रेटिंग: आधा स्टार

निर्माताः संदीप चैधरी

लेखक व निर्देशक: लोम हर्ष

कलाकार:गैवी चहल, लोम हर्ष, सुरेंद्र पाल, मोहन अगाषे, डायना उपल, मोहन जोशी, अंतरा बनर्जी, विक्रमजीत कंवरपाल  व  अन्य.

सिनेमा एक ऐसी विधा है, जिसमें उत्कृष्ट रचनात्मक काम करना हर इंसान के वस की बात नहीं है. अमूमन फिल्मकार एक बेहतरीन विषयवस्तु व कथानक पर अजेंडे वाली फिल्म बनाने का निर्णय तो ले लेता है, पर उसे अमली जामा नही पहना पाता. ऐसा ही कुछ फिल्मकार लोम हर्ष के साथ हुआ. आस्टे्लिया में छह वर्ष बिताते हुए वहां पर भारत को लेकर लोगों की सोच से विचलित होकर भारत महज गरीब या सपेरों का देश नहीं है, यह बताने और भारतीयों को भी उनके अपने देश की महत्ता याद दिलाने के मकसद से फिल्मकार लोम हर्ष फिल्म ‘‘ये है इंडिया’’ लेकर आए हैं, पर अफसोस यह फिल्म महज बेसिर पैर की कहानी से युक्त चूंचूं का मुरब्बा के अलावा कुछ नहीं है.

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कहानीः

फिल्म की कहानी लंदन में बसे अप्रवासी भारतीय मिथिलेश कुमार उर्फ मिक्की (गैवी चहल) के इर्द गिर्द घूमती है. मिक्की के माता पिता तीस वर्ष पहले लंदन चले गए थे. मिक्की का जन्म वहीं पर हुआ, पर उसे हमेशा अपने वतन भारत की याद आती रहती है. वह लंदन में रहते हुए भारत को लेकर जो कुछ सुनता है, और जो कुछ किताबों में पढ़ता है उसमें उसे विरोधाभास नजर आता है. वह सच जानने के लिए राजस्थान, भारत अपने मित्र पंडित के घर आता है. पंडित के दादाजी (सुरेंद्र पाल) मिक्की को भारत के बारे में काफी कुछ बताते हैं. वह भारत घूमना शुरू करता है. भारतीयों की मेहमान नवाजी व अपनेपन से प्रभावित होकर यहां के सिस्टम के खिलाफ युद्ध छेड़ देता है. मिक्की की प्रेमिका जेनी (डायना उपल) उसे लेने आती है, पर वह उसे वापस भेज देता है. एक दिन वह नालंदा विश्वविद्यालय के गाइड से भिड़ जाता है कि वह विदेशी पर्यटकों के सामने भारत के गौरवशाली इतिहास का जिक्र करते हुए यह क्यों नहीं बताता कि यदि विदेशियों ने हमारे देश को न लूटा होता, तो आज हमारा देश विश्व का सर्वशक्तिमान देश होता. तो वहीं वह राज्य के पर्यटन मंत्री के बेटे यशवर्धन (लोम हर्ष )द्वारा बच्चो से जबरन भीख मंगवाने के रैकेट का भांडा फोड़कर टीवी पर छा जाते हैं. यषवर्धन जब सड़क पर कचरा फेंकता है, तो मिक्की सारा कचरा उसके सिर पर डाल कर टीवी पर हीरो बनकर उभरता है. नाराज होकर राज्य के पर्यटन मंत्री उसे गिरफ्तार करवा देते हैं. देश की जनता मंत्री के खिलाफ धरने पर बैठकर मिक्की को छोड़ने की मांग करती है. मिक्की जमानत पर जेल से बाहर आता है. भारत के प्रधानमंत्री (मोहन अगाषे) मिक्की को बुलाकर मिलते हैं और भारत में होने वाले विश्व शांति समिट के लिए मिक्की को भारत का प्रतिनिधि बना देते हैं. मिक्की इस समिट में हिंसा व अहिंसा के अलावा विश्व शांति को लेकर लंबा चैड़ा भाषण देते है. पूरे विश्व के प्रतिनिधि मिक्की से प्रभावित होकर उसकी प्रशंसा करते हैं.

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पटकथाः

अति लचर व घटिया पटकथा के चलते यह फिल्म प्रभावहीन बन गयी है. कहानीकार व पटकथा लेखक को सिर्फ यह पता है कि उन्हें इस फिल्म में किन मुद्दों को पिरोना है, मगर उन्हें यह नहीं पता कि इन मुद्दों को किस तरह मनोरंजक कहानी का रूप देकर पेश करना है. सारे चरित्र अजीबों गरीब हैं. फिल्म में सिर्फ शुष्क भाषणबाजी के अलावा कुछ नही है. परिणामतः यह फिल्म अपने मकसद को पूरा करने में पूरी तरह से विफल रहती है.

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निर्देशनः     

निर्देशक के तौर पर लोम हर्ष का प्रयास सराहनीय नहीं कहा जा सकता.

अभिनयः

जब चरित्र चित्रण सही न हो, तो दिग्गज कलाकार भी कुछ नहीं कर सकते. गैवी चहल पंजाबी फिल्मों के सुपर स्टार हैं, मगर वह भी इस फिल्म में अपनी प्रतिभा से प्रभावित नही करते. मोहन अगाषे व सुरेंद्र पाल को जाया किया गया है. लोम हर्ष लेखक, निर्देशक के साथ साथ अभिनेता के रूप में भी पूरी तरह से असफल रहे.

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