बहुत दिनों के बाद मेरा कानपुर अपने मायके आना हुआ था. पहले मैं बनारस में थी तब तो महीने-दो महीने में आ जाती थी, मगर जबसे पति के साथ देहरादून शिफ्ट हुई तब से कानपुर आना-जाना बहुत कम हो गया था. भईया तो पढ़ने के लिए वियतनाम गये, तो फिर वहीं के होकर रह गये. शादी भी वहीं कर ली और घर भी वहीं ले लिया,  पीछे से मां और पिताजी कानपुर में अकेले रह गये.

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