ज्योंज्यों रात बीतती जा रही थी, त्योंत्यों महाराज सिंह की चिंता बढ़ती जा रही थी. उन की निगाह कभी घड़ी की सुइयों पर टिक जाती तो कभी दरवाजे पर. बात ही कुछ ऐसी थी, जिस से वह बेहद परेशान थे.

उन का बेटा सुनील कुमार जो उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में टीचर था, घर नहीं लौटा था. वह घर से यह कह कर कार से निकला था कि घंटे 2 घंटे में लौट जाएगा, लेकिन आधी रात बीत जाने पर भी वह वापस नहीं आया था. उस का मोबाइल फोन भी बंद था. यह बात 30 मई, 2019 की है.

सुबह हुई तो महाराज सिंह ने अपने कुनबे वालों को सुनील कुमार के लापता होने की जानकारी दी तो वे भी चिंतित हो उठे और महाराज सिंह के साथ सुनील को ढूंढने में जुट गए. महाराज सिंह ने मोबाइल से फोन कर के नातेरिश्तेदारों से बेटे के बारे में पूछा. लेकिन सुनील कुमार का कोई पता नहीं चला.

दुर्घटना की आशंका को देखते हुए इटावा, भरथना, सैफई आदि के अस्पतालों में भी जा कर देखा गया, लेकिन सुनील की कोई जानकारी नहीं मिली.

घर वालों के साथ बेटे की खोजबीन कर महाराज सिंह शाम को घर लौटे तो उन की बहू रेखा दरवाजे पर ही खड़ी थी. उस ने महाराज सिंह से पूछा, ‘‘पिताजी, उन का कहीं कुछ पता चला?’’

जवाब में ‘नहीं’ सुन कर रेखा फूटफूट कर रोने लगी. महाराज सिंह ने उसे धैर्य बंधाया, ‘‘बहू, सब्र करो. सुनील जल्द ही वापस आ जाएगा.’’

सुनील कुमार का एक दोस्त था सुखवीर सिंह यादव. वह भी टीचर था और कुसैली गांव में रहता था. उस का सुनील के घर खूब आनाजाना था. महाराज सिंह ने उसे सुनील के लापता होने की जानकारी दी तो वह तुरंत उन के यहां आ गया और महाराज सिंह के साथ सुनील की खोज में जुट गया. वह उन के साथ जरूरत से कुछ ज्यादा ही अपनत्व दिखा रहा था.

उस ने महाराज सिंह से कहा कि वह परेशान न हों, सुनील मनमौजी है इसलिए बिना कुछ बताए कहीं घूमनेफिरने चला गया होगा. कुछ दिन घूमघाम कर वापस लौट आएगा.

महाराज सिंह की बहू रेखा जो अब तक आंसू बहा रही थी, सुखवीर के आने के बाद उस के आंसू रुक गए. वह भी सुखवीर की हां में हां मिलाने लगी थी. वह अपने ससुर महाराज सिंह को तसल्ली दे रही थी कि पिताजी सुखवीर भाईसाहब सही कह रहे हैं. वह कहीं घूमने चले गए होंगे जल्दी ही लौट आएंगे. घबराने की जरूरत नहीं है.

बहू के इस बदले हुए व्यवहार से महाराज सिंह को आश्चर्य तो हुआ लेकिन उन्होंने उस से कुछ कहासुना नहीं. महाराज सिंह बेटे की खोज कर ही रहे थे कि एक अज्ञात नंबर से उन के मोबाइल पर काल आई. फोन करने वाले ने बताया कि सुनील की कार कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर कार पार्किंग में खड़ी है.

यह बताने के बाद उस ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया. महाराज सिंह ने कुछ और जानकारी के लिए काल बैक की तो स्विच्ड औफ मिला. इस के बाद उन्होंने कई बार बात करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे.

रेखा के पास पति की कार की डुप्लीकेट चाबी थी. वह पति के दोस्त सुखवीर सिंह तथा ससुर महाराज सिंह के साथ कानपुर सेंट्रल स्टेशन पहुंची. वहां पार्किंग में सुनील की कार खड़ी थी. पार्किंग वालों को उन लोगों ने सुनील के बारे में बताया, फिर तीनों वहां से कार ले कर लौट आए. घर पहुंच कर सुखवीर सिंह और रेखा ने महाराज सिंह को एक बार फिर धैर्य बंधाया.

लेकिन जब एक सप्ताह बीत गया और सुनील वापस नहीं आया तो महाराज सिंह का धैर्य जवाब देने लगा. उन्होंने बहू रेखा पर दबाव डाला कि वह थाने जा कर सुनील की गुमशुदगी दर्ज कराए. रेखा रिपोर्ट दर्ज कराना नहीं चाहती थी, लेकिन दबाव में उसे तैयार होना पड़ा.

8 जून, 2019 को रेखा अपने ससुर महाराज सिंह के साथ थाना चौबिया पहुंची और थानाप्रभारी सतीश यादव को अपना परिचय देने के बाद पति सुनील कुमार के सप्ताह भर पहले लापता होने की जानकारी दी. बहू के साथ आए महाराज सिंह ने भी थानाप्रभारी से बेटे को खोजने की गुहार लगाई.

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थानाप्रभारी सतीश यादव ने सुनील कुमार की गुमशुदगी दर्ज कर के उन दोनों से कुछ जरूरी जानकारियां हासिल कीं, फिर उन्हें भरोसा दिया कि वह सुनील को ढूंढने की पूरी कोशिश करेंगे.

सुनील कुमार गांव केशवपुर राहिन के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक  था. उस का समाज में अच्छा सम्मान था. उस के अचानक लापता होने से विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षकों व आसपास के कई गांवों के शिक्षकों में बेचैनी थी. पुलिस की निष्क्रियता से उन का रोष बढ़ता जा रहा था. शिक्षक भी अपने स्तर से सुनील कुमार की खोज कर रहे थे, पर उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी.

आखिर जब शिक्षकों के सब्र का बांध टूट गया तो उन्होंने और माखनपुर गांव के लोगों ने थाना चौबिया के सामने धरनाप्रदर्शन शुरू कर दिया. सूचना पा कर इटावा के एसएसपी संतोष कुमार मिश्रा, एडिशनल एसपी (सिटी) डा. रामयश सिंह तथा एडिशनल एसपी (ग्रामीण) रामबदन सिंह थाना चौबिया पहुंच गए.

उन्होंने धरनाप्रदर्शन कर रहे शिक्षकों को समझा कर आश्वासन दिया कि सुनील कुमार की खोज के लिए एक स्पैशल टीम गठित की जाएगी ताकि जल्द से जल्द उन का पता चल सके. एसएसपी के इस आश्वासन के बाद शिक्षकों ने आंदोलन समाप्त कर दिया.

इस के बाद एसएसपी संतोष कुमार मिश्रा ने एक स्पैशल टीम गठित कर दी. टीम में थाना चौबिया प्रभारी सतीश यादव, क्राइम ब्रांच प्रभारी सत्येंद्र यादव, सीओ (सैफई), अपराध शाखा तथा फोरैंसिक टीम के सदस्यों को शामिल किया गया. टीम का संचालन एडिशनल एसपी (ग्रामीण) रामबदन सिंह तथा एडिशनल एसपी (सिटी) डा. रामयश सिंह को सौंपा गया.

पुलिस टीम ने जांच शुरू की तो पता चला कि लापता शिक्षक सुनील कुमार की दोस्ती कुसैली गांव के शिक्षक सुखवीर सिंह यादव से है. उस का सुनील के घर बेधड़क आनाजाना था.

पुलिस टीम ने गुप्त रूप से पड़ोसियों से पूछताछ की तो पता चला कि सुखवीर सिंह यादव सुनील की गैरमौजूदगी में भी उस के घर आता था. यह भी पता चला कि सुनील की पत्नी रेखा और सुखवीर के बीच नाजायज संबंध हैं. रेखा सुखवीर के साथ घूमने भी जाती थी.

अवैध रिश्तों की जानकारी मिली तो पुलिस टीम का माथा ठनका. टीम को शक हुआ कि कहीं अवैध रिश्तों के चलते इन दोनों ने सुनील को ठिकाने तो नहीं लगा दिया.

बहरहाल, पुलिस टीम को पक्का विश्वास हो गया था कि सुनील के लापता होने का भेद रेखा और सुखवीर के पेट में ही छिपा है. लिहाजा पुलिस ने 15 जून, 2019 को शक के आधार पर रेखा और सुखवीर को उन के घरों से हिरासत में ले लिया.

थाने ले जा कर पुलिस ने उन दोनों के मोबाइल कब्जे में ले कर उन की काल डिटेल्स की जांच की तो 30 मई की शाम से ले कर रात तक दोनों की कई बार बात होने की पुष्टि हुई. सुखवीर के मोबाइल से एक और नंबर पर कई बार बात हुई थी. उस नंबर के बारे में पूछने पर सुखवीर ने बताया कि यह नंबर उस के रिश्तेदार रामप्रकाश यादव का है, जो औरैया जिले के ऐरवा कटरा थाना के बंजाराहारा गांव में रहता है.

पुलिस टीम ने रेखा और सुखवीर सिंह से लापता शिक्षक सुनील कुमार के संबंध में पूछताछ शुरू की. सख्ती करने पर दोनों टूट गए.

उस के बाद सुखवीर सिंह ने जो बताया, उसे सुन कर सभी के रोंगटे खड़े हो गए. उस ने बताया कि सुनील कुमार अब इस दुनिया में नहीं है. उस ने अपने रिश्तेदार रामप्रकाश की मदद से उस की हत्या कर शव के टुकड़ेटुकड़े कर गड्ढे में डाल कर जला दिए. फिर झुलसे हुए शव को गड्ढे में ही दफन कर दिया.

पुलिस टीम सुनील कुमार के शव को बरामद करने के लिए सुखवीर को साथ ले कर उस के गांव कुसैली पहुंची. गांव में उस के 2 मकान थे. एक मकान में वह स्वयं रहता था तथा दूसरा खाली पड़ा था.

इसी खाली मकान में उस ने अपने दोस्त का शव दफनाया था. सुखवीर की निशानदेही पर पुलिस टीम ने एक कमरे में खुदाई कराई तो गड्ढे से सुनील कुमार की लाश के जले हुए टुकड़े बरामद हो गए.

टीम ने शव बरामद होने की जानकारी एसएसपी संतोष कुमार मिश्रा को दी तो वह मौकामुआयना करने वहां पहुंच गए. बुलाई गई फोरैंसिक टीम ने भी साक्ष्य जुटाए. जिस फावड़े से हत्या की गई थी, उसे भी बरामद कर लिया गया.

यह जानकारी जब गांव वालों को हुई तो वहां भीड़ जुट गई. मृतक के घर वाले भी वहां आ पहुंचे. बढ़ती भीड़ को देखते हुए एसएसपी ने आसपास के थानों से भी पुलिस फोर्स बुला ली. महाराज सिंह बेटे का शव देख कर बदहवास थे. उन की आंखों से आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

पुलिस टीम ने भारी पुलिस सुरक्षा के बीच मौके की जरूरी काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए इटावा भेज दी. सुखवीर सिंह की निशानदेही पर हत्या में शामिल उस के रिश्तेदार रामप्रकाश को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. थाने में जब रेखा और सुखवीर से उस का सामना हुआ तो उस ने सहज ही हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. रामप्रकाश ने बताया कि सुखवीर सिंह ने उसे हत्या करने में सहयोग करने के लिए 10 हजार रुपए दिए थे.

इस के बाद एसएसपी संतोष कुमार मिश्रा ने पुलिस लाइन सभागार में प्रैसवार्ता की और तीनों कातिलों को पत्रकारों के सामने पेश कर शिक्षक सुनील कुमार की हत्या का खुलासा कर दिया. पुलिस कप्तान ने केस का खुलासा करने वाली टीम को 10 हजार रुपए के ईनाम की घोषणा की.

कानपुर देहात जिले का बड़ी आबादी वाला एक कस्बा है रूरा. इसी रूरा कस्बे में भगवानदीन अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी रुचि के अलावा 2 बेटियां रेखा व बरखा थीं. भगवानदीन गल्ले का व्यापार करते थे. इस धंधे में उन्हें अच्छी कमाई होती थी. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

भगवानदीन स्वयं तो ज्यादा पढ़लिख नहीं पाए थे, लेकिन वह बेटियों को पढ़ालिखा कर योग्य बनाना चाहते थे. उन की बड़ी बेटी रेखा खूबसूरत और पढ़नेलिखने में तेज थी. वह बीए में पढ़ रही थी, उसी दौरान उसे शिक्षा मित्र के पद पर नौकरी मिल गई. वह गुलाबपुर भोरा गांव के प्राथमिक स्कूल में पढ़ाने लगी.

जब रेखा शादी योग्य हुई तो भगवानदीन उस के लिए वर की खोज में जुट गए. रेखा चूंकि शिक्षक थी, इसलिए भगवानदीन उस के लिए शिक्षक वर की ही तलाश रहे थे. काफी दौड़धूप के बाद भगवान दीन को रेखा के लिए सुनील कुमार पसंद आ गया.

सुनील कुमार इटावा जिले के माखनपुर गांव के रहने वाले महाराज सिंह का बेटा था. सुनील के अलावा महाराज सिंह की एक बेटी थी, जिस की वह शादी कर चुके थे. सुनील उच्चतर माध्यमिक विद्यालय केशवपुर रोहिन में पढ़ाता था.

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उम्र में सुनील रेखा से करीब 7 साल बड़ा था, पर वह सरकारी नौकरी पर था इसलिए रेखा को भी उस से शादी करने में कोई आपत्ति नहीं थी. अंतत: जनवरी 2008 में उन का विवाह हो गया.

ससुराल में रेखा खुश थी. दोनों का दांपत्य जीवन सुखमय बीतने लगा. सुनील के पास कार थी. छुट्टी वाले दिनों में वह रेखा को कार से घुमाने के लिए निकल जाता था, जिस से उस की खुशियां और भी बढ़ जाती थीं.

समय बीतता गया और रेखा एक के बाद एक 2 बेटों और एक बेटी की मां बन गई. बच्चों के जन्म से घर में किलकारियां गूंजने लगी थीं. रेखा के ससुर महाराज सिंह घर में केवल खाना खाने के लिए ही आते थे. उन का ज्यादातर समय खेतों पर ही बीतता था. वहां उन्होंने एक कमरा भी बनवा लिया था. वह उसी कमरे में रहते थे. वहां रह कर वे ट्यूबवेल तथा फसल की रखवाली करते थे.

रेखा 3 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन उस की सुंदरता में कमी नहीं आई थी. इस के अलावा वह बिस्तर पर पति का रोजाना ही साथ चाहती थी. लेकिन सुनील उस का साथ नहीं दे पाता था, जिस की वजह से रेखा के स्वभाव में बदलाव आ गया था. वह बातबेबात पति से झगड़ने लगी.

सुनील कुमार का एक शिक्षक दोस्त सुखवीर सिंह यादव था. वह चौबिया थाने के कुसैली गांव का रहने वाला था. दोनों दोस्तों में खूब पटती थी. सुखवीर की आर्थिक स्थिति सुनील से बेहतर थी. वह ठाटबाट से रहता था.

एक रोज सुनील ने अपने दोस्त सुखवीर सिंह यादव को पार्टी देने के लिए अपने घर बुलाया. उस रोज पहली बार सुखवीर ने रेखा को देखा था. पहली नजर में ही रेखा उस की आंखों में रचबस गई. खानेपीने के दौरान सुखवीर की निगाहें रेखा की खूबसूरती पर ही टिकी रहीं. रेखा भी अपनी खूबसूरती का जादू चला कर सुखवीर के दिल को घायल करती रही. पार्टी के बाद सुखवीर जब जाने लगा तो उस ने रेखा से कहा, ‘‘भाभी, आप बेहद खूबसूरत हैं.’’

यह सुन रेखा सुखवीर को गौर से निहारने लगी फिर उस ने मुसकरा कर सिर झुका लिया. रेखा को दिल में बसा कर सुखवीर चला गया.

इस के बाद सुनील व सुखवीर जब कभी मिलते तो सुनील उसे घर ले आता. सुखबीर चाहता भी यही था. रेखा व उस के बच्चों को रिझाने के लिए कभी वह खानेपीने की चीजें लाता तो कभी खिलौने.

रेखा इन चीजों को थोड़ा नानुकुर के बाद स्वीकार कर लेती थी. सुनील को शक न हो या बुरा न लगे, इस के लिए वह सुनील की भी खातिरदारी करता. दरअसल, सुखवीर बियर पीने का शौकीन था. उस ने इस का चस्का सुनील को भी लगा दिया था.

30-32 वर्षीय सुखवीर शरीर से हृष्टपुष्ट व हंसमुख स्वभाव का था. रेखा से नजदीकी बनाने के लिए वह खूब खर्च करता था. कभीकभी वह रेखा के हाथ पर भी हजार 2 हजार रुपए रख देता था. रेखा मुसकरा कर उन्हें रख लेती थी.

बाद में सुखवीर सुनील की गैरमौजूदगी में भी आने लगा था. वह रेखा को भाभी कहता था. इस बहाने वह उस से खुल कर हंसीमजाक भी करनेलगा. रेखा उस की हंसीमजाक का बुरा नहीं मानती थी, बल्कि सुखवीर की रसीली बातें उस के दिल में हलचल पैदा करने लगी थीं.

सच तो यह है कि रेखा भी सुखवीर को चाहने लगी थी. क्योंकि सुखवीर एक तो उम्र में उस के बराबर था, दूसरे वह हंसमुख स्वभाव का था.

एक रोज सुखवीर स्कूल न जा कर रेखा के घर जा पहुंचा. उस समय रेखा घर में अकेली थी. बच्चे स्कूल गए थे और पति सुनील अपनी ड्यूटी पर. घर का कामकाज निपटा कर रेखा नहाधो कर सजीसंवरी बैठी थी कि सुखवीर आ गया. रेखा की खूबसूरती पर रीझ कर सुखवीर बोला, ‘‘भाभी, बनसंवर कर किस का इंतजार कर रही हो. क्या सुनील भैया जल्दी घर आने वाले हैं?’’

‘‘उन्हें मेरी फिक्र ही कब रहती है, जो जल्दी घर आएंगे.’’ रेखा तुनक कर बोली.

‘‘भैया को फिक्र नहीं तो क्या हुआ, मुझे तो आप की फिक्र है. मैं तो रातदिन तुम्हारी ही खूबसूरती में डूबा रहता हूं.’’ कहते हुए सुखवीर ने दरवाजा बंद किया और रेखा को अपनी बांहों में भर लिया. इस के बाद उस ने रेखा से छेड़छाड़ शुरू कर दी.

दिखावे के लिए रेखा ने उस की छेड़छाड़ का हलका विरोध किया, लेकिन जब उसे सुखद अनुभूति होने लगी तो वह भी उस का सहयोग करने लगी. इस तरह दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कर लीं.

एक ओर सुखवीर जहां रेखा से मिले सुख से निहाल था, वहीं रेखा भी थकी सांसों वाले पति सुनील से ऊब गई थी. सुखवीर का साथ पा कर वह फूली नहीं समा रही थी. उन दोनों ने एक बार मर्यादा की सीमा लांघी तो फिर लांघते ही चले गए. दोनों को जब भी मौका मिलता, एकदूसरे में समा जाते.

सुनील पत्नी के प्रेम प्रसंग से अनभिज्ञ था. उसे पत्नी व दोस्त दोनों पर भरोसा था. लेकिन दोनों ही उस के विश्वास का गला घोंट रहे थे.

सुनील भले ही पत्नी के प्रेम प्रसंग से अनभिज्ञ था, लेकिन पासपड़ोस के लोगों में रेखा और सुखवीर के नाजायज रिश्तों की चर्चा चल पड़ी थी. लेकिन उन दोनों ने इस की परवाह नहीं की. सुखवीर रेखा का दीवाना था तो रेखा उस की मुरीद. रेखा पत्नी तो सुनील की थी, लेकिन उस पर अधिकार उस के प्रेमी सुखवीर का हो गया था.

रेखा और सुखवीर के संबंधों के चर्चे गांव की हर गली के मोड़ पर होने लगे तो बात सुनील के कानों तक पहुंची. उस ने इस बारे में पत्नी से पूछा, ‘‘रेखा, आजकल तुम्हारे और सुखवीर के बारे में गांव में जो चर्चा है, क्या वह सच है?’’

‘‘कैसी चर्चा?’’

‘‘यही कि तुम्हारे और सुखवीर के बीच नाजायज संबंध हैं.’’

‘‘गांव वाले हमें बदनाम करने के लिए तुम्हारे कान भर रहे हैं. इस के बाद भी अगर तुम्हें अपने दोस्त पर भरोसा नहीं तो उस से साफसाफ कह दो कि वह घर न आया करे.’’

सुनील ने उस समय पत्नी की बात पर भरोसा कर लिया, लेकिन उस के मन में शक जरूर बैठ गया. अब वह दोनों को रंगेहाथ पकड़ने की जुगत में लग गया. उसे यह मौका जल्द ही मिल गया.

उस रोज रविवार था. सुनील ने रेखा से कहा कि वह किसी काम से इटावा जा रहा है, देर शाम तक ही वापस आ पाएगा.

इधर सुनील घर से निकला उधर रेखा ने फोन कर के सुखवीर को घर बुला लिया. आते ही सुखवीर ने रेखा को बांहों में कैद किया और बिस्तर पर जा पहुंचा. इसी दौरान रेखा को दरवाजा पीटने की आवाज सुनाई दी. रेखा ने कपड़े दुरुस्त करने के बाद दरवाजा खोला तो सामने पति को देख कर उस के चेहरे का रंग उड़ गया और उस की घिग्घी बंध गई.

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सुनील पत्नी की घबराहट भांप गया. रेखा को परे ढकेल कर सुनील घर के अंदर गया तो कमरे में उस का दोस्त सुखवीर बैठा मिला. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं.

सुनील को देख कर सुखवीर चेहरे पर बनावटी मुसकान बिखेरते हुए बोला, ‘‘आप तो इटावा गए थे. रेखा ने चंद मिनट पहले ही बताया था. मैं इधर से चौबिया जा रहा था तो सोचा आप से मिलता चलूं.’’

सुनील बोला, ‘‘हां दोस्त, गया तो इटावा था लेकिन यह सोच कर वापस आ गया कि तुम दोनों घर में क्या गुल खिला रहे हो, यह भी देख लूं. बहरहाल, तुम ने दोस्ती का अच्छा फर्ज निभाया और मेरी ही इज्जत पर डाका डाल दिया. तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो. अब तुम्हारी खैरियत इसी में है कि आज के बाद हमारे घर में कदम मत रखना.’’

सुखवीर एक तरह से रंगेहाथ पकड़ा गया था. इसलिए वह बिना जवाब दिए ही घर से चला गया. उस के बाद सुनील का सारा गुस्सा रेखा पर उतरा. उस ने पत्नी को बेतहाशा पीटा. रेखा पिटती रही लेकिन अपराध बोध के कारण उस ने जवाब नहीं दिया.

उस दिन के बाद रेखा और सुखवीर का मिलना बंद हो गया. सुनील और सुखवीर की दोस्ती में भी गांठ पड़ गई. लेकिन यह दूरियां अधिक दिनों तक नहीं चल पाईं. एक दिन जब दोनों का सामना हुआ तो सुखवीर ने पैर पकड़ कर सुनील से माफी मांग ली.

सुनील साफ दिल का था इसलिए उस ने उसे माफ कर दिया. इस के बाद दोनों में पहले जैसी दोस्ती हो गई. फिर से सुखवीर के घर आनेजाने लगा. रेखा इस से बहुत खुश थी.

एक रोज सुनील घर से निकला तो इत्तफाक से सुखवीर आ गया. रेखा और सुखवीर अपने प्यार के सिलसिले में बातें करने लगे. तभी रेखा बोली, ‘‘सुखवीर इस तरह लुकाछिपी का खेल कब तक चलेगा?’’

‘‘जब तक तुम चाहोगी.’’

‘‘नहीं, मुझे यह पसंद नहीं. अब मैं कोई स्थाई समाधान चाहती हूं.’’ रेखा ने कहा.

‘‘मतलब?’’ सुखवीर चौंकते हुए बोला.

‘‘मतलब यह कि मैं सुनील से छुटकारा चाहती हूं. अब मैं तुम से तभी बात करूंगी, जब तुम सुनील से छुटकारा दिला दोगे.’’

सुखवीर कुछ पल गहरी सोच में डूबा रहा फिर बोला, ‘‘ठीक है, मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है.’’

इस के बाद रेखा और सुखवीर ने मिल कर सुनील की हत्या की योजना बनाई. अपनी इस योजना में सुखवीर ने अपने एक रिश्तेदार रामप्रकाश को 10 हजार रुपए का लालच दे कर शामिल कर लिया.

योजना के अनुसार, 30 मई, 2019 की शाम 4 बजे सुखवीर सिंह अपने दोस्त सुनील कुमार के घर पहुंचा और उस ने उसे पार्टी की दावत दी. सुनील राजी हो गया तो सुखवीर ने अपने रिश्तेदार रामप्रकाश को फोन कर घर पहुंचने को कहा.

शाम लगभग 6 बजे सुखवीर, सुनील को साथ ले कर अपने गांव कुसैली आ गया. सुनील अपनी कार से आया था. सुखवीर ने सुनील को अपने खाली पड़े मकान में ठहराया. फिर वहीं पर पार्टी की व्यवस्था की. रात 8 बजे के लगभग रामप्रकाश भी कुसैली पहुंच गया. उस के बाद तीनों ने मिल कर बियर की पार्टी की. खानेपीने के बाद सुनील वहीं चारपाई पर सो गया.

आधी रात को जब गांव में सन्नाटा पसर गया तब सुखवीर और रामप्रकाश ने गहरी नींद सो रहे सुनील को दबोच लिया और फावड़े से गरदन काट कर उसे मौत की नींद सुला दी. इस के बद उन दोनों ने शव को दफनाने के लिए कमरे में गहरा गड्ढा खोदा और शव को फावड़े से काट कर कई टुकड़ों में विभाजित कर गड्ढे में डाल दिया.

लाश के उन टुकड़ों पर उस ने केरोसिन उड़ेल कर आग लगा दी फिर उन अवशेषों को गड्ढे में दफन कर दिया. सुबह होने से पहले रामप्रकाश ने गड्ढे को समतल कर गोबर से लीप दिया

और उस के ऊपर चारपाई बिछा दी.

लोगों को गुमराह करने के लिए सुखवीर सुनील की कार को कानपुर ले आया और कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन के बाहर पार्किंग में खड़ी कर वापस आ गया. 3 दिन बाद उस ने ही अज्ञात फोन नंबर से फोन कर कार पार्किंग में खड़ी होने की सूचना सुनील के पिता महाराज सिंह को दे दी.

इधर रात 8 बजे महाराज सिंह खेत से घर भोजन करने आए तो पता चला कि सुनील कार ले कर कहीं गया है और वापस नहीं आया. महाराज सिंह यह सोच कर घर में रुक गए कि बच्चेबहू घर में अकेले हैं. जब तक सुनील वापस नहीं आया तो उन की चिंता बढ़ती गई.

धीरेधीरे एक सप्ताह बीत गया पर सुनील का पता न चला, तब महाराज सिंह ने बहू रेखा पर दबाव डाल कर थाना चौबिया में गुमशुदगी दर्ज कराई.

17 जून, 2019 को थाना चौबिया पुलिस ने सुखवीर सिंह यादव, रामप्रकाश यादव तथा रेखा से विस्तार से पूछताछ करने के बाद तीनों को 17 जून को गिरफ्तार कर लिया. उन्हें इटावा की कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया गया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

  —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य कहानी- मनोहर कहानी

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