डैवलपमैंट अथौरिटी में कार्यरत थे. उन की जगह अनुराधा को नौकरी मिल गई. अनुराधा ने अपनी तनख्वाह से बचत कर हर साल पोस्ट औफिस से किसान विकास पत्र खरीदे और हर साल कुछ अमाउंट एफडी के तौर पर सेव करती रहीं. पिछले साल उन्होंने अपनी बेटी श्वेता की शादी बचत के उन्हीं पैसों से की है. अनुराधा भी मानती हैं कि जिस तरह पैसापैसा जोड़ कर उन की पीढ़ी के लोगों ने अपने बच्चों को पढ़ाया, अपना मकान बनाया, बच्चों की शादियां कीं, वैसी बचत कर पाना आज की जेनेरशन के बस की बात ही नहीं है.

क्रैडिट कार्ड और ‘बाय नाउ, पे लेटर’ जैसी सुविधाओं ने जेनजी के बेतहाशा खर्च की प्रवृत्ति को और भी बढ़ावा दिया है. क्रैडिट कार्ड के कारण खर्च करना आसान हो गया है, लेकिन चुकाना उतना ही कठिन है. लिहाजा, कई मामलों में तो आज के युवा अपने मातापिता की वर्षों की जमापूंजी को भी दांव पर लगा देते हैं. सोशल मीडिया पर दिखने वाली ‘परफैक्ट लाइफ’ ने युवाओं के भीतर एक अदृश्य प्रतिस्पर्धा पैदा कर दी है. हर कोई दूसरों से बेहतर दिखना चाहता है, चाहे वह असलियत में संभव हो या न. दिखावे की इस संस्कृति में संतोष, धैर्य और दीर्घकालिक सोच जैसी चीजें धीरेधीरे कमजोर पड़ती जा रही हैं. इस के पीछे गहरे सामाजिकआर्थिक बदलाव और बाजारवाद काम कर रहा है.

बाजार ने युवाओं की इच्छाओं को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है. विज्ञापन भावनाओं को लक्ष्य बनाते हैं. ब्रैंड ‘जरूरत को ‘ख्वाहिश’ में बदल देते हैं और फिर हर चीज को जरूरी बना दिया जाता है. इस उपभोक्तावादी संस्कृति में फंस कर युवा अपनी वास्तविक जरूरत और कृत्रिम चाहत के बीच फर्क नहीं कर पा रहे. कोरोना जैसी महामारी और उस के बाद युवाओं में बढ़ते हार्ट अटैक के अनुभवों ने भी भविष्य की अनिश्चितता को गहरा किया है. आज का नौजवान जल्दीजल्दी ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने और उड़ाने में विश्वास करने लगा है. वह कहता है- कल किस ने देखा है. आज जी लो जीभर के.

अधिकांश युवा तो शादी करने और परिवार की जिम्मेदारी उठाने की सोच से ही घबराते हैं. महानगरों में ऐसे लोगों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है, जो अकेले रहने या लिवइन में रहने को प्रैफर कर रहे हैं. चाहे लड़का हो या लड़की, शादी की इच्छा घटती जा रही है. हालांकि, सैक्स और रोमांस से इन्हें कोई परहेज नहीं है. इस के लिए इन्हें लग्जरी आइटम्स जैसे लेटेस्ट मौडल की कार, लेटेस्ट आईफोन, ब्रैंडेड कपड़े, महंगा लैपटौप, बढ़िया सनग्लासेस, परफ्यूम, बैग पर वे खूब पैसा फूंक रहे हैं. एक पार्टी में जो ड्रैस वे पहन कर गए उसे आगे की किसी पार्टी में वे नहीं पहनते. यानी, हर पार्टी के लिए अलग ड्रैस उन्हें चाहिए. खासतौर पर लड़कियों को, उस के साथ नया फुटवियर, नई ज्वैलरी और नया पर्स भी. ये सब बाजारवाद के कारण है. इसे ही कहते हैं दिखावा संस्कृति, जो युवाओं की जेब में पैसा टिकने नहीं दे रही.

सोशल मीडिया की दुनिया- इंस्टाग्राम, यूट्यूब और रील्स ने जीवन को एक प्रदर्शन बना दिया है. किस के पास कौन सा फ़ोन है, कौन सी कार है, कौन से ब्रैंड के कपड़े हैं, ये सब अब सिर्फ निजी पसंद नहीं, बल्कि ‘स्टेटस’ का हिस्सा भी बन गए हैं. युवाओं के सामने हर दिन एक ऐसी दुनिया पेश होती है जहां हर कोई परफैक्ट लाइफ’ जीता दिखता है. इस आभासी प्रतिस्पर्धा ने खर्च करने की प्रवृत्ति को बढ़ा दिया है. क्रैडिट कार्ड और आसान ईएमआई योजनाओं ने खर्च करना बेहद आसान बना दिया है. पहले जहां कोई चीज खरीदने से पहले कई बार सोचना पड़ता था, आज ‘अभी लो, बाद में चुकाओ’ का विकल्प हर जगह मौजूद है. नतीजा यह है कि युवा आय से ज्यादा खर्च कर रहे हैं. इस से कर्ज का बोझ बढ़ता है. कई युवा बिना पूरी समझ के क्रैडिट का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो आगे चल कर आर्थिक संकट में बदल सकता है.

एक और चिंताजनक पहलू यह है कि कुछ युवा अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए मातापिता की बचत पर भी निर्भर हो रहे हैं. यह प्रवृत्ति दो कारणों से खतरनाक है. पहला- यह जेनजी की आत्मनिर्भरता को कमजोर करती है और दूसरा, यह बुजुर्गों की आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालती है. परिवार की आर्थिक संरचना पर इस का दीर्घकालिक असर पड़ सकता है. हालांकि, दोष सभी युवाओं को देना ठीक नहीं है. सभी युवा ऐसा नहीं कर रहे. उच्च शिक्षा पाने और अच्छी नौकरी करने की ख्वाहिशें भी युवाओं में काफी बलवती हैं. यही वजह है कि जहां भी पैसे का अच्छा औफर मिलता है, वे तुरंत स्विच कर जाते हैं. मगर बाजारवाद की संस्कृति में बहक जाने से उन का बैंकबैलेंस गड़बड़ाता है. इस के लिए जागरूकता होनी अब जरूरी है.

जेनजी वाले पूरी तरह गैरजिम्मेदार नहीं हैं. वे नई अर्थव्यवस्था के उत्पाद हैं. हां, उन की प्राथमिकताएं पिछली पीढ़ियों से अलग हैं और वे लाइफस्टाइल को संपत्ति यानी घर, जमीन से ज्यादा महत्त्व देते हैं. इस के अलावा, कई युवा निवेश, स्टार्टअप और डिजिटल कमाई के नए रास्तों को भी अपना रहे हैं. इन में वे अच्छा पैसा भी कमा रहे हैं. लेकिन उन को खर्च और बचत के बीच संतुलन बनाना सीखना होगा. उन को क्रैडिट का समझदारी से उपयोग करना और दिखावे के बजाय वास्तविक जरूरतों को प्राथमिकता देना सीखना होगा.

जेनजी का जीवनदर्शन निश्चित तौर पर पिछली 2 पीढ़ियों से अलग है. नौकरी की अनिश्चितता, तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था और महामारी जैसे अनुभवों ने भविष्य की अनिश्चितता को और गहरा किया है. ऐसे में युवाओं को लगता है कि भविष्य का भरोसा नहीं, इसलिए वर्तमान को पूरी तरह जी लेना बेहतर है. जरूरत इस बात की है कि युवा अपनी स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जोड़ें क्योंकि वर्तमान को जीना जरूरी है, लेकिन भविष्य को सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है. Gen Z youth

Social Media Impact: स्मार्ट फोन – युवाओं के हाथ में हैंडग्रेनेड

Social Media Impact: औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा जारी की गई वर्ल्ड हैप्पीनेस 2026 की रिपोर्ट में भारत की स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है, जो पिछले साल की 118वीं रैंकिंग से 116 पर आ गया है.147 देशों की इस लिस्ट में फिनलैंड लगातार 9 साल से टौप पर बना हुआ है . इस रिपोर्ट की एक खास बात युवाओं और उनमें भी खासतौर से किशोरियों के मद्देनजर खुशहाली को इंटरनैट से कनैक्ट किया जाना है .

रिपोर्ट के मुताबिक जो लडकियां 5 घंटे या उस से ज्यादा इंटरनैट मीडिया का इस्तेमाल करती हैं वे कम संतुष्टि महसूस करती हैं यानी खुश नहीं रह पाती . जबकि जो युवा एक घंटे या उस से कम इंटरनैट मीडिया का इस्तेमाल करते हैं वे दूसरों के मुकाबले ज्यादा खुश रहते हैं . ऐसा सिर्फ इसलिए कि उन के दिमाग में वो कचरा नहीं भर पाता जो ज्यादा इस्तेमाल करने वाले युवाओं के दिमाग में भर जाता है . जाहिर है ये युवा इंटरनैट का वेजा इस्तेमाल ज्यादा करते हैं . जबकि इंटरनैट और सोशल मीडिया का पौजिटिव इस्तेमाल करने वाले युवाओं का फोकस अपनी पढ़ाई और कैरियर पर होता है .

*स्मार्ट फोन का दुष्प्रभाव*

भारत में लड़कियों में भी रील बनाने का चलन छूत की बीमारी की तरह फैल रहा है.नाचगानों से भरपूर ये रील भी अधिकतर बड़ी फूहड़, बेमतलब की और बेतुकी होती हैं. एक सर्व के अनुसार, 70 प्रतिशत युवा लड़कियां रील बनाने के लिए 2-3 घंटे का समय बिताती हैं, जबकि 40 प्रतिशत लड़कियां अपने भविष्य की योजनाओं को नजरअंदाज कर देती हैं.

*आंकड़े बताते हैं*

– 75 प्रतिशत युवा 5-6 घंटे स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करते हैं.

– 60 प्रतिशत युवा सोशल मीडिया पर अपना अधिकांश समय बिताते हैं.

– 50 प्रतिशत युवा अपने दोस्तों और परिवार के साथ कम समय बिताते हैं.

– 30 प्रतिशत युवा स्मार्ट फोन के कारण अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाते.

*क्या है इस का इलाज*

इस का इलाज क्या है? यह बताने के लिए कोई लुकमान हकीम आगे नहीं आता. ऐसे में युवाओं और किशोरियों को खुद तय करना होगा कि वे तात्कालिक और आभासी खुशी के लिए जिंदगीभर की दुख और तकलीफें मोल न लें. जो अभी लगभग फ्री में मिल रहा है, उस की भारी कीमत उन्हें भविष्य बर्बाद कर चुकाना पड़ेगी. इसलिए युवाओं को अच्छा पढ़ना चाहिए, जो पत्रपत्रिकाओं से ही मुमकिन है. Social Media Impact

Iran Israel War: युद्ध के घाव – जो पीढ़ियों तक रिसते हैं

Iran Israel War: ईरान और इजराइल के बीच चल रहे युद्ध के हालातों ने पूरी दुनिया की इकोनौमी और पौलिटिक्स को हिला कर रख दिया है. इस संघर्ष ने ऊर्जा, बाजार और कूटनीतिक समीकरणों का तानाबाना तो उधाड़ ही दिया है, इस का सब से गहरा और दीर्घकालिक असर उन आम लोगों पर पड़ रहा है, जो जंग की धधकती आग के बीच रहने के लिए मजबूर हैं.

ईरान-इजरायल युद्ध जैसेजैसे आगे बढ़ रहा है, वैसेवैसे इस के गंभीर परिणाम पूरी दुनिया पर और प्रमुखता से दिखने लगे हैं. ईंधन से ले कर एलपीजी की बाधित सप्लाई, मार्केट क्रैश, बदलती सरकारी और सैन्य रणनीतियां पर तो सब का ध्यान है, लेकिन इस बीच युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में रह रहे लोगों की मानसिक व भावनात्मक स्थिति पर कोई बात करता दिखाई नहीं दे रहा है. साइकोलौजिस्ट एंड ह्यूमन एंड सोशल राइट्स एक्टिविस्ट मालिनी सबा की मानें तो युद्ध से जन्मी स्थितियां मानव मन पर इतनी गहरी छाप छोड़ती हैं कि इस का असर पीढ़ियों तक नजर आता है. भले ही ईरान-इजरायल युद्ध कुछ महीने बाद खत्म हो जाए, लेकिन कड़वा सच यह है कि इस से जन्मी मानसिक और भावनात्मक समस्याएं एक से दूसरी पीढ़ी को विरासत में मिलती रहेंगी.

वर्ल्ड हेल्थ और्गेनाइजेशन का भी कहना है कि युद्ध और सशस्त्र संघर्ष से प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लगभग हर पांच में से एक व्यक्ति किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझता है. यह आंकड़ा सामान्य परिस्थितियों की तुलना में कई गुना अधिक है. मिसाइल सायरन, बम धमाके, रातों की नींद हराम कर देने वाली अनिश्चितता, ये सब मिल कर युद्ध क्षेत्र में निवास कर रहे लोगों के नर्वस सिस्टम को लगातार अलर्ट मोड में रखते हैं.ऐसे हालात में शरीर के अंदर कोर्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे स्ट्रेस हार्मोन लगातार उच्च स्तर पर बने रहते हैं. यही स्थिति आगे चल कर पोस्ट ट्रौमेटिक स्ट्रेस डिसऔर्डर, क्रोनिक एंग्जाइटी और फोबिया जैसी समस्याओं को जन्म देती है.

मानव शरीर और मस्तिष्क पर यह असर सिर्फ जंग जारी रहने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के मन, व्यवहार और व्यक्तित्व तक में उतर जाता है. युद्ध की सब से भयावह सच्चाई यही है कि यह सिर्फ सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि इंसानी दिमाग के भीतर भी चलता रहता है, कभी खत्म न होने वाली लड़ाई की तरह.

यूएन की रिफ्यूजी एजेंसी के अनुसार, हमलों के पहले 48 घंटों में 100,000 से ज्यादा लोगों को ईरान की राजधानी तेहरान को छोड़ कर भागना पड़ा है. लगातार होते हमले, मिसाइलों का गिरना, घर नष्ट हो जाना, परिवारों का अलग हो जाना और पूरी दिनचर्या का बिखर जाना, लोगों को भावनात्मक रूप से तोड़ देता है. ईरान और इजरायल दोनों ही जगहों पर लोग सिर्फ जान का खतरा नहीं झेल रहे, बल्कि अपनी पहचान और सुरक्षा के टूटने का दर्द भी झेल रहे हैं.

किसी इंसान का घर उजड़ना सिर्फ उस का भौतिक नुकसान नहीं होता, बल्कि यह व्यक्ति की स्मृतियों, रिश्तों और पहचान को भी खत्म कर देता है. गाजा पट्टी में ऐसे अनेक लोग हैं जिन के प्रियजन युद्ध में मारे जा चुके हैं. ऐसी औरतें और बच्चे बड़ी संख्या में हैं, जिन के घर के पुरुष खत्म हो चुके हैं. ऐसे में इनमें से कई खुद के बच जाने के अपराध बोध से ग्रस्त हैं. इस स्थिति को सर्वाइवर गिल्ट कहते हैं. वहीं, बिना किसी शारीरिक कारण के दर्द, थकान और घबराहट जैसे लक्षण भी आम होते जा रहे हैं. इसे मनोविज्ञान में साइकोसोमैटिक प्रभाव कहा जाता है.

आज का युद्ध सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया और 24×7 न्यूज कवरेज के कारण दुनिया भर के लोग भी इस हिंसा, आगजनी, चीख़पुकार, खून में नहाये शवों को प्रत्यक्ष देख रहे हैं. लगातार ऐसे दृश्य देखने से दिमाग वास्तविक और वर्चुअल अनुभव में फर्क नहीं कर पाता है. इस से सेकेंडरी ट्रौमा पैदा होता है, जिस में व्यक्ति खुद युद्ध क्षेत्र में न होते हुए भी एंग्जाइटी, बेचैनी और भावनात्मक थकान महसूस करता रहता है.

बच्चों के पास भले ही वह भाषा नहीं होती जिस में वह  सटीकता के साथ अपने ट्रौमा को जाहिर कर सकें, लेकिन ये बात तय है कि उन के आसपास क्या हो रहा है और भावनात्मक माहौल कैसा है, इसे वो गहराई से अपने सबकौन्शियस ब्रेन में एब्जौर्ब करते  हैं. वे युद्ध को अपने व्यवहार, खेल और खामोशी में जीने लगते हैं. उन में बिहेवियरल चेंज दिखने लगते हैं. वे डर के मारे बार बार बिस्तर गीला करते हैं, कभी वे अचानक चुप हो जाते हैं या अत्यधिक आक्रामक हो जाते हैं. खेलखेल में वे टैंक, बंदूक और धमाकों की दुनिया रचते हैं. यह उन के भीतर जमा डर का संकेत होता है. जब बच्चा बारबार टैंक, बंदूक, बम बनाता है, तो वह असल में अपने अनुभव को समझने और नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा होता है. युद्ध प्रभावित क्षेत्र में पलेबढ़े होने के कारण बच्चों में अक्सर ट्रौक्सिक स्ट्रेस भी मौजूद रहता है. जो डिप्रेशन, नशे की लत और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ट्रौमा के लक्षण पास होने के जोखिम को बढ़ाता है.

न्यूरोसाइंस बताता है कि बचपन में लगातार डर और असुरक्षा का अनुभव ट्रौक्सिक स्ट्रेस पैदा करता है, जो मस्तिष्क के विकास को प्रभावित करता है.  इसका असर जीवन भर रहता है. युद्धग्रस्त देशों में बच्चों में कम आत्मविश्वास, रिश्तों में अस्थिरता और निर्णय लेने की क्षमता पर युद्ध का प्रभाव साफ देखा गया है. इतिहास गवाह है, चाहे वह वियतनाम युद्ध हो, सीरिया का संघर्ष या द्वितीय विश्वयुद्ध, युद्ध खत्म होने के दशकों बाद भी उसके मनोवैज्ञानिक घाव बने रहे हैं. मातापिता का अधूरा डर, असुरक्षा और तनाव अगली पीढ़ी के व्यवहार और सोच में उतरता है. ऐसे समाजों में अविश्वास, हिंसा की स्वीकृति और भावनात्मक दूरी सामान्य व्यवहार में आ जाती है.

दुनियाभर के देश जो युद्ध की विभीषिकाओं से निकले हैं, वहां सड़कों, पुलों और इमारतों के पुनर्निर्माण पर तो जोर दिया जाता है, लेकिन लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है. जब तक लोगों को सुरक्षित माहौल, सामुदायिक सहयोग और मनोवैज्ञानिक सहायता नहीं मिलती, रिकवरी अधूरी रहती है. युद्ध के बाद जीवित बचे लोगों को मेंटल हेल्थ सपोर्ट, ट्रौमा काउंसलिंग और खुल कर बातचीत का माहौल मिलना उतना ही जरूरी हैं जितना कि आर्थिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया आवश्यक है. Iran Israel War

Nepal Politics Reform: बालेन का अभियान – ऊपरी तल से भ्रष्टाचार की सफाई

Nepal Politics Reform: बालेंद्र शाह उर्फ बालेन का उदय नेपाल की पारंपरिक राजनीति के विरुद्ध जनाक्रोश का परिणाम है. एक स्वतंत्र छवि वाले नेता के रूप में बालेन ने जिस तेजी से पूर्व प्रधानमंत्रियों और उद्योगपतियों के भ्रष्ट कारनामों के खिलाफ कार्रवाई और गिरफ्तारियां शुरू करवाई हैं, यह संकेत है कि वे सिस्टम को झकझोरने की मंशा रखते हैं.

सत्ता संभालते ही बालेन ने नेपाल के चार पूर्व प्रधानमंत्रियों – केपी शर्मा ओली, पुष्पकमल दहल प्रचंड, शेर बहादुर देउबा और माधव कुमार नेपाल की संपत्तियों की जांच का आदेश जारी कर दिया है. चार पूर्व प्रधानमंत्रियों को एक साथ जांच के दायरे में लाना एक असाधारण साहसिक, किंतु जोखिमपूर्ण दांव है. इन के साथ ही उद्योगपति दीपक खडका की गिरफ्तारी ने बालेन के अभियान को और गंभीर और व्यापक बना दिया है.

नेपाल में लंबे समय से यह चर्चा है कि सत्ता में बैठे नेता अपने पद का उपयोग सिर्फ निजी संपत्ति अर्जित करने के लिए करते रहे हैं. जबकि नेपाल की आम जनता भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता से परेशान है. 70 फीसदी नेपाली युवा दो वक्त की रोटी के लिए पड़ोसी देशों में वैध और अवैध तरीकों से पलायन करते हैं. पूर्व की सरकारों ने न तो बच्चों की शिक्षा और न ही युवाओं को रोजगार के क्षेत्र में कोई ठोस कार्य किया. अब बालेन शाह ने शिक्षा के क्षेत्र में कई बदलावों की घोषणा की है. उन्होंने कालेज व यूनिवर्सिटियों में छात्र राजनीति को खत्म करने के साथ पांचवीं कक्षा तक कोई परीक्षा न करवाने का ऐलान किया है. शिक्षा को ज्यादा समावेशी बनाना, कालेज कैम्पस को राजनीति की गंदगी से मुक्त करना और पढाई की गुणवत्ता को बढ़ाने की दिशा में कार्य शुरू हो गए हैं. भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसने के लिए बालेन ने सीधे ऊपर पायदान से सफाई शुरू की है.

देश के भ्र्ष्ट नेताओं के खिलाफ कार्रवाई से एक उम्मीद जरूर जगी है कि शायद अब व्यवस्था में बदलाव आए. लेकिन जांच का कोई ठोस निष्कर्ष जल्दी नहीं निकला तो जनता की उम्मीद निराशा में बदल सकती है. जांच में देरी से राजनीतिक अस्थिरता भी बढ़ सकती है. गौरतलब है कि नेपाल पहले ही गठबंधन की जटिल राजनीति, दल-बदल और वैचारिक टकराव से जूझ रहा है. ऐसे में बालेन शाह के सामने सब से बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की है. एक तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई और दूसरी तरफ राजनीतिक स्थिरता इन दोनों के बीच यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत हो, किसी भी प्रकार का सिलेक्टिव टारगेटिंग न हो और पारदर्शिता बनी रहे ताकि जनता का विश्वास कायम रहे. Nepal Politics Reform

Reservation System India: पढ़नेलिखने के बाद भी क्यों पिछड़ रहे पिछड़े?

Reservation System India:

नेता जी सुभाष चंद्र बोस महाविद्यालय लखनऊ का एक सब से अच्छा कालेज है. यहां पढ़ने आने वाली लड़कियों में बड़ी संख्या स्कूटी से आने वाली लड़कियों की है. साइकिल से आने वाली लड़कियों की बेहद कम है. कुछ लड़कियां बस, टैक्सी या कार से आती हैं. यह कालेज लखनऊ के अलीगंज एरिया में कपूरथला और पुरनिया चौराहे के बीच विज्ञान आंचलिक केंद्र के सामने स्थित है. करीब 1200 लड़कियां यहां पढ़ने आती हैं. इन लड़कियों को देख कर इस बात का अंदाजा लगाना आसान होता है कि लड़कियों में ओबीसी जातियों की संख्या अधिक है. यह सांवले रंग की साधारण सी दिखने वाली होती हैं.

केवल सुभाष चंद्र बोस महाविद्यालय का ही नहीं, हर स्कूलकालेज में ओबीसी लड़कियों की संख्या अधिक दिखती है. अगर 1980 के दशक से किसी कालेज से इस की तुलना करें तो ओबीसी लड़कियों की संख्या तेजी से बढ़ी है. पहले लड़कियां साइकिल से अधिक आती थी या फिर उन के परिवार का कोई सदस्य कालेज छोड़ने आता था. ओबीसी की लड़कियां अधिक से अधिक कक्षा 10 या 12 तक पढ़ती थी. इस के बाद उन की शादी हो जाती थी.

अब स्कूल ही नहीं कालेज में भी लड़कियों की संख्या बढ़ी है. बात केवल लड़कियों तक सीमित नहीं रह गई है. ओबीसी लड़के भी अब पहले से अधिक पढ़ रहे हैं. पढ़नेलिखने के बाद भी नौकरियों में इन की संख्या उस अनुपात में नहीं दिखती है. 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में ओबीसी की बेरोजगारी दर लगभग 3.1 फीसदी है. नौकरियों में ओबीसी उस अनुपात में नहीं पहुंच पा रहे हैं जिस तरह से उन की पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी है.

1990 में जब मंडल कमीशन लागू हुआ तो ओबीसी को आगे बढ़ने का मौका मिला. मंडल कमीशन लागू होने से अन्य पिछड़ा वर्ग ओबीसी को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 27 फीसदी का आरक्षण मिला. जिस से उन की सामाजिक आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ. इसने पिछड़ी जातियों में राजनीतिक चेतना जगाई और उन्हें मंडल राजनीति के तहत सत्ता में मुख्यधारा का भागीदार बनाया, जिस से बिहार और यूपी जैसे राज्यों में राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया.

पिछड़ी जातियों के वोट बैंक के रूप में उभरने से लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे नेताओं को आगे बढ़ने का मौका मिला. उच्च शिक्षा और केंद्र सरकार की नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण से ओबीसी युवाओं को आगे बढ़ने का अवसर मिला. मंडल की राजनीति के जवाब में कमंडल की धार्मिक राजनीति का दौर शुरू हुआ. इसने मंडल से पैदा हुई चेतना को खत्म कर दिया. दूसरी तरफ मंडल कमीशन का लाभ ओबीसी में अपरकास्ट तक ही सीमित रह गया. वह पूरी तरह से पूजापाठी हो गया है. उसे यह लगता है कि जब तक वह ब्राहमणों की तरह से पूजापाठ नहीं करेगा तब तक उसे अगड़ा नहीं माना जाएगा.

पूजापाठी हो गया ओबीसी : मंडल कमीशन के बाद रोहिणी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि ओबीसी की 6,000 जातियों में से केवल 40 जातियों को ही 50 फीसदी से अधिक लाभ मिला. मंडल कमीशन का पूरा लाभ सभी पिछड़ी जातियों तक समान रूप से नहीं पहुंच सका. मंडल और कमंडल की राजनीति में ओबीसी दो हिस्सों में बंट गया. ओबीसी का एक बड़ा वर्ग पूजापाठी को गया. यह ओबीसी अब जातियों में बंट गया है. इस में जिन के पास पैसा और ताकत आ गई वह धर्म को मानने लगे हैं. इस वर्ग से मोरारी बापू और देवकीनंदन ठाकुर जैसे कई प्रसिद्व कथावाचक हो गए हैं.

उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे कई राज्यों में यादव, कुर्मी, निषाद, लोध और मौर्य ओबीसी के लोग कथावाचक हो गए हैं. यह लोग गांव, कस्बों और शहरों में जा कर भागवत कथा, रामायण और देवी भागवत करने लगे हैं. 22 जून का इटावा के दादरपुर गांव में यादव जाति के कथावाचक मुकुटमणि सिंह कथा कहने पहुंच गए. यह गांव ब्राहमणों का था. कथा सुनने वाला परिवार भी ब्राहमण था. जब उन को यह पता चला कि कथा सुनाने के लिए व्यासगद्दी पर बैठने वाला यादव है तो उसे हटाया गया. उस से पैसे वापस लिए गए. और उस के सिर के बाल बनवा कर अपमानित किया गया.

जब सोशल मीडिया पर यह बात फैली जो समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कथावाचकों को लखनऊ बुलाया. उन का समर्थन किया. 21-21 हजार रुपए 3 कथावाचकों को दिया. उन से कथा भी सुनी और इस के बाद भाजपा और उस की मानसिकता का विरोध भी किया. मंडल कमीशन लागू होने के पहले समाजवाद में ब्राहमणवाद का विरोध था. मंडल कमीशन लागू होने का सब से बड़ा लाभ यादवों को मिला. पैसा आने के बाद वह ब्राहमण जैसे बन गए. अब अखिलेश यादव मंच पर समाजवाद की बात करते हैं घर में पूजापाठ होता है.

यादव जाति के तमाम लोग पूजापाठी और कथावाचक हो गए हैं. इन में मुकुटमणि यादव, संत सिंह यादव, ममता यादव, नीलम यादव और बृजेश यादव प्रमख है. हजारों स्थानीय ओबीसी कथावाचक गांवगांव धर्म का प्रचार वैसे ही कर रहे जैसे ब्राहमण कथावाचक करते हैं. जब धर्म आगे आ गया तो जाति और समाजवाद को पीछे जाना ही पड़ेगा. इन ओबीसी कथावाचकों को ओबीसी जाति को मानने वाले लोग ही अपने अपने घरों पर बुलाते हैं. धर्म के प्रभाव में आया व्यक्ति अनजाने ही सही भाजपा का प्रचार करने लगता है. इस को भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तरफ मिला कर ओबीसी राजनीति को खत्म कर दिया. बिहार में राम विलास पासवान और नीतीश कुमार भाजपा के साथ हो गए. इन के सहारे भाजपा ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद को खत्म कर दिया. यादव जाति के नेताओं को अपनी तरफ मिला लिया. इस के ही सहारे भाजपा ने उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया.

सपा केवल यादव और मुसलिमों तक सीमित रह गई. मुलायम सिंह यादव के समय सपा में पिछड़े वर्ग की कई जातियां शामिल थी. अब हालात बदल गए हैं. पिछड़ा वर्ग के पूजापाठी होने यह वह मुसलिमों के प्रति अलग भाव रखने लगे हैं. ऐसे में वह पिछड़ा वर्ग सपा से बिदक रहा है. अब अखिलेश यादव के समाने दिक्कत है कि वह खुद को पूजापाठी कैसे साबित करें. अपने को पूजापाठी साबित करने के लिए अखिलेश यादव अपने गांव सैफई में शिवमंदिर बनवा रहे हैं.

ओबीसी के आगे बढ़ने के बाद उन का जो धार्मिक रूझान बदल गया है. उस से मंडल कमीशन की सोच का खत्म हो गई है. रामचरित मानस की चैपाई ‘ढोल गंवार शुद्र पशु नारी’ को भूल ओबीसी का एक बड़ा तबका पूरी तरह से धार्मिक हो चुका है. यही भाजपा की सब से बड़ी ताकत है. भाजपा धर्म के जरिए राजनीति कर रही है. उस का प्रचार मंदिरों से होता है. अब लगभग हर जाति के लोगों के अलगअलग मंदिर हैं जहां वह अपनेअपने भगवानों की पूजा करते हैं. धर्म के नाम पर यह भाजपा के साथ खड़े हो रहे हैं.

समाजवादी पार्टी का मूल वोटबैंक यादव भी अब अखिलेश यादव के साथ पूरी तरह से नहीं है. वह सपा को पसंद करता है लेकिन जैसे ही मुद्दा हिंदूमुसलिम का होता है वह भाजपा के साथ खड़ा हो जाता है. भाजपा ने इस वर्ग को प्रभावित करने के लिए मध्य प्रदेश में मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया था. राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में कई ओबीसी नेता उप मुख्यमंत्री बनाए गए. ओबीसी खुद को सवर्ण समझ कर वैसा व्यवहार कर रहा है. उसे लगता है कि पूजापाठ कर के वह सवर्ण बन जाएगा.

ओबीसी जब इंटरकास्ट मैरिज करता है तो सवर्ण उस की पहली पंसद होते हैं. ओबीसी के लोग सवर्णो की लड़कियों से शादियां कर रहे हैं. सवर्ण परिवारों की यह लड़कियां घर के अंदर से ही बदलाव कर रही हैं. इन के बच्चे पूरी तरह से सवर्णो वाला व्यवहार करते हैं यही उन के स्वभाव में रच बस जाता है. उत्तर प्रदेश में सब से बड़े यादव परिवार मुलायम सिंह यादव का घर इस का उदाहरण है. मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता थी. जिस से उन को एक बेटा प्रतीक यादव है. प्रतीक यादव ने ठाकुर जाति की अपर्णा बिष्ठ से शादी की.

मुलायम सिंह यादव के बड़े बेटे अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव पहाड़ी जाति की ठाकुर है. उन के पिता का नाम आरएस रावत और मां का नाम चंपा रावत है. शादी के पहले डिंपल सिंह रावत थी. अब डिंपल यादव हो गई हैं. मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव की पत्नी राजलक्ष्मी मध्य प्रदेश के मैहर राजपूत घराने की है. इन के नाना राजा कुवंर नारायण सिंह जूदेव 3 बार विधायक रहे. राजलक्ष्मी ने लखनऊ विश्व विद्यालय से एमबीए किया था.

बिहार में लालू प्रसाद यादव के बेटे तेज प्रताप यादव की शादी भूमिहार जाति से आने वाले नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा राय की पौत्री ऐष्वर्या राय से हुई. ऐष्वर्या के पिता चंद्रिका राय भी बिहार में मंत्री रहे. लालू प्रसाद यादव के दूसरे बेटे तेजस्वी यादव की पत्नी रैचल गोडिन्हो हरियाणा के रेवाडी में रहने वाले इसाई परिवार की है. वह दिल्ली में पलीबढ़ी यहीं तेजस्वी यादव से उन की मुलाकात हुई और शादी के बाद उन का नाम राजश्री यादव हो गया. राजश्री यादव नाम इसलिए रखा गया जिस से बिहार के लोग आसानी से इस का उच्चारण कर सके. इस नाम को रखने का सुझाव लालू प्रसाद यादव ने ही दिया था.

ओबीसी जातियों ने खुद को सवर्णो की तरह बदला. वह अपना रहनसहन और व्यवहार सवर्णो जैसा ही करने लगी. धार्मिक रूप से वह सवर्णों की तरह की व्यवहार करने लगे हैं. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भले ही खुद को शुद्र कहे लेकिन उन का व्यवहार सवर्ण जैसा ही होता है. वोट से अलग हट कर देखें तो वह धर्म को पूरी तरह से मानते हैं. अपने पिता की अस्थियों का विर्सजन पूरी आस्था और धार्मिक कर्मकांडों के साथ किया. वह गंगा में डुबकी लगाए और कुंभ भी नहाएं. ऐसे में एससी जातियों को ओबीसी और सवर्णो में फर्क नजर नहीं आता है.

दक्षिणपंथ से अलग थी समाजवादी विचारधारा : धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर रामदेव का कारोबार भले ही बढ़ गया हो पर इस से वर्ण व्यवस्था पर कोई असर नहीं हुआ. ऐसे ओबीसी नेताओं की लिस्ट लंबी है. जो ओबीसी के नाम पर आगे तो बढ़ गए लेकिन वह खुद को ब्राहमण जैसा समझने लगे. ओबीसी के जो नेता आगे बढ़े वह धर्म की आलोचना कर के ही आगे बढ़े थे. इन की विचारधारा दक्षिणपंथी पंडावाद की नहीं थी. यह समाजवादी विचारधारा के थे. जिस में महिलाओं और रूढ़िवादी विचारों को व्यापक जगह दी गई थी.

समाजवादी राजनीति उस पक्ष या विचारधारा को कहते हैं जो वर्ण व्यवस्था वाले समाज को बदल कर उस में अधिक आर्थिक और जातीय समानता लाना चाहते हैं. इस विचारधारा में समाज के उन लोगों के लिए सहानुभूति जताई जाती है जो किसी भी कारण से अन्य लोगों की तुलना में पिछड़ गए हों या कमजोर हो. समाजवादी विचारधारा सब को साथ ले कर चलने की बात करती है. यह वर्णव्यवस्था के ठीक विपरीत विचारों को ले कर चलती है. यही वजह है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कहा कि ‘हम शूद्र है.’ समाजवादी पार्टी कार्यालय पर इस का प्रचार करता होर्डिंग भी लगाया गया था. उत्तर प्रदेश में रामचरितमानस पर विवादित बयान देने वाले नेता स्वामी प्रसाद मौर्य उस समय समाजवादी पार्टी में थे. इस को ले कर सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर सवाल उठ रहे थे.

उसी समय अखिलेश यादव मंदिरों में दर्शन करने गए उतो हिंदू संगठनों ने उन को काले झंडे दिखाए और उन के खिलाफ नारेबाजी की थी. इसे ले कर अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार पर हमला बोलते कहा था कि मैं मुख्यमंत्री जी से सदन में पूछूंगा कि मैं शूद्र हूं कि नहीं हूं. भाजपा और आरएसएस के लोग दलितों और पिछड़ों को शूद्र समझते हैं.’ यह वर्ण व्यवस्था की देन थी.

अखिलेश यादव कितनी भी वर्ण व्यवस्था की बात कर ले पर उन की पत्नी और सांसद डिंपल यादव नवरात्रि में कन्या पूजन कर उन का खाना खिलाती है. वह मंदिर बनवा रहे हैं. ऐसे में समाजवादी विचारधारा छोड़ ओबीसी अब धार्मिक हो कर कमंडल की तरफ झुक गए हैं. जिस से समाजवादी विचारधारा खत्म हो गई है. समाजवाद की बातें केवल भाषणों तक ही सीमित रह गई है. वह वर्ण व्यवस्था की आलोचना तो करते हैं पर उसी वर्णव्यवस्था का हिस्सा बन कर रह गए हैं. समाजवादी नेताओं की कथनी और करनी में अंतर होने से वोटर एक जुट नहीं हो पा रहा है.

क्या है वर्ण व्यवस्था ?

वर्ण व्यवस्था का सब से पहले जिक्र ऋग्वेद के दसवें मंडल में पाया जाता है. यही बाद में जातीय व्यवस्था व्यवस्था बन गई. जातीय व्यवस्था में 4 जातियां प्रमुख रखी गई. यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र है. शूद्र का मतलब दलित वर्ग से नहीं था. वर्ण व्यवस्था में उन को तो चर्चा के लायक भी नहीं समझा जाता था. वर्ण व्यवस्था 1500 ईसा पूर्व आर्यों के आने के साथ ही भारत में आ गई थी. यह मध्य एशिया से भारत आए थे. यह गोरे रंग वाले लोग थे. अपनी नस्लीय श्रेष्ठता को बनाए रखने के प्रयास में उन्होंने देश के मूल निवासियों यानी काली चमड़ी वाले लोगों से खुद को अलग रखा था.

आर्यों के आगमन के बाद समाज में दो वर्ग हो गए. मूलवर्ग काले रंग का था. जिस को दास कहा गया. ऋग्वैदिक काल में ही समाज का विभाजन हो गया था. आर्यों के एक समूह ने बौद्धिक नेतृत्व के लिए खुद को दूसरों से अलग रखा. इस समूह को ‘पुजारी’ कहा जाता था. दूसरे समूह ने समाज की रक्षा के लिए दावा किया. जिसे ‘राजन्या’ यानि राजा से पैदा कहा जाता था. यही आगे चल कर क्षत्रिय वर्ग बन गया. तीसरे वर्ग ने कारोबार करना शुरू किया यह ही वैश्य कहलाया.

उत्तर वैदिक काल में शूद्र नामक एक नए वर्ण का उदय हुआ. इस की जानकारी ऋग्वेद के दसवें मंडल में मिलती है. ब्राह्मणों, क्षत्रिय और वैश्यों को द्विज का दर्जा दिया गया था. जबकि शूद्रों को द्विज स्थिति के दायरे से बाहर रखा गया था और उन्हें ऊपरी 3 वर्णों की सेवा के लिए बनाया गया था. वर्ण व्यवस्था के तहत लोगों को उन की सामाजिक आर्थिक स्थिति के आधार पर दर्जा दिया जाता था. वर्ण व्यवस्था के तहत समाज को 4 अलगअलग वर्णों में विभाजित किया गया था. इस के आधार पर जातीय भेदभाव भी खूब होता है.

वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोच्च था. एक ब्राह्मण महिला एक ब्राह्मण पुरुष से ही शादी कर सकती थी. इस के बाद दूसरे नंबर पर क्षत्रिय वर्ग आता था. इन का मुख्य कार्य युद्धभूमि में लड़ना था. एक क्षत्रिय को सभी वर्णों की स्त्री से विवाह करने की अनुमति थी. हालांकि एक ब्राह्मण या क्षत्रिय महिला को प्राथमिकता दी जाती थी. इस व्यवस्था में तीसरा नंबर वैश्य का था. इस वर्ण की महिलाएं पशुपालन, कृषि और व्यवसाय में अपने पति का साथ देती थी. वैश्य महिलाओं को किसी भी वर्ण के पुरुष से शादी करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई थी. शूद्र पुरुष से शादी करने का प्रयास नहीं किया जाता था.

शूद्र वर्ण व्यवस्था में सब से निचले स्थान पर थे. इन को किसी भी तरह के अनुष्ठान करने से रोक दिया गया था. कुछ शूद्रों को किसानों और व्यापारियों के रूप में काम करने की अनुमति थी. शूद्र महिलाएं किसी भी वर्ण के पुरुष से विवाह कर सकती थीं. जबकि एक शूद्र पुरुष केवल शूद्र वर्ण की महिला से ही विवाह कर सकता था. बौध और जैन धर्म में वर्ण व्यवस्था में जातीय भेदभाव को खत्म करने की कोशिश की लेकिन यह खत्म नहीं हो सका. आजादी के बाद भी इस का प्रभाव कायम है. संविधान से मिली आरक्षण की ताकत से शूद्र वर्ग के लोग राजनीतिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ गए. आर्थिक संपन्नता से यह खुद को ब्राहमणों जैसे समझने लगे. असल में यह अपने वर्ग में श्रेष्ठ हो सकते हैं, लेकिन वर्ण व्यवस्था में इन की जगह जहां थी वहीं है. इस का सब से बड़ा उदाहरण समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले वैवाहिक विज्ञापनों में देखी जा सकती है.

वैवाहिक विज्ञापनों में दिखती है वर्ण व्यवस्था : ‘ब्राह्मण, 29 वर्षीय पोस्ट ग्रैजुएट बिजनेसमैन युवक के लिए सर्वगुण सुंदर, स्लिम, संस्कारी, गृहकार्य दक्ष, विश्वसनीय, ईमानदार व शाकाहारी वधु चाहिए.’ नौकरी केवल सरकारी टीचर और केवल ब्राह्मण परिवार ही स्वीकार्य. कुंडली मिलान और 36 गुणयोग, बायोडाटा फोटो सहित सम्पर्क करें.’ वैवाहिक विज्ञापनों में पूरी जातीय और वर्ण व्यवस्था दिखती है. हर जाति के लिए अलग कालम बने हैं. जहां अंतरजातीय विवाह की बात होती है उस का अर्थ है कि ब्राहमण, क्षत्रिय और वैश्य आपस में विवाह कर सकते हैं. शूद्र के साथ यह लोग अतंरजातीय विवाह नहीं करते हैं. यह विज्ञापन आज भी उतने ही रूढ़िवादी और जातिवादी हैं जितने पहले थे.

हाल के 10-15 सालों में विज्ञापन और अधिक पितृसत्तात्मक सोच से ग्रस्त हो गए हैं. इन विज्ञापनों में यह भी दिखता है कि कैसे हमारे सामाज में विवाह की मूल सोच को नकारते हुए इसे वैवाहिक सौदा बनाया गया है जिस में जाति, धर्म, गोत्र का ध्यान रखना सब से पहले आवश्यक है. कुछ विज्ञापनों में बिना दहेज और कोई जाति बाधा न होने जैसी बातें भले ही लिखी जा रही हैं लेकिन विज्ञापन देनेवाले अपनी जाति का उल्लेख करना नहीं भूलते हैं. वास्तविक रूप अपनी जाति से इतर शादी करना कितना कठिन होता है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी हमारे समाज में अपनी पसंद से शादी करने वाले जोड़े को जान तक गंवानी पड़ती है.

शादी के नाम पर पहले भी मातापिता की रजामंदी के आधार पर जातीय व धार्मिक व्यवस्था को लागू किया जाता आ रहा है. मैट्रिमोनियल साइट्स इन बातों को ध्यान में रखते हुए जाति, धर्म, समुदाय, क्षेत्र और व्यव्साय जैसे वर्गों को अपनी साइट्स में बांटे हुए हैं. वैवाहिक विज्ञापनों और साइट्स की भाषा समाज की उसी मानसिकता को दिखाते हैं. जो ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की ही मानसिकता है.

वैवाहिक विज्ञापनों की शुरूआत के पहले कालम में ‘ब्राहमण’ वैसे ही लिखा होता है जैसे वर्ण व्यवस्था में उस का नाम पहले आता है. वर चाहिए या वधू इस के अलगअलग कालम होते हैं. इस के बाद क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ, जाट, जाटव, मुस्लिम, यादव, बंगाली, पंजाबी, सिख होते हैं. एक कालम अन्य का होता है. इस में पासी, विश्वकर्मा, पाल, गड़रिया, प्रजापति, चमार जैसी जातियों के लिए वर या वधू का जिक्र होता है. ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य के विज्ञापनों में सजातीय शब्द के वरवधू की चाहत अधिक होती है. बहुत कम में जाति बंधन नहीं लिखा मिलता है. पासी, विश्वकर्मा, पाल, गड़रिया, प्रजापति, चमार और जाटव जैसी जातियों के वर्ग में जाति बंधन नहीं लिखा होता है.

सोशल मीडिया पर वैवाहिक साइटों की मैंबरशिप लेने से पहले वर या वधू का पूरी जानकारी बायोडाटा के रूप में ली जाती है. अब इस में लड़कालड़की और उस के मातापिता की जानकारी के अलावा भाई, बहन, चाचा और चाची की जानकारी भी ली जाती है. इस के साथ ही साथ लड़की शाकाहारी और अल्कोहल का प्रयोग नहीं करती यह भी लिखा जाता है. एक नया कालम जुड़ गया है जिस में पूछा जाता है कि वह सोशल मीडिया पर रील तो नहीं बनाती. समाचारपत्रों के वैवाहिक विज्ञापनों में कम बातों का जिक्र किया जाता है. वैवाहिक साइटों में तमाम गोपनीय जानकारी ली जाती है. जिस से आर्थिक हालत, लोन, ईएमआई जैसे सवाल होते हैं. कुछ बातें फार्म में भरी नहीं जाती अपने परिचय में बताई जाती है. वैवाहिक साइटों को चलाने वाला का दावा है कि इन जानकारियों के जरिए ही वह परफैक्ट मैच तलाश करते हैं. इन के जरिए लोगों की गोपनीय जानकारियां कहीं की कहीं पहुंचने का खतरा रहता है. 1990 से पहले इंटरकास्ट मैरिज का जोर सुनाई देता है. अब समाजवादी विचारधारा की तरह यह भी डूब गया है.

आजादी के 77 साल के बाद भी वर्ण व्यवस्था कायम है. 1960 से 1990 के बीच ब्राह्मणवाद को पीछे ढकेल कर समाजवाद आगे आया था. उस दौर में न केवल समाजवाद का आधार बढ़ा था बल्कि ब्राह्मणवाद और मनुवाद पीछे गया था. 1990 के बाद मंडल बनाम कमंडल की राजनीति में पहले ऐसा लगा जैसे कमंडल पिछड़ जाएगा. जैसे ही समाजवाद परिवार और जाति के लाभ में बदलने लगा समाजवाद का प्रभाव घटने लगा. समाजवादी लोग खुल कर धर्म की बुराई नहीं कर सकते हैं. मनुवाद का नाम लेने में समाजवादी विचारधारा के लोगों की जुबान पर ताला लग जा रहा है. ऐसे में कैसे समाजवाद बढ़ पाएगा?

समाजवाद की जड़े कार्ल मार्क्स और फ्रैडरिक एगेल्स के विचारों से जुड़ी है. यह आर्थिक समानता, वर्ग संघर्ष और धर्म को निजी मामला मानने की बात करता है. भारत का समाजवाद इस से अलग विचारों का रहा है. भारत का समाजवाद मिश्रित विचारधारा का रहा है. राम मनोहर लोहिया ने धर्म का सांस्कृतिक जुड़ाव माना था. जय प्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेताओं से जुड़े लालू, मुलायम जैसे नेताओं ने धर्म से कोई दूरी नहीं बनाई थी. भारत का समाजवाद धर्म से दूर नहीं रहा. वह जातिवाद पर फोकस करता रहा.

दक्षिणापंथी लोगों ने इस का लाभ उठाया और समाजवाद को धर्म से जोड़ लिया. राजनीति में धर्म का प्रभाव बढ़ने से समाजवादी विचारधारा को धर्म से जोड़ने में मदद मिल गई. धर्म से खुद को जोड़ने के चक्कर में समाजवाद बिखर गया. समाजवादी नेताओं ने सोचा था कि वह धर्म के साथ संतुलन साध कर आगे निकल जाएंगे. संतुलन की रस्सी इतनी पतली निकली कि इस पर चलने वाले फिसल कर धर्म कि खाई में गिर गए. अब उन का बाहर निकल पाना संभाव नहीं है. उन को बीचबीच में चुनावी सफलता भले मिल जाए पर अब उन के वैचारिक बदलाव की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. Reservation System India

Charak Movie: चरक – फेयर औफ फेथ

Charak Movie: चरक को आयुर्वेद का आचार्य माना जाता है. उन्होंने आयुर्वेद के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. मगर इसी शीर्षक से बनी सुदीप्तो सेन की पावरफुल कहानी ‘चरक: फेयर औफ फेथ’ को आयुर्वेद से कुछ लेनादेना नहीं है. यह फिल्म बंगाल की तांत्रिक प्रथाओं और नरबलि पर आधारित है.

हमारे देश में आज भी अंधविश्वास की जड़ें फैली हैं. इन अंधविश्वासों को फैलाने में पंडेपुंजारियों, तांत्रिकों और मौलवियों का बड़ा हाथ है. अकसर वे अंधविश्वासों के चक्रव्यूह में लोगों को फंसा कर अपनी जेबें भरते हैं. जादूटोने के नाम पर लोगों को गुमराह करते हैं, भूतप्रेत भगाने के नाम पर लोगों को उल्लू बनाते हैं और संतान सुख प्राप्त करने के लिए किसी दूसरे बच्चे की बलि दिलवाने तक में भी नहीं हिचकिचाते. यह सब वे मां काली और तथाकथित भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए करते हैं.

‘चरक’ में अंधविश्वासों की अति दिखाई गई है. यह फिल्म ग्रामीण भारत में अंधविश्वास, तांत्रिक प्रथाओं और बच्चों की बलि जैसे भयावह विषयों को उजागर करती है. आस्था और कट्टरता की महीन रेखा पर सवाल उठाती यह एक तनावपूर्ण थ्रिलर है. फिल्म में पारंपरिक चरक मेले में रची गई एक खतरनाक कहानी दिखाई गई है.

चरक मेला मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल और दक्षिणी बंगलादेश में बंगाली कैलेंडर के चैत्र महीने के अंतिम दिन यानी चैत्र संक्रांति (अप्रैल के मध्य में) आयोजित किया जाता है. यह तथाकथित भगवान शिव के सम्मान में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक त्योहार है जिस में अंधविश्वासी श्रद्धालु उपवास रखते हैं और चरक के चारों ओर घूमते हैं.

फिल्म की कहानी नरबलि और बच्चों के लापता होने की घटनाओं को केंद्र में रखती है. ‘द केरल स्टोरी’ के निर्देशक सुदीप्तो सेन ने ‘चरक’ के जरिए फिल्म निर्माण क्षेत्र में कदम रखा है. फिल्म मेले की आड़ में होने वाले अंधविश्वास को ले कर झकझोरती है. अकसर लोग हिंदी फिल्मों में दिखाए गए अंधविश्वासों से सबक नहीं लेते, उलटे, उसी तरह के अंधविश्वासों में खुद को लपेट लेते हैं.

कहानी चांदपुर में चरक मेले से 2 सप्ताह पहले शुरू होती है. विकास (सुब्रत दत्त) और सुकुमार (शशि भूषण) बचपन के दोस्त है. निसंतान सुकुमार और उस की पत्नी विकास के बेटे बिरसा (शरणदीप) से बहुत प्यार करते हैं. इस बार सुकुमार चरक मेले में बड़ा पुजारी बना है. उधर विकास से जुआं में हारा जगन उस से पैसे वापस मांगता है. विकास मना कर देता है. तब जगन उसे सबक सिखाने की ठान लेता है.

पुलिस इंस्पैक्टर सुभाष शर्मा (शफीकुर रहमान) और उस की पत्नी शेफाली (अंजलि पाटिल) शादी के 12 साल बाद भी निसंतान हैं. शेफाली पति से बच्चा गोद लेने को कहती है लेकिन सुभाष राजी नहीं होता. ऐसी मान्यता (अंधविश्वास) है कि निसंतान श्रद्धालु अगर अघोरियों के जरिए किसी बच्चे की बलि दे तो वह संतानसुख प्राप्त कर सकता है.

तभी निरसा और उस का दोस्त कानू (शौतक श्यामल) गायब हो जाते हैं. पुलिस उन की तलाश में जुटती है. एक चौंकाने वाला सच सामने आता है, अंधविश्वास के काले सच और नरबलि से जुड़ी भयावह हकीकत सब के सामने आती है.

फिल्म की यह कहानी दिखाती है कि कैसे पढ़ेलिखे लोग भी संतोषप्राप्ति या अन्य स्वार्थों के लिए रूढ़िवादी परंपराओं के आगे झुक जाते हैं. कहानी का क्लाइमैक्स दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है कि परंपरा की आड़ में नरबलि दी जा रही है. फिल्म का क्लाइमैक्स दर्शकों के आगे समाज की एक कड़वी सचाई को प्रस्तुत करता है.

निर्देशक ने एक संवेदनशील मुद्दा उठाया है. आगे क्या होगा, यह जानने के लिए दर्शक सीटों से बंधे से रहते हैं. सभी कलाकारों ने अच्छा काम किया है. फिल्म का निर्देशन बढिया है. लोकेशन भी अच्छी है. कई सीन देख कर डर भी लगता है. फिल्म के संवाद मजबूती देते हैं. विजुअल्स असली हैं, कलाकारों का मेकअप भी असली लगता है. म्यूजिक का सही इस्तेमाल हुआ है.

कहानी बीचबीच में उबाऊ सी हो जाती है लेकिन बाद में संभल जाती है. फिल्म को मनोरंजन के लिए न देखें. हां, बच्चों को साथ ले कर न जाएं. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Charak Movie

Hindi movie: जब खुली किताब

Hindi movie: विदेशों में वृद्धावस्था में तलाक आम होता जा रहा है. हालांकि पिछले 4 दशकों में युवा जोड़ों में यह दर कम हुई है मगर वृद्ध वयस्कों में यह दर बढ़ गई है. भारत में अभी ऐसे हालात नहीं पैदा हुए हैं. 65 वर्ष और उस से अधिक आयु के वयस्कों में अमेरिका में तलाक दर बढ़ रही है.

अध्ययनों से पता चलता है कि वृद्धावस्था में तलाक की यह प्रवृत्ति कई कारणों से हो रही है. लोगों की उम्र पहले से ज्यादा हो गई है और ज्यादा उम्र के जोड़े पहले की तुलना में असंतोषजक विवाह को बरदाश्त करने के लिए इच्छुक नहीं है. वहीं युवा देर से शादी कर रहे हैं और जीवनसाथी का चुनाव करते समय ज्यादा सतर्क हो गए हैं.

वृद्धावस्था में तलाक जीवनशैली में बदलाव और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है. अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की देखादेखी भारत में भी अब वृद्धावस्था में तलाक होने लगे लगे हैं, मगर वे अपेक्षाकृत कम हैं. वृद्धावस्था में तलाक लेने पर वित्तीय चुनौतियां ही सामने आती हैं, अकेलापन, अवसाद और चिंता हर वक्त घेरे रहती है. सामाजिक जीवन में बदलाव आता है, स्वास्थ्य की चिंता परेशान करने लगती है.

भारत में, खासकर बौलीवुड में, वृद्धावस्था में संबंधविच्छेद कर लेना आम बात है. मशहूर फिल्म अभिनेता धर्मेंद्र ने तो हेमा मालिनी से विवाह करने के लिए अपना धर्म परिवर्तन करा लिया था. पंकज कपूर ने सुप्रिया पाठक के साथ दूसरी शादी की थी. इस शादी से उन के 2 बच्चे हैं, बेटी ऋचा कपूर और बेटा रोहन कपूर. शाहिद कपूर नीलिमा अजीम से पैदा हुआ उन का बेटा है. ऐसे बहुत से उदाहरण आप को बौलीवुड में मिल जाएंगे.

‘खुली किताब’ भी एक उम्रदराज कपल द्वारा शादी बचाने नहीं, बल्कि तलाक लेने के लिए आपस में लड़ने की कहानी पर बनी फिल्म है. यह फिल्म सौरभ शुक्ला के उसी नाम वाले थिएटर प्ले का अडौप्शन है जिसे उस ने खुद लिखा और खुद ही निर्देशित किया.

कहानी के केंद्र में गोपाल (पंकज कपूर) और अनुसूया (डिंपल कपाड़िया) है. अनुसूया 2 साल कोमा में रहने के बाद होश में आती है. एक दिन वह गोपाल को 50 साल पुराने एक सच के बारे में बताती है. यह बात उन के लंबे रिश्ते की नींव हिला देती है. गोपाल भीतर से टूट जाता है. उसे लगता है कि उस ने उम्रभर एक झूठ पर यह रिश्ता निभाया है. गुस्से में आ कर वह बूढ़ी उम्र में तलाक लेने का फैसला करता है.

गोपाल के जीवन में उथलपुथल शुरू हो जाती है. बच्चे उलझ जाते हैं. गोपाल वकील आर के नेगी (अपारशक्ति खुराना) से मिलता है. बातचीत में गोपाल के कई साल पुराने जख्म हरे होते हैं और अनुसूया का सच भी सामने आता है. तलाक से शुरू हुआ यह सफर आखिर में उन्हें एक नई समझ की ओर ले जाता है. वहां रिश्ता टूटने के बजाय एक अलग रूप में बदलने लगता है.
यह एक ईमानदार पारिवारिक कौमेडी है. रिश्तों की सच्चाई बताने वाली यह फिल्म धीमी गति की है. फिल्म की लंबाई कम है, 94 मिनट, यह अच्छी बात है. फिल्म की कहानी आम फिल्मों से हट कर है. फिल्म का निर्देशन अच्छा है. कहानी संवादों द्वारा आगे बढ़ती है. लेकिन मध्यांतर के बाद फिल्म की रफ्तार धीमी पड़ जाती है. यह रफ्तार पूरे समय एक सी नहीं रहती. कुछ सीन जरूरत से ज्यादा लंबे हैं.
‘जब खुली किताब’ उम्रदराज रिश्तों की सच्चाइयों को बिना किसी दिखावे के दिखाती है. इस में कोई ड्रामा नहीं है. हर किसी को शायद पसंद भी न आए. सौरभ शुक्ला और डिंपल कपाड़िया के साथसाथ अपारशक्ति खुराना का काम भी बढ़िया है. फिल्म 75 वर्ष की उम्र में भी रिश्तों को नया मौका देने के विचार को खूबसूरती से पेश करती है. फिल्म दर्शकों को उन के परिवार के और नजदीक लाने में शायद सफल हो पाए. सिनेमेटोग्राफर की फोटोग्राफी बढ़िया है. Hindi movie

Romantic Movie: कपल फ्रैंडली

Romantic Movie: वैलेंटाइन के मौके पर रिलीज यह फिल्म कपल्स के लिए उपयुक्त है. यह फिल्म तेलुगू भाषा की रोमांटिक फिल्म है जिसे हिंदी में भी बनाया गया है. फ्रैंडली कपल वह होता है जो एकदूसरे को खुश रखे, चाहे वह शादीशुदा हो या कुंआरा या फिर प्रेमीप्रेमिका ही क्यों न हो. अगर एकदूसरे को खुश रखते हैं तो उन का आपसी रिश्ता मजबूत होता है और जीवन में खुशहाली व शांति आती है. एक फ्रैंडली कपल बनने के लिए एकदूसरे की तारीफ करें, एकदूसरे पर विश्वास करें, सम्मान करें और मतभेदों को भुला कर हंसे, खिलखिलाएं. इन आदतों को अपना कर आप अपने रिश्ते को सालोंसाल तक खुशहाल रख एकदूसरे के फ्रैंड बने रह सकते हैं, ऐसा मानना है इस फिल्म के निर्देशक चंद्रशेखर का, जो तेलुगू फिल्म के जानेमाने निर्देशक हैं.

‘कपल फ्रैंडली’ आधुनिक रोमांटिक ड्रामा फिल्म है. आधुनिक रिश्तों, संघर्षों और युवाओं के प्यार को संवेदनशीलता से दिखाते हुए यह फिल्म एक हलकीफुलकी प्रेम कहानी से शुरू होती है और बाद में भावनात्मक मोड़ ले लेती है. फिल्म रिलीज होते ही इस ने दर्शकों को दिल जीत लिया. अब इसे तमिल और कन्नड़ भाषाओं में भी रिलीज किया गया है.

‘कपल्स फ्रैंडली’ में चेन्नई में नाइक टैक्सी ड्राइवर के रूप में काम करने वाले एक संघर्षरत इंटीरियर डिजाइनर शिवा (संतोष सोमान) और एक महत्त्वाकांक्षी आई टी पेशेवर मित्रा (मानसा वाराणसी) की कहानी दिखाई गई है. शहर की कठिन जिंदगी में जब वे एकसाथ रहने लगते हैं तो उन का रिश्ता पहले फ्रैंडली, फिर प्यार में बदल जाता है. दोनों साथ रहने लगते हैं.

शिवा को अपने डिजाइन के काम में सफलता मिलने लगती है, वहीं मित्रा को अपने कैरियर में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. एक बड़ा मोड़ उन के जीवन में उथलपुथल मचा देता है जिस से उन की गहन भावनात्मक सहनशक्ति की परीक्षा होती है. आखिरकार, फिल्म इस बात पर प्रकाश डालते हुए खत्म होती है कि वे कैसे परिपक्व होते हैं, सामाजिक मानदंडों का सामना करते हैं और प्रेम के लिए अपना रास्ता चुनते हैं जिस से यह फ्रैंडली कपल की कहानी बन जाती है. क्लाइमैक्स में उन्हें एहसास होता है कि एक फ्रैंडली कपल का जीवन केवल साथ रहने के बारे में नहीं बल्कि आपसी सम्मान और भावनात्मक विकास के बारे में भी हैं. आखिरकार, वे एकदूसरे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के बीच संतुलन बनाते हैं.

यह एक हलकीफुलकी प्रेम कहानी पर बनी फिल्म है. फिल्म को मुख्य रूप से युवाओं को ध्यान में रख कर बनाया गया है. कहानी प्यार और रिश्तों की पेचीदगियों को दिखाती है. प्रीति, जो मित्र की दोस्त है, को एक बहुत बड़े उम्र के व्यक्ति से प्यार करते दिखाया गया है.

सिनेमेटोग्राफर दिनेश पुरुषोत्तम ने बारिश से भीगी, कीचड़भरी गलियों और व्यस्त सड़कों व लोकप्रिय स्थलों के माध्यम से शहर को कैमरे में कैद किया है. अदित्य रविद्रन का संगीत मनमोहक है. संवाद बढ़िया हैं. शिवा को एक बचकाने युवक से एक जिम्मेदार व्यक्ति में परिवर्तित होते देखना अच्छा लगता है. दोनों कलाकारों की कैमिस्ट्री गजब की है. कपल फ्रैंडली की कहानी भले ही अनोखी न हो पर यह परिपक्व और आधुनिक है. फिल्म का निर्देशन अच्छा है. Romantic Movie

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