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धोखाधड़ी : शादी के नाम पर ठगी का खेल

राजस्थान में अभी भी लड़कियों की कमी के चलते कई लोग कुंआरे हैं. वहां पहले से ही जातबिरादरी में रिश्तेदारी के जरीए शादियां होती रही हैं. आज भी ज्यादातर लोग परंपरा के मुताबिक अपने समाज में ही शादी करते हैं.

लेकिन आजकल ऐसा भी देखने को मिल रहा है कि एक समाज का लड़का दूसरे समाज की लड़की से प्यार कर के कोर्टमैरिज कर लेता है और अपनी नई दुनिया बसा कर मजे से रहता है.

समाज के ज्यादातर लोग उस प्रेमी जोड़े को कभी स्वीकार नहीं करते. कई बार तो वे उन्हें जान से मार डालते हैं. समाज का कोई आदमी उन से ताल्लुक नहीं रखता, जिस ने दूसरे समाज में जा कर शादी रचाई होती है.

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अगर कोई आदमी पंचों की बात नहीं मान कर शादी करने वालों के घर आताजाता है तो पंचायत उसे भी समाज से निकाल देती है. मगर कभीकभार पंचों के गलत फैसले भी उन के लिए मुसीबत बन जाते हैं और वे जेल का सफर भी कर लेते हैं.

ऐसे पंचों की वजह से न जाने कितने घर टूटे हैं और बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर हैं. राजस्थान के हर समाज में कुंआरे लड़कों की फौज मिलेगी. जब इन की शादी की उम्र निकल जाती है तो अपने समाज के बजाय ये मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा वगैरह राज्यों से पैसे दे कर दलाल के जरीए अपनी ही जाति की लड़की ढूंढ़ कर शादी करते हैं.

गरीब घरों की ऐसी लड़कियां जब राजस्थान आ कर खुशहाल होती हैं तो उन का मायके जाने का मन नहीं होता. दूसरे प्रदेश से खरीद कर लाई गई लड़कियां थोड़े समय में ही यहां के माहौल के हिसाब से उठनेबैठने लगती हैं.

यह देख कर कई दलालों ने ऐसी फरेबी दुलहनें भी तैयार कर ली हैं जो पैसे ले कर शादी कर के ससुराल जाती हैं और मौका मिलते ही गहनेरुपए ले कर फरार हो जाती हैं.

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ऐसी फरेबी दुलहनों का नाम, पता व मातापिता सब फर्जी होते हैं. ऐसे ठग गिरोहों ने ऐसी फरेबी दुलहनों के अलगअलग नाम से आधारकार्ड बना रखे हैं. राजस्थान का ऐसा कोई जिला नहीं बचा जहां ऐसी फरेबी दुलहनों ने ठगी नहीं की हो.

दलाल लोग पैसे ले कर फरेबी दुलहन से ब्याह करा देते हैं. फरेबी दुलहन फिर बनती है लुटेरी दुलहन और वह सबकुछ समेट कर भाग खड़ी होती है और दोबारा कभी नहीं लौटती है.

लुटेरी दुलहनें इतनी शातिर होती हैं कि कई तो पति से सैक्स संबंध तक नहीं बनाती हैं. वे कह देती हैं कि पीरियड्स चालू हैं. इस के बाद 1-2 दिन में ही वे रुपएगहने ले कर फरार हो जाती हैं.

जैसलमेर शहर में एक सेठ के बेटे की शादी मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में एक दलाल की मारफत हुई थी. दिसंबर, 2017 में शादी करने के एवज में लड़की वालों को 8 लाख रुपए दिए. लड़की गोरीचिट्टी और खूबसूरत थी. मगर जैसलमेर आ कर 3 दिन तक सेठजी के बेटे को पास तक फटकने नहीं दिया.

उस ने अपने पति से कहा, ‘‘मैं 4-5 दिन आप के काम की नहीं हूं. आप मुझ से दूर रहें. जब सब ठीक होगा तब प्यार में डूब जाना.’’

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सेठ का बेटा दिन गिनने लगा तभी शादी के 5वें दिन सुबहसवेरे ही दुलहन गायब हो गई. वह घर के गहने व 2 लाख रुपए नकद ले कर भाग गई. गहने 5 लाख रुपए के थे. इस हिसाब से सेठ को 15 लाख का चूना लग गया और दुलहन भी नहीं मिली. कई फरेबी दुलहनों ने पतियों के सीने में रख रातें भी गुजारीं. पति समझते थे कि प्यार करने वाली बीवी मिली है. मगर जैसे ही दुलहन को मौका मिला, वह सबकुछ समेट कर भाग गई.

बीवी की आस में लाखों रुपए खर्च कर चुके कुंआरों के साथ जब ऐसी वारदातें होती हैं तो दूसरे लोग भी मजाक करने से बाज नहीं आते. बेचारा कुंआरा जिंदगीभर की कमाई से तो हाथ धो बैठता ही है, लोगों के मजाक की वजह भी बन जाता है.

गैस की परेशानी है तो इन सब्जियों से करें तौबा

आज के वक्त में लोगों को गैस की परेशानी बहुत आम हो गई है. जिस तरह से लोगों के खानपान में बदलाव हुए हैं, ये समस्याएं बढ़ी हैं. जिसके बाद आपको किसी डाक्टर के पास जाना पड़ता है और बदले में आपके हाथ आती हैं ढ़ेरों दवाइया. इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि आप अपने खानपान से इस चीजों को  हटाइए और गैस की समस्या को दूर भगाइए.

गैस के मरीज अगर इन चीजों को अपने खाने में शामिल ना करें तो उनकी ये समस्या दूर हो सकती है.

  • पत्‍ता गोभी

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गैस के मरीज सबसे पहले पत्ता गोभी से दूरी बना लें. इसके पचने में काफी समय लगता है. रात में इसे खाने से अपच और गैस की समस्या हो सकती है.

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  • आलू

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आलू भी गैस के मरीजों के लिए काफी नुकसानदायक होता है. आपको बता दें कि आलू में स्टार्च की मात्रा अत्यधिक होती है, जिसे दाल के साथ खाना काफी नुकसानदायक होता है. इससे गैस की परेशानी और बढती है.

  • खीरा

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खीरा को दिन में खाना लाभकारी होता है. पर गैस के मरीजों के लिए ये बेहद नुकसानदायक होता है क्योंकि इसमें पानी की मात्रा काफी ज्यादा होती है और इसमें फाइबर भी प्रचूर मात्रा में पाया जाता है. रात में इसे खाने से पाचन में काफी दिक्कतें आती हैं, और गैस बनने लगती है.

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  • दूध के उत्पाद

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दूध के उत्पाद जैसे दूध में शुगर लैक्‍टोज होता है, जो बहुत से लोंगो को नहीं हजम हो पाता. इससे गैस और पेट में मरोड होने लगती है. कई लोंगो को तो दूध पी कर डायरिया भी हेा जाता है. रात में गर्म दूध पीने से गैस  की समस्या बढ़ जाती है.

चमकती त्वचा के लिए स्किन केयर के इन 5 टिप्स पर गौर जरूर करें

ज्यादातर लड़कियों की यह शिकायत रहती है कि उन की त्वचा ग्लोइंग और चार्मिंग नहीं दिखती. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि या तो उन्हें अपनी त्वचा के अनुसार सही स्किन केयर का पता नहीं होता या फिर वे त्वचा के प्रति लापरवाही बरतती हैं.

आइए जानते हैं त्वचा को साफसुथरा व चमकदार बनाए रखने के कुछ टिप्स:

  1. त्वचा को हर मौसम में मौइश्चराइज करने की जरूरत होती है, क्योंकि रूखी त्वचा खुजली जैसी समस्याएं पैदा करती है. मौइश्चराइजर का चुनाव करते समय यह ध्यान रखें कि आप की त्वचा औयली है या रूखी.

2. क्लींजिंग के बाद भी यदि त्वचा की गंदगी पूरी तरह साफ न हो तो नियमित तौर पर टोनिंग करनी चाहिए. इस से त्वचा की गंदगी भी दूर होती है और उस में नमी भी बनी रहती है.

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3. अगर आप की स्किन ड्राई है तो सौफ्ट क्लींजर ही प्रयोग करें. सैंसिटिव स्किन के लिए माइल्ड क्लींजर इस्तेमाल करें.

4. त्वचा की टोनिंग और मौइश्चराइजिंग से पहले उसे ऐक्सफौलिऐट करना न भूलें. इस से त्वचा की डैड सैल्स हट जाती हैं और उस का नैचुरल ग्लो उभर कर आता है.

5. यदि आप के पैर के नाखून साफ नहीं हैं, एडि़यां गंदी व कटीफटी हैं, पैरों पर अनचाहे बाल हैं तो कितनी भी स्टाइलिश ड्रैस व फुटवियर पहन लें, आप के ऊपर जंचेगा नहीं. शौर्ट ड्रैस या डैनिम के साथ ओपन फुटवियर पहनने का शौक है तो अपने पैरों की साफसफाई पर पूरा ध्यान दें. इस के लिए घरेलू उपाय अपनाना ही काफी नहीं है, र्पालर जा कर ऐक्सपर्ट से मैनिक्योर, पैडिक्योर, नेल कटिंग व क्लीनिंग नियमित तौर पर कराती रहें.

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धरती का स्वर्ग है ‘जम्मू कश्मीर’

अनेक इतिहासकार और जम्मू के लोग भी मानते हैं कि इस शहर की स्थापना 14वीं सदी में राजा जंबूलोचन ने की थी. कश्मीर का प्रवेशद्वार माना जाने वाला जम्मू शहर तवी नदी के तट पर बसा है. समुद्रतल से 305 मीटर की ऊंचाई पर बसे इस शहर का क्षेत्रफल 20.36 वर्ग किलोमीटर है. 18वीं शताब्दी के मध्य से यहां डोगरा राजाओं का राज रहा है. इसलिए यहां डोगरा संस्कृति की छाप साफ दिखाई देती है. जम्मूकश्मीर राज्य के व्यापार का प्रमुख केंद्र जम्मू को ही माना जाता है. यहां पर बने अनेक मंदिरों के कारण इसे ‘मंदिरों का शहर’ भी कहा जाता है. यहां घूमने का सब से अच्छा समय अप्रैल से अक्तूबर तक है जब पूरी घाटी हरियाली से सराबोर होती है. अक्तूबर के बाद यहां का मौसम सर्द होने लगता है. जम्मूकश्मीर में होने वाली आतंकवादी घटनाओं और धार्मिक व्यापार ने इस क्षेत्र की हालत खराब कर रखी है.

दर्शनीय स्थल

बाहु किला :  यह किला जम्मू बस अड्डे से 5 किलोमीटर की दूरी पर तवी नदी के बाईं तरफ एक पहाड़ी पर बना है. इसे शहर का सब से पुराना किला माना जाता है. इस किले का निर्माण राजा बाहुलोचन (राजा जंबूलोचन का भाई) ने 3 हजार साल पहले करवाया था.

मानसर झील : जम्मू से लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित है मानसर झील. यह खूबसूरत झील आसपास स्थित जंगलों से घिरी हुई है. यह पर्यटन की दृष्टि से एक आदर्श स्थान है. झील में नौकायन करते हुए इस के किनारे पर बने पुराने महल के खंडहर दिखते हैं.

सुरिनसर झील : यह झील जम्मू से 42 किलोमीटर दूर है. इस झील की लंबाईचौड़ाई मानसर झील से कम है लेकिन इस की खूबसूरती पर्यटकों का मन मोह लेती है.

शिवखोड़ी : जम्मू से लगभग 65 किलोमीटर दूर जम्मूकश्मीर राज्य के रियासी कसबे में शिवखोड़ी की गुफा कुदरत का एक अजूबा जान पड़ती है. गुफा लगभग 150 किलोमीटर लंबी है. इस गुफा की विशेषता है कि इस का दाहिना हिस्सा बहुत संकरा है. दूर से इस संकरे रास्ते को देखने पर लगता है कि इस के अंदर जाना असंभव है लेकिन गुफा के अंदर जाते ही एक चौड़ा मैदान दिखाई देने लगता है जिस में सैकड़ों लोग खड़े हो सकते हैं. जम्मू से शिवखोड़ी तक का रास्ता प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है.

अखनूर : अखनूर जम्मू से 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक सुंदर पिकनिक स्थल है. यह वह स्थान है जहां चिनाब नदी पहाड़ों से बलखाती हुई मैदान में उतर आती है.

अमर महल पैलेस संग्रहालय : अतीत का शाही महल आज अमर पैलेस संग्रहालय के नाम से जाना जाता है. तवी नदी के किनारे बने इस महल की विशेषता इस की बेहतरीन वास्तुशिल्प है, जिस का डिजाइन एक फें्रच वास्तुकार ने तैयार किया था. इस में पुराने समय की अनेक नायाब वस्तुएं संगृहीत हैं. यहां का पहाड़ी चित्रकला से संबंधित अनूठे चित्रों का संग्रह देखने लायक है.

झज्जर कोटली : जम्मूश्रीनगर राष्ट्रीय मार्ग पर स्थित पर्यटन स्थल झज्जर कोटली, पर्यटकों के लिए एक अच्छा पिकनिक स्थल है. यहां कलकल करता एक झरना है, जिस का स्वच्छ पानी पर्यटकों की थकान दूर करता है.

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पटनीटाप

जम्मूश्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर कुद और बटोट कसबों के बीच जम्मू से 112 किलोमीटर दूर स्थित है पटनीटाप. यह क्षेत्र खूबसूरती का पर्याय माना जाता है. देवदार के घने जंगल और हरीहरी घास के सुंदर ढलान यहां आने वाले पर्यटकों का मन मोह लेने के लिए काफी हैं. उधमपुर जिले में आने वाला यह क्षेत्र एक मशहूर रिसोर्ट में तबदील हो चुका है. पटनीटाप विकास प्राधिकरण ने इस स्थान को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए इस के आसपास शुद्ध महादेव, मानतलाई, चिनौनी, सनासर आदि स्थानों का विकास किया है.

यहां पर पूरे साल पर्यटकों का तांता लगा रहता है. स्कीइंग के शौकीनों के  लिए यह जगह काफी रोमांचक है. सर्दियों में यहां पर स्कीइंग का आयोजन किया जाता है. स्कीइंग को बढ़ावा देने के मकसद से यहां पर अब सिखाने का भी प्रबंध किया गया है जो आप एक सप्ताह के भीतर सीख सकते हैं. पटनीटाप से जुड़े नत्थाटाप के बाद पड़ने वाली खूबसूरत सनासर घाटी को खासतौर पर पैराग्लाइडिंग के लिए विकसित किया गया है.

यहां एक खूबसूरत झील भी है. झील के किनारे बैठ कर सैलानी प्रकृति के सुंदर नजारों का लुत्फ उठाते हैं. यहां पैराग्लाइडिंग सीखने आए देशीविदेशी पर्यटकों के खेलने के लिए गोल्फ का एक मैदान भी है.

श्रीनगर                         

झेलम नदी के किनारे बसा श्रीगनर जम्मूकश्मीर प्रदेश का एक खूबसूरत शहर है. जहां हर तरफ कुदरत के हसीन नजारे देखने को मिलते हैं. हर तरफ बिखरी हरियाली, हरीभरी घाटियां, पहाड़ों को चूमती झीलों का प्राकृतिक सौंदर्य और उस पर खुला नीला आसमान. जी हां, धरती का स्वर्ग यानी श्रीनगर की ये विशेषताएं ही तो हैं. जो इसे अन्य पहाड़ी पर्यटन स्थलों से अलग करती हैं. जहांगीर ने इस शहर की खूबसूरती से प्रभावित हो कर ही इसे धरती के स्वर्ग के नाम से नवाजा था. इस शहर के अंदर और इस के आसपास कुदरत के बेशकीमती खजाने बिखरे पड़े हैं. बस, देरी है तो इन्हें अपनी आंखों में समेट लेने की.

यहां आने वाले देशीविदेशी सैलानियों को पैदल चलने में थकान नहीं लगती, क्योंकि यहां का हर मौसम नया रंग बिखेरते हुए आता है इसीलिए श्रीनगर को जम्मूकश्मीर का गौरव भी कहा जाता है. श्रीनगर अपनी बेपनाह खूबसूरती के अलावा टै्रडिशनल कश्मीरी हैंडीक्राफ्ट और सूखे मेवों के लिए प्रसिद्ध है. श्रीनगर में मुख्यतया: कश्मीरी, डोगरी, उर्दू व अंगरेजी भाषाएं बोली जाती हैं. श्रीनगर घूमने का सब से बढि़या समय अप्रैल से जून है. समुद्रतल से 1,730 मीटर की ऊंचाई पर स्थित श्रीनगर का जर्राजर्रा दुनिया भर के सैलानियों को अपनी तरफ खींचता है. श्रीनगर में बहने वाली डल झील, वूलर झील, मुगलकालीन बगीचे, हजरतबल दरगाह, गुलमर्ग, पहलगाम, सोनमर्ग आदि यहां के मुख्य आकर्षणों में शुमार हैं.

दर्शनीय स्थल

डल झील : डल झील अपनी खूबसूरती के लिए दुनिया भर में मशहूर है. यह जम्मूकश्मीर की दूसरी बड़ी झील है. यह चारों तरफ से पर्वत की चोटियों से घिरी है. 6 किलोमीटर लंबी और 3 किलोमीटर चौड़ी झील के किनारों पर हरभरे बगीचे अपनी रौनक बिखेर रहे हैं. झील में बत्तखों की तरह तैरने वाले शिकारे सैलानियों को झील व टापुओं की सैर करवाते हैं. झील के पानी में तैरते घर के आकार की हाउस बोट्स लोगों को एक अलग और खास तरह का मजा देती हैं. रात में इन हाउस बोट्स से निकलने वाली सुनहरी रोशनी झील के पानी व आसपास के नजारे को और ज्यादा मनमोहक बना देती है.

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वूलर झील : भारत में स्वच्छ पानी की सब से बड़ी वूलर झील श्रीनगर के उत्तरपूर्व में लगभग 32 किलोमीटर दूर है. वूलर झील ऊंचेऊंचे पहाड़ों से घिरी है. इस के आसपास का नजारा झील की खूबसूरती को और बढ़ा देता है. झील में बहता कलकल करता साफ पानी मानो अपनी कहानी खुद बयां कर रहा हो.

मुगलकालीन बगीचे : सैलानियों के लिए श्रीनगर के बागबगीचे आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं. मुगलकाल के बादशाहों को इस शहर से इतना प्रेम था कि उन्होंने इस की खूबसूरती में चार चांद लगाने के लिए इसे बगीचों से सजाया, जो आज भी मुगल गार्डन के नाम से जाने जाते हैं. श्रीनगर के कुछ प्रमुख बगीचों में निशात बाग, शालीमार बाग, चश्मेशाही बगीचा काफी मशहूर हैं. इन में निशात बाग सब से बड़ा है. इसे मल्लिका नूरजहां के भाई आसिफ खान ने बनवाया था. शालीमार और निशात बाग चश्मेशाही की तुलना में काफी बड़े बाग हैं. चश्मेशाही बगीचा एक चश्मे के इर्दगिर्द बना हुआ है, जिसे 1632 में शाहजहां ने बनवाया था. मुगल बादशाह जहांगीर ने 1616 में मल्लिका नूरजहां के लिए शालीमार बाग का निर्माण करवाया था. इन बागों में लगे वृक्षों पर लगने वाले फूलों की खूबसूरती बयां करना काफी मुश्किल है.

गुलमर्ग : गुलमर्ग शहर से 52 किलोमीटर दूर स्थित है. गुलमर्ग का पूरा रास्ता देवदार के वृक्षों से ढका हुआ है. गरमियों में यह अपने हरेभरे घास के ढलानों व गोल्फ मैदान के लिए देशीविदेशी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र होता है तो सर्दियों में स्की रिसोर्ट दुनिया भर के सैलानियों के लिए भरपूर आनंद उठाने का केंद्र बन जाता है. समुद्रतल से 2,700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित होने की वजह से इस सैरगाह में नवंबर से ले कर अप्रैल तक बर्फ की सफेद चादर फै ली रहती है. सर्दी के मौसम में सैलानी यहां बर्फ के खेलों का मजा लेते हैं. गुलमर्ग में रोपवे एक और आकर्षण है. इसे स्थानीय भाषा में गंडोला कहा जाता है. इस में बैठ कर सैलानी चारों तरफ के मनमोहक दृश्यों का नजारा करते हैं.

पहलगाम : श्रीनगर से 96 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पहलगाम अनंतनाग जिले में आता है.  यहां सैलानी गोल्फ, हौर्स राइडिंग, स्कीइंग, टै्रकिंग के अलावा अन्य कई रोमांचक खेलों का आनंद उठा सकते हैं. 2,130 मीटर की ऊंचाई पर होने की वजह से पहलगाम में केसर की पैदावार एशिया में सब से ज्यादा होती है.

भारत रत्न से नवाजे गए पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

प्रणब मुखर्जी ऐसे पहले कांग्रेसी दिग्गज नेता होंगे. जिन्हें घुर विरोधी कहे जाने वाले विपक्ष भाजपा की सत्तासीन सरकार ने देश का सर्वोच्च  सम्मान देने का निश्चय किया है. और आज प्रणब मुखर्जी भारत रत्न से सम्मानित हो गए .देश के इस सर्वोच्च सम्मान के लिए हर एक प्रतिष्ठित शख्स लालायित रहता है. आज जब प्रणब मुखर्जी को भारत सरकार ने भारत रत्न से सम्मानित किया है ऐसे में अनेक प्रश्न खड़े हो जाते हैं जिनके जवाब शायद किसी के पास नहीं है.

प्रणब दा के रूप में

देश के राजनीतिक हलके में सम्मानित पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी एक बड़े  कांग्रेसी हैं. इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल मे उनके महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में रहे प्रणब मुखर्जी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा  राजीव गांधी के समय काल में जगजाहिर हुई.

प्रणब मुखर्जी कांग्रेस से बाहर रहकर अपना झंडा बुलंद करने लगे.जब ‘रोटी’ नहीं पकी तब नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में एक निष्ठावान कांग्रेसी के रूप में आपका रूपांतरण हो गया .

और आगे चलकर मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने तो यह सबके सामने जग जाहिर हो गया था कि प्रणब दा मनमसोस कर रह गए हैं. मगर दोनों कार्यकाल के दरम्यान आप एक निष्ठावान कांग्रेस मैन रह कर कांग्रेस की मुख्यधारा के दिग्गज रहे . लाख टके का सवाल है अब ऐसा क्या हो गया की आप को कांग्रेस के दिग्गज विरोधी गलबहियां कर रहे हैं-

इतिहास को मुंह दिखाना है

बुद्धिजीवी, दिग्गज, देश के धुरंधर कहते हैं और सोचते हैं की कल इतिहास जब प्रश्न करेगा तब हम क्या जवाब देंगे ? आज तो सत्ता की धमक में आप मुंह बंद कर देंगे. आवाज मौन कर देंगे.मगर वर्षों पश्चात जब इतिहास लिखा जाएगा तब आप क्या जवाब देंगे ?

प्रणब मुखर्जी की राजनीतिक यात्रा दीर्घकालीन है, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती. आप राष्ट्रपति रहे, आप प्रधानमंत्री के योग्य थे. सब ठीक है मगर कांग्रेस में रहकर उस विचारधारा से ऐन सेवानिवृत्ति के पश्चात अपने आप को बिल्कुल अलग कर लेना कई सवाल खड़े करता है .प्रणब मुखर्जी की हस्ती एक बौद्धिक की है,ऐसा शख्स आखिरकार कांग्रेस से निकलकर आज प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के इतने निकट कैसे आ गया है ? क्या कारण हो सकते हैं की आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मंच पर(जून 2018) पहुंच जाते हैं… यह जवाब तो, आपको देना होगा दा…

सोनिया राहुल की गलती !

प्रणब मुखर्जी आज कांग्रेस आलाकमान, सर्वोच्च नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी से दाएं बाएं क्यों रहते हैं ? क्या भूल हो गई श्रीमती गांधी से की आज प्रणब मुखर्जी कांग्रेस से दूर दूर रहते हैं .क्या राष्ट्रपति का सर्वोच्च पद पर उनकी प्रतिष्ठापना गलत थी. क्या सोनिया ने एक गलत शख्स को देश का सर्वोच्च पद सौंपा था ?

राजनीति मे पद अपने खासुलखास लोगों को बांटे जाते हैं. आज देश में बड़े-बड़े संवैधानिक पद, निष्ठावान लोगों को ही दिया जाता है. इसके उदाहरण अनेक हैं ज्ञानी जेल सिंह से लेकर प्रतिभा देवी पाटिल तक .आप स्वयं कल्पना कर सकते हैं कि नरेंद्र मोदी ने जिस शख्स को राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति बनाया है. लोकसभा अध्यक्ष बनाया है वह कल कांग्रेस की ‘गोद’ में जाकर बैठ सकता है ? शायद नहीं…

यहां यह भी गौर करने की बात है कि प्रणब दा को जब भारत रत्न प्रदान किया जा रहा था कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी वहां इस गरिमामयी कार्यक्रम में उपस्थित नहीं थी. आखिर क्यों?

आखिर लंबे वैवाहिक जीवन के बाद भी क्यों टूट जाते हैं रिश्ते?

हाल ही में इंग्लैंड के पूर्व फुटबौलर डैनी मर्फी अपनी पत्नी जोहना टेलर से आपसी सहमति से अलग हो गए. दोनों की 14 साल पुरानी वैवाहिक जिंदगी अब खत्म होने के कगार पर है. इसी तरह 18 साल के खूबसूरत वैवाहिक रिश्ते को विराम देते हुए मई 2017 में बौलीवुड सेलिब्रिटी अरबाज खान और मलाइका अरोड़ा भी एकदूसरे से अलग हो गए.

एक्टर, डायरेक्टर और सिंगर फरहान अख्तर ने भी अधुना अख्तर के साथ अपनी 15 सालों की वैवाहिक जिंदगी का अंत कर दिया. नवंबर 2014 को शादी के 14 साल बाद प्यार भरे रिश्ते की मिसाल समझे जाने वाले हरदिल अजीज ऋतिक रोशन और सुजैन खान का अलग होना भी कम शौकिंग नहीं था. इस तरह के २-४ नहीं बल्कि सैकड़ों मामले दीखते हैं जब प्यार भरा दांपत्य जी रहे कपल्स शादी के कई साल बाद एकदूसरे से अलग हो जाते हैं.

शादी के कई साल बाद जब कि हनीमून फेज यादों में सिमट चुका होता है, कुछ मैरिटल इश्यूज है सिर उठाने लगते हैं. रिश्ते की मजबूती के लिए जरूरी है कि समय रहते उन पर ध्यान दिया जाए.

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  1. जब आप पार्टनर कम और रूममेट अधिक लगने लगे

शादी के काफी समय बाद एक समय आता है जब आप रोमांटिक पार्टनर्स कम और रूममेट्स की तरह ज्यादा व्यवहार करने लगते हैं. आप लंबे समय तक मजबूत रिश्ते में बंधे रहें उस के लिए जरूरी है परस्पर आकर्षण कायम रखना.

इस के लिए एक प्रयास करने पड़ते हैं. कभीकभी रोमांटिक ड्राइव पर जाएं. एकदूसरे को सरप्राइज़ दे. शारीरिक हावभाव द्वारा समयसमय पर एक दूसरे के प्रति प्यार प्रकट करें. जरुरत पड़ने पर काउंसलिंग के लिए जाते रहे. ऐसे प्रयास आप को एकदूसरे से जोड़े रखते हैं.

इस के विपरीत यदि आप अपना पूरा फोकस एकदूसरे के बजाए जिंदगी से जुड़ी दूसरी बातों पर लगा देते हैं तो समझिए कि वह दिन दूर नहीं जब आप पार्टनर कम रूममेट्स ज्यादा लगने लगेंगे.

2. एक दूसरे से बोरियत

विवाह के कई साल बाद यह सोचना बेमानी है कि आप का हर दिन परियों की कहानियों जैसा खूबसूरत गुजरेगा. यदि आप अपनी वैवाहिक जिंदगी से बोर होने लगे तो इस का मतलब है कि आप ने एकदूसरे को ग्रांटेड ले लिया है. आप एक रूटीन लाइफ जीने लगे हैं और किसी भी तरह के रिस्क लेने से बचने लगे हैं. सेक्स , एजिंग, इनलाज से जुड़े विषयों पर डिस्कशन करने या फिर अपनी दैनिक दिनचर्या में परिवर्तन लाने से भी हिचकिचाने लगे हैं. ऐसे में जरूरी है कि आप खुद को बदले. हर विषय पर बात करें और जीवन में विविधता लाए.

3. रोमांस और फिजिकल क्लोजनेस की कमी

अक्सर शादी के कुछ साल बाद कपल्स की सेक्स लाइफ कम होती जाती है. इस के कई कारण हो सकते हैं जैसे फिजिकल और मेंटल हेल्थ इश्यूज,स्लीप इश्यूज , बच्चों का जन्म, दवाओं का असर,रिलेशनशिप से जुड़ी समस्याएं वगैरह.

शादी के कुछ सालों के बाद ऐसा होना अक्सर स्वभाविक माना जाता है. मगर यह स्थिति लंबे समय तक चले और दूरी बढ़ती जाए तो रिश्ते की मजबूती के लिए खतरा पैदा हो सकता है.

जरूरी है कि कभीकभी पार्टनर को किस और हग कर के अपने प्यार का इजहार करें और उन्हें फिजिकली दूर न जाने दे.

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4. मकसद से दूरी

शादी के 10- 15 साल बाद आप के अंदर यह सोच कर असंतोष पैदा हो सकता है कि आप जिंदगी में कुछ खास मकसद को नहीं पा सके. जब आप की शादी होती है तो जिंदगी की प्राथमिकताएं बदल जाती है. आप का जीवनसाथी और बच्चे आप के लिए सब से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं. शादी के बाद हर किसी को छोटेमोटे त्याग और समझौते करने पड़ते हैं जिन की वजह से कई दफा खास कर महिलाओं को, अपने करियर और जिंदगी से जुड़े दूसरे मकसद जैसे अपना बिजनेस शुरू करना, ट्रैवलिंग ,मॉडलिंग या दूसरी हौबीज को समय देना जैसी बातों से वंचित रहना पड़ता है.

अक्सर कपल्स शादी के शुरुआती सालों में रिश्तो को मजबूत बनाने और परिवार आगे बढ़ाने के दौरान अपने सपनों की उड़ान पर बंदिशें लगा देते हैं ताकि वैवाहिक जिंदगी में स्थिरता कायम कर सकें. मगर 10 -15 साल बीतते बीतते उन्हें इस बातका मलाल होने लगता है कि उन्होंने अपने सपनों से दूरी क्यों बनाई. उन्हें लगता है जैसे जिंदगी वापस बुला रही है.

सच तो यह है कि सही मायनों में कपल्स को कुछ बारे करना है तो उन्हें मिल कर कदम बढ़ाने होंगे एक दुसरे को पूरा सपोर्ट देना होगा.

5. सहनशक्ति का घटना

शादी के शुरुआती सालों में जब आप के पार्टनर कुछ इरिटेटिंग या डिस्टर्बिंग काम करते हैं तो आप उसे इग्नोर कर देते हैं. मगर जैसेजैसे समय बीतता जाता है ज्यादातर पार्टनर्स में एकदूसरे के द्वारा की गई गलतियों के प्रति सब्र  बनाए रखने और माफ करने की प्रवृत्ति घटती जाती है. शुरुआत में जिन बातों को वे हंस कर टाल दिया करते थे उन्हीं बातों पर एकदूसरे से नाराज होने लगते हैं.

जरूरी है कि शादी के शुरुआती समय में आप एकदूसरे के प्रति जो प्यार और केयर दिखाते हैं, गलतियों को भी पल में नजरअंदाज कर देते हैं, यही प्रवृत्ति उन्हें हमेशा कायम रखनी चाहिए. तब रिश्ते में टकराव नहीं आएगा बल्कि प्यार पनपेगा.

6. छोटे बड़े सेलिब्रेशन

शादी के शुरुआती दिनों में आप छोटे से छोटे मौके को भी सेलिब्रेट करते हैं.  6 माह की मैरिज एनिवर्सरी हो या फर्स्ट डेट एनिवर्सरी ,वैलेंटाइन डे हो या बर्थ डे सेलिब्रेशन ,हर मौके को खास बनाने का प्रयास करते हैं. मगर शादी के 10 -12 साल बीततेबीतते सेलिब्रेशन कम होते जाते हैं.

जरूरी है कि हर छोटीबड़ी खुशियों का आनंद उठाया जाए. सेलिब्रेशन का कारण बदले पर मिजाज नहीं. जैसे वर्क प्रमोशन , बच्चे का बर्थडे ,बच्चे द्वारा ग्रेजुएशन डिग्री हासिल करने का सेलिब्रेशन ,शादी के 10 साल गुजरने का सेलिब्रेशन आदि. कभी भी इन से बचने का प्रयास न करें. ऐसे मौके ही आप दोनों को करीब लाएंगे.

आप अपने दोस्तोंऔर परिजनों के साथ गेट टुगेदर कर सकते हैं या फिर आपस में ही सेलिब्रेट कर सकते हैं. हर मौके को यादगार बनाएं.  यह सेलिब्रेशन एक्सपेंसिव होना जरूरी नहीं बल्कि इस में दोनों एंजॉय करें यह मायने रखता है.

अपने प्यार को सेलिब्रेट करने के लिए कभीकभी लौन्ग ड्राइव पर जाएं, कंसर्ट अटेंड करें, मूवी देखें या फिर घर पर ही स्पा नाइट का आनंद लें. यानि कभी भी डेट पर जाना बंद न करें.

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7. बड़ीबड़ी इच्छाएं पूरी करने का दवाब

शादी के 10 -15 साल बाद पहुंचते पहुंचते कपल्स बड़ी बड़ी जिम्मेदारियों का बोझ उठा लेते हैं. बड़ेबड़े लक्ष्य बना लेते हैं. अपना घर, बच्चों की ऊंची शिक्षा जैसी बहुत सी योजनाएं उन के दिमाग में चल रही होती है. इन्हें पूरा करने की जद्दोजहद में अपने रिश्ते पर ध्यान देना कम कर देते हैं. जब कि ऐसे मामलों में संतुलन बना कर चलना बहुत जरूरी है. एकदूसरे के साथ मिल कर यदि आप अपनी योजनाओं पर काम करेंगे तो इस से रिश्ते भी प्रगाढ़ बनते हैं और लक्ष्य भी आसानी से हासिल हो जाते हैं.

सेहत का दुश्मन पैकेटबंद खाना

भागती दौड़ती जिंदगी में जब सबकुछ फास्ट हो गया है तो फूड भला पीछे क्यों रहे. बनने में आसान, स्वाद में बेजोड़ रेडी टु ईट फूड आज किचन की शान बनते जा रहे हैं. ऐसे में जानें रेडी टु ईट फूड के खतरे व कैसे बना सकते हैं आप इन्हें सेहतमंद.

पुलाव, मटरपनीर, पालकपनीर,  दालमखनी, छोले, कोफ्ता, नवरतन कोरमा, बिरयानी, मटनकोरमा, शाही पनीर, टिक्का कबाब ही नहीं, बल्कि नूडल्स, सूप, चिकन नगेट्स, चिकन बौल्स, मीट बौल्स, मटन नगेट्स और न जाने क्याक्या, बनाने का झंझट नहीं और खाने में भी स्वादिष्ठ, मन तो आखिर ललचाएगा ही न.

जीवन की आपाधापी में तो कभी शौकिया और कभी अचानक किसी मेहमान के आ जाने पर पैकेट फूड या फ्रोजन फूड का बड़ा सहारा होता है. हम इसीलिए रेडी टु ईट फूड की तरफ  जाने अनजाने  में बढ़ ही जाते हैं. सब से बड़ी बात यह कि ये रेडी टु ईट फूड मौल्स से ले कर नुक्कड़ की दुकानों तक हर जगह उपलब्ध हैं. महानगर या शहर ही नहीं, गांव और कसबे में भी रेडी टु ईट फूड ने किचन में अपनी जगह बना ली है. पैकेट बंद फ्रोजन फूड अनाज की दुकानों तक में मिल जाते हैं.

बनाना आसान

एक जमाना था जब छोले बनाने होते थे तो रात से ही तैयारी करनी पड़ती थी. छोले को भिगोना और सुबह तमाम मसाले को तालमेल के साथ तैयार करना व फिर छोले उबालना, मसाले पीसना, भूनना वगैरह. लेकिन आज मसाले तो क्या, मौसमबेमौसम हर तरह की सब्जीभाजी से ले कर मछलीमीट तक प्रीकुक्ड यानी पहले से तैयार खाने के सामान बंद पैकेटों में मिल जाते हैं और स्वाद, उस का तो कहना ही क्या.

स्वाद में बेजोड़ होने के कारण इन का बाजार दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. अगर किसी परिवार में पैकेट फूड का इस्तेमाल नहीं भी किया जाता है तो भुना तैयार मसाला, गार्लिक पेस्ट, जिंजर पेस्ट के लिए उस के किचन में जगह निकल ही आती है. कुल मिला कर इन तैयार खाने के सामानों ने जीवन को बहुत आसान बना दिया है, खासतौर पर उन कामकाजी महिलाओं के, जिन पर घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारी है.

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फलता फूलता व्यवसाय

पैकेटबंद फूड के चलन के चलते खाद्य प्रसंस्करण एक बढ़ता, फलताफूलता उद्योग बनता जा रहा है. केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि पिछले एक दशक में आसानी से तैयार हो जाने वाले पैकेटबंद फूड के बाजार में 70 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

कोलकाता के यादवपुर विश्वविद्यालय के फूड टैक्नोलौजी के प्रो. उत्पल राय चौधुरी का कहना है कि ऐसे पैकेटबंद या रेडी टु ईट खाने के सामानों के साथ ढेर सारे ‘लेकिन’, ‘किंतु’ और ‘परंतु’ जुड़े हुए हैं. खाने में स्वादिष्ठ पैकेटबंद सामानों के बारे में फौरी तौर पर कहा जाए तो अव्वल इन में बहुत ज्यादा सोडियम यानी नमक होता है. इस के अलावा कार्बोहाइड्रेट्स, बड़ी मात्रा में फ्रूटोज, ट्रांसफैट होते हैं. उस में सेहत के लिए जरूरी विटामिंस विशेषरूप से विटामिन बी1 और विटामिन सी व मिनरल्स की कमी होती है. दरअसल, इसे तैयार करने में इन के पौष्टिक गुण नष्ट हो जाते हैं. दूसरे, इन में अच्छीखासी मात्रा में प्रिजरवेटिव्स के साथ कृत्रिम रंग और खुशबू का इस्तेमाल होता है.

हकीकत यह है कि बड़ी से बड़ी या नामीगिरामी कंपनी क्यों न हो, पैकेट में कोई भी इस बात का सहीसही जिक्र नहीं करती है कि उस में कितनी मात्रा में प्रिजरवेटिव्स और रंग का इस्तेमाल किया गया है. प्रो. उत्पल राय कहते हैं कि हालांकि इन का इस्तेमाल करने का न केवल एक मानक तय कर दिया गया है बल्कि इस से संबंधित कानून भी हैं लेकिन जागरूकता की कमी के कारण इस पर पूरी तरह से अमल नहीं हो रहा है.

रेडी टु ईट फूड के खतरे

ज्यादातर रेडी टु ईट या फ्रोजन फूड में उपादानों की सूची में हमें उन उपादानों का जिक्र देखने को नहीं मिलता जो हमारी सेहत के लिए हानिकारक होते हैं. ज्यादातर प्रोडक्ट में मोनोसोडियम ग्लुटैमेट या एमएसजी होता है, लेकिन सूची में इन का जिक्र अजीनोमोटो के रूप में या नैचुरल फ्लेवरिंग के तौर पर होता है.

इन में मौजूद ट्रांसफैट की मात्रा सेहत के लिए हानिकारक होती है. यह ट्रांसफैट हाइड्रोजन गैस और तेल के मिश्रण से तैयार होता है. हालांकि प्राकृतिक रूप से यह ट्रांसफैट बीफ और मिल्क प्रोडक्ट में पाया जाता है. यह कोलैस्ट्रौल को बढ़ाता है. इस से मोटापे के खतरे के साथ धमनियों में चरबी जमने की आशंका होती है.

नूडल्स और सूप में काफी मात्रा में स्टार्च और नमक होता है. इस के अलावा एमएसजी यानी मोनोसोडियम ग्लुटैमेट होता है. पैकेट बंद गार्लिक व जिंजर पेस्ट का इस्तेमाल करने वालों को इस में एक विशेष तरह की गंध की शिकायत होती है. उत्पल रायचौधुरी का कहना है कि यह गंध दरअसल प्रिजरवेटिव्स की होती है. अलगअलग कंपनियां 1 साल से 6 महीने तक इस्तेमाल लायक बनाने के लिए उन में अधिक मात्रा में प्रिजरवेटिव्स उपादान डालती हैं.

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भगवान के नाम पर दुनिया में ठगी का धंधा

भगवान के अस्तित्व को ले कर धर्म के ठेकेदार तरहतरह की मनगढ़ंत बातें करते हैं ताकि उन की मुफ्त की रोटी चल सके. आश्चर्य तो तब होता है जब पढ़ेलिखे लोग भी धर्म के इन ठेकेदारों की चिकनीचुपड़ी बातों में आ जाते हैं और अदृश्य भगवान को अपनी जिंदगी का सहारा मान कर अपनी मेहनत की कमाई लुटा देते हैं. प्रस्तुत है, अंधविश्वास को उजागर करता जगत यादव का यह लेख.

विश्व के किसी भी कोने में जाइए, लगभग हर जगह मानव समाज किसी न किसी भगवान से जकड़ा हुआ है. मानव जब पाषाण युग में था तब कोई भगवान नहीं था. सब को अपना भोजन खुद जुटाना पड़ता था. प्रकृति का पहला नियम जीवित रहने के लिए अपना पेट भरना है. यह सच भी है क्योंकि प्रकृति का हर प्राणी रातदिन स्वयं का पेट भरने में जुटा रहता है. यह प्रक्रिया सतत चलती रहती है.

बस, इसी पेट भरने की इच्छा ने ‘भगवान’ की उत्पत्ति की है. पाषाण युग के पश्चात मानव व्यवस्थित होने लगा. तब उस के सामने भोजन की बड़ी समस्या थी, कठोर परिश्रम करना पड़ता था. हर कोई इस में सक्षम हो, ऐसा नहीं था. प्रकृति में मानव ही ऐसा जीव है जो अपनी बुद्धि का विकास कर सकता है. एक मेहनत करे और दूसरा बैठेबैठे खाए वह भी जीवन भर.

धूर्त, खुदगर्ज, कामचोर और ठग प्रवृत्ति वालों ने भगवान की उत्पत्ति कर सरल, सीधे लोगों को डराधमका कर ईश्वरीय शक्ति (इन के द्वारा प्रदत्त) को मानने को विवश किया ताकि वे बिना मेहनत के भोजन व सम्मान के अधिकारी बने रहें. इन के अनुसार प्रकृति की हर घटना भगवान की लीला है चाहे भूकंप आए, आंधीतूफान आए, बाढ़ आए या बीमारी.

अत: यह कहने में थोड़ा भी संकोच नहीं. ‘भगवान’ ने इनसानों को पैदा नहीं किया बल्कि इनसानों ने भगवान को पैदा किया. उसे शक्तियों से महिमामंडित किया, केवल इसलिए कि उन की दालरोटी बिना मेहनत के चलती रहे.

विश्व में मानव जीव सर्वशक्तिमान है भगवान नहीं क्योंकि मिनटों में कोई भगवान पैदा कर देना इनसान के ही बस की बात है. आज भारत में लाखों देवीदेवता हैं और सभी धूर्त मानव की देन हैं. मिथ्या साहित्य की रचना कर श्राप और वरदान का ढोंग रचा गया, मानो इनके श्राप व वरदान से प्रकृति के नियम बदल जाएंगे.

मनगढ़ंत : कैसे कैसे

ऐसे ढोंगी लोगों को स्वर्गनरक की कहानी गढ़ कर अपनी सेवा करवाने में थोड़ी भी शर्म नहीं है. इन की खासीयत लच्छेदार बातें करने भर की है. हर भगवान लंबीचौड़ी हांकने का काम बखूबी कर सकता है, चाहे वह जीसस हो, कृष्ण या बुद्ध. लोकपरलोक में पुण्य कमाने की लालसा जगा कर ये मानव को आदिकाल से ठगते आ रहे हैं.

बड़े मजे की बात है कि इन के ठगने की कला में विचित्रता जरूर होगी.

एक उदाहरण देखिए :

गणेश ने मानव शरीर धारण किया था लेकिन उन का सिर हाथी का था. कहां मानव के गले की परिधि और कहां हाथी के सिर की परिधि. ऊपर से इन कथित भगवान में शक्ति थी जो दूसरे जीव को बिना मारे भी जिंदा कर सकते थे. यह सब धर्माचार्यों का कमाल है. कहीं मानव का तन और सिर सिंह का, कहीं 10 हाथ तो कहीं 10 सिर. महाभारत में धृतराष्ट्र को अंधा क्यों रहने दिया गया? यहां शक्ति दिखाने की बात छोडि़ए, कम से कम वरदान दे कर ज्योति तो देते.

रामायण में हनुमान द्वारा मुंह में सूर्य को रख लेने का उल्लेख है. वास्तव में सूर्य कितना बड़ा है उन्हें मालूम ही नहीं था. भगवान की शक्ति को स्थापित करने के लिए कुछ ऊटपटांग व विचित्र होना तो जरूरी था.

उन्हें यह भी मालूम नहीं था कि कोई भी जीव सांस द्वारा आक्सीजन लेता है जो जीवित रहने के लिए जरूरी है अन्यथा शरीर की सारी प्रक्रिया बंद हो जाएगी, यानी जीव मृत हो जाएगा, लेकिन ये ढोंगी कहेंगे कि आत्मा ने शरीर को छोड़ दिया.

हमारे देश में साधुसंत होना बड़प्पन की बात मानी जाती है. वास्तव में ये एक नंबर के ठग, दुराचारी, आलसी, कामचोर अपने सामाजिक उत्तरदायित्व से मुक्त हो कर भगवान का नाम ले मेहनत करने वालों का हिस्सा हजम करते हैं.

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विश्व के सभी धर्मों का यही हाल है. बिना विचित्रता के भगवान की लीला कैसी, जीसस क्राइस्ट ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि आने वाले समय में उस के नाम से लोग प्रार्थना करेंगे, धर्मपरिवर्तन करेंगे, वह भी केवल पैसा बटोरने के लिए. जब काम करेंगे तभी तो पैसे की हेराफेरी कर सकते हैं.

वैसा ही हाल पैगंबर हजरत मोहम्मद का है. उन्होंने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उन के अनुयायी अल्लाह के नाम पर मारकाट की प्रेरणा देंगे, यह कह कर कि खुदा ने तुम्हारे लिए जन्नत में सुरासुंदरी का इंतजाम कर रखा है और अंधविश्वासी लोग बिना सोचेसमझे मरनेमारने को तैयार हो जाते हैं. वे यह भी नहीं सोचते कि अगर ऐसी बात होती तो इमाम, मुल्ला व मौलवी खुद फिदायीन बनने से क्यों पीछे रहते?

हिंदू धर्म में ‘मनु’ को आदिमानव कहा गया है तो यह भी कहना पडे़गा कि निकृष्टता भी उन्हीं से शुरू हुई.

धर्माचार्य (सभी धर्मों के) समाज के हर कार्यकलाप में हस्तक्षेप रखते हैं ताकि इन की मांग लगातार बनी रहे. पीढ़ी दर पीढ़ी इन की पौबारह रहे. पूजापाठ और भगवान के नाम पर ये भोग भी लगाएंगे, यानी पेटपूजा की पूरी व्यवस्था कर रखी है.

ये ‘ढोंगी’ बीचबीच में धार्मिक आयोजन जैसे कुंभमेला आदि करते रहेंगे ताकि इन की डिमांड बनी रहे और लोग भगवान को भूलें नहीं.

हिंदू धर्म में भगवानों की सीरीज चलती रहती है. अवतार के नाम पर आखिर एक ही कहानी का टेप कितने दिन चलाएंगे. मिथ्या साहित्य से अंध- विश्वास फैलता है. भारत में इस की भरमार है. अब देखिए न, पूर्वजन्म का फल बता कर क्या ये ढोंगी बता पाएंगे कि महात्मा गांधी को गोली से और जीसस क्राइस्ट को सूली पर क्यों चढ़ाया गया.

प्रकृति के सामने किसी के भगवान की कुछ नहीं चली. सभी प्रकृति की गोद में समा गए. सुनामी के कहर से किसी के भगवान ने नहीं बचाया. सुनामी हो चाहे भूकंप अथवा बाढ़, भगवान की नहीं भोजन की आवश्यकता होती है. इस आपदा से निबटने के लिए भोजन के पैकेट गिराए जाते हैं न कि कुरान, बाइबिल अथवा रामायण.

कुछ अंधविश्वासी तर्क देते हैं कि ‘भगवान’ की पूजा तो बड़ेबडे़ विद्वान भी करते हैं. विद्वान होना अलग बात है और अंधविश्वासी होना अलग. विद्वान किसी विषय के हो सकते हैं तो इस का मतलब यह तो नहीं कि अंधविश्वासी न हों. अंधविश्वासी इधरउधर घूम कर अपने अंधविश्वास में ही लौट आता है.

अत: यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि-

भगवान का अस्तित्व व उस का शक्तिशाली होना दुनिया का सब से बड़ा झूठ है. यह केवल ठगी का प्रतीक है.

-दुनिया के सभी धर्म अपने अनु- यायियों को दीर्घकाल तक ठगने के सब से बड़े संगठन हैं.

-अंधविश्वासी लोग इन्हें पालते- पोसते हैं.

-धर्म के ठेकेदार दानदक्षिणा और भीख पर पलते हैं.

-मायामोह सब बेकार कह कर मायामोह वालों से अन्न, दूध, मलाई, मेवा, मिष्ठान, रुपएपैसे आदि का भोग लगा भगवान की जयजयकार कर उन्हें अंधविश्वास की ओर ढकेलते हैं.

-इन का मानना है कि जब तक बेवकूफ जिंदा हैं, बुद्धिमान (भगवान के बंदे) कभी भूखे नहीं मर सकते.

अंतत: यह कहा जा सकता है कि जो धर्म जितना पुराना है उतना ही ठगी के धंधे में पारंगत है. चोरी, बेईमानी, घूसखोरी आदि को आम भारतीय सामाजिक अपराध समझता ही नहीं. यह सब ‘भगवान’ की लीला है.

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हवस का शिकार पति

ज्योंज्यों रात बीतती जा रही थी, त्योंत्यों महाराज सिंह की चिंता बढ़ती जा रही थी. उन की निगाह कभी घड़ी की सुइयों पर टिक जाती तो कभी दरवाजे पर. बात ही कुछ ऐसी थी, जिस से वह बेहद परेशान थे.

उन का बेटा सुनील कुमार जो उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में टीचर था, घर नहीं लौटा था. वह घर से यह कह कर कार से निकला था कि घंटे 2 घंटे में लौट जाएगा, लेकिन आधी रात बीत जाने पर भी वह वापस नहीं आया था. उस का मोबाइल फोन भी बंद था. यह बात 30 मई, 2019 की है.

सुबह हुई तो महाराज सिंह ने अपने कुनबे वालों को सुनील कुमार के लापता होने की जानकारी दी तो वे भी चिंतित हो उठे और महाराज सिंह के साथ सुनील को ढूंढने में जुट गए. महाराज सिंह ने मोबाइल से फोन कर के नातेरिश्तेदारों से बेटे के बारे में पूछा. लेकिन सुनील कुमार का कोई पता नहीं चला.

दुर्घटना की आशंका को देखते हुए इटावा, भरथना, सैफई आदि के अस्पतालों में भी जा कर देखा गया, लेकिन सुनील की कोई जानकारी नहीं मिली.

घर वालों के साथ बेटे की खोजबीन कर महाराज सिंह शाम को घर लौटे तो उन की बहू रेखा दरवाजे पर ही खड़ी थी. उस ने महाराज सिंह से पूछा, ‘‘पिताजी, उन का कहीं कुछ पता चला?’’

जवाब में ‘नहीं’ सुन कर रेखा फूटफूट कर रोने लगी. महाराज सिंह ने उसे धैर्य बंधाया, ‘‘बहू, सब्र करो. सुनील जल्द ही वापस आ जाएगा.’’

सुनील कुमार का एक दोस्त था सुखवीर सिंह यादव. वह भी टीचर था और कुसैली गांव में रहता था. उस का सुनील के घर खूब आनाजाना था. महाराज सिंह ने उसे सुनील के लापता होने की जानकारी दी तो वह तुरंत उन के यहां आ गया और महाराज सिंह के साथ सुनील की खोज में जुट गया. वह उन के साथ जरूरत से कुछ ज्यादा ही अपनत्व दिखा रहा था.

उस ने महाराज सिंह से कहा कि वह परेशान न हों, सुनील मनमौजी है इसलिए बिना कुछ बताए कहीं घूमनेफिरने चला गया होगा. कुछ दिन घूमघाम कर वापस लौट आएगा.

महाराज सिंह की बहू रेखा जो अब तक आंसू बहा रही थी, सुखवीर के आने के बाद उस के आंसू रुक गए. वह भी सुखवीर की हां में हां मिलाने लगी थी. वह अपने ससुर महाराज सिंह को तसल्ली दे रही थी कि पिताजी सुखवीर भाईसाहब सही कह रहे हैं. वह कहीं घूमने चले गए होंगे जल्दी ही लौट आएंगे. घबराने की जरूरत नहीं है.

बहू के इस बदले हुए व्यवहार से महाराज सिंह को आश्चर्य तो हुआ लेकिन उन्होंने उस से कुछ कहासुना नहीं. महाराज सिंह बेटे की खोज कर ही रहे थे कि एक अज्ञात नंबर से उन के मोबाइल पर काल आई. फोन करने वाले ने बताया कि सुनील की कार कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर कार पार्किंग में खड़ी है.

यह बताने के बाद उस ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया. महाराज सिंह ने कुछ और जानकारी के लिए काल बैक की तो स्विच्ड औफ मिला. इस के बाद उन्होंने कई बार बात करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे.

रेखा के पास पति की कार की डुप्लीकेट चाबी थी. वह पति के दोस्त सुखवीर सिंह तथा ससुर महाराज सिंह के साथ कानपुर सेंट्रल स्टेशन पहुंची. वहां पार्किंग में सुनील की कार खड़ी थी. पार्किंग वालों को उन लोगों ने सुनील के बारे में बताया, फिर तीनों वहां से कार ले कर लौट आए. घर पहुंच कर सुखवीर सिंह और रेखा ने महाराज सिंह को एक बार फिर धैर्य बंधाया.

लेकिन जब एक सप्ताह बीत गया और सुनील वापस नहीं आया तो महाराज सिंह का धैर्य जवाब देने लगा. उन्होंने बहू रेखा पर दबाव डाला कि वह थाने जा कर सुनील की गुमशुदगी दर्ज कराए. रेखा रिपोर्ट दर्ज कराना नहीं चाहती थी, लेकिन दबाव में उसे तैयार होना पड़ा.

8 जून, 2019 को रेखा अपने ससुर महाराज सिंह के साथ थाना चौबिया पहुंची और थानाप्रभारी सतीश यादव को अपना परिचय देने के बाद पति सुनील कुमार के सप्ताह भर पहले लापता होने की जानकारी दी. बहू के साथ आए महाराज सिंह ने भी थानाप्रभारी से बेटे को खोजने की गुहार लगाई.

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थानाप्रभारी सतीश यादव ने सुनील कुमार की गुमशुदगी दर्ज कर के उन दोनों से कुछ जरूरी जानकारियां हासिल कीं, फिर उन्हें भरोसा दिया कि वह सुनील को ढूंढने की पूरी कोशिश करेंगे.

सुनील कुमार गांव केशवपुर राहिन के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक  था. उस का समाज में अच्छा सम्मान था. उस के अचानक लापता होने से विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षकों व आसपास के कई गांवों के शिक्षकों में बेचैनी थी. पुलिस की निष्क्रियता से उन का रोष बढ़ता जा रहा था. शिक्षक भी अपने स्तर से सुनील कुमार की खोज कर रहे थे, पर उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी.

आखिर जब शिक्षकों के सब्र का बांध टूट गया तो उन्होंने और माखनपुर गांव के लोगों ने थाना चौबिया के सामने धरनाप्रदर्शन शुरू कर दिया. सूचना पा कर इटावा के एसएसपी संतोष कुमार मिश्रा, एडिशनल एसपी (सिटी) डा. रामयश सिंह तथा एडिशनल एसपी (ग्रामीण) रामबदन सिंह थाना चौबिया पहुंच गए.

उन्होंने धरनाप्रदर्शन कर रहे शिक्षकों को समझा कर आश्वासन दिया कि सुनील कुमार की खोज के लिए एक स्पैशल टीम गठित की जाएगी ताकि जल्द से जल्द उन का पता चल सके. एसएसपी के इस आश्वासन के बाद शिक्षकों ने आंदोलन समाप्त कर दिया.

इस के बाद एसएसपी संतोष कुमार मिश्रा ने एक स्पैशल टीम गठित कर दी. टीम में थाना चौबिया प्रभारी सतीश यादव, क्राइम ब्रांच प्रभारी सत्येंद्र यादव, सीओ (सैफई), अपराध शाखा तथा फोरैंसिक टीम के सदस्यों को शामिल किया गया. टीम का संचालन एडिशनल एसपी (ग्रामीण) रामबदन सिंह तथा एडिशनल एसपी (सिटी) डा. रामयश सिंह को सौंपा गया.

पुलिस टीम ने जांच शुरू की तो पता चला कि लापता शिक्षक सुनील कुमार की दोस्ती कुसैली गांव के शिक्षक सुखवीर सिंह यादव से है. उस का सुनील के घर बेधड़क आनाजाना था.

पुलिस टीम ने गुप्त रूप से पड़ोसियों से पूछताछ की तो पता चला कि सुखवीर सिंह यादव सुनील की गैरमौजूदगी में भी उस के घर आता था. यह भी पता चला कि सुनील की पत्नी रेखा और सुखवीर के बीच नाजायज संबंध हैं. रेखा सुखवीर के साथ घूमने भी जाती थी.

अवैध रिश्तों की जानकारी मिली तो पुलिस टीम का माथा ठनका. टीम को शक हुआ कि कहीं अवैध रिश्तों के चलते इन दोनों ने सुनील को ठिकाने तो नहीं लगा दिया.

बहरहाल, पुलिस टीम को पक्का विश्वास हो गया था कि सुनील के लापता होने का भेद रेखा और सुखवीर के पेट में ही छिपा है. लिहाजा पुलिस ने 15 जून, 2019 को शक के आधार पर रेखा और सुखवीर को उन के घरों से हिरासत में ले लिया.

थाने ले जा कर पुलिस ने उन दोनों के मोबाइल कब्जे में ले कर उन की काल डिटेल्स की जांच की तो 30 मई की शाम से ले कर रात तक दोनों की कई बार बात होने की पुष्टि हुई. सुखवीर के मोबाइल से एक और नंबर पर कई बार बात हुई थी. उस नंबर के बारे में पूछने पर सुखवीर ने बताया कि यह नंबर उस के रिश्तेदार रामप्रकाश यादव का है, जो औरैया जिले के ऐरवा कटरा थाना के बंजाराहारा गांव में रहता है.

पुलिस टीम ने रेखा और सुखवीर सिंह से लापता शिक्षक सुनील कुमार के संबंध में पूछताछ शुरू की. सख्ती करने पर दोनों टूट गए.

उस के बाद सुखवीर सिंह ने जो बताया, उसे सुन कर सभी के रोंगटे खड़े हो गए. उस ने बताया कि सुनील कुमार अब इस दुनिया में नहीं है. उस ने अपने रिश्तेदार रामप्रकाश की मदद से उस की हत्या कर शव के टुकड़ेटुकड़े कर गड्ढे में डाल कर जला दिए. फिर झुलसे हुए शव को गड्ढे में ही दफन कर दिया.

पुलिस टीम सुनील कुमार के शव को बरामद करने के लिए सुखवीर को साथ ले कर उस के गांव कुसैली पहुंची. गांव में उस के 2 मकान थे. एक मकान में वह स्वयं रहता था तथा दूसरा खाली पड़ा था.

इसी खाली मकान में उस ने अपने दोस्त का शव दफनाया था. सुखवीर की निशानदेही पर पुलिस टीम ने एक कमरे में खुदाई कराई तो गड्ढे से सुनील कुमार की लाश के जले हुए टुकड़े बरामद हो गए.

टीम ने शव बरामद होने की जानकारी एसएसपी संतोष कुमार मिश्रा को दी तो वह मौकामुआयना करने वहां पहुंच गए. बुलाई गई फोरैंसिक टीम ने भी साक्ष्य जुटाए. जिस फावड़े से हत्या की गई थी, उसे भी बरामद कर लिया गया.

यह जानकारी जब गांव वालों को हुई तो वहां भीड़ जुट गई. मृतक के घर वाले भी वहां आ पहुंचे. बढ़ती भीड़ को देखते हुए एसएसपी ने आसपास के थानों से भी पुलिस फोर्स बुला ली. महाराज सिंह बेटे का शव देख कर बदहवास थे. उन की आंखों से आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

पुलिस टीम ने भारी पुलिस सुरक्षा के बीच मौके की जरूरी काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए इटावा भेज दी. सुखवीर सिंह की निशानदेही पर हत्या में शामिल उस के रिश्तेदार रामप्रकाश को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. थाने में जब रेखा और सुखवीर से उस का सामना हुआ तो उस ने सहज ही हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. रामप्रकाश ने बताया कि सुखवीर सिंह ने उसे हत्या करने में सहयोग करने के लिए 10 हजार रुपए दिए थे.

इस के बाद एसएसपी संतोष कुमार मिश्रा ने पुलिस लाइन सभागार में प्रैसवार्ता की और तीनों कातिलों को पत्रकारों के सामने पेश कर शिक्षक सुनील कुमार की हत्या का खुलासा कर दिया. पुलिस कप्तान ने केस का खुलासा करने वाली टीम को 10 हजार रुपए के ईनाम की घोषणा की.

कानपुर देहात जिले का बड़ी आबादी वाला एक कस्बा है रूरा. इसी रूरा कस्बे में भगवानदीन अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी रुचि के अलावा 2 बेटियां रेखा व बरखा थीं. भगवानदीन गल्ले का व्यापार करते थे. इस धंधे में उन्हें अच्छी कमाई होती थी. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

भगवानदीन स्वयं तो ज्यादा पढ़लिख नहीं पाए थे, लेकिन वह बेटियों को पढ़ालिखा कर योग्य बनाना चाहते थे. उन की बड़ी बेटी रेखा खूबसूरत और पढ़नेलिखने में तेज थी. वह बीए में पढ़ रही थी, उसी दौरान उसे शिक्षा मित्र के पद पर नौकरी मिल गई. वह गुलाबपुर भोरा गांव के प्राथमिक स्कूल में पढ़ाने लगी.

जब रेखा शादी योग्य हुई तो भगवानदीन उस के लिए वर की खोज में जुट गए. रेखा चूंकि शिक्षक थी, इसलिए भगवानदीन उस के लिए शिक्षक वर की ही तलाश रहे थे. काफी दौड़धूप के बाद भगवान दीन को रेखा के लिए सुनील कुमार पसंद आ गया.

सुनील कुमार इटावा जिले के माखनपुर गांव के रहने वाले महाराज सिंह का बेटा था. सुनील के अलावा महाराज सिंह की एक बेटी थी, जिस की वह शादी कर चुके थे. सुनील उच्चतर माध्यमिक विद्यालय केशवपुर रोहिन में पढ़ाता था.

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उम्र में सुनील रेखा से करीब 7 साल बड़ा था, पर वह सरकारी नौकरी पर था इसलिए रेखा को भी उस से शादी करने में कोई आपत्ति नहीं थी. अंतत: जनवरी 2008 में उन का विवाह हो गया.

ससुराल में रेखा खुश थी. दोनों का दांपत्य जीवन सुखमय बीतने लगा. सुनील के पास कार थी. छुट्टी वाले दिनों में वह रेखा को कार से घुमाने के लिए निकल जाता था, जिस से उस की खुशियां और भी बढ़ जाती थीं.

समय बीतता गया और रेखा एक के बाद एक 2 बेटों और एक बेटी की मां बन गई. बच्चों के जन्म से घर में किलकारियां गूंजने लगी थीं. रेखा के ससुर महाराज सिंह घर में केवल खाना खाने के लिए ही आते थे. उन का ज्यादातर समय खेतों पर ही बीतता था. वहां उन्होंने एक कमरा भी बनवा लिया था. वह उसी कमरे में रहते थे. वहां रह कर वे ट्यूबवेल तथा फसल की रखवाली करते थे.

रेखा 3 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन उस की सुंदरता में कमी नहीं आई थी. इस के अलावा वह बिस्तर पर पति का रोजाना ही साथ चाहती थी. लेकिन सुनील उस का साथ नहीं दे पाता था, जिस की वजह से रेखा के स्वभाव में बदलाव आ गया था. वह बातबेबात पति से झगड़ने लगी.

सुनील कुमार का एक शिक्षक दोस्त सुखवीर सिंह यादव था. वह चौबिया थाने के कुसैली गांव का रहने वाला था. दोनों दोस्तों में खूब पटती थी. सुखवीर की आर्थिक स्थिति सुनील से बेहतर थी. वह ठाटबाट से रहता था.

एक रोज सुनील ने अपने दोस्त सुखवीर सिंह यादव को पार्टी देने के लिए अपने घर बुलाया. उस रोज पहली बार सुखवीर ने रेखा को देखा था. पहली नजर में ही रेखा उस की आंखों में रचबस गई. खानेपीने के दौरान सुखवीर की निगाहें रेखा की खूबसूरती पर ही टिकी रहीं. रेखा भी अपनी खूबसूरती का जादू चला कर सुखवीर के दिल को घायल करती रही. पार्टी के बाद सुखवीर जब जाने लगा तो उस ने रेखा से कहा, ‘‘भाभी, आप बेहद खूबसूरत हैं.’’

यह सुन रेखा सुखवीर को गौर से निहारने लगी फिर उस ने मुसकरा कर सिर झुका लिया. रेखा को दिल में बसा कर सुखवीर चला गया.

इस के बाद सुनील व सुखवीर जब कभी मिलते तो सुनील उसे घर ले आता. सुखबीर चाहता भी यही था. रेखा व उस के बच्चों को रिझाने के लिए कभी वह खानेपीने की चीजें लाता तो कभी खिलौने.

रेखा इन चीजों को थोड़ा नानुकुर के बाद स्वीकार कर लेती थी. सुनील को शक न हो या बुरा न लगे, इस के लिए वह सुनील की भी खातिरदारी करता. दरअसल, सुखवीर बियर पीने का शौकीन था. उस ने इस का चस्का सुनील को भी लगा दिया था.

30-32 वर्षीय सुखवीर शरीर से हृष्टपुष्ट व हंसमुख स्वभाव का था. रेखा से नजदीकी बनाने के लिए वह खूब खर्च करता था. कभीकभी वह रेखा के हाथ पर भी हजार 2 हजार रुपए रख देता था. रेखा मुसकरा कर उन्हें रख लेती थी.

बाद में सुखवीर सुनील की गैरमौजूदगी में भी आने लगा था. वह रेखा को भाभी कहता था. इस बहाने वह उस से खुल कर हंसीमजाक भी करनेलगा. रेखा उस की हंसीमजाक का बुरा नहीं मानती थी, बल्कि सुखवीर की रसीली बातें उस के दिल में हलचल पैदा करने लगी थीं.

सच तो यह है कि रेखा भी सुखवीर को चाहने लगी थी. क्योंकि सुखवीर एक तो उम्र में उस के बराबर था, दूसरे वह हंसमुख स्वभाव का था.

एक रोज सुखवीर स्कूल न जा कर रेखा के घर जा पहुंचा. उस समय रेखा घर में अकेली थी. बच्चे स्कूल गए थे और पति सुनील अपनी ड्यूटी पर. घर का कामकाज निपटा कर रेखा नहाधो कर सजीसंवरी बैठी थी कि सुखवीर आ गया. रेखा की खूबसूरती पर रीझ कर सुखवीर बोला, ‘‘भाभी, बनसंवर कर किस का इंतजार कर रही हो. क्या सुनील भैया जल्दी घर आने वाले हैं?’’

‘‘उन्हें मेरी फिक्र ही कब रहती है, जो जल्दी घर आएंगे.’’ रेखा तुनक कर बोली.

‘‘भैया को फिक्र नहीं तो क्या हुआ, मुझे तो आप की फिक्र है. मैं तो रातदिन तुम्हारी ही खूबसूरती में डूबा रहता हूं.’’ कहते हुए सुखवीर ने दरवाजा बंद किया और रेखा को अपनी बांहों में भर लिया. इस के बाद उस ने रेखा से छेड़छाड़ शुरू कर दी.

दिखावे के लिए रेखा ने उस की छेड़छाड़ का हलका विरोध किया, लेकिन जब उसे सुखद अनुभूति होने लगी तो वह भी उस का सहयोग करने लगी. इस तरह दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कर लीं.

एक ओर सुखवीर जहां रेखा से मिले सुख से निहाल था, वहीं रेखा भी थकी सांसों वाले पति सुनील से ऊब गई थी. सुखवीर का साथ पा कर वह फूली नहीं समा रही थी. उन दोनों ने एक बार मर्यादा की सीमा लांघी तो फिर लांघते ही चले गए. दोनों को जब भी मौका मिलता, एकदूसरे में समा जाते.

सुनील पत्नी के प्रेम प्रसंग से अनभिज्ञ था. उसे पत्नी व दोस्त दोनों पर भरोसा था. लेकिन दोनों ही उस के विश्वास का गला घोंट रहे थे.

सुनील भले ही पत्नी के प्रेम प्रसंग से अनभिज्ञ था, लेकिन पासपड़ोस के लोगों में रेखा और सुखवीर के नाजायज रिश्तों की चर्चा चल पड़ी थी. लेकिन उन दोनों ने इस की परवाह नहीं की. सुखवीर रेखा का दीवाना था तो रेखा उस की मुरीद. रेखा पत्नी तो सुनील की थी, लेकिन उस पर अधिकार उस के प्रेमी सुखवीर का हो गया था.

रेखा और सुखवीर के संबंधों के चर्चे गांव की हर गली के मोड़ पर होने लगे तो बात सुनील के कानों तक पहुंची. उस ने इस बारे में पत्नी से पूछा, ‘‘रेखा, आजकल तुम्हारे और सुखवीर के बारे में गांव में जो चर्चा है, क्या वह सच है?’’

‘‘कैसी चर्चा?’’

‘‘यही कि तुम्हारे और सुखवीर के बीच नाजायज संबंध हैं.’’

‘‘गांव वाले हमें बदनाम करने के लिए तुम्हारे कान भर रहे हैं. इस के बाद भी अगर तुम्हें अपने दोस्त पर भरोसा नहीं तो उस से साफसाफ कह दो कि वह घर न आया करे.’’

सुनील ने उस समय पत्नी की बात पर भरोसा कर लिया, लेकिन उस के मन में शक जरूर बैठ गया. अब वह दोनों को रंगेहाथ पकड़ने की जुगत में लग गया. उसे यह मौका जल्द ही मिल गया.

उस रोज रविवार था. सुनील ने रेखा से कहा कि वह किसी काम से इटावा जा रहा है, देर शाम तक ही वापस आ पाएगा.

इधर सुनील घर से निकला उधर रेखा ने फोन कर के सुखवीर को घर बुला लिया. आते ही सुखवीर ने रेखा को बांहों में कैद किया और बिस्तर पर जा पहुंचा. इसी दौरान रेखा को दरवाजा पीटने की आवाज सुनाई दी. रेखा ने कपड़े दुरुस्त करने के बाद दरवाजा खोला तो सामने पति को देख कर उस के चेहरे का रंग उड़ गया और उस की घिग्घी बंध गई.

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सुनील पत्नी की घबराहट भांप गया. रेखा को परे ढकेल कर सुनील घर के अंदर गया तो कमरे में उस का दोस्त सुखवीर बैठा मिला. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं.

सुनील को देख कर सुखवीर चेहरे पर बनावटी मुसकान बिखेरते हुए बोला, ‘‘आप तो इटावा गए थे. रेखा ने चंद मिनट पहले ही बताया था. मैं इधर से चौबिया जा रहा था तो सोचा आप से मिलता चलूं.’’

सुनील बोला, ‘‘हां दोस्त, गया तो इटावा था लेकिन यह सोच कर वापस आ गया कि तुम दोनों घर में क्या गुल खिला रहे हो, यह भी देख लूं. बहरहाल, तुम ने दोस्ती का अच्छा फर्ज निभाया और मेरी ही इज्जत पर डाका डाल दिया. तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो. अब तुम्हारी खैरियत इसी में है कि आज के बाद हमारे घर में कदम मत रखना.’’

सुखवीर एक तरह से रंगेहाथ पकड़ा गया था. इसलिए वह बिना जवाब दिए ही घर से चला गया. उस के बाद सुनील का सारा गुस्सा रेखा पर उतरा. उस ने पत्नी को बेतहाशा पीटा. रेखा पिटती रही लेकिन अपराध बोध के कारण उस ने जवाब नहीं दिया.

उस दिन के बाद रेखा और सुखवीर का मिलना बंद हो गया. सुनील और सुखवीर की दोस्ती में भी गांठ पड़ गई. लेकिन यह दूरियां अधिक दिनों तक नहीं चल पाईं. एक दिन जब दोनों का सामना हुआ तो सुखवीर ने पैर पकड़ कर सुनील से माफी मांग ली.

सुनील साफ दिल का था इसलिए उस ने उसे माफ कर दिया. इस के बाद दोनों में पहले जैसी दोस्ती हो गई. फिर से सुखवीर के घर आनेजाने लगा. रेखा इस से बहुत खुश थी.

एक रोज सुनील घर से निकला तो इत्तफाक से सुखवीर आ गया. रेखा और सुखवीर अपने प्यार के सिलसिले में बातें करने लगे. तभी रेखा बोली, ‘‘सुखवीर इस तरह लुकाछिपी का खेल कब तक चलेगा?’’

‘‘जब तक तुम चाहोगी.’’

‘‘नहीं, मुझे यह पसंद नहीं. अब मैं कोई स्थाई समाधान चाहती हूं.’’ रेखा ने कहा.

‘‘मतलब?’’ सुखवीर चौंकते हुए बोला.

‘‘मतलब यह कि मैं सुनील से छुटकारा चाहती हूं. अब मैं तुम से तभी बात करूंगी, जब तुम सुनील से छुटकारा दिला दोगे.’’

सुखवीर कुछ पल गहरी सोच में डूबा रहा फिर बोला, ‘‘ठीक है, मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है.’’

इस के बाद रेखा और सुखवीर ने मिल कर सुनील की हत्या की योजना बनाई. अपनी इस योजना में सुखवीर ने अपने एक रिश्तेदार रामप्रकाश को 10 हजार रुपए का लालच दे कर शामिल कर लिया.

योजना के अनुसार, 30 मई, 2019 की शाम 4 बजे सुखवीर सिंह अपने दोस्त सुनील कुमार के घर पहुंचा और उस ने उसे पार्टी की दावत दी. सुनील राजी हो गया तो सुखवीर ने अपने रिश्तेदार रामप्रकाश को फोन कर घर पहुंचने को कहा.

शाम लगभग 6 बजे सुखवीर, सुनील को साथ ले कर अपने गांव कुसैली आ गया. सुनील अपनी कार से आया था. सुखवीर ने सुनील को अपने खाली पड़े मकान में ठहराया. फिर वहीं पर पार्टी की व्यवस्था की. रात 8 बजे के लगभग रामप्रकाश भी कुसैली पहुंच गया. उस के बाद तीनों ने मिल कर बियर की पार्टी की. खानेपीने के बाद सुनील वहीं चारपाई पर सो गया.

आधी रात को जब गांव में सन्नाटा पसर गया तब सुखवीर और रामप्रकाश ने गहरी नींद सो रहे सुनील को दबोच लिया और फावड़े से गरदन काट कर उसे मौत की नींद सुला दी. इस के बद उन दोनों ने शव को दफनाने के लिए कमरे में गहरा गड्ढा खोदा और शव को फावड़े से काट कर कई टुकड़ों में विभाजित कर गड्ढे में डाल दिया.

लाश के उन टुकड़ों पर उस ने केरोसिन उड़ेल कर आग लगा दी फिर उन अवशेषों को गड्ढे में दफन कर दिया. सुबह होने से पहले रामप्रकाश ने गड्ढे को समतल कर गोबर से लीप दिया

और उस के ऊपर चारपाई बिछा दी.

लोगों को गुमराह करने के लिए सुखवीर सुनील की कार को कानपुर ले आया और कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन के बाहर पार्किंग में खड़ी कर वापस आ गया. 3 दिन बाद उस ने ही अज्ञात फोन नंबर से फोन कर कार पार्किंग में खड़ी होने की सूचना सुनील के पिता महाराज सिंह को दे दी.

इधर रात 8 बजे महाराज सिंह खेत से घर भोजन करने आए तो पता चला कि सुनील कार ले कर कहीं गया है और वापस नहीं आया. महाराज सिंह यह सोच कर घर में रुक गए कि बच्चेबहू घर में अकेले हैं. जब तक सुनील वापस नहीं आया तो उन की चिंता बढ़ती गई.

धीरेधीरे एक सप्ताह बीत गया पर सुनील का पता न चला, तब महाराज सिंह ने बहू रेखा पर दबाव डाल कर थाना चौबिया में गुमशुदगी दर्ज कराई.

17 जून, 2019 को थाना चौबिया पुलिस ने सुखवीर सिंह यादव, रामप्रकाश यादव तथा रेखा से विस्तार से पूछताछ करने के बाद तीनों को 17 जून को गिरफ्तार कर लिया. उन्हें इटावा की कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया गया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

  —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य कहानी- मनोहर कहानी

मैं पत्नी के साथ ज्यादा देर तक फिजिकल नहीं हो पाता, क्या करूं?

सवाल

मैं बीवी के साथ ज्यादा देर तक हमबिस्तरी नहीं कर पाता. क्या करूं?

जवाब

हमबिस्तरी में लगने वाले वक्त के बारे में ज्यादा नहीं सोचना चाहिए. जब मन करे तो देर तक फोरप्ले करने के बाद हमबिस्तरी करें. धीरेधीरे मामला अच्छा हो जाएगा.

कुछ लोगों के लिए चूमना, सहलाना, चाटना सम्भोग जितना ही महत्वपूर्ण होता है- और शायद उतना ही ऑर्गैस्मिक भी! दूसरों के लिए ये असल एहसास की शुरुआत का पहला कदम होता है. महिलाओं के लिए फोरप्ले काफी महत्वपूर्ण होता है, उनकी योनि को लुब्रिकेट करने और उन्हें सम्भोग के लिए तैयार करने में.

क्या करें…

उन हौटस्पौट्स को पहचानिए

सिर्फ लिंग या योनि पर ही ध्यान मत केन्द्रित करिए. हर व्यक्ति के लिए अलग अलग हॉट स्पॉट्स हो सकते हैं, यानि की शरीर के वो हिस्से जहां छूना और सहलाना उन्हें जादुई एहसास करता है और उन्हें कामोत्तेजित कर देता है. जैसे की निप्पल्स, गर्दन, कान, पीठ या नितम्ब. लेकिन क्यूंकि हर व्यक्ति अलग है, तो बेहतर है की आप अपने पार्टनर के उस खास हॉट स्पॉट की खोज करें और ये खोज जारी रखें- सिर्फ किताब में लिखे अंगों तक सीमित न रहे. कुछ नया करके अपने साथी को सरप्राइज करें.

घुला-मिला दीजिये

हर रोज एक ही चीज़ करने से ज्यादा बोरिंग और कुछ नहीं होता. अच्छा चुम्बन, स्तन पर हाथ, लिंग को ऊपर नीचे करना, और बस! अरे, कुछ और मजेदार करो, कुछ अलग करो! अलग अलग चीजें आजमाओ! अपने साथी को छूकर, अचानक से चूम कर चिढाओ. अरे कुछ चीज़ों का इस्तेमाल भी कर सकते हो जैसे पंख. चिकनाई पदार्थ का इस्तेमाल भी आप कर सकते हैं. अपने साथी की शरीर की भाषा को समझने की कोशिश करिए यह जानने के लिए की उन्हें क्या अच्छा लग रहा है और क्या नहीं. अगर आपको लगे की जो आप कर रहे हैं वो उन्हें पसंद आ रहा है तो करते रहिये. अगर नहीं, तो कुछ और कोशिश करिए. जरूरत है की जो आप करें वो बोरिंग ना हो. अपने साथी को सरप्राइज करिए, क्यूंकि यही तो चाबी है बढ़िया फोरप्ले और सेक्स की!

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क्या नहीं करें जल्दबाज़ी

फोरप्ले सबसे ज़्यादा ज़रूरी है महिलाओं के लिए. एक बार पुरुषों का लिंग तन जाए, तो उनके लिए तो सीधे सेक्स ही आता है. महिलाओं को थोडा समय लगता है मूड में आने के लिए, भावनात्मक और शारीरिक दोनों तौर पर. उनकी योनि में गीलापन आना जरूरी होता है, ताकि जब लिंग योनि के अन्दर जाए तो दर्द महसूस ना हो. तो सेक्स के लिए जल्दबाजी करना अच्छा आईडिया नहीं है क्यूंकि वो सेक्स का मजा आप दोनों ही नहीं ले पाएंगे और  महिलाओं को इंटरकोर्स के दौरान ओर्गास्म हमेशा नहीं होता, तो इसका मतलब है की फोरप्ले और भी ज़्यादा ज़रूरी है उनको चरमानंद तक पहुचाने के लिए. और यह सब और ज़रूरी तब भी है जब आपका साथी सेक्स के बाद सीधे खराटे लेने वाला हो और भूल जाये की उसने अपनी साथी को संतुष्ट किया भी है या नहीं.

लेकिन हां, कई बार फोरप्ले छोड़कर सीधे ‘क्विकी’ कर लेना भी दोनों साथियों के लिए बहुत मजेदार हो सकता है.

ज़्यादा ना करो

हाँ तो फोरप्ले बहुत ज़रूरी है और मज़ेदार भी तो के इसका मतलब है की आप यह करते ही जाए, बस करते ही जाये? हम यह नहीं कह रहे है की यह बिलकुल अनिवार्य है – हम यह कह रहे हैं की यह सेक्स का मज़ा आप दोनों के लिए और बढ़ता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं की आप हर बार इसे करना अनिवार्य समझे.

और अगर आपके साथी को शीघ्र वीर्यपात की समस्या है, तो फिर ज़्यादा फोरप्ले आपके लिए नुकसान दायक भी बन सकता है. ज़्यादा लम्बा फोरप्ले खीचने से शायद वो इंटरकोर्स पर पहुचने से पहले ही वीर्य निकाल दे. और यह भी हो सकता है की वो इसे रोक पाए लेकिन शायद फिर उसे बाद में वीर्यपात में परेशानी आये.

फोरप्ले का कोई परफेक्ट टाइम नहीं होता, यह हर एक के लिए अलग है, और कुछ दिन आप इसका मज़ा ज़्यादा लेना पसंद करते हैं और कुछ दिन नहीं.

फोरप्ले सिर्फ बिस्तर पर

फोरप्ले सिर्फ तभी शुरू नहीं होता जब आप दोनों बिस्तर पर हों. यह काफी पहले भी शुरू हो सकता है. घर के किसी भी कोने में, कार में, एक दूसरे को मदहोशी भरी निगाहों से देखना, एक दूसरे के शरीर के अंगो को छूना और एक दूसरे को चुम्बन देना. सिर्फ शब्दों से भी आप दोनों एक दूसरे को उत्तेजित कर सकते हैं. और बातचीत का मतलब यह नहीं की आप ‘गन्दी’ बात ही करें. इसका मतलब है की आप एक दूसरे की तारीफ़ भी कर सकते हैं और यह ज़ाहिर कर सकते है की आप एक दूसरे की तरफ कितना आकर्षित हैं.

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