बहुत दिनों के बाद मेरा कानपुर अपने मायके आना हुआ था. पहले मैं बनारस में थी तब तो महीने-दो महीने में आ जाती थी, मगर जबसे पति के साथ देहरादून शिफ्ट हुई तब से कानपुर आना-जाना बहुत कम हो गया था. भईया तो पढ़ने के लिए वियतनाम गये, तो फिर वहीं के होकर रह गये. शादी भी वहीं कर ली और घर भी वहीं ले लिया,  पीछे से मां और पिताजी कानपुर में अकेले रह गये.

भईया कभी पांच-छह साल में कुछ हफ्तों के लिए आते भी हैं, तो यहां के माहौल में रह पाना उनके लिए काफी कष्टकारी हो जाता है. धूल भरी टूटी-फूटी सड़कें, हर वक्त बिजली जाने की समस्या, प्रदूषित पानी और हवा, उनके लिए तो यहां हफ्ता काटना भी मुश्किल हो जाता है. मैं ही साल छह महीने में एकाध बार चक्कर लगा जाती थी. अक्सर फोन पर ही बात कर लेती थी मां से, मगर फोन पर वह अपना दुखड़ा क्या रोती. अकेलापन दोनों के जीवन में गहरे बस गया था. सत्तर साल की उम्र तो पार हो चुकी थी, बची हुई बस किसी तरह काट रहे थे.

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उन्हें अकेला देखकर मुझे बड़ा बुरा महसूस होता था. मैं भी यहां उनके पास ज्यादा दिन तो रह नहीं पाती थी. अपने घर में भी बूढ़े सास-ससुर थे. बच्चे थे, पति था, जिनकी सारी जिम्मेदारी मेरे ही कंधों पर थी. मगर अपने मां-पिता का अकेलापन भी मुझे सालता रहता था.

अबकी बार आयी तो देखा कि दोनों काफी दुबले और कमजोर हो गये हैं. पापा का शुगर काफी बढ़ा हुआ था और कमजोरी बहुत थी. मां की भी कमर झुक गयी थी. बड़ी मुश्किल से रसोई में कुछ काम कर पा रही थीं. एक नौकरानी थी जो सुबह आकर दोनों वक्त का खाना पका जाती और झाड़ू-बरतन कर जाती थी. जिस दिन नहीं आती थी, दोनों ब्रेड खाकर गुजारा करते थे.

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