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होममेड स्क्रब: घर पर ऐसे बनाएं नेचुरल स्क्रब

अगर आप चाहें तो घर पर भी नेचुरल स्क्रब बना सकती हैं और वो भी कम समय में. नेचुरल स्क्रब बनाने की विधि भी काफी आसान है. यह स्क्रब पूरी तरह से नेचुरल होता है. तो आइए जानते हैं कि आप घर पर स्क्रब कैसे बनाएं.

स्क्रब बनाने के लिए सामग्री

दानेदार चीनी

औलिव आयल

बाउल

खुश्बूदार तेल

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कैसे बनाएं स्क्रब 

बाउल में एक कप चीनी ले लें. उसी कप से एक-तिहाई आलिव आयल ले लें. साथ में कुछ बूंदें खुश्बूदार तेल की भी मिला लें.

इन तीनों चीजों को अच्छी तरह से मिला लें.

इस मिश्रण को किसी कांच के बर्तन में पैक करके रख दें.

सुझाव

अगर आपके पास सुगंधित तेल नहीं है तो आप उसकी जगह नींबू के रस का भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

औलिव आयल न होने की स्थिति में नारियल का तेल भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

अगर आप नेचुरल स्क्रब बना रही हैं तो कुछ मात्रा में सी-साल्ट भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

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कैसे करें इस्तेमाल

इस स्क्रब को अपने चेहरे, कोहनी, घुटने, हाथ और पैर पर लगा सकते हैं. इसे सप्ताह में एक या दो बार लगाएं. स्क्रब लगाने से पहले प्रभावित अंग को अच्छी तरह साफ कर लें. उसके बाद इस मिश्रण को हल्के हाथों से लगाएं. शरीर के कटे या चोट लगी जगह पर इसे न लगाएं. इसके बाद पानी से धो लें और बाद में मौश्चराइजर लगा लें.

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क्यों दूर चले गए

सामाजिक मान्यताएं, संस्कार और परंपराएं व्यक्ति को अपने मकड़जाल में उलझाए रखती हैं. ऐसे में या तो वह विद्रोह कर के सब का कोपभाजन बने या फिर परिस्थितियों से समझौता कर के खुद को नियति के हाल पर छोड़ दे. किंतु यह जरूरी नहीं कि वह सुखी रह सके.

मैं भी जीवन के एक ऐसे दोराहे पर उस मकड़जाल में फंस गया कि जिस से निकलना शायद मेरे लिए संभव नहीं था. कोई मेरी मजबूरी नहीं समझना चाहता था. बस, अपनाअपना स्वार्थ भरा आदेश और निर्णय वे थोपते रहे और मैं अपने ही दिल के हाथों मजबूरी का पर्याय बन चुका था.

मैं जानता हूं कि पिछले कई दिनों से खुशी मेरे फोन का इंतजार कर रही थी. उस ने कई बार मेरा फैसला सुनने के लिए फोन भी किया था मगर मेरे पास वह साहस नहीं था कि उस का फोन उठा सकूं. वैसे हमारे बीच कोई अनबन नहीं थी और न ही कोई मतभेद था फिर भी मैं उस का फोन सुनने का साहस नहीं जुटा सका.

मैं ने कई बार यह कोशिश की कि खुशी को फोन पर सबकुछ साफसाफ बता दूं पर मेरा फोन पर हाथ जातेजाते रुक जाता और दिल तेजी से धड़कने लगता. मैं घबरा कर फोन रख देता.

खुशी मेरी प्रेमिका थी, मेरी जान थी, मेरी मंजिल थी. थोडे़ में कहूं तो वह मेरी सबकुछ थी. पिछले 4 सालों में हमारे बीच संबंध इतने गहरे बनते चले गए कि हम ने एकदूसरे की जिंदगी में आने का फैसला कर लिया था और आज जो समाचार मैं उसे देने जा रहा था वह किसी भी तरह से मनोनुकूल नहीं था. न मेरे लिए, न उस के लिए. फिर भी उसे बताना तो था ही.

मैं आफिस में बैठा घड़ी की तरफ देख रहा था. जैसे ही 2 बजेंगे वह फिर फोन करेगी क्योंकि इसी समय हम दोनों बातें किया करते थे. मैं भी अपने काम से फ्री हो जाता और वह भी. बाकी आफिस के लोग लंच में व्यस्त हो जाते.

मैं ने हिम्मत जुटा कर फोन किया, ‘‘खुशी.’’

‘‘अरे, कहां हो तुम? इतने दिन हो गए, न कोई फोन न कोई एसएमएस. मैं ने तुम्हें कितने फोेन किए, क्या बात है सब ठीक तो है न?’’

‘‘हां, ठीक ही है. बस, तुम से मिलना चाहता हूं,’’ मैं ने बडे़ अनमने मन से कहा.

‘‘क्या बात है, तुम ऐसे क्यों बोल रहे हो? न डार्लिंग कहा, न जानू बोले. बस, सीधेसीधे औपचारिकता निभाने लग गए. घर पर कोई बात हुई है क्या?’’

‘‘हां, हुई तो थी पर फोन पर नहीं बता सकता. तुम मिलो तो सारी बात बताऊंगा.’’

‘‘देखो, कुछ ऐसीवैसी बात मत बताना. मैं सह नहीं पाऊंगी,’’ वह एकदम घबरा कर बोली, ‘‘डार्लिंग, आई लव यू. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊंगी.’’

‘‘आई लव यू टू, पर खुशी, लगता है हम इस जन्म में नहीं मिल पाएंगे.’’

‘‘यही खुशखबरी देने के लिए तुम मुझ से मिलना चाहते थे,’’ खुशी एकदम असंयत हो उठी, ‘‘तुम ने जरा भी नहीं सोचा कि मुझ पर क्या बीतेगी. क्या सोचेंगे वे लोग जो हमें हमेशा एकसाथ देखते थे. यही है तुम्हारा प्यार. तुम्हारे कहने पर ही मैं ने मम्मीपापा को अपने रिश्ते के बारे में बताया था. आज क्या कहूंगी कि सब झूठ है,’’ इतना कहतेकहते खुशी रो पड़ी और फोन काट दिया.

इस के बाद मैं ने कितनी ही बार उसे फोन किया पर हर बार वह काट देती और अंत में उस ने फोन ही बंद कर दिया.

मैं एकदम परेशान हो गया. कहता भी तो किस से.

खुशी का मुझ से गुस्सा होना स्वाभाविक था. मैं ने ही उस से झूठेसच्चे वादे किए थे. मैं ने उस को एक सुनहरे भविष्य का सपना दिखाया था. अपना सुखदुख उस से बांटा था. उस ने हर समय मुझे एक रास्ता दिखाया था. मेरे बीमार होने पर वह बुरी तरह परेशान हो जाती थी और बिना कहे कई दवाइयां सीधे मेरे आफिस भिजवा देती और मेरे चपरासी को फोन कर के ढेर सारी हिदायतें भी देती. वह जानती थी कि मैं अपने प्रति बेहद लापरवाह हूं. आज मैं ने उस के सारे सपने पल भर में ही तोड़ दिए.

शाम को उदास मन और भरे दिल से मैं घर पहुंचा. मुझे देखते ही भाभी ने पूछा, ‘‘क्या बात है, तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘हां, ठीक है,’’ कहते हुए मैं रोंआसा सा हो गया. मुझे लगा कि वहां कुछ देर और खड़ा रहा तो आंसू न आ जाएं, इसलिए खुद को संभालता हुआ चुपचाप अपने कमरे में चला गया. बिस्तर पर गिरते ही मेरा सारा अवसाद आंखों के रास्ते बह निकला. रोतेरोते आंसू तो सूख गए पर भीतर का मन शांत न हो सका. थोड़ी देर में भाभी ने खाने के लिए पूछा. मैं ने कह दिया कि खा कर आ रहा हूं, भूख नहीं है पर खाया कब था, मैं अपने विचारों से जितना बचना चाहता था वे मुझे उतना ही सताने लगे.

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खुशी से मेरी मुलाकात 4 साल पहले आफिस के बाहर वाले बस स्टैंड पर हुई थी. उजला वर्ण, तीखी नाक, लंबा कद और सधी हुई देहयष्टि. ऊपर से कपडे़ पहनने का ढंग इतना निराला था कि मैं उसे देखे बिना नहीं रह सका और पहली ही नजर में वह आंखों के रास्ते दिल में उतर गई. हमारी चार्टर्ड बस और आफिस के छूटने का लगभग एक ही समय था. मैं 5 मिनट पहले ही बस स्टैंड पर पहुंच जाता. पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता था कि उस की आंखें निरंतर मुझे ही तलाशती रहती हैं. धीरेधीरे वह भी आतेजाते मुझे देख कर हंस देती. इस तरह हम एकदूसरे के करीब आ गए. उस के पिता नेवी में उच्च पद पर थे तथा मेरे पिता मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर थे.

बीतते दिनों के साथ खुशी से मेरा प्रेम भी परवान चढ़ता गया. हमारी मुलाकातों की संख्या और समय दोनों बढ़ते रहे. इस दौरान मुझे सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली एक बड़़ी कंपनी में बहुत अच्छा औफर मिला और मैं ने उसे स्वीकार कर लिया. अब दोनों के दफ्तरों में कई किलोमीटर का फासला हो गया था. इस के बावजूद भी हम कोई न कोई बहाना ढूंढ़ कर मिलते रहे. हम दोनों कभी फिल्में देखते तो कभी बिना मकसद बांहों में बांहें डाल कर इधरउधर घूमते.

एक दिन खुशी ने मेरे कंधे पर अपना सिर रख कर कहा, ‘अब बहुत हो चुकी है चुहलमस्ती. सीधीसीधी बात बताओ, कब मिला रहे हो मुझे अपनी मम्मी से.’

‘अरे, तुम तो दिल के रास्ते सीधा घर पर कब्जा करने की सोच रही हो,’ मैं ने मजाक के लहजे में कहा.

‘मेरे पापा अब रिटायर होने वाले हैं. वह चाहते हैं कि मेरी जल्दी से शादी हो जाए ताकि नौकरी में रहते हुए वह अपनी तमाम सुविधाओं का उपयोग कर सकें. रिटायरमेंट के बाद तो हम सिविलियन हो जाएंगे. फिर कहां ये सुविधाएं मिलेंगी.’

‘तो कोर्ट मैरिज कर लेंगे,’ मैं ने चुटकी लेते हुए कहा और उस के माथे पर घिर आई लटों को पीछे करने के बहाने उसे अपने अंक में भींच लिया. उस ने बिना कोई प्रतिवाद किए अपना सिर मेरे कंधों पर टिका दिया.

‘सच कहूं तो मुझे इन मजबूत कंधों की बहुत जरूरत है. प्लीज, मेरी बात को सीरियसली लेना, नहीं तो तुम्हारी खुशी तुम्हारे हाथ से निकल जाएगी,’ कहतेकहते वह रोंआसी हो गई.

मैं ने उस की भर आई आंखों के कोरों से बहने वाले आंसू के कतरे को अपनी उंगलियों से पोंछा, ‘तुम तो बेहद संजीदा हो गई हो.’

‘हां, बात ही कुछ ऐसी है. इन दिनों मेरे रिश्ते की बातें चल रही हैं. तुम एक बार अपने घर पर बात कर लेते तो मैं भी कम से कम उन्हें बता देती.’

‘कौन सी बात? मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा, ‘क्या कहोगी मेरे बारे में?’

‘यही कि तुम बेवकूफ हो, बुद्धू हो, एकदम बेकार और गुस्से वाले हो, पर तुम मेरे हो,’ कह कर पुन: खुशी ने मेरी गोद में सिर रख दिया. देर तक हम यों ही भविष्य के सपने संजोते रहे. मैं ने उस का हाथ अपने हाथों में रखा और उसे जल्दी ही बात करने का आश्वासन दिया. हम दोनों ही वहां से विदा हो गए.

घर पर मैं अपनी बात को इस ढंग से पेश करना चाहता था कि इनकार की कोई गुंजाइश ही न रहे और इस के लिए उचित अवसर तलाशता रहा.

भैया की शादी को 2 वर्ष हो चुके थे और उन का 8 माह का एक बेटा भी था. हमारे घर का माहौल बेहद सौहार्दपूर्ण था पर घर के सभी लोग एकसाथ नहीं मिल पाते थे.

मैं सपनों में जीने लगा था. एक दिन मैं आफिस में बैठा कोई काम कर रहा था कि तभी मेरे मोबाइल पर पापा का फोन आया. पता चला कि भैया का एक्सीडेंट हो गया और उन्हें काफी गंभीर चोटें आई हैं. वह जीवन नर्सिंगहोम में हैं. इस से पहले कि मैं वहां पहुंचता, भैया की निर्जीव देह को लोग एंबुलेंस में डाल कर घर ले जा रहे थे.

घर पर मरघट का सा सन्नाटा पसरा था. सभी एकदम स्तब्ध रह गए थे. भाभी तो जैसे पत्थर ही बन गईं और मम्मीपापा का रोरो कर बुरा हाल था. 2-3 दिनों तक घर का माहौल बेहद गमगीन रहा.

समय अपनी गति से चलता रहा. घर का माहौल धीरेधीरे संभलने लगा. खुशी मेरी विवशता समझती थी और दिल का हाल भी. जितनी बार भी समय निकाल कर मैं ने उस से संपर्क किया, बेहद नरम आवाज में वह संवेदना व्यक्त करती और मेरे घर पर आने की जिद करती. वह चाहती थी कि मैं अपने और उस के बारे में घर पर सबकुछ बता दूं मगर मैं ऐसा कर नहीं पा रहा था.

मम्मी भाभी को ले कर बेहद चिंतित और दुखी थीं. एक तो उन का बड़ा बेटा गुजर गया था, दूसरा जवान बहू का गम. उन्हें इस बात की बेहद चिंता थी कि बहू बाकी की तमाम उम्र इस घर में कैसे बिताएगी.

एक दिन खुशी और मैं पार्क में बैठे थे. वह भरे स्वर

में कहने लगी, ‘देखो, अब तक मैं पापा को जैसेतैसे टालती रही हूं पर अब और उन्हें टाल नहीं पाऊंगी. आज भी उन्होंने मुझे कई लड़कों के फोटो दिखाए हैं. तुम ने यदि अब तक अपने घर पर बात की होती तो मैं कम से कम तुम्हारे बारे में कुछ तो कह सकती. उन का इस तरह रोजरोज बात करना तो रुक जाता. मम्मी अकेले में कई बार मुझ से मेरी पसंद की तरफ भी इशारा करती हैं.’

‘तो फिर इंतजार किस बात का है,’ मैं ने खुशी से कहा, ‘तुम मेरे बारे में सबकुछ बता दो और मेरी मजबूरी भी उन्हें बता दो कि जैसे ही मुझे मौका मिला, मैं उन से मिलने आऊंगा.’

‘सच,’ उस ने अविश्वास भरे स्वर में ऐसे पूछा जैसे उसे मुझ पर शक हो.

‘तुम ऐसे अविश्वास से मुझे क्यों देख रही हो. तुम तो जानती हो कि मैं घर पर बात करने जा ही रहा था कि ऐसा हादसा हो गया,’ मैं ने कहा.

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‘ओह डार्लिंग, पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लग रहा था कि तुम इस बात को संजीदगी से नहीं ले रहे हो.’

‘मैं भी तुम्हारे बिना रह सकता हूं क्या?’ कह कर मैं ने उस के गालों पर एक प्यारा सा चुंबन जड़ दिया तो शर्म से खुशी ने अपनी पलकें झुका लीं और कस कर मुझ से लिपट गई.

एक दिन शाम को मैं घर आया. भाभी के मम्मीपापा आए हुए थे. मैं ने उन के चरण स्पर्श किए और बाथरूम में फ्रेश होने चला गया. मेरे आने पर भाभी चाय बना कर ले आईं. घर का माहौल बेहद गमगीन और घुटा हुआ था. खामोशी तोड़ने के लिए मम्मी ने पहल की थी.

‘बहनजी, अब तो मेरे बेटे को गुजरे हुए 3 महीने हो चुके हैं. किंतु बहू की ऐसी हालत मुझ से देखी नहीं जाती. मैं जब भी इसे देखती हूं कलेजा मुंह को आता है. क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता. आप ही कुछ बताइए न.’

‘मैं क्या कहूं, मैं ने तो अपनी बेटी आप को दी है. आप जैसा उचित समझें, करें,’ वह बेहद भावुक हो कर बोलीं.

‘आप इसे कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जाइए. वहां थोड़ा इस का मन तो बहल जाएगा,’ मम्मी ने कुछ सोचते हुए कहा.

‘नहीं, मम्मीजी, मैं इस घर को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी. मैं इस घर में बहू बन कर आई थी और यहीं से मेरी अंतिम विदाई भी होगी,’ भाभी धीरे से बोलीं.

‘तुम्हें यहां से कौन भेज रहा है बहू. मैं तो कह रही हूं कि कुछ दिनों के लिए मायके चली जाओ. वैसे तुम इस बात को भी ध्यान से सोचना कि तुम्हारे सामने सारी उम्र पड़ी है. तुम पहाड़ जैसा जीवन किस के सहारे काटोगी.’

‘मुन्ना है न, उसी में मैं उन का रूप देखती हूं,’ कहतेकहते भाभी की आंखें भर आईं.

‘बेटी, मुझे अपने बेटे के खोने से ज्यादा गम तुम्हारा है, क्योंकि मुझे तुम से हमदर्दी भी है और आत्मीयता भी. हम भला कब तक तुम्हारा साथ देंगे. एकल परिवारों की अपनी जन्मजात मुश्किलें हैं. कल अंकित की शादी होगी. उस की अपनी गृहस्थी बनेगी. हमारे जाने के बाद कौन कैसा व्यवहार करेगा…’

‘बहनजी, वैसे तो यह आप का पारिवारिक मामला है पर यदि अंकित की कहीं और बात नहीं चली हो तो संगीता भी तो…घर की बात घर में ही बन जाएगी और आप भी चिंतामुक्त हो जाएंगी. आप सोच लीजिए…’

उन के यह शब्द सुन कर मैं एकदम सकते में आ गया. मुझे लगा यदि मैं ने कोई कदम फौरन नहीं उठाया तो शायद किसी परेशानी में न फंस जाऊं.

‘आंटी, यह आप क्या कह रही हैं? मैं अपनी ही भाभी से…’ मैं ने कहा.

‘बेटा, जब भाई ही नहीं रहा तो यह रिश्ता कैसा,’ मम्मी ने कहा. जैसे वह भी इस रिश्ते को स्वीकार कर के बैठी थीं.

‘लेकिन मम्मी…’ मैं ने चौंक कर कहा.

‘ठीक है, तो सोच कर बता देना,’ मम्मी बोलीं, ‘हम ने तो बिना झिझक एक बात कही है. बाकी तुम जैसा उचित समझो, बता देना.’

मेरे लिए अब वहां का माहौल बेहद बोझिल होता जा रहा था. मुझ से और देर तक वहां बैठा नहीं गया और मैं उठ कर चला गया.

मेरे लिए अब बेहद जरूरी हो गया था कि मैं घर पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दूं, पर भाभी की उपस्थिति में मैं कोई बात नहीं करना चाहता था. इधर मुझ पर लगातार खुशी का दबाव बढ़ता जा रहा था.

एक दिन भाभी किसी काम से बाजार गई हुई थीं. मम्मीपापा बाहर बरामदे में बैठे थे. उचित अवसर देख कर मैं ने बिना कोई भूमिका बांधे कहा, ‘मम्मी, मैं एक लड़की को पसंद करता हूं. पिछले कई सालों से मेरा उस के साथ परिचय है और हम शादी करना चाहते हैं.’

‘ये प्रेमप्यार सब बेकार की बातें हैं. तुम जिसे प्रेम कहते हो वह महज कुछ ही दिनों का बुखार होता है,’ पापा ने एक तरह से मेरा प्रस्ताव ठुकरा दिया.

‘नहीं, यह बात नहीं है,’ मैं ने मजबूती से कहा.

‘बेटा, हम तुम्हारा कोई बुरा थोड़े ही चाहेंगे,’ मम्मी ने गरमाए माहौल की तीव्रता को कम करने की कोशिश की, ‘संगीता को इस घर में रहते हुए लगभग 2 साल हो चुके हैं. अब वह हम सब को अच्छी तरह जान चुकी है और हम उसे. नई लड़की इस घर में कैसे एडजेस्ट करेगी, यह कौन जानता है. इस हादसे के बाद तो वह इस घर में पूरी तरह समर्पित रहेगी. संगीता और तुम हमउम्र हो. तुम ने दुनियादारी को अभी ठीक से जाना नहीं है. आज जिसे तुम अपनी पत्नी बना कर लाना चाहते हो, क्या पता वह संगीता के साथ कैसा व्यवहार करे और तुम्हारा संगीता से मिलना उसे कितना उचित लगे. ऐसा नहीं है कि संगीता के मातापिता के कहने के बाद हम ने ऐसा निर्णय लिया है. सोच तो हम लोग पहले से रहे थे पर यह सब कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. अब अगर उस के घर वालों की भी ऐसी इच्छा है तो हमें कोई एतराज नहीं है.’

‘लेकिन मम्मी, मैं जिसे भाभी मानता आया हूं उसे पत्नी बनाने के बारे में कैसे सोच सकता हूं. यह शादी आप की नजरों में नैतिक हो सकती है पर युक्तिसंगत नहीं. मेरे भी अपने कुछ अरमान हैं, फिर मेरे उस लड़की के प्रति वादे और कसमें…’

‘अरे, बेटा, यह प्रेमप्यार कुछ दिनों का बुखार होता है. वह अपने घर में एडजेस्ट हो जाएगी और तुम अपने घर में,’ पापा ने अपनी बात फिर से दोहराई.

मैं ने उन्हें लाख समझाने की कोशिश की पर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा.

मेरे पास अब 2 ही विकल्प बचे थे. मैं या तो संगीता भाभी से विवाह करूं या इस घर को छोड़ कर अपनी इच्छानुसार गृहस्थी बसा लूं. भैया की मौत के बाद अब मैं ही उन का सहारा था. मुझ से अब उन की सारी आशाएं बंधी थीं. हर हाल में वज्रपात मुझ पर ही होना था. यह तो सच था कि इस विवाह से न तो मैं सुखी रह सकता, न संगीता भाभी को खुश रख सकता और न ही खुशी ही सुखी रहती.

परिस्थितियां धीरेधीरे ऐसी बनती गईं कि मैं घर में तटस्थ होता चला गया और अंतर्मुखी भी.

हार कर इस घर की भलाई और मातापिता के फर्ज को निभाने के लिए मुझे ही अपनी कामनाओं के पंख समेटने पडे़. मुझे नहीं पता था कि नियति मेरे साथ ही ऐसा खेल क्यों खेल रही है. कहने को सब अपने थे पर अपनापन किसी में नहीं था.

मैं ने खुशी को कई बार फोन करने की कोशिश की मगर हर बार नाकामयाबी हाथ लगी. मैं उस की हालत भी अच्छी तरह जानता था. मैं ने उसे सचमुच कहीं का नहीं छोड़ा था. उस का गम मेरे गम से काफी गहरा था. आज मुझे उस की और उसे मेरी सख्त जरूरत थी पर वह मुझ से बहुत दूर जा चुकी थी. मैं ने भी समझ लिया कि मुझ पर अब जिंदगी कभी मेहरबान नहीं हो सकती. मेरे सारे सपने पलकों में ही लरज कर रह गए और सारी हसरतें सीने में ही दफन हो कर रह गईं.

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अचानक घर से संगीता भाभी का फोन आया तो मैं चाैंक पड़ा. मैं सपनों की जिस दुनिया में घूम रहा था, उस से बाहर निकल कर मोबाइल को कान से लगा लिया.

‘‘सौरी, मैं ने तुम्हें इस समय फोन किया. क्या तुम अभी घर पर आ सकते हो?’’

मैं एकदम घबरा गया. मुझे लगा मेरे लिए एक और आघात प्रतीक्षा कर रहा है. मैं ने पूछा, ‘‘क्या बात है. सब ठीक तो है?’’

‘‘सब ठीक नहीं है. बस, तुम घर आ जाओ,’’ इस बार भाभी का निवेदन आदेश में बदल गया.

‘‘बात क्या है?’’ मैं ने फिर पूछा.

‘‘सच बात तो यह है कि मैं ठीक से जानना चाहती हूं कि तुम इस विवाह से खुश हो या नहीं. मैं चाहती हूं कि तुम इसी समय घर पर आ जाओ. मम्मीपापा घर पर नहीं हैं. ऐसे में तसल्ली से बैठ कर बात हो सकेगी ताकि हम कोई निर्णय ले सकें.’’

मुझे लगा शायद यही ठीक होगा. जो औरत मेरी जिंदगी का हिस्सा बनना चाहती है उसे मैं सबकुछ बता दूंगा पर खुशी की बात को छिपा जाऊंगा ताकि उस के भविष्य में कोई बाधा न पहुंचे.

मैं ने जैसे ही घर में कदम रखा, सामने खुशी बैठी थी. मेरा तनबदन एकदम सिहर उठा. पता नहीं, खुशी क्या कह चुकी होगी.

‘‘इसे पहचानते हैं, इस का नाम खुशी है,’’ भाभी ने भेद भरी नजरों से मुझे देखा, ‘‘मैं ने ही इसे यहां बुलाया है. मुझे इतना कमजोर और स्वार्थी मत समझना. तुम्हारे हावभाव से मैं समझ चुकी थी कि तुम किसी को बहुत चाहते हो. मुझे लगा, ऐसे घुटघुट कर जीने से क्या फायदा. जिंदगी जीने और काटने में बड़ा फर्क होता है अंकित, और तुम्हारी जिंदगी तो खुशी है, फिर परिस्थितियों से डट कर मुकाबला क्यों नहीं कर सकते. जब किसी से कोई सच्चा प्यार करता है तो उस के दिल में हमेशा वही बसा रहता है, फिर तुम मुझे कैसे खुश रख सकोगे?

‘‘मैं ने बड़ी मुश्किल से इस का नंबर तुम्हारे मोबाइल से ढूंढ़ा था. अपनी इस गलती के लिए मैं तुम से माफी मांगती हूं. जब मैं ने तुम्हारी सारी स्थिति खुशी के सामने रखी तो इस ने फौरन मुझ से मिलने की इच्छा जाहिर की.’’

‘‘मम्मीपापा मानेंगे क्या?’’ मैं ने अपनी शंका रखी.

‘‘जानते हो, वे दोनों खुशी के घर ही गए हैं इस का हाथ मांगने और यह पूरी की पूरी तुम्हारे सामने खड़ी है,’’ कहतेकहते भाभी की आंखें भर आईं और वह भीतर चली गईं.

मैं ने खुशी को कस कर अंक में भींच लिया. खुशी मुझ से अलग होते हुए बोली, ‘‘तुम मेरा सबकुछ ले कर क्यों दूर चले गए थे.’’

‘‘तुम ने भी तो जल्दी हार मान ली थी,’’ कहतेकहते मैं रो पड़ा.

तब तक भाभी मेरे लिए पानी ले कर आ गईं. मैं ने पूछा, ‘‘लेकिन भाभी, आप ने अपने बारे में क्या सोचा है?’’

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लाइसेंस

रोहित तुरंत मिस्टर सूद के केबिन में पहुंच गया. सूद साहब कुछ परेशान लग रहे थे. रोहित भांप गया कि कोई गंभीर बात है.‘‘बैठो,’’ कुरसी की तरफ इशारा करते हुए सूद साहब ने रोहित से कहा.

‘‘मिस्टर रोहित, मेरी पोजीशन बहुत खराब हो रही है,’’ सूद साहब ने धीमी और कांपती आवाज में कहना शुरू किया, ‘‘पहली तारीख को बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स की मीटिंग है. फैक्टरी तैयार हो चुकी है, ट्रायल उत्पादन कल से शुरू होना है, लेकिन फैक्टरी शुरू करने का लाइसेंस अभी तक नहीं मिला है. अभीअभी दत्ता से खबर मिली है कि विस्फोटक विभाग में हमारी फाइल अटक गई है और वहां से कारण बताओ नोटिस जारी होने वाला है.’’

एक पल रुक कर सूद साहब ने फिर कहना शुरू किया, ‘‘रोहित, यदि लाइसेंस मिलने में देर हो गई तो हम किसी को अपना मुंह नहीं दिखा सकते हैं. बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स द्वारा मीटिंग के फौरन बाद प्रेस कान्फ्रेंस में फैक्टरी में उत्पादन शुरू होने की घोषणा की जानी है और बिना लाइसेंस के उत्पादन शुरू नहीं कर सकते. जबकि उत्पादन हमें हर हालत में शुरू करना है, क्योंकि अगले महीने हमारा प्रतिद्वंद्वी अपना उत्पादन शुरू कर के बाजार पर कब्जा करना चाहता है.

‘‘दत्ता ने खबर दी है कि उन्होंने हमारी कंपनी के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज की है ताकि कंपनी को वर्क लाइसेंस मिलने में देर हो जाए और बाजी वह मार ले. मैं ऐसा किसी भी कीमत पर नहीं होने दूंगा. यदि हमारा उत्पादन शुरू नहीं हुआ तो कंपनी के शेयर डूब सकते हैं और हम कहीं के नहीं रहेंगे,’’ कह कर सूद साहब चुप हो गए.

‘‘यह सब अचानक कैसे हो गया, सर?’’ रोहित ने पूछा.

‘‘यह सबकुछ मुझे विपिन का कियाधरा लगता है. बहुत ही शातिर निकला. मुझ से एक सप्ताह की छुट्टी ले कर गया था कि लखनऊ शादी में जाना है और आज सुबह ईमेल से इस्तीफा भेज दिया. वह लखनऊ गया ही नहीं बल्कि उस ने दूसरी कंपनी ज्वाइन कर ली है और यहां की तमाम गोपनीय बातें दूसरी कंपनी को बता कर हमारी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया.’’

‘‘मैं उसे किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ूंगा.’’

‘‘दूसरी कंपनी ने हमारी कंपनी के खिलाफ शिकायत की है, जिस के आधार पर लाइसेंस रोक लिया गया है. दत्ता को मैं ने नवयुग सिटी में रोक रखा है. तुम फौरन वहां चले जाओ. दत्ता अकेले काम संभाल नहीं पा रहा है. उस के साथ मिल कर तुम्हें किसी भी कीमत पर लाइसेंस लेना है. साम, दाम, दंड, भेद किसी भी नीति से मुझे फैक्टरी शुरू करने का लाइसेंस चाहिए. पैसा पानी की तरह बहता है तो बहा दो पर बिना लाइसेंस के आफिस में मत घुसना. मेरे कहने का मतलब तुम अच्छी तरह से समझ गए होगे…अब तुम जा सकते हो.’’

मिस्टर सूद की बात सुन कर रोहित परेशान हो गया. खासतौर पर आखिरी शब्द तीर की तरह उस के सीने के पार चले गए कि किसी भी कीमत पर लाइसेंस लेना है और बिना लाइसेंस के आफिस में मत घुसना.

सूद के आदेश के अनुसार उसे फौरन नवयुग सिटी के लिए रवाना होना था, इसीलिए वह फटाफट ब्रीफकेस उठा कर घर चला गया.

घर आ कर रोहित ने अपने कपडे़ सूटकेस में डालते हुए पत्नी श्वेता को चाय बनाने को कहा.

‘‘क्या बात है, आफिस से जल्दी आ कर सूटकेस तैयार कर रहे हो?’’ श्वेता ने चाय बनाते हुए पूछा.

‘‘आफिस के काम से आज और अभी नवयुग सिटी जाना है. काम इतना जरूरी है कि वहां 2-3 दिन भी लग सकते हैं,’’

‘‘रोहित, तुम जहां जा रहे हो उस के पास ही न्यू समरहिल है. एक दिन के लिए वहां चले चलो,’’ श्वेता बोली.

‘‘मुश्किल है,’’ रोहित बोला.

‘‘काम खत्म होने पर एक दिन की छुट्टी ले लेना. काम के साथ आराम और मौजमस्ती भी हो जाएगी,’’ कहतेकहते श्वेता चाय के साथ कमरे में आ गई.

‘‘श्वेता, यदि काम हो गया तो एक दिन क्या एक सप्ताह न्यू समरहिल के नाम,’’ रोहित ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा.

चाय पी कर रोहित ने सूटकेस उठाया और नवयुग सिटी के लिए रवाना हो गया.

रोहित पिछले 5 सालों से सूद की कंपनी में जरनल मैनेजर है और अपने 20 साल के कैरियर में उस ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. सफलता की जिन ऊंचाइयों को आज रोहित छू रहा है उस की एक वजह यह भी है कि उस ने कभी असफलता का स्वाद नहीं चखा था.

नवयुग सिटी, जहां विस्फोटक विभाग का मुख्यालय है, रात के 9 बजे रोहित ब्रिस्टल होटल में पहुंचा तो दत्ता ने उस का जोरदार स्वागत इन शब्दों से किया, ‘‘आइए, रोहित साहब, आप को देख कर तो इस मुरदे में भी जान आ गई है.’’

रोहित अपना सूटकेस एक तरफ रख कर बाथरूम में घुस गया.

नहाने के बाद अपने को तरोताजा महसूस करता रोहित कुरसी खींचते हुए दत्ता से बोला, ‘‘यहां नवयुग सिटी में अकेले खूब मौज मना रहे हो.’’

‘‘प्यारे रोहित,’’ दत्ता मायूस हो कर बोला, ‘‘मैं कितना मौज मना रहा हूं यह मेरे दिल से पूछो.’’

‘‘पूछ तो रहा हूं दत्ता साहब कि वह ऐसा कौन सा गम है जिसे आप शराब के हर घूंट के साथ पीए जा रहे हैं.’’

‘‘वही लाइसेंस का गम. क्योंकि लाइसेंस तो मिलना नहीं फिर तो नौकरी के हाथ से निकलने का गम,’’ दत्ता की आवाज में गंभीरता थी.

‘‘मजाक छोड़ कर सीरियस बात करो, दत्ता,’’ रोहित ने गंभीरता से कहा.

‘‘रोहित, आज दोपहर को मिस्टर सूद से मैं ने बात की थी कि लाइसेंस नहीं मिल रहा है. यह सुन कर उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि अगर लाइसेंस नहीं मिला तो आफिस मत आना. मैं ने सारे पापड़ बेल कर देख लिए, रोहित, कल फाइल पर साइन हो जाएंगे. सहायक कंट्रोलर मोहन तो आज ही हमारी कंपनी की फाइल पर साइन कर के आवेदनपत्र को निरस्त कर रहे थे, बहुत मिन्नतों के बाद एक दिन के लिए फाइल को पेंडिंग किया है. तभी तो मिस्टर सूद ने आप को यहां भेजा है,’’ दत्ता कहतेकहते रुक गया.

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‘‘सूद साहब ने खुला आफर दिया है कि जितना पैसा खर्च हो, लाइसेंस हर हालत में चाहिए,’’ रोहित ने दत्ता से कहा, ‘‘मेरी पूरी अटैची नोटों से भरी हुई है.’’

‘‘देखो रोहित, हमारी कंपनी की फाइल असिस्टेंट कंट्रोलर मोहन के पास है और वह रिश्वत नहीं लेता है.’’

‘‘दत्ता, मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि आज के समय में कोई रिश्वत नहीं लेता है,’’ रोहित ने आश्चर्य से कहा.

‘‘सच यही है कि आज के इस भ्रष्ट दौर में मोहन जैसा ईमानदार व्यक्ति भी है.’’

‘‘उस की कोई तो कमजोरी होगी, जिस का हम फायदा उठा सकते हैं,’’ रोहित ने समय की नजाकत को भांपते हुए पूछा.

‘‘शरीफ आदमी की कोई कमजोरी नहीं होती है. शराफत ही उस की कमजोरी समझो या ताकत, मुझे मालूम नहीं, लेकिन एक बात साफ है कि उस का भ्रष्ट न होना हमें भारी मुसीबत में डाल सकता है. मुझे पता है कि तुम ने जिंदगी में कभी असफलता का मुंह नहीं देखा है, लेकिन इस बार सावधान रहना.’’

‘‘दत्ता, मोहन तो असिस्टेंट कंट्रोलर है, हम चीफ कंट्रोलर से मिल सकते हैं.’’

‘‘रोहित, कोई फायदा नहीं होने वाला है. फाइल पर मोहन की लिखी टिप्पणी को चीफ कंट्रोलर भी नजरअंदाज नहीं कर सकता है.’’

‘‘मगर क्यों?’’

‘‘लगता है मिस्टर सूद ने तुम्हें पूरी बात बताई नहीं है, तभी तुम ज्यादा उत्साहित लग रहे हो,’’ दत्ता ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘रोहित, विस्फोटक नियमों के अनुसार हमें कंपनी में जितना खुला क्षेत्र रखना था उस का आधा भी नहीं रखा है, जिस की लिखित शिकायत हमारी प्रतिद्वंद्वी कंपनी ने की है, जिस के आधार पर अब हमारी फैक्टरी को ‘शो काज’ नोटिस दिया जाएगा और हम बिना लाइसेंस के प्रोडक्शन शुरू नहीं कर सकते. नियमों का पालन करने का मतलब है, फैक्टरी में तोड़फोड़ और पैसे व समय की बरबादी, जिसे सूद साहब बरदाश्त नहीं कर सकते हैं.’’

‘‘क्या हमें नियम मालूम नहीं थे?’’

‘‘मालूम थे, लेकिन एक तो सूद साहब का लालच और दूसरे कुछ लोगों की गलत राय. फैक्टरी पहले नियमों के अनुसार बन रही थी, खुला क्षेत्र भी नियमों के अनुसार ही छोड़ा जा रहा था लेकिन बाद में नक्शे में परिवर्तन कर के खुला क्षेत्र कम कर दिया गया.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’

‘‘ज्यादा प्रोडक्शन के लिए और अधिक मशीनें लगाई गई हैं.’’

दत्ता ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शायद विपिन की कहानी का पता नहीं है. दरअसल, विपिन ने मिस्टर सूद को सलाह दी थी कि लाइसेंस लेने के बाद ओपन एरिया कवर करना चाहिए, लेकिन कुछ दूसरे लोगों के कहने पर और पैसे के घमंड में सूद साहब ने खुलेआम सभी के सामने विपिन को डांट लगाई और उस की खिल्ली उड़ाई. विपिन अपने इस अपमान को सहन नहीं कर सका और उस ने नौकरी छोड़ दी.

‘‘शायद अपने अपमान का बदला लेने के लिए ही विपिन ने प्रतिद्वंद्वी कंपनी ज्वाइन की है और उस की लिखित शिकायत पर विस्फोटक विभाग भी चुप नहीं बैठा. चूंकि वह जांच में भरपूर मदद कर रहा है, इसलिए हमें लाइसेंस नहीं मिल रहा है.’’

‘‘चलो, सुबह देखते हैं,’’ कह कर रोहित बिस्तर पर लेट गया, लेकिन काफी देर तक उस की आंखों में नींद नहीं आई. आंखें बंद कर सोचता रहा कि कैसे इस मसले को हल किया जाए.

सुबह 10 बजे रोहित और दत्ता विस्फोटक विभाग के मुख्यालय पहुंच गए और मोहन के केबिन के बाहर बैठ कर इंतजार करने लगे. मोहन जैसे ही दफ्तर आया, अपने केबिन के आगे रोहित को बैठा देख कर वह रुक गया.

‘‘रोहित, तुम और यहां…अरे, यह कैसा सुखद आश्चर्य है,’’ मोहन खुशी से हंसते हुए बोला.

‘‘मोहन, आज हम सालों बाद एकदूसरे से मिल रहे हैं तो साबित होता है कि दुनिया गोल है.’’

‘‘रोहित, चलो, केबिन मेें बैठ कर आराम से बात करते हैं.’’

मोहन और रोहित दोनों बचपन के दोस्त थे. स्कूल और कालिज में एकसाथ पढ़ते थे. दोनों के परिवार पुरानी दिल्ली के कूचा घासीराम में रहते थे. हमउम्र और एक ही गली में रहने के कारण दोनों का समय एकसाथ बीतता था. वे सिर्फ रात को सोने के लिए एकदूसरे से अलग होते थे. स्कूल और कालिज में एकसाथ पढ़ाई की. बी.काम. करने के बाद रोहित एमबीए करने अमेरिका चला गया और मोहन ने नौकरी कर ली.

इतने में चपरासी चाय ले आया. चाय की चुस्कियों में मोहन ने रोहित से पूछा, ‘‘आजकल रिहाइश कहां रखी है? लगभग 10 साल पहले मैं दिल्ली गया था. तुम ने मकान बेच दिया था. बहुत कोशिशों के बाद भी मुझे तुम्हारे नए मकान का पता नहीं चला. तब मैं ने देखा था कि आसपास सभी जगह आफिस बन गए थे और जिस बिल्ंिडग में मैं रहता था वहां बैंक खुल गया था.’’

‘‘हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद जब मैं दिल्ली वापस आया तब तुम मकान छोड़ कर जा चुके थे. 2-3 साल बाद मेरे घर वालों ने भी मकान बेच कर ग्रेटर कैलाश में कोठी बनवा ली. तभी से परिवार के साथ वहीं रह रहा हूं.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ, इस आफिस में तुम्हारा कैसे आना  हुआ?’’ मोहन ने पूछा.

‘‘मोहन, मैं सूद एंड कंपनी में जनरल मैनेजर हूं और यहां लाइसेंस के सिलसिले में आया हूं.’’

कुछ पल की खामोशी के बाद मोहन ने कहा, ‘‘बचपन के दोस्त हो और लगभग 20 सालों के बाद मिले भी तो किन हालात में, यह इत्तफाक भी अजीब सा है.’’

रोहित भी कुछ बोल न सका. बचपन के साथी से लाइसेंस की कोई बात न कर सका.

चुप्पी तोड़ते हुए मोहन ने कहा, ‘‘रोहित, तुम्हारे आने का मकसद मैं समझ सकता हूं लेकिन मैं तुम्हारी मदद नहीं कर सकता हूं. तुम्हारी कंपनी के खिलाफ शिकायत की मैं ने जांच करवाई है, मेरे कुछ सिद्धांत हैं. मैं रिश्वत नहीं लेता हूं और निरीक्षण के दौरान जो अनियमितताएं पाई गई हैं उन के आधार पर लाइसेंस के लिए मैं अनुमति नहीं दे सकता हूं.’’

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‘‘मोहन, इस बारे में अब मैं क्या बोलूं. फिर भी तुम से दिल की बात कह सकता हूं, क्योंकि तुम बचपन के दोस्त हो. जीवन में कभी मैं ने असफलता का सामना नहीं किया. अगर लाइसेंस नहीं मिला तो मुझे नौकरी छोड़नी पड़ेगी और पहली बार असफलता का कारण दोस्ती बनेगी. मुझे अपनी इस असफलता पर तुम से कोई शिकायत भी नहीं होगी, लेकिन मोहन, कुछ रास्ता निकालो. हर समस्या का कोई न कोई समाधान तो होता है न. इस भ्रष्ट समाज में तुम जैसे ईमानदार आदमी को देख कर मुझे खुशी है. और सब से अधिक खुशी इस बात की है कि वह ईमानदार आदमी मेरा बचपन का सखा है.’’

रोहित की बात सुन कर मोहन ने कहा, ‘‘रोहित, मैं जानता हूं कि यहां मुझे छोड़ कर हर कोई भ्रष्ट है, मैं समाज से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं कर सकता. हां, तरीके तो बहुत हैं, मुझे सोचने के लिए वक्त दो. कल सुबह बात करते हैं.’’

‘‘तुम बुरा तो नहीं मानोगे,’’ झिझकते हुए रोहित ने मोहन से पूछा, ‘‘क्या शाम को मैं तुम्हारे घर आ सकता हूं?’’

‘‘तुम्हारा ही घर है, बेझिझक आ सकते हो,’’ कहते हुए मोहन ने एक कागज पर अपने घर का पता लिख कर रोहित को पकड़ा दिया.

रोहित और दत्ता होटल आ गए.

शाम को रोहित और दत्ता मोहन के घर रूप नगर के लिए चले. रास्ते में एक मिठाई की दुकान पर रुक कर रोहित ने मिठाई खरीदी.

‘‘कुछ गिफ्ट ले चलते हैं,’’ दत्ता ने कहा.

‘‘नहीं, दोस्ती को मैं पैसे में नहीं तोलना चाहता हूं. ऐसे दोस्त बहुत तकदीर से मिलते हैं. अगर आज पहली बार असफलता भी मिले तो कोई गम नहीं, क्योंकि मैं अपने दोस्त को खोना नहीं चाहता हूं. सोच लिया है कि अगर लाइसेंस नहीं मिला तो नौकरी छोड़ दूंगा.’’

इतने में मोहन का घर आ गया. 200 मीटर के प्लाट पर सिर्फ 2 कमरों का सेट बना था और सारा प्लाट खाली. घर के बाहर और अंदर दीवार के साथ फलदार पेड़ और पौधे घर की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे.

मोहन ने रोहित और दत्ता का स्वागत किया. घर के अंदर बैठक में मोहन की पत्नी नीलम ने नाश्ते का इंतजाम कर रखा था. रोहित ने नीलम को मिठाई का डब्बा पकड़ाते हुए धीरे से हेलो कहा.

चाय पीने के बाद मोहन ने रोहित को अपना घर दिखाया, ‘‘यह बैठक कम हमारा बेडरूम है, दूसरा बच्चों का बेडरूम, रसोई, बाथरूम और पीछे लान, जहां नीबू के झाड़ के साथ पपीते और अमरूद के पेड़ हैं.

‘‘एक छोटा सा साफसुथरा घर, जहां जरूरत की हर चीज बड़े करीने से मौजूद थी, लेकिन कोई भी विलासिता का सामान नजर नहीं आया.

‘‘यार, मोहन, तुम ने खाली प्लाट छोड़ रखा है, 1-2 कमरे और बनवा लो.’’

‘‘उस के लिए रकम चाहिए और तुम तो जानते हो कि रिश्वत मैं लेता नहीं और तनख्वाह में यह मुश्किल है, क्योंकि बच्चे बड़े हो रहे हैं, उन की पढ़ाई और कुछ भविष्य के लिए भी बचत करनी है.’’

‘‘बच्चे नजर नहीं आ रहे हैं,’’ रोहित ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘भई, तुम्हारे लाइसेंस के चक्कर में बच्चों का जिक्र तो रह ही गया. एक लड़का और एक लड़की हैं. दोनों कालिज में पढ़ते हैं और छुट्टियां मनाने वे न्यू समरहिल गए हैं. मैं भी पत्नी के साथ कल सुबह 10 दिन के लिए, बच्चों के पास जा रहा हूं. शाम को छुट्टी मंजूर करवाई है.’’

छुट्टी का नाम सुनते ही रोहित हक्काबक्का रह गया.

मोहन इस बात को भांप गया था. चेहरे पर मुसकराहट लाते हुए बोला, ‘‘मेरे दोस्त, तुम इस बात को नहीं समझ सकते पर आफिस में मेरी मौजूदगी में तुम्हें लाइसेंस मिल नहीं सकता है क्योंकि ऐसे काम मेरी गैरमौजूदगी में होते हैं. सारी दुनिया के गलत काम होते हैं, एक और सही, दोस्ती की खातिर, इसीलिए मैं ने चीफ साहब से बात कर ली है. मैं 10 दिन की छुट्टी जा रहा हूं, तुम्हारा काम हो जाएगा.’’

रोहित को अपनी काबिलीयत और पैसे पर घमंड था. वह हमेशा समझता था कि पैसे के बलबूते सबकुछ संभव है, लेकिन आज यहां बाजी पलट गई. पैसे पर बचपन की दोस्ती हावी हो गई. पैसा हार गया और दोस्ती जीत गई. रोहित, मोहन की बात चुपचाप सुनता रहा.

‘‘रोहित, जब भी मेरे द्वारा आब्जेक्शन फाइल को पास करना होता है तो मुझे छुट्टी पर भेज दिया जाता है, ताकि कोई दूसरा अफसर उसे पास कर सके, आज मैं ने खुद छुट्टी मांगी है ताकि तुम्हारा काम हो सके. चलो, छोड़ो इस विषय को, रात काफी हो चुकी है, डिनर करते हैं.’’

खाना खाते हुए दत्ता पहली बार बोला, ‘‘मोहनजी, मैं आप के सिद्धांतों की कद्र करता हूं, क्या मैं आप का दोस्त बन सकता हूं?’’

‘‘बेशक, हर सच्चा आदमी मेरा दोस्त बन सकता है.’’

‘‘मैं आप की कसौटी पर खरा उतरने की भरपूर कोशिश करूंगा.’’

डिनर के बाद रोहित और दत्ता होटल वापस आ गए पर रोहित खामोश ही बना रहा. दत्ता ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘‘रोहित, तुम्हें अपने दोस्त पर गर्व होना चाहिए, जिस ने दोस्ती पर सिद्धांतों की बलि दे दी. जिस काम को पैसे नहीं कर सके उसे दोस्ती ने कर दिखाया.’’

‘‘लेकिन पैसे तो फिर भी लगेंगे,’’ रोहित ने कहा.

‘‘आज पहली बार असफल हुए हो रोहित, पर मेरी बात मानो, इस दोस्ती को कभी मत छोड़ना,’’ दत्ता बेहद भावुक हो गया था.

अगली सुबह मोहन आफिस में नहीं था. उस के सहयोगी सोहन के पास फाइल भेज दी गई. फाइल में से आपत्तिजनक कागजों को निकाल कर दूसरे कागज लगा दिए गए. आफिस में बैठ कर फैक्टरी का निरीक्षण भी हो गया और संतोषजनक रिपोर्ट लगा कर 3 दिन में लाइसेंस जारी कर दिया गया. कल तक जो काम असंभव लग रहा था पैसों के बोझ में दब कर संभव हो गया. लाइसेंस हाथ में आते ही रोहित खुशी से उछल पड़ा, झट से सूद साहब को फोन किया.

‘‘गुड न्यूज, सर, लाइसेंस मिल गया.’’

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‘‘वैल डन रोहित, मैं जानता था कि तुम यह काम कर लोगे, इसीलिए मैं ने तुम्हें यह काम सौंपा था,’’ सूद साहब की आवाज में एक नई ताकत नजर आ रही थी.

‘‘रोहित, तुम मानो या न मानो, पर तुम ने बाजी जीत कर हारी है और मोहन ने दोस्ती के नाम पर अपने सिद्धांतों की बलि दे कर बाजी जीत ली है,’’ इतना कह कर दत्ता मंदमंद मुसकरा रहा था और रोहित अवाक् हो उस को देखता रह गया.

महमोहन भाटिया  

कहीं आप भी तो नही हैं स्ट्रैच मार्क्स से परेशान

स्ट्रैच मार्क्स यानी स्किन पर खिंचाव के निशान. वैसे महिलाओं में प्रैग्नेंसी के बाद होने वाली यह एक आम परेशानी है, लेकिन कई बार देखा गया है कि वजन कम करने के बाद भी इस तरह के निशान स्किन पर देखे जाते हैं. यही नहीं महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों में भी स्ट्रैच मार्क्स एक आम समस्या बनते जा रहे हैं. स्टैच मार्क्स कई तरह के होते हैं, जिन के होने की कुछ अलगअलग वजहें हो सकती हैं. लेकिन इन से घबराने की जरूरत नहीं है.

महिलाएं और पुरुष इस तरह के निशानों को कुछ साधारण घरेलू उपायों से दूर कर सकते हैं. इस के अलावा कुछ खास क्रीमों और औयल आदि की नियमित मालिश से भी इन निशानों से छुटकारा पाया जा सकता है.

क्यों होते हैं स्ट्रैच मार्क्स

शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर हमारी स्किन अलगअलग प्रकार की यानी कहीं सख्त तो कहीं मुलायम होती है. लेकिन मुख्य तौर पर स्किन की 3 परतें होती हैं- पहली परत यानी बाहरी स्किन को ऐपिडर्मिस, दूसरी परत को डर्मिस और सब से निचली यानी अंतिम परत को हाइपोडर्मिस कहते हैं.

शरीर पर दिखाई देने वाले खिंचाव के निशान हमारी स्किन की बीच की परत में होते हैं, जो किसी तंतु या कोशिका में होने वाले खिंचाव की वजह से पैदा होते हैं.

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आमतौर पर महिलाओं में प्रैग्नेंसी के दौरान या डिलिवरी के बाद शरीर के निचले हिस्सों यानी पेट, कमर या साइड में स्ट्रैच मार्क्स हो जाते हैं, लेकिन शोध बताते हैं कि खिंचाव के ये निशान आनुवंशिक कारणों से भी हो सकते हैं.

80 फीसदी से ज्यादा मामलों में पाया गया है कि जिन महिलाओं को प्रैग्नेंसी के दौरान या डिलिवरी के बाद स्ट्रैच मार्क्स हुए, पूर्व में उन की मां को भी इसी तरह के खिंचाव के निशान अपनी प्रैगनैंसी के दौरान हुए थे. नौर्मल डिलिवरी के अलावा सिजेरियन मामलों में भी ऐसे निशान हो सकते हैं.

प्रैग्नेंसी ही नहीं एकमात्र कारण

महिलाओं में स्ट्रैच मार्क्स का मुख्य कारण प्रैगनैंसी ही है, लेकिन अक्सर देखा गया है कि वजन कम करने के दौरान तथा तेजी से वजन घटने के बाद भी इस तरह के खिंचाव के निशान स्किन पर होना आम बात है. दरअसल, हमारी स्किन का लचीलापन और नसों में होने वाला खिंचाव इस तरह के निशानों की मुख्य वजह है. वजन कम करने की प्रक्रिया के दौरान हमारा शरीर रूटीन की शारीरिक गतिविधियों से कुछ अतिरिक्त गतिविधियों की तरफ बढ़ता है. वजन उठाने, कसरत करने, जौगिंग करने आदि से हमारी नसों में अचानक से खिंचाव बढ़ने लगता है, जिस की प्रतिक्रिया के रूप में हमारा रक्तसंचार भी प्रभावित होता है. शुरुआत में हलके गुलाबी या लाल रंग के दिखने वाले खिंचाव के ये निशान बाद में धारियों के रूप में स्किन पर दिखने लगते हैं.

बढ़ने लगी है मेन्स में भी परेशानी

तेजी से बदलती इस जीवनशैली में आज जिम जाना और नियमित रूप से एक्सरसाइज बगैर करना सभी के लिए जरूरी हो गया है. ऐसे में न केवल महिलाओं, बल्कि पुरुषों में भी स्ट्रैच मार्क्स की दिक्कत सामने आने लगी है. दरअसल, पुरुषों में वजन घटाने की प्रक्रिया के दौरान भी खिंचाव के निशान देखे जाते हैं, जो पीठ, कंधों और जांघों पर मुख्य रूप से पाए जाते हैं.

ऐथलीट्स में खेल की ट्रैनिंग के दौरान इस तरह के निशान देखे जाते हैं. हालांकि महिलाओं के मुकाबले पुरुषों की स्किन पर होने वाले ये निशान कई मामलों में अपनेआप गायब हो जाते हैं. इस के अलावा पुरुषों में उम्र बढ़ने के साथ भी स्ट्रैच मार्क्स दिखाई देने लगते हैं.

अलग रंग व निशान के कारण भी पड़ते हैं स्ट्रैच मार्क्स

हमारी स्किन पर अलग-अलग रंगों और आकार में होने वाले धब्बों, निशानों इत्यादि के विभिन्न कारण होते हैं, लेकिन स्किन पर होने वाले खिंचाव के निशान किसी प्रकार से हानिकारक नहीं होते. इस से आपकी कार्यक्षमता पर भी असर नहीं पड़ता. फिर भी इस तरह के निशानों के बारे में जानकारी होनी बहुत जरूरी है. खासतौर से लाल और सफेद रंग के स्ट्रैच मार्क्स के बारे में.

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हालांकि रंगों के प्रभाव के मामलें में ये निशान थोड़े हलके होते हैं, जो स्किन के आकर बदलने की वजह से होते हैं. महिलाओं में ऐसे निशान स्तनों, जांघों, नितंबों और बांहों के आसपास देखे जाते हैं. वजन में उतारचढ़ाव, मांसपेशियों के खिंचाव आदि के अलावा हारमोंस में बदलाव भी इन का कारण होता है. ऐसे में स्किन में खिंचाव की वजह से लाल और बैगनी निशान दिखाई देने लगते हैं.

लाल रंग के स्ट्रैच मार्क्स शुरुआती स्तर पर होते हैं, जो हमारी ब्लड वैसल्स को दर्शाते हैं. डाक्टर की सलाह पर विशेष प्रकार की क्रीम द्वारा कोलोजन का स्तर सुधारने के बाद ये निशान ठीक हो जाते हैं.

जब लंबे समय तक स्ट्रैच मार्क्स शरीर पर रहते हैं, तो धीरेधीरे उन का रंग सफेद और चमकीला होने लगता है. माइक्रोडर्माब्रेसन जैसे उपचारों के माध्यम से सफेद स्ट्रैच मार्क्स को हलका किया जा सकता है. इस के अलावा आईपीएल और फ्रैक्सेल जैसे उपचार भी स्ट्रैच मार्क्स के रंग को फीका करने में मदद कर सकते हैं.

क्या है उपाय

खिंचाव के इस तरह के नशानों से व्यायाम, खानपान, मालिश और कुछ खास तरह की क्रीम, लोशन या औयल आदि के जरीए छुटकारा पाया जा सकता है. ऐक्सरसाइज में मांसपेशियां मजबूत बनती हैं, इसलिए पेट के स्ट्रैच मार्क्स से छुटकारा पाने के लिए रोजाना कं्रचेज करें. इस के अलावा अपने आहार में विटामिन सी और विटामिन ई के साथसाथ ताजे फल और हरी सब्जियां शामिल करें. इस से नए टिशूज बनने लगते हैं.

स्टिंग आपरेशन का खेल

इसी 22 अप्रैल की बात है. केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री डा. महेश शर्मा नोएडा के सेक्टर-27 स्थित कैलाश हौस्पिटल में बैठे थे. यह उन का खुद का अस्पताल है. लोकसभा चुनावों की वजह से डा. शर्मा काफी व्यस्त थे. वह खुद भी उत्तर प्रदेश की गौतम बुद्ध नगर लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे थे.

हालांकि गौतम बुद्ध नगर लोकसभा क्षेत्र में 11 अप्रैल को ही मतदान हो चुका था, फिर भी डा. शर्मा की व्यस्तता इसलिए कम नहीं हुई थी कि केंद्र सरकार में मंत्री होने के नाते उन्हें पार्टी की ओर से किसी भी प्रत्याशी के चुनाव प्रचार के लिए भेजा जा सकता था. इस के अलावा वह अपने खुद के चुनाव की जीतहार का गणित भी लगा रहे थे.

दोपहर करीब 12 बजे एक युवती अस्पताल में उन के चैंबर में पहुंची. चैंबर में डा. शर्मा के पास एकदो लोग बैठे हुए थे. पतलीदुबली सी इस युवती ने पूरी आस्तीन की टीशर्ट और जींस पहन रखी थी. युवती ने डा. महेश शर्मा को नमस्ते कर के कहा, ‘‘मुझे आलोक सर ने भेजा है.’’

मंत्री डा. शर्मा ने उस युवती की ओर देखते हुए सवाल किया, ‘‘कौन आलोकजी?’’

‘‘जी, प्रतिनिधि न्यूज चैनल वाले आलोक सर.’’ युवती ने प्रभावी तरीके से जवाब दिया.

‘‘हांहां, याद आ गया चैनल वाले आलोकजी.’’ डा. शर्मा ने युवती को सामने रखी कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए शालीनता से कहा, ‘‘बताइए, मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं?’’

‘‘आलोक सर ने आप के लिए एक चिट्ठी भेजी है.’’ युवती ने यह कह कर अपने बैग से एक लिफाफा निकाल कर केंद्रीय मंत्री डा. शर्मा की ओर बढ़ा दिया.

चिट्ठी बम ने उड़ाए डा. शर्मा के होश

डा. शर्मा ने युवती से लिफाफा ले कर खोला. उस में 2 पेज की एक प्रिंटेड चिट्ठी थी. चिट्ठी पढ़ कर डा. शर्मा के चेहरे पर परेशानी के भाव उभर आए. उन्होंने अपनी टेबल पर रखे गिलास से ठंडा पानी पीया और एक बार फिर चिट्ठी को गौर से पढ़ा. सामने बैठी युवती की ओर देख कर अपनी परेशानी छिपाते हुए डा. शर्मा ने जेब से रूमाल निकाल कर चेहरा पोंछा.

दरअसल, उस चिट्ठी में ब्लैकमेलिंग और धमकी भरी कुछ ऐसी बातें लिखी थीं, जिन से डा. शर्मा का परेशान होना स्वाभाविक था. चिट्ठी में केंद्रीय मंत्री डा. शर्मा से मोटे तौर पर 3 किस्तों में 9-10 करोड़ रुपए मांगे गए थे. चिट्ठी में लिखा था कि 45 लाख रुपए आज शाम 4 बजे तक दे दें. इस के 2 दिन बाद एक करोड़ 55 लाख रुपए देने की बात लिखी थी. आलोक कुमार ने बाकी 7-8 करोड़ रुपए मई के महीने में बतौर कर्ज देने की बात लिखी थी.

चिट्ठी में दोस्ती और दुश्मनी की बातें भी लिखी थीं. इन में कहा गया था कि आप से दुश्मनी करने से कोई फायदा तो है नहीं, लेकिन अगर आप से दोस्ती कर ली जाए तो हम दोनों के लिए अच्छा रहेगा. बतौर कर्ज के लिए लिखा था कि एक नई कंपनी के लिए आप 40 प्रतिशत शेयर ले कर 7-8 करोड़ रुपए की मदद करेंगे तो अच्छा रहेगा. चिट्ठी में यह बात भी लिखी थी कि इसे आप ब्लैकमेलिंग न समझें, बल्कि इसे आपसी सहभागिता के लिए जरूरी समझें.

2 बार चिट्ठी पढ़ने के बाद यह बात साफ हो गई थी कि आलोक कुमार ने उन्हें ब्लैकमेल करने के मकसद से पत्र भेजा था. कुछ देर सोचनेविचारने के बाद उन्होंने अपने एक कर्मचारी को बुला कर युवती को दूसरे कमरे में बैठाने के लिए कह दिया.

इस के बाद डा. शर्मा ने हौस्पिटल में ही मौजूद अपने भाई अजय शर्मा को बुलाया. डाक्टर साहब को चिंता में बैठे देख कर अजय ने पूछा, ‘‘भाईसाहब, क्या बात है, कुछ परेशान नजर आ रहे हैं?’’

डा. शर्मा ने कोई जवाब देने के बजाए वह चिट्ठी पढ़ने के लिए भाई को दे दी. चिट्ठी पढ़ कर अजय शर्मा भी चिंता में पड़ गए. चिट्ठी में साफतौर पर पैसों की मांग की गई थी. यह रकम क्यों मांगी जा रही थी, यह बात स्पष्ट नहीं थी. काफी देर विचारविमर्श के बाद केंद्रीय मंत्री डा. शर्मा ने पुलिस को सूचना देने का फैसला किया. उन्होंने नोएडा के एसएसपी वैभव कृष्ण को फोन लगा कर पूरी बात बताई. एसएसपी ने कहा कि वह खुद हौस्पिटल आ रहे हैं.

कुछ ही देर में एसएसपी वैभव कृष्ण, एसपी (सिटी) सुधा सिंह और इलाके के अन्य पुलिस अधिकारी कैलाश अस्पताल पहुंच गए. एसएसपी ने डा. शर्मा से मिल कर चिट्ठी और चिट्ठी देने आई युवती के बारे में पूछा. डा. शर्मा ने उन्हें वह चिट्ठी दे दी. युवती के बारे में बताया कि वह दूसरे कमरे में बैठी है.

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एससपी ने 2 महिला कांस्टेबल भेज कर उस युवती को पुलिस की निगरानी में ले लिया. फिर उन्होंने डा. शर्मा से विस्तार से सारी बातें पूछीं. डा. शर्मा ने बताया कि करीब एक महीने पहले 24 मार्च को ऊषा ठाकुर के साथ आलोक कुमार नाम का युवक उन से मिलने आया था. डा. शर्मा ने बताया कि ऊषा ठाकुर को वह बड़ी बहन के रूप में मानते हैं, उन पर कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं.

चुनाव प्रचार के बहाने फेंका जाल

युवक ने केंद्रीय मंत्री से खुद को रचना आईटी सोल्यूशन नाम की कंपनी का सीईओ बताया और चुनाव प्रचार में मदद करने की बात कही. युवक ने उन से कहा कि लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान उस की कंपनी की तरफ से वाहन, 60 मैनेजर और 300 कर्मचारी डोर टू डोर कैंपेन के लिए लगाए जाएंगे.

बातचीत के दौरान युवक ने कई बार डा. महेश शर्मा का नाम लिया. इस पर डा. शर्मा ने कथित तौर पर उस से कहा कि नाम लेने के बजाए वह कोड वर्ड में बात करे. बातचीत खत्म होने पर डा. शर्मा ने उस युवक को उन का चुनाव प्रबंधन देख रहे अपने भाई अजय शर्मा से मिलने को कहा.

इस के करीब 15 दिन बाद 9 अप्रैल को आलोक ने शर्मा को फोन कर बताया कि वह प्रतिनिधि न्यूज चैनल से बोल रहा है और उस ने उन का स्टिंग औपरेशन किया है. स्टिंग औपरेशन के बारे में पूछने पर आलोक ने डा. शर्मा को 24 मई को हुई बातचीत में कोड वर्ड में बात करने वाली बातें याद दिलाई और कहा कि उस मुलाकात के दौरान वह खुफिया कैमरों से लैस था.

इस के बाद आलोक ने अपनी आवाज में नरमी ला कर केंद्रीय मंत्री को फोन पर ही बताया कि नोटबंदी के दौरान उस का चैनल घाटे में चला गया था. इस वजह से चैनल को बंद करना पड़ा. अगर वह चैनल में अपना शेयर डाल दें या खरीद लें तो वह उसे चला देगा.

उस समय चुनाव प्रचार में व्यस्त होने के कारण डा. शर्मा ने आलोक से 11 अप्रैल को मतदान होने के बाद फुरसत में बात करने को कहा.

बाद में 21 अप्रैल को आलोक ने डा. शर्मा को मैसेज किया कि अगले दिन उस की एक प्रतिनिधि पत्र ले कर उन से मिलेगी. पत्र पढ़ कर क्या करना है, वह उसे बता देना. वरना वह स्टिंग को चैनल पर चला देगा.

डा. शर्मा ने एसएसपी को बताया कि स्टिंग में क्या है, यह उन्हें नहीं पता. उन की किसी से इस तरह की कोई आपत्तिजनक बात भी नहीं हुई है.

सारी बातें समझने के बाद एसएसपी वैभव कृष्ण ने एसपी सिटी सुधा सिंह को आलोक की चिट्ठी ले कर आई युवती से पूछताछ करने को कहा. युवती के पास एक खुफिया कैमरा और एक टैबलेट मिला.

रिकौर्डिंग डिवाइस लगे टैबलेट में 20 मिनट का एक वीडियो अपलोड था. इस में चुनाव प्रचार के लिए वाहनों का इंतजाम करने के साथ वोट दिलाने की बात कही गई थी. इस में एक जगह केंद्रीय मंत्री ने कोड वर्ड में बात करने का जिक्र किया था. आशंका यही थी कि इसी कोड वर्ड की बात को ले कर चैनल संचालक आलोक केंद्रीय मंत्री को ब्लैकमेल करना चाहता था.

पूछताछ में पता चला कि युवती का नाम निशु था. वह नोटबंदी के दौरान बंद हो चुके यूट्यूब चैनल ‘प्रतिनिधि’ की रिपोर्टर थी. इस चैनल का संचालक आलोक कुमार था. मूलरूप से बिहार की रहने वाली निशु के पिता का निधन हो चुका है. परिवार में केवल विधवा मां है. घर का खर्च चलाने के लिए वह पत्रकारिता के ग्लैमर वाले रास्ते पर चल कर कुछ साल से आलोक कुमार के चैनल में काम कर रही थी.

निशु से पता चला कि जब वह चिट्ठी देने आई थी, तब आलोक कुमार भी अस्पताल में मौजूद था. यह पता चलने पर पुलिस ने उस की तलाश की, लेकिन वह नहीं मिला. पुलिस अधिकारी निशु को थाना सेक्टर-20 ले गए और व्यापक पूछताछ की. इस में कई बातें सामने आईं.

बाद में डा. महेश शर्मा के भाई अजय शर्मा ने इस मामले में नोएडा के सेक्टर-20 पुलिस थाने में आलोक कुमार, निशु और खालिद नाम के एक शख्स के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई. रिपोर्ट दर्ज होने पर पुलिस ने निशु को गिरफ्तार कर लिया.

निशु की मैडिकल जांच कराने के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. इस मामले में पुलिस ने उसी दिन ऊषा ठाकुर से भी पूछताछ की, लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया गया. ऊषा ठाकुर चिट्ठी देने की घटना के दौरान कैलाश अस्पताल में ही थीं.

ऊषा ठाकुर हिंदी के महान कवि रहे रामधारी सिंह दिनकर की नातिन हैं. बिहार के बेगूसराय जिले का सिमरिया घाट कवि दिनकर की जन्मस्थली है. ऊषा ठाकुर नोएडा इलाके की चर्चित समाजसेविका हैं. वह कई स्वयंसेवी संगठनों से जुड़ी हुई हैं. उन्होंने नोएडा के निठारी से लापता हो रहे बच्चों के परिजनों को न्याय दिलाने के लिए काफी भागदौड़ की थी.

इस के बाद जांच होने पर दिसंबर 2006 में निठारी का बहुचर्चित मानवभक्षी और पोर्नोग्राफी का मामला उजागर हुआ था. बाद में निठारी कांड में आरोपियों को सजा दिलाने में भी ऊषा ठाकुर ने काफी संघर्ष किया था.

ऊषा ठाकुर के संबंधों का फायदा उठाने की कोशिश निशु की गिरफ्तारी के बाद एसएसपी वैभव कृष्ण ने दावा किया कि आलोक का 5-6 लोगों का संगठित गिरोह था. यह गिरोह ब्लैकमेलिंग के धंधे में लगा था. चुनाव के दौरान इन लोगों ने दिल्ली और नोएडा के कई दिग्गज नेताओं के स्टिंग कर वीडियो बनाए थे. इन लोगों ने नेताओं को वीडियो दिखा कर उन से मोटी रकम हड़पी थी.

इस के बाद नोएडा पुलिस मुख्य आरोपी आलोक कुमार और उस के साथियों की तलाश में जुट गई. इस के लिए पुलिस की 3 टीमें बनाई गईं. क्राइम ब्रांच और सर्विलांस टीम का भी सहयोग लिया गया. पुलिस ने आरोपियों के ठिकानों पर दबिश दी. आलोक का पता लगाने के लिए उस के परिवार जनों से भी पूछताछ की गई. आलोक कुमार नोएडा में ही मां, पत्नी और 2 बच्चों के साथ रहता था.

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पुलिस की ओर से इस मामले में पूछताछ करने से चर्चा में आई 69 साल की ऊषा ठाकुर ने दूसरे दिन मीडिया से कहा कि आलोक कुमार उन्हें मां कह कर बोलता था. उस के पिता बिहार में आईपीएस औफिसर थे, जिन की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी.

मिलनेजुलने के दौरान आलोक ने डा. महेश शर्मा से मिलने की इच्छा जताई थी. चूंकि वह खुद भी डा. महेश शर्मा को भाई मानती हैं और लंबे समय से उन के लिए चुनाव प्रचार भी करती आई हैं. इसलिए आलोक को वह मना नहीं कर सकीं और अपने साथ डा. महेश शर्मा से मिलवाने ले गई थीं. ऊषा ठाकुर का कहना था कि उन्हें यह बिलकुल नहीं पता था कि मुलाकात के दौरान आलोक ने स्टिंग औपरेशन किया है.

घटना के दौरान अस्पताल में मौजूदगी पर ऊषा ठाकुर का कहना था कि उस दिन सुबह रिटायर्ड डीएसपी के.के. गौतम का फोन आया था. उन्होंने कहा कि डा. महेश शर्मा उन से मिलना चाहते हैं. इस पर ऊषा ठाकुर ने गौतम से कहा कि वे अपनी बीमार मां को दिखाने कैलाश अस्पताल आएंगी तो वहां मंत्रीजी से भी मिल लेंगी.

नोएडा की सेक्टर-20 थाना पुलिस ने 24 अप्रैल को निशु को 7 दिन के रिमांड पर लिया. पुलिस उसे पूछताछ के लिए लुक्सर जेल ले  आई. निशु से पता चला कि स्टिंग का असली वीडियो आलोक कुमार के पास है. उस के पास टेबलेट में जो वीडियो मिला था, वह उस की मूल कौपी नहीं थी.

दूसरी ओर, पुलिस इस मामले में नामजद आरोपी आलोक कुमार और खालिद की तलाश में दिल्ली, गाजियाबाद व नोएडा सहित कई जगह छापे मारती रही. लेकिन दोनों का पता नहीं चला. उन के फरार होने से यह आशंका भी थी कि आलोक कुमार केंद्रीय मंत्री के स्टिंग का असली वीडियो वायरल न कर दे.

पुलिस को जांचपड़ताल में पता चला कि प्रतिनिधि चैनल के मालिक आलोक कुमार के साथ निशु के अलावा एक अन्य युवती भी जुड़ी हुई थी. उस का नाम निशा था. आलोक ने नोएडा के सेक्टर-92 में एक फ्लैट किराए पर ले रखा था.

निशु दूसरी युवती निशा और जामिया नगर में रहने वाले खालिद का ज्यादा वक्त इसी फ्लैट में गुजरता था. आलोक ने पांडव नगर में एक औफिस बना रखा था. इस औफिस में उस ने कई रिपोर्टर और अन्य कर्मचारियों को रख रखा था. पुलिस को यह औफिस बंद मिला. पुलिस को इस औफिस से ब्लैकमेलिंग से संबंधित सबूत मिलने की उम्मीद थी.

इधर, आलोक और खालिद की तलाश में पुलिस टीमें इलाहाबाद और लखनऊ भी भेजी गईं. आलोक की तलाश में पुलिस मुंबई तक की चक्कर लगा कर आई. खालिद की दिल्ली के अलावा हापुड़ में भी तलाश की गई.

बड़ा खिलाड़ी बनने की राह पर था आलोक रिमांड अवधि में निशु ने पूछताछ में बताया कि आलोक के कहने पर उस ने 3 नेताओं के स्टिंग किए थे. स्टिंग के दौरान निशु के साथ एक अन्य युवती भी थी. इन के वीडियो आलोक के पास ही हैं. उस ने बताया कि आलोक की स्टिंग करने वाली टीम में युवतियों सहित 6-10 लोग शामिल थे.

इस टीम को आलोक ही हिडन कैमरे मुहैया कराता था. निशु ने पुलिस को बताया कि आलोक ने उसे ब्लैकमेलिंग से मिलने वाली रकम में से हिस्सा देने का वादा किया था. आलोक ही अपनी स्टिंग टीम को नए मोबाइल और सिमकार्ड खरीद कर देता था. नए मोबाइल से ही स्टिंग में रिकौर्ड वीडियो व औडियो को संबंधित नेता तक पहुंचाया जाता था.

रंगदारी के पैसों के लेनदेन की बात भी नए मोबाइल से ही की जाती थी. इन नए मोबाइलों में केवल 8-10 नंबर ही होते थे. निशु के पास से भी पुलिस ने नया मोबाइल बरामद किया था. रिमांड अवधि पूरी होने पर पुलिस ने निशु को 2 मई को अदालत में पेश कर न्यायिक हिरासत में भिजवा दिया.

लगातार भागदौड़ करने के बाद सुराग मिलने पर पुलिस ने आलोक को 4 मई को कोलकाता से गिरफ्तार कर लिया. उस के साथ महिला पत्रकार निशा को भी गिरफ्तार किया गया. दोनों कोलकाता में न्यू मार्केट थाना इलाके के होटल रीगल में ठहरे हुए थे. दोनों को कोलकाता की अदालत में पेश कर 72 घंटे का ट्रांजिट रिमांड ले कर नोएडा लाया गया. नोएडा ला कर 5 मई को दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

बाद में पुलिस ने आलोक व निशा को 4 दिन के रिमांड पर लिया. पूछताछ में उस ने बताया कि सन 2017 में नोटबंदी के बाद उस का यूट्यूब चैनल ‘प्रतिनिधि’ बंद हो गया. उस पर 70 लाख रुपए का कर्ज था. कर्ज उतारने के लिए उस ने अपनी 2 कारों में एक कार बेच दी थी. इस के बाद बड़े लोगों को स्टिंग कर ब्लैकमेलिंग का रास्ता चुना. 2 साल में वह कई चर्चित नेताओं व बिजनेसमैनों  का स्टिंग कर मोटी रकम ऐंठ चुका था.

केंद्रीय मंत्री डा. महेश शर्मा से मिलने के लिए उस ने मूलरूप से बिहार की रहने वाली नोएडा में बसी चर्चित समाजसेविका ऊषा ठाकुर से संपर्क किया. उन के जरिए डा. शर्मा से मुलाकात कर लोकसभा चुनाव में मदद करने के लिए गाडि़यां और मैन पावर उपलब्ध कराने का औफर दिया.

उसी वक्त उस ने केंद्रीय मंत्री से बातचीत हिडन कैमरे के जरिए रिकौर्ड कर ली. बातचीत के बीचबीच में आलोक ने जानबूझ कर कई बार डा. महेश शर्मा का नाम लिया और कुछ ऐसी बातें कहीं, जिस पर डा. शर्मा ने उस से कोड वर्ड में बात करने को कहा.

कोड वर्ड को ले कर ही आलोक ने केंद्रीय मंत्री को ब्लैकमेलिंग करने की योजना बनाई और निशु को चिट्ठी दे कर उन के पास भेजा. वह खुद भी इस दौरान कैलाश अस्पताल पहुंच गया था. उसे उम्मीद थी कि डा. शर्मा उसे फोन कर बुलाएंगे. लेकिन बाद में जब वहां पुलिस आने लगी, तो वह वहां से खिसक गया.

यह बात भी सामने आई कि केंद्रीय मंत्री के स्टिंग का वीडियो ले कर आलोक कुमार विरोधी राजनीतिक पार्टी के पास गया था. इस वीडियो के बदले उस ने मोटी रकम की मांग की थी लेकिन विरोधी नेताओं ने उतनी रकम में वह वीडियो खरीदने से इनकार कर दिया था. इस के बाद आलोक ने खुद केंद्रीय मंत्री को फोन कर स्टिंग करने की बात बताई थी. साथ ही पैसे की बात भी कह दी थी.

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पूछताछ में पता चलने पर पुलिस ने आलोक के घर से स्टिंग में उपयोग लिए गए 2 लैपटौप, 3 हिडन कैमरे, 3 मोबाइल फोन, 10 सिमकार्ड और एक टैब आदि चीजें बरामद कीं. इन में एक लैपटौप से केंद्रीय मंत्री के स्टिंग का असली वीडियो मिला. पुलिस ने लैपटौप, मोबाइल, टैब सहित अन्य डिवाइस को जांच के लिए फोेरैंसिक लैब भेज दिया. रिमांड अवधि पूरी होने पर दोनों को 11 मई को जेल भेज दिया गया.

ऊषा की भूमिका संदेह के दायरे में

इस मामले में पुलिस ने 17 मई को ऊषा ठाकुर को सेक्टर 31 स्थित उन के घर से गिरफ्तार कर लिया. बाद में उन्हें अदालत में पेश कर उसी दिन जेल भेज दिया गया. पुलिस का कहना है कि आलोक से पूछताछ में पता चला कि ब्लैकमेलिंग के इस मामले में ऊषा ठाकुर की सक्रिय भूमिका थी. ऊषा ठाकुर और डा. महेश शर्मा का 30 साल पुराना संबंध बताया जाता है.

पुलिस का कहना है कि ऊषा ठाकुर और आलोक कुमार दोनों ही बिहार के रहने वाले हैं. आलोक अपने न्यूज चैनल पर डिबेट के लिए ऊषा ठाकुर को बुलाता था. बाद में चैनल बंद होने की कगार पर आ गया. तब एक दिन आलोक ने ऊषा को नेताओं को ब्लैकमेलिंग कर मोटी रकम कमाने के बारे में बताया.

पहले तो उन्होंने इस काम में शामिल होने से इनकार कर दिया. फिर आलोक ने एक दिन ऊषा के घर पहुंच कर साथ देने की बात कही. इस के बाद ऊषा नेताओं को ब्लैकमेल कर वसूली करने की साजिश में शामिल हो गईं. यह साजिश अगस्त 2018 में ऊषा की मौजूदगी में उन के घर पर रची गई.

इस के बाद लोकसभा चुनाव का मौका देख कर ऊषा ने ही आलोक को एक कंपनी का सीईओ बताते हुए केंद्रीय मंत्री से मिलवाया था. ऊषा ने डा. शर्मा को यह नहीं बताया कि आलोक न्यूज चैनल चलाता है, जबकि वे खुद उस के चैनल और डिबेट में जाती थीं.

पुलिस ने पहले दिन निशु से जो टेबलेट बरामद किया था, वह उस ने ऊषा के घर से ही लिया था. निशु जब आलोक की चिट्ठी ले कर वसूली करने गई थी तब ऊषा ठाकुर भी केंद्रीय मंत्री डा. शर्मा के कैलाश अस्पताल में मौजूद थीं.

कहा जाता है कि केंद्रीय मंत्री को ब्लैकमेल करने के मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय भी नजर रखे हुए था. पहले दिन जब निशु की गिरफ्तारी के बाद ऊषा ठाकुर से पुलिस द्वारा पूछताछ की गई तो पीएमओ के अधिकारियों ने उन से खेद जताया था.

साथ ही उन से इस मामले से संबंधित सारी जानकारियां भी मांगी थी. पीएमओ के अधिकारियों ने उन से कहा था कि लोकसभा चुनाव का परिणाम आने तक वे इस मामले में चुप रहें. इस के बाद उचित काररवाई की जाएगी.

ऊषा ठाकुर ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि उन्हें 30 साल की उन की सामाजिक प्रतिष्ठा को खत्म करने के लिए इस मामले में फंसाया गया है. उन्होंने तो नोटबंदी के बाद आलोक की आर्थिक रूप से मदद की थी. कुछ जानकारों से उसे पैसे भी दिलवाए थे. दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि ऊषा और आलोक को जेल में ही आमनेसामने बैठा कर पूछताछ की जाएगी.कथा लिखे जाने तक इस मामले में एक नामजद आरोपी खालिद को पुलिस तलाश कर रही थी.

पुलिस उस के घर की कुर्की की काररवाई की बात भी कह रही थी. पुलिस ने नोएडा में पहले तैनात रहे एक रिटायर्ड डीएसपी को भी शक के दायरे में रखा गया था. यह डीएसपी भी 22 अप्रैल को घटना के दौरान केंद्रीय मंत्री डा. महेश शर्मा के अस्पताल में मौजूद थे.

अब डा. महेश शर्मा के बारे में भी जान लें. वे नोएडा विधानसभा सीट से पहली बार विधायक बने. बाद में 2014 में वे भाजपा के टिकट पर गौतम बुद्ध नगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ कर जीते. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपनी केबिनेट में शामिल कर केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री बनाया.

राजस्थान के अलवर जिले की मुंडावर तहसील के मनेठी गांव में 30 सितंबर 1959 को पैदा हुए डा. महेश शर्मा पेशे से फिजिशियन हैं. उन के पिता अध्यापक थे. सेकेंडरी तक की पढ़ाई अलवर जिले में करने के बाद महेश शर्मा दिल्ली चले गए थे. बाद में उन्होंने डाक्टरी की डिग्री ली. उन का कैलाश ग्रुप औफ हौस्पिटल्स है.

नोएडा के अलावा उन का राजस्थान के अलवर जिले के बहरोड़ में भी कैलाश हौस्पिटल है. डा. महेश शर्मा की पत्नी डा. ऊषा शर्मा गायनेकोलौजिस्ट हैं. वे कैलाश हौस्पिटल एंड हार्ट इंस्टीट्यूट की प्रबंधन कमेटी और कैलाश हेल्थ केयर लि. की वाइस चेयनमैन हैं. इन का एक बेटा और बेटी भी मैडिकल प्रोफेशन में हैं.

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निखिल अग्रवाल 

(कहानी सौजन्य- मनोहर कहानियां) 

सैन फ्रांसिस्को में लें दुनियाभर के इन 13 शहरों के खाने का मजा

सैन फ्रांसिस्को अपनी विविधता के लिए जाना जाता है और इस में यहां का भोजन भी शामिल है. इसलिए इस बात में कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए कि यह दुनिया के ऐसे कुछ शहरों में से एक है जहां आप इस के 49 वर्ग मील के दायरे से बाहर पैर रखे बिना दर्जनों देशों के व्यंजनों का स्वाद ले सकते हैं.

  1. मैक्सिकन- टैकोलिसियस(741 वालेंसिया स्ट्रीट)

अगर आप किसी ऐसी चीज़ को आज़माना चाहते हैं जो आप को कहीं और नहीं मिलती है, जैसे शौट-एंड-ए-बीयर ब्रेज़्ड चिकन या कौर्न, समर स्क्वैश और स्वीट पीपर्स टैकोस, तो आप टैकोलिसियस का रुख कीजिये.

2. स्पेनिश – एलेग्रीअस (2018 लोम्बार्ड स्ट्रीट)

सैन फ्रांसिस्को में हर प्रसिद्ध पकवान खाने के बाद शायद आप वहां से बाहर छोटी जगहों में कुछ मजेदार खाने की खोज में हो सकते हैं. ऐसे में हम आप को एलेग्रीअस में- तपस -या स्पेनिश स्नैक्स खाने का सुझाव दे सकते हैं. यहां के मेनू में सब से लोकप्रिय व्यंजन एम्पैनाडिलस डे कारने, माचेगो फ्लैमबिएडो, पटाटास एलिओली और बहुत चर्चित फ्लान हैं. आप को ऐसा महसूस होगा कि आप एक झटके में अटलांटिक महासागर से स्पेन पहुंच गए हैं.

 

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?: @the_wonderworld | Where stinking is a good thing. What are your favorite restaurant names in San Francisco? #AlwaysSF

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3. मोरक्कन – मौराड (140 न्यू मोंटगोमरी स्ट्रीट)

यदि आप ने पहले कभी मोरक्को के भोजन को नहीं आजमाया है तो हाल ही में मिशेलिन स्टार प्राप्त करने वाले रेस्टोरेंट, मौराड की यात्रा के बिना आप की सैन फ्रांसिस्को की यात्रा पूरी नहीं होगी. मोरक्को के सब से लोकप्रिय व्यंजनों में टैगाइन, कूसकस और ब’स्टिला शामिल हैं. यदि आप फिज़ूलखर्ची नहीं करना चाहते हैं तो लंच और डिनर की सेवा के बीच मौराड के बार में आएं और शानदार, अधिक किफायती, भोजन का लुत्फ उठाएं.

4. फ्रेंच – ला फोली (2316 पोल्क स्ट्रीट)

ला फोली, सैन फ्रांसिस्को में रसियन हिल में स्थित है. इस का काफी नाम है. शेफ रोलैंड पासोट और उनकी पत्नी जेमी ने 1988 में ला फोली की शुरुआत की थी. ला फोली के डाइनिंग रूम की बेहतरीन प्रकाश व्यवस्था, लकड़ी और शीशे के चमकते पैनल्स और अच्छी सर्विस यहां की खासियत है.

5. जर्मन – श्रूएडर(240 फ्रंट स्ट्रीट)

जब आप को ब्राटवुर्स्ट, स्ट्रूडल या किसी प्रकार के श्निट्ज़ेल खाने की अचानक इच्छा जगे तो आप सैन फ्रांसिस्को का रुख कर सकते है. यहां आप की तलाश 1893 से वेस्ट कोस्ट के सब से पुराने जर्मन रेस्टोरेंट श्रूएडर के रूप में पूरी होगी.

6. इटैलियन – लोकान्डा ओस्टरिया और बार (557 वालेंसिया स्ट्रीट)

नौर्थ बीच, वेस्ट कोस्ट का इतालवी मक्का, इतालवी भोजन जैसे कि लसाग्ना, स्पेगेटी, रैवियोली और बेशक पिज्जा खाने के लिए एक शानदार जगह है. हालांकि सैन फ्रांसिस्को दर्जनों इतालवी रेस्टोरेंट का घर है. टॉप रेटेड इतालवी रेस्टोरेंट में से एक लोकांडा मिशन नाम के जिले में है जिस के मेनू में रिगाटोनी, प्रोस्क्यूटो, भुना हुआ बैंगन और यहूदी शैली के आर्टिकोक शामिल हैं. आप उन के सिग्नेचर कौकटेल का भी मजा ले सकते हैं.

7. ग्रीक – सौवेल (517 हेस स्ट्रीट)

अगर आप को बकलाव, मेमना, ग्रीक फ्राइज़ या गायरोस अच्छे लगते हैं तो समय है ग्रीक रेस्टोरेंट खोजने का. हेस वैली में एक फास्ट-कैजुअल और सस्ता विकल्प भी है जिस का नाम सौवेल है. यह अपने फोटोजेनिक भोजन और सस्ती कीमत के लिए प्रसिद्ध है.

8. रसियन – रेड टैवर्न (2229 क्लेमेंट स्ट्रीट)

सैन फ्रांसिस्को के सेंट पीटर्सबर्ग में कुछ खास रूसी भोजन मिल जाता है. रेड टैवर्न में बीफ़ स्ट्रैगनऔफ़, पेलमेनी या कोटल्टी वगैरह सब कुछ मिल जाएगा.

9. इंडियन – एम्बर इंडिया (25 येरबा ब्यूना लेन.)

भारतीय व्यंजन हर तरह के मसालों के मिश्रण के लिए जाने जाते हैं. तभी तो इंडियन खाने का एक अलग ही स्वाद होता है. यदि आप भी करी, तंदूरी चिकन ,नरम नान या किसी अन्य उत्तर भारतीय खाने के लिए तरस रहे हैं तो सोमा में एम्बर इंडिया रेस्टोरेंट आप के लिए बेस्ट जगह है.

10. थाई – थाई स्पाइस (1730 पोलक स्ट्रीट)

थाईलैंड के कुछ सब से लोकप्रिय खाद्य पदार्थों में मू नमटोक, ग्रीन करी, सोम टैम, पैड थाई और थाई फ्राइड राइस शामिल हैं. यदि आप इन स्वादिष्ट व्यंजनों में से कुछ खाने की इच्छा रखते हैं तो थाई स्पाइस रेस्टोरेंट आजमा सकते हैं. आप जान कर हैरान होंगे कि वे 80 से अधिक खास थाई व्यंजन परोसते हैं. तभी तो सैन फ्रांसिस्को क्रौनिकल ने इसे शहर के श्रेष्ठ पांच थाई रेस्टोरेंटस में से एक में शामिल किया है.

11. कोरियन – हान II क्वान (1802 बलबोआ स्ट्रीट)

किम्ची, गुक्सु या बोकेम खाना हो तो आप के लिए सैन फ्रांसिस्को में मौजूद कोरियाई रेस्टोरेंट क्वान बेहतर औप्शन है. यह स्वादिष्ट भोजन और बेहतर ग्राहक सेवा दोनों के लिए जाना जाता है.

12. जेपनीज – ओज़ुमो (161 स्टुअर्ट स्ट्रीट)

यदि आप सैन फ्रांसिस्को की अपनी यात्रा के दौरान जापानी भोजन खाने को तरस रहे हैं तो आप को यह जान कर खुशी होगी कि एम्बारकाडेरो के पास ओज़ुमो रेस्टोरेंट में वह सब मिलता है जिसे आप खाना चाहते हैं. इस के मेनू में पारंपरिक जापानी व्यंजन शामिल हैं जैसे शुरू करने के लिए मिसो और एडामैम, इस के बाद मुख्य व्यंजन जैसे शब्बू-शब्बू, टेम्पुरा, साशिमी और सुशी. आसपास खूबसूरत लाउंज और खाड़ी के अद्भुत दृश्य खाने का अलग आनंद देते हैं.

13. अमेरिकन – द डोरियन (2001 चेस्टनट स्ट्रीट)

कभीकभी आप को बेक्ड बीन्स और टाटर टोट्स के साथ केवल एक बर्गर, रिब्स या नर्म स्टेक और उस के बाद एप्पल पाई खाने का मन करता है. गुड ‘ओल हर्टी अमेरिकन फेयर इस के लिए सब से बेहतरीन जगह है. आप डोरियन में वह सब कुछ पा सकते हैं. मरीना में बर्गर से ले कर चिकन स्लाइडर्स और ऑयस्टर तक सब कुछ परोसा जाता है.

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कहीं जयपुर में रात के खाने के लिए न भटकना पड़ जाए

वैसे तो यह बात खुद में अटपटी लगती है कि आप को मई-जून की झुलसती गरमी में रेगिस्तानी राजस्थान की गुलाबी राजधानी जयपुर में घूमने-फिरने के मकसद से जाने की सलाह दी जाए लेकिन अगर कभी ऐसा होता है और आप आमेर किले के आसपास हैं तो वहां के छोटे-बड़े रेस्टोरेंटों में यह जरूर पूछ लें कि रात का खाना मिल जाएगा या नहीं.

यह बात बचकानी जरूर लगती है, पर ऐसा ही कुछ हमारे साथ हुआ. दरअसल, हाल ही में मेरा अपने बचपन के कुछ दोस्तों के साथ जयपुर जाना हुआ. हमारा रिसोर्ट आमेर किले से महज 2 किलोमीटर दूर था. शाम को जयपुर की मशहूर झील जलमहल देखने के बाद वहीं उस के सामने बने किसी रेस्टोरेंट में हमारा खाना खाने का प्लान था.

ऐसे ही जानकारी के लिए एक रेस्टोरेंट में घुसे तो पता चला कि गरमी में वहां शाम के 5-6 बजे तक ही खाना परोसा जाता है. जब इस की वजह जाननी चाही तो पता चला कि टूरिस्ट न के बराबर होने की वजह से वे लोग डिनर नहीं बनाते हैं. हम सब थोड़ा चकराए पर अगले रेस्टोरेंट में भी यही जवाब मिला. वहां के मैनेजर ने बताया कि झील पर भी आसपास के लोकल लोग ही ज्यादा आते हैं जो वहीं झील पर हल्के-फुल्के स्नैक्स खा कर घर चले जाते हैं.

रात का खाना न मिलने की बात सुन कर थोड़ा अचंभा लगा, फिर सोचा कि अपने रिसोर्ट के पास किसी सस्ते रेस्टोरेंट को खंगालते हैं. हालांकि हमारे रिसोर्ट में डिनर का पूरा इंतजाम था, पर जब यह मामला सामने आया तो यह जानने की जिज्ञासा बढ़ गई कि ऐसा होता क्यों है?

एक और रेस्टोरेंट में गए तो भीतर एकदम सुनसान. तभी एक लड़का बाहर रोड से भीतर आया और बोला कि आप को अंदर आते देख कर मैं बाहर से आया हूं, नहीं तो घर चला गया होता. वह कम उम्र का लड़का उस रेस्टोरेंट को संभालता था. डिनर के बारे में पूछने पर उस ने भी वही रामकहानी बताई. साथ में एक और कारण बताया कि आमेर किले के आसपास ज्यादातर विदेशी सैलानी जब सीजन में आ कर आसपास के होटलों में ठहरते हैं, तब ये रेस्टोरेंट गुलजार हो जाते हैं. यह सीजन बारिश के बाद या सितंबर महीने से शुरू होता है और मार्च महीने तक रहता है. छोटे ढाबों पर खाने को मिल जाता है पर रेस्टोरेंट तो जैसे रात को उजाड़ हो जाते हैं.

उस लड़के ने बताया कि आगे एक और रेस्टोरेंट है, शायद वहां कुछ खाने को मिल जाए. लेकिन जवाब तो उस नए रेस्टोरेंट भी यही मिला था पर उस आदमी ने कहा कि अगर आप रात को पक्का मेरे यहां खाना खाने आओगे तो मैं उसी समय दालरोटी और पनीर की सब्जी बनवा सकता हूं. चावल भी मिल जाएंगे. लेकिन रात के 10 बजे से पहले आना होगा.

एक रेस्टोरेंट से रात के खाने के बारे में हां में जवाब मिलना हमारे लिए बड़ी राहत की बात थी. हम रात को 10 बजे से पहले उस रेस्टोरेंट में पहुंचे और यकीन मानिए रसोई में 3 आदमियों ने बस हम 4 लोगों के लिए खाना बनाया था.

संविधान नहीं सत्ता के प्रभाव में काम करती है पुलिस

उत्तर प्रदेश को उल्टा प्रदेश ऐसे ही नहीं कहा जाता. यहां पुलिस हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों से जुड़े आरोपियों को भले ही समय पर न पकड़ पाये पर मुख्यमंत्री के खिलाफ टिप्पणी करने वालों को तुरंत जेल में भेज दिया जाता है. एक या दो दिन के लिये नहीं पूरे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाता है.

ताजा मामला उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के वीडियो पर टिप्पणी को लेकर प्रशांत कन्नौजिया की गिरफतारी और 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजने का है. उत्तर प्रदेश पुलिस को झटका देते हुये सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान के खिलाफ बताते हुए प्रशांत को तुरंत रिहा करने का आदेश दे दिया. पुलिस के इस कदम को जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया उससे योगी सरकार और उत्तर प्रदेश पुलिस विरोधियों के निशाने पर आ गई है.

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नेताओं से लेकर पत्रकार संगठनों ने इसका विरोध भी किया था. वैसे इसके पहले भी ऐसे मामले हो चुके हैं. 5 साल पहले अखिलेश सरकार के समय दलित चिंतक लेखक कमल भारतीय ने आरक्षण और दुर्गानागपाल को लेकर अखिलेश यादव, शिवपाल यादव, आजंम खां और मुलायम सिंह यादव के खिलाफ टिप्पणी की थी.

सपा सरकार में उनको जेल भेज दिया गया था. रामपुर पुलिस ने 2015 में एक छात्र को आजम खां पर टिप्पणी करने पर जेल भेज दिया गया था. ऐसी घटनायें हर सरकार में होती रही है. यही वजह है कि पुलिस संविधान उपर जाकर काम करने लगती है जिससे उसको कोर्ट की फटकार सुननी पड़ती है. अब योगी सरकार पर टिप्पणी करने वाले को जेल जाना पडा. पर जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सुना उससे साफ हो गया कि कोर्ट ने पुलिस के काम को सही नहीं माना.

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सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री के खिलाफ टिप्पणी करने वाले को जेल भेजने की कड़ी में प्रशांत अकेला नाम नहीं है. गोरखपुर के नर्सिग होम संचालक सहित दिल्ली के एक चैनल पर काम करने वाले 2 और लोग भी शामिल हैं. पत्रकारों के पकड़े जाने पर कांग्रेस के नेता राहुल गांधी और बसपा नेता मायावती ने भी आवाज बुलंद की. पूरे मामले को लेकर लोग भाजपा के खिलाफ हैं. पुलिस ने अगर समझधारी से काम लिया होता तो उसे सुप्रीम कोर्ट की फटकार ना सुननी पड़ती. पुलिस को अपनी कार्यशैली में बदलाव करना होगा नहीं तो बार-बार उसे एक ही जैसे हाल से गुजराना होता है.

अफसोस… ‘गब्बर’ नहीं दिखेगा इस वर्ल्ड कप में

अपने पिछले मैच में औस्ट्रेलियाई कंगारुओं को शतक से सबक सिखाने वाले भारतीय ओपनर बल्लेबाज शिखर धवन इस विश्व कप से बाहर हो गए हैं. रविवार, 9 जून को औस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच में चोटिल हुए शिखर धवन अब वर्ल्ड कप में नहीं खेल सकेंगे.

शिखर धवन को तेज गेंदबाज नाथन कुल्टर नाइल की उछाल लेती गेंद लगी थी. इस के बावजूद उन्होंने 109 गेंद में 117 रन की बेहतरीन पारी खेली थी. लेकिन उस चोट की वजह से वे फील्डिंग के लिए मैदान पर नहीं उतरे थे. उन की जगह रविंद्र जडेजा ने फील्डिंग की थी.

स्कैन के बाद चोटिल अंगूठे में फ्रैक्चर की बात सामने आई. लिहाजा, डौक्टरों ने उन्हें 3 हफ्ते आराम की सलाह दी हैं.

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कौन लेगा उन की जगह

शिखर धवन की जगह टीम में बतौर ओपनर बल्लेबाज किसे मौका मिलेगा, इसे ले कर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी लेकिन सूत्रों के मुताबिक, टीम की तरफ से श्रेयस अय्यर का नाम आगे बढ़ाया गया है. विकेट कीपर ऋषभ पंत को टीम में शामिल किया जा सकता है. केएल राहुल भी रोहित शर्मा के साथ बल्लेबाजी की शुरुआत कर सकते हैं.

चूंकि रोहित शर्मा दाएं हाथ के बल्लेबाज हैं तो हो सकता है कि विपक्षी टीम के गेंदबाजों को परेशान करने के लिए किसी बाएं हाथ के बल्लेबाज को बतौर ओपनर आजमाया जाए.

13 जून को भारतीय टीम का मुकाबला न्यूजीलैंड के साथ है, शायद तभी खुलासा होगा कि क्रिकेट के ‘गब्बर’ की जगह किस खिलाड़ी को मिलती है. वैसे, फौर्म में चल रहे शिखर धवन का यों विश्व कप से बाहर जाना भारतीय टीम के लिए कतई अच्छी बात नहीं है, वह भी तब जब शिखर धवन और रोहित शर्मा की जोड़ी ने मिल कर रनों के अंबार लगाए हैं.

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क्या सृष्टि रोडे ने तोड़ा रोहित सुचांती का दिल, जानें इस खबर की सच्चाई

बिग बौस 12 की प्रतिभागी सृष्टि रोड़े इन दिनों काफी चर्चे में है. आपको बता दें, इनके एक्स बायफ्रेंड मनीष नागदेव ने ब्रेकअप के लिए पूरी तरह से सृष्टि को जिम्मेदार बता दिया था. दरअसल मनीष ने इंस्टाग्राम पर एक इमोशनल मैसेज शेयर कर अपने ब्रेकअप की पूरी कहानी बताई थी. लेकिन इसके बाद अब तक सृष्टि रोड़े की ओर से किसी तरह का बयान सामने नहीं आया है.

 

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मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक मनीष नागदेव से अलग होने के बाद सृष्टि रोड़े का रोहित सुचांती के साथ भी ब्रेकअप हो गया है. रोहित सुचांती इस ब्रेकअप के बाद काफी टूट गए हैं. वही मनीष नागदेव ने कहा कि सृष्टि ने मेरा गलत इस्तेमाल किया है. खबरों की माने तो मनीष और रोहित के बाद अब सृष्टि किसी और शख्स को डेट कर रही हैं और जल्दी ही शादी भी करने वाली है.

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बिग बौस 12 में सृष्टि रोड़े और रोहित सुचांती की गहरी दोस्ती को लेकर कई तरह की अफवाहें फैली थी. घर से बाहर निकलने के कुछ ही दिनों बाद सृष्टि और मनीष नागदेव के ब्रेकअप की खबर सामने आ गई थी. मनीष की खास दोस्त और एक्ट्रेस काम्या पंजाबी ने इन दोनों के रिश्ते के टूटने की वजह रोहित सुचांती की एंट्री को बताया था.

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