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Action Drama Movie: सूबेदार

Action Drama Movie: यह एक सैनिक के जीवन पर आधारित ऐक्शन ड्रामा फिल्म है. वर्ष 2023 में मराठी फिल्म ‘सुभेदार’ आई थी. यह ऐतिहासिक फिल्म तानाजी मालसारे के जीवन पर आधारित थी. 2018 में 962वें भारत-चीन युद्ध के नायक पर आधारित बायोपिक फिल्म ‘सूबेदार जोगिंदर सिंह 2018 में रिलीज हो चुकी है.’

फौज से सेवानिवृत्त फौजियों को अकसर तेजी से बदलती दुनिया में नागरिक जीवन में ढलने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. अकसर वे स्थानीय भ्रष्टाचार और सिस्टम का शिकार बनते हैं. मजबूर हो कर उन्हें अपने परिवार की रक्षा के लिए सेना के अनुशासन और युद्ध कौशल पर भरोसा करना पड़ता है.

इस विषय पर 80-90 के दशक में कई फिल्में आ चुकी हैं. उस समय गरीबों के हकों के लिए लड़ने वाले और एक ही समय में 10-20 गुंडों को ढेर करने वाले हीरोज का बोलबाला था. दर्शकों को उस समय ऐसे एंग्रीयंगमैन वाले नायक खूब पसंद आए. अनिल कपूर इस तरह की भूमिकाएं 80 के दशक में निभाया करता था, इस फिल्म में रिटायर्ड फौजी के रोल में वह दोबारा से लौटा है और समाज में फैली बुराइयों से उसे लड़ता हुआ देखा जा सकता है.

कहानी रिटायर्ड आर्मी अफसर सूबेदार अर्जुन सिंह (अनिल कपूर) के इर्दगिर्द बुनी गई है, जो बरसों बाद मध्य प्रदेश के एक कसबे में अपनी बिखरी जिंदगी समेटने को लौटा है. श्यामा (राधिका मदान) कालेज गर्ल है और अपनी मां (खुशबू) की ऐक्सिडैंट में हुई मौत से सदमे में है. अर्जुन का दोस्त प्रभाकर (सौरव शुल्ला) उसे इलाके के दबंग सौफ्टी (फैसल मलिक) और प्रिंस (आदित्य रावल) के पास ले जाता है. ये दोनों रेत माफिया से जुड़े हैं. इस नैटवर्क की असली सरगना दीदी (मोना सिंह) जेल में बंद है और वहीं से अवैध कारोबार चलाती है.

अर्जुन इस अराजकता और सिस्टम की बदहाली से वाकिफ है. उधर श्यामा को भी कालेज में गुंडागर्दी का सामना करना पड़ता है. एक दिन बिगड़ैल प्रिंस अर्जुन की जिप्सी को नुकसान पहुंचाता है. यह अपमान अर्जुन को झकझोर देता है. वह रेत माफिया के इन दरिंदों के खिलाफ जंग छेड़ देता है. रेत माफिया श्यामा का अपहरण कर लेते हैं और अर्जुन के दोस्त प्रभाकर की हत्या कर देते हैं. मगर अर्जुन प्रिंस का खात्मा कर देता है. प्रिंस के मरने के बाद ही नकली दीदी का वर्चस्व भी खत्म हो जाता है. अर्जुन और उस की बेटी श्यामा के बीच का रिश्ता सुधर जाता है.

क्लाइमैक्स में नाना पाटेकर का एक सरप्राइज कैमियो है जो पूर्व सैनिकों की एक टीम के नेता के रूप में अर्जुन की मदद करता है.

अंत में फिल्म के सीक्वल बनने का इशारा कर दिया गया है. निर्देशक ने फिल्म में जम कर मसाले डाले हैं. फिल्म का मध्यांतर से पहले का भाग तेजतर्रार है, मध्यांतर के बाद कहानी निखर जाती है. छोटे कसबे की धूलधक्कड़ और बेतरतीब लाइफ को विश्वसनीय तरीके से दिखाया गया है.

सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. ‘लल्ला…’ और ‘बलम सूबेदार…’ गाने अच्छे बन पड़े हैं. अनिल कपूर का काम बढ़िया है. खौफनाक प्रिंस की भूमिका में आदित्य रावल जंचा है. राधिका मदान का काम भी ठीकठाक है. मोना सिंह ने अपने किरदार के साथ न्याय नहीं किया है. Action Drama Movie

CBFC controversy: सैंसर बोर्ड की तानाशाही की शिकार बनी ‘द वौयस औफ हिंद रजब’

CBFC controversy: भारतीय सैंसर बोर्ड यानी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड एक तरफ ‘धुरंधर द रिवेंज’ को वयस्क प्रमाणपत्र के साथ प्रदर्शन की इजाजत देता है जिस में एक किरदार दूसरे किरदार का सिर काट कर उस के सिर को फुटबौल बना कर खेलता है क्योंकि इस फिल्म के फिल्मकार आदित्य धर ने इस फिल्म में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2016 में लागू की गई ‘नोटबंदी’ को जायज और अतिआवश्यक बताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी लेकिन दूसरी तरफ यही सैंसर बोर्ड 2025 में प्रमुख सिख मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर बनी फिल्म ‘पंजाब 95’ को बैन कर देता है.

हनी त्रेहान निर्देशित फिल्म ‘पंजाब 95’ में दिलजीत दोसांझ, अर्जुन रामपाल और सुविंदर विक्की की अहम भूमिकाएं हैं. इस के बाद अक्टूबर 2025 में सैंसर बोर्ड ने संध्या सूरी लिखित व निर्देशित तथा यूनाइटेड किंगडम, भारत, जरमनी और फ्रांस के एक अंतर्राष्ट्रीय सहनिर्माण वाली फिल्म ‘संतोष’ को बैन कर देता है. फिल्म ‘संतोष’ 97वें औस्कर अवार्ड में नामित हुई थी. उत्तरी भारत के ग्रामीण परिवेश पर आधारित इस फिल्म में शाहना गोस्वामी एक विधवा की भूमिका में है जिसे अपने दिवंगत पति की पुलिस कौंस्टेबल की नौकरी विरासत में मिलती है और वह एक दलित किशोरी की हत्या व बलात्कार की जांच में शामिल हो जाती है. इस फिल्म का विश्व प्रीमियर मई 2025 में कान्स फिल्म फैस्टिवल में हुआ था.

अब 98वें औस्कर अवार्ड के लिए नामांकित ट्यूनीशिया व फ्रांस की कौथर बेन हानिया लिखित व निर्देशित फिल्म ‘द वौयस औफ द हिंद रजब’ के प्रदर्शन पर भारतीय सैंसर बोर्ड ने पाबंदी लगा दी है. जबकि, यह फिल्म अमेरिका, वेनिस, फ्रांस, ब्रिटेन सहित कई देशों में प्रदर्शित हो चुकी है. फिल्म का विश्व प्रीमियर 3 सितंबर, 2025 को 82वें वेनिस अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के मुख्य प्रतियोगिता में हुआ, जहां इस ने ग्रैंड जूरी पुरस्कार और 6 अन्य समानांतर पुरस्कार जीते. इसे 10 सितंबर को ट्यूनीशिया में और 26 नवंबर को फ्रांस में सिनेमाघरों में रिलीज किया गया. 98वें अकादमी पुरस्कारों में इसे ट्यूनीशियाई प्रविष्टि के रूप में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए नामांकित किया गया था. 83वें गोल्डन ग्लोब पुरस्कारों में इसे सर्वश्रेष्ठ गैरइंग्लिश भाषा फिल्म के लिए भी नामांकित किया गया था.

29 जनवरी, 2024 की बात है. रेड क्रिसेंट के स्वयंसेवकों को एक आपातकालीन फोन आता है और गाजा में गोलीबारी के बीच एक कार में फंसी 6 साल की बच्ची मदद की गुहार लगाती है. उसे फोन पर बनाए रखने की कोशिश करते हुए वे स्वयंसेवक एम्बुलैंस को उस के पास पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं. उस का नाम हिंद रजब था. यह अलग बात है कि बाद में उसी कार में हिंद रजब का मृत शरीर गोलियों से छलनी किया हुआ पाया गया था. यह महज संयोग ही है कि हिंद रजब की हत्या की इस कहानी पर 2024 में डच लघु फिल्म ‘क्लोज योर आइज हिंद’, जौर्डन की लघु फिल्म ‘हिंद अंडर सीज’ तथा कौथर बेन हानिया निर्देशित ट्यूनीशियन फिल्म ‘द वौयस औफ हिंद रजब’ के फिल्मांकन हुए और ये तीनों फिल्में 2025 में अलगअलग माह में रिलीज हुईं.

जी हां, इंटरनैशनल पुरस्कारों से पुरस्कृत ट्यूनीशियान फिल्मकार कौथर बेन हानिया लिखित व निर्देशित हृदय विदारक डौक्यूड्रामा फिल्म ‘द वौयस औफ हिंद रजब’ गाजा पट्टी पर इजराइल के आक्रमण के दौरान गाजा में इजराइली सेना की गोलाबारी के बीच हिंद रजब अपने परिवार के साथ एक कार में फंस गई थी. उस के परिवार के अन्य सदस्य मारे जा चुके थे और वह अकेली जीवित बची थी. हिंद रजब ने अपनी मदद के लिए रेड क्रिसेंट के आपातकालीन स्वयंसेवकों को फोन किया था. उसे बचाने के लिए भेजे गए 2 पैरामेडिक्स भी रास्ते में मारे गए और 12 दिनों बाद हिंद का शव गोलियों से छलनी उसी कार में मिला था.

यह फिल्म इजराइली रक्षाबलों द्वारा 6 वर्षीया फिलिस्तीनी बच्ची हिंद रजब की हत्या के समय रेड क्रिसेंट की प्रतिक्रिया का चित्रण करती है. फिल्मकार ने 70 मिनट की अवधि वाली मौलिक औडियो रिकौर्डिंग का भी इस फिल्म में उपयोग किया है. इस में साजा किलानी, मोताज मलहीस, आमेर हलेहल और क्लारा खौरी ने अभिनय किया है. लेकिन भारत में इस फिल्म के रिलीज पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. फिल्म के भारतीय वितरक मनोज नंदवाना ने मीडिया को जो कुछ बताया, उस के अनुसार, सैंसर बोर्ड ने मौखिक रूप से फिल्म को प्रमाणपत्र देने से मना कर दिया है. कथित तौर पर बोर्ड का मानना है कि यह फिल्म ‘अत्यधिक संवेदनशील’ है और इस के प्रदर्शन से भारत और इजराइल के राजनयिक संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. सैंसर बोर्ड ने यह निर्णय उस वक्त लिया था जब फरवरी माह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजराइल के दौरे पर थे. उस वक्त इस फिल्म को 6 मार्च को भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज किया जाना था. इस फिल्म के वितरक मनोज नंदवानी ने सैंसर बोर्ड के इस कृत्य के खिलाफ फिलहाल कानूनी लड़ाई लड़ने से परहेज किया है क्योंकि उन के पास कोई लिखित आदेश नहीं है.

सैंसर बोर्ड की बात सुन कर लोगों को हंसी आ रही है. अहम सवाल यह है कि क्या एक 6 साल की बच्ची की त्रासदी भी अब ‘डिप्लोमैसी’ के तराजू पर तोली जाएगी? क्या कला को देशों के रिश्तों के चश्मे से देखना सही है? फिल्म की निर्देशक का कहना है कि, ‘यह फिल्म किसी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि युद्ध के खिलाफ है.’ निर्देशक कौथर बेन हानिया का मानना है कि यह महज एक फिल्म नहीं, बल्कि उन्होंने इसे ‘फौरेंसिक साक्ष्य’ की तरह पेश किया है. यों भी ट्यूनीशियाई फिल्मकार कौथर बेन हानिया अपनी फिल्मों में हकीकत और कल्पना के धुंधलेपन को दिखाने के लिए जानी जाती हैं.

भारतीय सैंसर बोर्ड के इस फैसले की चारों तरफ आलोचना हो रही है. भारत में फिल्म ‘संतोष’ की ही भांति इस फिल्म पर लगे ‘अघोषित प्रतिबंध’ ने ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर नई बहस छेड़ दी है. वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर ने इसे ‘अपमानजनक’ करार दिया और कहा कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का उपयोग अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने के लिए नहीं किया जाना चाहिए. इसी के साथसाथ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के हनन के रूप में आलोचना की है. फिल्म ‘द वौयस औफ हिंद रजब’ न केवल एक सिनेमाई रचना है बल्कि एक वैश्विक मानवाधिकार मुद्दा बन चुकी है. अब लोग सैंसर बोर्ड पर एक खास राजनीतिक नैरेटिव को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं.

सैंसर बोर्ड के लिया धारा 5बी

सैंसर बोर्ड के पास एक ब्रह्मास्त्र है, गाइडलाइन की धारा 5बी, जो कहती है कि अगर कोई फिल्म ‘भारत की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा या विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के खिलाफ जाती है, तो उसे सर्टिफिकेट देने से मना किया जा सकता है.’ लेकिन कई जानकारों का मानना है कि यह नियम तब लागू होता है जब फिल्म किसी देश के खिलाफ जहर उगल रही हो या झूठ फैला रही हो. ‘द वौयस औफ हिंद रजब’ तो एक 6 साल की बच्ची की सच्ची चीख है, जो रेड क्रिसेंट के रिकौर्ड्स में दर्ज है. क्या एक मासूम की मौत का सच दिखाना किसी देश का अपमान है? या फिर हमारी ‘डिप्लोमैसी’ इतनी कमजोर है कि एक फिल्म से टूट जाएगी? कितनी अजीब बात है कि धारा 5बी का उपयोग ‘मैत्रीपूर्ण संबंधों’ को बचाने के बजाय ‘असुविधाजनक सच’ को छिपाने के लिए किया जा रहा है. यदि एक औस्कर नौमिनेटेड फिल्म, जोकि अमेरिका सहित विश्व के तमाम देशों में रिलीज हो चुकी हो, वह भारत के सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच पा रही. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय सिनेमा की आजादी को लकवा मार गया है.

सुप्रीम कोर्ट का कथन

सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि, “किसी फिल्म से तनाव हो सकता है, इस शंका के चलते अभिव्यक्ति की आजादी को नहीं दबाया जा सकता.’’

हौलीवुड मे तमाम फिल्मकार व कलाकार इस फिल्म के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. जी हां, ब्रैड पिट और जोकिन फीनिक्स जैसे हौलीवुड के दिग्गजों ने इस फिल्म को सिर्फ इसलिए सपोर्ट किया क्योंकि वह इस के ‘सिनेमाई साहस’ से प्रभावित थे. उन्होंने इसे ‘राजनीति से परे एक मानवीय त्रासदी’ की संज्ञा दी है. जोकिन फीनिक्स, जो खुद मानवाधिकारों के लिए मुखर रहते हैं, ने कहा कि, ‘यह फिल्म ‘इंसानियत के नाम पर एक जरूरी दस्तावेज है.’

इस मसले में अहम बात यह है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड लिखित में कुछ देने को तैयार नहीं है जिस के चलते फिल्म वितरक के पास अदालत का दरवाजा खटखटाने का विकल्प ही नहीं है. पर यह तय है कि भारतीय सिनेमाप्रेमी एक 6 साल की बच्ची की त्रासदी के सच को नहीं जान सकता. डबिंग नहीं बल्कि असली औडियो हिंद रजब और रेड क्रिसेंट की 70 मिनट की बातचीत की औडियो रिकौर्डिंग के कुछ संवादों से आप भी रूबरू होइए. जान लें कि फिल्म की निर्देशक कौथर बेन हानिया ने किसी अभिनेत्री से ‘हिंद रजब’ के संवादों की डबिंग नहीं कराई, बल्कि हिंद रजब की असली फोन रिकौर्डिंग्स का औडियो ही इस्तेमाल किया है. कुछ संवाद ये हैं-

हिंद रजब कहती है- चाचा, क्या आप मुझे लेने आ रहे हैं? मुझे बहुत डर लग रहा है.’’

औपरेटर जवाब देता है- हां बेटा, हम आ रहे हैं. बस, थोड़ा और रुक जाओ. क्या आप के पास कोई बड़ा है?

हिंद रजब (रोते हुए कहती है)- नहीं, सब सो गए हैं. उन के शरीर से खून निकल रहा है. चाचा, टैंक मेरे बहुत पास है, वह मुझे देख रहा है.

औपरेटर- डरो मत बेटा. बस, नीचे झुक जाओ.

हिंद रजब- मैं मम्मी को परेशान नहीं करना चाहती, इसलिए अपना खून हाथ से पोंछ रही हूं. क्या आप जल्दी आएंगे?

ये शब्द नहीं, एक मरती हुई मासूमियत की गवाही हैं

फिल्म की कहानी का सार

कौथर निर्देशित डौक्यूड्रामा फिल्म ‘द वौयस औफ हिंद रजब’ की दुखद कहानी 29 जनवरी, 2024 की घटना बयां करती है जब हिंद रजब गाजा पट्टी में इजराइली रक्षाबलों के टैंक हमले में अपने परिवार के सदस्यों के साथ मारी गई थी. कथित दोषियों की पहचान कर्नल/लैफ्टिनैंट कर्नल बेनी अहारोन (401वीं बख्तरबंद ब्रिगेड के कमांडर), लैफ्टिनैंट कर्नल डैनियल एला (52वीं बख्तरबंद बटालियन के कमांडर), मेजर शान ग्लास (वैम्पायर एम्पायर कंपनी के कमांडर) और टैंक चालक दल के सदस्य इटे कुकिएरकाफ के रूप में हुई. कार पर हुए हमले में उन के चाचा इयाद रजब, चाची हना अलआघा और 3 चचेरे भाई (रमी, डायना, रकन) की मौके पर ही मौत हो गई.

हिंद रजब बुरी तरह घायल हो गईं और फिलिस्तीनी रेड क्रिसेंट सोसाइटी के बचाव दल से फोन पर संपर्क में रहीं. उन की चचेरी बहन लयान हमादेह भी कथित तौर पर आईडीएफ के टैंक हमले में मारी गईं, जिस में करीब 335 गोलियां लगीं. रेड क्रिसेंट के 2 स्वयंसेवक यूसुफ और अहमद उसे बचाने आए लेकिन इजराइली सैनिकों ने उन्हें भी मार डाला. हिंद रजब 3 घंटे तक फोन पर बात करती रही. 12 घंटे बाद उसी कार में हिंद रजब का गोलियों से छलनी मृत शरीर मिला. बाद में उसके चाचा ने आर्मेनिया और जरमनी में न्याय की गुहार लगाई थी, जिस के चलते इस दुखद घटना से पूरा विश्व वाकिफ हो सका.

निर्देशक ने लौटाई अवार्ड की ट्रौफी

निर्देशक कौथर बेन हानिया को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए. कौथर बेन हानिया को हक की लड़ाई लड़ना भी आता है. उन की बगावत तब दिखी जब उन्होंने बर्लिन फिल्म फैस्टिवल में ‘सिनेमा फौर पीस’ का अवार्ड लेने से मना कर दिया. उन्होंने कहा, ‘‘शांति कोई परफ्यूम नहीं है जिसे हिंसा पर छिड़क दिया जाए ताकि सत्ता सुरक्षित महसूस करे. न्याय के बिना शांति संभव नहीं है.’’ उन्होंने अवार्ड वहीं छोड़ दिया क्योंकि मंच पर एक इजराइली जनरल को भी सम्मानित किया जा रहा था.

सैंसर बोर्ड द्वारा फिल्म बैन किए जाने पर बेन हानिया उवाच

जब कौथर बेन हानिया को पता चला कि भारत में उन की फिल्म को ‘भारत-इजराइल संबंधों’ के बहाने रोका जा रहा है, तो उन्होंने तीखा तंज कसा. उन्होंने भारत के प्रति अपने प्रेम को याद करते हुए जो कुछ कहा वह हर सिनेमाप्रेमी को सोचने पर मजबूर कर देगा. कौथर बेन हानिया ने कहा है- ‘‘मैं भारत को प्यार करते हुए बड़ी हुई हूं. बौलीवुड मेरे बचपन का हिस्सा था. एक समय तो मैं खुद को भारतीय मूल का होने की कल्पना करती थी ताकि खास महसूस कर सकूं. लेकिन आज मेरा सवाल है, ‘क्या ‘दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र’ और ‘मध्यपूर्व के इकलौते लोकतंत्र’ के बीच का हनीमून इतना नाजुक है कि एक फिल्म उसे तोड़ सकती है?’’

कौन हैं कौथर बेन हानिया

सिदी बौज़िद में जन्मी कौथर बेन हानिया की शिक्षा ट्यूनीशिया के इकोले डेस आर्ट्स एट डू सिनेमा (ईडीएसी) और पेरिस में ला फेमिस और सोरबोन में हुई. उन्होंने 2002 से 2004 तक ट्यूनिस स्कूल औफ आर्ट्स एंड सिनेमा में अध्ययन किया. इस प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने कई लघु फिल्मों का निर्देशन किया, जिन में से एक, ला ब्रेचे, को काफी सराहना मिली. 2003 में उन्होंने यूरोमेड द्वारा वित्तपोषित एक फीचर फिल्म लेखन कार्यशाला में भी भाग लिया. 2004 में उन्होंने ला फेमिस में अपना प्रशिक्षण जारी रखा, पहले ग्रीष्मकालीन विश्वविद्यालय में और फिर 2004-2005 में.

2006 में उन्होंने मोहसेन बेन हानिया की लघु कहानी ले ज्यून होम एंड लश्एनफैंट एट ला क्वेश्चन से प्रेरित एक और लघु फिल्म, मोई, मा सोउर एट ला चोज का निर्देशन किया. इस के बाद उन्होंने 2007 तक अल जजीरा डौक्यूमैंट्री चैनल के लिए काम किया. फिर उन्होंने कई फीचर फिल्मों का निर्देशन किया, जिन्हें विभिन्न फिल्म समारोहों में पुरस्कार मिले. साथ ही, 2007-2008 में सोरबोन नोवेल विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की. उन की पहली फीचर फिल्म ‘ले चल्लात दे ट्यूनिस’ थी, जो 2014 में रिलीज हुई थी. यह एक व्यंग्यात्मक लहजे वाली सामाजिक व्यंग्य फिल्म थी, जिस में बाद की फिल्मों की तरह ही महिलाओं और पुरुषों के बीच संबंधों को दर्शाया गया था.

उन की 2017 की फिल्म ‘ब्यूटी एंड द डाग्स’ को 2017 कान फिल्म फैस्टिवल में ‘अनसर्टेन रिगार्ड’ श्रेणी के लिए चुना गया था. इसे 91वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए ट्यूनीशियाई प्रविष्टि के रूप में भी चुना गया था, लेकिन इसे नामांकित नहीं किया गया. 2018 में फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फ्रांसीसीभाषी फिल्म के लिए ल्यूमियर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था. 2020 में उन की फिल्म ‘द मैन हू सोल्ड हिज स्किन’ का विश्व प्रीमियर 77वें वेनिस अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के ओरिजोंटी अनुभाग में हुआ था. इसे सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए ट्यूनीशियाई प्रविष्टि के रूप में भी चुना गया था और 93वें अकादमी पुरस्कारों में नामांकित किया गया था, जिस से यह औस्कर के लिए नामांकित होने वाली पहली ट्यूनीशियाई फिल्म बन गई.

2023 में उन की डौक्यूमैंट्री ‘फोर डौटर्स’ को कान फिल्म फैस्टिवल की मुख्य प्रतियोगिता के लिए चुना गया, जहां इस ने ‘लश्ओइल डीश्ओर’ और ‘फ्रांकोइस शैले पुरस्कार जीता. 49वें सीजर पुरस्कार समारोह में इसे सर्वश्रेष्ठ डौक्यूमैंट्री फिल्म का सीजर पुरस्कार मिला. फिल्म ने महिला सशक्तीकरण के लिए सिनेमा फौर पीस पुरस्कार जीता. इसे 96वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ डौक्यूमैंट्री फीचर के लिए भी नामांकित किया गया था. 2025 में उन के डौक्यूड्रामा ‘द वौयस औफ हिंद रजब’ को 82वें वेनिस अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में 23 मिनट तक स्टैंडिंग ओवेशन मिला, साथ ही, इस ने ग्रैंड जूरी पुरस्कार जीता. इस फिल्म को 98वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर के लिए भी नामांकित किया गया था. CBFC controversy

 

Religious Conspiracy: अविमुक्तेश्वरानंद के बहाने ऊंचे वर्णों की लड़ाई 

Religious Conspiracy: कोई भी दावे से यह नहीं कह सकता कि ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने बटुकों का यौनशोषण किया है या नहीं. हकीकत हर कोई समझ रहा है कि इस के पीछे ब्राह्मणों की अपनी वर्णगत श्रेष्ठता की शाश्वत लड़ाई है. मुद्दत बात एक बार फिर शैव और वैष्णव मतों के मतभेद उजागर हुए हैं. कानूनी फैसला जो भी आए लेकिन इस विवाद ने सनातनी साधुसंतों के अहं और स्वार्थ फिर उधेड़ कर रख दिए हैं.

अविमुक्तेश्वरानंद अभिमन्यु की तरह घिर गए हैं. यह खेल कहां जा कर और कैसे खत्म होगा, इस का अंदाजा लगाना मुश्किल है. यह ड्रामा या कहानी, कुछ भी कह लें, शुरू से ही किसी मसालेदार हिंदी फिल्म से कम नहीं जिस में धार्मिक और राजनीतिक षड्यंत्रों सहित रहस्य, रोमांच, हिंसा, मारधाड़, खेमेबाजी, पुलिस, अदालत, कानून और सैक्स वगैरह सब ठुंसे हुए हैं. इस दिलचस्प कहानी को सिरे से समझने से पहले राजनीति को छोड़ उस से जुड़े एक प्रमुख किरदार, जिस के चलते कहानी में जान आई, की नाटकीय एंट्री और उस का रोल देखना मौजूं होगा.

यह पात्र आशुतोष ब्रह्मचारी उर्फ अश्विनी पांडेय है जो भगवा खेमे के चहेते वैष्णव संत रामभद्राचार्य का वैष्णव शिष्य है. उस पर बीते 8 मार्च को चलती ट्रेन में जानलेवा हमला हुआ था. उस दिन आशुतोष रीवा एक्सप्रेस ट्रेन से गाजियाबाद से प्रयागराज जा रहा था. सुबह कोई 5 बजे ट्रेन सिराथू रेलवे स्टेशन पहुंची तो एकाएक एक आदमी ने एसी कोच में आ कर उस पर उस्तरे से हमला कर दिया. हमले में आशुतोष की नाक पर चोट लगी. उस ने टौयलेट में जा कर अपनी जान बचाई.

बकौल आशुतोष पांडेय, हमलावर ने उसे जान से मारने की धमकी देते हुए यह भी कहा था कि नाक काट कर अपने गुरु के चरणों में चढ़ाऊंगा. घायल आशुतोष को प्रयागराज के काल्विन अस्पताल में भरती कराया गया जहां मरहमपट्टी के बाद उसे छुट्टी दे दी गई.

वह गुरु जिन के चरणों पर नाक चढ़ानी थी प्रसिद्द शंकराचार्य 56 वर्षीय अविमुक्तेश्वरानंद हैं जिन का असली नाम उमाशंकर उपाध्याय है. वे उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के गांव ब्राह्मणपुर के रहने वाले हैं. साल 1977 से ले कर 1982 तक गुजरात की सयाजीराव यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के बाद इधरउधर जहां से भी मिला, वे `ज्ञान` प्राप्त करते रहे. 1982 में वे काशी में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद के संपर्क में आए और 2006 में उन से दीक्षा ले ली. स्वरूपानंद ने उन का संन्यासी नाम अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती रख दिया. देखते ही देखते ही वे स्वरूपानंद के इतने चहेते हो गए कि 11 सितंबर, 2022 को स्वरूपानंद की मौत के बाद उन्हें ज्योतिर्मय पीठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया गया जिस का आधार स्वरूपानंद की कथित वसीयत थी.

हमलावर के बारे में आशुतोष ने मीडिया को बताया, “जिस किसी ने भी मुझ पर हमला किया है वह अविमुक्तेश्वरानंद के कहने पर किया है और 21 लाख रुपए के इनाम के चक्कर में किया है जिस की घोषणा अविमुक्तेश्वरानंद ने कर रखी है. इन लोगों की योजना मेरी नाक काटने की है ताकि मैं गवाही देने कोर्ट तक न पहुंच पाऊं.” बातबात में वह आदतन अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ जहर उगलते उन्हें समाजवादी पार्टी का बताता रहा.

यौनशोषण है असल मामला

इधर अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य का खेमा यह आरोप लगाता रहा कि आशुतोष ने खुद पर ही हमला कराया है. साल 2024 में आशुतोष ब्रह्मचारी एक नामालूम, गुमनाम सा पात्र था. उस के पिता राजेंद्र पांडेय शामली जिले के कांधला के थे जो बस कंडक्टर थे. उस ने साल 2022 में रामभद्राचार्य से दीक्षा ली थी और महंत आशुतोष पांडेय बन गया.

इसी आशुतोष पांडेय की रिपोर्ट पर उत्तराखंड स्थित ज्योतिर्मठ यानी जोशी मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर 21 फरवरी को पौक्सो अदालत के न्यायाधीश विनोद कुमार चौरसिया ने प्रयागराज के झूंसी पुलिस स्टेशन को आदेश दिया था कि अविमुक्तेश्वरानंद और उस के एक शिष्य मुकुंदानंद गिरी सहित 3 अज्ञात लोगों पर 2 नाबालिगों के यौनशोषण के आरोप में पौक्सो एक्ट की धाराओं 5, 6, 3, 4 (2), 16 व 17 सहित बीएनएस की धारा 351 (3) के तहत एफआईआर दर्ज की जाए. जिस का फैसला अब स्वर्ग की नहीं, बल्कि जमीन की अदालत को करना है जिस ने बीती 27 फरवरी को अविमुक्तेश्वरानंद को गिरफ्तारी से 3 सप्ताह की छूट देते सस्पैंस और गहरा दिया.

न्यायाधीश ने अपने आदेश में लिखा था कि आरोपों से गंभीर और विशिष्ट यौन उत्पीड़न का पता चलता है. बच्चों पर यौन हमलों के अपराधों, की जांच करना राज्य का वैधानिक दायित्व है. इसलिए यह अदालत इस से संतुष्ट है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 173 (4) के तहत पेश आवेदन स्वीकार किए जाने योग्य है.

आशुतोष पांडेय के अनुसार, प्रयागराज में हुए माघ मेले के दौरान दोनों पीड़ित बटुक उस के पास आए और अपने यौनशोषण की कहानी सुनाई, जिस में उन्होंने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर यौनशोषण का आरोप लगाया था. इस कहानी से आशुतोष `व्यथित‘ हो गया और प्रयागराज पुलिस से संपर्क किया लेकिन कोई रिस्पौंस उसे नहीं मिला.

जब पुलिस न सुने तो सीधे अदालत का दरवाजा खटखटा कर सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत भी इंसाफ मांगा जा सकता है. आशुतोष ने पुलिस कार्रवाई के लिए पौक्सो अदालत का रुख किया. अदालत ने 21 फरवरी को फैसला सुनाया. इस से पहले अदालत ने अविमुक्तेश्वरानंद से भी जवाब मांगा था जो उन्होंने दे दिया था.

यह मामला मीडिया से लोगों तक पहुंचा तो लोग दोफाड़ हो गए. उन में से एक पक्ष कह रहा था कि अविमुक्तेश्वरानंद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और खासतौर से उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पंगा नहीं लेना चाहिए था. अपने बड़बोलेपन के चलते उन्होंने मुसीबत मोल ले ली, निकल गई सारी हेकड़ी एक झटके में. 27 फरवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस सुरेंद्र कुमार सिन्हा की बैंच ने अविमुक्तेश्वरानंद की अग्रिम जमानत की याचिका पर उन्हें अंतरिम राहत दे दी, यानी, अविमुक्तेश्वरानंद को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा.

शंकराचार्य हैं भी और नहीं भी

इस से इनकार नहीं किया जा सकता कि संत समाज को 2022 की ज्योतिर्मठ पीठ की गददी  अविमुक्तेश्वरानंद को देने की बात रास नहीं आई थी. सब से पहले संन्यासी अखाड़े ने उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया. 21 सितंबर, 2022 को स्वामी वासुदेवानंद ने अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक रोकने के लिए याचिका दायर कर 16 अक्तूबर, 2022 को स्टे ले लिया. गोवर्धनपीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने भी सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दे कर कहा था कि वे अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति से असहमत हैं. तब से यह कोई नहीं समझ पा रहा या तय कर पा रहा कि वे दरअसल शंकराचार्य हैं भी या नहीं. उसी समय अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने भी इस नियुक्ति का विरोध करते कहा था कि अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य के पद पर नियुक्ति में प्रक्रिया और नियमों का पालन नहीं हुआ.

शंकराचार्य की नियुक्ति असल में काल्पनिक स्वर्ग के काल्पनिक कैलाश पर्वत पर बैठे कोई शिव शंकर नहीं करते बल्कि उन से डायरैक्ट कनैक्ट होने का दावा करने वाले नीचे चारों मठों के चांदी के सिंहासनों पर बैठे हाड़मांस के जीवित मानव शंकराचार्य करते हैं. किसी भी एक मठ का शंकराचार्य बनने के लिए बाकी 3 मठों के शंकराचार्यों की सहमति जरूरी होती है. गुरुशिष्य परंपरा के तहत गुरु जिस को नौमिनेट कर जाए, गद्दी उस के ही हिस्से में आती है.

एक बात जो हर कोई बेहतर जानता है कि किसी भी पीठ का शंकराचार्य बनने के लिए सब से बड़ी और अहम योग्यता उम्मीदवार का ब्राह्मण होना है. किसी गैरब्राह्मण को शंकराचार्य बनने का हक नहीं. इस के बाद की योग्यताएं हैं- उम्मीदवार का दंडधारी संन्यासी होना, आजीवन ब्रह्मचारी और वैरागी होना, सभी प्रमुख हिंदू धर्मग्रंथों मसलन वेद, पुराण, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद भागवदगीता सहित अद्वैत वेदांत और शास्त्रार्थ में महारथ हासिल होना. ये व्यवस्थाएं 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य अपने रचे ग्रंथ महानुशासनम में कर गए हैं.

उत्तराखंड में ज्योतिर्मठ पीठ बद्रीधाम के निकट है. इस के पास करोड़ों की जमीन है और जमीन के मुक़दमे मानवनिर्मित अदालतों में चल रहे हैं. एक मुकदमा मंदसौर जिले की कृषिभूमि का है जो भानपुरा अदालत में चल रहा है. 1953 से ही इस पीठ का शंकराचार्य कौन हो, इस पर विवाद चल रहा है भारतीय संविधान द्वारा नियुक्त जजों की अदालत में.

शंकराचार्य बनने की मारामारी के कई मुकदमे अदालतों में चले हैं जिन में से ज्योतिर्मठ की तो माया ही अलग है. 1953 में इस पीठ के शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती की मौत के बाद उन की वसीयत पर 2 गुट बन गए थे जिन में से एक खुद स्वरूपानंद का गुट था तो दूसरा शांतानंद का था. यह कानूनी विवाद अभी भी लंबित है और अविमुक्तेश्वरानंद का विवाद उसी का विस्तार है. एतराज जताने वाले धर्मगुरुओं की एक दलील यह भी है कि स्वरूपानंद ने अपने जिंदा रहते कभी सार्वजनिक रूप से अपना कोई वारिस घोषित नहीं किया था और अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक एकतरफा था. यह विवाद लोग भूल चले थे या यों कहें कि किसी की दिलचस्पी इस में नहीं रह गई थी लेकिन बाल यौनशोषण कांड में जो गड़े मुर्दे उखड़े उन में से एक यह भी था.

वर्ण और गाय हैं फसाद की जड़

अब कहने को ही सही, अविमुक्तेश्वरानंद ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य हैं और अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जाते हैं जो अकसर भगवा गैंग के खिलाफ होती है. चूंकि वे खुद भी भगवाधारी हैं इसलिए इस बात पर हर किसी को स्वाभाविक हैरानी होती है कि आखिर इस धर्मयुद्ध, जो अब अदालत में है, की वजह क्या है. जब सभी का मकसद हिंदू राष्ट्र और मनु स्मृति वाली वर्णव्यवस्था थोपना ही है तो मुद्ददत से खेमेबाजी और जूतमपैजार क्यों. ऐसा इसलिए क्योंकि धार्मिक लीडरी भी उतनी ही महत्त्व की होती है जितनी राजनीतिक, बिजनैस की और माफिया गैंगों की. त्रेता युग में भी विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच मतभेद थे. यह पौराणिक ग्रंथों में भी बारबार दोहराया गया है. फौरीतौर पर विश्वामित्र ही वह ऋषि थे जिन्होंने बूढ़े दशरथ से राक्षसों के खात्मे के लिए उन के टीनएजर बेटों राम और लक्ष्मण को मांगा था और फिर उन का विवाह भी करा डाला था.

विश्वामित्र-वशिष्ठ विवाद की असल वजह उन के अपने अहंकार और स्वार्थ हुआ करते थे. विश्वामित्र और वशिष्ठ का मनमुटाव और दुश्मनी की पहली वजह वर्ण थी. हिंदू वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण का कर्तव्य वेद ज्ञान, यज्ञ, तंत्रमंत्र और तपस्या वगैरह कर राजा को निर्देश और आदेश देना होता था कि वे कैसे राजकाज चलाएं. क्षत्रियों के जिम्मे शासन करना, अपने राज्य सहित तथाकथित प्रजा की रक्षा करना और सजा देना वगैरह के काम हुआ करते थे. उत्पादन और निर्माण दोनों में इन दोनों महान जातियों का कोई लेनादेना था तो पौराणिक ग्रंथों में जिक्र नहीं है. वह काम तो वैश्य और शूद्र का था.

इन दोनों वर्णों की घोषित जिम्मेदारी यह थी कि वे इन दोनों ऊपर के श्रेष्ठ वर्णों की गुलामी ढोते रहें और कभी धर्म आधारित शासन के लिए चुनौती पेश न करें. तब भी आज की तरह ग्रंथों की कहानियों के अनुसार, अकसर यह सवाल सिर उठाता रहता था कि श्रेष्ठ कौन- ब्राह्मण या क्षत्रिय. लड़ाई या विवाद इस बात को ले कर भी होते थे कि श्रेष्ठता तपस्या वगैरह से मानी जाए या ताकत और हथियार चलाने की काबिलीयत से मानी जाए और इस से भी अहम मुद्दे की बात यह कि राजा धर्म के अधीन होता है या धर्म राजा के अधीन होता है. यानी, राजा को अपने मुताबिक नचाए कौन- ब्राह्मण या क्षत्रिय.

आज भी लोचा यही है. कहानी को सहूलियत से समझने से पहले यह समझ लें कि योगी आदित्यनाथ क्षत्रिय हैं जिन की तरफ से मोरचा रामभद्राचार्य ने संभाल रखा है. यानी, यह विवाद ब्राह्मण बनाम ब्राह्मण है क्योंकि अविमुक्तेश्वरानंद भी ब्राह्मण हैं. असल लड़ाई मतभेद और मनमुटाव इन्हीं दोनों के बीच है. बाकी सब तो आशुतोष ब्रह्मचारी सरीखे सहायक पात्र भर हैं लेकिन उन की भूमिका को कमतर नहीं आंका जा सकता.

विश्वामित्र क्षत्रिय थे और वशिष्ठ ब्राह्मण थे. अव्वल तो यह एक वाक्य ही मौजूदा कहानी को समझने के लिए काफी है लेकिन इतने भर से दिलचस्पी खत्म नहीं होती बल्कि और बढ़ती है. विश्वामित्र तो मूलतया राजा थे जैसे कि आमतौर पर क्षत्रिय हुआ करते थे. कान्यकुब्ज के विश्वामित्र के पिता गाधि वहां के राजा थे, उन के बाद परिवारवाद के तहत कौशिक को गद्दी मिली. एक दिन विश्वामित्र अपने राज्य से कुछ किलोमीटर दूर शिकार करने का अपना शौक पूरा करने अयोध्या की तरफ निकल पड़े. वहां उन्हें वशिष्ठ का आश्रम दिखा. वशिष्ठ तब के पहुंचे हुए ऋषि थे जो सीधे ब्रह्मा के मन से पैदा हुए माने जाते थे. यानी, `नौनबायोलौजिकल` थे. वे सप्त ऋषियों में से एक थे.

वशिष्ठ ने विश्वामित्र सहित उन के लावलश्कर की खूब आवाभगत की. उन्हें तरहतरह के जायकेदार व्यंजन खिलाए जिसे देख कर विश्वामित्र हैरान रह गए कि एक साधारण से आश्रम के ऋषि ने चंद घंटों में हजारों सैनिकों के खानेपीने का इंतजाम कैसे कर दिया. इस का राज पूछने पर वशिष्ठ ने बताया कि उन के पास एक चमत्कारीदिव्य किस्म की अनूठी गाय नंदिनी है जिस का एक नाम कामधेनु भी है. यह गाय मांगने पर सोना, चांदी, धन, दौलत अनाज कपड़े वगैरह सब मिनटों में दे देती है. इस तरह के चमत्कार की कहानियां हर धर्म की जड़ में हैं जिन से आम लोगों को भरमाया जाता है कि हमारे कहने पर भगवान तुम्हारे लिए चमत्कार कर देंगे.

अब भला कौन राजा होता जो अपने राज्य में ऐसी अदभुद और चमत्कारी गाय को नहीं ले जाना चाहता. यही इच्छा या लालच विश्वामित्र के मन भी आया. सो, उन्होंने वशिष्ठ से वह गाय मांगी. वशिष्ठ ने कौशिक से कहा कि यह गाय आश्रम और धर्म की संपत्ति है और किसी रस्सी और खूंटे से नहीं बल्कि मेरे तपोबल से बंधी है. आप इसे नहीं ले जा सकते. हुआ वही जिस का डर था. कौशिक ने अपनी और अपनी सेना की ताकत के दम पर गाय हथियाने की कोशिश की. लेकिन उन्हें मुंह की खानी पड़ी क्योंकि खुद कामधेनु ने, कहानी के अनुसार, अपनी तपस्या के दम पर लाखों सैनिक पैदा कर दिए थे जिन्होंने क्षत्रिय कौशिक की सेना को खदेड़ दिया.

इस तरह ब्राह्मण जीत गया और क्षत्रिय हार गया. इस हार से बेइज्ज्त और व्यथित हुए कौशिक ने ब्राह्मणत्व को बतौर चुनौती लेते हुए विश्वामित्र बनने के लिए, ब्रह्मतेज हासिल करने के लिए बेसिरपैर की पौराणिक कहानी के अनुसार हजारोंलाखों वर्षों तक तपस्या की और बाद में ब्रह्मऋषि कहलाए. उन की घनघोर तपस्या से इंद्र का सिंहासन, जो हर कभी डोलने के लिए कुख्यात था, एक बार फिर डोल उठा था. इसलिए उस ने तपस्या भंग करने को स्वर्ग की मेनका नाम की अप्सरा पृथ्वी पर भेजी थी जिस ने विश्वामित्र  की तपस्या भंग कर भी दी थी और दोनों से शकुंतला नाम की एक बेटी हुई.

कौशिक फिर तपस्या करने लगे. तपस्या के दम यानी तपोबल से विश्वामित्र इतने सिद्ध हो गए थे कि उन्होंने राम और दशरथ के एक पूर्वज त्रिशंकु के लिए एक नया स्वर्ग ही बना कर उस के सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा पूरी कर दी थी. जबकि वशिष्ठ इस के खिलाफ थे कि कोई शरीर सहित स्वर्ग जाए. इन वजहों के चलते देवताओं, जो अधिकतर ब्राह्मण ही होते थे, ने उन्हें ब्रह्मर्षि की पदवी दे दी थी लेकिन वशिष्ठ ने इसे बहुत बाद में मान्यता दी थी.

इस कहानी को गढ़ने का मकसद भले ही नएपुराने लेखक, जिन्हें टीकाकार कहा जाता है, कहानी को सत्ता, धर्म और सामाजिक संतुलन का प्रतीक बताते रहें, लेकिन हकीकत में यह ब्राह्मण को क्षत्रिय से श्रेष्ठ साबित करने लिखी गई थी. लिखने वालों ने विश्वामित्र को ब्रह्मऋषि की उपाधि दे कर यह भी जता दिया कि क्षत्रिय भी कम नहीं जो अपनी पर उतारू हो आएं तो तपस्या कर, वेदपुराण पढ़ कर ब्राह्मणत्व को हासिल कर सकते हैं. साथ ही, राजा भी बने रह सकते हैं, जैसे कि योगी आदित्यनाथ हैं.

क्या यह उसी का दोहराव है

इस पौराणिक कहानी का अविमुक्तेश्वरानंद की मौजूदा हालत से मेल देखा जाए तो कहीं न कहीं फसाद में कामधेनु गाय और वर्ण दोनों हैं. अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे यौनशोषण के आरोपों का सच जब सामने आएगा तब आएगा लेकिन इन आरोपों के चलते घरघर यह चर्चा भी रही कि वे हिंदुत्व के मद्देनजर मुद्दे तो तुक के उठा रहे थे लेकिन अब फंसे हुए हैं और निरर्थक मुकदमों में उलझे हैं. अविमुक्तेश्वरानंद ने एक नहीं, बल्कि दर्जनों बार सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया था कि नरेंद्र मोदी और भाजपा गौरक्षा के अपने वादे और दावे से मुकरते सनातन धर्म और सनातनियों से विश्वासघात व उन की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं.

इस से कटटर सनातनियों में अच्छा मैसेज नहीं जा रहा था और भगवा गैंग खुद को असहज भी महसूस कर रहा था. क्योंकि आरोप एक शंकराचार्य लगा रहा था. अविमुक्तेश्वरानंद की इन बातों का सार यह है कि जो नेता वोट के लिए गाय की पूजा करते हैं वही सरकार चलाने के दौरान डौलर के लालच में बीफ निर्यात को बढ़ावा देने का लाइसैंस देते हैं.

घुसपैठियों के भाजपा के प्रिय मुद्दे पर उन्होंने दोटूक कहा था कि सरकार इस पर नाकाम साबित हुई है. यह उस की सुरक्षा व्यवस्था की विफलता है. ऐसा कोई मुद्दा या सरकार का फैसला नहीं है जिस पर अविमुक्तेश्वरानंद ने मोदी सरकार को बख्शा हो. वक्फ संशोधन बिल को शिगूफा बताते इसे उन्होंने मुसलिमों के लिए `सौगात ए मोदी` बताया था  जिस से हिंदू समाज को कोई लाभ नहीं है.

भगवा गैंग की इमेज बिगड़ रही थी लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद को रोका कैसे जाए, यह किसी हिंदूवादी को समझ नहीं आ रहा था. हालांकि, इस से भाजपा के वोटों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा था.

मोदी ने किया मैनेज

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अपनी बातों और बयानों का कोई असर न होते देख भाजपा की तरफ झुकने लगे थे जो पहले से झुकेझुकाए रामभद्राचार्य जैसे वैष्णव संतों को रास नहीं आ रहा था. क्योंकि राममंदिर की प्रतिष्ठा के मद्देनजर शैव संप्रदाय के मानने वाले शंकराचार्य भी सक्रिय हो उठे थे. 22 जनवरी, 2024 की प्राणप्रतिष्ठा के ठीक एक दिन पहले 21 जनवरी, 2024 को अविमुक्तेश्वरानंद ने मीडिया के सामने जम कर नरेंद्र मोदी की तारीफ की थी तो हर कोई हैरान रह गया था कि अब यह क्या नया नाटक है जो शंकराचार्य कल तक मोदी की छीछालेदार करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे वे उन की शान में कसीदे क्यों गढ़ रहे हैं.

इस दिन अविमुक्तेश्वरानंद का कहना था कि सच्चाई यह है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से हिंदुओं का स्वाभिमान जाग गया है. यह छोटी बात नहीं है. हम ने कई बार कहा है कि हम मोदीविरोधी नहीं बल्कि मोदी के प्रशंसक हैं.

असल में इस विरोधाभास की वजह शैव और वैष्णवों की सदियों पुरानी लड़ाई और मतभेद भी थे जो सदियों पहले ही खत्म भी हो चुके थे, लेकिन कहने को ही हुए थे, राममंदिर प्राणप्रतिष्ठा के दौरान दोनों ही संप्रदायों के मठाधीश चाह रहे थे कि राजा उन्हें पूछे और पूजे, दूसरे को नहीं. जो सनातनी यह प्रचार करते फिरते हैं कि इन दोनों संप्रदायों के बीच अब कोई मतभेद नहीं हैं उन्हें अविमुक्तेश्वरानंद के इस बयान पर गौर जरूर करना चाहिए, `अगर राममंदिर रामानंद संप्रदाय का है तो इसे उन्हें सौंप देना चाहिए. चारों पीठों के शंकराचार्यों को इस से कोई रागद्वेष नहीं है. लेकिन शास्त्रसम्मत विधि का पालन किए बिना मूर्ति स्थापित किया जाना सनातनी जनता के लिए उचित नहीं है.`

दोफाड़ संत समाज

चारों पीठों के शंकराचार्यों का `राग द्वेष` खुल कर 22 जनवरी, 2024 को ही सामने आ गया था जब शादी के नाराज फूफाओं की तरह इन में से एक भी प्राणप्रतिष्ठा समारोह में उपस्थित नहीं हुआ था. इस पर जम कर वादविवाद और आरोपप्रत्यारोप संतों के बीच हुए थे. शास्त्र विधि और धर्म सम्मत न होने के शंकराचार्यों के आरोपों पर श्री रामजन्म भूमि तीर्थ ट्रस्ट ने दोटूक कह दिया था कि सबकुछ धर्मसम्मत है. यानी, ये शंकराचार्य सनातन धर्म के विधिविधान वगैरह नहीं जानते.

इस फूट और बैर का अविमुक्तेश्वरानंद पर लगे ताजे गंभीर आरोपों से बड़ा और अहम कनैक्शन यह है कि आशुतोष ब्रह्मचारी वैष्णव संप्रदाय के संत रामभद्राचार्य का शिष्य है और इस मसले पर संत समाज ही दोफाड़ हो गया है. एक खेमा अविमुक्तेश्वरानंद को साजिश का शिकार मानता है तो दूसरा उन्हें नसीहत, जो असल में धौंस है. इन में रामभद्राचार्य का नाम अहम है जो राममंदिर की प्राणप्रतिष्ठा के बाद से ही अविमुक्तेश्वरानंद पर हमलावर रहे हैं.

विवाद माघ मेले का

इस साल का प्रयागराज का माघ मेला बेहद विवादित रहा था क्योंकि मोनी अमावस्या पर अविमुक्तेश्वरानंद की रथयात्रा को प्रशासन ने इजाजत नहीं दी थी जिस पर वे इतना भड़के थे कि 11 दिन के अनशन पर ही बैठ गए थे. उन का आरोप था कि पालकी शोभायात्रा प्रशासन ने जानबूझ कर रोकी है और उन के शिष्यों के साथ पुलिस ने मारपीट भी की है. बकौल अविमुक्तेश्वरानंद, ऐसा इतिहास में पहली बार हो रहा है कि शंकराचार्य को स्नान नहीं करने दिया जा रहा. देखते ही देखते यह मेला तमाशे में तबदील हो गया था. अविमुक्तेश्वरानंद को उम्मीद थी कि योगी आदित्यनाथ उन के विरोध के आगे घुटने टेक देंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सो, वे और खीझ उठे. इस मुद्दे पर आगलगाऊ और भड़काऊ न्यूज चैनल्स ने खूब वक्त दिया था. एनडीटीवी ने तो 22 जनवरी को एक लाइव डिबेट ही इस विषय पर प्रसारित कर दी थी जिस में रामभद्राचार्य और अविमुक्तेश्वरानंद आमनेसामने थे. इस बहस में दोनों जम कर एकदूसरे पर बरसे थे.

इस के पहले प्रशासन इस कोशिश में लगा रहा था कि अविमुक्तेश्वरानंद मान जाएं लेकिन जब नहीं माने तो उन्हें यह नोटिस थमा दिया कि आप शंकराचार्य हैं ही कब, लिहाजा इस पदनाम का इस्तेमाल न करें. जैसा कि ऊपर बताया गया है कि अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने न होने का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. अब लड़ाई सीधेसीधे लोकतांत्रिक दौर के वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच सिमट कर रह गई थी जिस में क्षत्रिय शासक को एक दिग्गज वैष्णव संत, जो उन्हें अपना छोटा भाई मानता है, का सहयोग और आशीर्वाद मिल गया था. इस बेमतलब की बहस की परिणति आशुतोष पांडेय द्वारा लगाए गए यौनशोषण के आरोप की शक्ल में ड्रामाई अंदाज में हुई. ये दोनों भी एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप मढ़ते रहे.

अविमुक्तेश्वरानंद इसे राजनीतिक साजिश करार देते यह कहते रहे कि यह एपस्टीन फाइल्स से जनता का ध्यान भटकाने की साजिश है. वे अपने बचाव में वकीलों सरीखी दलीलें देते रहे और आशुतोष पांडेय उन्हें पापी वगैरह कहता रहा. पीड़ित बटुकों का इंटरव्यू एक न्यूज चैनल आजतक ने प्रसारित कर दिया जिस में पीड़ित बच्चों ने खुल कर अविमुक्तेश्वरानंद और उन के शिष्यों पर यौनशोषण के आरोप लगाए. सो, हंगामा और भी बढ़ गया.

गौरतलब है कि एक वक्त में सनातनियों के धार्मिक संत करपात्री महाराज ने गौरक्षा को ले कर देशव्यापी आंदोलन छेड़ा था और देशभर के साधुसंतों का संसद तक पैदल मार्च भी करवा दिया था. 7 नवंबर, 1966 को लाखों लोगों ने संसद का घेराव किया था तब पुलिस लाठीचार्ज और गोलीबारी में लगभग 8 लोग मारे गए थे. हिंदूवादियों ने इस का जिम्मेदार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ठहराया था जिन की इमेज सनातन विरोधी बना दी गई थी. लेकिन 70 के दशक में जिस धर्मगुरु ने इंदिरा गांधी को सहारा दिया था वे स्वरूपानंद थे. वे उन धर्मगुरुओं में से थे जिन्होंने इंदिरा गांधी के आपातकाल का खुला समर्थन किया था. तब से उन पर कांग्रेसी शंकराचार्य होने का ठप्पा लग गया था क्योंकि उन के नेहरूगांधी परिवार सहित कई दिग्गज कांग्रेसी नेताओं से घनिष्ठ संबंध थे.

दरअसल, भाजपा को उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी का डर अकसर सताता रहता है. हालांकि, इस के कोई तात्कालिक माने नहीं हैं. दीर्घकालिक क्या होंगे, यह आने वाला वक्त बताएगा. लेकिन यह सनातनी ब्राह्मण – ब्राह्मण विवाद आसानी से थमेगा, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं क्योंकि इन दोनों ही धर्मगुरुओं की अपनी ठसक है, जिद है, अहं और अहंकार हैं जो त्रेतायुग से ही चले आ रहे हैं. लेकिन अब लोकतंत्र के चलते सब की डोर बहुसंख्यक वैश्यों और शूद्रों यानी पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के हाथ में है जिन के 80 फीसदी वोट तय करते हैं कि दिल्ली और लखनऊ की कुरसी पर कौन बैठेगा. इन दोनों वर्णों ने अगर पहले की तरह यह ठान लिया कि इन में से ही क्यों कोई बैठे, हम में से क्यों नहीं, तो तसवीर कुछ और होगी. Religious Conspiracy

 

औब्सेसिव पेरैंटिंग क्यों है खास

क्या है औब्सेसिव पेरैंटिंग (Obsessive Parenting)
औब्सेसिव पेरैंटिंग वह शैली है जिस में मातापिता बच्चे की पढ़ाई, गतिविधियों और भविष्य को ले कर अत्यधिक चिंतित रहते हैं. वे बच्चे के जीवन में हर स्तर पर गहरी सहभागिता निभाते हैं और उस से पूर्णता की अपेक्षा रखते हैं. इसी कारण इसे हैलिकौप्टर पेरैंटिंग भी कहा जाता है.

औब्सेसिव पेरैंटिंग के सकारात्मक प्रभाव
इस पेरैंटिंग शैली से बच्चों में अनुशासन, समयप्रबंधन और लक्ष्य के प्रति स्पष्टता विकसित होती है. निरंतर अभ्यास और मेहनत की आदत बच्चों में आत्मविश्वास जगाती है. मातापिता की सक्रिय भूमिका कई बार बच्चों को भटकने से रोकती है और उन की क्षमताओं को निखारने में सहायक बनती है.

नकारात्मक पक्ष की संभावनाएं
जब यह सजगता अत्यधिक नियंत्रण में बदल जाती है तो बच्चे की स्वतंत्रता बाधित होने लगती है. इस से निर्णयक्षमता और आत्मविश्वास में कमी आ सकती है. परफैक्शन की निरंतर अपेक्षा मानसिक दबाव बढ़ाती है, जिस से एंग्जायटी, डिप्रैशन तथा सामाजिक व भावनात्मक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं.

संतुलन क्यों है आवश्यक
पेरैंटिंग कब प्रेरणा बनती है और कब बोझ, इस अंतर को समझना आवश्यक है. मातापिता को बच्चों की रुचि पहचान कर मार्गदर्शक और सहायक की भूमिका निभानी चाहिए, न कि अपनी इच्छाएं थोपनी चाहिए. अनुशासन और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बच्चे को आत्मनिर्भर बनाता है.
विशेषज्ञों के अनुसार, संतुलित मार्गदर्शन से बच्चों में आत्मनियंत्रण, जिम्मेदारी और आत्मविश्वास विकसित होता है. परवरिश का उद्देश्य केवल सफलता नहीं, बल्कि मानसिक रूप से मजबूत और खुशहाल व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिए. सही दृष्टिकोण के साथ अपनाई गई औब्सेसिव पेरैंटिंग प्रेरणा बनती है वरना यह बच्चे को मानसिक रूप से पीड़ादायक भी बना सकती है. इसलिए आप बच्चे को सहीगलत में खुद फर्क समझना सिखाएं, बच्चे की काबिलीयत को समझें और उसे प्रोत्साहित करें, न कि अपनी इच्छाओं को उस पर थोपें.

 

State Elections: 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव-व्यक्तिपूजा से लोकतंत्र का मुकाबला

State Elections: पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं. 9 अप्रैल से 29 अप्रैल के बीच मतदान होगा और 4 मई को मतगणना है. इन चुनावों में मुकाबले में एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए मतदाताओं से वोट मांग रहे हैं तो दूसरी तरफ विपक्षी दल अलगअलग रणनीति बना कर मुकाबला कर रहे हैं. भाजपा के पास न केवल चुनाव लड़ने के साधन अधिक हैं बल्कि केंद्र सरकार में होने का मनोवैज्ञानिक लाभ भी उस के पास है.

प्रधानमंत्री के अंगूठे के नीचे काम करते चुनाव आयोग और दूसरी केंद्रीय संस्थाओं पर केंद्र सरकार के साथ मिल कर काम करने के आरोप विपक्षी दल लगातार लगा रहे हैं. एसआईआर इस में एक प्रमुख मुद्दा है जिस के जरिए ऊपर से तो वोटर लिस्ट में सुधार की बात की जा रही है जबकि इस आड़ में विपक्षियों के समर्थक वोटरों के नाम वोटरलिस्ट से हटाए जा रहे हैं, ऐसा आरोप विपक्षी दल लगा रहे हैं.
5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में एक तरफ भारतीय जनता पार्टी का भारीभरकम अमला है. व्यक्तिपूजा के नाम पर प्रधानमंत्री का चेहरा है. प्रधानमंत्री जब चुनावप्रचार करने जाते हैं तो उन के साथ भारीभरकम अमला चलता है. जिस का खर्च प्रतियात्रा 3 से 5 करोड़ रुपए के बीच आता है. यहां एक बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का अपनी पार्टी के लिए चुनावप्रचार करना चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है.

देश का संविधान आम नागरिक और किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति को एकजैसा अधिकार देता है. ऐसे में भाजपा का सदस्य होने के नाते प्रधानमंत्री को चुनाव में अपनी पार्टी के प्रचार करने का अधिकार देता है. यहां इस बात को ले कर एक शर्त रखी गई है. इस के अनुसार प्रधानमंत्री अपने पद और ताकत का इस्तेमाल कर के चुनावप्रचार करेंगे तो यह बात नियम के अनुसार नहीं है. चुनावप्रचार में प्रधानमंत्री सरकारी संपत्ति का प्रयोग नहीं कर सकते. इस का मतलब यह है कि सरकारी खर्च पर प्रचार नहीं होगा, लेकिन, ऐसा हो नहीं रहा.

चुनाव के दौरान सरकार नई योजनाओं की घोषणा, नए प्रोजैक्ट या पैसे की घोषणा नहीं कर सकती. सरकारी कार्यक्रमों में चुनावप्रचार नहीं कर सकते. सरकारी नियमकानूनों के उलट हर चुनाव में चुनाव की इस व्यवस्था का अनादर होता है. इस से पहले भी महाराष्ट्र, बिहार और हरियाणा विधानसभा चुनाव के ठीक पहले केंद्र सरकार ने कई योजनाओं के जरिए वोटरों को पैसा भेजा था जिस का सीधा असर चुनावों पर पड़ा.
पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के विधानसभा में यही होगा, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता. भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम का सहारा ले कर चुनावप्रचार करेगी.

लोकसभा चुनाव के पहले बदल दिया था नियम
2024 के लोकसभा चुनाव के पहले जनता को यह अधिकार था कि वह चुनाव संचालन नियम 1961 के नियम 93(2) (अ) के तहत चुनाव से संबंधित अन्य सभी कागजात सार्वजनिक रूप से दिखाने की मांग कर सकती थी. मोदी सरकार ने इस में बदलाव कर दिया. इस बदलाव से चुनावी नियमों के अलगअलग प्रावधानों के तहत केवल चुनावी पत्र (जैसे नामांकन पत्र आदि) ही सार्वजनिक जांच के लिए खुले रहेंगे.
उम्मीदवारों के लिए फौर्म 17-सी जैसे दस्तावेज उपलब्ध रहेंगे लेकिन चुनाव से संबंधित इलैक्ट्रौनिक रिकौर्ड और सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं रहेंगे. इस के पक्ष में सरकार ने यह बहाना बनाया कि मतदान केंद्र के अंदर सीसीटीवी फुटेज के दुरुपयोग को रोकने के लिए नियम में संशोधन किया गया है. सीसीटीवी फुटेज साझा करने से विशेष रूप से जम्मूकश्मीर, नक्सल प्रभावित जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जहां गोपनीयता महत्त्वपूर्ण है. मतदाताओं की जान भी जोखिम में पड़ सकती है.

इस नियम में संशोधन से पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 9 दिसंबर, 2023 को चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह वकील महमूद प्राचा को हरियाणा विधानसभा चुनाव से संबंधित आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए. महमूद प्राचा ने हरियाणा विधानसभा चुनाव से संबंधित वीडियोग्राफी, सीसीटीवी फुटेज और फौर्म 17-सी की प्रतियां उपलब्ध कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया था कि रिटर्निंग औफिसर के लिए जारी हैंडबुक में यह प्रावधान है कि उम्मीदवार या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा आवेदन किए जाने पर ऐसी वीडियोग्राफी उपलब्ध कराई जानी चाहिए.

याचिका का विरोध करते हुए चुनाव आयोग के वकील ने कोर्ट में कहा था कि प्राचा न तो हरियाणा के निवासी हैं और न ही उन्होंने किसी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा है. ऐसे में उन की मांग सही नहीं है. प्राचा की तरफ से कहा गया था कि चुनाव संचालन नियम 1961 के मुताबिक, उम्मीदवार और दूसरे व्यक्ति के बीच यह अंतर है कि उम्मीदवार को दस्तावेज निशुल्क दिए जाते हैं जबकि किसी अन्य व्यक्ति को इस के लिए एक निर्धारित शुल्क देना होगा. प्राचा के वकील ने कहा था कि वो निर्धारित शुल्क का भुगतान करने के लिए तैयार और इच्छुक हैं.

इस मामले में जस्टिस विनोद एस भारद्वाज ने कहा था कि चुनाव आयोग 6 सप्ताह के भीतर आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए. इस आदेश के 2 हफ्ते के भीतर केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग की सिफारिश को लागू कर दिया. जिस से मतदान के वीडियो देने की कानूनी शर्त खत्म हो जाए. इस संशोधन के बाद चुनाव आयोग की कार्यशैली पर एक और सवाल खड़ा हो गया. हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि याचिकाकर्ता को संबंधित डेटा दे दीजिए और इस आदेश के कुछ दिनों बाद कानून में यह संशोधन किया गया.

लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान भी चुनाव आयोग आरोपों और विवादों के केंद्र में था. तब चुनाव आयोग पर मतदान संबंधी आंकड़ों को देरी से जारी करने का आरोप लगा था. एक विवाद वोटिंग प्रतिशत को ले कर भी था. लोकसभा चुनाव में कुल वोटों की संख्या के बजाय वोटिंग प्रतिशत जारी किया गया. इस के अलावा ईवीएम और पोस्टल बैलेट से जुड़े सवाल भी लगातार उठते रहते हैं. चुनाव आयोग के ऐसे फैसलों से उस के प्रति लोगों का भरोसा कम हो रहा है.
चुनाव आयोग को रिप्रैजेंटेशन औफ पीपल एक्ट के तहत काम करना चाहिए लेकिन कई मौके ऐसे आए जब वो इस के तहत काम करते हुए नहीं दिखा. जब सीसीटीवी फुटेज है और चुनाव आयोग ने उसे जारी नहीं किया तो स्वाभाविक है कि लोगों के मन में संदेह पैदा हुआ. लोगों ने चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर सवाल जरूर उठाने शुरू कर दिए.

5 राज्यों के विधान सभा चुनाव
पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में टीएससी यानी तृणमूल कांग्रेस की सरकार है. ममता बनर्जी वहां मुख्यमंत्री हैं. वहां मुख्य मुकाबला भाजपा और टीएमसी के बीच है. वहां विधानसभा की 294 सीटें हैं. 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी को 215 और भाजपा को 77 सीटें मिली थी. ममता बनर्जी लगातार 3 बार से मुख्यमंत्री हैं. असम में भाजपा के हिमंत सरमा मुख्यमंत्री है. वहां विधानसभा की 126 सीटें हैं. 2021 के चुनाव में भाजपा को 60 सीटें मिली थीं. मुख्य विपक्षी कांग्रेस को वहां 29 सीटें ही मिली थीं. भाजपा के हिमंत सरमा लगातार दो बार से चुनाव जीत रहे हैं.

केरल में एलडीएफ की सरकार है. वहां के मुख्यमंत्री पी विजयन है. वहां का मुख्य मुकाबला कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ से है. मुख्यमंत्री पी विजयन लगातार 2 बार से मुख्यमंत्री हैं. भाजपा वहां तीसरे नंबर की पार्टी के रूप में है. भाजपा को वहां खाता खोलना बाकी है. केरल में कुल 140 सीटे हैं. 2021 के चुनाव में एलडीएफ को 99 और यूडीएफ को 41 सीटें मिली थीं.
तमिलनाडु में 8 दलों की अगुआई वाले द्रमुक पार्टी के नेता एम के स्टालिन मुख्यमंत्री हैं. वहां मुख्य विपक्षी पार्टी अन्नाद्रमुक है. भाजपा वहां भी केवल तमाशाई ही है. केरल में विधानसभा की 234 सीटें हैं. 2021 के विधानसभा चुनाव में द्रमुक को 159 सीटें मिली थीं और अन्नाद्रमुक को 75 सीटें ही मिली थीं. चुनाव के समय दलबदल के जरिए एम के स्टालिन वापस सत्ता में आना चाहते हैं. इस चुनाव में अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कशगम यानी टीवीके तीसरी ताकत बन कर उभरी है. भाजपा अभिनेता विजय के साथ गठबंधन कर के कुछ उलटफेर करना चाहती है.

30 विधानसभा सीटों वाली पुडुचेरी में 2021 के विधानसभा चुनाव में एनडीए और कांग्रेस के बीच मुकाबला है. पिछले चुनाव में एनडीए को 16 सीटें मिली थी. एन रंगास्वामी मुख्यमंत्री बने थे. कांग्रेस के गठबंधन यूडीएफ को 9 सीटें मिली थीं. इस चुनाव में कांग्रेस इस राज्य को जीतने का प्रयास करेगी. 5 राज्यों के चुनाव में सब से अधिक दिलचस्पी पश्चिम बंगाल और असम को ले कर है. कांग्रेस और भाजपा का आमनेसामने मुकाबला असम और पुडुचेरी में ही है. पश्चिम बंगाल में भाजपा और टीएमसी मुकाबले में हैं. भाजपा दक्षिण भारत के राज्यों में अपना खाता खोलने का प्रयास करेगी.
भाजपा के पास नरेंद्र मोदी का ही प्रमुख चेहरा है, जिन के जरिए वह चुनाव जीतना चाहती है. केंद्र सरकार अपनी योजनाओं के जरिए प्रदेश की जनता को प्रभावित करना चाहती है. यहीं से चुनाव का मुकाबला बराबरी का नहीं रह जाता. लैवल प्लेइंग फील्ड न होने से लोकतंत्र खतरे में पड़ रहा है, जिस का असर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ता ही है.

Youth Trend : युवाओं को भा रहीं बड़ी उम्र की महिलाएं

Youth Trend : लड़कियां कैरियर बनाने के चक्कर में देरी से शादी कर रही हैं. इस वजह से 35-40 वर्ष की कुंआरी लड़कियों की तादाद बढ़ी है. वहीं, युवाओं का उम्र में बड़ी महिलाओं की ओर आकर्षण एक ट्रैंड बनता जा रहा है. यह ट्रैंड सिर्फ बौलीवुड या हौलीवुड की फिल्मों तक सीमित नहीं है बल्कि आम जीवन में भी देखा जा रहा है. सवाल यह है कि आखिर क्यों युवाओं को अपने से उम्र में बड़ी महिलाएं भा रही हैं?

पुराने समय में उम्र के फासले मायने नहीं रखते थे. 10-12 साल की लड़की अपने से काफी बड़े उम्र के मर्द से ब्याह दी जाती थी. यह परंपरा सभी धर्मों में मौजूद थी. लड़का किसी भी उम्र का हो, लड़की उम्र में उस से छोटी होनी चाहिए. समाज की इस मानसिकता के कारण लड़कियां समझदार होने से पहले ही पत्नी, मां, भाभी, बहू, ननद या सौतन बन जाती थीं. हिंदू विवाह अधिनियम 1955 लागू होने के बाद मर्दों के लिए एक से ज्यादा शादी और लड़कियों की कम उम्र में शादी यानी बाल विवाह पर रोक लगी. हालांकि, आज भी भारत के ग्रामीण इलाकों में अशिक्षा और बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं मौजूद हैं जिन का खमियाजा लड़कियों को ही भुगतना पड़ता है.

शहरों और कसबों में हालात कुछ हद तक बदल चुके हैं. लड़कियां पढ़ रही हैं, जौब कर रही हैं और सब से बड़ी बात यह कि वे अपनी मरजी से शादी कर रही हैं. वो जमाना बीत गया जब 15 साल में लड़की के हाथ पीले करने का रिवाज था. आज शहरों में 25 से 30 साल तक की लड़कियां कुआंरी हैं वह भी अपनी मरजी से.
गीता और निखिल दोनों भारतीय इंफ्लुएंसर हैं. यह कपल 2025 में इंस्टाग्राम रील्स पर वायरल हुआ. गीता अपने प्रेमी निखिल से उम्र में काफी बड़ी है. मर्द बड़ा हो तो ठीक, औरत बड़ी हो तो प्रौब्लम क्यों? दोनों ने सोसाइटी के इसी डबल स्टैंडडर्स को चुनौती दी है. गीता और निखिल की ये बातें टिकटौक और इंस्टाग्राम पर ट्रैंड हुईं. वे ‘एज गैप कपल औफ इंडिया’ के नाम से फेमस हैं और गूगल पर मोस्ट सर्च्ड हैं.

निक जोन्स और प्रियंका चोपड़ा की उम्र का अंतर कुछ भी नहीं है. हाल में 25 से 30 साल के युवा और बड़ी उम्र की महिलाओं के बीच अफेयर या शादियों की खबरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं. इन में चेर और अलेक्जेंडर ऐसी वाइरल जोड़ी बन गई जिस में उम्र का फर्क 40 साल का है. चेर 79 साल की हैं तो अलेक्जेंडर 39 साल के हैं.
कृति सेनन और कबीर बहिया में उम्र का फर्क 9 साल है. कृति 35 साल की हैं तो कबीर 26 साल के. बौलीवुड ऐक्ट्रैस कृति सेनन की 2025 में यूके बेस्ड बिजनैसमैन कबीर बहिया के साथ डेटिंग की खबरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं. यह बौलीवुड में ओल्डर वुमन यंगर मैन का ताजा केस है.
वर्ष 2024 में ट्विटर पर एक स्टोरी वायरल हुई जिस में 66 साल की एक महिला ने 40 साल के अपने पति को छोड़ कर 27 साल के युवक से रिलेशनशिप शुरू की. इस पोस्ट को हजारों लाइक्स और कमैंट्स मिले और यह सोशल मीडिया पर ‘एज गैप लव’ का खूबसूरत उदाहरण बन गया. यह आम लोगों का केस है जो ग्लोबल ट्रैंड बन गया.

भारत में भी बदल रहा नजरिया
भारत में मर्द हमेशा ही औरतों से धन, रुतबा और उम्र में बड़ा होता है, यह पुरुषवादी समाज की सांस्कृतिक विरासत है ताकि औरतें हमेशा दब कर रहें. अब जबकि औरतों को आजादी मिलनी शुरू हुई है, पितृसत्ता की परंपराएं टूट रही हैं. बड़ी उम्र की औरतों से इश्क या शादी का ट्रैंड नया है, जो बढ़ रहा है. शहर के मिलेनियल्स और जेनजी वाली दोनों पीढ़ियां पिछली टिपिकल पीढ़ियों से काफी अलग हैं. ये पीढ़ियां परंपराओं की परवा नहीं करतीं.
ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में सोशल मीडिया ने दुनियाभर के युवाओं को नया कल्चर दिया है. इस नए कल्चर में पुरानी तहजीबें दम तोड़ रही हैं. बड़ी उम्र की महिलाएं इकोनौमिकली ज्यादा स्वतंत्र होती हैं, इस से नौजवान लड़कों को बराबरी का एहसास मिलता है. बड़ी उम्र की औरतें अब सिर्फ घरेलू नहीं बल्कि कैरियरओरिएंटेड हैं, यह बात युवाओं को प्रेरित करती है.
नौजवान लड़के कैरियर की शुरुआत में होते हैं जहां वे कई तरह की इनसिक्योरिटी से जूझते हैं. बड़ी उम्र की औरतें कैरियर के मामले में सैटल्ड होती हैं. इस से युवाओं को कान्फिडैंस मिलता है. एक रिपोर्ट के अनुसार ऐसी जोड़ियां ज्यादा सफल होती हैं क्योंकि 10- 15 साल बड़ी होने के कारण औरतें रिश्तों को ले कर ज्यादा ईमानदार और गंभीर होती हैं. ऐसे रिश्तों की सफलता में आर्थिक स्वतंत्रता भी एक बड़ा फैक्टर है. बड़ी उम्र की औरतें अपने से कम उम्र के साथी को बिना दबाव के बढ़ने का मौका देती हैं. ऐसे रिश्तों में दोनों के बीच बेहतर संवाद होता है. जलन या मनमुटाव की नौबत नहीं आती और एकदूजे के प्रति सम्मान बना रहता है.

‘एज गैप रिलेशनशिप’ के पीछे का मनोविज्ञान
मनोविज्ञान के अनुसार नौजवान लड़कों का उम्र में बड़ी औरतों की ओर झुकाव होने के कई कारण हैं. जवान होती लड़कियों की तुलना में बड़ी उम्र की औरतें जीवन के उतारचढ़ावों से गुजर चुकी होती हैं. नौजवन लड़के ऐसी औरतों को पसंद करते हैं जो कम ड्रामा वाली होती हैं और रिश्तों में समझदारी से काम लेती हैं.
फ्रायड के ओडिपस कौम्पलैक्स थ्योरी के अनुसार, कुछ नौजवानों को मां जैसी सिक्योरिटी और ममता की फीलिंग्स आकर्षित करती है जो उन्हें बड़ी उम्र की औरतों में नजर आती है. इस के अलावा, बड़ी उम्र की औरतें सैक्स के मामले में ज्यादा अनुभवी होती हैं, यह बात भी युवाओं के अट्रैक्शन की बड़ी वजह है. यह आकर्षण सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि बौद्धिक स्तर पर भी होता है. बड़ी उम्र की औरतें समस्याओं को बेहतर तरीके से सुलझा सकती हैं.
न्यूयौर्क प्रैस्बिटेरियन हौस्पिटल में एसोसिएट प्रोफैसर डा. गेल साल्ट्ज ऐसे रिश्तों की साइकोलौजी के बारे में सोशल मीडिया के जरिए लोगों से खुल कर बात करती हैं. उम्र के फासले वाले रिश्तों पर वो कहती हैं, “उम्र के अंतर से प्यार में कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन कई बार बच्चों की चाहत के मामले में ऐसे रिश्ते मुश्किल का सामना करते हैं. नौजवान लड़कों को बड़ी उम्र की औरतों के साथ इमोशनल बौन्डिंग तो मजबूत होती है लेकिन दोनों को कई बार व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.”
डा. रामानी दूर्वासूला, जिन के यूट्यूब पर लाखों सब्सक्राइबर्स हैं, रिलेशनशिप डायनैमिक्स पर अकसर बातें करती हैं. एज गैप अट्रैक्शन पर वे कहती हैं कि रिलेशनशिप्स में एज गैप्स अकसर इमोशनल मैच्योरिटी के साथ चलते हैं.
आकाश हैल्थकेयर की एसोसिएट कंसल्टैंट, साइकियाट्री, डा. पवित्रा शंकर कहती हैं, “यह कोई हैरानी की बात नहीं बल्कि एक बेहद सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है. इस अट्रैक्शन का सब से बड़ा कारण महिलाओं की इमोशनल मैच्योरिटी और उन के जीवन का गहरा अनुभव होता है. बड़ी उम्र की महिलाएं अकसर कौन्फिडैंस से भरी होती हैं और जीवन को ले कर उन की सोच बेहद साफ होती है. वे रिश्तों को बहुत ही प्रैक्टिकल नजरिए से संभालती हैं. महिलाओं की यही समझदारी युवा पुरुषों को रिश्ते में स्थिरता और एक बेहतर समझ का एहसास दिलाती है.”

ऐसे रिश्तों का भविष्य क्या
भारत में शादी के मामले में लड़की से लड़का औसतन 5 साल बड़ा होता है लेकिन जहां लड़की लड़के से 5-10 साल ज्यादा बड़ी होती है, वैसे रिश्ते परिवार और समाज एक्सैप्ट नहीं कर पाते. फिर भी, हालिया ट्रैंड्स को देखें तो जेनब्लैंड रिलेशनशिप्स यानी जिन में एज गैप ज्यादा होता है, ऐसे रिश्तों को 80 प्रतिशत से ज्यादा युवा अब पुरानी सोच मानते हैं. कई केसेज में ये रिश्ते लंबे चलते हैं खासकर अगर दोनों पार्टनर मैच्योर हों.
एक अध्ययन के अनुसार, 10 साल से ज्यादा एज गैप वाली महिलाएं अपने रिश्तों में ज्यादा सैटिसफाई और कमिटैड महसूस करती हैं क्योंकि वहां पावर बैलेंस बराबर होता है. 33 प्रतिशत युवाओं का मानना है कि फैमिली और फ्रैंड्स के जजमैंट ऐसे रिश्तों को मुश्किल बना देते हैं. अगर बच्चे चाहिए तो फर्टिलिटी इश्यू भी एक बड़ी समस्या होती है क्योंकि बड़ी उम्र की महिलाओं में प्रैग्नैंसी रिस्क ज्यादा होता है. अगर एज गैप बहुत बड़ा हो तो हैल्थ इश्यू या लाइफस्टेज डिफरैंस से ब्रेकअप का रिस्क बढ़ जाता है. भारत में जहां मैरिज कल्चर आज भी स्ट्रौंग है, ये रिश्ते 74 फीसदी मामलों में समय के साथ कमजोर पड़ने लगते हैं.

मेनोपौज के बाद भी क्या ये रिश्ते कायम रहते हैं
आमतौर पर 45 से 55 साल के बीच औरतों का मेनोपौज हो जाता है. इस से रिश्तों में फिजिकल और इमोशनल बदलाव आना स्वाभाविक होता है. 50 साल की किसी महिला का पार्टनर अगर उस से 5 साल छोटा यानी 45 वर्ष का है तो वह औरत के मेनोपौज के बाद अकेलापन महसूस करने लगता है.
50 वर्ष की उम्र में औरतों की सैक्स डिजायर कम होने लगती है तो 45 की उम्र के मर्दों में सैक्स की चाहत प्रबल ही रहती है. दोनों के बीच कितनी भी अंडरस्टैंडिंग क्यों न हो, बात जब फिजिकल रिश्तों में कमजोरी की हो तो दोनों के बीच के रिश्तों में दरारें पड़नी आम बात होती है. मेनोपौज के साथ ही मूड स्विंग्स, हौट फ्लशेस और सैक्शुअल डिजायर में कमी आनी शुरू हो जाती है और इस का असर रिश्तों पर पड़ता है.
हालांकि, एक हालिया स्टडी में पाया गया कि अगर पार्टनर 7 से 10 साल छोटा हो तो औरत के मेनोपौज सिम्पटम्स 54 प्रतिशत तक कम होते हैं और सैक्शुअल फंक्शनिंग अराउजल और डिजायर 84 प्रतिशत तक बेहतर रहते हैं. कई मामलों में जवान पार्टनर की एनर्जी और इमोशनल सपोर्ट से औरत ज्यादा ऐक्टिव और संतुष्ट रहती है लेकिन यह संतुष्टि और डिजायर उम्र के साथ कमजोर पड़ने लगता है.
मेनोपौज से इंटिमेसी फीकी पड़ जाती है. वैजाइनल ड्राइनैस और लो लिबीडो की समस्या बढ़ने लगती है. कुल मिला कर बात यह है कि मेनोपौज के बाद दोनों के बीच कितना भी अच्छा कम्युनिकेशन, इमोशनल इक्विटी और म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग हो, रिश्ते पहले जैसे नहीं रह पाते. सो, ऐसे रिश्ते शुरुआत में तो काफी खूबसूरत लगते हैं लेकिन ये ताउम्र की बौन्डिंग बन जाएं, जरूरी नहीं.

UPSC : आईएएस में खास को चुनौती देते आम

UPSC : पिछले कुछ सालों की तरह इस साल भी यूपीएससी की परीक्षा में कुछ ऐसे युवा सिलैक्ट हुए हैं जिन की कामयाबी को महज प्रेरणादायक कहानी करार देते एक दायरे में समेटने की कोशिश की जा रही है. इन के चयन पर मोटेमोटे अक्षरों में लिखा गया और न्यूज़ चैनल्स पर इन की कहानियां इन सुर्ख़ियों के साथ परोसी गईं कि किसान, चौकीदार और मजदूर परिवारों के बच्चे अभावों को मात दे कर अफसर बने.

जबकि यह दायरा बहुत बड़ा और अहम है. यह गरीबी और अभावों का दायरा है जिस के नीचे देश की कोई 80 फीसदी आबादी रहती है. गरीबी, धर्म के मुताबिक, भाग्य की देन है जिस का संबंध पूर्वजन्म में किए गए कर्मों, जो जाहिर है बुरे ही होते हैं, से है. अगलापिछला जन्म कुछ होता नहीं, इन युवाओं ने यह तो इसी जन्म में साबित कर दिया है कि मेहनत और ईमानदारी के साथसाथ शिक्षा से भाग्य न केवल बदला जा सकता है बल्कि बनाया भी जा सकता है. यूपीएससी के कड़े इम्तिहान में चुना जाना कोई हंसीखेल नहीं है जिस में आईएएस बन जाने का सपना लिए देशभर से औसतन 10 लाख उम्मीदवार हर साल शामिल होते हैं. लेकिन उन में से चुने महज 800 से 900 तक ही जाते हैं.

यही 800-900 स्टीलफ्रेम के ख़िताब से नवाजे जाते हैं जो देश की दशा और दिशा तय करते हैं. इस साल इस परीक्षा में 13.45 लाख उम्मीदवारों ने फौर्म भरे थे जिन में से चुने महज 958 गए. यानी, चुने जाने की दर .1 फीसदी से भी कम होती है.
पहले यह हक सिर्फ एलीट क्लास के युवाओं को हुआ करता था जो कमोबेश अब भी बरक़रार है लेकिन अब यह दबदबा टूटता सा नजर आ रहा है क्योंकि उस तबके के युवा भी आईएएस बनने लगे हैं जिन्हें यह ख्वाव देखने का भी हक नहीं था. सरकारी नौकरियों का आकर्षण कभी किसी सुबूत को मुहताज नहीं रहा और वह नौकरी अगर आईएस की हो तो बात सोने पे सुहागा वाली हो जाती है. इस में खासा पैसा और इज्जत है, स्थायित्व है, रसूख है, रुतबा है, अनापशनाप सहूलियतें हैं और बेशुमार अधिकार भी हैं.

ये रहे सुर्ख़ियों में
क्यों हर युवा का पहला सपना आईएएस बनने का होता है, इस का जवाब जानने से पहले इस साल सिलैक्ट हुए कुछ ऐसे युवाओं की जिंदगी पर नजर डालें जिन्होंने एलीट क्लास को चुनौती देने का रिवाज बरक़रार रखते यह मैसेज देने में भी कामयाबी हासिल कर ली है कि यह नौकरी अब किसी की बपौती नहीं रह गई है.

इस लिस्ट में शुमार नामों में एक अहम नाम राजस्थान के जोधपुर के भोपालगढ़ कसबे की अनीता देवड़ा का है जिस ने 644 बी रैंक हासिल की है. अनीता के पिता श्यामलाल देवड़ा पेशे से ऐसे किसान हैं जिन के गुजारे का जरिया थोड़ीमोड़ी जमीन के साथ मजदूरी भी होती है. उस की मां भी खेतिहर मजदूर हैं. अनीता की कामयाबी जिन कई मायनों में अहम है उन में से पहली यह है कि राजस्थान में लड़कियों को दसवींबारहवीं के बाद आगे पढ़ाने से परहेज किया जाता है. देहाती इलाकों में तो उन के जवान होते ही मांबाप शादी कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं.

यूपीएससी की पढ़ाई कठिन होने के साथसाथ महंगी भी है जिस में बिना कोचिंग के बिरले ही सफल हो पाते हैं. इस बात का एहसास खासतौर से अनीता की मां को था, इसलिए उन्होंने एकएक पैसा जोड़ कर बेटी को दिल्ली कोचिंग के लिए भेजा. बहुत कम आमदनी वाले देवड़ा दंपती के लिए यह खर्च उठा पाना जोखिमभरा और निहायत ही मुश्किल काम था. लेकिन उन्होंने इसे किया और अनीता ने भी उन्हें निराश नहीं किया जिस ने 12वीं में ब्लौक लैवल पर टौप किया था. गांव के सरकारी स्कूल से पढ़ाई करने के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली आ गई जहां दिल्ली यूनिवर्सिटी से उस ने एमएससी की डिग्री ली.

अनीता की कामयाबी इस लिहाज से भी अहम है कि उस ने ओरल इंटरव्यू यानी पर्सनैलिटी टैस्ट में सब से ज्यादा नंबर 275 में से 220 हासिल किए जो लिखित में सब से ज्यादा नंबर और पहली रैंक हासिल करने वाले राजस्थान के ही रावतभाटा के डाक्टर अनुज भाटी से 16 नंबर ज्यादा हैं. अनीता के मुकाबले अनुज संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं.

उत्तर प्रदेश के संभल के इंद्रमोहन डुडेजा चंदौसी के एस एम कालेज गेट के सामने छोटी सी चाय की दुकान चलाते हैं. सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन की आमदनी और स्टेटस क्या होंगे. लेकिन अब उन के बेटे देव डुडेजा ने यूपीएससी के इम्तिहान में 327वीं रैंक हासिल कर एक झटके में सबकुछ बदल दिया है. अनीता की तरह देव ने भी दिल्ली जा कर पोस्ट ग्रेजुएशन किया और कोचिंग ली. हालांकि कामयाबी उसे भी तीसरी बार में मिली लेकिन उस ने इस मिथक को तोड़ दिया कि आईएएस बनने के लिए बहुत सी सहूलियतों, पैसों के ढेर और खासे स्थापित फैमिली बैकग्राउंड की जरूरत होती है.

इसी कड़ी में एक और उल्लेखनीय नाम उत्तर प्रदेश के ही शामली जिले के कांधला कसबे की आस्था जैन का है जिस ने इस बार 9वीं रैंक हासिल की है. आस्था इस से पहले 2024 में आईपीएस में सिलैक्ट हुई थी और हैदराबाद में ट्रेनिंग ले रही थी. इसी दौरान वह दोबारा यूपीएससी के इम्तिहान में शामिल हुई थी. आस्था के लिए भी इस से पहले सबकुछ आसान नहीं था लेकिन उस के हौसले बुलंद थे और दिलोदिमाग में कुछ कर गुजरने का जज्बा था. उस के पिता अजय जैन मामूली परचून की दुकान चलाते हैं.

आस्था ने 2019 के सीबीएसई के इंटरमीडिएट इम्तिहान में देशभर में चौथी रैंक हासिल की थी. इस के बाद उस ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. अनीता और देव की तरह उस ने भी दिल्ली जा कर आगे की पढ़ाई की और कोचिंग ली. हालांकि इन दोनों के मुकाबले उस की आर्थिक स्थिति थोड़ी बेहतर थी लेकिन इतनी नहीं कि वह मनपसंद खा और पहन सके, अपने शौक पूरे कर सके और इफरात से स्टडी मैटीरियल खरीद सके क्योंकि उसे एहसास था कि परिवार में 3 भाईबहन और भी हैं और पिता की सीमित आय में जैसेतैसे गुजारा हो पाता है. इस का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस बार उस ने ईडब्ल्यूएस कोटे से परीक्षा दी थी जिसे ले कर विवाद भी उठ खड़े हुए.

उत्तर प्रदेश के आंबेडकर नगर जिले से इस बार 2 युवाओं ने यूपीएससी क्रैक किया है. लेकिन दोनों की हैसियत में हर स्तर पर फर्क है सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक और शैक्षणिक भी. 86वीं रैंक हासिल करने वाले पुरु दुबे के पिता संजय दुबे प्रोफैसर हैं तो 316वीं रैंक वाले विपिन देव के पिता राजाराम यादव चौकीदार हैं. जाहिर है, विपिन ने अभावों से जूझते हुए कामयाबी हासिल की. इत्तफाक की बात यह है कि इन दोनों को ही चौथी बार में सफलता मिली जिस से समझ आता है कि अभाव और सुविधाएं दोनों में प्रतिस्पर्धा तो होती है फिर भले ही वह मेहनत की हो.

कभी ये भी रहे थे सुर्ख़ियों में
यह लिस्ट बहुत लंबी नहीं है तो अब एकदम छोटी भी नहीं रह गई है. इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस कोटे से इस बार 104 युवा सिलैक्ट हुए हैं. गरीब और अभावग्रस्त युवाओं की बड़े पैमाने पर चर्चा सब से पहले साल 2007 में हुई थी जब वाराणसी के गोविंद जायसवाल आईएएस बने थे. उन के पिता रिकशा चलाते थे और परिवार झोंपड़े में रहता था. स्ट्रीट लाइट में पढ़ाई कर आईएएस बनने वाले गोविंद ने 48वीं रैंक हासिल कर हरकिसी को चौंका दिया था.

लगभग यही कहानी मध्यप्रदेश के मुरैना के मनोज कुमार शर्मा की है जिन्होंने 2005 में यह इम्तिहान क्रैक किया था. उन के अभावों, संघर्षों और सफलता पर ‘12वीं फेल’ फिल्म भी बनी थी जो खासी चर्चाओं में रही थी. धीरेधीरे ऐसे आईएएस अफसरों की संख्या बढ़ने लगी जो एक तरह से मखमल में टाट के पैबंद के मानिंद थे.

2015 के बैच की टौपर टीना डाबी हों या 2010 के बैच के एम नागराजू या मणिपुर के एक गरीब किसान परिवार के आर्मस्ट्रांग पामे हों या फिर मुंबई के नाइट वाचमैन के बेटे सब्जी विक्रेता 2017 के बैच के अंसार शेख (जिन के नाम सब से कम उम्र में आईएस बन जाने का रिकौर्ड दर्ज है) हों या कि फिर केरल के तीरकमान बेचने वाले दिहाड़ी मजदूर 2016 के बैच के श्रीधन्या सुरेश हों- इन सभी और इन जैसे कईयों न अपना खुद का इतिहास तो गढ़ा लेकिन इतिहास बदल नहीं पाए और न ही ऐसा लग रहा कि आने वाले कल में तसवीर बहुत ज्यादा बदलेगी.

आईसीएस के थे जलवे
आईएएस यानी इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज का नाम पहले आईसीएस यानी इंडियन सिविल सर्विसेज हुआ करता था. जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने 1858 में शुरू किया था. मकसद था प्रशासन चलाने के लिए काबिल अफसरों को चुनना. दिलचस्प बात यह है कि इस की परीक्षा इंगलैंड में आयोजित होती थी. सो, जाहिर है कि परीक्षा देने के लिए ऊंची जाति वाले अमीर, संभ्रांत और अभिजात्य घरानों के युवा ही जा पाते थे वरना तो उस दौर में खासे मिडिल क्लासियों को भी दूर शहर जाने के पहले पैसों का जुगाड़ करना पड़ता था.

नाम में जरूर इंडियन जुड़ा था वरना आईसीएस में सिलैक्ट होने वाले अधिकतर युवा अंगरेज ही होते थे जो ठसके से भारत आ कर ऊंचे पदों पर विराज कर ठाट से राजकाज चलाया करते थे. इसलिए इस का नाम ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने स्टील फ्रेम औफ ब्रिटिश राज रख दिया था. यह भारत में ब्यूरोक्रेट्स की औपचारिक शुरुआत थी. इस स्टील फ्रेम की जिम्मेदारी ब्रिटिश हुकूमत की हिफाजत करना थी जिस के एवज में इन्हें राजाओं सरीखी जिंदगी जीने का मौका मिलता था.

रवींद्र नाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्र नाथ टैगोर पहले भरतीय थे जिन्होंने 1863 में आईसीएस की परीक्षा पास की और वे बौम्बे प्रैसीडैंसी के अहम प्रशासनिक पदों पर रहे. उन के बाद जितने भी भारतीय आईसीएस हुए उन में भद्र बंगाली ज्यादा थे जो अमीर होने के साथसाथ ऊंची जाति के भी थे, मसलन सुरेंद्र नाथ बनर्जी, रमेश चंद्र दत्त, सत्येंद्र प्रसन्ना सिन्हा सहित नेता जी के ख़िताब से नवाज दिए गए सुभाष चंद्र बोस जिन्हें किस बिना पर `नेताजी’ और ‘फ्रीडम फाइटर’ कहा जाता है, समझ से परे है क्योंकि अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा उन्होंने विदेशों में ऐशोआराम से गुजारा, देश के लिए कुछ नहीं कियाधरा.

आईसीएस के जलवों पर गौर करें तो आज के आईएएस उन के सामने कहीं नहीं ठहरते. उन्हें दर्जनों नौकरचाकर, कई एकड़ जमीन में फैला बंगला, घोडा और ड्राइवर सहित मोटर गाडी मिलती थी. उन के हुक्म कानून की तरह लागू होते थे. जिला कलैक्टर छोटामोटा राजा होता था जिस से आम लोग नहीं मिल सकते थे. ब्रिटिश क्लबों में दारूमुरगा पार्टियों के आदी होते जाते आईसीएस शिकार के भी शौक़ीन होते थे जिस पर कोई रोकटोक नहीं थी. सारे विभाग पुलिस, फारेस्ट, राजस्व और जुडिशियरी उन के अधीन होते थे. हर विभाग के अधिकारी उन का दरबार रिपोर्ट देने के बहाने आबाद करते थे. उन का एक अहम काम बेहद सख्ती और क्रूरता से टैक्स वसूली का होता था.

उन्हें सैलरी दी जाती थी, यह कहने के बजाय कहना यह ज्यादा बेहतर होगा कि इन पर पैसा लुटाया जाता था. चुने जाने के बाद आईसीएस, जिसे असिस्टैंट कलैक्टर की पोस्ट मिलती थी, को 700-800 रुपए महीना तनख्वाह मिलती थी जो आज के लगभग 10 लाख रुपए के बराबर होती है. प्रमोशन के साथसाथ यह पगार भी बढ़ती जाती थी. गवर्नर को 5 हजार रुपए मिलते थे जिन की कीमत आज 50 लाख रुपए के लगभग होती है.

कायम है प्रशासनिक वर्ण व्यवस्था
आजादी मिलते ही 1947 में आईसीएस का नाम बदल कर आईएएस कर दिया गया. इस से बहुत ज्यादा कुछ नहीं बदला सिवा इस के कि इस में देसी युवा सिलैक्ट होने लगे लेकिन वे भी संपन्न सवर्ण, मालदार और इज्जतदार घरानों के ही होते थे जिन्हें देसी या काले अंगरेज न कहने की कोई वजह नहीं. हैरानी की बात यह भी है कि उस वक्त देश में कोई एक हजार आईएएस अधिकारी थे जिन में से 500 के लगभग अंगरेज ही थे. मूलतया वे आईसीएस थे जिन में से ज्यादातर इंगलैंड लौट गए थे. बाकी जो देसी बचे वे उन्हीं की तर्ज पर ऐशोआराम की जिंदगी जीते सिस्टम का हिस्सा बन गए.

ब्रिटिश हुकूमत द्वारा बनाई गई सरकारी नौकरियों की यह अघोषित वर्ण व्यवस्था आज तक कायम है जिस के तहत आईएएस और दूसरे प्रथम श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी ब्राह्मण होते हैं. इन के पास पैसा, नाम और अधिकार सब से ज्यादा होते हैं. द्वितीय श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी क्षत्रिय होते हैं जो आईएएस अफसरों की गणेशपरिक्रमा करने को मजबूर होते हैं. तृतीय श्रेणी यानी वैश्य वर्ण में आतेआते अधिकारी की जगह कर्मचारी शब्द जुड़ जाता है. इन में क्लर्क, टीचर, पटवारी वगैरह इफरात से होते हैं. ये मोक्ष यानी अपने कल्याण के लिए ब्राह्मणों के आशीर्वाद के मुहताज होते हैं. फोर्थ क्लास यानी चतुर्थ यानी शूद्र श्रेणी में ड्राइवर, सफाईकर्मी, चपरासी वगैरह आते हैं जो बेचारे जिंदगीभर दफ्तर में झाड़ूपोंछा करते फाइलों को एक से दूसरी टेबल तक पहुंचाते रहते हैं. इन्हें उक्त तीनों वर्णों के साहब लोग लतियाते रहते हैं.

आईएएस कई मानों में ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ होता है जिस के पास अधिकार तो अनापशनाप होते हैं लेकिन जवाबदेही कोई नहीं होती. एक हद तक ही वह नेताओं और मंत्रियों का मुहताज रहता है. लेकिन सीनियर यानी कमिश्नर और चीफ व प्रिंसिपल सैकेट्री हो जाने के बाद उस का ट्रांसफर भी बिना उस की सहमति से करना आसान नहीं होता.

अब तक ये देवताओं की श्रेणी में शुमार होने लगते हैं जो जानते हैं कि जनप्रतिनिधियों को तो एक मरतबा जनता चुनाव में धकिया सकती है. लेकिन संविधान के अनुच्छेद 308 से 311 इन्हें विशेष सुरक्षा देते हैं जिन के चलते इन का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. पहले तो कुछ आईएएस, मसलन 1991 के बैच के अशोक खेमका, 2010 बैच की दुर्गाशक्ति नागपाल, 2012 बैच के कन्नन गोपीनाथन और 2002 बैच के संजीव चतुर्वेदी सरकार और नेताओं से उलझ भी पड़ते थे लेकिन मोदी राज में यह रिवाज ही खत्म हो गया है.

आजादी के बाद आईएएस स्टील फ्रेम औफ इंडिया कहे जाने लगे थे. इन में से कुछ ने वाकई तुक के काम किए जो आज तक याद किए जाते हैं. इन में एक उल्लेखनीय नाम 1955 के बैच के टी एन शेषन का है. मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर उन का नाम और काम किसी सुबूत का मुहताज नहीं जिन की सख्ती के चलते चुनावी आचार संहिता सही मानो में लागू हुई थी और फर्जी वोटिंग व बूथ कैप्चरिंग बंद होने के साथसाथ नेताओं की लुभावनी घोषनाओं पर रोक लगी थी.

गुजरे कल की इन बातों का आज से ताल्लुक यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की हैसियत से 1988 के बैच के आईएएस ज्ञानेश कुमार खुलेआम इतनी मनमानी पर उतारू हो आए हैं कि उन से त्रस्त विपक्ष उन के खिलाफ महाभियोग ला रहा है. इस मुहिम में लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसद शामिल हैं. एक दूसरे नाम से आज की पीढ़ी भी परिचित है, वह नाम मेट्रोमैन के ख़िताब से नवाजे गए ई श्रीधरन का है. 1960 के दशक के आईएएस पी एन हक्सर भी खासे चर्चित रहे थे जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सचिव रहते बैंकों के राष्ट्रीयकरण में अहम रोल निभाया था.

सिमटा रहा एससी/एसटी का रोल
संविधान के लागू होते ही बी आर आंबेडकर की मंशा के मुताबिक आईएएस में भी एससी/एसटी आरक्षण लागू हो गया था. लेकिन जागरूकता और शिक्षा की कमी के चलते आरक्षित कोटे से इनेगिने दलित ही आईएस बन पाते थे. हालात आज भी वही हैं कि आरक्षित कोटे से बेहद कम आईएस हैं.
सरकार द्वारा संसद में बीती 12 फरवरी को दी गई जानकारी के मुताबिक वर्तमान में देश में 5,577 आईएएस अधिकारी हैं जिन में से एससी के महज 2.42 फीसदी यानी 135 और एसटी के उस से भी कम केवल 1.2 फीसदी यानी 67 ही हैं. ओबीसी के भी महज 245 आईएस हैं जो 4.39 फीसदी होते हैं.
अब अगर कोटे के सभी पद भरे हों तो एससी के 1,030, एसटी के 516 और ओबीसी के 1,850 के लगभग आईएस अधिकारी होने चाहिए. लेकिन नहीं हैं, तो इस का फर्क क्या पड़ रहा है, यह सवाल 29 जुलाई, 2024 को विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने उठा कर देशभर में हलचल मचा दी थी.
बकौल राहुल गांधी, देश की आबादी का बड़ा हिस्सा लगभग 90 फीसदी इन्हीं वर्गों का है. सो, नीति निर्माण में उन की भागीदारी इतनी कम क्यों है कि केंद्रीय बजट बनाने वाली 20 शीर्ष अधिकारियों की टीम में एससी व एसटी का कोई अधिकारी ही नहीं था. ओबीसी वर्ग से भी नाममात्र को ही थे. इसी मुद्दे से देश में जातिगत जनगणना की बहस ने तूल पकड़ा था.

तो फिर ये क्या कर लेंगे
जब सबकुछ नरेंद्र मोदी और अमित शाह की पसंद के चंद सवर्ण आईएएस अधिकारियों के हाथ में ही है और एससी, एसटी व ओबीसी के रोल समेट कर सरकार ने रख दिया है तो लगता है कि देश वापस आईसीएस के दौर में आ गया है जहां यह स्टील फ्रेम सरकार के इशारों पर नाचता थी. यह सवाल साल 2026 में सिलैक्ट हुए गरीब तबके के युवाओं के मद्देनजर मौजूं है कि उन्हें भी यही करना पड़ेगा. वैसे भी, इन अधिकारियों की प्राथमिकता अपनी और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने की स्वाभाविक रूप से होगी.

यह कोई एतराज की भी बात नहीं क्योंकि उन्होंने अभाव देखे और भुगते हैं. सो, उन का फोकस अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने पर कुदरती तौर पर ज्यादा रहेगा. अनीता देवड़ा, देव डुडेजा, आस्था जैन और विपिन देव यादव जैसे नए आईएएस के दिलों में मुमकिन है देश के लिए कुछ करने का जज्बा हो क्योंकि इन्होंने सही मानों में आम लोगों की समस्याओं को बहुत नजदीक से देखा है. जाहिर है, ये लोग उन समस्याओं से नजात पा गए हैं, अब इन के पास वह सब होगा जिस का सपना इन्होंने देखा था, मसलन बड़ा सरकारी बंगला, लालबत्ती वाली कार, नौकरचाकर, झुके हुए सिर और इन सब से अहम पैसा.

लेकिन ऐसा लगता नहीं कि ये नए आईएएस देश के मौजूदा माहौल से नावाकिफ होंगे कि उन्हें धर्मगुरुओं के इशारो पर नाच रही सरकार के इशारों पर ही नाचना है, हमारी हैसियत अब कहने भर की ही रह गई है. सो, खामख्वाह हीरो बनने की जरूरत नहीं, सिर झुका कर अपने हिस्से में आया राजयोग भोगने में ही बेहतरी है.

Middle East war : ईरान-इजराइल संघर्ष – हथियारों की होड़ से वैश्विक संकट तक

Middle East war :  ईरान-इजराइल युद्ध वैश्विक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी बन गया है. क्षेत्रीय शक्तियां हथियारों की होड़ में आगे बढ़ती रहीं, तो पश्चिम एशिया में अशांति और अस्थिरता गहराती चली जाएगी. युद्ध रोकने के कूटनीतिक प्रयास कहीं दिखाई नहीं दे रहे. हमले बढ़ेंगे तो उन का दायरा और बड़ा हो सकता है. यानी, युद्ध की जद में कई देश और आ जाएंगे.
ईरान अब ऐसे हथियारों से हमले कर रहा है जो आयरन डोम को फेल कर रहे हैं. क्लस्टर बम, जो एक मिसाइल के अंदर मौजूद सैकड़ों छोटेछोटे बम होते हैं, में हर बम में करीब 5 किलोग्राम तक विस्फोटक होता है. एक मिसाइल में लगभग 24 क्लस्टर बम होते हैं, यह संख्या 80 तक पहुंच सकती है. जब ऐसी मिसाइल से हमला किया जाता है तो यह 8 से 10 किलोमीटर के दायरे को कवर करती है. ईरान ने इन मिसाइलों का इस्तेमाल कर के अमेरिका और इजराइल के बेहद महंगे व विनाशक हथियारों की ऐसी हवा निकाली कि जिस की कल्पना भी इन दोनों देशों ने न की होगी.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान-इजराइल युद्ध को जितने हलके में ले कर इजराइल का साथ दिया था, अब यह उतना ही भयानक हो चुका है. ट्रंप ने सोचा था कि ईरान के सुप्रीम लीडर के साथ दोचार अन्य नेताओं का खात्मा कर के वे हफ्तेभर में ईरान को अपने कदमों में झुका लेंगे, खामेनेई की सत्ता पलट कर वहां अपनी किसी कठपुतली को बिठा देंगे, मगर इस जंग में अब खुद अमेरिका दो पाटों के बीच पिस रहा है.

अमेरिका और इजरायल का टूटा सपना
जारी जंग में ईरान की जिन मिसाइलों के खत्म होने का इंतजार अमेरिका कर रहा था, वो तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं, उलटे, इजराइल के इंटरसैप्टर जरूर खात्मे की कगार पर हैं, जिन से वो ईरानी मिसाइलों से अपना बचाव कर रहा था. इजराइल के पास पहले ही इंटरसैप्टर की संख्या कम थी क्योंकि पिछले साल ईरान के साथ हुए संघर्ष में इन का काफी इस्तेमाल हो चुका था. अब मौजूदा युद्ध में ईरान लगातार मिसाइल हमले कर रहा है, जिस से इजराइल की लंबी दूरी की रक्षा प्रणाली पर भारी दबाव पड़ रहा है.
हैरानी तो यह है कि ईरान अब अपनी मिसाइलों में क्लस्टर म्यूनिशन भी जोड़ रहा है, जिस से निपटना इजराइल के लिए चुनौती साबित हो रहा है. क्लस्टर म्यूनिशन वह प्रणाली है जिस से एक मिसाइल से कई छोटेछोटे बम गिरते हैं, जिन्हें रोकना और मुश्किल हो रहा है. यह जंग कितनी लंबी चलेगी, फिलहाल कहना मुश्किल है क्योंकि अमेरिका और इजराइल मिल कर जिस ईरान को कब्जाने का सपना देख रहे थे उस के पास जमा हथियारों की तादाद ने इन दोनों देशों का गणित बिगाड़ दिया है.

ये हमले क्यों ज्यादा प्रभावशाली हैं
ईरान की मिलिट्री पावर और आक्रामक रवैये से यह तो साफ हो गया है कि ईरान ने बीते सालों में न केवल अपने डिफैंस सिस्टम को मजबूत किया है, बल्कि सस्ते मगर घातक हथियारों के उत्पादन में भी बढ़त हासिल कर ली है.
ईरान की युद्ध रणनीति अब पारंपरिक तरीकों तक सीमित नहीं रही है. उस ने मिसाइल तकनीक, ड्रोन और प्रौक्सी नैटवर्क के माध्यम से एक मल्टीलैवल मिलिट्री स्ट्रक्चर खड़ा कर लिया है. उस के ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों का प्रभाव पिछले साल की लड़ाई में भी देखा गया था. इस युद्ध में उस ने दुनिया को दिखा दिया है कि कम संसाधनों में भी उस ने जबरदस्त प्रभाव वाले हथियार विकसित करने की दिशा में बड़ी सफलता पाई है.
हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि युद्ध में तबाही का आकलन केवल हथियारों की संख्या से नहीं, बल्कि उन के रणनीतिक उपयोग, लक्ष्य चयन और मनोवैज्ञानिक प्रभाव से भी होता है. इस बार के युद्ध में ईरान इन तीनों पहलुओं में भी दक्षता दिखाता नजर आ रहा है. यही कारण है कि हमले ज्यादा प्रभावशाली हैं.
ईरान इस समय एक बड़ी रणनीति के तहत जंग लड़ रहा है. अमेरिका को धूल चटाने के लिए उस ने दुनियाभर के देशों में मौजूद तमाम अमेरिकी मिलिट्री अड्डों को गिनगिन कर निशाना बनाया और तबाह किया है. यही नहीं, अब वह उन तमाम देशों के तेल भंडारों को भी नष्ट करने की दिशा में बढ़ रहा है जो देश अमेरिका और इजराइल के मददगार हैं. ईरान ने अमेरिका का समर्थन कर रहे मिडिलईस्ट के देशों को धमकी दी है कि उस के निशाने पर सभी तेल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर हैं. इस के बाद मिडिलईस्ट में तेल और गैस प्रोडक्शन पर संकट मंडराने लगा है.

यूरोप और एशिया में गैस के लिए होड़
19 मार्च को ईरान ने कतर के लिक्विफाइड नैचुरल गैस (एलएनजी) प्लांट पर हमला कर दुनिया में कुहराम सा मचा दिया. यानी, अब यह युद्ध औयल इंफ्रा अटैक में तबदील होता जा रहा है. कतर के जिस एलएनजी प्लांट पर हमला हुआ है वह दुनिया के सब से बड़े गैस निर्यात केंद्रों में से एक है. उस के बाद यूरोप में गैस की कीमतों में 30 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यूरोप एलएनजी पर ज्यादा निर्भर है और ईरान ने हमला कर पूरी सप्लाई चेन ब्लौक कर दी है.
ऐसे में अब यूरोप और एशिया में गैस के लिए होड़ बढ़ेगी. फिलहाल इन क्षेत्रों के तमाम प्लांट्स सुरक्षा के मद्देनजर बंद कर दिए गए हैं. आने वाले दिनों में तेल और गैस की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो सकती है. भारत के लिए भी चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं, क्योंकि भारत कतर से गैस आयात करता है जिस का सब से बड़ा प्लांट बंद होने से सप्लाई बाधित होगी. ऐसे में देश में कंप्रेस्ड नैचुरल गैस (सीएनजी) और पाइप्ड नैचुरल गैस (पीएनजी) महंगी हो सकती हैं. यही नहीं, बिजली उत्पादन की लागत भी बढ़ सकती है. यानी, आम आदमी तक महंगाई की मार बस पहुंचने ही वाली है.
गौरतलब है कि ईरान ने बहुत सस्ते ड्रोन्स और मिसाइलों से वार किए और अमेरिका व इजराइल ने उन ड्रोन्स को मारने के लिए अपनी महंगी मिसाइलों व डिफैंस सिस्टम का इस्तेमाल किया. इस से अमेरिका-इजराइल के लिए ईरान के सस्ते ड्रोन्स को मारना बहुत महंगा साबित हुआ. उन्होंने सोचा था कि ईरान थोड़ेबहुत हमले के बाद डर कर घुटनों पर आ जाएगा मगर ईरान ने तो इजराइल और मिडिलईस्ट के देशों में तमाम अमेरिकी मिलिट्री ठिकानों पर ड्रोन्स की बारिश कर दी.
बताते चलें कि एस-400 दुनिया का एक सब से आधुनिक डिफैंस सिस्टम है और यह 400 किलोमीटर दूर के खतरों पर वार कर सकता है. इस डिफैंस सिस्टम को मुख्य रूप से फाइटर जेट्स और खतरनाक मिसाइलों को रोकने के लिए बनाया गया है. मगर एस-400 जैसे बेहद आधुनिक डिफैंस सिस्टम से हर हवाई खतरे पर वार करना समझदारी नहीं है. इस को औपरेट करने का खर्च बहुत ज्यादा है. एस-400 से एक बार मिसाइल दागने में 2.5 करोड़ से 16 करोड़ रुपए का खर्च आता है. यह इस सिस्मट में लगी तरहतरह की मिसाइलों के हिसाब से तय होता है. ऐसे में ड्रोन जैसे नन्हें एरियल खतरों को मारने के लिए इस सिस्टम का इस्तेमाल करना बेवकूफी है, जो इजराइल कर बैठा है.
ईरान जिस तरह से जंग में तबाही मचा रहा है, उस से यह प्रतीत होता है कि उस ने बहुत बड़ी तादाद में घातक हथियार बना लिए हैं. शायद रूस और चीन भी उस की अप्रत्यक्ष रूप में मदद कर रहे हैं. मगर हथियार सिर्फ खून बहा सकते हैं, शांति नहीं ला सकते. रूसयूक्रेन युद्ध ने दोनों देशों को आर्थिक रूप से तोड़ दिया है. उन्हें फिर से व्यवस्थित होने में दशकों का समय लगेगा. अगर अमेरिका बीच में न कूदता तो ईरान-इजराइल युद्ध इतना लंबा न खिंचता, तबाही इतने बड़े पैमाने पर न होती जिस के कारण दुनिया के तमाम देशों के आगे तेल और गैस का इतना बड़ा संकट खड़ा हो गया है. मगर अमेरिका की अदूरदर्शिता और हेठी ने अपने साथसाथ पूरी दुनिया को परेशानी में डाल दिया है.

यह धर्म युद्ध है
इस युद्ध को देख कर कुछ लोग यह तर्क देने लगे हैं कि वियतनाम और दक्षिण कोरिया भी युद्ध की आग से तप कर मजबूत और विकसित राष्ट्र बने. आर्थिक चमत्कार की मिसाल बने. ईरान भी आने वाले सालों में ताकतवर राष्ट्र के रूप में उभर सकता है, मगर यह सोच बिलकुल गलत है. दरअसल ईरान-इजराइलअमेरिका के बीच धर्म युद्ध चल रहा है. ऊपरी तौर पर भले यह मालूम पड़े कि लड़ाई अस्तित्व की, तेल की, भूमि हथियाने की है, मगर सच्चाई यह है कि यह युद्ध सिर्फ धर्म का है. इसलाम-यहूदी और ईसाइयत के बीच जंग है, जो सदियों से जारी है. और यह एक कड़वी सच्चाई है कि धर्म ने जिनजिन देशों में युद्ध करवाए, उन देशों के आम नागरिक कभी चैन और सुकून की जिंदगी नहीं जी पाए.
ईरान के मामले में वियतनाम और दक्षिण कोरिया का उदाहरण देना गलत सिद्ध होगा क्योंकि इन दोनों देशों में धर्म युद्ध नहीं लड़ा गया था. और युद्ध के बाद उन्होंने शांति, संस्थागत सुधार और वैश्विक सहयोग को अपनाया था. युद्ध के बाद जो नीतियां इन देशों में बनीं उन नीतियों ने उन्हें आगे बढ़ाया. वियतनाम ने दशकों तक आर्थिक सुधार, वैश्विक निवेश और राजनीतिक स्थिरता पर जोर दिया, जबकि दक्षिण कोरिया को अमेरिका का व्यापक समर्थन, तकनीकी निवेश और वैश्विक बाजारों तक खुली पहुंच मिली.
इस के विपरीत, ईरान की स्थिति जटिल है. इस के साथ ही ईरान इसलामिक राष्ट्र के रूप में अपनेआप को स्थापित करना चाहता है. उस की इस चाहत में ईरान की कुछ जनता उस के साथ है और कुछ उस के खिलाफ. बहुतेरी कुर्द औरतें हिजाब को उतार फेंकना चाहती हैं और पश्चिमी लिबास में आजाद घूमने की इच्छा रखती हैं. वहीं एक बड़ी संख्या उन औरतों की भी है जो जबरन हिजाब ओढ़ कर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं या नौकरियां कर रही हैं. वे डाक्टर, इंजीनियर, नर्स, टीचर, लैक्चरर हैं.
बीते कुछ सालों से पश्चिमी मीडिया इस चीज को जोरशोर से उठा रहा है कि ईरान में महिलाओं के हक कुचले जाते हैं. ईरान ने अपने नागरिकों से खुल कर सांस लेने की आजादी छीन ली है. औरतें कैसे कपड़े पहनें, कैसे बाल बनाएं, कैसे चलें, किस के साथ आएंजाएं, सब इसलाम की नजर से तय हो रहा है. लगातार इस तरह की खबरों से ईरान के भीतर भी अविश्वास, घृणा, असहयोग और तनाव का माहौल बना है. धार्मिक प्रतिबंध ज्यादा होने लगें, तो उपद्रव में देर नहीं लगती है, ईरान को यह समझना होगा. जब किसी समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीमित होती है और शासन व्यवस्था धार्मिक नियंत्रण में होती है, तो वहां स्थायी विकास की संभावनाएं कमजोर पड़ जाती हैं. ऐसे वातावरण में युद्ध केवल अस्थिरता को और गहरा करता है.
अमेरिकीइजराइली हमले से ठीक पहले ईरान बुरी तरह ईरानी जनता के विद्रोह का सामना कर रहा था. अमेरिका और इजराइल ने उस विरोध की शक्ति छीन ली और ताकत फिर से कट्टरपंथी धार्मिक नेताओं के हाथों में आ गई है.

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युद्ध की भेंट चढ़ गए ईरान के प्रमुख नेता
अमेरिकाइजराइल और ईरान के बीच जारी जंग में ईरान के कई प्रमुख राजनीतिक और सैन्य हस्तियों की जानें गई हैं जिस के कारण शीर्ष नेतृत्व को गहरा झटका लगा है.
अयातुल्लाह अली खामेनेई : ईरान के सर्वोच्च नेता, जो 1989 से सत्ता में थे. 28 फरवरी, 2026 को तेहरान में उन के परिसर पर हुए हवाई हमले में मारे गए. वे 86 वर्ष के थे. उन के 3 दशकों से अधिक के शासनकाल ने सुरक्षा तंत्र के माध्यम से सत्ता को मजबूत किया और ईरान के प्रभाव का विस्तार किया. उन के परमाणु कार्यक्रम के कारण उन्हें बारबार पश्चिम के साथ टकराव का सामना करना पड़ा.
अली लारीजानी : सुप्रीम नैशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव और एक प्रभावशाली रणनीतिकार, जिन्हें 17 मार्च, 2026 को एक इजराइली हवाई हमले में मार गिराया गया. वे 67 वर्ष के थे. उन के साथ उन के बेटे और एक डिप्टी भी मारे गए. वे सर्वोच्च नेता के करीबी सलाहकार थे और ईरान की सुरक्षा व विदेश नीति को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
अली शमखानी : खामेनेई के करीबी सलाहकार और पूर्व रक्षा मंत्री, इन की 28 फरवरी, 2026 को तेहरान में किए गए एक हमले में मृत्यु हो गई. इस से पहले इजराइल और ईरान के बीच जून में हुए 12 दिवसीय युद्ध के दौरान इन के घर पर हुए हमले में वे बालबाल बचे थे.
मोहम्मद पाकपुर : ये ईरान की सब से शक्तिशाली सैन्य टुकड़ी इसलामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कार्प्स (आईआरजीसी) के कमांडर-इन-चीफ थे जो 28 फरवरी, 2026 के हमले में मारे गए.
अजीज नसीरजादेह : ईरान के रक्षा मंत्री और वायुसेना के अनुभवी अधिकारी अजीज को 28 फरवरी, 2026 को तेहरान में शीर्ष नेतृत्व पर हुए हमलों में मार दिया गया. उन्होंने सैन्य योजना और रक्षा नीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
गुलामरेजा सोलेमानी : ईरान के बासिज अर्धसैनिक बल के कमांडर 17 मार्च, 2026 के हमले में मारे गए. वे रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के वरिष्ठ अधिकारी और आतंरिक सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले व्यक्ति थे.
इस्माइल खतीब : ईरान के खुफिया मंत्री की मौत 18 मार्च, 2026 को इजराइली हमले में हुई. एक कट्टरपंथी धर्मगुरु और राजनीतिज्ञ, जिन्होंने अगस्त 2021 में नागरिक खुफिया तंत्र का नेतृत्व करने से पहले अयातुल्लाह खामेनेई के कार्यालय में भी काम किया था.
अब्दोलरहीम मौसवी : ईरानी सशस्त्र बलों के चीफ औफ स्टाफ, जो 28 फरवरी, 2026 के हमलों में मारे गए.
अली मोहम्मद नैनी : ये आईआरजीसी के प्रवक्ता थे जिन्हें युद्ध के 21वें दिन अमेरिकीइजराइली हमले में मार दिया गया.
इन के अलावा, कई अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, सुरक्षा सलाहकार और परमाणु वैज्ञानिक भी इस संघर्ष के दौरान मारे गए हैं, जिस से ईरान का सुरक्षा ढांचा बुरी तरह प्रभावित हुआ है. , Middle East war

chronic kidney disease: साइलैंट किलर है किडनी रोग

chronic kidney disease : रवि नागर के बड़े भाई नीरज नागर, जिन की आयु अभी 55 वर्ष थी, की कलाइयों के ऊपरी हिस्से में कुछ दिनों से सूजन और दर्द था. उन्होंने नौकर से चारपांच दिन तेलमालिश करवाई. उन को लगा कि ठंड की वजह से सूजन आ गई है. मगर मालिश से कोई खास फर्क नहीं पड़ा. इधर कुछ दिनों से यूरिन करने में भी कुछ परेशानी हो रही थी. यूरिन महसूस तो होता था मगर खुल कर होता नहीं था.
दिसंबर का महीना था. ठंड अधिक थी. लिहाजा, उन्होंने इन लक्षणों को ठंड के कारण उत्पन्न लक्षण समझा और डाक्टर के पास नहीं गए. एक दिन जब अचानक चक्कर आया तो उन की पत्नी ने उन्हें डाक्टर के पास जाने की सलाह दी. शाम को पतिपत्नी अपने फैमिली डाक्टर के पास गए. डाक्टर ने थोड़ी देर एग्जामिन किया और कुछ टैस्ट लिखे. दूसरे दिन जब टैस्ट रिपोर्ट आईं तो डाक्टर ने तुरंत हौस्पिटल में एडमिट होने के लिए कहा.

नीरज नागर के रक्त में क्रिएटिनिन की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ी हुई थी. यूरिया और पोटैशियम भी खतरनाक स्तर पर थे. हौस्पिटल में एक हफ्ते के अंदर 3 बार उन का डायलिसिस हुआ. उन की किडनी की कार्यक्षमता बिलकुल खत्म हो चुकी थी. वे मात्र 10 फीसद ही काम कर रही थीं. डायलिसिस के बाद भी कुछ खास फर्क नहीं पड़ा. दो हफ्ते हौस्पिटल के आईसीयू वार्ड में रहे और वहीं उन का निधन हो गया.
नीरज नागर शरीर से हष्टपुष्ट थे. रोज सुबह मौर्निंग वाक के लिए जाते थे. शाम को दोस्तों के साथ बैडमिंटन कोर्ट में देखे जाते थे. वर्किंग थे. सेल्स टैक्स डिपार्टमैंट में अधिकारी थे. किडनी की समस्या ने दबेपांव कब उन के शरीर में प्रवेश किया, पता ही नहीं चला. हाथों में सूजन के तौर पर हलकेफुलके लक्षण भी तब दिखे जब किडनी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी. डाक्टर ट्रांसप्लांट के बारे में अभी सोच ही रहे थे कि उन्होंने देह त्याग दी.

किडनी क्या करती है

किडनी यानी गुर्दे शरीर के सब से महत्त्वपूर्ण अंगों में से एक है. मनुष्य के शरीर में सामान्यतया 2 किडनियां होती हैं, जो पेट के पीछे कमर के दोनों ओर होती हैं. किडनी का सब से महत्त्वपूर्ण काम खून को फिल्टर करना और शरीर के अंदर के रासायनिक संतुलन को बनाए रखना है. शरीर में बनने वाले विषैले पदार्थ (टौक्सिन) और अतिरिक्त पानी को किडनी खून से अलग करती है. यह अपशिष्ट पदार्थ को मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालती है.
एक स्वस्थ किडनी यह भी तय करती है कि शरीर में कितना पानी रखना है और कितना बाहर निकालना है. यदि शरीर में पानी ज्यादा है तो अधिक पेशाब बनता है और यदि पानी कम है तो किडनी पानी को बचाने की कोशिश करती है. जब किडनी काम करना बंद कर देती है तो शरीर में जगहजगह पानी जमा होने लगता है, जिस से सूजन आती है. वहीं, शरीर में विषाक्त पदार्थ जमा होने लगते हैं और खून में इन की मात्रा बढ़ने से यह जहर का काम करने लगते हैं.

तेजी से बढ़ता किडनी रोग

भारत में किडनी की बीमारी बहुत तेजी से एक महामारी का रूप लेती जा रही है. इस की मुख्य वजह है अत्यधिक मात्रा में अनाज, सब्जी और फलों आदि में डाला जाने वाला पैस्टीसाइड व फलों को जल्दी पकाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला रसायन. पैस्टीसाइड शरीर में प्रवेश कर के धीरेधीरे किडनी के फिल्टर (नेफ्रान) को नुकसान पहुंचाते हैं. इस से किडनी के काम करने की क्षमता कम होने लगती है.
ये रसायन सिर्फ अनाज, सब्जी, फल के उपभोक्ताओं के लिए ही खतरा नहीं बन रहे हैं बल्कि लंबे समय तक पैस्टीसाइड के संपर्क में रहने वाले किसानों में भी किडनी रोग का खतरा ज्यादा पाया जा रहा है. देश के कई कृषि क्षेत्रों में क्रौनिक किडनी डिजीज के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है. यह खतरनाक रसायन शरीर में औक्सीडेटिव स्ट्रैस और सूजन पैदा करते हैं, जिस से किडनी की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं.

पैस्टीसाइड का असर लिवर पर भी

किडनी के साथसाथ लिवर, जो कि शरीर का मुख्य डिटौक्स अंग है, पर भी इन जहरीले रसायनों का काफी बुरा असर पड़ रहा है. पैस्टीसाइड लिवर में जमा हो कर फैटी लिवर, लिवर डैमेज और लिवर सिरोसिस का खतरा बढ़ा रहे हैं. कुछ कीटनाशक लिवर की कोशिकाओं को सीधे नुकसान पहुंचाते हैं.
हमारे यहां खेती में कीटनाशकों का व्यापक उपयोग हो रहा है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में किडनी और लिवर रोगों की बढ़ती दर इस बात का प्रमाण हैं कि पैस्टीसाइड हमारे लिए कितना बड़ा ख़तरा बन चुका है.

हर 10 में एक भारतीय को किडनी की समस्या

दुनिया भर में करोड़ों लोग क्रौनिक किडनी डिजीज से पीड़ित हैं. भारत में भी इस के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है. अनुमान है कि भारत में हर 10 में से 1 व्यक्ति किसी न किसी स्तर की किडनी की समस्या से जूझ रहा है. हर साल अस्पतालों में लाखों नए मरीज सामने आ रहे हैं. किडनी फेल होने पर लोगों को डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है, जो कि बहुत महंगा प्रोसैस है और गांवदेहात के लोग तो इस इलाज का खर्च ही वहन नहीं कर सकते.

शहरी जीवनशैली भी बढ़ा रही है खतरा

शहरी क्षेत्रों में पैस्टीसाइड युक्त भोजन के अलावा किडनी फेल होने का सब से बड़ा कारण उच्च रक्तचाप भी है. मोटापा और अस्वस्थ जीवनशैली, दर्दनिवारक दवाओं का अधिक इस्तेमाल, धूम्रपान और शराब, प्रदूषण और खराब खानपान भी इस के लिए उत्तरदायी हैं.

देर से दिखाई देते बीमारी के लक्षण

किडनी की बीमारी की सब से बड़ी समस्या यह है कि इस के लक्षण देर से दिखाई देते हैं, जैसे हाथपैरों और चेहरे पर सूजन, बारबार पेशाब आना या कम आना, थकान और कमजोरी, भूख कम लगना और उलटी या जी मिचलाना. ये लक्षण तब दिखते हैं जब किडनी का 50–60 फीसदी तक नुकसान हो चुका होता है.

जब किडनी पूरी तरह फेल हो जाए

अगर किडनी पूरी तरह खराब हो जाए तो मरीज को डायलिसिस या ट्रांसप्लांट कराना पड़ता है. डायलिसिस सप्ताह में 2 से 3 बार कराना पड़ सकता है. किडनी ट्रांसप्लांट महंगा और जटिल इलाज है. इस वजह से यह बीमारी आर्थिक और सामाजिक बोझ भी बनती जा रही है.
किडनी ट्रांसप्लांट एक ऐसी सर्जरी है जिस में खराब या काम न करने वाली किडनी को हटा कर किसी स्वस्थ व्यक्ति की किडनी रोगी के शरीर में लगाई जाती है. यह एंडस्टेज किडनी फेलियर (जब किडनी 85–90 फीसदी से अधिक खराब हो जाए) के इलाज का सब से प्रभावी तरीका माना जाता है.

लालू प्रसाद यादव का उदाहरण

याद होगा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की किडनी खराब होने पर उन की बेटी रोहिणी आचार्य ने उन्हें अपनी एक किडनी दी थी. लालू प्रसाद यादव कई सालों से किडनी सहित कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे. डाक्टरों ने उन्हें किडनी ट्रांसप्लांट की सलाह दी. उन की बेटी रोहिणी आचार्य, जो सिंगापुर में रहती हैं, ने अपने पिता को अपनी एक किडनी दान करने का निर्णय लिया. 5 दिसंबर, 2022 को सिंगापुर के एक अस्पताल- माउंट एलिजाबेथ हौस्पिटल- में उन का सफल किडनी ट्रांसप्लांट किया गया. यह बापबेटी के बीच भावनात्मक लगाव के कारण संभव हुआ.

डोनर की कमी सब से बड़ी समस्या

भारत में हर साल लाखों लोग किडनी फेलियर के शिकार होते हैं, लेकिन ट्रांसप्लांट का परसैंटेज बहुत कम है, क्योंकि डोनर की कमी है. अधिकांशतया परिवार के लोग भी अपनी किडनी अपने मरीज को देने में हिचकिचाते हैं. वर्ष 2023 में भारत में लगभग 13,642 किडनी ट्रांसप्लांट हुए, जबकि मरीजों की संख्या लाखों में थी.
किडनी ट्रांसप्लांट में किसी स्वस्थ व्यक्ति (डोनर) की एक किडनी ले कर मरीज के शरीर में लगाई जाती है. गौरतलब है कि हर इंसान दो किडनी के साथ पैदा होता है, मगर एक किडनी भी शरीर को सामान्य जीवन दे सकती है. इसलिए डोनर अपनी एक किडनी दे कर भी सामान्य जीवन जी सकता है. पर लोगों में डर है कि पता नहीं किडनी दान करने के बाद उन का अपना स्वास्थ्य खराब न हो जाए.

किडनी ट्रांसप्लांट के दो तरीके

किडनी ट्रांसप्लांट दो तरह से होता है. पहला, जीवित डोनर ट्रांसप्लांट, जिस में रोगी के मातापिता, भाईबहन, पतिपत्नी या करीबी रिश्तेदार अपनी एक किडनी दे कर रोगी की जान बचा सकते हैं. यह सब से सामान्य तरीका है. दूसरा है मृत डोनर ट्रांसप्लांट, जिस में किसी ब्रेन-डेड व्यक्ति की किडनी रोगी को मिल सकती है. यह जानकारी सरकार की आर्गन वेटिंग लिस्ट से मिलती है, कि किस ब्रेन डेड व्यक्ति के परिजनों ने उस के अंग दान का निर्णय लिया है. पर देश में यह संख्या बहुत ही कम है क्योंकि लोगों में अंगदान के प्रति जागरूकता ही नहीं है.

दुनिया का पहला किडनी ट्रांसप्लांट

दुनिया का पहला सफल किडनी ट्रांसप्लांट 1954 में हुआ था. यह ट्रांसप्लांट डा. जोसेफ मरे और उन की टीम ने अमेरिका के ब्रिघम एंड वीमेन हौस्पिटल में किया था. इस के लिए उन्हें बाद में नोबेल पुरस्कार भी मिला.

ट्रांसप्लांट की सफलता, खर्च और सावधानियां

अकसर लोग सोचते हैं कि नई किडनी पुरानी किडनी की जगह लगाई जाती है. बता दें कि आमतौर पर नई किडनी पेट के निचले हिस्से में लगाई जाती है और पुरानी किडनी को वहीं रहने दिया जाता है. मातापिता, भाईबहन या बच्चे जैसे करीबी रिश्तेदारों की किडनी सब से जल्दी मैच हो जाती है. इसलिए उन से ट्रांसप्लांट का सफल होना आसान होता है.
आमतौर पर किडनी ट्रांसप्लांट के बाद मरीज 5 से 10 साल तक आराम से जी सकते हैं. भारत में यह दर 50 से 80 प्रतिशत है. यदि मरीज दवाएं नियमित ले और डाक्टर की सलाह माने, तो ट्रांसप्लांट के बाद 20–30 साल तक भी सामान्य जीवन जी सकता है. कई लोग नौकरी, खेल और यात्रा भी करते हैं. हालांकि, कोई डाक्टर जीवन की गारंटी नहीं देता.

इलाज महंगा

भारत में आमतौर पर किडनी ट्रांसप्लांट पर 10 से 20 लाख रुपए तक खर्च आता है और महीने की दवाएं 8 से 20 हजार रुपए तक की होती हैं. ये दवाएं जीवनभर लेनी पड़ती हैं.
भारत में करीब 600 निजी और सरकारी ट्रांसप्लांट सैंटर हैं. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली, एम्स नागपुर, पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ और एसजीपीजीआई लखनऊ में मुख्य रूप से लोग किडनी ट्रांसप्लांट के लिए एडमिट होते हैं. इस के अलावा, सरकारी मैडिकल कालेज तमिलनाडु और केरल आदि में भी ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध है. निजी अस्पतालों में अपोलो, मेदांता, फोर्टिस, मैक्स और मणिपाल हौस्पिटल में ट्रांसप्लांट होता है. इन अस्पतालों में ट्रांसप्लांट की सफलता दर काफी अच्छी मानी जाती है.
किडनी मिलने में कितना समय लगता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि यदि परिवार में डोनर है तो 1 से 3 महीने में ट्रांसप्लांट हो सकता है. यदि मृत डोनर से किडनी चाहिए तो वेटिंग लिस्ट में नाम दर्ज होता है और औसतन 3 से 5 साल तक इंतजार करना पड़ सकता है.

ट्रांसप्लांट के बाद की सावधानी

किडनी ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को जीवनभर कुछ नियम मानने पड़ते हैं, जैसे रोज इम्यूनो सप्रेसिव दवाएं लेना, संक्रमण से बचाव रखना, नियमित ब्लड टैस्ट, संतुलित भोजन और शराब व धूम्रपान से परहेज रखना. हर सर्जरी की तरह किडनी ट्रांसप्लांट में भी जोखिम होता है. कभीकभी तो परिवार के सदस्य की किडनी भी शरीर अस्वीकार कर देता है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग साल में कम से कम एक बार ब्लडप्रैशर, ब्लडशुगर, क्रिएटिनिन और यूरिन की सामान्य जांच करवा लें, तो किडनी रोग को शुरुआती चरण में ही पकड़ा जा सकता है. शुरुआती अवस्था में ही पता चल जाए तो दवाओं, खानपान में सुधार और जीवनशैली में बदलाव से किडनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है.
किडनी को स्वस्थ रखने के लिए कुछ सरल उपाय भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं- पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पानी पीना, नमक और जंक फूड का कम सेवन, दर्द निवारक दवाओं का अनावश्यक प्रयोग न करना, धूम्रपान और शराब से दूरी, नियमित व्यायाम और वजन नियंत्रित रखना, रक्तचाप और मधुमेह को नियंत्रण में रखना, फल और सब्जियों को अच्छी तरह धो कर ही खाना ताकि पैस्टीसाइड का असर कम हो सके.

जागरूकता बहुत जरूरी

लेकिन इन सभी जोखिमों और जटिलताओं के बावजूद एक बात स्पष्ट है कि किडनी रोग से लड़ाई का सब से बड़ा हथियार समय रहते जागरूकता और जांच है क्योंकि यह बीमारी अकसर धीरेधीरे और बिना शोर किए शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती है. यही वजह है कि डाक्टर इसे ‘साइलैंट किलर’ कहते हैं.
समाज में अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी बेहद जरूरी है. एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उस के अंग कई लोगों को जीवन दे सकते हैं. यदि लोग अंगदान के महत्त्व को समझें तो हजारों मरीजों को डायलिसिस की पीड़ा से मुक्ति मिल सकती है और उन्हें नया जीवन मिल सकता है.

नीरज नागर की कहानी एक चेतावनी

नीरज नागर की कहानी केवल एक व्यक्ति की दुखद मृत्यु की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है. यह हमें याद दिलाती है कि शरीर के छोटेछोटे संकेतों को नजरअंदाज करना कभीकभी जानलेवा साबित हो सकता है.
किडनी रोग वास्तव में साइलैंट किलर है जो धीरेधीरे शरीर को भीतर से कमजोर करता है और जब तक इस के स्पष्ट लक्षण सामने आते हैं, तब तक अकसर बहुत देर हो चुकी होती है. इसलिए जरूरी है कि हम अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें, समयसमय पर जांच करवाएं और अपने शरीर के संकेतों को गंभीरता से लें. दरअसल, स्वास्थ्य की रक्षा केवल अस्पतालों में नहीं, बल्कि जागरूकता, सावधानी और समय पर लिए गए छोटेछोटे निर्णयों से होती है.

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