दिल्ली के निजामुद्दीन बस स्टेशन पर बस से उतर कर मैं यों ही चहलकदमी करता चिश्ती घराने के चौथे संत हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के मकबरे की ओर निकल गया. हजरत वैराग्य और सहनशीलता की मिसाल कहे जाते हैं. बड़ा नाम सुना था उन का. फकीराना अंदाज और शहंशाही मिजाज. कहते हैं बड़ेबड़े बादशाह उन को सलामी देते थे. वर्ष 1303 में उन के कहने पर मुगल सेना ने अपना हमला रोक दिया था. 92 साल की उम्र में हजरत ख्वाजा की मृत्यु हुई और उस के बाद उन का जो मकबरा बना, उस का वर्ष 1562 तक नवीनीकरण होता रहा. आज उन की दरगाह पर देश के कोनेकोने से लोग अपनी मुरादें ले कर आते हैं. कहते हैं कि उन के दर से कोई खाली हाथ नहीं लौटता है.

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