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छोटी सरदारनी: अपना बच्चा या सरब और परम, किसे चुनेगी मेहर?

शो ‘छोटी सरदारनी’ में हरलीन को पता चल चुका है कि मेहर के पेट में पल रहा बच्चा सरब का नहीं है, जिसके कारण वो मेहर के खिलाफ हो गई है. तो आइए आपको बताते हैं क्या होगा अपकमिंग एपिसोड में…

हरलीन ने मारा मेहर को थप्पड़

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पिछले एपिसोड में आपने देखा कि मेहर घर पहुंचकर हरलीन से बात करने की कोशिश करती है, लेकिन हरलीन उसे थप्पड़ मार देती है. वहीं हरलीन सरब को बताती है की मेहर के पेट में पल रहा बच्चा सरब का नही है, लेकिन सरब हरलीन से कहता है कि उसे मेहर की प्रेग्नेंसी का सच पता है.

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गुस्से में हरलीन जाएगी कुलवंत कौर के घर

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मेहर की सच्चाई जानने के बाद हरलीन गुस्से में है, जिसके चलते वह मेहर की मां यानी कि कुलवंत कौर के घर चली जाती है. वहीं जब ये बात सरब को पता चलती है तो उसे बेहद बुरा लगता है.

मेहर को चेतावनी देगी हरलीन

मेहर की प्रेग्नेंसी के बारे में जानने के बाद हरलीन, मेहर के बच्चे को अपनाने से मना कर देगी. इसी के साथ हरलीन मेहर को एक चेतावनी देगी कि 9 दिन में फैसला करे कि या तो वह अपने पेट में पल रहे बच्चे का अबौर्शन करा ले या फिर सरब और परम की जिंदगी से दूर चली जाए.  

किसे चुनेगी मेहर

अब देखना ये है कि मेहर किसे चुनती है. अपने पेट में पल रही मानव की आखिरी निशानी को या सरब और परम को? जानने के लिए देखते रहिए ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवार, रात 7:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

जेनिफर विंगेट ने क्रिसमस डे से पहले ही उठाया क्रिसमस पार्टी का मजा

क्रिसमस पार्टी की तस्वीरें खुद जेनिफर ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट से शेयर भी की इन फोटोज को देख के लग रहा है कि जेनिफर विंगेट और उनके दोस्तों ने इस पार्टी में खूब मस्ती और धमाल किया है. पार्टी में केक कटिंग, डांसिंग, सिंगिंग और गेमिंग सेशन को भरपूर एंजौय किया. पार्टी की फोटो शेयर करते हुए जेनिफर ने सभी लोगों को क्रिसमस की बधाई दी.

आपको बता दें जेनिफर की क्रिसमस पार्टी में सीरियल ‘बेपनाह’ और ‘बेहद’ में उनके साथ काम कर चुके कई एक्टर्स शामिल हुए. जैसे हर्षद चोपड़ा और सेहबान अजीम आदि.

इस पार्टी में अगर बेस्ट लुक की बात करें तो जेनिफर का लुक लाजवाब था. उन्होंने दो तरह की आउटफिट्स पहने थे. पहली शिमरी ग्रीन शार्ट ड्रेस है जो फुल बाजू की है और दूसरी शिमरी रेड कलर की स्लीवलेस शार्ट ड्रेस है इन शौर्ट ड्रेसेज में जेनिफर हमेशा की तरह बहुत खूबसूरत लग रही थीं. रेड ड्रेस के साथ राउंड ब्लैक गॉगल्स में उनकी फोटो बहुत मस्त लग रही है.

जेनिफर विंगेट के वर्क फ्रंट की बात करें तो इन दिनों वह टीवी सीरियल बेहद 2 को लेकर सुर्खियों में है क्योंकि उनका माया का किरदार काफी रहस्यमयी और खतरनाक दिख रहा है. जिसे लोग बहुत पसंद कर रहे है. इस सीरियल में उनके साथ शिविन नारंग और आशीष चौधरी लीड रोल में हैं.

स्कूलकालेजों में ड्रैसकोड : बच्चे और टीचर भी परेशान

स्कूल का ध्यान आते ही याद आती है यूनिफौर्म. चिलचिलाती गरमी के दिन हों या उमसभरे बारिश के, या फिर ठिठुरती सर्दी. यूनिफौर्म की पकड़ से बच्चे तभी आजाद हो सकते हैं जब कालेज में पहुंचें. लेकिन क्या हो अगर कालेज में भी आप को यूनिफौर्र्म पहना दी जाए? और तो और, जब आप खुद टीचर बन कर स्कूल या कालेज में पढ़ाने पहुंचें तब भी यदि यूनिफौर्म आप का पीछा न छोड़े तो?

यह सीन आजकल काफी आम है. एक तरफ कालेज का नाम सुन कर याद आता है रंगीन वातावरण जैसा करण जौहर की फिल्मों में दिखाया जाता है. वहीं, दूसरी ओर आजकल इंजीनियरिंग कालेज हो या मैनेजमैंट कालेज, यूनिफौर्म या यों कहें कि डै्रसकोड लागू रहता है. विश्वविद्यालयों की छात्राओं को जबतब सही डै्रसकोड की लिस्ट का सामना करना पड़ता है.

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तमिलनाडु के कालेज की छात्राओं को टीशर्ट पहनने पर बैन लगा कर सलवार, कमीज, दुपट्टा पहनने का फरमान मिला तो मीनाक्षी का कहना था कि जींसटौप में गरमी से काफी राहत मिलती है. उमा भी डै्रसकोड के सख्त खिलाफ दिखी. उस का प्रश्न था कि केवल लड़कियों के कपड़ों से ही हमारी संस्कृति को खतरा क्यों होता है? मुंबई के नालंदा ला कालेज के डै्रसकोड को विद्यार्थियों ने तालिबान स्टाइल कह कर पुकारा.

छात्रों का कहना था कि अपना कैरियर बनाने आए विद्यार्थी शिक्षा पर ध्यान देते हैं न कि फैशन पर. फिर क्यों प्राधिकारी शिक्षाप्रणाली पर ध्यान न दे कर अपना समय और ऊर्जा डै्रसकोड पर व्यर्थ गंवाते हैं. और तो और, कितने ही स्कूलों व कालेजों में शिक्षकों के लिए भी डै्रसकोड निर्धारित है. हालांकि, अकसर महिला शिक्षकों को ही डै्रसकोड के नियमों का पालन करना पड़ता है, उस पर सिलवाने का खर्च भी खुद को ही उठाना पड़ता है. कभी महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर तो कभी संस्कृति के, कभी कौर्पोरेट वर्ल्ड के लिए अपने स्टुडैंट्स को तैयार करने के नाम पर तो कभी अनुशासन लाने के बहाने, डै्रसकोड को अकसर शैक्षिक संस्थान सही ठहराते रहते हैं.

लगता है ड्रैसकोड की बात अब स्कूल और कालेज से निकल कर औफिस में भी पहुंच गई है. इंडिया टुडे की संवाददाता शालिनी लोबो ने खबर दी कि  सरकारी दफ्तरों में कर्मचारी कैजुअल कपड़े न पहन कर आएं, इसलिए कि हाल ही में तमिलनाडु सरकार ने नया डै्रसकोड लागू किया है. इस के तहत महिलाएं साड़ी या सलवार, कमीज व दुपट्टा और पुरुष शर्टपैंट या वेस्टी पहन कर काम पर आ सकते हैं.

डै्रसकोड की वकालत करने वाले यूनिफौर्म को सुव्यवहार और अनुशासन से जोड़ कर देखते हैं. उन का मानना है कि एक से कपड़े पहनने से बच्चों में एकता की भावना जन्म लेती है. वे एकदूसरे से भेदभाव नहीं करते, गुटबाजी नहीं करते, सुव्यवहार सीखते हैं और उन का ध्यान फैशन की ओर भी नहीं भटकता. लेकिन, डै्रसकोड की पैरवी करने वालों को यह सम झना चाहिए कि अनुशासन कपड़ों तक सीमित नहीं होता. अनुशासन का दर्पण होता है बरताव, और इस पर यूनिफौर्म का कोई असर नहीं होता.

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आड़े आता ड्रैसकोड

डै्रसकोड से बच्चे चिढ़ते हैं, विद्रोह करने की सोचते हैं. उन्हें इस बात से नाराजगी होती है कि स्कूलकालेज उन के कपड़ों की चौइस पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं. हमारे देश में सब को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, किंतु हम अपनी नई पीढ़ी को उसी की इच्छा से कपड़ों का चयन करने के मौलिक अधिकार से वंचित रखते हैं

रेयान इंटरनैशनल स्कूल की छात्रा आरुषि का कहना है, ‘‘मेरे कपड़े मेरे व्यक्तित्व को व्यक्त करते हैं. सब बच्चों को एकजैसे कपड़े पहना देने से सब का व्यक्तित्त्व न तो एकजैसा बन सकता है और न ही ऐसा करना वांछनीय है. समाज में रचनात्मकता को बढ़ावा देने से ही हम उन्नति की ओर बढ़ेंगे. मेरी दृष्टि में शैक्षिक संस्थान अधिगम, ज्ञान और सुबोध के परिचायक होते हैं. वहां अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए.’’

देहरादून के प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज की लैक्चरर इंदु मेहरा डै्रसकोड के पीछे की मानसिकता पर सवाल उठाते हुए पूछती हैं कि भारतीय समाज में यूनिफौर्म समानता कैसे ला सकती है, यहां तो हर कोई दूसरे से जातपांत, रंगसंस्कार में भिन्न है. क्या एकजैसे डै्रसकोड के माध्यम से हमारे सदियों पुराने सांस्कृतिक भेदभाव को ढक पाना इतना आसान है? ऊपर से गरीब परिवार के बच्चे डै्रसकोड का ऐक्सट्रा खर्र्च उठाने में कई बार कसमसा जाते हैं.

यूनिफौर्म नहीं होती कंफर्टेबल

स्कूलकालेज या फिर औफिस में कई घंटों तक बैठना पड़ता है. ऐसे में यूनिफौर्म कभी भी उतनी कंफर्टेबल नहीं हो सकती. अकसर यूनिफौर्म सिंथैटिक कपड़े या फिर पौलीकौटन से बनाई जाती है. कभी स्कर्ट के ऊपर ट्यूनिक की ऐक्सट्रा लेयर तो कभी जैकेट. उस पर टाई. भारतीय मौसम के लिए ऐसे डै्रसकोड कतई उपयुक्त नहीं होते. बेचारे बच्चे गरमी के दिनों में पसीनेपसीने हुए रहते हैं तो सर्दी में ठिठुरते रहते हैं. उस पर डै्रसकोड की डिजाइन ऐसी बनाई जाती है जो हर शारीरिक संरचना पर फिट बैठे, तो हर अलग शरीर की कदकाठी की सुंदरता को उभारने में निश्चित ही वह असफल रहती है.

डै्रसकोड का धंधा

यूनिफौर्म को सिलवाने में अलग खर्चा आता है. मीरा के 2 बच्चे हैं. एक इंटरनैशनल स्कूल में पढ़ता है, दूसरा प्राइवेट कालेज में. ‘‘रोजाना पहनने के कपड़ों के अलावा हर स्कूलकालेज की अलग यूनिफौर्म सिलवाओ. बढ़ते बच्चों के पैंटजूते जल्दीजल्दी छोटे होते रहने के कारण बेकार हो जाते हैं. ऊपर से हर मौसम में कुछ न कुछ अलग, जैसे बारिश में रेनकोट जरूर खरीदो तो सर्दी में ब्लेजर. अधिकतर स्कूलकालेज अपनी ही दुकानों से यूनिफौर्म खरीदने की शर्त रखते हैं, जो मनमाने दामों पर यूनिफौर्म बेचती हैं. जो रिबन बाहर बाजार में 10 रुपए का आता है वह स्कूल द्वारा निश्चित दुकान पर 20 रुपए का मिलता है. फिर हर बच्चे का अलग पीटी हाउस रख देते हैं तो बड़े बच्चे की यूनिफौर्म छोटा भाईबहन नहीं उपयोग कर सकता है. उस पर आजकल स्कूल हर दूसरे सैशन में यूनिफौर्म के रंग में या फिर डिजाइन में थोड़ाबहुत फेरबदल कर डालते हैं ताकि पूरा सैट बारबार खरीदना पडे़. सब चोरबाजारी है पैसा कमाने की.’’

लोग अपने बच्चों को प्राइवेट एजुकेशन इंस्टिट्यूट्स में इस उम्मीद में भेजते हैं कि वे वहां अपना भविष्य बनाएंगे, अपनी अलग पहचान, अपने विचार, अपने जीवन को सुगम बनाना सीखेंगे. यूनिफौर्म बेचने पर ध्यान देने के बजाय मैनेजमैंट को अपनी शिक्षा की गुणवत्ता को केंद्र में रखना चाहिए.

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नहीं चाहिए ड्रैसकोड

सैंट थौमस स्कूल का एक छात्र प्रणव कहता है, ‘‘हमारी क्लास के बच्चे कहते हैं, ‘रूल्स आर मैट टु बी ब्रोकन.’ इसीलिए तो यूनिफौर्म की जबरदस्ती के कारण बच्चे रिबेल बनते हैं, अपनी मरजी करना चाहते हैं, नियमों को ताक पर रखने की कोशिश करते रहते हैं. ड्रैसकोड के बजाय प्रबंधन अगर प्रोफैशनल एटिट्यूड व अटायर पर फोकस करें तो कितना अच्छा होगा.’’

यदि छात्रछात्राओं ने बगावत करने की ठान ली तो अध्यापक के टोकने का असर भी बेमानी हो जाता है. एक नामीगिरामी महानगरीय स्कूल के टीचर बताते हैं कि कैसे उन्हें लड़कों को बारबार शर्ट के ऊपर के बटन बंद करने के लिए टोकना पड़ता है. कभी टाई ढीली कर, कभी एक तरफ से शर्ट को पैंट से बाहर निकाल कर तो कभी जैल से बालों में स्पाइक बना कर, लड़के उन की नाक में दम किए रहते हैं. लड़कियों को टोकना और भी मुसीबत का काम है. वे अकसर अपनी स्कर्ट को बैल्ट की तरफ से गोल घुमा कर ऊंचा कर लेती हैं और टोकने पर मुंह बिचका कर खुसफुसाती हैं कि सर को क्या जरूरत है हर टाइम हमारी टांगों की ओर देखने की.’’

दुनिया की राय

चेक रिपब्लिक की टैक्निकल यूनिवर्सिटी औफ ओस्ट्रावा के जोसफ पंकोचर का मानना है कि अनुशासन दिमाग में होना जरूरी है, कपड़ों में नहीं. विद्यार्थियों या शिक्षकों की यूनिफौर्म की जगह साफसुथरे और स्वयं पर फबने वाले कपड़े होने चाहिए.

कैनेडा की साइमन फ्रेजर यूनिवर्सिटी में शिक्षिका मोनिका भट्टाचार्य का मत है कि कपड़े पहनने की आजादी के पीछे कई सारे पहलू होते हैं. मसलन, मौसम, क्लासरूम, जिम, साइंस लैब, फील्डट्रिप या फिर स्कूल का इमोशनल क्लाइमेट. निजी तौर पर मोनिका आराम को अदब से ज्यादा महत्त्व देती हैं. वे मानती हैं कि शिक्षकों को  झीनेपारदर्शी या फिर बदनदिखाऊ कपड़े नहीं पहनने चाहिए. जींसटीशर्ट सब से आरामदेह पोशाक है, लेकिन इतनी सम झ पहनने वाले में होनी चाहिए कि फौर्मल या स्पैशल अवसरों पर इन्हें न पहनें.

हौलैंड के निवासी जेडन बराका इस बात से आश्चर्यचकित होते हैं कि लोग डै्रसकोड और अनुशासन को जोड़ कर देखते हैं. वे कई इंग्लिश स्कूलों में पढ़ा चुके हैं और कहीं भी डै्रसकोड के कारण अनुशासन पर कोई सकारात्मक असर नहीं देख पाए. डच स्कूलों में यूनिफौर्म का कौन्सैप्ट नहीं होता. डच लोगों को ड्रैसकोड नहीं भाता. उन के देश में ड्रैसकोड के माध्यम से निजता पर प्रहार नहीं सहा जाएगा.

जरमनी के रिसर्चर यू दरेएयर बताते हैं कि उन के देश के स्कूलों में पिछले 40 वर्षों से डै्रसकोड का कोई रिवाज नहीं है. ‘स्कूल लुक’ के नाम पर केवल उन्हीं ड्रैसेस की मनाही है जो बहुत महंगी या ऊंचे डिजाइनर्स की होती हैं. बच्चे कैजुअल कपड़े पहन कर पढ़ने जाते हैं. ऐसे ही अमेरिका में भी करीब 80 प्रतिशत स्कूलों में ड्रैसकोड का चलन नहीं है.

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एक मत यह भी है कि एक जमाने में कामगार पहले पढ़ने जाते थे, फिर वहीं से काम करने के लिए फैक्ट्री जाया करते थे. इसलिए वे ड्रैस पहन कर ही स्कूल जाते थे ताकि घर लौट कर कपड़े बदलने में समय व्यर्थ न हो. ऐसा प्रतीत होता है जैसे हमारी शिक्षाव्यवस्था अभी भी फैक्ट्री प्रणाली पर ही आधारित है. क्या करें, हमारा देश किसी भी बदलाव को अपनाने में इतना हिचकता जो है.

रैजिमैंटेशन का एक तरीका ड्रैसकोड है जो पुलिस और सेना की तरह ऊपर वाले का आदेश मानने को तैयार करता है और अलग सोच, अलग व्यवहार व अलग रास्ता अपनाने से रोकता है. धर्म में भी ड्रैसकोड है और धार्मिक स्कूलों की ही देन यह ड्रैसकोड है जो आज स्कूलों में फैल गया और अब सरकार में फैल रहा है.

एक थप्पड़ के बदले 2 हत्याएं : भाग 1

इंसानी दिमाग की फितरत को समझ पाना आसान नहीं होता. भ्रमित व्यक्ति अगर गुस्से में प्रतिशोध लेने की ठान ले तो वह किसी भी हद तक जा सकता है. दिलीप उर्फ दीपा की मिसाल सामने है. उस की करतूत..

सौरभ गुप्ता जब डा. दीपक गुप्ता के घर पहुंचे तब उन के होंठों पर भावभीनी मुसकराहट थी और मन में प्रसन्नता. जिस गली में डा. गुप्ता का घर था, उस में लोगों की आवाजाही थी. कहीं भी ऐसा कुछ नहीं था जो अजीब सा लगे.

सौरभ ने डा. दीपक गुप्ता का दरवाजा खटखटाया लेकिन दरवाजा नहीं खुला. न ही अंदर कोई प्रतिक्रिया हुई. इस पर सौरभ ने धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया.

दरवाजे के अंदर डा. दीपक का 2 साल का बेटा दिवित जिसे प्यार से सब लाला कहते थे, खड़ा था. उस के दोनों हाथ व कपड़े खून से रंगे हुए थे. घर में सन्नाटा पसरा था. सौरभ ने किसी अनहोनी की आशंका से जैसे ही मकान में प्रवेश किया, तो सामने ही डा. गुप्ता की 70 वर्षीय मां शिवदेवी की लाश पड़ी थी.

घबराहट में सौरभ की नजर कमरे में गई तो वहां दीपक के बड़े भाई अमित की 35 वर्षीय पत्नी रानी गुप्ता की खून से लथपथ लाश नजर आई. चारों ओर खून फैला हुआ था. यह मंजर देख सौरभ का कलेजा कांप उठा और मुंह से चीख निकल गई.

इस बीच बालक दिवित दरवाजे से बाहर निकल गया था. मकान के बगल में ही चूड़ी का कारखाना था. कारखाने में लोग काम कर रहे थे. चूड़ी के गोदाम पर बैठे रामू गुप्ता की नजर दिवित पर गई तो उस के हाथों और कपड़ों पर खून देख कर उन्हें लगा कि उसे शायद गिरने से चोट लग गई है.

उन्होंने दिवित को गोद में उठा लिया और उस की चोट तलाशने लगे. तभी सौरभ चीखते हुए घर के बाहर आए. उन के शोर मचाने पर आसपास के लोग आ गए.

यह बात 8 अगस्त, 2019 की है. घटना का समय साढ़े 11 बजे. घटनास्थल दुनिया भर में कांचनगरी के नाम से प्रसिद्ध फिरोजाबाद का मोहल्ला नया रसूलपुर. सौरभ गुप्ता डा. दीपक के दोस्त थे और उन से मिलने आए थे.

डा. प्रदीप गुप्ता के घर के बाहर एकत्र लोगों को लगा कि हत्या करने के बाद बदमाश शायद छत पर चढ़ कर छिप गए होंगे, इसी आशंका के चलते लोग लाठीडंडे ले कर मकान की छत पर गए, लेकिन वहां कोई नहीं मिला.

यह मकान शहर के नामचीन बालरोग विशेषज्ञ डा. एल.के. गुप्ता का पैतृक मकान था, जिस में उन के तीसरे नंबर के भाई डा. दीपक गुप्ता अपनी पत्नी, बेटे, दूसरे नंबर के भाई अमित गुप्ता, उन की पत्नी रानी और मां शिवदेवी के साथ रहते थे.

डा. एल.के. गुप्ता अपने परिवार और वृद्ध पिता डा. वेदप्रकाश के साथ शहर के ही मोहल्ला नई बस्ती में रहते थे. उन का सब से छोटा भाई पिंटू भी उन्हीं के साथ रहता था.

सौरभ ने फोन कर के घटना की जानकारी डा. दीपक गुप्ता व उन के बड़े भाई डा. एल.के. गुप्ता को दे दी. साथ ही उन्होंने घटना की सूचना देने के लिए थाना रसूलपुर के थानाप्रभारी बी.डी. पांडे को देने की कोशिश की, लेकिन उन का मोबाइल स्विच्ड औफ था. इस पर उन्होंने 100 नंबर पर काल की. लेकिन कई बार नंबर डायल करने के बाद भी काल रिसीव नहीं की गई.

अंतत: उन्होंने यह सूचना एसएसपी सचींद्र पटेल को दे दी. एसएसपी के निर्देश पर दोपहर करीब 12 बजे एसपी (सिटी) प्रबल प्रताप सिंह, सीओ (सिटी) इंदुप्रभा सिंह पुलिस टीम के साथ मौकाएवारदात पर पहुंच गए.

जब यह सूचना डा. एल.के. गुप्ता को मिली, तब वह और उन की पत्नी डा. नीता गुप्ता मैडिकल कालेज, फिरोजाबाद में मरीजों को देख रहे थे. आननफानन में डा. एल.के. गुप्ता पत्नी के साथ पैतृक घर पहुंच गए. कुछ देर में अन्य घर वाले भी वहां जा पहुंचे.

पुलिस ने घटनास्थल को पीला फीता लगा कर सील कर दिया ताकि सबूतों से किसी तरह की छेड़छाड़ न की जा सके. इस के बाद थानाप्रभारी बी.डी. पांडे भी पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. मामले की गंभीरता को देखते हुए एसएसपी सचींद्र पटेल व एसपी (ग्रामीण) राजेश कुमार भी आ गए थे.

फोरैंसिक टीम को भी मौके पर बुला लिया गया था. दिनदहाड़े हुए इस डबल मर्डर की खबर कुछ ही देर में पूरे इलाके में फैल गई. देखते ही देखते मौके पर लोगों की भारी भीड़ एकत्र हो गई.

लोगों के आक्रोश व भीड़ बढ़ती देख किसी अनहोनी की आशंका से अधिकारियों को फिरोजाबाद के थाना दक्षिण, थाना उत्तर व थाना लाइनपार के अलावा जिले के अन्य थानों से भी फोर्स मंगानी पड़ी. सूचना पर सीओ (टूंडला) डा. अरुण कुमार सिंह, सीओ (सिरसागंज) संजय वर्मा भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने शवों का निरीक्षण किया तो पता चला दोनों महिलाओं की हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. कमरे में रानी का शव पड़ा था. शव के पास ही सोने की चूड़ी, हथौड़ा व चाकू पड़ा मिला. दोनों महिलाओं की हत्या गला रेत कर की गई थी. रानी के पैरों के पास ही सास शिवदेवी का शव पड़ा था. उन के पैर कमरे के बाहर आंगन में थे.

निरीक्षण के दौरान यह बात भी सामने आई कि खुद को हत्यारे से बचाने के लिए सासबहू ने काफी संघर्ष किया था क्योंकि दोनों के गले कटे होने के अलावा उन के शरीर पर भी कई जगह चोट के निशान थे. घटनास्थल के हालात देखने से लग रहा था कि रानी की हत्या पहले हुई. उस समय सास शिवदेवी ऊपर वाले कमरे में रही होंगी. ऊपर की मंजिल पर पड़े लोहे के जाल के पास लगे नाली के पाइप पर भी खून लगा था.

पुलिस का अनुमान था कि शिवदेवी के सिर पर पहले हथौड़े से प्रहार किया गया, बाद में उन्हें घसीटते हुए नीचे लाया गया. नीचे ला कर उन की भी गला रेत कर हत्या कर दी गई. घर में चारों तरफ खून फैला हुआ था.

नीचे वाले कमरे में पलंग के पास रखी अलमारी खुली हुई थी और उस का सामान बिखरा पड़ा था. मकान के ऊपर वाले हिस्से में सीढि़यों के बाईं तरफ वाले कमरे में रखी अलमारी भी टूटी हुई थी. उस का सामान भी बिखरा पड़ा था. दूसरे कमरे में रखी अलमारी का केवल हैंडल टूटा था. अनुमान था कि इस अलमारी को भी खोलने का प्रयास किया गया था, लेकिन हत्यारे सफल नहीं हो सके थे.

इस बीच फोरैंसिक टीम ने अलमारी व अन्य स्थानों से फिंगरप्रिंट व अन्य साक्ष्य एकत्र किए. घर वालों ने बताया कि मकान के ऊपरी हिस्से में छोटा भाई डा. दीपक गुप्ता, उन की पत्नी डा. दीप्ति गुप्ता, मां शिवदेवी और 2 बेटे दर्श व दिवित रहते थे, जबकि नीचे वाले हिस्से में दूसरे नंबर का भाई अमित गुप्ता अपनी पत्नी रानी, बेटी रिया व बेटे ईशू के साथ रहता था.

दिवित को छोड़ कर बाकी बच्चे स्कूल गए हुए थे. अमित की अपनी पैथलैब थी. घटना के बाद सभी बच्चों को स्कूल से बुला लिया गया.

सदर विधायक मनीष असीजा उस दिन लखनऊ में थे. घटना की जानकारी मिलने पर उन्होंने इस बारे में गृह सचिव व डीजीपी को बताया. डीजीपी तक मामला पहुंचने के बाद दोपहर लगभग सवा 2 बजे आईजी (आगरा जोन) ए. सतीश गणेश अपने साथ डौग स्क्वायड की टीम ले कर मौकाएवारदात पर पहुंच गए.

खोजी कुत्ते के आने से पहले तक गली के अंदर व घटनास्थल पर सैकड़ों लोग आ जा चुके थे, इसलिए खोजी कुत्ता हत्यारे के बारे में कोई भी सुराग नहीं दे सका.

लोगों के मन में इस बात को ले कर आक्रोश था कि घटनास्थल से थाना मात्र 300 मीटर की दूरी पर है, इस के बावजूद पुलिस सूचना देने के आधा घंटे बाद घटनास्थल पर आई.

गुस्साए लोगों को एसएसपी सचींद्र पटेल ने भरोसा दिया कि इस जघन्य घटना का शीघ्र खुलासा कर दिया जाएगा. डौग स्क्वायड व फोरैंसिक टीम का काम निपट जाने के बाद पुलिस ने दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दीं.

एसएसपी सचींद्र पटेल ने हत्यारों के शहर से बाहर भागने की बात के मद्देनजर पुलिस को रेलवे स्टेशन, रोडवेज बस स्टैंड तथा प्राइवेट बस स्टैंड पर चैकिंग करने के आदेश दिए.

जानें बड़ी उम्र के लड़के के साथ डेटिंग करने के फायदे

अपने से ज्यादा उम्र के लड़कों के साथ रिलेशनशिप में आने के कुछ फायदें होते हैं और साथ-साथ नुकसान भी होते हैं. अगर आपका साथी आपसे उम्र में बड़ा होगा तो स्वभाविक है कि उसे आपसे अधिक अनुभव होगा और चीजों की जानकारी भी आपसे अधिक होगी. महिलाएं अपने से बड़े उम्र के लड़कों से अधिक आकर्षित होती हैं क्योंकि वह अपने रिश्ते को लेकर अधिक ईमानदार होते हैं और अपने प्यार को अच्छी तरह दिखा भी पाते हैं. अपने से बड़ी उम्र के लड़के आपको मानसिक और वित्तीय दोनों तरफ से समर्थन देंगे.

  1. प्यार को जताते हैं:

अपने से बड़ी उम्र के लड़के हमेशा अपने प्यार को अलग-अलग तरीकों से अपने साथी को दर्शाते हैं जैसे आपको फूल भेजना, कार्ड देना या कहीं बाहर घुमाने ले जाना. उनकी दुनिया सिर्फ अपनी साथी के आस-पास घूमती रहती है. वह हमेशा आपको खास महसूस कराते हैं. आपकी हर इच्छा को खुशी-खुशी पूरा करने की कोशिश करते हैं.

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2. रिश्ते को समझेगा:

अगर आपका साथी पहले किसी रिलेशनशिप में रहा होगा तो उसे इस बात की जानकारी होगी कि किस कारण से उसका पिछला रिश्ता टूटा. ऐसा ज्यादातर तब होता है जब आपका साथी आपसे बड़ा हो क्योंकि उसे इन चीजों की अच्छे से समझ होगी. वह आपको अपने पिछले रिश्ते की वजह से कभी कोई दुख नहीं होने देगा और ना ही अपने रिश्ते पर उसका प्रभाव पड़ने देगा. वह आपको अपनी जिम्मेदारी के रूप में लेंगे और आपको किसी तरह की तकलीफ नहीं होने देंगे.

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3. आर्थिक सहारा मिलता है:

अपने से बड़े उम्र के लड़के के साथ अगर आप रिलेशनशिप में है तो आप उससे वित्तिय मामलों को लेकर आसानी से चर्चा कर पाएंगी. आपकी जरूरतों का अच्छी तरह ध्यान रखेंगे और अगर कभी आपको पैसों की जरूरत पड़ी तो वह हमेशा आपको सहारा देने के लिए खड़े रहेंगे. लेकिन छोटे उम्र के लड़को के साथ आपको इन बातों को लेकर परेशानी हो सकती है.

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4. भविष्य के बारे में सोचेगा:

अगर आपका साथी उम्र में आपसे बड़ा होगा तो वह आप दोनों के आने वाले भविष्य के बारे में अधिक गहराई से सोचेगा और अपने रिश्ते को लेकर अधिक गंभीर भी होगा. आपके आने वाले भविष्य से जुड़ी छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखेगा और उसकी प्लानिंग भी करेगा.

ऐसे बनाएं भेल पूरी

आप भेल पूरी को झट से बना सकते हैं. इसे बनाने के लिए आपको सिर्फ मुरमुरे, सेव, आलू, प्याज, मसाले और चटनी की जरूरत होती है. और इसे बनान भी बेहद आसान है.

सामग्री

2 कप मुरमुरा

1/2 कप सेव

1 कप प्याज, बारीक कटा हुआ

1 कप उबले हुए आलू के टुकड़े

8 पूरी

1 टेबल स्पून हरी चटनी

1/4 टेबल स्पून खजूर की चटनी

1 टेबल स्पून नींबू का रस

1 टेबल स्पून नमक

गार्निशिंग के लिए हरा धनिया

हरी चटनी के लिए:

हरा धनिया

लहसुन

हरी मिर्च

थोड़ा सा नींबू का रस

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बनाने की वि​धि

1.सारी सामग्री को एक साथ मिला लें, सेव और हरा धनिया डालकर गार्निश करके सर्व करें.

हरी चटनी:

1.हरा धनिया, लहसुन, हरी मिर्च और नींबू का रस डालकर इसे एक साथ पीस लें.

पलभर का सच : भाग 2

‘‘शादी के बाद मुझे यह भी पता चला कि अमीरों की भी अलगअलग जातियां होती हैं. शेखर के पिता बड़े अमीर थे जो अपने दोनों बेटों के साथ अपने उद्योग को और बढ़ाना चाहते थे. शेखर की मां का बहुत पहले ही देहांत हो चुका था. घर में हम सिर्फ 4 लोग थे. शेखर के पिता, शेखर का छोटा भाई विशाल, शेखर और मैं. घर के इन 4 लोगों में से मेरी बातचीत सिर्फ शेखर से होती थी. शेखर के पिता ने कभी भी मुझ से आमनेसामने हो कर बात नहीं की थी. जब भी कुछ कहना होता तो शेखर से कह देते कि बहू से कहो…

‘‘विशाल, मेरा छोटा देवर शेखर से सिर्फ 2 साल छोटा था. वह स्वभाव से बेहद शर्मीला था. शुरूशुरू में मैं ने उस से दोस्ती करने के लिए हंसीमजाक करने की कोशिश की तो एक दिन शेखर ने बड़े गंभीर अंदाज में मुझ से कहा था, ‘तुम विशाल से यों हंसीमजाक न किया करो… डैडी को अच्छा नहीं लगता.’

‘‘ ‘तुम्हारे डैडी को तो मैं ही अच्छी नहीं लगती. तभी तो वह सीधे मुंह मुझ से बात ही नहीं करते, जो कहना होता है तुम से कहलवाते हैं और अब विशाल से बात करने को भी मना कर रहे हैं.’

‘‘मैं ने गुस्से में तुनक कर कहा था. इस पर शेखर का जो रौद्र रूप उस रात मैं ने पहली बार देखा था वह आजतक नहीं भूल पाई हूं.

‘‘अपने मजबूत हाथों से मुझे पलंग से उठा कर नीचे गिराते हुए एकदम ही राक्षसी अंदाज में शेखर ने कहा था, ‘इस घर में जो डैडी कहेंगे वही होगा, और तुम्हें भी वही करना होगा. अगर तुम्हें यह सब पसंद नहीं है तो तुम इस घर को छोड़ कर जा सकती हो…मगर तब मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊंगा.’

‘‘और फिर बड़ी बेदर्दी से शेखर बेडरूम छोड़ कर बाहर चला गया था. और मैं रात भर रोती रही थी पर मेरी सिसकियां सुनने वाला वहां कोई नहीं था.

‘‘इस घटना के बाद 15-20 दिनों तक शेखर और मुझ में बोलचाल बिलकुल बंद थी. जाने कितने दिनों तक हम दोनों का यह मौनव्रत चालू रहता मगर एक दिन बात को निरर्थक न बढ़ाने की सोच कर मैं ने ही शेखर से बात करनी शुरू की और फिर शायद मुझे खुश करने के लिए ही वह उस समय मुझे घुमाने स्विट्जरलैंड ले गया था. वह 10-12 दिन जैसे परियों के पंख लगा कर उड़ गए थे. वापसी में मैं ने ही शेखर से कहा था, ‘सोचती हूं, कुछ दिन…मां से मिल आऊं.’

‘‘शेखर ने तब कहा था, ‘चलो, कल ही चले चलते हैं.’

‘मां और बाबूजी हम दोनों को देख कर बहुत खुश हो गए थे. मां तो दामाद की सेवा करतेकरते मुझे भूल ही गई थीं. लेकिन जब उन्होंने मुझे कुछ दिन उन के पास छोड़ जाने की बात शेखर से कही तो उस ने तपाक से मना कर दिया और फिर 2 दिन में ही मैं शेखर के साथ अपने घर वापस आ गई थी. उस वक्त भी मेरा मन बहुत खट्टा हो गया था और रात को शेखर से कुछ कहने ही वाली थी कि उस का तमतमाता हुआ चेहरा देख कर डर के मारे चुप ही रह गई थी.

‘‘इस घटना के बाद हर 15-20 दिनों के बाद कुछ न कुछ ऐसा घट जाता जिस से मैं जान गई कि इस घर में मुझे अपने मन की इच्छा पूरी करने की आजादी कभी मिल ही नहीं सकती. यह बात सच थी कि व्यावहारिक दृष्टिकोण से उस घर में सुख ही सुख था. गहने, कपड़े, खानापीना यानी किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी. शेखर मुझ से प्यार तो बहुत करता था मगर उस के प्यार में मेरी अपनी इच्छा की कोई कद्र नहीं होती थी.

‘‘घर में कुछ काम नहीं था तो मैं ने शेखर से आगे की पढ़ाई करने की बात कहीं तो ‘जरूरत क्या है’ कह कर उस ने मना कर दिया.

‘‘कुछ करने की बात छोड़ो, किसी सहेली से मिलने जाने की बात करती तो हर वक्त शेखर के साथ ही जाना होता था और उसी के साथ वापस भी आना होता था… इसी कारण मैं तुम्हारे घर बहुत कम आती थी. वैसे पूजा के डैडी की आंखों में मैं ने रईसी के प्रति नफरत कब की पढ़ ली थी. तभी तो सचिन व पूजा की शादी से मैं डरती थी. लगता था पूजा को मेरा ही इतिहास न दोहराना पड़े मगर सचिन बहुत समझदार है.

शादी होते ही उस ने अपनी अलग इंडस्ट्री खोल ली और उस में पूजा को भी बराबर का हिस्सेदार बना दिया है. पूजा को सचिन के साथ काम करते देख कर मुझे बहुत अच्छा लगता है. जब पूजा को आफिस में काम करते देखती हूं तो 10 साल पहले की एक बात मुझे याद आती है.

‘‘10 साल पहले शेखर ने जब अपने आफिस में ‘पर्सनल आफिसर’ के तौर पर कविता की नियुक्ति की थी तब जाने कितने दिनों बाद शेखर से मेरी फिर एक बार जबरदस्त लड़ाई हुई थी.

‘‘वह सिर्फ झगड़ा नहीं था शालो… शेखर मुझे मारने पर भी उतर आया था.’’

यह सबकुछ बताते हुए शुभा की आंखें भर आई थीं और फिर जाने कितनी देर तक आंसू बहाते हुए वह निशब्द सी हो कर बैठ गई थी.

शुभा की सारी बातें सुन लेने के  बाद मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि उस से क्या कहूं. मन में बारबार एक ही सवाल उठ रहा था कि शुभा जैसी तेजतर्रार लड़की इतने दिनों तक यों चुप कर दब कर क्यों रह गई.

कुछ न सूझते हुए भी मैं ने अनायास ही शुभा से बेहद सरल सवाल करने शुरू किए थे :

‘‘तू इतने दिनों तक चुप क्यों थी? और अगर इतने दिनों तक चुप थी तो अब एकदम ही तलाक लेने की आफत क्यों मोल ले रही है? क्या अपनी खुद्दारी दिखाने का यही एक रास्ता बचा है तेरे पास? अपना विरोध हर कदम पर दिखा कर भी तो तू शेखर के साथ रह सकती है.’’

‘‘नहीं शालो, मेरी खुद्दारी, स्वाभिमान सब खत्म हो चुके हैं. अब मैं सिर्फ शांति से और अपने तरीके से जीना चाहती हूं.’’

‘‘मतलब, क्या करने वाली है तू?’’

‘‘यहां दिल्ली में एक वृद्धाश्रम खुला है. उस के संचालन का काम मुझे मिल गया है. सोचती हूं जरूरतमंद वृद्धों की सेवा करूंगी तो जीवन में कुछ करने की चाह भी पूरी हो सकेगी.’’

‘‘क्या शेखर ने इस की इजाजत दी है?’’

‘‘उस की इजाजत मिलेगी ही नहीं, यह मुझे पता है तभी तो पहले उस से तलाक ले कर अलग होने का फैसला लिया है. फिर अपना काम करूंगी.’’

‘‘क्या सचिन यह सब जानता है?’’

‘‘हां, जानता है और कुछ हद तक मेरी भावनाओं को समझता भी है मगर तुम्हारी तरह वह भी कहता है कि अब यह सब करने की क्या जरूरत है.’’

‘‘तो फिर सच में जरूरत क्या है, शुभा?’’

‘‘जीवन में ‘जरूरत’ शब्द की व्याख्या हर इनसान अपनेअपने मन से करता है और तब ‘जरूरत’ हर किसी की अलग हो सकती है…10 साल पहले शेखर ने जब अपने आफिस में कविता की नियुक्ति की थी तब हमारा आखिरी झगड़ा हुआ था. उस के बाद मैं ने कभी शेखर से झगड़ा नहीं किया…मैं अपनेआप से ही झगड़ती रही हूं…10 साल से शेखर के मुंह से कविता की तारीफ सुनसुन कर मैं ऊब सी गई हूं.

‘‘मैं जानती हूं कि इस में मेरी स्त्रीसुलभ ईर्ष्या भी हो सकती है लेकिन सच तो यह है कि शेखर के मुंह से कविता की तारीफ सुन कर मैं हैरान हो कर सोचती हूं कि एक इनसान इस तरह अलगअलग हिस्सों में अलगअलग बरताव कैसे कर सकता है.’’

‘‘तो क्या तू समझती है कि शेखर और कविता में कुछ चल रहा है?’’ मैं ने बड़े ही संयत स्वरों में पूछा.

कुछ देर तक तो शुभा चुप रही फिर बड़े ही अटपटे से स्वर में बोली, ‘‘मैं दावे के साथ कुछ नहीं कह सकती मगर यह सच है कि शेखर का अधिकतर समय अब उस के साथ ही बीतता है. मैं यह भी नहीं कह सकती कि शेखर का मेरी तरफ ध्यान ही नहीं है, वह आज भी मेरी हर जिम्मेदारी को पूरा करता है.

त्योहारों में मुझे गहने व साडि़यां दिलाना, मुझे पार्टियों में ले जाना, यह सब कुछ पहले की तरह ही चल रहा है क्योंकि शेखर के जीवन में मैं आज भी ‘बीवी’ नामक ऐसी चीज हूं जिस पर कानूनन शेखर का ही अधिकार है. लेकिन शालो, अब इस तरह सिर्फ एक कानूनन हकदार चीज बन कर रहना मेरे लिए नामुमकिन हो गया है.’’

‘‘और दोनों बच्चों के बारे में तुम ने क्या सोचा है?’’

‘‘बच्चों का सोचतेसोचते ही तो शेखर के साथ 30 साल गुजारे, शालो, अब बच्चे बच्चे नहीं रहे… उन के जीने के अपनेअपने तरीके हैं, उन्हें अपने तरीके से जीने दें…मुन्ना ने भी अपनी शादी तय कर ली है और उस की शादी होते ही मैं मुक्त हो जाऊंगी… जब भी बच्चों को मेरी जरूरत होगी, मैं उन के पास जरूर हो आऊंगी.’’

‘‘उम्र के इस पड़ाव पर आ कर अचानक इस तरह का निर्णय लेने से तुझे डर नहीं लगा?’’

‘‘नहीं, शालो, अब सच में डर नहीं लगता. जीवन भर मैं ने जो मानसिक यातनाएं भोगी हैं उन्हें अब दोबारा बहूबेटों के सामने भुगतने से डर लगता है और इसी से अब मैं निर्भय हो कर जीना चाहती हूं.’’

शुभा की कहानी सुन कर मैं कुछ देर तक तो निशब्द सी बैठी रही फिर शुभा को गले लगा लिया और बोली, ‘‘तेरे इस निर्भीक फैसले पर मुझे गर्व है, शुभा. तेरे इस अनोखे निर्णय में तेरी यह सहेली हमेशा तेरे साथ रहेगी. जब कभी किसी चीज की जरूरत पड़ेगी तो बेहिचक मेरे पास चली आना, समधन समझ कर नहीं, अपनी प्रिय सहेली समझ कर.’’

इतनी सारी मन की बातें मुझ से कह लेने के बाद मेरे कहने पर ही शुभा बहुत ही सामान्य हो कर 2 दिन तक रह गई थी. लेकिन तीसरे दिन एक अनोखी घटना ने शुभा को और मुझे हिला कर रख दिया था.

एक कार दुर्घटना में शेखर की अचानक मौत हो गई और शुभा का जीवन फिर एक बार शेखर से जुड़ गया था.

शुभा को ले कर तुरंत हम लोग मुंबई पहुंचे थे. तो एक बार फिर वह भूचाल में घिर गई थी.

मुंबई में इतने बड़े इंडस्ट्रीयलिस्ट की मौत का ‘नजारा’ किसी त्योहार से कम नहीं था.

शुभा की शुष्क आंखों ने पति की मौत का राजसी ठाटबाट भी ‘संयत’ मन से सह लिया था.

अब इतने बड़े उद्योगपति की विधवा होने का मानसम्मान भी उस के जीवन को त्याग नहीं सकता था. जिस मुक्ति की कामना वह कर रही थी वह तो अपनेआप ही मिल गई थी मगर किस ढंग से?

जीवन को खदेड़ देने वाले मुझ से कहे हुए उस पल भर के ‘सच’ को क्या वह कभी भूल सकती है? और क्या मैं कभी भुला पाऊंगी?

फिल्म ‘पंगा’ में कंगना का लुक हुआ वायरल

बौलीवुड अदाकारा कंगना रानौट लगातार विधितापूर्ण किरदार निभाते हुए अपनी एक अलग पहचान बनाती आ रही हैं.अब वह अश्विनी अय्यर तिवारी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘‘पंगा‘’ को लेकर चर्चा में है. इसमें कंगना के साथ रिचा चड्ढा, नीना गुप्ता, जस्सी गिल और पंकज त्रिपाठी भी नजर आएंगे. अब इस फिल्म का ट्रेलर 23 दिसंबर को रिलीज होगा, जबकि फिल्म 24 जनवरी 2020 को पूरे देश के सिनेमाघरों में पहुंचेगी. फिल्म के निर्माताओं ने फिल्म ‘‘पंगा’’ में कंगना रानौट के पहले लुक को जग जाहिर कर दिया है. तो वहीं कंगना रानौट की बहन रंगाली चंदेल ने भी इसे अपने ट्वीटर हैंडल पर पोस्ट कर दिया है. ‘मणिकर्णिका‘ के बाद एक बार पुनः कंगना रानौट फिल्म ‘‘पंगा’’ में मां के किरदार में नजर आएंगी.

रंगोली चंदेल ने अपने ट्वीटर हैंडल पर फिल्म ‘पगा’ में कंगना के लुक की तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है- ‘‘कंगना कहती हैं कि एक ऐक्ट्रेस के तौर पर सबसे बड़ी बेइज्जती तब होती है जब उन्हें मां के रोल के लिए अप्रोच किया जाता है, हालांकि मणिकर्णिका में एक मां का सफल किरदार निभाए जाने के बाद वह एक बार फिर मां के किरदार में दिखेंगी. आज मेनस्ट्रीम की यह टौप ऐक्ट्रेस अपने करियर के शिखर पर गर्व से मां का रोल निभा रही है. यह नया इंडिया है जिसे ‘पंगा‘ पसंद है.‘’

https://twitter.com/Rangoli_A/status/1207555166381043712

उधर 23 दिसंबर को हो रहे फिल्म ‘‘पंगा’’के ट्रेलर लांच के लिए कंगना रानौट और निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी ने अपने स्व हस्ताक्षर युक्त निमंत्रण कार्ड हर पत्रकार को भेजे हैं. इस निमंत्रण कार्ड में लिखा है-‘‘जो सपने देखते हैं, वो सो नहीं पाते हैं. उन्हें पूरा किए बगैर बेचैन रहते है. जो सपने देखते है, वो  गिरते हैं, रूकते हैं, वो कमर कसते हैं, हर लिमिट फांद कर बढ़ते है. जो सपने देखते हैं, वही खुद से मिलते हैं. अपनी दुनिया बदलते हैं और हर सपना सच करते हैं. जो सपना देखते है, वो ‘पंगा’ लेते हैं. हर बंधन से,हर रूकावट से, नामुमकीन से, खुद से, जोर लगाकर पंगा लेते हैं..

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कंगना और अश्विनी अय्यर तिवारी द्वारा स्वहस्ताक्षरित निमंत्रण पत्र में हर पत्रकार का नाम कंगना ने अपने हाथ से लिखा है और उसे कूरियर से भिजवाया गया है.

शुभारंभ: क्या राजा-रानी के बीच बढ़ती गलतफहमियाँ कम हो पाएंगी?

कलर्स के शो शुभारंभ में इन दिनों राजा और रानी के बीच गलतफहमी बढ़ती ही जा रही है तो वहीं दूसरी तरफ राजा की माँ रानी के साथ अपने बेटे की शादी का सपना देख रही है, जिसके बारे में दोनों को कुछ पता नही है. अब देखते हैं क्या होगा शो में आगे…

राजा से झूठ कहती है झरना

पिछले एपिसोड में आपने देखा कि राजा और रानी के बीच गलतफहमी बढ़ाने के लिए झरना राजा को कहती है कि रानी उससे प्यार करती है, जिसके कारण राजा का व्यवहार बदल जाता है.

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गलतफहमी दूर करती है रानी

रानी राजा के मैसेज का जवाब देने के लिए गलती से सेल्फी भेज देती है. इस गलतफहमी को दूर करने के लिए रानी मंदिर में राजा से बात करती है और बताती है कि सेल्फी वाला किस्सा गलती से हुआ. इससे राजा को एहसास होता है उसकी खुद की गलती के कारण ये सब हुआ है.

रानी के भाई की लगी लौटरी

रानी के भाई उत्सव की 50 लाख की लौटरी लग गई है, जिसकी खबर उत्सव राजा की मां को बता देता है. लौटरी की खबर सुनते ही राजा की माँ अपने बेटे की शादी रानी से करने की सोचती है. पर वह ये नही जानती की रानी वही लड़की है, जिससे वह डांडिया में मिली थी.

एक-दूसरे से रिश्ते के लिए मिलेंगे राजा रानी

आने वाले एपिसोड में आप देखेंगे कि जहाँ एक तरफ राजा की फैमिली उसे कहती है कि रानी पैसों की लालची है. दूसरी तरफ रानी के दिमाग में ये बात डाली जाती है कि राजा उसके शरीर के पार्टस बेचना चाहता है.

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अब देखना ये है कि आने वाले एपिसोड में क्या राजा-रानी के बीच बढ़ती गलतफहमियां कम हो पाएंगी? जानने के लिए देखते रहिए ‘शुभारंभ’, हर सोमवार से शुक्रवार रात 9 बजे सिर्फ कलर्स पर.

हिना खान और प्रियांक शर्मा की जोड़ी ने म्यूजिक वीडियो से किया धमाल

टेलीविजन एक्ट्रेस हिना खान और प्रियांक शर्मा की दोस्ती से सभी वाकिफ है इनकी दोस्ती बिग बौस सीजन 11 से जारी है. लेकिन अब अगर आपको इन दोनों की बेस्ट केमिस्ट्री  देखनी है तो अरिजीत सिंह के रोमांटिक ट्रैक ‘रांझणा’ में  मिल जाएगी जो आजकल खूब वायरल हो रहा है.

हिना खान और प्रियांक शर्मा का म्यूजिक वीडियो ‘रांझणा’ सांग के रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर खूब धूम है. कुछ घंटों में इस म्यूजिक वीडियो को यू ट्यूब पर  लगभग 9 लाख से भी अधिक लोगों ने देखा और पसंद भी किया है.

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हिना ने एक इंटरव्यू के दौरान इस सांग की शूटिंग के बारे में बताया  ‘ये हमारे सबसे मुश्किल शूट में से एक है. हमने 50 डिग्री सेल्सियस की जबरदस्त गर्मी के बीच ये गाना शूट किया है. धूल भी इतनी ज्यादा था कि हमारी आंख, मुंह, सब जगह जा रही थी. हमारा मेकअप भी मेल्ट हो रहा था और तपती जमीन के चलते पैर भी जल रहे थे. मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि हमने बहुत मेहनत की  है. मैं इस कहानी की दूसरी साइड बताने की कोशिश कर रही हूं. आपको जो चीज इस समय दिखने में लाजवाब लग रही है उसके लिए हमने काफी पसीना बहाया है, कई चुनौतियों का सामना किया है.’

अर्जित सिंह के गाए ‘रांझणा’ गीत का निर्माण आकांक्षा राहुल शर्मा द्वारा किया गया है और इसे कमलचंद्र ने निर्देशित किया है. इस गाने का संगीत असद खान ने दिया है और लिरिक्स रकीब आलम ने लिखे हैं.

इस वीडियो में हिना खान ब्लू आई मेकअप में बहुत ही खूबसूरत नज़र आ रही हैं.  इसमें हिना के ब्राइडल लुक को भी लोग बहुत पसंद कर रहे है. जिसमें वह पिंक कलर का खूबसूरत लहंगा-चुनरी पहने हुए बहुत सुंदर नज़र आ रही हैं. जिसमें गोल्डन प्रिंट से खूबसूरत एंब्राइड्री की हुई है.

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टीवी सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में बहु अक्षरा के रूप में पहचान बना कर हिना ने अपना करियर शुरू किया था. फिलहाल हिना ने छोटे पर्दे से दूरी बना ली है और अब जल्दी ही फिल्म ‘हैक्ड’ से बौलीवुड में डेब्यू करने जा रही हैं. हाल ही में उन्होंने इस फिल्म की शूटिंग खत्म की है.

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