मेंटल डिसऔर्डर को लेकर आज भी भारत में बहुत कम जागरूकता है. इस वजह से अक्सर इलाज तब शुरू हो पाता है, जब स्थिति काफी बिगड़ जाती है. हाल ही में हुए एक अध्ययन में यह सामने आया है कि घातक बीमारियों की तुलना में दिमागी तनाव ज्यादा खतरनाक है. इस अध्ययन में पाया गया कि लोग एचआईवी, टीबी और डायबिटीज जैसी घातक बीमारियों की वजह से कम, लेकिन डिप्रेसिव डिसऑर्डर के कारण ज्यादा बीमार पड़ रहे हैं और इससे उनकी मौत भी हो रही है. एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में बीमारियों की वजह से हो रही मौतों में से 40 प्रतिशत हिस्सेदारी दिमागी डिसऑर्डर से जुड़ी है.

दिमाग से जुड़े विकार विभिन्न प्रकार के होते है. आम व्यक्ति को भी कुछ छोटे-मोटे दिमागी विकार हो सकते हैं, जिसे आमतौर पर सामान्य मान कर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं कि वे सामान्य ही हों. कई बार कुछ सामान्य सी दिखने वाली आदतें भी मेंटल डिसऑर्डर की ओर इशारा करती हैं. भारत में हजारों-लाखों लोग मानसिक रोग का शिकार हैं और इसका असर उनके साथ- साथ उनके परिचितों पर भी पड़ता है. देखा गया है कि हर चौथे इंसान को कभी-न-कभी मानसिक रोग होता है. दुनिया-भर में इस रोग की सबसे बड़ी वजह है, तनाव और निराशा. मानसिक रोग किसी को भी हो सकता है, फिर चाहे वह आदमी हो या औरत, जवान हो या बुजुर्ग, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, या चाहे वह किसी भी संस्कृति, जाति, धर्म या तबके का हो. अगर मानसिक रोगी अच्छी तरह अपना इलाज करवाए, तो वह ठीक हो सकता है. वह एक अच्छी और खुशहाल जिन्दगी जी सकता है. लेकिन ज्यादातर केस में लोगों को लम्बे समय तक यह पता ही नहीं चल पाता कि वे मानसिक रोग का शिकार हैं. जब उन्हें पता चलता है तब वे काउंसलिंग करवाने से डरते हैं कि दूसरे लोग उन्हें पागल समझेंगे और इस तरह समस्या बढ़ जाती है. मानसिक रोग से जुड़ी एक संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल अमेरीका में 8 से 15 साल की उम्र के जिन बच्चों को मानसिक रोग था, उनमें से करीब 50 प्रतिशत बच्चों का इलाज नहीं करवाया गया और 15 से ऊपर की उम्र के करीब 60 प्रतिशत लोगों का इलाज नहीं हुआ.

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