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कौन बनेगा प्रधानमंत्री?

19 वीं लोकसभा चुनाव के लंबे उबाऊ चुनाव के बाद अब क्लाइमेक्स का समय आ गया है. मजेदार बात यह है कि बहुत सारी संभावनाओं में सबसे प्रबल संभावना मिली-जुली सरकार के बन रहे हैं. इसमें सबसे बडा पेंच यह है कि क्या गठबंधन में शामिल होने वाले लोग प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी को अपना नेता स्वीकार करेंगे? इसके प्रश्न में ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि भाजपा और एनडीए यानि नेशनल डेमाक्रेटिक एलांयस अगर बहुमत से सत्ता में नहीं आती तो प्रधानमंत्री कौन होगा ?

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सबसे प्रबल संभावनाओं में भाजपा नरेन्द्र मोदी ने नाम की जगह पर कोई और नाम सामने ला सकती है. इसमें सामान्य तौर पर भाजपा नेता नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह के नाम की संभावना देखी जा रही है. इस थ्यौरी से अलग लोग यह भी मान रहे हैं कि ऐसी हालत में पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का नाम सामने लाया जा सकता है. लालकृष्ण आडवाणी के नाम पर विरोधी दल और भाजपा दोनो में आम सहमति बन सकती है.

उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत के नेता भी इस चुनाव के बाद अपने लिये प्रबल संभावनाएं देख रहे हैं. चन्द्र बाबू नायडू और नवीन पटनायक का नाम दौड में शामिल हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बसपा नेता मायावती भी सत्ता की दौड में आगे चल रहे हैं. 23 मई को ही विपक्षी दलों की मीटिंग है. जिसमें मतगणना के बाद के हालातों पर चर्चा होगी. मतगणना के पहले कौन होगा प्रधानमंत्री इस पर चर्चा तेज हो गई है.

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चर्चा का मुख्य बिन्दू यह है कि भाजपा में नरेन्द्र मोदी, नहीं तो फिर कौन बनेगा प्रधानमंत्री?  भाजपा के समर्थक मानते हैं कि इस तरह की कोई संभावना ही नहीं है. भाजपा 300 से अधिक सीटे लाएगी और नरेन्द्र मोदी ही प्रधानमंत्री होंगे. दूसरी तरफ कांग्रेस का दावा है कि देश ने नरेन्द्र मोदी को नकार दिया है. 23 के बाद नया नेता देश का प्रधानमंत्री बनेगा. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बसपा नेता मायावती का नाम आगे बढा रहे हैं. नेताओं से लेकर आम जनता तक के कयास जारी है.

इन 6 तरीकों से मच्‍छरों को रखें अपने बच्चों से दूर…

गंदगी और जगह-जगह पानी इकट्ठा रहने की वजह से इस मौसम में मच्‍छर ज्‍यादा होते हैं. जिससे आपको और आपके छोटे बच्‍चे को कई बीमारियां हो सकती हैं. क्‍योंकि छोटे बच्‍चों का इम्‍यून सिस्‍टम कमजोर होता है और उन्‍हें बीमारी होने की आशंका ज्‍यादा होती है. ऐसे में जरूरी है की आप अपने छोटे बच्‍चे की सेहत का विशेष ध्‍यान दें और मच्‍छरों से बचने के लिए कुछ उपाय अपनाएं.

 मच्‍छरों के काटने से होने वाली बिमारियां

मलेरिया, चिकनगुनियां, पीलिया और डेंगू कुछ जैसी खतरनाक बीमारियों है जो मच्छरो के काटने से होती है.

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नेचुरल रेपलेंट का करे इस्तेमाल

आप अपने घर में केमिकल वाले मौस्‍क्‍यूटो रेपलेंट की जगह नेचुरल रेपलेंट का इस्‍तेमाल करे ताकि वो आपके स्वास्थ के लिए हानिकारक ना हो.

चलिये जानते वो कौन सी 6 चीजों की महक जो मच्‍छरों को आप से से दूर रखेंगी-

1.लहसुन और पुदीना

लहसुन खाने के स्वाद को तो बढ़ाता ही है लेकिन इसकी गंध मच्‍छरों को दूर रखने के एक रामबाण तरीका है. लहसुन की एक कली या लौंग खाने से खून चूसने वाले इन मच्‍छरों से बचा जा सकता है. लहसुन की गंध मच्‍छरों को घर के अंदर आने से रोकती है. लहसुन की कुछ कलियों को पीसकर पानी में उबाल लें और फिर इसका छिड़काव आप पूरे घर में कर लें. ऐसा करने से मच्‍छर आपके घर में नहीं घुस पायेंगे और आपके बच्‍चों को मच्‍छरों के काटने से बचा सकेंगे.

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2.तुलसी

आयुर्वेद के अनुसार तुलसी इतनी फायदेमंद है, कि इसका पौधा खिड़की या दरवाजे के पास रखने से मच्‍छरों को दूर भगाया जा सकता है.  तुलसी का पौधा मच्‍छर के लार्वा को नष्‍ट करने का प्रभावी माध्‍यम है. यह मच्‍छरों को आपके बच्‍चों से दूर रखने का बेहतर उपाय है. आप अपने या बच्‍चे के शरीर पर तुलसी का रस लगा सकते है या फिर कमरे में चारों तरफ इसका स्‍प्रे कर सकते हैं. इससे मच्‍छर आपसे दूर रहेंगे.

3.लेमनग्रास और नींबू

 कई बार बीमारियों का उपचार और बचाव के विकल्‍प आपके आस-पास होता है. लेकिन जानकारी न होने के कारण आप उनका इस्‍तेमाल नहीं कर पाते. इन्‍हीं विकल्‍पों में से एक है लेमनग्रास. इसके इस्‍तेमाल से मच्‍छरों को दूर भगाया जा सकता है. लेमनग्रास का इस्‍तेमाल लेमन टी के तौर पर किया जाता है. एक्‍सपर्ट के अनुसार यदि आपके घर के गमले या लौन में लेमन ग्रास का पौधा है, तो उसकी महक से मच्‍छर आपके आस-पास नहीं भटकते. यह पौधा मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों से बचाने में भी हेल्प करता है.

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4.नीम और नारियल तेल

नीम स्‍वास्‍थ्‍य व शरीर के लिए बहुत गुणकारी है. स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक होने के साथ यह आपको और आपके बच्‍चो को मच्‍छरों के आंतक से भी बचाने में मदद करेगा. नीम के तेल को शरीर पर लगाने से मच्‍छर आपसे कोसों दूर रहते हैं. नीम के साथ नारियल तेल को मिला कर लगाने से करने से मच्‍छर आप तक नहीं पहुच पायेंगे. नारियल के तेल में नीम का तेल मिलाकर दीया जलाएं, इसकी महक से मच्‍छर आपके बच्‍चे से दूर रखेंगे. यह एक जीवाणुरोधी, एंटी फंगल, एंटी वायरस एजेंट होने के साथ आपकी त्‍वचा पर एक विशेष महक छोड़ता है, जो मच्‍छरों को दूर रखता है.

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5.लवेंडर फूल व टी ट्री औयल

लवेंडर के फूल खुशबूदार होने के साथ-साथ आपको मच्‍छरों से बचाने का भी एक अच्‍छा तरीका है. आप इस फूल की महक से मच्‍छरों को असमर्थ बना सकते हैं. इसके लिए आप लवेंडर के तेल को कमरे में रूम फ्रेशनर की तरह छिड़कें, इससे मच्‍छर कमरे में प्रवेश नहीं कर पाएंगे.

6.पुदीना

पुदीना मच्‍छरों को दूर रखने के लिए बहुत उपयोगी है. पुदीने का तेल किसी भी कीटनाशक के जितना प्रभावी है. आप पुदीने का तेल अपने बच्‍चे के या खुद के शरीर पर लगा सकते हैं, यह मच्‍छरों को बच्‍चे से दूर रखेगा. इसके अलावा आप अपने कमरे की खिड़की या दरवाजे के पास पुदीने का पौधा लगा सकते हैं या पुदीने के पत्‍तों के रस का छिड़काव कर भी कर सकते हैं.

चौकलेट एंड बनाना क्रेप्स

सामग्री

दूध (1/2 कप)

मक्खन (1 टेबल स्पून)

पानी (1/4 कप)

मैदा (1 कप)

अंडे (2 )

मक्खन

चौकलेट/हेजलनट

बनाना (1)

औरेंज (छीलकर कटा हुआ)

दालचीनी (एक चुटकी)

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बनाने की वि​धि

दूध, अंडे और मक्खन को एक साथ मिला लें.

थोड़ा सा मैदा लेकर बैटर तैयार करें.

इसमें थोड़ा सा पानी मिलाकर पतला कर लें.

एक बात हमेशा ध्यान रखें की क्रेप्स के लिए बैटर बिल्कुल पतला होना चाहिए, यह थोड़ा सा भी गाढ़ा नहीं होना चाहिए, क्रेप्स पतले होने चाहिए.

थोड़ा सा मक्खन पैन में गर्म करें और बैटर को उसमें डालें.

इसे हल्का सा पकने दें और इसे पर टौपिंग्स डालें, चौकलेट/हेजलनट और केला डाला, इसके अलावा कटे हुए संतरे और चुटकी भर दालचीनी डालें.

थोड़ा सा नींबू का रस और आइसिंग शुगर भी डाल सकते हैं.

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सेब को क्यों छिलके के साथ खाना चाहिए, जानें यहां

सेब का छिलका आपके सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है. अगर आप सेब को छिलके के बिना खाते हैं तो ये बाते आपके लिए जानना जरूरी है. आइए जानते हैं सेब को छिलके सहित क्यों खाना चाहिए.

फेफड़ों के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए

सेब के छिलके में क्वार्सेटिन नामक एक शक्तिशाली यौगिक पाया जाता है, जिसे एंटी-इंफलामेटरी के रूप में जाना जाता है, यह आपके फेफड़ों और दिल को विभिन्न रोगों से बचाता है. विटामिन से भरपूर है.

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दिल के लिए फायदेमंद

सेब के छिलके में मौजूद पौलीफेनौल ब्‍लड प्रेशर को कंट्रोल करने और कोलेस्ट्रौल को कम करने में मददगार हो सकता. इतना ही नहीं इसका छिलका हेल्‍दी हार्ट के लिए भी काफी फायदेमंद माना गया है.

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वजन कम करने के लिए

अगर आप सेब का छिलका हटा देते हैं, तो अब आपके पास इसे न हटाने का कारण है. हालांकि, आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि सेब के छिलके में वेक्‍स न हो. सेब को ताजा रखने के लिए विक्रेता कई बार इसपर वेक्‍स लगाते हैं,  इसलिए हमेशा काटने से पहले सेब को अच्छी तरह से साफ़ कर लें.

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रिश्तों से परे

विदेश में बसी विनी के ‘भारतीय’ होने पर जेड ऊलजलूल बकती पर वह नजरअंदाज कर देती. लेकिन छुट्टियां मनाने भारत गई विनी के मन में भारतीय सरजमीं पर खड़ी जेड को देख कर अनगिनत सवाल उठ खड़े हुए.

जून का मौसम अपनी पूरी गरमाहट से  स्टे्रटफोर्ड के निवासियों का स्वागत करने आ गया था. उस ने यहां पर जिन पेड़ों को बिलकुल नग्न अवस्था में देखा था, वे अब विभिन्न आकार के पत्तों से सुसज्जित हो हवा में नृत्य करने लगे थे. चैरी के पेड़ों पर फूलों के गुच्छे आने वाले को अपनी ओर आकर्षित तो कर ही रहे थे, अपनी छाया में बिठा कर विश्राम भी दे रहे थे.

यह वही स्टे्रटफोर्ड है जहां महान साहित्यकार शेक्सपियर ने जन्म लिया था. अभीअभी वह शेक्सपियर के जन्मस्थान को देख कर आई थी. लकड़ी का साफसुथरा 3 मंजिल का घर, जहां आज भी शेक्सपियर पालने में झूल रहा था, आज भी वहां गुलाबी रंग की खूबसूरत शानदार मसहरी रखी हुई थी, आज भी साहित्यकार की मां का चूल्हा जल रहा था. जिस शेक्सपियर को उस ने पढ़ा था, उस को वह महसूस कर पा रही थी.

सोने में सुहागा यह कि वह उस समय वहां पहुंची थी जब शेक्सपियर का जन्मदिवस मनाया जा रहा था. नुमाइश देख कर वह उसी से संबंधित दुकान में गई. जैसे ही वह दुकाननुमा स्टोर से बाहर निकली, अपने सामने शेक्सपियर को खड़ा पाया. वही कदकाठी, वही काली डे्रस. एकदम भौचक रह गई. रूथ ने अंगरेजी में बताया था, ‘इस आदमी ने शेक्सपियर का डे्रसअप कर रखा है. जैसे आप के भारत में बहुरूपिए होते हैं…’

समझने के अंदाज में उस ने गरदन हिलाई और अन्य कई लोगों को जमीन पर पड़े हुए काले कपड़े पर पैसे डालते हुए देख कर उस ने 20 पैंस का एक सिक्का उस कपडे़ पर उछाल दिया.

भारत से इंगलैंड आए हुए उसे कुछ माह ही हुए थे. जिस स्कूल में उसे नौकरी मिली थी, उस के कुछ अध्यापक-अध्यापिकाओं के साथ वह स्टे्रटफोर्ड आई थी, शेक्सपियर की जन्मभूमि को महसूस करने, उस की मिट्टी की सुगंध को अपने भीतर उतार लेने. इस नौकरी को पाने के लिए उसे न जाने कितने पापड़ बेलने पडे़ थे. पूरे स्कूल में एक अकेली वही ‘एशियन’ थी, सो सभी की नजर उस पर अटक जाती थी. उसे औरों से अधिक परिश्रम करना था, स्वयं को सिद्ध करने के लिए दिनरात एक करने थे. रूथ उस की सहयोगी अध्यापिका थी, जो बहुत अच्छी महिला थी, उसी के बाध्य करने पर वह यहां आई थी और सब से मेलमिलाप बढ़ाने का प्रयास कर रही थी.

चैरी के घने पेड़ के नीचे एक ऊंची मुंडेर सी बनी हुई थी. वह सब के साथ उस पर बैठ गई और सोचने लगी कि क्या हमारे तुलसीदास और कालीदास इतने समर्थ साहित्यकार नहीं थे? स्टे्रटफोर्ड के चारों ओर शेक्सपियर को महसूस करते हुए भारतीय महान साहित्यकार उस के दिमाग में हलचल पैदा करने लगे. हम क्यों अपने साहित्यकारों को इतना सम्मान नहीं दे पाते…ऐसा जीवंत एहसास इन साहित्यकारों के जन्मस्थल पर जाने से क्यों नहीं हो पाता?

‘‘प्लीज हैव दिस…’’ इन शब्दों ने उसे चौंका दिया मगर नजर उठा कर देखा तो सामने रूथ अपने हाथों में 2 बड़ी आइस्क्रीम लिए खड़ी थी.

‘‘ओह…थैंक्स….’’

उस ने अपने चारों ओर नजर दौड़ाई तो सब लोग अपनेअपने तरीके से मस्त थे. गरमी के कारण अधनंगे गोरे शरीर लाल हो उठे थे और हाथों में ठंडे पेय के डब्बे या आइस्क्रीम के कोन ले कर गरमी को कम करने का प्रयास कर रहे थे. उन के साथ के लोग अपनीअपनी रुचि के अनुसार आनंद लेने में मग्न थे. यह केवल रूथ ही थी जो लगातार उसी के साथ बनी हुई थी.

स्कूल में नौकरी मिलने के बाद हर परेशानी में रूथ उस का सहारा बनती, उसे विद्यार्थियों के बारे में बताती, कोर्स के बारे में सिखाती और पढ़ाने की योजना तैयार करने में सहायता करती. कुछेक माह में ही उसे अपनी भूल का एहसास होने लगा था. बेहतर था कि वह कहीं और नौकरी करती, किसी स्टोर में या कहीं भी पर स्कूल में…जहां के वातावरण को सह पाना उस के भारतीय मनमस्तिष्क के लिए असहनीय हो रहा था.

सरकार के आदेशानुसार 10वीं तक की पढ़ाई आवश्यक थी. फीस माफ, कोई अन्य खर्चा नहीं…जब तक छठी, 7वीं तक बच्चे रहते सब सामान्य चलता पर उस के बाद उन्हें बस में करना तौबा….उस के पसीने छूटने लगे. स्कूल से घर आते ही प्रतिदिन तो वह रोती थी. आंखें लाल रहतीं. कोई न कोई ऐसी घटना अवश्य घट जाती जो उसे भीतर तक हिला कर रख देती और तब उसे अपने भारतीय होने पर अफसोस होने लगता.

चैरी के फूल झरझर कर उस के ऊपर पड़ रहे थे, खिलते हुए सफेद- गुलाबी से फूलों को उस ने अपने कुरते पर से समेट कर पर्स में डाल लिया. रूथ उसे देख कर मुसकराने लगी थी.

आज फिर स्कूल में वह पढ़ा नहीं सकी, क्योंकि जेड ठीक उस के सामने बैठ कर तरहतरह के मुंह बनाती रहती है. च्यूइंगम चबाती हुई जेड को देख कर उस का मन करता है कि एक झन्नाटेदार तमाचा उस के गाल पर रसीद कर दे पर मन मसोस कर रह जाती है. इंगलैंड में किसी छात्र को मारने की बात तो दूर जोर से बोलना भी सपने की बात है. वह मन मार कर रह जाती है. अनुशासन वाले इस समाज में विद्यार्थी इतने अनुशासनहीन… यह बात किस प्रकार गले उतर सकती है? पर सच यही है.

वैसे भी उस की कक्षा को जेड ने बिगाड़ रखा है. 9वीं कक्षा के ये विद्यार्थी अपनी नेता जेड के इशारे पर हर प्रकार की असभ्यता करते हैं. एकदूसरे की गोद में बैठ कर चूमाचाटी करना तो आम बात है ही, उस ने अपने पीछे से जेड की आवाज में ‘दिस इंडियन बिच’ न जाने कितनी बार सुना है और बहरों की भांति आगे बढ़ गई है. यह बात और है कि उस की आंखों में आंसुओं की बाढ़ उमड़ आई है. हर दिन सवेरे स्कूल के लिए तैयार होते हुए वह सोचती कि आखिर ऐसा कब तक चलेगा?

फिलहाल तो अपने इस प्रश्न का कोई उत्तर उस के पास नहीं है. उस ने एक साल का बांड भरा है, उस से पहले तो वहां से छुटकारा पाना उस के लिए संभव ही नहीं. अपने पीछे ठहाकों की बेहूदी आवाजें सुनना उस की नियति हो गई है.

इस अमीर देश में वह बेहद गरीब है, जो अपने बच्चों की जूठन और फैलाव तो समेटती ही है जेड जैसी जाहिलोंके उस के कमरे में फैलाई हुई ‘गंद’ भी उसे ही समेटनी पड़ती है. भरीभरी आंखों से वह एक मशीन की भांति काम करती रहती है. अधिक संवेदनशील होने के कारण सूई सा दर्द भी उसे तलवार का घाव महसूस होता है. आसान नहीं है यहां पर ‘टीचिंग प्रोफेशन’ यह जानती तो वह पहले से ही थी पर इतना मानसिक क्लेश होता होगा, यह अनुभव से ही उसे पता चल सका.

एक साल बीता तो उस ने चैन की सांस ली. अब वह सलिल से कहेगी कि वह यह काम नहीं कर पाएगी. खाली तो रहेगी नहीं, कुछ न कुछ तो करना ही है. सलिल को ‘वारविकशायर विश्वविद्यालय’ में प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए आमंत्रित किया गया था. उन का पिछला रेकार्ड देख कर ही कई अंतर्राष्ट्रीय विश्व- विद्यालयों से उन्हें निमंत्रण मिलते रहे थे. कुछ साल पहले वह अमेरिका भी 2 वर्ष के लिए हो आए थे और समय पूर्ण होने पर भारत लौट गए थे.

यहां पर उन का ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन से पूरे 4 वर्ष के बांड पर हस्ताक्षर करवा लिए गए. भारतीय दिमाग का तो वाकई कोई जवाब नहीं है. हर तरफ मलाई की कीमत है, केवल अपने यहां ही वह सम्मान नहीं प्राप्त होता जिस का आदमी हकदार है.

सलिल ने बड़ी प्रसन्नता से बांड पर हस्ताक्षर कर के कम से कम 4 वर्ष तो वहीं रुकने का इंतजाम कर लिया था. शिक्षा के क्षेत्र में होने के कारण उन की इच्छा थी कि उन की पत्नी विनीता यानी विनी भी शिक्षा में ही रहे. काम तो करना ही था फिर इधरउधर भटकते हुए स्टोर, मौल अथवा किसी और जगह क्यों…. क्यों नहीं शिक्षा के क्षेत्र में?

विनी ने न जाने कैसेकैसे स्कूल में एक साल पूरा किया…हरेक सांस में वह अपने स्वतंत्र होने की बात सोचती पर सलिल उस के निर्णय से बिलकुल खुश नहीं थे. वह कहते, ‘‘सीढ़ी पर चढ़ने के लिए पहला कदम ही मुश्किल होता है. जैसे एक साल गुजरा, 2-4 साल में तो आदी हो जाओगी इस वातावरण की.’’

विनी का दिल धड़क उठा. पति की नाराजगी उस से बहुत कुछ कह गई. वह कमजोर बन गई और चाहते हुए भी त्यागपत्र न दे सकी. छुट्टियों में भारत आ कर जब वह मां के गले मिली तो मानो उस की हिचकियों का बांध टूट कर मां के दिल में समा गया. मां भी क्या कर सकती थीं…

इंगलैंड लौटने पर सलिल ने उसे खुशखबरी दी.

‘‘डोरिथी मेरे काम से इतनी खुश है कि उस ने मुझे प्रमोट करने का प्रस्ताव रखा है और अब हम अपना घर खरीदने जा रहे हैं.’’

इतनी जल्दी घर? यह सवाल मन में कौंधा पर वह कुछ बोली नहीं. प्रसन्नता और सफलता में डूबे पति का चेहरा निहारती रही. उस की अपनी क्या कीमत है? उस ने सोचा, सभी फैसले सलिल के ही तो होेते हैं. वह तो बस, कठपुतली या मशीन की भांति वही सब करती है जो सलिल चाहते हैं.

बेमन से विनी बच्चों और सलिल के साथ घर देखने गई. डोरिथी ने ‘रिकमेंड’ किया था, वह बौस थी सलिल की और उसे अपने पास ही रखना चाहती थी. जल्दी ही वह पूरे परिवार सहित अपने घर में ‘शिफ्ट’ हो गई. घर सुंदर था, पूरे साजोसामान सहित बड़े ही कम ‘इंस्टालमेंट’ पर घर मिल गया था, जो सलिल की तनख्वाह से ही हर माह कटता रहेगा. अब तो उस के लिए अधिक कमाना और भी आवश्यक हो गया था.

घर में आने के अगले दिन जैसे ही विनी ने सो कर उठने के बाद बेडरू म की खिड़की का परदा उठाया, उसे चक्कर आ गया. घर के ठीक सामने जेड खड़ी थी, किसी लड़के से चिपट कर. 2 मिनट वह सुन्न सी खड़ी देखती रही फिर लड़के के साथ जब जेड सामने वाले घर के अंदर चली गई तब वह टूटे हुए पैरों से घिसट कर पलंग पर आ पड़ी.

शनिवार छुट्टी का दिन था व अगले दिन रविवार…2 दिन की छुट्टियों में वह आसपास घूमफिर कर देखना चाहती थी. कार्नर शौप, शौपिंग मौल्स, लाइबे्ररी, सब के बारे में पता करना चाहती थी पर उस के तो पैर ही मानो बर्फ के हो गए थे. उस ने एक नजर सलिल पर डाली, जो चैन की नींद, प्रसन्नवदन सो रहे थे. धीरे से उठ कर उस ने स्वयं को संभालने की चेष्टा की.

शीघ्र ही विनी को पता चला कि जेड उसी घर में रहती है, अपनी मां व अपनी 2 सौतेली छोटी बहनों के साथ. उस की मां का बौयफें्रड जब भी आता है, दोनों छोटी बहनों और उस की मां को अपने साथ बाहर ले जाता है. एक दिन विनी ने सुना, उस की मां का बौयफें्रड जेड को सब के साथ चलने के लिए कह रहा था और वह चिल्ला रही थी :

‘नहीं, तुम मेरे पिता नहीं हो, मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकती.’

कुछ देर बाद ही गाड़ी जेड के सिवा सब को ले कर फर्राटे से निकल गई और जेड का दोस्त उसे ले कर अपने से चिपटाते हुए घर में घुस गया.

विनी का धैर्य जवाब देने लगा. अपने बच्चों को कैसे इस वातावरण में रख सकेगी? अब तो जेड ने यहां पर भी बदतमीजी शुरू कर दी थी. वह उस की बेटी को चिल्लाचिल्ला कर ‘बिच’ बोलती, गालियां बकती, ‘गो बैक टू योर इंडिया…’ और न जाने क्याक्या.

विनी व सलिल बच्चों को समझाते रहते थे. भारत से सलिल के मातापिता भी बच्चों की देखभाल के लिए वहीं आ गए थे. 4 बेडरूम वाले इस घर में जगह ठीकठाक ही थी अत: इस जेड नामक अशांति के अलावा सब ठीक ही चल रहा था. अब कभीकभी जेड अपने बौयफें्रड के साथ निकल कर दरवाजे की घंटी दबा जाती, कभी उस के बेटे कुणाल को साइकिल चलाते हुए देख कर जूता मार देती, फिर दोनों खिलखिला कर मजाक करते, गालियां देते निकल जाते. अब तो यह रोज का कार्यक्रम बन गया था और अनमनी सी विनी बच्चों के लिए हर क्षण भयभीत बनी रहती.

जेड की बदतमीजी हद से अधिक बढ़ जाने से उसे स्कूल से निकाल दिया गया था. अब स्कूल में शांति थी परंतु घर में तो वही अशांति बन कर उस के समक्ष रहती थी. वह कपड़ों की तरह लड़के बदलती और उन के साथ घूमती रहती.

विनी को उस की मां पर आश्चर्य होता, मानो कोई सरोकार ही नहीं. साल दर साल गुजरते रहे और सबकुछ उसी प्रकार चलता रहा. जेड और परिपक्व दिखाई देने लगी थी. हर साल छुट्टियों में विनी अपने पूरे परिवार सहित मुंबई आती. इस साल सलिल के मातापिता ने बच्चों को अपने साथ दिल्ली ले जाने और उन की बूआ के पास  कुछ दिन ठहरने का प्रस्ताव रखा. सलिल को भी उस की बहन बारबार बुलाती थीं, सो सलिल, बच्चे एवं उस के मातापिता दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे जबकि विनी को 2 दिन बाद की टिकट मिली थी. वह मुंबई हवाई अड्डे पर उतरी तो वहां जेड को देख कर आश्चर्य से उस का मुंह खुला रह गया.

हवाई जहाज से उतरते समय जेड का पैर न जाने कैसे फिसल गया था और वह किसी चीज से उलझ कर औंधेमुंह जा गिरी थी. खून से लथपथ उस को देखते ही विनी उस के पास जा पहुंची. अचानक ही ढेरों सवाल उस के जेहन में कुलबुलाने लगे. उस के साथ कोई नहीं था, कैसे और क्यों वह यहां अकेले आई थी?

भारत और भारतीयों के लिए मन मेें ढेरों कटुता भरे हुए वह यहां आखिर करने क्या आई थी? इस सवाल को मन में रख कर विनी ने हवाई अड्डे के प्रबंधकों से जेड के साथ स्वयं भी अस्पताल चलने का आग्रह किया. विनी के भाईभाभी उसे लेने पहुंचे हुए थे, वह भी विनी के साथ अस्पताल पहुंचे. जेड का काफी खून निकल गया और उसे खून की जरूरत थी. जब विनी को पता चला कि जेड का ब्लड ग्रुप ‘बी पौजिटिव’ है तो उस ने डाक्टरों से प्रार्थना की कि वे उस का खून ले लें क्योंकि उस का भी वही ग्रुप था.

देखते ही देखते विनी का खून जेड की नसों में दौड़ने लगा. जेड अब भी बेहोश थी. विनी ने अस्पताल में अपना टेलीफोन नंबर लिखवा कर प्रार्थना की कि कृपया घायल की स्थिति से उसे अवगत कराया जाए. अस्पताल में बहुत सी औप- चारिकताएं पूरी करनी थीं, सो विनी को बताना पड़ा कि वह उसे किस प्रकार जानती है और फार्म पर अपने हस्ताक्षर भी किए.

दूसरे दिन जब जेड को होश आया तब विनी उस के सामने ही थी. अब जेड के आश्चर्य का ठिकाना न था. उस के आंसुओं के आवेग को विनी ने बहुत मुश्किल से बंद कराया, फिर जो जेड ने बताया वह और भी चौंका देने वाला था.

जेड को अभी कुछ दिन पहले ही पता चला था कि वह एक भारतीय पिता की बेटी है और उस के पिता कहीं मुंबई में ही थे. उन का पता ले कर अपनी मां की सहायता से जेड भारत आई थी. पिता से मिलने की उत्सुकता ने मानो उस में पंख लगा दिए थे. अस्पताल के अधिकारी उस के पिता को सूचित कर चुके थे. जेड, विनी का हाथ पकड़े पश्चात्ताप के आंसुओं से अपना मुख भिगोती रही और विनी शब्दहीन रह कर उसे सांत्वना देती रही.

जेड के पिता बेटी से मिलने विनी की मौजूदगी में ही आए थे. साथ उन की पत्नी और 2 बच्चे भी थे. भावावेश में आ कर उन्होंने जेड को अपने सीने से चिपटा लिया पर जेड की तेज तर्रार आंखों ने उन की पत्नी की उदासीनता को भांप लिया.

‘‘आई जस्ट वांटेड टू सी यू डैड,’’ जेड हिचकियों के बीच बोली.

वह जानती थी कि उस परिवार में उस का मन से स्वागत नहीं किया जाएगा. पिता के जाने के बाद उस ने एक प्रश्नवाचक दृष्टि विनी पर डाली. विनी ने उस का हाथ थपथपा कर सांत्वना दी. अस्पताल से छुट्टी मिलने पर वह उसे अपने घर ले गई, जहां जेड के पिता उस से मिलने कई बार आए.

अतीत के गलियारों में भटकना छोड़ कर जेड अब विनी के बेहद करीब आ गई थी, इतनी कि विनी के गले से चिपट गई.

‘‘आई वांट टू बी लाइक यू…. मैम,’’ पश्चात्ताप के आंसुओं ने जेड के दिलोदिमाग में अविश्वसनीय परिवर्तन भर दिया था.

कंठ अवरुद्ध होने के कारण जेड ने घूम कर विनी की ओर अपनी पीठ कर ली और तेजी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ चली.

पैंसठ पार का सफर

सुरभि के बच्चे कैरियर बनाने के लिए विदेश क्या गए, वहीं के हो कर रह गए, जबकि दूसरी ओर पति की मौत और आएदिन महानगरों में होने वाले हादसों ने सुरभि को और भी डरा दिया था.

भाग-1

टे लीविजन का यह विज्ञापन उन्हें कहीं  बहुत गहरे सहला देता है, ‘झूठ बोलते हैं वे लोग जो कहते हैं कि उन्हें डर नहीं लगता. डर सब को लगता है, प्यास सब को लगती है.’ अगर वे इस विज्ञापन को लिखतीं तो इस में कुछ वाक्य और जोड़तीं, प्यास ही नहीं, भूख भी सब को लगती है…हर उम्र में…इनसान की देह की गंध भी सब को छूती है और चाहत की चाहत भी सब में होती है.

उम्र 65 की हो गई है. मौत का डर हर वक्त सताता है. यह जानते हुए भी कि मौत तो एक दिन सब क ोआती है. फिर उस से डर क्यों? नहीं, गीता की आत्मा वाली बात में उन की आस्था नहीं है कि आत्मा को न आग जला सकती है, न मौत मार सकती है, न पानी गला सकता है…सब झूठ लगता है उन्हें. शरीर में स्वतंत्र आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं लगता और शरीर को यह सब व्यापते हैं तो आत्मा को भी जरूर व्यापते होंगे. धर्मशास्त्र आदमी को हमेशा बरगलाया क्यों करते हैं? सच को सच क्यों नहीं मानते, कहते? वे अपनेआप से बतियाने लगती हैं, दार्शनिकों की तरह…

चौथी मंजिल के इस फ्लैट में सारे सुखसाधन मौजूद हैं. एक कमरे में एअरकंडीशनर, दूसरे में कूलर. काफी बड़ी लौबी. लौबी से जुडे़ दोनों कमरे, किचन, बाथरूम. बरामदे में जाने का सिर्फ एक रास्ता, बरामदे में 3 दूसरे फ्लैटों के अलावा चौथा लिफ्ट का दरवाजा है.

इस विशाल इमारत के चारों तरफ ऊंची चारदीवारी, पक्का फर्श, गेट पर सुरक्षा गार्ड. गार्ड रूम में फोन. गार्ड आगंतुक से पूछताछ करते हैं, दस्तखत कराते हैं. फोन से फ्लैट वाले से पूछा जाता है कि फलां साहब मिलने आना चाहते हैं, आने दें?

इस फ्लैट मेंऐसा क्या है जो पति उन्हें न दे कर गए हों? मौत से पहले उन्होंने उस के लिए सब जुटा दिया और एक दिन हंसीहंसी में कहा था उन्होंने, ‘आराम से रहोगी हमारे बिना भी.’

तब वह कु्रद्ध हो गई थीं, ‘ठीक है कि मुझे धर्मकर्म के ढोंग में विश्वास नहीं है पर मैं मरना सुहागिन ही चाहूंगी…मेरी अर्थी को आप का कंधा मिले, हर भारतीय नारी की तरह यह मेरी भी दिली आकांक्षा है.’ पर आकांक्षाएं और चाहतें पूरी कहां होती हैं?

उन के 2 बेटे हैं. एक ने आई.आई.टी. में उच्च शिक्षा पाई तो दूसरे ने आई.आई.एम. में. लड़की ने रुड़की से इलेक्ट्रोनिक इंजीनियरिंग में शिक्षा पाई. तीनों में से कोई भी अपने देश में रुकने को तैयार नहीं हुआ. सब को आज की चकाचौंध ने चौंधिया रखा था. सब कैरियर बनाने विदेश चले गए और उन की चाहत धरी की धरी रह गई. पति से बोली भी थीं, ‘लड़की को शादी के बाद ही जाने दो बाहर…कोई गलत कदम उठ गया तो बदनामी होगी,’ पर लड़की का साफ कहना था, ‘वहीं कोई पसंद आ गया तो कर लूंगी शादी. अपने जैसा ही चाहिए मुझे, सुंदर, स्मार्ट, पढ़ालिखा, वैज्ञानिक दृष्टि वाला.’

लड़कों ने भी उन की नहीं सुनी. पहले कैरियर बाद में शादी, यह कह कर विदेश गए और बाद में शादी कर ली पर बाप से पूछना तक मुनासिब नहीं समझा.

इस फ्लैट में अकेले वे दोनों ही रह गए. उस रात अचानक पति के सीने में दर्द उठा. वह घबराईं, डाक्टर को फोन किया. अस्पताल से एंबुलेंस आए उस से पहले ही उन्होंने अंतिम सांस ले ली. बच्चों को फोन किया तो दोनों ने फ्लाइट्स न मिलने की बात कही और बताया कि आने  में एक सप्ताह लगेगा, सबकुछ खुद ही निबटवा लें किसी तरह. उन्होंने पूछा भी था कि कैसे और किस से कराएं दाहसंस्कार? पर कोई उत्तर नहीं मिला उन्हें.

बच्चे आए. बाकी के कर्मकांड जल्दी से निबटाए और फिर एक दिन बोले, ‘पापा लापरवाह आदमी थे. इस उम्र में तेल, घी छोड़ देना चाहिए था, पर वह तो हर वक्त यहां दीवान पर लेटेलेटे या तो किताबें, अखबार पढ़ते या फिर टीवी पर खबरें सुनते रहते. उन्होंने तो कहीं आनाजाना भी छोड़ दिया था. ऐसे लाइफ स्टाइल का यही हश्र होना था. वह तो सब्जीभाजी तक नौकरानी से मंगाते. इस्तेमाल की चीजें दुकानों से फोन कर के मंगवा लेते. कहीं इस तरह जीवन जिया जाता है?’

कहते तो ठीक थे बच्चे पर उन के अपने तर्क होते थे. वह कहते, ‘यह महानगर है, सुरभि. यहां बेमतलब कोई न किसी से मिलता है न मिलना पसंद करता है. किसे फुर्सत है जो ठलुओं से बतियाए?’

‘ठलुए’ शब्द उन्हें बहुत खलता. आखिर उन के अपने दफ्तर के भी तो लोग हैं. उन में  भी 2-3 रिटायर व्यक्ति हैं. उन्हीं के पास जा बैठें. अगर ये ठलुए हैं तो वे कौन सा पहाड़ खोद रहे होंगे?

कहा तो बोले, ‘सब ने कोई न कोई पार्ट टाइम जौब पकड़ लिया है. किसी को फुर्सत नहीं है.’

‘तो आप भी ऐसा कुछ करने लगिए,’ सुरभि ने कहा था.

‘नहीं करना. अपने पास अब सब है. पेंशन तुम्हें भी मिलती है, मुझे भी. बच्चे सब बड़े हो गए. विदेश जा बसे. उन्हें हमारे पैसे की जरूरत नहीं है. अपने पास कोई कमी नहीं है, फिर क्यों इस उम्र में अपने से काफी कम उम्र के लोगों की झिड़कियां सुनें?’

जबरन ही कभीकभी शाम को खाने के बाद सुरभि पति को अपने साथ लिवा जातीं. सड़क पार एक बड़ा पार्क था, उस में चहलकदमी करते. वहां बच्चों का हुल्लड़ उन्हें पसंद न आता. खासकर वे जिस तरह धौलधप्प करते, गेंद खेलते, भागदौड़ में गिरतेपड़ते. कभीकभी उन की गेंद उन तक आ जाती या उन्हें लग जाती तो झुंझला उठते, ‘यह पार्क ही रह गया है तुम लोगों को हुल्लड़ मचाने के लिए?’

वह पति की कोहनी दबा देतीं, ‘तो कहां जाएं बेचारे खेलने? सड़क पर वाहनों की रेलपेल, घरों में जगह नहीं, स्कूल दूर हैं. कहां खेलें फिर?’

‘भाड़ में,’ वह चीख से पड़ते. यह उन का तकिया कलाम था. जब भी, जिस पर भी वह गुस्सा होते, उन के मुंह से यही शब्द निकलता.

आखिर उन की बात सच निकली… बच्चे हम से बहुत दूर, विदेश के भाड़ में चले गए और स्वयं भी वह चिता के भाड़ में और जीतेजी वह भी इस फ्लैट में अकेली भाड़ में ही पड़ी हुई हैं.

शाम को जब बर्तन मांजने वाली बर्तन साफ कर जाती तो वह अकसर सामने के पार्क में चली जातीं…इस भाड़ से कुछ देर को तो बाहर निकलें.

घूमतीटहलती जब थक जातीं तो सीमेंट की बेंच पर बैठ जातीं. एक दिन बैठीं तो एक और वृद्धा उन के निकट आ बैठी. इस उम्र की औरतों का एकसूत्री कार्यक्रम होता है, बेटेबहुओं की आलोचना करना और बेटियों के गुणगान, अपने दुखदर्द और बेचारगी का रोना और बीमारियों का बढ़ाचढ़ा कर बखान करना. यह भी कि बहू इस उम्र में उन्हें कैसा खाना देती है, उन से क्याक्या काम कराती है, इस का पूरा लेखाजोखा.

बहुत जल्दी ऊब जाती हैं वह इन बुढि़यों की एकरस बातों से. सुरभि उठने को ही थीं कि वह वृद्धा बोली, ‘आजकल मैं सुबह टेलीविजन पर योग और प्राणायाम देखती हूं. पहले सुबह यहां घूमने आती थी, पर जब से चैनल पर यह कार्यक्रम आने लगा, आ ही नहीं पाती. आप को भी जरूर देखना चाहिए. सारे रोगों की दवा बताते हैं. अब आसन तो इस उमर में हो नहीं पाते मुझ से, पर हाथपांव को चलाना, घुटनों को मोड़ना, प्राणायाम तो कर ही लेती हूं.’

‘फायदा हुआ कुछ इन सब से आप को?’ न चाहते हुए भी सुरभि पूछ बैठीं.

‘पहले हाथ ऊपर उठाने में बहुत तकलीफ होती थी. घुटने भी काम नहीं करते थे. यहां पार्क में ज्यादा चलफिर लेती तो टीस होने लगती थी पर अब ऐसा नहीं होता. टीस कम हो गई है, हाथ भी ऊपर उठने लगे हैं, जांघों का मांस भी कुछ कम हो गया है.’

‘सब प्रचार है बहनजी. दुकानदारी कहिए,’ वह मुसकराती हैं, ‘कुछ बातें ठीक हैं उन की, सुबह उठने की आदत, टहलना, घूमनाफिरना, स्वच्छसाफ हवा में अपने फेफड़ों में सांस खींचना…कुछ आसनों से जोड़ चलाए जाएंगे तो जाम होने से बचेंगे ही. पर हर रोग की दवा योग है, यह सही नहीं हो सकता.’

पास वाली बिल्डिंग के तीसरे माले पर एक बूढ़े दंपती रहते थे. उन्होंने 15-16 साल का एक नौकर रख रखा था. बच्चे विदेश से पैसा भेजते थे. नौकर ने एक दिन देख लिया कि पैसा कहां रखते हैं. अपने एक सहयोगी की सहायता से नौकर ने रात को दोनों का गला रेत दिया और मालमता बटोर कर भाग गए. पुलिस दिखावटी काररवाई करती रही. एक साल हो गया, न कोई पकड़ा गया, न कुछ पता चला.

सुरभि और उन के पति ने तब से नियम बना रखा था कि पैसा और जेवर कभी नौकरों के सामने न रखो, जरूरत भर का ही बैंक से वह पैसा लाते थे. खर्च होने पर फिर बैंक चले जाते थे. किसी को बड़ी रकम देनी होती तो हमेशा यह कह कर दूसरे दिन बुलाते थे कि बैंक से ला कर देंगे, घर में पैसा नहीं रहता.

मौत सचमुच बहुत डराती है उन्हें. पति के जाने के बाद जैसे सबकुछ खत्म हो गया. क्या आदमी जीवन में इतना महत्त्व रखता है? कई बार सोचती हैं वह और हमेशा इसी नतीजे पर पहुंचती हैं. हां, बहुत महत्त्वपूर्ण, खासकर इस उम्र में, इन परिस्थितियों में, ऐसे अकेलेपन में…कोई तो हो जिस से बात करें, लड़ेंझगड़ें, बहस करें, देश और दुनिया के हालात पर अफसोस करें.

इसी इमारत में एक अकेले सज्जन भाटिया साहब अपने फ्लैट में रहते हैं, बैंक के रिटायर अफसर. बेटाबहू आई.टी. इंजीनियर. बंगलौर में नौकरी. बूढ़े का स्वभाव जरा खरा था. देर रात तक बेटेबहू का बाहर क्लबों में रहना, सुबह देर से उठना, फिर सबकुछ जल्दीजल्दी निबटा, दफ्तर भागना…कुछ दिन तो भाटिया साहब ने बरदाश्त किया, फिर एक दिन बोले, ‘मैं अपने शहर जा कर रहूंगा. यहां अकेले नहीं रह सकता. कोई बच्चा भी नहीं है तुम लोगों का कि उस से बतियाता रहूं.’

‘बच्चे के लिए वक्त कहां है पापा हमारे पास? जब वक्त होगा, देखा जाएगा,’ लड़के ने लापरवाही से कहा था.

भाटिया साहब इसी बिल्ंिडग के अपने  फ्लैट में आ गए.

भाटिया साहब के फ्लैट का दरवाजा एकांत गैलरी में पड़ता था. किसी को पता नहीं चला. दूध वाला 3 दिन तक दूध की थैलियां रखता रहा. अखबार वाला भी रोज दूध की थैलियों के नीचे अखबार रखता रहा. चौथे दिन पड़ोसी से बोला, ‘भाटिया साहब क्या बाहर गए हैं? हम लोगों से कह कर भी नहीं गए. दूध और अखबार 3 दिन से यहीं पड़ा है.’

पड़ोसी ने आसपास के लोगों को जमा किया. दरवाजा खटखटाया. कोई जवाब नहीं. पुलिस बुलाई गई. दरवाजा तोड़ा गया. भाटिया साहब बिस्तर पर मृत पड़े थे और लाश से बदबू आ रही थी. पता नहीं किस दिन, किस वक्त प्राण निकल गए. अगर भाटिया साहब की पत्नी जीवित होतीं तो यों असहाय अवस्था में न मरते.

ऐसी मौतें सुरभि को भी बहुत डराती हैं. कलेजा धड़कने लगता है जब वह टीवी पर समाचारों में, अखबारों या पत्रिकाओं में अथवा अपने शहर या आसपास की इमारतों में किसी वृद्ध को ऐसे मरते या मारे जाते देखती हैं. उस रात उन्हें ठीक से नींद नहीं आती. लगता रहता है, वह भी ऐसे ही किसी दिन या तो मार दी जाएंगी या मर जाएंगी और उन की लाश भी ऐसे ही बिस्तर पर पड़ी सड़ती रहेगी. पुलिस ही दरवाजा तोड़ेगी, पोस्टमार्टम कराएगी, फिर अड़ोसीपड़ोसी ही दाहसंस्कार करेंगे. बेटेबहू या बेटीदामाद तो विदेश से आएंगे नहीं. इसी डर से उन्होंने अपने तीनों पड़ोसियों को बच्चों के पते और टेलीफोन नंबर तथा मोबाइल नंबर दे रखे हैं…घटनादुर्घटना का इस उम्र में क्या ठिकाना, कब हो जाए?

अखबार के महीन अक्षर पढ़ने में अब इस चश्मे से उन्हें दिक्कत होने लगी है. शायद चश्मा उतर गया है. बदलवाना पड़ेगा. पहले तो सोचा कि बाजार में चश्मे वाले स्वयं कंप्यूटर से आंख टेस्ट कर देते हैं, उन्हीं से करवा लें और अगर उतर गया तो लैंस बदलवा लें. पर फिर सोचा, नहीं, आंख है तो सबकुछ है. अगर अंधी हो गईं तो कैसे जिएंगी?

पिछली बार जिस डाक्टर से आंख टेस्ट कराई थी उसी से आंख चैक कराना ठीक रहेगा. खाने के बाद वह अपनी कार से उस डाक्टर के महल्ले में गईं. काफी भीड़ थी. यही तो मुसीबत है अच्छे डाक्टरों के यहां जाने में. लंबी लाइन लगती है, घंटों इंतजार करो. फिर आंख में दवा डाल कर एकांत में बैठा देते हैं. फिर बहुत लंबे समय तक धुंधला दिखाई देता है, चलने और गाड़ी चलाने में भी कठिनाई होती है.

वह लंबी बैंच थी जिस के कोने में थोड़ी जगह थी और वह किसी तरह ठुंसठुंसा कर बैठ सकती थीं. खड़ी कहां तक रहेंगी? शरीर का वजन बढ़ रहा है.

बैठीं तो उन का ध्यान गया, बगल में कोई वृद्ध सज्जन बैठे थे. उन की आंखों में शायद दवा डाली जा चुकी थी, इसलिए आंखें बंद थीं और चेहरे को सिर की कैप से ढक लिया.

200 से कम की कीमत के ये नेलपेंट करें ट्राई

आपके नेल्स अगर खूबसूरत हैं तो उन्हें और भी ब्यूटीफुल बनाने के लिए आप नेल पेन्ट का इस्तेमाल तो जरूर करते होंगे. पर क्या आप अच्छे और सुंदर नेल्स के लिए कोई भी बिना ब्रैंड की नेलपेंट खरीदकर अपने नेल्स को खराब करतीं हैं, पर अब ऐसा नही होगा. आज हम आपको कुछ ऐसे ब्रैंडेड नेलपेंट के बारे में बताएंगे, जो आपके नेल्स की शाइनिंग को बरकरार रखने के साथ-साथ स्टाइलिश लुक भी देगा.

1. लेक्मे ट्रू वियर नेल कलर (Lakme True Wear Nail Color)

आप सोचते होंगे कि लेक्मे के प्रौडक्ट बहुत महंगे मिलते होंगे. लेकिन आपका यह सोचना गलत है लेक्मे के प्रौडक्ट बाजार में आसानी से मिल तो जाते ही हैं. साथ ही यह सस्ते और किफायती रेट में भी मिल जाते हैं. लेक्मे के नेलपेंट ट्रेंडी होने के साथ ही स्टाइलिश भी होते हैं जो आपको एक नया लुक देते हैं. यह आपको दुकानों में 99 रूपए में मिल जाएंगे.

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2. नाइका कुकी क्रम्बल नेल इनेमल (Nykaa Cookie Crumble Nail Enamel)

नाइक के मेकअप प्रौडक्टस बाजार में आसानी से मिल सकते है. नाइका के प्रौडक्ट बहुत स्टाइलिश हैं, जो कौलेज गर्ल्स के लिए बेस्ट है. आप चाहें तो नाइका की नेलपेंट को कौलेज के अलावा किसी पार्टी के लिए भी इस्तेमाल कर सकते है. यह आपको दुकानों में 179 रूपए में मिल जाएगी.

3. लोरियल पेरिस L’Huile नेल पेंट (L’Oreal Paris L’Huile Nail Paint)

लोरियल पेरिस के प्रौडक्टस जितने अपने हेयर प्रौडक्ट्स के लिए फेमस है उतना ही यह अपने मेकअप के लिए भी फेमस है. यह नेलपेंट एक कोट में ही आपको कूल और स्टाइलिश लुक देगी. यह आपको दुकानों में 193 में मिल जाएगी.

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4. एले 18 नेलपौप्स नेल पेंट (Elle 18 Nail Pops Nail Polish)

एले 18 अपने नेलपेंट प्रौडक्ट्स के लिए कौलेज गर्ल्स के बीच बहुत फेमस है. कौलेज गर्ल्स के बीच नेलपेंट का फैशन पुराना है, पर आजकल बहुत ब्युटूफुल और स्टाइलिश दिखने वाले कलर आ गए हैं, जो आपके लुक को नया और स्टाइलिश दिखाएंगे. यह आपको आसानी से दुकानों में 111 रूपए में मिल जाएगा.

“छोरियां छोरों से कम नही होती” : लैंगिक पूर्वाग्रह पर बेहतरीन फिल्म

रेटिंग: तीन स्टार

फिल्म निर्माता: सतीश कौशिक 

फिल्म निर्देशक: राजेश बब्बर 

कलाकार : रश्मी सोमवंशी, अनिरूद्ध दवे, जानवी सगवान, अंजवी सिंह हूडा, विधि देशवाल, गौतम सौगात, जगबीर राठी और अन्य

हर लड़की को सपने देखने और सपनो को पूरा करने के लिए मेहनत करनी चाहिए. हर लड़की को सपना देखना सिखाने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देने के मकसद से निर्माता सतीश कौशिक और निर्देशक राजेश बब्बर हरियाणवी भाषा की फिल्म ‘‘छोरियां छोरों से कम नहीं होती’’ लेकर आए हैं. लेखक व निर्देशक की कुछ कमियों के बावजूद यह फिल्म अपने मकसद को सही ढंग से पेश करने में सफल रहती है. यदि फिल्मकार ने थोड़ी सी मेहनत की होती, तो यह फिल्म पुरूष मानसिकता को बदलने में कारगार होने के साथ साथ एक बेहतरीन फिल्म बन सकती थी. फिर भी यह ऐसी फिल्म है, जिसे हर माता पिता व हर लड़के व लड़की को अवश्य देखनी चाहिए.

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कहानीः

फिल्म की कहानी हरियाणा  एक गांव दिनारपुर की है. जहां अनाथ विकास( अनिरूद्ध दवे) अपने फूफा के यहां रह रहा है. उसके पड़ोस में जयदेव चैधरी (सतीश कौशिक) और सामने जयदेव चैधरी के भाई बलदेव चैधरी (मोहनकांत) रहते है. बलदेव चैधरी धन के मामले में ताकतवर हैं. उनका बेटा है. जबकि जयदेव चैधरी के यहां सुनीता और विनीता दो बेटियां हैं. बलदेव अक्सर जयदेव को बेटियों के होने व बेटे के न होने का ताना मारता रहता है. जयदेव को भी अपने भाई की ही तरह बेटा चाहिए था. वह बार बार अपनी बेटियों को कोसता रहता है कि छोरियां किस काम की हैं. जयदेव अपनी बेटियों पर कई तरह की पाबंदी लगाकर रखता है. विनीता उर्फ विन्नू पतंग उड़ाती है, लड़कों के साथ खेलती है और लड़कों को पीटती रहती है. विकास उसका साथी है. विनीता (रश्मी सोमवंशी) किसी से नहीं डरती. इधर एक दिन बलदेव चैधरी, धोखे से जयदेव चैधरी की सारी जमीन हथिया लेता है. तहसील दार धोखे से जयदेव से जमीन के असली कागज लेकर बलदेव तक पहुंचा देता है. अदालत में जयदेव मुकदमा हार जाता है. वह सारा गुस्सा विनीता पर निकलता है कि यदि उनका छोरा/बेटा होता, तो वह उसके साथ खड़ा होकर उनके दुःख का भागीदार बनता. पिता के ताने सुनकर विनीता अपने ताउ बलदेव के अखाड़े में जाकर उनके कुश्तीबाजों को पटखनी देकर धमकी देती है. विनीता हर बार अच्छे नंबर से पास होती है. उसे स्पोटर्टस कोटे में कौलेज में प्रवेश मिल जाता है. स्कूल व कौलेज हर जगह विकास उसके साथ ही है. जब जयदेव उसे पढ़ने के लिए रोकते हैं, तो जयदेव के पिता विनीता के साथ खड़ा नजर आते हैं. फिर आई पीएस रोहिणी(सोनाली फोगट) से पेरित होकर विनीता आईपीएस के लिए तैयारी करती है, पर बलदेव गुंडो से उसका हाथ पैर तुड़वा देते हैं. उसके बाद जयदेव के घर जाकर शोक प्रकट करते हुए कहते है कि अब तो विनीता कभी चल नहीं पाएगी, बेचारी विनीता से कौन शादी करेगा. वहां पर मौजूद विकास कह देता है कि वह विनीता से शादी करेगा.

कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. विकास का प्रोत्साहन और विनीता की मेहनत रंग लाती है. विनीता को आई पीएस की ट्रेनिंग के लिए चुन लिया जाता है. इधर विनीता आईपीएस की ट्रेनिंग के लिए रवाना होती है, उधर जयदेव पश्चाताप की आग में जलते हुए घर छोड़कर आश्रम में चले जाते हैं. और वहां छोटी लड़कियों को पढ़ाना शुरू करते हैं. आईपीएस बनने के बाद विनीता चैधरी अपने पिता को उनका खोया हुआ मान सम्मान व जमीन वापस दिलाती है. जयदेव कह उठते हैं कि छोरियां छोरों से कम नही होती.

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लेखन व निर्देशनः

यूं तो देखने में फिल्म काफी अच्छी लगती है. ध्वनि, संगीत, दृश्यों का संयोजन व लोकेशन आदि पर बेहतरीन काम किया गया है. मगर पिछले तीस वर्षों से बौलीवुड में सक्रिय फिल्मकार सतीश कौशिक बौलीवुड के मोह से उबर नहीं पाए, इसलिए इसमें उन्होंने बौलीवुड मसाला भी पिरो दिया है.

निर्देशक की सबसे बड़ी कमी यह है कि फिल्म के कई दृश्य ज्यों का त्यों बौलीवुड फिल्मों से चुराए गए हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण फिल्म में विनीता का इंट्रोदक्शन का दृश्य है, जिसमें विनीता पतंग उड़ाते हुए आती है. ‘कलंक’  सहित कई बौलीवुड फिल्मों में हीर्राइनो की इंट्री इसी तरह से दिखायी जा चुकी है. इस तरह फिल्मकार ने क्षेत्रीय सिनेमा यानी कि हरियाणवी सिनेमा को नुकसान ही पहुंचाया है. फिल्म में मेलोड्रामा हावी है.

निर्देशक के तौर पर राजेश बब्बर यह भूल गए कि किरदारों के रोने से दर्शक नहीं रोते. बल्कि आपकी कथा-कथन शैली और किरदार इस तरह से गढ़े होने चाहिए कि सिनेमा देखते समय किरदारों व कहानी के साथ जुड़कर दर्शक की आंखों से बरबस आंसू आ जाएं.

महिला सशक्तिकरण के नाम पर फिल्म की नायिका विनीता को पढ़ाई मे तेज, मारामारी करने में तेज, पंतगबाजी मे अव्वल,  कुष्ती लड़ने में माहिर, मुक्केबाजी में माहिर बताते हुए उसे सुपर हीरो की तरह पेश कर फिल्म के लैंगिक पूर्वाग्रह के मुद्दे को उकेरने के मकसद से भटक जाती है. इतना ही नही फिल्म में एक दृश्य है, जहां विनीता कही बहन के पति को महिला पुलिस अफसर थप्पड़ मारते हुए कहती हैं- ‘‘शकर कर कि तेरी बीबी पढ़ी लिखी न होई, आधुनिक और पढ़ी लिखी होती तो तेरा तमाचा वापस तेरे को मारती.. ’’यह संवाद और दृश्य पूर्णरूपेण फिल्म की मूल विषयवस्तु के खिलाफ जाता है.

लेखक व निर्देशक की कुछ कमजोरियों के बावजूद इस फिल्म को हर माता पिता व लड़के लड़कियों  को अवश्य देखना चाहिए. जहां तक अभिनय का सवाल है, तो विनीता के किरदार मे रश्मी सोमवंषी ने शानदार अभिनय किया है. अनिरुद्ध देव के हिस्से करने को कुछ खास नहीं रहा, पर कुछ दृश्यों में उसके चेहरे के भाव बहुत कुछ कह जाते हैं. बाकी के कलाकारो ने ठीक ठाक अभिनय किया हैं.

कुंगफू धमाकाः हौलीवुड स्तर का एनीमेशन

पूर्व प्रेमी से अलगाव के बावजूद प्यार खत्म नहीं होता : रश्मी सोमवंशी

उत्तर प्रदेश के छोटे शहर प्रतापगढ़ से निकलकर बौलीवुड में अपनी एक अलग पहचान बनाने वाली रश्मी  ने दस वर्ष के दौरान काफी संघर्ष किया.पढ़ने में तेज होने के चलते उन्हें 2010 में एकता कपूर की कंपनी ‘‘बालाजी टेलीफिल्मस’’ में नौकरी मिल गयी. पर उसके बाद वह कई कंपनियों में प्रोग्राम प्रोड्यूस करती रही. इसी बीच उन्होंने ‘‘जी कुत्ता से’’ ‘‘देवी’’, ‘ए बिलियन कलर’ सहित कुछ फिल्मों मे अभिनय किया. इन दिनों 17 मई को प्रदर्षित सतीश कौशिक निर्मित और राजेश बब्बर निर्देशित हरियाणवी फिल्म ‘‘छोरीयां छोरों से कम नहीं’’ को लेकर चर्चा बटोर रही हैं.

यूं तो रश्मी सोमवंषी को पहली फिल्म ‘‘जी कुत्ता से’’ काफी शोहरत मिली थी. पर उन्हें आपेक्षित काम नहीं मिला. वह बताती हैं- ‘‘इस फिल्म और मेरे काम की बहुत लोगों ने तारीफ की. पर सही वक्त पर सही जगह होना जरुरी है. पर अभिनय करने के लिए फिल्में नही मिली, सिर्फ सीरियल के ही आफर आए. मैं टीवी पर ज्यादा काम नहीं करना चाहती. मैंने बहुत नजदीक से देखा है कि टीवी पर किस तरह से काम होता है. टीवी पर क्रिएटिव सटिस्फैक्षन नहीं है. मैं सिर्फ पैसा नही कमाना चाहती. मैं रचनात्मक और मन को संतुष्टि देने वाला काम करना चाहती हूं. कई फेस्टिवल में सराहना मिली.’’

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इसके बाद रश्मी सोमवंशी ने राजस्थानी फिल्म ‘‘देवी’’ की जिसके लिए उन्हे अवार्ड भी मिला. पर करियर में कोई प्रगति नहीं हुई. फिर उन्होंने एक फिल्म ‘‘ए बिलियन कलर स्टोरी’’ की. इस फिल्म की सत्तर प्रतिषत भाषा अंग्रेजी हैं. यह फिल्म डिजिटल प्लेटफार्म पर दो साल पहले रिलीज हुई थी. इस फिल्म की चर्चा करते हुए रश्मी सोमवंषी ने कहा- ‘‘मैंने रेहाना का किरदार निभाया है. बचपन से ही वह हिजाब /बुरखे में रहती है. फिल्म के अंत में किस तरह उसका हिजाब उतरता है, यह इसकी खूबसूरती है. बहुत स्वतंत्र है. पति का सपोर्ट भी है. यह फिल्म ब्लैंक एंड व्हाइट में है. इसमें रंगभेद व क्लास भेद की बात है. हमारे समाज मे शिक्षित लोग हैं, फिर भी कई तरह के विभाजन की लकीरें खीची हुई है. फिल्म में व्यंग के साथ पूरी कहानी बयां की गयी है. इसमें कई समस्याओं पर बात की गयी है. मसलन, मुस्लिम कालोनी में हिंदू परिवार को किराए का घर न मिलना, हिंदू कालोनी मुस्लिम को किराए का घर न मिलना. देखिए, यह समस्या मुंबई जैसे शहर में नहीं है. इसे कई फेस्टिवल में सराहा गया. यह फिल्म हौट स्टार व नेटफ्लिक्स पर है. इस फिल्म को देखकर अनिल कपूर, नसिरूद्दीन शाह सहित कई दिग्गजों ने मेरे अभिनय की तारीफ की, पर काम नहीं मिला.’’

पूरे दो साल बाद उन्हें हरियाणवी फिल्म ‘‘छोरीयां छोरो से कम नही’’ मिली, जिसके निर्माता सतीश कौशिक हैं, जिन्होंने ‘ए बिलियन कलर स्टोरी’ बनायी थी. इस फिल्म में रश्मी सोमवंषी ने हरियाणा के एक गांव की लड़की का किरदार निभाया है, जो कि अपने पिता की सोच को बदलती है. खुद रश्मी सोमवंषी बताती हैं- ‘‘इस फिल्म में उन समस्याओं की बात की गयी है, जो कि गांव में रहने वाली लड़कियों को झेलनी पड़ती है. यह फिल्म विनीता चैधरी उर्फ विन्नू नामक उस लड़की की यात्रा है, जिसे उसका पिता स्वीकार नहीं करता है. उसका पिता कहता है कि बेटा जो काम कर सकता है, वह काम बेटी नही कर सकती. इसके बावजूद यह लड़की अपने पिता से उतना ही प्यार करती है. वह अपने पिता से नफरत नहीं करती. उसके मन में अपने पिता के प्रति गुस्सा आता है, पर वह सोचती हैं कि मुझे बहुत कुछ करके दिखाना है. वह अपने पिता के साथ जो भी ज्यादतियां हुई है. अन्याय हुआ है,  उससे उन्हे निजात भी दिलाना चाहती है. एक दिन विनीता चैधरी उर्फ विन्नू आइपीएस अफसर बन जाती है. यह पूरी तरह से मनोरंजक फिल्म है.’’

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अभिनेत्री रश्मी सोमवंशी फिल्म की पटकथाएं लिखने के साथ साथ कविताएं भी लिखती हैं.वह बताती हैं-‘‘मैंने ज्यादातर रोमांटिक कविताएं ही लिखी हैं. मैंने जो जो इमोशन फील किए हैं, उन सभी पर मैंने कविताएं लिखी हैं. आठवीं कक्षा में मैने पहली रोमांटिक कविता लिखी थी, जिसे पढ़कर मेरे पापा को लगा था कि मेरा स्कूल में कोई ब्वायफ्रेंड है, जबकि ऐसा कुछ नहीं था. (20 से 20.50-कविता की लाइनें). अब तक आधी अधूरी 150 कविताएं लिखी हैं. जबकि 40 के आस पास पूरी कविताएं लिखी हैं. मेरी कविताएं बहुत पर्सनल हैं. छोटी उम्र से ही मैंने कई गहरे इमोषन फील किए हैं, वह सभी मेरी कविताओं का हिस्सा हैं.’’

जब हमने उनसे रोमांस को लेकर सवाल किया, तो रश्मी ने कहा- ‘‘सर, रोमांस तो बहुत बढ़िया चीज है. कौलेज में भी मेरा रिश्ता रहा है. पर कौलेज के साथ ही वह खत्म हो गया. रोमांस भी प्यार ही होता है. आप किसी के साथ रिलेशनशिप में हों, तभी प्यार हो, यह जरुरी नही है. मेरा पिछला जो रिश्ता टूटा, वह आज भी मेरे दोस्त हैं. पर मैं उनका नाम नहीं लेना चहती. उनसे बातचीत होती है. देखिए, दो इंसान अच्छे हों, पर यह जरुरी नहीं कि जब वह एक साथ हों, तो भी अच्छे हों. अलग अलग रहने पर अच्छाई बरकरार रहती है, तो कई बार हमें अलग होने के निर्णय लेने पड़ते हैं. मैं अभी भी उनसे प्यार करती हूं.

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वह आगे कहती हैं-‘‘जिनसे एक बार प्यार हो जाता है, उनसे भले ही वैचारिक मतभेद के चलते अलगाव हो जाए, मगर प्यार जाता नहीं है. लेकिन जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए हमें कुछ भुलाना पड़ता है. पर जब अलगाव हुआ, तो मैं बहुत डिप्रेस हो गयी थी. अपना बैग उठाकर धरमपुर चली गयी. वहां पर योगा किया. मेडीटेशन किया. 15 दिन इधर उार भटकी, रोयी. फिर वापस मुंबई आ गयी. आखिर काम करना था. जिंदगी में आगे बढ़ना ही था. गम को सीने पर लगाकर जिंदगी जी नही जा सकती. फिर से संघर्ष शुरू हुआ.’’

निशाने पर है चुनाव आयोग की निष्पक्षता

‘बैटल औफ बंगाल’ को देखते हुए चुनाव आयोग ने आखिरी चरण के चुनाव प्रचार पर निर्धारित अवधि से पहले ही प्रतिबंध लगा दिया है. 16 मई को बंगाल में मोदी की रैली के बाद उसी रोज रात दस बजे से पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार बंद कर दिया जाएगा. वोटिंग 19 मई को है. चुनाव के आखिरी राउंड से पहले आयोग का यह फैसला पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर बिजली की तरह गिरा है. तय समय से पहले बंगाल में प्रचार पर रोक से ‘दीदी’ की आशाओं पर पानी फिर गया है. आखिरी दिन यानी 17 मई को उनको धुआंधार प्रचार की उम्मीद थी. ऐसे में ममता सीधे मोदी, शाह और चुनाव आयोग पर प्रचंड प्रहार कर रही हैं. ममता ने कहा कि आयोग ने मोदी को उपहार दिया है जो अभूतपूर्व, असंवैधानिक और अनैतिक है. पहले कभी इस तरह का चुनाव आयोग नहीं देखा जो आरएसएस के लोगों से भरा पड़ा है.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जुबान से निकल रहे कड़वे अल्फाज उनके भीतर मचे तूफान को साफ दिखा रहे हैं. उनका आरोप है कि अमित शाह और मोदी के कहने पर ही चुनाव आयोग ने ऐसा किया है. आयोग के इस कदम से ममता बनर्जी ही नहीं, बल्कि तमाम विपक्षी पार्टियां भी आयोग पर हमलावार है. विपक्षी दलों का कहना है कि अगर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हुई हिंसा को देखते हुए वहां प्रचार पर रोक लगायी गयी है तो मोदी को भी अब वहां प्रचार की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए थी. रोक तुरंत लगनी चाहिए थी और हर पार्टी पर लगनी चाहिए थी. कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि प्रचार अभियान को ऐसे वक्त पर खत्म करने का निर्देश दिया गया, जिससे पीएम नरेन्द्र मोदी तो अपनी रैली कर सकें, मगर बाकियों को मौका न मिले. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने तो आयोग की आचार संहिता को ‘मौडल कोड औफ कंडक्ट’ की जगह ‘मोदी कोड औफ मिस कंडक्ट’ तक कह दिया, जो भाजपा के राजनीतिक विरोधियों पर लागू होगा और मोदी सहित तमाम भाजपा नेताओं को संरक्षण देगा. बीएसपी चीफ मायावती ने भी आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा कि ममता बनर्जी को जानबूझकर टारगेट किया जा रहा है.

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भारत के इतिहास में कभी भी चुनाव आयोग की ऐसी गयी-बीती हालत नहीं रही है. चुनाव आयोग पर आरोप हैं कि भाजपा द्वारा आचार संहिता के उल्लंघन की ग्यारह गम्भीर शिकायतों के बावजूद आयोग ने उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया. दरअसल फासीवादी और पूंजीवादी ताकतों ने देश की तमाम सम्मानित संस्थाओं को बीते पांच साल में खोखला कर दिया है. चाहे चुनाव आयोग हो, न्यायपालिका या सर्वोच्च जांच एजेंसियां, आज ये तमाम संस्थान एक अप्रत्यक्ष डिक्टेटरशिप के तहत काम कर रहे हैं और डिक्टेटर कौन है, तानाशाह कौन है, यह बताने की जरूरत नहीं है.

2019 का लोकसभा चुनाव जिस तरह की घटनाओं और चुनाव आयोग की लुंज-पुंज हालत का साक्षी है, ऐसा पूर्व में कभी देखा-सुना नहीं गया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी चुनावी रैली में भारतीय सेना को ‘मोदी की सेना’ कहते रहे, और आयोग उनके खिलाफ कोई सख्त कदम उठाने की बजाये महज चेतावनी देकर रह गया. नरेन्द्र मोदी सैटेलाइट को नष्ट करने वाली एक मिसाइल के परीक्षण के ऐलान के बूते पार्टी का प्रचार करते रहे, मगर आयोग को उनके भाषणों में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा. बालाकोट हमले की बातें और शहीद जवानों की तस्वीरों को मोदी ने अपने चुनावी मंच पर भुनाया, मगर चुनाव आयोग अंधा बना रहा. चुनाव के दौरान आश्चर्यजनक ढंग से ‘नमो टीवी’ लौन्च हो गया, जिसमें मोदी का महिमामंडन चलता रहा, और मजे की बात यह कि इस चैनल के लिए न तो कोई पंजीकरण हुआ था और न ही कोई अनुमति ली गयी थी, बावजूद इसके चुनाव आयोग ने मोदी के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया. उधर मोदी सफेद झूठ बोलते रहे कि उन्हें ‘नमो टीवी’ के बारे में जानकारी तक नहीं है, जबकि उन्हीं के ट्विटर अकाउंट से रोजाना इस चैनल का प्रचार होता रहा. भाजपा का आईटी सेल ही इस चैनल को चलाता रहा और मोदी के भाषणों और रैलियों को दिखाता रहा. इसी के साथ मोदी के जीवन पर बनी एक बौलीवुड फिल्म का भी इसी दौरान धड़ल्ले से प्रचार हुआ, जिसमें विवेक ओबेरौय ने मोदी का किरदार निभाया है. मोदी पर एक वेब सीरीज का प्रसारण भी होता रहा. सारे नियम-कानूनों को ताक पर रखकर भाजपा और आरएसएस आचार संहिता की खुलेआम धज्जियां उड़ाते रहे और चुनाव आयोग मूक-दर्शक बना रहा. कहना गलत न होगा कि झूठ और बेशर्मी जहां मोदी की पहचान बन चुकी है, वहीं चुनाव आयोग एक तानाशाह की बांदी बन कर उसके इशारों पर नाच रहा है. ऐसे में चुनाव निष्पक्ष होंगे, इस पर संदेह है.

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लोकसभा चुनाव को जीतने के लिए भाजपा साम-दाम-दंड-भेद हर दांव खेल रही है. देश भर से ऐसी खबरें आ रही हैं, जो चुनाव की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगाती हैं. मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से गायब मिले. पहले चरण के मतदान के बाद ही देश भर से ईवीएम मशीनों में खराबी की खबरें आनी शुरू हो गयीं. साफ है कि जनता किसी तरह अपना मत दे भी दे, तो ईवीएम घोटाला चुनाव को निष्पक्ष नहीं रहने देगा. सहारनपुर में करीब 56 मशीनें खराब होने की शिकायत के बाद उन्हें बदला गया. चुनाव आयोग ने खुद माना कि करीब साढ़े तीन सौ से ज्यादा खराब मशीनों की खबरें उनके पास आयीं. आखिर पोलिंग बूथों पर ठीक मशीनें भेजने की जिम्मेदारी किसकी थी? कितने शर्म की बात है कि चुनाव आयोग चुनाव की प्रक्रिया को ठीक तरीके से हैंडल करने में नाकाम है. ऐसे में चुनाव निष्पक्ष होंगे, यह भ्रम पाल कर बैठना बेवकूफी ही है. हर चुनाव के बाद करोड़ों रुपये का बोझ जनता की जेब पर पड़ता है. देश की जनता अपना सारा काम छोड़ कर धूप, बरसात में घंटों लाइन में लग कर अपना मत डालती है, क्या इसलिए कि उसका मत एक ऐसी ईवीएम में पड़े जो खराब है? ऐसी ईवीएम जिसमें कोई भी बटन दबाओ वोट भाजपा की झोली में ही जाए? फिर चुनाव कराने की जरूरत क्या है? चुनाव आयोग मोदी को पुन: प्रधानमंत्री क्यों नहीं घोषित कर देता है?

कितने हैरत की बात है कि ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी की सूचनाएं आने के बाद जब उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग से पूछा कि सभी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के साथ वीवीपैट की व्यवस्था करके चुनावों में पारदर्शिता सुनिश्चित क्यों नहीं की जा सकती है? तो इस पर जवाब देने के बजाय चुनाव आयोग उच्चतम न्यायालय से पूछता है कि क्या उसे ईवीएम पर भरोसा नहीं है! यह कैसा जवाब है? चुनाव आयोग ने सभी ईवीएम मशीनों के साथ वीवीपैट की व्यवस्था आखिर क्यों नहीं की? क्या इसके पीछे साजिश की बू नहीं आती?

आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमन्त्री चन्द्रबाबू नायडू ने कहा कि 30 प्रतिशत ईवीएम सही काम नहीं कर रही हैं. पहले चरण के मतदान में ही साफ हो गया था कि ईवीएम मशीनों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है. पहले चरण के मतदान में एक वोटर ने तो बकायदा वीडियो बनाकर फेसबुक पर पोस्ट किया कि किसी अन्य पार्टी के आगे का बटन दबाने के बावजूद उसका वोट भाजपा को ही जा रहा है. क्या चुनाव आयोग को पहले चरण के अनुभव के बाद स्वयं ही सभी ईवीएम के साथ वीवीपैट वेरिफिकेशन की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए थी? क्या सुप्रीम कोर्ट को स्वयं संज्ञान लेकर इस मुद्दे पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए थी? मगर कहीं कुछ नहीं हुआ क्योंकि कोई नहीं चाहता कि उसका हश्र जज लोया जैसा हो. मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं का हाल दयनीय हो गया है.

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संदेह के घेरे में ईवीएम

ईवीएम की व्यवस्था को दुनिया के तमाम देश अपनाने के बाद छोड़ चुके हैं. वे पुन: बैलेट पेपर सिस्टम पर आ गये हैं. मगर भारत में हर चुनाव में ईवीएम में खराबी की रिपोर्ट्स आती हैं, घोटाले की बात की जाती है, ईवीएम मशीनें बदलने की सूचनाएं भी आती हैं, हाल ही में एक विडिओ सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ जिसमे वोटिंग के बाद एक ट्रक में जा रही ईवीएम मशीने बदली जा रही थी, मगर इस विडिओ की सत्यता जांचने की इच्छा चुनाव आयोग की तरफ से नहीं दिखाई गई. चुनाव आयोग कहता है कि उसे ईवीएम सिस्टम पर ही भरोसा है! भाजपा के दोगलेपन का आलम यह है कि जब ये सत्ता में नहीं थे तो ईवीएम का जोर-शोर से विरोध करते थे. लालकृष्ण आडवाणी ने तो ईवीएम से होने वाले चुनाव घोटालों के उदाहरण देते हुए इसे खारिज करने की मांग पर एक किताब तक लिख डाली थी, मगर अब भाजपा सत्ता में है, इसलिए ईवीएम सिस्टम ही ठीक है!

ईवीएम की गड़बड़ी की पहली रिपोर्ट

1982 में सीपीआई उम्मीदवार सिवान पिल्लई ने केरल हाई कोर्ट में एक रिट पेटिशन दायर करके ईवीएम के इस्तेमाल पर सबसे पहले सवाल खड़ा किया था. जब चुनाव आयोग ने हाई कोर्ट को मशीन दिखायी तो अदालत ने इस मामले में दखल देने से इंकार कर दिया. लेकिन जब पिल्लई 123 वोटों से चुनाव जीत गये तो कांग्रेसी एसी जोस हाईकोर्ट पहुंच गये. जोस का कहना था कि ईवीएम का इस्तेमाल करके आरपी एक्ट 1951 और चुनाव प्रक्रिया एक्ट 1961 का उल्लंघन हुआ है. हाई कोर्ट ने एक बार फिर चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला सुनाया. जोस ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी. सर्वोच्च न्यायालय ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए दोबारा बैलट पेपर से चुनाव कराने का आदेश दिया. दोबारा चुनाव हुए तो जोस जीत गये.
सर्र्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद चुनाव आयोग ने ईवीएम का इस्तेमाल को बंद कर दिया. वर्ष 1988 में आरपी एक्ट में संशोधन करके ईवीएम के इस्तेमाल को कानूनी बनाया गया. नवम्बर 1998 में मध्य प्रदेश और राजस्थान की 16 विधानसभा सीटों पर प्रयोग के तौर पर ईवीएम का इस्तेमाल किया गया. वहीं दिल्ली की छह विधानसभा सीटों पर इनका प्रयोगात्मक इस्तेमाल किया गया. साल 2004 के लोकसभा चुनाव में पूरे देश में ईवीएम का इस्तेमाल हुआ.

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किन देशों ने छोड़ दिया ईवीएम का इस्तेमाल

जर्मनी और नीदरलैंड ने पारदर्शिता के अभाव में ईवीएम के इस्तेमाल पर रोक लगा दी. इटली को भी लगता है कि ईवीएम के नतीजे प्रभावित किये जा सकते हैं. आयरलैंड ने तीन सालों तक ईवीएम पर शोध में पांच करोड़ दस लाख पाउंड खर्च करने के बाद इनके इस्तेमाल का ख्याल छोड़ दिया. अमेरिका समेत कई देशों में बिना पेपर ट्रेल वाले ईवीएम पर रोक लगी हुई है. मगर भारत का चुनाव आयोग ईवीएम पर अपना पूरा भरोसा जता रहा है. उसका कहना है कि जिन देशों में ईवीएम विफल साबित हुए हैं उनसे भारतीय ईवीएम की तुलना ‘गलत और भ्रामक’ है. आयोग का कहना है कि दूसरे देशों में पर्सनल कम्प्यूटर वाले ईवीएम इस्तेमाल होते हैं जो ऑपरेटिंग सिस्टम से चलते हैं, जबकि भारत में इस्तेमाल होने वाले ईवीएम पूरी तरह स्वतंत्र मशीन है, जो किसी नेटवर्क से नहीं जुड़ी है, इसलिए इसको हैक नहीं किया जा सकता है. अब आयोग के इतने जबरदस्त ‘भरोसे’ के पीछे क्या कारण हैं, यह रिसर्च का विषय है.

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