फिल्मों में अपेक्षित सफलता से महरूम अभिनेत्रियों का आखिरी पड़ाव शादी होता है. शायद इसी के चलते अभिनेत्री समीरा रेड्डी ने चट मंगनी पट ब्याह कर डाला. बीते दिनों जब उन्होंने अपने बौयफ्रैंड अक्षय वर्दे, जोकि एक बिजनेसमैन हैं, से शादी कर ली तो सब की जबान पर यह बात थी कि न तो साउथ फिल्मों का सहारा मिला न हिंदी फिल्मों का. वैसे अक्षय का मोटरसाइकिल कस्टमाइजेशन का बिजनैस है. लिहाजा, दूल्हे राजा भी घोड़ी पर सवार होने के बजाय हाईफाई बाइक पर सवार हो कर मंडप तक पहुंचे.
बता दें कि समीरा और अक्षय 2 साल से डेटिंग कर रहे थे. बीते साल दिसंबर महीने में समीरा के बांद्रा स्थित घर पर दोनों की रिंग सेरेमनी हुई थी. वैसे समीरा के मुताबिक, शादी कुछ महीनों बाद होनी थी लेकिन अचानक फैसला बदलना पड़ा. चलिए, समीरा जी, आप का कैरियर चले न चले, शादी जरूर चल जाए.
बौलीवुड के कलाकार इन दिनों खेल के जरिए भी पैसा कमाने की रेस में लगे हैं. कोई क्रिकेट की तो कोई हौकी की टीमें खरीद कर करोड़ों कमाने के सपने देख रहा है. इस रेस में अमिताभ बच्चन ने खास दिलचस्पी नहीं दिखाई थी. लेकिन अब सुनने में आ रहा है कि वे हमारे देसी खेल कबड्डी के जरिए आजमाइश करने जा रहे हैं. यह काम वे अपनी कंपनी एबी कौर्प के जरिए कर रहे हैं.
गौरतलब है कि पटना में आयोजित होने वाली 61वीं सीनियर राष्ट्रीय पुरुष और महिला कबड्डी चैंपियनशिप में किए गए प्रदर्शनों के आधार पर कबड्डी प्रीमियर लीग (केपीएल) के लिए खिलाडि़यों के बेस प्राइस तय किए गए. आईपीएल और एचसीएल की तर्ज पर होने वाली कबड्डी की लीग में अमिताभ बच्चन की कंपनी सहित 16 अन्य कंपनियां हिस्सा लेंगी. इन कंपनियों में महिंद्रा, एअर इंडिया, ओएनजीसी जैसी कंपनियां प्रमुख हैं.
सालों बाद फिल्म ‘शाहिद’ से निर्देशन के मैदान में उतरे हंसल मेहता इन दिनों सैंसर बोर्ड से दोदो हाथ करने के मूड में हैं. हंसल ने सैंसर बोर्ड पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा है कि उन की फिल्म ‘शाहिद’ को ‘ए’ सर्टिफिकेट दिया गया, जबकि उत्तेजक, किसिंग और हिंसक दृश्यों से भरपूर ‘…राम-लीला’ और ‘मद्रास कैफे’ को यू/ए सर्टिफिकेट दिया गया.
हंसल मेहता कहते हैं कि वे 2013 में प्रामाणिक की गई फिल्मों पर आरटीआई दायर करेंगे, ताकि सैंसर बोर्ड के दोहरे मापदंडों को उजागर किया जा सके. वैसे सैंसर बोर्ड पर भेदभाव वाले आरोप पहले भी लगते रहे हैं.
कंगना राणावत जल्द ही फिल्म ‘क्वीन’ के जरिए कौमेडी करती नजर आएंगी. लेकिन जब कंगना से उन के पसंदीदा जौनर के बारे में पूछा गया तो उन का जवाब था, हौरर. जी हां. कंगना को दर्शकों को डराने में मजा आता है. शायद इसीलिए वे ‘राज 2’ के बाद जल्द ही दूसरी हौरर फिल्म में नजर आने वाली हैं. निर्देशक भूषण पटेल के साथ बनने वाली इस फिल्म में कंगना ने काम करने की हामी भर दी है.
गौरतलब है कि भूषण पटेल अभी एकता कपूर की फिल्म ‘रागिनी एमएमएस 2’ का निर्देशन कर रहे हैं. भूषण कहते हैं कि कंगना मेरी फिल्म के किरदार को सूट करती है.
देखते हैं, कंगना अपने इस पसंद के जौनर में दर्शकों को कितना भाती हैं.
हौलीवुड में जिस तरह से साल की सब से खराब फिल्मों और अभिनेताओं को रैज्जी अवार्ड देने का चलन है, कुछ इसी तर्ज पर बौलीवुड में भी पिछले कुछ सालों से कद्दू अवार्ड देने का सिलसिला चल रहा है. एक निजी रेडियो द्वारा आयोजित इस अवार्ड शो में ए ग्रेड ऐक्टर्स को उन की वाहियात और फ्लौप फिल्मों के लिए अजीबोगरीब कैटेगिरी के तहत ये अवार्ड दिए जाते हैं.
सब से खराब काम करने वाले बौलीवुड सैलिब्रिटीज को इस साल भी ‘मिर्ची कद्दू अवार्ड’ दिए गए. अभिषेक बच्चन को धूम 3 के लिए ‘बिटवा तुम से ना हो पाएगा अवार्ड’ दिया गया वहीं ‘फटा पोस्टर निकला जीरो अवार्ड’ इमरान खान के
खाते में आया. ‘पकाऊ फिल्म अवार्ड’ ‘हिम्मतवाला’ को, तो वहीं ‘ऐक्सपायरी डेट अवार्ड’ प्रीति जिंटा को मिला. इसी तरह कई और दिलचस्प कैटेगिरी में ये अवार्ड बांटे गए. इतनी बेइज्जती, अवार्ड के जरिए, इन सितारों की शायद ही पहले कभी हुई हो.
इस फिल्म का टाइटल पुरानी दिल्ली की एक मशहूर गली ‘परांठे वाली गली’ के नाम पर रखा गया है, मगर न तो इस में परांठों की खुशबू है न ही परांठों के साथ खाई जाने वाली सब्जी का टैस्ट.
‘परांठे वाली गली’ दर्शकों को थिएटर की दुनिया में ले जाती है. जी हां, वही थिएटर जिसे 30-40 साल पहले दर्शक ऐंजौय करते थे परंतु अब कोई थिएटर का रुख नहीं करता. इस फिल्म के निर्देशक सचिन गुप्ता ने कई थिएटर प्रोडक्शन किए हैं. यह उन की पहली फिल्म है. थिएटर पर आधारित उन की यह फिल्म दर्शकों को निराश ही करती है.
फिल्म को पुरानी दिल्ली की 2-4 लोकेशनों पर शूट किया गया है, बाकी पूरी फिल्म में दिल्ली से कुछ लेनादेना नहीं है. कहानी पुरानी दिल्ली में रहने वाली एक लड़की नैना (नेहा पंवार) और उस के परिवार की है. नैना परांठे बना कर दुकानदारों को सप्लाई करती है. वह हर वक्त चपरचपर बोलती रहती है.
एक दिन उस की मुलाकात मौलिक (अनुज सक्सेना) से होती है जो पास ही की गली की धर्मशाला में अपने दोस्तों के साथ मिल कर एक थिएटर कंपनी चलाता है. नैना उस के साथ थिएटर में काम करने की इच्छा जाहिर करती है. नैना की मां भी उस के साथ जुड़ जाती है. नैना मौलिक की सिफारिश सलूजा (विजयंत कोहली) से करती है मगर सलूजा ऐन मौके पर उसे धोखा दे जाता है. मौलिक टूट सा जाता है. नैना उसे हिम्मत बंधाती है और उसे थिएटर शुरू करने में मदद करती है. उस की मदद से मौलिक सफल हो जाता है.
निर्देशक ने फिल्म को काफी लाउड बनाया है. हर वक्त नैना ‘तैनूमैनू’ करती चिल्लाती रहती है. फिल्म में ‘बैंड बाजा बरात’ की तर्ज पर नैना की बहन की शादी पर बैंडबाजा खूब बजवाया गया है जिस में लोगों को खूब नाचते दिखाया गया है. यह सीन ठूंसा गया लगता है.
अनुज सक्सेना का चेहरा एकदम सपाट लगा है. अभिनय के मामले में वह फिसड्डी है. नेहा पंवार अनाकर्षक लगी है. फिल्म का गीतसंगीत औसत है. गानों में पंजाबी टच है. कैमरामैन ने पुरानी दिल्ली के दर्शन कराने में कंजूसी बरती है.
फिल्म ‘मिस लवली’ को देखते वक्त आप को लगेगा जैसे आप कोई डौक्युमैंटरी फिल्म देख रहे हैं. 80 के दशक में इस तरह की 1-2 रील की छोटीछोटी फिल्में खूब बना करती थीं. सैंसर बोर्ड और सरकार की आंखों में धूल झोंक कर चुपके से इन 1-2 रील की पौर्न फिल्मों को दक्षिण भारत में बनी फिल्मों में फिट कर दिया जाता था ताकि दर्शकों की भीड़ जुटाई जा सके व जम कर कमाई की जा सके. यह फिल्म पौर्न इंडस्ट्री की सचाई को दर्शाती है. परिवार के साथ बैठ कर यह फिल्म देखने लायक तो कतई नहीं है.
‘मिस लवली’ जैसी फिल्में विदेशों में होने वाले फिल्म समारोहों के लिए ठीक होती हैं. इस फिल्म की कांस फिल्म समारोह में काफी तारीफ हुई है.
फिल्म देख कर लगा, निर्देशक ने विषय को गंभीरता से ट्रीट नहीं किया है. फिल्म में गदराए जिस्म, नकली मास्क लगाए चेहरे और कुछ डरावने से चेहरों को दिखाने की ही कोशिश की गई है.
फिल्म की शुरुआत में यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि फिल्म पौर्न इंडस्ट्री की सचाइयों से रूबरू करा रही है. करीब पौने 2 घंटे की यह फिल्म काफी सुस्त है. पटकथा बिखरी हुई है और संपादन में भी कसावट नहीं है.
कहानी 2 भाइयों, मिकी दुग्गल (अनिल जौर्ज) और सोनू (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) की है. मिकी अश्लील फिल्में बनाता है तो सोनू ये अश्लील रीलें सप्लाई करता है. वह इन पौर्न फिल्मों में काम करने के लिए नईनई लड़कियों की भी सप्लाई करता है. एक दिन उस की मुलाकात पिंकी (निहारिका सिंह) से होती है. वह पिंकी से प्यार करने लगता है और उसे ले कर एक फिल्म बनाना चाहता है. उधर, मिकी की जिंदगी में एक नई लड़की नाडिया (मेनका लालवानी) आती है. वहीं, एक दिन नाडिया का खून हो जाता है तो अवैध रूप से ऐसी फिल्में बनाने वालों पर गाज गिर पड़ती है. सोनू गिरफ्तार हो जाता है. मगर जब वह छूट कर आता है तो उसे पता चलता है कि मिकी ने उस की प्रेमिका पिंकी के साथ सैक्स संबंध बना लिए हैं और पिंकी पूरी तरह से मिकी के रंग में रंग चुकी है. वह विक्षिप्त सा हो जाता है.
फिल्म की इस कहानी में 80 के दशक की पुरानी इमारतों, स्टूडियो, धुंधली रोशनी में कामकाज करते कलाकार, डै्रस डिजाइनों पर फोकस किया गया है. फिल्म के कई सीन रात के अंधेरे में फिल्माए गए हैं.
फिल्म में नायक की भूमिका नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने निभाई है. निहारिका सिंह पूर्व मिस इंडिया रह चुकी है. उस ने कई हौट सीन दिए हैं.
दिल्ली में केजरीवाल ने आम आदमी का मुद्दा उठा कर वाहवाही क्या लूटी, सल्लू मियां ने भी अपनी फिल्म ‘जय हो’ में आम आदमी के फैक्टर को भुना डाला.
‘जय हो’ न तो देशभक्ति पर बनी फिल्म है न ही इस में सलमान खान ने देशभक्ति का कोई काम किया है. यह फिल्म अच्छाई का प्रचार करती है. फिल्म में दिखाने की कोशिश की गई है कि सत्ता में बैठे लोग पावर का गलत इस्तेमाल किस तरह करते हैं और आम आदमी त्रस्त होता रहता है. फिल्म का यह विषय नया या अनूठा बिलकुल नहीं है, सैकड़ों बार दोहराया जा चुका है. लेकिन ‘जय हो’ में सलमान खान ने खुद को आम आदमी का प्रतिनिधि जताते हुए भ्रष्ट राजनीतिबाज से टक्कर ले कर अपनी ‘जय हो’ कराई है.
किसी भी फिल्म में सलमान खान का नाम ही फिल्म की गारंटी समझा जाता है. फिल्म कूड़ा हो तो भी सलमान के प्रशंसक उसे हाथोंहाथ लेते हैं. वह चाहे चश्मा उलटा पहन ले, कमर पर तौलिया हिला दे, शर्ट फाड़ कर अपनी छाती दिखाए, उस के फैंस को उस की हर अदा अच्छी लगती है.
‘जय हो’ में सलमान के भाई व निर्देशक सोहेल खान ने सभी चटखारेदार मसाले डाले हैं ताकि सलमान के प्रशंसकों को खुश किया जा सके. फिल्म में भरपूर ऐक्शन है, फनी जोक्स हैं, लव सौंग्स हैं, कौमेडी है, सलमान ने अपनी शर्ट भी उतारी है. फिल्म में गंभीरता बिलकुल नहीं है. फिल्म के कई सीन उस की पिछली फिल्मों के कौपी लगते हैं.
यह फिल्म 2006 में आई तेलुगू फिल्म ‘स्टालिन’ की रीमेक है. ओरिजिनल फिल्म में चिरंजीवी हीरो था. उस वक्त वह राजनीति में आने का प्लान बना रहा था. इसी मकसद से उस फिल्म को बनाया गया था. ‘जय हो’ में सलमान खान ने खुद को दक्षिण भारत के सुपरस्टार रजनीकांत जैसा दिखाने की कोशिश की है.
यह फिल्म सलमान की ही पिछली फिल्म ‘दबंग’ जैसी है, मगर इस फिल्म में वह कुछ ज्यादा खूंखार लगा है, शेर की तरह दहाड़ा भी है. फिल्म में सलमान खान ने अनगिनत लाशें बिछाई हैं. सलमान खान की फिल्मों को पचा पाना हर किसी के बस की बात नहीं है. इस फिल्म में दिखाई गई हिंसा को सिर्फ उस के फैंस ही पचा सकते हैं. अगर बात करें एंटरटेनमैंट की, तो यह फिल्म सलमान की ही ‘एक था टाइगर’ से काफी कमजोर है.
कहानी जय अग्निहोत्री (सलमान खान) की है, जिसे सेना से निकाल दिया गया है. अब उस का एक ही लक्ष्य है, लोगों की मदद करना. वह अपने दोनों भाइयों (अश्मित पटेल और यश टोंक) के साथ मदद करने वाले को संदेश भी देता है कि किसी की मदद के बदले उसे थैंक्यू मत कहो, बदले में 3 और लोगों की मदद करो.
एक दिन जय गुंडों के चंगुल से एक लड़की को छुड़ाता है. वह फोन पर लड़कियां छेड़ने वाले से भी निबटता है, साथ ही हर किसी की मदद को भी तैयार रहता है. भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाता है तो भ्रष्ट मंत्री दशरथ पाटिल (डैनी) की आंख की किरकिरी बन जाता है. लेकिन जब जय को गृहमंत्री की काली करतूतों के बारे में पता चलता है तो वह उस के खिलाफ आम आदमी की जंग शुरू कर देता है. इस जंग में उस की बहन गीता (तब्बू) उस के साथ है. गृहमंत्री तब जय का दुश्मन हो जाता है. वह मुख्यमंत्री प्रधान (मोहनीश बहल) पर जानलेवा हमला करता है और इलजाम जय पर लगा देता है, साथ ही वह जय को आतंकवादी करार देता है. मुख्यमंत्री बच जाता है. वह बयान देता है कि जय बेकुसूर है. उसे तो गृहमंत्री ने कत्ल करने की कोशिश की थी. जनता जय का साथ देती है और जय गृहमंत्री के गुर्गों को मौत के घाट उतार देता है. सारी जनता गृहमंत्री पर टूट पड़ती है और उसे उस के किए की सजा देती है.
फिल्म की नायिका पिंकी (डेजी शाह) है जिस ने सलमान के साथ एक गाने में परफौर्म किया है. वह कुछ दृश्यों में ही नजर आई है. वह सलमान खान से प्यार करती है.
कहानी को पूरी तरह सलमान खान को केंद्र में रख कर लिखा गया है. उस की फौजी जिंदगी को फ्लैशबैक में दिखाया गया है. सलमान खान ने खलनायकों की फौज को धूल चटाई है. फिल्म का शुरू का भाग कुछ धीमा है. क्लाइमैक्स में खूब हिंसा है. मिलिट्री अफसर सुनील शेट्टी को जय की मदद करने के लिए सड़क पर टैंक ले कर आया देख दर्शकों को हंसी आ जाती है.
सलमान की मां की भूमिका में नादिरा बब्बर और बहन की भूमिका में तब्बू का काम अच्छा है. फिल्म का गीतसंगीत पक्ष कमजोर है. सलमान और डेजी शाह पर फिल्माया गाना ‘तेरे नैना…’ अच्छा बन पड़ा है. छायांकन अच्छा है.