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आखिर क्यूं होती है दूध से एलर्जी, जाने यहां…

आमतौर पर बच्चों को दूध पीना पसंद नहीं होता या फिर कई बच्चों को दूध से एलर्जी होती है लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि आखिर दूध से कई लोगों या बच्चों को एलर्जी क्‍यूं होती है? अगर नहीं, तो हम आपको बताते हैं

दूध क्यूं नहीं आता पसंद

दूध में मौजूद कुछ प्रोटीन्स के कारण कई लोगों को एलर्जी हो सकती है. गाय का दूध, दूध से होने वाली एलर्जी का मुख्य कारण होता है. इसके अलावा भैंस, बकरी व अन्‍स स्‍तनधारियों के दूध से भी एलर्जी हो सकती है. गाय के दूध में अल्‍फा एस1 कैसिइन प्रोटीन सबसे अधिक होता है, जो मुख्‍यत: दूध की एलर्जी का कारण होता है.

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दूध की एलर्जी

दूध और दूध से बने उत्‍पादों में पाये जाने वाले कुछ प्रोटीन के कारण भी दूध से एलर्जी होती है. प्रोटीन को बेअसर करने के लिए इम्‍युनोग्‍लोबुलिन ई नामक एंटीबौडी का उत्‍पादन जोखिम का कारण बनता है. हर बार जब आप प्रोटीन के संपर्क में आते हैं, तो एंटीबौडी उन्हें पहचानती हैं और हिस्टामाइन और अन्य रसायनों को छोड़ने के लिए आपकी इम्यून सिस्टम को संकेत देती हैं. जिसके चलते एलर्जी होती है.

वयस्कों की तुलना में बच्चों में दूध की एलर्जी अधिक आम है क्योंकि बच्चों का डाइजेस्टिव सिस्टम कमजोर होता है. यह लैक्‍टेज एंजाइम की कमी से होता है. दूध का लैक्‍टोज जब छोटी आंत में पहुंचता है, तो वहां से लैक्‍टेज एंजाइम से ग्लूकोस और गैलेक्‍टोज टूट जाता है. जिससे दूध आसानी से पच नहीं पाता.

लैक्‍टोज दूध व दूध से बने उत्‍पादों में पाया जाने वाला प्राकृतिक शुगर है. जब किसी को दूध हजम नहीं हो पाता है तो उसे लैक्टोज इंटौलरेंस की समस्‍या होती है. इससे एलर्जी की समस्‍या के साथ-साथ पाचन संबंधी समस्‍याएं भी होती हैं.

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बच्‍चों को दूध से एलर्जी

जिन बच्चों या लोगों को दूध से एलर्जी होती है, उन्‍हें वह जल्‍दी महसूस नहीं होता है. आमतौर पर दूध की एलर्जी वाले लोगों में इसके लक्षण कई घंटे या फिर कई दिनों बाद देखने को मिलते हैं.

चलिए जानते है  इसके 6 लक्षण

1 यूरीन का रंग गहरा पड़ने लगता है, जिसमें कई बार रक्त या बलगम हो सकता है.

2.दूध की एलर्जी के चलते पेट में ऐंठन होना भी एक आम लक्षण है.

3.कई लोगों में दूध से होने वाली एलर्जी के कारण त्वचा पर चकत्ते भी होते हैं.

4.दस्त व खांसी होना भी इसके आम लक्षण हैं.

5.इसके अलावा गीली आंखें, बहती नाक भी इसके संकेत हो सकते हैं.

6. जी मिचलाना, उल्‍टी, घबराहट, होंठों के पास खुजली और सूजे हुए होंठ व गला भी इसके आम लक्षण होते हैं.

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बचाव व उपचार

  1. दूध की एलर्जी के लिए आपको सर्वप्रथम चिकित्‍सक से सुझाव लेना चाहिए.
  2. दूध का सेवन करना बंद कर देना चाहिए.
  3. यदि आप बच्‍चे को दूध पिला रहे हैं तो ऐसा दूध पिलाएं जिसमें लेक्‍टोस न हो.
  4. कोशिश करें इस स्थिति में बच्चे को सोया का दूध पिलाएं.

 

6 होममेड टिप्स : ऐसे रखें अपनी खूबसूरती का ख्याल

अगर आप अपनी खूबसूरती बढ़ाना चाहती हैं तो केवल त्वचा ही नहीं बल्कि हाथ, बाल, पांव और नाखून के सौंदर्य पर ध्यान देकर अपनी खूबसूरती में चार चांद लगा सकती हैं. तो चलिए जानते हैं,  घर पर कैसे आप अपनी सुंदरता को बढ़ा सकती हैं.

  1. हाथ तथा पांवों को गर्म पानी में डुबोने के बाद क्रीम से मसाज कर लीजिए, ताकि त्वचा कोमल तथा मुलायम बन जाए. हाथों के सौंदर्य के लिए उन्हें चीनी तथा नींबू जूस से रगड़ लें.

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2. अंडे के सफेद हिस्से को बालों को शैम्पू करने से आधा घंटा पहला लगा लीजिए. बालों को पोषण प्रदान करने के लिए अंडे के योक से खोपड़ी की हल्की-हल्की मालिश कीजिए और इसे आध घंटा तक रहने दीजिए. बाद में बालों को स्वच्छ पानी से धो डालिए. इससे बाल मुलायम हो जाते हैं तथा बालों में रंग लगाने के दौरान सुलझाने में मदद मिलती और ज्यादा नुकसान भी नहीं होता.

3. सप्ताह में दो बार बालों का तेल से ट्रीटमेंट करें. जैतून के तेल को गर्म करके इसे बालों तथा खोपड़ी पर मालिश करें. इसके बाद तौलिए को गर्म पानी में डुबोएं. पानी को निचोड़ने के बाद तौलिए को सिर पर पगड़ी की तरह पांच मिनट तक लपेट लें. इस प्रक्रिया को 3-4 बार दोहराएं, इससे बालों तथा खोपड़ी पर तेल को सोखने में आसानी होती है.

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4. यदि आपके बाल खुश्क पड़ गए हैं तो शैम्पू से पहले कंडीशनर कर लें. एक चम्मच सिरके को शहद में मिलाकर एक अंडे में मिला लीजिए. इस मिश्रण को अच्छी तरह फेंट लीजिए तथा खोपड़ी में लगा लीजिए. बाद में सिर को गर्म तौलिए से 20 मिनट तक ढक कर रखिए. इसके बाद बालों को ताजे ठंडे पानी से धो डालिए. इससे आपके बाल चमकदार व सुंदर दिखेंगे.

5. तीन चम्मच गुलाब जल में एक चम्मच ग्लीसरीन तथा नींबू का रस मिला लीजिए. इसे हाथों तथा पांवों पर आध घंटा तक लगा रहने दीजिए, इसके बाद ताजे सादे जल से धो डालिए. हाथों तथा नाखूनों के सौंदर्य के लिए बादाम के तेल तथा शहद को बराबर मात्रा में मिलाकर इसे नाखूनों तथा क्यूटिकल की मालिश करें. इसे 15 मिनट तक लगे रहने के बाद गीले तौलिए से साफ कर लीजिए.

6. चेहरे को साफ करने के लिए शहद को अंडे के सफेद पदार्थ में मिलाइए तथा इसे चेहरे पर 20 मिनट तक लगा रहने के बाद ताजे स्वच्छ पानी से धो लीजिए. जिनकी त्वचा अत्यधिक खुश्क है, वह आधा चम्मच शहद में बादाम तेल तथा ड्राई मिल्क पाऊडर मिला लें तथा इसका पेस्ट बनाकर इसे चेहरे पर लगा लें. इस पेस्ट को आधे घंटे तक चेहरे पर लगा रहने दें तथा बाद में पानी से धो डालें. इससे आपके चेहरे पर ताजगी आएगी.

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टीचर करे पिटाई तो क्या करें पेरैंट्स

स्कूल में टीचर द्वारा बच्चे की पिटाई, बात सिर्फ एक थप्पड़ की नहीं क्योंकि बेशक उस एक थप्पड़ या एक बेंत से बच्चे के शरीर को ज्यादा चोट न लगे लेकिन यह थप्पड़ उसे मानसिक रूप से गहरा सदमा पहुंचाता है.

बहुत सारे कानूनों और जागरूकता के प्रयासों के बाद भी स्कूलों में बच्चों की पिटाई की घटनाएं खत्म नहीं हो रही हैं. कई बार यह पिटाई खतरनाक भी साबित हो जाती है. बच्चों की पिटाई का सब से बड़ा कारण टीचर और बच्चे के बीच बढ़ती दूरी है. इस तरह की बढ़ती घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने प्रयास करने शुरू कर दिए हैं.

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सरकार ने स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड दिए जाने को पूरी तरह से मना कर दिया है. अब बच्चों को तमाचा मारना तो दूर, चपत लगाना भी टीचर को महंगा पड़ सकता है. यही नहीं, सरकार चाहती है कि शिक्षक बच्चों को तेज आवाज में फटकारने का काम भी न करें. यह सच है कि जागरूकता के कारण बच्चों की पिटाई के मामले कम हुए हैं पर अभी ये पूरी तरह से खत्म नहीं हुए हैं.

सरकारी और गैरसरकारी सभी तरह के स्कूलों में बच्चों को अनुशासित करने की प्रक्रिया में शारीरिक दंड को प्रभावी हथियार बना लिया गया है. बच्चे भय के कारण हिंसा का विरोध करने के बजाय शांत रहते हैं. कानून इस तरह के दंड को मूलभूत मानव अधिकारों का हनन मानता है. बच्चों और उन के मातापिता को अपने अधिकारों के प्रति सचेत होना चाहिए ताकि शिक्षक ऐसी हरकत न कर सकें. मारपीट करने की प्रवृत्ति को अगर देखा जाए तो पता चलता है कि इस के पीछे दूसरों को तकलीफ पहुंचाने की ही मानसिकता होती है.

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कभीकभी शिक्षक खुद की किसी कमी को छिपाने के लिए बच्चों से मारपीट करता है. शिक्षक को पता होता है कि छोटे बच्चे डर के मारे मारपीट की बात अपने घर में नहीं बताते और शिक्षक से भी किसी तरह का कोई प्रतिरोध नहीं करते हैं. यही वजह है कि बड़े बच्चों के साथ मारपीट की घटनाएं कम होती हैं.

शिक्षक अगर मारपीट करने के बजाय बच्चों को समझा कर उन्हें अनुशासन में रखे तो उन की समझ में बात जल्दी आ जाएगी. मारपीट की घटनाओं का बच्चों पर गलत प्रभाव पड़ता है. कई बार तो वे स्कूल के नाम से ही डरने लगते हैं.

बच्चे डरें नहीं, घर पर बताएं

जिन बच्चों के साथ मारपीट की घटनाएं होती हैं उन को घबराना नहीं चाहिए. उन को पूरी बात अपने घर में बतानी चाहिए. आमतौर पर बच्चे इसलिए घर में कुछ नहीं बताते क्योंकि उन को लगता है कि पढ़ाई न करने से शिक्षक ने बच्चे को मारा होगा. मातापिता आमतौर पर अपने ही बच्चे को दोषी ठहराने लगते हैं.

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बच्चों को सब से बड़ा खतरा यह होता है कि परीक्षा में शिक्षक नाराज हो कर उस को फेल कर देगा. इसलिए बच्चा शिक्षक के खिलाफ कोई शिकायत नहीं करता है. बच्चे मारपीट की उन घटनाओं को ही बताते हैं जिन में शरीर पर मार नजर आने लगती है.

क्या करें मातापिता

अगर स्कूल में शिक्षक बच्चे के साथ मारपीट करे तो मातापिता को स्कूल प्रबंधन से शिकायत करने से पहले उस शिक्षक से बात करनी चाहिए. बच्चे के साथ क्यों मारपीट की गई है, अगर इस बारे में शिक्षक का जवाब ठीक नहीं है तो स्कूल के प्रबंधतंत्र को मामले की जानकारी दे कर यह देखना चाहिए कि प्रबंधतंत्र ने क्या किया?

अगर शिक्षक के खिलाफ प्रबंधतंत्र कोई संतोषजनक कार्यवाही नहीं करता तो मातापिता को पुलिस के पास जा कर कानून से मदद मांगने में हिचकिचाना नहीं चाहिए.

अभिभावक को बच्चों के साथ बात कर के उस के मनोभावों को भी मजबूत करने का काम करना चाहिए. बच्चों को यह बताना चाहिए कि मारपीट की घटना को छिपाएं नहीं. अगर बच्चे

को चोट ज्यादा लगी है तो उस को सब से पहले डाक्टर को दिखाएं और उस की रिपोर्ट अपने पास रखें जिस से कानून की मदद लेने में आसानी हो सके.

स्कूल में शिक्षकों द्वारा बच्चों के साथ मारपीट के बहुत से तरीके होते हैं. बहुत सारे ऐसे तरीके हैं जो बच्चों को पता ही नहीं होते हैं. बच्चों और उन के मातापिता को इन तौरतरीकों को भी देखना और समझना चाहिए. शारीरिक दंड में बच्चों को डांटना, फटकारना, स्कूल के अंदर दौड़ाना, घुटनों के बल बैठाना, छड़ी से पीटना, चिकोटी काटना, चांटा या तमाचा मारना, लड़कियों का यौनशोषण करना, उन के नाजुक अंगों को सहलाना या दबाना, क्लासरूम में अकेले बंद कर देना और बिजली का झटका देना आदि शामिल हैं.

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इस के अलावा हर तरह के वे काम जिन के कारण बच्चा अपने को अपमानित महसूस करे, शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को हीन महसूस करे, भी मारपीट की श्रेणी में आते हैं. अगर स्कूल के शिक्षक ने कोई ऐसा काम किया है जो बाद में बच्चे की मौत का कारण बने, तो उस को भी मारपीट की श्रेणी में रखा जाता है.

शिक्षक को मिल सकती है सजा

अगर स्कूल के टीचर ने बच्चे को मारा है तो उस को उसी तरह से सजा मिल सकती है जैसे दूसरे लोगों को मारपीट करने के बाद सजा मिलती है. शिक्षक के खिलाफ भारतीय दंड कानून की धारा 323 (जानबूझ कर चोट पहुंचाना), 324 (मारने में घातक हथियार का प्रयोग करना),325 (अत्यधिक चोट पहुंचाना), 326 (जानबूझ कर घातक हथियार से चोट पहुंचाना), 304 (बिना इरादतन मारने पर यदि छात्र की मौत हो जाए), 302 (जानबूझ कर मारने पर छात्र मर जाए), 504 (जानबूझ कर अपमान करने) और 506 (धमकी दे कर कोई काम कराने) के तहत मुकदमे लिखे जा सकते हैं. मामला सही पाए जाने पर अदालत टीचर को इन धाराओं के हिसाब से सजा दे सकती है.

अंत्येष्टि

पति की मौत के बाद शैला के खुशहाल जीवन की बगिया ही उजड़ गई. उस के सूने जीवन में आशा की किरण बन कर आया परेश, उस का भतीजा.

पहियों की घड़घड़ाहट में अचानक ठहराव आ जाने से शैला की ध्यान समाधि टूट गई. अपने घर, अपने पुराने शहर, अपने मातापिता के पास 4 बरस बाद लौट कर आ रही थी. घर तक की 300 किलोमीटर की दूरी, अपने अतीत के बनतेबिगड़ते पहलुओं को गिनते हुए कुछ ऐसे काट दी कि समय का पता ही न चला.

पूरे दिन गाड़ी की घड़घड़ और डब्बे में कुछ बंधेबंधे से परिवेश में बैठे विभिन्न मंजिलों की दूरी तय करते उन सहयात्रियों में शैला को कहीं कुछ ऐसा न लगा था कि उन की उपस्थिति से वह जी को उबा देने वाली नीरस यात्रा के कुछ ही क्षणों को सुखद बना सकती. हर स्टेशन पर चाय, पान और मौसमी फलों को बेचने वालों के चेहरों पर उसे जीवन में किसी तरह झेलते रहने वाली मासूम मजबूरी ही दिखाई देती थी.

शैला घर जा रही थी. यह भी शायद उस की एक आवश्यक मजबूरी ही थी. 4 साल से हर लंबी छुट ्टी में वह किसी न किसी पहाड़ी स्थान पर चली जाती थी. इसलिए नहीं कि वह उस की आदी हो गई थी, पर शायद इसलिए कि उसी बहाने वह अपने घर न जाने का एक बहाना ढूंढ़ लेती थी, क्योंकि घर पर सब के साथ रह कर भी तो वह अपने मन के रीतेपन से मुक्ति नहीं पा सकती थी. घर के लोगों के लिए भी शायद वह अपने में ही मगन, किसी तरह जिंदगी का भार ढोने वाली एक सदस्य बन कर रह गई थी.

25 वर्ष पहले एम.एससी. की पढ़ाई पूरी कर के शैला 1 वर्ष के लिए विदेश में रह कर प्रशिक्षण भी ले आई थी. भारत लौटते ही उस की मेधा में डा. रजत जैसे होनहार सर्जन की मेधा का मेल विवाह के पावन बंधन ने कर दिया था. सबकुछ मिला शैला को…प्यार, अपनत्व, विश्वास, सम्मान और रजत पर अपना संपूर्ण एकाधिकार.

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27 वर्ष की आयु में ही डाक्टरी की कई उपाधियां ले कर रजत विदेश से लौटा था. शैला साल भर भी अपने जीवन के उन सुखद क्षणों को अपनी खाली झोली में भर कर संजो न पाई थी कि    डा. हरीश के यहां से डिनर से लौटते हुए रास्ते में कार दुर्घटना और फिर अंतिम क्षणों में रजत का शैला के हाथ को मुट्ठी में जकड़ कर चिरनिद्रा में सो जाना शैला कभी नहीं भूल सकती थी.

हर सफल आपरेशन के बाद रजत के चेहरे की चमक और स्नेहसिक्त आंखों से शैला को देख कर कहना, ‘शैला, तुम मेरी प्रेरणा हो,’ शैला के मन को कहां भिगो जाता, उस कोने को शैला शायद स्वयं अपनी खुशी के छिपे ढेर में ढूंढ़ न पाती.

तब से ले कर अब तक अपने सेवारत समय के 25 वर्ष शैला ने अपने हिसाब से तो बड़ी अच्छी तरह बिता दिए थे. इतना अवश्य था कि अपनी कठोर अनुशासनप्रियता या कुछ व्यक्तिगत आदर्शों की आलोचना, कभी अपने ऊपर लगाए कुछ झूठे सामाजिक आरोप, जो कभी उस के चरित्र से जोड़ कर लगाए जाते थे, वह सुनती थी. फिर समय ही सब स्पष्ट कर के कहने वालों के मुंह पर पछतावे की छाप छोड़ देता था.

शैला का सब सुनना और सब झेल जाना, अब उस का स्वभाव बन गया था. घर पर कभीकभी आना आवश्यक भी हो जाता था.

4 बरस पहले छोटी बहन सोनी की शादी में आई थी. वह भी बरात आने के 2 दिन पहले. सोनी की शादी के मौके पर ही छोटी भाभी ने पूछा था, ‘खूब पैसा जोड़ लिया होगा तुम ने तो शैला. क्या करोगी इतने धन का?’

शैला मुसकराई थी, ‘जोड़ा तो नहीं, हां, जुड़ गया है सब अपनेआप.’

किसी चीज की कमी नहीं थी उसे. उस के पास सभी भौतिक सुख के साधन थे और उस से बढ़ कर उस की सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान था. पर जो कभी उस के रीते मन पर निरंतर हथौड़े की चोट करती थी.

उसे वह कभी कह भी तो नहीं सकती थी. उस ने बचपन का वह मस्त और आनंदपूर्ण रूप नहीं देखा था, जो अन्य भाईबहनों में था. कुछ ऐसे हालात रहे कि वह शुरू से ही हंसना चाह कर भी खुल कर हंस न सकी. नियमित, सीमित, अपनेआप से बंधा हुआ एक जीवन. कालिज में पढ़ती थी तो कभी अगर छोटा भाई उस की पेंसिल ले लेता था या ‘डिसेक्शन बाक्स’ से छुरी निकाल लेता था तो कभी दीदी का और कभी मां का यही स्वर सुनाई देता था, ‘देबू देख, अभी शैला आएगी, कैसी हायहाय मचा देगी.’

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शायद शैला की गंभीरता ने ही उस घर में आतंक फैला दिया था. देबू के मन में शैला के प्रति पहले भय उपजा और फिर वही भय पलायन और कालांतर में आंशिक घृणा में बदल गया था. ऐसा शैला कभीकभी अब महसूस करती थी.

देबू अब डा. देवेंद्र था पर कभी उस ने शैला से खुल कर बातें नहीं की थीं. शैला चाहती थी कि देबू उस का पल्ला पकड़ कर उस से अपना अधिकार जताए और कहे, ‘दीदी, इस बार कश्मीर घुमा दो.’

‘ऐसा सूट बनवा दो.’

‘कुछ खिलातीपिलाती नहीं,’ आदि.

फिर अब तो देबू भी बीवी वाला हो गया था. सुंदरसलोनी बड़े ही सरल मन की सुनंदा उस की पत्नी थी. शादी के कुछ दिनों बाद ही देबू ने सुनंदा से कहा था, ‘नंदा, दीदी की खातिर यही है कि इन का कमरा बिलकुल ठीक रहे, इन की कोई चीज इधरउधर न हो.’

शैला के मन में कहीं चोट लगी थी. ठीक रहने को तो उस का खूबसूरत बंगला सवेरे से रात तक कई बार झाड़ापोंछा जाता था. उस के बगीचे के बराबर और कोई बगीचा पास में नहीं था. पर हर साल ‘पुष्पप्रदर्शनी’ में प्रथम पुरस्कार पाने वाले बगीचे के फूल क्या कभी उस के सूनेपन को महका सके थे?

ससुराल से उजड़ी मांग और सूने माथे पर सादी धोती का पल्ला डाल कर रोते वृद्ध ससुर के साथ जब शैला मांपिताजी के सामने अचानक आ कर तांगे से उतरी थी तो उस के सारे आंसू सूख चुके थे. चेहरा गंभीर था. निस्तेज ठहरी हुई आंखें थीं और वह अपने कमरे में आ गई थी. वह 1 वर्ष पहले छोड़े चिरपरिचित स्थान पर आ कर शांत हो कर बैठ गई थी, बस, ऐसे ही, जैसे एक यात्रा पर गई हो. उसी यात्रा में अपनी चिरसंचित निधि गंवा कर लौट आई हो.

फिर दूसरे वर्ष नैनीताल में साइंस कालिज की पिं्रसिपल हो कर चली गई थी. कुछ जीवन का खोखलापन और जीवन के प्रति विरक्तिपूर्ण उदासीनता में अगर कहीं आनंद की आशा और अपनत्व का कोई अंश था तो परेश.

परेश उस के बड़े भैया का बड़ा बेटा था. जबजब घर आई, परेश का आकर्षण उसे खींच लाया. जीवन के इतने मधुर कटु अनुभव ले कर भी अगर कहीं शैला ने अपने पूर्ण अधिकार का प्रयोग किया था तो वह परेश पर. घर वह आए या न आए, पर दूसरे क्लास की प्रगति रिपोर्ट से ले कर मेडिकल कालिज के तीसरे वर्ष तक का परिणाम उसे परेश के हाथों का लिखा निरंतर मिलता रहा था. उसी के साथ लगी हर पत्र में एक सूची होती थी जिस में कभी सूट, कभी घड़ी और कभी पिताजी से छिपा कर दोस्तों को पिकनिक पर ले जाने के लिए रुपयों की मांग.

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परेश का इस प्रकार मांगना और अंत में ‘बूआजी, अब्दुल के हाथ जल्दी भिजवा देना’ वाक्य शैला को अपनत्व की कौन सी सुखानुभूति दे जाता था, वह स्वयं नहीं जानती थी. मातापिता को अगर कहीं शैला के प्रति संतोष था तो वह परेश और शैला के इस ममतापूर्ण संबंध को देख कर.

घर जाती थी तो इधरउधर के हाल ले कर फिर भैयाभाभी और उस की परेश को ले कर विविध समस्या समाधान की वार्त्ता. वह क्या खाता था, क्यों उस के साथ घर के अन्य बच्चों सा व्यवहार होता था, जब वह शैला का एकमात्र वारिस था आदि.

कभीकभी मजाक में भाभी कहती थीं, ‘परेश तो बूआ का हकदार है, बूआ का बेटा है.’

सुन कर शैला कितनी खुश होती थी. खून का रिश्ता कभी झूठा नहीं होता, न ही हो सकता है. उस के गंभीर चेहरे पर खुशी की एक रेखा सी खिंच जाती थी. जिस साल परेश का जन्म हुआ था, उस के 3 साल के अंदर शैला ने घर के 4-5 चक्कर लगाए थे, कुछ अनुभवी प्रौढ़ महिलाएं दबी जबान से शैला से हंसहंस कर कहती थीं, ‘दीदी, भतीजा ऐसी जंजीर ले कर पैदा हुआ है जिस का फंदा बूआ के गले में है. जरा सी जंजीर कसी और बूआजी चल पड़ती हैं घर की ओर.’

और शैला के चेहरे पर आ जाता था गर्वीला ममत्वपूर्ण भाव. वह हलके से मुसकरा कर कहती, ‘बहुत प्यारा है मेरा भतीजा. घर जाती हूं तो पल्ला पकड़ कर पीछेपीछे घूमता रहता है.’ इस वाक्य के साथ ही शैला एक आनंदमिश्रित तृप्ति का अनुभव करती थी. 3 बरस के बच्चे को उस से कितना प्यार था.

जब से परेश बड़ा हो कर सफर करने लायक हुआ था, शैला उसे छुट्टियों में लगभग हर वर्ष अपने पास बुला लेती थी और भूल जाती थी कि वह अकेली है.

कभी परेश कहता, ‘बूआजी, आज तो पिक्चर चलना ही है, चाहे जो हो.’  तब शैला परेश को टाल न पाती.

अब तो परेश पूरे 24 साल का हो गया था. डाक्टरी के अंतिम वर्ष में था. शैला शुरू से जानती थी कि अगर वह मुंह खोल कर कह देती तो बड़े भैया व भाभी परेश को स्वयं आ कर उस के पास छोड़ जाते. पर कहने से पहले जाने क्यों मन के कोने में कहीं एक बात उठती, ‘अपनी गोद तो सूनी थी ही. भाभी से परेश जैसा प्यारा और होनहार बेटा ले कर उस के मन में सूनापन कैसे भर दूं.’

इधर कई बार वह तैयार हो कर आती, भैया से कुछ कहने को. पर जहां बात का आरंभ होता, वह सब के बीच से हट कर स्नानघर में जा कर खूब रो आती. एक बार फिर रजत का वाक्य कानों में गूंज उठता, ‘शैला, कभी बेटा होगा तो उसे ऐसा अव्वल दरजे का सर्जन बनाऊंगा कि बाल चीर कर 2 टुकड़े कर देगा.’

कल्पना में ही दोनों जाने कितने नाम दे चुके थे अपने अजन्मे बेटे को. उन्हीं नामों में से एक नाम ‘परेश’ भी था. यह शैला के सिवा कोई नहीं जानता था. पर शैला के ये सब सपने तो रजत की मृत्यु के साथ ही टूट गए थे. भाभी को जब बेटा हुआ था तब अस्पताल में ही भरे गले, भारी मन से अतीत के घावों को भुला कर, शैला मुसकराते चेहरे से भतीजे का नाम रख आई थी, ‘परेश.’

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आज 4 वर्ष बाद शैला घर आई तो परेश में बड़े परिवर्तन पा रही थी. कुछ आधुनिकता का प्रभाव, कुछ बदलते समय को जानते हुए भी शैला ने परेश पर अपना वही अधिकार और अपनी पसंद के अनुसार परेश को ढालने के प्रयासों में कोई कमी न की. लंबाचौड़ा, खूबसूरत युवक के रूप में परेश, शैला को स्टेशन लेने आया तो बस ‘हाय बूआ’ कह कर उस के हाथ से सूटकेस ले लिया. भविष्य की कल्पना में खोई शैला को परेश का वह व्यवहार कहीं भीतर तक साल गया. कार पर बैठते ही बोली, ‘‘क्यों रे परेश, अब ऐसा आधुनिक हो गया कि बूआ के पैर तक छूना भूल गया. देख तो घर पहुंच कर तेरी क्या खबर लेती हूं.’’

और शैला अधिकारपूर्ण अपनत्व की गरिमा से खिलखिला कर हंस पड़ी थी. पर शायद वह परेश के चेहरे पर आतेजाते भावों को देख न पाई थी.

15 दिन की छुट्टी पर आई थी शैला इस बार. भैयाभाभी हर खुशी उसे देने को उतावले नजर आते थे. मातापिता थके हुए, पर संतुष्ट मालूम होते थे. शैला दिन भर मातापिता के साथ बगीचे में बैठ कर, कभी पीछे नौकरों के क्वार्टरों में जा कर बूढ़े माली, चौकीदार, महाराज सब का हाल पूछती, तो कभी परेश से घंटों बातें करती.

परेश पास बैठता था, पर शाम होते ही अजीब सी बेचैनी महसूस करता और किसी न किसी बहाने वहां से उठ जाता था.

जाने से 5 दिन पहले यों ही घूमते- घूमते शैला, परेश के कमरे में पहुंच गई. पढ़ने की मेज पर तमाम किताबों, कागजों के बीच सिगरेट के अधजले टुकड़ों से भरी ऐश ट्रे थी. उस के नीचे एक मुड़ा रंगीन कागज रखा था. शैला ने उसे यों ही उत्सुकतावश उठा लिया. पत्र था किसी के नाम. लिखा था :

‘सोनाली, तुम्हें मैं कितना चाहता हूं, शायद मुझे अब यह लिखने की कोई जरूरत नहीं. मैं जानता हूं, मेरे उत्तर न देने पर तुम कितना नाराज होगी. कारण बस, यही है कि आजकल मेरी बूआजी आई हुई हैं, जो आज भी शायद 18वीं शताब्दी के कायदेकानूनों की कायल हैं. उन के सामने अभी तुम्हारा जिक्र नहीं करना चाहता. बेकार में आफत उठ जाएगी. मातापिता की कोई चिंता नहीं. वह तो आखिरकार मान ही जाएंगे. अंत में अपनी ही जीत होगी. पर बूआजी के सामने कुछ कहने की अभी हिम्मत नहीं है मेरी.

‘अब तुम ही समझ लो, ऐसे में कैसे तुम्हें घर ले जाऊं. पर वादा करता हूं कि उन के जाते ही मांपिताजी के पास तुम्हें ला कर उन्हें सब बता दूंगा और तुम्हें मांग लूंगा. बूआजी के रहते हुए ऐसा संभव नहीं है. समझ रही हो न? फिर यों भी मुझे कुछ तो आदर दिखाना ही चाहिए. आखिर वह मेरी बूआजी हैं. मैं क्षत्रिय और तुम ब्राह्मण, वह जमीनआसमान एक कर देंगी.’

और शैला वहीं पसीने में भीग गई थी. वह आंखों के सामने घिरते अंधेरे को ले कर कुरसी पकड़ कर किसी तरह बैठ गई थी. उस की आंखों के सामने, साड़ी का पल्लू पकड़ कर पीछेपीछे घूमने वाला परेश, फिर भविष्य की कल्पना में घोड़े पर चढ़ा दूल्हा परेश और जीवन की अंतिम घडि़यों में शैला की मृत्यु शैया के पास बैठा परेश अपने विभिन्न रूपों में घूम गया.

शैला वर्षों बाद स्नानघर में खड़ी हो कर रो रही थी. ऐसे ही जैसे बड़े अरमानों और त्यागों से जीवन की सारी संचित निधि से बनाया अपना घर कोई ईंटईंट के रूप में गिरता देख रहा हो. दिमाग पर बारबार लोहे की गरम सलाखें चोटें कर रही थीं.

‘आखिर वह मेरी बूआजी हैं… बूआजी…बस, और कुछ नहीं.’

तभी शैला के मन का एक कोना प्रश्नवाचक चिह्न बन कर सामने आ गया. क्या वह स्वयं जिम्मेदार नहीं थी परेश की उन भावनाओं के लिए? ठीक था, वह स्वयं अपने लिए अब तक समाज की परंपराओं और कहींकहीं खोखले आदर्शवाद को भी स्वीकारती आई थी. पर इस का अर्थ यह तो नहीं था कि वह उन्हें इस पीढ़ी पर भी थोपती रहेगी. क्यों वह इतनी उम्मीदें रखती थी परेश से? क्या हुआ जो वह आधुनिक ढंग से पहनता- घूमता था.

शैला अब सोचती थी कि शायद उस का उन छोटीछोटी बातों को गंभीर रूप देना ही उसे परेश से इतना दूर ले आया था. वह क्यों नहीं सोचती थी कि समाज बहुत आगे आ चुका है. ब्राह्मण, क्षत्रिय जैसे जातीय भेदभाव को सोचना क्या शैला जैसी पढ़ीलिखी, अच्छे संस्कारों में पलीबढ़ी स्त्री को शोभा देता था? शैला समझौता करेगी उस स्थिति से. वह उस नई पीढ़ी पर हावी होने का प्रयास नहीं करेगी. पुरानी लकीरों पर चलती आई जिंदगी को नया मोड़ दे कर, वह परंपरागत रूढि़यों व मान्यताओं की अंत्येष्टि स्वयं करेगी.

रात को खाने के बाद उस ने परेश को बगीचे में बुलाया. ओस से भीगी घास पर टहलती शैला का मन प्रफुल्लित था. परेश आया और चुपचाप खड़ा हो गया. शैला का हाथ उठ कर सहज ढंग से परेश के कंधे पर टिक गया. आंखों में सारा लाड़ उमड़ आया. बोली, ‘‘क्यों रे, परेश, मैं क्या इतनी बुरी हूं जो तू ने मेरी बहू को मुझ से छिपा कर रखा? यह बता, क्या मुझ से अलग हो पाएगा? मैं जानती हूं, अपनी बूआजी के लिए तेरा सीना फिर धड़केगा. बता, कहां रहती है सोनाली? यों ही ले आएगा उसे? बेटे, मेरे मन की आग तभी ठंडी होगी जब तू मुझे सोनाली के पास ले चलेगा. पहला आशीर्वाद तो मैं ही दूंगी उसे. तू शायद नहीं जानता कि मैं ने कितने अरमान संजोए हैं इन दिनों के लिए. मैं तेरी खुशी के बीच में कहीं भी ब्राह्मण, क्षत्रिय जैसी घटिया बात नहीं लाऊंगी.’’

और दूसरे दिन मेजर विक्रम के ड्राइंगरूम में भैयाभाभी और परेश के साथ बैठी शैला के सामने सौम्य, शालीन और सुंदर सी सोनाली ने प्रवेश किया. उस की मां ने उसे भाभी के सामने करते हुए उन के पैर छूने को कहा ही था कि भाभी ने सोनाली को बड़े प्यार से पकड़ कर शैला की तरफ करते हुए कहा, ‘‘इन का आशीर्वाद पहले लो. भले ही मैं ने परेश को जन्म दिया है, पर बेटा तो यह बूआ का ही है.’’

और शैला की आंखों से खुशी की ज्यादती से बहती आंसुओं की धारा उस के बरसों से जलते दिल को शीतलता देती चली गई.

परेश ने अपने पुराने दुलार भरे भाव से शैला को पकड़ते हुए इतना ही कहा, ‘‘बूआजी, आशीर्वाद दो कि तुम्हारे और अपने सब स्वप्न साकार कर सकूं.’’

शैला की सारी उदासी छिटक कर कहीं दूर जाने लगी और दूर होतेहोते उस की छाया तक विलीन हो गई. वह देख रही थी. उस की कल्पना में मृतक पति  डा. रजत की धुंधली छाया उभर आई. वह मुसकरा रहे थे. शायद कह भी रहे थे, ‘पुत्रवधू मुबारक हो शैली.’

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रिटायरमेंट

पूर्व कथा

हंसराज मलिक अपनी कंपनी के चीफ इंजीनियर को डांटते हुए नई मशीनों को लगाने का आर्डर देते हैं. और कल से अपने फैक्टरी आने की बात भी कहते हैं. यह निर्देश देते हुए वह कार में बैठ कर चले जाते हैं.

कार में बैठते ही वह अतीत की यादों में खो जाते हैं कि 20 साल पहले वह अपने परिवार के साथ काम ढूंढ़ने के लिए शहर में आए थे. किस तरह धीरेधीरे अपनी मेहनत के बल पर वह ‘मलिक इंडस्ट्रीज’ के मालिक बन गए.

इतनी तरक्की के बाद भी उन में कोई घमंड नहीं था. अपने कर्मचारियों के साथ दोस्ताना व्यवहार करते हंसराज अपने बिजनेस की बागडोर अपने दोनों बेटों सौरभ और वैभव को सौंप देते हैं. लेकिन उन के व्यापार करने का तरीका बिलकुल अपने पिता के विपरीत था. वे ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में डीलरों को खराब माल देना शुरू कर देते हैं.

रामदीन कंपनी का पुराना डीलर व हंसराज का दोस्त है. खराब माल देने की एवज में वह वैभव व सौरभ की शिकायत हंसराज से करता है तो हंसराज अपने चीफ एकाउंटेंट, चीफ इंजीनियर और बेटों को बुला कर डांटते हैं और रामदीन को हरजाना देने को कहते हैं. रामदीन के जाने के बाद सौरभ व वैभव अपने पिता को हरजाना देने की बात पर नाराज होते हैं.

सब के चले जाने के बाद हंसराज सोच में पड़ जाते हैं कि कंपनी में आखिर चल क्या रहा है. अगले दिन हंसराज फैक्टरी जाते हैं तो वहां वह चीफ क्वालिटी कंट्रोलर और चीफ इंजीनियर की बातें सुन लेते हैं. वे दोनों हंसराज को वहां देख कर चौंक जाते हैं. हंसराज के पूछने पर वे कंपनी और मशीनों की स्थिति से उन्हें अवगत कराते हैं. और अब आगे…

अंतिम भाग

गतांक से आगे…

मशीनों का निरीक्षण करने के बाद शिव आ कर हंसराज को बताता है कि कुछ पुरजे बदलने पड़ेंगे. किंतु जो पुरजे चाहिए वे हमारे स्टाक में नहीं हैं.

‘कितने दिन में पुरजे आएंगे?’ हंसराज पूछते हैं.

‘कम से कम 2 महीने लग जाएंगे?’

‘क्या कहते हो, 2 महीने. यानी कि 2 महीने फैक्टरी बंद. कंपनी का नाम खराब करने में तुम लोगों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है,’ हंसराज अधिक क्रोधित हो उठे, ‘मैं ऐसा नहीं होने दूंगा. शिव, तुम अभी नए पुरजों का आर्डर दो और खराब पुरजों को रिपेयर करवा कर मशीनों को 1-2 दिन में चालू करो.’

रिपेयर के बाद मशीनें सिर्फ 2 दिन चलीं. इस बार हंसराज ने शिव से पूछा, ‘तुम्हें मालूम है कि जब यह फैक्टरी लगी थी तब रामनरेश की कंसलटेंसी ली थी. आजकल वह कहां है, काफी वर्षों से उस से मुलाकात नहीं हुई. वह जरूर इस समस्या का हल निकालेगा.’

शिव ने डायरी निकाली, ‘सर, फोन नंबर तो पुराने हैं,’ डायरी देख कर शिव बोला, ‘लेकिन कृष्णा नगर में मकान का नंबर लिखा है, वहीं जा कर पता चलेगा.’

‘चंदरपाल, सुनो, तुम जाओ,’ हंसराज मलिक बोले, ‘तुम उस को जानते हो और उस के घर भी गए हो.’

‘हां, सर, उस का मकान मैं ने देखा हुआ है,’ कह कर चंदरपाल निकल पड़ा.

रामनरेश घर पर ही मिल गया था. चंदरपाल को देखते ही पहचान लिया, ‘क्या हाल है, चंदरपाल, आज इधर कैसे आना हुआ. आजकल कहां हो?’

‘अभी तो वहीं मलिक इंडस्ट्रीज में टाइमपास कर रहा हूं. आप से थोड़ा सा काम है, सेठजी बात करना चाहते हैं,’ चंदरपाल ने नंबर डायल किया.

‘भई, हंस, किस गुफा में छिपे रहते हो, पुराने दोस्तों को भूल गए लगते हो… हुक्म करो मेरे आका, कैसे इस नाचीज की याद आ गई.’

‘सुना है, रामनरेश तू बड़ा आदमी बन गया. उत्तराखंड में तू ने बड़ीबड़ी फैक्टरियां लगवा दीं तो हम जैसे छोटे दोस्तों को भूल गया,’ हंसराज ने मजाक किया, ‘अच्छा एक बात जिस के लिए चंदरपाल को तेरे पास भेजा है, कुछ मशीनें चेक करवानी हैं, अभी आजा, शाम का नाश्ता एकसाथ करेंगे.’

‘कल सुबह आता हूं, अभी जरा दांतों के डाक्टर के पास जाना है. कल रात से दांत दुख रहे हैं.’

अगले दिन वादे के अनुसार रामनरेश ने फैक्टरी में मशीनों का निरीक्षण किया. निरीक्षण के बाद हंसराज से बोला, ‘यार हंस, तुम्हारी फैक्टरी में मशीनों की ये दुर्गति, मैं तो सोच भी नहीं सकता, तुम ऐसे तो कभी नहीं थे, तुम्हें तो मशीनें अपनी जान से अधिक प्यारी होती थीं.’

हंसराज अब किस मुंह से बताएं कि उन के अपने बेटे ही उन के सिद्धांतों की धज्जियां उडा़ रहे हैं, ‘खैर, इन बातों को छोड़, अब क्या करना है, यह बता.’

‘हंस, एक तो तुम कुछ मशीनों को रिटायर कर के नई मशीनों का आर्डर भेजो, लेकिन मशीनें आने में 7-8 महीने लग ही जाएंगे. तब तक पुराने पुरजों को बदलना पडे़गा, लेकिन पुरजों का आर्डर तुम कालीचरण वर्कशाप को ही देना. वैसे बाजार में सस्ते भी पुरजे मिल जाएंगे, लेकिन उन का कोई भरोसा नहीं होता. अच्छी क्वालिटी के पुरजे केवल कालीचरण ही दे सकता है. मैं कल उत्तराखंड जा रहा हूं पर कोई दिक्कत हो तो मेरे मोबाइल पर कांटेक्ट करना.’’

हंसराज ने शिवनारायण के साथ वैभव और सौरभ को भी खास हिदायत दी कि रामनरेश के बताए उपायों पर अमल करें, लेकिन परचेज डिपार्टमेंट का हैड तिलकराज बेहद चापलूस और रिश्वतखोर था, जहां से उसे अधिक कमीशन मिलता वहीं से सामान खरीदा जाता. छोटे सेठों को उस ने अपनी बातों से गुमराह कर रखा था.

इस बार उस ने वैभव और सौरभ के कान भर दिए कि कालीचरण से रामनरेश की सेटिंग है, रामनरेश को कालीचरण कमीशन देता है. वहां से पुरजे बनवाने की कोई जरूरत नहीं है. दूसरी बहुत सी वर्कशाप हैं, जहां से सस्ता और टिकाऊ सामान बन सकता है.

वैभव और सौरभ को तिलकराज पर भरोसा था. उन दोनों ने रामनरेश की सलाह अनसुनी कर के तिलकराज का रास्ता चुना, लेकिन पुरजे दोचार दिन में ही खराब हो जाते. ऐसे करते हुए 2 महीने बीत गए, मशीनें और भी खराब हो गईं. एक दिन एक मशीन में बहुत जोर से धमाका हुआ और 2 कर्मचारियों को चोट लग गई. घायल कर्मचारियों को अस्पताल में दाखिल कराया गया.

इस घटना को बीते अभी 2 दिन ही हुए थे कि कुछ अन्य मशीनों में भी खराब पुरजों के कारण धमाके हुए और कई कर्मचारी घायल हो गए. शिवनारायण काफी परेशान हो गए कि अब तो हंसराज को पूरी बात बतानी पडे़गी, तभी तिलकराज ने वैभव और सौरभ से कहना शुरू किया कि फैक्टरी में कुछ अनिष्ट हो रहा है, उस के पीछे किसी बुरी आत्मा का हाथ है और शुद्धि के लिए पूजाहवन आदि कराने की जरूरत है.

वैभव और सौरभ दोनों ने आपस में विचार किया कि पूजा करवानी चाहिए. आजकल हर जगह बिना पूजा के कुछ भी कार्य शुरू नहीं होता और हर व्यक्ति बिना भविष्यफल पढ़े घर से बाहर भी नहीं निकलता है. हर जगह वास्तुशास्त्र की धूम है. मशीनों की वास्तु के मुताबिक सेटिंग करानी पडे़गी.

वैभव और सौरभ दोनों की पत्नियां भी उन पंडितों के पीछे पड़ी रहती थीं. उन की किट्टी पार्टियों में आएदिन किसी अंगरेजी में लच्छेदार प्रवचन देने वाले को बुलाया जाता था. वैभव और सौरभ को भी जाना पड़ता था और वे दोनों भी पढ़ाईलिखाई भूल कर ढकोसलों के दलदल में फंसने लगे थे. तिलकराज को यह मालूम था और उस ने इस का पूरा फायदा उठाया.

अब तो तिलकराज का हौसला बढ़ गया, ‘सरजी, आप ने डिंपल कंपनी का नाम तो सुना होगा. फैक्टरी बंद होने की नौबत आ गई थी, तब एक पहुंचे हुए वास्तुशास्त्री से सलाह ले कर पूरी फैक्टरी को नए सिरे से बनवाया. अब तो उन के पौबारह हैं,’ तिलकराज ने आग में घी डाल दिया.

‘तिलक बिलकुल ठीक क ह रहा है. मैं ने भी कई आफिस देखे हैं, जो एकदम नए सिरे से वास्तु के हिसाब से बने हैं,’ वैभव ने सौरभ से कहा.

‘हां, ठीक बात है, पापा ने कभी इस बारे में नहीं सोचा. आज तो जमाना सिर्फ वास्तु का है. हमें शीघ्र ही एक अच्छे वास्तुशास्त्री से मिल कर उपाय कर लेना चाहिए,’ सौरभ ने हां में हां मिलाई फिर तिलक की ओर देख कर बोला, ‘क्या तुम ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हो?’

‘सरजी, बहुत विद्वान हैं. शास्त्री नगर के मंदिर के प्रमुख पंडित हैं. ज्योतिष के साथसाथ वास्तुशास्त्र के भी विद्वान हैं. बस, आप एक बार मिलेंगे तो किसी दूसरे के बारे में सब भूल जाएंगे. कहें तो आप की फोन पर बात करवा दूं,’ तिलकराज ने चापलूसी तेज करते हुए कहा.

‘हां, समय है तो बात करवाओ,’ सौरभ की यह बात सुनते ही तिलक ने झट से शास्त्रीजी का मोबाइल लगाया.

‘शास्त्रीजी, मैं तिलक.’

‘हां, वत्स, इस समय कैसे कष्ट उठाया,’ दूसरी तरफ से शास्त्रीजी बोले.

‘हमारे सेठजी आप से मिलना चाहते हैं, क्या आज आप समय निकाल सकेंगे?’’

कुछ क्षण बाद शास्त्रीजी बोले, ‘ठीक है, वत्स. कल 11 बजे का समय उचित रहेगा.’

‘ठीक है, शास्त्रीजी, मैं खुद आप को लेने आ जाऊंगा,’ तिलक ने कहा.

तिलकराज खुद शास्त्री नगर में रहता था और शास्त्रीजी उस के महल्ले के मंदिर में पुजारी थे. तिलक पूजापाठ में बहुत अधिक विश्वास रखता था, उस की पत्नी लगभग पूरा दिन ही मंदिर में रहती थी. शास्त्रीजी का नाम फैलाने में तिलक का काफी हाथ था, जहां भी मौका मिलता, शास्त्रीजी के गीत गाता थकता नहीं था. शास्त्रीजी भी तिलक का पूरा ध्यान रखते थे. चंदे, चढ़ावे और दानदक्षिणा का एक हिस्सा वे तिलक को देते. इस प्रकार तिलक और शास्त्रीजी एकदूसरे के पूरक थे.

अगले दिन ठीक 11 बजे शास्त्रीजी अपनी कार में फैक्टरी पहुंचे. पूरी फैक्टरी का निरीक्षण करने के बाद वैभव और सौरभ के केबिन में अपना लैपटाप निकाला और कुछ गणना के बाद बोले, ‘वत्स, पूरी फैक्टरी बिना सोच के वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत बनाई गई है, इसी कारण फैक्टरी में मशीनों का कष्ट रहेगा.’

‘कुछ उपाय बताइए,’ वैभव ने हाथ जोड़ कर कहा.

‘वत्स, हमारे शास्त्रों में हर संकट का निवारण है. यदि आप तैयार हैं तो…’

‘शास्त्रीजी शुभ कार्य में देर नहीं होनी चाहिए,’ सौरभ ने उन की बात बीच में काट कर कहा.

‘वत्स, आप को अति शीघ्र यज्ञ करवाना होगा और वास्तु के हिसाब से मशीनों की दिशा बदलनी पडे़गी.’

वैभव और सौरभ के तैयार होने पर शास्त्रीजी ने शुक्रवार के 11 बजे का मुहूर्त निकाला.

‘वत्स, यज्ञ की सफलता के लिए जरूरी है कि कार्य में विघ्न नहीं पड़ना चाहिए, जब तक यज्ञ होगा, फैक्टरी के दरवाजे बंद रहने चाहिए, जो जहां होगा, वहीं रहेगा, कोई भी अंदरबाहर नहीं आएगाजाएगा. यज्ञ का सारा सामान हम लाएंगे ताकि उस में किसी का गंदा हाथ न लग सके. इस महान यज्ञ की लागत और दक्षिणा 2 लाख 21 हजार रुपए होगी, जो आप को एडवांस में देनी होगी. यज्ञ संपन्न होने के बाद वास्तुशास्त्र के हिसाब से फैक्टरी में परिवर्तन के सुझाव दिए जाएंगे. आप को कुछ नहीं करना होगा. सब हम संभाल लेंगे.’

यज्ञ की रकम ले कर शास्त्रीजी तो चले गए. तिलक की खुशी की कोई सीमा नहीं थी, क्योंकि शास्त्रीजी से 20 प्रतिशत कमीशन पहले ही तय हो चुका था.

‘शास्त्रीजी बड़े हाईटेक हैं. लैपटाप ले कर काम करते हैं,’ वैभव ने सौरभ को इशारा किया.

‘भाई, हमारा लैपटाप तो पुराना हो गया है, शास्त्रीजी का लैपटाप एकदम स्लिम नया लेटेस्ट माडल है,’ सौरभ बोला.

‘नया लैपटाप लेने के बाद तिलक, मैं अपना पुराना लैपटाप तुम्हें दे दूंगा. तुम्हारे पास भी लैपटाप जरूर होना चाहिए. आजकल जमाना लैपटाप का है.’

यज्ञ की खबर सुनने से पहले ही हंसराज को अपनी साली के ससुर के देहांत पर पटना जाना पड़ा. ससुर पटना से भी 200 मील दूर एक छोटे शहर में रहते थे. जाने से पहले वह कह गए, ‘मैं 4-5 रोज में आ जाऊंगा.’

बेटों ने पिता के पीछे पूजा करना ज्यादा ठीक समझा. आखिर पूजा का दिन शुक्रवार आ गया. शास्त्रीजी के चेले ने 1 घंटा पहले आ कर पूजा की तैयारियां संपन्न कीं. ठीक 11 बजे फैक्टरी के दरवाजे बंद कर दिए गए और पूजा शुरू की. विधिविधान के साथ शास्त्रीजी के पूजा करने के तरीकों से सब मंत्रमुग्ध हो गए कि ऐसी विधि से पूजा अब तक सिर्फ टेलीविजन सीरियलों में ही देखी थी. 2 घंटे की पूजा के बाद शास्त्रीजी ने शंख बजाया. शंख की ऐसी आवाज वैभव व सौरभ ने महाभारत धारावाहिक में सुनी थी. सभी मुग्ध हो पूजा में तल्लीन थे. जैसे ही दूसरी बार शास्त्रीजी ने शंख बजाया, तभी एक जोर से धमाका हुआ और तीव्र कंपन और घरघराहट के साथ सारी मशीनें रुक गईं. वैभव ने आवाज दी, ‘शिव, फटाफट देखो, क्या हुआ?’

एक मशीन टूट गई थी. शुक्र यह था कि 2 मशीनमैनों को मामूली चोटें आईं, जिन्हें प्राथमिक चिकित्सा के लिए अस्पताल ले जाया गया.

2 रोज बाद जब हंसराज लौटे तो शिवनारायण के साथ निरीक्षण करते समय उन्होंने कहा, ‘शिव, रामनरेश यदि शहर में है तो उसे फौरन बुलाओ.’

संयोग से रामनरेश शहर में थे, जो कुछ समय बाद फैक्टरी में आ गए. रामनरेश ने आते ही शिकायत की, ‘हंस, तुम कंजूस कब से हो गए, मैं ने तुम्हें ऐसा कभी नहीं देखा था.’

‘क्या हुआ, नरेश, आज तो तेरे तेवर गरम हैं.’

‘तुम से कहा था कि कालीचरण वर्कशाप से पुरजे बनवाना, लेकिन सस्ते के चक्कर में एक तो 4 बार पुरजे बनवाए, जिस का परिणाम अब तुम देख रहे हो, साथ में पूरे बाजार में मुझे बदनाम कर दिया कि मैं कालीचरण से कमीशन लेता हूं. आखिर किस जन्म का बदला मुझ से ले रहे हो?’

रामनरेश की बात सुन कर हंसराज भौचक रह गए, लेकिन तुरंत समझ गए कि यह करतूत तिलक की होगी. मौके की नजाकत समझते हुए उन्होंने बात पलट कर रामनरेश से माफी मांगी और पूछा कि अब क्या करना चाहिए.

‘हंस, जो बात मैं ने पहले कही थी, वही दोहरा रहा हूं. नई मशीनों के लिए तुरंत आर्डर दे दो. मशीनें आने में कम से कम 6 महीने लग जाएंगे. तब तक कालीचरण से पुरजे बनवा लो. दो बातें मैं तुम्हारे लाड़लों से कहना चाहता हूं…पहली यह कि बिना किसी सुबूत के किसी पर आरोप नहीं लगाने चाहिए. दूसरी, बाजार में मेरी काफी अच्छी साख है, आज तक ईमानदारी और लगन से काम किया है, तभी आज 62 साल की उम्र में भी लोग मेरे पीछे घूमते हैं, कभी किसी के आगे काम के लिए चापलूसी नहीं की. और तुम मुझे बदनाम कर के क्या हासिल कर लोगे. क्या तुम्हारी मशीनें ठीक हो गईं? अच्छी क्वालिटी के पुरजे लगाने के बदले पूजा और वास्तु के चक्कर में पड़ गए.

‘अंधविश्वास नहीं करना चाहिए. हंस, तुम से एक बात पूछना चाहता हूं कि आज से 20 साल पहले जब तुम ने यह फैक्टरी लगाई थी, मैं उस समय भी तुम्हारा सलाहकार था, हम ने फैक्टरी एक्ट के नियमानुसार निर्माण किया और इसी फैक्टरी से लाभ कमा कर 3 और फैक्टरियां लगाईं. अगर हम ने वास्तु के हिसाब से फैक्टरी का निर्माण नहीं किया तो 20 साल तक लगातार मुनाफा क्यों आया?

‘एक बात मेरी और सुनो, लाभ और हानि, सुख और दुख एक सिक्के के दो पहलू हैं, जो बारीबारी से हमारी जिंदगी में आते हैं. दुनिया का कोई भी आदमी इस से बच नहीं सकता. इतिहास गवाह है, किसी भी अमीर या मशहूर आदमी की जिंदगी देख लो, उतारचढ़ाव, सुख और दुख से कोई नहीं बचा है.

‘क्या आप ने कभी कार ठीक करवाने के लिए कोई पूजा की है, तब इन मशीनों की पूजा क्यों. मेरी मंशा कोई भाषण देने की नहीं है लेकिन तिलक के झूठे प्रचार से मुझे ठेस लगी, शायद इसी कारण कुछ अधिक बोल गया,’ कहतेकहते रामनरेश की आंखें भर गईं और अपना ब्रीफकेस उठा कर अपनी कार में बैठ कर रवाना हो गया.

वैभव और सौरभ पर क्या असर हुआ. यह तो पता नहीं, लेकिन हंसराज ने शिवनारायण को बुला कर कहा कि फौरन नई मशीनों के आर्डर तैयार करें. आर्डर तैयार होते ही खुद हंसराज ने आर्डर और अग्रिम राशि के चेक पर दस्तखत किए और अपनी कार में बैठ कर घर के लिए रवाना हुए.

‘‘साबजी, घर आ गया है,’’ ड्राइवर की आवाज सुन कर हंसराज अतीत से वर्तमान में आ गए और धीरेधीरे चलते हुए कोठी के लान में कुरसी खींच कर बैठे और ड्राइवर से कहा, ‘‘अंदर बीबीजी को कहना, चाय के साथ यहीं लान में आ जाएं.’’

उन्हें लगा कि उन का रिटायरमेंट 5-7 साल के लिए फिर टल गया. अब जब तक बेटे पटरी पर न आ जाएं, उन्हें एक बार फिर कोल्हू का बैल बनना पडे़गा, पर जब कोल्हू अपना ही हो तो बैल बनने में क्या एतराज.

वीआईपी के नए अर्थ

हमारे शब्दछेड़  मित्र प्रो. अर्थसिंह को हर बात में नए अर्थ ढूंढ़ लेने का आदत है. यों उन का नाम पृथ्वीसिंह है मगर हम यार लोग उन की अर्थ निकालने की आदत के कारण उन्हें अर्थ सिंह के नाम से बुलाते हैं. यह नाम ज्यादा ठीक भी बैठता है. वह भी खूब मजा लेते हैं अपने नए डाउन टू अर्थ नाम का.

अभी कल ही प्रोफेसर मिले. पूछा, ‘‘कहां रहते हो?’’

बोले, ‘‘आजकल कुरसियों के नए अर्थ खोज रहा हूं.’’

‘‘कुरसियों के नए अर्थ? क्या विषय है यार?’’

हम ने कह तो दिया मगर तत्काल दिलचस्पी ने हमें घेर लिया. कहा, ‘‘एक्सप्लेन करो.’’

अर्थसिंह ने समझाया, ‘‘वीआईपी होना एक चमकदार कुरसी होना है, क्यों?’’

हम ने कहा, ‘‘ठीक है, मगर इस का मतलब तो सीधा है, वेरी इंपोर्टेंट पर्सन. हां, खुशवंत सिंह के किसी कालम में हम ने 2 गलत से अर्थ पढ़े थे ‘वेरी इंपोर्टेंट (महत्त्वपूर्ण) प्राब्लम’ और ‘वेरी इनकन्विनिएंट (असुविधाजनक) पर्सन.’

अर्थसिंह खिलखिला कर हंसने लगे, ‘‘हां, यार, बडे़ जबर्दस्त अर्थ थे. मगर थे खरखरे, मैं ने भी कोशिश कर कुछ नए अर्थ खोजे हैं, मुलाहिजा फरमाएं, शायद आप को स्वादिष्ठ लगें.

‘‘सब से पहले कुछ मीठे अर्थ…‘वेरी आइडियल (उत्कृष्ट) पर्सन’, ‘वेरी आइडल (आराध्य) पर्सन’, ‘वर्सेटाइल (बहुमुखी) इंडियन पर्सनेलिटी’, ‘वेरी इल्सट्रियस   (उदाहरणीय) पर्सन’ ‘वेरी इंपार्शियल (निष्पक्ष) पर्सन’ ‘वेंचर (साहसिक कार्य) इनीशिएटिंग पर्सन’, ‘वेरी इंटैलिजेंट पायनियर (मार्गदर्शक)’, ‘वेरी इंसपायरिंग (प्रेरक) पर्सन’, ‘वेरी इंटैलिजेंट पर्सन’.’’

हम ने कहा, ‘‘वाह, क्या सही अर्थ हैं…बेहद शालीन व सभ्य. आप ने अपने नाम को सही रूप में चरितार्थ कर दिखाया. आजकल के वीआईपीज को अच्छा लगने वाला काम किया. एक लिस्ट अगर आप सभी वीआईपीज के पास भिजवा दें तो सामाजिक व आध्यात्मिक कार्यों को समर्पित उन की पत्नियों की प्रसिद्ध संस्था आप को सहर्ष सम्मानित कर सकती है. इस बहाने आप अखबारों में छा जाएंगे.’’

प्रो. साहब के चेहरे पर संतुष्टि भरी मुसकान आ चुकी थी. वह बोले, ‘‘अब कुछ और किस्म के अर्थ बडे़ अदब के साथ पेश करता हूं. थोड़े कड़वे हैं, प्लीज, आराम से चखना… ‘वेरी आइडल (समयगंवाऊ) पर्सन’, ‘वेरी इंडिफ्रेंट (उदासीन) पर्सन’, ‘वेरी इग्नोरेंट (अनजान) पर्सन’, ‘वेरी इनआर्टिकुलेट (अस्पष्ट) पर्सन’, ‘वेरी इग्नोरिंग (उपेक्षाकरू) पर्सन’, ‘वेरी वेरी इलिबरल (संकीर्ण) पर्सन’, ‘वेरी इम्मोबाइल (गतिहीन) पर्सन’, ‘वेरी इम्मोडेस्ट (अशिष्ट) पर्सन’, ‘वेरी इम्पेशेंट (उतावले) पर्सन’…’’

‘‘बसबस,’’ अर्थसिंह को रोका हम ने और कहा, ‘‘क्या गजब करते हो यार.’’

‘‘क्या हुआ? अर्थ गलत हो गया क्या? कौन सा गलत है, बताओ? अभी सही अर्थ खोजने की कोशिश करता हूं.’’

अर्थसिंह को शायद शक होने लगा कि उन्होंने ठीक अर्थ नहीं निकाले हैं.

हम ने उन से साफ कह दिया, ‘‘आज जमाना सही अर्थों का नहीं है, बल्कि सब को उन की पसंद के अर्थ परोसने का है. आप यह कड़वे अर्थ किसी वीआईपी के पास भी नहीं पहुंचने देना, नहीं तो अनर्थ हो जाएगा.’’

प्रोफेसर थोड़े उखड़े, घबराए, लड़खड़ाए. अब वीआईपी शब्द का रोबदाब व असर तो होता ही है. हम ने कहा, ‘‘घबराइए नहीं, इस समय आसपास कोई वीआईपी नहीं है, पर ध्यान रखिएगा.’’

कुछ देर हम दोनों चुप रहे. शायद कड़वे अर्थों का असर होने लगा था. थोड़ी देर बाद प्रो. अर्थसिंह जाने लगे तो हमें लगा कि अभी उन के पास वीआईपी जैसे सजीले, गर्वीले, ग्रेट शब्द के कुछ और अर्थ भी हैं, जो वह बताना चाहते थे मगर हम ने ही उन्हें  रोक दिया था. अब जिम्मेदारी हमारी बनती थी, सो हम ने उन से अनुरोध किया, ‘‘बुरा न मानें, बाकी अर्थ भी बता दें. आप ने सच, बड़ी मेहनत की है.’’

अर्थसिंह बोले, ‘‘वीआईपी के मीठे और कड़वे अर्थ तो आप को बता चुका हूं, अब जो अर्थ बता रहा हूं उन्हें मैं ने खट्टी श्रेणी में रखा है. कुछ नमूने देखें… ‘वैरिड (विविध) इनट्रस्ट पर्सन’, ‘वेरी इंफ्लेमेबल (ज्वलनशील) पर्सन’, ‘वेरी इंबैलैंस (विषम) फिजीशियन’, ‘वेरी इंडिपेंडेंट (स्वतंत्र) पर्सन’, ‘वेरी इमेजिनेटिव (कल्पनाशील) पैट्रिएट (देशभक्त)’, ‘वेरी इनसिंसियर (कपटी) पार्टनर’…कुछ और भी हैं, पर रहने दो.’’

अर्थसिंह के बताए अनर्थ जैसेतैसे निबट गए. शाम को किसी वीआईपी से मिलने जाना था मगर यह निश्चय किया कि कल जाऊंगा ताकि नए अर्थ सुबह तक भूल जाऊं. डर लगने लगा था कहीं याद रह गए तो मुश्किल हो जाएगी.

कांस फिल्म 2019:  दीपिका के साथ क्यों नही थे रणवीर सिंह?

हाल ही में कांस 2019 में दीपिका पादुकोण ने हिस्सा लिया और अपनी अदाओं से सभी का दील जीत लिया. दीपिका पादुकोण की सभी ड्रेसेस और लुक्स रेड कारपेट पर कहर ही ढाते दिखे. दीपिका के अलावा यहां कंगना रनौत और प्रियंका चोपड़ा ने भी शानदार एंट्री की. लेकिन इस बार अभी तक दीपिका ही 72वें कांस फिल्म फेस्टिवल को रुल करती दिखीं. लेकिन यहां देखने वाली बात ये रही की एक्ट्रेस अकेली ही इस इवेंट में हिस्सा लेने पहुंची थी और उनके साथ पति रणवीर सिंह मौजूद नहीं थे.

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इस बारे में जब दीपिका से पूछा गया तो उन्होंने बहुत मजेदार जवाब दिया. दीपिका ने कहा कि रणवीर सिंह मेट गाला इवेंट के लिए ज्यादा बेहतर हैं और कांस फिल्म फेस्टिवल में वो उनसे ऊपर रहेंगी.वाकई में, ऐसा तो उनके फैंस भी मानते हैं, इससे पहले मेट गाला 2019 में अपीयरेंस से पहले दीपिका ने रणवीर के लिए कहा था.

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‘उनके फैशन का अंदाज इतना क्रेजी है और मुझे लगता है कि दरअसल, वोथीम के हिसाब से बिल्कुल ठीक रहते हैं. मुझे लगता है कि वो ऐसे इंसान हैं जो थीम के हिसाब से 100 प्रतिशत न्याय करेंगे. मैं बस उन्हें रीप्रजेंट कर रही हूं.  दीपिका ने मेट गाला 2019 और कांस 2019 दोनों ही इवेंट्स में अकेले ही हिस्सा लिया था. दरअसल, रणवीर सिंह इन दिनों अपनी फिल्म ’83’ की शूटिंग में बिजी हैं.

 

सर्वेक्षण हैं या बैलेन्स शीट

दाद देनी होगी न्यूज चैनल्स और विभिन्न एजेंसियों की जिन्होंने इतनी शिद्दत से नमक हलाली निभाईं कि नमक हलाल फिल्म के अमिताभ बच्चन और सुरेश ओबराय भी शर्मा जाएं. जो सर्वे दिखाये गए वें भाजपा और एनडीए समर्थकों के कलेजे को ठंडक पहुंचाने वाले हैं, पौराणिक भाषा में कहें तो हृदय और मस्तिष्क को शीतलता देने वाले हैं जिन्होंने जोड़-तोड़ और तोड़-मरोड़ कर साबित कर दिया हैं कि ऐसे मानो, चाहे वैसे मानो आएंगे तो मोदी ही. अच्छा तो यह रहा कि किसी ने यह नहीं कहा कि उसके आंकड़े वोटरों से की गई बातचीत पर आधारित न होकर सीधे वैकुंठ से आए हैं इसलिए इन पर शक शुबहा नहीं किया जाना चाहिए यह अधर्म और पाप होगा.

इन पोलों में कई पोल हैं जिन्हें देख मीडिया के कारोबारियों पर तरस और हंसी दोनों आते हैं . एक चैनल ने धमाका सा किया कि भाजपा उत्तर प्रदेश में केवल 22 सीटें ले जा पा रही हैं लेकिन उसके बगल वाले चैनल का एंकर नुमा पत्रकार या पत्रकार नुमा एंकर स्पीकर फटने की हद तक चिल्ला रहा थे कि भाजपा वहां 50 से भी ज्यादा सीटें ले जा रही है. अब देखने वाला बेचारा फंस गया कि किसे सच और किसे गप्प माने. एक राज्य में एक पार्टी को मिल रही सीटों में 5-10 का अंतर आए तो बात हजम होती है पर यहां तो अंतर मानव कल्पना से भी परे आ रहा है. एक चैनल की निगाह में भाजपा बंगाल में 8-10 सीटें ही ले जा पा रही है तो दूसरे की निष्ठा उसे 20 पार करा रही है.

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यह बड़ी मनोरंजक और दिलचस्प शाम थी क्योंकि जो यूपी में भाजपा को पिछड़ता बता रहा था उसने बड़ी चतुराई से उसकी भरपाई ओडिशा और बंगाल से करते एनडीए को बहुमत के करीब पहुंचाकर ही पानी पिया. कुल जमा सार ये कि होड़ इस बात की थी कि आप कैसे भाजपा को सत्ता तक और मोदी को फिर से सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंचा सकते हैं और अगर ऐसा नहीं कर सकते हैं आपका मीडिया योनि में जन्म लेना व्यर्थ है.

मुद्दे की बात इन सर्वेक्षणो में विकट का विरोधाभास है. जो महज अनुमानों के आधार पर वातानुकूलित स्टूडियो में ही तैयार कर लिए गए लगते हैं, और ऐसा कहने की पर्याप्त वजहें भी हैं. जिन्हें संभावना के सिद्धांतो की रत्ती भर की भी जानकारी है, वे बिना कुछ सोचे समझे बता सकते हैं कि सिक्का अगर उछाला जाएगा तो चित और पट दोनों की आने की संभावना फिफ़्टी फिफ़्टी रहती है. कम से कम सांख्यिकी विज्ञान तो इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकता लेकिन मीडिया के शूरवीरों ने एक नई थ्योरी गढ़ दी, कि सिक्का 75 फीसदी चित और 25 फीसदी पट की तरफ भी झुका रह सकता है. इन गणितज्ञों के हुनर और नए शोध को सैल्यूट ठोकने का मन हर किसी का कर रहा है.

कौमर्स के छात्र और उसके जानकारों सहित छोटे बड़े व्यापारी जानते हैं कि ये सर्वे बैलेन्स शीट सरीखे हैं. जिनमें जैसे भी हो आय और व्यय को बराबर बताना पड़ता है और यह दुनिया का सबसे आसान काम है. जिसे चैनल्स और एजेंसियों ने बड़े कलात्मक ढंग से अंजाम दिया.

एक शक यह भी

चुनाव पर खरबों का सट्टा लगा है, और अधिकतर लोगों ने भाजपा और एनडीए पर ही दांव खेला है. पिछले दिनों जब कुछ भाजपा नेताओं ने ही त्रिशंकु लोकसभा की संभावना जताई थी तो लोग इसी पर दांव लगाने लगे थे. खुद नरेंद्र मोदी ने एक सभा में गठबंधन सरकार चलाने का अनुभव है, जैसी बात कहकर सट्टा बाजार फिर गरमा दिया था. मीडिया के सुर भी बदले थे तो भाजपा का भाव बढ़ने लगा था. खाइबाजों के लिए यह घाटे का सौदा था. अब हर कोई टीवी के सर्वेक्षणो का इंतजार कर रहा था जिससे धुंधलका छंटे. मीडिया ने सटोरियों के मन माफिक आंकड़े दिये तो सट्टा बाजार फिर गुलजार हो उठा अब हर कोई भाजपा एनडीए और मोदी पर पैसा लगा रहा है.

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ऐसे में अगर नतीजे त्रिशंकु लोकसभा के आए जिसकी कि उम्मीद ज्यादा है तो सटोरियों की बल्ले बल्ले हो जाएगी. सर्वेक्षण हर कोई जानता है कभी सच और सटीक नहीं होते इनका  आधार या सैंपल प्रामाणिक और वैज्ञानिक नहीं होता. ये बस पैसा कमाने का जरिया होते हैं, जो  बहुत ज्यादा हर्ज की बात नहीं. लेकिन सिरे से ही सभी ने एकजुट होकर 19 मई को ही सरकार बना डाली, यह जरूर चिंता की बात है. क्योंकि मीडिया अब अपने नाम या साख की परवाह नहीं कर रहा है बल्कि नमक का हक अदा कर रहा है.

कम हैरत की बात नहीं हिन्दी भाषी राज्यों में जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच कोई 200 सीटों पर सीधा मुक़ाबला है वहीं भाजपा को 2014 की तरह बढ़त पर बताया गया है. बात बिलकुल ही प्रायोजित न लगे इसलिए कांग्रेस की दो चार सीटें बढ़ा दी गईं. चूंकि मीडिया के अनुमान अभी भी विकल्प हीन होते हैं इसलिए उसे झेलना लोगों की मजबूरी भी है. यह किसी दल विशेष के प्रति पूर्वाग्रह नहीं बल्कि मीडिया की विश्वसनीयता की चिंता है. जो जमीनी कम हवा हवाई बातें ज्यादा कर रहा है. वह भी इस द्रुत गति से कि 19 मई को हुई 59 सीटों की वोटिंग का विश्लेषण उसने मिनटों में कर डाला. मीडिया की यह बैलेन्स शीट कितनी खरी उतरी यह 23 मई को ही पता चलेगा. लेकिन उसकी निष्ठा पर कोई संदेह व्यक्त नहीं किया जा सकता.

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4 टिप्स: स्टाइलिश बालों के लिए बेस्ट हैं ये हेयर स्ट्रेटनर

रोजाना कौलेज या औफिस जाने के लिए आप नए-नए हेयस्टाइल ट्राई करना पसंद करते होंगे, जिसके लिए आपको हेयर स्ट्रेटनर मशीन की जरूरत पड़ती है. वहीं अक्सर आप बालों को स्ट्रेट करने के लिए किसी पार्लर या घर पर ही महंगी-महंगी मशीनें खरीदते होंगे. जो आपके बजट से बाहर हो जाता है. तो आज हम आपको कुछ ऐसे हेयर स्ट्रेटनर के बारे में बताएंगे, जिन्हें आप अपने बजट में यानी 1000 रूपए की कीमत के अंदर खरीद पाएंगे. साथ ही स्टाइलिश लुक भी कैरी कर पाएंगे…

1. वेगा हेयर स्ट्रेटनर (Desire flat hair straightener)

अगर आपको भी लंबे और स्ट्रेट हेयर पसंद है तो यह स्ट्रेटनर आपके लिए बेस्ट औप्शन में से एक है. यह फ्लैट हेयर स्ट्रेटनर है, जिसे आप अपने बैग में रखकर कहीं भी ट्रैवल कर सकती हैं. यह आपको 1000 रूपए से कम की कीमत में यानी 899 रूपए में मिल जाएगा.

 2. नोवा टैम्प्रेचर कंट्रोल प्रौफेशनल हेयर स्ट्रेटनर (Nova Temperature Control Professional Hair Straightener)

अक्सर हेयर को स्ट्रेट करते समय आपको हेयर डैमेज या स्ट्रेटनर का टैम्प्रेचर कंट्रोल करने की जरूरत होती होगी. तो यह स्ट्रेटनर आपके लिए परफेक्ट है. यह टैम्प्रेचर कंट्रोल करके आपके बालों को डैमेज होने से बचाएगा. यह आपको 425 रूपए में मिल जाएगा.

3. सिस्का सुपर ग्लैम हेयर स्ट्रेटनर (Syska Super Glam Hair Straightener)

कौलेज के लिए अगर आप भी पाना चाहती हैं ग्लैमरस लुक के साथ स्ट्रेट हेयर का लुक पाना चाहती हैं, तो यह स्ट्रेटनर जरूर ट्राई करें यह आपको दुकानों में 649 में मिल जाएगी. और आप चाहें तो यह औनलाइन भी खरीद सकती हैं.

4. फिलिप्स कौम्पैक हेयर स्ट्रेटनर (Philips compact Hair Straightener)

फिलिप्स अपने आप में ही एक ब्रैंड है. अगर आप एख ब्रैडेड हेयर स्ट्रेटनर का शौक रखती हैं. तो यह आपके लिए बेस्ट औप्शन है. यह आपको औन्लाइन या मार्केट में 949 रूपए में आसानी से मिल जाएगी.

जायकेदार लहसुनी मुर्ग

लहसुनी मुर्ग बहुत ही स्वादिष्ट डिश है. इसमें डाले जाने वाले मसाले और भरपूरी मात्रा में लहसुन का इस्तेमाल इसे एक बेहतरीन डिश बनाते हैं. चिकन खाने के शौकीन है तो एक बार इस बेहतरीन डिश को ​ट्राई करें.

सामग्री

बोनलेस चि​कन (1/2 kg)

घी (2-3 टेबल स्पून)

पानी (1 कप पानी)

प्याज (1 कप)

लहसुन पेस्ट (5-6 टी स्पून)

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अदरक पेस्ट (3-4 टी स्पून)

धनिया पाउडर (3 टी स्पून)

दही (4 टी स्पून)

लाल मिर्च पाउडर (2 टी स्पून)

बादाम पेस्ट (5-6 टी स्पून)

जायफल (1/4 टी स्पून)

जावित्री पाउडर (1/4 टी स्पून)

कालीमिर्च पाउडर (1/2 टी स्पून)

लहसुन (4 टी स्पून तला हुआ)

केसर का घोल (2 टी स्पून)

स्पून हरा धनिया (2-3 टी स्पून)

बनाने की वि​धि

बादाम को हल्का सा रोस्ट करें और पानी में कुछ देर भिगोने के बाद इसे पीसकर इसका पेस्ट बनाकर एक तरफ रख दें.

एक पैन में घी गर्म करें और इसमें प्याज डालकर फ्राई करें और इसमें अदरक और लहसुन का पेस्ट डालकर अच्छे से मिलाएं.

इसमें धनिया पाउडर और 4 से 5 बड़े चम्मच पानी डालें और इसे लगातार चलाएं.

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इसमें दही और लाल मिर्च पाउडर डालकर दोबारा अच्छे से मिलाएं.

इसके बाद बादाम का पेस्ट डालकर इसे कुछ देर के लिए पकाएं.

चिकन को डालकर अच्छे से मिलाएं.

इसमें अब नमक और पानी डालकर, थोड़ी देर पकाएं या फिर चिकन जब तक पूरी तरह न पक जाएं.

जायफल पाउडर, जावित्री पाउडर, कालीमिर्च पाउडर डालें और इसी के साथ इसमें काटकर फ्राई किया गया लहसुन और केसर भी डालें.

हरा धनिया डालकर गार्निश करें और गर्मागर्म सर्व करें.

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