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ताजी हवा का झोंका: किस बात की जिद्द कर रहा था चिराग

Best Hindi Story: चिराग अपनी धुन में था, ‘‘पापा, मैं आप से कह चुका हूं, मैं नलिनी से ही विवाह करूंगा चाहे कुछ भी हो जाए,’’ चिराग ने जब यह बात दृढ़ स्वर में फिर दोहराई तो रमाकांत स्वयं पर नियंत्रण खो बैठे, चिल्लाते हुए बोले, ‘‘वह लड़की मेरे घर में बहू बन कर नहीं आएगी, यह मेरा अंतिम निर्णय है.’’

‘‘तो ठीक है, नहीं लाऊंगा इस घर में उसे, जहां धर्म के पुतले बसते हों. आप बस धर्मजाति को पूजते रहना, आप की अनर्थक जिद के कारण मैं योग्य नलिनी को नहीं छोड़ूंगा,’’ चिराग पैर पटकते हुए अपना बैग उठा कर औफिस चला गया.

माला ने फिर बापबेटे की बहस से दुखी हो कर अपना सिर पकड़ लिया. किसे समझाए वह. बापबेटे की अपनीअपनी जिद में वह बुरी तरह पिस रही है. चिराग से 5 साल छोटी दीप्ति भी मां के दुख में दुखी थी.

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माला ने पति को फिर समझाने की कोशिश की, ‘‘आखिर एक बार नलिनी से मिल तो लो, पढ़ीलिखी है. चिराग के औफिस में ही अच्छे पद पर है, सिर्फ दूसरी जाति का होना तो कोई अवगुण नहीं है.’’

रमाकांत गुर्राए, ‘‘तुम चुप रहो, तुम ने ही चिराग को शह दी है, देख लूंगा मैं उसे.’’

किसी भी तरह से रमाकांत नलिनी को अपनी बहू बनाने के लिए तैयार नहीं थे. वे अब भी चिराग के लिए लड़की देखते रहते. चिराग का मूड अकसर खराब ही रहने लगा था. माला भी स्वभाव से विनम्र, हंसमुख और होनहार बेटे की उदासी देख कर उदास ही रहती. रमाकांत सुबहशाम ताना देते, ‘‘इस घर में मेरी मरजी चलती है, यहां रहना है तो मेरे हिसाब से रहना पड़ेगा.’’ एक दिन चिराग ने कहा, ‘‘मां, मेरा दम घुटता है इस घर में, पापा की  इतनी जिद, इतना घमंड सहन नहीं होता मुझ से और विवाह तो मैं नलिनी से ही करूंगा, मैं ने उस से प्रौमिस किया है. हां, विवाह में अभी टाइम है, उस के मातापिता तो हैं नहीं, वह अपने भाईभाभी के साथ रहती है. नलिनी कहती है कि वह पापा के आशीर्वाद का इंतजार करेगी. फिलहाल मैं कहीं और रहूंगा, पापा के तानों से दूर.’’

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माला रोने लगी तो चिराग ने कहा, ‘‘दूर थोड़े ही जा रहा हूं आप से, यहीं कहीं किराए पर रह लूंगा. आप का और दीप्ति का जब मन हो आ जाना.’’

माला को तसल्ली करनी ही पड़ी. चिराग अपना सामान ले कर चला गया तो रमाकांत को और गुस्सा आया. चिराग अपनी मां माला और बहन दीप्ति के साथ हमेशा फोन पर संपर्क में रहता. रमाकांत के औफिस जाने पर माला और दीप्ति कभी चिराग से मिलने भी चली जातीं. माला बेटे को खुश देख कर ही खुश हो लेतीं. माला और दीप्ति दोनों नलिनी से भी मिल चुकी थीं. नलिनी उन्हें बहुत पसंद आई थी. कुछ महीने बीत गए, एक ही शहर में रहने के बावजूद पितापुत्र में दूरी बढ़ती जा रही थी.

रमाकांत को छोड़ कर सब आपस में मिलते रहते थे. यह बात रमाकांत को पता चली तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. कुछ उम्र का असर था, कुछ तनमन की थकान थी. जिस बिजनैस को बेटे के साथ आगे बढ़ाने की उन्होंने सोची थी, अकेले भागदौड़ करने में अब समस्या हो रही थी. काफी सोचविचार करने के बाद उन्होंने माला से कहा, ‘‘उस से कह दो वापस आ जाए.’’

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वह कहने लगी, ‘‘आप ने ही कहा था उसे जाने के लिए, आप ही उस से कहेंगे तभी आएगा. आप का ही तो बेटा है, जिद्दी.’’

रमाकांत कुछ बोले नहीं. शाम के समय अचानक चिराग के फ्लैट पर पहुंच गए, उन्हें देख वह बुरी तरह चौंका. रमाकांत ने कहा, ‘‘चलो, अब घर चलो, बहुत हो गया.’’

‘‘पापा, मैं यहीं खुश हूं.’’

‘‘यह क्या बदतमीजी है, मैं तुम्हें लेने आया हूं और आज भी तुम अकड़ दिखा रहे हो.’’

‘‘नहीं पापा, आप की धर्मजाति की बातों से मेरा दम घुटता है. मैं यहां बहुत खुश हूं. आप की कट्टरपंथी सोच ने हमेशा घर में घुटन का माहौल बनाए रखा है. हम साथ रहेंगे तो रोज मेरे और आप के विचार टकराएंगे और जब मैं नलिनी से विवाह करूंगा तो यदि आप उस का अपमान करेंगे तो मैं सहन नहीं करूंगा.’’

‘‘अच्छा बेटा, अब देख, मैं तेरी अकड़ का क्या इलाज करता हूं,’’ गुस्से से उफनते रमाकांत उलटे पैर लौट आए. उन के बेटे ने उन के साथ रहने के लिए मना कर दिया था. यह अपमान उन्हें सहन नहीं हो रहा था. वे बहुत देर चुपचाप कुछ सोचते रहे. माला के कई बार पूछने पर उसे बुरी तरह झिड़क दिया.

दीप्ति अपनी पढ़ाई में व्यस्त थी.

रमाकांत ने बेटे को नीचा दिखाने के लिए कानूनी कार्यवाही का सहारा लिया. उन्होंने गुस्से में अखबार में बेटे को अपनी संपत्ति से बेदखल करने का नोटिस छपवा दिया. माला जैसे जड़वत हो गई. कोई पिता सिर्फ अपनी जिद में इतना बड़ा कदम उठा सकता है. जिस ने भी सुना, पढ़ा, हैरान हो गया. आसपड़ोस में माला ने अब तक जो ढकाछिपा रखा था, सब खुल गया. सब की बातों का जवाब देतेदेते माला पस्त हो गई. इस उम्र में पति और बेटे के बीच पिसती माला का मन बुरी तरह आहत हो गया.

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माला ने फिर पति को समझाने की कोशिश की, ‘‘बहुत हो गया, इस उम्र में बेटे पर ही कोर्टकचहरी के मुकदमे शोभा देते हैं क्या? लोग थूथू कर रहे हैं, कुछ तो सोचिए.’’

‘‘मुझे समझाने की जरूरत नहीं है, मैं जो कर रहा हूं, ठीक कर रहा हूं, मैं अपने घर की मानमर्यादा, संस्कृति, धर्म के खिलाफ कभी नहीं जाऊंगा.’’

माला ने अपनेआप को घर में बंद कर लिया था जैसे, रिश्तेदार अलग मजा ले रहे थे. घर की शांति के लिए अपने सारे मानसम्मान और स्वाभिमान को गिरवी रख वह हमेशा एक ऐसे पति नामक जीव की हां में हां मिलाती आई थी जिस के कोई विचार उस से मेल खाते ही नहीं थे. उस का लक्ष्यहीन जीवन यों ही अंधेरे में आगे बढ़ता आया था. पति के फैसले अडिग होते थे. बीच का रास्ता नहीं था. बहुत कोशिशों के बाद भी उन की दकियानूसी सोच को वह बदल नहीं पाई थी. पति के झूठे अहं की तुष्टि के लिए हमेशा अपने अरमानों की चिता जलाती एक झूठा जीवन जीती रही थी माला.

अभी तो बहुतकुछ बाकी था जिस का अंदाजा पहले से माला को था. दीप्ति की पढ़ाई पूरी हो गई थी. रमाकांत उस के लिए लड़का ढूंढ़ रहे थे. बिजनैस की जिम्मेदारी, रिश्तों की खोजपड़ताल के बीच रमाकांत परेशान रहने लगे.

सुयश उन्हें बेटी के लिए उचित वर लगा, यहां बात बनती लग रही थी. सुयश को उन्होंने एक मित्र की पार्टी में देखा था. उन के दोस्त केशव ने कहा था, ‘‘बहुत बड़े बिजनैसमैन का बेटा है. यहां बात बन गई तो दीप्ति को बहुत अच्छा घरवर मिल जाएगा.’’रमाकांत अगले ही दिन केशव के साथ सुयश के पिता ओमप्रकाश से मिलने उन के घर पहुंच गए.

औपचारिक बातों के बाद रिश्ते की बात छिड़ने पर ओमप्रकाश ने सपाट स्वर में पूछा, ‘‘न्यूजपेपर में आप ने ही वह नोटिस छपवाया था? क्या झगड़ा है बेटे से?’’

रमाकांत को कुछ समझ नहीं आया, क्या बोलें, इतना ही कहा, ‘‘कुछ खास नहीं, बस उस के और मेरे विचार नहीं मिलते, बात बढ़ती गई.’’

‘‘माफ कीजिए, रमाकांत जी, मेरे खयाल से आप काफी दकियानूसी सोच रखते हैं, जमाना काफी बदल गया है. जिस घर में बापबेटे के बीच कानूनी कार्यवाही हो रही हो, उस घर की बेटी को अपनी बहू नहीं बना पाएंगे हम लोग.’’

अपना सा मुंह ले कर लौट गए रमाकांत. उस के बाद भी जहां लड़के वालों से मिले, सब ने बापबेटे का झगड़ा पता चलने पर हाथ जोड़ लिए. अब रमाकांत को दिन में तारे दिखने लगे. वे लड़का ढूंढ़ने में रहते तो कामकाज पर असर पड़ता. इस उम्र में अकेला महसूस करने पर स्वास्थ्य पर भी असर पड़ने लगा था.

एक दिन उन के घनिष्ठ मित्र हरकिशन घर आए. उन्होंने चिंतित रमाकांत को बहुत समझाया, ‘‘रमाकांत, समय बहुत बदल गया है. रूढि़वादी सोच और मान्यताएं भी बदल रही हैं. तुम अब भी कैसे दुनिया में होती प्रगति और बदलते परिवेश से बेखबर अपनी संकीर्ण विचारधारा में ही व्यस्त हो.’’

‘‘पर बरसों से परंपराओं और सामाजिक मापदंडों में जकड़ा मेरा मन इतनी जल्दी और आसानी से आजाद नहीं हो पाएगा, दोस्त,’’ थके स्वर में कहा रमाकांत ने.

‘‘जीवन के 50वें दशक तक आज भी यही सोच रहे हो कि लोग क्या कहेंगे, लोगों की चिंता कर के जीना कितना मुश्किल और बेमानी हो जाता है, देख रहे हो न. अगर नई पीढ़ी, पुरानी सोच व दायरों से निकल कर अपने लिए कुछ अच्छा सोचती है तो क्यों बाधा बन रहे हो. जीवन तुम्हारे बेटे का है, उसे क्यों मजबूर करते हो कि वह तुम्हारे हिसाब से जिए, अपने जीवन के लिए फैसला उस का अपना होना चाहिए, कोशिश तो करो, एक बार उस लड़की से मिलो, बात करो, देखो तो बेटे की पसंद है कैसी.’’

‘‘देखता हूं, कोशिश करूंगा,’’ थके स्वर में रमाकांत ने कहा तो दूसरे कमरे में बैठी माला और दीप्ति की आंखें खुशी से चमक उठीं. दीप्ति ने फोन पर उसी समय भाई को यह खुशखबरी दी.

अगले ही दिन रमाकांत अपने बेटे चिराग, जहां किराए पर रह रहा था, वहां पहुंचे, चिराग को यह उम्मीद न थी कि पापा इतनी जल्दी आ जाएंगे. चिराग के दोस्त, जिन में 3 लड़कियां भी थीं, ड्राइंगरूम में सब हंसीमजाक कर रहे थे. चिराग ने दरवाजा खोला तो पिता को देख हक्काबक्का रह गया. कुछ न सूझा, इतना ही कहा, ‘‘पापा, आप? अंदर आइए न.’’

रमाकांत को देख एकदम सन्नाटा छा गया था, बैठी हुई लड़कियों पर उन्होंने नजर डाली, नलिनी कौन सी होगी, अंदाजा लगाने की कोशिश की. चिराग ने कहा, ‘‘पापा, आप अंदर आइए न.’’

रमाकांत अंदर के रूम में चले गए. चिराग ने कहा, ‘‘ये लोग अभी चले जाएंगे, पापा, मैं अभी आया.’’

‘‘ठीक है, मैं कुछ देर बैठा हूं. आराम से आओ,’’ अपने स्वर की नरमी पर रमाकांत खुद ही हैरान हो गए. यह उन का स्वभाव तो नहीं है, क्या वे हालात से थक चुके हैं. जितना चिराग के बारे में सोचने लगे उतना ही दिल नरम होता जा रहा था.

परदे की झिरी से उन्होंने बाहर बैठी तीनों लड़कियों पर नजर डाली, 2 धीरेधीरे तीसरी को छेड़ रही थीं. उन्होंने अंदाजा लगाया, वही होगी नलिनी. सुंदर है, स्मार्ट है. उन सब के हंसीमजाक सुनतेसुनते रमाकांत को उन बच्चों के विचारों का खुलापन भाने लगा. बंधनों से दूर खुली हवा में सांस लेता इन का जीवन काफी सरस और सरल लगा. आत्मविश्वास से भरी लड़कियां काफी खुश नजर आ रही थीं. खूब बातें कर रही थीं. अपनी बात को सभी के सामने रखने की क्षमता थी उन में. उन्हें अपनी पत्नी और बेटी याद आ गई जो उन की परंपराओं व संस्कृति का दर्द झेल रही थीं. अपनेआप को अभिव्यक्त करने की एक तड़प शायद उन के मन में ही दबी रह गई थी.

नई पीढ़ी का जातिधर्म से परे मानवीय संबंधों को महत्त्व देना, लड़कियों को भी अपने बराबर मान देना आदि. यह सब देख कर पता नहीं क्यों उन के मन में नएनए विचार आने लगे थे, जातिधर्म से अलग एक बंधनहीन समाज का विचार. पुराने विचारों पर चली आ रही दृढ़ता कम होने लगी थी. अचानक वे हैरान हो गए, नलिनी अंदर आई, हाथ जोड़ कर उन्हें नमस्ते किया. रमाकांत ने सिर हिला कर जवाब दे दिया.

नलिनी ने पूछा, ‘‘पापा, आप कैसे हैं?’’ उन्हें हैरत का एक झटका लगा, कितने आत्मविश्वास से उन्हें ‘पापा’ कह रही है. फिर बोली, ‘‘पापा, आप थके होंगे, चाय लाऊं या कुछ ठंडा?’’

‘‘नहीं, कुछ नहीं चाहिए.’’

‘‘नहीं पापा, आप के लिए अदरक वाली चाय लाती हूं. आप को पसंद है न, चिराग ने बताया था एक दिन.’’

रमाकांत हैरान थे. यह जरा सी लड़की उन से बिलकुल भी डर नहीं रही है. उन की अपनी बेटी तो उन के एक बार मना करने पर इतने अधिकार से बात कर ही नहीं सकती, इतना डरती है वह उन से. बाहर दोस्त जाने की तैयारी कर रहे थे.

नलिनी उन के लिए चाय बना लाई थी. बोली, ‘‘मैं ने सब को जाने का इशारा कर दिया, पापा, पता नहीं कब तक डटे रहते. अच्छा, मैं चलती हूं. नमस्ते,’’ फिर हाथ जोड़ कर मुसकराते हुए नलिनी चली गई.

उन्हें लगा ताजी हवा का एक झोंका जैसे गुजरा हो. वे सोचने लगे, क्या सचमुच कुल की मानमर्यादा, व्यक्ति की खुशियों से बढ़ कर है? धर्म की, जातिबिरादरी की बात करना मानवोचित है क्या? और हर बार उन का मन दोनों सवालों का जवाब ‘नहीं’ में दे रहा था. जब तक चिराग आया उन्होंने फैसला ले लिया था. लोग क्या कहेंगे, यह सोच कर जीवन के फैसले नहीं लिए जा सकते, दिल की बातें दिल की धड़कनों से तय होती हैं, उसूलों से नहीं.

क्या कुल की मानमर्यादा, व्यक्ति की खुशियों से बढ़ कर है? क्या धर्म की, जातबिरादरी की बात करना मानवोचित है? दिल की बातें दिल की धड़कनों से तय होती हैं, उसूलों से नहीं. Best Hindi Story

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन लेकिन पहले दिन ही खुली योगी सरकार की पोल

Noida International Airport: पहले ही दिन एयरपोर्ट आने वाले यात्री कैब और बसों के लिए परेशान रहे. मैट्रो कनैक्टिविटी तो अभी दूर की कौड़ी है. डायरेक्ट बस सर्विस ही अभी पूरी तरह तैयार नहीं. लोग घंटों इंतजार करते रहे, महंगे कैबों के चक्कर काटे. दावा किया गया था कि यह दिल्ली के एयरपोर्ट की तर्ज पर है. हाई लेवल की फैसिलिटीज हैं लेकिन पहले दिन ही यह दावा धराशायी हो गया.

सरकार ने इलैक्ट्रिक बसें चलाने की घोषणा जरूर की है लेकिन इस व्यवस्था को अभी सुचारु रूप से काम करने में वक्त लगेगा. इलैक्ट्रिक बसे चलनी शुरू भी हुईं तो यह केवल एयरपोर्ट के दायरे के लिए ही होंगी. नोएडा-ग्रेटर नोएडा जैसे इलाकों में पहले से ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट की कमी है. नया एयरपोर्ट चालू हो जाने के बाद भी औटो या टैक्सी वालों की सुलभता नहीं है. बीजेपी सरकार प्रचार तो खूब करती है लेकिन पोल खुलते देर नहीं लगती.

उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार ने पिछले सालों में एयरपोर्ट बनाने का बड़ा शोर मचाया था. दिल्ली के मेट्रो और बस स्टैंडों पर योगी और मोदी के बड़ेबड़े होर्डिंग लगाए गए थे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावे किए कि यूपी अब हवाई कनैक्टिविटी का हब बन जाएगा. खरबों रुपए खर्च कर के कई नए एयरपोर्ट बनाए गए, रिबन काटे गए, फोटो सैशन हुए और प्रचार का तांता बंध गया लेकिन आज जमीनी हकीकत कुछ और ही है. ज्यादातर एयरपोर्ट वीरान पड़े हैं. उड़ानें बंद हैं, यात्री गायब हैं और टैक्सपेयर्स का पैसा प्रचार में स्वाहा हो गया.

भारत सरकार की “उड़ान” योजना के तहत यूपी में 7 नए एयरपोर्ट बनाए गए. आज इन में से छह लगभग बंद पड़े हैं. अयोध्या को छोड़ कर अजमगढ़, अलीगढ़, मुरादाबाद, कुशीनगर और चित्रकूट जैसे एयरपोर्टों पर उड़ानें ठप हैं. सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च हो गए लेकिन पैसेंजर नहीं आए. इस का कारण खराब सड़क कनैक्टिविटी, बस और ट्रांसपोर्ट की कमी रही. लोग घर से एयरपोर्ट तक पहुंच ही नहीं पा रहे तो टिकट कौन बुक कराएगा?

सरकार ने एयरपोर्ट तो बना दिए लेकिन उन्हें जिंदा रखने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान ही नहीं दिया. नतीजा यह हुआ की रनवे खाली रहे, टर्मिनल सुनसान पड़े रहे और कर्मचारी बेकार बैठ गए. यह तमाम एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर विकास नहीं बल्कि टैक्सपेयर्स की लूट और प्रचार की राजनीति बन कर रह गई.

एयरपोर्ट बनाना आसान है लेकिन उन्हें चलाना मुश्किल. इस के लिए अच्छी सड़कें, बसें, मेट्रो, आसपास होटल, टैक्सी स्टैंड और लोकल इकोनौमी की जरूरत होती है. सरकार ने सिर्फ फोटो खिंचवाई और ढिंढोरा पीटा. इस का नतीजा यह हुआ कि टैक्सपेयर्स का पैसा डूबा, यूपी की इमेज खराब हुई और आम आदमी परेशान हुआ. योगी सरकार को अब एयरपोर्ट बनाने का शौक छोड़ कर बने हुए एयरपोर्टों को चलाने पर ध्यान देना चाहिए. वरना यूपी के बाकी बने नए एयरपोर्ट की तरह नोएडा एयरपोर्ट भी सिर्फ वोट बैंक के लिए किया गया घोस्ट प्रोजेक्ट ही साबित होगा.

जनता अब प्रचार नहीं, परिणाम चाहती है. बीजेपी को यूपी के वीरान पड़े एयरपोर्टों पर सफाई दे कर बताना चाहिए कि इतना पैसा कहां गया? कनैक्टिविटी क्यों नहीं बनी? यूपी के लोगों को हवाई सपने नहीं, हकीकत चाहिए. सरकार अगर सच में विकास चाहती है तो पहले इन घोस्ट एयरपोर्टों को जिंदा करे. नहीं तो यह सिर्फ एक और फेल प्रचार अभियान बन कर रह जाएगा. Noida International Airport

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला- घरेलू औरतों के काम की कीमत 30 हजार रूपए महीना

Supreme Court Verdict: भारतीय समाज औरतों को घर की मालकिन कहता है और इस मालकिन को घरेलू नौकर बना कर उस की मेहनत पर डाका डालता है. यह दोगलापन सदियों से जारी है हालांकि कंस्टीट्यूशन ने औरतों को बराबरी का दर्जा दे रखा है लेकिन बिना वेतन के घरेलू गुलामी आज भी जारी है. एक मर्द बाहर कमाने जाता है. औरत घर में रह कर मर्द से कहीं ज्यादा काम करती है. मर्द हर माह तनख्वाह ले कर आता है तो उसे कमाने वाला पूत मान लिया जाता हैं वहीं औरत बिना छुट्टी और बिना वेतन के लगातार पूरे माह काम करती है तो उसे मेहनताना तो दूर, श्रेय तक नहीं दिया जाता. इसी मानसिकता को सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने चुनौती दी है और औरत के घरेलू काम की कीमत तय कर दी है जो औरतों के हक में एक क्रांतिकारी फैसला है.

सुप्रीम कोर्ट ने 11 जून 2026 को एक बहुत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. इस फैसले में कोर्ट ने कहा कि घरेलू महिलाएं, होममेकर या गृहिणियां असल में राष्ट्र की निर्माता हैं. उन का घर संभालने के काम की भी कीमत है और यह कीमत कम से कम 30 हजार रुपए प्रति महीना तो बनती ही है. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हरियाणा के एक पुराने सड़क हादसे के मामले में आया. साल 2001 में रेशमा नाम की एक घरेलू महिला की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. उन के परिवार ने मोटर एक्सीडैंट क्लेम ट्रिब्यूनल में मुआवजे की मांग की. लंबे समय तक केस चलने के बाद सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने इस मामले में यह नया सिद्धांत बनाया.

कोर्ट ने साफ कहा कि घरेलू महिलाओं का काम अदृश्य नहीं है. वे पूरे परिवार को संभालती हैं. खाना बनाना, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, घर की सफाई और परिवार की खुशहाली के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती हैं. अगर इन की मौत हो जाए तो परिवार को घरेलू देखभाल के नुकसान का भी अलग से मुआवजा मिलना चाहिए. इस की न्यूनतम कीमत 30 हजार रुपए महीना तय की गई है. यह राशि हर 3 साल में 10 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी.

इस फैसले के बाद अब अदालतों में गृहिणियों की मौत के मामलों में मुआवजा ज्यादा मिलेगा. पहले घरेलू औरतों के काम को मजदूर के बराबर आंका जाता था. इस फैसले के बाद घरेलू औरत की मौत के बाद परिवारों को आर्थिक सहारा तो मिलेगा ही साथ ही घरेलू औरतों के काम को भी सम्मान दिया जाएगा.

यह फैसला महिलाओं के संघर्ष को पहचानने वाला एक बड़ा कदम है. सदियों से घरेलू महिलाओं को कहा जाता रहा तुम तो बस घर संभालती हो, कमाती नहीं. इसी मानसिकता के तहत औरतों की मेहनत को बिना मजदूरी का काम समझा गया. सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार साफ शब्दों में कहा कि घरेलू काम राष्ट्र बनाने का काम है. एक मां, पत्नी, बहू का दिनरात का श्रम परिवार को मजबूत बनाता है, बच्चे अच्छे नागरिक बनते हैं और पूरा समाज आगे बढ़ता है.

यह पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती देने वाला बेहद महत्वपूर्ण फैसला है. इस से औरतों को अनपेड लेबर समझने की मानसिकता बदलेगी. यह फैसला लिंग समानता की दिशा में भी बेहद मजबूत कदम है. अब पुरुष भी समझेंगे कि घरेलू महिला का योगदान उन के कमाए पैसे जितना ही मूल्यवान है. यह फैसला औरतों को सशक्त बनाएगा और वे जानेंगी कि उन के काम की भी उतनी ही कीमत है जीतने की बाहर कमाने वाले मर्द की. घरेलू औरतें सचमुच राष्ट्र बनाती हैं. उन के बिना न घर चलता है, न देश. 30 हजार रुपए सिर्फ एक संख्या नहीं औरतों के सम्मान का प्रतीक है. Supreme Court Verdict

फायर विभाग की शिफारिश, हर घर में स्मोक डिटैक्टर और स्प्रिंकलर?

Delhi Fire Department: दिल्ली फायर डिपार्टमेंट ने दिल्ली सरकार से आग की घटनाओं में होने वाली मौतों को कम करने के लिए हर घर में स्मोक डिटैक्टर और वाटर स्प्रिंकलर लगाने की सिफारिश की है. अगर जनता मांगे कि फायर डिपार्टमैंट पूरे शहर में 4 इंच मोटा पाइप बिछा दे जिस से फायर ब्रिगेड जरूरत पड़ने पर पानी ले सके तो क्या सरकार मान जाएगी?

फायर डिपार्टमैंट की इस शिफारिश में दावा किया जा रहा है कि इस से आग से होने वाली मौतों में 97 प्रतिशत तक कमी आ सकती है. पहली नजर में यह सुझाव बहुत अच्छा लगता है. आखिर कौन नहीं चाहता कि लोगों की जान बचे? लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सुझाव दिल्ली की जमीनी हकीकत को ध्यान में रख कर दिया गया है या यह सिर्फ कागजों पर अच्छा दिखने वाला विचार है जैसा कि पूरे शहर में पानी के प्रेशर वाला पाइप बिछाना?

दिल्ली कोई ऐसा शहर नहीं है जहां सभी लोग बड़ेबड़े फ्लैटों और मौडर्न सोसाइटियों में रहते हों. लाखों लोग झुग्गी बस्तियों, अनधिकृत कालोनियों और बेहद तंग गलियों वाले इलाकों में रहते हैं. कई जगहों पर तो फायर ब्रिगेड की गाड़ी तक नहीं पहुंच पाती. ऐसे में हर घर में स्प्रिंकलर और स्मोक डिटैक्टर लगाने की बात सुनने में तो अच्छी लगती है लेकिन इसे लागू करना बेहद मुश्किल है. हां कंपल्सरी कर के रिश्वत का एक स्रोत और स्प्रिंकलर बेचने के धंधे बन जाएंगे.

सब से बड़ा सवाल खर्च का है. दिल्ली में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जिन के लिए महीने का बिजली बिल और बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना ही बड़ी चुनौती है. ऐसे परिवारों से यह उम्मीद करना कि वे हजारों रुपए खर्च कर के स्मोक डिटैक्टर और स्प्रिंकलर लगवाएंगे, वास्तविकता से आंखें मूंदने जैसा है. अगर सरकार यह व्यवस्था मुफ्त में उपलब्ध कराए तो फिर सवाल उठता है कि क्या सरकार के पास इतना बजट और इच्छाशक्ति है?

दूसरी समस्या रखरखाव की है. केवल उपकरण लगा देने से काम नहीं चलता. स्मोक डिटेक्टर की बैटरी बदलनी पड़ती है, स्प्रिंकलर सिस्टम की समयसमय पर जांच करनी पड़ती है. अगर रखरखाव नहीं हुआ तो ये उपकरण सिर्फ दीवारों की सजावट बन कर रह जाएंगे.

दिल्ली में आग लगने की घटनाओं का बड़ा कारण असल में खराब बिजली व्यवस्था, इल्लीगल तारों का जाल, ओवरलोडिंग, संकरी गलियां और नियमों की अनदेखी है. झुग्गियों में आग का कारण अकसर बिजली की लाइनें होती है. जब तक इन मूल कारणों को नहीं सुधारा जाएगा तब तक केवल डिटेक्टर और स्प्रिंकलर लगाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी.

भाजपा सरकार हो या पहले की सरकारें सभी ने अनधिकृत कालोनियों और झुग्गी बस्तियों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल तो किया लेकिन उन्हें सुरक्षित बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए. चुनावों के समय विकास के बड़ेबड़े दावे किए जाते हैं लेकिन जब कहीं आग लगती है तो सरकार के तमाम दावों की पोल खुल जाती है.

दिल्ली में ऊंचीऊंची बिल्डिंगें हैं लेकिन फायर विभाग के पास छठी मंजिल से ऊपर तक पानी पहुंचाने का सिस्टम तक नहीं है. यह दिल्ली सरकार की नाकामी का सबूत है. हर घर में स्मोक डिटैक्टर और स्प्रिंकलर लगाने का सुझाव गलत नहीं हैं लेकिन दिल्ली की जमीनी हकीकत में इन्हें जादुई समाधान बताना सही नहीं है. जब तक लोगों को सुरक्षित घर, बेहतर बुनियादी सुविधाएं और मजबूत शहरी योजना नहीं मिलेगी, तब तक आग की घटनाओं पर कंट्रोल संभव नहीं है. Delhi Fire Department

Hindi Stories: केयर ऑफ

  लेखक-अश्विनी कुमार आलोक

Hindi Stories: समूची दुनिया में कहर बरपा रही संक्रामक बीमारी कोरोना का आतंक कुछ मद्धिम हुआ है.यह खुशी की बात है कि शुरुआती तीन मौतों के बाद हमारे डाॅक्टरों और नर्सों की सतर्कता ने इस अस्पताल में भर्ती तिरपन में से ग्यारह जानें बचा ली हैं. इस तरह उन ग्यारहों लोगों को अपने घर लौटने की छुट्टी दी जाती है.शेष लोगों के लिए हम प्रयासरत हैं. आशा है कि उनके परिजन भी शीघ्र उन्हें अपने पास पायेंगे.” अस्पताल के सुपरिंटेंडेंट जब वार्डों में गूंजी , तो उन चेहरों पर मुस्कानें फैल गयीं , जो इस महामारी में मरते – मरते बच गये थे और अब स्वस्थ घोषित किये जा रहे थे.उन चेहरों पर भी एक हरापन आकार लेने लगा था , जिन पर मास्क चढ़े थे या जिनके नथुनों में ऑक्सीजन की नलियाँ घुसेड़ी गयी थीं. कुछ लोग बेसुध थे. उनकी तीमारदारी में लगे डॉक्टरों एवं नर्सों ने मास्कों के भीतर से मुस्कानें बिखेरकर अपनी सफलताओं के लिए स्वयं की प्रशंसा की.

घंटे – दो घंटे में सारी ऑपचारिकताएँ पूरी कर ली गयीं. वार्ड के दस बेड खाली हो गये. सुमित्रा ने महीनेभर के बाद यह हल्कापन महसूस किया. किसी नर्स के लिए उसके मरीजों का स्वस्थ होकर घर के लिए लौटना तपस्या से वरदान प्राप्त करने जैसा है. उसने मास्क और दस्ताने को ढक्कन वाले कूड़ेदान में उतारकर फेंका.वाॅशरूम गयी और आधे घंटे में निकल आयी.अब इस वार्ड में जब तक कोई नया मरीज नहीं आता , नहीं आना पड़ेगा. वह दरवाजे से निकलने ही वाली थी कि ठहर गयी.वह कुछ समझ पाती कि हल्की – सी मुस्कान के साथ बेड पर बैठे बैठे युवक ने कहा : ” मैं अभी ठीक नहीं हुआ हूँ”
सुमित्रा सन्न रह गयी , अब यह कौन -सी बला है!उसने जाँच के लिए स्वयं सैंपल इकट्ठे किये थे और सिनियर डाॅक्टर अमिताभ शुक्ला ने रिपोर्ट बनायी थी.

सुमित्रा ने याद किया , यह तो वही युवक है , जिसे पहले ही से टीबी है, नाम रघुवर है. सुमित्रा ने दुपट्टे को नाक पर चढ़ाया और निकट चली गयी , ” तुम बिल्कुल ठीक हो , रघुवर जाओ, घरवाले चिंतित होंगे”
वह कुछ नहीं बोला , हल्की – फीकी मुस्कान लाकर होठों पर जीभ फेरी और सिर झुका लिया.
” समस्तीपुर के हो न ? ” सुमित्रा ने फिर पूछा
जवाब में उसने सिर हिला दिया, बोला नहीं
सुमित्रा ने फिर पूछा: ” कौन – सा प्रखंड? रघुवर ”
” मोहीउद्दीननगर हजरतपुर गाँव” इस बार उसे बोलना पड़ा
” तुम बिल्कुल ठीक हो” सुमित्रा ने उसे आश्वस्त किया
” लेकिन , मैं नहीं जा पाऊंगा, मैडम!कमजोरी है” रघुवर ने असमर्थता व्यक्त की
वार्ड की पहरेदारी में लगे चार सिपाहियों में से एक उत्तेजित हो गया, ” जवान आदमी है. तीस – बत्तीस की उम्र कहीं से रोगी नहीं लग रहा घंटेभर से कहे जा रहा हूँ कि घर लौटने के लिए सरकारी व्यवस्था है , लौट जाये।र जिद पर अड़ा हुआ है”
” मैं कल जाऊंगा” रघुवर ने निगाहें उठाकर सुमित्रा पर टिका दीं
” तब तुम यहाँ नहीं रह सकते सिपाहियो ! रघुवर के साथ किसी प्रकार की सख्ती नहीं होनी चाहिए. इसे बाहर खड़ी गाड़ियों में से किसी पर बैठाओ और शीतला माता मंदिर वाली धर्मशाला में पहुँचा दो.ऐसे लोगों के लिए वहीं व्यवस्था की गयी है” सुमित्रा नर्स इंचार्ज है , लोग अदब भी करते हैं. एक सिपाही ने स्वीकृति में सिर हिलाया. सुमित्रा घर के लिए निकल गयी.

दिनभर की थकी – मांदी सुमित्रा ने जैसे ही कालोनी में पाँव रखे , खिड़कियों से घूरती हुईं नजरों ने उसे अविनम्रता से देखा. उसे न तो गुस्सा आया , न ग्लानि महसूस हुई.ऐसा रोज होता है , पर वह किसी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त करना उचित नहीं समझती सुमित्रा के परिवार के लोग भी उसके प्रति ऐसे ही भाव रखते हैं.वह किस – किस से कहे- बीते तेईस दिनों में उसने जो सहा है , वह असह्य है. हालांकि पेशे से इंजीनियर पति साकेत ने कभी नहीं चाहा कि सुमित्रा नर्स की इस छोटी-सी नौकरी से लिपटी रहे.विवाह के छह सालों के बाद भी सुमित्रा अपने पति को अपने सुख – दुःख का सहभागी नहीं बना सकी.पति को मित्र के रूप में देखने की इच्छा दबाये हुए उसने एक बेटे को जन्म दिया, पर वह स्वामी और अधिपति ही बना रहा.
सुमित्रा ने घड़ी पर निगाह डाली, छह बजेंगे. सीढ़ियों पर पाँव रखे , तो सिहर गयी.पति की डाँट वह बीते तेईस दिनों से नहीं सुन रही. एक प्रकार से इन तेईस दिनों में उससे दूर रहकर वह सुकून ही महसूस करती रही है. पर चार साल के बेटे नलिन के निकट नहीं जाना उसके लिए सबसे अधिक दुःखदायी है.दूसरे कमरे में वह अपने पिता के साथ कैसे रहता होगा. सुमित्रा की चिंता पति के कड़े स्वभाव को लेकर नहीं बढ़ती,वह तो इंजीनियर होने के दंभ में जीता है. सुमित्रा अपने पति के साथ नहीं जीती, यहाँ तो एक इंजीनियर के साथ कोई नर्स जबरन रिश्तेदारी कायम करने की चेष्टा करती हुई बीते छह सालों में बार बार पिछड़ी है.
दरवाजे के करीब पहुँचकर उसने फोन लगाया, कोरोना संक्रमितों की तीमारदारी में लगी नर्स को काॅलबेल छूने का अधिकार नहीं.दाई दरवाजा खोलकर पीछे हट गयी. सुमित्रा अपने कमरे की ओर बढ़ गयी.
कोई दो घंटे बाद दाई खाना रख गयी और दूसरे कमरे से झाँकते नलिन की ओर इशारा किया.सुमित्रा ने मुस्कुराकर हाथ हिला दिया.नलिन के पीछे बिछावन पर लेटा हुआ उसका पति मोबाइल पर व्यस्त था.उसके कमरे से टेलीविजन के आते – जाते चित्र शीशे पर चमक जा रहे थे.सुमित्रा ने एक बार पति के कमरे को शीशे की दीवार से ऐसे ही देख लिया.उसके मन में कोई भाव नहीं आया. इंजीनियर के कमरे के ऐश्वर्य ने उसे आकर्षित नहीं किया. बेटे नलिन को देखकर मुस्कुराते हुए उसने हाथों से इशारे किये.शीशे की दीवार आर – पार के लोगों का दीदार भले करा दे ,पर आवाज निगल जाती है.सुमित्रा ने कुछ बोलना निरर्थक समझा.

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थकावट से बोझिल आँखें लग गयीं , तो दिनभर के लिए ताजग देकर सुबह – सुबह खुल भी गयीं. यह तो रोज का सिलसिला है.सुमित्रा की तरह के सैंकड़ों लोगों के भीतर के अंधेरे को रात अपने आँचल में छुपा लेती है.ऐसे ही , हर दिन फिर से जीवन शुरु करती है सुमित्रा.

अस्पताल में पहुँचते ही उसने बड़े – से रजिस्टर पर निगाह दौड़ायी. गहरी साँस ली , ” उफ ! रात भर में तीन मरीज बढ़ गये. ”
सुमित्रा वार्ड में घूमने के लिए उठी ही थी कि रघुवर दिख गया।वह उसी को देख रहा था।
” अरे ! गये नहीं ? ” सुमित्रा ने आश्चर्य से पूछा।
रघुवर कुछ नहीं बोला।
सुमित्रा जल्दीबाजी में थी , वार्ड की ओर निकल गयी।

दूसरे दिन रघुवर फिर सुमित्रा को अस्पताल के दरवाजे पर दिख गया।उसके साँवले चेहरे पर एक प्रसन्नकारी ताजगी दिखाई पड़ रही थी।सुमित्रा ने मुस्कुराकर पूछा , ” खुश लग रहे हो । लेकिन घर क्यों नहीं गये ? ”
” घर में क्या रखा है ! ”  रघुवर ने हल्की – सी मुस्कान बिखेरी।
” क्यों ?  पत्नी, बच्चे , माँ – बाप ।इंतजार तो करते होंगे? ” सुमित्रा ने सहजता से पूछा।
” पत्नी बीते साल चल बसी।एक बच्चा है, उसे मेरे माँ – बाप देखते हैं।” रघुवर ने सिर झुका लिया।
” ओह ! लेकिन , घर जाना चाहिए।” सुमित्रा ने अधिक रुचि नहीं ली और अस्पताल के वार्डों की ओर निकल गयी।

रात में खाना खाने के बाद रघुवर का चेहरा अनायास सुमित्रा की आँखों में आ गया।उसके लिए रघुवर के संबंध में सोचने की न तो कोई जरूरत थी , न कोई विषय था।पर , वह यह नहीं समझ पा रही थी कि यह लड़का ठीक होने के बजाय अस्पताल के निकट क्यों मंडराता रहता है।सुमित्रा की आँखें बंद हुई जा रही थीं।कोरोना के नये मरीज अब अस्पताल में नहीं आ रहे थे, सरकार आश्वस्त हुई जा रही थी।उसने अनायास अपने कमरे का टीवी ऑन कर दिया।महीनेभर से वह देश दुनिया से बेखबर रही है।पर टीवी के समाचारों ने उसे आकर्षित नहीं किया ।जैसे खोला था , वैसे ही बंद भी कर दिया।

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सुमित्रा ने सुबह उठते उठते विचार किया था, आज कुछ सवेरे अस्पताल जायेगी।यदि रघुवर फिर खड़ा दिखा , तो आज कुछ बातें करेगी।नर्स प्रेम और अपनापन बाँटती है , यदि यह किसी को भला लगता है , तो इसे उसकी सफलता कहेंगे।
नियत समय से एक घंटा पूर्व सुमित्रा ने अस्पताल में
कदम रखा।रघुवर फिर उसका इंतजार करता दिखा।वह उसी के निकट जा बैठी। रघुवर ऐसे मुस्कुराया , जैसे उसकी मुराद पूरी हो गयी।
” रघुवर ! मैं आज तुम्हारे लिए सवेरे आयी हूँ।कहो , कुछ कहना है मुझसे?” सुमित्रा के मुँह से अनायास निकल गया।
रघुवर एक पल कुछ नहीं बोला, हाथ जोड़कर उसे निहारता रहा।फिर , हाथ जोड़कर उसे निहारता रहा।फिर , धीरे – से बोल पड़ा- ” आप मुझे अच्छी लगती हैं, बस।”
” मुझे ही देखने आते हो ? ” पता नहीं उसने क्यों मुस्कुरा दिया।
” हाँ। ” रघुवर ने सिर हिला दिया।
” ऐसा क्या है मुझमें ? ” सुमित्रा के इस प्रश्न पर रघुवर  चुप हो गया।फिर धीरे से बोला, ” मेरी पत्नी आप ही के जैसी थी।स्वभाव , चाल – चलन , हँसी – मुस्कुराहट सब कुछ आप से मिलता था।”
सुमित्रा गंभीर हो गयी।
” मैं मैं आपके साथ रह सकता हूँ? ” उसने हकलाते हुए हिम्मत जुटायी।
” क्या ?” जैसे चौंक पड़ी सुमित्रा, ” रघुवर ! मैं शादीशुदा हूँ।मेरा एक बच्चा भी है।मेरा इंजीनियर पति सुन भी लेगा , तो तुम्हें कच्चा चबा जायेगा।”
रघुवर उदास हो गया।
” और कुछ बोलो ।” सुमित्रा ने सहानुभूति दिखायी।रघुवर दूसरी ओर देखने लगा।
अस्पताल दुःखों की दुनिया है।दुःखों को देख – देखकर नर्स जीना सीखती है और दूसरों के दुःख में अपनत्व बढ़ाकर उनके लिए जीवन की आशाएँ जगाती हैं।रघुवर का दुःख अपने दुःख जैसा लगा , उसे लगा कि रघुवर जैसे अनजान युवक के जीवन को उसकी जरूरत है।पर यह तो सर्वथा असंभव है।
उसीने बात बढ़ायी , ” कैसे मरी तुम्हारी पत्नी?”
रघुवर की आँखें छलछला आयीं, ” हम दोनों ने प्रेमविवाह किया था।महीनों तक ससुरालवालों से भागते रहे ।केस हो गया।हमने आपसी मर्जी से विवाह का हलफनामा दिया , तो जान छूटी।मैं एक हाॅस्टल में दरबानी करने लगा।कम आमदनी होती थी , पर हम खुश थे।मेरी पत्नी रूना मुझपर जान लुटाती थी।उसने जान लुटा भी दी।बच्चे के जन्म के बाद महीनों तक खून गिरा।वह घर – आंगन में थकावट महसूस करने लगी और उचित चिकित्सा के अभाव में उसे कैंसर हो गया।” रघुवर चुप हो गया , उसकी आँखें पनीली हो गयीं।
कुछ देर चुप रहकर फिर बोलना शुरु किया , ” मैं कंपाउंडरी करने लगा , इच्छा थी कि अपने जैसे कमजोर लोगों की सेवा करूँ।दिल्ली में एक अस्पताल में नौकरी की , साल भर।वहीं से आया हूँ। ”
” ओह ! ” रघुवर के दर्द को सुमित्रा ने महसूस किया।
सुमित्रा ने रघुवर की आँखों में देखा , ” अब बीती हुई बातें भूलकर नया जीवन शुरु करो रघुवर!मेरा दुःख तुम- सा ही है , मैं हर रोज एक नया जीवन शुरु करती हूँ।”
” आप आपके साथ कंपाउंडर बनकर रह लेता , तो अच्छा होता।” रघुवर ने विकल्प सुझाया।
” साथ रहोगे और मुझमें अपनी पत्नी का चेहरा
देखोगे ।” सुमित्रा खीझ गयी।वह उठकर जाने लगी , तो रघुवर ने फिर टोका , ” मैं यही कहने के लिए रुका हुआ था।कल गाँव लौट जाऊंगा।फोन नंबर देतीं , तो कभी – कभार बात कर लेता ।”
सुमित्रा ने सुना , पर जैसे नहीं सुना।वह आगे बढ़ गयी। फिर पीछे लौटकर रघुवर की ओर देखा , कहा :
” लिखो।”
रघुवर ने जेब से कलम निकाली और हाथ ही पर जल्दी – जल्दी में सुमित्रा का मोबाईल नंबर लिख लिया।

कोरोना के मरीज नहीं आ रहे थे।सरकार ने सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए पूर्णबंदी समाप्त कर दी।लेकिन नर्स की दिनचर्या तो रोगियों से शुरु होती है और रोगियों पर ही खत्म।इस दौरान रघुवर का कोई फोन नहीं आया।न जाने क्यों , सुमित्रा ने प्रायः हर दिन उसके फोन का इंतजार किया।उसने रघुवर का नंबर लिया भी नहीं कि हालचाल पूछ लेती।किसी से हालचाल पूछ लेना अंतरंगता बढ़ाना तो नहीं होता।रघुवर टीबी का मरीज था , पर लगता नहीं था।उसकी आँखें गहरी और सपने देखनेवाली थीं, उनमें जीने का साहस था।
सुमित्रा ने गहरी साँस ली और शीशे की दीवार से पति और बच्चे की ओर निगाह दौड़ायी, ” मैं इनके बारे में क्यों नहीं सोचती कि एक अनजान युवक के बारे में सोचकर परेशान हुई जाती हूँ!” उसका प्रश्न अपने आप से था ।उसीके अंदर से उत्तर भी आ गया , ” किसी के बारे में सोचने में हर्ज क्या है ! ”

वक्त के साथ यादें धुंधली हो ही जाती हैं।कि एक दिन फिर रघुवर अस्पताल के अहाते में दिख गया ।सुमित्रा ने तपाक से पूछ दिया , ” अरे , फोन नहीं किया ? ”
” आपने इंतजार किया था ? ”
” कैसे हो ? ” सुमित्रा ने उसकी पीठ पर हाथ रख दिया।
” यहाँ से जाने के बाद खून की कई उल्टियाँ हुईं।अब कुछ ठीक हूँ, तो रहा न गया।आपको देखने आ गया।अब एक भी उल्टी हुई , तो नहीं बचूंगा । ” वह एक पीली- सी हँसी हँसकर रह गया।
” आओ। ” सुमित्रा के पीछे – पीछे रघुवर अस्पताल में दाखिल हो गया।
अस्पताल में रघुवर की जाँच हुई, टीबी के अतिरिक्त पेप्टिक अल्सर भी निकला।सुमित्रा ने तय कर लिया , यहीं अपनी देखरेख में उसका ऑपरेशन करायेगी।अस्पताल के सुपरिंटेंडेंट सुमित्रा को मानते हैं।उसने तय कर लिया कि उसके ठीक होते ही इसी अस्पताल
में कंपाऊंडर के रूप में रघुवर को रखवाने के लिए बात करेगी।यदि उसे देखकर किसी को खुशी मिले , तो इसमें क्या बुराई है !
चार दिनों तक रघुवर की चिकित्सा चली।हिमोग्लोबिन की स्थिति ठीक होते ही उसका ऑपरेशन होना तय हो गया।
सुमित्रा दूसरे वार्ड में थी ।तभी वार्डब्वाय दौड़ा हुआ आया , ” आपका मरीज खून की उल्टियाँ कर रहा है।”
वह दौड़ी।रघुवर बुखार से तप रहा था, उसके कपड़े खून से रंग गये थे।
सुमित्रा सुई लाने के लिए मुड़ी , रघुवर ने हाथ पकड़ लिया , ” कहीं मत जाइए।” हिचकियों से उसका दम उखड़ रहा था।सुमित्रा ने उसके सिर पर हाथ रखा ,
” रघुवर ! हौसला रखो।”
रघुवर ने एक और हिचकी ली, ” आपको देखने की इच्छा थी , पूरी हुई।” उसके मुँह से निकली लार में खून के थक्के निकल आये।सिर एक तरफ लुढक कर शांत हो गया।सुमित्रा सन्न रह गयी , उसकी ओर झुकती चली गयी।
” आपका कोई सगा था सिस्टर? ” वार्डब्वाय ने पूछा।पर वह बिना कुछ बोले चुप रही।
डाॅक्टर ने पूछा , ” रजिस्टर में इसके किसी परिजन का नाम नहीं! ”
” केयर ऑफ माइन ” उसके मुँह से निकल गया।
शुक्र है , किसी ने नहीं पूछा कि मृतक उसका कौन था। Hindi Stories

बस कंडक्टर: बस में बैठी बूढ़ी अम्मा किस बात से निराश हो गई

Hindi Story: मैं नागपुर से छिंदवाड़ा होते हुए पिपरिया आने वाली महाराष्ट्र परिवहन निगम की सरकारी बस में बैठा था. मेरे साथ मेरा छोटा भाई था, जिस के इलाज के सिलसिले में हम लोग नागपुर से लौट रहे थे. बस पूरे 5 घंटे लेट थी. बस तकरीबन पूरी खाली थी. मैं, मेरा भाई, कंडक्टर और मुश्किल से 4-5 मुसाफिर और रहे होंगे. नागपुर से चल कर 10 बजे रात में हम लोग छिंदवाड़ा पहुंचे. छिंदवाड़ा स्टौप पर बस 5 मिनट के लिए रुकी.

बस में सभी कुछकुछ महाराष्ट्रियन टच लिए हुए थे. ड्राइवर और कंडक्टर एकदूसरे से मराठी में बात कर रहे थे. कंडक्टर ने अपनी ड्रैस पहनी हुई थी. कंडक्टर के पास पंच मशीन थी जिस से वह टिकटों पर छेद कर रहा था. यह पंच मशीन एक प्रकार का सिग्नल भी थी कि बस को कब रोकना और कब चलाना है. पूरी बस में पीछे से आगे तक कहीं से भी वह इस लोहे की मशीन को बस के पाइप या कहीं भी जोर से ठोंक देता तो ड्राइवर बस रोक देता था. हमारा सफर बहुत ज्यादा लंबा था और मेरा भाई बीमार होने की वजह से सो रहा था, इस कारण मैं हर चीज का बारीकी से मुआयना कर रहा था.

बस छिंदवाड़ा से चली ही थी कि कंडक्टर ने अपनी पंच मशीन ठोंकी. चौराहे से एक होमगार्ड बस में चढ़ा. मैं आंखें बंद कर के सोचने लगा कि अगले महीने होने वाली राज्य की सिविल सेवा परीक्षा के साक्षात्कार की तैयारी किस तरह करनी है. मैं एमए पूर्वार्द्ध का विद्यार्थी था और मेरा एकमात्र लक्ष्य सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण करना था. मैं ने प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा अच्छी तरह से पास कर ली थी. अब मेरा साक्षात्कार होने वाला था. अपनी तैयारी के प्रति मैं आश्वस्त था और मुझे विश्वास था कि मेरा चयन किसी न किसी पद के लिए हो जाएगा.

इसी बीच कंडक्टर और होमगार्ड के बीच हो रही बहस ने मेरा ध्यान खींचा. होमगार्ड कह रहा था, ‘‘मैं वारंट ले कर गया था, इसलिए मैं टिकट नहीं लूंगा.’’

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कंडक्टर ने कहा, ‘‘आप वारंट ले कर भले ही गए हों लेकिन उस का भी किराया आप को बाद में विभाग से मिल जाएगा, टिकट तो आप को लेना ही पड़ेगा.’’

‘‘एक आदमी के टिकट से क्या फर्क पड़ता है? जानता नहीं मैं पुलिसवाला हूं,’’ होमगार्ड कंडक्टर को डराना चाहता था.

कंडक्टर बोला, ‘‘आप कोई भी हों, टिकट तो आप को लेना ही पड़ेगा.’’

कंडक्टर को किसी तरह झुकता न देख वह होमगार्ड उसे डराने लगा और उलटीसीधी बातें कहने लगा जैसे ‘गाड़ी का नंबर मुझे नोट करवाओ, बस का चैसिस नंबर लिखवाओ, गाड़ी के कागज पूरे हैं या नहीं, कल तेरी गाड़ी थाने में खड़ी न करवाई तो कहना, मुझे तू जानता नहीं है, अब इस रूट पर तू बस नहीं चला पाएगा,’ वगैरहवगैरह.

होमगार्ड का व्यवहार बहुत गलत था. कंडक्टर ने टिकट मांग कर गलत नहीं किया था. बस छिंदवाड़ा शहर को छोड़ अब सुनसान इलाके में आ गई थी. मैं पीछे बैठा सब सुन रहा था, सोच रहा था कि इस मामले में कुछ बोला जाए या नहीं. दिमाग कह रहा था कि ऐसे फालतू पचड़ों में पड़ने से चुपचाप बैठे रहना बेहतर है, वहीं दिल कह रहा था कि सचाई के लिए लड़ रहे इस कंडक्टर का साथ देना चाहिए.

अब उन के बीच की बहस अपने चरम पर पहुंच चुकी थी. होमगार्ड न जाने क्याक्या कह रहा था. बस का ड्राइवर बोला, ‘‘जाने दे न, विजय, काय को बहस करता है, थोड़ी दूर की तो बात है,’’ विजय शायद यह सुन ही नहीं रहा था, वह तो अपने कर्तव्य को पूरा करने पर अडिग था. मैं ने देखा, रोड पर दूर सामने की तरफ हलकी रोशनी दिखाई दे रही थी, शायद कोई ढाबा था. कंडक्टर ने भी उस ढाबे को देख लिया था. वह निश्चयात्मक स्वर में होमगार्ड से बोला, ‘‘मैं आखिरी बार पूछ रहा हूं आप टिकट लेंगे या नहीं?’’

होमगार्ड बोला, ‘‘नहीं.’’

कंडक्टर ने पंच मशीन लोहे के पाइप पर मारी. ‘टनटन’ की जोरदार आवाज हुई और बस रुक गई. कंडक्टर बोला, ‘‘उतरिए, आप नौकरी में हैं इसलिए ढाबे पर छोड़ रहा हूं. दूसरा कोई होता तो जंगल में उतारता.’’

होमगार्ड के पास जवाब नहीं था, वह उतर गया.

बस फिर चल पड़ी थी. मैं कंडक्टर की हिम्मत से प्रभावित था. कोई पौने ग्यारह बजे के लगभग बस एक गांव में रुकी. एक अम्मा बस में चढ़ी थीं, तारतार होती साड़ी, फटा सा सफेद गंदा झोला, बिखरे से सफेद बाल और लाठी के सहारे खड़ी उस की देह यह बताने के लिए काफी थी कि उस की माली हालत अच्छी नहीं थी. कंडक्टर के पूछने पर उस ने नजदीक के किसी गांव का नाम बताया, जहां वह जाना चाहती थी. कंडक्टर ने कहा, ‘‘15 रुपए निकालिए.’’

बूढ़ी अम्मा थोड़ा सा निराश हो गईं क्योंकि उन के पास सिर्फ 12 रुपए थे.

कंडक्टर कहने लगा, ‘‘अम्मा, ऐसा कैसे चलेगा? मैं टिकट बना रहा हूं, 15 रुपए मतलब 15 रुपए.’’

मैं सारी बातें सुन रहा था. मैं ने सोचा, अम्मा का किराया मैं दे दूंगा. इस बीच अम्मा ने अपनी मजबूरी और गरीबी बताई. जाहिर था कि वह सच बोल रही थी.

कंडक्टर बोला, ‘‘आज तो मैं तुम्हारे टिकट का 3 रुपए कम कर देता हूं लेकिन आगे से बस में बैठना तो पूरे 15 रुपए ले कर, समझीं?’’

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मैं कंडक्टर की ओर ही देख रहा था. उस ने मुझे देखा और मुसकरा दिया. एक ढाबे पर बस रुकी. वहां मैं ने कंडक्टर से बातचीत की. और उस के कार्यव्यवहार की प्रशंसा की. मैं उस से बहुत प्रभावित था. उस ने अपने बारे में बताया कि उस का नाम विजय है और वह 2 साल से कंडक्टरी कर रहा है. जो भी बस में बैठेगा वह टिकट ले कर ही बैठेगा, बिना टिकट किसी को यात्रा नहीं कराना है. घर में एक बूढ़ी मां है और वह है, 2 लोगों का गुजारा कंडक्टरी की नौकरी में चल जाता है.

मैं ने उस से कहा कि हमेशा ऐसे ही रहना और साथ में यह भी कि न जाने दोबारा जिंदगी में कब मुलाकात हो.

रात करीब 2 बजे हम पिपरिया बस स्टैंड पहुंचे. एकदूसरे से हाथ मिला कर अपनेअपने रास्तों पर रवाना हो गए.

इस घटना के 1 महीने के बाद मेरा इंदौर में इंटरव्यू हुआ जो बहुत अच्छा रहा. मेरा चयन डीएसपी के लिए हो गया. हालांकि आज मैं डिप्टी कलैक्टर के पद पर हूं लेकिन उस वाकये को भूला नहीं हूं और शायद जिंदगीभर भूल नहीं पाऊंगा. आज भी ड्यूटी पर हर वक्त यह कोशिश करता हूं कि मैं डिप्टी कलैक्टर रहते हुए उस कंडक्टर की हिम्मत और गरीबों के प्रति उस के हृदय में बसी ममता को अपने जज्बातों में उतार कर ड्यूटी कर सकूं. कंडक्टर विजय, मैं इस देश के तुम जैसे सच्चे सिपाहियों को सैल्यूट करता हूं. Hindi Story

Hindi Kahani: डाक टिकट संग्रह

Hindi Kahani: बचपन के दिन भुला न देना… वर्तमान पीढ़ी ने तो यह गाना शायद ही सुना हो, मगर साठ-सत्तर की नैया पर सवार लोगों को यह गीत बखूबी याद है. बचपन यानी शरारतें, मौज-मस्ती, घुमक्कड़ी और याराना. हमने तो बचपन में ढेरों शरारतें की हैं. आजकल के बच्चे तो कम्प्यूटर और फोन में ही घुसे रहते हैं. याराना क्या होता है, मस्ती क्या होती है, मोहल्लेदारी क्या होती है, इन्हें पता ही नहीं. एक हम थे कि हर दिन कोई नयी चीज ट्राई करते थे, सफल हुए तो खुश और असफल हुए तो भी मजा ही आता था.

काफी खुराफाती शौक होते थे हमारे. तब हमारी उम्र रही होगी कोई बारह या तेरह साल की. दो लंगोटिया यार थे – धीरू और टिल्लू. वो दोनों हम पर जान देते थे और हम उन दोनों पर. ये दोनों मेरे दो हाथ थे. तीन वानरों की यह सेना मिल कर खूब शरारतें करती थी. अक्ल मेरी चलती थी और हाथ पांव उन दोनों के, मगर मजे की बात यह थी कि जब पकड़े जाते तो मैं अपनी बेचारी सी शक्ल और दुबलेपन की वजह से बच निकलता, मगर धीरू और टिल्लू फंस जाते थे. कभी पतंग लूटने के चक्कर में पीटे जाते, कभी किसी के चलते वाहन में गिल्ली उड़ कर जा लगती तो वह इन दोनों को ही दौड़ाता.

हमारे जमाने में चिट्ठियों का बहुत चलन था, आजकल तो डाक से चिट्ठियां आती ही नहीं हैं, लोग ईमेल और वॉट्सएप पर ही बतिया लेते हैं. लेकिन जब हम छोटे थे तो चिट्ठियां डाकिया लाता था, साइकिल की घंटी बजा कर घर वालों को इत्तिला देता था और अपने बड़े से झोले से चिट्ठी निकाल कर घर के बाहर लगे छोटे से लेटर बॉक्स में डाल जाता था. तब हर घर के गेट या दरवाजे पर एक छोटा लेटर बॉक्स जरूर लगा होता था.

शाम को पिताजी दफ्तर से आते तो दरवाजे की कुंडी खटकाने से पहले लेटर बॉक्स खोलकर चिट्ठियां निकालते थे. उन्हीं दिनों हमारा एक शौक जागा था – डाक टिकट संग्रह का. यह कोई मंहगा शौक नहीं था. पहले पहल तो हमने अपने घर में आने वाले पत्रों के डाक टिकटों को सहेजना शुरू किया. हम लिफाफे पर लगे डाक टिकट पर नम रुई का फाया रखते और फिर बड़ी सफाई से टिकट निकाल लिया करते थे, धीरे-धीरे हमारा शौक विस्तार पाने लगा तो डाक टिकट निकालने में अच्छी खासी महारत हासिल हो गई.

हम चाहते थे कि जल्दी ही ढेर सारे टिकट संग्रह कर लें, मगर हफ्ते में तीन-चार चिट्ठियों से ज्यादा आती नहीं थीं. हमने धीरू और टिल्लू को भी इस काम में लगा दिया. दोनों बड़ी मेहनत से मेरे लिए टिकट संग्रह करने लगे. मगर मेरी हवस पूरी होने का नाम ही नहीं ले रही थी. टिकटों की संख्या में ज्यादा बढ़ोत्तरी न देखकर हमने मोहल्ले के पोस्ट ऑफिस रामादीन पोस्टमैन को पटाने की सोची. हमारी सोच यह थी कि अगर रामादीन पट गया तो उनके झोले में मौजूद ढेरों देसी-विदेशी पत्रों पर से हमें देसी के साथ-साथ विदेशी टिकट भी आसानी से हासिल हो जाएंगे.

इससे हमारा खजाना बढ़ भी जाएगा और उसमें वैराइटी भी आ जाएगी. हमने रामादीन से बात की. ठाकुर के होटल पर एक कटिंग चाय पिलाने की बात पर हमारा कॉन्ट्रैक्ट साइन हो गया. कुछ दिन तक रामादीन एक कटिंग चाय में हमें टिकट उपलब्ध कराते रहे, मगर फिर उन्होंने चाय के साथ समोसे की मांग भी रख दी. खैर, हम उस पर भी राजी हो गये. जब तक रामादीन चाचा चाय और समोसे पर हाथ साफ करते, हम लोग उनके झोले में भरे पत्रों पर लगे डाक टिकटों पर हाथ साफ करते रहते.

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थोड़े दिन बाद रामादीन ने डिमांड बढ़ा दी. बोले – कटिंग चाय और बासी समोसे से काम नहीं चलेगा, आधा पाव दूध वाली चाय और मिठाई खिलाओ तब झोला खोलना. हम लोगों ने कास्ट बेनिफिट एनालिसिस किया, और यह निश्चय किया कि अब हम रामादीन की ब्लैकमेलिंग के आगे नहीं झुकेंगे और अपने बलबूते मैदान में उतरेंगे. इस तरह से हम तीनों ने आत्मनिर्भर होकर मोहल्ले की चिट्ठियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया.

मोहल्ले के घरों के बाहर लगे डाक बक्से से चिट्ठियां निकालना कोई बड़ी बात नहीं थी. कुछ लेटर बौक्स तो खुले ही रहते थे, मगर कुछ पर छोटे ताले पड़े होते थे. मगर ताले वाले लेटर बौक्स से भी हम चिमटी की मदद से आराम से चिट्ठियां निकाल लेते थे. उन पर लगे डाक टिकट निकाल कर हम चिट्ठियां वापस लेटर बॉक्स में डाल देते थे. लोगों को अब पत्र बिना डाक टिकट के मिलने लगे थे. पहले पहल तो लोगों को पता ही नहीं चला, या उन्होंने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया, लेकिन धीरे-धीरे कुछ शक्की लोगों का ध्यान इस ओर गया. हमें पता ही नहीं चला कि मोहल्ले के चौकीदार, दुकानदार, प्रेस वाली तक यह सूचना पहुंच गई कि देखो, डाक वाले डिब्बे कौन छूता है.

एक दिन भाजी वाले ने धीरू को डिब्बे से चिट्ठी निकालते धर लिया. हम दूसरे डिब्बों पर हाथ साफ कर रहे थे, सो बच गए. धीरू की धुनाई हो गई. धीरू ने मुंह खोला तो बात हमारे घर तक भी पहुंच गई. पिताजी ने कड़कदार आवाज में हमें बुलाया. सच्चाई पूछी और डांट कर अंदर अम्मा के पास भेज दिया. दूसरे दिन पिताजी जब दफ्तर से लौटे तो हमसे पूछा, ‘कितने टिकट बटोरे हैं?’

हमने डरते डरते बताया, ‘सात सौ पैंतालीस…’

बोले, ‘ले आओ.’ मैं घबराया कि आज तो मेरे सारे डाक टिकट गए समझो. पिताजी जरूर इन्हें चूल्हे में झोंकने वाले हैं. इतने सालों की मेहनत मिट्टी में मिलने वाली है… डरते-डरते अंदर गए. अपना बस्ता खोला और किताबों के बीच जमा की गई अपनी मेहनत को दोनों हथेलियों के बीच लेकर बाहर कमरे में आए और पिताजी के सामने सिर झुका कर खड़े हो गए. पिताजी तख्त पर एक ओर खिसक कर बैठ गए. बोले, ‘यहां रख दो और बैठो मेरे पास.’

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हम आंखों में आंसू लिए उनके पास तख्त पर बैठ गए. सारे टिकट हमने उनके चरणों में रख दिए. पिताजी ने टिकट देखे. उनकी आंखों में खुशी नाच रही थी. बड़े उल्लास से उन्होंने पास पड़ा अपना थैला खोला और उसमें से एक डाक टिकट कलेक्शन की फाइल निकाल कर मेरे सामने रख दी और चहक कर बोले, ‘चलो, सारे टिकट इसमें कायदे से लगाते हैं, मुझे भी बचपन में बड़ा शौक था टिकट संग्रह का…’ Hindi Kahani

सफर: जिस्म का मजा और रंगीन नोटो की सजा

Romantic  Kahani: रात के ठीक 10 बजे ‘झेलम ऐक्सप्रैस’ ट्रेन ने जम्मूतवी से रेंगना शुरू किया, तो पलभर में रफ्तार पकड़ ली. कंपार्टमैंट में सभी मुसाफिर अपना सामान रख आराम कर रहे थे. गीता ने भी लोअर बर्थ पर अपनी कमर टिकाई. कमर टिकाते ही उस ने देखा कि सामने वाली बर्थ पर जो साहब अभी तक बैठे थे, मुंह खुला रख कर खर्राटों भरी गहरी नींद सो चुके थे. गीता की नजर उन साहब के ऊपर वाली बर्थ पर गई तो देखा कि एक नौजवान अपनी छाती पर मोबाइल फोन रख कानों में ईयरफोन लगाए उस में बज रहे गानों के संग जुगलबंदी में मस्त था.

गीता को नींद नहीं आ रही थी. उस के ऊपर वाली बर्थ पर कोई हलचल नहीं थी. उस पर सामान रखा हुआ था और सामान वाला उसी कंपार्टमैंट के आखिरी छोर पर अपने दोस्त के साथ कारोबार की बातें कर रहा था. रात गुजर गई. गीता लेटी रही, मगर सो नहीं पाई थी. सुबह के 5 बज चुके थे. अपनी ही दुनिया में मस्त वह नौजवान उठा और वाशरूम की तरफ चल दिया. जब वह लौटा, तो उस का चेहरा एकदम तरोताजा दिख रहा था. तब तक गाड़ी अंबाला कैंट रेलवे स्टेशन पर रुक चुकी थी. वह नौजवान छोलेकुलचे ले कर आया और फिर उस ने देखते ही देखते नाश्ता कर लिया. सामने वाली बर्थ पर लेटे साहब हरकत में आने शुरू हुए. उन्होंने गीता से पूछा, ‘‘मैडम, यह गाड़ी कौन से स्टेशन पर रुकी हुई है?’’

गीता ने उन के सवाल का जवाब देते हुए कहा, ‘‘जी, अंबाला स्टेशन पर.’’

तभी ट्रेन ने रेंगना शुरू कर दिया. उन साहब ने सवाल किया, ‘‘क्या कोई चाय वाला नहीं आया अब तक?’’

गीता बोली, ‘‘जी, बहुत आए थे, मगर आप सो रहे थे.’’ वे साहब चाय की तलब लिए फिर से अपनी बर्थ पर आलू की तरह लुढ़क गए. थोड़ी देर बाद उन का मुंह खुला और वे फिर से खर्राटे लेने लगे. गीता ने सामने ऊपर वाली बर्थ पर उस नौजवान पर निगाह डाली तो देखा कि वह कोई उपन्यास पढ़ रहा था. न जाने क्यों गीता की निगाहों को वह अच्छा लगने लगा था. उस का डीलडौल, कदकाठी, हेयरकट और उस के दैनिक रूटीन से उस ने अंदाजा लगा लिया था कि यह तो पक्का फौजी है. इस के बाद गीता वाशरूम चली गई. थोड़ी देर बाद वह होंठों को और गुलाबी कर, आंखों को कजरारी कर, चेहरे को चमका कर व जुल्फों को संवार कर जब वापस अपनी बर्थ की ओर लौटने लगी, तो उस की नजरें दूर से ही उस नौजवान पर जा टिकीं. वह उपन्यास के पात्रों में खोया हुआ था.

गीता ने ठोकर लगने की सी ऐक्टिंग कर उस का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की, मगर सब बेकार. गीता खिसियाई सी खिड़की के पास आ कर बैठ गई और बाहर झांकने लगी.

तकरीबन 8 बजे गाड़ी पानीपत स्टेशन पर रुकी, तो गीता ने अपनी नजरें नौजवान पर टिका कर सामने वाले साहब को पुकारते हुए कहा, ‘‘जी उठिए, स्टेशन पर गाड़ी रुकी है… चायनाश्ता सब है यहां.’’

‘‘ओके थैंक्यू, चाय पीने का बड़ा मन है मेरा,’’ उन साहब ने कहा.

‘‘जी, इसीलिए तो उठाया है. मैं जानती हूं कि आप चाय की तलब के साथ ही सो गए थे,’’ गीता बोली.

चाय वाला जैसे ही खिड़की पर आया, तो उन साहब ने झट से चाय का कप लिया और अपनी जेब से पैसे निकाल कर चाय वाले को थमा दिए. इस के तुरंत बाद आलूपूरी वाले ने खिड़की पर दस्तक दी, तो पलभर में उन साहब ने आलूपूरी अपने हाथों में थाम ली. गीता की नजर दोबारा ऊपर वाली बर्थ पर गई, तो उस ने देखा कि वह नौजवान अभी भी उपन्यास पढ़ने में डूबा हुआ था. चायनाश्ते से निबट कर जब उन साहब को फुरसत मिली, तो उन्होंने गीता को ‘थैंक्यू’ कहा. तभी ऊपर बैठे उस नौजवान ने नीचे झांका तो देखा कि साहब नाश्ता कर चुके थे.

उस नौजवान ने बड़ी नम्रता से कहा, ‘‘सर, अगर आप बैठ रहे हैं, तो मैं अपनी बर्थ नीचे कर लूं क्या?’’

‘‘हांहां क्यों नहीं.’’

थोड़ी देर बाद वह नौजवान उन साहब की बगल में, तो गीता के ठीक सामने बैठ चुका था.

गीता अपनी बर्थ पर बैठीबैठी खिड़की से बाहर झांकतेझांकते अपनी नजरें उस नौजवान की नजरों से मिलाने की कोशिश करने लगी. लेकिन वह नौजवान तो उसे देख ही नहीं रहा था. वह सोचने लगी, ‘ऐसा कभी हुआ ही नहीं कि मुझे कोई देखे भी न. अगर कोई मेरी बगल से भी गुजरता है, तो वह पलट कर मुझे जरूर देखता है.’ उस नौजवान पर टकटकी लगाए गीता सोच रही थी कि तभी उस ने पानी की बोतल गीता की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मैडम, पानी पी लीजिए.’’

यह सुन कर गीता के गंभीर चेहरे पर एक मुसकान उभरी. उस की ओर देखतेदेखते गीता पानी की बोतल अपने हाथ में थाम बैठी और दोचार घूंट गटागट पी भी गई.

पानी की बोतल उसे वापस देते हुए गीता ने अपने कयास को पुख्ता करने के लिए पूछ लिया, ‘‘आप फौजी हैं न?’’

‘‘जी…’’

गीता ने उस से दोबारा कहा, ‘‘बुरा मत मानना प्लीज… मैं ने किसी से सुना था कि फौजी दिमाग से पैदल होते हैं… जहां लड़की देखी नहीं कि कभी उन के सिर में तो कभी बदन में खुजली होने लगती है और फिर वे पागलों की तरह लड़कियों को देखने लगते हैं. पर आप ने यह साबित कर दिया कि सभी फौजी एकजैसे नहीं होते.’’

‘‘हां, पर फौजियों को ठीक रहने कौन देता है… जहां फौजी ऐसी हरकत नहीं करते, वहां लड़कियां उन के साथ ऐसा ही करने लगती हैं. आखिर कोई कहां तक बचे?’’ उस नौजवान की यह बात सीधा गीता के दिल को जा कर लगी.

बातचीत का सिलसिला चला, तो उस नौजवान ने पूछ लिया, ‘‘क्या नाम है आप का?’’

‘‘गीता.’’

‘‘क्या करती हैं आप?’’

‘‘जी, मैं बैंक में हूं.’’

‘‘बहुत अच्छा,’’ वह फौजी बोला.

गीता ने पूछा, ‘‘और आप का नाम?’’

‘‘मेरा नाम प्रिंस है.’’

‘‘प्रिंस… वह भी सेना में… पर कौन रहने देता होगा आप को वहां प्रिंस की तरह…’’

इस बात पर वे दोनों हंस दिए थे, हंसीठहाकों के बीच उन्हें पता ही नहीं चला कि टे्रन कब नई दिल्ली स्टेशन पर आ कर रुक गई. सवारियों ने उतरना शुरू किया, तो साथ ही साथ नई सवारियों का चढ़ना भी जारी था. तभी एक बंगाली जोड़ा अपना बर्थ नंबर ढूंढ़तेढूंढ़ते वहां आ पहुंचा. अधेड़ उम्र के उस बंगाली जोड़े ने अपना सामान सीट के नीचे रखा और वे दोनों गीता व प्रिंस के साथ ही आ बैठे. दिनभर की प्यारभरी बातों के सिलसिले के साथ ही एक के बाद एक स्टेशन भी पीछे छूटते रहे और पता ही नहीं चला कि कब शाम हो गई. पैंट्री वाले आए, खाने का और्डर बुक किया. कुछ देर बाद रात का भोजन सब के सामने था. खाना खाने के बाद प्रिंस ने टूथब्रश किया, तो गीता ने भी उस की देखादेखी यह काम कर डाला. सभी सुस्ताने के मूड में आए, तो सब ने अपनीअपनी बर्थ संभालनी शुरू कर दी.

बंगाली जोड़ा कुछ परेशान सा इधरउधर ताकनेझांकने लगा. प्रिंस ने उन्हें टोकते हुए पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है जी?’’

बंगाली आदमी ने अपना दर्द बयां किया, ‘‘क्या बताएं बेटा. एक तो हम शरीर से भारी, उस पर उम्र के उस पड़ाव पर हैं कि जहां हमारे लिए ऊपर वाली बर्थ पर चढ़नाउतरना किसी किले को फतेह करने से कम नहीं है. कहीं इस चढ़नेउतरने में फिसल कर गिर गए, तो 2-4 हड्डियां तो टूट ही जाएंगी.’’

इतने में बंगाली औरत की याचक निगाहें गीता के छरहरे बदन पर जा पड़ीं. उन्होंने विनती करते हुए कहा, ‘‘बेटी, क्या आप हमारी मदद कर सकती हैं?’’

गीता हैरानी से उन की ओर देखते हुए बोली, ‘‘कैसे आंटी?’’

‘‘आप बर्थ ऐक्सचेंज कर लीजिए प्लीज. आप जवान लोग हो, ऊपर की बर्थ पर चढ़उतर सकते हो.’’

‘‘ठीक है आंटी. मैं ऊपर वाली बर्थ पर चली जाती हूं, आप मेरी बर्थ पर सो जाइए,’’ गीता ने कहा. गीता पायदान में पैर अटका कर प्रिंस के सामने ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ गई, तो बंगाली जोड़ा भी नीचे वाली बर्थ पर लेट गया.

प्रिंस, जो पहले से ही अपनी बर्थ पर मौजूद था, अब तक उपन्यास के पन्नों में डूब चुका था. गीता ने ऊंघते हुए उस की तरफ देखा और एक बदनतोड़ अंगड़ाई लेते हुए अपनी छाती को उभारा, तो फौजी की नजरें उपन्यास से हट कर उस के बदन पर आ ठहरीं. उपन्यास हाथ से छूट कर नीचे गिर गया. गीता के चेहरे पर मादकता में लिपटी जीत की मुसकान तैर गई. उस ने नीचे गिरे हुए उपन्यास को देखा तो उस के उभार झांकने लगे. फौजी की निगाहें तो मानो वहीं पर अटक कर रह गईं.

फौजी ने गीता की ओर देख कर कहा, ‘‘बुरा मत मानना, आप की हंसी तो बेहद खूबसूरत है.’’

गीता ने भी जवाब में कहा, ‘‘आप का चालचलन बहुत अच्छा है… मैं कल से देख रही हूं.’’

यह बात सुन कर प्रिंस हंस पड़ा और बोला, ‘‘आर्मी वालों का चालचलन बिगड़ने कौन देता है मैडम? कैद में रहते हैं. कोई हमें खुला छोड़ कर तो देखे.’’

गीता मुसकराते हुए कहने लगी, ‘‘अब चालचलन कुछ ठीक नहीं लग रहा है आप का.’’

‘‘कहां से ठीक रहता… आप जो कल रात से मुझ पर डोरे डालती आ रही हैं. हम कंट्रोल करना जानते हैं, तो इस का मतलब यह तो नहीं हुआ कि किसी हुस्नपरी को देख कर हमारा दिल ही नहीं धड़कता. हम बात मौका देख कर करते हैं मैडम.’’ गीता ने उस की बातों में दिलचस्पी लेते हुए पूछा, ‘‘गाने के शौकीन हो बाबू, फौज में क्यों चले गए?’’

प्रिंस गंभीर हो गया, फिर कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘एक लड़की के चक्कर में फौजी बन गया. उसे आर्मी वाले पसंद थे.’’

‘‘ओह… अब तो वह लड़की आप की पत्नी होगी?’’

‘‘न… जब मैं ट्रेनिंग कर के गांव लौटा, तब तक उस ने किसी कारोबारी से शादी कर ली थी. मगर मैं फौजी हो कर रह गया.’’

‘‘बहुत दुख हुआ होगा उस के ऐसा करने पर?’’

‘‘हां, पर क्या करता? जिंदगी है ही चलने का नाम. कभी दोस्तों ने मुझ को, तो कभी मैं ने खुद को समझा लिया कि जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है.’’

फिर गीता की ओर आंख मार कर प्रिंस ने हलके से मुसकराते हुए कहा, ‘‘बस, अब मैं कुछ अच्छा होने का इंतजार कर रहा हूं.’’

‘‘क्या बात है साहब… मुझे आप की यही अदा तो बड़ी पसंद है.’’

‘‘मुझ से दोस्ती करोगी?’’

‘‘वह तो हो ही गई है अब… इस में कहने की क्या बात है?’’ फिर उन दोनों ने एकदूसरे से हाथ मिलाया, तो गीता ने प्रिंस की हथेली में अपनी उंगलियों से सरसराहट सी पैदा कर दी. उस सरसराहट ने प्रिंस के तनमन में खलबली मचा दी थी. दोनों एकदूजे की आंखों में डूबने लगे. रात अपने शबाब पर चढ़नी शुरू हो गई थी. वे दोनों कब एक ही बर्थ पर आ गए, किसी को भनक तक न हुई. गीता के बदन से आ रही गुलाब के इत्र की भीनीभीनी खुशबू में प्रिंस बहकता चला गया. गीता ने थोड़ी ढील दी, तो प्रिंस के हाथ उस के बदन से खेलने लगे. गीता ने कुछ नहीं कहा, तो प्रिंस ने उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया. थोड़ी ही देर में वे दो बदन एक जान हो गए. चलती टे्रन में उन के प्यार का सफर अब अपनी हद पर था. फिर इसी सफर में वे दोनों हांफतेहांफते नींद के आगोश में समा गए. सुबह के तकरीबन 3 बजे गाड़ी ने अपनी रफ्तार कम की, तो गीता की नींद खुल गई. उस ने अपनेआप को प्रिंस की बांहों से आजाद कर कपड़े पहने. उस का खंडवा स्टेशन आने वाला था.

गीता ने एक कागज पर प्रिंस के लिए कुछ लिखा और उस के सिरहाने रख दिया. फिर कुछ सोचा और जल्दबाजी में एक और पुरजे पर कुछ लिखा और पर्स निकाल कर उस पुरजे को पर्स में रखा और पैंट की जेब के हवाले किया.

फिर गीता ने अपना सामान समेटा और बिना आहट किए ही प्लेटफार्म पर उतर गई. रात के प्यार में थके प्रिंस की नींद सुबह के 5 बजे खुली, तो उस ने अपनी बगल में गीता को टटोला. वह वहां नहीं थी और न ही उस का सामान. प्रिंस हैरानपरेशान सा इधरउधर ताकने लगा. गीता का कहीं नामोनिशान न मिलने पर उस ने खुद को ठीकठाक करने के लिए सिरहाने रखी अपनी शर्ट उठाई, तो उसे उस के नीचे एक चिट्ठी मिली. लिखा था:

‘डियर,

‘आप बहुत अच्छे फौजी हैं. देर से बहकते हो जरा… पर बहकते जरूर हो. सफर रोमांचक गुजरा. आप की बात ही कुछ और थी… फिर कभी दोबारा आप से इसी तरह मुलाकात हो.

‘लव यू डियर, गुड बाय.’

चिट्ठी पढ़ कर प्रिंस हैरान हुआ. उस भोलीभाली दिखने वाली मासूम बला के बारे में सोचतेसोचते उस के माथे पर सिलवटें पड़ने लगीं, तभी चाय वाला वहां आया.

‘‘अरे भैया, एक कप चाय दे दो,’’ कहते हुए प्रिंस ने अपना पर्स निकाला, तो उस में से एक और पुरजा निकला, जिस पर लिखा हुआ था: ‘आप का पर्स रंगीन नोटों की गरमी से लबालब था. दिल आ गया… सो, निशानी के तौर पर सभी रंगीनियां साथ लिए जा रही हूं… उम्मीद है कि आप बुरा नहीं मानेंगे.’ प्रिंस के मुंह से बस इतना ही निकला, ‘‘चाय के लिए चिल्लर तो छोड़ जाती…पर फौजी पर तरस खाता कौन है…’’

Hindi Stories: रिटायरमैंट के क्विक लौस

Hindi Stories: मेरे रिटायरमैंट का दिन नजदीक आते ही मेरे आसपास के लोग मेरा मन बहलाने के लिए मुझे सपने दिखाते रहे कि रिटायर होने के बाद जो मजा है, वह सरकारी नौकरी में रहते नहीं. लेकिन रिटायरमैंट के बाद मेरे जो क्विक लौस हुए उन्हें मैं ही जानता हूं.

रिटायर होने के 4 दिनों बाद ही पता चल गया कि रिटायर होने के कितने क्विक लौस हैं. लौंग टर्म लौस तो धीरेधीरे सामने आएंगे. आह रे रिटायरी. बीते सुख तो कम्बख्त औफिस में ही छूट गए रे भैये. रिटायरमैंट के बाद के सब्जबाग दिखाने वालो, हे मेरे परमादरणियो, मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें कभी समय पर पैंशन न मिले.

बंधुओ, घर के कामों से न मैं पहले डरता था, न अब डरता हूं. इन्हीं कम्बख्त घर के कामों के कारण ही तो हर रोज लेट हो जाने के बाद अगले दिन समय पर औफिस जाने की कसम खा कर भी रिटायर होने तक समय पर औफिस न पहुंचा.

वैसे मु झे इस बात पर पूरा संतोष है कि मैं ने सरकारी नौकरी में रहते घर के कामों को औफिस के कामों से अधिक प्राथमिकता दी, इन की, उन की, सब की तरह. औफिस के कामों का क्या? वे तो होते ही रहते हैं. आज नहीं तो कल. कल नहीं तो परसों. परसों नहीं तो चौथे. और जो ज्यादा ही हुआ तो अपना काम सरका दिया किसी दूसरे की ओर. पर घर के काम तो भाईसाहब आप को ही करने होते हैं, अपने हिस्से के भी, अपनी बीवी के हिस्से के भी घर में शांति रखनी हो तो. वरना, महाभारत के लिए कुरुक्षेत्र ढूंढ़ने की कतई जरूरत नहीं.

दूसरी ओर, जोजो औफिस के कामों को कम घर के कामों को अधिक प्राथमिकता देते हैं, उन का घर नरक होते हुए भी स्वर्ग होता है. और जो औफिस के कामों को अधिक प्राथमिकता देते हैं और घर के कामों से हाथ चुराते हैं वे रिटायरमैंट के बाद तो छोडि़ए, रिटायर होने से पहले ही स्वर्ग जैसे औफिस में रहने के बाद भी नरक ही भोगते हैं.

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जौब लगने से ले कर रिटायरमैंट तक लेट औफिस जाने, जाने तो जाने, न जाने तो न जाने का, बिन छुट्टी लिए औफिस से जल्दी घर आने का मु झे तनिक भी मलाल नहीं क्योंकि मैं उस देश का वासी हूं जहां जल्दी तो सब को रहती है, पर समय पर कोई कहीं भी नहीं पहुंचता.

तो मित्रो, अब मैं फील कर रहा हूं कि रिटायरमैंट के बाद मेरा सब से बड़ा क्विक लौस जो हुआ है, वह यह है कि अब मैं सरकारी पैसे पर निजी मस्ती करने नहीं जा सकूंगा. सरकारी नौकरी में रहते सरकार के पैसों पर घूमने के आप के पास हजारों बहाने होते हैं. न भी हों तो भी किसी भी बहाने घूमने की अति आवश्यक जरूरत बता बहाने बना लिए जाते हैं. बस, आप के पास  झूठा इनोवेटिव दिमाग होना चाहिए.

ऐसा करने से सरकारी कामों में गतिशीलता बनी रहती है. बाहर के लोगों से संपर्क बढ़ते हैं जो रिटायरमैंट से पहले और रिटायरमैंट के बाद बड़े काम आते हैं. वैसे भी, जो मैं ने रिटायरमैंट तक फील किया, वह यह कि सरकारी नौकरी मेलमिलाप के सिवा और कुछ भी नहीं, काम तो जाए भाड़ में.

जब हम अंगरेजों के रहते हुए भी सरकारी काम का बहिष्कार सीने पर गोली खाने के बाद कर सकते हैं तो भाईसाहब, अब तो हम आजाद हैं, आजाद. और आजाद भी ऐसे कि हमारी आजादी हम सब से कुछ करवा सकती है पर, औफिस में काम कदापि नहीं करवा सकती. हम और तो सब कुछ कर सकते हैं, पर औफिस में रह कर औफिस का काम नहीं कर सकते, तो बस, नहीं कर सकते. जिस में दम हो, करवा कर देख ले. चौथे दिन अपनेआप ही काम करना न भूल जाए तो रिटायरमैंट के बाद उस का जूता मेरा सिर.

सच कहूं तो अपनी जेब से पैसे दे कर आज तक मैं शौचालय भी नहीं गया था. शौचालय जाता तो उस का 5 के बदले 50 रुपए का बिल ले औफिस आ कर वापस ले लेता. कई बार तो मैं ने ऐसा भी किया कि शौच खुले में कर दिया और शौचालय वाले से बिल ले उसे सगर्व औफिस में प्रोड्यूस कर रीइंबर्स करवा लिया. अब मैं सच बोल कर अपना मन हलका कर लेना चाहता हूं. सो, जो शौचालय के बाहर जानपहचान का निकल आता, उस से अलतेचलते यों ही 50 रुपए का बिल ले लेता. शौच के जाली बिल के 10 रुपए निकालने वाला खा लेता, 40 अपुन रख लेते अदब से.

दूसरा क्विक लौस जो मैं फील कर रहा हूं वह यह कि घर में अब सारा दिन इस भीषण गरमी में पंखा पूरी स्पीड में चलाना पड़ रहा है. पड़ेगा ही, अपने मीटर के साथ. औफिस में ऐसीऐसी गंदी आदतें पड़ गई थीं कि अब पता चल रहा है कि वे गंदी नहीं, बहुत गंदी आदतें थीं. औफिस में कई बार तो हीटर और पंखा तक एकसाथ चला देता था. पर अब 2 दिन में ही घर के पंखे को औन करने में भी दम निकल रहा है. अभी से ही यह हाल है तो सर्दी में सूरज ही जाने, हीटर कैसे लगा पाऊंगा?

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रिटायरमैंट का एक और क्विक लौस जो मैं फील कर रहा हूं वह यह भी है कि औफिस में तो जिसे जो मन में आता था, बक देता था. बेचारे प्यून टेबल साफ होने के बाद भी मेरे गालियां देने पर साफ करते रहते थे. इतना साफ कि हर महीने टेबल का माइका नया लगवाना पड़ता था. इस बहाने लाख पगार लेने वाले के ऊपर या नीचे कहीं से भी 2-4 सौ और बन जाते थे. पर अब घर में सब मु झ पर बकते रहते हैं. जबकि मु झे बेवजह अपने पर बकना तक पसंद नहीं.

रिटायरमैंट का एक और क्विक लौस…कल तक जो कुत्ता मेरे घर से औफिस जाने और औफिस से घर आने पर मेरे तलवे चाटता था, आज मु झे उसी के तलवे चाटने पड़ रहे हैं. जिस बंदे ने औफिस में सब को उंगलियों पर नचाया, आज वही घर, गली के गधे से गधे की उंगलियों पर नाचने को विवश है.

कुल मिला कर, जमा के नाम पर कुछ नहीं, सब घटघटा कर ही अपनी हालत वह हो गई है कि… अपने रिटायरमैंट के कगार पर बैठे मित्रों से सारे सच कहना चाहता हूं पर इस बात से डरता हूं कि कल को कहीं वे रिटायर होने के डर के बदले एक्सटैंशन की टैंशन ले कर वैसे ही रिटायर न हो जाएं.

दस्तखत : सुखिया की जवानी का सबने लिया मजा

Short Hindi Story: सुरेंद्र सुखिया की जवानी पर फिदा था. उस के भरे उभारों, मांसल जिस्म और तीखे नैननक्श को देख कर दूसरे लोगों की तरह ही कई बार सुरेंद्र की नीयत भी बिगड़ गई थी. पिछले दिनों सुखिया के पति की ट्रक की टक्कर से मौत हो गई थी. जमींदार के बिगड़े बेटे सुरेंद्र के लिए तो यह सोने पे सुहागा हो गया था, इसलिए कई बार वह सुखिया से अपने दिल की बात कह चुका था.

इस बीच सुखिया लोगों के घर बरतन मांज कर कुछ पैसे कमा लेती थी. एक वकील ने उस से मिल कर उस के पति के बीमे के पैसे के लिए उसे तैयार किया और केस लगा दिया था.

एक दिन सुरेंद्र ने सुखिया से कहा, ‘‘तू कोर्टकचहरी के चक्कर में कहां पड़ी है. जितना तुझे बीमा से मिलेगा, उस से दोगुना मैं तुझे देता हूं. बस, तू एक बार राजी हो जा.’’

सुखिया उस की बात को अनसुना कर देती. सुखिया की गरीबी और जवानी का हर कोई फायदा उठाना चाहता था, इसलिए एक दिन वकील ने कहा, ‘‘सुखिया, तेरा केस लड़तेलड़ते मैं थक गया हूं. अब एक दिन घर आ जा, तो थकान मिट जाए.’’

सुखिया एक दिन कचहरी आ रही थी, तभी उस का केस देखने वाला जज सामने टकरा गया और बोला, ‘‘सुखिया, तेरा केस तो एक ही बार में खत्म कर दूंगा और पैसा भी बहुत दिलवा दूंगा. बस, तू मुझ से मिलने आ जा.’’

लेकिन सुखिया किसी की बात पर कोई ध्यान नहीं देती. बस, अपने चेहरे पर दिलफेंक मुसकराहट ला देती. आखिरकार जज साहब ने 2 लाख रुपए के मुआवजे का फैसला ले लिया. जज और वकील की मिलीभगत थी, इसलिए और्डर की कौपी वकील ने ले ली और हिसाब पूरा करने के बाद उसे सुखिया को देने के लिए राजी हो गया.

कचहरी में चैक बनाने वाले बाबू ने जब सुखिया को देखा, तो उस का भी ईमान डोल गया. वह सुखिया को चैक देने के बहाने बुलाने लगा और सामने बैठा कर उस के उभारों पर नजर गड़ाए रखता.

एक दिन बाबू ने कहा, ‘‘तेरी फाइल और चैक के ऊपर सभी के दस्तखत होंगे, तभी मिलेगा.’’ सुखिया ने परेशान हो कर कहा, ‘‘बाबू, कुछ पैसा चाहिए तो ले लो, क्यों रोजरोज परेशान करते हो?’’

इस पर बाबू उसे अपनी बातों में बहला लेता था. एक दिन जब सुखिया आई, तब बाबू ने कहा, ‘‘मैं फाइल और चैक तैयार रखूंगा. तुम आ जाना, फिर वहीं सब के दस्तखत करा कर चैक दे देंगे.’’ सुखिया इस के लिए तैयार हो गई.

यह खबर जब दारोगा को मिली, तो वह भी इस में शामिल हो गया. इस से यह डर भी खत्म हो गया कि अगर सुखिया ने कहीं शिकायत वगैरह की, तो कुछ नहीं होगा. बाबू की पत्नी मायके गई थी, इसलिए सुखिया को उसी के कमरे में बुलाया.

सुखिया ने वहां पहुंच कर परेशान होते हुए कहा, ‘‘अब तो चैक पर दस्तखत कर के दे दो, क्यों इतना परेशान कर रहे हो?’’ कचहरी के बाबू ने कुटिल हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘सुखिया, ऐसी भी क्या जल्दी है, थोड़ा रुको तो.’’

इधर सुखिया कसमसाती रही, उधर फाइलचैक पर दस्तखत होते रहे. Short Hindi Story

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