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श्रिया पिलगांवकर टर्की में मना रही हैं अपनी मां सुप्रिया का जन्मदिन

मशहूर अदाकार व निर्देशक सचिन पिलगांवकर व अभिनेत्री सुप्रिया पिलगांवकर की बेटी और वेब सीरीज ‘‘मिर्जापुर’’ से चर्चा में आयी अभिनेत्री श्रिया पिलगांवकर ने इस बार अपनी मां सुप्रिया का जन्मदिन (17 अगस्त) मुंबई की बजाय भारत से बाहर टर्की में मनाने की योजना बनायी है. वास्तव में श्रिया इन दिनों अपनी मां के साथ टर्की घूम रहीं हैं, जहां उन्होंने एक सप्ताह पहले से ही अपनी मां सुप्रिया के जन्मदिन का जश्न शुरू कर दिया है. काफी लंबे समय बाद श्रिया को अपनी मां के साथ छुट्टियां मनाने का अवसर मिला है. इसी के चलते इस बार वह अपनी मां के जन्मदिन को यादगार बनाने में जुटी हुई हैं.

मुंबई से रवाना होने से पहले श्रिया ने कहा- ‘‘पिछले वर्ष अपनी मां के जन्मदिन पर मैं लंदन में गुरींदर चड्डा की वेब सीरीज ‘‘बीचम हाउस’’ के लिए शूटिंग कर रही थी. तब उनके जन्मदिन पर मैं मौजूद नही थी. पर तभी से मेरे दिमाग में था कि अब अगले जन्मदिन पर मैं अपनी मां को आश्चर्य चकित करने का प्रयास करुंगी. इसी के चलते हमने मां के साथ टर्की घूमने की योजना बनायी. पापा शूटिंग में व्यस्त हैं, इसलिए वह हमारा साथ नहीं दे पाए.

 

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फिलहाल श्रिया पिलगांवकर   आनंद एल राय निर्मित और प्रभु सेलोमन निर्देशित फिल्म ‘‘हाथी मेरे साथी’’ में राणा डगुबट्टी, जोया हुसैन व पुलकित सम्राट के साथ अभिनय कर रही हैं. जबकि 13 सितंबर को उनकी फिल्म ‘‘भांगड़ा पा ले’’  रिलीज होने वाली है,जिसमें उनके साथ सनी कौशल व रूकसार ढिल्लों है.

सारा के बर्थडे पर सामने आया ‘कुली नम्बर 1’ का पोस्टर, फैंस हुए दीवाने

बौलीवुड एक्ट्रेस साराअली खान का आज बर्थडे है. इस खास मौके ही सारा अली खान और वरुण धवन की नई फिल्म कुली नम्बर 1 के दो औफिशियल पोस्टर सामने आए है. इस पोस्टर में सारा काफी ग्लैमरस अंदाज में दिख रही हैं. और वरुण कुली के भेष में नजर आ रहे है. इस पोस्टर में वे लगेज पर बैठे हुए दिखाई दे रहे है.

वहीं दूसरे पोस्टर में वरुण के साथ-साथ सारा अली खान भी दिखाई दे रही है. इस पोस्टर में सारा ने वरुण को जिस तरह से पकड़ा है, उससे साफ पता चलता है कि वरुण उनके इशारों पर नाचने वाले है. कुली नम्बर 1 रिमेक के पोस्टर को देखने के बाद तो फैंस इन दोनो स्टार के दीवाने हो गए हैं.

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सोशल मीडिया पर अपनी खुशी जाहिर रहे हैं. फैंस का कहना है कि ये फिल्म बौक्स औफिस पर छप्पर फाड़ कमाई करेगी तो वहीं कोई कह रहा है कि इस फिल्म के जरिए  सारा और वरुण के कैरियर में चार चांद लग जाएंगे.

यह फिल्म गोविंदा और करिश्मा कपूर की सुपरहिट फिल्म का औफिशियल रीमेक है. इस फिल्म की शूटिंग के लिए सारा और वरुण बैंकौक गए थे. इस फिल्म में परेश रावल और जौनी लीवर जैसे जबरदस्त कलाकार भी नजर आने वाले हैं.

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जार जार कांग्रेस: राहुल गांधी का शोक गीत!

देश का राजनीतिक परिदृश्य कुछ ऐसा है की प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी आगे आगे दौड़ रहे हैं. और  प्रतिस्पर्धा ऐसी की कांग्रेस के स्तंभ श्रीमती सोनिया गांधी, राहुल गांधी पीछे-पीछे दौड़ रहे हैं . यह हास्यास्पद स्थिति है. कांग्रेस अपने सबसे बुरे दूर्दिनो से गुजर रही है.

आपको देश देख रहा है… एक-एक कदम, आप फूंक-फूंक कर चलें. मगर यहां तो यह भ्रम है कि हम ही देश हैं,हम भी ब्रह्मास्त्र हैं. कांग्रेस को जिस परिपक्वता सूझबूझ के साथ आगे बढ़ना चाहिए वह आज के नेतृत्व में कहीं दिखाई नहीं देता. इसका ज्वलंत उदाहरण है आर्टिकल 370 नरेंद्र मोदी अमित शाह के इस मिशन में कांग्रेस चारों खाने चित हो गई.उसके बड़े बड़े नेता नरेंद्र मोदी के पक्ष में खड़े दिखाई दिए इससे स्पष्ट है की कांग्रेस का नेतृत्व नरेंद्र मोदी के सामने असहाय है.ऐसा करुण दृश्य कांग्रेसियों का इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया .

मोदी का करंट पर करंट !

नरेंद्र मोदी कांग्रेस नेतृत्व को शौक पर शाौक दिए जा रहे हैं. और कांग्रेस नेतृत्व निरंतर छीजते चला जा रहा है और कमजोर से कमजोर होता चला जा रहा है. इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण आर्टिकल 370 पर कांग्रेस की घबराहट और थोथी रणनीति है.

लगभग सारा देश आर्टिकल 370 पर नरेंद्र दामोदरदास मोदी के साथ खड़ा हो गया .राहुल गांधी कंधा झटकाते कहते रहे, -” मैं क्या करूं ! मैं तो अध्यक्ष हूं नहीं !!”

यह कह कर आप महान कांग्रेस पार्टी का अपमान कर रहे हैं. कांग्रेस पार्टी देश की थाती है.ऐसी महानतम पार्टी के नेता होकर ऐसा असमंजस,ऐसा  व्यवहार. इसे कांग्रेस के लिए शर्मनाक कहा जा सकता है .राहुल गांधी यह भूल गए की कांग्रेस पार्टी के बड़े अलम बरदार है और कांग्रेस उन्हें अपने से अलग नहीं कर सकती और न ही वे अलग होंगे.

ऐसा प्रतीत होता है, राहुल गांधी  17 वी लोकसभा चुनाव में हार कर शोक गीत गा रहे हैं. स्यापा मना रहे हैं. हे देश के जन जन, आपने मुझे प्रधानमंत्री नहीं बनाया न… तो लो, झेलो ! मैं अब तुम लोगों के लिए कुछ नहीं कर सकता. मगर ऐसा व्यवहार विपक्ष को शोभा नहीं देता उसे अपनी भूमिका जिम्मेदारी से निभानी चाहिए.

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जार जार कांग्रेस !

सोनिया गांधी और राहुल गांधी की स्व-केंद्रित नीति के कारण कांग्रेस आज जार-जार स्थिति में है .कश्मीर मुद्दे पर कांग्रेस ने देश को कुछ भी स्टैंड नहीं बताया और नरेंद्र मोदी अमित शाह बाजी मार गए. यह एक बड़ा मसला था इस पर मोदी सरकार को कांग्रेस संसद में पानी पिला सकती थी. मगर कांग्रेस नेतृत्व ने के पास अब ना तो वैसे वक्ता हैं न बौद्धिक शख्सियते  जो ऐसे गंभीर मसले पर देश को दिशा दे सकें कांग्रेस को ऊर्जा दे सकें.

कांग्रेस पार्टी अपने सबसे बुरे दिन दुर्दिनों से गुजर रही है .संसद में जैसा प्रदर्शन रहा, उसे पार्टी के लिए शर्मनाक कहा जा सकता है. राज्यसभा के मुख्य सचेतक आलाकमान की बातें नहीं मानते और घत्ता बताते हैं.बड़े चेहरे ज्योतिरादित्य सिंधिया, जनार्दन द्विवेदी, मिलिंद देवड़ा, हुड्डा जैसे मेन स्टीम के नेताओं ने कांग्रेस की बघिया उघेड़ कर रख दी. मगर फिर भी शर्म है की इन्हें आती नहीं. अपरिवक्वता का आलम यह की अतिरंजन चौधरी लीक से हट गए… दरअसल पार्टी में लोकतंत्र खत्म हो गया है.जिसका खामियाजा आज  कांग्रेस भुगतना पड़ रहा है. यही कारण है कि कांग्रेस के एक समय बड़े नेता रहे और अब छत्तीसगढ़ में जनता कांग्रेस पार्टी के सुप्रीमो अजीत प्रमोद कुमार जोगी ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा है कांग्रेस को अब खत्म कर दिया जाना चाहिए कांग्रेस पार्टी चूक गई है और अब देश को इसकी कोई आवश्यकता नहीं है.

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छटपटा रही है कांग्रेस पार्टी !

कांग्रेस पार्टी को कांख से दाब कर,  राजनीति और लोकतंत्र का गला दबाने से न देश का भला है न ही कांग्रेस के कर्ताधर्ता गांधी परिवार का. कांग्रेस को खुली हवा चाहिए सूझबूझ से परिपूर्ण परिपक्वत नेतृत्व चाहिए.

जो जनता से जुड़े और जनता जनार्दन को जोड़े . अपनी नई लीक तैयार करें. नरेंद्र मोदी और संघ परिवार की सोच के समक्ष आज का नेतृत्व बारंबार निस्तेज हुआ है. वैचारिक दिवालियापन ऐसा की राहुल, प्रियंका मंदिर -मंदिर घूमने लगे और यह सब देख जनता समझ गई यह सिर्फ दिखावा है. आपको पीछे पीछे दौड़ना नहीं है जब आप सत्तर साल पीछे नहीं दौड़े, सो अब क्यों दौड़ रहे हो !

बहुतेरी समस्याएं हैं, मुद्दे हैं उन्हें आप साधो, संगठन मजबूत बनाओ. अन्यथा आप ताजिंदगी मोदी और संघ के पीछे दौड़ते रहोगे और ये ऐसी विभूतियां है आप को पता भी नहीं चलेगा किन भूल भुलैया में आपको उलझा देंगे. यह 24 घंटे काम करने वाले लोग हैं.कर्मठ है. आप भी बनिये या फिर दूसरों को मौका दीजिए.

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दांपत्य में दरार डालता ‘मोबाइल’

यह सच है कि मोबाइल ने दूर दूर रह रहे पति पत्नी के बीच दूरियों को कम किया है. मोबाइल के जरीये वह अब संदेश, बातचीत, फीलिंग्स, फोटो और वीडियों तक आपस में पलक झपकते एक दूसरे तक पहुंच रहे है. दूर होते हुए भी पति पत्नी ‘सोशल रिलेशनशिप’ तक बनाने में सफल होते है. रोमांटिक होकर पति पत्नी निजी संबंधें तक की सीमाओं तक पहुंच जाते है. दूर होकर दूरी का अहसास नहीं होता. यही मोबाइल पास पास रह रहे पतिपत्नी के बीच दूरियां बढ़ाने का काम भी कर रहा है. पतिपत्नी को शिकायत यह रहती है कि मोबाइल अब दांपत्य जीवन में ‘पतिपत्नी और वो’ की भूमिका निभा रहा है. जिससे पति पत्नी के रिश्तों में मोबाइल दरार डालने का काम कर रहा है.

कविता को अपने पति से शिकायत है कि उनका बेडरूम में भी पत्नी से अधिक समय मोबाइल के साथ गुजरता है. कविता कहती है कि ‘पति कभी अपने दोस्तों के साथ चैटिंग करते हैं तो कभी मोबाइल पर गेम्स खेलते रहते है. कई बार बहुत शिकायत करो तो कुछ देर जबरदस्ती बातचीत करेंगे इसके बाद फिर मेरे सोते ही मोबाइल में लग जाते है. कई बार तो मुझे यह शक भी होता है कि उनको किसी और से कोई संबंध तो नहीं जो उसी से बातें करते हो और मुझे पता भी ना चलता हो. मैंने जब कभी उनका मोबाइल देखने की कोशिश करती हूं. हमारा झगड़ा शुरू हो जाता है.’

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कविता जैसी समस्याएं बहुत सारी दूसरी महिलाओं की भी है. साइकोलाजिस्ट सुप्रीती बाली कहती है ‘पति पत्नी के बीच रिश्तों में सबसे पहली दूरी शक की वजह से बढ़ती है. जब पतिपत्नी  आपस में शक करने लगते हैं. शक के चलते आपस में दूरियां और एक दूसरे पर अविश्वास बढ़ता है. कई बार मोबाइल को लेकर झगड़ा शुरू होता है, जो बाद में घरेलू हिंसा का रूप भी ले लेता है. मेरे पास आने वाली ज्यादातर शिकायतों में आपसी झगड़े की शुरूआत यहीं से होती है. ऐसे में जरूरी है कि निजी समय में मोबाइल के प्रयोग को लेकर पति पत्नी को सहमति से काम करना चाहिए. इससे आपस में संबंध मधुर बने रहेंगे.

प्राइवेसी पर प्रभाव:

मोबाइल के अधिक प्रयोग से केवल पति पत्नी के बीच रिश्ते ही प्रभावित नहीं हुए है उनकी आपसी प्राइवेसी भी प्रभावित हुई है. कई पति-पत्नी को यह शिकायत होती है कि मोबाइल के प्रयोग होने से एक दूसरे के संबंध बेडरूम से बाहर तक पहुंच जा रहे है. महिला थाने में शिकायत करने वाली रश्मि ने कहा कि उसके पति के संबंध किसी दूसरी लड़की से थे. ऐसे में वह पत्नी के साथ निजी संबंधों की जानकारी उस महिला को भी देते थे. एक बार उनकी आपसी चैटिंग को पत्नी ने पढ़ लिया तो इस बात का खुलासा हो गया. इसके बाद रश्मि और उसके पति के बीच लड़ाई शुरू हुई. तब रश्मि ने मोबाइल छीनकर देखा तो उसमे पति और उस महिला के अश्लील फोटो तो थे ही, रश्मि के साथ के भी कुछ निजी फोटो उस महिला को भेजे गए थे. यह भी पता चला.

अलग-अलग बेडरूम में रहते हुए भी दो लोग आपस में एक हो रहे थे. और एक ही बेडरूम में रहते हुये भी पति पत्नी के बीच दूरी आ रही है. ऐसे में जरूरी है कि पति पत्नी के बीच रिश्तों को मधुर बनाये रखने के लिये बेडरूम को मोबाइल की रेंज से बाहर कर दिया जाए. साइकोलाजिस्ट सुप्रीती बाली कहती है ‘जब पति या पत्नी एक साथ रहते हुए आपस में बातचीत करने की जगह पर मोबाइल में अपना समय गुजारते हैं तो एक तरह से वह अपने रिश्ते को रिजेक्ट कर रहे होते हैं. रिश्तों में रिजेक्ट होने का यह अहसास उनमें तनाव भर देते है. पति पत्नी ही नहीं पैरेंटस के व्यस्त रहने से बच्चों को भी इस बात का अहसास होता है. पति पत्नी के बीच इस तनाव को ‘टैक्नोफ्रेंस‘ नामक बीमारी के नाम से भी जाना जाता है.’

टेक्नलौजी प्रयोग का तरीका सीखें:

मोबाइल के प्रयोग से बहुत सारी मानसिक बीमारियां पैदा हो रही है. विदेशों में अब मोबाइल के प्रयोग को लेकर समय सीमा तय की जाने लगी है. इसको लेकर तमाम ‘ मोबाइल एप्स’ भी बनने लगे है. जिसमें यह तय होता है कि मोबाइल और सोशल मीडिया का प्रयोग कितनी देर करना खतरनाक नहीं रहता है. ‘मोबाइल एप’ के जरीये यह डिस्सप्ले होता है कि कितना प्रयोग कर लिया गया है. इससे कई लोगों में मोबाइल के उपयोग की सीमा कम हुई है. इसका प्रभाव भी तभी पड़ता है जब मोबाइल का प्रयोग करने वाला पूरी ईमानदारी से इस एप के जरीये काम को करे. केवल मोबाइल पर एप डाउनलोड करने से कोई लाभ नहीं होने वाला है. ऐसे में जरूरी है कि टैक्नलौजी के प्रयोग का सही तरीका सीखें.

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रात में देर तक मोबाइल का प्रयोग करने वाले सुशांत कहते है ‘मेरा अपनी पत्नी के साथ एक वादा हुआ कि अब हम मोबाइल का प्रयोग कम करेंगे. मुझे देर रात तक मोबाइल के प्रयोग की लत लगी थी. ऐसे में पत्नी के सो जाने के बाद भी मुझे नींद नहीं आती थी. इसके बाद भी मैंने मोबाइल का प्रयोग नहीं किया. मुझे कौलेज के दिनों में कार्टून बनाने का शौक था. रात में जब नींद नहीं आती थी तो मैं कार्टून बनाने लगा. सच में वह कार्टून लोगों को बहुत पंसद आने लगे पत्नी ने अब मुझे उत्साहित करते कहा कि इन कार्टून को अब किताब के रूप में प्रिंट कराएंगे. मोबाइल की लत से छुटकारा पाने का मुझे यह लाभ हुआ.’

समझदारी से करें बातचीत:

साइकोलाजिस्ट  सुप्रीती बाली कहती है ‘कई बार पति या पत्नी दोनो को मोबाइल पर अपने औफिस के जरूरी काम निपटाते है. पहले औफिस के जो काम कंप्यूटर या लैपटौप पर होते थे अब मोबाइल पर होने लगे है. ऐसे में काम के वक्त मोबाइल के प्रयोग को भी कई बार गैर जरूरी मान लिया जाता है. आज के समय में प्राइवेट कंपनियों में काम करने वाले लोगों को रात में भी ईमेल या वाट्सएप पर औफिस के काम निपटाने पड़ते है. ऐसे में पति या पत्नी दोनो को ही एक दूसरे के काम की जरूरतों को समझते हुये ही दखल देना चाहिये. कई बार आपसी रिश्ते किसी और वजह से बिगड़ते है पर झगड़ा मोबाइल से ही शुरू हो जाता है. बेडरूम में या रात में जब मोबाइल का प्रयोग करना हो तो आपसी बातचीत और समझदारी से करे. कोशिश करें कि मोबाइल का कम से कम प्रयोग करें. पति पत्नी के बिगड़ते रिश्ते से अलग यह स्वास्थ्य के लिये भी खतरनाक है. यह तनाव, नींद ना आने की बीमारी और दूसरी परेशानियों को भी पैदा कर रहा है.

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सान्निध्य

रमाकांत की तरफ से रोहिणी को हर तरह का सुख मिला था. दुख था तो  उसे केवल रमाकांत का साथ न मिलने का. दरअसल, रमाकांत अपने को काम में कुछ ज्यादा ही व्यस्त रखते थे. समय उन्हें मिला लेकिन रोहिणी के परलोक सिधारने के बाद. और तब वे रोहिणी को हृदय से लगाए बिना नहीं रह सके.

अभी शाम के 4 ही बजे थे, लेकिन आसमान में घिर आए गहरे काले बादलों ने कुछ अंधेरा सा कर दिया था. तेज बारिश के साथ जोरों की आंधी भी चल रही थी. सामने के पार्क में पेड़ झूमतेलहराते अपनी प्रसन्नता का इजहार कर रहे थे. रमाकांत का मन हुआ कि कमरे के सामने की बालकनी में कुरसी लगा कर मौसम का आनंद उठाएं, लेकिन फिर उन्हें लगा कि रोहिणी का कमजोर शरीर तेज हवा सहन नहीं कर पाएगा.

उन्होंने रोहिणी की ओर देखा. वह पलंग पर आंखें मूंदे लेटी हुई थी. रमाकांत ने पूछा, ‘‘अदरक वाली चाय बनाऊं, पिओगी?’’

अदरक वाली चाय रोहिणी को बहुत पसंद थी. उस ने धीरे से आंखें खोलीं और मुसकराई, ‘‘मोहन से…कहिए… वह…बना देगा,’’ उखड़ती सांसों से वह बड़ी मुश्किल से इतना कह पाई.

‘‘अरे, मोहन से क्यों कहूं? वह क्या मुझ से ज्यादा अच्छी चाय बनाएगा? तुम्हारे लिए तो चाय मैं ही बनाऊंगा,’’ कह कर रमाकांत किचन में चले गए.

जब वह वापस आए तो टे्र में 2 कप चाय के साथ कुछ बिस्कुट भी रख लाए. उन्होंने सहारा दे कर रोहिणी को उठाया और हाथ में चाय का कप पकड़ा कर बिस्कुट आगे कर दिए.

‘‘नहीं जी…कुछ नहीं खाना,’’ कह कर रोहिणी ने बिस्कुट की प्लेट सरका दी.

‘‘बिस्कुट चाय में डुबो कर…’’ उन की बात पूरी होने से पहले ही रोहिणी ने सिर हिला कर मना कर दिया.

रोहिणी की हालत देख कर रमाकांत का दिल भर आया. उस का खानापीना लगभग न के बराबर ही हो गया था. आंखों के नीचे गहरे गड्ढे पड़ गए थे. वजन एकदम घट गया था. वह इतनी कमजोर हो गई थी कि देखा नहीं जाता था. स्वयं को अत्यंत विवश महसूस कर रहे थे रमाकांत. कैसी विडंबना थी कि डाक्टर हो कर उन्होंने कितने ही मरीजों को स्वस्थ किया था, किंतु खुद अपनी पत्नी के लिए कुछ नहीं कर सके. बस, धीरेधीरे रोहिणी को मौत की ओर अग्रसर होते देख रहे थे.

उन के जेहन में वह दिन उतर आया जब वह रोहिणी को ब्याह कर घर ले आए थे. अम्मा अपनी सारी जिम्मेदारियां उसे सौंप कर निश्ंिचत हो गई थीं. कोमल सी दिखने वाली रोहिणी ने भी खुले दिल से अपनी हर जिम्मेदारी को स्वीकारा और किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया. उस के सौम्य और सरल स्वभाव ने परिवार के हर सदस्य को उस का कायल बना दिया था.

रमाकांत उन दिनों मेडिकल कालेज में लेक्चरर के पद पर थे. साथ ही घर के अहाते में एक छोटा सा क्लिनिक भी खोल रखा था. स्वयं को एक स्थापित और नामी डाक्टर के रूप में देखने की उन की बड़ी तमन्ना थी. घर का मोरचा रोहिणी पर डाल वह सुबह से रात तक अपने काम में व्यस्त रहते. नईनवेली पत्नी के साथ प्यार के मीठे क्षण गुजारने की फुरसत उन्हें न थी…या फिर शायद जरूरत ही न समझी.

उन्हें लगता कि रोहिणी को तमाम सुखसुविधा मुहैया करा कर वह पति होने का अपना फर्ज बखूबी निभा रहे हैं, लेकिन उस की भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति से उन्हें कोई मतलब न था. रोहिणी का मन तो करता कि रमाकांत उस के साथ कुछ देर बैठें, बातें करें, लेकिन वह कभी उन से यह कह नहीं पाई. जब कहा भी, तब वे समझ नहीं पाए और जब समझे तब बहुत देर हो चुकी थी.

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वक्त के साथसाथ रमाकांत की महत्त्वाकांक्षा भी बढ़ी. अपनी पुश्तैनी जायदाद बेच कर और सारी जमापूंजी लगा कर उन्होंने एक सर्वसुविधायुक्त नर्सिंगहोम खोल लिया. रोहिणी ने तब अपने सारे गहने उन के आगे रख दिए थे. हर कदम पर वह उन का मौन संबल बनी रही. उन के जीवन में एक घने वृक्ष सी शीतल छाया देती रही.

रमाकांत की मेहनत रंग लाई और सफलता उन के कदम चूमने लगी. कुछ ही समय में उन के नर्सिंगहोम का बड़ा नाम हो गया. वहां उन की मसरूफियत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने नौकरी छोड़ दी और सिर्फ नर्सिंगहोम पर ही ध्यान देने लगे.

इस बीच रोहिणी ने भी रवि और सुनयना को जन्म दिया और वह उन की परवरिश में ही अपनी खुशी तलाशने लगी. जीवन एक बंधेबंधाए ढर्रे पर चल रहा था. रमाकांत के लिए उन का काम था और रोहिणी के लिए बच्चे और सामाजिकता का निर्वाह.

अम्मांबाबूजी के देहांत और ननद के विवाह के बाद रोहिणी और भी अकेलापन महसूस करने लगी. बच्चे भी बड़े हो रहे थे और अपनी पढ़ाई में व्यस्त थे. रमाकांत के लिए पत्नी का अस्तित्व बस, इतना भर था कि वह समयसमय पर उसे गहनेकपड़े भेंट कर देते थे. उस का मन किस बात के लिए लालायित था, यह जानने की उन्होंने कभी कोशिश नहीं की.

जिंदगी ने रमाकांत को एक मौका दिया था. कभी कोई मांग न करने वाली उन की पत्नी रोहिणी ने एक बार उन्हें अपने दिल की गहराइयों से परिचित कराया था, लेकिन वे ही उस की बातों का दर्द और आंखों के सूनेपन को अनदेखा कर गए थे. उस दिन रोहिणी का जन्मदिन था. उन्होंने उसे कुछ प्यार दिखाते हुए पूछा था, ‘बताओ तो, मैं तुम्हारे लिए क्या तोहफा लाया हूं?’

तब रोहिणी के चेहरे पर फीकी सी मुसकान आ गई थी. उस ने धीमी आवाज में बस इतना ही कहा था, ‘तोहफे तो आप मुझे बहुत दे चुके हैं. अब तो बस आप का सान्निध्य मिल जाए…’

‘वह भी मिल जाएगा. बस, कुछ साल मेहनत से काम कर लें, अपनी और बच्चों की जिंदगी सेटल कर लें, फिर तो तुम्हारे साथ ही समय गुजारना है,’ कहते हुए उसे एक कीमती साड़ी का पैकेट थमा रमाकांत काम पर निकल गए थे. रोहिणी ने फिर कभी उन से कुछ नहीं कहा था.

रवि भी पिता के नक्शेकदम पर चल कर डाक्टर ही बना. उस ने अपनी सहपाठिन गीता से विवाह की इच्छा जाहिर की, जिस की उसे सहर्ष अनुमति भी मिल गई. अब रमाकांत को बेटेबहू का भी अच्छा साथ मिलने लगा. फिर सुनयना का विवाह भी हो गया. रमाकांत व रोहिणी अपनी जिम्मेदारियों से निवृत्त हो गए, लेकिन स्थिति अब भी पहले की तरह ही थी. रोहिणी अब भी उन के सान्निध्य को तरस रही थी और रमाकांत कुछ और वर्ष काम करना चाहते थे, अभी और सेटल होना चाहते थे.

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शायद सबकुछ इसी तरह चलता रहता अगर रोहिणी बीमार न पड़ती. एक दिन जब सब लोग नर्सिंगहोम गए थे, तब वह चक्कर खा कर गिर पड़ी. घर के नौकर मोहन ने जब फोन पर बताया, तो सब भागे हुए आए. फिर शुरू हुआ टेस्ट कराने का सिलसिला. जब रिपोर्ट आई तो पता चला कि रोहिणी को ओवेरियन कैंसर है.

रमाकांत सुन कर घबरा से गए. उन्होंने अपने मित्र कैंसर स्पेशलिस्ट

डा. भागवत को रिपोर्ट दिखाई. उन्होंने देखते ही साफ कह दिया, ‘रमाकांत, तुम्हारी पत्नी को ओवेरियन कैंसर ही हुआ है. इस में कुछ तो बीमारी के लक्षणों का पता ही देर से चलता है और कुछ इन्होंने अपनी तकलीफ घर में छिपाई होगी. अब तो कैंसर चौथी स्टेज पर है. यह शरीर के दूसरे अंगों तक भी फैल चुका है. चाहो तो सर्जरी और कीमोथैरेपी कर सकते हैं, लेकिन कुछ खास फायदा नहीं होने वाला. अब तो जो शेष समय है उस में इन्हें खुश रखो.’

सुन कर रमाकांत को लगा कि जैसे उन के हाथपैरों से दम निकल गया है. उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि रोहिणी इस तरह उन्हें छोड़ कर चली जाएगी. वह तो हर वक्त एक खामोश साए की तरह उन के साथ रहती थी. उन की हर जरूरत को उन के कहने से पहले ही पूरा कर देती थी. फिर यों अचानक उस के बिना…

अब जा कर रमाकांत को लगा कि उन्होंने कितनी बड़ी गलती कर दी थी. रोहिणी के अस्तित्व की कभी कोई कद्र नहीं की उन्होंने. उन के लिए तो वह बस उन की मूक सहचरी थी, जो उन की हर जरूरत के लिए हर वक्त उपलब्ध थी. इस से ज्यादा कोई अहमियत नहीं दी उन्होंने उसे. आज प्रकृति ने न्याय किया था. उन्हें इस गलती की कड़ी सजा दी थी. जिस महत्त्वाकांक्षा के पीछे भागते उन की जिंदगी बीती, जिस का उन्हें बड़ा दंभ था, आज वह सारा ज्ञान उन के किसी काम न आया.

अब जब उन्हें पता चला कि रोहिणी के जीवन का बस थोड़ा ही समय शेष रह गया था, तब उन्हें एहसास हुआ कि वह उन के जीवन का कितना बड़ा हिस्सा थी. उस के बिना जीने की कल्पना मात्र से वे सिहर उठे. महत्त्वाकांक्षाओं के पीछे भागने में वे हमेशा रोहिणी को उपेक्षित करते रहे, लेकिन अपनी सारी उपलब्धियां अब उन्हें बेमानी लगने लगी थीं.

‘पापा, आप चिंता मत कीजिए. मैं अब नर्सिंगहोम नहीं आऊंगी. घर पर ही रह कर मम्मी का ध्यान रखूंगी,’ उन की बहू गीता कह रही थी.

रमाकांत ने एक गहरी सांस ली और उस के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, ‘नहीं, बेटा, नर्सिंगहोम अब तुम्हीं लोग संभालो. तुम्हारी मम्मी को इस वक्त सब से ज्यादा मेरी ही जरूरत है. उस ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है. उस का ऋण तो मैं किसी भी हाल में नहीं चुका पाऊंगा, लेकिन कम से कम अब तो उस का साथ निभाऊं.’

उस के बाद से रमाकांत ने नर्सिंगहोम जाना छोड़ दिया. वे घर पर ही रह कर रोहिणी की देखभाल करते, उस से दुनियाजहान की बातें करते. कभी कोई किताब पढ़ कर सुनाते, तो कभी साथ टीवी देखते. वे किसी तरह रोहिणी के जाने से पहले बीते वक्त की भरपाई करना चाहते थे.

मगर वक्त उन के साथ नहीं था. धीरेधीरे रोहिणी की तबीयत और बिगड़ने लगी थी. रमाकांत उस के सामने तो संयत रहते, मगर अकेले में उन की पीड़ा आंसुओं की धारा बन कर बह निकलती. रोहिणी की कमजोर काया और सूनी आंखें उन के हृदय में शूल की तरह चुभती रहतीं. वे स्वयं को रोहिणी की इस हालत का दोषी मानने लगे थे. इस के साथसाथ उन के मन में हर वक्त रोहिणी को खो देने का डर होता. वे जानते थे कि यह दुर्भाग्य तो उन की नियति में लिखा जा चुका था, लेकिन उस क्षण की कल्पना करते हुए हमेशा भयभीत रहते.

‘‘अंधेरा…हो गया जी,’’ रोहिणी की आवाज से रमाकांत की तंद्रा टूटी. उन्होंने उठ कर लाइट जला दी. देखा, रोहिणी का चाय का कप आधा भरा हुआ रखा था और वह फिर से आंखें मूंदे टेक लगा कर बैठी थी. चाय ठंडी हो चुकी थी. रमाकांत ने चुपचाप कप उठाया और किचन में जा कर सिंक में चाय फैला दी. उन्होंने खिड़की से बाहर देखा, बाहर अभी भी तेज बारिश हो रही थी. हवा का ठंडा झोंका आ कर उन्हें छू गया, लेकिन अब उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. उन्होंने अपनी आंखों के कोरों को पोंछा और मोहन को आवाज लगा कर खिचड़ी बनाने के लिए कहा.

खिचड़ी बिलकुल पतली थी, फिर भी रोहिणी बमुश्किल 2 चम्मच ही खा पाई. आखिर रमाकांत उस की प्लेट उठा कर किचन में रख आए. तब तक रवि और गीता भी नर्सिंगहोम से वापस आ गए थे.

‘‘कैसी हो, मम्मा?’’ रवि लाड़ से रोहिणी की गोद में लेटते हुए बोला.

‘‘ठीक हूं, मेरे बच्चे,’’ रोहिणी मुसकराते हुए उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए धीमी आवाज में बोली.

रमाकांत ने देखा कि रोहिणी के चेहरे पर असीम संतोष था. अपने पूरे परिवार के साथ होने की खुशी थी उसे. वह अपनी बीमारी से अनभिज्ञ नहीं थी, परंतु फिर भी प्रसन्न ही रहती थी. जिस सान्निध्य की आस ले कर वह वर्षों से जी रही थी, वह अब उसे बिना मांगे ही मिल रहा था. अब वह तृप्त थी, इसलिए आने वाली मौत के लिए कोई डर या अफसोस उस के चेहरे पर दिखाई नहीं देता था.

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बच्चे काफी देर तक मां का हालचाल पूछते रहे, उसे अपने दिन भर के काम के बारे में बताते रहे. फिर रोहिणी का रुख देख कर रमाकांत ने उन से कहा, ‘‘अब खाना खा कर आराम करो. दिनभर काम कर के थक गए होगे.’’

‘‘पापा, आप भी खाना खा लीजिए,’’ गीता ने कहा.

‘‘मुझे अभी भूख नहीं, बेटा. आप लोग खा लो. मैं बाद में खा लूंगा.’’

बच्चों के जाने के बाद रोहिणी फिर आंखें मूंद कर लेट गई. रमाकांत ने धीमी आवाज में टीवी चला दिया, लेकिन थोड़ी देर में ही उन का मन ऊब गया. अब उन्हें थोड़ी भूख लग आई थी, लेकिन खाना खाने का मन नहीं किया. उन्होंने सोचा रोहिणी और अपने लिए दूध ले आएं. किचन में जा कर उन्होंने 2 गिलास दूध गरम किया. तब तक रवि और गीता खाना खा कर अपने कमरे में सो चुके थे.

‘‘रोहिणी, दूध लाया हूं,’’ कमरे में आ कर रमाकांत ने धीरे से आवाज लगाई, लेकिन रोहिणी ने कोई जवाब नहीं दिया. उन्हें लगा कि वह सो रही है. उन्होंने उस के गिलास को ढंक कर रख दिया और खुद पलंग के दूसरी ओर बैठ कर दूध पीने लगे.

उन्होंने रोहिणी की तरफ देखा. सोते हुए उस के चेहरे पर कितनी शांति थी. उन का हाथ बरबस ही उस का माथा सहलाने के लिए आगे बढ़ा. फिर वह चौंक पड़े. दोबारा माथे और गालों पर हाथ लगाया. तब उन्हें एहसास हुआ कि रोहिणी का शरीर ठंडा था. वह सो नहीं रही थी बल्कि सदा के लिए चिरनिद्रा में विलीन हो चुकी थी.

उन्हें जो डर इतने महीनों से जकड़े था, आज वे उस के वास्तविक रूप का सामना कर रहे थे. कुछ समय के लिए एकदम सुन्न से हो गए. उन्हें समझ ही न आया कि क्या करें. फिर धीरेधीरे चेतना जागी. पहले सोचा कि जा कर बच्चों को खबर कर दें, लेकिन फिर कुछ सोच कर रुक गए.

सारी उम्र रोहिणी को उन के सान्निध्य की जरूरत थी, लेकिन आज उन्हें उस का साथ चाहिए था. वे उस की उपस्थिति को अपने पास महसूस करना चाहते थे, इस एहसास को अपने अंदर समेट लेना चाहते थे क्योंकि बाकी की एकाकी जिंदगी उन्हें अपने इसी एहसास के साथ गुजारनी थी. उन के पास केवल एक रात थी. अपने और अपनी पत्नी के सान्निध्य के इन आखिरी पलों में वे किसी और की उपस्थिति नहीं चाहते थे. उन्होंने लाइट बुझा दी और रोहिणी को धीरे से अपने हृदय से लगा लिया. पानी बरसना अब बंद हो गया था.

अजब गजब: जब इस शोरूम ने बांटे मुफ्त कपड़े, जानें क्यों

अगर कोई ये कहे कि शो रूम से आप कपड़े खरीदोगे तो आपको कोई पैसे नहीं देने होंगे तो शायद ही आप इस बात पर विश्वास करें. आपको बता दें, भारत में एक ऐसा भी जगह है, जहां कपड़े खरीदने पर आपको कोई पैसे नहीं देने होंगे. जी हां मध्य प्रदेश के इंदौर में एक ऐसा शो रूम खुला है जहां से कपड़े लेने पर कोई पैसे नहीं देने होंगे.

दरअसल, यह शो रूम गरीबों और जरूरतमंदों के लिए खोला गया है. इस शोरूम को श्वेतांबर जैन समाज के लोगों ने शुरू किया है. मीडियो रिपोर्ट्स के मुताबिक मणिधारी मंडल सोसायटी के सुजान चोपड़ा के हवाले से कहा गया है कि श्वेतांबर जैन समाज के लोग हर महीने घरों से पुराने कपड़े एकत्र करते हैं. इन कपड़ों की अच्छे से धुलाई करने के बाद इस शोरूम में लाते हैं और यहां से इसे गरीबों और जरूरतमंदों को दिया जाता है.

इस सोसायटी के लोग इन पुराने कपड़ों को महिला, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग की श्रेणियों के हिसाब से अलग-अलग कर देते हैं. जानकारी के अनुसार इस अनोखे शो रूम में एक बार में दो जोड़ी से ज्यादा कपड़े नहीं दिया जाता है. पर जिनके पास थोड़े बहुत भी पैसे होते हैं, उन्हें 10, 20 और 50 रुपए प्रति जोड़ी कपड़े दिए जाते है.

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ईद स्पेशल डिश: मटन अचारी

ईद के मौके पर तरह-तरह के डिश बनाए जाते है. वेज के साथ-साथ नौनवेज रेसिपी भी बनाई जाती है. तो चलिए इस खास मौके पर आपको मटन अचारी की रेसिपी बताते हैं. घर पर आए मेहमानों को आप लंच या डिनर में परोस सकते हैं.

सामग्री

4 प्याज

4 टमाटर

800 ग्राम बोनलेस मटन

1 चम्मटच हल्दी पाउडर

1 चम्मच सरसों के दाने

1 चम्मच कलौंजी

5 से 6 लौंग

1 चम्मच लाल मिर्च पाउडर

2 चम्मचच अदरक

2 चम्मिच लहसुन

1/2 कप हरी धनिया कटी हुई

8 साबुत लाल मिर्च पाउडर

डेढ कप दही

7 चम्मच सरसों का तेल

स्वादानुसार नमक

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बनाने की विधि

मटन को धोकर छोटे-छोटे टुकडों में काट लें.

प्याज और टमाटर भी काट लें.

अब सभी मसालों को अलग-अलग भूनकर एक साथ पीस लें.

एक कडाही में तेल डालकर गर्म करें और कटा हुआ अदरक-लहसुन डालकर भूनें। पिसे हुए मसाले डालकर चलाते हुए मिलाएं.

प्याज और मटन के टुकडे डालकर तेज आंच पर सुनहरा होने तक पकाएं.

दही, टमाटर, लाल मिर्च पाउडर, नमक और हल्दी पाउडर डालकर एक साथ अच्छी तरह मिलाएं.

अब लगभग 3 कप पानी डालकर एक उबाल दें.

फिर ढककर मटन गलने तक पकाएं और कटी हुई हरी धनिया से सर्व कर गरमागरम परोसे.

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भूख मिटा लो ठेले पर

भूख लगती है तो मां की याद आती हैं. भाग कर जाओ और रसोई में पकवान बना रही मां से लिपट जाओ. घर की रसोई और मां के हाथ का खाना भूख की तृष्णा को शांत कर देता है. लेकिन जब आप घर से दूर अकेले रह रहे हों, भूख लगे और पास में न मां हो, न मां के हाथ का बना खाना, तब बहुत तकलीफ होती है. बहुत याद आती है घर की रसोई और मां के हाथ की रोटी-सब्जी. नथुने फड़कते हैं उस खुशबू को एक बार फिर पा लेने को, मगर वह दूर-दूर तक नहीं मिलती.

घर से दूर किसी अनजान शहर में पढ़ने या नौकरी करने के दौरान अक्सर बाहर के खाने से ही पेट भरना पड़ता है. बाहर के खाने से भूख तो मिट जाती है, मन नहीं भर पाता है. तृप्ति नहीं हो पाती है. मगर मजबूरी है, क्या कर सकते हैं? जीवित तो रहना है और उसके लिए खाना जरूरी है. इसलिए हम परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं.

ज्यादातर लोगों की राय है कि बाहर के खाने में स्वाद नहीं होता. सारी सब्जियां एक जैसे स्वाद वाली होती हैं. लेकिन फिर भी कभी-कभी बाहर ठेले इत्यादि पर खाना खाते हुए हमें कुछ ऐसा स्वादिष्ट मिल ही जाता है कि पेट और आत्मा दोनों तृप्त हो जाती हैं. जरूरत है तो बस थोड़ा एक्सप्लोर करने की. जगह-जगह का स्वाद चखने की.

दिल्ली में 70 से 80 प्रतिशत लोग दूसरे शहरों से रोजी-रोटी की तलाश में आते हैं. कितने ही युवा उच्च शिक्षा के लिए घर से दूर किराये का कमरा लेकर या निजी छात्रवासों में रहते हैं. उन्हें लगभग रोज ही बाहर से खरीदे हुए खाने से पेट भरना पड़ता है. लेकिन रोज-रोज होटलों या रेस्तरां के खर्चे उठाना संभव नहीं हो पाता. ऐसे में ठेले और ढाबे के खाने पर निर्भर होना ही पड़ता है, जहां 20 से 50 रुपए खर्च कर पेट भरना आसान होता है.

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घर से दूर रह रहे छात्रों या नौकरीपेशा युवाओं के लिए अच्छा और सस्ता खाना मिल पाना परेशानी का सबब है. खाना या तो खुद बनाना पड़ता हैं या खरीद कर खाना पड़ता हैं. अब खाना अच्छा भी हो और मंहगा भी न हो, तो आपकी ये दोनों इच्छाएं पूरी करते हैं दिल्ली के ठेलेवाले. चाहे पेट भरना हो या स्वाद के चटखारे लेने हो, कम पैसों में फास्ट फूड से लेकर खाने की थाली तक मिल जाती है इन ठेलेवालों के पास. राजमा-चावल , कढ़ी-चावल, मटर-कुलचे, आलू परांठा , पनीर परांठा या कचौरी-सब्जी दाम और स्वाद दोनों में घर से दूर युवाओं के लिए वरदान साबित होते हैं. बात करते हैं कुछ ऐसे ही ठेले और ढाबे वालों की, जिनका खाना स्वादिष्ट भी है और पेट व पॉकेट दोनों के अनुकूल भी.

ठेले, जिनके आगे लगते हैं मेले 

दिल्ली में खाने के कुछ ऐसे ठेले हैं जिनके आगे हमेशा ही भीड़ लगी रहती हैं. इनके खाने की खुशबू और जायका लोगों को खींच लाता हैं. ऑफिस में लंच टाइम होते ही इन ठेलों पर भीड़ जुट जाती है. परांठे का स्वाद, राजमा-चावल की खुश्बू, छोले-भठूरे का जायका, भूखे पेट होने पर तपती धूप में बारिश की बूंदों सा लगता है.

दक्षिणी दिल्ली में मूलचंद फ्लाईओवर के नीचे एक परांठे वाला सुबह के नौ बजे से रात के बारह बजे तक परांठे बेचता है. आलू का परांठा, पनीर का परांठा, प्याज का परांठा, गोभी का परांठा और न जाने किस-किस चीज के परांठे और स्वाद ऐसा कि भीड़ सुबह से शाम कैसे कर देती है, पता ही नहीं चलता.

कुछ यही हाल गणेश नगर में ‘चांदनी चौक के परांठे’ वाले ढाबे का है. बीस रुपए से साठ रुपए में आलू परांठा, पनीर परांठा, गोभी परांठा जैसी कई वैरायटी आपको मिल जाती हैं. गर्म परांठे पर मक्खन का एक टुकड़ा साथ में लाल-हरी चटनी, सोचते ही मुंह में पानी भर आता है. कभी-कभी परांठे के साथ दही और हरी मिर्च का आचार पेट के साथ-साथ मन भी भर देता है.

राजीव चौक से सटे शंकर मार्केट के राजमा चावल का स्वाद भी बेजोड़ है. आॅफिस में काम करनेवाले कर्मचारी लंच टाइम पर इस ठेले पर ऐसे टूटते हैं, कि बेचारा ठेलेवाला ग्राहकों की प्लेटें लगाते-लगाते पसीने से तरबतर हो जाता है. चटपट में सारा राजमा-चावल सफाचट हो जाते हैं. इसी तरह मूलचंद में संजय चूर-चूर नान वाले के नान का स्वाद खाने वाले पर अलग ही जादू चलाता है. तिलकनगर में रामछोले के छोले भठूरे हों या जंग बहादुर कचौरी वाले की प्याज कचौरी, ड्राई फ्रूट कचौरी या दाल कचौरी ही क्यों न हों, कम दाम में ये स्वाद का जबरदस्त तड़का लगाते हैं. वहीं बिहारी पर बनने वाला गरमा-गरम बाटी-चोखा बिहारी लोगों को ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश और दिल्ली वालों को भी खूब भाता है.

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झंडेवालान में सैकड़ों छोटे-बड़े औफिस हैं. वीडियोकौन टावर भी यहां है तो बहुत बड़ा साइकिल मार्केट भी है. कहने का मतलब यह है कि यहां अधिकारी वर्ग के साथ-साथ एक बहुत बड़ा मजदूर वर्ग भी है, जो दोपहर के खाने के लिए बाहर निकलता है. इस क्षेत्र में बड़े होटल या रेस्ट्रां नहीं हैं, मगर ठेलेवाले खूब हैं. जूस से लेकर बिरयानी तक यहां ठेले पर मिलती है. चालीस रुपये में थाली, जिसमें दाल, चावल, चार रोटी, दो तरह की सब्जी और सलाद पेट भरने के लिए काफी होते हैं. वहीं सत्तर रुपये में मुर्ग-कोरमा और रोटी का स्वाद तो गजब का है. नब्बे रुपये में भरपेट बिरयानी के साथ रायता, सलाद और हरी चटनी का स्वाद लेना हो तो झंडेवालान आ जाइये.

क्या है इनकी कमाई?

भले ही ये ठेलेवाले हैं, छोटा व्यवसाय करते हैं, लेकिन इनके ठेले से इनकी कमाई का अंदाजा लगाना मुश्किल है. देखने में मामूली से लगने वाले ठेले और ढाबे वाले भी महीने में हजारों-लाखों रुपये की कमाई करते हैं. एक अच्छी कंपनी में नौकरी करने वाला आदमी महीने के 20 से 25 हजार रुपये कमाता है, तो उसी कंपनी के सामने चाय और समोसे की थपरी लगाने वाला महीने के 70 से 80 हजार रुपए आराम से कमा लेता है.

लक्ष्मी नगर के मशहूर गणेश कचौरी वाले का कहना है कि वो माह के साठ से सत्तर हजार रुपए कमाता है. सुबह के ग्यारह बजे से रात के दस बजे तक उसके ठेले पर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती हैं. जिससे प्रतिदिन 3-5 हजार रुपए तक की कमाई हो जाती है. अपने आठ वर्कर्स को तनख्वाह देने के बाद भी उसके पास एक अच्छा अमाउंट बच जाता है. एक सर्वेक्षण के अनुसार, औसत स्ट्रीट फूड विक्रेता कम से कम अस्सी हजार रुपए प्रतिमाह कमा लेते हैं. दिल्ली का एक मशहूर छोले भठूरे वाला एक दिन में 500 प्लेटें छोले भठूरे बेचता है. जिसकी कमाई औसतन 1.5 लाख रुपए प्रतिमाह है.

आथारिटी क्या कहती हैं?

भारत में फूड सेफ्टी एंड स्टैण्डर्ड अथारिटी औफ़ इंडिया (एफएसएसएआई) ने स्ट्रीट फूड विक्रेताओं के लिए धारा 92 के तहत पंजीकरण कराने का प्रावधान है. जिसमें सभी फूड बिजनेस संचालकों, उत्पादकों, विक्रेताओं और वितरक को अधिनियम में सूचित प्रक्रियाओं के अनुसार कम से कम पंजीकरण कराना अनिवार्य किया गया है. फूड सेफ्टी एंड स्टैण्डर्ड अथॉरिटी यह सुनिश्चित करता है कि फूड उत्पादकों  या वितरकों या विक्रेताओं द्वारा उपभोक्ता तक पहुंचने वाले सभी भोज्य पदार्थ स्वास्थ्य और सुरक्षा के मापदंडों को पूरा करते हों.

स्ट्रीट फूड या ठेले और ढाबे के फूड विक्रताओं के लिए भी एफएसएसएआई  के अंतर्गत पंजीकरण कराना अनिवार्य है. आथारिटी के अनुसार, ठेले और ढाबे वालों के लिए भी सभी कच्ची खाद्य सामग्री को अधिनियम के शर्तों को पूरा करना होता हैं. जिससे स्वास्थ्य और सफाई का विशेष ध्यान रखा जा सके. अथारिटी समय-समय पर फूड सैंपल लेकर उनकी जांच भी करती है और मानक से कम पाए जाने पर दंडित भी करती है, अथवा उनका पंजीकरण निरस्त कर देती है.

साफ-सफाई जरूरी है

कोई भी व्यक्ति खाना ऐसी जगह से खाना चाहता है जहां उसे साफ-सफाई मिले, खाना हाइजेनिक हो और ठीक से पका हुआ हो. ग्राहकों की मन:स्थिति को भांपते हुए ठेलों पर साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है, तभी उनकी कमाई भी होती है. ज्यादातर ठेलेवाले इस बात का ध्यान रखते हैं कि खाना बनाने वाले बर्तन साफ और धुले हुए हों. खाने की प्लेटें ठीक से धुली हों. हाइजीन का ध्यान रखते हुए ज्यादातर ठेलेवाले पेपर प्लेट, प्लास्टिक चम्मच, थर्माकोल की कटोरियों आदि का इस्तेमाल करते हैं. नगर निगम भी इन ठेलों के आसपास सफाई के लिए सख्ती बरतता है, जिसके चलते हर ठेलेवाले को अपने ठेले के पास एक बड़ा ढक्कनवाला डस्टबिन रखना अनिवार्य है ताकि खाने के बाद जूठन और प्लेटे इत्यादि उसमें फेंकी जाएं.

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इस बात का भी ध्यान रखा जाना जरूरी हैं कि खाने में इस्तेमाल की जाने वाली कच्ची सामग्री और तेल-मसाले सही गुणवत्ता वाले हों. खाना बनाने में इस्तेमाल किया जाने वाला पानी साफ हो. अगर खाना कहीं और से या केटरिंग से बनकर आता हों तो वहां भी साफ-सफाई की व्यवस्था ठीक होनी चाहिए. साथ ही खाना बनाने वाले कर्मी भी सफाई का पूरा ध्यान रखें. एप्रन और हाथों में दस्ताने का इस्तेमाल करें. इसके लिए फूड कंट्रोल अथौरिटी और नगर निगम अधिकारियों के साथ-साथ ग्राहक को भी नजर रखनी चाहिए. आप कहीं भी गंदगी देखें या खाने को मानक से कम पायें तो इसकी शिकायत जरूर करें और ठेलेवाले को भी चेताएं कि उसकी शिकायत होगी. इस तरह आप भी एक तरह से नियंत्रक का कार्य करेंगे और ठेलेवाले भी मानक के अनुरूप ही खाना बनाएंगे. ठेले का खाना स्वादिष्ट और सेहतमंत हो सकता है, बशर्ते आप ऐसा ठेला चुनें जहां हाईजीन और स्वाद का पूरा ध्यान रखा जाता हो.

ऐसे बनाएं अपने काले घुटनों को गोरा

काली कुहनियां और घुटने देखने में बहुत ही गंदे लगते हैं. हाथ-पैर गोरे हों और घुटने काले, तो इस बदले स्‍किन टोन की वजह से लोगों का ध्‍यान तो जाएगा ही आप पर. अगर आपके पैर स्‍मूथ और गोरे हैं पर घुटने काले, तो अपनाइये यहां दिए गए कुछ असरदार टिप्‍स.

  • काले घुटनों को नारियल तेल से 5-8 मिनट तक के लिए मालिश करें और उसके बाद पानी से धो लें. चाहें तो नारियल तेल में दो बूंद नींबू की भी डाल सकती हैं.
  • दही एक ब्‍लीचिंग एजेंट होता है, जिसको आप सिरके के साथ मिला कर घुटनों को सफेद करने के लिए लगा सकते हैं.

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  • चीनी को बेकिंग सोडा के साथ मिक्‍स कर के अपने घुटनों और कोहनियों को चार मिनट तक के लिये रगड़े. इसके बाद त्‍वचा को 15 मिनट तक के लिए ऐसे ही छोड़ दें और बाद में पानी से धो कर बॉडी लोशन लगा लें.
  • रोजाना दो बार अपने घुटनों पर नींबू का रस लगाइये. चाहे तो सीधे नींबू के छिलके को ही 5 मिनट तक रगड़ लीजिये. रगडने के बाद इसको करीब 15-20 मिनट तक ऐसे ही छोड दीजिये और बाद में पैरों को धो लीहिये. नींबू लगाने से त्‍वचा रूखी हो जाती है इसलिए थोड़ी देर बाद मौस्‍चराइजर लगा लीजिये.
  • जब भी आप नहाएं तब लूफा या किसी स्‍क्रब से अपने घुटनों की स्‍क्रबिंग जरुर करें. इससे त्‍वचा साफ होगी और डेड स्‍किन हटेगी.

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  • दही को नींबू के रस में मिला कर अपने घुटनों को 10 मिनट तक के‍ लिए मालिश करें. उसके बाद इसको ऐसे ही कुछ देर तक लगा छोड दें और फिर सबसे पहले घुटनों को दूध से धोएं और फिर पानी से.
  • सरसों के तेल को नारियल के तेल के साथ मिक्‍स कर के अपने घुटनों पर लगा कर मालिश करें, इससे घुटने सफेद हो जाएंगे.
  • बादाम या नारियल तेल को चीनी और शहद के साथ मिला कर अपने घुटनों पर 15 मिनट तक लगा रहने दें. और धोते समय स्‍क्रब करें .
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