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इन्हें भी आजमाइए

  1. वाशरूम में बड़े साइज का वर्ल्ड मैप लगाएं. जितना समय आप वहां गुजारेंगे, उस मैप को रोजाना देखना आप को भूगोल का ज्ञान कराएगा.
  2. मछली का ताजापन जांचने के लिए उसे ठंडे पानी भरे कटोरे में डालें. ऊपर तैरे तो मतलब मछली ताजा है.
  3. कपड़े से स्याही का दाग हटाना चाहते हैं तो दाग पर टूथपेस्ट लगा कर उसे पूरी तरह सूखने दें, बाद में धो लें.
  4. गरम पानी में नीबू का रस डाल कर उस में 10 मिनट तक सफेद कपड़े भीगने दें, फिर सफेदी देखिए.
  5. अपने छोटेछोटे आभूषणों को व्यवस्थित रखने के लिए आइस ट्रे का इस्तेमाल करें.
  6. कपड़े में लगे च्युंगम को हटाने के लिए कपड़े को 1 घंटे के लिए फ्रीजर में रख दें.
  7. टिश्यू पेपर बौक्स के साथ एक खाली टिश्यू पेपर बौक्स रबड़ बैंड से अटैच कर दें. जो भी टिश्यू पेपर इस्तेमाल करेगा, इधरउधर के बजाय खाली बौक्स में ही डालेगा.
  8. स्प्रिट से शीशा साफ करें, चमक उठेगा.
  9. ठंडे पानी से बालों की शौवरिंग करें, रूसी से नजात मिलेगी.

सांस

एकएक सांस का 
हिसाब मांगती है जिंदगी
कहां से शुरू, कहां खत्म 
कितनी कहानी अभी बाकी है
 
कहां रुकी, कहां थमी
सांस लेने को जिंदगी
कहकहे कहां गए
क्या बुलबुले से फूट गए
 
लुप्त हुई मुसकान कहां गई
कहां जाएगी ये जिंदगी
समझने को बेकरार मेरा शरीर
किसी उत्तर के इंतजार में आज भी .
शशि श्रीवास्तव

मेरे पापा

मेरे पापा शिक्षा को बहुत अहमियत देते थे. जब लड़कियों में शिक्षा का प्रचलन कम था, उस समय भी उन्होंने छोटे शहर में रहने के बावजूद हम
5 बहनों और 2 भाइयों को शिक्षा दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वे कहते थे, जो जितना पढ़ेगा उसे उतना अधिक पढ़ाऊंगा.
पापा की उम्मीदों पर खरी सिर्फ एक दीदी ही उतरती थीं इसलिए वे उन्हें ऐक्सप्रैस ट्रेन और हम लोगों को मालगाड़ी कहते थे ताकि हम लोग भी मेहनत से पढ़ें और आगे बढ़ें.
जीवन के नैतिक मूल्यों की शिक्षा और अच्छे संस्कार, जो उन के द्वारा मिले, उस की बदौलत हम भाईबहनों की गाड़ी कभी पटरी से नीचे नहीं उतरी, बल्कि अपनेअपने क्षेत्र में कामयाब हो कर आगे बढ़ते हुए सुव्यवस्थित जीवनयापन करने में सफल रहे.
यद्यपि पापा हम लोगों के बीच नहीं हैं फिर भी उन के व्यक्तित्व व शिक्षा से हमें सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है.
रेणुका श्रीवास्तव, लखनऊ (उ.प्र.)
 
मुझे रसोई के काम में तनिक भी रुचि नहीं थी. कभीकभार मेरे पापा मुझे चाय बनाने के लिए कह देते तो मैं कभी ज्यादा पानी वाली या कभी ज्यादा चीनी वाली चाय उन को बना कर दे देती.
उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि चाय में चीनी अधिक है या चाय ठीक नहीं बनी है. वे हमेशा एक ही बात कहते, ‘बेटा, तुम ने चाय तो बढि़या बना कर दी है.’
एक दिन पापा के एक मित्र आए. पापा मेरे साथ किचन में आए. उन्होंने मुझ से चाय बनवाई. चाय पीने के बाद पापा के दोस्त जब जाने लगे तो उन्होंने कहा कि आप की बिटिया तो सब काम अच्छी तरह कर लेती है.
पापा ने अपने मित्र से कहा कि इस के रहते हुए मुझे कोई फिक्र नहीं है. पापा की बातों से मुझ में आत्मविश्वास पैदा हुआ और अब रसोई का कार्य मैं स्वयं कर लेती हूं. काश, सभी के पापा ऐसे हों.
दीपशिखा गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)
 
बात वर्ष 1986-87 की है. मैं 11वीं में पढ़ता था. मेरी मां का देहांत, जब मैं मात्र 5 साल का था, हो गया था. मुझे मेरे भैयाभाभी ने पालापोसा. मेरे पिताजी रिटायर्ड फौजी थे और दिल्ली में दूसरी सर्विस कर रहे थे. मां के देहांत के बाद अचानक पिताजी की आंखों की रोशनी चली गई. पिताजी गांव में रहने लगे. वे मुझे सेना में जाने के लिए जागरूक करते, सेना की बहादुरी के पुराने किस्से सुनाते. नतीजतन, मुझे भी सेना में जाने की जिज्ञासा हुई.
पापा की ही प्रेरणा से मैं आज सेना में सूबेदार हूं. पापा को सैल्यूट.
महिपाल रावत, नंदौली (उ.खं.) 

सूक्तियां

प्रशंसा
झिड़कियां और बदनामी वही सह सकते हैं जो प्रशंसा के योग्य होते हैं.
अज्ञानता
अपने ज्ञान के लिए गर्वित होना सब  से बड़ी अज्ञानता है.
धोखा
जीवन में कोई मनुष्य किसी से इतना धोखा नहीं खाता जितना कि अपनेआप से.
लक्ष्य
महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यत्न करतेकरते असफल हो जाना?भी शान की बात है.
विवाह
विवाह कभी विफल नहीं होते. यह तो व्यक्ति है जो विफल होता है. विवाह तो केवल व्यक्ति को उस के वास्तविक रूप में प्रकट कर देता है.
शिकायत
हम हमेशा शिकायत करते रहते हैं कि हमारे जीने के दिन थोड़े हैं, पर काम ऐसे करते रहते हैं मानो हमारा अंत कभी न होगा.
श्रेष्ठ व्यक्ति
श्रेष्ठ व्यक्ति के 3 रूप होते हैं–वह नेक हो तो चिंताओं से, बुद्धिमान हो तो उलझनों से और शक्तिवान हो तो भय से मुक्त रहता है.

दिन दहाड़े

मैं बाजार में आम खरीदने गई थी. एक ठेले वाले के पास मुझे दशहरी आम दिखाई दिए. मैं ने भाव पूछा तो उस ने उन का भाव 50 रुपए किलो बताया. मैं ने उसे 1 किलो आम तौलने के लिए कहा और पर्स से पैसे निकालने लगी. इसी बीच आम वाले ने आम पौलिथीन में डाल कर बांध दिए.
हमारे परिवार ने पिछले कई सालों से पौलिथीन का इस्तेमाल बंद कर दिया है इसलिए मैं ने उस से कहा कि आम मेरे बैग में डाल दे, मुझे पौलिथीन नहीं चाहिए, तो वह आनाकानी करने लगा. मैं भी अपनी बात पर अड़ी रही. आखिरकार उस को पौलिथीन खोलनी पड़ी. मैं दंग रह गई, उस में भरे हुए ज्यादातर आम खराब थे. मेरे आम दूसरी तरफ रखे हुए थे. दुकानदार बारबार कहने लगा कि गलती से ऐसा हो गया.
वंदना मानवटकर, सिवनी (म.प्र.)
मेरी सहेली बनारस जा रही थी. कुछ रिश्तेदार भी साथ जा रहे थे. सभी को स्टेशन पर मिलना था. मेरी सहेली कुछ जल्दी पहुंच कर स्टेशन के बाहर ही अपने परिचितों का इंतजार कर रही थी. एक अच्छाभला संभ्रांत सा व्यक्ति उस के बगल में आ कर खड़ा हुआ और अपने मोबाइल से किसी से बातें करने लगा. उस की बातों से ऐसा लग रहा था कि वह बहुत परेशान सा है.
मेरी सहेली ने जिज्ञासावश पूछ लिया कि क्या बात है. उस ने बताया कि सुबह 3 बजे एअरपोर्ट पर उस ने अपने पिता को विदा किया था. वे जरमनी जा रहे थे बिजनैस के सिलसिले में और सुबह उन की फ्लाइट थी. उन का मध्य प्रदेश के मऊ शहर में साडि़यों का बड़ा कारोबार है.
एअरपोर्ट से लौटते समय बस में किसी ने उस का पौकेट मार लिया जिस से सारे पैसे चले गए. दिल्ली में उस की कोई जानपहचान भी नहीं है. रेलवे अधिकारी से भी बात की थी पर कोई मदद नहीं मिली.
उस व्यक्ति ने इतनी दयनीयता से अपनी परेशानी कही कि मेरी सहेली ने सहानुभूतिवश उस से पूछ लिया कि किराए में कितना लगेगा? उस व्यक्ति ने कहा, 300 रुपए. मेरी सहेली ने जब 300 रुपए दिए तो उस ने कहा, 500 कर दीजिए, मैं पहुंचते ही रुपए भेज दूंगा. इत्तेफाक से सहेली के पास उस समय पर्स में सिर्फ 400 रुपए ही थे जो उस ने दे दिए.
उस व्यक्ति ने अपना नाम पता दिया और सहेली का भी नाम, पता, फोन नंबर ले लिया. पैसे हाथ में पाते ही यह कहता हुआ चला गया कि देखूं शायद अभी कोई टे्रन मिल जाए. जिस तरह से वह गायब हुआ, मेरी सहेली को थोड़ा शक हुआ पर पैसे तो चले ही गए थे.
डेढ़ महीने बीत गए पर पैसे वापस न आने थे न आए.
किरन श्रीवास्तव, वसंत कुंज (न.दि.) 

बहाने आंसू के

निकल ही आते हैं बहाने
आंसू बहाने के
दूर से भी तुम 
नहीं छोड़ते मौके रुलाने के
ऐसी भी क्या बेचैनी थी 
दामन छुड़ाने की
पहले ढूंढ़ तो लेते 
बहाने कुछ ठिकाने के
मैं दिल की बात करता हूं 
तुम करो दुनिया की
छोड़ कर भी मुझे तुम 
न हो सके जमाने के
मेरे गीत-ओ-गजल में 
ढूंढ़ते हैं सब तुम्हें
मगर कुछ फिक्र न करना 
हम नहीं बताने के
बड़ी मुद्दत के बाद सोया था
कल रात मैं
तसवीर नहीं थी तेरी,
नीचे मेरे सिरहाने के
दिल को यकीं है
तुम लौट तो आओगे मगर
आवाज दे कर ‘आलोक’
अब तुम्हें नहीं बुलाने के.
आलोक यादव
 

कुत्ता एक सच्चा पहरेदार

आज के दौर में जब सुरक्षा प्रश्नचिह्न बनती जा रही है और लोगों का अपनों पर से विश्वास उठता जा रहा है तो ऐसे में कुत्ते अपनी वफादारी के बलबूते खेत, घर और फार्महाउस के नए पहरेदार बन कर उभर रहे हैं.

किसी को गाली देनी हो तो उसे कुत्ता कह देना काफी है, हालांकि समाज में कुत्ते को वफादार माना व कहा जाता है. कुत्ते इंसानों की सुरक्षा ही नहीं, घरों, फार्म हाउसों, खेतखलिहानों, बागबगीचों की पहरेदारी भी बखूबी करते हैं. बुंदेलखंड के महोबा जिले का कालीपहाड़ी गांव पत्थरों और छोटीछोटी पहाडि़यों से घिरा है. खेत गांव से दूर स्थित हैं. लिहाजा, किसानों को अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए कई तरह के इंतजाम करने होते हैं. रामदीन ने वहां अपने खेतों के चारों ओर बाड़ लगा  कर सब्जी की खेती की है. वह अपनी 10 बीघा जमीन पर सब्जी के अलावा गेहूं, चना और मूंग की खेती करता है. उस ने अपने खेत के एक हिस्से में कटहल, नीबू और आम के पेड़ भी लगाए हैं.

उस की सब से बड़ी परेशानी इन फसलों की सुरक्षा की होती है. नीलगाय और छुट्टा जानवरों के अलावा चोरी करने वाले लोगों से फल और फसलों को बचाना मुश्किल होता है. रामदीन कहता है, ‘‘बुंदेलखंड में वैसे तो छुट्टा जानवरों को छोड़ने वाली अन्ना प्रथा लगभग बंद हो गई है लेकिन नीलगाय और दूसरे जानवरों से खेतों को बचाना आसान नहीं है. वहीं, फसलों की चोरी करने वाले भी परेशान करते हैं.’’

फसलों को बचाने के लिए रामदीन ने अपने खेत के बीच में एक जगह बनाई है जहां वह रात को सोता है. जंगली इलाके में रात को सोना किसी मुसीबत से कम नहीं होता. इस से बचने के लिए रामदीन ने 2 देसी नस्ल के कुत्ते पाल रखे हैं. किसी अनजान आदमी के आने पर वे जोरजोर से भूंकने लगते हैं. इस से रामदीन सचेत हो जाता है. वह कहता है, ‘‘कई जानवर तो इन कुत्तों की आवाज सुन कर ही भाग जाते हैं. जो जानवर या आदमी इस के बाद भी खेत में घुस कर फल और फसलों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं, कुत्ते उन का मुकाबला करते हैं. इन को जैसे ही यह पता चलता है कि हम जाग गए हैं और इन के पास हैं, ये दोगुनी ताकत से विरोधी पर हमला कर देते हैं.’’

ऐसा केवल रामदीन के साथ ही नहीं है, खेत से ले कर फार्म हाउस तक में खेती करने वाले सभी मानते हैं कि कुत्ते किसानों के दोस्त और फसलों के सब से बेहतर सुरक्षाकर्मी होते हैं. लखनऊ के रहने वाले राजेश राय ने सुल्तानपुर रोड पर गोमती नदी के किनारे अपना एक फार्म हाउस ‘ड्रीमवैली’ नाम से बनाया है. इस में वे मैडिसिनल प्लांट की खेती करते हैं. उन्होंने फार्म हाउस को पार्क का रूप भी दे रखा है. यहां पर हौर्स राइडिंग और कै मल राइडिंग के शौकीन लोग खूब आते हैं. वैसे तो यह फार्म हाउस लोहे के कंटीले तार से घिरा है पर फार्म हाउस का काफी हिस्सा खुला हुआ है. इस रास्ते से तमाम जानवर व चोरउचक्के फार्म हाउस में आ कर फसलों व वहां रहने वालों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इस से बचने के लिए राजेश राय ने जरमन शेफर्ड नस्ल के 2 कुत्ते पाल रखे हैं.

कुत्तों की फौज

यही हाल कानपुर रोड पर लखनऊ से 25 किलोमीटर दूर ‘ड्रीमवर्ल्ड’ वाटर पार्क और फार्म हाउस चलाने वाले मनीष वर्मा का भी है. वाटर पार्क को तो बाउंड्रीवाल से सुरक्षित कर दिया गया पर फार्म हाउस की सुरक्षा के लिए केवल लोहे के तार की बाड़ का ही सहारा लिया गया है. इस के बीच से रास्ता बना कर जंगली जानवर और चोरउचक्के रात को यहां घुसने का प्रयास करते हैं. इन को रोकने के लिए मनीष वर्मा ने 18 कुत्तों की फौज तैनात कर रखी है. इन में जरमन शेफर्ड, नैपोलियन मैस्टिफ, ग्रेडडेन, लैब्राडोर और डालमेशन नस्ल के कुत्ते शामिल हैं.

दिन में ये कुत्ते एक ठंडी जगह पर बंधे रहते हैं. रात होते ही इन को फार्म हाउस में छोड़ दिया जाता है. इन के डर से चोर- उचक्के और जंगली जानवर फार्म हाउस में घुसने की हिम्मत नहीं करते. मनीष वर्मा बताते हैं कि अगर गलती से कोई छोटामोटा जानवर वहां पर आ भी जाता है तो ये कुत्ते मिल कर उसे मार देते हैं.

यह चलन नया नहीं है, बहुत पहले से लोग अपनी सुरक्षा के लिए कुत्तों को ले कर चलते थे. शिकार करने के शौकीन लोग भी कुत्तों पर खूब भरोसा करते थे. जब से फार्म हाउस कल्चर बढ़ा और लोगों ने फार्म हाउस में महंगे सामान रखने शुरू किए, उन की सुरक्षा बहुत जरूरी हो गई. कुत्ता रातभर जाग कर पूरी मुस्तैदी से फार्म हाउस की सुरक्षा करता है. हल्की सी आहट सुन कर वह उठ जाता है. जरूरत के अनुसार लोग खतरनाक किस्म के कुत्ते पालने लगे हैं जिन को देख कर ही लोगों के पसीने छूट जाते हैं.

सुरक्षा का बेहतर माध्यम

बाराबंकी जिले में अपना फार्म हाउस चलाने वाले राहुल मिश्रा ने बड़ी और छोटी दोनों ही प्रजाति के 20 से ज्यादा कुत्ते पाल रखे हैं. इन में छोटी प्रजाति वाले कुत्ते जहां घर पर रहते हैं वहीं बड़ी प्रजाति वाले डोबर मैन और जरमन शेफर्ड जैसे कुत्ते फार्म हाउस की सुरक्षा के लिए तैनात हैं. राहुल मिश्रा को प्रगतिशील किसान का अवार्ड मिल चुका है. वे कहते हैं, ‘‘सुरक्षा के लिए कुत्ता सब से सही माध्यम होता है. यह किसानों का सदा से मित्र रहा है. अब फार्म हाउस कल्चर बढ़ने से सुरक्षा का मसला खड़ा होने लगा है. इस के लिए  खतरनाक नस्ल के विदेशी कुत्ते को पालने का प्रचलन बढ़ गया है.’’ 

इस तरह से कुत्ते वर्तमान में घर, खेत, बागबगीचे व फार्म हाउस सभी की सुरक्षा कर रहे हैं. इंसान इन से तरहतरह के काम कराता रहा है. इंसानों ने जानवरों में कुत्ते को वफादार का तमगा दिया है. यह बागबानी की देखरेख में भी अपना योगदान देता है.    

भोजपुरी सिनेमा सफलता का देसी फार्मूला

1961 में रिलीज हुई पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ से शुरू हुआ भोजपुरी फिल्मों का सफर लंबे संघर्ष के बाद आज एक खास मुकाम हासिल कर चुका है. यही वजह है कि बौलीवुड और साउथ इंडियन फिल्मों के असफल और निराश कलाकारों के लिए भोजपुरी फिल्म उद्योग सफलता का देसी फार्मूला बन कर उभरा है. पढि़ए राजेश कुमार का लेख.

भोजपुरी फिल्मों का कारोबार आज हिंदी फिल्मों को चुनौती दे रहा है. भोजपुरी भाषा में बनी फिल्में अब द इंटरनैशनल इंडियन फिल्म एकेडमी अवार्ड्स (आइफा) और कई विदेशी अवार्ड समारोहों में प्रीमियर की जा रही हैं. इन फिल्मों ने देशभर के सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों को एक बार फिर से जिंदा कर दिया है. लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब भोजपुरी फिल्मों में काम करने को कई सफल कलाकार लो स्टेटस का काम समझते थे. दौर बदला और भोजपुरी फिल्मों का बाजार भी. भोजपुरी सिनेमा की जनता के बीच बढ़ती लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब भोजपुरी फिल्मों में अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, जया बच्चन, मिथुन चक्रवर्ती, अजय देवगन, जितेंद्र से ले कर हर छोटाबड़ा अभिनेता, गायक, निर्मातानिर्देशक और कौमेडियन शान से काम कर रहे हैं.

भोजपुरी फिल्म उद्योग ने सब से ज्यादा फायदा उन अभिनेत्रियों को पहुंचाया है जो हिंदी फिल्मों से शुरुआती दौर से ही अचानक लाइमलाइट से बाहर हो गईं. कैरियर को खत्म होता देख इन अभिनेत्रियों ने भोजपुरी सिनेमा का रुख किया और इस देसी सिनेमा ने इन के कैरियर को एक नया जीवनदान दिया. इन में भूमिका चावला, नीतू चंद्रा, ऋषिता भट्ट, श्वेता तिवारी, संभावना सेठ, भाग्यश्री, रश्मि देसाई, नगमा, पाखी हेगडे़, मोनालिसा, रिंकू घोष, रंभा, अनारा गुप्ता, लवी रोहतगी और प्रीति झ्ंिगयानी आदि के नाम प्रमुख हैं. इन के कैरियर के लिए भोजपुरी फिल्में सफलता का देसी फार्मूला बन कर उभरी हैं.

ऐसा नहीं है कि भोजपुरी फिल्में सिर्फ अभिनेत्रियों के कैरियर को जीवन दे रही हैं, हिंदी फिल्मों में काम कर चुके आशिकी फेम राहुल राय, मुकेश खन्ना, कृष्णा, विनय आनंद, रवि किशन, शक्ति कपूर से ले कर कुमार सानू, अनूप जलोटा, एकता कपूर और उदित नारायण भी आजकल भोजपुरी फिल्मों में मसरूफ हैं.

कोई अभिनेता के तौर पर, कोई गायक या निर्माता के तौर पर. मतलब यह है कि अभिनेत्रियों के अलावा भोजपुरी फिल्मों ने कई गायकों, संगीत निर्देशकों और चरित्र अभिनेताओं के कैरियर में भी जान फूंकी है. इन सब के बावजूद, यह मानना पड़ेगा कि फ्लौप अभिनेत्रियों के लिए भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री डूबते को तिनके का सहारा बन कर उभरी है.

सलमान खान के साथ ‘तेरे नाम’ जैसी सुपरहिट फिल्म देने के बावजूद भूमिका चावला को हिंदी फिल्मों में असफलता ही हाथ लगी. लिहाजा, उन्होंने भोजपुरी फिल्म का रुख किया. भोजपुरी फिल्मों की शुरुआत में ही उन्होंने अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गज कलाकार के साथ काम किया. और एक वक्त में स्टारडम से कोसों दूर रहीं भूमिका को इन देसी फिल्मों ने फिर से सफलता के मुकाम पर पहुंचा दिया. हालफिलहाल भूमिका भोजपुरी फिल्मों के साथसाथ साउथ की फिल्मों में सक्रिय हैं.

भूमिका की तरह ही सलमान खान के साथ सुपरहिट फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ करने के बाद भाग्यश्री ने कई हिंदी फिल्में कीं, लेकिन सफल नहीं हो सकीं. भोजपुरी फिल्मों में अपना भाग्य आजमाया. यहां उन्हें सफलता का स्वाद चखने को मिल ही गया. उन्होंने भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार रवि किशन के साथ ‘उठाइले घूंघटा चांद देख ले’ जैसी सुपरहिट फिल्म की. आज भोजपुरी फिल्मों में उन की खासी डिमांड है.

नीतू चंद्रा ने अपना कैरियर अक्षय कुमार के साथ फिल्म ‘गरम मसाला’ जैसी सुपरहिट फिल्म से स्टार्ट किया.  लेकिन बाद में खास सफल नहीं हुईं.

कैरियर का ढलान आता देख उन्होंने भी भोजपुरी फिल्मों का रुख किया. उन्होंने बतौर निर्माता पाखी हेगडे़ को ले कर आई फिल्म ‘देसवा’ बनाई जो न सिर्फ सफल हुई बल्कि समीक्षकों को भी खासी पसंद आई. भोजपुरी फिल्मों से सफलता का स्वाद चखने के बाद उन्होंने कई और भोजपुरी फिल्मों के निर्माण की घोषणा की है.

धारावाहिक ‘कसौटी जिंदगी की’ से चर्चा में आईं टीवी क्वीन श्वेता तिवारी को बड़े परदे ने खींच तो लिया पर अपेक्षित सफलता न दिला सका. कई हिंदी फिल्मों में अभिनय और आइटम सौंग करने के बाद श्वेता ने भी भोजपुरी फिल्मों में हाथ आजमाया. वहां उन की दाल गल गई. भोजपुरी में श्वेता खुद कई फिल्मों का निर्माण भी कर रही हैं.

डूबने से बचाया कैरियर

‘उतरन’ और ‘झलक दिखला जा’ में चर्चा बटोरने वाली रश्मि उर्फ दिव्या देसाई को भी यह सफलता भोजपुरी फिल्मों ने दिलवाई है. वे टीवी पर तो पार्टटाइम काम करती हैं, उन का फुलटाइम भोजपुरी फिल्मों के लिए ही है. इन के अलावा मोनालिसा ने हिंदी की बी और सी ग्रेड फिल्मों, ‘तौबातौबा’ और ‘एक चतुर नार’ में अपनी बोल्ड अदाओं से कहर बरपाने में नाकाम रहने के बाद भोजपुरी फिल्मों का रुख किया. हालफिलहाल मोनालिसा भोजपुरी की टौप अभिनेत्रियों में से हैं और भोजपुरी के सुपरस्टार निरहुआ से ले कर रवि किशन और मनोज तिवारी के साथ अपनी जोड़ी जमा रही हैं.

सैक्स स्कैंडल से अचानक सुर्खियों में आई ‘मिस जम्मू’ अनारा गुप्ता ने फिल्मी कैरियर की शुरुआत हिंदी फिल्मों से की. पहली हिंदी फिल्म उन के सैक्स सीडी प्रकरण पर आधारित थी पर उन्हें कोई नोटिस नहीं मिला. बाद में अनारा को भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में मौका मिला. अनारा इन दिनों भोजपुरी फिल्मों में एक सफल नाम है.

हिंदी और बंगाली फिल्म में काम कर चुकीं रिंकू घोष का कैरियर भी भोजपुरी फिल्मों की बदौलत चमका. आज वे भोजपुरी की सफल स्टार हैं. रिंकू भोजपुरी में कई सुपरहिट फिल्में दे चुकी हैं. वहीं कंट्रोवर्सी क्वीन संभावना सेठ को भी भोजपुरी फिल्मों ने पहचान दी. संभावना ने बतौर आइटम डांसर, कई भोजपुरी फिल्मों में काम किया है.

भोजपुरी फिल्मों ने सिर्फ हिंदी फिल्म अभिनेत्रियों के ही नहीं बल्कि दक्षिण भारतीय फिल्मों की अभिनेत्रियों के ढलते कैरियर को डूबने से बचाया. साउथ और हिंदी फिल्मों ने अपने कैरियर को डूबते देख नगमा ने भोजपुरी फिल्मों में सफलता पाई. उन्होंने भोजपुरी में बिग बी यानी अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘गंगा’ में भी काम किया. नगमा की तरह ही साउथ की जानीपहचानी अदाकारा रंभा ने कई सुपरहिट हिंदी फिल्में भी की हैं लेकिन कैरियर ढलता देख उन्हें भी देसी फिल्मों की शरण में आना पड़ा.

दरअसल, लंबे समय से उपेक्षित भोजपुरी फिल्म उद्योग को चमकाने में काफी मेहनत की गई है. अमिताभ बच्चन के मेकअपमैन दीपक सावंत ने अमिताभ को जब भोजपुरी फिल्मों में उतारा तब अचानक लोगों का भोजपुरी फिल्मों के प्रति उपेक्षाभरा रवैया बदला. अमिताभ ने बयान भी दिया था कि क्षेत्रीय फिल्मों को सहयोग और समर्थन की जरूरत है और यही कारण है कि वे ऐसी फिल्मों में काम के बदले कभी पैसा नहीं लेते. भोजपुरी भाषा की ‘गंगा’ और ‘गंगोत्री’ जैसी फिल्मों में काम कर चुके अमिताभ और जया कई और भोजपुरी फिल्मों में काम कर रहे हैं. देखतेदेखते लंबे समय तक उपेक्षित रही पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की भाषा ‘भोजपुरी’ एकाएक बढि़या मुनाफे वाले सिनेमा का जरिया बन गई है. 

राममंदिर के मारे किसान

अयोध्या के राममंदिर विवाद के दौरान मंदिरमसजिद की राजनीति कर कई नेताओं ने न सिर्फ अपनी सियासत चमकाई बल्कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक बन बैठे. इसी दरम्यान मंदिर के नाम पर किसानों से उन की जमीनें कौडि़यों के भाव ली गईं. मुआवजे की आस में बैठे किसान इंसाफ के लिए आज तक अदालतों के चक्कर काट रहे हैं. ऐसे ही एक किसान के दर्द को साझा कर रहे हैं शैलेंद्र सिंह.

अयोध्या के राममंदिर विवाद ने राजनीतिक पार्टियों, मुकदमा लड़ने वाले वकीलों और नेताओं को कुरसी व पैसा दोनों का लाभ कराया. मंदिर व मसजिद की राजनीति करने वाले कई नेता मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक बन गए. राममंदिर बनाने के लिए किसानों की जमीनें मिट्टी के भाव ली गईं. उन का तय मुआवजा तक नहीं दिया गया. ऐसी 29 एकड़ जमीन के मालिक कई किसान परिवार पिछले 22 साल से मुआवजे हासिल करने की लड़ाई लड़ रहे हैं. उन की सुध लेने वाला कोई नहीं है.

अयोध्या के 3 गांव के 20 से ज्यादा किसान मंदिर के लिए जमीन के अधिग्रहण का दर्द पिछले 22 सालों से झेल रहे हैं. ये गांव अवध खास, कोट रामचंद्र और जालवानपुर परगना हवेली अवध, तहसील सदर, जिला फैजाबाद का हिस्सा हैं. यहां के रहने वाले किसान अमरजीत, रामजीत, कृष्णकुमार, विनोद कुमार, रामदुलारी, रामानंद, परशुराम, तुलसीराम, राजकुमार, राजितराम, रामबहादुर, शिवकुमार, रामप्रसाद और विनीत मौर्य के खेतों में आलू, टमाटर, गोभी, बैगन, लौकी जैसी सब्जियां और गेंदा, गुलाब जैसे फूलों की खेती

होती थी. यही इन के रोजीरोजगार का साधन था. इन के घरपरिवार इसी पर अपना गुजरबसर कर रहे थे. फूलों की खेती साल भर होती थी. अयोध्या में फूल बेच कर इन का गुजारा हो जाता था.

वर्ष 1988-89 में उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग ने रामकथा पार्क बनाने के लिए 3 चरणों में 43 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया. इस में 29 एकड़ जमीन खेती की थी. किसानों से वादा किया कि 15 रुपए प्रति वर्गफुट के हिसाब से इस जमीन का मुआवजा दिया जाएगा. जिन परिवारों से जमीन ली गई है उन के परिवार से एक आदमी को नौकरी दी जाएगी. सरकार ने इन किसान परिवारों को केवल 2 रुपए 40 पैसे प्रति वर्गफुट के हिसाब से मुआवजा दिया. किसी भी किसान के परिवार को कोई नौकरी नहीं दी गई. बाद में यही जमीन मंदिर बनाने के लिए अधिगृहीत कर ली गई. इस के बाद भी किसानों के मुआवजे पर कोई कदम नहीं उठाया गया.

कब मिलेगा न्याय

इस लड़ाई को लड़ रहे किसान विनीत मौर्य कहते हैं, ‘‘हम सभी किसान खेती कर के अपने परिवार का पालनपोषण करते थे. आज हमारे पास न तो खेती के लिए जमीन रह गई है और न ही कोई दूसरा काम. ऐसे में हमारे परिवार भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं.

बच्चों की पढ़ाईलिखाई नहीं हो पा रही है. हमें मजदूरी कर के अपना पेट पालना पड़ रहा है. हम सभी किसान मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, कानूनमंत्री और राष्ट्रपति तक अपनी बात पहुंचा चुके हैं पर कोई भी सुनने को तैयार नहीं है. हम जिला न्यायालय में यह मुकदमा लड़ रहे हैं.

‘‘कोर्ट में लड़ाई इतनी सुस्त गति से चल रही है कि 22 साल बाद भी कुछ नहीं हुआ. हमारी एक पीढ़ी तो गुजर गई. बच्चे बडे़ हो गए. कब हमें न्याय मिलेगा, पता नहीं. जो जमीन अधिग्रहण के पहले सब्जी और फूलों से लहलहाती थी, अब जंगल बन गई है. इसे देख कर दुख होता है. सरकार की लालफीताशाही के चलते हम और हमारे परिवार भूखों मरने के कगार पर हैं.’’

कई किसान तो मुआवजे के इंतजार में दुनिया छोड़ चुके हैं. अब उन के परिवार वाले संघर्ष कर रहे हैं. रामकथा पार्क के लिए ली गई जमीन का राममंदिर बनाने के लिए अधिग्रहण कर लिया गया. तब से मामला केंद्र्र सरकार के पाले में चला गया है. अब उत्तर प्रदेश सरकार यह कह रही है कि जमीन की मालिक केंद्र्र सरकार है. वह ही तय करे, क्या करना है? विनीत मौर्य कहते हैं, ‘‘हम किसानों से जमीन प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग ने ली थी. हमें मुआवजा और नौकरी देने की बात भी प्रदेश सरकार ने की थी. ऐसे में वह मसला केंद्र्र के पाले में क्यों डाल रही है. हमारी जमीन केंद्र्र को देने के पहले राज्य सरकार को हम किसानों से किया गया वादा पूरा करना चाहिए था.’’

सरकार की मनमानी

विनीत मौर्य कहते हैं, ‘‘हम ने सूचना अधिकार के तहत राज्य सरकार से इस अधिग्रहण के कानूनी पहलू की जानकारी मांगी तो पर्यटन विभाग ने किसी भी तरह की जानकारी देने से इनकार कर दिया. उस का कहना है कि उस के पास इस जमीन से जुड़ा कोई कागज नहीं है.’’

किसानों की जमीन को ले कर सरकार कैसे उस का मनमाना उपयोग करती है, इस का भी उदाहरण यहां देखने को मिलता है. जिन किसानों की जमीन पर्यटन विभाग ने रामकथा पार्क बनाने के लिए ली थी उस को 1 रुपए सालाना की दर से रामजन्मभूमि न्यास को पट्टे पर दे दिया. रामकथा पार्क दूसरी जगह पर बना लिया गया.

विनीत मौर्य आगे कहते हैं, ‘‘केंद्र्र सरकार कहती है कि जब उस ने जमीन का अधिग्रहण किया तो वह रामकथा पार्क की जमीन थी. उस में किसी भी किसान का नाम नहीं था. प्रदेश का पर्यटन विभाग अब अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा है. ऐसे में हम सभी किसानों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिख कर मांग की है कि अगर हमें 26 जनवरी, 2014 तक जमीन का मुआवजा नहीं मिलेगा तो हम सभी किसान अनिश्चितकालीन धरना देने के लिए मजबूर होंगे.’’

इस संबंध में जब राज्य के पर्यटन विभाग से उन का पक्ष जानने की कोशिश की गई तो पर्यटन विभाग ने बात करने से मना कर दिया. उन का तर्क था कि किसान जमीन के मुआवजे की लड़ाई अदालत में लड़ रहे हैं. जैसा अदालत का फैसला होगा, हम करेंगे.

धर्म को आधार बना कर लड़ाई लड़ने वाले सभी दल इन किसानों से अपना पल्ला झाड़ रहे हैं. उन को इन की कोई चिंता नहीं है. कांग्रेसी सांसद निर्मली खत्री हों या समाजवादी पार्टी के विधायक और मंत्री तेज नारायण पांडेय या भारतीय जनता पार्टी के नेता विनय कटियार, इन किसानों की लड़ाई लड़ने की पहल कोई नहीं कर रहा है.

इन किसानों को अब केवल अदालत का भरोसा रह गया है. इन किसानों की लड़ाई भी राममंदिर विवाद जैसी लंबी हो गई है. सरकार न तो किसानों की जमीन उन को वापस दे रही है और न उस का मुआवजा ही.

उद्देश्य से भटकता मीडिया

हम गणना नहीं कर सकते कि भारत में छपने वाले समाचारपत्रों और पत्रिकाओं की संख्या कितनी है. इस संबंध में जो आंकड़े छपते रहते हैं उन से तसवीर बहुत गुलाबी लगती है. बताया जाता है कि विभिन्न भाषाओं में छपने वाले अखबारों की संख्या हजारों में है तो साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्रिकाएं भी इतनी हैं कि उन की गणना नहीं हो सकती. कई पत्रपत्रिकाएं तो लाखों की संख्या में छपती और बिकती हैं. कुल मिला कर ये करोड़ों में बिकते और अरबों का व्यापार करते हैं.

जाहिर है, उन्हें पढ़ने वाले करोड़ों की तादात में होंगे. पूरे शिक्षित अथवा अर्धशिक्षित, अपनी भाषा का कोई न कोई अखबार सभी पढ़ते हैं. शिक्षा और सूचना के प्रसार में पत्रिकाओं का योगदान भी कम नहीं है. एक तरह से देखें तो यह एक विस्फोट है जो भारत में इतने व्यापक रूप से पहली बार हो रहा है. अपनीअपनी दिलचस्पी और जरूरत के मुताबिक हम अपना कोई पत्र और पत्रिका चुन ही लेते हैं, और उन्हें पढ़ते रहने की हमारी एक आदत सी बन जाती है.

कुछ कठिनाई दूरदराज में रहने वाले उन पाठकों को होती है जहां पत्रपत्रिकाएं नहीं पहुंच पातीं या देर से पहुंचती हैं. उन्हें उन छोटेछोटे स्थानीय समाचारपत्रों को पढ़ कर अपनी भूख मिटानी पड़ती है जो आसपास के कसबों और जिलों से प्रकाशित होते हैं. उन की प्रसार संख्या चाहे बहुत कम हो, पर पाठकों के बीच उन की पैठ गहरी होती है. 2 से 4 पन्नों के इन अखबारों की संख्या कई हजार है.

इन अत्यंत स्थानीय दैनिकों और साप्ताहिकों में स्थानीय ‘मसाले’ का जम कर प्रयोग किया जाता है. उन का एकमात्र उद्देश्य होता है समाचारों को चटपटा बना कर पेश करना. अधिक महत्त्व की राष्ट्रीय खबरें भी देरसवेर उन में छप ही जाती हैं. सुबह या शाम को छपने वाले इन अखबारों का लोग बेसब्री से इंतजार करते हैं. फिर नुक्कड़ों पर गुट बना कर पढ़ते और अपनीअपनी सोच के अनुसार टीकाटिप्पणी करते हैं.

पाठकों की रुचि की अनदेखी

विडंबना यह है कि पाठकों की रुचि को समझने और अपने प्रकाशन को सुधारने की कोशिश बहुत कम पत्रपत्रिकाएं करती हैं. पढ़ने के लिए वे जो सामग्री पेश करती हैं उन में सही सूचना देने, मार्गदर्शन करने और भाषा सुधारने का कोई खास संकल्प नहीं दिखाई देता. जो जनमत वे तैयार करती हैं या उन्हें पढ़ कर जो जनमत तैयार होता है, वह वास्तविकता से कोसों दूर रह जाता है. पाठक को दरअसल क्या मिलना चाहिए, यह जाने बगैर उन्हें छापा और बेचा जाता है.

जो समाचारपत्र कोई राजनीतिक खिचड़ी पकाने के लिए झूठे व चटपटे मसालों का प्रयोग करते हैं वे उस महत्त्वपूर्ण मकसद से भटक जाते हैं कि उन का मुख्य काम जनता में जागरूकता फैलाना भी है. सनसनी फैला कर जीने वाली ऐसे पत्रपत्रिकाओं का मायाजाल बढ़ता ही जा रहा है. हालांकि आज का जागरूक पाठक उन की इस चाल को समझता है. मजे के लिए वह चाहे उन्हें थोड़ी देर के लिए देख ले, पर वह अपना स्थायी संबंध उन्हीं से बनाता है जो अच्छी और जीवनोपयोगी सामग्री छापते हैं.

‘जीवनोपयोगी’ एक ऐसा शब्द है जिसे आज के मीडिया वाले हंसीमजाक में टाल देते हैं. उन का कहना है कि ऐसी पत्रकारिता का अर्थ है जीने के गुर सिखाना और यह काम पत्रकारिता का नहीं सड़कछाप किताबों का है. फिर भी आप देखेंगे कि वे उन से पूरी तरह कन्नी नहीं काट पाते हैं. उन के अखबारों में एकाध कोना जीवनोपयोगी सामग्री के लिए भी सुरक्षित रहता है. जो पत्रिकाएं जीवनोपयोगी सामग्री को अधिक गंभीरता के साथ पेश करती हैं उन से उन के पाठक अपना नाता तोड़ नहीं पाते और बाजार में उन का वर्चस्व स्थापित रहता है.

शुद्ध साहित्यिक कही जाने वाली मासिक और त्रैमासिक पत्रिकाओं की भी अपने यहां कमी नहीं है. वे जीतीमरती, संघर्ष करती हुई आगे बढ़ती हैं. साहित्य से सरोकार रखने वाले पाठक उन्हें पढ़ते हैं. स्वयं रचनाकार भी उन के प्रकाशित होने का बेसब्री से इंतजार करते हैं. उन में कविता, कहानी, समीक्षा, साहित्यिक समाचार और आलोचनाप्रत्यालोचना को विशेष स्थान दिया जाता है. पर पिछले कुछ वर्षों में इन में एकदूसरे पर कीचड़ उछालने की प्रवृत्ति बढ़ी है. समालोचना के नाम पर गालीगलौज और चरित्रहनन करने वाली इन तथाकथित साहित्यिक पत्रिकाओं से आम पाठक का क्या लेनादेना?

प्रिंट मीडिया के साथसाथ अब इलैक्ट्रौनिक मीडिया भी काफी लोकप्रिय हुआ है. पर अपने आकर्षक रूपरंग और ग्लैमर के बावजूद अखबारों और पत्रिकाओं की तुलना में वह बौना साबित हो रहा है. दरअसल, टीवी देखने या रेडियो सुनने वालों के सामने पठनपाठन से प्राप्त होने वाले आनंद का विकल्प नहीं रहता. उन्हें जो दिखाया या सुनाया जाता है उसी को देखनेसुनने को वे अभिशप्त हैं.

कार्यक्रमों का दोहराव

इस मीडिया की एक न्यूनता यह भी है कि पहले दिखा दिए गए कार्यक्रमों को बारबार दोहराया जाता रहता है. ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ व कुछ दूसरे धारावाहिकों को अलगअलग चैनलों पर बारबार बेचा और दोहराया गया. दूसरी ओर पत्रपत्रिकाओं में जो एक बार छप जाता है, उसे दोबारा नहीं छापा जाता. इस ‘चीटिंग’ से इन के पाठक मुक्त रहते हैं. फिर कुछ टीवी कार्यक्रमों में ‘मैगजीन फौर्मेट’ की नकल साफ झलकती है. किसानों, महिलाओं, युवाओं और बच्चों के लिए प्रसारित होने वाले कार्यक्रम अपने को इस सीमा से मुक्त नहीं कर पाए हैं.

पत्रिकाओं के कहानी रूप का एक टीवी रूप वे धारावाहिक हैं जो छोटे परदे पर लगातार छाए रहते हैं. ध्यान से देखें तो मालूम होगा कि वे हमें फैंटेसी की दुनिया में वहां ले जाते हैं जहां वास्तविक जीवन की झलक नहीं के बराबर है. फैमिली ड्रामा की तो बरसात सी हो रही है और कहना मुश्किल हो जाता है कि एक धारावाहिक दूसरे धारावाहिक से भिन्न कैसे है. फिर जो धारावाहिक सफल हो जाता है उसी तरह के दूसरे धारावाहिकों की बाढ़ आ जाती है.

दर्शकों को सब से अधिक खीझ होती है समाचार चैनलों पर समाचारों को बारबार दोहराए जाने पर. कुछ चैनल तो 3-4 समाचारों में ही पूरा दिन काट देते हैं. अखबारों में एक बार छपी खबर दोबारा नहीं छापी जाती. पत्रिकाओं में तो समाचारों का विश्लेषण भी छापा जाता है. सैकड़ों पत्रिकाओं में समाचार समीक्षा की दृष्टि से आप जो चाहे चुन सकते हैं. टीवी पर तो आप को जो दिखाया जाता है उसे ही देखना पड़ता है.

कमोबेश यही स्थिति सोशल मीडिया की भी है. तमाम वैबसाइट्स में उन्हीं खबरों या कहें गौसिप्स को तरजीह दी जाती है जिन से उन्हें सर्वाधिक हिट्स मिलें और विज्ञापन भी. टीवी की टीआरपी की तरह सोशल साइट्स भी अपनीअपनी वैबसाइट्स को नंबर वन बनाने की होड़ के चलते उद्देश्य से भटक रही हैं.

सूचना मंत्रालय की नीतियों के अनुसार, मीडिया के कुछ निर्धारित उद्देश्य हैं. ये उद्देश्य हैं शिक्षा, सूचना और मनोरंजन. प्राइवेट चैनलों के मालिक इस का मतलब अपनेअपने ढंग से निकालते हैं और निर्माताओं से उसी तरह के कार्यक्रम बनवाते हैं. सूचना के नाम पर दूरदर्शन तो बस वही सब दिखाता है जिस से सरकार का कोई राजनीतिक लाभ होता है. दर्शकों के साथ यह कहां का न्याय है?

बहरहाल, पाठकों के सामने बड़ा सवाल सही पत्रपत्रिकाओं के चुनाव का है. समाचारपत्र व पत्रिका चुनते समय ध्यान रखें कि वे आप के सवालों का कितना अच्छा जवाब देते हैं. वे आप के रोजमर्रा के जीवन के वास्तविक दर्पणस्वरूप होने चाहिए. जो सामग्री उन में पेश की जा रही है उन की भाषा ऐसी हो जो आप की बोलचाल से मिलतीजुलती हो, वह लेखक के पांडित्यप्रदर्शन जैसी न लगे, पाठक को मात्र चमत्कृत करने की दृष्टि से न लिखी गई हो. बहुत से समाचारपत्रों के संपादकीय पेज तो इसीलिए बिन पढ़े रह जाते हैं.  

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