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बढ़ रही है भूलने की बीमारी

मां अक्सर चूल्हे पर दाल या दूध की पतीली चढ़ा कर भूल जाती हैं. ड्राइंग रूम या बेडरूम में जब हमलोगों को घर में कुछ जलने की तीव्र गंध आती है, तब पता चलता है कि मां पतीली चढ़ा कर या तो सो गयीं या अन्य कामों में बिजी हो गयीं. उनकी यह हालत कोई साल भर से है. एक दिन तो वह बाजार से सामान खरीदने गयीं और सामान से भरा एक झोला किसी सब्जीवाले के ठेले पर भूल आयीं, वह तो भला हो उस ठेलेवाले का जो मां को जानता था, सो आकर झोला वापस कर गया. मां यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि उन्हें भूलने का रोग यानी अल्जाइमर हो गया है. डौक्टर के पास चलने को कहो तो उल्टे नाराज हो जाती हैं. कहती हैं कि मैं काम की अधिकता में कुछ भूल जाती हूं तो तुम लोग मुझे भुलक्कड़ साबित करने लगते हो… अब उन्हें कौन समझाए कि उम्र के साथ यह रोग लग ही जाता है. उम्र के साथ शरीर की ही नहीं, बल्कि दिमाग की कोशिकाएं भी सुस्त पड़ने लगती हैं या क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, जिसके चलते इंसान चीजों को भूलने लगता है.

भूलने का रोग यानी अल्जाइमर रोग भारत में तेजी से पैर पसार रहा है. इसे डिमेंशिया भी कहते हैं. अलोइस अल्जाइमर के नाम पर इसे अल्जाइमर कहा गया, जिन्होंने सबसे पहले इस रोग के लक्षणों को पहचाना था. बुढ़ापे में यह बीमारी आमतौर पर देखी जाती है, मगर कई बार सिर में चोट लगने या आधुनिक जीवनशैली, शराब या ड्रग्स का सेवन भी इस रोग का कारण हो सकते हैं. इसमें इंसान की याददाश्त कम होने लगती है, वह निर्णय नहीं ले पाता या उसको बोलने में दिक्कत आने लगती है, जिसकी वजह से सामाजिक और पारिवारिक दायरे में गम्भीर स्थिति उत्पन्न हो जाती है. उच्च रक्तचाप, तनाव, मधुमेह भी इस रोग की वजहों में से एक है.

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अल्जाइमर एक दिमागी बीमारी है. इस रोग में मस्तिष्क में हानि होती है. इससे एक आम इंसान की मानसिक क्षमता में गिरावट आ जाती है. मस्तिष्क में न्यूरोफिब्रिलरी टैंगिल और बीटा-एमीलायड प्लैक देखे जाते हैं, और मस्तिष्क सिकुड़ने लगता है. अल्जाइमर एक प्रगतिशील रोग है. इसमें हो रही मस्तिष्क में हानि समय के साथ-साथ बढ़ती जाती है. लक्षण भी गंभीर होते जाते हैं. इस रोग के बढ़ने से आगे आनेवाले समय में साधारण जिन्दगी जीने में भी मुश्किलें पैदा हो जाती हैं. इस रोग का प्रारंभिक लक्षण है याददाश्त की समस्या. इसलिए इस रोग को कई लोग भूलने की बीमारी, स्मृति-लोप और याददाश्त की समस्या के नाम से भी पुकारते हैं. शुरू में कुछ और लक्षण जैसे की अवसाद, अरुचि, समय और स्थान का सही बोध न होना, वगैरह भी प्रकट होता है. रोग के अंतिम चरण में व्यक्ति अधिकांश समय बिस्तर पर ही रहते हैं और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं. यह एक तरह से लाइलाज बीमारी है. भारत में पचास लाख से भी ज्यादा लोग इस मानसिक बीमारी का सामना कर रहे हैं, जिसमें से अस्सी प्रतिशत लोगों को अल्जाइमर है. डॉक्टरों का कहना है कि वर्ष 2030 तक यह संख्या दोगुनी हो सकती है.

अमूमन 60 वर्ष की उम्र के आसपास होने वाली इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थायी इलाज नहीं है. हम जैसे-जैसे बूढ़े होते हैं, हमारी सोचने और याद करने की क्षमता भी कमजोर होती जाती है. अल्जाइमर रोग इस बात का संकेत है कि हमारे दिमाग की कोशिकाएं मर रही हैं. गौरतलब है कि हमारे दिमाग में एक सौ अरब कोशिकाएं (न्यूरॉन) होती हैं. हरेक कोशिका बहुत सारी अन्य कोशिकाओं से संवाद कर एक जटिल नेटवर्क बनाती हैं. इस नेटवर्क का काम विशेष होता है. कुछ कोशिकाएं सोचती हैं, कुछ सीखती हैं, कुछ याद रखती हैं, कुछ संकेत पे्रषित करती हैं. अन्य कोशिकाएं हमें देखने, सुनने, सूंघने, स्पर्श समझने आदि में मदद करती हैं. इसके अलावा कुछ कोशिकाएं हमारी मांसपेशियों को चलने का निर्देश देती हैं. कहना गलत न होगा कि शारीरिक और मानसिक कार्यों के लिए हमारे दिमाग की कोशिकाएं किसी लघु उद्योग की तरह काम करती हैं. वे सप्लाई लेती हैं, ऊर्जा पैदा करती हैं, अंगों का निर्माण करती हैं और बेकार चीजों को शरीर से बाहर निकालती हैं. कोशिकाएं सूचनाओं को जमा करती हैं और फिर उनका प्रसंस्करण भी करती हैं. शरीर को चलते रहने के लिए समन्वय के साथ बड़ी मात्रा में औक्सीजन और ईधन की जरूरत होती हैं. बाल्यावस्था या युवावस्था में हमारे शरीर में काफी एनर्जी होती है. ऑक्सीजन की खूब मात्रा फेफड़े हमारे मस्तिष्क तक भेजते हैं, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ-साथ कोशिकाओं के काम करने की क्षमता कम होती जाती है. उम्र के साथ कोशिकाएं नष्ट भी होने लगती हैं और नई कोशिकाओं के बनने की गति भी मंद पड़ जाती है, जिससे मस्तिष्क तक पर्याप्त ईधन और ऊर्जा नहीं पहुंच पाती है और वहां कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है. इसके अलावा चोट लगने से भी कोशिकाएं नष्ट होती हैं और उस मात्रा में नई कोशिकाओं के न बन पाने के चलते अल्जाइमर रोग उत्पन्न होता है.

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कैसे पहचानें इस रोग को

  • भूलने की बीमारी होने पर पीड़ित व्यक्ति को कोई भी गेम खेलने या खाना पकाने में कठिनाई होने लगती है.
  • अधिक उम्र में बीमारी बढ़ने पर व्यक्ति को बोलने में दिक्कतें आने लगती हैं. यहां तक कि साधारण वाक्य या शब्द तक नहीं बोल पाता. न सिर्फ बोलने में फर्क आता है, बल्कि उसकी लेखन शैली भी बदल जाती है. अक्सर बुढ़ापे में लोगों के हस्ताक्षर बदल जाते हैं.  –  घर का पता या आसपास के माहौल तक को व्यक्ति भूलने लगता है. कई बार अपने रिश्तेदारों के नाम तक वह भूल जाता है.
  • कोई भी निर्णय लेने में उसे काफी दिक्कतें आती हैं.
  • हिसाब किताब करने में परेशानी होने लगती है.
  • अपनी चीजों को रखकर भूल जाना भी एक बड़ी समस्या बन जाती है.
  • मूड में बदलाव आ जाना, बिना वजह गुस्सा करना इस रोग के लक्षण हैं.

खानपान में लाएं थोड़ा बदलाव

  • बादाम और ड्राई फ्रूट तो दिमाग तेज करने और याददाश्तको बढ़ाने के लिए तो रामबाण हैं ही, इसके अलावा भी कई और सुपरफूड हैं जो आपकी याददाश्त तेज कर सकते हैं. दिमाग को सक्रिय रखने के लिए एंटी औक्सीडेंट्स से भरपूर स्ट्रॉबेरी और ब्लूबेरी खाएं. विटामिन-ई से भरपूर स्ट्रॉबेरी और ब्लूबेरी खाने से तनाव कम होता है.
  • हरी फूलगोभी यानी ब्रोकली का सेवन करने से दिमाग तेज होता है. ब्रोकली में मैग्नीशियम, कैल्शियम, जिंक और  फास्फोरस अच्छी मात्रा में पाया जाता है, जिससे दिमाग तो तेज होता ही है, हड्डियां भी मजबूत होती हैं.
  • अल्जाइमर के दौरान दिमाग में बढ़ने वाले जहरीले बीटा एमिलॉयड नामक प्रोटीन के प्रभाव को ग्रीन टी के सेवन से कम किया जा सकता है.
  • हरी पत्तेदार सब्जियां, बींस, साबुत अनाज, मछली, जैतून का तेल और एक गिलास वाइन अल्जाइमर रोग से लड़ने में मदद करती है.
  • अतिरिक्त कौपर को डायट में कम कर देना चाहिए. कौपर डायट अल्जाइमर रोग का खतरा बढ़ा देता है. ऐसे में कौपरयुक्त खाद्य पादार्थ जैसे – तिल, काजू, सूखे टमाटर, कद्दू, तुलसी, मक्खन, चीज, फ्राइड फूड्र जंकफूड, रेड मीट, पेस्ट्रीज और मीठे का सेवन करने से बचें.
  • तनाव से दूर रहें. मेडिटेशन करें, हल्का संगीत सुनें और मन को शांत रखें.

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दीक्षा यानी गुरूओं की दुकानदारी

रिटायरमैंट के करीब पहुंचे एक सज्जन से मैं ने पूछा, ‘‘दीक्षा का मतलब क्या है?’’ वे बताने लगे, ‘‘दीक्षा का मतलब, दक्ष,’’ वे आगे बोले, ‘‘कृष्ण ने अर्जुन को महाभारत के युद्ध में दीक्षा दी थी.’’

‘‘क्या दीक्षा दी थी?’’ मेरे दोबारा पूछने पर वे कुछ नहीं बोले. जाहिर है, वे अपने गुरु के अंधसमर्थक थे.

इस बारे में महाभारत से स्पष्ट है कि कृष्ण ने छलकपट से कुरुक्षेत्र का युद्ध जीता था. तो क्या उन्होंने अर्जुन को छलकपट की दीक्षा दी? आमतौर पर दीक्षा का मतलब होता है, गुरु द्वारा दिया गया ज्ञान का सार, जिस पर शिष्य (छात्र) अपने जीवन में अमल कर सफलता की सीढ़ी चढ़ता है. स्कूल की पढ़ाई को तथाकथित गुरु अपर्याप्त शिक्षा मानते हैं. अनपढ़, गंवार गुरु अपने तप से जीवन में ऐसा कौन सा मंत्र प्राप्त करते हैं जो अपने शिष्यों में बांट कर उन का जीवन सुधारने का कार्य करते हैं, जबकि वे खुद असफल, जीवन के संघर्षों से भागने वाले लोग होते हैं.

गुरु के मर जाने के बाद भी दीक्षा का कार्यक्रम चलता है. यह समझ से परे है, क्योंकि गुरु खुद अपना ज्ञान दे तो समझ में आता है पर यह कार्य मरने के बाद उन के कुछ शिष्यों द्वारा चलता रहे, तो यही कहा जा सकता है कि यह गुरु की दुकानदारी है.

दीक्षा देने का तरीका सभी गुरुओं का एक जैसा नहीं होता. कुछ गुरु खास रंगों के वस्त्रों के साथ नहाधो कर ब्रह्ममुहूर्त में दीक्षा देते हैं, तो कुछ कभी भी, किसी भी अवस्था में. दीक्षा के लिए किस गुरु को चुना जाए, यह बुद्धि से ज्यादा गुरु के प्रचार पर निर्भर करता है जिस गुरु का जितना प्रचार होता है उस से दीक्षित होने के लिए लोग उतने ही उतावले होते हैं. इस के अलावा संपर्क भी एक माध्यम है. क्यों? जड़बुद्धि जनता के लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं होता क्योंकि इतना सोचने के लिए उस के पास दिमाग ही नहीं होता. उसे तो बस यह पता हो कि उक्त गुरुजी बहुत पहुंचे हुए महात्मा हैं.

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इन गुरुओं से संबंधित अनेक मनगढं़त कहानियां होती हैं जो नए ग्राहक (शिष्य) को फंसाने के लिए सुनाई जाती हैं. एक दीक्षा प्राप्त महिला ने अपने गुरु के बारे में बताया कि एक बार मेरा बेटा मोटरसाइकिल से आ रहा था. उसे अचानक चक्कर आया और वह गिर पड़ा. गिरते ही बेहोश होने की जगह उस ने गुरुमंत्र जपा. तभी गुरु समान सड़क पर पता नहीं कहां से एक रिकशा वाला आ गया, जो मेरे बेटे को उठा कर पास के अस्पताल में ले गया. आमतौर पर उस अस्पताल में औक्सीजन सिलिंडर नहीं होता पर उस रोज था और इस तरह बेटे की जान बच गई. रिकशे वाले की सदाशयता और अस्पताल की सारी मुस्तैदी का के्रडिट गुरुजी ले उड़े.

दूसरी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है : एक शिष्य साइकिल से जा रहा था. अचानक ट्रक ने पीछे से साइकिल में टक्कर मारी तो साइकिल सवार सड़क पर और साइकिल छिटक कर दूर जा पड़ी. सड़क पर गिरते ही उस का एक हाथ ट्रक के अगले पहिए के नीचे आ गया. तभी उस ने गुरुमंत्र जपा. मंत्र जपने के साथ ही उस में पता नहीं कहां से इतनी शक्ति आ गई कि उस ने सिर झटके से हटा लिया. इस तरह उस का सिर पिछले पहिए से कुचलने से बच गया.

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समझने वाली बात है कि उस का ध्यान मंत्रजाप पर था या सिर बचाने पर. साफ पता लग रहा है कि सारी घटना में जानबूझ कर मंत्र का तड़का लगाया गया है.

गुरुमंत्र कानों में इस तरह फुसफुसाए जाते हैं ताकि कोई सुन न ले. ठीक पाकिस्तान के आणविक कार्यक्रम की तरह कहीं आतंकवादियों के हाथ न पड़ जाए, वरना महाविनाश निश्चित है. गुरुमंत्र से दीक्षित हो कर वह आदमी उस फार्मूले (मंत्र) को अपने तक ही सीमित रखता है.

दीक्षा मुफ्त में नहीं मिलती. इस के लिए बाकायदा चढ़ावा निश्चित है. ‘माया महा ठगिति हम जानी’, तिस पर गुरु व उन के खासमखास चेले बिना रुपया हाथ में लिए दीक्षा नहीं देते. यहां तक कि मर चुके गुरु के फोटो तक के पैसे शिष्यों से वसूल लिए जाते हैं. एकाधिकार बना रहे तभी कानों में मंत्र फूंकने का काम वह अपने तक ही सीमित रखता है. हां, मरने के बाद गुरु की दुकानदारी चलती रहे, सो अपने किसी प्रिय शिष्य को वह यह कार्य सौंप कर जाता है.

दीक्षा में कुछ नहीं है. कानों में गुरु अपना उपनाम बताता है, जिसे दीक्षित आदमी से हर वक्त जपने को कहा जाता है. यह एक तरह से व्यक्ति पूजा है ताकि कथित भगवानों से ऊपर लोग उसे जानें. तथाकथित गुरु का यह आत्ममोह से ज्यादा कुछ नहीं.

गुरु कितने आध्यात्मिक व ताकतवर हैं, यह सब को मालूम है. सुधांशु महाराज, जयगुरुदेव, कृपालु महाराज, आसाराम बापू, प्रभातरंजन सरकार (आनंदमार्गी) इन सब के क्रियाकलापों से सारा देश परिचित है. इन्होंने समाज को कौन सी सीख दी? क्या मंत्र दिया? उन का गुरुशिष्य के खेल में कितना कल्याण हुआ? यह बताने की जरूरत नहीं. हां, इतना जरूरी है कि दीक्षा के नाम पर करोड़ों रुपए कमा चुके ये महात्मा खुद आलीशान जीवन जी रहे हैं और दीक्षा लेने वाला शिष्य भूखे पेट इन के नाम का जाप कर इन्हें धन्य कर रहा है.

अपनी गिरफ्तारी पर आसाराम बापू ढिठाई से कहते हैं, ‘‘नरेंद्र मोदी की सत्ता बच न सकेगी.’’ मानो वे कोई अंतर्यामी व सर्वशक्तिमान हैं. उन के गिरफ्तार होते ही प्रलय आ जाएगी. दुनिया तहसनहस हो जाएगी. अपनी दुकानदारी चलाने की नीयत से इन गुरुओं द्वारा, यदि दिवंगत हुए तो शिष्यों द्वारा साल में 1 या 2 बार विभिन्न धार्मिक शहरों में भंडारे का आयोजन होता है. जहां इन के शिष्य जुटते, खातेपीते, सत्संग (चुगलखोरी) करते हैं. कहने को सभी शिष्य आश्रम में गुरुभाई हैं पर जैसे ही भंडारा खत्म होता है फिर से वे जातिपांति, भाषा में बंटे अपने घरों को लौट जाते हैं. सिवा पिकनिक के इन भंडारों से कोई लाभ नहीं होता. भंडारे के लिए धन कहां से आता है? इस के लिए हर शिष्य चंदा देता है. कुछ पैसे वाले व्यापारी तो गुरु महाराज की इच्छा के नाम पर भंडारे का सारा खर्च अपने ऊपर ले लेते हैं. दरअसल, जमाखोरी कर के वे जो पाप की कमाई करते हैं उसे थोड़ा खर्च कर के अपने पाप को धोने की कोशिश करते हैं.

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दीक्षित होने के बाद बताया जाता है कि गुरु की तसवीर के सामने बिना होंठ व जबान हिलाए मंत्र (गुरु नाम) का स्मरण करना चाहिए. यह प्रक्रिया दिनरात कभी भी की जा सकती है. सुबह अनिवार्य है. ऐसा कर के शिष्य के ऊपर कभी भी संकट नहीं आ सकता. तो क्या गुरुजी उस आदमी के लिए ‘बुलेटप्रूफ जैकेट’ का काम करते हैं? अगर गुरुजी पर संकट आए तब जैसा आसाराम बापू के साथ हुआ? तब मीडिया को कोसने का मंत्र गला फाड़फाड़ कर बोलने का नियम शायद लागू होता है.

कुल मिला कर दीक्षा वक्त व धन की बरबादी है. जो धर्मभीरु हैं, बेकार हैं व भाग्य के भरोसे रहने वाले हैं वे ही इन गुरुओं के चक्कर में पड़ते हैं. जो गुरु खुद दिग्भ्रमित हो वह क्या लोगों को रास्ता दिखाएगा. दोष कबीर का ही है, न वे कहते, ‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय. बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय.’ न आम लोगों में यह धारणा बनती कि गुरु ही भगवान के पास जाने का रास्ता जानते हैं.

छोटे शहरों में बढ़ रहा मैटरनिटी फोटो शूट का क्रेज

कुछ समय पहले तक गर्भावस्था को छिपाया जाता था. प्रसव के बाद ही लोगों को बच्चे का पता चलता था. कुछ समय पहले फिल्म आर्टिस्ट और मौडल्स ने अपने गर्भावस्था के दिनों में ही अलग अलग फोटो शूट कराये. यह फोटो शूट प्रसव के कुछ समय पहले तक कराये जाते है. बड़े शहरों में यह काफी ग्लैमरस अंदाज में होते है. छोटे शहरों में माहौल को देखते हुये यह मैटरनिटी फोटो शूट हो रहे हैं. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ ‘कैमरो क्लिक‘ की शुभांगी मौर्या कहती हैं ‘हमारे पास कुछ समय से ऐसे फोटो शूट के लिये बडी संख्या में लोग आ रहे हैं. यह लोग केवल स्टूडियों में ही नही आउटडोर शूट भी कराते हैं. थीम के अनुसार अलग अलग रिश्तेदारों खासकर पति और सास या ननद के साथ ऐसे शूट भी कराते हैं. महिलाएं गर्भावस्था को यादगार बनाते हुये अपने भावनात्मक पलों को भी फोटो में कैद करना चाहती हैं.

ऐसे फोटोशूट के लिये नार्मल फोटो शूट की ही तरह से मेकअप, ड्रेस और लोकेशन का चयन करना पड़ता है. शुभांगी मौर्या कहती हैं ‘मैटरनिटी फोटोशूट के समय सबसे ज्यादा देखने वाली चीज लोकेशन और ड्रेस होती है. यह गर्भावस्था के दिनो भी महिला को और सुदंर दिखाने का काम करती है. सामान्य तौर पर ऐसे फोटो शूट के लिये एक पैकेज लेना लोग पंसद करते हैं. जिसमें गर्भावस्था से लेकर प्रसव के 6 माह तक का समय शामिल होता है. जिसमें प्रसव के बाद बच्चे का फोटोशूट भी होता है. लोग ऐसे फोटो के स्लाइड शो भी बनवाते हैं. साथ ही साथ एलबम भी. उनकी जरूरत यह होती है कि ऐसे पलों को वह अपनी यादों में संजो कर रख सके साथ ही साथ आज सोशल मीडिया के दौर में दूसरों को बता भी सके.

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स्त्री रोग विषेषज्ञ डाक्टर सुनीता चन्द्रा कहती हैं कि ‘मेडिकल सांइस के तरक्की करने और जागरूकता आने से प्रसव अब पीड़ादायक नहीं रह गया है. ऐसे में हर कोई इस पलों का संभाल कर रखना चाहता था. गर्भावस्था के दौर में भी महिलाएं खुद के फिगर को फिट रखती है. वह सुंदर दिखना चाहती है. इसके लिये डाइट, एक्सरसाइज, ड्रेस को भी बहुत अच्छा रखती है. ऐसे में मैटरनिटी फोटो शूट एक जरूरी रास्ता बन गया है. इसको करते समय यह ख्याल जरूर रखें कि इसका गर्भावस्था पर कोई कुप्रभाव ना पडे. डाक्टर की सलाह पर ही ऐसे काम करें. यह जरूर है कि अगर सब कुछ हेल्थ कर नजर से सही है तो मैटरनिटी फोटो शूट कराने में कोई दिक्कत नहीं होती है.

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32 साल का युवक बना 81 साल का बूढ़ा

जी हां आपने अक्सर फिल्मों में और सीरियल्स में ही लोगों को रूप बदलते देखा होगा लेकिन अब तो लोग असल जिंदगी में भी ऐसा ही करने लगे हैं भाई. जरा सोचिए कि किसी की इतनी हिम्मत कहां से हो गई जो भेस बदलकर दूसरे देश में जाने के फिराक में था. हालांकि अब तो ऐसी खबरें आम बात हो गई जब लोग ऐसे कारनामें करने लगे हैं.

हाल ही में एक खबर आई कि दिल्ली एयरपोर्ट पर एक व्यक्ति को पकड़ा गया जिसकी उम्र तो थी 32 साल लेकिन वो बना 81 साल का बूढ़ा. उस व्यक्ति की पहचान जयश पटेल नाम से हुई है और उसने क्या किया ये आपको जरूर जानना चाहिए.

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जयेश पटेल गुजरात का रहने वाला है और उसे अमेरिका जाना था जहां जाकर वो अपनी जिंदगी बदलना चाहता था.वो एशोआराम से रहना चाहता था,वो सोचता था कि भारत में रहकर उसका कुछ नहीं होने वाला विदेश जाकर उसकी जिंदगी बदल जाएगी और बड़े ही आराम से उसकी जिंदगी कटेगी लेकिन उसे वीज़ा नहीं मिल रहा था जिसके कारण उसने एक एजेंट से बात की और उसी एजेंट ने उसे ये सलाह दी कि उसे अपना भेस बदलना होगा.बस फिर क्या था चल पड़े महाशय ओखली में सर देने. 32 साल के जयेश पटेल ने 81 साल के बूढ़े के रुप में अपना भेस बदला और व्हीलचेयर पर बैठ कर जाने लगा उसे लगा कि कोई उसपर शक नहीं करेगा लेकिन दिल्ली एयरपोर्ट पर चेकिंग के दौरान सीआईएसएफ ने उससे पूछताछ की और उन्हें उसपर शक हो गया.जब सीआईएसएफ को सच का पता चला तो सबके होश ही उड़ गए.सबसे चौकानें वाली बात तो ये सामने आई कि उसने एजेंसी को भी अपने क्लीयरेंस में ले लिया था और 81 साल का दिखने के लिए उसने ज़ीरो पावर का चश्मा भी पहन रखा था.सफेद दाढ़ी भी लगा रखा थी और मेकओवर ऐसा कि किसी को भी उस पर शक नहीं होता..लेकिन सुरक्षाकर्मियों से बच नहीं पाया और पूछताछ में पकड़ा गया.उस व्यक्ति के दिमाग की तो दाद देनी पड़ेगी जिसने उसको इतना बड़ा अपराध करने पर मजबूर कर दिया.उस एजेंट की भी क्या कहें जिसने जयेश को ये सलाह दी.

सिर्फ वीजा न मिलने के कारण उसने इतनी बड़ी साजिश रच डाली…वाह भाई पहले तो सिर्फ फिल्मों में ही देखना होता था लेकिन अब लोग सच में ऐसा करने लगे हैं.लेकिन आप सभी जरूर सावधान रहें और ऐसा करने से पहले सोचें क्योंकि ये करना कितना खतरनाक है ये तो आप समझ ही गए होंगे.क्योंकि जयेश के इस बहरूपिए के खेल ने उसे जेल का रास्ता दिखा दिया.अब वो भी यही सोच रहा होगा कि कहां विदेश जाकर उसकी जिंदगी बदलने वाली था और कहां वो जेल पहुंच गया.जनाब जब दिमाग जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर लो तो यही होता है…वो कहते हैं न विनाशकाले विपरीत बुद्धि बस वही हाल हुआ जयेश का.तो दोस्तों यही सलाह है आप कभी ऐसा कुछ न करें.

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जानें, लड़कों के लिए क्यों जरूरी होते हैं उनके बेस्ट फ्रेंड

हर व्यक्ति का कोई बेस्ट फ्रेंड तो होता ही हैं, जिसके साथ वह अपने दिल की सारी बातें शेयर करता हैं और खुशी और गम दोनों में उसे याद करता हैं. ऐसे कई मौके आते हैं जब उसे रिश्तों के बीच में चुनाव करना होता है तो वह अपने बैस्ट फ्रैंड का चुनाव करता हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि लड़कों के लिए उनके बेस्ट फ्रेंड क्यों इतने जरूरी होते हैं.

आज हम आपको बताने जा रहे हैं इसके पीछे के कारण के बारे में कि क्यों लड़कों के लिए गर्लफ्रेंड से ज्यादा दोस्त मायने रखते हैं.

हर माहौल में रहते हैं फिट

गर्लफ्रैंड के साथ घूमने जाना हो तो पहले सो बातें सोचनी पड़ती लेकिन दोस्तों के साथ जाना हो तो किसी बात की कोई टेंशन नहीं होती क्योंकि दोस्त जिम्मेदारी नहीं बल्कि साथ बनकर जाते है.

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इंप्रेस करने का कोई झंझट नहीं

रिलेशन नया हो या पुराना, गर्लफ्रैंड को इम्प्रेस करने के लिए हर बार नया बहाना ढूंढना पड़ता है लेकिन दोस्तों के साथ ऐसा कुछ नहीं होता. दोस्त हमसे कोई खास मुम्मीद ही नहीं लगाते. दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है, जिसमें कोई नाराजगी की जगह नहीं होती.

अहम फैसले लेने में मदद

जिंदगी में कई ऐसे मोड़ आते हैं, जहां हमें अहम फैसला लेना पड़ता. ऐसे में किसी की सलाह लेनी पड़ती तो वह दोस्त ही होते है, जिनसे हम अपनी जिंदगी से जुड़े अहम किस्सों को सांझा कर लेते है और वह कई बार पूरा साथ भी देते है.

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कोई कमिटमेंट नहीं

दोस्ती में कमिटमेंट जैसा कोई शब्द ही नहीं होता. जबकि गर्लफ्रैंड के साथ इस टॉपिक पर हमेशा डिसकशन हो जाता है.

मिलने से पहले लुक देखना

अगर गर्लफ्रैंड मिलने बुलाए तो सबसे पहले अपने लुक पर ध्यान देना पड़ता. कहीं गर्लफ्रैंड बेसती न कर दें. वहीं कहीं दोस्त बुलाए तो हम ऐसे ही मुंह उठाकर निकल पड़ते है क्योंकि वो कौन-सा लुक पर ध्य़ान देते है.

ज्यादा वक्त नहीं मांगते दोस्त

दोस्तों के साथ हम जितना वक्त बिताना चाहे बिता लेते है, वह कभी कोई शिकायत नहीं करते कि याद तू हमे बुलाता ही नहीं है. वहीं अगर गर्लफ्रैंड को एक दिन भी टाइम न दे पाए तो सो बातें सुननी पड़ती है.

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‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’: 3000वें एपिसोड में कार्तिक और नायरा आए करीब!

स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाला शो “ये रिश्ता क्या कहलाता है”  के 3000 एपिसोड पूरे हो चुके हैं. और इस शो का 3000 वां एपिसोड भी औन एयर हुआ था, जिसमें काफी लंबे समय बाद कार्तिक और नायरा को एक साथ समय बिताते हुए देखा गया. इस शो के फैंस के लिए ये एपिसोड बेहद खास रहा.

टीवी की इस दिलकश जोड़ी को रोमांस करते देखकर फैंस काफी खुश होंगे. इस शो के फैंस की खुशी सोशल मीडिया पर भी देखने को मिली. फैंस के लाइक और कमेंट्स के जरिए इस शो के लिए उनका प्यार नजर आया. इस शो 11 साल के लंबे खूबसूरत सफर को फैंस ने याद किया.

https://twitter.com/Archu1830/status/1171968854639071232

तो आईए कुछ फैंस के कमेंट आपको बताते है. एक यूजर ने ट्वीटर पर कमेंट करते हुए लिखा, मैं ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ की टीम के लिए बहुत खुश हूं. आप सब ने 11 साल तक टीवी की दुनिया पर राज किया है और मुझे उम्मीद है कि आगे भी आग अपन सफर ऐसे ही जारी रखेंगे.

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https://twitter.com/jualam_1/status/1172041802976657408

तो वही दूसरे यूजर ने लिखा कि मुझे बीता एपिसोड बहुचत पसंद आया. मैं इस शो के मेकर्स से गुजारिश करता हूं कि,  कुछ समय तक इस ट्रैक को यूं ही दिखाया जाए. मुझे कार्तिक और नायरा का साथ बहुत खुशी देता है.

https://twitter.com/maham_kaira/status/1172033797845651458

इतना ही नहीं  एक यूजर ने लिखा कि ‘आज का एपिसोड बहुत ही खूबसूरत था. क्योंकि एक लंबे वक्त के बाद कार्तिक और नायरा एक-दूसरे के इतने करीब नजर आए. इन दोनों को साथ देखकर मैं आज बहुत खुश हूं.

https://twitter.com/piu587315/status/1172041727797944322

फैंस के कमेंट्स देख कर इतना तो साफ है कि, बीती रात के एपिसोड ने दर्शकों का दिल जीत लिया है. जब कार्तिक और नायरा करीब आए हैं तो ऐसे में अब दर्शक चाहते हैं कि उनकी नजदीकीयां कायम रहे.

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‘‘सेक्शन 375″: यौन अपराधों पर प्रासंगिक व बेहतरीन कोर्ट रूम ड्रामा

रेटिंगः तीन स्टार

निर्माताःकुमार मंगत पाठक, अभिषेक पाठक,एससीआईपीएल

निर्देशकः अजय बहल

लेखकः मनीश गुप्ता

संगीतकारः क्लिंटन सिरिजो

कैमरामैनः सुधीर के चैधरी

कलाकार: अक्षय खन्ना, रिचा चड्डा,  मीरा चोपड़ा, राहुल भट्ट, कृतिका देसाई, कुमुद मिश्रा, अतुल कुलकर्णी, संध्या मृदुल

अवधिः दो घंटे चार मिनट

2012 के निर्भयाकांड के बाद सरकार ने ‘बलात्कार’ के कानून में कुछ बदलाव किए. फिर 2013 में नया कानून आ गया. जिसके तहत इंडियन पैनल कोड के ‘‘सेक्शन 375’’ के अनुसार यौन संबंधों में लड़की या औरत की सिर्फ ‘हां’ के साथ ‘मर्जी’ भी जरुरी हो गयी. यानी कि एक लड़की किसी लड़के के साथ यौन संबंध रखती है और मेडीकली यौन संबंध बनने की बात साबित हो जाए, उसके बाद यदि लड़की अदालत मे कह देती है कि यह यौन संबंध उसकी मर्जी/इच्छा के विपरीत हुआ, तो उसे बलात्कार माना जाएगा. इसी ‘‘सेक्शन 375’’ के इर्दगिर्द लेखक मनीश गुप्ता और निर्देशक अजय बहल एक बेहतरीन कोर्ट रूम ड्रामा वाली फिल्म लेकर आए हैं, जिसमें उन्होंने हर पक्ष को पेश किया है.

कहानीः

मशहूर फिल्म निर्देशक रोहण खुराना (राहुल भट्ट) की फिल्म की सहायक कास्ट्यूम डिजायनर अंजली दांगले (मीरा चोपड़ा) उनके घर पर कुछ कस्ट्यूम दिखाने आती है. रोहण अपनी नौकरानी को बाजार भेज देते हैं और फिर रोहण व अंजली के बीच सेक्स/यौन संबंध स्थापित होते हैं. कुछ देर बाद अंजीली दांगले अपने चेहरे को अपने दुपट्टे छिपाए हुए रिक्शे से अपने घर पहुंचती है, उसका भाई उससे पूछता है कि आखिर हुआ क्या? तब अंजली अपने भाई को कुछ बताती है. फिर पता चलता है कि पुलिस ने रोहण खुराना को गिरफ्तार कर लिया है. अस्पताल में अंजली और रोहण दोनों का मेडिकल परीक्षण होता है. मामला सेशन कोर्ट में पहुंचता है और सेशन कोर्ट रोहण खुराना बलात्कार करने का दोषी मानकर रोहण को दस साल की सजा सुना देता है. रोहण अपनी पत्नी से कहता है कि वह बेगुनाह है. अंजली ने उसे जानबूझकर फंसाया है.

तब फिल्म निर्देशक रोहण खुराना की पत्नी कैनाज(श्रीस्वरा) शहर के मशहूर और अति मंहगे वकील तरूण सलूजा (अक्षय खन्ना) के पास पहुंचती है. वह चाहती है कि तरूण सलूजा हाईकोर्ट में रोहण खुराना का मुकदमा लड़कर उसे बरी कराए. तरूण सलूजा अपनी पत्नी (संध्या मृदुल) की इच्छा के विपरीत जाकर यह मुकदमा ले लेता है. तरूण सलूजा, जेल में रोहण से मिलकर सच बताने के लिए कहता है. अब मुकदमा हाईकोर्ट की दो जजों /न्यायाधीशों (किशोर कदम और कृतिका देसाई) की बेंच सुनती है. पहले दिन तरूण सलूजा का प्रयास होता है कि वह रोहण खुराना को जमानत पर रिहा करवा ले, पर अंजली की तरफ से मुकदमा लड़ रही सरकारी वकील हीरल गांधी (रिचा चड्डा) के कानूनी दांव पेंच के चलते रोहण को जमानत नही मिलती. यहीं पर पता चलता है कि कभी वकील हीरल गांधी, तरूण सलूजा की सहायक हुआ करती थी.

बहरहाल, एक तरफ अदालत में इस मुकदमें पर तीखी बहस होती रहती है, तो दूसरी तरफ मीडिया ट्रायल चलता रहता है. तीसरी तरफ सोशल मीडिया के चलते लोग सड़क पर प्रदर्शन भी करते हैं. पर अंततः अदालत रोहण की सजा बरकरार रखती है. हीरल गांधी चैन की सांस लेती है कि उसने जीत हासिल कर अंजली को न्याय दिला दिया. पर कुछ देर में हीरल को अहसास हो जाता है कि न्याय हुआ ही नही.

निर्देशनः

एक कसी हुई पटकथा पर बनी फिल्म ‘‘सेक्शन 375’’ में सिनेमाई स्वतंत्रता कम से कम लेते हुए यथार्थ पर जोर दिया गया है. कोर्ट के अंदर के दृश्य लाजवाब हैं. कहीं कोई मजाक नहीं. अदालत की गरिमा को बरकरार रखा गया है, जबकि अमूमन दूसरी फिल्मों मे अदालतों का मजाक बनाकर रखा जाता रहा है. संजीदा विषय पर एक अति गंभीर फिल्म है, जो दर्शकों को बांधकर रखती है. मगर इसमें मनोरंजन बिलकुल नही है. फिल्म के कुछ संवाद काफी बेहतरीन हैं. फिल्म में अक्षय खन्ना का एक संवाद है- ‘‘हम कानून के व्यवसाय में हैं, न्याय के व्यवसाय में नही है.’’ मगर इस संवाद की ही तरह ज्यादातर संवाद अंग्रेजी भाषा में है. अदालती बहस के दौरान कुछ संवाद ऐसे हैं, जिन्हे आम दर्षक समझ नहीं पाएगा. फिल्म में वकील तरूण स्वीकार करते हैं कि न्याय अमूर्त है और कानून न्याय प्राप्त करने का उपकरण है.

फिल्म के लेखक व निर्देशक इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने बिना किसी लाग लपेट के एक तरफ जहां इस बात का चित्रण किया है कि डाक्टर, पुलिस व वकीलों की सोच के चलते बलात्कार पीड़िता को न्याय मिलने में कठिनाई आती है, वहीं इस ओर भी इशारा किया है कि महिलाएं ‘सेक्शन 375’ का उपयोग पुरूषों से बदला लेने के लिए करती हैं.

फिल्म ‘वयस्क’ प्रमाणपत्र वाली है. इसलिए सिंगल थिएटर में इसे दर्शक मिलने की संभावनाएं कम हैं. महानगरों में मल्टीलैक्स तक ही सीमित रहेगी.

अभिनयः

रेप पीड़िता के किरदार में मीरा चोपड़ा ने काफी सहज अभिनय किया है. उनके चेहरे पर दर्द के भाव साफ झलकते हैं. वकील के किरदार में अक्षय खन्ना और रिचा चड्डा ने जानदार अभिनय किया है. रिचा चड्डा ने बहुत कौशल पूर्ण अभिनय करते हुए बहुत बेहतरीन अभिनय का प्रदर्शन किया है. राहुल भट्ट अपने किरदार में काफी सहज व स्वाभाविक रहे. जजों के किरदार में किशोर कदम और कृतिका देसाई ने काफी अच्छा काम किया है. बीच बीच में किशोर कदम धूर्त हास्य के क्षण भी लाते हैं.

खूबसूरती को कम करती इलेक्ट्रौनिक डिवाइसेज की लाइट

मौजूदा समय में व्यक्ति बहुत सी ऐसी चीजों के संपर्क में आता है, जिससे ब्लू लाइट निकलती है, जैसे एलईडी, सीएफएल, टैबलेट, टेलीविजन और कंप्यूटर. ऐसे में यह साफ है कि लोगों की जिंदगी में लगातार ब्लू लाइट बढ़ती जा रही है, जिसकी वजह से त्वचा पर बुरा असर पड़ रहा है.

खूबसूरती को किसी  की नजर ना लगें  इसके लिए महिलाएं ना जानें क्या क्या करती हैं  पर ये  क्या इतनी  केयर  के बाद  भी  आपकी  सुंदरता  बढ़ने  के बजाये  कम  होती जा रही है.  जी  हां, शायद  आपको पता  नहीं  कि  आप  जो इलेक्ट्रौनिक डिवाइसेज यानि  मोबाइल,  टैब और लैपटौप  का इस्तेमाल  कर  रहीं  हैं  इससे  निकलने  वाली  रौशनी ही आपकी खूबसूरती को  छीन रहीं  है.  इस बारे  में  स्किन  स्पेशलिस्ट डौक्टर  कहते  हैं  कि आज  की  लाइफ  स्टाइल  में  लोग  इलेक्ट्रौनिक डिवाइसेज के बिना  नहीं  रह  सकते, जिसका  नुकसान  उनको  खुद  भुगतना  पड़  रहा  है. देर  रात  तक  लाइट  औफ  करके  मोबाइल  की  रौशनी में कुछ  ना  कुछ पढ़ते  हैं,  जिससे  इन उपकरण से  निकलने  वाली  रौशनी  जहां  खराब  नींद  के लिए  जिम्मेदार है , वहीं मेलाटोनिन हार्मोन के असंतुलन के  लिए भी  जिम्मेदार है.

यू वी किरणों से ज्यादा खतरनाक है

डौक्टरों  के  अनुसार  इलेक्ट्रौनिक डिवाइस से  निकलने  वाली रौशनी सूरज  से  निकलने  वाली  किरणों से  ज्यादा नुकसानदेह है.  ये रौशनी  स्किन  में  रिंकल और हाईपर पिग्में टेशन आदि  का  कारण  बन  रही  हैं. जरनल औफ इन्वेसिटगेटिव डर्मटोलॉजिस्ट में प्रकाशित रिपोर्ट के  अनुसार हमारी स्किन हमेशा सूरज की हानिकारक किरणों के संपर्क  में नहीं  रहती बल्कि चारों ओर  मौजूद  इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज से निकले ब्लू  लाइट  रेडिएशन के संपर्क में  भी  रहती है. लंबे  समय  तक नीली  रौशनी  में रहने  से  स्किन का कलर  खराब  होने,  सूजन  और उम्र  से पहले  एजिंग के  लक्षण नजर  आने  लगते  हैं.

डर्मटोलौजिस्टकहते  हैं  कि लाइट  स्पेक्ट्रम में अल्ट्रावायलेट इंफ्रारेडऔर  विजीबल किरण होती  है.  ब्लू  लाइट  इन विजीबल किरणों का हिससा है,  जिसकी  एनर्जी  वेव लेंथ सबसे  जायदा  होती  है.  ये रौशनी  स्किन  की  संवेदना शील त को बढ़  देती  है,  इससे  मेलेनिन सिंथेसिस बढ़  जाता  है,  जिससे त्वचा  पर पिगमेंटशन होने  लगता  है पर  इसका  असर  तुरंत  नज़र  नहीं  आता मगर लंबे  समय  तक  अगर  इस  रौशनी  के  संपर्क  में  हैं  तो  त्वचा  पर  इसका  प्रभाव  पड़ता  हैं.

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कैसे  रहें  सुरछित

मोबाइल  की  ब्राइटनेस कम  कर  दें.

लाइट  जलाकर  मोबाइल  व  लैपटौप पर काम  करें.

फोन  सेटिंग से  नीली  रौशनी  को  कम  करें.

एलोवेरा  और  मुल्तानी  मिटटी स्किन  पर  लगाएं.

सोने से करीब 2 घंटे पहले इन सभी डिवाइस से दूर रहें.

बार-बार मोबाइल या अन्य डिवाइस को चेक करने की आदत बदलें.

सोते समय अपने मोबाइल को बेड से दूर रखें.

टीवी या लैपटौप पर कोई फिल्म आदि देखने से अच्छा है कि कुछ देर कोई किताब या कुछ और पढ़ें.

टेलीविजन, लैपटौप आदि को बेडरूम से बाहर रखें.

कमरे में सोते समय लाल रंग की लाइट का इस्तेमाल करें.

ब्लू लाइट से बचाने वाले ऐप मोबाइल में इंस्टौल करें.

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अगर आप बहुत देर तक लैपटौप आदि पर काम करते हैं तो अधिकतम 20 मिनट बाद लैपटौप से ध्यान हटाएं और करीब 20 फुट दूर रखी किसी चीज को करीब 20 सेकेंड तक देखें और फिर अपना काम शुरू करें.

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आप अपनी उम्र को तो बढ़ने से नहीं रोक सकतीं, मगर बढ़ती उम्र के असर को जरूर कम कर सकती हैं. सरोज सुपर स्पैश्यलिटी हौस्पिटल की सीनियर डाइटीशियन निधि धवन के मुताबिक हम क्या खाते हैं और कैसे खाते हैं, इस का हमारी सेहत और सक्रियता से सीधा संबंध होता है.

क्या खाएं

– ऐंटीऔक्सीडैंट्स से भरपूर खाना जैसे सूखे मेवे, साबूत अनाज, चिकन, अंडे सब्जियां और फल खाएं. ऐंटीऔक्सीडैंट्स फ्री रैडिकल्स से लड़ते हैं और बुढ़ापे के लक्षणों को धीमा करते है. ये इम्यून सिस्टम मजबूत बना कर संक्रमण से भी बचाते हैं.

– दिन में कम से कम 1 कप ग्रीन टी पीने से उम्र बढ़ने पर याददाश्त ठीक रहती है.

– ओमेगा 3 फैटी ऐसिड्स और मोनो सैचुरेटेड फैट से भरपूर खानेपीने की चीजें जैसे मछली, सूखे मेवे, जैतून के तेल का इस्तेमाल करें, ओमेगा 3 आप को जवां और खूबसूरत बनाता है.

– विटामिन सी शरीर के लिए नैचुरल बोटोक्स के समान कार्य करता है. इस से स्किन टिश्यू हैल्दी रहते हैं और झुर्रियां नहीं पड़तीं. इस के लिए संतरा, मौसंबी, पत्तागोभी आदि खाएं.

– अगर कुछ मीठा खाने का मन करे तो गहरे रंग की चौकलेट खाएं. यह फ्लैवेनोल से भरपूर होती है जो ब्लड सर्कुलेशन सही रखने में सहायता करता है.

– दोपहर के खाने के साथ एक कटोरी दही जरूर खाएं. इस में कैल्सियम होता है जो औस्टियोपोरोसिस की परेशानी से बचाता है.

– युवा और सक्रिय रहना चाहती हैं तो ओवर ईटिंग से बचें. आप को जितनी भूख है उस का 80% खाएं.

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क्या न खाएं

– खानेपीने की जिन चीजों से खून में शुगर का स्तर बढ़ जाता है. मीठे फल, जूस, चीनी आदि कम खाएं.

– सोयाबीन, कौर्न, कनोला औयल से बचें, क्योंकि इन में पौली सैचुरेटेड वसा अधिक मात्रा में होती है. जैतून के तेल का सेवन करें.

– लाल मांस, पनीर, फुल फैट दूध और क्रीम में अत्यधिक मात्रा में सैचुरेटेड फैट होता है. इस से दिल की धमनी ब्लौक हो सकती है.

– सफेद ब्रैड, पास्ता, पिज्जा आदि कम खाएं.

डा. निधि कहती हैं, ‘‘मोटापे और कैलोरी इनटेक में सीधा संबंध है. मोटापा बढ़ने से न केवल सेहत खराब होगी, बल्कि शारीरिक सक्रियता भी घटेगी.’’

जीवनशैली में बदलाव

जेपी हौस्पिटल, नोएडा की डा. करुणा चतुर्वेदी के मुताबिक अपनी रोजमर्रा की आदतों में ये छोटेछोटे बदलाव ला कर हम लंबे समय तक युवा और सक्रिय रह सकते हैं:

– अपने दिमाग को हमेशा व्यस्त रखें. कुछ नया सीखती रहें ताकि दिमाग सक्रिय रहे.

– अपने हारमोन स्तर पर नियंत्रण रखें ताकि आप एजिंग से जुड़े लक्षणों से दूर रह सकें.

– कम से कम 6-7 घंटे जरूर सोएं. जब आप सो रही होती हैं तो त्वचा की कोशिकाएं अपनी मरम्मत करती हैं जिस से त्वचा की झुर्रियां और फाइन लाइंस दूर हो जाती है.

– आप चीजों को किस नजरिए से देखती हैं यह भी महत्त्वपूर्ण है. हर चीज के सकारात्मक पहलू को देखें, अपनेआप को खुश और मोटिवेटेड रखें.

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त्वचा को जवां और सुरक्षित रखें

– धूप में जाने से त्वचा का रंग काला पड़ जाता है. फिर काले हिस्सों पर झुर्रियां जल्दी पड़ती हैं. इसलिए बाहर जाने से पहले सनस्क्रीन का इस्तेमाल जरूर करें.

– त्वचा को स्वस्थ व हाइड्रेटेड बनाए रखने के लिए त्वचा के अनुसार नौनटौक्सिक मौइश्चराइजर चुनें. सोने से पहले इसे जरूर लगाएं.

फेशियल ऐक्सरसाइज

चेहरे की पेशियों की कसरत चेहरे को झुर्रियों से बचाती है. माथे को झुर्रियों से बचाने के लिए अपने दोनों हाथों को माथे पर रखें और उंगलियों को हेयरलाइन और भौंहों के बीच फैला लें. धीरेधीरे उंगलियों को हलके दबाव के साथ बाहर की ओर खिसकाएं.

कुछ फेशियल ऐक्सरसाइज

चीकू लिफ्ट: अपने होंठो को हलके से बंद करें और गालों को आंखों से बंद करें और गालों को आंखों की ओर खींचने की कोशिश करें. चौड़ी मुसकान के साथ अपने होंठों के बाहरी कोनों को उठाएं. कुछ समय इसी मुद्रा में रहें. मुसकराना गालों के लिए अच्छा व्यायाम है.

फिश फेस: यह गालों और जबड़ों के लिए अच्छा व्यायाम है. इस से आप के होंठ सही शेप में आ जाते हैं. हलके से होंठ बंद करें. गालों को जितना हो सके भीतर की ओर खींचे. इसी मुद्रा में मुसकराने की कोशिश करें और 15 सैकंड्स तक इसी मुद्रा में रहें. इसे 5 बार दोहराएं.

पपेट फेस: यह व्यायाम पूरे चेहरे पर काम करता है. यह गालों की पेशियों को मजबूत बनाता है, जिस से वे ढीली नहीं पड़तीं. अपनी उंगलियों के पोरों को गालों पर रखें और मुसकराएं. गालों को ऊपर की ओर खींचे और मुसकान की मुद्रा में कुछ समय तक रहें.

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कीटो डायट: ऐसे बनाएं पनीर सूप

पनीर सूप एक बेहद आसान डिश है. इसमें पत्ता गोभी, पनीर के क्यूब्स और पत्तागोभी से बनाया जाता है. इसके अतिरिक्त कुछ मसालों का भी इस्तेमाल किया जाता है. आगर आप कीटो डायट पर हैं तो इस सूप को जरूर ट्राई करें. तो चलिए जानते हैं इस सूप के बनाने की रेसिपी.

सामग्री

वेजिटेबल औइल- 1 चम्मच

सरसों के दाने- आधा चम्मच

काली मिर्च – 2 चम्मच

कुटी अदरक – 1 चम्मच

कुटा लहसुन – 1 चम्मच

पनीर क्यूब्स-  200 ग्राम

बारीक कटी पत्ता गोभी-  आधा कप

करी पत्ता 6

नमक चुटकी भर

पानी 4 कप

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बनाने की वि​धि

सबसे पहले एक पैन में तेल गर्म करें और फिर उसमें सरसों के दाने डाल दें.

जब सरसों तड़कने लगे तो उसमें करी पत्ता, बारीक कटा अदरक-लहसुन डालकर कुछ सेकंड्स के लिए फ्राई करें.

अब इसमें पनीर डालकर अच्छे से मिक्स करें औऱ फिर इसमें 4 कप पानी, नमक, काली मिर्च और बारीक कटी पत्ता गोभी डालें और अच्छी तरह से मिक्स करें.

ढक्कन से कवर करके सूप को करीब 10 मिनट तक धीमी आंच पर पकाएं.

अब आपका सूप रेडी है इसे गर्मा गर्म सर्व करें.

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