उत्तर प्रदेश के छोटे शहर प्रतापगढ़ से निकलकर बौलीवुड में अपनी एक अलग पहचान बनाने वाली रश्मी  ने दस वर्ष के दौरान काफी संघर्ष किया.पढ़ने में तेज होने के चलते उन्हें 2010 में एकता कपूर की कंपनी ‘‘बालाजी टेलीफिल्मस’’ में नौकरी मिल गयी. पर उसके बाद वह कई कंपनियों में प्रोग्राम प्रोड्यूस करती रही. इसी बीच उन्होंने ‘‘जी कुत्ता से’’ ‘‘देवी’’, ‘ए बिलियन कलर’ सहित कुछ फिल्मों मे अभिनय किया. इन दिनों 17 मई को प्रदर्षित सतीश कौशिक निर्मित और राजेश बब्बर निर्देशित हरियाणवी फिल्म ‘‘छोरीयां छोरों से कम नहीं’’ को लेकर चर्चा बटोर रही हैं.

यूं तो रश्मी सोमवंषी को पहली फिल्म ‘‘जी कुत्ता से’’ काफी शोहरत मिली थी. पर उन्हें आपेक्षित काम नहीं मिला. वह बताती हैं- ‘‘इस फिल्म और मेरे काम की बहुत लोगों ने तारीफ की. पर सही वक्त पर सही जगह होना जरुरी है. पर अभिनय करने के लिए फिल्में नही मिली, सिर्फ सीरियल के ही आफर आए. मैं टीवी पर ज्यादा काम नहीं करना चाहती. मैंने बहुत नजदीक से देखा है कि टीवी पर किस तरह से काम होता है. टीवी पर क्रिएटिव सटिस्फैक्षन नहीं है. मैं सिर्फ पैसा नही कमाना चाहती. मैं रचनात्मक और मन को संतुष्टि देने वाला काम करना चाहती हूं. कई फेस्टिवल में सराहना मिली.’’

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इसके बाद रश्मी सोमवंशी ने राजस्थानी फिल्म ‘‘देवी’’ की जिसके लिए उन्हे अवार्ड भी मिला. पर करियर में कोई प्रगति नहीं हुई. फिर उन्होंने एक फिल्म ‘‘ए बिलियन कलर स्टोरी’’ की. इस फिल्म की सत्तर प्रतिषत भाषा अंग्रेजी हैं. यह फिल्म डिजिटल प्लेटफार्म पर दो साल पहले रिलीज हुई थी. इस फिल्म की चर्चा करते हुए रश्मी सोमवंषी ने कहा- ‘‘मैंने रेहाना का किरदार निभाया है. बचपन से ही वह हिजाब /बुरखे में रहती है. फिल्म के अंत में किस तरह उसका हिजाब उतरता है, यह इसकी खूबसूरती है. बहुत स्वतंत्र है. पति का सपोर्ट भी है. यह फिल्म ब्लैंक एंड व्हाइट में है. इसमें रंगभेद व क्लास भेद की बात है. हमारे समाज मे शिक्षित लोग हैं, फिर भी कई तरह के विभाजन की लकीरें खीची हुई है. फिल्म में व्यंग के साथ पूरी कहानी बयां की गयी है. इसमें कई समस्याओं पर बात की गयी है. मसलन, मुस्लिम कालोनी में हिंदू परिवार को किराए का घर न मिलना, हिंदू कालोनी मुस्लिम को किराए का घर न मिलना. देखिए, यह समस्या मुंबई जैसे शहर में नहीं है. इसे कई फेस्टिवल में सराहा गया. यह फिल्म हौट स्टार व नेटफ्लिक्स पर है. इस फिल्म को देखकर अनिल कपूर, नसिरूद्दीन शाह सहित कई दिग्गजों ने मेरे अभिनय की तारीफ की, पर काम नहीं मिला.’’

पूरे दो साल बाद उन्हें हरियाणवी फिल्म ‘‘छोरीयां छोरो से कम नही’’ मिली, जिसके निर्माता सतीश कौशिक हैं, जिन्होंने ‘ए बिलियन कलर स्टोरी’ बनायी थी. इस फिल्म में रश्मी सोमवंषी ने हरियाणा के एक गांव की लड़की का किरदार निभाया है, जो कि अपने पिता की सोच को बदलती है. खुद रश्मी सोमवंषी बताती हैं- ‘‘इस फिल्म में उन समस्याओं की बात की गयी है, जो कि गांव में रहने वाली लड़कियों को झेलनी पड़ती है. यह फिल्म विनीता चैधरी उर्फ विन्नू नामक उस लड़की की यात्रा है, जिसे उसका पिता स्वीकार नहीं करता है. उसका पिता कहता है कि बेटा जो काम कर सकता है, वह काम बेटी नही कर सकती. इसके बावजूद यह लड़की अपने पिता से उतना ही प्यार करती है. वह अपने पिता से नफरत नहीं करती. उसके मन में अपने पिता के प्रति गुस्सा आता है, पर वह सोचती हैं कि मुझे बहुत कुछ करके दिखाना है. वह अपने पिता के साथ जो भी ज्यादतियां हुई है. अन्याय हुआ है,  उससे उन्हे निजात भी दिलाना चाहती है. एक दिन विनीता चैधरी उर्फ विन्नू आइपीएस अफसर बन जाती है. यह पूरी तरह से मनोरंजक फिल्म है.’’

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अभिनेत्री रश्मी सोमवंशी फिल्म की पटकथाएं लिखने के साथ साथ कविताएं भी लिखती हैं.वह बताती हैं-‘‘मैंने ज्यादातर रोमांटिक कविताएं ही लिखी हैं. मैंने जो जो इमोशन फील किए हैं, उन सभी पर मैंने कविताएं लिखी हैं. आठवीं कक्षा में मैने पहली रोमांटिक कविता लिखी थी, जिसे पढ़कर मेरे पापा को लगा था कि मेरा स्कूल में कोई ब्वायफ्रेंड है, जबकि ऐसा कुछ नहीं था. (20 से 20.50-कविता की लाइनें). अब तक आधी अधूरी 150 कविताएं लिखी हैं. जबकि 40 के आस पास पूरी कविताएं लिखी हैं. मेरी कविताएं बहुत पर्सनल हैं. छोटी उम्र से ही मैंने कई गहरे इमोषन फील किए हैं, वह सभी मेरी कविताओं का हिस्सा हैं.’’

जब हमने उनसे रोमांस को लेकर सवाल किया, तो रश्मी ने कहा- ‘‘सर, रोमांस तो बहुत बढ़िया चीज है. कौलेज में भी मेरा रिश्ता रहा है. पर कौलेज के साथ ही वह खत्म हो गया. रोमांस भी प्यार ही होता है. आप किसी के साथ रिलेशनशिप में हों, तभी प्यार हो, यह जरुरी नही है. मेरा पिछला जो रिश्ता टूटा, वह आज भी मेरे दोस्त हैं. पर मैं उनका नाम नहीं लेना चहती. उनसे बातचीत होती है. देखिए, दो इंसान अच्छे हों, पर यह जरुरी नहीं कि जब वह एक साथ हों, तो भी अच्छे हों. अलग अलग रहने पर अच्छाई बरकरार रहती है, तो कई बार हमें अलग होने के निर्णय लेने पड़ते हैं. मैं अभी भी उनसे प्यार करती हूं.

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वह आगे कहती हैं-‘‘जिनसे एक बार प्यार हो जाता है, उनसे भले ही वैचारिक मतभेद के चलते अलगाव हो जाए, मगर प्यार जाता नहीं है. लेकिन जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए हमें कुछ भुलाना पड़ता है. पर जब अलगाव हुआ, तो मैं बहुत डिप्रेस हो गयी थी. अपना बैग उठाकर धरमपुर चली गयी. वहां पर योगा किया. मेडीटेशन किया. 15 दिन इधर उार भटकी, रोयी. फिर वापस मुंबई आ गयी. आखिर काम करना था. जिंदगी में आगे बढ़ना ही था. गम को सीने पर लगाकर जिंदगी जी नही जा सकती. फिर से संघर्ष शुरू हुआ.’’

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