2008 में ‘‘कलर्स’’ पर प्रसारित हो चुके सीरियल ‘‘मोहे रंग दे’’ से करियर की शुरूआत करने वाले अभिनेता गैवी चहल के करियर में फिल्म ‘‘एक था टाइगर’’ से जबरदस्त मोड़ आया. अब उनकी गिनती पंजाबी सिनेमा के सुपर स्टार के तौर पर होती है. तो वहीं वह हिंदी फिल्मों में भी लगातार काम कर रहे हैं. इन दिनों वह 24 मई को प्रदर्शित हो रही फिल्मकार लोम हर्श की फिल्म ‘‘ये है इंडिया’’ में हीरो बनकर आ रहे हैं, तो दूसरी तरफ संजय दत्त के साथ फिल्म ‘‘तोरबा’’ कर रहे हैं.

हाल ही में जब गैवी चहल से मुलाकात हुई, तो उन्होंने हमसे एक्सक्लूसिव बात करते हुए टीवी इंडस्ट्री के काम काज के प्रति रोष जताते हुए कहा- ‘‘टीवी इंडस्ट्री का पतन हो रहा है. डेली सोप का प्रसारण शुरू होते ही रचनात्मकता का खात्मा हो जाता है. उस वक्त तो निर्माता निर्देशक से लेकर कलाकार तक सभी के दिमाग में एक ही बात रहती है कि किसी तरह से एपीसोड पूरा होकर जाए. इतना ही नही हम कलाकारों के किरदार भी टीआरपी के आधार पर बदलते रहते हैं. एक मोड़ पर हम हर एपीसोड में अपने आपको दोहराते रहते हैं.’’

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इसका अर्थ यह हुआ कि टीवी माध्यम में कलाकार को रचनात्मक संतुष्टि कम मिलती है? हमारे इस सवाल पर गैवी चहल ने कहा- ‘‘मैं अपनी बात कहूं तो जब ‘कलर्स’ चैनल लांच हुआ, तभी मेरे अभिनय करियर की शुरूआत हुई. मुझे इस चैनल पर ‘मोहे रंग दे’ सीरियल करने का मौका मिला. एक साल तक टीवी करने के बाद मुझे लगा कि वही दोहराव हो रहा है. वही पोशाक पहननी है, वही विंटेज गाड़ी में बैठना है, तो वहां क्रिएटीविटी एकदम खत्म हो गयी थी. पर एक कलाकार के तौर पर आपको हर दिन पैसे मिलते हैं. इस तरह आप टीवी पर पैसा ज्यादा कमा लेते हैं. इसलिए ‘मोहे रंग दे’ के बाद मैंने सोच लिया था कि मुझे डेली सोप नही करना है. फिर मैंने रियालिटी शो ‘खतरों के खिलाड़ी’  किया, जिसका मैं विजेता भी बना. यह टीवी था, पर रियालिटी शो होने की वजह से थोड़ा सा अंतर हो गया था, उसके बाद मैं फिर फिल्मों में व्यस्त हो गया. लेकिन मैंने टीवी को हमेशा के लिए अलविदा नहीं कहा. यदि टीवी में कभी कुछ अच्छा काम करने का मौका मिलेगा, तो मैं जरूर करना चाहूंगा.

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क्योंकि टीवी का दर्शक बहुत बड़ा है और कलाकार के तौर पर हम बहुत जल्दी लोगों के घर तक पहुंच जाते हैं. लेकिन मैं यह मानता हूं कि टीवी में कलाकार को अपनी अभिनय क्षमता दिखाने की एक सीमा है, उसमें फैलाव कम है. इसके अलावा टीवी सीरियल महिला प्रधान होते हैं.तो पुरूष कलाकारों के किरदार कुछ कमजोर रह जाते हैं.मैं हमेषा कहता हूं कि टीवी सिर्फ पैसा कमाने के लिए बहुत बहुत अच्छा है. टीवी में हमें पता होता है कि हमने आज जो काम किया है, उसका पूरा पैसा तीन माह बाद मिल जाएगा. जबकि फिल्म में हमें एक साथ धन मिलता है, तो उसे हम कहीं न कहीं इन्वेस्ट कर देते हैं. तो यदि सिर्फ पैसा कमाना है, तब टीवी माध्यम ज्यादा ठीक है.’’

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