Bihar SIR : भारत के संविधान ने आजादी मिलने से पहले ही सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार दे दिया था लेकिन आज वोटर लिस्ट में ‘सुधार’ के नाम पर संविधान की भावना को कुचला जा रहा है.

देश के एक महत्त्वपूर्ण राज्य बिहार में होने जा रहे विधानसभा चुनाव से ऐन पहले वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का काम एक तरह से डैमोक्रेसी की नसबंदी जैसा है. जिस तरह से 1975 से 1977 के बीच इमरजैंसी के दौरान जनता की राय के बिना नसबंदी की गई, उस को कहीं आपत्ति दर्ज कराने का मौका नहीं दिया गया उसी तरह से 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद उस की अघोषित इमरजैंसी में जनता को अपनी बात कहने का मौका नहीं दिया जा रहा.

नसबंदी की तरह नोटबंदी कर लोगों की मेहनत की कमाई को लूट लिया गया. नोटबंदी के पक्ष में तर्क दिया गया कि इस से आतंकवाद खत्म होगा. जबकि, नोटबंदी के बाद देश में बड़ी आतंकवादी घटनाए हुईं. यानी, नोटबंदी का मकसद कुछ और था, कहा कुछ और गया.

कोरोना संक्रमण के दौरान देश में जबरन तालाबंदी थोपी गई. तालाबंदी के बाद भी कोरोना से मरने वालों की संख्या को रोका न जा सका. तालाबंदी भी तुगलकी फरमान जैसी घोषणा थी. अब इसी तरह का फरमान बिहार चुनाव से पहले वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण का थोपा गया है. इस का भी मकसद कुछ और है, बताया कुछ और जा रहा है. सवाल है कि वर्ष 1952 में संविधान ने वोट देने का जो अधिकार दिया, चार पीढ़ियों के बाद अब उस को इस तरह से कैसे खत्म किया जा सकता है?

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