भगवान के अस्तित्व को ले कर धर्म के ठेकेदार तरहतरह की मनगढ़ंत बातें करते हैं ताकि उन की मुफ्त की रोटी चल सके. आश्चर्य तो तब होता है जब पढ़ेलिखे लोग भी धर्म के इन ठेकेदारों की चिकनीचुपड़ी बातों में आ जाते हैं और अदृश्य भगवान को अपनी जिंदगी का सहारा मान कर अपनी मेहनत की कमाई लुटा देते हैं. प्रस्तुत है, अंधविश्वास को उजागर करता जगत यादव का यह लेख.

विश्व के किसी भी कोने में जाइए, लगभग हर जगह मानव समाज किसी न किसी भगवान से जकड़ा हुआ है. मानव जब पाषाण युग में था तब कोई भगवान नहीं था. सब को अपना भोजन खुद जुटाना पड़ता था. प्रकृति का पहला नियम जीवित रहने के लिए अपना पेट भरना है. यह सच भी है क्योंकि प्रकृति का हर प्राणी रातदिन स्वयं का पेट भरने में जुटा रहता है. यह प्रक्रिया सतत चलती रहती है.

बस, इसी पेट भरने की इच्छा ने ‘भगवान’ की उत्पत्ति की है. पाषाण युग के पश्चात मानव व्यवस्थित होने लगा. तब उस के सामने भोजन की बड़ी समस्या थी, कठोर परिश्रम करना पड़ता था. हर कोई इस में सक्षम हो, ऐसा नहीं था. प्रकृति में मानव ही ऐसा जीव है जो अपनी बुद्धि का विकास कर सकता है. एक मेहनत करे और दूसरा बैठेबैठे खाए वह भी जीवन भर.

धूर्त, खुदगर्ज, कामचोर और ठग प्रवृत्ति वालों ने भगवान की उत्पत्ति कर सरल, सीधे लोगों को डराधमका कर ईश्वरीय शक्ति (इन के द्वारा प्रदत्त) को मानने को विवश किया ताकि वे बिना मेहनत के भोजन व सम्मान के अधिकारी बने रहें. इन के अनुसार प्रकृति की हर घटना भगवान की लीला है चाहे भूकंप आए, आंधीतूफान आए, बाढ़ आए या बीमारी.

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