Download App

नच बलिए सीजन 9: ये दिलकश जोड़ा बनेगा इस शो का हिस्सा

नच बलिए सीजन 9 में छोटे पर्दे का ये दिलकश जोड़ा हिस्सा लेने जा रहे हैं. हाल ही में मिली जानकारी के अनुसार मधुरिमा तुली अपने एक्स बौयफ्रेंड विशाल आदित्य के साथ नच बलिए सीजन 9 का हिस्सा बनने जा रही हैं. वैसे तो डांस शो में हिस्सा लेने के लिए इस जोड़ी के अलावा कई टीवी कपल्स के नाम भी सामने आ रहे हैं. इसी बीच एक और टीवी के इस जानेमाने कपल ने इस डांस रियलिटी शो का हिस्सा बनने का हामी भर दी है.

 ये भी पढ़ें- ये है इंडिया: स्तरहीन पटकथा व निर्देशन

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Rubina Dilaik (@rubinadilaik) on


आपको बता दें, सीरियल शक्ति में किन्नर का दमदार रोल निभा रही रुबीना दिलाइक की जो कि अपने पति के साथ ‘नच बलिए’ के मंच पर ताल से ताल मिलाती नजर आएंगी. वैसे भी इन दोनों के फैंस उनकी लवस्टोरी के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते हैं. ऐसे में इस रियलिटी शो के मंच के जरिए दर्शक को इस कपल के बारे में काफी कुछ जानकारी मिलेगी.

सूत्रों के अनुसार डांस रियलिटी शो में रुबिना और अभिनव के अलावा श्रीसंथ- भुवनेश्वरी, फैजल खान-मुस्कान कटारिया, वही एक्स जोड़ियों की लिस्ट में ऊर्वशी ढ़ोलकिया-अनुज सचदेवा का नाम सामने आ रहा है.

ये भी पढ़ें- ऐश्वर्या विवादित मीम: विवेक ओबरौय को मांगनी पड़ी माफी

ये है इंडिया: स्तरहीन पटकथा व निर्देशन

रेटिंग: आधा स्टार

निर्माताः संदीप चैधरी

लेखक व निर्देशक: लोम हर्ष

कलाकार:गैवी चहल, लोम हर्ष, सुरेंद्र पाल, मोहन अगाषे, डायना उपल, मोहन जोशी, अंतरा बनर्जी, विक्रमजीत कंवरपाल  व  अन्य.

सिनेमा एक ऐसी विधा है, जिसमें उत्कृष्ट रचनात्मक काम करना हर इंसान के वस की बात नहीं है. अमूमन फिल्मकार एक बेहतरीन विषयवस्तु व कथानक पर अजेंडे वाली फिल्म बनाने का निर्णय तो ले लेता है, पर उसे अमली जामा नही पहना पाता. ऐसा ही कुछ फिल्मकार लोम हर्ष के साथ हुआ. आस्टे्लिया में छह वर्ष बिताते हुए वहां पर भारत को लेकर लोगों की सोच से विचलित होकर भारत महज गरीब या सपेरों का देश नहीं है, यह बताने और भारतीयों को भी उनके अपने देश की महत्ता याद दिलाने के मकसद से फिल्मकार लोम हर्ष फिल्म ‘‘ये है इंडिया’’ लेकर आए हैं, पर अफसोस यह फिल्म महज बेसिर पैर की कहानी से युक्त चूंचूं का मुरब्बा के अलावा कुछ नहीं है.

yeh-hai-inda

कहानीः

फिल्म की कहानी लंदन में बसे अप्रवासी भारतीय मिथिलेश कुमार उर्फ मिक्की (गैवी चहल) के इर्द गिर्द घूमती है. मिक्की के माता पिता तीस वर्ष पहले लंदन चले गए थे. मिक्की का जन्म वहीं पर हुआ, पर उसे हमेशा अपने वतन भारत की याद आती रहती है. वह लंदन में रहते हुए भारत को लेकर जो कुछ सुनता है, और जो कुछ किताबों में पढ़ता है उसमें उसे विरोधाभास नजर आता है. वह सच जानने के लिए राजस्थान, भारत अपने मित्र पंडित के घर आता है. पंडित के दादाजी (सुरेंद्र पाल) मिक्की को भारत के बारे में काफी कुछ बताते हैं. वह भारत घूमना शुरू करता है. भारतीयों की मेहमान नवाजी व अपनेपन से प्रभावित होकर यहां के सिस्टम के खिलाफ युद्ध छेड़ देता है. मिक्की की प्रेमिका जेनी (डायना उपल) उसे लेने आती है, पर वह उसे वापस भेज देता है. एक दिन वह नालंदा विश्वविद्यालय के गाइड से भिड़ जाता है कि वह विदेशी पर्यटकों के सामने भारत के गौरवशाली इतिहास का जिक्र करते हुए यह क्यों नहीं बताता कि यदि विदेशियों ने हमारे देश को न लूटा होता, तो आज हमारा देश विश्व का सर्वशक्तिमान देश होता. तो वहीं वह राज्य के पर्यटन मंत्री के बेटे यशवर्धन (लोम हर्ष )द्वारा बच्चो से जबरन भीख मंगवाने के रैकेट का भांडा फोड़कर टीवी पर छा जाते हैं. यषवर्धन जब सड़क पर कचरा फेंकता है, तो मिक्की सारा कचरा उसके सिर पर डाल कर टीवी पर हीरो बनकर उभरता है. नाराज होकर राज्य के पर्यटन मंत्री उसे गिरफ्तार करवा देते हैं. देश की जनता मंत्री के खिलाफ धरने पर बैठकर मिक्की को छोड़ने की मांग करती है. मिक्की जमानत पर जेल से बाहर आता है. भारत के प्रधानमंत्री (मोहन अगाषे) मिक्की को बुलाकर मिलते हैं और भारत में होने वाले विश्व शांति समिट के लिए मिक्की को भारत का प्रतिनिधि बना देते हैं. मिक्की इस समिट में हिंसा व अहिंसा के अलावा विश्व शांति को लेकर लंबा चैड़ा भाषण देते है. पूरे विश्व के प्रतिनिधि मिक्की से प्रभावित होकर उसकी प्रशंसा करते हैं.

ये भी पढ़ें- मुझे हमेशा अपने वतन से प्यार रहा है: गैवी चहल

पटकथाः

अति लचर व घटिया पटकथा के चलते यह फिल्म प्रभावहीन बन गयी है. कहानीकार व पटकथा लेखक को सिर्फ यह पता है कि उन्हें इस फिल्म में किन मुद्दों को पिरोना है, मगर उन्हें यह नहीं पता कि इन मुद्दों को किस तरह मनोरंजक कहानी का रूप देकर पेश करना है. सारे चरित्र अजीबों गरीब हैं. फिल्म में सिर्फ शुष्क भाषणबाजी के अलावा कुछ नही है. परिणामतः यह फिल्म अपने मकसद को पूरा करने में पूरी तरह से विफल रहती है.

Yeh-Hai-India(Poster).

निर्देशनः     

निर्देशक के तौर पर लोम हर्ष का प्रयास सराहनीय नहीं कहा जा सकता.

अभिनयः

जब चरित्र चित्रण सही न हो, तो दिग्गज कलाकार भी कुछ नहीं कर सकते. गैवी चहल पंजाबी फिल्मों के सुपर स्टार हैं, मगर वह भी इस फिल्म में अपनी प्रतिभा से प्रभावित नही करते. मोहन अगाषे व सुरेंद्र पाल को जाया किया गया है. लोम हर्ष लेखक, निर्देशक के साथ साथ अभिनेता के रूप में भी पूरी तरह से असफल रहे.

ये भी पढ़ें- बिग बौस 13: खत्म होगा कौमनर्स का कौन्सेप्ट

गुड़ के इतने फायदे जानकर रह जाएंगे हैरान

गुड़ का सेवन सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है. इसके सेवन से शरीर में कई जरूरी तत्वों की पूर्ति की जा सकती है. आइए जानते हैं गुड़ के सेवन से क्या लाभ होता है.

सर्दी-जुकाम में

मौसम के बदलने से या दूसरी वजहों से कई बार आप भी सर्दी-जुकाम से परेशान हो जाते हैं. इनसे बचाव के लिए भी गुड़ काफी अहम साबित होता है. गुड़ की मदद से सर्दी-जुकाम आदि से आसानी से निजात दिलाई जा सकती है.

jaggery-on-plate-hl

ये भी पढ़ें- आखिर क्यूं होती है दूध से एलर्जी, जाने यहां…

हिमोग्लोबिन

गुड़ में आयरन होता है. आयरन शरीर में हिमोग्लोबिन बनाने में मदद करता है. हिमोग्लोबिन की पूर्ति के लिए गुड़ का सेवन करना फायदेमंद रहता है.

कब्ज दूर

अक्सर गर्मियों में कब्ज की समस्या हो जाती है. इससे बचाव के लिए भी गुड़ का इस्तेमाल करना काफी अच्छा रहता है. गुड़ में अनरिफाइन्ड शुगर पाया जाता है. जिससे डाइजेस्टिव एंजाइम को सक्रिय करने और बच्चों में पाचन को बढ़ावा देने में मदद मिलती है.

jaggery

ये भी पढ़ें- हर्बल दवाएं बिना जानकारी न लें

हड्डियां मजबूत

गुड़ मिनरल्स, कैल्शियम और फौस्फोरस से भरपूर होता है. इसकी मदद से हड्डियों को मजबूत करने में भी मदद मिलती है. गुड़ की मदद से मजबूत की जा सकती है.

कई बार तो ऐसा लगता है जैसे मेरा माइंड रेस्ट मोड में जा रहा है…

सवाल

मैं 30 वर्षीया विवाहिता हूं. शादी के बाद से ही मुझे बहुत जल्दीजल्दी थकान महसूस होने लगी थी. लेकिन पिछले दिनों तबीयत काफी खराब होने के कारण चैकअप व टैस्ट करवाने पर पता चला कि मेरा शुगर लैवल 50 है जोकि काफी कम है. मुझे आनेजाने में भी काफी थकान महसूस होती है और कई बार तो ऐसा लगता है जैसे मेरा माइंड रैस्ट मोड में जा रहा है. ऐसे में मुझे कैसी डाइट लेनी चाहिए व किन बातों का ध्यान रखने की जरूरत है?

ये भी पढ़ें- मैं अपने हसबैंड और प्रेमी दोनों को चाहती हूं. इस वजह से मैं डिप्रैशन में आ गई हूं…

जवाब

अभी आप की उम्र काफी कम है और इतनी सी उम्र में आप को लो शुगर की प्रौब्लम होने लगी है, जो चिंता का विषय है. ऐसे में आप डाक्टर की गाइडैंस में ही सबकुछ करें ताकि समय रहते आप की शुगर प्रौब्लम को कंट्रोल किया जा सके.

साथ ही, आप थोड़ीथोड़ी देर में कुछ खाती रहें और अगर आप वर्किंग हैं तो अपने बैग में चीनी, टाफी व खानेपीने का सामान जरूर रखें ताकि रास्ते में दिक्कत होने पर आप के पास उसे कंट्रोल करने के लिए चीजें हों. और भूल कर भी डाइटिंग वगैरह के बारे में न सोचें. रोज वौक पर जाएं और ओवर वर्कलोड से बचें. इस से धीरेधीरे आप की प्रौब्लम कंट्रोल में आने लगेगी.

ये भी पढ़ें- सब से बड़ी बहन की शादी को 2 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन इधर कुछ दिनों से मेरे जीजाजी…

10 टिप्स: स्किन टोन के हिसाब से चुनें मेकअप बेस

फेस हमारी पर्सनेलिटी का आइना होता है और इस आइने को बेदाग व खूबसूरत बनाने के लिए फेस मेकअप की सही जानकारी होना जरूरी है. किसी भी मेकअप की शुरुआत बेस से होती है. इसीलिए उसे स्किन का बैकड्रौप माना जाता है, जो मेकअप के लिए परफेक्ट स्किन देता है. आमतौर पर हम सभी अपने फेस के लिए स्किनटोन के हिसाब से बेस चुनते हैं. पर वह कैसे हों इसके बारे में आज हम आपको बताएंगे.

ड्राई स्किन के लिए ट्राई करें ये बेस औप्शन  

अगर आपकी स्किन ड्राई है तो आप टिंटिड मौइश्चराइजर, क्रीम बेस्ड फाउंडेशन या सूफले का इस्तेमाल कर सकती हैं.

1. ड्राईनैस को टिंटिड मौइश्चराइजर से करें मौइश्चराइज

अगर आपकी स्किन साफ, बेदाग व निखरी हुई है, तो आप बेस बनाने के लिए केवल टिंटिड मौइश्चराइजर का इस्तेमाल कर सकती हैं. इसे लगाना बेहद आसान है. अपने हाथ में मौइश्चराइजर की कुछ बूंदें लें और अपनी उंगली से चेहरे पर जगह-जगह डौट्स लगा कर एक-सार फैला लें. यह एसपीएफ यानी सनप्रोटैक्शन फैक्टर के साथ भी आता है, जिसके कारण यह हमारी स्किन को प्रौटेक्ट करता है. इसके अलावा यह हमारी स्किन को तेज हवाओं व अन्य वजह से होने वाली ड्राईनैस से बचा कर मौइश्चराइज भी करता है.

ये भी पढ़ें- 4 टिप्स: मसूर दाल पाउडर से पाएं चेहरे पर निखार

2. क्रीम बेस्ड फाउंडेशन का करें ऐसे इस्तेमाल

यह स्किन की ड्राईनैस को कम कर के उसे मौइश्चराइज करता है, इसलिए यह ड्राई स्किन वालों के लिए काफी अच्छा होता है. इसे लगाने से स्किन को प्रौपर मौइश्चर मिलता है. इसे यूज करना भी आसान है. स्पैचुला से थोड़ा सा बेस हथेली पर लें और स्पंज या ब्रश की मदद से एकसार पूरे फेस पर लगा लें. इसे सैट करने के लिए पाउडर की एक परत लगाना जरूरी है. इस से बेस ज्यादा देर तक टिका रहता है.

3. फेस पर लाइट कवरेज देता है सूफले

यह बेहद हलका होता है और फेस पर लाइट कवरेज देता है. सूफले को स्पैचुला की मदद से थोड़ा सा हथेली पर लें. फिर ब्रश या स्पंज की मदद से पूरे फेस पर एकसार फैला लें.

औयली स्किन के लिए ट्राई करें ये बेस औप्शन

अगर आपकी स्किन औयली है और पसीना बहुत आता है, तो टू वे केक का इस्तेमाल आप के लिए बेहतर है, क्योंकि यह एक वाटरपू्रफ बेस है. इसके अलावा आप अपनी स्किन के लिए पैन स्टिक और मूज का भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

ये भी पढ़ें- 5 टिप्स: गरमी में पैर रहेंगे क्लीन

4. क्रीमी फौर्म में होती पैन स्टिक

यह क्रीमी फौर्म में होती है, जिस कारण स्किन को मौइश्चराइज करती है और साथ ही वाटरपू्रफ होने के कारण औयली स्किन के लिए अच्छी होती है.

5. क्विक वाटरपू्रफ बेस है टू वे केक

यह एक क्विक वाटरपू्रफ बेस है. इसे आप अपने पर्स में कैरी कर सकती हैं और कहीं भी टचअप दे सकती हैं. टू वे केक के साथ स्पंज मिलता है. इसे बेस की तरह इस्तेमाल करने के लिए स्पंज को गीला कर लें और पूरे चेहरे पर फैलाएं. टचअप देने के लिए आप सूखे स्पंज का इस्तेमाल कर सकती हैं. बस ध्यान रखें कि टू वे केक आपकी स्किन से मैच करता हो.

6. पाउडर फौर्म में चेंज हो जाता है मूज

मूज का इस्तेमाल औयली स्किन वालों के लिए काफी उपयुक्त रहता है. मूज चेहरे पर लगाते ही पाउडर फौर्म में चेंज हो जाता है, जिस कारण पसीना नहीं आता. यह अतिरिक्त औयल रिमूव कर के फेस को मैट फिनिश और लाइट लुक देता है. इसे हथेली में लें और स्पंज या ब्रश की मदद से चेहरे पर एकसार फैला लें.

नौर्मल स्किन के लिए ट्राई करें ये बेस औप्शन

अगर आप की स्किन नौर्मल है, तो फाउंडेशन और कौंपैक्ट आपके लिए अच्छे औप्शन हैं.

ये भी पढ़ें- 6 होममेड टिप्स : ऐसे रखें अपनी खूबसूरती का ख्याल

7. लिक्विड फौर्म में फाउंडेशन करें इस्तेमाल

यह लिक्विड फौर्म में होता है. आजकल मार्केट में हर स्किन के हिसाब से ढेरों शेड्स में मिलते हैं. इसे लगाते ही स्किन एक जैसी दिखती है. फाउंडेशन अपनी स्किन से मैच करता या एक शेड फेयर लगाएं. इसे हथेली में लें और फिर इंडैक्स फिंगर से माथे, नाक, गालों और ठोढ़ी पर डौट्स लगाएं. स्पंज या ब्रश की सहायता से ब्लैंड कर लें. चाहें तो हाथ का भी इस्तेमाल कर सकती हैं. इसे सैट करने के लिए पाउडर की एक परत लगाना जरूरी है. इससे बेस ज्यादा समय तक टिका रहता है.

8. पाउडर और फाउंडेशन का मिक्सचर होता है कौंपैक्ट

यह पाउडर और फाउंडेशन दोनों का मिक्स फौर्म होता है. अगर आप को कहीं जल्दी में जाना है और आपके पास समय नहीं है, तो आप सिर्फ कौंपैक्ट का इस्तेमाल कर सकती हैं. इसे केवल पफ की मदद से ही लगाएं. आजकल हर स्किन से मैच करते कौंपैक्ट पाउडर बाजार में उपलब्ध हैं. अपनी स्किनटोन से मैच करता कौंपैक्ट लगाएं. कौंपैक्ट का इस्तेमाल टचअप देने के लिए भी कर सकती हैं. स्टूडियो फिक्स, डर्मा फाउंडेशन, मूज व सूफले इन दिनों मार्केट में काफी मौजूद हैं.

9. फाउंडेशन का कंबाइंड सल्यूशन है स्टूडियो फिक्स

यह पाउडर और फाउंडेशन का कंबाइंड सल्यूशन है, जो लगाते वक्त क्रीमी होता है और लगाने के बाद पाउडर फार्म में तबदील हो जाता है. यह स्किन पर लाइट होते हुए भी फुल कवरेज देता है और चेहरे पर लंबे समय तक टिका रहता है.

10. कंसीलर व बेस दोनों का काम करता है डर्मा फाउंडेशन

यह स्टिक फार्म में होता है. यह कंसीलर व बेस दोनों का काम करता है. यह चेहरे के सभी स्कार्स व अंडरआईज डार्क सर्कल्स को छिपा के चेहरे को फुल कवरेज देता है.

ये भी पढ़ें- 10 टिप्स: गरमी में टैनिंग को ऐसे कहें बाय-बाय

Edited by Rosy

आज का इनसान ऐसा क्यों

‘‘कहिए सोमजी, क्या हाल है? भई क्या लिखते हैं आप…बहुत तारीफ हो रही है आप की रचनाओं की. आप अपनी रचनाओं का कोई संग्रह क्यों नहीं निकलवाते. देखिए, आप ने मेरे साथ भी वफा नहीं की. मैं ने मांगा भी था आप से कि कुछ दीजिए न अपना पढ़ने को…’’

‘‘बिना पढ़े ही इतनी तारीफ कर रहे हैं आप साहब, पढ़ लेंगे तो क्या करेंगे…डर गया हूं आप से इसीलिए कभी कुछ दिया नहीं. वैसे मेरे देने न देने से क्या अंतर पड़ने वाला है. पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं. आप कहीं से भी उठा कर पढ़ सकते हैं. मैं ने वफा नहीं की ऐसा क्यों कह रहे हैं?’’

‘‘इतना समय किस के पास होता है जो पत्रिका उठा कर पढ़ी जाए…’’

‘‘तो आप जब भी मिलते हैं इतनी चापलूसी किस लिए करते रहते हैं. मुझ पर आरोप क्यों कि मैं ने अपना कुछ पढ़ने को नहीं दिया. पढ़ने वाला कहीं भी समय निकाल लेता है, वह किसी की कमजोर नस का सहारा ले कर अपनी बात शुरू नहीं करता.’’

इतना बोल कर सोम आगे निकल गए और मैं हक्काबक्का सा उन के प्रशंसक का मुंह देखता रहा. उस के बाद यह सोच कर स्वयं भी उन के पीछे लपका कि पुस्तक मेले में वह कहीं खो न जाएं.

‘‘सोमजी, आप ने उस आदमी से इस तरह बात क्यों की?’’

‘‘वह आदमी है ही इस लायक. बनावटी बातों से बहुत घबराहट होती है मुझे.’’

‘‘वह तो आप का प्रशंसक है.’’

‘‘प्रशंसक नहीं है, सिर्फ बात करने के लिए विषय पकड़ता है. जब भी मिलता है यही उलाहना देता है कि मैं ने उसे कुछ पढ़ने को नहीं दिया जबकि सत्य यह है कि उस के पास पत्रिका हो तो भी उठा कर देखता तक नहीं.’’

‘‘आप को उस का न पढ़ना बुरा लगता है?’’

‘‘क्यों भई, लाखों लोग मुझे पढ़ते हैं…एक वह न पढ़े तो मैं क्यों बुरा मानूं. पढ़ना एक शौक है विजय जिस में कोई जबरदस्ती नहीं चल सकती. जिसे पढ़ने की लत हो वह खाना खाते भी पढ़ लेता है और जिसे नहीं पढ़ना उसे किताबों के ढेर में फेंक दो तो भी वह पढ़ेगा नहीं.

‘‘उस का बेटा इस साल फाइनल में है. मेरे हाथ में उस की एसाइनमेंट है. इसलिए जब भी मिलता है प्रशंसा का चारा मेरे आगे डालने लगता है, जो मेरे गले में फांस जैसा फंस जाता है. बेवकूफ हूं क्या मैं? क्या मुझे समझ में नहीं आता कि वह कितना दिखावा कर रहा है. झूठ क्यों बोलना?

‘‘मैं ने तो उसे नहीं कहा कि मेरी तारीफ करो. जब उस ने मेरा लिखा कभी पढ़ा ही नहीं तो झूठी तारीफ भी क्यों करनी. पढ़ कर चाहे बुराई ही करो वह मुझे मंजूर है. जरूरी नहीं मेरा लिखा सब को पसंद ही आए. सब का अपनाअपना दृष्टिकोण है जीवन को नापने का. जोजो मैं ने अपने जीवन में पाया वहवह मेरा सच है. जो तुम जीवन से सीखोगे वही तुम्हारा भी सच होगा. जरूरी तो नहीं न तुम्हारा और मेरा सच एक ही हो.’’

सोमजी अपनी ही रौ में बहते हुए कहते भी गए और अपनी मनपसंद पुस्तकें भी चुनते गए. सच ही तो कह रहे हैं सोमजी…किसी के भी व्यवहार का सच वह कितनी जल्दी पकड़ लेते हैं. मैं ने उन से कहा तो हंस पडे़.

‘‘अरे, नहीं विजय, किसी का भी व्यवहार झट से पकड़ लेना आसान नहीं है. आज का इनसान बहुत समझदार हो गया है. किस की कौन सी नस पर हाथ रख कर अपना कौन सा काम निकालना है उसे अच्छी तरह आता है. और मुझ जैसा भावुक मूर्ख इस का शिकार अकसर हो जाता है.’’

ये भी पढ़ें- निर्णय: आखिर क्यों अफरोज ने किया निकाह से इंकार?

सोमजी, खरीद कर लाई कुछ किताबें उलटतेपलटते हुए मुसकराने लगे. बड़ी गहरी होती है उन की मुसकान. अपनी मनपसंद पुस्तक में कुछ मिल गया था उन्हें. मेरी ओर देख कर बोले, ‘‘विजय, कुछ बातें सिर्फ कहने के लिए ही कही जाती हैं. उन का कोई अर्थ नहीं होता. जैसे कि किसी ने आप से आप का हाथ पकड़ कर आप का हालचाल पूछा. उसे आप की सेहत से कुछ भी लेनादेना नहीं होता. बस, एक शिष्टाचार है. सिर्फ इसलिए पूछा कि सवाल पूछना था. पूछने वाले के शब्दों में कोई गहराई नहीं होती.

‘‘एक सतही सा सवाल है कि आप कैसे हैं. आप कल चाहे किसी भयानक बीमारी से मर ही क्यों न जाएं लेकिन आज आप को सिर्फ यही उत्तर देना है कि आप अच्छे हैं. अपनी बीमारी का दुखड़ा रोना आज का शिष्टाचार नहीं है. अपने मन की बात खुल कर करना आज का शिष्टाचार है ही नहीं. आप के मन में भावनाओं का ज्वारभाटा तूफानी वेग से उमड़घुमड़ रहा हो लेकिन आज का शिष्टाचार, यही सिखाता है कि बस, चुप रह जाओ. एक बनावटी सी…नकली सी मुसकान चेहरे पर लाओ और अपनी पीड़ा अपने तक ही रखतेरखते हंसते हुए कहो, ‘मैं अच्छा हूं.’

‘‘उस आदमी को न तो मेरी रचनाओं से कुछ लेनादेना है न ही मेरी लेखनी से. उस के हाथ अगर अपना कुछ लिखा दे दूंगा तो हो सकता है कह दे, उसे पढ़ने का शौक ही नहीं है. मैं ने बेकार ही तकलीफ की, क्योंकि शिष्टाचार है इसलिए जब भी मिलता है यही एक उलाहना देता है कि मैं ने उसे कुछ दिया नहीं जिसे वह पढ़ पाता.’’

बड़े गौर से मैं सोमजी का चेहरा पढ़ता रहा. सच ही तो कह रहे हैं सोम. वास्तव में आज का युग वह नहीं रहा जो हमारे बचपन और हमारी जवानी में था. हमारे बचपन में वह था जिस की जड़ें आज भी गहरी समाई हैं हमारी चेतना में. शब्दों में गहराई थी. हां का मतलब हां ही होता था और ना का मतलब सिर्फ ना. आज जरूरी नहीं हां का मतलब हां ही हो. शिष्टाचारवश किसी का हां कह देना वास्तव में ना भी हो सकता है. शब्दों में गहराई है कहां जिन में जरा सी ईमानदारी नजर आए. एक ओढ़ा हुआ जीवन सभी जी रहे हैं. शब्दों का नाता सिर्फ जीभ से है सत्य से नहीं.

हफ्ता भर ही बीता उस वाकया को कि मुझे किसी काम से दिल्ली जाना पड़ा. मेरे एक मित्र बीमार थे…उन्हीं ने बुला भेजा था. कैंसर की आखिरी स्टेज पर हैं वह. कब समय आ जाए नहीं जानते इसलिए मिलना चाहते थे. उन के परिवार से 2-4 दिन वास्ता पड़ा मेरा. मौत के कगार पर खड़ा मेरा मित्र किसी भी कोण से दुखी हो ऐसा नहीं लगा मुझे.

‘‘ऐसा जीवन बारबार जीना चाहता हूं मैं. कोई भी ऐसी इच्छा नहीं है मेरी जो पूरी न हुई हो. संतुष्ट हूं मैं. बारबार थोड़े ही मरूंगा. एक बार ही तो मरना है…जब उस की इच्छा हो…मैं तैयार हूं.’’

मित्र का सीधासादा मध्यवर्गीय परिवार है. अपने छोटे से फ्लैट में वह पत्नी के साथ रहता है. बेटा नई पीढ़ी का है… परेशान रहता है. अच्छी कंपनी में नौकरी करता है. जितना पिता ने नौकरी के आखिरी दिनों में कमाया होगा उस से कहीं ज्यादा वह आज हर महीने कमाता है फिर भी सुखी नहीं है.

‘‘पता नहीं आज के बच्चों को चैन क्यों नहीं है. सबकुछ है फिर भी खुश नजर नहीं आते. हम ने जो सब धीरेधीरे बनाया था उस को यह शुरू के 4-5 साल में ही बना लेते हैं. कर्ज पर घर बना लिया, कर्ज पर गाड़ी, कर्ज पर घर का सारा सामान. कभी इस के घर जा कर देखो क्या नहीं है मगर सब कर्ज पर है. महीने के शुरू में ही कंगाल नजर आता है क्योंकि पूरी तनख्वाह तो किस्तों में बंट कर अपनीअपनी जगह पर चली जाती है. अभी अकेला है, खानापीना हमारे पास चल जाता है. कल को शादी होगी तो घर कैसे चलाएगा, मेरी तो समझ में नहीं आता.’’

‘‘बीवी भी तो कमाएगी न. रोजीरोटी वह चला लेगी घर इस ने बना ही लिया है. सब प्लान बना रखा है बच्चों ने, तुम क्यों परेशान…’’

‘‘अरे, नहीं बाबा, मैं परेशान नहीं हो रहा…मैं तो खुश हूं कि आज भी अपने कमाऊ बेटे को पाल रहा हूं. आज भी उस पर बोझ नहीं हूं. इस से बड़ा संतोष मेरे लिए और क्या होगा कि मेरे शरीर में स्थापित कैंसर भी मुझे तंग नहीं कर रहा. इतनी खतरनाक बीमारी पेट में लिए घूम रहा हूं पर क्या मजाल मुझे जरा सी भी तकलीफ हो.

‘‘मुझे जीवन से कोई शिकायत नहीं है. हम पतिपत्नी अपने फ्लैट में आराम से रह रहे हैं. सौरभ ने अपना घर ले रखा है. रात वहीं चला जाता है सोने. मेरी औलाद भी अपने पैरों पर खड़ी है. बेटी अपने घर में खुश है. मेरे बाद मेरी पत्नी भी किसी का मुंह नहीं देखेगी, इतना प्रबंध कर रखा है. सौरभ भी मां का खयाल रखेगा पूरा विश्वास है मुझे. देखो विजय, इनसान को अगर खुश रहना है तो उसे अपनी सोच को बदलना होगा. अंधी दौड़ में रहेगा तो कभी भी खुश नहीं रह पाएगा. स्वर्र्ग मरने के बाद नहीं मिलता और न मरने के बाद नरक ही होता है. सब यहीं है, इसी जन्म में. कुछ हमारे द्वारा बोए गए कर्म कुछ उन का फल, कुछ संयोग और कुछ हादसे यही सब मिला कर ही तो हमारा जीवन बनता है. हमें यह जीवन जीना है और इसे जिए बिना गुजारा नहीं है तो क्यों न इस तरह जिएं कि किसी को हमारी वजह से तकलीफ न हो.’’

ये भी पढ़ें- ईद का चांद

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है. कहीं न कहीं, कभी न कभी तो ऐसा होता ही है. समाज में रह कर हम सब के साथ जीते हैं. हम सब को सुख ही दे पाएं ऐसा नहीं होता. यदि कोई हमें पसंद ही न करे तो हम कैसे उसे भी खुश रखें. संसार में रहते हुए सब को सुख देना आसान नहीं होता. लाख यत्न करो, कहीं न कहीं कुछ न कुछ छूट ही जाता है.’’

‘‘जो तुम्हें पसंद नहीं करता तुम उस से दूर रहो ऐसा भी तो हो सकता है न. गुजारे लायक ही उस के पास जाओ. एक जायज और सम्मानजनक दूरी रखो. जितना कम वास्ता पड़ेगा उतनी कम तकलीफ होगी.’’

‘‘यदि रिश्ता ही ऐसा हो कि दूरी रखना संभव न हो…’’

‘‘तो उसे स्वीकार कर लो. उस इनसान की वजह से दुखी होना ही छोड़ दो. उस के सामने चिकने घड़े बन जाओ.’’

‘‘तुम्हारा मतलब है ढीठ बन जाओ, क्योंकि तुम्हें अपने मन की शांति के साथ जीना है…इस के लिए क्या बदतमीज ही बन जाना पड़ेगा.’’

‘‘बदतमीज और ढीठ बनने को कौन कह रहा है. उस इनसान को एक सीमा तक नकार दो. अपना दायित्व निभाते रहो. एक उचित दूरी रख कर शांति से रहा जा सकता है.’’

‘‘एक स्वार्थी इनसान के साथ शांति से कैसे रहना?’’

‘‘स्वार्थी इनसान तो हर पल अपनी आग में जलता ही रहता है. कम से कम हम उसे नकार कर अपनी जान तो बचा लें, उस की सोच का प्रभाव हम पर क्यों हो. हम उसे बदल नहीं सकते. उसे कुदरत ने ऐसा ही बनाया है तो क्यों उसे बदलने की कोशिश करें. हम भी इनसान हैं यार…क्यों बिना वजह औरों की गलती की सजा भोगें.

‘‘मेरे बड़े भाई साहब को ही देख लो, सारी उम्र उन्होंने पिताजी की शराफत और कमजोरी का फायदा उठाया और उन की धनसंपदा पर ऐश किया. हम घर से बाहर हैं नौकरी पर. जितनी चादर थी उतने ही पैर पसारे. भाई साहब की तरह शानोशौकत में रहते तो गुजारा ही न चलता. मैं ने कभी पिता से कुछ नहीं मांगा.

‘‘इन दिनों भाई साहब नाराज चल रहे हैं. सारी जायदाद बेच कर खा चुके हैं. मुझ से मदद चाहते हैं. अब तुम्हीं बताओ, मैं उन की मदद कैसे करूं? अपनी मौत का इंतजार करता मैं उस भाई की सहायता कैसे करूं जिस ने सदा मुझे बेवकूफ बनाया और समझा भी. जिस के पैर सदा चादर से बाहर रहे, क्या मैं भी उस भाई के लिए नंगा हो जाऊं.

‘‘सारी उम्र मैं सादगी में जिआ, इसीलिए न कि कभी किसी के आगे हाथ न फैलाना पडे़े…तो क्या उन की मदद कर मैं भी सड़क पर आ जाऊं. सो नकार दिया है मैं ने उन की नाराजगी को. नहीं तो न सही. वह मुझे मिलने नहीं आते न आएं, मैं क्यों अपने मन को जलाऊं. मैं दुखी नहीं होता क्योंकि मैं जानता हूं मेरी सामर्थ्य से बाहर है उन की मदद करना. 3-3 बिगड़े बेटों के पिता हैं वह. परिवार में 4 जन हैं कमाने वाले और मैं अकेला और बीमार. क्या मुझ से मदद मांगना उन्हें शोभा देता है? स्वार्थ की पराकाष्ठा नहीं है यह तो और क्या है?

‘‘कहते हैं मैं सौरभ से रुपए मांग कर उन्हें दे दूं. तुम्हीं बताओ, विजय, मैं सौरभ से भी ऐसी आशा क्यों करूं कि वह उस रिश्तेदार का पेट भरे जिस का पेट करोड़ों हजम कर के भी नहीं भरा. अरे, हम बापबेटे कोई इतने बड़े पैसे वाले तो हैं नहीं जो कहीं से लाखों निकाल कर उन्हें दे देंगे.’’

स्तब्ध रह गया मैं. मेरा मित्र जरा सा परेशान हो गया अपनी सुनातेसुनाते. वास्तव में हैरानी थी मुझे.

‘‘मैं ने हाथ जोड़ कर माफी मांगी ली भाई साहब से. कहते हैं मैं मर जाऊंगा तो भी नहीं आएंगे. अब क्या करूं मैं? न आएं, अब मरने से पहले उन की मदद कर मैं अपना परिवार तो सड़क पर लाने से रहा…और मरने के बाद कौन आया कौन नहीं मेरी बला से. मैं देखने तो नहीं आऊंगा कि मेरे मरने पर कौन रोया कौन नहीं.’’

मित्र का हाथ अपनी हथेली में भींच लिया मैं ने. क्या गलत कह रहा है मेरा मित्र. भाई का स्वार्थ वह कहां तक ढोए और क्यों. सदा सादगी में रहा मेरा यह मित्र. लगभग 4-5 साल हम एकदूसरे के पड़ोसी रहे हैं. उन की पत्नी घर का एकएक काम अपने हाथ से करती थीं. कोई फुजूलखर्ची नहीं, कोई शानोशौकत नहीं. भाई साहब अकसर परिवार सहित तब आते थे जब जहाज पकड़ना होता था. कभी गोआ के लिए कभी ऊटी के लिए.

दिल्ली पालम एअरपोर्ट से वह हर साल उड़ानें भरते. हमें हैरानी होती थी, इन के पास इतने पैसे कहां से आते हैं. दूसरा भाई इतना सादा और हम जैसा ही मध्यवर्गीय, जिस की तनख्वाह 20 तारीख को ही आखिरी सांसें लेने लगती है. सच है, जो इनसान औरों के बल पर ऐश करता रहा उसे एक दिन तो जमीन पर आना ही था. और आया भी ऐसा कि उसी से मदद भी मांग रहा है जिस का अधिकार भी उस ने छोड़ा नहीं.

‘‘यह नरक नहीं तो और क्या है? मैं उन का सगा भाई हूं और मेरा स्नेह भी उन्हें दरकार नहीं. मेरा बेटा उन का सम्मान नहीं करता. मेरी पत्नी भी उन की तरफ पीठ कर लेती है. मेरे बाद सब समाप्त हो जाएगा, जानता हूं. कंगाल पिता का साथ बेटे भी कब तक देंगे. कल जिस इनसान ने सब को जूती के नीचे रखा आज उसी की ही जीवन शैली ने उसे कहां ला पटका. मेरे हाथ खड़े हैं, मैं जहां कल था आज भी वहीं हूं. न कल हवा में उड़ता था और न ही आज उड़ सकता हूं…आज तो खैर उड़ने का वक्त भी नहीं बचा.’’

कुछ छू गया मन को. मृत्यु की आंखों में हर पल झांकने वाला मेरा मित्र अपने जीवन का निचोड़ मेरे सामने परोस रहा था. सोम के शब्द याद आने लगे मुझे. हर इनसान का अपनाअपना सच होता है लेकिन कोई सच ऐसा भी होता है जो लगभग सब पर लागू होता है. जमीन से टूटा इनसान जब जमीन पर गिरता है. तब वह औरों पर दोष लगाता है. सदा अपना ही हित सोचने वाला जब सब से कट जाता है तब उन रिश्तों को कोसता है जिन का इस्तेमाल उस ने सदा अपने फायदे के लिए किया. रिश्तों में आज हम जो भी बीज डाल देंगे उसी का फल तो कल खाना पडे़गा…फिर पछताना कैसा और किसी पर दोषारोपण भी क्यों करना.

ये भी पढ़ें- परवरिश

‘‘मैं तो समझता हूं वह इनसान नसीब वाला है जो अपना मन किसी के आगे खोल कर रख सकता है और ऐसा वही कर पाएगा जिस के मन में छिपाने जैसा कुछ नहीं. सीधासादा साफसुथरा जीवन जीने वाला इनसान छिपाएगा भी क्या. तुम मुझे जानते हो, विश्वास कर सकते हो. मैं जो भी इस पल कह रहा हूं सच होगा क्योंकि अंदर भी वही है जो बाहर है.’’

मैं उस के चेहरे की तृप्त और मीठी मुसकान देख कर सहज अनुमान लगा सकता था कि वह अपने जीवन से नाराज नहीं है. उस का सादा सा घर जहां जरूरत का सारा सामान है, वही उस का साम्राज्य है. वैभव से सुख नहीं मिलता, इस का जीताजागता उदाहरण मेरे समक्ष था. भाभी के तन पर सादे से कपड़े और माथे पर कोई बल नहीं, कोई खीज या कोई संताप नहीं. सुखदुख हमारे ही भीतर है. हमारे ही मन और दिमाग की उपज.

सामर्थ्य के अनुसार ही इनसान चाह करे और जो मिला उसी को कुदरत का प्रसाद समझ कर ग्रहण करे इसी में सुख है. नहीं तो इच्छाओं की राह तो हमारे जीवन से भी कहीं ज्यादा लंबी है. दुखी होने को हजार बहाने हैं हमारे पास. जब चाहो दुखी और परेशान हो लो. अपने ही हाथ में तो है सब.

‘‘हमारी हर भावना ऐसी होनी चाहिए जो पारदर्शी हो. पर ऐसा होता नहीं. हमारे मन में कुछ होता है होंठोें पर कुछ. सामने वाले से बात करते हुए अकसर हम बडे़ अच्छे अभिनेता बन जाते हैं. मन में आग भड़कती है और हम होंठों से फूल बरसाते हैं, क्योंकि वह मुझ से आगे निकल गया. उस का घर मेरे घर से बड़ा हो गया यही तो सब से बड़ा रोना है. अपनी खुशी से खुश होना इनसान को याद ही नहीं रहा.’’

फिर से सोम की कही बातें याद आने लगीं मुझे. उस ने भी तो यही निचोड़ निकाला था उस दिन. हर इनसान अभिनेता बनता जा रहा है, जो शिष्टाचार के नाम पर आप से बात करता है और नपातुला उत्तर ही चाहता है, क्योंकि वास्तव में आप को सुनना उस की इच्छा और चाहत में शामिल ही नहीं होता.

विडंबना भी तो यही है कि आज का इनसान प्यार पाना तो चाहता है लेकिन प्यार करना नहीं, खुश रहना तो चाहता है खुशी देना उसे याद ही नहीं, अपने अधिकार के प्रति तो पूरा जागरूक है पर दूसरे के अधिकार का हनन उस ने कबकब किया उसे पता ही नहीं. अपनी पीड़ा पीड़ा और दूसरे की पीड़ा तमाशा, अपना खून खून दूसरे का खून पानी. कहीं कोई कमी नहीं फिर भी एक अंधी दौड़ में शामिल है आज का आदमी. थक जाता है, अवसाद में चला जाता है, जो पास है उस का सुख लेना भी आखिर क्यों भूल गया है आज का इनसान.

ये भी पढ़ें- प्यार का पौधा तीसरे देश की धरती पर

एयरपोर्ट नौकरी के नाम पर ठगी

एक तरफ जहां तकनीक ने लोगों को सुविधाओं से संपन्न कर दिया है वहीं दूसरी ओर अपराधों को भी इस तकनीक ने कुछ कम बढ़ावा नहीं दिया है. इन अपराधों में चोरी और ठगी के मामले भी कुछ कम नहीं हैं. आजकल नौकरी देनेदिलाने के नाम पर खूब ठगी की जा रही है.

नौकरी की ठगी का शिकार अत्यधिक युवावर्ग होता है जिसे नौकरी की तलाश होती है. नौकरी की ठगी एयरलाइंस में भी नौकरी देने के नाम पर की जा रही है. यह ठगी 1,500 से 20,000 रुपए के बीच हो सकती है, जिस के कई उदाहरण सामने आ रहे हैं.

जनवरी 2018

एयरलाइंस में नौकरी करने की इच्छा रखने वाले कुछ युवाओं को एयरइंडिया के नाम से ईमेल मिला. इस ईमेल में लिखा था कि कंपनी ने इन का बायोडाटा सलैक्ट कर लिया है और इन्हें औनलाइन इंटरव्यू देना होगा. ईमेल में यह भी लिखा था कि इन प्रतिभागियों को 9,600 रुपए की रिफंडेबल रकम जमा करनी है जो उन के इंटरव्यू प्रोसेस, मेनटेनैंस, कुरियर आदि के लिए इस्तेमाल की जाएगी और कुछ समय बाद वापस कर दी जाएगी.

इस रकम को देख कर कुछ युवाओं के कान खड़े हुए परंतु कुछ इस ठगी का शिकार हो गए. बहरहाल, इन ठगों को इस से फर्क नहीं पड़ा लेकिन एयरइंडिया द्वारा इस तरह के सभी ईमेल्स को फ्रौड करार दे दिया गया.

एयरलाइंस द्वारा किसी भी प्रतिभागी को बिना किसी एप्लीकेशन प्राप्ति के ईमेल नहीं भेजे जाते. सभी एयरलाइंस किसी भी तरह के चयनांकन में कोई रकम नहीं मांगती. यदि व्यक्ति के पास किसी तरह का ईमेल आए और उसे फीस या सेलैक्शन के नाम पर पैसे मांगे जाएं तो समझ लीजिए यह फ्रौड है.

ये भी पढ़ें- अवैध संबंध

मार्च 2017

अखबार के क्लासीफाइड सैक्शन में एक विज्ञापन छपा जिस पर लिखा था ‘ग्रेजुएट लड़के और लड़कियों के लिए एयरपोेर्ट में नौकरी.’ इस विज्ञापन में साफ शब्दों में लिखा था कि किसी तरह का इंटरव्यू नहीं होगा. इस विज्ञापन को पढ़ लोगों ने नीचे दिए नंबर पर फोन किया तो एक महिला ने दूसरी तरफ से बात की और आवेदक को 1,500 की रकम जौब प्रोसेसिंग के नाम पर जमा करने के लिए कहा. अकाउंट किसी पूजा रावत के नाम पर था जो नारायणा विहार, दिल्ली के पंजाब नैशनल बैंक में था.

इन आवेदकों में एक आवेदक अंबाला की मीनू भी थी. मीनू ने 1,500 रुपए इस आकउंट में जमा करा दिए तो उन्हें 2 दिन बाद एयरपोर्ट अथौरिटी औफ इंडिया के नाम से एक अपौइंटमैंट लेटर आया. इस लेटर में लिखा था कि उन्हें सिक्योरिटी एग्रीमैंट फीस के नाम पर 15,000 रुपए जमा कराने हैं. नौकरी असल में फ्रौड थी. इस का पता मीनू को समय रहते चल गया. परंतु 1,500 रुपए न जाने कितने ही आवेदकों ने इस फ्रौड अकाउंट में डलवाए होंगे.

जब इस तरह की घटनाओं की शिकायत एयरपोर्ट अथौरिटी को मिली तो डायरैक्टर द्वारा पुष्टि की गई कि एयरपोर्ट अथौरिटी द्वारा किसी प्रकार का विज्ञापन नहीं दिया गया.

एयरलाइंस द्वारा यदि कोई विज्ञापन दिया भी जाता है तो वह क्लासीफाइड सैक्शन में नहीं होता. यदि कोई ईमेल लेटर भेजा भी जाता है तो वह एयरपोर्ट अथौरिटी के नाम से होगा न कि किसी व्यक्ति के नाम पर.

एयरलाइंस द्वारा इंटरव्यू की प्रक्रिया अनिवार्य होती है. इंटरव्यू के बिना एयरलाइंस प्रतिभागियों को नौकरी नहीं देती. एयरलाइंस की नौकरी के विज्ञापनों में आवेदन जमा करने की आखिरी तारीख हमेशा लिखी होती है.

इन बातों का रखें ध्यान

एयरलाइंस जिन लोगों की भरती करती है वे पढ़ेलिखे व ट्रेनिंग प्राप्त होते हैं. यदि किसी विज्ञापन में यह लिखा हो कि 10वीं व 12वीं पास छात्रों के लिए केबिन क्रू या एयरहोस्टैस की नौकरी है तो समझ जाइए कि यह फ्रौड है और इस से सावधान रहिए.

यदि आप किसी एयरलाइंस के नाम से किसी तरह का ईमेल प्राप्त करते हैं, तो उस एयरलाइन की मुख्य वैबसाइट पर जा कर उस ईमेल की पुष्टि करें.

ये भी पढ़ें- आप चोर हैं, सरकार की नजर में

एयरपोर्ट अथौरिटी औफ इंडिया के नाम से यदि किसी वैबसाइट या नौकरी पोर्टल पर कोई विज्ञापन हो तो संभवतया वह फ्रौड है क्योंकि एयरपोर्ट अथौरिटी द्वारा केवल उस की खुद की वैबसाइट पर ही नौकरी की पोस्ट डाली जाती हैं.

फ्रौड नौकरियों को पहचानने का सब से अच्छा तरीका यह है कि आप पूछें कि उन्होंने (उस एयरलाइंस) ने आप से किस आधार पर संपर्क किया है. यदि वे यह कहें कि उन्होंने आप का बायोडाटा वैबसाइट से लिया है तो यह फ्रौड है. एयरलाइंस इस तरह से किसी को कौल नहीं करतीं. उन के पास आवेदकों की कमी नहीं जो वे आप को ढूंढ़ कर संपर्क करें.

आप को इंटरव्यू का स्थान यदि होटल या कोई प्राइवेट फर्म बताया जाए तो इस का अर्थ है कि वे ठग हैं क्योंकि एयरलाइंस हमेशा अपनी कंपनी में ही इंटरव्यू रखती हैं.

जब आप को ज्ञात हो जाए कि जिस व्यक्ति ने आप से संपर्क किया है वह फ्रौड है तो बिना सोचविचार किए जल्द से जल्द पुलिस को इस की सूचना दें. इस से दूसरे व्यक्ति भी फ्रौड का शिकार होने से बच जाएंगे.

ये भी पढ़ें- टीचर करे पिटाई तो क्या करें पेरैंट्स

राजनीति में युवा हैं कहां

गुजरात के सुरेंद्र नगर में एक रैली को संबोधित कर रहे युवा कांग्रेसी नेता हार्दिक पटेल को एक शख्स ने जो जोरदार थप्पड़ मारा उस की गूंज उतनी सुनाई नहीं दी जितनी कि सुनाई देनी चाहिए थी. आरोपी भले ही इस की वजहें कुछ भी गिनाता रहे पर हकीकत में यह थप्पड़ उस मानसिकता का प्रतीक था जो अपने दम पर राजनीति में जगह बना रहे पिछड़े और दलित युवाओं को हतोत्साहित करने का कोई मौका नहीं छोड़ती.

राजनीति में युवाओं को जाति और धर्म के नाम पर न बांटे जाने की कोई ठोस या तार्किक वजह है भी नहीं. यह कहने भर की बात है कि हमें युवाओं को इस परंपरागत तरीके से नहीं देखना चाहिए.

हकीकत तो यह है कि धर्म का अनुसरण करती राजनीति भी युवाओं को इसी नजरिए से देखती और बांटती रही है और अगर ऐसा नहीं होता तो मौजूदा आम चुनावों में युवा उम्मीदवारों की संख्या सभी प्रमुख दलों की ओर से 250 से कम न होती. देश में युवा मतदाताओं की संख्या कोई 60 करोड़ है लेकिन उन का प्रतिनिधित्व वृद्ध लोग कर रहे हैं.

युवाओं की चुनौती

राजनीति में युवाओं की भागीदारी को ले कर बड़ीबड़ी बातें अकसर हर किसी मंच से होती रहती हैं लेकिन कोई दल उन्हें प्रतिनिधित्व का मौका नहीं देता क्योंकि उन की नजर में युवा वोट भर हैं. दिक्कत तो यह है कि खुद युवा भी अपनी तरफ से कोई पहल नहीं करते. सियासी दल उन का इस्तेमाल भीड़ और ट्रौलिंग के लिए करते रहते हैं. दूसरे भारतीय परिवारों में भी राजनीति को ले कर एक पूर्वाग्रह है कि इस में वही लोग जाते हैं जो कुछ और नहीं कर सकते और राजनीति में कोई कैरियर या भविष्य नहीं है.

ये भी पढ़ें- दलितों के भरोसे दिग्विजय

हालांकि यह मिथक अब धीरेधीरे टूट रहा है लेकिन लगता नहीं कि इस के बाद भी राजनीति में युवाओं को वह जगह और सम्मान मिल पाएगा जिस के कि वे आबादी के लिहाज से हकदार हैं.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में युवाओं ने बढ़चढ़ कर मतदान किया था तो इस की वजह मशहूर समाजसेवी अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन था जिस में देशभर के युवाओं ने शिद्दत से शिरकत की थी. इस के तुरंत बाद भाजपा से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने युवाओं की कमजोर नब्ज पकड़ते हुए हर साल 2 करोड़ नौकरियों का वादा किया तो युवा उन के भी झांसे में आ गए और जातपांत व धर्म को दरकिनार करते उन्हें चुना.

2014 के लोकसभा चुनाव में नए युवा मतदाताओं की तादाद 11 करोड़ 72 लाख थी. नरेंद्र मोदी रोजगार के अपने वादे पर खरे नहीं उतर पाए, नई नौकरियां या रोजगार के मौके पैदा करना तो दूर की बात है, नोटबंदी और जीएसटी ने युवाओं की लगी लगाई नौकरियां छीन लीं.

अब भी नरेंद्र मोदी युवाओं को छल ही रहे हैं. वे अब नए यानी पहली बार वोट करने जा रहे युवाओं से कह रहे हैं कि वे अपना पहला वोट बालाकोट एयर स्ट्राइक के मद्देनजर पुलवामा के शहीदों के नाम करें यानी सरकार की इस कथित उपलब्धि, जिस का कोई पुख्ता सुबूत तक नहीं है, को सैल्यूट ठोकते भाजपा को फिर चुन लें.

युवाओं में देशभक्ति का स्वाभाविक जज्बा होता है जिसे भुनाने उन से यह भावुक अपील उन्होंने की तो चुनाव आयोग ने इस पर दिखावे की सख्ती दिखाई तो इस के बाद नरेंद्र मोदी ने इस बात को दोहराया नहीं क्योंकि युवाओं को उन का 2014 का वादा और उस के बाद के हालात भी नजर आने लगे थे.

मौजूदा चुनाव युवाओं के लिहाज से बेहद अहम हैं क्योंकि इस बार नए युवा वोटरों की तादाद लगभग 15 करोड़ है. जाहिर है ये युवा जिस तरफ झुक जाएंगे उस के लिए दिल्ली की राह आसान हो जाएगी. लेकिन युवाओं की बेरुखी और खामोशी से सभी पार्टियां हलकान हैं और इस बार लुभावने वादे नहीं कर रहीं क्योंकि दांव उलटा भी पड़ सकता है.

युवा राजनीति से नाउम्मीद हो चला है तो इस की अपनी वजहें भी हैं जिन में सब्जबाग दिखा कर पार्टियों का वादों से मुकर जाना खास है. अब यह 23 मई के नतीजे बताएंगे कि युवाओं ने किस के बटन को दबाया. लेकिन राजनीति में युवा क्यों नहीं हैं, इस पर गौर करना उस से भी ज्यादा जरूरी है.

राजनीति में भागीदारी

राजनीति एक उद्योग की तरह है. इस में जाना कैसे है, यह अधिकतर युवाओं को नहीं मालूम रहता और जिन्हें मालूम रहता है वही राजनीति में दिखते हैं और ये 5-6 सक्रिय युवा ही राजनीति चमकाते हैं.

देश में कम हैरत की बात नहीं कि अप्रत्यक्ष रूप से सभी युवा राजनीति से जुड़े रहते हैं लेकिन उन की दिलचस्पी राजनेताओं को कोसने व गाली देने में ज्यादा रहती हैं.

ये युवा मानते हैं कि उन की और देश की दुर्दशा के जिम्मेदार सिर्फ राजनेता ही होते हैं जो ऊंचे मुकाम पर पहुंचने के बाद भ्रष्टाचार व घोटाले करते देश को दीमक की तरह चाटते हैं और इन का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता. ये युवा अकसर ख्बाबों और खयालों में सिस्टम को सुधारते रहते हैं, लेकिन राजनीति में सीधे नहीं आते.

राजनीति में युवाओं की इस निष्क्त्रिय सी भागीदारी पर अकसर परिवारवाद को दोषी ठहराया जाता है, जबकि यह पूरा सच नहीं है. अरविंद केजरीवाल कोई पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले या पेशेवर राजनेता नहीं हैं और न ही उन्होंने कभी राजनीति में आने की बात सोची थी.

कहने का मतलब यह नहीं कि वे कोई ऐक्सिडैंटल नेता हैं बल्कि यह है कि उन्होंने अच्छीखासी नौकरी छोड़ कर भ्रष्ट सिस्टम को सुधारने का बीड़ा उठाया और उस में कामयाब भी हो रहे हैं. दिल्ली के विकास की मिसाल अब हर कहीं दी जाने लगी है जिस से एक उम्मीद तो जागती है कि अगर युवा राजनीति में आएं तो काफी कुछ कर सकते हैं.

ये भी पढ़ें- सर्वेक्षण हैं या बैलेन्स शीट

अन्ना हजारे के आंदोलन की देन अरविंद केजरीवाल के सफल होने के बाद कई उच्च शिक्षण संस्थानों के छात्रों ने राजनीति में आने की इच्छा जताई थी. वे नहीं आए, यह और बात है लेकिन एक और बात उन्होंने यह सीखी थी कि अगर आप अपने दम पर राजनीति करते हैं तो तरहतरह से आप को परेशान किया जाएगा.

परीक्षा की घड़ी

बिहार की बेगुसराय सीट से कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर भाजपाई दिग्गज गिरिराज सिंह को कड़ी टक्कर दे रहे छात्र नेता कन्हैया कुमार के समर्थन में देशभर के युवा हैं और कई सैलिब्रिटीज उन का प्रचार करने बेगुसराय पहुंच भी रहे हैं लेकिन इस के बाद भी चुनावी लिहाज से कन्हैया कुमार की जीत की गारंटी नहीं है क्योंकि उन की इमेज एक ऐसे नेता की गढ़ी जा रही है जो वामपंथी है और हिंदू धर्म का दुश्मन है.

अच्छी बात यह है कि कन्हैया कुमार पर इस दुष्प्रचार का कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा है और देशभर के धर्मनिरपेक्ष युवा उन्हें समर्थन व शुभकामनाएं भेज रहे हैं. गौरतलब है कि उन का भी विरोध देशभर में भगवा खेमा करता रहा है. वे जहां भी गए वहां उन्हें घेरा गया और ये घेरने वाले भी युवा ही थे.

कट्टरपंथी वैचारिक विरोध नहीं कर पाते, तो थप्पड़ मारते हैं ,जूते चलाते हैं, काले झंडे दिखाते हैं और भाषण नहीं देने देते. विरोध के ये घटिया और खतरनाक तरीके भी युवाओं को राजनीति में आने से डराते हैं. यानी उन की भूमिका वोट देने तक में ही समेट कर रखने की साजिश परवान चढ़ रही है बावजूद इस सच के कि अगले साल यानी 2020 में देश की 65 फीसदी आबादी 35 साल से कम युवाओं की होगी और हम सब से युवा राष्ट्र होंगे.

युवाओं की उदासीनता

औक्सफोर्ड डिक्शनरी द्वारा साल 2017 में यूथक्वेक को वर्ड औफ द ईयर घोषित किया गया था लेकिन यह क्वेक देश की राजनीति में कहीं नजर नहीं आ रहा. बमुश्किल 10 युवा उम्मीदवार भी प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस ने चुनाव में नहीं उतारे हैं लेकिन दरियां और कुरसियां उठाने व रखने में उन्हीं का इस्तेमाल किया जा रहा है. अगर यही युवा शक्ति का सम्मान है तो खुद युवाओं को इसे दूर से प्रणाम कर लेना चाहिए.

इस स्थिति पर सीएसडीएस और लोकनीति के सर्वे पर नजर डालें तो देश के 46 फीसदी युवा राजनीति में किसी भी तरह की दिलचस्पी नहीं रखते हैं और 75 फीसदी युवा किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होते हैं. इस सर्वे के मुताबिक, साल 2013 के बाद से विरोधप्रदर्शनों में छात्रों की भागीदारी में कमी आई है. 2013 में 24 फीसदी छात्र विरोध प्रदर्शनों में शामिल होते थे जिन की संख्या 2016 आतेआते घट कर 13 फीसदी रह गई थी. चिंताजनक बात यह भी सामने आई कि छात्र संगठनों की गतिविधियों से भी केवल 26 फीसदी छात्र ही वास्ता रखते हैं.

यानी, गड़बड़ी स्कूलकालेज लेवल से भी है जहां छात्रों को केवल पढ़ाई और कैरियर से ही मतलब है, राजनीति उन के लिए दूसरी, तीसरी प्राथमिकता भी नहीं है. इसे बारीकी से समझें तो लगता ऐसा है कि जानबूझ कर रोजगार के मौके कम किए जा रहे हैं जिस से कम से कम युवा राजनीति में आएं और उन का पूरा फोकस नौकरी पर रहे. ऐसे में सोचना लाजिमी है कि राजनीति में युवा हैं ही कहां, और जो हैं वे थप्पड़ खा रहे हैं व दुष्प्रचार का शिकार हो रहे हैं.

ये भी पढ़ें- दिखावा है साध्वी प्रज्ञा के बयान पर पीएम की सफाई

युवाओं का पूरा ध्यान खुद के विकास पर हो, यह एतराज की बात नहीं, एतराज की बात है उन का राजनीति से बिलकुल कट जाना. इस समस्या का एकलौता हल यही दिखता है कि देश के विकास में युवाओं की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित की जाए. लोकसभा व विधानसभा सहित स्थानीय निकायों में युवाओं के लिए कम से कम 10 फीसदी सीटें आरक्षित की जाएं वरना युवा न केवल राजनीति, बल्कि देश से भी कटते जाएंगे.

आशिक हत्यारा

राजकुमार गौतम अपनी खूबसूरत पत्नी और ढाई वर्षीय बेटी नान्या के साथ 4 महीने पहले ही थाणे जिले के भादवड़ गांव में किराए पर रहने के लिए आया था. इस के पहले वह भिवंडी के अवधा गांव में रहता था. उस समय उस की पत्नी सपना लगभग 7 महीने की गर्भवती थी. दोनों का व्यवहार सरल और मधुर था. यही कारण था कि आसपड़ोस के लोगों में पतिपत्नी जल्दी ही घुलमिल गए थे.

वैसे बड़े महानगरों में रहने वाले लोग अपनी दोहरी जिंदगी जीते हैं. वे जल्दी किसी से घुलतेमिलते नहीं हैं. सभी अपने काम से मतलब रखते हैं. कौन क्या करता है, कैसे रहता है, इस से उन्हें कोई मतलब नहीं रहता. लेकिन राजकुमार और सपना अपने पड़ोसियों से घुलमिल कर रहते थे.

पतिपत्नी का दांपत्य जीवन अच्छी तरह से चल रहा था. करीब 2 महीने बाद सपना ने दूसरी बच्ची को जन्म दिया. बच्ची स्वस्थ और सुंदर थी, जिसे देख दोनों खुश थे.

2 बेटियों के जन्म के बाद दोनों कुछ दिनों तक कोई बच्चा नहीं चाहते थे. लिहाजा सपना ने डिलिवरी के बाद कौपर टी लगवा ली थी. लेकिन कौपर टी लगने के बाद सपना के पेट में अकसर दर्द रहने लगा था. यह दर्द कभीकभी असहनीय हो जाता था, जिस की वजह से वह बेहोश तक हो जाती थी. यह बात उस के पड़ोसियों को भी मालूम थी.

घटना 4 फरवरी, 2019 की है. उस समय दोपहर के लगभग 3 बजे का समय था, जब पड़ोसियों ने राजकुमार की ढाई वर्षीय बेटी नान्या के रोने की आवाज सुनी. रोने की आवाज पिछले 15-20 मिनट से लगातार आ रही थी. पड़ोसी राम गणेश से नहीं रहा गया तो वह राजकुमार के घर पहुंच गए.

उन्होंने घर का जो दृश्य देखा उसे देख कर उन के होश उड़ गए. वह चीखते हुए भाग कर बाहर आ गए और चीखचीख कर आसपड़ोस के लोगों को इकट्ठा कर लिया. लोगों ने चीखने की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि राजकुमार की पत्नी का किसी ने गला काट दिया है.

ये भी पढ़ें- पहलवानी के नाम पर दहशतगर्दी

यह सुन कर जब लोग राजकुमार के घर में गए तो उस की पत्नी फर्श पर औंधे मुंह पड़ी थी. उस के गले के आसपास खून फैला हुआ था. उस की बेटी नान्या उस के पास बैठी अपने नन्हेनन्हे हाथों से मां को उठाने की कोशिश कर रही थी और दूसरी छोटी नवजात बच्ची बिस्तर पर पड़ी हाथपैर मार रही थी.

इस मार्मिक दृश्य को जिस ने भी देखा था, उस का कलेजा मुंह को आ गया. पड़ोसी दोनों बच्चियों को उठा कर घर से बाहर लाए. उन्होंने फोन कर के इस की जानकारी राजकुमार गौतम को दे दी और बेहोशी की हालत में पड़ी घायल सपना को उठा कर स्थानीय इंदिरा गांधी अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने सपना को मृत घोषित कर दिया. अस्पताल ने इस मामले की जानकारी पुलिस को दे दी.

वह इलाका शांतिनगर थाने के अंतर्गत आता था. यह सूचना पीआई किशोर जाधव को मिली तो वह एसआई संदीपन सोनवणे के साथ इंदिरा गांधी अस्पताल पहुंच गए. अस्पताल जा कर उन्होंने डाक्टरों से बात की. इस के अलावा वह उन लोगों से मिले, जो सपना को उपचार के लिए अस्पताल लाए थे.

मृतका के पति राजकुमार ने बताया कि उस की पत्नी की जान कौपर टी के कारण गई है. कौपर टी की वजह से उस की तबीयत ठीक नहीं रहती थी, जिस का इलाज चल रहा था. लेकिन कभीकभी दर्द जब असह्य हो जाता था, तब उस की सहनशक्ति जवाब दे देती थी. ऐसे में वह अपनी जान लेने पर आमादा हो जाती थी.

राजकुमार ने पत्नी की मौत की जो थ्यौरी बताई, वह टीआई के गले नहीं उतरी. उन्होंने यह तो माना कि तकलीफ में कभीकभी इंसान आपा खो बैठता है, लेकिन उस समय सपना की स्थिति ऐसी नहीं थी. डाक्टरों के बयानों से स्पष्ट हो चुका था कि आत्महत्या के लिए कोई अपना गला नहीं काट सकता.

मौत की सही वजह तो पोस्टमार्टम के बाद ही सामने आनी थी. लिहाजा टीआई किशोर जाधव ने सपना की संदिग्ध हालत में हुई मौत की जानकारी डीसीपी और एसीपी को देने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए उसी अस्पताल की मोर्चरी में भिजवा दी.

अस्पताल की काररवाई निपटाने के बाद पीआई किशोर जाधव सीधे घटनास्थल पर पहुंचे और वहां का बारीकी से निरीक्षण किया. घटनास्थल पर खून लगा एक स्टील का चाकू मिला, जिसे जाब्ते की काररवाई में शामिल कर के उन्होंने जांच के लिए रख लिया.

पीआई ने राजकुमार गौतम के बयानों के आधार पर सपना गौतम की मौत को आत्महत्या के रूप में दर्ज तो कर लिया था, लेकिन मामले की जांच बंद नहीं की थी. उन्हें सपना गौतम की पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था. किशोर जाधव को लग रहा था कि दाल में कुछ काला है.

पोस्टमार्टम और फोरैंसिक रिपोर्ट आई तो पीआई चौंके. चाकू पर फिंगरप्रिंट मृतका के बजाए किसी और के पाए गए. इस का मतलब था कि सपना की हत्या की गई थी.

मामले की आगे की जांच के लिए पीआई किशोर जाधव ने एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम में सहायक इंसपेक्टर (क्राइम), कांस्टेबल रविंद्र चौधरी, गुरुनाथ विशे, अनिल बलबी, किरण पाटिल, विजय कुमार, श्रीकांत पाटिल आदि को शामिल किया गया.

टीम ने जांच शुरू कर दी. अपराध घर के अंदर हुआ था, इस का मतलब था कि अपराधी सपना का नजदीकी ही रहा होगा. इसलिए इंसपेक्टर राजेंद्र मायने ने संदेह के आधार पर सपना के पति राजकुमार गौतम से गहराई से पूछताछ की.

उन्होंने उस की कुंडली भी खंगाली. उस की अंगुलियों के निशान ले कर जांच के लिए भेज दिए गए. लेकिन उस के हाथों के निशानों ने चाकू पर मिले निशानों से मेल नहीं खाया. इस से पुलिस को राजकुमार बेकसूर लगा.

ये भी पढ़ें- यूज ऐंड थ्रो के दौर में जानवर

तब पुलिस ने उस के दोस्तों की जांच की. जांच में पता चला कि राजकुमार का एक दोस्त विकास चौरसिया उस की गैरमौजूदगी में भी उस के घर आता था. विकास पान की एक दुकान पर काम करता था और राजकुमार के गांव का ही रहने वाला था. दोनों के बीच अच्छी दोस्ती थी. पुलिस ने विकास का फोन नंबर सर्विलांस पर लगा दिया और उस की तलाश शुरू कर दी.

वह अपने घर से गायब था. उस की तलाश के लिए पुलिस ने मुखबिर भी लगा दिए. एक मुखबिर की सूचना पर विकास को भिवंडी के सोनाले गांव से हिरासत में ले लिया गया. पुलिस ने विकास से सपना की हत्या के संबंध में पूछताछ की तो वह खुद को बेकसूर बताता रहा. लेकिन सख्ती करने पर उस ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उस ने हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली निकली.

25 वर्षीय राजकुमार गौतम उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के गांव कारमियां शुक्ला का रहने वाला था. उस के पिता गौतमराम गांव के एक साधारण किसान थे. गांव में उन की थोड़ी सी काश्तकारी थी, जिस में उन की गृहस्थी की गाड़ी चलती थी.

परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण राजकुमार गौतम की कोई खास शिक्षादीक्षा नहीं हो पाई थी. जब वह थोड़ा समझदार हुआ तो उस ने रोजीरोटी के लिए मुंबई की राह पकड़ ली. उस के गांव के कई लोग रहते थे. मुंबई से करीब सौ किलोमीटर दूर तहसील भिवंडी के अवधा गांव में उन्हीं के साथ रह कर वह छोटामोटा काम करने लगा.

भिवंडी का अवधा गांव पावरलूम कपड़ों और कारखानों का गढ़ माना जाता है. राजकुमार गौतम ने भी पावरलूम कारखाने में काम कर कपड़ों की बुनाई का काम सीखा और मेहनत से काम करने लगा. जब वह कमाने लगा तो परिवार वालों ने उस की शादी पड़ोस के ही गांव की लड़की सपना से कर दी. यह सन 2016 की बात है.

राजकुमार गौतम खूबसूरत सपना से शादी कर के बहुत खुश था. वह शादी के कुछ दिनों बाद ही सपना को अपने साथ मुंबई ले गया. किराए का कमरा ले कर वह पत्नी के साथ रहने लगा. शादी के करीब डेढ़ साल बाद सपना ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम नान्या रखा गया.

इसी दौरान राजकुमार की विकास चौरसिया से मुलाकात हो गई. विकास चौरसिया पान की एक दुकान पर काम करता था. दोनों एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए उन के बीच जल्द ही दोस्ती हो गई.

20 वर्षीय विकास एक महत्त्वाकांक्षी युवक था. वह जो भी कमाता था, अपने खानपान और शौक पर खर्च करता था. राजकुमार गौतम ने जिगरी दोस्त होने की वजह से विकास की मुलाकात अपनी पत्नी से भी करवा दी थी. राजकुमार ने पत्नी के सामने विकास की काफी तारीफ की थी.

ये भी पढ़ें- मसाज के नाम पर ब्लैकमेलिंग

पहली मुलाकात में ही विकास सपना का दीवाना हो गया था. उस ने अपनी बेटी नान्या का जन्मदिन मनाया तो विकास चौरसिया को खासतौर पर अपने घर बुलाया. तब राजकुमार और सपना ने विकास की काफी आवभगत की थी. इस आवभगत में राजकुमार गौतम की सजीधजी बीवी सपना विकास के दिल में उतर गई.

वह जब तक राजकुमार के घर में रहा, उस की निगाहें सपना पर ही घूमती रहीं. जन्मदिन की पार्टी खत्म होने के बाद विकास चौरसिया सब से बाद में अपने घर गया था. उस समय उस ने नान्या को एक महंगा गिफ्ट दिया था. यह सब उस ने सपना को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए किया था.

सपना की छवि विकास की नसनस और आंखों में कुछ इस तरह से समा गई थी कि उस का सारा सुखचैन छिन गया. उस का मन किसी काम में नहीं लग रहा था. सोतेजागते उसे बस सपना ही दिख रही थी. वह उस का स्पर्श पाने के लिए तड़पने लगा था.

राजकुमार को अपनी दोस्ती पर पूरा विश्वास था. लेकिन विकास दोस्ती में दगा करने की फिराक में था. वह तो बस उस की पत्नी सपना का दीवाना था. वह सपना का सामीप्य पाने के लिए मौके की तलाश में रहने लगा था.

इसीलिए मौका देख कर वह राजकुमार के साथ चाय पीने के बहाने अकसर उस के घर जाने लगा था. वह सपना के हाथों की बनी चाय की जम कर तारीफ करता था. औरत को और क्या चाहिए. विकास चौरसिया को यह बात अच्छी तरह मालूम थी कि औरत अपनी तारीफ और प्यार की भूखी होती है. जो विकास ने सोचा था, वैसा ही कुछ हुआ भी. इस तरह दोनों में बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया.

धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के काफी करीब आ गए थे. विकास बातचीत के बीच कभीकभी सपना से भद्दा मजाक भी कर लेता था, जिसे सुन कर सपना का चेहरा लाल हो जाता था और वह उस से नजरें चुरा लेती थी.

कुछ दिनों तक तो विकास राजकुमार के साथ ही उस के घर जाता था, लेकिन बाद में वह राजकुमार के घर पर अकेला भी आनेजाने लगा. वह चोरीछिपे सपना के लिए कीमती उपहार भी ले कर जाता था. उपहारों और अपनी लच्छेदार बातों में उस ने सपना को कुछ इस तरह उलझाया कि वह अपने आप को रोक नहीं पाई और परकटे पंछी की तरह उस की गोदी में आ गिरी. सपना को अपनी बांहों में पा कर विकास चौरसिया के मन की मुराद पूरी हो गई.

एक बार जब मर्यादा की कडि़यां बिखरीं तो बिखरती ही चली गईं. अब स्थिति ऐसी हो गई थी कि बिना एकदूसरे को देखे दोनों को चैन नहीं मिलता था. उन्हें जब भी मौका मिलता, दोनों अपनी हसरतें पूरी कर लेते. सपना और विकास चौरसिया का यह खेल बड़े आराम से लगभग एक साल तक चला. इस बीच सपना फिर से गर्भवती हो गई.

पहली बार सपना जब गर्भवती हुई थी तो वह अपनी डिलिवरी के लिए अपने गांव चली गई थी. इस बार सपना ने गांव न जा कर अपनी डिलिवरी शहर में ही करवाने का फैसला कर लिया था.

जब सपना की डिलिवरी के 3 महीने शेष रह गए तो राजकुमार अवधा गांव का कमरा खाली कर भादवड़ गांव पहुंच गया और भिवंडी के इंदिरा गांधी अस्पताल में सपना की डिलिवरी करवाई. डिलिवरी के बाद सपना ने पति की सहमति से कौपर टी लगवा ली. यह कौपर टी सपना को रास नहीं आई. इसे लगवाने के बाद सपना को दूसरे तरह की समस्याएं आने लगीं.

सपना की डिलिवरी के 25 दिनों बाद एक दिन दोपहर 2 बजे विकास चौरसिया मौका देख कर राजकुमार गौतम के घर पहुंच गया. उस समय सपना की बेटी नान्या घर के दरवाजे पर खेल रही थी. घर में घुसते ही उस ने दरवाजा बंद कर लिया. उस समय सपना अपने बिस्तर पर लेटी अपनी छोटी बेटी को दूध पिला रही थी. विकास के अचानक आ जाने से सपना उठ कर बैठ गई.

इस से पहले कि सपना कुछ कह पाती विकास ने उस के बगल में बैठ कर बच्ची का माथा चूमा और सपना को बांहों में लेते हुए उस से शारीरिक संबंध बनाने के लिए जिद करने लगा, जिस के लिए सपना तैयार नहीं थी.

सपना ने विकास को काफी समझाने की कोशिश की और कहा, ‘‘देखो, अभी मैं उस स्थिति में नहीं हुई हूं कि तुम्हारी यह इच्छा पूरी कर सकूं. आज तक मैं ने कभी तुम्हारी बातों से कभी इनकार नहीं किया है. आज मैं बीमार हूं, ऊपर से कौपर टीम लगवाई है. अभी तुम जाओ, जब मैं ठीक हो जाऊंगी तो आना.’’

लेकिन वासना के भूखे विकास पर सपना की बातों का कोई असर न हुआ. वह उस के साथ जबरदस्ती करने पर उतारू हो गया और उस पर भूखे भेडि़ए की तरह टूट पड़ा. इस के पहले कि वह अपने मकसद में कामयाब होता, सपना नाराज हो गई और उस ने अपने ऊपर से विकास को नीचे फर्श पर धक्का दे दिया. फिर उठ कर वह उसे अपने घर से बाहर जाने के लिए कहने लगी.

सपना के इस व्यवहार और वासना के उन्माद में वह अपना होश खो बैठा. वह सीधे सपना की किचन में गया और वहां से स्टील का चाकू उठा लाया. उस चाकू से उस ने सपना का गला काट दिया. सपना के गले से खून निकलने लगा और वह फर्श पर गिर पड़ी.

सपना के गले से बहते खून को देख कर विकास चौरसिया की वासना का उन्माद काफूर हो गया. वह डर कर वहां से चुपचाप निकल गया. उस के जाने के बाद दरवाजे पर खेल रही नान्या घर के अंदर आई और मां को उठाने लगी थी. सपना के न उठने पर वह उस से लिपट कर रोने लगी.

विकास चौरसिया से विस्तृत पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया.

ये भी पढ़ें- मजार बन रहे लूट के अड्डे

राजकुमार गौतम को जब यह मालूम पड़ा कि उस की पत्नी का आशिक और हत्यारा और कोई नहीं, बल्कि उस का अपना जिगरी दोस्त था तो उसे इस बात का अफसोस हुआ कि विकास जैसे आस्तीन के सांप को घर बुला कर उस ने कितनी बड़ी गलती की थी.

कथा लिखे जाने तक अभियुक्त विकास चौरसिया थाणे की तलौजा जेल में था. मामले की जांच इंसपेक्टर राजेंद्र मायने कर रहे थे.

मुझे हमेशा अपने वतन से प्यार रहा है: गैवी चहल

पंजाबी सिनेमा में सुपर स्टार माने जा रहे गैवी चहल ने टीवी सीरियल ‘‘मोहे रंग दे’’से करियर की शुरूआत की थी. उसके बाद वह कुछ रियालिटी शो में नजर आए. पर 2012 में गैवी चहल को सलमान खान के साथ फिल्म ‘‘एक था टाइगर’’ में पाकिस्तानी आईएएस एजेंट कैप्टन अबरार का किरदार निभाने का अवसर क्या मिला, उनके करियर में नया मोड़ आ गया. इन दिनों वह अपनी देशभक्तिपूर्ण फिल्म ‘‘ये है इंडिया’’ को लेकर चर्चा में है, जो कि 24 मई को रिलीज होगी.

प्रस्तत है गैवी चहल से हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश

Gavie-Chahal--IN-FILM-YEH-HAI-INDIA-

एक वक्त वह था,जब टीवी कलाकारों को फिल्म वाले अछूत की तरह देखते थे.पर अब ऐसा नहीं रहा. आपका अपना अनुभव क्या रहा?

देखिए, आप हर सब्जी में आलू डालेंगे,तो आलू की वैल्यू कम हो जाती है.उसी तरह से टीवी है. टीवी मुफ्त में देखने को मिलता है, तो आप घर में देख सकते हैं. जो कलाकार दर्शक को उसके घर के टीवी में हर दिन मुफ्त में दिख रहा हो, उसके लिए दर्शक तीन सौ रूपए देकर थिएटर में क्यों जाएगा? यही सोच फिल्म वालों की भी रही है. फिल्मकार भी सोचते हैं कि जो चेहरा हर घर में नजर आ रहा है, उसके लिए कोई 300 रूपए की टिकट क्यों देगा? यही लोगों की दिमागी सोच/मेंटालिटी रही है. पर अब धीरे धीरे बदल रही है. अब टीवी से फिल्मों में जाने वालों की संख्या बहुत तेजी से बदल रही है. इन्हें दर्शक फिल्मों में देखना भी पसंद कर रहा है. यानी कि लोगों का नजरिया बदला है. अब टीवी कलाकारों को फिल्मों में भी स्वीकार किया जा रहा है. एक तरह से यह सिस्टम का मसला है. पर अब सिस्टम बदल चुका है. मैने ‘एक था टाइगर’’ के बाद कई हिंदी व पंजाबी फिल्में की. पंजाबी फिल्मों में मुझे सुपर स्टार माना जाता है. अब हिंदी फिल्म ‘‘ये है इंडिया’’ में हीरो बनकर आ रहा हूं.

ये भी पढ़ें- ऐश्वर्या विवादित मीम: विवेक ओबरौय को मांगनी पड़ी माफी

फिल्म ‘‘यह है इंडिया’’ है क्या?

यह फिल्म भारत के बारे में है. कहानी का केंद्र एक एनआरआई यानी कि अप्रवासी भारतीय मिकी है, जो कि भारत घूमने आता है और यहां के सिस्टम को देखता है. यह कहानी सुनते सुनते मुझे लगा कि हम सभी अपने देश से लगाव रखते हैं और हम सभी अपने देश के लिए कुछ करना चाहते हैं, तो देश से प्रेम के लिए मुझे यह फिल्म करनी चाहिए. यह लड़का किस तरह भारत में आकर सिस्टम को समझता है और पूरे सिस्टम के खिलाफ अकेले खड़े होकर लड़ाई लड़ता है. इस फिल्म में देश भावना वाली बात है. देश के लिए कुछ करने की बात है.

Gavie-Chahal

फिल्म के अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगे?

मैंने इसमें एक अप्रवासी भारतीय लड़के मिकी का किरदार निभाया है. वह अपने माता पिता के साथ इंग्लैंड में रहता है. उसके माता पिता भारतीय ही हैं, पर तीस साल पहले वह इंग्लैंड में जाकर बस गए थे. वह इंग्लैंड में भारत को लेकर जो कुछ सुनता है और किताबों में जो कुछ होता है, उसमें उसे बहुत अंतर नजर आता है, इसलिए वह भारत आकर घूमने का निर्णय लेता हैं.जबकि उसके दोस्त उसे मना करते हैं कि भारत जाकर क्या करोगे? भारत तो गरीबों का देश है. भारत आने के बाद मिकी का साबका किस तरह से तमाम चीजों से पड़ता है और उसे बहुत कुछ समझ में आता है. फिर पोलीटिकली जो कुछ होता है, उसे आप समझ सकेंगे. मिक्की के किरदार के माध्यम से दर्शक भारत की अच्छाई व बुराई सहित हर चीज को देख सकेंगे.

आपने इस फिल्म को देश के कई शहरों में फिल्माया है. शूटिंग के दौरान आप कितना रिलेट कर रहे थे?

हमने इसे लगभग आठ राज्यों के 15 शहरों में इस फिल्म की शूटिंग की है. इससे पहले भी मैं अपना देश भारत काफी घूमा हूं. फिर भी हम दावा नहीं करते कि हमने भारत को अच्छी तरह से देखा है. इसीलिए हमारी फिल्म में संवाद है कि ‘आपने भारत को देखा ही कितना है.’ सच कह तो शूटिंग के दौरान मेरी भी समझ मे आया कि मैंने स्वयं अपने देश को कितना देखा या समझा है? यह अति खूबसूरत देश है. भारत एक ऐसा देश है, जहां आपको एक नहीं कई कल्चर, रहन सहन देखने को मिलते हैं. राजस्थान का कल्चर अलग है. पंजाब का कल्चर अलग है.

ये भी पढ़ें- कांस फिल्म 2019:  दीपिका के साथ क्यों नही थे रणवीर सिंह?

फिल्म ‘‘यह है इंडिया’’ की शूटिंग करने के बाद आपकी सोच में किस तरह का बदलाव आया है?

-मैं तो इस फिल्म से जुड़ने से पहले भी भारत को महान देश मानता रहा हूं. मुझे अपने वतन से प्यार रहा है. मगर इस फिल्म की शूटिंग करते हुए जिस यथार्थ से मेरा साबका पड़ा, उसके बाद तो मेरा अपने वतन के प्रति प्यार काफी बढ़ गया है. अममून हम राह चलते कुछ खा रहे होते हैं और खाली पैकेट या कागज का टुकड़ा सड़क पर फेंक देते हैं, पर अब मैं बहुत सतर्क रहता हूं. हम जा रहे हैं और रात में तेज बारिश के दौरान किसी की कार खराब हो गयी है, तो हम उसकी मदद करने लगते हैं. इस तरह मेरी सोच में इतना बदलाव आया है कि मैं बहुत छोटी छोटी चीजों पर ध्यान देने के अलावा उन पर अमल करने लगा हूं. मेरा मानना है कि इस फिल्म को देखने के बाद लोगों का भारत के प्रति नजरिया बदल जाएगा.

इसके अलावा क्या कर रहे है?

इस साल मेरी तीन पंजाबी फिल्मों के अलावा संजय दत्त के साथ हिंदी फिल्म ‘‘तोरबा’’ रिलीज होगी. इसमें एक अफगानी का किरदार है.

m_Punjabi-actor-Gavie-Chahal

आपने ‘एक था टाइगर’ में पाकिस्तानी किरदार निभाया था. अब आपने ‘तोरबा’ में भी किसी दूसरे देश के नागरिक का किरदार निभा रहे हैं. क्या कहना चाहेंगे?

सर जी, आपने बहुत अच्छा सवाल किया. आज मैं कलाकार के तौर पर जिस मुकाम पर पहुंचा हूं, उसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि सिनेमा मेरा पैशन है. मैं पूरे पैशन के साथ किरदार निभाता हूं. किरदार में खुद को ढालने के लिए आवश्यक तैयारी करता हूं. फिल्म ‘एक था टाइगर’ में मैं पाकिस्तानी आईएएस एजेंट बना था. तो उसके अनुरूप मैंने बौडी लैंग्वेज पकड़ी. पाकिस्तानी किस तरह से बात करते हैं, उसे एडौप्ट की थी. वह एक आईएसआई एजेंट है, तो एक आईएसआई एजेंट किस तरह से काम करेगा, किस तरह से हथियार चलाएगा. किस तरह से गन/बंदूक पकड़ेगा आदि सीखा था. इन सबके बारे में जानकारी हासिल की थी. उसके बाद सेट पर निर्देशक कबीर खान ने काफी मदद की थी.

अब संजय दत्त के साथ फिल्म ‘‘तोरबा’’की है.इसमें मेरा अफगानी किरदार है. अफगानी लोग हिंदी भी बहुत अलग अंदाज में बोलते हैं, तो मैंने अफगानी वेशभूषा अपनाने के साथ साथ उनकी बौडी लैंग्वेज और भाषा को भी पकड़ा.

ये भी पढ़ें- “छोरियां छोरों से कम नही होती” : लैंगिक पूर्वाग्रह पर बेहतरीन फिल्म

क्या अफगानी भाषा को पकड़ने के लिए आपने कोई टीचर रखा?

जी नहीं….हमने कुछ वीडियो देखे. इसके अलावा मुझे दो अफगानी लड़के अफगानी मिल गए, जो कि मूलतः भारतीय थे, पर वहां रहते रहते उस तरह की भाषा बोलने लगे थे. उन्होंने मेरी काफी मदद की.मैंने उन लोगों के साथ लंबी लंबी बातें की.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें