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Hindi Love Stories : कायर – क्यों श्रेया ने श्रवण को छोड़ राजीव से विवाह कर लिया?

Hindi Love Stories : श्रेया के आगे खड़ी महिला जैसे ही अपना बोर्डिंग पास ले कर मुड़ी श्रेया चौंक पड़ी. बोली, ‘‘अरे तन्वी तू…तो तू भी दिल्ली जा रही है… मैं अभी बोर्डिंग पास ले कर आती हूं.’’

उन की बातें सुन कर काउंटर पर खड़ी लड़की मुसकराई, ‘‘आप दोनों को साथ की सीटें दे दी हैं. हैव ए नाइस टाइम.’’ धन्यवाद कह श्रेया इंतजार करती तन्वी के पास आई.

‘‘चल आराम से बैठ कर बातें करते हैं,’’ तन्वी ने कहा. हौल में बहुत भीड़ थी. कहींकहीं एक कुरसी खाली थी. उन दोनों को असहाय से एकसाथ 2 खाली कुरसियां ढूंढ़ते देख कर खाली कुरसी के बराबर बैठा एक भद्र पुरुष उठ खड़ा हुआ. बोला, ‘‘बैठिए.’’ ‘‘हाऊ शिवैलरस,’’ तन्वी बैठते हुए बोली, ‘‘लगता है शिवैलरी अभी लुप्त नहीं हुई है.’’

‘‘यह तो तुझे ही मालूम होगा श्रेया…तू ही हमेशा शिवैलरी के कसीदे पढ़ा करती थी,’’ तन्वी हंसी, ‘‘खैर, छोड़ ये सब, यह बता तू यहां कैसे?’’‘‘क्योंकि मेरा घर यानी आशियाना यहीं है, दिल्ली तो एक शादी में जा रही हूं.’’ ‘‘अजब इत्तफाक है. मैं एक शादी में यहां आई थी और अब अपने आशियाने में वापस दिल्ली जा रही हूं.’’

‘‘मगर जीजू तो सिंगापुर में सैटल्ड थे?’’ ‘‘हां, सर्विस कौंट्रैक्ट खत्म होने पर वापस दिल्ली आ गए. नौकरी के लिए भले ही कहीं भी चले जाएं, दिल्ली वाले सैटल कहीं और नहीं हो सकते.’’ ‘‘वैसे हूं तो मैं भी दिल्ली की, मगर अब भोपाल छेड़ कर कहीं और नहीं रह सकती.’’

‘‘लेकिन मेरी शादी के समय तो तेरा भी दिल्ली में सैटल होना पक्का ही था,’’ श्रेया ने उसांस भरी. ‘‘हां, था तो पक्का ही, मगर मैं ने ही पूरा नहीं होने दिया और उस का मुझे कोई अफसोस भी नहीं है. अफसोस है तो बस इतना कि मैं ने दिल्ली में सैटल होने का मूर्खतापूर्ण फैसला कैसे कर लिया था.’’

‘‘माना कि कई खामियां हैं दिल्ली में, लेकिन भई इतनी बुरी भी नहीं है हमारी दिल्ली कि वहां रहने की सोचने तक को बेवकूफी माना जाए,’’ तन्वी आहत स्वर में बोली.

‘‘मुझे दिल्ली से कोई शिकायत नहीं है तन्वी,’’ श्रेया खिसिया कर बोली, ‘‘दिल्ली तो मेरी भी उतनी ही है जितनी तेरी. मेरा मायका है. अत: अकसर जाती रहती हूं वहां. अफसोस है तो अपनी उस पसंद पर जिस के साथ दिल्ली में बसने जा रही थी.’’

तन्वी ने चौंक कर उस की ओर देखा. फिर कुछ हिचकते हुए बोली, ‘‘तू कहीं श्रवण की बात तो नहीं कर रही?’’ श्रेया ने उस की ओर उदास नजरों से देखा. फिर पूछा, ‘‘तुझे याद है उस का नाम?’’

‘‘नाम ही नहीं उस से जुड़े सब अफसाने भी जो तू सुनाया करती थी. उन से तो यह पक्का था कि श्रवण वाज ए जैंटलमैन, ए थौरो जैंटलमैन टु बी ऐग्जैक्ट. फिर उस ने ऐसा क्या कर दिया कि तुझे उस से प्यार करने का अफसोस हो रहा है? वैसे जितना मैं श्रवण को जानती हूं उस से मुझे यकीन है कि श्रवण ने कोई गलत काम नहीं किया होगा जैसे किसी और से प्यार या तेरे से जोरजबरदस्ती?’’

श्रेया ने मुंह बिचकाया, ‘‘अरे नहीं, ऐसा सोचने की तो उस में हिम्मत ही नहीं थी.’’‘‘तो फिर क्या दहेज की मांग करी थी उस ने?’’ ‘‘वहां तक तो बात ही नहीं पहुंची. उस से पहले ही उस का असली चेहरा दिख गया और मैं ने उस से किनारा कर लिया,’’ श्रेया ने फिर गहरी सांस खींची, ‘‘कुछ और उलटीसीधी अटकल लगाने से पहले पूरी बात सुनना चाहेगी?’’

‘‘जरूर, बशर्ते कोई ऐसी व्यक्तिगत बात न हो जिसे बताने में तुझे कोई संकोच हो.’’ ‘‘संकोच वाली तो खैर कोई बात ही नहीं है, समझने की बात है जो तू ही समझ सकती है, क्योंकि तूने अभीअभी कहा कि मैं शिवैलरी के कसीदे पढ़ा करती थी…’’

इसी बीच फ्लाइट के आधा घंटा लेट होने की घोषणा हुई. ‘‘अब टुकड़ों में बात करने के बजाय श्रेया पूरी कहानी ही सुना दे.’’‘‘मेरा श्रवण की तरफ झुकाव उस के शालीन व्यवहार से प्रभावित हो कर हुआ था. अकसर लाइबेरी में वह ऊंची शैल्फ से मेरी किताबें निकालने और रखने में बगैर कहे मदद करता था. प्यार कब और कैसे हो गया पता ही नहीं चला. चूंकि हम एक ही बिरादरी और स्तर के थे, इसलिए श्रवण का कहना था कि सही समय पर सही तरीके से घर वालों को बताएंगे तो शादी में कोई रुकावट नहीं आएगी. मगर किसी और ने चुगली कर दी तो मुश्किल होगी. हम संभल कर रहेंगे.

प्यार के जज्बे को दिल में समेटे रखना तो आसान नहीं होता. अत: मैं तुझे सब बताया करती थी. फाइनल परीक्षा के बाद श्रवण के कहने पर मैं ने उस के साथ फर्नीचर डिजाइनिंग का कोर्स जौइन किया था. साउथ इंस्टिट्यूट मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं था.

श्रवण पहले मुझे पैदल मेरे घर छोड़ने आता था. फिर वापस जा कर अपनी बाइक ले कर अपने घर जाता था. मुझे छोड़ने घर से गाड़ी आती थी. लेने भी आ सकती थी लेकिन वन वे की वजह से उसे लंबा चक्कर लगाना पड़ता. अत: मैं ने कह दिया  था कि नजदीक रहने वाले सहपाठी के साथ पैदल आ जाती हूं. यह तो बस मुझे ही पता था कि बेचारा सहपाठी मेरी वजह से डबल पैदल चलता था. मगर बाइक पर वह मुझे मेरी बदनामी के डर से नहीं बैठाता था. मैं उस की इन्हीं बातों पर मुग्ध थी.

वैसे और सब भी अनुकूल ही था. हम दोनों ने ही इंटीरियर डैकोरेशन का कोर्स किया. श्रवण के पिता फरनिशिंग का बड़ा शोरूम खोलने वाले थे, जिसे हम दोनों को संभालना था. श्रवण का कहना था कि रिजल्ट निकलने के तुरंत बाद वह अपनी भाभी से मुझे मिलवाएगा और फिर भाभी मेरे घर वालों से मिल कर कैसे क्या करना है तय कर लेंगी.

लेकिन उस से पहले ही मेरी मामी मेरे लिए अपने भानजे राजीव का रिश्ता ले कर आ गईं. राजीव आर्किटैक्ट था और ऐसी लड़की चाहता था, जो उस के व्यवसाय में हाथ बंटा सके. मामी द्वारा दिया गया मेरा विवरण राजीव को बहुत पसंद आया और उस ने मामी से तुरंत रिश्ता करवाने को कहा.

‘‘मामी का कहना था कि नवाबों के शहर भोपाल में श्रेया को अपनी कला के पारखी मिलेंगे और वह खूब तरक्की करेगी. मामी के जाने के बाद मैं ने मां से कहा कि दिल्ली जितने कलापारखी और दिलवाले कहीं और नहीं मिलेंगे. अत: मेरे लिए तो दिल्ली में रहना ही ठीक होगा. मां बोलीं कि वह स्वयं भी मुझे दिल्ली में ही ब्याहना चाहेंगी, लेकिन दिल्ली में राजीव जैसा उपयुक्त वर भी तो मिलना चाहिए. तब मैं ने उन्हें श्रवण के बारे में सब बताया. मां ने कहा कि मैं श्रवण को उन से मिलवा दूं. अगर उन्हें लड़का जंचा तो वे पापा से बात करेंगी.

‘‘दोपहर में पड़ोस में एक फंक्शन था. वहां जाने से पहले मां ने मेरे गले में सोने की चेन पहना दी थी. मुझे भी पहननी अच्छी लगी और इंस्टिट्यूट जाते हुए मैं ने चेन उतारी नहीं. शाम को जब श्रवण रोज की तरह मुझे छोड़ने आ रहा था तो मैं ने उसे सारी बात बताई और अगले दिन अपने घर आने को कहा.

‘‘कल क्यों, अभी क्यों नहीं? अगर तुम्हारी मम्मी कहेंगी तो तुम्हारे पापा से मिलने के लिए भी रुक जाऊंगा,’’ श्रवण ने उतावली से कहा.‘‘तुम्हारी बाइक तो डिजाइनिंग इंस्टिट्यूट में खड़ी है.’’‘‘खड़ी रहने दो, तुम्हारे घर वालों से मिलने के बाद जा कर उठा लूंगा.’’‘‘तब तक अगर कोई और ले गया तो? अभी जा कर ले आओ न.’’‘‘ले जाने दो, अभी तो मेरे लिए तुम्हारे मम्मीपापा से मिलना ज्यादा जरूरी है.’’

सुन कर मैं भावविभोर हो गई और मैं ने देखा नहीं कि बिलकुल करीब 2 गुंडे चल रहे थे, जिन्होंने मौका लगते ही मेरे गले से चेन खींच ली. इस छीनाझपटी में मैं चिल्लाई और नीचे गिर गई. लेकिन मेरे साथ चलते श्रवण ने मुझे बचाने की कोई कोशिश नहीं करी. मेरा चिल्लाना सुन कर जब लोग इकट्ठे हुए और किसी ने मुझे सहारा दे कर उठाया तब भी वह मूकदर्शक बना देखता रहा और जब लोगों ने पूछा कि क्या मैं अकेली हूं तो मैं ने बड़ी आस से श्रवण की ओर देखा, लेकिन उस के चेहरे पर पहचान का कोई भाव नहीं था.

एक प्रौढ दंपती के कहने पर कि चलो हम तुम्हें तुम्हारे घर पहुंचा दें, श्रवण तुरंत वहां से चलता बना. अब तू ही बता, एक कायर को शिवैलरस हीरो समझ कर उस की शिवैलरी के कसीदे पढ़ने के लिए मैं भला खुद को कैसे माफ कर सकती हूं? राजीव के साथ मैं बहुत खुश हूं. पूर्णतया संतुष्ट पर जबतब खासकर जब राजीव मेरी दूरदर्शिता और बुद्धिमता की तारीफ करते हैं, तो मुझे बहुत ग्लानि होती है और यह मूर्खता मुझे बुरी तरह कचोटती है.’’

‘‘इस हादसे के बाद श्रवण ने तुझ से संपर्क नहीं किया?’’‘‘कैसे करता क्योंकि अगले दिन से मैं ने डिजाइनिंग इंस्टिट्यूट जाना ही छोड़ दिया. उस जमाने में मोबाइल तो थे नहीं और घर का नंबर उस ने कभी लिया ही नहीं था. मां के पूछने पर कि मैं अपनी पसंद के लड़के से उन्हें कब मिलवाऊंगी, मैं ने कहा कि मैं तो मजाक कर रही थी. मां ने आश्वस्त हो कर पापा को राजीव से रिश्ता पक्का करने को कह दिया. राजीव के घर वालों को शादी की बहुत जल्दी थी. अत: रिजल्ट आने से पहले ही हमारी शादी भी हो गई. आज तुझ से बात कर के दिल से एक बोझ सा हट गया तन्वी. लगता है अब आगे की जिंदगी इतमीनान से जी सकूंगी वरना सब कुछ होते हुए भी, अपनी मूर्खता की फांस हमेशा कचोटती रहती थी.’’

तभी यात्रियों को सुरक्षा जांच के लिए बुला लिया गया. प्लेन में बैठ कर श्रेया ने कहा, ‘‘मेरा तो पूरा कच्चा चिट्ठा सुन लिया पर अपने बारे में तो तूने कुछ बताया ही नहीं.’’‘‘दिल्ली से एक अखबार निकलता है दैनिक सुप्रभात…’’‘‘दैनिक सुप्रभात तो दशकों से हमारे घर में आता है,’’ श्रेया बीच में ही बोली, ‘‘अभी भी दिल्ली जाने पर बड़े शौक से पढ़ती हूं खासकर ‘हस्तियां’ वाला पन्ना.’’

‘‘अच्छा. सुप्रभात मेरे दादा ससुर ने आरंभ किया था. अब मैं अपने पति के साथ उसे चलाती हूं. ‘हस्तियां’ स्तंभ मेरा ही विभाग है.’’‘‘हस्तियों की तसवीर क्यों नहीं छापते आप लोग?’’‘‘यह तो पापा को ही मालूम होगा जिन्होंने यह स्तंभ शुरू किया था. यह बता मेरे घर कब आएगी, तुझे हस्तियों के पुराने संकलन भी दे दूंगी.’’‘‘शादी के बाद अगर फुरसत मिली तो जरूर आऊंगी वरना अगली बार तो पक्का… मेरा भोपाल का पता ले ले. संकलन वहां भेज देना.’’‘‘मुझे तेरा यहां का घर मालूम है, तेरे जाने से पहले वहीं भिजवा दूंगी.’’

दिल्ली आ कर श्रेया बड़ी बहन के बेटे की शादी में व्यस्त हो गई. जिस शाम को उसे वापस जाना था, उस रोज सुबह उसे तन्वी का भेजा पैकेट मिला. तभी उस का छोटा भाई भी आ गया और बोला, ‘‘हम सभी दिल्ली में हैं, आप ही भोपाल जा बसी हैं. कितना अच्छा होता दीदी अगर पापा आप के लिए भी कोई दिल्ली वाला लड़का ही देखते या आप ने ही कोई पसंद कर लिया होता. आप तो सहशिक्षा में पढ़ी थीं.’’

सुनते ही श्रेया का मुंह कसैला सा हो गया. तन्वी से बात करने के बाद दूर हुआ अवसाद जैसे फिर लौट आया. उस ने ध्यान बंटाने के लिए तन्वी का भेजा लिफाफा खोला ‘हस्तियां’ वाले पहले पृष्ठ पर ही उस की नजर अटक गई, ‘श्रवण कुमार अपने शहर के जानेमाने सफल व्यवसायी और समाजसेवी हैं. जरूरतमंदों की सहायता करना इन का कर्तव्य है. अपनी आयु और जान की परवाह किए बगैर इन्होंने जवान मनचलों से एक युवती की रक्षा की जिस में गंभीर रूप से घायल होने पर अस्पताल में भी रहना पड़ा. लेकिन अहं और अभिमान से यह सर्वथा अछूते हैं.’

हमारे प्रतिनिधि के पूछने पर कि उन्होंने अपनी जान जोखिम में क्यों डाली, उन की एक आवाज पर मंदिर के पुजारी व अन्य लोग लड़नेमरने को तैयार हो जाते तो उन्होंने बड़ी सादगी से कहा, ‘‘इतना सोचने का समय ही कहां था और सच बताऊं तो यह करने के बाद मुझे बहुत शांति मिली है. कई दशक पहले एक ऐसा हादसा मेरी मित्र और सहपाठिन के साथ हुआ था. चाहते हुए भी मैं उस की मदद नहीं कर सका था. एक अनजान मूकदर्शक की तरह सब देखता रहा था. मैं नहीं चाहता था कि किसी को पता चले कि वह मेरे साथ थी और उस का नाम मेरे से जुडे़ और बेकार में उस की बदनामी हो.

‘‘मुझे चुपचाप वहां से खिसकते देख कर उस ने जिस तरह से होंठ सिकोड़े थे मैं समझ गया था कि वह कह रही थी कायर. तब मैं खुद की नजरों में ही गिर गया और सोचने लगा कि क्या मैं उसे बदनामी से बचाने के लिए चुप रहा या सच में ही मैं कायर हूं? जाहिर है उस के बाद उस ने मुझ से कभी संपर्क नहीं किया. मैं यह जानता हूं कि वह जीवन में बहुत सुखी और सफल है. सफल और संपन्न तो मैं भी हूं बस अपनी कायरता के बारे में सोच कर ही दुखी रहता था पर आज इस अनजान युवती को बचाने के बाद लग रहा है कि मैं कायर नहीं हूं…’’

श्रेया और नहीं पढ़ सकी. एक अजीब सी संतुष्टि की अनुभूति में वह यह भी भूल गई कि उसे सुकून देने को ही तन्वी ने ‘हस्तियां’ कालम के संकलन भेजे थे और एक मनगढ़ंत कहानी छापना तन्वी के लिए मुश्किल नहीं था. Hindi Love Stories

Romantic Story In Hindi : सुबह होती है, शाम होती है

Romantic Story In Hindi : ‘‘आजफिर देर हो गई औफिस में?’’ आशिमा ने रोहन से पूछा.

‘‘हां…,’’ रोहन सिर्फ इतना बोला.

फिर आशिमा डाइनिंग टेबल पर खाना लगाने चल दी और रोहन हाथमुंह धो कर टीवी के सामने बैठ गया. इतनी संक्षिप्त बातचीत देख कर कौन कह सकता था इन की शादी को मात्र 2 वर्ष ही बीते थे. दोनों का दिन का सारा समय औफिस के काम बीतता था और जब घर लौट कर आते थे तो भी दोनों अपनेअपने लैपटौप पर ही व्यस्त रहते थे. शुरूशुरू में एकदूसरे के दफ्तर के कामकाज व कार्यप्रणाली पर दोनों में कुछ देर बातचीत हो जाया करती थी पर अब यह भी नहीं होता. एक दिन औफिस में आशिमा अपने कार्य में व्यस्त थी कि सैलफोन घनघना उठा. उस ने स्क्रीन पर पुरानी सहेली रिया का नाम देखा तो लपक कर फोन उठाया.

‘‘और भई, हाऊ इज लाइफ?’’ रिया पूरे उत्साह से बात कर रही थी.

‘‘कूल,’’ आशिमा को शायद संक्षिप्त बात करने की आदत हो गई थी.

‘‘कूल या फिर हौट?’’ रिया ने मजाकिया अंदाज में उसे छेड़ा.

‘‘अरे, क्या हौट यार. अपनीअपनी नौकरी में दोनों व्यस्त रहते हैं. आजकल तो फिल्म देखने भी नहीं जाते.’’

‘‘आशिमा, तेरी आवाज में वह बात नहीं. यार कोई बात हुई है क्या रोहन के साथ?’’ रिया पुरानी सहेली थी, आशिमा की सुस्ती को फौरन भांप गई.

‘‘नहींनहीं, ऐसा कुछ नहीं,’’ आशिमा बोली.

‘‘तो ठीक है. मैं इस वीकैंड का प्रोग्राम बना रही हूं. उस दिन सुबह 10 बजे मिलते हैं और कहीं घूमने चलते हैं.’’

आशिमा ने देर रात जब रोहन घर लौटा तो उसे रिया से मुलाकात का प्रोग्राम बताया और बोली, ‘‘तुम भी चलो न. शनिवार को तो छुट्टी है न तुम्हारी. काफी दिनों से हम कहीं गए भी नहीं हैं.’’

‘‘नहीं आशिमा इस शनिवार शायद औफिस जाना पड़ेगा.’’

‘‘तो फिर मैं रिया से मिलने का प्रोग्राम इतवार का रख लेती हूं.’’

‘‘एक दिन तो मिलेगा छुट्टी का. उस दिन मैं जी भर कर सोऊंगा. तुम अपना प्रोग्राम मेरी वजह से मत खराब करो. वैसे भी तुम्हारी सहेली है, तुम्हीं मिल आओ,’’ कह कर रोहन अपने लैपटौप पर व्यस्त हो गया. उस का रोज का यही नियम था. खाना खातेखाते डाइनिंग टेबल पर लैपटौप पर कुछ काम निबटाना और फिर टीवी में खो जाना. साढे़ 11 बजे तक आशिमा साथ बैठी टीवी पर कुछ न कुछ देखती रही. फिर वह गुडनाइट कह कर सोने चल दी.

‘‘गुडनाइट. तुम सो जाओ, तुम्हें सुबह जल्दी उठना है. मैं यह प्रोग्राम देख कर आऊंगा.’’ बिस्तर पर अकेली लेटी आशिमा अपनी शादीशुदा जिंदगी को रिवाइंड करने लगी. दोनों परिवारों ने अपने रिश्तेदारों की सहायता से रिश्ता तय किया था. पूर्णतया अजनबी होते हुए भी 2-3 मुलाकातों में ही आशिमा और रोहन एकदूसरे को पसंद करने लगे थे. दोनों की जोड़ी देखने में जितनी सुंदर लगती थी, उतनी ही दोनों के स्वभाव में भी एकरसता थी. कोर्टशिप पीरियड को दोनों ने जी भर कर ऐंजौय किया था. फिल्में देखना, मौल में शौपिंग, सैरसपाटा और बचपन से ले कर आज तक की ढेर सारी बातें. कितने मधुर दिन थे वे. अब लगता है जैसे सारी बातें तभी खत्म कर दी थीं दोनों ने. शादी के बाद कुछ महीनों तक दोनों औफिस से टाइम पर घर लौट आते. कभी दोस्तों के यहां घूम आते, तो कभी यों ही लौंग ड्राइव पर सैर को निकल जाते. और तो और सब्जी या ग्रौसरी खरीदना भी एक ऐडवैंचर सा लगता था. धीरेधीरे यही काम जिम्मेदारी लगने लगे और फिर मंदी की मार में अपनी जौब बचाए रखना एक कठिन लक्ष्य बन गया. काम और सिर्फ काम. केवल औफिस का काम ही जीवन बन कर रह गया. ‘काम’ शब्द का एक और अर्थ होता है जिसे वे जैसे भूल से गए थे. हर रात थक कर ऐसे बिस्तर पर पड़ते थे कि कब सुबह हुई पता ही नहीं चलता था. बस, समय की सूइयों ने भागभाग कर शादी के 2 साल पूरे कर डाले थे. अब तो महानगर की जिंदगी की भागदौड़, परेशानियां और स्ट्रैस से निबटना ही सुबह से रात तक का टारगेट होता था. शनिवार की शाम रिया के साथ बिता कर आशिमा एक बार फिर फै्रश हो गई. हंसीमजाक और टांगखिंचाई से पुरानी यादें ताजा हो आईं.

रात उस ने डिनर में रोहन की पसंदीदा डिश बनाई. उसे चहकता देख कर रोहन भी खुश था और काफी समय बाद आज रात दोनों ने एकदूसरे को जी भर कर प्यार किया, केवल खानापूर्ति नहीं की. इस से आशिमा को लगा कि जीवन में खुशहाली लाते रहने के लिए दोस्तों से मिलनाजुलना कितना जरूरी है. उस ने इस बात पर गौर किया और ठाना ही था कि वह पुराने दोस्तों से एक बार फिर तार जोड़ेगी कि एक दिन अचानक उस की फेसबुक पर अपने कालेज के दोस्तों मनमीत से मुलाकात हो गई. फिर फेसबुक पर दोनों ने चैटिंग की और मिलने का प्रोग्राम बनाया. घर लौट कर वह रोहन से भी यह खुशी बांटना चाहती थी, किंतु रोज की तरह रोहन फिर इतनी देर से आया कि आशिमा पर थकान व नींद हावी हो चुकी थी. एक शाम दफ्तर से निकलते समय आशिमा ने मनमीत को गेट पर खड़ा पाया.

‘‘ओह, व्हाटए सरप्राइज,’’ कह वह उछल पड़ी.

‘‘मैं ने सोचा तुम बस प्रोग्राम ही बनाती रहोगी, इसलिए मैं आज ही चला आया.’’

मनमीत बातचीत में बेबाक व मस्त था. कालेज में भी वह जिस महफिल में जाता, समां बांध देता. यथा नाम तथा गुण.

‘‘अरे सुनाओ, कैसी चल रही है शादीशुदा जिंदगी?’’ आशिना के साथ एक रैस्टोरैंट के कोने में बैठ मनमीत ने पूछा.

‘‘चल नहीं, दौड़ रही है. हम तो बस पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं. देखो न पता भी नहीं चला कब 2 साल बीत गए,’’ आशिमा अपने दोस्त से मन की बातें बांटने लगी, ‘‘सच कहूं तो मनमीत, इतने बिजी रहते हैं हम दोनों कि एकदूसरे के लिए, अपनी भावनाओं के लिए समय ही नहीं है हमारे पास. और दुख तो इस बात का है कि दोष किसे दूं यह भी समझ नहीं आता.’’

‘‘चलो, कोई बात नहीं. इस में दिल क्यों छोटा करती हो? दोस्त कब काम आएंगे?’’ मनमीत के दिलासे पर आशिमा खुश हो गई और अपनी सहूलत अनुसार दोनों ने अगली मुलाकात में फिल्म देखने का प्रोग्राम बनाया.

उस शाम आशिमा फिर चहक रही थी. रोहन के घर में घुसते ही वह मनमीत से मुलाकात का पूरा वाकेआ तसल्ली से बयान करने लगी. रोहन भी खुश हो गया आशिमा को इतना खुश देख कर. कभीकभी रोजमर्रा की जिंदगी हमारी खुशियों की कीमत मांगने लगती है. यही तो हो रहा था आशिमा और रोहन के साथ एकदूसरे से प्यार करते हुए भी, एकसाथ एक छत के नीचे रहते हुए भी दोनों कितने अकेले जीने लगे थे.

‘‘रोहन, तुम भी चलो न मूवी देखने. मैं और मनमीत अगले वीकैंड का प्रोग्राम बना रहे हैं,’’ रोहन का उस पर विश्वास और उस के जरा भी शक्की स्वभाव न होने के कारण ही आशिमा अपना हर प्रोग्राम बेझिझक उसे बता देती थी.’’

‘‘अगले वीकैंड…,’’ कुछ सोचते हुए रोहन बोला, ‘‘सौरी आशिमा, अगले शुक्रवार तो मुझे टूर पर अहमदाबाद जाना होगा. 3-4 दिन लग जाएंगे वहां पर,’’ फिर आगे कहने लगा, ‘‘लेकिन तुम मूवी देख आओ अपने फै्रंड के साथ कालेज की मस्ती भरी यादें ताजा हो जा जाएंगी.’’

फिर  समय बीतता गया और शानिवार आ गया. मनमीत पहले से उस का इंतजार कर रहा था. वाकई कालेज के दिनों की यादों में आज भी वह शक्ति थी कि सुस्ती भरे जीवन में स्फूर्ति भर दे. दोनों ने फिल्म देखी, जी भर कर बातें कीं और डिनर के बाद मनमीत आशिमा को घर छोड़ गया. धीरेधीरे आशिमा और मनमीत अकसर मिलने लगे. इन मुलाकातों का श्रेय मनमीत को जाता, क्योंकि प्रोग्राम वही बनाता. आशिमा को उस के दफ्तर से लेता और बाद में उसे घर भी छोड़ता. 1-2 बार रोहन से भी मुलाकात हुई मनमीत की. इस बार फिर रोहन काम के सिलसिले में कई दिनों के लिए शहर से बाहर गया हुआ था. और मनमीत आशिमा को घर छोड़ने आया था. आशिमा दोनों के लिए चाय बना कर लाई तो उस ने मनमीत चेहरे पर अजीब से असमंजस व परेशानी के भाव पढ़े

‘अरे, अभी शाम को तो ठीक था इस का मूड अचानक क्या हो गया? क्या मेरी कोई बात बुरी लग गई?’ आशिमा विचार करने लगी. फिर चाय देते हुए पूछ ही बैठी, ‘‘क्या हुआ मनमीत, किन खयालों ने आ घेरा?’’

‘‘सुबह होती है, शाम होती है, उम्र यों ही तमाम होती है,’’ गंभीर भाव से मनमीत बुदबुदाया.

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘तुम मेरे साथ खुश रहती हो न, आशिमा?’’ उस के इस अटपटे प्रश्न से आशिमा अचंभित थी.

‘‘हां, क्यों? ऐसे क्यों पूछ रहे हो?’’

‘‘मैं…मैं…आज से नहीं बल्कि कालेज के दिनों से…मुझे गलत मत समझना.’’

‘‘समझूंगी तो तब जब कुछ बोलोगे,’’ आशिमा बेफिक्री से हंस कर बोली.

‘‘आशिमा, मैं देख रहा हूं कि रोहन केवल अपने काम में मशगूल रहता है. तुम्हें तो वह समय ही नहीं देता. तुम्हारी शादी को महज 2 साल हुए हैं और तुम दोनों बासी हो गए एकदूसरे के लिए. ऐसे जिंदगी बरबाद करना क्या उचित है? एक तरफ रोहन के साथ यह घिसीपिटी जिंदगी और दूसरी तरफ मेरे साथ पूरी मौजमस्ती भरा जीवन,’’ मनमीत अपनी बात पूरी भूमिका के साथ कह रहा था.

‘‘इसीलिए तो दोस्त होते हैं, डियर,’’ आशिमा अब भी मनमीत की बात के आशय से अनभिज्ञ थी.

‘‘तुम शायद समझीं नहीं,’’ मनमीत कुछ सोचने लगा. फिर एकबारगी हिम्मत जुटा कर बोला,’’ मैं तुम्हें चाहता हूं, आशिमा. मैं यह जीवन तुम्हारे साथ, तुम्हारी खिलखिलाती हंसी के साथ, तुम्हारी जीवंत आंखों के साथ, तुम्हारे नेकदिल के साथ गुजारना चाहता हूं.’’ चाय का घूट आशिमा के गले में अटक गया. खांसी का दौरा पड़ गया उसे. आंखों से पानी बहने लगा. उस की यह हालत देख कर मनमीत दौड़ कर रसोई से पानी का गिलास लाया. पर तब तक आशिमा ने स्वयं को संभाल लिया था. उस ने पानी पीने से इनकार कर दिया. एक अजीब सी चुप्पी तैर गई कमरे की हवा में. दोनों नीचे नजरें किए बैठे रहे कुछ देर. फिर आशिमा अचानक खड़ी हो गई और बोली, ‘‘बहुत रात हो चुकी है, मनमीत, तुम अपने घर जाओ.’’

मनमीत चुपचाप चला गया. उस के जाने के बाद आशिमा फूटफूट कर रोने लगी. कुछ मनमीत की बात पर नाराजगी, कुछ ऐसी बात करने की उस की हिम्मत पर गुस्सा, अचानक रोहन की याद और आज एक अच्छा मित्र छूट जाने का गम. वह सोचती जा रही थी कि उस की किस बात से मनमीत ने यह निष्कर्ष निकाल लिया होगा कि वह रोहन के साथ खुश नहीं है? ऐसी बात कर के उस ने हमेशा के लिए अपनी देस्त खो दी थी. आशिमा फिर उदास हो गई और इस बार पहले से कहीं अधिक. 2 दिन बाद रोहन के लौटने पर भी वह खुश न हुई. सब कार्य यथावत कर रही थी किंतु उस के चेहरे पर फैली उदासी को रोहन ने फौरन भांप लिया. ‘‘क्या बात है आशिमा, ऐसे चुपचुप क्यों हो?’’ उसे बांहों में भरते हुए जैसे ही रोहन ने पूछा कि उस की भावनाओं का बांध टूट गया. वह बिलखबिलख कर रो पड़ी. रोहन घबरा गया. असमंजस में था कि आशिमा को हुआ क्या? बहलाफुसला कर उस ने आशिमा को चुप कराया, पानी पिलाया, बिस्तर पर बैठाया. शांत होने पर आशिमा ने सारी बात रोहन को बताई. उस की बात सुन कर रोहन भी गंभीर हो गया.

‘‘मुझे क्या पता था कि मेरी साफसुथरी  दोस्ती को मनमीत ऐसा रुख दे देगा. मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि वह मेरे बारे में ऐसे विचार पाले हुए है,’’ आशिमा अब भी मनमीत की बात से परेशान थी.

‘‘ इस में गलती मनमीत की कम और मेरी ज्यादा है,’’ रोहन की इस बात पर आशिमा हतप्रभ हो उस का मुंह देखने लगी. फिर, ‘‘क्या मतलब?’’ उस ने पूछा.

‘‘मानो न मानो आशिमा, मनमीत ने हमारी जिंदगी में पसर चुकी रोजमर्रा की उबासी को सही पकड़ा. यदि हमारे जीवन में ताजगी होती तो वह ऐसी बात कभी न सोचता. हो सकता है वह कालेज के दिनों में तुम्हें चाहता रहा हो. आखिर तुम हो ही चाहने लायक. पर आज तुम से मिल कर उसे लगा कि तुम सिर्फ जिम्मेदारियां निभा रही हो, जिंदगी नहीं जी रहीं. और इस में उसे मेरी कमी दिखाई दी.’’

‘‘कैसी बातें कर रहे हो तुम?’’ आशिमा को रोहन की बातें नागवार गुजर रही थीं.

‘‘मैं ठीक कह रहा हूं. हमें इस जिंदगी को एकदूसरे को फौर ग्रांटेड नहीं लेना चाहिए. हम जानते हैं, पढ़ते हैं कि हर रिश्ते में बासीपन आ जाता है जिसे हटाने के लिए प्रयास करते रहना चाहिए, लेकिन हम ने किया तो कुछ नहीं न.

‘‘मनमीत ने यह कहा था न कि सुबह होती है, शाम होती है, उम्र यों ही तमाम होती है. सही बात याद दिला गया वह. सुबह और शाम को तो रोक नहीं सकते हम, किंतु उम्र को यों ही तमाम नहीं होने दूंगा मैं अब,’’ फिर थोड़ी देर खामोश रहने के बाद आगे कहने लगा, ‘‘अब यही होगा कि साल में 2 बार छुट्टी ले कर हम घूमने का और हर महीने एक फिल्म का प्रोग्राम बनाएंगे. और हर रात…’’ कहतेकहते उस ने आशिमा को अपने सीने से लगा लिया. रोहन के आगोश में सिमटी आशिमा मुसकराई फिर बोली, ‘‘अरेअरे, लाइट तो बंद करने दो.’’ Romantic Story In Hindi

Family Story : अविश्वास – रश्मि ने अपने अकेलेपन को खत्म करने के लिए क्या तय किया ?

Family Story : अपने काम निबटाने के बाद मां अपने कमरे में जा लेटी थीं. उन का मन किसी काम में नहीं लग रहा था. शिखा से फोन पर बात कर वे बेहद अशांत हो उठी थीं. उन के शांत जीवन में सहसा उथलपुथल मच गई थी. दोनों रश्मि और शिखा बेटियों के विवाह के बाद वे स्वयं को बड़ी हलकी और निश्चिंत अनुभव कर रही थीं. बेटेबेटियां अपनेअपने घरों में सुखी जीवन बिता रहे हैं, यह सोच कर वे पतिपत्नी कितने सुखी व संतुष्ट थे.

शिखा की कही बातें रहरह कर उन के अंतर्मन में गूंज रही थीं. वे देर तक सूनीसूनी आंखों से छत की तरफ ताकती रहीं. घर में कौन था, जिस से कुछ कहसुन कर वे अपना मन हलका करतीं. लेदे कर घर में पति थे. वे तो शायद इस झटके को सहन न कर सकें.

दोनों बेटियों की विदाई पर उन्होंने अपने पति को मुश्किल से संभाला था. बारबार यही बोल उन के दिल को तसल्ली दी थी कि बेटी तो पराया धन है, कौन इसे रख पाया है. समय बहुत बड़ा मलहम है. बड़े से बड़ा घाव समय के साथ भर जाता है, वे भी संभल गए थे.

बड़ी बेटी रश्मि के लिए उन के दिल में बड़ा मोह था. रश्मि के जाने के बाद वे बेहद टूट गए थे. रश्मि को इस बात का एहसास था, सो हर 3-4 महीने बाद वह अपने पति के साथ पिता से मिलने आ जाती थी.

शादी के कई वर्षों बाद भी भी रश्मि मां नहीं बन सकी थी. बड़ेबड़े नामी डाक्टरों से इलाज कराया गया, पर कोईर् परिणाम नहीं निकला. हर बार नए डाक्टर के पास जाने पर रश्मि के दिल में आशा की लौ जागती, पर निराशारूपी आंधी उस की लौ को निर्ममता से बुझा जाती. किसी ने आईवीएफ तकनीक से संतान प्राप्ति का सुझाव दिया लेकिन आईवीएफ तकनीक में रश्मि को विश्वास न था.

अकेलापन जब असह्य हो उठा तो रश्मि ने तय किया कि वह अपनी पढ़ाई जारी रखेगी.

‘सुनो, मैं एमए जौइन कर लूं?’

‘बैठेबैठे यह तुम्हें क्या सूझा?’

‘खाली जो बैठी रहती हूं, इस से समय भी कट जाएगा और कुछ ज्ञान भी प्राप्त हो जाएगा.’

‘मुझे तो कोई एतराज नहीं, पर बाबूजी शायद ही राजी हों.’

‘ठीक है, बाबूजी से मैं स्वयं बात कर लूंगी.’

उस रात बाबूजी को खाना परोसते हुए रश्मि ने अपनी इच्छा जाहिर की तो एक पल को बाबूजी चुप हो गए. रश्मि समझी शायद बाबूजी को मेरी बात बुरी लगी है. अनुभवी बाबूजी समझ गए कि रश्मि ने अकेलेपन से ऊब कर ही यह इच्छा प्रकट की है. उन्होंने रश्मि को सहर्ष अनुमति दे दी.

कालेज जाने के बाद नए मित्रों और पढ़ाई के बीच 2 साल कैसे कट गए, यह स्वयं रश्मि भी न जान सकी. रश्मि ने अंगरेजी एमए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ली. उस के ससुर ने उसे एक हीरे की सुंदर अंगूठी उपहार में दी.

शिखा की शादी तय हो गई थी. रश्मि के लिए शिखा छोटी बहन ही नहीं, मित्र व हमराज भी थी. शिखा ने व्हाट्सऐप पर लिखा कि, ‘सच में बड़ी खुशी की बात यह है कि तुम्हारे जीजाजी का तुम्हारे शहर में अपने व्यापार के संबंध में खूब आनाजाना रहेगा. मुझे तो बड़ी खुशी है कि इसी बहाने तुम्हारे पास हमारा आनाजाना लगा रहेगा.’

व्हाट्सऐप में मैसेज देख कर और उस में लिखा पढ़ कर रश्मि खिल उठी थी. कल्पना में ही उस ने अनदेखे जीजाजी के व्यक्तित्व के कितने ही खाके खींच डाले थे, पर दिल में कहीं यह एहसास भी था कि शिखा के चले जाने के बाद मां और बाबूजी कितने अकेले हो जाएंगे.

शिखा की शादी में रमेश से मिल कर रश्मि बहुत खुश हुई, कितना हंसमुख, सरल, नेक लड़का है. शिखा जरूर इस के साथ खुश रहेगी. रमेश भी रश्मि से मिल कर प्रभावित हुआ था. उस का व्यक्तित्व ही ऐसा था. शिखा की शादी के बाद एक माह रश्मि मांबाप के पास ही रही थी, ताकि शिखा की जुदाई का दुख उस की उपस्थिति से कुछ कम हो जाए.

शिखा अपने पति के साथ रश्मि के घर आतीजाती रही. हर बार रश्मि ने उन की जी खोल कर आवभगत की. उन के साथ बीते दिन यों गुजर जाते कि पता ही न लगता कि कब वे लोग आए और कब चले गए. उन के जाने के बाद रश्मि के लिए वे सुखद स्मृतियां ही समय काटने को काफी रहतीं.

शिखा शादी के बाद जल्द ही एकएक कर 2 बेटियों की मां बन गई थी. रश्मि ने शिखा के हर बच्चे के स्वागत की तैयारी बड़ी धूमधाम और लगन से की. अपने दिल के अरमान वह शिखा की बेटियों पर पूरे कर रही थी. मनोज भी रश्मि को खुश देख कर खुश था. उस की जिंदगी में आई कमी को किसी हद तक पूरी होते देख उसे सांत्वना मिली थी.

शिखा के तीसरे बच्चे की खबर सुन कर रश्मि अपने को रोक न सकी. शिखा की चिंता उस के शब्दों से साफ प्रकट हो रही थी. उस ने तय कर लिया कि वह शिखा के इस बच्चे को गोद ले लेगी. इस से उस के अपने जीवन का अकेलापन, खालीपन तथा घर का सन्नाटा दूर हो जाएगा. बच्चे की जरूरत उस घर से ज्यादा इस घर में है. रश्मि ने जब मनोज के सामने अपनी इच्छा जाहिर की तो मनोज ने सहर्ष अपनी अनुमति दे दी.

‘शिखा, घबरा मत, तेरे ऊपर यह बच्चा भार बन कर नहीं आ रहा है. इस बच्चे को तुम मुझे दे देना. मुझे अपने जीवन का अकेलापन असह्य हो उठा है. तुम अगर यह उपकार कर सको तो आजन्म तुम्हारी आभारी रहूंगी.’ रश्मि ने शिखा से फोन पर बात की.

शाम को जब रमेश घर आया तब शिखा ने मोबाइल पर हुई सारी बात उसे बताई.

‘रश्मि मुझे ही गोद क्यों नहीं ले लेती, उसे कमाऊ बेटा मिल जाएगा और मुझे हसीन मम्मी.’ रमेश ने मजाक किया.

‘क्या हर वक्त बच्चों जैसी बातें करते हो. कभी तो बात को गंभीरता से लिया करो.’

रमेश ने गंभीर मुद्रा बनाते हुए कहा, ‘लो, हो गया गंभीर, अब शुरू करो अपनी बात.’

नाराज होते हुए शिखा कमरे से जाने लगी तो रमेश ने उस का आंचल खींच लिया, ‘बात पूरी किए बिना कैसे जा रही हो?’

‘रश्मि के दर्द व अकेलेपन को नारी हृदय ही समझ सकता है. हमारा बच्चा उस के पास रह कर भी हम से दूर नहीं रहेगा. हम तो वहां आतेजाते रहेंगे ही. ‘हां’ कह देती हूं.’

‘बच्चे पर मां का अधिकार पिता से अधिक होता है. तुम जैसा चाहो करो, मेरी तरफ से स्वतंत्र हो.’

शिखा ने रश्मि को अपनी रजामंदी दे दी. सुन कर रश्मि ने तैयारियां शुरू कर दीं. इस बार वह मौसी की नहीं, मां की भूमिका अदा कर रही थी. उस की खुशियों में मनोज पूरे दिल से साथ दे रहा था.

ऐसे में एक दिन उसे पता चला कि वह स्वयं मां बनने वाली है. रश्मि डाक्टर की बात का विश्वास ही न कर सकी.

उस ने अपने हाथों पर चिकोटी काटी.

मनोज ने खबर सुनते ही रश्मि को चूम लिया.

उसी रात रश्मि ने शिखा को फोन किया, ‘शिखा, तेरा यह बच्चा मेरे लिए दुनियाजहान की खुशियां ला रहा है. सुनेगी तो विश्वास नहीं आएगा. मैं मां बनने वाली हूं. कहीं तेरे बच्चे को गोद लेने के बाद मां बनती तो शायद तेरे बच्चे के साथ पूरा न्याय न कर पाती.’ रश्मि की आवाज में खुशी झलक रही थी.

‘आज मैं इतनी खुश हूं कि स्वयं मां बनने पर भी इतनी खुश न हुई थी. 14 साल बाद पहली बार तुम्हारे घर में खुशी नाचेगी,’ शिखा बहन की इस खुशी से दोगुनी खुश हो कर बोली.

मां और बाबूजी भी यह खुशखबरी सुन कर आ गए थे. रश्मि के ससुर की खुशी का ठिकाना ही न था.

रश्मि ने अपनी बेटी का नाम प्रीति रखा था. प्रीति घरभर की लाड़ली थी. शिखा व रमेश का आनाजाना लगा ही रहता. शिखा के तीसरा बच्चा बेटा था. रश्मि ने यही सोच कर कि घर में बेटा होना भी जरूरी है, शिखा से उस का बेटा नहीं मांगा.

रश्मि की खुशियां शायद जमाने को भायी नहीं. शिखा व रमेश रश्मि के पास आए हुए थे. उन की दूर की मौसी प्रीति को देखने आई थीं. रश्मि को बधाई देते हुए उन्होंने कहा, ‘रश्मि, तेरा रूप बिटिया न ले सकी. यह तो अपने मौसामौसी की बेटी लगती है.’

‘यह तो अपनेअपने समझने की बात है, मौसी, मैं प्रीति को अपनी बेटी से बढ़ कर प्यार करता हूं.’

मौसी का कथन और रमेश का समर्थन शिखा के दिल में तीर बन कर चुभ गए. जिन आंखों से प्रीति के लिए प्यार उमड़ता था, वही आंखें अब उस का कठोर परीक्षण कर रही थीं. प्रीति का हर अंग उसे रमेश के अंग से मेल खाता दिखाई देने लगा. प्रीति की नाक, उस की उंगलियां रमेश से कितनी मिलती हैं, तो क्या प्रीति रमेश की बेटी है? शिखा के दिल में संदेह का बीज पनपने लगा. मौसी का विषबाण अपना काम कर चुका था.

‘रश्मि बच्चे की चाह में इतना गिर सकती है और रमेश ने मेरे विश्वास का यही परिणाम दिया,’ शिखा सोचती रही, कुढ़ती रही.

घर  लौटते ही शिखा उबल पड़ी. सुनते ही रमेश सन्नाटे में आ गया. यह रश्मि की सगी बहन बोल रही है या कोई शत्रु?

‘तुम पढ़ीलिखी हो कर भी अनपढ़ों जैसा व्यवहार कर रही हो. तुम में विश्वास नाम की कोई चीज ही नहीं. इतना ही भरोसा है मुझ पर.’

‘अविश्वास की बात ही क्या रह जाती है? प्रीति का हर अंग गवाह है कि तुम्हीं उस के बाप हो. औरत सौत को कभी बरदाश्त नहीं कर पाती, चाहे वह उस की सगी बहन ही क्यों न हो.’

‘किसी के रूपरंग का किसी से मिलना क्या किसी को दोषी मानने के लिए काफी है? गर्भावस्था में मां की आंखों के सामने जिस की तसवीर होती है, बच्चा उसी के अनुरूप ढल जाता है.’

‘अपनी डाक्टरी अपने पास रखो, तुम्हारी कोई सफाई मेरे लिए पर्याप्त नहीं.’

‘डाक्टर राजेश को तो जानती हो न? उस की बेटी के बाल सुनहरे हैं, पर पतिपत्नी में से किस के बाल सुनहरे हैं? राजेश ने तो आज तक कोई तोहमत अपनी पत्नी पर नहीं लगाई.’

‘मैं औरत हूं, मेरे अंदर औरत का दिल है, पत्थर नहीं.’

बेचैनी में शिखा अपनी परेशानी मां को बता चुकी थी. उस की रातें जागते कटतीं, भूख खत्म हो गई थी. फोन करने के बाद मां कितनी बेचैन हो उठेंगी, यह उस ने सोचा ही न था.

मां अंदर ही अंदर परेशान हो उठीं. दोपहर को जब पति सोने चले गए तो उन्होंने शिखा को फोन किया, ‘‘तुम्हारी बात ने मुझे बहुत अशांत कर दिया है. रश्मि तुम्हारी बहन है, रमेश तुम्हारा पति, तुम उन के संबंध में ऐसा सोच भी कैसे सकती हो. रश्मि अगर 14 साल बाद मां बनी है तो इस का अर्थ यह तो नहीं कि तुम उस पर लांछन थोप दो. तुम्हारा अविश्वास तुम्हारे घर के साथसाथ रश्मि का घर भी ले डूबेगा. जिंदगी में सुख व खुशी हासिल करने के लिए विश्वास अत्यंत आवश्यक है. बसेबसाए घरों में आग मत लगाओ. रश्मि को इतने वर्षों बाद खुश देख कर कहीं तुम्हारी ईर्ष्या तो नहीं जाग उठी?’’

मां से बात करने के बाद शिखा के अशांत मन में हलचल सी उठी. सचाई सामने होते आंखें कैसे मूंदी जा सकती हैं. बातबात पर झल्ला जाना, पति पर व्यंग्य कसना शिखा का स्वभाव बन चुका था.

‘‘बचपना छोड़ दो, रश्मि सुनेगी तो कितनी दुखी होगी.’’

‘‘क्यों? तुम तो हो, उस के आंसू पोंछने के लिए.’’

‘‘चुप रहो, तमीज से बात करो, तुम तो हद से ज्यादा ही बढ़ती जा रही हो. जो सच नहीं है, उसे तुम सौ बार दोहरा कर भी सच नहीं बना सकतीं.’’

शिखा को हर घटना इसी एक बात से संबद्घ दिखाई पड़ रही थी. चाह कर भी वह अपने मन से किसी भी तरह इस बात को निकाल न सकी.

इधर रमेश को रहरह कर मौसीजी पर गुस्सा आ रहा था, जो उन के शांत जीवन में पत्थर फेंक कर हलचल मचा गई थीं. पढ़लिख कर इंसान का मस्तिष्क विकसित होता है, सोचनेसमझने और परखने की शक्ति आती है, पर शिखा तो पढ़लिख कर भी अनपढ़ रह गई थी.

एकदूसरे के लिए अजनबी बन पतिपत्नी अपनीअपनी जिंदगी जीने लगे. आखिर हुआ वही जो होना था. बात रश्मि तक भी पहुंच गई. सुन कर उसे गुस्सा कम और दुख अधिक हुआ. मनोज को भी इस बात का पता लगा, पर व्यक्ति व्यक्ति में भी कितना अंतर होता है. रश्मि के प्रति विश्वास की जो जड़ें सालों से जमी थीं, वे इस कुठाराघात से उखड़ न सकीं.

रश्मि ने मन मार कर शिखा को फोन कर कहा, ‘‘इसे तुम चाहो तो मेरी तरफ से अपनी सफाई में एक प्रयत्न भी समझ सकती हो. हमारा सालों का रिश्ता, खून का रिश्ता यों इतनी जल्दी तोड़ दोगी? शांत मन से सोचो, मैं तो तुम्हारा बच्चा गोद लेने वाली थी, फिर मुझे ऐसा करने की आवश्यकता क्यों होती? रमेश को मैं ने हमेशा छोटे भाई की तरह प्यार किया है, इस निश्चल प्यार को कलुषित मत बनाओ.

‘‘वैवाहिक जीवन की नींव विश्वासरूपी भूमि पर खड़ी है. अपनी बसीबसाई गृहस्थी में शंकारूपी कुल्हाड़ी से आघात क्यों करना चाहती हो? तनाव और कलह को क्यों निमंत्रण दे बैठी हो? रमेश को तुम इतने सालों में भी समझ नहीं सकी हो.’’

शिखा इन बातों से और जलभुन गई. रमेश उस की नजर में अभी भी अपराधी है. घर वह सोने और खाने को ही आता है. उस का घर से बस इतना ही नाता रह गया है. मां द्वारा पिता की उपेक्षा होते देख बच्चे भी उस से वैसा ही व्यवहार करते हैं.

शिखा ने स्वयं ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि आज न वह स्वयं खुश है, न उस का पति रमेश. Family Story

Family Story In Hindi : रूदन – नताशा क्यों परेशान थी ?

Family Story In Hindi : नतालिया इग्नातोवा या संक्षेप में नताशा मास्को विश्वविद्यालय में हिंदी की रीडर थी. उस के पति वहीं भारत विद्या विभाग के अध्यक्ष थे. पतिपत्नी दोनों मिलनसार, मेहनती और खुशमिजाज थे.

नताशा से अकसर फोन पर मेरी बात हो जाती थी. कभीकभी हमारी मुलाकात भी होती थी. वह हमेशा हिंदी की कोई न कोई दूभर समस्या मेरे पास ले कर आती जो विदेशी होने के कारण उसे पहाड़ जैसी लगती और मेरी मातृभाषा होने के कारण मुझे स्वाभाविक सी बात लगती. जैसे एक दिन उस ने पूछा कि रेलवे स्टेशन पर मैं उस से मिला या उस को मिला, क्या ठीक है और क्यों? आप बताइए जरा.

उस ने मुझे अपने संस्थान में 2-3 बार अतिथि प्रवक्ता के रूप में भी बुलाया था. मैं गया, उस के विद्यार्थियों से बात की. उसे अच्छा लगा और मुझे भी. मैं भी दूतावास के हिंदी से संबंधित कार्यक्रमों में उसे बुला लेता था.

नताशा मुझे दूतावास की दावतों में भी मिल जाती थी. जब भी दूतावास हिंदी से संबंधित कोई कार्यक्रम रखता, तो समय होने पर वह जरूर आती. कार्यक्रम के बाद जलपान की भी व्यवस्था रहती, जिस में वह भारतीय पकवानों का भरपूर आनंद लेती.

2-3 बार भारत हो आई नताशा को हिंदी से भी ज्यादा पंजाबी का ज्ञान था और वह बहुत फर्राटे से पंजाबी बोलती थी. दरअसल, शुरू में वह पंजाबी की ही प्रवक्ता थी, लेकिन बाद में जब विश्व- विद्यालय ने पंजाबी का पाठ्यक्रम बंद कर दिया तो वह हिंदी में चली आई.

रूस में अध्ययन व्यवस्था की यह एक खास विशेषता है कि व्यक्ति को कम से कम 2 कामों में प्रशिक्षण दिया जाता है. यदि एक काम में असफल हो गए तो दूसरा सही. इसलिए वहां आप को ऐसे डाक्टर मिल जाएंगे जो लेखापाल के कार्य में भी निपुण हैं.

हम दोनों की मित्रता हो गई थी. वह फोन पर घंटों बातें करती रहती. एक दिन फोन आया, तो वह बहुत उदास थी. बोली, ‘‘हमें अपना घर खाली करना होगा.’’

‘‘क्यों?’’ मैं ने पूछा, ‘‘क्या बेच दिया?’’

‘‘नहीं, किसी ने खरीद लिया,’’ उस ने बताया.

‘‘क्या मतलब? क्या दोनों ही अलगअलग बातें हैं?’’ मैं ने अपने मन की शंका जाहिर की.

‘‘हां,’’ उस ने हंस कर कहा, ‘‘वरना भाषा 2 अलगअलग अभि- व्यक्तियां क्यों रखती?’’

‘‘पहेलियां मत बुझाओ. वस्तुस्थिति को साफसाफ बताओ,’’ मैं ने नताशा से कहा था.

‘‘पहले यह बताइए कि पहेलियां कैसे बुझाई जाती हैं?’’ उस ने प्रश्न जड़ दिया, ‘‘मुझे आज तक समझ नहीं आया कि पहेलियां क्या जलती हैं जो बुझाई जाती हैं.’’

‘‘यहां बुझाने का मतलब मिटाना, खत्म करना नहीं है बल्कि हल करना, सुलझाना है,’’ मैं ने जल्दी से उस की शंका का समाधान किया और जिज्ञासा जाहिर की, ‘‘अब आप बताइए कि मकान का क्या चक्कर है?’’

‘‘यह बड़े दुख का विषय है,’’ उस ने दुखी स्वर में कहा, ‘‘मैं ने तो आप को पहले ही बताया था कि मेरा मकान बहुत अच्छे इलाके में है और यहां मकानों के दाम बहुत ज्यादा हैं.’’

‘‘जी हां, मुझे याद है,’’ मैं ने कहा, ‘‘वही तो पूछ रहा हूं कि क्या अच्छे दाम ले कर बेच दिया.’’

‘‘नहीं, असल में एक आदमी ने मेरे मकान के बहुत कम दाम भिजवाए हैं और कहा है कि आप का मकान मैं ने खरीद लिया है,’’ उस ने रहस्य का परदाफाश किया.

‘‘अरे, क्या कोई जबरदस्ती है,’’ मैं ने उत्तेजित होते हुए कहा, ‘‘आप कह दीजिए कि मुझे मकान नहीं बेचना है.’’

‘‘बेचने का प्रश्न कहां है,’’ नताशा बुझे हुए स्वर में बोली, ‘‘यहां तो मकान जबरन खरीदा गया है.’’

‘‘लेकिन आप मकान खाली ही मत कीजिए,’’ मैं ने राह सुझाई.

‘‘आप तो दूतावास में हैं, इसलिए आप को यहां के माफिया से वास्ता नहीं पड़ता,’’ उस ने दर्द भरे स्वर में बताया, ‘‘हम आनाकानी करेंगे तो वे गुंडे भिजवा देंगे, मुझे या मेरे पति को तंग करेंगे. हमारा आनाजाना मुहाल कर देंगे, हमें पीट भी सकते हैं. मतलब यह कि या तो हम अपनी छीछालेदर करवा कर मकान छोड़ें या दिल पर पत्थर रख कर शांति से चले जाएं.’’

‘‘और अगर आप पुलिस में रिपोर्ट कर दें तो,’’ मुझे भय लगने लगा था, ‘‘क्या पुलिस मदद के लिए नहीं आएगी?’’

‘‘मकान का दाम पुलिस वाला ही ले कर आया था,’’ उस ने राज खोला, ‘‘बहुत मुश्किल है, प्रकाशजी, माफिया ने यहां पूरी जड़ें जमा रखी हैं. यह सरकार माफिया के लोगों की ही तो है. मास्को का जो मेयर है, वह भी तो माफिया डौन है. आप क्या समझते हैं कि रूस तरक्की क्यों नहीं करता? सरकार के पास पैसे पहुंचते ही नहीं. जनता और सरकार के बीच माफिया का समानांतर शासन चल रहा है. ऐसे में देश तरक्की करे, तो कैसे करे.’’

‘‘यह न केवल दुख का विषय है बल्कि बहुत डरावना भी है,’’ मुझे झुरझुरी सी हो आई.

‘‘देखिए, हम कितने बहादुर हैं जो इस वातावरण में भी जी रहे हैं,’’ नताशा ने फीकी सी हंसी हंसते हुए कहा था.

मैं 1997 में जब मास्को पहुंचा था, तो एक डालर के बदले करीब 500 रूबल मिलते थे. साल भर बाद अचानक उन की मुद्रा तेजी से गिरने लगी. 7, 8, 11, 22 हजार तक यह 4-5 दिनों में पहुंच गई थी. देश भर में हायतौबा मच गई. दुकानों पर लोगों के हुजूम उमड़ पड़े, क्योंकि दामों में मुद्रा हृस के मुताबिक बढ़ोतरी नहीं हो पाई थी. सारे स्टोर खाली हो गए और आम रूसी का क्या हाल हुआ, वह तब पता चला जब नताशा से मुलाकात हुई.

नताशा ने मुझे बताया था कि अपने मकान से मिली राशि और अपनी जमापूंजी से वह एक मकान खरीद लेगी जो बहुत अच्छी जगह तो नहीं होगा पर सिर छिपाने के लिए जगह तो हो ही जाएगी.

‘‘क्यों नया मकान खरीदा?’’ उस के दोबारा मिलने पर मैं ने पूछा.

मेरा सवाल सुन कर नताशा विद्रूप हंसी हंसने लगी. फिर अचानक रुक कर बोली, ‘‘जानते हैं यह मेरी जो हंसी है वह असल में मेरा रोना है. आप के सामने रो नहीं सकती, इसलिए हंस रही हूं. वरना जी तो चाहता है कि जोरजोर से बुक्का फाड़ कर रोऊं,’’ वह रुकी और ठंडी आह भर कर फिर बोली, ‘‘और रोए भी कोई कितना. अब तो आंसू भी सूख चुके हैं.’’

मैं समझ गया कि मामला कुछ रूबल की घटती कीमत से ही जुड़ा होगा. मकानों के दाम बढ़ गए होंगे और नताशा के पैसे कम पड़ गए होंगे. मैं कुछ कहने की स्थिति में नहीं था, चुप रहा.

‘‘आप जानते हैं, राज्य का क्या मतलब होता है? हमें बताया जाता है कि राज्य लोगों की मदद के लिए है, समाज में व्यवस्था के लिए है, समाज के कल्याण के लिए है. यह हमारा, हमारे लिए, हमारे द्वारा बनाया गया राज्य है. लेकिन अगर आप ने इतिहास पढ़ा हो तो आप को पता चलेगा कि राज्य व्यवस्था का निर्माण दरअसल, लोगों के शोषण और उन पर शासन के लिए हुआ था? इसलिए हम जो यह खुशीखुशी वोट देने चल देते हैं, उस का मतलब सिर्फ इतना भर है कि हम अपनी इच्छा से अपना शोषण चुन रहे हैं.’’

नताशा बोलती रही, मैं ने उसे बोलने दिया क्योंकि मेरे टोकने का कोई औचित्य नहीं था और मुझे लगा कि बोल लेने से संभवत: उस का दुख कम होगा.

‘‘आप शायद नहीं जानते कि कल तक हमारे पास 80 हजार रूबल थे, जो हम ने अतिरिक्त काम कर के पेट काटकाट कर, पैदल चल कर, खुद सामान ढो कर और इसी तरह कष्ट उठा कर जमा किए थे. सोचा था कि एक कार खरीदेंगे पर जब उन हरामजादों ने हमारा मकान छीन लिया, तो सोचा कि चलो अभी मकान ही खरीदा जाए,’’ नताशा बातचीत के दौरान निस्संकोच गालियां देती थी जो उस के मुंह से अच्छी भी लगती थीं और उस के दुख की गहराई को भी जाहिर करती थीं, ‘‘पर हमें 2 दिन की देर हो गई और अब पता चला कि देर नहीं हुई, बल्कि देर की गई. हम तो सब पैसा तैयार कर चुके थे. लेकिन मकानमालिक को वह सब पता था, जो हमारे लिए आश्चर्य बन कर आया, इसलिए उस ने पैसा नहीं लिया.’’

नताशा ने रुक कर लंबी सांस ली और आगे कहा, ‘‘आप जानते हैं, यह मुद्रा हृस कब हुआ? यह अचानक नहीं हुआ, उन कुत्तों ने अपने सब रूबल डालर में बदल लिए या संपत्ति खरीद ली और फिर करवा दिया मुद्रा हृस. भुगतें लोग. रोएं अपनी किस्मत को,’’ इतना कह कर वह सचमुच रोने को हो आई, फिर अचानक हंसने लगी. बोली, ‘‘जाने क्यों, मैं, आप को यह सब सुना कर दुखी कर रही हूं,’’ उस ने फिर कहा, ‘‘शायद सहकर्मी होने का फायदा उठा रही हूं. जानते हैं न कि जिन रूबलों से मकान लिया जा सकता था वे अब एक महीने के किराए के लिए भी काफी नहीं हैं.’’

उस ने फीकी हंसी हंस कर फिर कहा, ‘‘और व्यवस्था पूरी थी. बैंक बंद कर दिए गए. लोग बैंकों के सामने लंबी कतारों में घंटों खड़े रहे. किसी को थोड़े रूबल दे दिए गए और फिर बैंकों को दिवालिया घोषित कर दिया गया. लोग सड़कों पर ही बाल नोचते, कपड़े फाड़ते देखे गए. लेकिन किसी का नुकसान ही तो दूसरे का फायदा होगा. यह दुनिया का नियम है.’’ Family Story In Hindi

USA : खब्ती डोनाल्ड का खब्ती आदेश, अमेरिका के लिए ही महंगा कर रहे कच्चा माल

USA : अमेरिकी सरकार ने डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर यूएसएआईडी का दफ्तर बंद कर दिया है. यह अमेरिकी सरकार की एक स्वतंत्र एजेंसी है जो अंतर्राष्ट्रीय विकास और मानवीय सहायता के लिए कार्य करती है. अमेरिकी आपदा सहायता दुनियाभर में आने वाले भूकंपों, बाढ़ों, अकालों और महामारियों से प्रभावित होने वालों की जान बचाने के काम आती थी. वर्ष 2022 में अफ्रीका के इथोपिया, केन्या और सोमालिया में अगर डेढ़ लाख टन की फूड-एड न मिलती तो 3 सालों के सूखे के कारण वहां 20-25 लाख लोग मर जाते.

2 अरब डौलर, जो प्र्रति अमेरिकी का कुछ काफियों पर होने वाला खर्र्च बचाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डौनेल्ड ट्रंप ने दुनिया के गरीब कोनों में लाखों मौतों को न्यौता दे दिया है. आज अमेरिका की अमीरी में दुनिया के हर गरीब का योगदान है क्योंकि जो कच्चा माल अमेरिकी फैक्ट्रियों और तैयार माल अमेरिकी स्टोरों में पहुंचता है, उन का कुछ न कुछ हिस्सा गरीबों के हाथों से दुनिया में कहीं भी तैयार होता है.

अमेरिकी राष्ट्रपति अपने खब्तीपन से अपने ही लिए कच्चा माल महंगा कर रहे हैं. ट्रंप की खब्तीपन की नीतियों से प्रभावित लोग सस्ता माल तैयार नहीं कर सकते न.

Relationship Problem : दांपत्य के छोटेमोटे झगड़े न बुलाएं पुलिस और वकील

Relationship Problem : पतिपत्नी के छोटेमोटे झगड़ों में भी कई बार लोग पुलिस और वकील के पास शिकायत ले कर चले जाते हैं. ऐसे में बात बनने की जगह पर बिगड़ जाती है. आजकल विवाद होते ही पत्नियां या ससुराल वाले 112 नंबर डायल कर पुलिस बुला लेते हैं. घरेलू झगड़ों में पुलिस को बुलाना समाजिक रूप से अपमान समझा जाता है. पुलिस दोनों पक्षों को बाद में थाने में बुलाती है. इस के बाद समझौता हो जाए तो ठीक, न हो तो मुकदमा कायम कर के जेल भेजने का कदम उठाया जाता है. जेल जाने के बाद समझौते के हालात खत्म हो जाते हैं.

पुलिस की ही तरह से कई बार नाराज पतिपत्नी वकीलों के पास पहुंच जाते हैं. छोटेछोटे झगड़ों में भी वकील तलाक का मुकदमा दाखिल करने की सलाह देते हैं. उन का समझाना होता है कि कोर्ट से नोटिस पर जब दूसरा पक्ष कोर्ट आएगा तो उस से बात कर के समझौता करा दिया जाता है. पुलिस की ही तरह से वकील के पास जाने के बाद भी विवाद सुलझने के बाद उलझ जाते हैं. बात बनने की जगह पर बिगड़ जाती है.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ बैंच की अधिवक्ता वेदिका द्विवेदी कहती हैं, ‘पतिपत्नी के संबंध बेहद संवेदनशील होते हैं. अगर कोई छोटामोटा विवाद होता है, जैसे पत्नी को समय न देना, बिना बताए घूमने जाना या पति को बिना बताए मायके चले जाना, किसी सहेली के साथ घूमने चले जाना तो उन को सब से पहले आपस में बात कर सुलझाना चाहिए. इस के बाद घर, परिवार और नातेरिश्तेदारों के बीच बात करनी चाहिए.

पतिपत्नी विवाद में पुलिस और वकील के आने के बाद बात बनने की जगह बिगड़ जाती है. एक बार थाना और कचहरी पहुंचने के बाद मसले खराब हो जाते हैं, संबंध सुधरने की हर गुंजाइश खत्म हो जाती है. पतिपत्नी संबंध बेहद निजी होते हैं. इन को बेहद निजता की जरूरत होती है.

झगड़े बढ़ जाते हैं तो एकदूसरे के सम्मान को चोट लगती है. यही कारण है की काननी मध्यस्थता में कोर्ट वकीलों को नहीं बुलाती है. वह चाहती है कि पतिपत्नी अपनी बात खुद कह सकें और खुद ही झगड़े को आपसी बातचीत कर के सुलझा सकें.

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तुम पुरुष तो हो नहीं
की नहाने के बाद
तुम्हें खाना मिल जाएगा
और चुपचाप खाके सो जाओगी।
महिला हो सुबह उठकर सबसे पहले तुम्हें नहाना ही पड़ेगा।
थोड़ी देर मंदिर में जाकर भगवान को भी हाजिरी लगानी होगी।
फिर घड़ी की तरफ देखना होगा …
कि अरे समय क्या हुआ है। ..
क्योंकि टाइम मैनेजमेंट तो तुम्हें खूब आता है।
तो घड़ी देखकर थोड़ा रिलैक्स होवोगी और मन ही मन कहोगी।
चलो अच्छा है अभी दो घंटे का टाइम है जल्दी से नाश्ता और उनके ऑफिस का लंच तैयार कर लेती हूं।

तुम अपने गीले बालों का जुड़ा बनाओगी और
साड़ी का पल्लू संभालोगी फ़िर घुस जाओगी
रसोईं घर में।
लेकिन यहां पर याद रखना हां..
अभी पानी का एक घूंट भी नहीं गया है तुम्हारे भीतर।
तुम्हें इसका अहसास नहीं पर कोई बात नहीं ये तो तुम्हारा रोज का काम है ..
और आदत पड़ चुकी है अब।
खैर सोचोगी नाश्ते में क्या बना लूं..
अब समय बीत रहा है तो जल्दबाजी में पूरी सब्जी बनाने का ही डिसाइड कर लोगी।
सब्जी छौंक कर आटा गूंथ लोगी
और दूसरे चूल्हे पर चढ़ा लोगी चाय ..
फिर अचानक याद आएगा एक जरूरी काम तो तुमने किया ही नहीं।
उन्हें जगाना भी तो है..
जो सात बजे ऑफिस से घर आते हैं,
कुछ स्नैक्स लेते हैं चाय के साथ,
फोन पर बतियाने हैं,
खाना खाते हैं,
तुम्हारे कहने पर थोड़ा बहोत तुमसे बात कर लेते हैं
और रात के दो बजे तक अपनी पसंदीदा फिल्म देखकर सो जाते हैं..
क्योंकि वो थके होते हैं।

तो उन्हें जगाना भी तो है..
तुम गरम गरम एक एक पूरियां तल कर देती हो उन्हें खिलाती हो..
क्योंकि उन्हें पसंद है गरम क्रिस्पी पूरियां
कितना ख्याल रखती हो उनकी पसंद नापसंद का
इसी तरह तो तुम अपना धर्म निभाती हों।
खैर टिफिन बॉक्स तैयार करके तुम उन्हें ऑफिस भेज देती हो।
अब आती है तुम्हारे हिस्से में थोड़ी सी फुर्सत..
याद रखना फुर्सत थोड़ी ही है.. क्योंकि घर तो अभी भी फैला पड़ा है पूरा।
तो तुम एक ग्लास पानी, एक कप चाय और प्लेट में आलू की भुजिया और चार ठंडी पूरियां लेकर बैठती हो।
पसंद तो तुम्हें भी हैं.. गर्म क्रिस्पी पूरियां।
पर तुम्हारे मन में ये ख्याल कभी नहीं आता
तुम उठती हो और घंटे भर में घर का सारा काम निपटाती हो.. और थक जाती हो।
तुम ये भी नहीं देखती कि.. तुम्हारी टेबल पर तुम्हारी पसंदीदा किताब रखी हुई है जिसके केवल दस पेज ही पढ़े हैं अब तक तुमने.. और दो दिनों से उसका एक पन्ना तक नहीं पलटा है।
तुम ये भी नहीं सोचती कि.. पिछले दो  दिनों से तुमने अपना पसंदीदा गाना तक नहीं सुना है ।
खैर तुम बिस्तर पे आती हो दो चार रील सरकाती हो..
अपनी बहनों से बात करती हो और सो जाती हो..
बचपन से लेकर अब तक तुम्हारे मन में ये एक ख्याल कभी नहीं आया.. कि नहाऊँ, खाऊं और सो जाऊं
क्रिस्पी पूरियों की महक से थोड़ा मैं भी आनंदित हो जाऊं
ये तुम नहीं सोच सकती कभी भी नहीं
क्योंकि कुछ सुख सिर्फ पुरुषों के हिस्से ही आते हैं
और वो सुख तुम ही उन्हें दे पाती हो..
इस तरह तुम अपना धर्म निभाती हो।

लेखिका : शिप्रा सिंह

Romantic Story In Hindi : सोशल डायरीज कैफे

Romantic Story In Hindi : सोशल डायरीज कैफे. जी हां, यही नाम था उस कैफे का. तकरीबन 8 वर्षों पहले वह ठेठ देहात से शहर के एक बड़े विश्वविद्यालय में पढऩे आया था, जहां उस की मुलाकात रूपाली से हुई थी. रूपाली ने इसी कैफे पर पहली दफा उसे मिलने के लिए बुलाया था.

इधर आप सोच रहे होंगे कि किसी कैफे का यह कैसा नाम- सोशल डायरीज कैफे. लेकिन वाकई में यह कैफे शहर में बहुत चर्चित जगह थी, खासकर युवाओं की लंबीलंबी गपशप के लिए. छात्रसंघ चुनावों में तो यहां युवाओं का जमघट लगता था. कई प्रेमी युगल घंटों यहां बैठेबैठे गुटरगुटर किया करते थे. इस दरमियान कैफे वाला समय की नजाकत को भांप कर पार्श्व में उसी अनुरूप संगीत की स्वरलहरियां छोडऩे लगता था. एक के बाद एक दिलकश नगमे…

बस, आप तो कैपुचिनो का और्डर दीजिए और उस के एकएक घूंट के साथ एकदूसरे की आंखों में आंखें डाल कर दबे होंठों से नगमे गुनगुनाते जाइए. कैपुचिनो के साथ यहां कईयों का प्रेम परवान चढ़ा, तो कईयों का धूमिल हुआ. उस समय यहां सोशल डिस्टेंसिंग और दो गज की दूरी की बाध्यता का प्रावधान भी नहीं था. बड़ा ही दिलचस्प माहौल था इस कैफे का.

कैफे का यह नाम कई बार भ्रम की स्थिति उत्पन्न करता था. उस दिन रूपाली ने उसे फोन पर कहा, ‘दीपक, तुम ठीक शाम 5 बजे सोशल डायरीज कैफे मुझ से मिलने आ जाना.’ इधर लडक़े तो वैसे भी लडक़ी से मिलने के नाम से ही हमेशा जल्दबाजी में रहते हैं. इसी उधेड़बुन में उस ने ठीक से सुना नहीं और सही समय पर वहां पहुंचने को ‘हां’ कर दी.

इस तरह किसी कैफे में लडक़ी से मुलाकात का उस का यह पहला अवसर था. यही सोचसोच कर उस के शरीर के रोमरोम में सिहरन पैदा हो रही थी.

वह ठहरा ठेठ देहात का. शहर में नयानया आया था. कैफे का नाम भी बाहर इंग्लिश में लिखा हुआ था- सोशल डायरीज कैफे – बड़ेबड़े, लाललाल अक्षरों में. ऊपर से ऐसे कांच लगा रखे थे जिन में अंदर से बाहर साफ देखा जा सकता था, लेकिन बाहर से अंदर कुछ नजर नहीं आता था. इधर दीपक के लिए इंग्लिश तो हिमालय की सब से ऊंची चोटी फतह करने के समान थी. वह गांव के सरकारी स्कूल से ‘थर्स्टी क्रो’ और ‘हंगरी फौक्स’ की कहानियां रटरट कर यहां तक पहुंचा था. लिहाजा, उस ने ‘डायरीज’ शब्द को ‘डेयरी’ पढ़ लिया. और वहां से आगे बढ़ गया.

वह कुछ देर तक रोड पर ही खाक छानता रहा. जब जगह नहीं मिली, तब उस ने रूपाली को फोन किया. ‘हेलो…’ वह आगे कुछ बोलता, इतने में वह बीच में ही बोल पड़ी. ‘व्हाट हेलो, 5 बजे का टाइम दिया था. तुम्हें वक्त की कोई कद्र ही नहीं है.’

‘तुम ने कौन सी जगह बताई थी? मिल नहीं रही है. मैं कब से रोड पर चक्कर काट रहा हूं.’ ‘सोशल डायरीज कैफे. कैफे के बाहर गुलमोहर और अमलतास के बड़ेबड़े पेड़ खड़े हैं. आंखें फाड़ कर देखो.’

‘तुम कैफे के बाहर खड़ी रहो, मैं ढूंढ रहा हूं.’

वह घूमताफिरता फिर वहीं आ पहुंचा, वहां लडक़ी बाहर खड़ी उस का इंतजार कर रही थी. जहां गुलमोहर भी महक रहा था और अमलतास अपने पीले फलों की छटा बिखेर रहा था. ‘ओह, मैं यहीं से हो कर तो गुजरा था. सोशल डेयरी..नहीं..डायरी..डायरीज कैफे.’ इस बार ‘डायरीज’ शब्द पर जोर देते हुए वह अपनी मोटरसाइकिल पर बैठेबैठे मन ही मन बुदबुदाया.

रूपाली को वहां खड़ा देख कर एक बार तो वह पानीपानी हुआ. फर्स्ट इंप्रैशन इज द लास्ट इंप्रैशन. लेकिन इस बात से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. एक तो वह सादगीभरा जीवन जीने वाला, दूसरा वह ठेठ देहात से आया हुआ. शहर के तौरतरीके समझने में वक्त तो लगता ही है. खैर, देर आए, दुरुस्त आए. उस के आने से पहले रूपाली एक प्लेट चाउमीन उड़ा चुकी थी. वह भी उस के पीछेपीछे कैफे में चला आया. बिलिंग काउंटर के ठीक सामने दीवार पर लगी मोनालिसा की पेंटिंग एक याद ताजा कर रही थी. कैफे के अंदर खरगोश के 2 सफेद बच्चे अठखेलियां कर रहे थे. पार्श्व में पाश्चात्य संगीत की मधुर धुन बज रही थी.

उन के वहां बैठते ही वेटर ने पीने का पानी टेबल पर रखा, फिर और्डर के लिए पूछा. रूपाली ने टेबल पर रखे मैन्यू कार्ड को दीपक की ओर बढ़ाया. उस ने कार्ड को वापस रूपाली की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘तुम्हें जो पसंद हो, मंगवा लो.’

‘कैपुचिनो चलेगी?’

उस ने यह नाम पहली दफा सुना था. लेकिन सोचा, अगर इस से पूछूंगा कि यह क्या चीज है तो मुझे बिलकुल गंवार ही समझेगी. बेहतर है, चुप ही रहूं. जो आएगा खापी लेंगे. उस ने कहा, ‘हां, क्यों नहीं चलेगी.’

रूपाली ने वेटर को 2 कैपुचिनो लाने के लिए कहा. फिर दीपक से मुखातिब हुई.

‘तुम ने आने में बहुत देर लगा दी?’ रूपाली ने पूछा.

‘देर कहां हुई मैडम जी. कब से आ गया, लेकिन इंग्लिश का लोचा हो गया था,’ वह दबे होंठों से बड़बड़ाया.

‘क्या? मन ही मन क्या बड़बड़ा रहे हो?’ रूपाली को थोड़ा अजीब सा लगा.

‘किसी काम से लेट हो गया था,’ उस ने जवाब दिया.

‘यू नो, तुम लड़कों की न, यही प्रौब्लम है. मैं समय की बहुत पाबंद हूं. आगे से तुम भी ध्यान रखना. अंडरस्टैंड?’

‘हां, ठीक है.’

‘फेसबुक पर हो तुम?’

‘किस पर?’ लडक़े को थोड़ा आश्चर्य हुआ कि क्या पूछ रही है.

‘फेसबुक…फेसबुक पर,’ रूपाली ने अपने एंड्रौएड मोबाइल में फेसबुक खोल कर उसे बताते हुए कहा. उस के पास साधारण सा मोबाइल था. ऊपर से फेसबुक से कभी वास्ता पड़ा नहीं था. उस ने ‘न’ में सिर हिला दिया. बात आगे बढ़ती, उस से पहले वेटर ने 2 कप कैपुचिनो के ला कर उन के सामने रख दिए. झागदार कौफी सामने देख कर दीपक के मुंह में पानी आ गया. ऐसी कौफी उस ने पहले कभी नहीं पी थी.

‘अरे वाह, कौफी. मैं बेवजह परेशान हो रहा था,’ वह मन ही मन सोचने लगा.

‘फ्यूचर का क्या प्लान है?’ रूपाली ने पूछा.

‘आगे चल कर एक बेहतरीन चित्रकार बनना चाहता हूं. ग्रेजुएशन में भी मेरा यही मुख्य विषय है.’

‘आर्टिस्ट…तुम्हें लगता है तुम आगे इस में बेहतर कर पाओगे?’

‘मेरा काम काम करना है और वह मैं कर रहा हूं. भविष्य के दरवाजे के अंदर क्या है, यह मैं अभी कैसे बता सकता हूं.’

‘तुम ने क्या सोचा है?’

‘आई वांट टू बिकम आईएएस. आफ्टर ग्रेजुएशन, आई विल गो टू दिल्ली टू प्रिपेयर फौर आईएएस.’

रूपाली ने अमेरिकी टोन में अपनी बात को इतना तेजी से बोला कि पूरा वाक्य दीपक के सिर के ऊपर से निकल गया. वह मोनालिसा की ओर देखने लगा. यहां आ कर वह 2 बातें तो सीख ही गया. पहली बात, यदि आप को शहरी लडक़ी से बातचीत करनी है, तो कम से कम थोड़ीबहुत इंग्लिश तो आनी ही चाहिए. वरना इज्जत तारतार होते देर नहीं लगती. दूसरी बात, शहर में इस तरह के और कौनकौन से कैफे हैं, जहां रूपाली मिलने को बुला सकती है, उन की भी एक लिस्ट बना लेनी चाहिए.

उस ने वहीं बैठेबैठे सोचा, हां, तैयारी करूंगा, और इंग्लिश जबान पर आ ही जाएगी. कोई भाषा सीखने में बुराई ही क्या है. जब उठो तब सवेरा. उस ने अगले ही दिन से इंग्लिश की कोचिंग करने का मानस बनाया.

उन की कौफी भी खत्म हो चुकी थी. दीपक ने काउंटर पर बैठे कैफे के मालिक उज्ज्वल भाई के पास जा कर बिल अदा किया. उज्ज्वल भाई के मिलनसार और सहृदय व्यक्तित्व के कारण हमारी भी साहित्यिक चर्चाएं यहां होती रहती थीं. मुसलसल होती रहती थीं. एकएक कप कैपुचिनो के साथ कईकई घंटे विमर्शों में गुजर जाते थे.

खैर, वे दोनों कैफे से बाहर निकल आए. बाहर गुलमोहर के पेड़ से रहरह कर वसंतदूत की मधुर आवाज आ रही थी. इधर दीपक के मन के किसी खाली कोने में पड़ी गीली मिट्टी के ऊपर प्रेम का दरख्त अपनी दस्तक दे रहा था.

आसमान पूरा बादलों से गिर आया था. बारिश की संभावना लग रही थी. रूपाली ने उस से विदा ली और वह भी अपने होस्टल चला आया. कुछ दीनों तक ऐसे ही चलता रहा. दीपक ने सुबह के वक्त इंग्लिश कोचिंग की क्लास भी जौइन कर ली. इधर विश्वविद्यालय के गलियारों में छात्रसघं चुनावों के मद्देनजर छात्र नेताओं में सियासी बाजार गरम होने लगा. लेकिन वह इन चुनावों की गतिविधयों से दूर अपनी इंग्लिश कोचिंग और कैनवास पर रंग बिखेरने में व्यस्त रहा.

छात्र नेताओं में आरोपप्रत्यारोप, सभाओं और भाषणों का दौर तेज होने लगा. छात्र शहर में जगहजगह मुफ्त के भोजन और थिएटर में फिल्में देखने का लुत्फ़ उठाने लगे. सोशल डायरी कैफे तो फास्ट फूड के लिए सब की पहली पसंद था. कहीं कोई हुड़दंग न हो जाए, इसलिए थानाधिकारी हनुवंत सिंह सिसोदिया अपनी टीम के साथ चुनाव में मुस्तैदी के साथ खडे रहे.

इस बार के चुनाव में प्रतीक शर्मा सब से प्रबल दावेदार था. उस के बोलने के लहजे से ही रूपाली उस की ओर आकर्षित होने लगी थी. आखिरकार, प्रतीक शर्मा की जीत हुई. इस के बाद रूपाली लगातार उस के साथ समय व्यतीत करने लगी थी. उस ने एकाएक दीपक से किनारा कर लिया था.

दीपक को भी इस बात की भनक लग गई थी. उस ने समय रहते रूपाली के मंसूबों को भांप लिया था. उस की नजर में एक इश्क जो मुकम्मल होना चाहिए था, वह अधूरा रह गया. लेकिन इस बात की उस ने तनिक भी परवा न की. वह अपनी राह पर आगे बढ़ गया. फिर उस ने कभी रूपाली की ओर मुड़ कर न देखा.

दीपक लगातार अपने सपने को सच करने में लगा रहा. आखिरकार, उस ने इंग्लिश पर विजय पाई और उस की आर्ट कला की तारीफ भी देशविदेश में होने लगी. इटली के फ्लोरेंस शहर की आर्ट गैलरी में उस की बनाई पेंटिंग ऊंचे दामों में बिकने लगीं. इधर रूपाली सालों तक प्रतीक के प्रेमजाल में फंसी रही. वहां उस ने प्रेम में धोखा खाया. जब बातें उड़ कर उस के घर तक पहुंची, तो उस के पिताजी ने उस की शादी करवा दी. आईएएस बनने का उस का सपना ख्वाब बन कर रह गया.

बाद के वषों में दीपक फ्लोरेंस के एक विश्वविद्यालय में आर्ट का प्रोफैसर बन गया. और उस ने वहीं इटालियन लडक़ी से शादी कर ली. आर्ट में छवि का कितना महत्त्व है, यह बात वह भलीभांति जानता है. कैफे में लगी मोनालिसा की पेंटिंग कई बार उस के मानस पटल पर उभरती है, लेकिन रूपाली की छवि उस के चेतन और अवचेतन मन में कहीं नजर नहीं आती. Romantic Story In Hindi 

लेखक : डा. एस डी वैष्णव

Hindi Love Stories : कैसा मोड़ है यह – माला और वल्लभ को कैसा एहसास हुआ

Hindi Love Stories : ‘‘अदालतसे गुजारिश है कि मेरी मुवक्किला को जल्दी न्याय मिले ताकि वह अपनी एक नई जिंदगी शुरू कर सके,’’ माला के वकील ने अपनी दलीलें पेश करने के बाद जज साहब से कहा. जज साहब ने मामले की गंभीरता को समझते हुए अगली तारीख दे दी. तलाक के मामलों में बहुत जल्दी फैसला लेना मुश्किल ही होता है, क्योंकि अदालत भी चाहती है कि तलाक न हो. यही वजह थी कि हमेशा की तरह आज भी अदालत में कोई फैसला नहीं हुआ. दोनों ही पक्षों के वकील अपनीअपनी दलीलें पेश करते रहे, पर जज साहब ने तो तारीख बढ़ाने का ही काम किया.

वल्लभ और माला दोनों उदास और खिन्न मन से अदालत से बाहर निकल आए, लेकिन बाहर निकलते वक्त उन्हें नेहा और भानू की घूरती नजरों का सामना करना पड़ा. उन दोनों की नफरत, क्रोध और धोखा देने के आक्रोश का सामना वे दोनों पिछले 5 सालों से कर रहे हैं और अब तो जैसे आदत ही हो गई है. वल्लभ उस नफरत और आक्रोश के साए में जीतेजीते टूट सा गया है. अफसोस और अपराधभाव उस के चेहरे के भावों से परिलक्षित होने लगे हैं. सच तो यह भी है कि अदालत के चक्कर काटतेकाटते वह थक गया है. हालत तो माला की भी कुछ ऐसी ही है, क्योंकि पिछले 5 सालों से वह भी अपनेपरायों सब की नफरत झेल रही है. यहां तक कि उस के बच्चे भी उस से दूर हो गए हैं. आखिर क्या मिला उन्हें इस तरह का कदम उठा कर?

‘‘चलो तुम्हें घर छोड़ देता हूं,’’ वल्लभ ने माला से कहा, तो थकी हुई आवाज में उस ने कहा, ‘‘मैं चली जाऊंगी, तुम्हें तो वैसे ही देर हो चुकी है.’’

‘‘बैठो,’’ वल्लभ ने कार का दरवाजा खोलते हुए कहा. फिर माला को उस के घर छोड़ कर जहां वह बतौर पेइंग गैस्ट रहती थी, वल्लभ औफिस की ओर चल दिया.

लंच टाइम हो चुका था. आज भी हाफ डे लगेगा. इस केस के चक्कर में हर महीने छुट्टियां या हाफ डे लेने पड़ते हैं. कितनी बार तो वह विदआउट पे भी हो चुका है. निजी कंपनियों में सरकारी नौकरी जैसे सुख नहीं हैं कि जब चाहे छुट्टी ले लो. यहां तो काम भी कस कर लेते हैं और समय देख कर काम करने वालों को तो पसंद ही नहीं किया जाता है. माला की तो इस वजह से 2 नौकरियां छूट चुकी थीं. अदालत में आतेजाते और वकील की फीस देतेदेते उन की आर्थिक स्थिति भी बिगड़ गई थी. बेशक माला और वल्लभ एकदूसरे का पूरा साथ दे रहे थे और उन के बीच के प्यार में इन 5 सालों में कोई कमी भी नहीं आई थी, पर कहीं न कहीं दोनों को लगने लगा था कि ऐसा कदम उठा कर उन से कोई भूल हो गई है. उन्हें अभी भी अलग ही रहना पड़ रहा था. समाज, परिवार और दोस्तों, सब की नाराजगी सहते हुए वे जी रहे थे, सिर्फ इस आशा से कि एक दिन अदालत का फैसला उन के हक में हो जाएगा और वे दोनों साथसाथ रहने लगेंगे.

वल्लभ औफिस में भी सारा दिन तनाव में ही रहा. वह काम में मन ही नहीं लगा पा रहा था. ‘‘कोई बात बनी?’’ कुलीग रमन ने पूछा तो उस ने सिर हिला दिया, ‘‘माला के लिए भी कितना मुश्किल है न यह सब. लेकिन फिर भी वह तेरा साथ दे रही है. वह सचमुच तुझ से प्यार करती है यार वरना कब की भानू के पास चली जाती.’’

‘‘रमन तू सही कह रहा है. पर माला और मैं अब दोनों ही बहुत थक गए हैं. अब तो लगता है कि 5 साल पहले जैसे जिंदगी चल रही थी, वही ठीक थी. न माला मेरी जिंदगी में आती और न यह तूफान आता. 42 साल का हो गया हूं, पर अभी भी परिवार बनाने के लिए भाग रहा हूं. माला भी अब 40 की है. कभीकभी गिल्टी फील करता हूं कि मेरी वजह से उसे भानू को छोड़ना पड़ा,’’ वल्लभ भावुक हो उठा.

‘‘संभाल अपनेआप को यार. प्यार कोई सोचसमझ कर थोड़े ही करता है. वह तो बस हो जाता है. तू अपने आप को दोष मत दे. सब ठीक हो जाएगा,’’ रमन ने उसे तसल्ली तो दे दी. पर वह भी जानता था कि मामला इतनी आसानी से सुलझने वाला नहीं है.

‘‘कैसे ठीक हो जाएगा? अब तक तो तू समझ ही गया होगा कि नेहा मुझे कभी तलाक नहीं देगी और अदालत के चक्कर लगवाती रहेगी. वह उन लोगों में से है, जो न खुद चैन से जीते हैं और न दूसरों की जीने देते हैं.’’

वल्लभ को मायूस देख रमन ने उस का कंधा थपथपाया. हालांकि वह जानता था कि उस की तसल्ली भी उस के काम नहीं आएगी. औफिस से लौट कर अपने घर का दरवाजा खोल वल्लभ बिना लाइट जलाए ही सोफे पर पसर गया. शरीर और मन जब दोनों ही थक जाएं तो इंसान बिलकुल टूट जाता है. बीते पल उसे बारबार झकझोर रहे थे. 15 साल पहले उस की और नेहा की शादी हुई थी. उस समय वह नौकरी करता था. पर उस का वेतन इतना नहीं था कि नेहा के शाही खर्चों को वह उठा सके. उस के ऊपर छोटी बहन का भी दायित्व था और अपनी मां की भी वह सहायता करना चाहता था, क्योंकि पिता थे नहीं. नेहा को उस के घर के हालात पता थे, फिर भी उस के  मांबाप ने उस की उस से शादी की तो कुछ देखा ही होगा. पर नेहा बहुत गुस्सैल और कर्कश स्वभाव की थी. वह बातबात पर उस से लड़ने लगती और मां से भी बहस करने लगती. बहन को ताने देती कि उस की वजह से उसे अपनी छोटीछोटी खुशियों को भी दांव पर लगाना पड़ता है.

नेहा चाहती थी कि सारा दिन घूमे या शौपिंग करे. घर का काम करना तो उसे पसंद ही नहीं था. वल्लभ उसे समझाने की कोशिश करता तो वह मायके चली जाती और बहुत मिन्नतों के बाद वापस आती. रोजरोज की किचकिच से वह तंग आ गया था. शादी के 2 साल बाद जब उन का बेटा हुआ तो उसे लगा कि अब शायद नेहा सुधर जाएगी. पर वह तो वैसी लापरवाह बनी रही. मां या बहन को ही बेटे को संभालना पड़ता. बेटा बीमार होता तो भी उसे छोड़ सहेलियों के साथ पिक्चर देखने चली जाती. एक बार बेटे को निमोनिया हुआ और नेहा ने उसे ठंडे पानी से नहला दिया. नन्ही सी जान ठंड सह नहीं पाई और बुखार बिगड़ गया. 2 दिन बाद उस की मौत हो गई. कुछ दिन नेहा रोई, शांत बनी रही, पर फिर वापस अपने ढर्रे पर लौट आई.

परेशान वल्लभ ने घर में रहना ही कम कर दिया. मां बहन को ले कर गांव चली गई. नेहा कईकई दिनों तक खाना नहीं बनाती थी. घर गंदा पड़ा रहता, पर वह तो बस घूमने निकल जाती. वल्लभ उस समय इतना परेशान था कि वह घंटों पार्क में बैठा रहता. ‘‘क्यों आजकल घर में दिल नहीं लगता? क्या कोई और मिल गई है?’’ नेहा का कटाक्ष उसे आहत कर जाता. उस ने बहुत बार उसे प्यार से समझाना चाहा, पर वह अपनी मनमानी करती रही. मांबहन के जाने के बाद से जैसे वह और आजाद हो गई थी. वल्लभ का जिस बिल्डिंग में औफिस था, उसी की दूसरी मंजिल पर माला का औफिस था. लिफ्ट में आतेजाते उन की मुलाकातें हुईं और फिर बातें होने लगीं. धीरेधीरे एकदूसरे के प्रति उन का आकर्षण बढ़ने लगा. वल्लभ तो वैसे भी प्यार के लिए तरसरहा था और माला भी अपने वैवाहिक जीवन से दुखी थी. उस के पति भानू को शराब की लत थी और नशे में वह उसे मारता था. अपने दोनों बच्चों की खातिर वह उसे सह रही थी. धीरेधीरे वे दोनों कब एकदूसरे को चाहने लगे, उन्हें पता नहीं चला. दोनों ही अपनेअपने साथी से छुटकारा पा एक खुशहाल जीवन जीने के सपने देखने लगे. पर उस के लिए दोनों का तलाक लेना जरूरी था. नेहा तो अपने बच्चों को भी अपने साथ रखना चाहती थी, जिसे ले कर वल्लभ को कोई आपत्ति नहीं थी, क्योंकि वह खुद बच्चों के लिए तरस रहा था.

उन दोनों के रिश्ते के बारे में लोगों को पता चलते ही जैसे बम फूटा था. नेहा तो जैसे रणचंडी बन गई थी, ‘‘तुम चाहते होगे कि तुम्हें तलाक दे दूं ताकि तुम उस कलमुंही के साथ गुलछर्रे उड़ा सको. कभी नहीं. अब समझ आया कि मुझ से क्यों भागते रहते हो. मुझे छोड़ तुम दूसरी शादी करने का सपना देख रहे हो. सारी उम्र अदालत के चक्कर काटते रहना, पर मैं तुम्हें तलाक देने वाली नहीं.’’

माला के साथ तो भानू ने और भी बुरा व्यवहार किया, शर्म नहीं आई तुझे, किसी और के साथ मुंह काला करते हुए…’’ यह तो उस ने कहा ही इस के अलावा उस ने पासपड़ोस वालों के सामने क्याक्या नहीं कहा. उस के बाद वह उसे रोज ही मारने लगा. बच्चे कुछ समझ नहीं पा रहे थे, इसलिए सहमे से रहते. जब कभी माला से मिलने वल्लभ घर जाता तो बच्चे कहते, ‘‘मम्मी, ये अंकल हमारे घर क्यों आते हैं? हमें अच्छा नहीं लगता. हमारे स्कूल फैं्रड्स कहते हैं कि आप दूसरी शादी करने वाली हो. मम्मी, पापा जैसे भी हैं हमें उन्हीं के साथ रहना है.’’

फिर एक वक्त ऐसा आया जब भानू तो तलाक देने को तैयार हो गया. पर उस की शर्त थी कि वह उसे तलाक और बच्चों को कस्टडी तभी देगा जब वह उसे क्व20 लाख देगी. माला कहां से लाती इतनी बड़ी रकम. तब से यानी पिछले 5 सालों से माला और वल्लभ दोनों तलाक पाने के लिए लड़ रहे हैं, पर कोई फैसला ही नहीं हो पा रहा है. समय के साथसाथ पैसा भी खर्च हो रहा है और माला और वह साथसाथ नहीं रह सकते, इसलिए दोनों अलगअलग रह रहे हैं.मोबाइल बजा तो वल्लभ की तंद्रा भंग हुई. 9 बज गए थे. उस ने लाइट जलाई. फोन पर माला थी. ‘‘वल्लभ, मैं तो अदालत के चक्कर लगातेलगाते तंग आ गई हूं. भानू ने आज तो मुझे धमकी दी है कि जल्दी ही मैं ने उसे पैसे नहीं दिए तो वह बच्चों को ले कर कहीं दूर चला जाएगा. कुछ समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं,’’ कहते हुए माला रो रही थ, लेकिन आज वल्लभ के पास कुछ कहने के लिए शब्द ही नहीं थे. कैसे कहे वह कि माला सब ठीक हो जाएगा, तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारे साथ हूं. कहां कुछ ठीक हो पा रहा है? ‘‘कल मिल कर बात करते हैं,’’ कह कर वल्लभ ने फोन काट दिया.

इन 5 सालों में उस के बालों की सफेदी चमकने लगी थी. काम में ध्यान नहीं लगा पाने के कारण प्रमोशन हर बार रुक जाता था. मां अलग नाराज थीं कि चाहे बीवी जैसी हो उस के साथ निभाना ही पड़ता है. इस चक्कर में बहन की शादी भी नहीं हो पा रही थी. सारे रिश्तेदारों ने उस से मुंह मोड़ लिया था. समाज से कट गया था वह पूरी तरह और औफिस में भी वह मजाक का पात्र बन गया था.

माला से प्यार करने की उसे इतनी बड़ी सजा मिलेगी उस ने कहां सोचा था. कहां तो उस ने सोचा था कि नेहा से तलाक ले कर माला के साथ एक खुशहाल जिंदगी बिताऊंगा, पर यहां तो सब उलटा हो गया था. इतनी मुसीबतें झेलने से तो अच्छा था कि वह कर्कशा बीवी के साथ ही जिंदगी गुजार लेता. उस का तो अब यह हाल है कि न माया मिली न राम. ‘‘आखिर हमें क्या मिला वल्लभ? माना कि भानू के साथ मैं कभी सुखद जीवन जीने की बात तो छोड़ो उस के सपने भी नहीं देख पाई, पर उस से अलग हो कर भी कहां सुखी हूं? मेरे बच्चे तक अब मुझ से मिलना नहीं चाहते हैं और तुम से भी दूर ही तो रहना पड़ रहा है. समाज मुझे ऐसे देखता है मानो पति को छोड़ मैं ने कोई बड़ा अपराध किया है. 40 साल की हो गई हूं और कुछ सालों में बुढ़ापा छा जाएगा, तब मेरा क्या होगा? दिनरात की भागदौड़ में कैरियर भी ठीक से बन नहीं पाया है और मेरे मांबाप तक ने मेरा साथ देने के लिए मना कर दिया है,’’ वल्लभ से मिलते ही जैसे माला के अंदर भरा गुबार बाहर निकल आया.

‘‘मेरी भी हालत कुछ ऐसी ही है माला, पर अब कर भी क्या सकते हैं?’’ वल्लभ ने एक आह भरी.

‘‘जानते हो जिन के घर में मैं बतौर पेइंग गैस्ट रहती हूं, वे अकसर कहती हैं कि जैसे आप पेरैंट्स चूज नहीं कर सकते हो, वैसे ही पार्टनर के बारे में अपनी तरफ से कोई फैसला नहीं ले सकते हो. जिस से एक बार शादी हो जाए, वह जैसा है उसे वैसा ही ऐक्सैप्ट कर लो. यही प्रैक्टिकल ऐप्रोच मानी जाती है.’’

वल्लभ को लगा कि वे माला से ठीक ही कह रही थीं. आखिर माला और उसे शादी के बाद प्यार में पड़ कर क्या मिला? तलाक न जाने कब मिले और कोई गारंटी भी नहीं कि मिलेगा भी कि नहीं. एक हफ्ते बाद फिर उन के केस की सुनवाई हुई. नेहा अड़ी हुई थी कि वह तलाक नहीं देगी और भानू पैसे मांग रहा था. अदालत की सीढि़यां उतरते हुए माला और वल्लभ ने एकदूसरे को इस तरह देखा कि मानों पूछ रहे हों कि अब क्या करें? दोनों के पास इस का कोई उत्तर नहीं था पर शायद भीतर ही भीतर दोनों समझ गए थे कि तलाक लेने का उन का फैसला गलत था. शादीशुदा हो कर प्यार करना और उसे निभाना उतना आसान नहीं है, जितना कि उन्होंने सोचा था. दोनों चुपचाप एक बैंच पर जा कर बैठ गए. जिंदगी उन्हें जिस मोड़ पर ले आई थी वहां से लौटना क्या अब आसान होगा? थोड़ी देर बाद माला उठी और बिना कुछ कहे चल दी. हर बार की तरह वल्लभ ने उस से न घर तक छोड़ आने की बात कही और न ही उस ने कार में बैठते हुए अदालत की उन सीढि़यों को देखा, जिन पर चलतेचलते उन दोनों के पैर ही नहीं दिलोदिमाग भी थक गया था. Hindi Love Stories

Family Story : दो लाख – धर्म सिंह का चेहरा लाल क्यों पड़ गया ?

Family Story : कर्नल धर्म सिंह जैसे ही अपने दफ्तर से निकले कि उन के ड्राइवर ने तेजी दिखाते हुए कार का दरवाजा खोला, पर कर्नल ने इशारे से ड्राइवर को अपने पास बुलाया और उसे बाजार से कुछ सामान लाने का आदेश दिया. फिर वे अपने घर की ओर पैदल ही चल पड़े. दफ्तर से घर का रास्ता मुश्किल से कुछ ही गज की दूरी पर था. पत्नी रजनी ने कर्नल धर्म सिंह को पहले ही मोबाइल फोन पर सूचना दे दी थी कि उन के गांव के रिश्ते के चाचा रघुवीर सिंह अपने बेटे ज्ञानेश के साथ उन से मिलने आए हैं.

कर्नल धर्म सिंह अपने गांव से आने वाले किसी भी शख्स की खूब आवभगत करते थे. गांव से उन का प्यार और मोह भंग नहीं हुआ था. रघुवीर चाचा से मिलते ही कर्नल धर्म सिंह ने उन के पैर छुए और चाचा ने भी उन्हें अपने गले से लगा लिया. ज्ञानेश ने भी पूरी इज्जत के साथ कर्नल धर्म सिंह के पैर छुए. बातचीत का दौर चला, फिर चाचा रघुवीर सिंह अपने मुद्दे पर आ गए. उन्होंने कहा, ‘‘बेटा धर्म सिंह, तुम्हारा यह छोटा भाई ज्ञानेश अगले हफ्ते मेरठ में लगने वाले सेना के भरती कैंप में जाने की तैयारी कर रहा है.’’ ‘‘चाचाजी, देश की सेवा से बढ़ कर तो कोई चीज हो ही नहीं सकती. ज्ञानेश जैसे हट्टेकट्टे नौजवानों के सेना में शामिल होने से सेना तो मजबूत होगी ही, हमारे गांव का नाम भी रोशन होगा,’’ कर्नल धर्म सिंह ने कहा.

‘‘बेटा, मैं इसीलिए तो तुम्हारे पास आया हूं कि तू इस की कुछ मदद कर दे.’’

‘‘चाचाजी, यह भी कोई कहने की बात है. ज्ञानेश मेरा छोटा भाई है. इस के कसरती बदन को देख कर ही लग रहा है कि यह सेना के लिए फिट है. रही बात लिखित इम्तिहान की तो इस के लिए मैं कुछ किताबें बता देता हूं, उन से पढ़ाई कर के यह अच्छी तैयारी कर ले.’’ यह सुन कर चाचा रघुवीर सिंह कुछ देर के लिए चुप हो गए, उन के चेहरे की रंगत भी हलकी पड़ गई. फिर कुछ सोच कर वे धीरे से बोले, ‘‘धर्म सिंह, तैयारी तो इस ने खूब कर रखी है. हकीकत तो यह है कि आजकल बिना लिएदिए कोई बात नहीं बनती.’’

‘‘चाचाजी, सेना की भरती में यह सबकुछ नहीं चलता है. हमारा सिस्टम भले ही कितना भी खराब क्यों न हो गया हो, हमारी सेना अभी भी साफसुथरी है. आखिर देश की हिफाजत का सवाल जो है.’’

कर्नल धर्म सिंह की यह बात सुन कर चाचा रघुवीर सिंह मुसकरा दिए और फिर बड़े यकीन से बोले, ‘‘धर्म सिंह, मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हें अभी सिस्टम की सही जानकारी नहीं है या फिर तुम अपनी सेना को पाकसाफ बताने की बहानेबाजी कर रहे हो.

‘‘आसपास के गांवों के 5 लोगों के नाम तो मैं यहां बैठे-बैठे बता सकता हूं, जिन्होंने अपने बेटों की भरती में 2-2 लाख रुपए खर्च किए हैं.’’ यह बात सुन कर धर्म सिंह दंग रह गए. वे जानते थे कि सेना की भरती में ऐसा कुछ नहीं होता है और भरती मुहिम के दौरान कोई ऐसा कर भी नहीं सकता है. सबकुछ बड़ी साफगोई और सेना के बड़े अफसरों की निगरानी में होता है. उन्होंने चाचा रघुवीर सिंह को सबकुछ समझाने की कोशिश की, लेकिन सब फेल. फिर चाचा रघुवीर सिंह ने जो कहा, वह किसी भी ईमानदार और देशभक्त सेनाधिकारी के लिए असहनीय था.

चाचा रघुवीर सिंह ने कहा, ‘‘बेटा धर्म सिंह, ऐसा लगता है कि तुम हमें बातों में उलझा रहे हो और हमारा काम नहीं करना चाहते. यह मत सोचो कि मैं यहां खाली हाथ आया हूं.’’

फिर चाचा रघुवीर सिंह ने अपनी अचकन में हाथ डाला और एकएक हजार रुपए के नोटों की 2 गड्डियां मेज पर रख दीं और कहा, ‘‘धर्म सिंह, गिन लो, पूरे 2 लाख रुपए हैं.’’

कर्नल धर्म सिंह का चेहरा नोटों की गड्डियों को देख कर लाल हो गया. अगर चाचा रघुवीर सिंह की जगह कोई और होता, तो उन्होंने उसे घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया होता या जेल में भिजवा दिया होता. कर्नल धर्म सिंह ने अपने गुस्से को शांत करने के लिए आधा गिलास पानी पीया, फिर यह सोचते हुए कि चाचाजी को समझाना बेकार है और चाचाजी के उन पर बहुत से एहसान हैं, इसलिए उन्होंने वे दोनों गड्डियां उठा कर अपने पास रख लीं. इस से चाचा रघुवीर सिंह तो खुश हो गए, लेकिन रजनी पसोपेश में पड़ गई. रजनी को समझ में नहीं आया कि उन का यह देशभक्त पति इतनी आसानी से बेईमान कैसे हो गया? क्या पैसे में इतनी ताकत होती है, जो कर्नल धर्म सिंह जैसे ईमानदारों का भी ईमान बिगाड़ दे?

जब कर्नल धर्म सिंह ने रजनी से दोनों गड्डियों को लौकर में रखने को कहा, तो वे उन पर बिगड़ गईं और बोलीं, ‘‘तुम ने यह सोच भी कैसे लिया कि मैं इन पैसों को हाथ भी लगाऊंगी? तुम ने अपना ईमान खो दिया तो क्या तुम उम्मीद करते हो कि सूबेदार की यह बेटी भी अपना ईमान खो देगी? लानत है तुम पर…’’ रजनी ने अपनी भड़ास निकालते हुए वह सबकुछ कह दिया, जो कहना नहीं चाहिए था. फिर कर्नल धर्म सिंह ने उन्हें कुछ ऐसा समझाया कि वे बुझे मन से उन गड्डियों को लौकर में रख आईं.

सेना में भरती का दिन आ गया. ज्ञानेश ने शारीरिक टैस्ट में अपना दमखम दिखाया और उस का आसानी से चुनाव हो गया. चाचा रघुवीर सिंह तो फूले नहीं समा रहे थे.

वे बारबार ज्ञानेश से कह रहे थे, ‘‘देखा बेटे, गड्डियों का असर. अब तू लिखित इम्तिहान में भी पास होगा.’’

कुछ दिनों बाद लिखित इम्तिहान हुआ. ज्ञानेश ने उस की भी खूब तैयारी की थी. कर्नल धर्म सिंह की बताई किताबों को उस ने खूब पढ़ा था. नतीजा वही रहा कि लिखित इम्तिहान में भी ज्ञानेश ने बाजी मार ली. चाचा रघुवीर सिंह का तो खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था. गांव में लड्डू बांटते समय वे 2 लाख रुपए वाली बात किसी को बताना नहीं भूलते थे. फिर उन्होंने कर्नल धर्म सिंह के लिए भी देशी घी के 2 किलो स्पैशल लड्डू तैयार कराए. अगले ही दिन वे ज्ञानेश को ले कर कर्नल धर्म सिंह की कोठी पर जा पहुंचे.

कर्नल धर्म सिंह ने पहले की तरह ही दोनों की आवभगत की. चाचा रघुवीर सिंह तो पूरे जोश में थे. उन से यह बताने से रुका नहीं जा रहा था कि 2 लाख रुपए की वजह से ही ज्ञानेश को यह कामयाबी मिली. उसी जोश में वे पूछ बैठे, ‘‘धर्म सिंह, पैसे कम तो नहीं पड़े? आखिर सब को हिस्सा देना पड़ता है न. तुम्हारे पल्ले भी कुछ पड़ा है कि नहीं?’’

कर्नल धर्म सिंह को यह बात करेले की तरह कड़वी तो लगी ही, नुकीले कांटे की तरह दिल में भी चुभी. लेकिन उन्होंने बड़े सब्र से कहा, ‘‘चाचाजी, मेरे पल्ले तो सबकुछ पड़ गया.’’

‘‘मतलब, तुम ने किसी को कुछ भी नहीं दिया. अकेले ही….’’

‘‘हां चाचाजी… और क्या करता? जरा एक मिनट रुको, मैं अभी आया.’’

कर्नल धर्म सिंह उठ कर दूसरे कमरे में चले गए. चाचा रघुवीर सिंह ने इतराते हुए कहा, ‘‘देखा ज्ञानेश, आज की दुनिया में लोग कैसे पैसे के लिए मरते हैं. धर्म सिंह उस दिन कैसी बड़ीबड़ी बातें कर रहा था, लेकिन देखो कैसे अकेले ही 2 लाख रुपए हड़प गया.’’ तभी कर्नल धर्म सिंह एकएक हजार की 2 गड्डियां ले कर कमरे में दाखिल हुए. उन के हाथों में नोटों की गड्डियां देख कर रघुवीर सिंह कुछ सोच में पड़ गए.

कर्नल धर्म सिंह ने दोनों गड्डियां उन के सामने रखते हुए कहा, ‘‘चाचाजी, ये रहे आप के 2 लाख रुपए.’’

‘‘हां, लेकिन इन का मैं क्या करूं? इन पर तो तुम्हारा हक है. तुम ने तो सारा काम कराया है.’’

‘‘हां चाचाजी, मैं ने कोई काम नहीं कराया है और न ही कोई सिफारिश की है. ज्ञानेश का काम अपनी काबिलीयत से हुआ है. हमारी सेना में ऐसा कुछ नहीं होता, जैसा कि आप लोग सोचते हैं.’’

‘‘तो फिर तुम ने उस दिन 2 लाख रुपए क्यों रख लिए थे?’’

‘‘आप के 2 लाख रुपए दलालों के चंगुल से बचाने के लिए. मगर उस दिन मैं 2 लाख रुपए सहित वापस भेज देता, आप किसी दलाल के चंगुल में जा कर फंसते, जैसे आप के वे लोग फंसे हैं, जिन की आप ने उस दिन चर्चा की थी.’’

‘‘मतलब उन के बेटों की भरती भी उन की अपनी मेहनत से हुई थी, लेनदेन से नहीं?’’

‘‘हां चाचाजी. उस दिन भी तो मैं आप को यही समझा रहा था, लेकिन आप की समझ में बात नहीं आ रही थी.

‘‘दलाल लोगों से पैसे ले लेते हैं, काम हो जाता है तो कह देते हैं, काम हम ने कराया है. अगर काम नहीं होता है, तो वे बड़ी मुश्किल से कुछ ही पैसा वापस करते हैं.’’

‘‘हां बेटा, रामरतन का काम न होने पर उस का बड़ी मुश्किल से आधा पैसा ही वापस किया था. दलाल कहते थे कि खिलानेपिलाने में आधा पैसा खर्च हो गया. उन्होंने तो पूरी कोशिश की थी, लेकिन काम नहीं बना, तो वे क्या करें.’’

‘‘चाचाजी, आप गांव के अपने आदमी थे, इसलिए मुझे ऐसा करना पड़ा, नहीं तो मुझे ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं थी. अब इन पैसों को आप अपनी अचकन में रख लो.’’ चाचाजी ने धीरे से दोनो गड्डियां उठा कर अचकन में रखीं. वे एक निगाह कर्नल धर्म सिंह को देखते और दूसरी निगाह खाली होते हुए चाय के प्याले में डालते. बस, अब उन्हें चाय खत्म होने और कर्नल धर्म सिंह से विदाई की इजाजत लेने का इंतजार था. Family Story 

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