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लव मैरिज के लिए पैरेंट्स को ऐसे करें राजी

प्रेम में पड़ना जितना आसान है, शादी के अंजाम तक पहुंचना उतना ही मुश्किल. प्यार में एक लंबा वक्त गुजरने के बाद, जब बात शादी की आती है तब यह डर सताने लगता है कि अगर मातापिता इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हुए तो? ऐसी बातें दिल को हिला कर रख देती हैं.

वैसे तो अब लवमैरिज को ले कर लोगों की सोच काफी हद तक बदल चुकी है और इस का सबसे बड़ा कारण पश्चिमी सभ्यता और शिक्षा का प्रभाव है और कुछ हद तक टीवी इंटरनेट का योगदान भी है लेकिन फिर भी अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनना और उस से ही विवाह करना आसान नहीं होता, क्योंकि हर मातापिता चाहते हैं कि शादी जैसे महत्त्वपूर्ण फैसले वे खुद लें.

अधिकतर मातापिता चाहते हैं कि वे अपने बच्चों की शादी अच्छी तरह जांचपरख कर खुद ही तय करें. ऐसे में मातापिता को लवमैरिज के लिए मनाना आसान नहीं होता है. प्रेमी जोड़े के लिए मातापिता को शादी के लिए मनाना किसी टफटास्क से कम नहीं होता. इसलिए अपने पार्टनर को अपने पेरैंट्स से मिलवाने और अपनी शादी की बात करने से पहले कुछ खास बातों का ध्यान रखना बहुत ही जरूरी है. परिवार वालों को मनाने के लिए इन टिप्स पर अमल करें तो राह आसान हो जाएगी :

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  • परिवार में जो आप के सब से करीबी हों, उन्हें इस बारे में बताएं. जैसे, कई लोग अपने भाई या बहन से बहुत क्लोज होते हैं, तो कुछ अपनी भाभी को अपना राजदार बनाते हैं. अगर आप के साथ भी ऐसा है, तो पहले अपने उस फैमिली मैंबर से रायमशवरा करें ताकि वह आप के पेरैंट्स को राजी करने में आप की मदद करे.
  • अगर आप शादी करने का पूरा मन बना चुके हैं, तो समयसमय पर अपने पेरैंट्स के सामने ऐसी कुछकुछ बातें करते रहें ताकि उन्हें आप के मन की बात पता चलती रहे.
  • पार्टनर को अपने पेरैंट्स से पहले एक अच्छे दोस्त की तरह मिलवाएं ताकि वह आप के घर वालों के साथ थोड़ा घुलमिल जाए. ऐसा करते रहें. इस बात का ध्यान जरूर रखें कि इस दौरान आप हर जरूरी बात को पार्टनर और घर वालों के साथ शेयर करें ताकि उन के बीच बौंडिंग मजबूती से बनी रहे.-
  • जब भी मौका मिले, बातोंबातों में अपने उस अच्छे दोस्त की बातें मातापिता से करते रहें.
  • धैर्य बनाए रखना बहुत जरूरी है. हो सकता है कि आप के पेरैंट्स आप की बात समझ कर भी उसे नजरअंदाज कर दें. ऐसे में हर संभव कोशिश कर उन्हें अपनी बात समझाने का प्रयास करते रहें.
  • अपने पेरैंट्स को कभी ऐसे लोगों से न मिलवाएं जो लवमैरिज के खिलाफ हों. ऐसे लोग आप की प्लानिंग पर पानी फेर सकते हैं और मामला सुलझने के बजाय, उलझ सकता है.
  • ऐसे लोगों की तलाश करें जो लवमैरिज के पक्ष में हों. हो सकता है आप के पेरैंट्स उन की बातों को समझें, क्योंकि कभीकभी अपनों से ज्यादा दूसरों की बातें लोगों को ज्यादा अच्छे से समझ में आती हैं.
  • अब जब आप अपने पार्टनर के बारे में घर पर सब को बता ही चुके हैं, तो घर वालों को अपने पार्टनर की अच्छी बातों के बारे में बताएं. क्योंकि रंगरूप और जातपांत ने आज भी घरों में और लोगों के दिलों में अपनी जड़ें जमा रखी हैं. यह भी सच है कि हर मातापिता के लिए अपने बच्चों की शादी एक भावनात्मक फैसला होता है, इसलिए अपने मातापिता की भावनाओं का खयाल रखना भी आप की जिम्मेदारी है.
  • अपने पेरैंट्स पर शादी का दबाव न बनाएं. इस से मामला और बिगड़ सकता है. उन्हें भी थोड़ा वक्त दें सोचनेसमझने का. ताकि वे आप की बातों को समझ सकें.
  • जब भी घर में लवमैरिज को ले कर बहस होने लगे, तब कुछ सच्ची और सफल शादियों के उदाहरण पेश करना न भूलें.

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उपरोक्त बातों पर अमल करते हुए आप अपने मातापिता से अपनी मनपसंद पार्टनर से शादी करने की बात करेंगे, तो उम्मीद करनी चाहिए कि वे आखिरकार जरूर राजी हो जाएंगे. सो, आगे बढ़ें, हैप्पी लवमैरिज.

डिप्रेशन से बचना चाहते हैं तो अपनाएं इन मसालों को

स्ट्रेस का बिगड़ा हुआ रूप है डिप्रेशन. जब लोग डिप्रेस हो जाते हैं तो खुद को लोगों से दूर कर लेते हैं. अकेले रहना, ज्यादा बातचीत ना करना, परेशान रहना ये सब डिप्रेशन के लक्षण हैं.  पर क्या आपको पता है कि अपनी डाइट में थोड़ा बदलाव कर के डिप्रेशन से छुटकारा पा सकते हैं.

हाल ही में हुई एक रिसर्च की माने तो खाने पीने की कई चीजों से हमारा मूड फ्रेश रहता है. असल में कुछ खास तरह के खान पान से हमारे शरीर में कुछ ऐसे हार्मोंस निकलता है जिससे लोगों का मूड ठीक रहता है.

डिप्रेशन से बचने के लिए लोग कई तरह की दवाइयों का सेवन करने लगते हैं. पर इसका असर दिमाग के लिए अच्छा नहीं होता है. इस खबर में हम आपको कुछ मसालों के बारे में बताएंगे जिनका सेवन आपकी मानसिक सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होगा.

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आइए जाने उन मसालों के बारे में जो रखेंगे आपको डिप्रेशन से दूर,

हल्दी

हल्दी में एंटी इंफ्लामेट्री और एंटी औक्सिडेंट की अच्छी मात्रा पाई जाती है. इसका इस्तेमाल मूड अच्छा करने के लिए भी होता है. इसके नियमित सेवन से मूड अच्छा रहता है.

दालचीनी

दालचीनी का सेवन डिप्रेशन की परेशानी में काफी लाभकारी होता है. इसकी खुशबू इतनी तेज और खास होती है कि इससे आपका दिमाग एक्टिव रहता है. इसके सेवन से मूड अच्छा रहता है और  याद्दाश्त भी अच्छी रहती है.

केसर

केसर को लोग खुशी का मसाला कहते हैं. कई अध्ययनों में ये बात सामने आई है कि केसर के नियमित प्रयोग से टेंशन दूर रहती है और मूड हल्का रहता है.

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‘नो मेकअप’ लुक के कारण ट्रोल हुई हिना खान

टीवी एक्ट्रेस हिना खान अपने लुक्स, फैशन और फिटनेस के कारण हमेशा सुर्खियों में बनी रहती हैं. और हो भी क्यों न उन्हें छोटे पर्दे की फैशनिस्टा जो कहा जाता है. लेकिन कल से नो मेकअप वाले लुक से ट्रोल का शिकार हो रही हैं.

एयरपोर्ट लुक पर ट्रोल का हुई शिकार

सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाली हिना कल से काफी ट्रोल का शिकार हो रही है. सोशल मीडिया पर हिना की बिना मेकअप वाली फोटी जो वायरल हो रही है. बिना मेकअप वाली लुक की फोटो को यूजर्स ने ट्रोल करना शुरू कर दिया है. हिना दिल्ली में एक ब्रांड कैम्पेन इवेंट अटैंड कर देर रात मुंबई एयरपोर्ट पहुंची. एयरपोर्ट पहुंचते ही हिना की फोटो वहां मौजूद एक फोटो जर्नलिस्ट ने क्लिक करके इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर दी. हिना का ये फोटो देखते ही यूजर ने उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया. किसी ने उन्हें दादी मां किसी ने बूढ़ी और काली जैसे कमेंटस देने शुरू कर दिए. एक यूजर ने लिखा कि हिना करीना की कापी करती हैं, जो कभी बन नही सकती., किसी ने लिखा चलो बिना मेकअप के चलते हैं. बिना मेकअप जैसे कटरीना का नाम खूबसूरत लोगों  में शामिल है मेरा भी हो जाएगा. आपको देख कर मरने का मन कर रहा है.

स्टाइलिश आउटफिट – हिना का नो मेकअप लुक लोगों को नहीं पसंद आया हो लेकिन उनका ड्रेसिंग सेंस बहुत अच्छा था.

हिना ने पिंक फ्लोरल पैंट जैकेट के साथ व्हाइट स्ट्रैपी टौप पहना था. जो स्टाइलिश था. उन्होंने बालों को खुला छोड़ रखा था. आंखों पर स्टाइलिश गौगल्स लगाया हुआ था.

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जानें क्यों भड़के यूजर्स मोनालिसा पर, बोले- ‘पागल’ है!

हाल ही में भोजपुरी एक्ट्रेस मोनालिसा के ससुर का देहांत हुआ. इसके बाद परिवार वालों उनकी तेरहवीं रखी थी. इस दुखद के पल के दौरान मोनालिसा अपने ससुरालवालों को संभालती दिखाई दे रही है. लेकिन तेरहवीं सेरेमनी के दौरान मोनालिसा हंसती हुई कैमरा में कैद हुई.

दरअसल, शोकसभा के दौरान जन मोनालिसा अपने परिवार के साथ अपनी तस्वीरें खिचवा रही थी तब वो हंसते हुए कुछ पिक्चर्स में क्लीक हो गई. इसके बाद मोनालिसा की हंसी देखने के बाद सोशल मीडिया के यूजर उनको ट्रेल करने लगे. तस्वीरों पर कमेंट्स करते हुए मोनालिसा को खूब खरी खोटी सुनाए.

 

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मोनालिसा पति विक्रांत सिंह राजपूत के साथ- साथ घर के बाकी परिवार मेंबर्स के साथ अपनी तस्वीरें खिचवाती दिखाई दे रही है. दुखद पल में परिवार के साथ मुस्कुराते हुए तस्वीरें खिचवाना उनके फैंस को पसंद नहीं आ रहा हैं. सोशल मीडिया यूजर्स भी उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिए.

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कश्मीर के महाराजा कर्ण सिंह: राहुल के बाद मोदी!

देश के बौद्धिक विभूतियों में कर्ण सिंह की गिनती होती है. कश्मीर के पूर्व सदर ए रियासत रहे कर्ण सिंह की एक बड़ी पहचान यह भी है की आप कश्मीर के अंतिम महाराजा हरि सिंह के सुपुत्र हैं. कश्मीर के मसले पर सदैव धीर गंभीर रहने वाले पूर्व सांसद कर्ण सिंह 5 अगस्त के ऐतिहासिक दिवस के आगे पीछे आर्टिकल 370 पर कुछ नहीं कहा… उनकी खामोशी असंदिग्ध थी. क्योंकि आप कांग्रेस के वरिष्ठतम बौद्धिक विचारकों में है, मगर 3 दिनों बाद डा.कर्ण सिंह ने जुबान खोली और कश्मीर पर अपना सारा उबाल निकाला है. उन्होंने आश्चर्यजनक ढंग से कांग्रेस और कश्मीर के दिग्गज नेताओं फारूख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और पीडीपी, चीफ महबूबा मुफ्ती के विपरीत विचार व्यक्त करते हुए कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने का समर्थन किया है . डा. कर्ण सिंह का जीवन परिचय जानने वाले जानते हैं आप देश के मूर्धन्य विद्वान है और जो कहते हैं वह बड़ा ही सार पूर्ण और निचोड़ होता है आइए कश्मीर के संदर्भ में आपके विचारों से  आपको अवगत कराएं –

मोदी को कश्मीर से बड़ा समर्थन

डा. कर्ण सिंह नि:संदेह जहां चोटी के विद्वान है वहीं जम्मू कश्मीर के प्रमुख व्यक्तित्व और नेता भी. आर्टिकल 370 के मामले में डा. कर्ण सिंह का अंततः भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार के पक्ष में आना बहुत बड़ी सफलता है. डौक्टर करण सिंह 65 तक कश्मीर के सदर ए सियासत रहे हैं बाद में लंबे समय तक सांसद रहे हैं एक तरह से उन्हें कश्मीर की आवाज या आत्मा कहा जाए तो किंचित भी गलत नहीं माना जा सकता.

कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी, राहुल गांधी के लाइन पर चलते हुए डॉ. कर्ण सिंह कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने पर मौन साधा हुआ था. कुछ पत्रकारों ने उनसे बात करने की कोशिश भी की मगर उन्होंने विनम्रता से इंकार कर दिया . मगर दीर्घ चिंतन के पश्चात 5 अगस्त को उन्होंने जम्मू कश्मीर और लद्दाख के संदर्भ में सरकार के फैसले का आंशिक समर्थन करके कांग्रेस की रीति नीति पर मानो एक और कील ठोक दी.

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 डा. कर्ण सिंह की बड़ी बातें

भारत सरकार के आर्टिकल 370 के कदम का एक तरह से समर्थन करते हुए डा. कर्ण सिंह ने कुछ बड़ी गंभीर बातें कही है .उन्होंने कहा जम्मू कश्मीर के फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती बड़ी नेता है उन्होंने केंद्र मे भी अपनी भूमिका निभाई है केंद्र सरकार को चाहिए की उन्हें विश्वास में लेकर आगे बढ़ा जाए .

उन्होंने कहा- लद्दाख का केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाना स्वागत योग्य कदम है यह बहुत बड़ी मांग थी साथ ही उन्होंने रहस्य से पर्दा हटाते हुए कहा- वे स्वयं जब जम्मू कश्मीर के सदर ए रियासत थे सन 65 में उन्होंने लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग की थी .दलितों, पिछड़े वर्गों के साथ अन्याय को भी उन्होंने मुखर होकर स्वीकार किया और कहा कुछ ऐसी धाराये थी जिनके कारण लोगों को अधिकार नहीं मिल रहे थे अब जम्मू कश्मीर मे एक नई सुबह का इंतजार है…

डा. कर्ण सिंह ने कहा अनुच्छेद 35 में महिला और पुरुष में बड़ा भेदभाव था अब वह दूर होगा. शरणार्थियों को मतदान का अधिकार मिलेगा अनुसूचित जाति को आरक्षण यह एक सकारात्मक कदम है जिसका स्वागत है…

वे राष्ट्र द्रोही नहीं है

डा. कर्ण सिंह ने जहां कांग्रेस की लाइन को तोड़कर अपने विचार व्यक्त किए हैं वहीं खुले हृदय से नरेंद्र मोदी अमित शाह के कदम को स्वीकृति दी है मगर साथ ही कहा- फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को सरकार शीघ्र रिहा करें यह देशद्रोही नहीं है इन्हें विश्वास मे लेकर सरकार जम्मू कश्मीर का भला कर सकती है उन्होंने कहा- यह जम्मू कश्मीर के बड़े नेता हैं और यहां की जनता सम्मान व प्रेम करती है.

इनके पूर्व जनार्दन द्विवेदी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा सहित अनेक नेताओं ने जम्मू-कश्मीर मसले पर भाजपानीत मोदी सरकार के द्वारा जम्मू कश्मीर और लद्दाख नीति पर समर्थन कर जहां कांग्रेस पार्टी को जोर का झटका दिया है वहीं यह कहा जा सकता है की सरकार की यह बड़ी जीत है देश के भीतर और बाहर दोनों जगह बड़ी ताकते पक्ष में खड़ी होती जा रही है.

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66th नेशनल फिल्म अवार्ड: यहां पढ़ें विनर्स की पूरी लिस्ट

66th नेशनल फिल्म अवार्ड का ऐलान हो गया है. पीछले साल रिलीज हुई फिल्म ‘अंधाधुन’ को बेस्ट हिंदी फिल्म सहित तीन अवार्ड मिला है. इस फिल्म के अभिनेता ‘आयुष्मान खुराना’ को  बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला है.  तो वहीं विक्की कौशल को भी ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राईक’ में उनकी शानदार एक्टिंग के लिए  बेस्ट एक्टर का अवार्ड  मिला है. बता दें, संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ ने भी कुल तीन-तीन अवार्ड्स अपने नाम किए हैं.

66th राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की पूरी लिस्ट

बेस्ट हिंदी फिल्म– ‘अंधाधुन’

बेस्ट एक्टर-  आयुष्मान खुराना (अंधाधुन) को फिल्म अंधाधुन और विक्की कौशल (उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक) के लिए चुना गया है.

बेस्ट डायरेक्टर- आदित्य धर को फिल्म उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक के लिए मिला है.

बेस्ट कोरियोग्राफी– संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण और शाहिद कपूर की फिल्म पद्मावत के गाने ‘घूमर’ को बेस्ट कोरियोग्राफी का अवार्ड मिला है.

बेस्ट म्यूजिक डायरेक्शन–  इस फिल्म  ‘पद्मावत’ के लिए बेस्ट म्यूजिक डायरेक्शन का अवार्ड संजय लीला भंसाली को मिला है.

 

बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस– फिल्म ‘बधाई हो’ के लिए सुरेखा सीखरी को मिला है.

बेस्ट एक्ट्रेस– फिल्म ‘महानती’ के लिए कीर्थि सुरेश को ये अवार्ड मिला है.

 

बेस्ट पौपुलर फिल्म– ‘होलसम एंटरटेनमेंट’ का अवार्ड ‘बधाई हो’ को मिला है.

वहीं, अक्षय कुमार की फिल्म ‘पैडमैन’ को सामाजिक मुद्दों पर आधारित बेस्ट फिल्म (हिंदी) के अवार्ड से नवाजा गया है.

फिल्म चुंबक के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल अवार्ड  ‘स्वानंदा कीर्कीरे’ को मिला है.

बेस्ट एक्शन का राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड कन्नड़ भाषा की फिल्म केजीएफ को मिला है.

बेस्ट फीचर फिल्म–  ये अवार्ड हैल्लारो (गुजराती) को मिला है.

नेशनल इंटीग्रेशन पर बनी फिल्म ओंडाला इराडाला (कन्नड़) को नर्गिस दत्त अवार्ड बेस्ट फीचर फिल्म के लिए चुना गया है.

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 उपाध्यक्ष महोदय

किसी भी संस्था में उपाध्यक्ष का पद भले ही भारीभरकम प्रतीत होता है लेकिन इस पद की त्रासदी यह है कि इस पर विराजमान नौकरशाह को कोई तरजीह नहीं दी जाती. वह बेचारा अध्यक्ष के रहते न तो मंच पर आसीन होने की जुर्रत कर सकता है और न ही कोई अहम फैसला ही लेने में सक्षम होता है. उपाध्यक्ष की दर्दे दास्तां बयां कर रहे हैं वीरेंद्र जैन.

जब कोई व्यक्ति किसी संस्था के लिए ‘उगलत निगलत पीर घनेरी’ वाली दशा को प्राप्त हो जाता है तो उसे उस संस्था का उपाध्यक्ष बना दिया जाता है.

उपाध्यक्ष पदाधिकारियों में ईश्वर की तरह होता है, जो होते हुए भी नहीं होता है और नहीं होते हुए भी होता है. वह टीम का 12वां खिलाड़ी होता है, जो पैडगार्ड बांधे बल्ले पर ठुड्डी टिकाए किसी के घायल होने की प्रतीक्षा में लघुशंका तक नहीं जाता और मैच समाप्त होने पर गु्रपफोटो के लिए बुला लिया जाता है.

उपाध्यक्ष कार्यकारिणी का ‘खामखां’ होता है. किसी भी कार्यक्रम के अवसर पर वह ठीक समय पर पहुंच जाता है तथा अध्यक्ष महोदय के स्वास्थ्य की पूछताछ इस तरह करता है जैसे वह उन का बहुत हितैषी हो. वह संस्था के लौन में बाहर टहलता रहता है और अध्यक्ष के आने और खासतौर पर न आने की आहट लेता रहता है.

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अगर इस बात की पुष्टि हो जाती है कि अध्यक्ष महोदय नहीं आ रहे हैं, तो वह इस बात की जानकारी अपने तक ही बनाए रखता है और बहुत विनम्रता व गंभीरता से बिलकुल पीछे की ओर बैठ जाता है, जैसे उसे कुछ पता ही न हो. जब सचिव आदि अध्यक्ष महोदय के न आने की सूचना देते हैं, जिस का कारण अपरिहार्य होता है और सामान्यत: बहुवचन में होता है, तो वह ऐसा जाहिर करता है जैसे उस के लिए यह सूचना सभी सर्वेक्षणों के विपरीत चुनाव परिणाम आने की सूचना हो.

वह माथे पर चिंता की लकीरें उभारता है और अध्यक्ष महोदय के न आने के पीछे वाले कारणों के प्रति जिज्ञासा उछालता है. फिर कोई गंभीर बात न होने की घोषणा पर संतोष कर के गहरी सांस लेता है. अब वह अध्यक्ष है और संस्था का भार उस के कंधों पर है.

आमतौर पर उपाध्यक्ष, अध्यक्ष से संख्या में कई गुना अधिक होते हैं. कई संस्थाओं में अध्यक्ष तो एक ही होता है पर उपाध्यक्ष एक दर्जन तक होते हैं क्योंकि काम करने वालों की तुलना में काम न करने वालों की संख्या हमेशा ही अधिक रहती है.

उपाध्यक्षों के 2 ही भविष्य होते हैं, एक तो वे अध्यक्ष के मर जाने, पागल हो जाने या निकाल दिए जाने की स्थिति में अध्यक्ष बना दिए जाते हैं या फिर झींक कर अंतत: दूसरी संस्था में चले जाते हैं जहां पहली संस्था में व्याप्त अनेक अनियमितताओं के बारे में रामायण के अखंड पाठ की तरह लगातार बताते रहते हैं.

उपाध्यक्षों का सपना संस्था का अध्यक्ष बनने का होता है और संस्था इस प्रयास में रहती है कि इस व्यक्ति को ऐसे कौन से तरीके से निकाल दिया जाए कि यह संस्था की ज्यादा फजीहत न कर सके.

मंच पर उपाध्यक्षों के लिए कोई कुरसी नहीं होती है. वहां अध्यक्ष बैठता है, सचिव बैठता है, विशिष्ट अतिथि बैठता है पर उपाध्यक्ष नहीं बैठता है, केवल उस की दृष्टि वहां स्थिर हो कर बैठी रहती है. कभीकभी जब फूलमालाएं अधिक आ जाएं तब मुख्य अतिथि से उस का परिचय कराने के लिए मंच से घोषणा की जाती है कि अब हमारी संस्था के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मुख्य अतिथि को माला पहनाएंगे. बेचारा मरे कदमों से मंच पर चढ़ता है और माला डाल कर उतर आता है. फोटोग्राफर उस का फोटो नहीं खींचता इसलिए वह मुंह पर मुसकान चिपकाने की भी जरूरत नहीं समझता.

उपाध्यक्ष किसी संस्था का वैसा ही हिस्सा होता है जैसे कि शरीर में फांस चुभ जाए, आंख में तिनका पड़ जाए या दांतों के बीच कोई रेशा फंस जाए. सूखने डाले गए कपड़े पर की गई चिडि़या की बीट की भांति उस के सूख कर झड़ जाने की प्रतीक्षा मेें पूरी संस्था सदैव तत्पर रहती है क्योंकि गीले में छुटाने पर वह दाग दे सकता है.

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उपाध्यक्ष के दस्तखत न चेक पर होते हैं न वार्षिक रिपोर्ट पर. न उसे संस्था के संस्थापक सदस्य पूछते हैं न चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी. न उसे अंत में धन्यवाद ज्ञापन को कहा जाता है और न ही प्रारंभ में विषय प्रवर्तन को. न उस का नाम निमंत्रणपत्रों में होता है और न प्रेस रिपोर्टों में. गलती से यदि कभी अखबार की रिपोर्टों में नाम चला भी जाता है तो समझदार अखबार वाले समाचार बनाते समय उसे काट देते हैं. अगले दिन सुबह वह अखबार देखता है और उसे पलट कर मन ही मन सोचता है कि लोकतंत्र के 3 ही स्तंभ होते हैं. काश, चौथा भी होता तो मैं भी उस पर बैठ कर प्रकाशित हो लेता.

वैसे मैं आत्महत्या का पक्षधर नहीं हूं और इस साहस को हमेशा कायरतापूर्ण कृत्य बता कर तथाकथित बहादुर बना घूमता हूं पर फिर भी मेरा यह विश्वास है कि किसी संस्था का उपाध्यक्ष बनने की तुलना में आत्महत्या कर लेना लाखगुना अच्छा है.

जादूगर का आखिरी जादू 

लेखक- निखिल अग्रवाल  

बीते 16 जून की बात है. उस दिन पश्चिम बंगाल के हावड़ा शहर में हुगली नदी के किनारे सुबह से ही लोगों का हुजूम जुटने लगा था. इन लोगों को इंतजार था जादूगर चंचल लाहिड़ी के आने का. कोलकाता के मशहूर जादूगर चंचल ने उस दिन हैरतअंगेज कारनामा दिखाने की घोषणा की थी. चंचल पश्चिम बंगाल में जादूगर ‘मैंडे्रक’ के नाम से मशहूर थे.

जादूगर चंचल जो नायाब कारनामा दिखाने जा रहे थे, वह जादुई करतब दुनिया के महान अमेरिकी जादूगर हैरी हुडिनी से मशहूर हुआ था. करीब सौ साल पहले जादूगर हुडिनी ने खुद को एक पिंजरे में बंद कर ताले लगवा दिए थे. यह पिंजरा गहरे पानी में डुबो दिया गया. इस के बाद हुडिनी अपने जादू की कला से पिंजरे के ताले खोल कर कुछ ही देर में पानी की सतह पर आ गए. यह खेल दिखा कर जादूगर हुडिनी ने अपना नाम पूरी दुनिया में अमर कर लिया था.

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कोलकाता के मशहूर जादूगर चंचल ने जादूगर हुडिनी के इसी करतब को दिखाने की तैयारी की थी. चंचल यह कारनामा तीसरी बार दिखाने जा रहे थे. सब से पहले मैंड्रेक यानी चंचल ने यह कारनामा 1998 में दिखाया था. इस के बाद दूसरी बार 2013 में भी उन्होंने यह करतब दिखा कर पूरे देश में अच्छी खासी लोकप्रियता हासिल कर ली थी. अपनी लोकप्रियता के चलते जादूगर चंचल विभिन्न राज्यों में अपने जादू का प्रदर्शन करने लगे थे.

जादूगर चंचल ने पानी की सतह पर चलने का करतब दिखाने की भी घोषणा कर रखी थी. जब वे प्रचार के लिए निकलते थे, तो गाड़ी के साथ करीब 10 फुट ऊंचाई पर हवा में चलते थे. भीड़ भरी सड़कों पर जादूगर का इस तरह का लाइव कारनामा देख कर दर्शक रोमांचित हो जाते थे.

इस से पहले 2013 में यही करतब दिखाते समय जादूगर चंचल की बचने की कला को दर्शकों ने पकड़ लिया था. उस समय चंचल को शीशे के पारदर्शी बौक्स में तालों से बंद कर हुगली नदी में फेंका गया था. तब वे 29 सेकंड में पानी से बाहर आ गए थे. दरसअल  जादूगर चंचल ने पानी में बौक्स फेंके जाने के बाद उसे अपने तरीके से खोला और बाहर आ गए थे.

यह बौक्स इस तरह से बना हुआ था कि आम दर्शक को इस बात का पता नहीं चल सकता था कि ताले लगाने के बाद बौक्स का एक गेट खुल जाता है. जादूगर ने पानी के अंदर इसी गेट से खुद को बाहर निकाल कर दर्शकों को जादू का अहसास कराया था.

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पता नहीं कहां गलती हुई कि दर्शकों को इस बौक्स के गेट से जादूगर के निकलने का पता चल गया और बाहर निकलने पर उन्होंने चंचल को घेर लिया. दर्शकों की भीड़ ने चंचल की सुनहरी विग भी खींच ली थी. उस समय बड़ी मुश्किल से दर्शकों को समझा कर शांत किया गया था.

अब तीसरी बार यही कारनामा दिखाने के लिए जादूगर चंचल के सहयोगियों ने पूरी तैयारी कर ली थी. सारे आवश्यक साजोसामान भी जुटा लिए गए थे. इस के लिए पुलिस और प्रशासन को आवश्यक पत्र भी दिया गया था.

निर्धारित दिन 16 जून को जादूगर के सहयोगियों का दल हावड़ा ब्रिज के पास पहुंच गया. सुबह करीब 10 बजे के आसपास जादूगर चंचल भी वहां आ गए. तब तक जादूगर का अनूठा कारनामा देखने के लिए वहां हजारों लोगों की भीड़ एकत्र हो चुकी थी.

चंचल ने हाथ हिला कर दर्शकों की भीड़ का अभिवादन किया. जादूगर चंचल ने इस दौरान दर्शकों को संबोधित करते हुए कहा कि अगर मैं यह खतरनाक करतब दिखाते हुए नदी से सफलतापूर्वक बाहर आ गया, तो यह जादू होगा और अगर नहीं आ सका तो दुखांत होगा.

हावड़ा ब्रिज के नीचे पहले से ही 2 जलयान तैयार खड़े थे. जादूगर चंचल इन में से एक जलयान पर चढ़ गए. दूसरे पर उन के सहयोगियों की दूसरी टीम सवार थी, जो पूरे दृश्य को कैमरे में कैद कर रही थी.

हजारों लोगों की मौजूदगी में एक जलयान पर सवार सहयोगियों ने चंचल के हाथपैर मोटी रस्सी और जंजीरों से बांध दिए. जंजीर को 2 तालों से जड़ दिया गया ताकि जादूगर आसानी से न तो अपने हाथपैर हिला सके और न ही ताले खोल सकें. इस के बाद जादूगर की आंखों पर पट्टी बांध दी गई.

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पूरी तैयारी के बाद दोपहर करीब 12.30 बजे रस्सी और जंजीरों से बंधे जादूगर को क्रेन में लंबी रस्सी लटका कर हुबली व गंगा नदी के बीच पानी की तेज धारा में फेंक दिया गया. नदी में फेंके जाने से पहले जादूगर चंचल ने हाथपैर बंधे होने और आंखों पर पट्टी होने के बावजूद एक बार फिर दर्शकों का अभिवादन करने का प्रयास किया. इस पर दर्शकों ने तालियां बजा कर, जयकारे लगा कर जादूगर की हौसलाअफजाई की.

जादूगर को नदी के गहरे पानी में फेंके जाने के बाद वहां खड़ी हजारों की भीड़ बिना पलक झपकाए नदी के पानी की सतह पर जादूगर के दिखने का इंतजार करने लगी, दर्शकों को कुछ सेकंड के लिए एक बार जादूगर नदी की सतह पर नजर जरूर आए लेकिन फिर अचानक गायब हो गए और फिर दिखाई नहीं दिए.

जादूगर को 5-7 मिनट के दरम्यान अपनी कला के बल पर रस्सी, जंजीरों और तालों से मुक्त हो कर नदी की सतह पर आ जाना था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

लोग टकटकी लगाए जादूगर चंचल के फिर से दिखाई देने का इंतजार कर रहे थे. दर्शकों को एकएक पल मुश्किल लग रहा था. 5 मिनट क्या, जादूगर चंचल को नदी में डाले 15 मिनट से ज्यादा का समय हो चुका था. लेकिन वे नजर नहीं आए.

इस से हजारों दर्शकों के साथ उन के सहयोगियों की बेचैनी भी बढ़ गई. काफी देर इंतजार के बाद अधिकांश दर्शक निराश हो कर लौट गए. सैकड़ों दर्शक वहां रुक कर अगले समाचार का इंतजार करते रहे.

इसी बीच, जादूगर के सहयोगियों ने चंचल की तलाशी के लिए अपने कुछ साथियों को नदी में उतार दिया था. लेकिन जादूगर का कुछ पता नहीं चला. इस के बाद पुलिस को सूचना दे दी गई. सूचना मिलने पर रिवर ट्रैफिक पुलिस जादूगर की तलाश में जुट गई.

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बाद में आपदा प्रबंधन टीम और गोताखोर भी आ गए. जिस पिंजड़े में जादूगर को नदी की धारा में फेंका गया था, वह तो मिल गया लेकिन चंचल का कोई पता नहीं चला. इस का मतलब चंचल हाथपैर खोल कर पिंजरे से बाहर तो निकल गए थे, लेकिन किन्हीं कारणों से पानी के सतह से ऊपर नहीं आ सके थे.

इस का मतलब था कि जादूगर के साथ कोई दुर्घटना हो गई थी. फिर भी शाम तक नदी में जादूगर की तलाश होती रही, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. रात को अंधेरा हो जाने के कारण बचाव अभियान रोक दिया गया.

इस बीच, जादूगर के सहयोगियों को कुछ लोगों से पता चला कि घटनास्थल से दूर उन्होंने नदी की तेज धारा में पीले कपड़े पहने हुए एक आदमी को हाथ मारते और बचाव की कोशिश करते देखा था. इन परिस्थितियों में बचाव दल और चंचल के सहयोगियों को जादूगर के जीवित होने की उम्मीद कम ही रह गई थी.

दूसरे दिन 17 जून को रिवर ट्रैफिक पुलिस और आपदा प्रबंधन की टीम के साथ गोताखोर हुगली नदी में जादूगर चंचल की तलाश में फिर से जुट गए. दिनभर तलाशी का काम चलता रहा. इस दौरान वहां हजारों लोग आतेजाते रहे. अधिकारी भी आए गए.

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जादूगर के सहयोगियों का दल तो 16 जून की सुबह से ही बिना कुछ खाएपिए वहीं डटा हुआ था. उन की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई थी. वे समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसा क्या हुआ, जो जादूगर वापस नहीं आ सके. यह तय था कि जादूगर की कला में कोई कमी रह गई थी.

लगभग 30 घंटे तक चले खोज अभियान के बाद 17 जून की शाम को जादूगर मैंड्रेक का शव हावड़ा के रामकृष्णपुर घाट के पास बरामद हुआ. उन का शव नाव से कदमतल्ला घाट पर लाया गया.

चंचल की पहचान उन के पहने कपड़ों से की गई. करतब दिखाने के लिए वे पीले रंग की शर्ट, लाल पैंट और पीले रंग के नकली बाल पहन कर नदी में कूदे थे. उन का शव देख कर उन के सहयोगी फूटफूट कर रोने लगे. वहां मौजूद चंचल के शुभचिंतकों की आंखों से भी आंसू आ गए.

पुलिस ने आवश्यक काररवाई के बाद इस मामले को धारा 304 के तहत नौर्थ पोर्ट थाने में दर्ज कर लिया. पुलिस का कहना था कि जादूगर ने करतब दिखाने और उस से होने वाले जोखिम की आवश्यक अनुमति नहीं ली थी. जिस जलयान से जादूगर नदी में उतरे थे, उस में जीवनरक्षक व्यवस्था नहीं थी.

जिस क्रेन के सहारे जादूगर को हाथपैर बंधी हालत में नदी में फेंका गया, उस क्रेन के लिए पोर्ट ट्रस्ट से अनुमति नहीं ली गई थी. पुलिस ने 18 जून को जादूगर के शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद उन के घर वालों को सौंप दिया.

इस बीच, जादूगर चंचल के सहायक और भतीजे रुद्रप्रसाद लाहिड़ी ने दावा किया कि जादूगर चंचल यानी मैंड्रेक अपनी जादू की कला से सारे बंधन खोल कर नदी की सतह पर आ गए थे और उन्होंने हाथ भी हिलाया था. लेकिन फिर अचानक गायब हो गए. पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जादूगर ने करतब दिखाने की अनुमति लेते समय नियमों की कमी का फायदा उठाया हो और अपनी जान से हाथ धो बैठे हों.

कहा जा रहा है कि जादूगर ने पुलिस को अनुमति देने के लिए दिए पत्र में यह नहीं लिखा था कि वे पानी में छलांग लगाएंगे. डीसी पोर्ट सैयद वकार रजा का कहना था कि चंचल लाहिड़ी ने पत्र में लिखा था कि पूरा करतब किसी नाव पर दिखाया जाएगा. इसी आधार पर उन को अनुमति दी गई थी.

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अधिकारियों का कहना है कि नदी में फेंके जाने के बाद जादूगर रस्सी और लोहे की जंजीर से बंधे हाथपैर कैसे खोलेगा, इस की जानकारी चंचल के सहयोगी नहीं दे सके. हो सकता है जादूगर ने अपने बंधन खोलने का राज सहयोगियों को बताया ही नहीं हो.

विशेषज्ञों का मानना है कि जादूगर चंचल के शरीर पर भारी भरकम कपड़े और दूसरी चीजें थीं, संभवत: इसी कारण वे नदी के तेज बहाव में तैर नहीं पाए होंगे और मौत के मुंह में समा गए. माना जा रहा है कि जादूगर के टाइम मैनेजमेंट में कुछ कमियों और गलतियों की कीमत उन्हें अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी.

इस के अलावा जादूगर को नदी में फेंके जाते समय मौके पर सुरक्षा के इंतजाम नहीं थे. अगर सुरक्षा के इंतजाम होते, तो तुरंत खोजने का अभियान शुरू कर दिया जाता और संभवत: उन की जान बच जाती.

41 साल के जादूगर चंचल लाहिड़ी पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर स्थित सुभाष ग्राम के रहने वाले थे. परिवार में उन की मां उमा लाहिड़ी, पत्नी और 10वीं में पढ़ रहा एक बेटा है.

मां उमा लाहिड़ी अपने बेटे को याद करती हुई कहती है कि उसे बचपन से ही जादूगरी के करतब सीखने और दिखाने का शौक था. वह छोटी सी उम्र में ही जादूगरी के बल पर मशहूर हो गया था.

यह दुखद रहा कि जादूगर चंचल उर्फ मैंड्रेक का आखिरी कारनामा उन के जीवन का अंत साबित हुआ. लाहिड़ी की असमय मौत से जादूगर समुदाय में शोक छा गया. देश के मशहूर जादूगर पी.सी. सरकार का कहना है कि शायद लाहिड़ी को ऐसे करतब के लिए और ज्यादा प्रैक्टिस की जरूरत थी.

भारत में करतब दिखाते समय जादूगर की मौत का यह पहला मामला बताया जा रहा है. इस से पहले किसी नामी या चर्चित जादूगर के इस तरह दुखद अंत की कोई बात सामने नहीं आई.

जादू कला भारत में सैकड़ों साल से प्रचलित है. जादूगरों के मामले में बंगाल का नाम मुख्य रहा है. राजामहाराजाओं के काल में जादू कला खूब फलीफूली थी. जादू मुख्य रूप से आधुनिक तकनीक, समय प्रबंधन, विज्ञान के सहारे हाथ की सफाई और सम्मोहन पर निर्भर होता है.

कुछ लोग तंत्र विद्या को भी जादू से जोड़ते हैं, लेकिन ऐसा है नहीं. आजकल जादूगरी मनोरंजन के साथ लोगों को साधु-बाबाओं के अंधविश्वास से बचने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.

हमारे देश में कई मशहूर जादूगर हुए हैं. इन जादूगरों ने भारत के साथ विदेशों में भी अपने करतबों से काफी नाम कमाया है. इन में पीसी सरकार, ओपी शर्मा, अशोक भंडारी, जादूगर आनंद, के. लाल, प्रह्लाद आचार्य, गोपीनाथ मुथुकाड, नकुल शेनौय, यमुनाथ पालिनाथ, गणपति चक्रवर्ती आदि के नाम प्रमुख हैं.

इस से पहले जादूगरी में गोगिया पाशा का पूरी दुनिया में नाम रहा था. भारतीय जादूगरों ने आजकल पुराने और परंपरागत जादू के कारनामों के स्थान पर विज्ञान और तकनीक के सहारे नईनई प्रस्तुतियां शुरू की हैं.

आंखों पर पट्टी पर बांध कर भीड़ भरी सड़कों पर मोटरसाइकिल चलाना, वाटर औफ इंडिया, हैट में से कबूतर निकालना, हथकड़ी लगाना और खोल देना, मंच से गायब हो जाना, आरा मशीन से लड़की के 2 टुकड़े करना, इंद्रजाल आदि कारनामे लोगों को जादू कला देखने के लिए आकर्षित करते हैं.

कुछ जादूगर स्टेज शो के अलावा खुले आसमान तले भी अपनी कला दिखाते हैं. इन में हाथी, बस या ट्रेन गायब करने के करतब भी शामिल हैं. कुछ जादूगर ताजमहल को गायब कर दिखाने का दावा भी करते हैं.

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करतब दिखाते समय हुआ यह हादसा कोई पहला नहीं है. इस से पहले भी दुनिया के कई नामी जादूगर अपना करतब दिखाते समय मौत की नींद सो गए. वे करतब उन के लिए आखिरी स्टंट साबित हुए. इस में अमेजिंग जौय के नाम से जाने जाते रहे जौय बुरस एक ताबूत में अपना करतब दिखाते समय मौत के मुंह में समा गए थे. इस करतब में जादूगर को ताबूत में बंद कर सीमेंट से चिन दिया गया था, बाद में जादूगर को अपनी कला से जीवित बाहर निकल आना था. लेकिन अमेजिंग जौय के साथ ऐसा नहीं हुआ.

जादूगरनी प्रिंसेज टेनको अपनी पोशाकों के बल पर जादू दिखाती थीं. एक कारनामा दिखाते हुए उन के पहने कपड़ों पर 10 तलवारें घोंपी गईं. यह कारनामा उन की जिंदगी का आखिरी सफर बन गया. चार्लिस रोवन की कार स्टंट के दौरान मौत हो गई थी. उन्हें यह कारनामा दिखाते हुए कार से भी तेज गति से भागना था.

जादूगर जेनेस्टा को पानी से भरे टैंक में कारनामा दिखाना था. लेकिन वे सफल नहीं हो सके और उन की मौत हो गई. बालाब्रेगा की मौत आग का स्टंट दिखाने के दौरान हुई थी. सन 1934 में नामी जादूगर बेजामिन खुद को जमीन में गाड़ने के बाद भी जीवित बाहर निकल आए थे. लेकिन इस के तुरंत बाद उन की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी.

स्टेज पर जादू के कारनामे दिखाते जादूगरों की लोकप्रियता सोशल मीडिया के इस युग में लगातार कम हो रही है, इसलिए जादूगर भी खुद को समय के साथ अपडेट कर रहे हैं. लोगों में जादू के प्रति आकर्षण बनाए रखने के लिए जादूगर नईनई ट्रिक सीख कर उन का प्रदर्शन कर रहे हैं.

कहा जाता है कि बीसवीं सदी में ‘रोप ट्रिक’ नाम के जादू का कारनामा सब से हैरतअंगेज हुआ करता था. इस कारनामे के सफल प्रदर्शन में एकदो जादूगर ही कामयाब हो सके थे. इस कला में जादूगर एक रस्सी को जादू के सहारे आसमान में सीधी खड़ी कर उस पर सीढ़ी की तरह चढ़ कर गायब हो जाता है. इस के बाद उस जादूगर के एकएक अंग नीचे जमीन पर गिरते थे. बाद में वह जादूगर प्रकट हो जाता था. आज भी जादूगरों की नई पीढ़ी इस हैरतअंगेज कारनामे को सीखने को लालायित हैं.

कहानी सौजन्य- मनोहर कहानियां

महीने के ‘वे’ दिन, बदलनी होगी सोच

एक इलैक्ट्रिकल ऐप्लायंसिस कंपनी के विज्ञापन में जहां नारी का सम्मान करने का संदेश दिया जा रहा है, वहीं ‘आज की नारी सब पर भारी’ जैसे जुमले भी सुनने को मिलते हैं. उसे आधी आबादी का दर्जा दिया जा रहा है और चारों ओर नारी सशक्तीकरण की बातें की जा रही हैं. हैरानी की बात तो यह है कि उसी समाज में लड़कियों व महिलाओं को पीरियड्स यानी मासिकधर्म के दौरान शारीरिक दर्द का सामना करते हुए अपवित्र होने का मानसिक दंश सहना पड़ता है. इस के बारे में बात और विचारविमर्श करने को बेशर्मी माना जाता है, क्योंकि लोगों को आज भी इस जैविक प्रक्रिया के वैज्ञानिक पहलुओं की जानकारी नहीं है. इस के कारण लड़कियों और महिलाओं को इस दौरान अपवित्र समझा जाता है, उन के साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया जाता है, उन्हें धार्मिक उत्सवों में भाग लेने की मनाही होती है और घर के पुरुषों से दूर अलग बिस्तर पर सोने की मजबूरी.

मैंस्ट्रुएशन यानी मासिकधर्म से जुड़े ये अंधविश्वास सालों से ढोए जा रहे हैं. सभी मांएं अपनी बेटियों को इन्हें सिखाती हैं, जिस से विकास के दौर में उन के आत्मविश्वास को गहरी चोट पहुंचती है और उन का व्यक्तित्व विकास रुक जाता है.

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बदलाव की बयार

भारत में चर्चा के लिए वर्जित माने जाने वाले मैंस्ट्रुएशन को चर्चा का विषय बनाने और उस पर खुल कर बात करने की शुरुआत की झारखंड के गढ़वा की अदिति गुप्ता ने. पेशे से इंजीनियर और नैशनल इंस्ट्टियूट औफ डिजाइन (एनआईडी), अहमदाबाद से पोस्ट ग्रैजुएट अदिति का कहना है कि बचपन में जब भी टैलीविजन पर सैनिटरी नैपकिन का विज्ञापन आता था और मैं उस के बारे में जानना चाहती थी, तो मेरी मां उस चैनल को बदल देती थीं और जब भी मैं स्पष्ट रूप से बात करना चाहती, तो वे कहतीं कि जब बड़ी हो जाओगी सब जान जाओगी. पहली बार जब 12 वर्ष की उम्र में मेरे पीरियड्स शुरू हुए तो मां ने मुझे पुराना कपड़ा दिया, जिसे वे खुद भी इस्तेमाल करती थीं. उस दौरान मुझे पेट में दर्द होता था और मेरा पूरा दिन बरबाद हो जाता था. परेशानियां तब और बढ़ जाती थीं, जब मुझे अपने कपड़े अलग धोने पड़ते थे. पीरियड्स खत्म हो जाने के बाद बैडशीट को भी धोना पड़ता था. समाज में व्याप्त मासिकधर्म से जुड़े अंधविश्वासों और वर्जनाओं के कारण दुकान पर जा कर सैनिटरी नैपकिन खरीदना शर्मनाक माना जाता था. फिर भी इस दौरान मेरे परिवार ने मुझे पूरा सहयोग दिया.

स्कूल में भी जब 9वीं कक्षा में बायोलौजी में इस विषय पर पढ़ाया जाना था, तो हमारे पुरुष अध्यापक ने हमें उस चैप्टर को खुद घर से पढ़ कर आने को कहा. अच्छी शिक्षा के अभाव में जब मैं ने दूसरे शहर के स्कूल में दाखिला लिया, तो वहां के होस्टल में 10 लड़कियों के लिए एक बाथरूम था. जहां कपड़े के पैड को धोना संभव न था. तब मैं ने अपनी रूममेट को सैनिटरी नैपकिन प्रयोग करते देखा, तो मैं ने भी सैनिटरी नैपकिन प्रयोग करने की सोची. जब मैं दुकान से नैपकिन लेने गई, तो दुकानदार ने पैड को पेपर से लपेट कर काली पौलिथीन में डाल कर दिया. तब से आज तक मैं ने अनेक ब्रैंड्स के नैपकिन ट्राई किए और उन के सोखने की क्षमता जांची.

अदिति एनआईडी, अहमदाबाद में तुहीन जो अब उन के पति हैं के संपर्क में आईं. अदिति बताती हैं कि तुहीन मेरे सहपाठी होने के साथसाथ मेरे अच्छे दोस्त भी थे. तुहीन इस विषय पर इंटरनैट से जानकारी प्राप्त करते और मुझे बताते. 2009 में एक प्रोजैक्ट के दौरान मैं ने और तुहीन ने मैंस्ट्रुएशन पर रिसर्च करने का निर्णय लिया और इस बारे में कई लड़कियों, उन के मातापिता, शिक्षकों व गाइनोकोलौजिस्ट्स से बात की. तब हम ने जाना कि स्थितियां आज भी वैसी ही हैं, जैसी 18-20 साल पहले थीं. तब यह प्रोजैक्ट मैंस्ट्रुपीडिया का आधार बना.

क्या है मैंस्ट्रुपीडिया

मैंस्ट्रुपीडिया एक फन गाइड है हैल्दी पीरियड्स की. गूगल पर मैंस्ट्रुपीडिया लिखते ही मैंस्ट्रुएशन यानी मासिकधर्म या माहवारी से संबंधित जानकारियों की लंबी सूची आप के सामने आती है. इस वैबसाइट को बनाने का श्रेय जाता है अदिति गुप्ता और तुहीन पौल को. नवंबर, 2012 को लौंच हुई इस वैबसाइट का उद्देश्य पीरियड्स के बारे में लोगों को जागरूक कराना है और इस से जुड़े अंधविश्वासों को दूर करने के साथसाथ इस दौरान साफसफाई की पूरी जानकारी भी देना है ताकि इस दौरान लड़कियां व महिलाएं ऐक्टिव व हैल्दी रहें और उन के साथ अछूतों जैसा व्यवहार न किया जाए. इस वैबसाइट में मासिकधर्म से जुड़े सामाजिक और वैज्ञानिक पहलुओं की जानकारी है, पाठकों द्वारा अकसर पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर हैं व एक ब्लौग है, जहां पाठक अपने अनुभव व आपबीती शेयर कर सकते हैं.

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वैबसाइट की सभी जानकारियां विश्व की प्रसिद्ध हैल्थ व मैडिकल संस्थाओं द्वारा प्राप्त की गई हैं. लंदन के गाइनोकोलौजिस्ट डा. महादेव भिडे इस वैबसाइट के मैडिकल सलाहकार हैं. वे वैबसाइट का कंटैंट देखने के साथसाथ इस के सवालजवाब विभाग को भी देखते हैं. जबकि ब्लौग की ऐडिटर दिव्या रोजलीन हैं. अदिति इस वैबसाइट की सहसंस्थापक व मार्केटिंग स्ट्रेटजिस्ट हैं, जबकि तुहीन कहानीकार व इलेस्ट्रेटर.

कौमिक बुक टेल्स औफ चेंज

रंगीन चित्रों व आसान हिंदी व अंगरेजी भाषा में बनाई गई कौमिक बुक टेल्स औफ चेंज का उद्देश्य लड़कियों को इस के माध्यम से पीरियड्स की जानकारी देना है. हिंदी व अंगरेजी में इस कौमिक बुक के लौंच होने के बाद अदिति गुप्ता, तुहीन पौल व रजत मित्तल, जो वैबसाइट के तकनीकी पक्ष को संभालते हैं, इस कौमिक को अन्य भारतीय भाषाओं में भी लौंच करने की योजना बना रहे हैं. इस कौमिक में पूजा, अंजलि व जिया नामक 3 किरदारों को पीरियड्स की जानकारी देने का काम दीदी नामक किरदार को सौंपा गया है, जो मैडिकल स्टूडैंट है.

अदिति कहती हैं कि इस लौजिक को लोगों तक पहुंचाने के लिए हम स्कूलों, एनजीओ व सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली कंपनियों का सहयोग लेंगे. यह कौमिक बुक वहां सफल होगी और जानकारी का माध्यम बनेगी, जहां बोलचाल का माध्यम असफल हो जाता है. यह कौमिक उन छोटीछोटी लड़कियों, जो इस कठिन दौर से गुजरती हैं, को बेसिक जानकारी देगी. फिलहाल यह कौमिक बुक हिंदी व अंगरेजी में बन रही है और अगले 5 वर्षों में अदिति की इस के 15 भारतीय भाषाओं में अनुवाद कराने की योजना है. इस के अलावा 15 पेज की एक कौमिक भी है, जो मैंस्ट्रुएशन से संबंधित आधारभूत जानकारी लड़कियों को सरल भाषा में उपलब्ध कराएगी.

बदलनी होगी सोच

अदिति का मानना है कि मैंस्ट्रुएशन को एक वर्जित विषय बनाने की जिम्मेदारी काफी हद तक हमारे समाज की महिलाओं की ही है. मांएं अपनी बेटियों को शुरू से सिखाती हैं कि शर्म ही तुम्हारा गहना है. ऐसे बैठो, वैसे मत बैठो, इस से बात करो उस से मत करो, खुद को हमेशा ढक कर रखो, अपने शरीर के बारे में किसी से बात मत करो. दरअसल, यही सोच हमें बदलनी होगी. हमें समाज में यह जानकारी फैलानी होगी कि यह एक बायोलौजिकल प्रोसैस है, जिसे गंदा मानना गलत है. कोई भी लड़की विवाहित होने के बाद इस प्रोसैस के चलते ही मां बनती है, तो यह प्रक्रिया गंदी कैसे हो सकती है?

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अदिति का कहना है कि इस वैबसाइट व कौमिक बुक का टारगेट वैसे तो युवा लड़कियां व महिलाएं हैं पर हम पुरुषों व लड़कों तक भी अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें जब महिलाओं के इस बायोलौजिकल प्रौसेस की जानकारी होगी, तभी वे अपने जीवन में आने वाली लड़कियों व महिलाओं की समस्याओं को समझ सकेंगे व उन के साथ सहयोग कर सकेंगे. मैंस्ट्रुएशन के बारे में खुल कर बात न करने यानी अपनी समस्याओं को शेयर न करने के कारण अधिकांश महिलाएं पीरियड्स के दौरान अनहाइजीनिक माहौल में रहती हैं. वे आधुनिक उत्पादों का प्रयोग नहीं करतीं, जिस के चलते उन्हें वैजाइनल इन्फैक्शन व अन्य कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. आप को जान कर हैरानी होगी कि पीरियड्स को शर्म के साथ जोड़ने के कारण केवल 12 फीसदी भारतीय महिलाएं सैनिटरी नैपकिन्स का इस्तेमाल करती हैं. अदिति उम्मीद करती हैं कि आज की युवा पीढ़ी जो बदलाव की पक्षधर है और समाज में बदलाव चाहती है, हमारे इस मिशन में हमारे साथ होगी और समाज में इस दिशा में सकारात्मक बदलाव आएंगे.

पार्लर क्यों जाना जब रसोई में है खजाना

‘‘मेरी त्वचा से मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता, क्योंकि मेरे साबुन में हैं हलदी, चंदन और शहद के गुण. इस साबुन में है एकचौथाई मिल्कक्रीम जो दे मुझे नर्म मुलायम त्वचा. दादी मां ने झट लौंग का तेल मला था. क्या आप के टूथपेस्ट में नमक है? क्ले शैंपू से मेरे बाल रहते हैं एकदम खिलेखिले,’’ इस तरह के जुमलों वाले न जाने कितने ही विज्ञापन हम रोज अखबार, टीवी और रेडियो पर देखतेसुनते हैं. इन व्यावसायिक विज्ञापनों में कितनी सचाई है यह तो उत्पाद बनाने और उन्हें इस्तेमाल करने वाले ही बता सकते हैं, मगर यह निरविवाद सच है कि खूबसूरती का खजाना हमारीआपकी रसोई में ही छिपा है.

बाजार में मिलने वाले सौंदर्य उत्पादों से कई महिलाओं को एलर्जी की शिकायत होती है. वे महंगे भी बहुत होते हैं. ऐसे में जब हर अच्छे उत्पाद में वही सामग्री इस्तेमाल करने का दावा किया जाता है, जो हमारी रसोई में मौजूद है, तो क्यों न हम खुद ही अपने खजाने का उपयोग कर खुद को बनाएं खूबसूरत.

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आइए रसोई में तलाशते हैं खूबसूरती

– शहद को सीधे चेहरे पर इस्तेमाल किया जा सकता है. यह न केवल त्वचा की नमी बनाए रखता है, बल्कि चेहरे के दागधब्बे भी दूर करता है. इस से सनबर्न भी दूर होता है.

– हलदी के गुण तो इसी बात से जाहिर हो जाते हैं कि इस के उबटन के प्रयोग को शादीब्याह में एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है. यह त्वचा में निखार लाती है. इसे दूध में मिला कर लगाने से टैनिंग दूर होती है.

– चीनी को कटे नीबू पर लगा कर कुहनियों और घुटनों पर गोलगोल घुमाते हुए धीरेधीरे रगड़ने से उन का कालापन दूर होता है. यह प्रयोग हाथों को नर्ममुलायम बनाने के लिए भी किया जा सकता है.

– दूध की मलाई के नियमित इस्तेमाल से न केवल त्वचा ही कोमल रहती है, बल्कि चेहरे की झुर्रियों से भी छुटकारा मिलता है.

– दही लगाने से चेहरे की टैनिंग और दागधब्बे दूर होते हैं. इसे मेथी पाउडर के साथ मिला कर लगाने से बालों की चमक देखते ही बनती है. इस से बाल मजबूत और मुलायम बनते हैं.

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– मुट्ठी में नमक ले कर बांहों की मालिश करने से उन की त्वचा में कोमलता आती है. अदरक के रस में नमक मिला कर लगाने से मुंहांसों से छुटकारा मिलता है.

– बर्फ के इस्तेमाल से न केवल चेहरे पर ताजगी आती है, बल्कि डार्क सर्कल्स भी दूर होते हैं. इसे मुलायम कपड़े में लपेट कर चेहरे और गरदन पर हलके हाथ से गोलगोल घुमाएं. मेकअप करने से पहले चेहरे पर बर्फ लगाने से यह अधिक समय तक टिका रहता है.

– ग्लिसरीन स्किन केयर दवाओं की मुख्य घटक है. यह एक बेहतरीन मौइश्चराइजर है. यह त्वचा के रूखेपन को दूर करती है. इसे सीधे या गुलाबजल के साथ मिला कर इस्तेमाल किया जा सकता है.

– लौंग को पानी में घिस कर लगाने से मुंहासे दूर होते हैं और उन के निशान भी नहीं रहते हैं.

– इस्तेमाल किए टी बैग्स को फ्रिज में ठंडा कर के आंखों पर रखने से आंखों की सूजन और थकान दूर होती है.

– आंवला अमृत फल कहलाता है. इस का प्रयोग बालों को काला, घना और लंबा बनाता है. यह बालों का टूटनाझड़ना और असमय सफेद होना भी रोकता है.

– बेसन को साबुन की जगह इस्तेमाल करने से यह त्वचा की अतिरिक्त चिकनाई को कम कर के उसे साफ और चमकदार बनाता है.

– फलों और सब्जियों के छिलकों का इस्तेमाल भी त्वचा की कोमलता बनाए रखने का बेहतर उपाय है.

– बेकिंग सोडे को स्क्रब की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. यह ऐक्नों और ब्लैक हैड्स से छुटकारा दिलाता है.

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