16 साल के करियर में शाहिद कपूर ने काफी उतार चढ़ाव झेले हैं. पर उन्होंने हार नही मानी. मगर अब फिल्म ‘‘कबीर सिंह’’ को मिली अपार सफलता ने सारे समीकरण बदलकर रख दिए हैं. ‘कबीर सिंह’ अब तक लगभग तीन सौ करोड़ रूपए कमा चुकी है. शाहिद कपूर के लिए यह एक नया अनुभव है. दर्शक फिल्म को पसंद कर रहे हैं, जबकि फिल्म आलोचकों ने काफी आलोचना की थी. इतना ही नहीं कई समाजसेवियों ने भी फिल्म के खिलाफ आवाज उठायी थी. पर शाहिद कपूर को कबीर सिंह का किरदार निभाते समय और आज भी पूरा यकीन है. उनका मानना है कि इस तरह के इंसान होते हैं.

प्रस्तुत है शाहिद कपूर के संग हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश

आपके 16 साल के कैरियर में टर्निंग प्वाइंट क्या रहे?

मेरी नजर में पहली फिल्म ‘इश्क विश्क’ का मिलना ही एक बहुत बड़ा टर्निंग प्वाइंट था. उसके बाद दूसरा टर्निंग प्वाइंट मेरे लिए फिल्म ‘‘कमीने’’ था. क्योंकि इस फिल्म से पहले मैं एक इमेज में अटक गया था. लोग मुझे रोमांटिक ब्वाय या चौकलेटी ब्वाय वाले किरदार और प्रेम कहानी वाली फिल्मों में ही देखना चाह रहे थे. जबकि मुझे लगता था कि मेरे अंदर कुछ दूसरे किरदार निभाने के गुण हैं. जिसे फिल्मकार मेरी शक्ल और उम्र की वजह से देख नहीं पा रहे हैं. ऐसे में जब विशाल भारद्वाज ने मुझे बुलाकर फिल्म ‘‘कमीने’’ दी, तो यह मेरे करियर का दूसरा सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट रहा. मैं हमेशा विशाल सर का शुक्रगुजार रहूंगा. उन्होंने मुझे ऐसा काम करने का मौका दिया, जो मैंने उस वक्त तक नहीं किया था और ना ही कोई सोचता था कि मैं ऐसा कुछ कर पाऊंगा. मुझे लगता है कि अब तीसरा बसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट फिल्म‘ ‘कबीर सिंह’’ के रूप में आया है. इस फिल्म को जिस तरह की सफलता मिली है, उसकी वजह से हर कोई मेरे बारे में बात करने लगा है.

आपको लगता है कि ‘कमीने’’ का ही एक्सटेंशन ‘‘उड़ता पंजाब’’ थी और फिर उसका एक्सटेंशन ’’कबीर सिंह’’ है?

लोगों को ऐसा लग सकता है. यदि लोगों को ऐसा लगता है, तो गलत भी नहीं है. फिर भी मेरे नजरिए से इन तीनों फिल्मों के किरदारों में कोई समानता नहीं है. पर किरदारों के ग्राफ को देखते हुए लोग सही हैं. एक कलाकार के तौर पर ज्यादा से ज्यादा काम करने की तमन्ना हमेशा थी. मैं हमेशा चाहता था कि कोई ऐसा किरदार मिले, जिसे सुनकर ऐसा लगे कि मैं यह नहीं कर पाऊंगा. जरुरत से ज्यादा चुनौतीपूर्ण किरदार हो. उसे करते हुए मेरे अंदर का उत्साह बरकरार रहे. तो सच यही है कि ‘‘उड़ता पंजाब’’ मेरे लिए बहुत बड़ा चुनौतीपूर्ण किरदार रहा. उसके बाद उससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण किरदार कबीर सिंह रहा. मेरी निजी राय यह है कि कबीर सिंह अब तक का मेरा सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण किरदार है.

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फिल्म ‘‘कबीर सिंह’’ को जिस तरह की सफलता मिली है, उससे आपके करियर पर क्या असर हुआ?

फिल्म की सफलता से संतुष्टि मिली. भावुक भी हुआ. मैं अपने दर्शकों का आभारी हूं. इस फिल्म की सफलता ने मेरे अंदर भी काफी कुछ बदला है. तो वहीं दर्शकों के साथ मेरे रिश्ते में बदलाव आया है. अब मैं दर्शको के लिए ही काम करना चाहता हूं. मैं भविष्य में वही फिल्में अपने दर्शकों को दूंगा, जिस तरह की फिल्में वह पसंद करते हैं.

बहुत जल्द अवार्ड का मौसम शुरू होने वाला है. तो आपको भी अवार्ड पाने की उम्मीदे होंगी?

यह तो समय ही बताएगा. हमने देखा कि दर्शक किस तरह से परिपक्व हुआ है. अब देखना है कि बाकी लोग परिपक्व हुए हैं, या अभी भी दकियानूसी हैं. कबीर सिंह को किस तरह से लोगों ने पसंद किया है, उस पर विवाद तो हो ही नहीं सकता. यह फिल्म किरदार ड्राइवेन रही.

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पर फिल्म को लेकर काफी आलोचना ?

फिल्म के रिव्यू बहुत क्रिटिकल आए. जब हौलीवुड फिल्मों में रौ सीन दिखाते हैं, तो लोग कहते हैं कि यह बहुत महान सिनेमा है. यह पाखंड ही है कि 2013 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘द वोल्फ आफ वाल स्ट्रीट’’ में लियोनार्डो डिकाप्रियो ने जो किरदार निभाया था, उसमें तो कबीर सिंह से ज्यादा समस्याएं थीं. लेकिन सभी आलोचकों ने उसकी जमकर तारीफ की थी, पर वही लोग कबीर सिंह की अलोचना कर रहे हैं. जबकि दर्शकों ने ‘द वोल्फ आफ वाल स्ट्रीट’’ की ही तरह. ‘‘कबीर सिंह’’ को पसंद किया है. सच कह रहा हूं कि एक तरफ मुझे बहुत ही हिप्पोक्रेटिकल फीलिंग आयी. रिव्यूज बहुत हिप्पोक्रेटिकल थे.

आपको लगता है कि लोग कबीर सिंह के किरदार की गलत आलोचना कर रहे हैं?

देखिए, वायलेंस और अग्रेशन एक गलत इमोशन है, तो उसको गलत कहना सही बात है. जो गलत है, वह गलत है. मगर सबसे अहम सवाल यह है कि हीरो के अंदर कोई गलती क्यों नहीं हो सकती? क्या हीरो इंसान नहीं होता. हीरो शब्द भी नहीं इस्तेमाल करना चाहूंगा, क्योंकि हीरो और विलेन बहुत ही आउट डेटेड हो गए हैं. फिल्म का जो प्रोटोगौनिस्ट है, जिसके ऊपर आपकी पूरी फिल्म आधारित है, या फिल्म का जो मुख्य किरदार है, वह गलत नही हो सकता, यह कहां लिखा है. यह कहा लिखा है कि उसके अंदर हर चीज अच्छी होनी चाहिए. ऐसा कहां लिखा है कि अगर उसके अंदर खामी है, तो दर्शक उसको खामी की तरह नहीं देखेगी. मेरे हिसाब से आज का दर्शक हमसे ज्यादा बुद्धिमान है. दर्शक को कोई चीज क्यों अच्छी लगती है, वह बहुत साफ है. इसके अलावा हम किस तरह की फिल्म बनाएं? किस तरह की न बनाएं. किसको अच्छा लगेगा, किसको नही, इन्हीं बातों में हम उलझे रहते हैं. जबकि दर्शक की सोच एकदम साफ रहती है. हम ही बेकार की चीजों में उलझे रहते हैं. कबीर सिंह के प्वाइंट औफ व्यू से भी दर्शक सहमत नजर आए. उनको फिल्म बहुत पसंद आयी. भले ही फिल्म के बारे में बहुत कुछ कहा जा रहा है. फिल्म ने बाक्स आफिस पर बहुत कमाल की कमाई की है. कुछ लोगों ने का कि यह फिल्म सिर्फ मर्दों को पसंद आएगी, मगर मुझे पता है कि मर्दों से ज्यादा औरतों ने फिल्म को सबसे ज्यादा देखा.

दूसरी बात दर्शक हर किरदार को पसंद करें, यह भी जरुरी नहीं है. किरदार को समझना जरूरी होता है. अगर आपको एक जटिल किरदार समझ में आ जाता है, तो यह फिल्म, फिल्म के कलाकार के साथ साथ पूरी टीम के लिए बहुत बड़ा कंप्लीमेंट होता है

कबीर सिंह जैसे जटिल किरदार को निभाने के लिए आपने अपने आपको दिमागी रूप से कैसे तैयार किया?

देखिए,पहली बात तो एक कलाकार के तौर पर मैं अपने किरदार को जज नहीं करता हूं कि वह अच्छा इंसान है या बुरा इंसान है. क्योंकि अगर मैं किरदार को जज करने बैठा, तो उसे न्याय संगत ढंग से परदे पर नहीं उतार सकता. मैं जैसा किरदार है, वैसा बन ही नही पाउंगा. यदि वैसा बनना है,तो उसको जज करना नहीं चाहिए.

मेरे किरदार को जज करना दर्शकों का काम है. दर्शक तय करेगा कि उसे मेरा काम, मेरा अभिनय अच्छा लगा या नहीं. मेरा काम है, पटकथा के अनुसार किरदार को दर्शाना. यदि किरदार बेहूदा है, तो भी मेरा काम है कि उस हद तक मैं उसे निभाउं कि दर्शक कहे कि यह बेहूदा है. यानी कि किरदार जैसा है, वैसा दर्शकों को महसूस हो. कबीर सिंह नफरत के योग्य है, तो मुझे उसे उसी तरह से निभाना था कि दर्शक नफरत करे. मैंने कबीर सिंह को उसी तरह से पोट्रेट किया है. मैंने कहीं भी उसको केयरफुल बनाने की कोशिश नहीं की. कहीं भी उसको ब्रेक लगाने की कोशिश नहीं की. या उसको थोड़ा सा सौफ्ट करने की कोशिश नहीं की. क्योंकि अगर मैं उसको सौफ्ट करूंगा, तो उसकी खामियां छिप जाएंगी. किसी भी किरदार की खामियों को अगर उभारना है, तो उन्हें पूरी ईमानदारी के साथ और खुलेपन के साथ दर्शाना चाहिए. ताकि दर्शक उसको उस वक्त पसंद ना करें. इसके लिए अगर मैं किरदार को जस्टीफाई करने लगा, तो फिल्म बेकार हो जाएगी. मुझे इमोशंस के साथ पूरी तरह से उतरना था. मुझे ऐसा लगा कि यह कबीर सिंह वह किरदार है, जो मुझे ऐसा मौका देता है कि मैं पूरी तरह से उन चीजों में उतर सकूं.

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आपने कबीर सिंह जैसे नेगेटिव किरदार में भी पूरे अग्रेशन के साथ काम किया है. तो किस तरह की तैयारी की थी?

मैंने निर्देशक के साथ काफी वक्त बिताया था. क्योंकि वह किरदार व कहानी के साथ काफी हद तक जुड़े हुए थे. देखिए,कबीर सिंह नेगेटिव नहीं है. कबीर के अंदर कुछ खामियां हैं और उन खामियों की वजह से वह बहुत बुरी तरह व्यवहार करता है. लेकिन उसके अंदर अच्छी चीजें भी है. वह एक आम इंसान जैसा ही होता है. मेरा इंटरप्रिटेशन यही था कि कबीर के अंदर एक ही खामी है कि वह अपने गुस्से पर काबू नही रख पाता. अन्यथा वह एक अच्छा स्टूडेंट है, स्पोर्ट्स में भी अच्छा है. इंटेलीजेंट बंदा है. अच्छा डौक्टर है. जब पेशंट से बात करता है, तो बहुत प्यार से बात करता है. बहुत अच्छे स्पेस में है. उसकी अपने टीचर के साथ भी अच्छी रिलेशनशिप है, जो अब वह खराब कर रहा है. क्योंकि अगर आप देखेंगे तो उसका जो टीचर के साथ पहला सीन है, उसमें वह बोलता है कि, ‘आई एम वेरी डिसअप्वाइंटेड विथ यू.’ मतलब कि उनकी उससे कुछ अपेक्षाएं रही होंगी, जिसे वह पूरा नहीं कर पा रहा है. तभी तो वह डिसअप्वाइंट हो रहा है. कहने का अर्थ कोई एक अच्छा रिश्ता तो होगा. मुझे लगता है कि कबीर सिंह की सिर्फ एक ही गलती थी ‘एंगर मैनेजमेंट प्रौब्लम’/क्रोध पर काबू न रख पाना.’ इस एक गलती की वजह से वह अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर देता है. यही बात फिल्म में दिखायी गयी है. इंटरवल से लेकर क्लायमैक्स तक आपने सिर्फ उसे नीचे गिरते हुए ही देखा है. सेल्फ डिस्ट्रक्ट. दूसरी रोचक बात यह लगी कि एक ऐसा इंसान, जिसे ‘एंगर मैनेजमेंट का प्रौब्लम’ है, जो अपने प्वाइंट औफ यू से बाहर निकलकर दूसरे की बात समझना ही नहीं चाहता. वही इंसान एक लड़की से इतना प्यार करता है, कि एक बार प्यार कर लिया, तो उसके प्यार में खुद को ही बर्बाद कर लिया.

आपको नहीं लगता है कि यह जो गुस्से पर काबू न रख पाने वाली बात लोगों के गले नहीं उतरी?

शिक्षा ग्रहण करने के लिए लोग स्कूल व कालेज जाते हैं, सिनेमा देखने नहीं. फिल्म का काम नही है कि वह लोगों को शिक्षित करे. फिल्म का काम है जिंदगी को दर्शाना. ज्यादातर फिल्में जिंदगी को दर्शाती हैं. अब उस फिल्म को देखकर दर्शक क्या बाहर लेकर जाता है, यह तो उस पर निर्भर करता है. मेरी राय में दर्शक जो देखना था, जो समझना था, वह उसने किया. उसने एक प्रेम कहानी देखी. थिएटर से बाहर निकल तारीफ की. उसने कहानी के नएपन की भी तारीफ की.

यदि हम आपके सवाल के अनुसार देखें तो मिस्टर बच्चन ने एंग्री यंग मैन को किया. वह भी 15 साल पहले लगातार बीस साल तक. तो क्या वह गलत थे. हम कई एक्शन फिल्मों मे दिखाते हैं कि चोर, पुलिस को गोली मार देता है. तो क्या फिल्म देखकर बाहर निकलते ही दर्शक पुलिस को गोली मारने लगे. यह कहां की आउटडेटेड सोच है, मेरी समझ में नहीं आता. हम 2019 में यह बातें कर रहे हैं, जो कि फंडामेंटल औफ फिल्म मेकिंग है. ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के समय भी यह सवाल नहीं उठते थे.

फिल्म के प्रदर्शन को तीन माह हो गए. इस बीच किसी ने ऐसा कोई कमेंट किया हो, जो आपके दिल को छू गया हो?

ऐसी कुछ बातें हुई हैं, पर यह पर्सनल होती हैं, जिन्हें इस तरह से पब्लिक प्लेटफौर्म पर बोलना शायद सही ना हो. क्योंकि मैं किसी दूसरे एक्टर या कलाकार का नाम भी नहीं लेना चाहता हूं. लोगों ने मुझे बहुत प्यार दिया है. अच्छी-अच्छी बातें बोली. सबसे ज्यादा रिस्पांस जो मुझे मिला वह लड़कियों से मिला. लड़कियों ने कहा- ‘‘हमारी लाइफ में ऐसा लड़का क्यों नहीं आता है, जो हमें उस लेवल तक प्यार करें, जिस शिद्दत से कबीर ने प्रीति के साथ किया है. मेरी जिंदगी में ऐसा लड़का क्यों नहीं आता है, जो वैसा प्यार कर सके.’’ हमारी फिल्म का मकसद भी प्यार की इंटेंसिटी /संजीदगी को समझना था.

आपकी अगली फिल्म को रहस्य बना हुआ है?

फिल्म ही नहीं मेरी जिंदगी ही मेरे साथ रहस्य बनी हुई है. मैं तो यह घोषणा करने के लिए मरा जा रहा हूं कि मैं यह नई सर्वश्रेष्ठ फिल्म करने जा रहा हूं. मैं तो ‘कबीर सिंह’ के प्रदर्शन से पहले ही नई फिल्म अनुबंधित करना चाहता था. क्योंकि मैं घर पर खाली नहीं बैठना चाहता. फिलहाल मेरे पास कई चीजें आ रही हैं, जिन्हे पढ़ रहा हूं. और अभी तक किसी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुंचा. जबकि कुछ पसंद आया है.

इन दिनों सोशल मीडिया पर जो नई पीढ़ी स्टार बन रही है, उन्हें अब फिल्म, टीवी सीरियल व वेब सीरीज में प्रधानता दी जा रही है. क्या किसी कलाकार के सोशल मीडिया के फालोअर्स बाक्स आफिस पर प्रभाव डालते हैं?

जी नहीं. क्योंकि सोशल मीडिया के फालोअर्स और बाक्स आफिस का सीधे कोई जुडाव ही नहीं है.फिर भी दोनो एक दूसरे से जुड़े हैं. लेकिन जरूरी नहीं है कि सोशल मीडिया पर अगर आपके बहुत सारे फालोअर्स हैं, तो वह आपकी फिल्म देखने भी आएंगे. या आपकी फिल्म को जितने दर्शकों ने देखा, उतने ही आपके फालोअर्स सोशल मीडिया पर होंगे. मगर आपकी फिल्में बाक्स आफिस पर ज्यादा सफल हो रही हैं, तो इसके चलते सोशल मीडिया पर आपके फालोअर्स बढ़ सकते हैं. लेकिन उससे आपकी फिल्म नहीं चलेगी.

लेकिन इन दिनों कुछ फिल्मकार कलाकार के सोशल मीडिया पर मौजूद फालोअर्स की संख्या देखकर कलाकारों को काम दे रहे हैं?

यदि ऐसा हो रहा है, तो यह अच्छी बात है. जैसे मैं आपको बता रहा था कि मुझे अपने संघर्ष के दिनो में अपनी फोटो लेकर एक औफिस से दूसरे औफिस के चक्कर लगाना पड़ रहा था. आज आप मुफ्त में इंस्टाग्राम या किसी अन्य सोशल मीडिया पर अपना खाता खोल लीजिए, उस पर अपनी तस्वीरें पोस्ट कर अपने टैलेंट को भारत ही नहीं पूरे विश्व के फिल्मकारों तक पहुंचा सकते हैं. अगर आपकी तस्वीर या आपके द्वारा पोस्ट किया गया वीडियो लोगों को पसंद आता है, तो उस आधर पर लोग आपको बुलाकर काम दे सकते हैं. मेरे हिसाब से यह अच्छा ही है. लोगों को अपनी प्रतिभा दिखने व कुछ अच्छा करने का मौका मिल रहा है. अच्छे-अच्छे टैलेंटेड लोग जो कहीं छिपे हुए थे, उनको मौका मिल रहा है. उन्हें कुछ दिखाने का मौका मिल रहा है. दूसरी बात यह कहां लिखा है कि फिल्म या टीवी में ही अपनी प्रतिभा दिखाना जरूरी है. लोग अपनी प्रतिभा सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोगों तक पहुंचा सकते हैं. मुझे लगता है कई लोग सोशल मीडिया पर ऐसी परफार्मेंस कर जाते हैं, जो शायद मैं भी नहीं करता हूं.

आप सोशल मीडिया पर क्या लिखना व किस तरह की फोटो पोस्ट करना पसंद करता हैं?

सब कुछ मेरे मूड़ पर निर्भर करता है.

आप सोशल मीडिया को कितनी गंभीरता से लेते हैं?

मैं सोशल मीडिया पर काफी वक्त बिताता हूं. लेकिन इसे गंभीरता से बिलकुल नहीं लेता.

इसके अलावा क्या करना पसंद करते हैं?

फिलहाल तो परिवार और बच्चों के साथ समय बिताना ज्यादा पसंद है. मुझे ऐसा लगता है कि जब तक बच्चे पांच साल के ना हो जाएं, आप उनके साथ वक्त बिता सकते हैं. फिर वह स्कूल चले जाएंगे, उनके दोस्त बन जाएंगे और शायद ऐसा फिर मौका ना मिले. जब आप काम से लौटे, तो बच्चे आपका इंतजार करते मिले कि पापा मम्मी आप कहां थे. फिर कुछ साल बाद उल्टा हो जाएगा. मां-बाप अपने बच्चों के घर आने का इंतजार कर रहे होते हैं.उस वक्त बच्चों  के पास अपने माता पिता के लिए वक्त ही नही होता.इसलिए अभी मैं जितना समय दे सकता हूं,उतना देने की कोशिश करता हूं.

आपके दो बच्चे हैं. दोनों के साथ आपकी किस तरह की ट्यूनिंग है? फिलहाल किसमें क्या खूबी नजर आ रही है?

जेन छोटा है, लेकिन बहुत क्यूट है. मिशा बड़ी है, उसके साथ ज्यादा वक्त बिताती है. फिलहाल सबसे ज्यादा मजा दोनों को साथ साथ देखने में आता है. दोनों की आपस में रिलेशनशिप शुरू हो रही है. निशा तीन साल की है, जेड एक साल का है. तो आपस में उनका जो इंटरेक्शन है, वह किसी कौमेडी शो से कम नहीं है. दोनों को साथ में देखकर बहुत मजा आता है.

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हर कलाकार फिल्म प्रोडक्शन या लेखन या निर्देशन में कदम रख रहा है. आपने ऐसा कुछ नहीं सोचा?

कुछ तैयारी चल रही है. पर निर्देशन नहीं. फिल्म निर्माण करने की सोची है.

आप वेब सीरीज में अभिनय करना चाहेंगे?

वेब सीरीज के लिए समय बहुत चाहिए. अगर मुझे लगा कि मैं फिल्मों से अपना वक्त निकाल सकूंगा, तो जरूर करूंगा. देखिए, मैं मूंछ दाढ़ी चिपका कर एक साथ तीन तीन फिल्में नहीं कर सकता. मुझे हर किरदार में खुद को ढालना पसंद है. किरदार के अनुसार अपना लुक बदलना अच्छा लगता है. उसके बारे में सोचना और उसको धीरे धीरे अपने अंदर बिठाना मेरा ‘वर्क प्रोसेस’ है. इस वजह से मुझे एक फिल्म करने में आठ से नौ माह का वक्त लग जाता है.

जब आप कबीर सिंह जैसे किरदार में खुद को ढाल लेते है, तो उससे छुटकारा पाने के लिए क्या करते हैं ?

कुछ नहीं.. सर मैं घर आता हूं, बच्चों के साथ खेलता हूं. कबीर सिंह को भूल जाता हूं. कबीर सिंह के अंदर भी इतनी ताकत नहीं है कि वह मुझे मेरे बच्चों से जुदा करे.

कभी किसी किरदार ने…?

‘हैदर’ ने डिस्टर्ब किया था. लेकिन तब शादी नहीं हुई थी, बच्चे नहीं थे. इसलिए अकेलेपन में डिस्टर्ब हुआ था. लेकिन जब परिवार होता है, तो हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है. ऐसे में हम किसी भी किरदार को घर पर नहीं ला सकते. ‘हैदर’ का समय अलग था, इसलिए उससे बाहर निकलने में मुझे थोड़ा वक्त लगा था.

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