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5 टिप्स: ऐसे करें सही लिपस्टिक का चुनाव

होंठों की सुंदरता बढ़ाने में लिपस्टिक का काफी महत्त्व है. मगर कई महिलाएं लिपस्टिक का सही चुनाव नहीं कर पातीं, जिस का प्रभाव उन के चेहरे पर भी पड़ता है. चलिए जानते हैं, सही लिपस्टिक  का चुनाव कैसे करें.

चुनें रंग स्किन टोन के अनुसार

सबसे अच्छा तरीका है कि कलाई पर उभरी हुई नसों का रंग देखा जाए. यदि नसों का रंग नीला है तो यह कूल स्किन टोन का प्रतीक है और यदि नसों का रंग हरा है स्किन टोन वार्म होती है. कूल स्किन टोन वाली महिलाओं का रंग पेल व्हाइट और व्हाइट होता है जबकि वार्म स्किन टोन वाली महिलाएं व्हीटिश, डस्की और डीप डार्क.

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लिपस्टिक खरीदते वक्त रखें ध्यान

  1. त्वचा के रंग के आधार पर लिपस्टिक खरीदते वक्त कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है.
  2. हर ब्रांड में एक ही लिपस्टिक के 2-3 कलर टोन आते हैं और यह होंठों के रंग पर निर्भर करता है की कौन सा कलर टोन अच्छा लगेगा.
  3. निचले होंठ के रंग से 2 शेड गहरी लिपस्टिक ही खरीदें. रंग जांचने के लिए लिपस्टिक को निचले होंठ पर लगाएं और ऊपर वाले होंठ के रंग की गहराई से परखें. रंग की गहराई समान होने पर ही लिपस्टिक खरीदें.
  4. लिपस्टिक का सही कलर इफैक्ट देखने के लिए बिना मेकअप ओरिजनल स्किन टोन पर लिपस्टिक लगा कर देखें.
  5. यदि एक साथ कई लिपस्टिक शेड खरीद रही हैं, तो पहले शेड को होंठों से साफ करने के बाद ही दूसरा ट्राय करें.

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न करें ये गलतियां

– ड्रैस के कलर को उभारने वाला लिप शेड लगाएं न की ड्रैस के रंग से मैच करता हुआ.

– तले होंठों पर कभी भी गहरे रंग की लिपस्टिक न लगाएं.

– आंखों पर हैवी मेकअप है तो होंठों को ड्रामैटिक लुक देने से बचें.

बिग बौस 13: खत्म होगा कौमनर्स का कौन्सेप्ट

कलर्स टीवी पर प्रसारित होने वाला रिएलिटी शो ‘बिग बौस’ कंट्रोवर्सियल शोज में से एक है. दरअसल इस शो का पिछला सीजन टीआरपी के मामले में काफी पीछे रहा. ऐसे में बिग बौस के तेरहवें सीजन को हिट बनाने के लिए निर्माता क्या-क्या कर रहे हैं. तो चलिए आपको बता दें, इस सीजन के लिए तैयारियां शुरू कर दी गई है.

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक इस सीजन में कुछ बदलाव भी किए जाएंगे. खबरों की माने तो इस शो के निर्माता कौमनर्स के कौन्सेप्ट को खत्म भी कर सकते हैं. ‘बिग बौस’ के कई सीजन्स में आम आदमी को भी आने का मौका दिया गया. इसके दसवें सीजन में मनवीर गुर्जर विजेता बनें, जो कि एक कौमनर थे.

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आपको बता दें, 10वें सीजन के बाद कौमनर्स वाले कौन्सेप्ट की वजह से ही इस शो की टीआरपी घटने लगी. मसलन ‘बिग बौस’ के पिछले सीजन में तो कई कौमनर्स की पहचान को लेकर सवाल भी किए गए थे. कौमनर्स, सौरभ औरशिवाशीष  की  पहचान को लेकर कई तरह के सवाल भी  उठाए गए. इस वजह से दर्शकों ने निर्माताओं की आलोचना भी की थी.

‘बिग बौस’ के 13वें सीजन में विवेक दहिया, जय भानुशाली और माही विज जैसे सेलिब्रिटी को हिस्सा लेने के लिए औफर दिया गया था,  लेकिन  फिलहाल तीनों कलाकारों ने इस औफर को ठुकरा दिया हैं.

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अवैध संबंध

अवैध संबंध पति के हों या पत्नी के, देरसबेर इन की पोल खुल ही जाती है. इस के बाद नतीजे अपराध के रूप में सामने आते हैं. कह सकते हैं कि इन नतीजों से कभी पत्नी प्रभावित होती है तो कभी पति. यदाकदा प्रेमी या प्रेमिका का नंबर भी आ जाता है. इस कहानी में पति जागीर सिंह को मौत की नींद सोना पड़ा और मंजीत कौर व उस के प्रेमी कुलवंत को…

मनप्रीत कौर सालों के बाद मामा के घर आई थी. गुरप्रीत सिंह और उस की पत्नी ने मनप्रीत की खूब

खातिरदारी की. मामामामी और मनप्रीत के बीच खूब बातें हुईं. बातोंबातों में मनप्रीत ने गुरप्रीत से पूछा,‘‘मामाजी, बड़े मामा जागीर सिंह के क्या हालचाल हैं. उन से मुलाकात होती है या नहीं?’’‘‘नहीं, हम 5 साल पहले मिले थे अनाजमंडी में. जागीर उस समय परेशान भी था और दुखी भी. गले लग कर खूब रोया. उस ने बताया कि भाभी (मंजीत कौर) के किसी कुलवंत सिंह से संबंध हैं और दोनों मिल कर उस की हत्या भी कर सकते हैं.’’

गुरप्रीत ने यह भी बताया कि उस ने जागीर सिंह से कहा था कि वह भाभी का साथ छोड़ कर मेरे साथ मेरे घर में रहे. लेकिन उस ने इनकार कर दिया. वजह वह भी जानता था और मैं भी. उस ने मुझे समझाने के लिए कहा कि वह भाभी को अपने ढंग से संभाल लेगा. बस उस के बाद जागीर सिंह मुझे नहीं मिला.

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‘‘वाह मामा वाह, बड़े मामा ने तुम से अपनी हत्या की आशंका जताई और आप ने 5 साल से उन की खबर तक नहीं ली?’’

‘‘खबर कैसे लेता, भाभी ने तो लड़झगड़ कर घर से निकाल दिया था. मैं उस के घर कैसे जाता? जाता तो गालियां सुननी पड़तीं.’’ गुरमीत ने अपनी स्थिति साफ कर दी.

बात चिंता वाली थी. मनप्रीत ने खुद ही बड़े मामा जागीर सिंह का पता लगाने का निश्चय किया. उस ने मामा के पैतृक गांव से ले कर गुरमीत द्वारा बताई गई संभावित जगह रेलवे बस्ती, गुरु हरसहाय नगर तक पता लगाया. उस की इस छानबीन में जागीर सिंह का तो कोई पता नहीं लगा, पर यह जानकारी जरूर मिल गई कि जागीर सिंह की पत्नी मंजीत कौर रेलवे बस्ती में किसी कुलवंत सिंह नाम के व्यक्ति के साथ रह रही है.

सवाल यह था कि मंजीत कौर अगर किसी दूसरे आदमी के साथ रह रही थी तो जागीर सिंह कहां था? मंजीत ने ये सारी बातें छोटे मामा गुरमीत को बताईं. इन बातों से साफ लग रहा था कि जागीर सिंह के साथ कोई दुखद घटना घट गई थी. सोचविचार कर गुरमीत और मंजीत ने थाना गुरसहाय नगर जा कर इस बारे में पूरी जानकारी थानाप्रभारी रमन कुमार को दी.

बठिंडा (पंजाब) के रहने वाले गुरदेव सिंह के 2 बेटे थे जागीर सिंह और गुरमीत सिंह. उन के पास खेती की कुछ जमीन थी, जिस से जैसेतैसे घर का खर्च चलता था. सालों पहले उन के परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था. पत्नी के बीमार होने पर उन्हें अपनी जमीन बेचनी पड़ी. इस के बावजूद वह उसे बचा नहीं पाए थे.

पत्नी की मौत के बाद गुरदेव सिंह टूट से गए थे. जैसेतैसे उन्होंने अपने दोनों बेटों की परवरिश की. आज से करीब 15 साल पहले गुरदेव सिंह भी दुनिया छोड़ कर चले गए. पर मरने से पहले गुरदेव सिंह यह सोच कर बड़े बेटे जागीर सिंह का विवाह अपने एक जिगरी दोस्त की बेटी मंजीत कौर के साथ कर गए थे कि वह जिम्मेदारी के साथ उस का घर संभाल लेगी.

मंजीत कौर तेजतर्रार और झगड़ालू किस्म की औरत थी. उस ने घर की जिम्मेदारी तो संभाल ली, लेकिन पति और देवर की कमाई अपने पास रखती थी. दोनों भाई जमींदारों के खेतों में मेहनतमजदूरी कर के जो भी कमा कर लाते, मंजीत कौर के हाथ पर रख देते. लेकिन पत्नी की आदत को देखते हुए जागीर सिंह कुछ पैसे बचा कर रख लेता था.

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इसी बीच जागीर सिंह ने जैसेतैसे अपने छोटे भाई गुरमीत की भी शादी कर दी थी. गुरमीत की शादी के बाद मंजीत कौर और गुरमीत की पत्नी के बीच आए दिन लड़ाईझगड़े होने लगे थे. रोज के क्लेश से दुखी हो कर गुरमीत सिंह अपनी पत्नी को ले कर अलग हो गया. उस के अलग होने के बाद दोनों भाइयों का आपस में मिलना कभीकभार ही हो पाता था. ऐसे ही दोनों भाइयों का जीवनयापन हो रहा था.

समय का चक्र अपनी गति से चलता रहा. इस बीच जागीर सिंह और मंजीत कौर के बीच की दूरियां बढ़ती गईं. उन के घर में हर समय क्लेश रहने लगा था.

जागीर सिंह की समझ में यह नहीं आ रहा था कि अब मंजीत कौर घर में टेंशन क्यों करती है. पहले तो उस के भाई गुरमीत की पत्नी की वजह से वह घर में झगड़ा करती थी, पर अब उसे भी घर से अलग हुए कई साल हो गए थे. फिर एक दिन जागीर सिंह को पत्नी द्वारा घर में कलह रखने का कारण समझ आ गया था.

दरअसल, मंजीत कौर के पड़ोसी गांव जुवाए सिंघवाला निवासी कुलवंत सिंह के साथ गलत संबंध थे. दोनों के बीच के संबंधों के बारे में उसे कई लोगों ने बताया था. लेकिन उसे लोगों की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. जब एक दिन उस ने दोनों को अपनी आंखों से देखा और रंगेहाथों पकड़ लिया तो अविश्वास की कोई वजह नहीं बची.

उस दिन वह सिरदर्द होने की वजह से समय से पहले ही काम से घर लौट आया था. तभी उसे पत्नी की सच्चाई पता चली थी. पत्नी की यह करतूत देख कर उसे गहरा आघात लगा.

शोर मचाने पर उस के घर की ही बदनामी होती, इसलिए उस ने पत्नी को समझाना उचित समझा. उस ने उस से कहा, ‘‘मंजीत, तुम जो कर रही हो उस से बदनामी के अलावा कुछ नहीं मिलेगा. समझदारी से काम लो. अब तक जो हुआ, उसे मैं भी भूल जाता हूं और तुम भी यह सब भूल कर आगे से एक नया जीवन शुरू करो.’’

उस समय तो मंजीत कौर ने अपनी गलती मान कर पति से माफी मांग ली, पर उस ने अपने प्रेमी कुलवंत से मिलनाजुलना बंद नहीं किया. बल्कि कुछ समय बाद ही उस ने कुलवंत के साथ मिल कर जागीर सिंह को ही रास्ते से हटाने की योजना बना ली.

मंजीत कौर ने घर में क्लेश कर पति जागीर सिंह को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह गांव वाला घर छोड़ कर गुरुसहाय नगर की रेलवे बस्ती में किराए का मकान ले कर रहे.

मकान बदलने की योजना कुलवंत ने बनाई थी. उसी के कहने पर मंजीत कौर ने यह फैसला लिया था. उस ने जानबूझ कर पति को मकान बदलने के लिए मजबूर किया था. पत्नी की बातों और हावभाव से जागीर सिंह को इस बात की आशंका होने लगी थी कि कहीं जागीर कौर उस की हत्या न करा दे. अचानक उन्हीं दिनों अनाजमंडी में जागीर सिंह की मुलाकात अपने छोटे भाई गुरमीत सिंह से हुई.

दोनों भाई आपस में गले मिल कर बहुत रोए. अपनेअपने मन का गुबार शांत करने के बाद जागीर सिंह ने अपने और मंजीत कौर के रिश्तों के बारे में उसे बताते हुए यह भी शक जताया था कि मंजीत कौर किसी दिन उस की हत्या करा सकती है.

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गुरमीत सिंह ने बड़े भाई से कहा कि घर का माहौल ऐसा है तो उस का मंजीत कौर के साथ रहना ठीक नहीं है. उस ने जागीर सिंह को यह सलाह भी दी कि वह मंजीत कौर को छोड़ दे और बाकी जिंदगी उस के घर आ कर गुजारे. लेकिन जागीर सिंह ने उसे आश्वासन देते हुए कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, मैं मंजीत को समझा कर उसे सीधे रास्ते पर ले आऊंगा.’’

इस बातचीत के बाद दोनों भाई अपनेअपने रास्ते चले गए थे. उस दिन के बाद वे दोनों आपस में फिर कभी नहीं मिले. यह बात सन 2013 के आसपास की है.

गुरमीत सिंह 5 वर्ष पहले अपने भाई से हुई मुलाकात को भूल गया था. एक दिन उस के घर उस के साले बलदेव सिंह की बड़ी बेटी मनप्रीत कौर मिलने के लिए आई और बातोंबातों में उस ने पूछ लिया, ‘‘मामाजी, बड़े मामा जागीर सिंह के क्या हाल हैं और आजकल वह कहां रह रहे हैं?’’

गुरमीत सिंह ने उसे बताया कि करीब 5 साल पहले अनाजमंडी में मुलाकात हुई थी. तब उन्होंने बताया था कि वह गुरु हरसहाय नगर में रह रहे हैं. उस दिन के बाद फिर कभी उन से नहीं मिला.

बहरहाल, 20 सितंबर 2018 को गुरमीत सिंह की तहरीर पर एसएचओ रमन कुमार ने मंजीत कौर और कुलवंत सिंह के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी. जरूरी जांच के बाद उन्होंने अगले दिन ही मंजीत कौर और कुलवंत को हिरासत में ले लिया.

थाने ला कर जब दोनों से जागीर सिंह के बारे में पूछताछ की तो मंजीत कौर ने बताया कि उस के पति के किसी महिला के साथ नाजायज संबंध थे. उस महिला की वजह से वह उससे मारपीट किया करता था. फिर 5 साल पहले एक दिन वह उस से झगड़ा और मारपीट करने के बाद घर से निकल गया. इस के बाद वह कहां गया, पता नहीं.

रमन कुमार समझ गए कि मंजीत झूठ बोल रही है. इसलिए उन्होंने उस से और उस के प्रेमी से सख्ती से पूछताछ की. आखिर उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि 5 साल पहले 23 अप्रैल, 2013 को उन्होंने जागीर सिंह की हत्या कर उस की लाश घर के सीवर में डाल दी थी.

मंजीत कौर ने बताया कि पिछले लगभग 12 सालों से कुलवंत के साथ उस के अवैध संबंध थे, जिन का जागीर सिंह को पता लग गया था और वह इस बात को ले कर उस से झगड़ा किया करता था. इसीलिए उस ने अपने प्रेमी कुलवंत के साथ मिल कर पति को अपने रास्ते से हटाने के लिए उस की हत्या करने की योजना बनाई.

योजनानुसार 23 अप्रैल, 2013 को जागीर सिंह को चाय में नशे की गोलियां मिला कर पिला दीं. जब वह बेहोश हो गया तो गला दबा कर उस की हत्या करने के बाद उन्होंने उस की लाश सीवर में डाल दी.

एसएचओ रमन कुमार ने मंजीत कौर और कुलवंत सिंह को 21 सितंबर, 2018 को अदालत में पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान दोनों की निशानदेही पर गांव वालों, गांव के सरपंच और मजिस्ट्रैट की मौजूदगी में उस के घर के सीवर से हड्डियां बरामद कीं.

उस समय म्युनिसिपल कारपोरेशन के अधिकारियों के साथ एफएसएल टीम भी मौजूद थी. पुलिस ने जरूरी काररवाई के बाद हड्डियां एफएसएल टीम के सुपुर्द कर दीं.

दोनों हत्यारोपियों से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 23 सितंबर, 2018 को मंजीत कौर और कुलवंत सिंह को अदालत में पेश कर जिला जेल भेज दिया.

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—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

परेशानी का सबब गेमिंग डिसऔर्डर

अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा पाने के लिए बहुत से मातापिता बच्चों के हाथ में अपना मोबाइल फोन थमा देते हैं और फिर यह जानने की कोशिश भी नहीं करते हैं कि बच्चे उस मोबाइल में किस तरह के गेम खेल रहे हैं. बच्चों की यह गेमिंग लत कई बार भारी पड़ जाती है.

राहुल पढ़ने में बहुत होशियार था. वह क्लास में अच्छी रैंक लाता था. राहुल की सब से बड़ी खासीयत यह थी कि उस का व्यवहार लोगों के प्रति काफी विनम्र था. महल्ले के लोग उस की तारीफ करते थे. सबकुछ अच्छा चल रहा था.

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राहुल ने इस वर्ष 12वीं की परीक्षा दी थी, लेकिन जब राहुल का रिजल्ट आया तो राहुल फेल हो गया. यह बात महल्ले में जंगली आग की तरह फैल गई. राहुल के मातापिता परेशान हो उठे, क्योंकि राहुल न केवल होनहार था बल्कि अभी तक वह अपनी कक्षा में अव्वल आता रहा. फेल होने के चलते राहुल ने खुद को कमरे में बंद कर लिया, हालांकि, काफी समझाने के बाद उस ने दरवाजा खोला. राहुल का फेल हो जाना किसी के गले नहीं उतर रहा था.

मांबाप के बहुत पूछने पर राहुल ने जो बताया उसे सुन कर सभी हैरान हो गए. परीक्षा के 2 महीने पहले ही राहुल ने अपने स्मार्टफोन में एक औनलाइन खेला जाने वाला गेम इंस्टौल कर लिया था. राहुल को इस गेम की ऐसी लत लगी कि वह घंटों अपने स्मार्टफोन पर गेम में उलझा रहता था. जब वह अपने कमरे से बाहर नहीं निकलता तो घरवालों को यह लगता कि राहुल परीक्षा की तैयारी कर रहा है. लेकिन माजरा बिलकुल उलटा था.

राहुल पढ़ाई की आड़ में अपना सारा समय औनलाइन गेम खेलने में लगा देता था, जिस का नतीजा सामने था. राहुल की इस लत के चलते उस के पिता नाराज होने लगे तो राहुल ने उन पर ही हमला बोल दिया. यहां मामला केवल परीक्षा में फेल होने तक ही सीमित नहीं था, बल्कि मामला कहीं ज्यादा गंभीर हो चुका था.

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राहुल के पिता राहुल के इस व्यवहार से काफी घबरा गए थे. वे राहुल को ले कर काफी परेशान रहने लगे. उन्होंने अपनी यह परेशानी अपने जानने वाले को बताई तो उस जानने वाले ने राहुल के पिता को राहुल को दिमाग के डाक्टर को दिखाने की सलाह दी. आखिर राहुल को ले कर जब उस के पिता दिमाग के डाक्टर के पास ले कर पहुंचे तो डाक्टर ने राहुल के लक्षणों को देख कर बताया कि राहुल गेमिंग डिस्और्डर का शिकार हो चुका है.

क्या है गेमिंग डिस्और्डर : मनोरोग विशेषज्ञ डा. बी एम त्रिपाठी की मानें तो गेमिंग डिस्और्डर ऐसा मनोरोग है जो बहुत ज्यादा औनलाइन गेम खेलने से होता है. इस में मरीज को गेम के प्रति अति रुचि हो जाती है जो नशे या व्यसन की तरह काम करने लगती है. पहले इस बीमारी को मनोरोग की श्रेणी से बाहर रखा गया था लेकिन हाल ही में डब्लूएचओ यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे भयावह मानते हुए गेमिंग डिस्और्डर को मनोरोग की श्रेणी में सूचीबद्ध कर दिया है.

गेमिंग डिस्और्डर के लक्षण : गेमिंग डिस्और्डर के मरीज औनलाइन गेमिंग को इतनी ज्यादा तरजीह देने लगते हैं कि उन के लिए बाकी के काम और ऐक्टिविटीज निरर्थक लगने लगती हैं. धीरेधीरे मरीज को नींद आनी कम हो जाती है. उस का खानपान अनियमित हो जाता है. इस से वह बातबात पर झुंझलाने लगता है. इसी कड़ी में उस के आपसी निजी संबंध चाहे पारिवारिक हों या सामाजिक, बिखर जाते हैं.

सर्वाइकल की समस्या : हड्डी रोग विशेषज्ञ डा. कृष्णा वर्मा का कहना है कि औनलाइन गेमिंग के ज्यादा इस्तेमाल से हमारी गरदन लगातार मोबाइल की स्क्रीन पर झुकी हुई स्थिति में रहती है. लगातार बैठने की यह स्थिति हमें मुसीबत में डाल सकती है. ऐसी स्थिति में गरदन के पिछले हिस्से में भयानक दर्द व सूजन होने लगती है. परेशानी तब और बढ़ जाती है जब मरीज को कौलर बैल्ट पहनने की नौबत आ जाती है. इन सब के अलावा औनलाइन गेम यूजर के दोनों हथेलियों के अंगूठे बहुत समय तक मुड़े हुए होते हैं. इस से धीरेधीरे अंगूठों में भी तकलीफ महसूस होने लगती है. यही हाल दोनों हाथ की कुहनी का भी होता है जो कि गेम खेलते समय अमूमन मुड़ी हुई अवस्था में होती हैं. आजकल ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है जिन्हें कम उम्र में ही हड्डी के रोगों से जूझना पड़ रहा है.

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आंखों पर असर : मोबाइल चाहे कितना ही अच्छा हो या आई प्रोटैक्शन फीचर से लैस हो, ज्यादा इस्तेमाल नुकसानदायक होता ही है. यदि आप औनलाइन गेमिंग के आदी हो चुके हैं तो इस का सीधा असर आप की आंखों पर पड़ता है. छोटी स्क्रीन का मोबाइल हो या बड़ी स्क्रीन का, ज्यादा देर स्क्रीन पर आंख गड़ाए रहने पर नुकसान तो होता ही है, आंखों से पानी गिरना, जलन व खुजली की समस्या भी होने लगती है. सिर में भारीपन महसूस होने लगता है, सो अलग.

हिंसा को बढ़ावा : समाजशास्त्री

डा. लोकरत्न शुक्ल की मानें तो आज के आधुनिक परिवेश में हर क्षेत्र में एकदूसरे से आगे निकल जाने की होड़ है. जहां पर एक तरफ युवावर्ग अच्छा कैरियर बनाने के पीछे जीतोड़ मेहनत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर एक ऐसा वर्ग भी है जो अपना पूरा समय व ऊर्जा इस तरह के खेलों के पीछे बरबाद कर रहा है. इस तरह के खेले जाने वाले हिंसक खेल, बेशक वर्चुअल ही सही लेकिन हथियारों का इस्तेमाल अपने दूसरे साथी खिलाड़ी पर किया जाता है, निश्चितरूप से खिलाड़ी के मन में हिंसा की भावना पैदा करते हैं.

एकदूसरे को खत्म कर के अपने नंबर को बढ़ाते हुए वर्चुअल दुनिया से बाहर निकल कर जब आप वास्तविक दुनिया में अपनेआप को विस्तारित करने लगें तो समझिए वास्तव में स्थिति माफी गंभीर है. हाल ही में इन खेलों के प्रभाव से होने वाले अपराधों की खबरों ने चिंता पैदा कर दी है. जब युवावर्ग या किशोर को अपना समय, अपनी ऊर्जा अपने सर्वांगीय विकास में लगानी चाहिए, वे बाल सुधार गृह में भेजे जा रहे हैं और इस की वजह अगर कोई खेल है, तो स्थिति बहुत ही चिंतनीय है. ऐसे में हम सब की जिम्मेदारी बनती है कि हम ऐसे हिंसात्मक खेलों से खुद को दूर रखें. अपने बच्चों पर इतनी नजर जरूर रखें कि वे मोबाइल का सदुपयोग कर रहे हैं या दुरुपयोग.

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डा. लोकरत्न शुक्ल के अनुसार तकनीकी के इस दौर में आउटडोर खेल खेलने वाले बच्चों की संख्या लगातार घटती जा रही है. बाहरी परिवेश में खेले जाने वाले खेल हमारा शारीरिक विकास तो करते ही हैं, साथ में, उन से हमारे अंदर टीमवर्क की भावना भी विकसित होती है. और ऐसे खेल हमें किसी भी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.

वयस्कों को भी लत : औनलाइन गेमिंग के शौकीन केवल कम उम्र के बच्चे ही नहीं, बल्कि किशोर व वयस्क भी होते हैं. एक रिपोर्ट की मानें तो यूनाइटेड किंगडम मेें लगभग 200 ऐसे मामले दर्ज हुए हैं जिन में महिलाओं ने अपने पति से तलाक मांगा है, जिस की सब से बड़ी वजह है उन का औनलाइन गेम खेलने के चलते अपनी पत्नियों को समय नहीं दे पाना.

पबजी यानी प्लेयर्स अननोन बैटलग्राउंड एक साउथ कोरियन कंपनी ब्लू होल औपरेट करती है. आज के समय का सब से रोचक व एडवांस फीचर ग्राफिक्स वाला यह गेम इन दिनों लोगों को अपने शिकंजे में जकड़े हुए है. पबजी गेम का डिजाइनर ब्रेंडन ग्रीन है जो आयरलैंड का मूल निवासी है. सब से पहले इस गेम का बीटा वर्जन मार्च 2017 में लौंच हुआ, जिस की सफलता ने इस खेल के लिए एक बड़ा बाजार खोल दिया. इसी कड़ी में फरवरी 2018 में इस का फुल वर्जन एडवांस फीचर के साथ ऐंड्रौयड के प्लेटफौर्म पर परोस दिया गया. यह खेल रोचक तो है लेकिन यह हमें बीमार बना रहा है.

अमेरिकी विशेषज्ञों के अनुसार, यह खेल बच्चों का माइंड डैवलपमैंट रोक रहा है. इस खेल को डिजाइन ही ऐसे किया गया कि इसे खेलने वाले के दिमाग में इस खेल के लिए लालच और जनून पैदा हो जाए. इस में सर्वाइवल टास्क दिए गए हैं. दूसरे को मार कर खुद को बचा रखना ही रैंकिंग को बढ़ाता है. अभी हाल में ही कुछ सट्टेबाजी के मामले भी संज्ञान में आए हैं जिस से इस का दुरुपयोग और बढ़ गया है.

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जब आ जाएं इस की जद में : सिक्के के दो पहलू होते हैं, जहां अच्छाई होती है वहां बुराई भी होती है. दोनों चीजें समानांतर चलती रहती हैं. कोई भी खेल मनोरंजन का साधन मात्र होता है. उसे जनून बनाना, उस खेल का नशा पालना जानबूझ कर आग में कूदने जैसा होता है. अगर आप इस की गिरफ्त में आ जाते हैं तो इस से बाहर भी निकलना आप को खुद ही पड़ेगा.

मनोरोग विशेषज्ञ डा. बी एम त्रिपाठी के अनुसार, गेमिंग डिस्और्डर से बाहर आने के लिए अपना दिमाग दूसरे कार्यों में लगाएं. वह कार्य करें जिस से आप का समुचित विकास हो, परिवार को समय दें व एकांत से बचें.

ऐसे में जब आप गेमिंग डिस्और्डर से जूझ रहे होंगे तो सब से ज्यादा सहायक आप का परिवार ही साबित होगा. अपनों से अपनी बातें शेयर करें, अपनों के साथ अच्छा वक्त बिताएं और जो सब से जरूरी बात है वह यह है कि एकांतवास से बच कर रहें. खुद से लौंग टाइम कमिट करें. अच्छी पत्रिकाएं और पुस्तकें पढ़ने की आदत डालें. इस तरह की बुरी लत से बचाने में पत्रिकाओं में समयसमय पर छपने वाले लेख काफी कारगर साबित हो सकते हैं.

4 टिप्स: मसूर दाल पाउडर से पाएं चेहरे पर निखार

मसूर की दाल खाने के साथ-साथ आपकी स्किन के लिए भी काफी फायदेमंद है. इसमें कई तरह के मिनरल,  विटामिन, एंटीऔक्सीडेंट होते हैं, जो स्किन के लिए मददगार होते हैं. इसके इस्‍तेमाल से आप अपनी स्किन में बदलाव देख सकते हैं. मसूर दाल आपके चेहरे के धब्बे और पिग्मेंटेशन को कम करने में मदद करती है.

ऐसे करें इस्‍तेमाल

  1. अगर आप चेहरे में निखार लाना चाहते हैं तो मसूर की दाल के पेस्‍ट में बेसन, मुल्‍तानी मिट्टी मिलाकर इस्‍तेमाल करें.

2. मसूर की दाल का इस्‍तेमाल एंटी-एजिंग पैक बनाने के लिए किया जा सकता है,  जिसमें पाउडर के साथ सूखे मावों का पाउडर भी मिलाया जाता है. उदाहरण के लिए आप इसमें अखरोट का पाउडर या बेसन मिला सकते हैं. यह स्किन की टैन निकालने में फायदेमंद है.

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3. मसूर की दाल पाउडर में दूध मिलाकर भी इस्‍तेमाल किया जा सकता है. इस पेस्‍ट को हल्‍के हाथों से चहेरे पर लगाएं. यह चहेरे की डेड स्किन, पौल्‍यूशन, एक्‍स्‍ट्रा औयल निकालने में मदद करता है. इसमें मिलाया गया दूध चेहरे को मौइश्‍चराइज करता है.

4. मसूर की दाल के पाउडर में पिसी उड़द की दाल, बादाम का तेल, ग्लिसरीन और गुलाब जल मिलाने से यह एंटी एक्‍ने फेस पैक की तरह काम करती है.

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ध्‍यान रखें ये बातें

– ब्‍लैकहेड्स और व्‍हाइटहेड्स को हटाने में मसूर की दाल बेहद फायदेमंद होती है. लेकिन इसे हफ्ते में एक से ज्‍यादा बार इस्‍तेमाल करने पर यह चेहरे के लिए आवश्‍यक औयल को रोक भी सकती है.

– जिन लोगों की स्किन सेंसिटिव और अधिक ड्राई होती है उन्‍हें इससे बचना चाहिए.

– मसूर की दाल स्किन में कसावट लाती है पर इससे स्किन ड्राई भी होती है, इसलिए इसको अप्‍लाई करने के बाद चेहरे की मौइस्चराइजिंग बेहद महत्वपूर्ण है.

आप चोर हैं, सरकार की नजर में

सरकार से उम्मीद तो यह रहती है कि वह आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को बेवजह कठिन न बनाए लेकिन अगर कायदेकानूनों और नियमों की आड़ में सरकार लोगों को चोर साबित करने पर उतारू हो जाए तो कोई क्या कर लेगा…

सरकार यही रही और प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री भी यही रहे, जो हैं, तो अगले साल आप को मुमकिन है कि इस बात का भी ब्योरा देना पड़े कि सुबह नाश्ते से ले कर रात के डिनर तक में आप ने क्या खाया था और उस की कीमत कितनी थी. फिर सरकार तय करेगी कि आप ने कहीं निर्धारित आमदनी से ज्यादा का तो नहीं खाया और अगर खाया पाया गया तो आप को सजा भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि आप ने बेईमानी की है.

ऐसा करने के पीछे मुकम्मल साजिशें और वजहें हैं जिन में से ताजीताजी यह है कि आइंदा आप को अपने आयकर रिटर्न में अपनी आय के तमाम छोटेबड़े स्रोतों की जानकारी देनी होगी, मसलन-

आप का कोई किराएदार है तो आईटीआर में उस का नाम और किराया देना होगा. यह जानकारी आप इसलिए नहीं छिपा सकते क्योंकि किराएदार पहले ही उस का टीडीएस काट चुका होगा. यह नियम एक लाख रुपए सालाना तक के किराए पर लागू होगा.

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इस पर भी तुर्रा यह, कि किराएदार के पैनकार्ड का भी इंतजाम मकानमालिक को ही करना होगा.

अपनी कृषिआय की जानकारी पूरे विस्तार से देनी होगी. आप को आईटीआर में यह दर्ज करना ही होगा कि आप के पास कितनी जमीन है और उस में से कितनी सिंचित व कितनी असिंचित है. इस बाबत आप को खसरे की प्रति नत्थी करनी पड़ेगी.

दूसरे स्रोतों से आमदनी का ब्योरा देने के लिए भी आप बाध्य होंगे जिसे 2 वर्गों कैजुअल व नौनकैजुअल में बांटा गया है. गेमिंग व लौटरी से अर्जित आय केजुअल और ब्याज व कमीशन से हुई आय को नौनकैजुअल मद में रखा गया है.

यानी आप चोर हैं

नए फरमान के पीछे छिपी सरकारी मंशा यह है कि लोग अपनी आय छिपाएं नहीं और सही जानकारी दे कर टैक्स भरें. यानी अभी तक आप आय छिपा कर टैक्स बचा रहे थे. जाहिर है कि सरकार की नजर में आप चोर हैं. इस कथित चोरी को रोकने के लिए अब आप को नए तरीके से परेशान किया जाएगा. आईटीआर फौर्म और लंबाचौड़ा हो जाएगा. इस से ज्यादा सिरदर्दी की बात यह है कि आयकर विभाग को कभी भी आप को परेशान करने की छूट दे दी गई है.

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जैसा इस सरकार का धर्म मानता है कि आप पापी हैं और जब तक पंडों को दान न करें, आप को पापों से मुक्ति नहीं मिलेगी. वैसे ही देश चलाने वाले पंडेनुमा शासक मानते हैं कि आप आय छिपाते हैं क्योंकि आप उसे टैक्स नहीं देना चाहते जो कालाधन हो जाता है. दलील यह दी जा रही है कि उच्च और मध्यवर्ग कृषिआय की आड़ में यह चोरी कर रहा है और किराएदारी के अलावा आमदनी के दूसरे स्रोतों की जानकारी नहीं दे रहा.

जाहिर सी बात है कि दरअसल, सरकार नियमों और नए कानूनों की आड़ ले कर आप के और आप की वित्तीय स्थिति के बारे में सबकुछ जान लेना चाह रही है. इस के पीछे देश के विकास की उस की यह दलील उतनी ही खोखली है जितनी यह कि आप मंदिर में अपनी मरजी से दानदक्षिणा नहीं देते, बल्कि उसे तरहतरह के डर दिखा कर वसूला जाता है. जो लोग मरजी से यथोचित दक्षिणा चढ़ाते हैं वे चोर नहीं हैं, बल्कि सज्जन और धार्मिक हैं.

एक के बाद एक प्रहार

हकीकत तो यह है कि मौजूदा सरकार 5 साल लोगों की हर गतिविधि को जानने में लगी रही क्योंकि वह न केवल पूर्वाग्रही व कुंठित है बल्कि खुद को असुरक्षित भी महसूस करती रही है. सरकार की साफ मंशा आम लोगों को गुलाम बनाने की रही है. नोटबंदी कैसे एक बेतुका और तानाशाहीभरा कदम था, इस पर खूब चर्चा हो चुकी है, लेकिन एक झटके में सरकार को पता चल गया था कि किस के पास कितना पैसा है.

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भ्रष्टाचार, कालाधन, आतंकवाद खत्म करने जैसे मकसद तो नोटबंदी से पूरे नहीं हो पाए, क्योंकि सरकार की यह मंशा ही नहीं थी. सरकार की मंशा थी लोगों की वित्तीय स्थिति जानने की, जो उस ने जान ली. इस से हुआ यह कि लोग अब तक सदमे में हैं और बचत नहीं कर पा रहे हैं और न ही जमीनजायदाद बना पा रहे हैं. लोग मारे डर के बचत के पैसे से सोना भी नहीं खरीद पा रहे कि क्या पता कब सरकार कोई नया नियमकानून ला कर नया बखेड़ा खड़ा कर दे.

नोटबंदी के हादसे के बाद आया जीएसटी नाम का कानून. इस ने व्यापारियों की चूलें हिला कर रख दीं. लाखों लोग बेरोजगार हो गए. छोटे व्यापारी देखते ही देखते कंगाल हो कर सड़कों पर आ गए और डरने लगे. सरकार यही चाहती थी. पैसा केवल श्रेष्ठ लोगों के हाथों में होना चाहिए जो राजा के दरबार में नियमित हाजिरी लगाएं. हर किस्म की अनुमति के बिना कुछ करने वाला राष्ट्रद्रोही ही है.

लोकतंत्र में किसी भी चुनी गई सरकार से अपेक्षा यह की जाती है कि वह रोजागार के मौके बढ़ाए, व्यापार, व्यवसाय और खेतीकिसानी को बढ़ावा दे, जिस से लोगों का जीवनस्तर सुधरे और वे खुशहाल रहते हुए देश के विकास में भागीदार बनें. लेकिन मोदी सरकार ने हर काम उलटा किया, जो लोगों की निजता का हनन करता हुआ था. 5 साल सरकार लोगों की पीठ पर वित्तीय कोड़ा बरसाती रही और लोग कराहते, सोचते रहे कि आखिर उन का कुसूर क्या है, क्या सिर्फ इतना कि वे दुनिया के सब से बड़े लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं?

बेनामी जायदाद के नए लंबित कानून की तलवार लोगों के सिर पर लटक रही है जिस में सरकार ने यह मान लिया है कि हर वह जायदाद नाजायज है जिस की जानकारी उसे नहीं दी जाती. यह पूछने और सोचने वाला कोई नहीं कि लोग सरकार को यह जानकारी क्यों दें. और अब तो सोने पर भी सीलिंग कर दी गई है. आप को सरकार को बताना जरूरी है कि आप के पास कितना सोना है और वह आया कहां से है.

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सरकार ने कदमकदम पर कैसे निजता और आमदनी पर पहरे बैठाए और आम लोगों को आतंकित करने का काम किया, इसे आधारकार्ड की अनिवार्यता से भी सहज समझा जा सकता है, जिस पर खासा बवंडर मचा था और सुप्रीम कोर्ट को कई मामलों की सुनवाई करने के बाद यह आदेश देना पड़ा था कि आधारकार्ड की हर जगह अनिवार्यता गैरजरूरी है.

5 साल का दर्द

जिस तरह आज आईटीआर में नएनए प्रावधान किए जा रहे हैं ठीक उसी तरह सरकार ने हर जगह आधारकार्ड अनिवार्य कर दिया था जिस से आम लोगों की हर गतिविधि व जानकारी उस के पास रहे. यह सीधेसीधे निजता पर हमला था जिस पर 25 सितंबर, 2018 को एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि बैंकखाते और मोबाइल नंबर को आधार से जोड़ना जरूरी नहीं है. स्कूल, कालेजों में दाखिले के लिए भी सुप्रीम कोर्ट ने आधारकार्ड को गैरजरूरी बताया था.

इस के अलावा अहम बात सब से बड़ी अदालत ने यह कही थी कि सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए आधार अनिवार्य नहीं होगा. यह ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की मंशा पर पानी फेर दिया था लेकिन तब तक डरेसहमे आधे से भी ज्यादा लोग हर जगह आधारकार्ड लिंक करा चुके थे.

याद करना जरूरी और प्रासंगिक है कि सुप्रीम कोर्ट में आधारकार्ड पर 27 याचिकाएं दायर हुई थीं और अदालत ने रिकौर्ड 38 दिनों तक इस पर सुनवाई करते अपना फैसला सुनाया था जो लोगों को आंशिक राहत देता हुआ था. इन सभी याचिकाकर्ताओं, जिन में से एक हाईकोर्ट के पूर्व जज के एस पुट्टास्वामी भी थे, का कहना था कि आधार से निजता का पूर्ण उल्लंघन हो रहा है. आधार एक तरह से जनेऊ या झाड़ू की तरह है जो हरेक को जबरन हर समय धारण करना पड़ता है.

नोटबंदी और जीएसटी की दहशत से लोग अभी उबर भी नहीं पाए थे कि सरकार ने हर जगह आधार की अनिवार्यता लाद कर अपने मंसूबे जाहिर कर दिए थे कि वह हर हालत में लोगों के बारे में सबकुछ जान कर रहेगी.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर एक याचिककर्ता ऊषा रामानाथन का यह कहना बेहद अर्थपूर्ण था कि लोगों की व्यक्तिगत जानकारी भविष्य का एक ऐसा संसाधन है जिस के दम पर सरकार आने वाले समय में एक अर्थव्यवस्था तैयार करना चाहती है.

यह सोचा जाना बेमानी नहीं है कि उन का इशारा पौराणिक वर्णव्यवस्था आधारित अर्थव्यवस्था की तरफ हो सकता है जिस में ब्राह्माणों की आमदनी सब से ज्यादा होती थी और शूद्रों की सब से कम होती थी, बल्कि होती ही नहीं थी.

बकौल ऊषा रामानाथन, ऐसा करना सही है या गलत, यह बड़ा सवाल है. मुझे नहीं लगता कि इस फैसले से लोगों के मौलिक अधिकार सुरक्षित हुए हैं. दरअसल, सरकार आधार लिंक को मनी बिल की तरह पारित करना चाहती थी. गौरतलब यह भी है कि 5 जजों की बैंच में से एक जस्टिस वाई वी चंद्रचूड़ ने तो आधार नंबर को पूरी तरह असंवैधानिक करार दे दिया था.

गैरजरूरी सिरदर्दी

नोटबंदी की मानसिक यंत्रणा शायद ही आम लोग कभी भूल पाएंगे. व्यापारी तो अब रोजरोज जीएसटी को झींकते रहते हैं. लेकिन सरकार ने अपनी कोशिशें नहीं छोड़ी हैं. वह लोगों के बारे में जानने की हर मुमकिन कोशिश करती रही

है. चुनाव की सुगबुगाहट के चलते ये कोशिशें धीमी जरूर हुईं लेकिन आईटीआर का नया मामला बताता है कि सरकार ने अपनी कोशिशें पूरी तरह बंद नहीं की हैं.

आईटीआर के नए प्रावधानों से

होगा यह कि लोगों को गैरजरूरी सिरदर्दी से जूझना पड़ेगा. जिन के पास जमीनजायदाद हैं उन्हें पूरा ब्योरा देना पड़ेगा. इस पर भी डर यह बना रहेगा कि आयकर विभाग कभी भी उन की गरदन दबोच सकता है.

उदाहरण जमीन का लें, जिन के पास एक एकड़ जमीन है उन्हें बताना होगा कि उस से अगर एक लाख रुपए की आमदनी हुई तो कैसे हुई. आयकर विभाग पूछेगा कि आप ने ऐसी कौन सी कैश क्रौप बोई थी जो एक लाख रुपए की बिकी. अगर बिकी तो उस के सुबूत रसीद वगैरह भी लाइए.

एक एकड़ जमीन से आमदनी का आयकर विभाग का पैमाना वही होगा जो सरकार का है कि इस से तो 20-30 हजार रुपए ही कमाए जा सकते हैं क्योंकि सरकार उतना ही हर्जाना या मुआवजा देती है. दूसरे, अगर लोग जमीन को परती रखते हैं या पैदावार मर जाती है तो आयकर विभाग लोगों की एक नहीं सुनने वाला. उस की नजर में तो कृषियोग्य भूमि का मतलब ही यह होगा कि इतने हजार रुपए की फसल उस में हुई.

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यही बात किराएदारी पर लागू होती है. यह जरूरी नहीं कि कोई भी मकान सालभर किराए पर उठा रहे. अब आप लाख रोतेझींकते रहिए कि हुजूर, किराएदार तो 10 महीने ही टिका था. 2 महीने तो मकान खाली पड़ा रहा था. यानी अब मकानमालिक को किराएदार के सामने गिड़गिड़ाना पड़ेगा कि भैया, एक एनओसी तू भी देता जा कि जनवरी से अक्तूबर तक ही रहा था.

यह एक बेतुकी बात नहीं तो और क्या है कि लोग किराएदार को दामाद की तरह रखने को मजबूर हो जाएंगे. वह अगर किराया खा कर भाग भी जाए तो आयकर विभाग एक नहीं सुनेगा. कागजी और कानूनी खानापूर्तियां और बढ़ेंगी जिस का खमियाजा मकानमालिक और किराएदार दोनों को ही भुगतना पड़ेगा.

सरकार, दरअसल, जानबूझ कर लोगों की रोजमर्राई जिंदगी मुश्किल कर रही है. वह चाहती है कि लोग लिखापढ़ी में उलझे रहें और सरकारी विभागों से आतंकित रहें. आयकर विभाग से तो लोग वैसे ही खौफ खाते हैं जो कभी भी किसी के यहां छापा मार सकता है. इन छापों में कुछ न भी निकले तो उस का कुछ नहीं बिगड़ता. क्योंकि यह तो अदालत में साबित होता है कि छापे में पकड़ाई रकम व जायदाद वाकई नाजायज और गैरकानूनी थी भी या नहीं.

होना यह चाहिए

यह सोचना गलत है कि सभी लोग टैक्सचोर होते हैं. हकीकत में सरकार नएनए और ज्यादा टैक्स जुटाने के चक्कर में लोगों को डराधमका कर पैसे वसूलती है. टैक्स कितना हो, इस पर बहस की तमाम गुंजाइशें हैं. वह इतना नहीं होना चाहिए कि लोग बचत ही न कर पाएं जो कि उन का हक है.

टैक्स स्लैब ऐसा होना कोई मुश्किल काम नहीं है कि लोग स्वेच्छा से यथोचित टैक्स दें. लोग मंदिर में पैसा चढ़ाते हैं. वहां कोई जोरजबरदस्ती आमतौर पर नहीं होती. इसलिए मंदिर खूब फलफूल भी रहे हैं. पंडेपुजारी अगर जोरजबरदस्ती करते हैं तो लोग श्रद्धाआस्था भूलते हुए उन्हें धकिया भी देते हैं.

नए आईटीआर पर भोपाल की एक प्रोफैसर का कहना है कि उन की सालाना सैलरी 18 लाख रुपए है जिस में से 5 लाख 40 हजार रुपए उन्हें इनकम टैक्स के देने पड़ते हैं यानी उन की वास्तविक सालाना तनख्वाह 12 लाख 60 हजार रुपए ही है. इस में से खरीदे गए 60 लाख रुपए के मकान पर वे 60 हजार रुपए की मासिक बैंककिस्त भरती हैं. ऐसे में उन के पास 5 लाख 40 हजार रुपए ही वास्तविक रूप से बचते हैं.

उन के मकान का किराया सिर्फ

एक लाख 20 हजार रुपए सालाना आता है, यानी कागजों में उन की आमदनी इतनी ही बढ़ जाती है. ऐसे कई मकानमालिकों का दर्द यह है कि कर्ज के ब्याज पर महज ढाई लाख रुपए की छूट है. अब अगर किराए के एकाध लाख रुपए मिल भी जाते हैं तो सरकार उसे भी आमदनी मानते क्यों टैक्स ले रही है? क्या भविष्य या बुरे वक्त के लिए जमीनजायदाद बनाना गुनाह है.

बैंक में एफडी करो तो उस के ब्याज पर भी टैक्स और कहीं निवेश करो तो भी टैक्स. आखिर सरकार चाहती क्या है?

सौ में से एकाध नागरिक ही टैक्स चोरी करता है, लेकिन उस की सजा 99 बेगुनाह और ईमानदार लोगों को भी बेईमान मानते देना कौन सा न्याय है, बात समझ से परे है.

दिक्कत जानकारी देना नहीं है, बल्कि उस का सप्रमाण अनावश्यक ब्योरा देना है. लोगों का जायज डर यह है कि अपनी आमदनी बढ़ाने पर सरकार कभी भी इन जानकारियों के आधार उन्हें टारगेट कर सकती है.

सोचने वाली इकलौती बात यह है कि सरकार लोगों की खासतौर से उन की वित्तीय स्थिति के बारे में जानने को बेचैन क्यों है. तय है इसलिए कि सरकार को जागरूक और खुश लोग नहीं, बल्कि रोते, झींकते, गुलाम लोग चाहिए जो मेहनत कर पैसा कमाएं और उसे टैक्स देते रहें.

नई सुबह

अंधविश्वास की कट्टर विरोधी अमृता पाखंडी गुरुजी की मीठी- मीठी बातों के जाल में ऐसी फंसी कि उस ने संन्यासिन बनने का फैसला कर लिया जबकि दादा उस की दूसरी शादी कर गृहस्थी बसाना चाहते थे.

अ  मृता को नींद नहीं आ रही थी. वह जीवन के इस मोड़ पर आ कर अपने को असहाय महसूस कर रही थी. उस ने कभी नहीं सोचा था कि ऐसे दिन भी आएंगे कि हर पल बस, दुख और तकलीफ के एहसास के अलावा सोचने के लिए और कुछ नहीं बचेगा. एक तरफ उस ने गुरुजी के मोह में आ कर संन्यास लेने का फैसला लिया था और दूसरी ओर दादा, माधवन से शादी करने को कह रहे थे. इसी उधेड़बुन में उलझी अमृता सोच रही थी.

उस के संन्यास लेने के फैसले से सभी चकित थे. बड़ी दीदी तो बहुत नाराज हुईं, ‘यह क्या अमृता, तू और संन्यास. तू तो खुद इन पाखंडी बाबाओं के खिलाफ थी और जब अम्मां के गुरुभाई आ कर धर्म और मूल्यों की बात कर रहे थे तो तू ने कितनी बहस कर के उन्हें चुप करा दिया था. एक बार बाऊजी के साथ तू उन के आश्रम गई थी तो तू ने वहां जगहजगह होने वाले पाखंडों की कैसी धज्जियां उड़ाई थीं कि बाऊजी ने गुस्से में कितने दिन तक बात नहीं की थी और आज तू उन्हीं लोगों के बीच…’

बड़े भाईसाहब, जिन्हें वह दादा बोलती थी, हतप्रभ हो कर बोले थे, ‘माना कि अमृता, तू ने बहुत तकलीफें झेली हैं पर इस का मतलब यह तो नहीं कि तू अपने को गड्ढे में डाल दे.’दादा भी शुरू से इन पाखंडों के बहुत खिलाफ थे. वह मां के लाख कहने के बाद भी कभी आश्रम नहीं गए थे.

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सभी लोग अमृता को बहुत चाहते थे लेकिन उस में एक बड़ा अवगुण था, उस का तेज स्वभाव. वह अपने फैसले खुद लेती थी. यदि और कोई विरोध करता तो वह बदतमीजी करने से भी नहीं चूकती थी. इसलिए जब भी कोई उस से एक बार बहस करता तो जवाब में मिले रूखेपन से दोबारा साहस नहीं करता था.

अब शादी को ही लें. नरेन से शादी करने के उस के फैसले का सभी ने बहुत विरोध किया क्योंकि पूरा परिवार नरेन की गलत आदतों के बारे में जानता था पर अमृता ने किसी की नहीं सुनी. नरेन ने उस से वादा किया था कि शादी के बाद वह सारी बुरी आदतें छोड़ देगा…पर ऐसा बिलकुल नहीं हुआ, बल्कि यह सोच कर कि अमृता ने अपने घर वालों का विरोध कर उस से शादी की है तो अब वह कहां जाएगी, नरेन ने उस पर मनमानी करनी शुरू कर दी थी.

शुरुआत में अमृता झुकी भी पर जब सबकुछ असहनीय हो गया तो फिर उस ने अपने को अलग कर लिया. नरेन के घर वाले भी इस शादी से नाखुश थे, सो उन्होंने नरेन को तलाक के लिए प्रेरित किया और उस की दूसरी शादी भी कर दी.

अब इस से घर के लोगों को कहने का अवसर मिल गया कि उन्होंने तो नरेन के बारे में सही कहा था लेकिन अमृता की हठ के चलते उस की यह दशा हुई है. वह तो अमृता के पक्ष में एक अच्छी बात यह थी कि वह सरकारी नौकरी करती थी इसलिए कम से कम आर्थिक रूप से उसे किसी का मुंह नहीं देखना पड़ता था.

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बाबूजी की मौत के बाद मां अकेली थीं, सो वह अमृता के साथ रहने लगीं. अब अमृता का नौकरी के बाद जो भी समय बचता, वह मां के साथ ही गुजारती थी. मां के पास कोई विशेष काम तो था नहीं इसलिए आश्रम के साथ उन की गतिविधियां बढ़ती जा रही थीं. आएदिन गुरुजी के शिविर लगते थे और उन शिविरों में उन को चमत्कारी बाबा के रूप में पेश किया जाता था. लोग अपनेअपने दुख ले कर आते और गुरु बाबा सब को तसल्ली देते, प्रसाद दे कर समस्याओं को सुलझाने का दावा करते. कुछ लोगों की परेशानियां सहज, स्वाभाविक ढंग से निबट जातीं तो वह दावा करते कि बाबा की कृपा से ऐसा हो गया लेकिन यदि कुछ नहीं हो पाता तो वह कह देते कि सच्ची श्रद्धा के अभाव में भला क्या हो सकता है?

अमृता शुरू से इन चीजों की विरोधी थी. उसे कभी धर्मकर्म, पूजापाठ, साधुसंत और इन की बातें रास नहीं आई थीं पर अब बढ़ती उम्र के साथ उस के विरोध के स्वर थोड़े कमजोर पड़ गए थे. अत: मां की बातें वह निराकार भाव से सुन लेती थी.

मां ने बेटी के इस बदलाव को सकारात्मक ढंग से लिया. उन्होंने सोचा कि शायद अमृता उन के धार्मिक क्रियाकलापों में रुचि लेने लग गई है. उन्होंने एक दिन गुरुजी को घर बुलाया. बड़ी मुश्किल से अमृता गुरुजी से मिलने को तैयार हुई थी. गुरुजी भी अमृता से मिल कर बहुत खुश हुए. उन्हें लगा कि एक सुंदर, पढ़ीलिखी युवती अगर उन के आश्रम से जुड़ जाएगी तो उन का भला ही होगा.

गुरुजी ने अमृता के मनोविचार भांपे और उस के शुरुआती विरोध को दिल से स्वीकारा. उन्होंने स्वीकार किया कि वाकई कुछ मामलों में उन का आश्रम बेहतर नहीं है. अमृता ने जो बातें बताईं वे अब तक किसी ने कहने की हिम्मत नहीं की थी इसलिए वह उस के बहुत आभारी हैं.

अमृता ने गुरुजी से बात तो महज मां का मन रखने को की थी पर गुरुजी का मनोविज्ञान वह भांप न सकी. गुरुजी उस की हर बात का समर्थन करते रहे. अब नारी की हर बात का समर्थन यदि कोई पुरुष करता रहे तो यह तो नारी मन की स्वाभाविक दुर्बलता है कि वह खुश होती है. अमृता बहुत दिन से अपने बारे में नकारात्मक बातें सुनसुन कर परेशान थी. उस ने गुरुजी से यही उम्मीद की थी कि वह उसे सारी दुनिया का ज्ञान दे डालेंगे, लेकिन गुरुजी ने सब्र से काम लिया और उस से सारी स्थिति ही पलट गई.

गुरुजी जब भी मिलते उस की तारीफों के पुल बांधते. अमृता का नारी मन बहुत दिन से अपनी तारीफ सुनने को तरस रहा था. अब जब गुरुजी की ओर से प्रशंसा रूपी धारा बही तो वह अपनेआप को रोक नहीं  पाई और धीरेधीरे उस धारा में बहने लगी. अब वह गुरुजी की बातें सुन कर गुस्सा नहीं होती थी बल्कि उन की बहुत सी बातों का समर्थन करने लगी.

गुरुजी के बहुत आग्रह पर एक दिन वह आश्रम चली गई. आश्रम क्या था, भव्य पांचसितारा होटल को मात करता था. शांत और उदास जिंदगी में अचानक आए इस परिवर्तन ने अमृता को झंझोड़ कर रख दिया. सबकुछ स्वप्निल था. उस का मजबूत व्यक्तित्व गुरुजी की मीठीमीठी बातों में आ कर न जाने कहां बह गया. उन की बातों ने उस के सोचनेसमझने की शक्ति ही जैसे छीन ली.

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जब अमृता की आंखें खुलीं तो वह अपना सर्वस्व गंवा चुकी थी. गुरुजी की बड़ीबड़ी आध्यात्मिक बातें वास्तविकता की चट्टान से टकरा कर चकनाचूर हो गई थीं. वह थोड़ा विचलित भी हुई, लेकिन आखिर उस ने उस परिवेश को अपनी नियति मान लिया.

उसे लगा कि वैसे भी उस का जीवन क्या है. उस ने सारी दुनिया से लड़ाई मोल ले कर नरेन से शादी कर ली पर उसे क्या मिला…एक दिन वह भी उसे छोड़ कर चला गया और दे कर गया अशांति ही अशांति. नरेन के मामले में खुद गलत साबित होने से उस का विश्वास पहले ही हिल चुका था, ऊपर से रिश्तेदारों द्वारा लगातार उस की असफलता का जिक्र करने से वह घबरा गई थी. आज इस आश्रम में आ कर उसे लगा कि वह सभी अप्रिय स्थितियों से परे हो गई है.

दादा भी माधवन से शादी के लिए उस के बहुत पीछे पड़ रहे थे, वह मानती थी कि माधवन एक अच्छा युवक था, लेकिन वह भला किसी के लिए क्या कह सकती थी. नरेन को भी उस ने इतना चाहा था, परंतु क्या मिला?

दूसरी ओर उस की बड़ी बहन व दादा चाहते थे कि जो गलती हो गई सो हो गई. एक बार ऐसा होने से कोई जिंदगी खत्म नहीं हो जाती. वे चाहते थे कि अमृता के लिए कोई अच्छा सा लड़का देख कर उस की दोबारा शादी कर दें, नहीं तो वह जिंदगी भर परेशान रहेगी.

इस के लिए दादा को अधिक मेहनत भी नहीं करनी थी. उन्हीं के आफिस में माधवन अकाउंटेंट के पद पर काम कर रहा था. वह वर्षों से उसे जानते थे. उस के मांबाप जीवित नहीं थे, एक बहन थी जिस की हाल ही में शादी कर के वह निबटा था. हालांकि माधवन उन की जाति का नहीं था लेकिन बहुत ही सुशील नवयुवक था. दादा ने उसे हर परिस्थितियों में हंसते हुए ही देखा था और सब से बड़ी बात तो यह थी कि वह अमृता को बहुत चाहता था.

शुरू से दादा के परिवार के संपर्क में रहने के कारण वह अमृता को बहुत अच्छी तरह जानता था. दादा भी इस बात से खुश थे. लेकिन इस से पहले कि वह कुछ करते अमृता ने नरेन का जिक्र कर घर में तूफान खड़ा कर दिया था.

आज जब अमृता बिलकुल अकेली थी तो खुद संन्यास के भंवर में कूद गई थी. दादा को लगता, काश, माधवन से उस की शादी हो जाती तो आज अमृता कितनी खुश होती.

अमृता का तलाक होने के बाद दादा के दिमाग में विचार आया कि एक बार माधवन से बात कर के देख लेते हैं, हो सकता है बात बन ही जाए.

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वह माधवन को समीप के कैफे में ले गए. बहुत देर तक इधरउधर की बातें करते रहे फिर उन्होंने उसे अमृता के बारे में बताया. कुछ भी नहीं छिपाया.

माधवन बहुत साफ दिल का युवक था. उस ने कहा, ‘दादा, आप को मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं. आप कितने अच्छे इनसान हैं. मैं भी इस दुनिया में अकेला हूं. एक बहन के अलावा मेरा है ही कौन. आप जैसे परिवार से जुड़ना मेरे लिए गौरव की बात है और जहां तक बात रही अमृता की पिछली जिंदगी की, तो भूल तो किसी से भी हो सकती है.’

माधवन की बातों से दादा का दिल भर आया. सचमुच संबंधों के लिए आपसी विश्वास कितना जरूरी है. दादा ने सोचा, अब अमृता को मनाना मुश्किल काम नहीं है लेकिन उन को क्या पता था कि पीछे क्या चल रहा है.

जैसे ही अमृता के संन्यास लेने की इच्छा का उन्हें पता चला, उन पर मानो आसमान ही गिर पड़ा. वह सारे कामकाज छोड़ कर दौड़ेदौड़े वहां पहुंच गए. वह मां से बहुत नाराज हो कर बोले, ‘मैं यह क्या सुन रहा हूं?’

‘मैं क्या करूं,’ मां बोलीं, ‘खुद गुरु महाराज की मरजी है. और वह गलत कहते भी क्या हैं… बेचारी इस लड़की को मिला भी क्या? जिस आदमी के लिए यह दिनरात खटती रही वह निकम्मा मेरी फूल जैसी बच्ची को धोखा दे कर भाग गया और उस के बाद तुम लोगों ने भी क्या किया?’

दादा गुस्से में लालपीले होते रहे और जब बस नहीं चला तो अपने घर वापस आ गए.

दूसरी ओर अमृता गुरुजी के प्रवचन के बाद जब कमरे की ओर लौट रही थी, तब एक महिला ने उस का रास्ता रोका. वह रुक गई. देखा, उस की मां की बहुत पुरानी सहेली थी.

‘अरे, मंजू मौसी आप,’ अमृता ने पूछा.

‘हां बेटा, मैं तो यहां आती भी नहीं, लेकिन तेरे कारण ही आज मैं यहां आई हूं.’

‘मेरे कारण,’ वह चौंक गई.

‘हां बेटा, तू अपनी जिंदगी खराब मत कर. यह गुरु आज तुझ से मीठीमीठी बातें कर तुझे बेवकूफ बना रहा है पर जब तेरी सुंदरता खत्म हो जाएगी व उम्र ढल जाएगी तो तुझे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक देगा. मैं ने तो एक दिन तेरी मां से भी कहा था पर उन की आंखों पर तो भ्रम की पट्टी बंधी है.’

अमृता घबरा कर बोली, ‘यह आप क्या कह रही हैं, मौसी? गुरुजी ने तो मुझे सबकुछ मान लिया है. वह तो कह रहे थे कि हम दोनों मिल कर इस दुनिया को बदल कर रख देंगे.’

मंजू मौसी रोने लगीं. ‘अरे बेटा, दुनिया तो नहीं बदलेगी, बदलोगी केवल तुम. आज तुम, कल और कोई, परसों…’

‘बसबस… पर आप इतने विश्वास के साथ कैसे कह सकती हैं?’ अमृता ने बरदाश्त न होने पर पूछा.

‘इसलिए कि मेरी बेटी कांता को यह सब सहना पड़ा था और फिर उस ने तंग आ कर आत्महत्या कर ली थी.’

अमृता को लगा कि सारी दुनिया घूम रही है. एक मुकाम पर आ कर उस ने यही सोच लिया था कि अब उसे स्थायित्व मिल गया है. अब वह चैन से अपनी बाकी जिंदगी गुजार सकती है, लेकिन आज पता चला कि उस के पांवों तले की जमीन कितनी खोखली है.

उसी शाम दादा का फोन आया. दादा उसे घर बुला रहे थे. अमृता दादा की बात न टाल सकी. वह फौरन दादा के पास चली गई. दादा उसे देख कर बहुत खुश हुए. थोड़ी देर हालचाल पूछने के बाद दादा बोले, ‘ऐसा है, अमृता… यह तुम्हारा जीवन है और इस बात को मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि अगर तुम संन्यास लेना चाहोगी तो तुम्हें कोई रोक नहीं सकता. आज गुरुजी तुम्हें इस आश्रम से जोड़ रहे हैं तो इसलिए कि तुम सुंदर और पढ़ीलिखी हो. लेकिन इन के व्यवहार, चरित्र की क्या गारंटी है. कल को जिंदगी क्या मोड़ लेती है तुम्हें क्या पता. अगर कल से गुरु का तुम्हारे प्रति व्यवहार का स्तर गिर जाता है तो फिर तुम क्या करोगी? जिंदगी में तुम्हारे पास लौटने का क्या विकल्प रहेगा? अमृता, मेरी बहन, ऐसा न हो कि जीवन ऐसी जगह जा कर खड़ा हो जाए कि तुम्हारे पास लौटने का कोई रास्ता ही न बचे. सबकुछ बरबाद होने के बाद तुम चाह के भी लौट न पाओ.’

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दादा की बात सुन कर अमृता की आंखें भर आईं.

‘और हां, जहां तक बात है तुम्हारी पुरानी जिंदगी की, तो उसे एक हादसा मान कर तुम नए जीवन की शुरुआत कर सकती हो. इस जीवन में सभी तो नरेन की तरह नहीं होते…और हम खुद भी अपनी जिंदगी से सबक ले कर आगे के लिए अपनी सोच को विकसित कर सकते हैं. माधवन तुम्हें बहुत पसंद करता है. मैं ने तुम्हारे बारे में उसे सबकुछ साफसाफ बता रखा है. उसे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है.’

अमृता उस रात एक पल भी नहीं सो पाई थी. मंजू मौसी व दादा की बातों ने उस के मन में हलचल मचा दी थी. एक ओर गुरुजी का फैला हुआ मनमोहक जाल था जिस की असलियत इतनी भयावह थी तो दूसरी ओर माधवन था, जिस के साथ वह नई जिंदगी शुरू कर सकती थी. वह दादा के साथ 3 साल से काम कर रहा था, दादा का सबकुछ देखा हुआ था. और सही भी है, आज नरेन ऐसा निकल गया, इस का मतलब यह तो नहीं कि सारी दुनिया के मर्द ही ऐसे होते हैं.

सही बात तो यह है कि जब वह किसी जोड़े को हंस कर बात करते देखती है तो उस के दिल में कसक पैदा हो जाती है.

फिर गुरुजी का भी क्या भरोसा… उस के मन ने उस से सवाल पूछा, आज वह उस की बातों का अंधसमर्थन क्यों करते हैं? क्या उस की सुंदरता व अकेली औरत होना तो इन बातों का कारण नहीं है? वाकई, सुंदर शरीर के अलावा उस में क्या है…जिस दिन उस की सुंदरता नहीं रही…फिर…क्या वह कांता की तरह आत्महत्या…

यह विचार आते ही अमृता पसीनापसीना हो उठी. सचमुच अभी वह क्या करने जा रही थी. अगर वह यह कदम उठा लेती तो फिर चाहे कितनी ही दुर्गति होती, क्या इस जीवन में कभी वापस आ सकती थी? उस ने निर्णय लिया कि वह अब केवल दादा की ही बात मानेगी. उसे अब इस आश्रम में नहीं रहना है. वह बस, सुबह का इंतजार करने लगी, कब सुबह हो और वह यहां से बाहर निकले.

धीरेधीरे सुबह हुई. चिडि़यों की चहचहाहट सुन कर उस की सोच को विराम लगा और वह वर्तमान में आ गई. सूरज की किरणें उजाला बन उस के जीवन में प्रवेश कर रही थीं. उस ने दादा को फोन लगाया.

‘‘दादा, मैं ने आप की बात मानने का फैसला किया है.’’

दादा खुशी से झूम कर बोले, ‘‘अमृता…मेरी बहन, मुझे विश्वास था कि तुम मेरी बात ही मानोगी. मैं तो तुम्हारे जवाब का ही इंतजार कर रहा था. मैं उस से बात करवाता हूं.’’

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दादा की बात सुन कर अमृता का हृदय जोरों से धड़क उठा.

थोड़ी देर बाद…

‘‘हैलो, अमृता, मैं माधवन बोल रहा हूं. तुम्हारे इस निर्णय से हमसब बहुत खुश हैं. मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि तुम मेरे साथ बहुत खुश रहोगी. मैं तुम्हारा बहुत ध्यान रखूंगा, कम से कम इतना तो जरूर कि तुम कभी संन्यास लेने की नहीं सोचोगी.’’

अमृता, माधवन की बातों से शरमा गई. वह केवल इतना ही बोल सकी, ‘‘नहीं, ऐसा मैं कभी नहीं सोचूंगी,’’ और फिर धीरे से फोन रख दिया.

इस के बाद अमृता आश्रम से निकल कर ऐसे भागी जैसे उस के पीछे ज्वालामुखी का लावा हो…

फैशन नहीं हेल्थ की दुश्मन है ये 5 चीजें…

आज के मौर्डन दौर में फैशन लोगों पर काफी हावी हो चुका है इसी के चलते आए दिन नई-नई तकनीक भी सामने आती रहती जिससे आप अपनी खूबसूरती को और बढ़ा सकते है. लेकिन क्या आप जानते है की  हर दिन फैशनेबल बने रहने की कोशिश स्वास्थ्य के लिए कितनी हानिकारक हो सकती है. नहीं ना तो आइए हम आपको बताते हैं कि आपको किन—किन फैशनेबल चीजों से सावधानी बरतने की आवश्यकता है.

1.पुश अप ब्रा हैं कैंसर का खतरा

आजकल के फैशनेबल चीजों में से एक पुश-अप ब्रा भी है. फिट एंड सेक्सी दिखने के लिए कई महिलाएं पुश-अप ब्रा का इस्तेमाल करती हैं, जबकि यह स्वास्थ्य के लिए नुकसादायक है. पुश-अप ब्रा से भले ही ब्रेस्ट को सही आकार और ऊंचाई देती हों, लेकिन ब्रेस्ट पर बुरा असर डालती है. पुशगअप ब्रा आपकी ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचाती है और ब्रेस्ट पर इसके निरंतर दबाव से कैंसर का खतरा भी हो सकता है.

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2.टाइट जींस से रहे दूर

टाइट जींस आज सबसे ज्यदा ट्रेंड में है. आजकल 100 में से 70 प्रतिशत लड़कियां टाइट जींस पहनना पसंद करती हैं. जिसके लिए कई लड़कियां और महिलाएं अपने फिगर को बनाए रखने की कोशिश भी करती हैं. टाइट जींस आपके लेग मसल्स पर दवाब बढाती है, जिससे शरीर में ब्लड सर्कुलेशन बाधित होता  है, जो वैरिकाज नसों और सेल्युलाईट की ओर जाता है.

3.हैंडबैग से हो सकता है कंधे और रीढ़ में दर्द

बड़े हैंडबैग को लम्बे समय तक एक ही बाजू पर लटकाए रखना भी आपके लिए हानिकारक हो सकता है. महिलाओं में हैंडबैग को कैरी करना आम बात है. वह उसमें अपने मेकअप का सामान यानि मेकअप किट और लैपटाफप भी रखत हैं. हैंडबैग है तो सुविधाजनक, लेकिन इस तरह से इसका इस्तेमाल हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है. लगातार एक कंधे पर बैग या हैंडबैग रखने से, कंधे और रीढ़ पर खिंचाव आता है. जिससे स्कोलियोसिस और ओस्टियोचोन्ड्रोसिस हो सकता है, साथ ही मांसपेशियों में ऐंठन, रक्त वाहिकाओं का अवरूद्ध और नसों से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं.

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4.हाई हील से हो सकता है हर्निया

महिलाओं को हाई हील पहनना बेहद पसंद होता है. कुछ महिलाएं अपने छोटे कद-काठी की वजह से ऊंची एड़ी के जूते या हाई हील सेंडल रोजाना पहनना पसंद करती हैं. इससे आपका कद सही तो दिखता है. लेकिन इसका मतलब यह नही कि आप रोजाना हाई हील को यूज करें. इससे आपके पैरों में दर्द, पीठ में दर्द और सूजन हो सकती है. इसके अलावा, ऊंची एड़ी के जूते या हाई हील पहनने से अक्सर हर्निया और रीढ़ की समस्या हो सकती है.

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5.अंडरगारमेंट़स करे सही चुनाव

यह महिला के कपड़ों का आवश्यक हिस्सा है. इसके बिना जीना असहजता से भरा लगता है. लेकिन दुर्भाग्यवश, आपके अंडरगारमेंट़स भी आपके लिए हानिकारक हो सकते हैं. सिंथैटिक अंडवियर नमी उत्पन्न करती है और ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करती है. इससे विभिन्न वेजाइना यानि योनि संक्रमण की समसयाएं उत्पन्न होती हैं. इसके अलावा यह ब्लड सर्कुलेशन पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है, जो वैरिकाज नसों और सेल्युलाईट का कारण बन सकती है. वैजाइना को स्‍वस्‍थ रखने के लिए अंडरगारमेंट़स का चुनाव सही ढ़ग से करें.

दलितों के भरोसे दिग्विजय

जैसे ही मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को कांग्रेस ने भोपाल से उम्मीदवार बनाया तो भगवा खेमे में हड़कंप मच गया. जब कोई बड़ा नेता उन के मुकाबले मैदान में उतरने को तैयार नहीं हुआ तो आरएसएस की तरफ से मालेगांव बम ब्लास्ट की आरोपी साध्वी प्रज्ञा भारती को अवतरित कर दिया गया. प्रज्ञा कुछ भी अनापशनाप बोलने के लिए कुख्यात हैं और उन का पहला बयान ही बड़ा बकवास भरा था कि आईपीएस अधिकारी शहीद हेमंत करकरे उन के श्राप के चलते आतंकियों की गोलियों का शिकार हुए थे.

ऐसे बयानों से वोटों का ध्रुवीकरण तो भगवा खेमे ने कर लिया लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि पिछड़े हिंदू और दलित क्यों हिंदुत्व के नाम पर उसे वोट देगा जिन्हें साधने के लिए दिग्विजय सिंह ने पहले ही इंतजाम कर लिए थे. हिंदूमुसलिम वोटर तो बंट चुके हैं, ऐसे में दलित वोटर तय करेंगे कि असली आतंकवादी कौन है प्रज्ञा भारती या फिर दिग्विजय सिंह.

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बदलते रिश्ते

बात साल 2004 की है, धाकड़ नेता बलराम जाखड़ को कांग्रेस ने राजस्थान की चुरू सीट से उम्मीदवार बनाया था. तब भाजपा उन के मुकाबले अभिनेता धर्मेंद्र को उतारना चाहती थी.  लेकिन धर्मेंद्र ने यह कहते चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था कि बलराम जाखड़ उन के बड़े भाई हैं, इसलिए वे उन के खिलाफ नहीं लड़ेंगे. तब हर किसी ने धर्मेंद्र के इस फैसले का स्वागत किया था क्योंकि बलराम जाखड़ और धर्मेंद्र के उजागर रिश्ते वाकई में पारिवारिक व अंतरंग थे.

अब बात 2019 की है, गुरदासपुर सीट से धर्मेंद्र के अभिनेता बेटे सन्नी देओल भाजपा से बलराम जाखड़ के बेटे सुनील जाखड़ के सामने हैं जिन्होंने यह सीट अप्रैल 2017 के उपचुनाव में रिकौर्ड एक लाख 93 हजार वोटों से जीत कर अपनी अहमियत जता दी थी. इस सीट से भाजपा की तरफ से अभिनेता विनोद खन्ना 4 बार जीते लेकिन भाजपा ने उन के बेटे अक्षय खन्ना को टिकट नहीं दिया क्योंकि उन की जीत संदिग्ध थी. सन्नी और सुनील के दिलचस्प और कड़े मुकाबले में कोई भी जीते, लेकिन पुराने रिश्ते और दोस्ती दोनों ही हार चुके हैं.

काहे के क्रुसेडर

गोद लिए बेटे से कभी सगे वाले जैसी फीलिंग नहीं आती और दलित चाहे कितना भी शिक्षित और बुद्धिजीवी हो, सवर्णों की डिक्शनरी में रहता तो दलित ही है. यह सनातनी सत्य जब तक दिल्ली के भाजपा सांसद डाक्टर उदित राज को समझ आया तब तक भाजपा उन्हें गोद से उतार फेंक चुकी थी. वह दूसरे दलित पुत्र, पेशे से गायक, हंसराज हंस को सीने से चिपटा चुकी थी जो पहले ही अकाली दल और कांग्रेस की गोद हरी कर चुके थे. भाजपा से उन्हें क्यों निकलना पड़ा, इस की वजहें गिना रहे तिलमिलाए उदित राज शायद ही इस बात का जवाब दे पाएं कि अगर उन्हें टिकट मिल जाता तो क्या उन वजहों की भ्रूणहत्या नहीं हो जाती.

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15 साल पहले हिंदू धर्म की वर्णव्यवस्था से घबराए इस दलित नेता ने बौद्ध धर्म अपना लिया था, लेकिन 2014 के चुनाव में वे मय अपनी जस्टिस पार्टी के भगवा गोद में क्यों जा बैठे थे, इस सवाल का जवाब शायद ही वे दें. अब समानता और समरसता की हकीकत को झींक रहे उदित राज भले ही नई गोद में जा बैठे हों लेकिन वहां भी उन्हें न्याय नहीं मिलने वाला.

ऐश्वर्या विवादित मीम: विवेक ओबरौय को मांगनी पड़ी माफी

बौलीवुड एक्टर विवेक ओबरौय ने सोमवार को अपने ट्विटर अकाउंट पर एक मीम शेयर किया था, जिसमें ऐश्वर्या राय बच्चन,  सलमान खान, विवेक और अभिषेक बच्चन के साथ नजर आ रही हैं. इस पोस्ट पर ऐश्वर्या राय को टारगेट करते हुए पोल्स के नतीजों का मजाक बनाया गया था.

इस पोस्ट के बाद से विवेक ओेबेरौय को सोशल मीडिया पर लगातार ट्रोल किया जा रहा है. यही नहीं, विवेक के पोस्ट करने के कुछ देर बाद ही महाराष्ट्र महिला आयोग ने एक्टर के नाम नोटिस जारी कर दिया था.इसके बाद विवेक ओबरौय ने अपना बयान देते हुए कहा कि पता नहीं लोग इस बात को क्यों इतना तूल दे रहे हैं जबकि जो लोग उस पोस्ट में हैं, उन्हें कोई दिक्कत नहीं है.

इसके बाद  विवेक ने मंगलवार को अपने ट्विटर अकाउंट से उस ट्वीट को डिलीट करते हुए माफी मांगी हैं. उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा कि कभी-कभी जो पहली नजर में मजाकिया प्रतीत होता है, वह दूसरों के लिए ऐसा नहीं हो सकता है. मैंने पिछले 10 वर्षों में 2000 से अधिक वंचित लड़कियों को सशक्त बनाने में खर्च किया है, मैं कभी भी किसी भी महिला के प्रति अपमानजनक नहीं सोच सकता. आपको बता दें, विवेक ओबरौय आगामी फिल्म ‘पीएम नरेन्द्र मोदी’ में नजर आने वाले हैं.

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