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Social Story In Hindi : गलतियां सभी से होती हैं

Social Story In Hindi : दुलहन के जोड़े में सजी रोली बेहद ही खूबसूरत और आकर्षक लग रही थी. वैसे तो रोली प्राकृतिक रूप से खूबसूरत थी, परंतु आज ब्यूटीपार्लर के ब्राइडल मेकअप ने उस के चेहरे पर चार चांद लगा दिया था, किंतु उस के कमनीय चेहरे पर आकुलता थी. उस की नजरें रिसेप्शन में आ रहे मेहमानों पर ही टिकी हुई थीं. उस की निगाहें बेसब्री से किसी के आने का इंतजार कर रही थीं.

रोली को इस प्रकार परेशान देख वीर उस के हाथों को थामते हुए बोला, “क्या बात है? आर यू ओके?”

रोली होंठों पर फीकी सी मुसकान लिए बोली, “यस… आई एम ओके, परंतु थोड़ी सी थकान लग रही है.”

ऐसा सुनते ही वीर ने कहा, “पार्टी तो काफी देर तक चलेगी. तुम चाहो तो कुछ देर रूम में रिलैक्स हो कर आ जाओ.”

वीर के ऐसा कहने पर रोली रूम में चली आई और फौरन मोबाइल फोन निकाल नंबर डायल करने लगी. फोन बजता रहा, लेकिन किसी ने नहीं उठाया.रोली दुखी हो कर वहीं सोफे पर पसर गई.

उसे डौली आंटी याद आने लगी. आज वह जो भी है, उन्हीं की वजह से है वरना वह तो इस महानगरी में गुमनामी की जिंदगी जीने की ओर अग्रसर थी. वो डौली आंटी ही थीं, जिन्होंने वक्त पर उस का हाथ थाम लिया और वह उस गर्त में जाने से बच ग‌ई.

आज उस का प्यार वीर उस के साथ है. यह भी डौली आंटी की ही देने है. पर, अब तक वे आई क्यों नहीं? उन्होंने तो वादा किया था कि वे अंकल के साथ उस की शादी में जरूर आएंगी.

यही सब सोचती हुई रोली वहां पहुंच गई. अपने परिवार वालों से जिद कर वह एक सफल इंटीरियर डिजाइनर बनने का इरादा मन में ठाने जब अपने छोटे से शहर जौनपुर से दिल्ली आई थी.

यहां दिल्ली यूनिवर्सिटी में आ कर उस ने जो देखा, उसे देख वह भौंचक्की सी रह गई. यहां सभी लड़केलड़कियां बिना किसी पाबंदी के उन्मुक्त बिंदास अंदाज में खुल कर जीता देख रोली खुशी से उछल पड़ी. ऐसा उस ने पहले कभी नहीं देखा था.यहां ना तो कोई किसी को रोकने वाला था और ना ही कोई टोकने वाला, जैसा चाहो वैसा जियो.

रोली भी अब आजाद पंछी की भांति आकाश में उड़ने को तैयार थी.

वहां जौनपुर में दादी, मम्मीपापा, चाचाचाची, ताऊ यहां तक कि उस का छोटा भाई भी उस पर बंदिशें लगाता. हर छोटीबड़ी बातों के लिए उसे अनुमति लेनी पड़ती, परंतु यहां ऐसा कुछ नहीं था.

यहां रोली स्वयं अपनी मरजी की मालकिन थी. वह वो सब कर सकती थी, जो उस का दिल चाहता.

दिल्ली में आने के पश्चात रोली अपना लक्ष्य भूल यहां के चकाचौंध में खो गई. वह तो अपनी रूम पार्टनर रागिनी के संग जिंदगी के मजे लूटने लगी.

रागिनी उस से एक साल ‌सीनियर थी और हर मामले में स्मार्ट, र‌ईस लड़कों को अपनी अदाओं से रिझाना, उन्हें फांसना और उन से पैसे खर्च कराना, ये सारे हुनर उसे बखूबी आते थे, लेकिन रोली इन सब बातों से बेखबर बस रागिनी के बोल्डनेस और उस के बिंदास जीने के अंदाज की कायल थी.

रोली बिना सोचेसमझे कालेज में दिखावा और खुद को मौडल बताने के चक्कर में पैसे खर्च करने लगी. उसे इस बात का भी खयाल ना रहा कि वह एक मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार से ताल्लुक रखती है, जहां पैसे हिसाब से खर्च किए जाते हैं.

अपने घर की सारी परिस्थितियों से भलीभांति अवगत होने के बावजूद रोली रागिनी के रंग में रंगने लगी. केवल अब तक वह सिगरेट और शराब से बची हुई थी, लेकिन रागिनी को बिंदास धुआं उड़ाते, कश लगाते और पी कर लहराते देख कभीकभी उस का भी मन करता, लेकिन ना जाने कौन सी बात उसे रोक लेती. इस बार पैसे खत्म होने पर जब उस ने घर पर मां को फोन किया, तो मां भरे कंठ से बोली, “रोली, देखो बेटा हम हर महीने तुम्हें जितने पैसे भेजते हैं, तुम उसी से खर्च चलाने की कोशिश करो अन्यथा तुम्हें यहां वापस आना पड़ेगा.”

मां और भी कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन उन के कहने से पहले ही रोली ने फोन काट दिया. होस्टल के कमरे में आई, तो उस ने देखा कि रागिनी अपना सारा सामान समेट कर कहीं जाने की तैयारी में है. यह देख रोली बोली, “कहां जा रही हो?”

रागिनी हंसते हुए अपने दोनों हाथ रोली के कंधे पर टिकाती हुई बोली, “ऐश करने, मेरी जान.”

रोली आश्चर्य से रागिनी को देखने लगी, तभीरागनी धुआं उड़ाती हुई बोली, “नहीं समझी मेरी मोम की भोली गुड़िया, मैं सौरभ के पास जा रही हूं. अब हम दोनों साथ ही रहेंगे. उस के बाप के पास बहुत माल है. उसे उड़ाने के लिए कोई तो चाहिए ना, सो मैं जा रही हूं. वैसे भी सौरभ मुझ पर लट्टू है.”

यह सुनते ही रोली बोली, “लेकिन…”

रागिनी उसे बीच में ही टोकती हुई बोली, “लेकिन क्या…? माई स्विट हार्ट मुझे मालूम है कि मैं क्या कर रही हूं. मेरी मान तो तू भी होस्टल छोड़ करबकिसी पीजी में रहने चली जा, फिर बिंदास रहना अपने वीर के साथ, समय पर होस्टल लौटने का कोई लफड़ा नहीं, अच्छा चलती हूं… फिर मिलते हैं,” कहती हुई रागिनी झूमते हुए चली गई.

रागिनी के होस्टल से चले जाने के पश्चात रोली भी कुछ दिनों में होस्टल छोड़ पीजी में डौली आंटी के यहां आ गई.

यहां आने के बाद उसे पता चला कि यहां रहना इतना आसान नहीं है. लोग डौली आंटी के बारे में तरहतरह की बातें किया करते थे. कोई उन्हें खड़ूस, कोई पागल, तो कोई उन्हें सीसीटीवी कहता, क्योंकि उन की नजरों से कुछ भी छुपना नामुमकिन था. आसपड़ोस की महिलाएं तो उन से बात करने से भी कतरातीं, सब कहतीं कि न जाने कब ये सनबकी बुढ़िया किस बात पर सनक जाए.

डौली आंटी की टोकाटाकी की वजह से कोई ज्यादा दिनों तक यहां टिकता भी नहीं था, लेकिन रोली का अब यहां रहना मजबूरी था, क्योंकि वह होस्टल छोड़ चुकी थी और सब से बड़ी बात डौली आंटी पैसे भी कम ले रही थी, यहां से कालेज की दूरी भी ज्यादा नहीं थी, जिस की वजह से बस और रिकशा के पैसे भी बच रहे थे और साथ ही साथ डौली आंटी के हाथों में वो जादू था कि वह जो भी खाना बनाती स्वादिष्ठ और लजीज होता, उस में बिलकुल मां के हाथों का स्वाद होता.

सब ठीक था, लेकिन डौली आंटी की टोकाटाकी और जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप रोली को नागवार गुजरने लगा. वह वीर के साथ भी वैसे समय नहीं बिता पा रही थी, जैसा उस ने सोचा था.
जब उस ने वीर से इस बारे में बात की, तो वह कहने लगा, “आंटी स्ट्रिक्ट है तो क्या हुआ… वह तुम्हारा भला ही चाहती है. 1-2 साल में मेरा प्रमोशन हो जाएगा. कंपनी की ओर से मुझे फ्लेट भी मिल जाएगा और तुम्हारा ग्रेजुएशन भी पूरा हो जाएगा, फिर हम शादी कर साथ रहेंगे.”

वीर से यह सब सुन रोली स्तब्ध रह ग‌ई. वह तो उस से शादी करना ही नहीं चाहती. वह तो बस वीर को अपनी खूबसूरती और मोहपाश के झूठे जाल में केवल पैसों के लिए बांध रखी थी और वह भी रागिनी के कहने पर, लेकिन अब वीर उस से शादी की सोच रहा है. यह जान कर रोली विचलित हो ग‌ई.

अपसेट रोली घर पहुंची, तो उस ने देखा कि डौली आंटी और अंकल कहीं जाने की तैयारी में हैं. उसे देखते ही आंटी बोली, “रोली बेटा मैं और अंकल एक शादी में जा रहे हैं. कल रात तक लौटेंगे. तुम अपना और घर का खयाल रखना, रात को दरवाजा अच्छी तरह बंद कर लेना,” इतना कह कर वे दोनों चले गए.

परेशान रोली को कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह क्या करे. तभी रागिनी का फोन आया.

रोली उसे फोन पर सारी बातें बता कर इस समस्या से बाहर निकलने का हल पूछने लगी, तो रागनी ने कहा, “डोंट वरी डियर, आज रात मैं तेरे रूम पर आती हूं. दोनों पार्टी करते हैं और सोचते हैं कि क्या करना है.”

रोली नहीं चाहती थी कि रागिनी आए, लेकिन वह उसे मना ना कर सकी. रागिनी शराब, सिगरेट और दो चीज पिज्जा ले कर पहुंची.

ये सब देख कर रोली चिढ़ती हुई बोली, “तू ये सब क्या ले कर आई है? आंटी को पता चल गया, तो वह मुझे निकाल देगी.”

“चिल यार… किसी को कुछ पता नहीं चलेगा. वैसे भी आंटी तो कल रात तक लौटेंगी?” कहती हुई रागिनी एक गिलास में शराब डालती हुई धुआं उड़ाने लगी.

रोली भी वीर की बातों से परेशान तो थी ही, वह भी सिगरेट सुलगा कर पीने लगी. तभी रागिनी अपने बैग से एक छोटी सी पुड़िया निकाल कर रोली को देती हुई बोली, “इसे ट्राई कर… ये जादू की पुड़िया है. इसे लेते ही तेरी सारी परेशानी उड़नछू हो जाएगी.”

यह सुन कर रोली पुड़िया खोल कर एक ही बार में ले ली. पुड़िया लेने के कुछ समय पश्चात वह बेहोश होने लगी. यह देख कर रागिनी उसे उसी हालत में छोड़ भाग गई.

जब रोली को होश आया, तो उस ने स्वयं को अस्पताल के बेड पर लेटा पाया, जहां एक ओर डौली आंटी डबडबाई आंखों से स्टूल पर बैठी थी और अंकल डाक्टर से कुछ बातें कर रहे थे.

रोली को होश में आया देख आंटी ने रोली का माथा चूम लिया. रोली घबराई हुई डौली आंटी की ओर देखने लगी, तभी आंटी रोली का हाथ अपने हाथों में लेती हुई बोली, “शादी में पहुंचने के बाद मैं ने रात को क‌ई दफे तुम्हें फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला, किसी अनहोनी के भय से हम उसी वक्त घर लौट आए. यहां आ कर देखा, तो बाहर का दरवाजा खुला था और तुम बेहोश पड़ी थी. पूरे कमरे में शराब की बोतल, सिगरेट और ड्रग्स के पैकेट पड़े थे. हम समझ गए कि आखिर माजरा क्या है.”

फिर आंटी लंबी सांस लेते हुए बोली, “तुम सब यह सोचते हो ना कि मैं इतनी खड़ूस, इतनी स्ट्रिक्ट क्यों हूं. मैं ऐसी इसलिए हूं, क्योंकि इसी ड्रग्स की वजह से मैं ने अपने एकलौते बेटे को खोया है…

“और मैं यह नहीं चाहती कि कोई भी मांबाप अपने बच्चे को इस वजह से खोए. मेरा बेटा भी तुम्हारी तरह आंखों में क‌ई सुनहरे सपने लिए बीई की पढ़ाई करने जालंधर गया था, लेकिन वहां जा कर वह बुरी संगत में पड़ ड्रग्स लेने लगा, क्योंकि वहां कोई रोकटोक करने वाला नहीं था और हर कोई बस यही सोचता था कि हमें क्या करना…?

“एक बार सप्ताहभर उस ने कोई फोन नहीं किया, हमारे फोन लगाने पर वह फोन भी नहीं उठा रहा था, तब हम परेशान हो कर उस के पास पहुंचे, तो पता चला कि वह ड्रग्स की ओवरडोज के कारण हफ्तेभर से अपने कमरे में बेहोश पड़ा है. उसे देखने वाला कोई नहीं था. हम उसे उसी हालत में यहां ले आए, लेकिन बचा ना सके.”

यह सब कहती हुई डौली आंटी फूटफूट कर रो पड़ी. रोली की आंखों के कोर में भी पानी आ गया.

आंटी ने आगे बताया कि तुम भी ड्रग्स के ओवरडोज की वजह से बेहोश पड़ी थी. आज पूरे 2 दिन बाद तुम्हें होश आया है.

यह सुन कर रोली की आंखें शर्म से झुक गईं. तभी आंटी बोली, “बेटी, गलतियां तो सभी से होती हैं, लेकिन उन गलतियों से सबक ले कर आगे बढ़ना ही जीवन है. अक्लमंदी और समझदारी इसी में है कि वक्त रहते उन्हें सुधार लिया जाए .”

फिर आंटी मुसकराती हुई बोली, “वीर एक अच्छा लड़का है. तुम्हें बहुत प्यार भी करता है और शायद तुम भी, वरना पिछले डेढ़ साल में रागिनी की तरह तुम भी क‌ई बौयफ्रेंड बदल चुकी होती.

“वीर तुम्हें क‌ई बार फोन कर चुका है, मैं ने उस से कहा है कि तुम हमारे साथ शादी में आई हो और अभी काम में व्यस्त हो.”

खटखट की आवाज से रोली वर्तमान में लौट आई. दरवाजा खोलते ही डौली आंटी और अंकल सामने खड़े थे. उन्हें देखते ही रोली आंटी से लिपट रो पड़ी, उसे शांत कराती हुई आंटी बोली, “रोते नहीं बेटा, अब तुम एक सफल इंटीरियर डिजाइनर हो. तुम सफलता के उस शिखर पर हो, जहां पहुंचने का सपना लिए तुम इस महानगरी में आई थीं. आज खुशी का दिन है,अब आंसू पोंछो और चलो वीर तुम्हारा पार्टी में इंतजार कर रहा है.” Social Story In Hindi 

Social Story : मर्यादा – मर्दों की फितरत जान कर फायदा उठाना स्वाति खूब जान गई थी

Social Story : रात के 12 बज रहे थे, लेकिन स्वाति की आंखों में नींद नहीं थी. वह करवटें बदल रही थी. उस की बगल में लेटा पति वरुण गहरी नींद में खर्राटे भर रहा था. स्वाति दिन भर की थकान के बाद भी सो नहीं पा रही थी. आज का घटनाक्रम बारबार उस की आंखों में घूम रहा था. आज ऐसा कुछ हुआ कि वह कांप कर रह गई. जिसे वह सिर्फ खेल समझती थी वह कितना गंभीर हो सकता है, उसे इस बात का भान नहीं था. वह मर्दों से हलकाफुलका मजाक और फ्लर्टिंग को सामान्य बात समझती थी. स्वाति अपनी फ्रैंड्स और रिश्तेदारों से कहती थी कि उस की मार्केट में इतनी जानपहचान है कि कोई भी सामान उसे स्पैशल डिस्काउंट पर मिलता है.

स्वाति फोन पर अपने मायके में भाभी से कहती कि आज मैं ने वैस्टर्न ड्रैस खरीदी. इतनी बढि़या और अच्छे डिजाइन में बहुत सस्ती मिल गई. मैं ने साड़ी बिलकुल नए कलर में खरीदी. 1000 की है पर मुझे सिर्फ 500 में मिल गई. डायमंड रिंग अपनी फ्रैंड से और्डर दे कर बनवाई. ऐसी रिंग 2 लाख से कम नहीं, परंतु मुझे 11/2 लाख में मिल गई. भाभी की नजरों में स्वाति की छवि बहुत ही समझदार और पारखी महिला के रूप में थी. वह जब भी कोई सामान खरीद कर भेजने को कहती, स्वाति खुशीखुशी भिजवा देती. पूरे परिवार में उस के नाम का डंका बजता था.

स्वाति आकर्षक नैननक्श वाली पढ़ीलिखी महिला थी. बचपन से ही उसे खरीदारी का बेहद शौक था. लाखों रुपए की खरीदारी इतने कम दाम और चुटकियों में करती कि हर कोई हैरान रह जाता. स्वाति का मायका मिडल क्लास फैमिली से था. 15 साल पहले एक बड़े उद्योगपति परिवार में उस की शादी हुई. शादी भले ही करोड़पति घर में हो गई, लेकिन संस्कार वही मिडल क्लास फैमिली वाले ही थे. 1-1 पैसे की कीमत वह जानती थी. घर खर्च में पैसा बचाना और उस पैसे से स्वयं के लिए खरीदारी करने में उसे बहुत मजा आता. पति से भी पैसे मारना स्वाति को अच्छा लगता था. अच्छे संस्कार, पढ़ीलिखी और समझदार स्वाति को एक बात बड़ी आसानी से समझ आ गई थी कि पुरुषों की कमजोरी क्या है. कैसे कम रेट पर खरीदारी करनी है. वह उस दुकान या शोरूम में ही खरीदारी करती जहां पुरुष मालिक होते. वह सेल्समैन से बात नहीं करती. सेल्समैन से वह कहती, ‘‘आप तो सामान दिखा दो, रेट मैं अपनेआप भैया से तय कर लूंगी.’’

और जब हिसाबकिताब की बारी आती, तो वह सेठ की आंखों में आंखें डाल कर कहती, ‘‘भैया सही रेट बताओ. आज की नहीं 10 सालों से आप की शौप पर आ रही हूं.’’

‘‘भाभी, आप को रेट गलत नहीं लगेगा, क्यों चिंता करती हैं?’’ सेठ कहता.

‘‘नहीं, इस बार ज्यादा लगा रहे हो. मुझे तो स्पैशल डिस्काउंट मिलता है, आप की शौप पर,’’ कहते हुए स्वाति काउंटर पर खड़े सेठ के हाथों को बातोंबातों में स्पर्श करती या फिर कहती, ‘‘भैया, आप तो मेरे देवर की तरह हो. देवरभाभी के बीच रुपएपैसे मत लाओ न.’’

अकसर दुकानदार स्वाति की मीठीमीठी बातों में आ कर उसे 10-20% तक स्पैशल डिस्काउंट दे देते थे. एक ज्वैलर से तो स्वाति ने जीजासाली का रिश्ता ही बना लिया था. ज्वैलरी आमतौर पर औरतों की कमजोरी होती है, स्वाति की भी कमजोरी थी. वह अकसर इस ज्वैलर के यहां पहुंच जाती. क्याक्या नई डिजाइनें आई हैं, देखने जाती तो कुछ न कुछ पसंद आ ही जाता. तब जीजासाली के बीच हंसीमजाक शुरू हो जाता.

स्वाति कहती, ‘‘साली आधी घरवाली होती है जीजाजी, इतने ही दूंगी.’’

ज्वैलर स्वाति का स्पर्शसुख पा कर निहाल हो जाता. उस के मन में स्पर्श को आगे बढ़ाने की प्लानिंग चलती रहती, पर स्वाति थी कि काबू में ही नहीं आती थी. सामान खरीदा और उड़न छू. उस दिन भतीजी की शादी के लिए सामान व ज्वैलरी खरीदने स्वाति ज्वैलर के यहां पहुंच गई. उसे भाभी ने बताया था कि क्याक्या खरीदना है.

स्वाति ने घर से निकलने से पहले ही ज्वैलर को फोन किया, ‘‘भतीजी की शादी के लिए ज्वैलरी खरीदने आ रही हूं. आप अच्छीअच्छी डिजाइनों का चयन करा कर रखना. मेरे पास ज्यादा टाइम नहीं होगा.’’

‘‘आप आइए तो सही साली साहिबा. आप के लिए सब हाजिर है,’’ ज्वैलर ने कहा. ज्वैलरी की यह दुकान कोई बड़ा शोरूम नहीं था, लेकिन वह खुद अच्छा कारीगर था और और्डर पर ज्वैलरी तैयार करता था. शहर की एक कालोनी में उस की दुकान थी जहां कुछ खास लोगों को और्डर पर तैयार ज्वैलरी भी दिखा कर बेच देता था और और्डर देने वाले को कुछ दिन बाद सप्लाई दे देता. स्वाति की एक फ्रैंड रजनी ने उस ज्वैलर्स से उस की मुलाकात कराई थी. लेकिन रजनी कभी यह बात समझ नहीं पाई थी कि आखिर यह ज्वैलर स्वाति पर इतना मेहरबान क्यों रहता है. उसे नईनई डिजाइनें दिखाता है और अतिरिक्त डिस्काउंट भी देता है.

‘‘जीजाजी, कुछ और डिजाइनें दिखाओ. ये तो मैं ने पिछली बार देखी थीं,’’ स्वाति ने ज्वैलर की आंखों में झांकते हुए कहा.

स्वाति को ज्वैलर की आंखों में शरारत नजर आ रही थी. वह बारबार सहज होने की कोशिश कर रहा था. अपनी आदत के मुताबिक स्वाति ने बातोंबातों में ज्वैलर के हाथों पर इधरउधर स्पर्श किया. उस का यह स्पर्श ज्वैलर को बेचैन कर रहा था. उस ने भी स्वाति की हरकतें देख हौसला दिखाना शुरू कर दिया. वह भी बातोंबातों में स्वाति के हाथों पर स्पर्श करने लगा. यह स्पर्श स्वाति को कुछ बेचैन कर रहा था, लेकिन वह सहज रही. उसे कुछ देर की हरकतों से स्पैशल डिस्काउंट जो लेना था. स्वाति ने देखा कि आज दुकान पर सिर्फ एक लड़का ही हैल्पर के तौर पर काम कर रहा था बाकी स्टाफ न था. ज्वैलर ने उसे एक सूची थमाते हुए कहा कि यह सामान मार्केट से ले आओ. और जाने से पहले फ्रिज में रखे 2 कोल्ड ड्रिंक खोल कर दे जाओ.’’

‘‘आप और नई डिजाइनें दिखाइए न,’’ स्वाति ने कहा.

‘‘हां, अभी दिखाता हूं. कल ही आई हैं. आप के लिए ही रखी हुई हैं अलग से.’’

‘‘तो दिखाइए न,’’ स्वाति ने चहकते हुए कहा.

‘‘आप ऐसा करें अंदर वाले कैबिन में आ कर पसंद कर लें. अभी अंदर ही रखी हैं… लड़का भी जा चुका है तो…’’

स्वाति ने देखा लड़का सामान की सूची ले कर जा चुका था. अब दुकान पर सिर्फ ज्वैलर और स्वाति ही थे. स्वाति को एक पल के लिए डर लगा कि अकेली देख ज्वैलर कोई हरकत न कर दे. वह ऐसा कुछ चाहती भी नहीं थी. वह तो सिर्फ कुछ हलकीफुलकी अदाएं दिखा कर दुकानदारों से फायदा उठाती आई थी. आज भी ऐसा कुछ कर के ज्वैलर से स्पैशल डिस्काउंट लेने की फिराक में थी. उस की धड़कनें बढ़ रही थीं. वह चाहती थी कि जल्दी से जल्दी खरीदारी कर के निकल ले. उस का दिमाग तेजी से काम कर रहा था कि क्या करे. वह अपनेआप को संभाल कर कैबिन में ज्वैलरी देखने घुस गई. उस ने अपने शब्दों में मिठास घोलते हुए कहा, ‘‘जीजाजी, आज कुछ सुस्त लग रहे हो क्या बात है?’’

‘‘नहींनहीं, ऐसा कुछ नहीं है.’’

‘‘कोई तो बात है, मुझ से छिपाओगे क्या?’’

‘‘आप नैकलैस देखिए, साथसाथ बातें करते हैं,’’ ज्वैलर ने कहा. स्वाति गजब की सुंदर लग रही थी. वह बनठन कर निकली थी. ज्वैलर के मन में हलचल थी जो उसे बेचैन कर रही थी. उस ने सोचा कि हिम्मत दिखाई जा सकती है. अत: उस ने स्वाति के हाथ को स्पर्श किया तो वह सहम गई. लेकिन उस ने सोचा कि अगर थोड़ा छू लिया तो उस से क्या फर्क पड़ेगा. स्वाति के रुख को देख ज्वैलर का हौसला बढ़ गया. उस ने स्वाति का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा. ज्वैलर की इस आकस्मिक हरकत से वह हड़बड़ा गई.

‘‘क्या कर रहे हो?’’ स्वाति ने हाथ छुड़ाते हुए कहा.

ज्वैलर ने अपनी हरकत जारी रखी. स्वाति घबरा गई. ज्वैलर की हिम्मत देख दंग रह गई वह. मर्दों की कमजोरी का फायदा उठाने की सोच उसे भारी पड़ती नजर आ रही थी. वह कैसे ज्वैलर के चंगुल से बचे, सोचने लगी. फिर उस ने हिम्मत दिखाई और ज्वैलर के गाल पर थप्पड़ों की बारिश कर दी. स्वाति क्रोध से कांप रही थी. उस का यह रूप देख ज्वैलर हड़बड़ा गया. इसी हड़बड़ी में वह जमीन पर गिर गया. स्वाति के लिए यही मौका था कैबिन से बाहर निकल भागने का. अत: वह फुरती दिखाते हुए तुरंत कैबिन से बाहर निकल अपनी कार में जा बैठी. फिर तुरंत कार स्टार्ट कर वहां से चल दी. उस के अंदर तूफान चल रहा था. उसे आत्मग्लानि हो रही थी. लंबे समय से स्वाति जिसे खेल समझती आ रही थी, वह कितना गंभीर हो सकता है, उस ने यह कभी सोचा भी नहीं था. Social Story

Family Story In Hindi : बीवी ओल्ड, बीवी न्यू, बीवी गोल्ड, बीवी…

Family Story In Hindi : ज्योंज्यों जिंदगी टैक्निक से टैक्निकल होती जा रही है, त्योंत्यों इधर खुशियों के रूपस्वरूपों के साथसाथ डर के भी रूपस्वरूप बदलते जा रहे हैं. तकनीकी के इस युग में अनजाने लोगों से उतना डर नहीं लगता, जितना अनजाने नंबर की कौल से लगता है.
खाली जनधन खाते के सिवाय और तो मेरे पास कुछ भी नहीं, मगर फिर भी क्या पता किसी की अनजानी कौल सुनने पर वह मेरा खाली जनधन खाता और खाली कर जाए. असल में मैं ने जनधन खाता इसलिए खुलवाया था कि कम से कम उस में रसाई गैस की सब्सिडी आया करेगी, पर मजे की बात, उस में रसोई गैस की सब्सिडी कभी नहीं आई.

हे मेरी तरह के घरेलू कुत्ते उर्फ शेरो, घर के बाहर विदेशों से आयातित शेरों की तरह दहाड़ने वाले शुद्ध स्वदेशी सियारो, मैं सब के खुदा को हाजिर मान कर बयान से न बदलने वाला बयान दे रहा हूं, जिस का सोशल मीडिया जो चाहे मतलब निकाल ले, मेरा कहने का वही मतलब होगा कि मैं उतना अपनी बीवी को अटेंड करने से नहीं डरता, जितना अनजानी कौल अटेंड करने से डरता हूं. मैं उतना अपने ईमानदार, मेरे लिए समर्पित दोस्तों को अटेंड करने से भी नहीं डरता, जितना अनजानी कौल अटेंड करने से डरता हूं. इसलिए, मैं केवल उन्हीं नंबरों से आई कौल स्वीकारता हूं, जो मेरी कौंटैक्ट लिस्ट में हों. मैं अपनी बीवी तक की उसी कौल को अटेंड करता हूं, जो मेरी कौंटैक्ट लिस्ट में हो.

कल पता नहीं किस का फोन आया. मैं ने काट दिया. फिर उसी नंबर से दोबारा फोन आया, तो कुछ गुस्से से मैं ने फिर काट दिया. बाद में जब उन्होंने पुराने नंबर से फोन कर बताया तो पता चला कि गधे, ये तो अपने खास दोस्त का नया अननोन नंबर है. नंबर बदलने की परंपरा में ये उन का पांचवा नया नंबर था. पता नहीं क्यों वे उतनी जल्दी नंबर बदलते हैं, जितनी जल्दी गिरगिट भी रंग नहीं बदलता. पता नहीं क्यों वे उतनी जल्दी नंबर बदलते हैं जितनी जल्दी सांप भी केंचुली नहीं बदलता. नंबर बदलना उन का शौक है या कुछ और, वे ही जानें. चौथे दिन नंबर बदलने के पीछे आगे का राज वे ही जाने.

‘यार, मैं तुझे बारबार फोन कर रहा हूं और तू बारबार फोन काट रहा है?’ उन्होंने बेकार का सा शिकवा मुझ से किया, पर मैं ने उसे परे धकेल दिया, ‘अनजान नंबर था इसलिए…’

‘यह भी मेरा नया नंबर है.’

‘बंधु, तुम ही कहो, अब तुम्हारे कितने नंबर कैसे किसकिस नाम से सेव करूं? जब तुम्हारा मन करे, तुम नंबर बदल लेते हो,’ मैं ने अपना मोबाइल खुजलाते हुए वाजिब सा सवाल उठाया तो वे मुझे शांत कराते हुए बोले, ‘देखो दोस्त, मोबाइल है तो हर चौथे दिन नया नंबर है. आज आदमी के पास अपने मोबाइल के नंबर बदलने की ही तो बस एक औप्शन बचा है, सो बेचारा ईजीली बदल देता है. वैसे, आज आदमी आदमी न रह कर एक मोबाइल नंबर हो कर रह गया है. सो, टेक इट इजी यार.

‘देखो दोस्त, रिश्तों का अर्थ तो बहुत पहले बदल चुका था. दीनईमान का अर्थ भी बहुत पहले का बदल चुका है. इनसायित का अर्थ भी बहुत पहले बदल चुका है. नीयत का अर्थ भी बहुत पहले बदल चुका है. आदमियत का अर्थ भी बहुत पहले बदल चुका है. सच बोलने वाली जीभ भी बहुत पहले बदल चुकी है. सच सुनने वाले कान भी बहुत पहले बदल चुके हैं. समाजोपयोगी सोचने वाला दिमाग भी बहुत पहले बदल चुका है. ऐसे में अब कम से कम आदमी से नित अपने मोबाइल का नंबर बदलने का हक तो मत छीनो दोस्त… रही बात मेरा नया नंबर सेव करने की, तो तुम मेरा नया नंबर भी उसी तरह से सेव कर लो, जैसे एक आदर्श पति अपनी बीवी के तीनतीन नंबर यों सेव कर सेफ रहता है- बीवी ओल्ड, बीवी न्यू, बीवी गोल्ड, बीवी…

‘मेरा नंबर भी तुम उसी तरह सेव कर लो, जैसे हर आदर्श पत्नी अपने पति का हर नया नंबर सेव करती है- हसबेंड पुराने, हसबेंड नए, हसबेंड औफिस, हसबेंड इमर्जेंसी, हसबेंड टेंपरेरी, हसबेंड परमानेंट या फिर बेटा अपने पापा का हर नया नंबर यों सेव करता है- पापा पुराने, पापा नए, पापा घर, पापा औफिस या फिर…,’ बंधु ने 2,000 रुपए वाले नोट सी नसीहत दी, तो मैं ने अपने मोबाइल से अपना सिर फोड़ लिया. वे पास होते तो उन का भी फोड़ देता.

थैंक गौड, सिर फूटा तो फूटा, पर मोबाइल सहीसलामत रहा. सिर का क्या, जख्म हुआ तो हुआ, खून बहा तो बहा, चार दिन बाद सब ठीक हो जाएगा. न भी हुआ तो कौन सा नासूर बन जाएगा. बन भी जाए तो बन जाए, पर जो मोबाइल को कुछ हो जाता तो??? Family Story In Hindi

Bollywood : सैयारा ने लौटाई खुशियां, पर अनुपम खेर और सिन्हा परिवार की डूबी लुटिया

Bollywood : बौलीवुड में 2025 की पहली छमाही एकदम सूखी गई. कई सिंगल थिएटरों ने तो बंद करने का ऐलान कर दिया था. बौलीवुड के कई फिल्मकार खुलेआम कहने लगे थे कि अब दर्शक सिनेमाघर जा कर फिल्म ही नहीं देखना चाहता.लेकिन जुलाई माह के तीसरे सप्ताह यानी कि 18 जुलाई को स्थितियां एकदम से बदल गई और यह कारनामा नए कलाकारों के अभिनय से सजी मोहित सूरी निर्देशित फिल्म ‘‘सैयारा’’ की वजह से ही संभव हो पाया.

जुलाई माह के तीसरे सप्ताह यानी कि 18 जुलाई को एक साथ तीन फिल्में रिलीज की गई.पहली अनुपम खेर की फिल्म ‘तनवी द ग्रेट’,दूसरी षत्रुघ्न सिन्हा के बेटे कुष सिन्हा व बेटी सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म ‘निकिता रॉय’ तथा तीसरी मोहित सूरी की फिल्म ‘सैयारा’.

18 जुलाई को पहली फिल्म रहस्य व रोमांच से भरपूर ‘निकिता रॉय’ रिलीज हुई थी,जिसके निर्माता व निर्देषक अपने समय के मषहूर अभिनेता व पूर्व सांसद षत्रुघ्न सिन्हा के बेटे कुष सिन्हा हैं.फिल्म में काफी की बहन सोनाक्षी सिन्हा के साथ अर्जुन रामपाल व परेष रावल की मुख्य भूमिका है.इस फिल्म के लिए कुष सिन्हा व सोनाक्षी सिन्हा ने कोई फीस नहीं ली. 25 करोड़ रूपए की लागत में बनी यह फिल्म पूरे 7 दिन में केवल एक करोड़ रूपए ही एकत्र कर सकी.

दूसरी फिल्म अनुपम खेर की ‘‘तनवी द ग्रेट’ रिलीज हुई. 23 साल बाद इस फिल्म के निर्देशन से अभिनेता अनुपम खेर ने निर्देशन में वापसी की, जो कि बुरी तरह से असफल रही. फिल्म का निर्माण अनुपम खेर ने सरकारी संस्थान ‘राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम’ के सहयोग से किया है. तनवी के मुख्य किरदार में नवोदित अभिनेत्री सुभंगी दत्त को उन्होंने ब्रेक दिया.

फिल्म को ओटिज्म की शिकार लड़की की कहानी के रूप में प्रचारित किया गया. जो कि ओटिज्म से ग्रसित होने के बावजूद आर्मी में भर्ती हो कर सियाचीन ग्लेशियर की सब से उंची चोटी पर जा कर तिरंगे झंडे को सलामी देना चाहती है. अफसोस इस फिल्म में ओटिज्म और आर्मी को छोड़ की बाकी सारी बातें हैं.

इस फिल्म ने पूरे सप्ताह भर में बौक्स औफिस पर केवल एक करोड़ 90 लाख रूपए ही एकत्र किए. अनुपम खेर अपनी इस फिल्म का बजट बताने को तैयार नहीं हैं. पर वह रोना रो रहे हैं कि उन्होंने 10 लोगों से पैसे ले कर इस फिल्म को बनाया था और अब वह बुरी तरह से नुकसान में आ गए हैं.

18 जुलाई को ही ‘यशराज फिल्म्स’ निर्मित तथा मोहित सूरी निर्देशित फिल्म ‘सैयारा’ रिलीज हुई, जो कि 2004 की सफल कोरियन फिल्म ‘‘ए मोमेंट टू बी रिमेम्बर्ड’’ पर आधारित है. रोमांटिक कौमेडी फिल्म ‘सैयारा’ में दो नवोदित कलाकारों अहान पांडे और अनीत पड्डा की जोड़ी है. अहान पांडे नेपोकिड हैं. उन के चाचा चंकी पांडे मशहूर अभिनेता हैं जबकि उन की कजिन अनन्या पांडे भी अभिनेत्री हैं.

अहान पांडे के पिता चिक्की पांडे फिल्म जगत व उद्योग जगत की हस्ती हैं. उन का प्रोडक्शन हाउस व इवेंट कंपनी है. शाहरुख खान को स्ट्रगल के दिनों में चिक्की पांडे ने ही मदद की थी. 60 करोड़ रूपए के बजट में बनी फिल्म ‘सैयारा’ ने एक सप्ताह के अंदर 172 करोड़ रूपए बौक्स औफिस पर एकत्र कर कई रिकार्ड बना डाले.

‘सैयारा’ के बौक्स औफिस पर आए तूफान के चलते कई बंद होने जा रहे थिएटरों को जीवन दान मिल गया. फिलहाल फिल्म ब्लौकबस्टर हो गई है.

फिल्म ‘सैयारा’ के लिए यशराज फिल्म्स की पीआर टीम ने बहुत अलग तरह से काम किया. अब तक फिल्म के दोनों कलाकारों से मीडिया को नहीं मिलवाया गया. जब फिल्म की एडवांस बुकिंग शुरू हुई तो उस के दूसरे दिन से पीआर टीम ने बहुत बड़े स्तर पर सोशल मीडिया के हर प्लेटफौर्म पर प्रचारित किया कि एडवांस बुकिंग में सारे रिकार्ड टूट गए.

सलमान खान व महेश बाबू सहित सहित आधे से ज्यादा फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने फिल्म व अहान पांडे की तारीफों के पुल बांधते हुए कमेंट जारी किए. पहले दिन यानी कि ओपनिंग डे इस फिल्म ने 22 करोड़ रूपए से अधिक कमाए. तब चर्चा हुई कि अहान पांडे के पिता चिक्की पांडे ने अपनी पहुंच का फायदा उठा कर कौरपोरेट बुकिंग कर रहे हैं और चिक्की पांडे ने खुद कई करोड़ रूपए की टिकटें खरीद लीं.

इस तरह के आरोपों का चिक्की पांडे या यशराज फिल्म्स की तरफ से कोई जवाब नहीं दिया गया. पर सोशल मीडिया पर कई तरह के वीडियो पोस्ट करवाए गए. यह सब देख कर फिल्म ‘कांटे’ सहित कई सफलतम फिल्मों के निर्माता निर्देशक संजय गुप्ता सहित कई फिल्मकारों ने ‘सैयारा’ की पीआर टीम के खिलाफ जम कर बयानबाजी की ओर इसे पीआर टीम का बहुत गलत रवैया करार दिया.

हम ने मुंबई व मुंबई से बाहर कुछ सिनेमाघर मालिकों से बात की तो उस से यह बात साफ होती है कि कौरपारेट बुकिंग या चिक्की पांडे ने कुछ टिकटें खरीदी होंगी, पर जिस तरह बौक्स औफिस कलेक्शन है, उस से यह नहीं कहा जा सकता कि फिल्म असफल है.

फिल्म ‘सैयारा’ ब्लौकबस्टर हो चुकी है. यशराज फिल्म्स ने ‘सैयारा’ को जुलाई के चौथे सप्ताह भी थिएटरों में लगाए रखने का निर्णय किया है. कुछ लोग मान रहे हैं कि यशराज फिल्म्स इस तरह अपनी 14 अगस्त को रिलीज होने वाली बड़े बजट की फिल्म ‘वार 2’ के लिए मैदान तैयार कर रही है. कुछ भी हो पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अनीत पड्डा और अहान पांडे बेहतरीन कलाकार हैं. इन दोनों कलाकारों ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है. लेखन में कमी रही और अलमाइजर की बीमारी का जिस तरह से असंवेदनशील तरीके से फिल्म में उपयोग किया गया, वह गलत है.

एक बात यह तय है कि चिक्की पांडे अपने बेटे अहान पांडे को सुपरस्टार बनाने के लिए पीआर पर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं. इस का नुकसान यह हो सकता है कि कहीं अहान पांडे भी कुमार गौरव की तरह ‘वन फिल्म वंडर’ न बन कर रह जाएं. इसलिए अब इन्हें अपनी पीआर स्ट्रेटजी में बदलाव करना चाहिए.

Indira Gandhi : इंदिरा का ‘राष्ट्रीय हित’ आपातकाल ‘ट्रंप के शासन में आंदोलन पर अमेरिकी’

Indira Gandhi : 25-26 जून, 1975 की रात को भारत में आपातकाल की घोषणा हुई थी. रेडियो पर आपातकाल की घोषणा 26 जून, 1975 को सुबह इंदिरा गांधी ने औल इंडिया रेडियो पर सुबह के प्रसारण में देश को संबोधित करते हुए कहा, “राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा कर दी है. इस में घबराने की कोई बात नहीं है.”

यह उन का सब से प्रसिद्ध बयान था, जिस का उद्देश्य जनता को आश्वस्त करना था कि आपातकाल सामान्य नागरिकों के लिए नहीं, बल्कि देश की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए है.

अपने रेडियो संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा कि देश में ‘गहरी साजिश’ रची जा रही थी, जिस का उद्देश्य उन की सरकार को अस्थिर करना और देश को अराजकता की ओर धकेलना था. उन्होंने दावा किया कि कुछ लोग ‘प्रगतिशील कदमों’ (जैसे गरीबों और महिलाओं के लिए उन के सुधार) का विरोध कर रहे थे. इंदिरा गांधी ने आपातकाल को आंतरिक अशांति के आधार पर लागू किया, उसे ‘राष्ट्रीय हित’ में बताया. इंदिरा गांधी के चुनाव को इलाहाबाद के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने राजनारायण की चुनावी याचिका के मद्देनजर रद्द कर दिया था.

इंदिरा गांधी का पूरा भाषण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है. उन के भाषण का मुख्य उद्देश्य जनता को शांत रखना और आपातकाल को आवश्यक कदम के रूप में प्रस्तुत करना था. हालांकि, बाद में उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘जब मैं ने आपातकाल लगाया, एक कुत्ता भी नहीं भूंका.’ यह उन के इस विश्वास को दर्शाता है कि जनता ने शुरू में इस का विरोध नहीं किया.

अमेरिका आज डोनाल्ड ट्रंप के शासन में आपातकाल जैसी स्थिति से जूझ रहा है और वहां लोकतंत्र समर्थक भारत के जयप्रकाश नारायण जैसा आंदोलन कर रहे हैं.

Hindi Love Stories : नाम की केंचुली

Hindi Love Stories : होटल सिटी पैलेस के रेस्तरां से बाहर निकलते समय पीहू की चाल जरूर धीमी थी मगर उस के कदमों में आत्मविश्वास की कमी नहीं थी. चेहरे पर उदासी की एक परत जरूर थी लेकिन पीहू ने उसे अपने मन के भीतर पांव नहीं पसारने दिया.

घर आ कर बिस्तर पर लेटी तो अखिल के साथ अपने रिश्ते को अंतिम विदाई देती उस की आंखें छलछला आईं.

पूरे 5 साल का साथ था उन का. ब्रेकअप तो खलेगा ही लेकिन इसे ब्रेकअप कहना शायद इस रिश्ते का अपमान होगा. इसे टूटा हुआ तो तब कहा जाता जब इस रिश्ते को जबरदस्ती बांधा जाता.

अखिल के साथ उस के बंधन में तो जबरदस्ती वाली कोई बात ही नहीं थी. यह तो दोनों का अपनी मरजी से एकदूसरे का हाथ थामना था जिसे अनुकूल न लगने पर उस ने बहुत हौले से छुड़ा लिया था, अखिल को भावी जीवन की शुभकामनाएं देते हुए.

पीहू और अखिल कालेज के पहले साल से ही अच्छे दोस्त थे. आखिरी बरस में आतेआते दोस्ती ने प्रेम का चोला पहन लिया. लेकिन यह प्रेम किस्सेकहानियों या फिल्मों वाले प्रेम की तरह अंधा नहीं बल्कि समय के साथ परिपक्व और समझदार होता गया था. यहां चांदतारे तोड़ कर चुनरी में टांकने जैसी हवाई बातें नहीं होती थीं, यहां तो अपने पांवों पर खड़ा हो कर साथ चलने के सपने देखे जा रहे थे.

कालेज खत्म होने के बाद पीहू और अखिल दोनों ही जौब की तलाश में जुट गए ताकि जल्द से जल्द अपने सपनों को हकीकत में ढाल सकें. हालांकि अखिल का अपना पारिवारिक व्यवसाय था लेकिन वह खुद को जमाने की कसौटी पर परखना चाहता था इसलिए एक बार कोई स्वतंत्र नौकरी करना चाहता था जो उसे विरासत में नहीं बल्कि खुद अपनी मेहनत से मिली हो.

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए दोनों दिल्ली आ गए. एक ही कोचिंग में साथसाथ तैयारी करने और घर के अनुशासन से दूर रहने के बावजूद दोनों ने अपनी परिधि तय कर रखी थी. जब भी अकेले में कोई एक बहकने लगता तो दूसरा उसे संभाल लेता. कई जोड़ियों को लिवइन में रहते देख कर उन का मन अपने लक्ष्य से कभी नहीं भटका.

“यार जब हम ने शादी करना तय कर ही लिया है तो अभी क्यों नहीं? सिर्फ एक बार…” कई बार उतावला पुरुष मन हठ पर उतर आता.

“शादी के बाद यही सब तो करना है. एक बार कैरियर बन जाए बस. फिर तो सदा साथ ही रहना है…” संयमी स्त्री उस के बढ़े हाथ हंस कर परे सरका देती. वहीं कभी जब सधे हुए नाजुक कदम अरमानों की ढलान पर फिसलने लगते तो दृढ़ मजबूत बांहें उन्हें सहारा दे कर थाम लेती और गर्त में गिरने से बचा लेती.

आज ऊपर तो कल नीचे, कोलंबस झूले से रिश्ते में दोनों झूल रहे थे. इसी बीच पीहू की बैंक में नौकरी लग गई और उस ने दिल्ली छोड़ दिया.

हालांकि दोनों फोन के माध्यम से बराबर जुड़े हुए थे लेकिन अब अखिल के लिए दिल्ली में अकेले रह कर परीक्षा की तैयारी करना जरा मुश्किल हो गया था. मन उड़ कर बारबार पीहू के पास पहुंच जाता लेकिन फिर भी वह खुद को एक मौका देने का मानस बनाए हुए वहां टिका रहा.

2 साल मेहनत करने के बाद भी अखिल का कहीं चयन नहीं हुआ तो वह वापस आ कर अपने परिवार के पुश्तैनी बिजनैस में हाथ बंटाने लगा. भागदौड़ खत्म हुई, स्थायित्व आ गया. जिंदगी एक तय रास्ते पर चलने लगी.

जैसाकि आम मध्यवर्गीय परिवारों में होता है, बच्चों के जीवन में स्थिरता आते ही घर में उन के लिए योग्य जीवनसाथी की तलाश शुरू हो जाती है. अखिल के घर में भी उस की शादी की बात चलने लगी. उधर पीहू के लिए भी लड़के की तलाश जोरशोर से जारी थी. जहां अखिल के परिवार की प्राथमिकता घरेलू लड़की थी, वहीं पीहू के घर वाले उस के लिए कोई बैंकर ही चाहते थे ताकि दोनों में आसानी से निभ जाए.

अखिल संयुक्त परिवार में तीसरी पीढ़ी का सब से बड़ा बेटा है. उस के द्वारा उठाया गया कोई भी अच्छाबुरा कदम भावी पीढ़ी के लिए लकीर बन सकता है. पारंपरिक मारवाड़ी परिवार होने के कारण अखिल के घर में बड़ों की बात पत्थर की लकीर मानी जाती है. दादा ने जो कह दिया वही फाइनल होता है. इस के बाद पापा या चाचा की एक नहीं चलने वाली. दूसरी तरफ पीहू का परिवार इस मामले में जरा तरक्कीपसंद है. उन्हें पीहू की पसंद पर कोई ऐतराज नहीं था बशर्ते कि उस का चयन व्यावहारिक हो.

परिवार की परिपाटी से भलीभांति परिचित अखिल घर वालों के सामने अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, उधर पीहू इस मामले में एकदम शांत थी. वह अखिल की पहल की प्रतीक्षा कर रही थी. उस ने ना तो अखिल पर शादी करने का कोई दबाव बनाया और ना ही अपनी असहमति जताई.

“पीहू मैं बहुत परेशान हूं यार. क्या करूं समझ में नहीं आ रहा. घर वाले चाहते हैं कि मेरी शादी किसी सजातीय मारवाड़ी खानदान की लड़की से हो यानी यह शादी सिर्फ 2 लोगों का नहीं बल्कि 2 व्यापारिक घरानों का मिलन हो ताकि यह संबंध दोनों परिवारों के बिजनैस को भी आगे बढ़ाए, लेकिन तुम तो जानती हो ना मैं ने तो तुम्हारे साथ के सपने देखे हैं. तुम्हीं बताओ, मैं कैसे अपने दादाजी को राजी करूं?” एक दिन अखिल ने कहा.

“इतनी हिम्मत तो तुम्हें जुटानी ही होगी अखिल. यदि आज हिम्मत नहीं करोगे तो सोच लो, बाद में पछताना ना पड़े,” पीहू ने गंभीर हो कर कहा.

“तो क्या तुम कुछ नहीं करोगी?” अखिल ने आश्चर्य से पूछा.

“तुम्हारे परिवार के मामले में मैं क्या कर सकती हूं? मैं अपनेआप में साफ हूं और जानती हूं कि मुझे तुम से शादी करनी है. इस के लिए मेरे घर वाले भी राजी हो जाएंगे लेकिन पहले तुम तो अपने घर वालों को राजी करो. लेकिन एक बात ध्यान रहे अखिल, मैं जैसी हूं मुझे इसी रूप में स्वीकार करना होगा. मुझ से मेरी पहचान छीनने की कोशिश मत करना. ना अभी, ना बाद में,” पीहू ने अपना फैसला सुनाया तो अखिल सोच में पड़ गया.

आधुनिक और आत्मनिर्भर पीहू की छवि उस के दादाजी की पसंद से एकदम विपरीत है. वैसे भी उन के परिवार में आजतक कोई विजातीय बहू या दामाद नहीं आए. उन्हें पीहू के लिए तैयार करना आसान नहीं होगा.

अखिल अपनी चाची से थोड़ा खुला हुआ था. उस ने उन से बात की. पहले तो चाची ने अखिल को ही समझाने का प्रयास किया लेकिन जब वह नहीं माना तो उन्होंने अखिल के चाचा से उस की पसंद का जिक्र किया. जैसाकि अंदेशा था, सुनते ही वे उखड़ गए.

“दिमाग खराब हो गया क्या लड़के का? अपने समाज में लड़कियों का अकाल पड़ गया क्या? अरे मैं तो उसे दिल्ली भेजने की उस की जिद पूरी करने के फैसले के ही खिलाफ था. फिर सोचा था जवानी की जिद है, सालदो साल में उतर जाएगी लेकिन यहां तो एक जिद के साथ दूसरी जिद भी साथ उठा लाया. एक तो बिजनैस में 2 साल पिछड़ गया, दूसरा यह प्रेम का चक्कर… समझाओ उसे कि नौकरी करने वाली लड़कियां हमारे यहां नहीं चल सकतीं,” चाचा ने अखिल को दिल्ली भेजने के बड़े भाई के फैसले का गुस्सा चाची पर उतारा.

लेकिन अखिल ने हौसला बनाए रखा. पिता को राजी करने का उस का प्रयास जारी रहा. इधर वह पीहू को भी जौब छोड़ने के लिए राजी कर रहा था ताकि कम से कम लड़की के घरेलू होने की शर्त तो पूरी हो सके. अखिल का प्रस्ताव पीहू के जरा भी गले नहीं उतरता था.

“तुम मुझे क्यों समझा रहे हो अखिल? मैं अपनी नौकरी जारी रखूंगी, बस इतना ही तो चाह रही हूं. देखो, समझने की जरूरत तुम्हें है. तुम्हारे सामने 2 विकल्प हैं. एक तुम्हारे परिवार की परंपरा और दूसरा तुम्हारा प्यार यानी मैं और मैं भी बिना अपनी पहचान खोए. जानते हो ना कि जब हमें 2 में से किसी 1 विकल्प का चुनाव करना होता है तो फैसला बहुत सोचसमझ कर करना पड़ता है. तुम तय करो कि तुम्हें क्या चाहिए,” पीहू ने दृढ़ता से कहा.

एक तरह से उस ने अपना निर्णय अखिल के सामने साफ कर दिया.
बुझा हुआ अखिल एक बार फिर से अपने घर वालों को मनाने में जुट गया. इस बार उस ने दादाजी को चुना.

कहते हैं कि मूल से प्यारा सूद होता है. दादाजी पोते के आग्रह पर पिघल गए. थोड़ी नानुकुर के बाद उन्होंने विजातीय पीहू के साथ उस का गठजोड़ करने के लिए हरी झंडी दिखा दी. अपनी कुछ शर्तों के साथ वे पीहू के परिवार से मिलने को तैयार भी हो गए.

अखिल इसे अपनी जीत समझते हुए खुशी से उछलने लगा. उस ने फोन पर पीहू को यह खुशखबरी दी और आगे की प्लानिंग करने के लिए उसे उसी होटल सिटी पैलेस में मिलने के लिए बुलाया जहां वे अकसर मिला करते थे. हालांकि पीहू अभी भी थोड़ी आशंकित थी.

“तुम ने उन्हें बता तो दिया ना कि मैं शादी के बाद जौब नहीं छोडूंगी?” पीहू ने अखिल को एक बार फिर से आगाह किया.

“जौबजौब… यह कैसी जिद पकड़ कर बैठी हो तुम? अरे हमारे परिवार को कहां कोई कमी है जो अपनी बहूबेटियों से नौकरी करवाएंगे…” पीहू की बात सुनते ही अखिल बिफर गया.

पीहू की आशंका सही साबित हुई. उस ने अखिल की तरफ अविश्वास से देखा तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. उस ने पीहू का हाथ कस कर पकड़ लिए और अपने स्वर को भरसक मुलायम किया.

“हमारे यहां बहुएं सिर्फ हुक्म चलाती हैं, हुक्म बजाती नहीं,” कहते हुए अखिल ने प्यार से पीहू के गाल खींच दिए. पीहू ने उस के हाथ झटक दिए.

“हमारे समाज में बहुओं के नखरे तब तक ही उठाए जाते हैं जब तक वे सिर पर पल्लू डाले, आंखें नीची किए सजीधजी गुड़िया सी घर में पायल बजाती घूमती रहें.”

“मुझ से यह उम्मीद मत रखना,” पीहू ने कहा.

“अरे यार गजब करती हो. एक बार शादी तो हो जाने दो फिर कर लेना अपने मन की. मैं बात करूंगा ना अपने घर वालों से,” अखिल ने उसे मनाने की कोशिश की.

“मेरे लिए भी यही बात तुम ने अपने घर में कही होगी कि एक बार शादी हो जाने दो, फिर छुड़वा देंगे नौकरी. मैं बात करूंगा ना पीहू से. है ना?”अखिल की आंखों में झांक कर पीहू ने उस की नकल उतारते हुए कहा.

बात सच ही थी. उस ने अपने दादाजी को यही कह कर पीहू से शादी करने के लिए राजी किया था. अखिल के पास पीहू के सवालों का कोई जवाब नहीं था. वह नजरें चुराने लगा.

“अच्छा बताओ, मेरी मां का नाम क्या है?” पीहू के अचानक दागे गए इस सवाल से अखिल अचकचा गया. उस ने इनकार में अपने कंधे उचका दिए.

“नहीं पता ना? पता होगा भी कैसे क्योंकि लोग उन्हें उन के नाम से जानते ही नहीं. वे बाहर के लोगों के लिए मिसेज सक्सेना और रिश्तेदारों के लिए पीहू की मम्मी हैं. और सिर्फ वे ही क्यों, ऐसी न जानें कितनी ही औरतें हैं जो अपना असली नाम भूल ही गई होंगी. वे या तो मिसेज अलांफलां या फिर गुड्डू, पप्पू की मम्मी के नाम से पहचानी जाती हैं. मैं ने देखा है अपने आसपास. अपने घर में भी. बहुत बुरा लगता है,” कहती हुई पीहू आवेश में आ गई.

“लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा होना बहुत जरूरी है. मैं तुम्हें प्यार करती हूं लेकिन सिर्फ इसी वजह से तुम्हारे घर में शोपीस बन कर नहीं रह सकती. तुम तो मेरे संघर्ष के साथी हो. सब जानते हो. मैं ने कितनी मुश्किल से अपनी पहचान बनाई है. इतनी मेहनत से हासिल इस मुकाम को मैं घूंघट की ओट में नहीं छिपा सकती. अपने नाम की पहचान को ऐशोआराम के लालच की आग में नहीं झोंक सकती,” पीहू ने अखिल का चेहरा पढ़ते हुए कहा.

“इस का मतलब तुम्हारे लिए तुम्हारी अपनी पहचान मुझ से अधिक जरूरी है. क्या तुम नहीं चाहतीं कि तुम्हारा नाम मेरे नाम से जुड़ कर पहचाना जाए, हमारे नाम एक हो जाएं? जरा सोचो, पीहू अखिल लखोटिया… आहा… सोच कर ही कितना अच्छा लग रहा है,” अखिल के स्वर में अभी भी एक उम्मीद शेष थी.

“नहीं, मैं नहीं चाहती कि मेरी पहचान तुम्हारे नाम की केंचुली में छिप जाए. पीहू अखिल सक्सेना या पीहू सक्सेना लखोटिया जैसा कुछ बन कर इतराने की बजाय मैं सिर्फ पीहू सक्सेना कहलाना अधिक पसंद करूंगी. सक्सेना ना भी हो तो भी चलेगा. मैं तो सिर्फ पीहू बन कर भी खुश रहूंगी. बल्कि मैं तो कहती हूं कि दुनिया की हर लड़की के लिए उस की अपनी पहचान बहुत जरूरी है,” पीहू ने भावुक होते हुए अखिल का हाथ थाम लिया.

“यानी तुम्हारी ना समझूं? हमारे सपनों का क्या होगा पीहू?” अखिल रुआंसा हो गया.

“हमारे सपने जुड़े हुए जरूर थे लेकिन उस के बावजूद भी वे स्वतंत्र थे, एकदूसरे से अलग थे. मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं. मैं यह भी नहीं चाहती कि तुम मेरे लिए अपने परिवार से बगावत करो, लेकिन माफ करना, मैं अपनी पहचान नहीं खो सकती. इसे तुम मेरा आखिरी फैसला ही समझो,” पीहू ने अपना आत्मविश्वास से भरा फैसला सुना दिया और स्नेह से अखिल का कंधा थपथपाती हुई उठ खड़ी हुई.

पीहू नहीं जानती थी कि वह अपने इस निर्णय को कितनी सहजता से स्वीकार कर पाएगी लेकिन यह भी तो आखिरी सच है कि हमारे हरेक कठोर निर्णय के समय मन के तराजू में एक तरफ निर्णय और दूसरी तरफ उस की कीमत रखी होती है.

आज भी पीहू के मन की तुला पर एक तरफ उस की निज पहचान थी तो दूसरी तरफ उस का प्रेम और सुविधाओं से भरा भविष्य. पीहू ने प्रेम की जगह अपनी पहचान को चुना. वह अखिल के नाम की केंचुली पहनने से इनकार कर अपने गढ़े हुए रास्ते पर बढ़ गई.

अखिल नम आंखों से उस आत्मविश्वास की मूरत को जाते हुए देख रहा था. Hindi Love Stories 

Social Story : ग्राम विकास प्राधिकरण

Social Story : लखीमपुरखीरी, उत्तर प्रदेश के गांव डिहुआकलां में जश्न का माहौल था. बेरोजगारों के चेहरे खिले हुए थे. बूढे़ मांबाप की आंखों में आशा के दीए जगमगा उठे थे. दरअसल, 2 दिन पहले भारत सरकार के ग्राम विकास मंत्रालय की तरफ से प्रधानजी को एक पत्र मिला था. उसे पढ़ते ही पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ गईर् थी. पत्र में लिखा था,

‘प्रिय प्रधानजी,

‘जयहिंद.

‘आप को यह जान कर प्रसन्नता होगी कि भारत सरकार की योजनाओं का लाभ सीधे ग्रामवासियों को मिल सके, इसलिए सरकार ने ग्राम विकास प्राधिकरण का गठन किया है. यह प्राधिकरण ग्रामवासियों के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य करेगा. प्राधिकरण का कार्य संचालित करने के लिए प्रत्येक ग्रामसभा में एक ग्राम विकास केंद्र की स्थापना की जाएगी. प्रत्येक केंद्र में 2 स्वास्थ्य सेवक, 2 स्वास्थ्य सेविकाएं, 2 स्वच्छता मित्र, 2 किसान मित्र और 2 जल संरक्षण सेवकों की तैनाती की जाएगी. इन में सभी पदों पर नियुक्तियां उसी ग्रामसभा के योग्य उम्मीदवारों की की जाएंगी. इन पदों पर चयन के लिए 3 सदस्यीय साक्षातकार समिति का गठन किया जाएगा, जिस में भारत सरकार के 2 अधिकारियों के साथसाथ संबंधित ग्रामप्रधान भी नामित किए जाएंगे.

‘इस पत्र के साथ संलग्न फौर्म भर कर इच्छुक उम्मीदवारों के प्रार्थनापत्र 15 दिन के भीतर रजिस्टर्ड डाक से प्राधिकरण के कार्यालय में भिजवाने की कृपा करें. सभी उम्मीदवारों को 500 रुपए का परीक्षा शुल्क देना होगा जोकि भारतीय स्टेट बैंक के खाता संख्या में जमा कर उस की रसीद प्रार्थनापत्र के साथ भेजनी अनिवार्य है. ‘कृपया इस पत्र का अपनी ग्रामसभा में व्यापक प्रचारप्रसार करें.

‘धन्यवाद.

‘सचिव, ग्राम विकास मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली.’

रमेश, कामता, राकेश, संगीता, सुमन और देवदत्त ने तो दूसरे ही दिन फौर्म भर कर बैंक में पैसे जमा कर दिए थे बाकी लोगों में जल्द से जल्द पैसा जमा करने की होड़ मची हुई थी. अपने ही गांव में केंद्र सरकार की नौकरी मिल जाए, इस से अच्छी बात और कोई हो ही नहीं सकती थी. ऐसा ही पत्र सभी ग्राम प्रधानों को प्राप्त हुआ था, क्योंकि चयन समिति में ग्राम प्रधानों को भी रखा गया था, इसलिए उन सब की इज्जत अचानक ही बढ़ गई थी. उन के दरवाजे पर दिन भर गांव वालों की भीड़ जमा रहती. सभी को उम्मीद थी कि प्रधानजी उन के  बच्चों को नौकरी जरूर दिलवा देंगे.

डिहुआकलां के प्रधान मोहनजी का बेटा विकास लखनऊ के एक इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ता था. कालेज में 3 दिन की छुट्टी थी तो वह अचानक गांव पहुंच गया. लोगों की भीड़ उस समय मोहनजी को घेरे हुए थी. ‘‘पिताजी, इतनी भीड़ क्यों जमा है? क्या कोई चुनाव होने वाले हैं?’’ विकास ने प्रधानजी के पैर छूते हुए पूछा.

‘‘ हां, चुनाव तो होने वाले हैं, लेकिन इस बार राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक चुनाव होने वाले हैं,’’ प्रधानजी ने हंसते हुए कहा.

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘बेटा, तुम इतना पढ़लिख कर गांव से बाहर कहीं दूर नौकरी करने चले जाओगे, लेकिन सरकार तुम्हारे कई साथियों को गांव में ही नौकरी देने जा रही है. इस से गांव और पूरे समाज का भरपूर विकास होगा,’’ प्रधानजी ने कहा और पूरी बात बताई. विकास को यह सब आश्चर्यजनक लगा. उन ने कहा, ‘‘पिताजी केंद्र सरकार की योजनाएं किसी एक प्रदेश में नहीं बल्कि पूरे देश में लागू होती हैं. पूरे देश में लाखों ग्रामसभाएं होंगी, अगर हर गांव के लोगों को नौकरी दी गई तो यह प्राधिकरण देश का सब से बड़ा संगठन बन जाएगा.’’

‘‘देश की 70% आबादी गांवों में रहती है. यदि  गांव का विकास करना है तो इस के लिए सब से बड़ा संगठन बनाना ही होगा. खुशी की बात है कि पहली बार यह बात सरकार की समझ में आईर् है.  ‘‘मैं तो किसी की सिफारिश नहीं सुनूंगा और अपने गांव के सब से योग्य उम्मीदवार को ही नौकरी दूंगा. देखना, उस के बाद गांव का विकास कितनी तेजी से होता है,’’ प्रधानजी ने कहा. ‘‘पिताजी, यह इतना आसान नहीं, जितना आप समझ रहे हैं,’’ विकास ने पिताजी से कहा. ‘‘तुम्हारी तो हर मामले में शक करने की आदत है. यह लो भारत सरकार का पत्र. खुद पढ़ लो,’’ प्रधानजी ने अपनी जेब से ग्राम विकास सचिव का पत्र निकाल कर विकास की ओर बढ़ाया. उन के चेहरे पर खिन्नता के भाव दिखाई दे रहे थे.

विकास ने उस पत्र को कई बार पढा़, लेकिन उस में उसे कोई कमी नजर नहीं आई. पत्र बाकायदा ग्राम विकास मंत्रालय के लैटरहैड पर लिखा गया था और सचिव के हस्ताक्षर के नीचे मुहर भी लगी हुई थी. पत्र पर प्राधिकरण के साउथ ब्लौक, नई दिल्ली का पता भी दिया हुआ था.

विकास को मालूम था कि केंद्र सरकार के ज्यादातर मंत्रालय साउथ ब्लौक में ही हैं. पत्र को देख कर शक की कोई गुंजाइश नहीं थी. फिर भी क्यों उसे किसी गड़बड़ी का आभास हो रहा था. कुछ सोच कर उस ने मोबाइल से लैटरहैड पर दिए गए फोन नंबर पर फोन किया. ‘‘हैलो, ग्राम विकास मंत्रालय प्लीज,’’ उधर से आवाज सुनाई पड़ी. ‘‘सर, क्या आप के मंत्रालय द्वारा किसी ग्राम विकास प्राधिकरण का गठन किया गया है?’’ विकास ने पूछा.

‘‘जी हां, प्रधानमंत्री की यह एक महत्त्वाकांक्षी योजना है. इस के संचालन के लिए प्रत्येक ग्रामसभा में कर्मचारियों की भरती भी शुरू हो गई है,’’ उधर से महत्त्वाकांक्षी आवाज सुनाई पड़ी. यह सुन कर विकास ने फोन काट दिया. प्रधानजी को भी उन की बातचीत सुनाई पड़ गई थी. उन्होंने विकास के कंधों को थपथपाते हुए कहा, ‘‘बेटा, केवल हमारे गांव में ही नहीं, बल्कि सभी ग्रामसभाओं में भरती हो रही है. बेकार में परेशान मत हो. थक गए होगे, अंदर चल कर नाश्तापानी करो. मुझे थोड़ी देर लग जाएगी.’’ विकास ने पल भर के लिए कुछ सोचा फिर बोला, ‘‘पिताजी, क्या मैं इस पत्र का एक फोटो खींच सकता हूं?’’

‘‘एक नहीं जितने मरजी फोटो खींचो,’’ प्रधानजी हंस पड़े.

विकास ने अपने स्मार्टफोन से उस पत्र का फोटो खींचा और उसे प्रधानजी को वापस कर दिया. वह घर पहुंचा तो मां उसे देखते ही खुशी से भर उठीं. उस का माथा चूम कर उन्होंने उसे जी भर कर आशीर्वाद दिया, फिर उस के लिए नाश्ता लगाने लगीं.

नाश्ता कर विकास अपने दोस्तों से मिलने चल दिया. सभी इन नौकरियों पर ही चर्चा कर रहे थे. वे सब इस के लिए काफी उत्साहित थे. सभी को विकास के पिता की ईमानदारी पर पूर्ण भरोसा था. ‘‘यार, मुझे तो कुछ गड़बड़ लग रही है. इस तरह एकसाथ लाखों की संख्या में भरतियां कैसे की जा सकती हैं.  इस के अलावा चयन समिति में ग्रामप्रधानों को रखने का क्या औचित्य है. क्या सरकार को मालूम नहीं है कि बहुत से प्रधान तो अशिक्षित हैं. वे साक्षात्कार कैसे ले सकते हैं?’’ विकास ने चिंता प्रकट की. ‘‘इस में भला गड़बड़ी क्या हो सकती है? नौकरी के बदले में कोई घूस तो मांगी नहीं जा रही है,’’ हेमंत बोला, ‘‘सरकार, सीधे गांव वालों से जुड़ना चाहती है, इसलिए वह गांवगांव में भरती करवा रही है.’’

‘‘गांव वालों के बारे में सब से अधिक जानकारी ग्रामप्रधान को ही होती है. इसीलिए सरकार ने चयन समिति में उन्हें रखा है. रही बात उन के अशिक्षित होने की तो सबकुछ प्रधान के हाथ में थोड़े होगा. उन की सहायता के लिए समिति में 20 सरकारी अधिकारी भी तो होंगे,’’ देवीदत्त ने समझाया. विकास के पास उन की बातों का कोई जवाब नहीं था, इसलिए वह चुप हो गया. किंतु उस के चेहरे पर छाई चिंता की रेखाओं को देख कामता ने कहा, ‘‘यार, हम तो कम पढ़ेलिखे लोग हैं, कंप्यूटर और इंटरनैट के बारे में ज्यादा नहीं जानते. मगर सुना है कि इंटरनैट पर सभी सरकारी कार्यालयों के बारे में जानकारी होती है. तुम तो इंजीनियरिंग पढ़ रहे हो, इंटरनैट चला लेते होगे. उस पर जा कर पता क्यों नहीं लगा लेते हो?’’

‘‘अरे, यह बात तो मेरे दिमाग में आई ही नहीं थी,’’ विकास के  चेहरे का तनाव तुरंत कम हो गया. उस ने अपने मोबाइल पर गूगल ओपन कर ग्राम विकास प्राधिकरण सर्च किया. अगले ही पल मोबाइल की स्क्रीन पर ‘ग्राम विकास प्राधिकरण’ की साइट खुल गई. उस पर एक तरफ भारत सरकार का लोगो अशोक स्तंभ बना था तो दूसरी तरफ ग्राम विकास मंत्री का फोटो लगा था. साइट पर सभी जरूरी सूचनाओं के साथ ग्रामसभा स्तर पर हो रही भरतियों का भी पूरा विवरण अंकित था.

अब तो शक की कोई गुंजाइश नहीं बची थी. सबकुछ सरकार की तरफ से ही हो रहा था. विकास के दोस्तों ने भी उसे समझाया कि वह बेकार में ज्यादा सोच कर परेशान न हो. दोस्तों के साथ घूमनेफिरने के बाद विकास घर लौट आया. उस रात उसे नींद नहीं आई. उस का मन यह मानने के लिए तैयार नहीं था कि सरकार अचानक इस तरह इतने बड़े स्तर पर भरती कर सकती है. उसे लग रहा था कि जरूर इस के पीछे कोई बड़ा खेल है. सुबह जब वह उठा तो अचानक उस के दिमाग में एक योजना कौंध उठी और वह औफिस खुलने का इंतजार करने लगा. करीब 11 बजे उस ने एक बार फिर पत्र में लिखे नंबर पर फोन किया.

‘‘हैलो, ग्राम विकास मंत्रालय, प्लीज,’’ उधर से शिष्टता भरी आवाज सुनाई पड़ी.

‘‘सर, आप के  मंत्रालय के ‘ग्राम विकास प्राधिकरण’ हेतु जो भरती चल रही हैं, उस के लिए मैं ने आवेदन किया है, लेकिन….’’ विकास ने जानबूझ कर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया.

‘‘लेकिन क्या?’’ उधर से पूछा गया.

‘‘हमारा ग्राम प्रधान बहुत बेईमान है. अपने आदमियों की भरती करने के लिए 1-1 लाख रुपए वसूल रहा है. हमारे और दोस्तों के घर वालों ने उसे वोट नहीं दिया था इसलिए वह हम लोगों को किसी भी कीमत पर भरती नहीं करेगा,’’ इतना कह कर विकास पल भर के लिए रुका फिर बोला,‘‘सर, हम 10 दोस्त हैं. आप हमारी भरती करवा दीजिए. हम लोग मिल कर 12 लाख रुपए देने के लिए तैयार हैं.’’ यह सुन कर उधर चंद पलों की चुप्पी छाई रही. फिर आवाज आई, ‘‘प्लीज एक मिनट होल्ड करिए. मैं अपने रिक्रूटमैंट अफसर से आप की बात करवा रहा हूं.’’

थोड़ी देर बाद उधर से किसी दूसरे आदमी की आवाज आई, ‘‘हैलो, मैं रिक्रूटमैंट अफसर बोल रहा हूं. बताइए क्या समस्या है?’’ ‘‘सर, पूरे देश में कई रिक्रूटमैंट अफसर बनाए गए होंगे. हमारे गांव की चयन समिति के जो अफसर हैं हमारी उन से बात करवाइए,’’ विकास ने कहा. ‘‘हूं, आप ठीक कह रहे हैं,’’ उधर पल भर की चुप्पी के बाद फिर आवाज आई. आप अपने गांव, तहसील, जिले और प्रदेश का नाम बताइए. मैं कंप्यूटर पर चैक कर के संबंधित अधिकारी से आप की बात करवाता हूं.

‘‘जी, मैं गांव डिहुआकलां, तहसील धौरहराकलां, जिला लखीमपुरखीरी, उत्तर प्रदेश से बोल रहा हूं,’’ विकास ने बताया.

उधर से थोड़ी देर तक कंप्यूटर के कीबोर्ड पर उंगलियां चलने की आवाज आती रही फिर एक मृदु आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘हैलो, मैं आपके क्षेत्र का रिक्रूटमैंट अफसर बोल रहा हूं. बताइए मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं?’’ विकास ने उस से बात दोहराई. फिर बोला, ‘‘आप जिस बैंक अकाउंट में कहेंगे हम लोग उस में 25%  पैसा एडवांस में जमा करवा देंगे बाकी काम हो जाने के बाद मिल जाएगा.  मगर इस बात की गांरटी होनी चाहिए कि प्रधानजी के किसी आदमी की नियुक्ति नहीं होगी. सारी नियुक्तियां हम 10 लोगों की ही होनी चाहिए.’’

‘‘उस की चिंता आप न करें. सारी भरतियां आप लोगों की ही होंगी, लेकिन 25% नहीं एडवांस में 50% देना होगा,’’ पवन कुमार साहब ने कहा.‘‘ओके,’’ विकास ने हामी भरी. ‘‘ तो फिर हमारे बैंक अकाउंट का नंबर नोट करिए. उस में 6 लाख रुपए जमा करने के बाद सभी 10 लोगों के नाम हमें नोट करा देना.’’ ‘‘सर, इतने पैसे जमा करने के लिए हमें 2-3 दिन का समय दे दीजिए.’’ विकास ने अनुरोध किया.

‘‘ठीक है,’’ रमेश साहब ने सहमति दी. फिर बोले, ‘‘लेकिन 3 दिन से ज्यादा का समय नहीं मिलेगा, क्योंकि दूसरे आदमी भी हम से संपर्क कर रहे हैं.’’ विकास ने 3 दिन में रुपए जमा करने की हामी भरने के बाद फोन काट दिया. उस के बाद सीधे अपने पिता के पास पहुंचा. उस ने सारी बातचीत रिकौर्ड कर ली थी. रिकौर्डिंग सुन उन का चेहरा गंभीर हो गया. कुछ सोचने के बाद वे बोले,‘‘ बेटा, तुम ने यह तो साबित कर दिया है कि यह सारा गोरखधंधा फर्जी है, लेकिन इस से किसी को क्या फायदा होने वाला है?’’ ‘‘पिताजी, पूरे देश में लाखों बेरोजगार फौर्म भरने के लिए 5-5 सौ रुपए जमा करेंगे, इस से ही करोड़ोअरबों रुपए आ जाएंगे. इस के अलावा बहुत से अयोग्य लोग नौकरी पाने के लिए लाखों रुपए की रिश्वत देने के लिए भी तैयार हो जाएंगे, उस से जो कमाई होगी वह अलग. इस सब के पीछे कोई बहुत बड़ा गैंग काम कर रहा है, जिस ने इंटरनैट पर प्राधिकरण की फर्जी साइट तक बना रखी है. इन का जल्द से जल्द भंडाफोड़ करना जरूरी है वरना ये लोग लाखों बेरोजगारों को ठग लेंगे,’’ विकास ने कहा.

‘‘तुम सही कह रहे हो. यह किसी बहुत बड़े गिरोह का काम लगता है. जिलाधिकारी महोदय से हमारी जानपहचान है. हम सीधे उन के पास चलते हैं. वही कुछ करेंगे,’’ प्रधानजी ने कहा. दोनों मोटरसाइकिल से जिलाधीश से मिलने चल दिए. जिलाधीश ने रिकौर्डिंग सुनने के बाद विकास की पीठ थपथपाई, फिर बोले, ‘‘बेटा, तुम ने देश के बेरोजगारों को बहुत बड़ी धोखाधड़ी से बचा लिया है. मुझे तुम पर गर्व है. मैं सरकार से तुम्हें पुरस्कार देने की सिफारिश करूंगा.’’ इतना कह कर उन्होंने तुरंत दिल्ली फोन कर ग्राम विकास मंत्रालय और गृहमंत्रालय के अधिकारियों से बात की. वहां से भी स्पष्ट हो गया कि यह वैबसाइट पूरी तरह फर्जी है. गृहमंत्रालय के निर्देश पर बैंक ने उस अकाउंट में जमा रकम को जब्त कर लिया. जिन लोगों ने वह अकाउंट खुलवाया था उन के पते पर छापा मार कर पुलिस ने देर रात तक पूरे गिरोह को गिरफ्तार कर लिया. वे लोग पहले भी अलगअलग प्रदेशों में भरती के विज्ञापन निकाल कर बेरोजगारों को ठग चुके थे. इस बार उन्होंने पूरे देश में एकसाथ लाखों लोगों को ठगने की योजना बनाई थी, लेकिन विकास की बुद्घिमानी से वे पकड़े गए. Social Story

Family Story In Hindi : पोलपट्टी – मिताली और गौरी के अनोखे रिश्ते की कहानी

Family Story In Hindi : आज अस्पताल में भरती नमन से मिलने जब भैयाभाभी आए तो अश्रुधारा ने तीनों की आंखों में चुपके से रास्ता बना लिया. कोई कुछ बोल नहीं रहा था. बस, सभी धीरे से अपनी आंखों के पोर पोंछते जा रहे थे. तभी नमन की पत्नी गौरी आ गई. सामने जेठजेठानी को अचानक खड़ा देख वह हैरान रह गई. झुक कर नमस्ते किया और बैठने का इशारा किया. फिर खुद को संभालते हुए पूछा, ‘‘आप कब आए? किस ने बताया कि ये…’’

‘‘तुम नहीं बताओगे तो क्या खून के रिश्ते खत्म हो जाएंगे?’’ जेठानी मिताली ने शिकायती सुर में कहा, ‘‘कब से तबीयत खराब है नमन भैया की?’’

‘‘क्या बताऊं, भाभी, ये तो कुछ महीनों से… इन्हें जो भी परहेज बताओ, ये किसी की सुनते ही नहीं,’’ कहते हुए गौरी की आंखें भीग गईं. इतने महीनों का दर्द उमड़ने लगा. देवरानीजेठानी कुछ देर साथ बैठ कर रो लीं. फिर गौरी के आंसू पोंछते हुए मिताली बोली, ‘‘अब हम आ गए हैं न, कोई बदपरहेजी नहीं करने देंगे भैया को. तुम बिलकुल चिंता मत करो. अभी कोई उम्र है अस्पताल में भरती होने की.’’

मिताली और रोहन की जिद पर नमन को अस्पताल से छुट्टी मिलने पर उन्हीं के घर ले जाया गया. बीमारी के कारण नमन ने दफ्तर से लंबी छुट्टी ले रखी थी. हिचकिचाहटभरे कदमों में नमनगौरी ने भैयाभाभी के घर में प्रवेश किया. जब से वे दोनों इस घर से अलग हुए थे, तब से आज पहली बार आए थे. मिताली ने उन के लिए कमरा तैयार कर रखा था. उस में जरूरत की सभी वस्तुओं का इंतजाम पहले से ही था.

‘‘आराम से बैठो,’’ कहते हुए मिताली उन्हें कमरे में छोड़ कर रसोई में चली गई.

रात का खाना सब ने एकसाथ खाया. सभी चुप थे. रिश्तों में लंबा गैप आ जाए तो कोई विषय ही नहीं मिलता बात करने को. खाने के बाद डाक्टर के अनुसार नमन को दवाइयां देने के बाद गौरी कुछ पल बालकनी में खड़ी हो गई. यह वही कमरा था जहां वह ब्याह कर आई थी. इसी कमरे के परदे की रौड पर उस ने अपने कलीरे टांगी थीं. नवविवाहिता गौरी इसी कमरे की डै्रसिंगटेबल के शीशे पर बिंदियों से अपना और नमन का नाम सजाती थी.

मिताली ने उस का पूरे प्यारमनुहार से अपने घर में स्वागत किया था. शुरू में वह उस से कोई काम नहीं करवाती, ‘यही दिन हैं, मौज करो,’ कहती रहती. शादीशुदा जीवन का आनंद गौरी को इसी घर में मिला. जब से अलग हुए, तब से नमन की तबीयत खराब रहने लगी. और आज हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि नमन ठीक से चलफिर भी नहीं पाता है. यह सब सोचते हुए गौरी की आंखों से फिर एक धारा बह निकली. तभी कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई.

दरवाजे पर मिताली थी, ‘‘लो, दूध पी लो. तुम्हें सोने से पहले दूध पीने की आदत है न.’’‘‘आप को याद है, भाभी?’’

‘‘मुझे सब याद है, गौरी,’’ मिताली की आंखों में एक शिकायत उभरी जिसे उस ने जल्दी से काबू कर लिया. आखिर गौरी कई वर्षों बाद इस घर में लौटी थी और उस की मेहमान थी. वह कतई उसे शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी.

अगले दिन से रोहन दफ्तर जाने लगे और मिताली घर संभालने लगी. गौरी अकसर नमन की देखरेख में लगी रहती. कुछ ही दिनों में नमन की हालत में आश्चर्यजनक सुधार होने लगा. शुरू से ही नमन इसी घर में रहा था. शादी के बाद दुखद कारणों से उसे अलग होना पड़ा था और इस का सीधा असर उस की सेहत पर पड़ने लगा था. अब फिर इसी घर में लौट कर वह खुश रहने लगा था. जब हम प्रसन्नचित्त रहते हैं तो बीमारी भी हम से दूर ही रहती है.

‘‘प्रणाम करती हूं बूआजी, कैसी हैं आप? कई दिनों में याद किया अब की बार कैसी रही आप की यात्रा?’’ मिताली फोन पर रोहन की बूआ से बात कर रही थी. बूआजी इस घर की सब से बड़ी थीं. उन का आनाजाना अकसर लगा रहता था. तभी गौरी का वहां आना हुआ और उस ने मिताली से कुछ पूछा.

‘‘पीछे यह गौरी की आवाज है न?’’ गौरी की आवाज बूआजी ने सुन ली.‘‘जी, बूआजी, वह नमन की तबीयत ठीक नहीं है, तो यहां ले आए हैं.’’

‘‘मिताली बेटा, ऐसा काम तू ही कर सकती है, तेरा ही दिल इतना बड़ा हो सकता है. मुझे तो अब भी गौरी की बात याद आती है तो दिल मुंह को आने लगता है. छी, मैं तुझ से बस इतना ही कहूंगी कि थोड़ा सावधान रहना,’’ बूआजी की बात सुन मिताली ने हामी भरी. उन की बात सुन कर पुरानी कड़वी बातें याद आते ही मिताली का मुंह कसैला हो गया. वह अपने कक्ष में चली गई और दरवाजा भिड़ा कर, आंखें मूंदे आरामकुरसी पर झूलने लगी.

गौरी को भी पता था कि बूआजी का फोन आया है. उस ने मिताली के चेहरे की उड़ती रंगत को भांप लिया था. वह पीछेपीछे मिताली के कमरे तक गई.‘‘अंदर आ जाऊं, भाभी?’’ कमरे का दरवाजा खटखटाते हुए गौरी ने पूछा.

‘‘हां,’’ संक्षिप्त सा उत्तर दिया मिताली ने. उस का मन अब भी पुराने गलियारों के अंधेरे कोनों से टकरा रहा था. जब कोई हमारा मन दुखाता है तो वह पीड़ा समय बीतने के साथ भी नहीं जाती. जब भी मन बीते दिन याद करता है, तो वही पीड़ा उतनी ही तीव्रता से सिर उठाती है.

‘‘भाभी, आज हम यहां हैं तो क्यों न अपने दिलों से बीते दिनों का मलाल साफ कर लें?’’ हिम्मत कर गौरी ने कह डाला. वह इस मौके को गंवाना नहीं चाहती थी.

‘‘जो बीत गई, सो बात गई. छोड़ो उन बातों को, गौरी,’’ पर शायद मिताली गिलेशिकवे दूर करने के पक्ष में नहीं थी. अपनी धारणा पर वह अडिग थी.

‘‘भाभी, प्लीज, बहुत हिम्मत कर आज मैं ने यह बात छेड़ी है. मुझे नहीं पता आप तक मेरी क्या बात, किस रूप में पहुंचाई गई. पर जो मैं ने आप के बारे में सुना, वह तो सुन लीजिए. आखिर हम एक ही परिवार की डोर से बंधे हैं. यदि हम एकदूसरे के हैं, तो इस संसार में कोईर् हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता. किंतु यदि हमारे रिश्ते में दरार रही तो इस से केवल दूसरों को फायदा होगा.’’

‘‘भाभी, मेरी डोली इसी घर में उतरी थी. सारे रिश्तेदार यहीं थे. शादी के तुरंत बाद से ही जब कभी मैं अकेली होती. बूआजी मुझे इशारों में सावधान करतीं कि मैं अपने पति का ध्यान रखूं. उन के पूरे काम करूं, और उन की आप पर निर्भरता कम करूं. आप समझ रही हैं न? मतलब, बूआजी का कहना था कि नमन को आप ने अपने मोहपाश में जकड़ रखा है ताकि… समझ रही हैं न आप मेरी बात?’’

गौरी के मुंह से अपने लिए चरित्रसंबंधी लांछन सुन मिताली की आंखें फटी रह गईं, ‘‘यह क्या कह रही हो तुम? बूआजी ऐसा नहीं कह सकतीं मेरे बारे में.’’

‘‘भाभी, हम चारों साथ होंगे तो हमारा परिवार पूरी रिश्तेदारी में अव्वल नंबर होगा, यह बात किसी से छिपी नहीं है. शादी के तुरंत बाद मैं इस परिवार के बारे में कुछ नहीं जानती थी. जब बूआजी जैसी बुजुर्ग महिला के मुंह से मैं ने ऐसी बातें सुनीं, तो मैं उन पर विश्वास करती चली गई. और इसीलिए मैं ने आप की तरफ शुष्क व्यवहार करना आरंभ कर दिया.

‘‘परंतु मेरी आंखें तब खुलीं जब चाचीजी की बेटी रानू दीदी की शादी में चाचीजी ने मुझे बताया कि इन बातों के पीछे बूआजी की मंशा क्या थी. बूआजी चाहती हैं कि जैसे पहले उनका इस घर में आनाजाना बना हुआ था जिस में आप छोटी बहू थीं और उन का एकाधिकार था, वैसे ही मेरी शादी के बाद भी रहे. यदि आप जेठानी की भूमिका अपना लेतीं तो आप में बड़प्पन की भावना घर करने लगती और यदि हमारा रिश्ता मजबूत होता तो हम एकदूसरे की पूरक बन जातीं. ऐसे में बूआजी की भूमिका धुंधली पड़ सकती थी. बूआजी ने मुझे इतना बरगलाया कि मैं ने नमन पर इस घर से अलग होने के लिए बेहद जोर डाला जिस के कारण वे बीमार रहने लगे. आज उन की यह स्थिति मेरे क्लेश का परिणाम है,’’ गौरी की आंखें पश्चात्ताप के आंसुओं से नम थीं.

गौरी की बातें सुन मिताली को नेपथ्य में बूआजी द्वारा कही बातें याद आ रही थीं, ‘क्या हो गया है आजकल की लड़कियों को. सोने जैसी जेठानी को छोड़ गौरी को अकेले गृहस्थी बसाने का शौक चर्राया है, तो जाने दे उसे. जब अकेले सारी गृहस्थी का बोझा पड़ेगा सिर पे, तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी. चार दिन ठोकर खाएगी, तो खुद आएगी तुझ से माफी मांगने. इस वक्त जाने दे उसे. और सुन, तू बड़ी है, तो अपना बड़प्पन भी रखना, कोई जरूरत नहीं है गौरी से उस के अलग होने की वजह पूछने की.’

‘‘भाभी, मुझे माफ कर दीजिए, मेरी गलती थी कि मैं ने बूआजी की कही बातों पर विश्वास कर लिया और तब आप को कुछ भी नहीं बताया.’’

‘‘नहीं, गौरी, गलती मेरी भी थी. मैं भी तो बूआजी की बातों पर उतना ही भरोसा कर बैठी. पर अब मैं तुम्हारा धन्यवाद करना चाहती हूं कि तुम ने आगे बढ़ कर इस गलतफहमी को दूर करने की पहल की,’’ यह कहते हुए मिताली ने अपनी बांहें खोल दीं और गौरी को आलिंगनबद्ध करते हुए सारी गलतफहमी समाप्त कर दी.

कुछ देर बाद मिताली के गले लगी गौरी बुदबुदाई, ‘‘भाभी, जी करता है कि बूआजी के मुंह पर बताऊं कि उन की पोलपट्टी खुल चुकी है. पर कैसे? घर की बड़ीबूढ़ी महिला को आईना दिखाएं तो कैसे, हमारे संस्कार आड़े आ जाते हैं.’’

‘‘तुम ठीक कहती हो, गौरी. परंतु बूआजी को सचाई ज्ञात कराने से भी महत्त्वपूर्ण एक और बात है. वह यह है कि हम आइंदा कभी भी गलतफहमियों का शिकार बन अपने अनमोल रिश्तों का मोल न भुला बैठें.’’

देवरानीजेठानी का आपसी सौहार्द न केवल उस घर की नींव ठोस कर रहा था बल्कि उस परिवार के लिए सुख व प्रगति की राह प्रशस्त भी कर रहा था. Family Story In Hindi

Hindi Love Story : जुगाड़ – आखिर वह लड़की अमित से क्या चाहती थी?

Hindi Love Story : मैं ठीक 10 बजे पूर्व निर्धारित स्थान पर पहुंच गया था. वह दूर से आती हुई दिखी. मैं ने मन ही मन में कहा ‘जुगाड़’ आ गई. हम ने फिर साथ में रिकशा लिया. इस बार मैं पहले की अपेक्षा अधिक चिपक कर बैठा शायद उसे आजमाना चाहता था.

मैंने फर्राटे से दौड़ते, हौर्न का शोर मचाते वाहनों के बीच दबे कदमों से चौराहा पार किया.

बीच चौराहे पर अंबेडकर की प्रतिमा जैसे हाथ खड़ी कर सब को स्टेशन की ओर जाने का संकेत कर रही हो. कैसरबाग, अमीनाबाद एक सवारी की रट लगाते वाहनचालक. दिन के 10 बजे लखनऊ के चारबाग चौराहे की हालत ऐसी ही होती है. भीड़ का एक हजूम, भागतेदौड़ते लोग, न जाने कितनी जल्दी है उन्हें मंजिल तक पहुंचने की.

मैं ने रिकशावाले से पूछा, ‘‘लाटूश रोड के कितने लोगे?’’

‘‘कहां जाना है लाटूश रोड में?’’ उस ने प्रश्न किया.

मैं ने कहा, ‘अमीनाबाद चौक से दोचार कदम आगे.’

‘एक सवारी के 8 रुपए और एक और बैठा लूं, तो 5 रुपए लगेंगे?’

मैं ने कहा, ‘अगर कोई मिलता है तो बैठा लो.’

अभी रिकशावाले ने पैडल पर पांव डाले ही थे कि आसमानी शमीज और सफेद सलवार धारण किए एक लड़की ने पूछा, ‘भैया, अमीनाबाद का क्या लोगे?’

‘5 रुपए,’ उस ने उत्तर दिया और वह लड़की आ कर मेरे साथ रिकशे पर बैठ गई.

गर मैं कहूं कि उस के मेरे साथ बैठने से मु झे कोई फर्क नहीं पड़ा तो शायद यह  झूठ होगा. विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. चाहे वह स्त्री का पुरुष के प्रति हो या पुरुष का स्त्री के प्रति. मैं भी इस से अछूता नहीं था. कई बार हम अपनी पत्नी या फिर प्रेमिका से कहते हैं, ‘मैं तुम्हारे सिवा किसी और को नहीं देखता. जबकि, हमें पता है कि हम  झूठ बोल रहे हैं उस से जिस से वास्तव में हम बेहद प्रेम करते हैं. हर इंसान को खुद से प्यार करने वाले का संपूर्ण समर्पण बेहद सुकून देता है चाहे वह स्त्री का पुरुष के प्रति हो या पुरुष का स्त्री के प्रति.

हम जैसे आम लोगों के लिए इस चुंबकीय आकर्षण से बचना संभव नहीं. बस, हम आकर्षण की दिशा बदल सकते हैं. किसी लड़की को बहन स्वीकार करना भी उतना ही बड़ा आकर्षण है जितना किसी स्त्री में प्रेयसी ढूंढ़ना. फर्क सिर्फ रिश्तों का है क्योंकि दोनों में ही प्रेम है. हां, दोनों ही प्रेम के आयाम भले भिन्न हों पर मेरी दृष्टि से बहन का रिश्ता जितना शुद्ध है उतना ही पवित्र प्रेमिका का रिश्ता भी है. शायद मैं भावना में बह गया.

उस लड़की की ड्रैस देख कर मैं सम झ चुका था कि वह किसी कालेज की छात्रा है और इस से पहले मैं अपनी जबान खोलता, उस ने मु झ से पूछा, ‘‘आप कहीं नौकरी करते हैं?’’

बड़ा ही सहज मगर दूरगामी प्रश्न था क्योंकि इस के उत्तर के साथ ही वह मु झे और मेरी शैक्षिक योग्यता को अपने मूल्यों के तराजू पर तौलने वाली थी.

मैं ने जोशीले अंदाज में कहा, ‘‘मैं ने एमबीए किया है और जरमनी की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए काम करता हूं. मैं कविताएं और आलेख भी लिखता हूं जिन में से कुछ विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं.’’ मैं ने शेखी बघारी मगर मेरे हृदय में आत्मविश्वास के भाव थे.

फिर उस ने पूछा, ‘‘तुम्हारी सैलरी कितनी है?’’

मैं ने कहा, ‘‘20 हजार रुपए.’’

उस ने पूछा, ‘‘कुल कितना मिल  जाता है.’’

मैं ने उत्तर दिया, ‘‘तकरीबन 25-30 हजार रुपए हो जाता है.’’

इस बार मैं थोड़ा असहज था क्योंकि मैं  झूठ बोल रहा था. फिर भी मैं ने अपने चेहरे का भाव छिपाने का हर संभव प्रयास किया. मु झे पता नहीं कि उस ने मु झ पर भरोसा किया या नहीं.

उस ने मु झ से अपने बारे में बताते हुए कहा, ‘‘मैं ने आईटी में एमबीए किया है. किंतु नौकरी नहीं मिली. अब बीएड कर रही हूं. शिक्षा का क्षेत्र महिलाओं के लिए बहुत उपयुक्त है.’’

उस ने साथ में तर्क दिया और मैं ने स्वीकृति में सिर हिलाया. उस ने आगे पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

मैं ने कहा, ‘‘अमित.’’

फिर उस ने चहक कर कहा, ‘‘मेरे भाई का नाम भी अमित है.’’

इस बार मु झे लगा जैसे वह जानबू झ कर मेरे करीब आने की कोशिश कर रही हो. उस ने फिर प्रश्न किया, ‘‘तुम रहने वाले कहां के हो?’’

मैं ने कहा, ‘‘बिहार.’’

उस ने इस बार चौंक कर कहा, ‘‘बिहार, फिर हाथ मिलाओ, मैं भी बिहार की हूं.’’

इस बार मु झे उस का उत्तर थोड़ा संदेहास्पद लगा. मैं ने धीरे से उस के हाथ पर अपना हाथ रख दिया. लेकिन यह पकड़ वैसी नहीं थी जिस आत्मविश्वास से मैं ‘मिली’ (मेरी प्रेमिका) का हाथ पकड़ता था. मैं ने जासूस की तरह उस से सवाल किया, ‘‘बिहार में कहां की रहने वाली हो?’’

उस ने कहा. ‘‘गया.’’

इस बार मु झे लगा जैसे वह सच कह रही हो. मैं ने कहा, ‘‘मैं हाजीपुर का रहने वाला हूं.’’

उस ने अनभिज्ञता से कहा, ‘‘हाजीपुर?’’

मैं ने कहा, ‘‘हां, वही जहां से माननीय रामविलास पासवानजी सांसद का चुनाव जीतते रहे  हैं.’’ मनुष्य भी अजीब प्राणी है. जब वह कमजोर पड़ता है, सभी उस से दूरी बना लेते हैं और जैसे ही वह शक्तिशाली हो जाता है लौह चुंबक की भांति, अनजानों को भी अपनी ओर समेट लेता है. इसलिए मैं ने भी रामविलासजी से अपना रिश्ता जोड़ा.

अब उस ने मेरा मोबाइल नंबर मांगा और मैं ने उस का. फिर मैं औफिस के पास रिकशे से उतर गया. उस ने कहा, ‘‘अगर कभी चाहो तो मेरे घर आओ. मु झे मिलना हुआ तो मैं इस औफिस में आ जाऊंगी.’’

मैं ने असहज भाव से उसे देखा, रिकशे वाले को अपने हिस्से के पैसे दिए. फिर औफिस के अंदर चला गया. हृदय में अजीब सा द्वंद्व था. मैं ने सब से पहले इस घटना की चर्चा अपने औफिस की महिला सहकर्मियों से की. सुनते ही सब के सब साथ हंस पड़ीं, साथ मैं भी हंसा. किंतु उन सब की हंसी में एक रहस्य था जो उस लड़की के चरित्र की ओर इशारा कर रहा था और मैं असमंजस की हालत में था.

दिन खत्म हुआ. घर पहुंचा. अजीब सी मनोस्थिति थी. इस घटना का जिक्र मैं ने अपने रूमपार्टनर विकास से किया. उस ने जोर दे कर पूछा, ‘‘उस ने तेरा हाथ छुआ?’’

‘‘मैं ने कहा, ‘‘हां.’’

‘‘तु झे अपने घर भी बुलाया है?’’

‘‘हां.’’

‘‘अपना मोबाइल नंबर भी दिया है. फिर तो वह साली जुगाड़ है. मु झे उस का मोबाइल नंबर देना,’’ उस ने कहा.

पता नहीं क्यों लेकिन मैं उस की बात टाल गया और मैं ने उसे मोबाइल नंबर नहीं दिया. जुगाड़ का अभिप्राय मैं अच्छी तरह से सम झ सकता था. पता नहीं क्यों, हम सब दोहरी जिंदगी जीते हैं, चाहे हम और हमारा समाज नारी स्वतंत्रता की कितनी ही बड़ीबड़़ी बातें सार्वजनिक स्थल पर कर ले पर सब ‘ढाक के तीन पात’ अपने हमाम में सब नंगे.

यों देखें, तो हाथ का पकड़ा जाना एक साधारण सी घटना थी. पर न जाने क्यों हम सब को लगा कि इस में कुछ असामान्य था और यह सिर्फ इसलिए क्योंकि वह एक लड़की थी.

क्या हम सचमुच 21वीं शताब्दी के दौर में हैं? मेरे लिए यह एक यक्ष प्रश्न था क्योंकि उन सब की सोच में मैं भी शामिल था.

मैं 2 दिनों तक उस के फोन आने का इंतजार करता रहा. पर कोई कौल नहीं आई. अकसर लड़कियों की जबान से सुना है, ‘लड़के एक नंबर के कुत्ते होते हैं’ और मैं इस से कभी इनकार नहीं करता. मन में अजीब सा कुतूहल था. तीसरे दिन मैं ने उस का नंबर मिलाया.

मैं ने कहा, ‘‘मैं अमित बोल रहा हूं. हम लाटूश रोड पर मिले थे.’’

उस ने कहा, ‘‘हां अमित, कैसे हो?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं ठीक हूं. तुम कैसी हो?’’

‘‘मैं भी ठीक हूं.’’

इस से पहले मैं कुछ पूछता, उस ने फिर सवाल दागना शुरू किया, ‘‘तुम कमरे में अकेले रहते हो?’’

मेरा उत्तर ‘हां’ था. मैं फिर  झूठ बोल रहा था मगर इस बार मु झे अपने चेहरे के भाव छिपाने की जरूरत न पड़ी क्योंकि दूरभाष पर आप हमेशा आधीअधूरी बात ही करते हैं. आप वे बातें सुन तो सकते हो जो सामने वाला कह रहा होता है किंतु आप उस के चेहरे पर लिखे शब्दों को पढ़ नहीं सकते.

उस ने सवाल किया, ‘‘तुम ने अब तक शादी क्यों नहीं की?’’

मैं ने महसूस किया कि जैसे वह मु झे खोलने का प्रयास कर रही हो. मैं ने अनमने ढंग से कहा, ‘‘हो जाएगी, मम्मीपापा देख रहे हैं.’’

उस के प्रश्न का सिलसिला अभी थमा नहीं था, ‘‘अमित तुम्हारी उम्र कितनी है?’’

मैं ने कहा, ‘‘26 प्लस.’’

उस ने कहा, ‘‘अमित, तुम्हें शादी की शारीरिक जरूरत महसूस नहीं होती?’’

इस से पहले मैं हां या न कुछ भी उत्तर दे पाता, उस ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘मैं तुम लड़कों का मनोविज्ञान बहुत अच्छे से सम झती हूं. सोचते होगे, पहले सैटल हो जाओ. खूब पैसे कमा लो, फिर किसी परी जैसी लड़की से शादी करोगे. अमित, मु झे लगता है ये सब करतेकरते कब जिंदगी निकल जाती है, हमें पता भी नहीं चलता. जिंदगी जैसी है, जितनी है, उसे बस जी लेनी चाहिए.’’

अब मु झे विकास की बातों पर भरोसा होने लगा था. मु झे लगा जैसे वह मु झे आमंत्रण दे रही हो और इस से पहले कुछ कह पाता, उस ने फिर सवाल दागा, ‘‘तुम खाना कहां खाते हो?’’

मैं ने कहा, ‘खुद ही बनाता हूं.’

‘‘अमित, तुम किसी कामवाली को क्यों नहीं रख लेते. काम से थक जाते होगे,’’ उस ने हंसते हुए आगे कहा, ‘‘किसी जवान लड़की को मत रख लेना. किसी उम्रदराज या किसी छोटे लड़के को रख लो, तुम्हारी मदद करेगा.’’

मैं ने जानबू झ कर उसे कुरेदा, ‘‘जवान लड़की क्यों नहीं?’’

उस ने कहा, ‘‘यह लखनऊ है,  दिल्ली नहीं.’’

इस बार मु झे लगा जैसे वह मेरी भावनाओं को छेड़ने का प्रयास कर रही हो. सवाल अभी खत्म नहीं हुए थे. अगला प्रश्न फिर सामने था.

‘‘तुम ने कभी किसी से प्यार किया है?’’

मैं ने कहा, ‘‘लड़कियां दोस्त बहुत हैं मगर कोई रिश्ता अब तक प्यार तक नहीं पहुंचा.’’ इस बार मु झे खुद पर हंसी आई.

‘‘अमित, तुम ने बताया था कि तुम कविताएं लिखते हो.’’

मेरे पास बस यही मौका था. मैं ने कहा, ‘अगर कविता सुननी हो तो मु झ से मिलो. मु झे खुद नहीं पता था कि मैं ने उसे क्यों बुलाया क्योंकि यह शारीरिक आकर्षण कतई नहीं था. अगर वह मु झे अपना संपूर्ण समर्पण कर भी देती तो भी मैं शायद उस के लिए न जाता. यह शायद इसलिए क्योंकि एक पुरुष एक साधारण स्त्री से भी बेहद कमजोर होता है. लेकिन, उस के बारे में जानने की जिज्ञासा जरूर थी.

उस ने कहा, ‘‘मु झे प्रेम वाली कविताएं अच्छी लगती हैं.’’

मैं ने उत्तर दिया, ‘‘मैं रोमांटिक कविता ही लिखता हूं.’’ और फिर अगले दिन चारबाग चौराहे पर मिलना तय हुआ.

मैं ठीक 10 बजे पूर्व निर्धारित स्थान पर पहुंच गया. वह दूर से आती हुई दिखी. मैं ने मन ही मन में कहा जुगाड़ आ गई. हम ने फिर साथ में रिकशा लिया. इस बार मैं पहले की अपेक्षा अधिक चिपक कर बैठा.

मैं ने पूछा, ‘‘कैसी हो?’’

उस ने कहा, ‘‘बस, ठीक. अमित, तुम ने कहा था कि तुम अपनी कविता सुनाओगे.’’

मैं ने उसे अपनी एक छोटी सी कविता सुनाई. इस बार मैं उस के चेहरे पर उभरे शब्दों को पढ़ सकता था.

उस ने कहना प्रारंभ किया, ‘‘अमित, कविताओं की कोंपलें हृदय के भीतर से निकलती हैं. पहले हम अपनी भावनाओं को कोरे कागज पर उकेरते हैं, फिर धीरेधीरे उसे जीने लगते हैं. शायद, मैं गलत होऊं मगर मु झे लगता है हर लिखने वाले का दिल आईने की तरह बिलकुल साफ होता है. पता नहीं क्यों मैं उस दिन तुम से मिली तो तुम पर विश्वास करने को दिल चाहा और मैं ने तुम्हें अपना मोबाइल नंबर दे दिया.

‘‘अमित, पता नहीं इस अंधी दौड़ में हम कहां जा रहे हैं. पैसापैसा और पैसा, जिंदगी बस इस में सिमट कर रह गई है. पर मेरे लिए प्यार महत्त्वपूर्ण है.’’

उस ने मेरा हाथ फिर खींच कर अपने हाथों में लिया. हमारी मानसिकता संकीर्ण होती जा रही है. हम जो हैं वह दिखना नहीं चाहते और जो नहीं हैं, चाहते हैं बस वही दिखे. अजीब सी सचाई थी उस की आंखों में.

‘‘अमित, अगर मु झे कोई तुम्हारे साथ इस तरह बैठे देखे तो पता नहीं क्या सोचेगा और मैं उन्हें रोक भी नहीं सकती क्योंकि बहुत कम ऐसे लोग हैं जो व्यवस्थित सोचते हैं या इस की कोशिश करते हैं. मगर यह जरूरी नहीं है कि हम रोज मिलें क्योंकि  2 अच्छे लोगों का बिखर जाना अच्छा होता है ताकि वे 2 अलगअलग दिशाओं में अच्छाइयां फैला सकें.’’

मैंने एक भरपूर दृष्टि उस के चेहरे पर डाली और खुद से प्रश्न किया, क्या सचमुच मैं एक अच्छा आदमी हूं? अचानक रिकशे वाले ने कहा, ‘‘अमीनाबाद आ गया.’’ हमारे बीच का वार्त्तालाप थम सा गया.

वह हंसी और कहना शुरू किया, ‘‘अमित अपना खयाल रखो, बिलकुल दुबलेपतले हो. खाने का ध्यान रखा करो और हां, जल्दी शादी कर लो. लेकिन, मु झे बुलाना मत भूलना.’’

उस के चेहरे पर आदेश का भाव था. मैं रिकशे से उतरा. इस बार मैं ने उस का हाथ उसी आत्मविश्वास से पकड़ा जैसे मैं किसी परममित्र या अपनी प्रेमिका का पकड़ता था क्योंकि इस बार मेरे आकर्षण को दिशा मिल चुकी थी. उस का रिकशा धीरेधीरे आगे बढ़ने लगा. मैं वहीं खड़ा तब तक उसे देखता रहा जब तक वह मेरी आंखों से ओझल नहीं हो गई. Hindi Love Story

Social Story In Hindi : मजाक – एक भगोना केक

Social Story In Hindi : स्नेहा तिरेक में लेख के महानायक, मुख्य महापुरुष मित्र सोनुवाजी ने एक भगोना केक बनाने की ग्रीष्म प्रतिज्ञा की. पूरा विश्व यह प्रतिज्ञा सुन कर प्रलयानुमान लगाने लगा. उन की यह प्रतिज्ञा इतिहास में ‘सोनुवा की प्रतिज्ञा’ नाम से लिखी जाएगी. आखिर क्यों? योंतो पिछले जन्म के पापों के आधिक्य से जीवन में अनेक चोंगा मित्रों की रिसीविंग करनी पड़ी, किंतु दैत्यऋण (दैवयोग के विपरीत) से हमारी भेंट मित्रों के मित्र अर्थात मित्राधिराज के रूप में प्रत्यक्ष टैलीफोन महाराज से हुई, जिन की बुद्धि का ताररूपी यश चतुर्दिक प्रसारित हो रहा था. दशोंदिशा के दिक्पाल उस टैलीफोन महर्षि के नैटवर्क को न्यूनकोण अवस्था में झुक झुक कर प्रणाम कर रहे थे. हमारे जीवन के संचित पुण्यों का टौकटाइम वहीं धराशायी हो गया क्योंकि हम ने उन से मित्रता का लाइफटाइम रिचार्ज करवा लिया था.

कला क्षेत्र में आयु की दृष्टि से भीष्म भी घनिष्ठ बडी बन जाते हैं लेकिन हमारे महापुरुष मित्र, भीष्म नहीं ग्रीष्म, प्रतिज्ञा किया करते हैं. हकीकत में वे महान भारतवर्ष की आधुनिक शिक्षा पद्धति के सुमेरू संस्थान एवं गुरुकल (प्रतिष्ठा कारणों से नाम का उल्लेख नहीं किया गया है) द्वारा उत्पादित एवं उद्दंडता से दीक्षित थे पर दीक्षित नहीं, किंतु ज्ञान के अत्यधिक धनी हैं, इतने धनी कि उन के आधे ज्ञान को जन्म के साथ ही स्विस बैंक के लौकरों में बंद करवाया गया. अन्यथा वे दुनिया कब्जा लेते और डोनाल्ड ट्रंप व जो बाइडेन को लोकतांत्रिक कब्ज हो जाता. हम उन की चर्चा करेंगे तो यह लेख महाकाव्य हो जाएगा. सो, मैं लेख को उन की एक जीवनलीला पर ही केंद्रित रखूंगा. उन की मित्रता में इतना सामर्थ्य था कि जब वे निषादराज के समान भक्तिभाव प्रकट करते थे तो सामने वाला मित्र एक युग आगे का दरिद्र सुदामा बन जाता था. कालांतर में यह हुआ कि हमारे एक अन्य पारस्परिक मित्र की जयंती की कौल आई तो रात्रि के 12 बजे देव, नाग, यक्ष, किन्नर, गंधर्व और दैत्यों ने बिना मोदीजी के आदेश के थालियां बजाईं और दीप जलाया. कहीं दीप जले कहीं दिल.

यह विराट दृश्य देख कर हमारा दिल सुलग उठा. उसी दिवस, स्नेहातिरेक में, लेख के महानायक व मुख्य महापुरुष मित्र ने केक बनाने की ग्रीष्म प्रतिज्ञा की. पूरा विश्व यह प्रतिज्ञा सुन कर प्रलयानुमान लगाने लगा. उन की यह प्रतिज्ञा इतिहास में ‘सोनुवा की प्रतिज्ञा’ नाम से लिखी जाएगी. उन के संदर्भ में यह जनश्रुति भी प्रचारित है कि वे मिनिमम इनपुट से मैक्सिमम आउटपुट देने वाले ऋषि हैं. सो, वे अपनी बालकनी में ‘एक टब जमीन’ में ही ‘वांछित उत्प्रेरक वनस्पतियों’ की जैविक खेती भी करते थे. ‘एक टब जमीन’ की अपार सफलता के बाद देवाधिपति सोनुवा महाराज ने ‘एक भगोना केक’ के निर्माण की घोषणा की. इस महान कार्य के वे स्वयंभू, नलनील एवं विश्वकर्मा अर्थात ‘थ्री इन वन’ थे. वे तत्काल इस कार्य में मनोयोग से लगे, मानो इसी के लिए उन का जन्म हुआ हो. सर्वप्रथम उन्होंने अनावश्यक सामग्रियों के एकत्रीकरण में दूतों को भेज कर उन की अव्यवस्था की.

इस के बाद अपने ज्ञानचक्षुओं को खोल कर बैठ गए. वैसे तो वे स्वभाववश मनमोहन सिंह थे किंतु ग्रीष्म प्रतिज्ञाओं के बाद वे किम जोंग हो जाते थे. तब उन का विकट रूप देख कर मैं ने अनेक भूतों को मदिरा मांगते देखा क्योंकि वे पानी नहीं पीते. किसी अभागी भैंस के 2 लिटर दूध को एक भगोने में डाल कर उसे सासबहू सीरियल की कथा सुना कर पकाते रहे. तत्पश्चात उन्होंने मैनमेड ‘मिल्कमेड’ डाल कर उसे शेख चिल्ली की बुद्धि जैसा मोटा बना दिया. अब उसे अनवरत कई युगों तक फेंटते रहे. जब उन का कांग्रेस का चुनावचिह्न शक्तिहीन हुआ तब उन्होंने वह पेस्ट दूसरे बड़े भगोने के अंदर नीचे कंकड़पत्थर की भीष्म शैया बना कर रख दिया और उन भगोनों को भाग्य के भरोसे अग्निदेव को समर्पित कर के 2 घंटे की तीर्थयात्रा पर निकल गए. मैं उन की रक्षा में लक्षमण सा फील करता हुआ धनुषबाण ले कर बैठ गया. लगभग एक युग के अंतराल के बाद मैं ने उन से दूरभाष पर संपर्क स्थापित किया तो उन्होंने अग्नि को और प्रबल कर के कुछ क्षणों में आने को कह दिया. मैं उन के आशीष वचन सुन कर निश्ंिचत रहा. सोनुवा महाराज ने आते ही अपनी यज्ञ सामग्री का निरीक्षण किया तो अपने परिपक्व ज्ञानलोचनों से उसे अधपका पाया.

एक और देव पुरुष ने उसे ‘बीरबल का केक’ कहा. तब भी सोनुवाजी के आत्मविश्वास में रंच मात्र भी कमी न आई. वे चीन का विरोध करते हुए आधा किलो चीनी की समिधा ‘केकाकुंड’ में झोंक कर चल दिए और इधर सब स्वाहा होता रहा. 2 घंटे के एक और युग बीत जाने पर प्रलय के बाद जब सृष्टि जगी तो पाया गया कि उस यज्ञ की बेदी में समय के थपेड़ों के गहरे काले स्याह निशान पड़ गए, जिन्हें सोनुवा महाराज ने अपने विज्ञान की कार्बन डेटिंग से बताया कि अभागी काली भैंस के दूध के रंग के कारण से यह पदार्थ भी वही रंग ले कर कोयले में परिवर्तित हो गया है जो कि दूसरे देशों को निर्यात कर के हम लोग कई भगोने केक चीन से आयात करेंगे. हम उन की इस सफलता पर भूतपूर्व अदनान सामी की तरह फूल कर कुप्पा और भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह चुप्पा दोनों हो गए थे.

पर वास्तविक समस्या अब थी. कोयले की खान बने भगोनेरूपी पात्र अब एक बूंद पानी रखने के भी पात्र नहीं बचे. हम ने उन्हें इतना रगड़ा कि हाथ रगड़ गए. शायद आदि मानव के चकमक पत्थर रगड़ने के बाद विश्व इतिहास में यह रगड़ने की ऐसी दूसरी घटना थी. हालांकि, इस में बौस द्वारा कर्मचारी को रगड़ना नहीं सम्मिलित किया गया है. उस दिवस, विम बार और उस के समकक्ष सभी उत्पादों के विज्ञापन में आने वाली सुंदर महिलाएं सूर्पणखा के बराबर लगने लगीं. यद्यपि हम ने वह केक 70 कोनों का मुंह बना कर खाया भी और जन्मदिन वाले मित्र से कहा भी कि तुम ने जन्म ले कर अच्छा नहीं किया, अगर जन्म न लेते तो यह केक अस्तित्व में न आता. इस घटना से सोनुवा महाराज को पाककला से विरक्ति हो गई.

उन्होंने तत्काल स्वयं को किचन के किचकिचीय जीवन से मुक्त रखने का निर्णय ले कर सृष्टि पर उपकार किया. उन का माफीनामा जल्द ही संग्रहालय में रखवाया जाएगा जो मानवजाति को भोजन पर किसी भी ऐसे प्रयोग से हतोत्साहित करने का प्रमाणपत्र सिद्ध होगा. क्या उन का क्षमापत्र पढ़ कर काला हुआ पात्र उन्हें क्षमा करेगा? हम उन्हें भगोना बरबाद होने से लगे सदमे से बचाने में प्रयत्नशील हैं. इस के लिए 7 मित्रों की संसद में यह निर्णय हुआ है कि अब वह भगोना भी एक टब जमीन के साथ रखा जाएगा और उस में भी उसी वांछित उत्प्रेरक वनस्पति की खेती होगी जिसे वायु में उड़ा कर वातावरण को संतुष्टि मिलती है और हमारे मन को वह शक्ति जिस से हम इस केक को न याद कर पाएं और गाएं ‘एक भगोना केक, जल्दीजल्दी फेंक.’ Social Story In Hindi

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