Download App

हेयरकट कराने से पहले रखें इन 5 बातों का ध्यान

हेयरकट कराने से पहले आपको कई बातों का ध्यान रखना होता है. हेयरकट आपके चेहरे का लुक पूरी तरह से बदल देता है. खास कर महिलाओं के लिए हेयरकट का निर्णय लेना मुश्किल होता है. अगर ऐसे में आपका हेयर स्टाइल बेकार हो जाए तो  इसे आप रिस्क नहीं ले सकतीं. तो आइए जानते हैं, हेयरकट लेने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

रखें इन 5 बातों का ध्यान

ये भी पढ़ें- होममेड स्क्रब: घर पर ऐसे बनाएं नेचुरल स्क्रब

  1. सभी हेयर स्टाइल का मेंटनेंस अलग होता है. अपनी लाइफस्‍टाइल के तरीकों को ध्‍यान में रखते हुए अपनी सुविधा अनुसार ही हेयरकट करवाएं.

2. पार्लर जाने से पहले ये भी तय कर लें कि आपको कैसा नया लुक चाहिए या ऐसा हेयरकट जिससे कि बाल लंबे या घने दिखें.

3. दूसरों पर जो हेयर स्टाइल आपको बहुत पसंद आया हो, जरूरी नहीं कि वह आपके चेहरे पर भी जंचे.

beauty

ये भी पढ़ें- क्यों जरूरी है चबा कर खाना?

4. बिना सोचे-समझे पार्लर में न जाएं. यह पहले से तय कर लें कि आप किस प्रकार का हेयर स्टाइल चाहती हैं.

5. अपने फेस कट के अनुसार हेयरकट करवाएं. इस बारे में आप हेयर एक्‍सपर्ट से पूछ सकती है. लेकिन आपको जो सूट करें, वही हेयरकट करवाएं.

बाइक राइडिंग एडवैंचर का स्पीडी सफर

एक रोचक जानकारी…

साल 1979 में जब फिल्म ‘काला पत्थर’ आई थी तो मैं उस के एक गाने ‘इक रास्ता है जिंदगी जो थम गए तो कुछ नहीं…’ का फैन हो गया था. इसलिए नहीं कि 7 साल की नन्ही उम्र में उस गाने के बोल मेरी समझ में आ गए थे, बल्कि मुझे तो शशि कपूर का बिंदास हो कर मोटरसाइकिल चलाना भा गया था.

मोटरसाइकिल कमाल की सवारी है. सलमान खान के एक फिल्मी डायलौग की बात करें तो यह जिंदगी को ‘किक’ देती है. और अगर इस पर सवार हो कर किसी लंबे रोमांचक सफर पर निकला जाए तो लगता है मानो आप सड़क के ऐसे बेताज बादशाह हैं जो मंजिल से ज्यादा सफर का मजा लेता है.

वैसे तो मोटर बाइक से कहीं का भी सफर किया जा सकता है, पर भारत में ही कुछ ऐसे एडवैंचर से भरे बाइक टूर मशहूर हो गए हैं जहां लोग अकेले और गु्रप बना कर पूरी तैयारी के साथ जाते हैं. अपनी और अपनी बाइक की लिमिट जानने के लिए लोग सूखे ऊंचे पहाड़ों की जन्नत लद्दाख या स्पीति घाटी तक हो आते हैं. बहुतों को घने जंगलों के कच्चे रास्तों पर बाइक दौड़ानी होती है तो वे पूर्वोत्तर राज्यों की दिलफेंक हरियाली से रूबरू होने के लिए चल देते हैं. इस के अलावा हिमाचल प्रदेश का मनाली भी बाइक लवर्स को खूब भाता है या बहुत से गंगा नदी के उद्गम स्थल उत्तराखंड के सर्पीले रास्तों को  नापने के लिए अपनी बाइक से चल पड़ते हैं.

बहुत से ऐसे बाइकर जो जान सुखा देने वाले पहाड़ों पर बाइक चलाने से बचते हैं, वे राजस्थान के भूरे रेगिस्तान को काटती काली सड़कों को अपने ‘2 पहियों के जहाज’ का रनवे बना सकते हैं.

वैसे मनाली से लेह, श्रीनगर-लेह-मनाली, जयपुर-जोधपुर-जैसलमेर, लेह बाइक टूर, जयपुर-उदयपुर-माउंट आबू-पुष्कर, मनाली से स्पीति, अहमदाबाद से रण औफ कच्छ, दिल्ली-जयपुर-रणथंभौर, सिक्किम-दार्जिलिंग, गुवाहाटी से त्वांग, शिलांग-चेरापूंजी-देवकी-मावल्यान्नांग, पश्चिमी अरुणाचल प्रदेश, बेंगलुरु-मैसूर-ऊटी, चेन्नई से पुदुचेरी, विशाखापट्नम से अरूका वैली, केरल टूर, मुंबई से थिरुवनंतपुरम, मुंबई से गोवा, बेंगलुरु से गोवा और पुरी से भुवनेश्वर कुछ ऐसे एडवैंचर टूर हैं जो बाइक राइडर्स को बेहद पसंद आते हैं.

दिल्ली के पटेल नगर इलाके के 24 साल के आर्यन गुप्ता ताइक्वांडो, मार्शल आर्ट्स के थर्ड डैन ब्लैक बेल्ट हैं. वे कई स्कूली बच्चों को यह कला सिखाते हैं. उन्होंने 20 साल की उम्र में दिल्ली से मसूरी तक लंबी दूरी की बाइक चलाई थी और पिछले साल तो वे दिल्ली से गोवा अपनी बाइक पर चले गए थे.

आर्यन गुप्ता ने अपने गोवा के टूर के बारे में बताया, ‘‘मेरा मुंबई में शेरू क्लासिक का फिटनैस मौडलिंग का कंपीटिशन था. मैं ने वहां अकेले ही बाइक से जाने की ठानी. मैं 10 अक्तूबर, 2018 को सुबह 5 बजे दिल्ली से निकला था और जयपुर, अजमेर होता हुआ उदयपुर पहुंचा था, जो दिल्ली से तकरीबन पौने

7 सौ किलोमीटर दूर है. वहां एक रात बिताने के बाद अगले दिन अहमदाबाद होते हुए मैं मुंबई जा पहुंचा था. वहां कंपीटिशन में हिस्सा ले कर 2 दिनों बाद मैं गोवा के लिए निकल गया था.’’

ऐसे अकेले ही बाइक पर इतनी दूर निकल जाने से क्या खुशी मिलती है? इस सवाल के जवाब में आर्यन गुप्ता ने बताया, ‘‘बाइक चलाते समय आप रोड के बादशाह होते हैं. अच्छाबुरा हर मंजर आप के सामने होता है. जहां मन किया, बाइक रोक दी और कुछ देर रुक कर फिर चल दिए अपनी मंजिल की तरफ.

‘‘यहां से 2 हजार किलोमीटर दूर गोवा में जब लोगों ने देखा कि एक लड़का दिल्ली के नंबर की बाइक ले कर यहां आ गया है तो वे हैरान रह गए थे. बाइक राइड का सब से बड़ा चैलेंज भी यही है कि आप वे दूरियां भी तय कर लेते हैं जो दूसरे सोच भी नहीं सकते हैं.

‘‘मैं लद्दाख तक बाइक से जा चुका हूं जहां बाइक चलाना ही अपनेआप में बहुत बड़ी बात है. वहां इतनी ज्यादा ऊंचाई है कि बाइक स्पीड ही नहीं पकड़ पाती. औक्सीजन की कमी से मुझे खुद सांस लेने में दिक्कत हो गई थी पर उस टूर में रोमांच चरम पर था.

ये भी पढ़ें- क्या तीर्थयात्रा एडवेंचर टूरिज्म है?

‘‘लेकिन साथ ही मैं एक बात और कहूंगा कि बाइक राइड में रोड पर चौकन्ना रहना चाहिए, क्योंकि यहां भारत में सड़क पर, चाहे वे हाईवे ही क्यों न हों, लोग नियमों का पालन नहीं करते. आप को अपनी स्पीड पर कंट्रोल करने के अलावा दूसरों की ड्राइविंग पर नजर रखनी पड़ती है.’’

आप को पहले ही जानकारी ले लेनी चाहिए कि जहां आप जा रहे हैं वहां की सड़कें टूटीफूटी तो नहीं हैं. अपनी गाड़ी के पूरे कागजात रखेंगे तो पुलिस भी ज्यादा तंग नहीं करेगी. हैलमेट बहुत अच्छी क्वालिटी का होना चाहिए. अनजान सड़कों पर रात को बाइक चलाने से बचना चाहिए.

हाईवे प्लेयर्स नाम से रौयल एनफील्ड बुलेट क्लब चलाने वाले फरीदाबाद के प्रवीण कुमार ने बताया, ‘‘हम 3-4 दोस्तों ने साल 2010 में शौकिया तौर पर अपना बाइक राइडिंग ग्रुप बनाया था. आज हमारे इस ग्रुप में 50-60 ऐक्टिव मैंबर्स हैं.

‘‘अपने गु्रप को मजबूत बनाए रखने के लिए हम सब महीने में 1-2 बार ब्रेकफास्ट राइड के लिए निकलते हैं. यह बाइक राइड ज्यादा लंबी नहीं होती है. हम बस इतनी ही दूर जाते हैं कि सुबह जल्दी घर से निकलें और कहीं हाईवे पर नाश्ता कर के वापस दोपहर तक घर आ जाएं.

‘‘ऐसा करने से हमें नए दोस्त बनाने में मदद मिलती है. दोस्ती की बात चली है तो पिछले साल के सितंबर महीने का ही एक किस्सा है. मेरे एक बाइक राइडर दोस्त अमित तिवारी ने ऐसे ही मुझ से कहा कि चलो स्पीति चलते हैं. बस, उसे छू कर आना है.

‘‘उस का इतना कहना भर था कि मैं और मेरा एक और साथी सोनू निकल लिए स्पीति के लिए. हम दिल्ली से शिमला होते हुए स्पीति से 40-50 किलोमीटर पहले कल्पा नाको बिना बीच में कहीं रुके पहुंच गए थे, जबकि स्पीति दिल्ली से 700 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर है.

‘‘वहां एक दिन रुक कर हम मनाली के रास्ते से दिल्ली आए थे. काजा, स्पीति से मनाली का रास्ता बहुत खराब था. सड़क तो जैसे थी ही नहीं. पगडंडियों, नदियों के बने रास्तों से निकल कर हम ने जैसेतैसे बाइक चलाई थी. वह सफर हमारे लिए यादगार बन गया था.

‘‘मैं एक बात और कहूंगा कि बाइक राइडिंग के दौरान कभी भी शराब वगैरह का नशा न करें. अगर हमारे ग्रुप में कोई सदस्य ऐसा करता पाया जाता है तो उस को बाइक टूर से तुरंत अलग कर दिया जाता है.’’

कुल मिला कर कह सकते हैं कि बाइक राइडिंग एडवैंचर ट्रिप को और भी मजेदार बना देती है. तो फिर देर किस बात की है, चाबी लगाइए अपनी बाइक के इग्निशन में और निकल पडि़ए नए स्पीडी टूर पर. हां, हैल्मेट पहनना न भूलें.

  मैडिकल किट

कहीं दूर पहाड़ों पर ट्रेकिंग हो या राजस्थान के रेगिस्तानों का सफर, छोटीमोटी चोट लगना सामान्य है और अकसर ही हमें आसपास से डाक्टरी सहायता भी मिल जाती है. परंतु क्या हो जब आप को कोई जहरीला कीड़ा काट ले या क्लिफ से गिर कर आप के हाथ की हड्डी टूट जाए? डाक्टर तक पहुंचने में समय लगता है और तब तक रोतेबिलखते, परेशानी बढ़ते समय ध्यान आता है कि काश, फर्स्टएड किट साथ रखी होती तो यह दुर्दशा न होती.

ये भी पढ़ें- पिथौरागढ़ में बनेगा ट्यूलिप गार्डन

ये चीजें आप के ट्रैवलबैग में फर्स्टएड हेतु जरूर होनी चाहिए –

  • पेन रिलीफ जैसे पैरासिटामौल, एस्पिरिन.
  • ऐंटीहिस्टमिन टेबलेट डंक व एलर्जी के लिए.
  • ब्लिस्टर्स, बैंडेज
  • थर्मा
  • हैंड सैनिटाइजर
  • ऐटीसैप्टिक सौल्यूशन
  • पट्टियां, रुई
  • सर्दीजुकाम की दवाई, ऐंटीबायोटिक
  • मैडिकल एथेसिव टेप
  • सैफ्टीपिन, कैंची व ट्वीजर्स
  • इन्सैक्ट रैप्लैंट, सीरिंज
  • कब्ज और दस्त की दवाई
  • ऐंटीफंगल व ऐंटीबैक्टीरियल क्म
  • स्क्यूटो प्रूफ जैल

आमिर खान की बेटी इस शख्स को कर रही हैं डेट

मिस्टर परफेक्शनिस्ट की बेटी इरा खान म्यूजिशियन मिशाल कृपलानी को डेट कर रही हैं. काफी समय पहले से सोशल मीडिया पर इस बात की अफवाह थी कि इरा मिशाल को डेट कर रही हैं लेकिन इरा ने इस बात को औफिशियल अनाउंसमेंट नहीं किया था.

इरा ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर इस बात को कंफर्म किया है. इंस्टाग्राम स्टोरी में एक फैन ने इरा से पूछा कि क्या वे रिलेशनशिप में हैं?  उन्होंने इस सवाल का जवाब एक तस्वीर के साथ देते हुए कहा जिसमें इरा मिशाल को हग करते हुए देखी जा सकती है. इस स्टोरी में इरा ने मिशाल को टैग भी किया है.

ये भी पढ़ें- इंटरनेशनल फिल्म में काम करेगा ‘गली बौय’ का ये एक्टर

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Ira Khan (@khan.ira) on

दरअसल इरा इंस्टाग्राम पर मिशाल के साथ तस्वीरें शेयर करती रहती हैं. इससे पहले भी इरा ने वैलेंटाइन डे पर मिशाल का एक वीडियो पोस्ट किया था जिसमें मिशाल पियानों के सामने बैठकर गाते हुए देखे जा सकते हैं.

कौफी विद करण के सीजन 6 पर आमिर खान ने कहा था कि जुनैद और इरा फिल्म इंडस्ट्री में अपना भविष्य तलाश रहे हैं. उन्होंने कहा था कि जहां उनके बेटे जुनैद एक्टर बनना चाहते हैं वही इरा फिल्ममेकिंग में ज्यादा दिलचस्पी रखती हैं.

ये भी पढ़ें- जानें यहां, क्या है #Men Too

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Ira Khan (@khan.ira) on

आमिर ने इरा के बारे में बात करते हुए कहा था कि ‘मुझे नहीं पता कि इरा अभी क्या करना चाहती हैं. लेकिन वो काफी क्रिएटिव हैं और सिनेमा उसे काफी उत्साहित करता है, ऐसे में वो फिल्ममेकिंग के क्षेत्र में कुछ सालों बाद कदम रख सकती हैं लेकिन मैं इस बारे में कंफर्म तौर पर कुछ नहीं बता सकता हूं. ‘

इंटरनेशनल फिल्म में काम करेगा ‘गली बौय’ का ये एक्टर

सुपर हिट फिल्म गली बौय में कमाल की परफौर्मेंस देने के बाद एफटीआईआई स्नातक, अभिनेता विजय वर्मा अब अपने पहले बड़े वेस्टर्न प्रोडक्शन के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाने के लिए तैयार हैं. इंडो-अमेरिकन लेखक और निर्देशक मीरा नायर, जिन्होंने कुछ ऐतिहासिक फिल्में दी हैं, उन्होंने विजय को अपने अगले प्रोजेक्ट ए सूटेबल बौय में कास्ट किया है, जो इसी नाम से विक्रम सेठ के बहुप्रशंसित उपन्यास का  एडौप्शन है. माना जाता है कि उनकी पिछली फिल्मों में उनके काम से प्रभावित होकर, नायर ने इस भूमिका के लिए वर्मा को कास्ट करने का निश्चय किया, जो कि पुस्तक के प्रमुख पात्रों में से एक है. मीरा ने इससे पहले द नेमसेक और द रिलक्टेंट फंडामेंटलिस्ट सहित कई पुस्तकों को फिल्मों में रूपांतरित किया है.

ये भी पढ़ें- जानें यहां, क्या है Men Too

Vijay-Varma

श्रृंखला में विजय ब्रह्मपुर विश्वविद्यालय के एक छात्र और एक अरबी शिक्षक रशीद का किरदार निभाते हुए दिखाई देंगे. हाल ही में एक साक्षात्कार के दौरान मीरा नायर ने अन्य कलाकारों सहित विजय वर्मा की कास्टिंग की भी पुष्टि की. अपनी भूमिका निभाने के लिए विजय ने पुस्तक पढ़ने के साथ ही अपना शोध कार्य शुरू कर दिया हैं. ए सूटेबल बाय की कहानी स्वतंत्रता के बाद के समय में चार परिवारों के इर्द-गिर्द सेट है. उपन्यास 19 पार्ट्स में बंटा है, प्रत्येक पार्ट अलग-अलग सब प्लौट पर आधारित है. श्रृंखला की शूटिंग इस साल सितंबर में शुरू होने वाली है. अन्य कलाकारों में तब्बू, रणदीप हुड्डा, शेफाली शाह, रसिका दुग्गल, विजय राज, विवान शाह शामिल हैं.

ये भी पढ़ें- फैन की मौत पर दुखी हुए रणवीर सिंह, लिखा ये मैसेज

विजय ने कहा, “मैं मीरा नायर के प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने को लेकर बहुत खुश हूं. मैं उनके काम का सबसे बड़ा प्रशंसक रहा हूं और इस शानदार कहानी को जीवंत बनाने के लिए बेहद उत्सुक हूं. स्क्रीन टेस्ट की प्रक्रिया के दौरान मैंने इसके कुछ हिस्से पढ़े थे लेकिन रशीद के किरदार ने मुझे एक अभिनेता के रूप में काफी आकर्षित किया और मैं जैसे इसकी तरफ खिंच सा गया. मुझे खुशी है कि मुझे यह प्रोजेक्ट मिला और मैं इस सेलेब्रिटी टीम के साथ काम करने के लिए उत्सुक हूं.”

ट्रांसफर नहीं हुआ बसपा का वोट

मायावती भले ही अखिलेश यादव पर यह आरोप लगाये कि सपा का वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं हुआ आंकड़े गवाह है कि सपा नहीं बसपा के वोट ट्रांसफर नहीं हुये. ऐसे में मायावती को भुलावे  में रहने के बजाये बसपा के मिशन पर ध्यान देना चाहिये. बसपा के लोगों के पूजापाठ और धर्म से जुड़ने से मायावती का काम मुश्किल हो गया है.

लोकसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन को वह सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद दोनो ही दलों को थी. मायावती ने इसका ठिकरा सपा नेता अखिलेश यादव के सिर पर पफोड़ते हुए कहा ‘समाजवादी पार्टी के वोट बसपा को ट्रांसपफर नहीं हुये. अखिलेश यादव को सपा में मिशनरी सिस्टम यानि काडर बेस को सही करना चाहिये.’ मायावती की इस बात को कोई भी मानने को तैयार नहीं है. 2014 के लोकसभा और 2017 के विधनसभा चुनाव में बसपा की हालत सबसे अध्कि खराब थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में तो बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी. 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन का ही लाभ है कि बसपा को 10 सीटे मिल गई.

ऐसे में साफ दिखता है कि सपा के साथ गठबंधन का लाभ बसपा को मिला. चुनाव आयोग के आंकड़ो को भी देखे तो यह बात साफ होती है कि सपा के वोट तो बसपा को मिले उल्टे बसपा के वोट सपा को नहीं मिले. सबसे अधिक जनाधर बसपा का खिसक रहा है. इसकी वजह भी यह है कि बीते करीब 20 सालों से बसपा में काडर के कार्यकर्ताओं की घोर उपेक्षा हुई है. मायावती को सबसे अधिक नुकसान 2009 के बाद से शुरू हुआ जब वह बहुमत से सरकार बनाने में सफल हुई और दलित कार्यकर्ताओं और दूसरे दलित संगठनो की उपेक्षा शुरू की थी.

टूटता जा रहा बसपा का मिशन:

बसपा से जाटव बिरादरी को छोड कर बाकी दलित जातियों का पूरी तरह से मोहभंग हो चुका है. बसपा का मिशन के रूप में कार्य करने वाला कार्यकर्ता अब अपने मिशन से पूरी तरह से हट चुका है. इसका सबसे बडा कारण खुद मायावती की नीतियां है. मायावती ने बसपा में लोकतंत्र को कभी आगे नहीं बढ़ने दिया. जो नेता भी अपना जनाधर बढाता था उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता था. ऐसे में धीरे धीरे करके जनाधर वाले नेता पार्टी से दूर होते गये और पार्टी का जनाधर खिसकता गया. मायावती भी दूसरे दलो की तरह पार्टी का टिकट देने के बदले पैसे लेने लगी. ऐसे में बसपा के मिशन के साथ काम करने वाले लोग कम होते गये.

टिकट के लिये पैसा लेने के सबसे अधिक आरोप बसपा पर लगते है. यही कारण है कि चुनाव हारने के बाद वह नेता बसपा से टिकट नहीं पाता. नया नेता भी पार्टी के नाम पर चुनाव नहीं जीत पाता है. उदाहरण के लिये राजधानी लखनऊ के पास की मोहनलालगंज सुरक्षित लोकसभा सीट को देखे तो 2014 के चुनाव में बसपा ने रिटायर अफसर राम बहादुर को टिकट दिया था. वह कम वोट से चुनाव हार गये. 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने इस सीट पर राम बहादुर को टिकट नहीं दिया और सीएल वर्मा को टिकट दिया जो मायावती के बेहद करीबी माने जाते है. सीएल वर्मा 2014 के मुकाबले ज्यादा वोट से चुनाव हार गये.

जानकार लोग कहते है ‘अगर राम बहादुर को दोबारा इस सीट से चुनाव लड़ाया जाता तो वह सीएल वर्मा के मुकाबले बेहतर चुनाव लड़ते.’ बसपा में यह बदलाव कांशीराम के दौर के खत्म होने के बाद शुरू हुआ. कांशीराम के समय में बसपा में सभी दलित जातियों का प्रतिनिधित्व होता था. चुनाव लड़ने के लिये टिकट देने के लिये यह देखा जाता था कि उम्मीदवार पार्टी की नीतियों को कितना समझता है. कांशीराम की मुहिम 85 फीसदी बनाम 15 फीसदी की थी. कांशीराम 85 फीसदी में पूरे वंचित समाज को जोड कर चल रहे थे. 85 बनाम 15 की यही लड़ाई बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की भी थी. यही वजह है कि कांशीराम के समय यह नारा लगता था कि ‘बाबा तेरा मिशन अधूरा कांशीराम करेगे पूरा’. कांशीराम के बाद मायावती के हाथ आते ही पार्टी अपने मिशन से भटक गई. मायावती पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे. वही से बसपा का मिशन अधूरा रह गया और पार्टी का जनाधर खिसकने लगा. यह बात मायावती स्वीकार नहीं कर रही. अपनी हर हार पर वह नया बहाना खोजने लगी. 2019 के लोकसभा में हार का ठिकरा सपा पर फोडते कहा कि सपा का वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं हुआ.

काम ना आई सोशल इंजिनियरिंग:

1998 के बाद से बसपा अपने मिशन को दरकिनार कर आगे बढ़ने लगी. ‘ठाकुर बामन बनिया छोड़, बाकी सब है डीएसफोर’ का नारा देने वाली बसपा अब सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर ब्राहमण समाज को आगे बढ़ाने लगी. 2003 से लेकर 2009 की बहुमत वाली जीत तक बसपा में 85 बनाम 15 की लड़ाई खत्म हो गई. बसपा में भी अलग अलग जातियों को लेकर भाईचारा कमेटी तक बन गई. ऐसे में बसपा का मिशन खत्म हो गया. बसपा के मिशन के रूप में काम करने वाली मशीनरी अब पार्टी से दूर होने लगी. यही वह दौर था जब सवर्ण समाज की अगुवाई करने वाली भारतीय जनता पार्टी का प्रभाव बढने लगा. ऐसे में सवर्ण जातियां बसपा की भाईचारा कमेटी से बाहर होने लगी.

बसपा के लिये परेशानी का सबब यह है कि भाईचारा कमेटी बनने से पार्टी के दलित वर्ग ने सवर्णो की तरह से रीति रिवाज और पूजा पाठ करना शुरू कर दिया. भाजपा ने इन सबको हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के नाम पर अपनी तरफ खीेचना शुरू कर दिया. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने एक भी मुसलिम को टिकट नहीं दिया तो बसपा ने दलित मुसलिम गठजोड बनाना शुरू किया. उस समय तक मायावती को इस बात का अहसास ही नहीं था कि दलित सवर्ण से अध्कि मुसलिम से दूर हो गया है.ऐसे में दलितों ने बसपा के मुसलिम प्रेम को नकारते हुये पार्टी से किनारा कर लिया. मायावती ने 2014 के लोकसभा चुनाव की हार के बाद भी इस सच को नही स्वीकार किया किबसपा का जनाधर खत्म हो चुका है. 2017 के विधनसभा चुनाव में मायावती ने बसपा के करीब 100 टिकट मुसलिम बिरादरी को दिये. नतीजा एक बार फिर से बसपा के खिलापफ गया और बसपा तीसरे नम्बर की पार्टी बनकर रह गई.

दलित पिछड़ा गठजोड़:

चुनाव में जातीय समीकरण मजबूत करने के लिये बसपा-सपा ने गठबंधन किया. दोनो को लग रहा था कि यह गठजोड़ काम करेगा. असल में बसपा नेता मायावती की ही तरह सपा नेता अखिलेश यादव भी केवल यादव जाति के नेता बनकर रह गये. जमीनी स्तर पर दलित और पिछड़ों के बीच वैसा ही भेदभाव है जैसा दलित और सवर्ण के बीच है. दलित वर्ग को अब लगता है कि उनको अगर समाज की मुख्यधारा में शामिल होना है तो धार्मिक होना पड़ेगा. ऐसे में देखे तो पूजा पाठ के मामले में दलित अब सवर्णो से भी आगे निकल गये है. वह अब धर्म के विरोध पर बसपा का साथ देने को तैयार नहीं है. इसके साथ ही साथ बसपा में पार्टी लेवल पर मायावती कह तानाशाही भी बुरी तरह से पार्टी संगठन को खत्म कर रही है.

बसपा के खिसकते जनाधार को चुनावी नतीजों से समझा जा सकता है. 2014 में बसपा ने 80 लोकसभा की सीटो पर चुनाव लड़ा उसको 19.77 फीसदी वोट मिले. 2019 में बसपा ने सपा के साथ मिलकर 38 सीटो पर चुनाव लडा और 19.36 फीसदी वोट मिले. केवल 38 सीटों पर चुनाव लडने के बाद भी उसे पहले जैसे की वोट मिले जिससे पता चलता है कि गठबंधन का लाभ बसपा को मिला. गठबंधन नहीं हुआ होता तो वोट प्रतिशत घट गया होता. सपा को देखे तो 2014 में उसको 22.35 फीसदी वोट मिले थे. 2019 में यह घटकर 18 फीसदी रह गये. ऐसे में साफ है कि गठबंधन का सपा को कोई लाभ नहीं हुआ. बसपा को केवल वोट प्रतिशत में ही लाभ नहीं हुआ बल्कि लोकसभा में वह शून्य से 10 सीटों पर आ पंहुची.

मायावती जो सीख सपा नेता अखिलेश यादव को दे रही है कि वह सपा कार्यकर्ताओं को समाजवादी मिशन से जोड़े असल में यह काम खुद मायावती को करने की जरूरत है. 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती की जीत बसपा की जीत नहीं है. यह मुस्लिम वोट का भी कारण है. जो भाजपा के खिलाफ वोट को लेकर एकजुट था. वह उन प्रत्याशियों को मिला जो भाजपा के मुकाबले असरदार तरह से चुनाव लड़ रहे थे. मुस्लिम वोट बैंक मायावती के साथ नहीं है. वह भाजपा के खिलाफ है. ऐसे में जब तक चुनाव में राष्ट्रवाद और धर्म पर चुनाव होगा तब तक जातिय गठजोड़ काम नहीं आयेगा. मुस्लिम की हिमायती बनने के कारण भी दलित सबसे अधिक बसपा से नाराज होकर पार्टी से दूर जा रहा है. बसपा के नई उम्र के वोट बैंक को अब 85 बनाम 15 की लडाई का कुछ याद नहीं है. उस पर धर्म का प्रभाव है. जिसकी वजह से वह बसपा से दूर भाजपा की तरफ झुक गया है. जब तक बसपा 85 बनाम 15 की लड़ाई को नहीं समझा पायेगी उसको अपना जनाधार बचाना मुश्किल होगा.

जानें यहां, क्या है #Men Too

हाल ही में #metoo के जरिए महिलाएं यौन शोषण को लेकर खुलकर बातें की और अपनी आपबीती बताई. इस मुहिम के तहत कई महिलाएं आगे आईं और उन्होंने अपने साथ हुए धटनाओं के बारे में बताई. #metoo मूवमेंट के जरिए कई बौलिवुड सेलिब्रिटिज का नाम आया.

लेकिन इस मुहिम के चलते कई ऐसे मामले भी सामने आए जिनमें आपसी मतभेद के कारण पुरूषों पर शोषण के झूठे आरोप लगाए गए. ऐसे में कई पुरुषों को समाज में बदनामी भी हुई. अब मीटू के जवाब में पुरुषों को लेकर भी मुहिम शुरू हो गई जिसमें पुरुष अपनी आपबीती और उन पर लगे झूठे आरोपों की कहानी बता रहे हैं.

ये भी पढ़ें- फैन की मौत पर दुखी हुए रणवीर सिंह, लिखा ये मैसेज

क्या है #MenToo

इन दिनों सोशल मीडिया पर #MenToo ट्रेंड हो रहा है. इस मुहिम के जरिए पुरुष अपनी आपबीती बता रहे हैं कि किस तरह #metoo के कारण आपसी सहमति से बने संबंधों को रेप करार दे दिया गया. और इन झूठे आरोपों के चलते उन्हें समाज में घृणा की नजर से देखा जाने लगा.

झूठे आरोपों के चलते उन्हें कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी और कोर्ट से भी उन्हें बहुत ज्यादा सहायता नहीं मिल सकी. इतना ही नहीं इन आरोपों के चलते सिर्फ आरोप ही नहीं बल्कि उनके परिवार वालों को भी कई परेशानियों का सामना करना पड़ा.

ये भी पढ़ें- जानें, करण जौहर के हौरर फिल्म का कौन होगा स्टार

आपको बता दें, #mentoo को लेकर एक्टर करण ओबेराय का मामला चर्चा में बना हुआ है. इसके तहत इनके समर्थन में कई सेलेब्स सामने आए हैं और उन्हें निर्दोष बताया है. हालांकि अभी मामला कोर्ट में है और हाल ही उन्हें एक महीने कस्टडी में रहने के बाद जमानत दी गई है. ये भी सामने आया था कि पीड़िता ने स्वयं ही खुद पर हमला करवाने की झूठी साजिश रची थी.

ये भी पढ़ें- एक्टर गिरीश कर्नाड का 81 की उम्र में निधन

भारत में #metoo के जरिए तनुश्री दत्ता ने बौलीवुड के जानेमाने एक्टर नाना पाटेकर पर शोषण और बदसलूकी के आरोप लगाए. इसके बाद कई जाने माने सितारों के नाम सामने आए,जिनमें आलोकनाथ, साजिद खान जैसे नाम शामिल हैं.

फैन की मौत पर दुखी हुए रणवीर सिंह, लिखा ये मैसेज

बौलीवुड सितारों के लिए उनके फैंस क्या-क्या कर गुजरते है. फिल्मी सितारें उनके दिल के बेहद करीब होते हैं. फैंस के कारण ही तो सितारें आगे बढ़ते हैं.  सितारों के सफलता का श्रेय उनके फैंस को ही जाता है. जब भी कोई फैंस अपने फेवरेट सितारों से मिलते है तो, वें अपने फैस को स्पेशल फील करवाते हैं.

आपको बता दें, हाल ही में अभिनेता रणवीर सिंह ने अपने फैन की मौत सुनकर काफी दुख जाहिर की. इस युवा फैंन की तबियत बिगड़ने से मौत हो गई. दरअसल रणवीर ने सोशल मीडिया पर एक फोटो शेयर की , जिसमें वह अपने फैन के साथ नजर आए रहे हैं. इस पोस्ट के कैप्शन में रणवीर ने लिखा ‘आरआईपी लिल होमी’.

ये भी पढ़ें- क्या सृष्टि रोडे ने तोड़ा रोहित सुचांती का दिल, जानें इस खबर की सच्चाई

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Viral Bhayani (@viralbhayani) on

रणवीर के इस फैन का नाम जतिन दुलेरा था. बताया जा रहा है कि, वह आफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था. उसी वक्त वह बाथरूम में गिर गया. कुछ ही पलों में उसने दम तोड़ दी.

रणवीर के अलावा और कई अन्य बौलीवुड सितारों ने जैसे कि प्रियंका चोपडा, शाहरुख खान,  सलमान खान और जोनस के संग जतिन दुलेरा की कई तस्वीरों को साझा करते हुए भयानी ने लिखा ‘हमेशा की तरह हमेशा मुस्कुराते रहो जतिन. हमें तुम्हारी याद आएगी.

ये भी पढ़ें- इस क्रिकेटर की हो सकती है ‘खतरों के खिलाड़ी 10’ में एंट्री

आपको बता दें, कबीर खान की आने वाली फिल्म ’83’ में रणवीर नजर आएंगे. यह फिल्म क्रिकेटर कपिल देव और 1983 के वर्ल्ड कप में भारत की शानदार जीत पर फिल्मायी जाएगी. ’83’ में साकिब सलीम, पंकज त्रिपाठी, ताहिर भसीन, आर.बद्री, हार्डी संधू, चिराग पाटिल, साहिल खट्टर और ऐमी विर्क भी हैं.

क्या तीर्थयात्रा एडवेंचर टूरिज्म है?

आज नेहा बहुत खुश थी. काफी समय से वह अपने पूरे परिवार के साथ अमरनाथ की यात्रा पर जाने की इच्छुक थी. आज जब पति ने इन छुट्टियों में वहां जाने का प्लान फाइनल किया तो उस का दिल खिल उठा. पर एक सवाल उस के मन में कौंध रहा था. उस के सासससुर की उम्र अधिक हो चुकी थी. ऐसे में क्या वे अमरनाथ की गुफा तक का कठिन सफर तय कर पाएंगे? इस का समाधान भी पति ने तुरंत कर दिया.

दरअसल अब यात्रियों के लिए वहां हेलीकाप्टर की सुविधा उपलब्ध है . उन लोगों ने तय किया कि आगे का सफर हेलीकाप्टर से ही तय करेंगे .नेहा के प्रति राकेश ने एजेंट के जरिए 3 नाइट्स और 4 डेज का पैकेज बुक करा लिया.

श्रीनगर पहुंच कर वे सोनमार्ग की ओर निकले. हालांकि इन दोनों के बीच की दूरी मात्र 120 किलोमीटर थी मगर भारी भीड़ और ट्रैफिक जाम की वजह से 4 से 5 घंटे लग गए. वहां पहुंच कर उन्होंने एक होटल में रात बिताई और सुबहसुबह मुख्य यात्रा के लिए निकल पड़े.हेलीकॉप्टर बालटाल से मिलना था. उन्हें सुबह 9 बजे बालटाल पहुँचने को  कहा गया था. वे यह सोच कर 6 बजे पहुंच गए कि फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व के नियम के मुताबिक शायद उन्हें पहले मौका मिल जाए. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ और उन्हें 9 बजे तक इंतजार करना पड़ा.

हेलीपैड पर हद से ज्यादा भीड़ और शोरशराबा मचा हुआ था. एजेंट्स ने पैसेंजर्स को मूर्ख बनाया था. इतनी ज्यादा ओवरबुकिंग थी की टिकट पर लिखे समय के मुताबिक टेकऑफ होना नामुमकिन था. करीब 3 घंटे की जद्दोजहद के बाद फाइनली उन्हें बोर्डिंग पास मिल गया . करीब 1 बजे तक उन का नंबर आया और अंततः वे पंचतरणी पहुंच गए. वहां से गुफा की दूरी 7 किलोमीटर थी मगर इतनी ज्यादा भीड़ और धक्कामुक्की हो रही थी कि गुफा तक पहुंचतेपहुंचते 5 घंटे और बीत गए. शरीर बेदम हो रहा था और सोने पर सुहागा यह हुआ कि इस भीड़ में नेहा का मोबाइल भी किसी ने मार लिया. इसी दौरान बारिश शुरु हो गई. तापमान प्लस 15 से गिर कर जीरो डिग्री पर पहुंच गया. राकेश ने जल्दी से पैरंट्स के लिए एक टेंट बुक किया. किसी तरह चाय का इंतजाम किया और फिर थोड़ी देर में दर्शन के लिए निकल पड़े. वहां पालकी की सुविधा मौजूद थी मगर इस के लिए भी काफी जेब ढीली करनी पड़ी.

शाम 7 बजे तक वे दर्शन कर के फ्री हुए. अंधेरा भी गहरा हो चुका था. इसलिए उन लोगों को रात टैंट में बिताने का फैसला लेना पड़ा. टैंट के लिए भी प्रति व्यक्ति 3 से 4 सौ देने पड़े. सब भूखप्यास से व्याकुल हो रहे थे. चोटी पर भंडारे चल रहे थे मगर नेहा के परिवार के लोग इतने थक चुके थे कि किसी के भी शरीर में इतनी ताकत नहीं बची कि वह जा कर भंडारे से खाने का सामान ले कर आ सकें. उन लोगों ने भूखे पेट ही सोने का फैसला लिया पर यों सोना भी सहज नहीं था. ठंड इतनी ज्यादा थी कि कंबल के बावजूद वे पूरी रात कांपते रहे.

जहां तक बात वाशरूम फैसिलिटी की थी तो वहां की हालत तो बहुत ही दयनीय थी. गंदगी इतनी

जैसे बीमारियों का घर. वह रात नेहा को इतनी भयानक लगी कि वह एकएक पल गिनती रही कि कब सुबह हो और कब वे वापस लौटे.

ये भी पढ़ें- सैन फ्रांसिस्को में लें दुनियाभर के इन 13 शहरों के खाने का मजा

6 बजे वे पंचतरणी ( 7किलोमीटर ) के लिए निकले. लौटते समय केवल दोढाई घंटे लगे पर हेलीपैड पर एक बार फिर चार-पांच घंटे इंतजार करना पड़ा. 1 बजे के करीब जब वे वापस लौटे तब तक शारीरिक मानसिक रूप से इतने थक चुके थे , इतने त्रस्त हो चुके थे कि कुछ भी करने की स्थिति में नहीं थे.

वास्तव में तीर्थयात्राएं ऐसे लोगों के लिए हैं जिन्हे लगता है कि वे सफर में जितनी ज्यादा तकलीफ और चुनौतियां सहेंगे उन पर उतनी ही ज्यादा दैव कृपा बरसेगी. पूरे सफर में आनद या रोमांच कहीं नहीं होता.

भारत के कई तीर्थस्‍थल आज भी बेहद दुर्गम मार्गों पर स्थित हैं. इन तीर्थस्‍थलों का रास्‍ता ऊंची चढ़ाई, प्राकृतिक आपदाओं से घिरे हजारों मीटर ऊंचे पर्वतों के  बीच से गुजरता हुआ किसी ऊंचे शिखर पर पहुंचता है. विषम जलवायु, जानलेवा  मौसम और कठिन से कठिन  परिस्थ‍ित‍यों के बावजूद हर साल लाखों लोग तीर्थों पर जाते हैं ताकि भगवान को पा सकें. भगवान का तो पता नहीं पर कई बार ऐसे प्रयासों में वे भगवान को प्यारे जरूर हो जाते हैं. कई लोग गंभीर बीमार का शिकार हो कर दम तोड़ देते हैं , कई  दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं  तो  कई कुदरत के अचानक बदले तेवरों से असामयिक  मौत की भेंट चढ़ जाते हैं. आइए आप को बताते हैं,  भारत के कुछ ऐसे तीर्थस्‍थलों के बारे में जहां जाना एक तरह से मौत को हाथ में ले कर चलने के बराबर है.

1. कैलाश मानसरोवर
यह भारत के सब से दुर्गम तीर्थस्‍थानों में से एक है. पूरा कैलाश पर्वत 48 किलोमीटर में फैला हुआ है और इस की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 4556  मीटर है. इस यात्रा का सब से  अधिक कठिन मार्ग भारत के पड़ोसी देश चीन से हो कर जाता है. यह यात्रा करीब 28 दिन की होती है.

2. अमरनाथ
अमरनाथ भी बेहद दुर्गम   तीर्थस्‍थलों में से एक है. श्रीनगर शहर के उत्तरपूर्व में 135 किलोमीटर दूर यह तीर्थस्‍थल समुद्रतल से 13600 फुट की ऊंचाई पर स्थित है.  यहां तापमान अक्‍सर शून्य से नीचे चला जाता है. यहाँ बारिश, भूस्‍खलन आदि कभी भी हो सकते हैं. सुरक्षा की दृष्टि से बेहद  संवेदनशील और  संदिग्ध   मानी जाने वाली इस यात्रा के लिए पहले से रजिस्‍ट्रशेन कराना होता है. बीमार और कमजोर यात्री अक्‍सर लौटा दिए जाते हैं.

3. वैष्‍णोदेवी
वैष्‍णो देवी जम्मूकश्‍मीर के कटरा जिले में स्थित तीर्थस्‍थल है. यह मंदिर 5,200  फ़ीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 12 किलोमीटर (7.45 मील) की  दूरी पर मौजूद है. मंदिर में जाने की यात्रा बेहद दुर्गम है. कटरा से 14 किमी की खड़ी चढ़ाई पर वैष्‍णोदवी की गुफा है.

4 . हेमकुंड साहेब

हेमकुंड साहेब सिखों का तीर्थस्थल है. यहां पहुंचने की राह  बहुत ही दुर्गम है. यह तकरीबन 19 किलोमीटर की पहाड़ी यात्रा है. पैदल या खच्‍चरों पर पूरी होने वाली यात्रा  में जान का जोखिम भी होता है.

5 . बद्रीनाथ
उत्‍तराखंड में अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नर और नारायण नाम की 2 पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित बद्रीनाथ भी एक तीर्थस्‍थल है जहां पहुंचने की  यात्रा भी बेहद दुर्गम है. हर साल यहां लाखों लोग पहुंचते हैं.

6 . गंगोत्री और यमनोत्री
गंगोत्री और यमुनोत्री दोनों ही उत्तरकाशी जिले में हैं. दुर्गम चढ़ाई होने के कारण लोग  इस उद्गम स्थल को देखने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाते. यहां 5 किलोमीटर की सीधी खड़ी चढ़ाई है. इसी तरह गंगोत्री गंगा नदी का उद्गम स्थान है. गंगा का मंदिर, समुद्र तल से 3042 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यह  स्थान उत्तरकाशी से 100 किमी की दूरी पर स्थित है.

ये भी पढ़ें- कहीं जयपुर में रात के खाने के लिए न भटकना पड़ जाए

जरा इस समाचारों पर गौर करें

त्रिकुटा की पहाड़ियों पर लगी आग, फंसे वैष्णो देवी गए 25 हजार श्रद्धालु

मई 23, 2018

कटरा जिले में वैष्णो देवी गए 25 हजार लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़  रहा है. यहां त्रिकुटा की पहाड़ियों के जंगलों में आग लग गई. जिस के बाद कई सारी सेवाओं को बंद करना पड़ा.

यमुनोत्री व केदारनाथ में हार्ट अटैक से चार यात्रियों की मौत

23 मई , 2018, यमुनोत्री मार्ग पर चारधाम यात्रा के दौरान दम फूलने और हार्टअटैक से 4 यात्रियों की मौत हो गई. इस के साथ ही यमुनोत्री व केदारनाथ में हार्ट अटैक से मरने वाले यात्रियों की संख्या 39 हो गई है जब कि चारों धाम में यह आकंड़ा 42 पहुंच गया है. गौरतलब है कि केदारनाथ की यात्रा के लिए लगभग 18 किलोमीटर की यात्रा पैदल चल कर करनी पड़ती है.

गंगासागर में भगदड़

15 जनवरी 2017, पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध गंगासागर मेले में मकर संक्रांति के मौके पर भगदड़ मचने से 6 श्रद्धालुओं की मौत हो गई जब कि 15 से ज्यादा लोग जख्मी हुए .सरकार ने मारे गए लोगों के परिवार वालों को 5-5 लाख रुपये मुआवजा देने का ऐलान किया. कोलकाता से 100 किलोमीटर दूर दक्षिण चौबीस परगना जिले में स्थित सागर द्वीप पर हर साल मकर संक्रांति के मौके पर गंगासागर मेले का आयोजन होता है. यह हादसा गंगासागर के कुचुबेरिया इलाके में हुआ है.

फरवरी, 07 2019

वृंदावन के एक आश्रम के कमरे में एक युवक का बिस्तर पर खून से लथपथ शव पड़ा मिला.

पुलिस तफ्तीश के मुताबिक गौधूलिपुरम कॉलोनी स्थित सियावर कुंज आश्रम में दो विद्यार्थी विशाल और संदीप रह रहे थे . इन के पास पिछले 15-20 दिनों से हरियाणा का रहने वाला सुनील नाम का शख्स भी आताजाता था जो वृंदावन में ईरिक्शा चलाता है और मंगलवार की शाम को वह अपने साथ  उस  युवक को आश्रम लाया था. सुबह विशाल ने कमरे में सुनील के साथ आए युवक का रक्तरंजित शव बिस्तर पर पड़ा हुआ देखा. पुलिस के अनुसार सिर पर किसी भारी चीज से प्रहार कर हत्या की गई.

तीर्थयात्रा के दौरान या तीर्थस्थलों में जान गंवाने से जुड़ी इस तरह की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं जब एक तीर्थयात्रा व्यक्ति की अंतिम यात्रा बन जाती है.

लोगों को लगता है कि तीर्थयात्रा भी एक तरह का एडवेंचर्स ट्रिप ही है जहाँ पूजापाठ के साथसाथ रिलैक्स होने और फॅमिली संग एडवेंचर का मजा भी लिया जा सकता है पर ध्यान रखें जहाँ पूजापाठ और चढ़ावों की बातें ,मन्नतों का दौर,  कुछ खोने का डर और पाने की आस हो वहां जोखिम से खेलने और नया देखने का आनंद नहीं मिल सकता.

आधुनिक युग बुद्धिवाद का युग कहा जाता है. हर बात तर्क और बुद्धि की तराजू पर तौली जाती है.  मगर अफ़सोस तीर्थयात्राओं के  मसले पर जनता बड़ी आसानी से मूर्ख बन जाती है. वे हर तरह के तर्क और विवेक को ताक पर रख कर केवल दैवी कृपा का नाम जपते हुए इन यात्राओं पर निकल पड़ते हैं.

इस के विपरीत एडवेंचर टूरिज्म पर्यटन का वह नया रूप है जहां आप कथित जोखिम के साथ कुछ नया खोजने का प्रयास करते हैं. इस तरह के टूरिज्म में भी काफी रिस्क रहता है  मगर ये यात्राएं जीवन की बेहतरीन यात्राएं साबित होती हैं. बस यह जरूरी है कि आप शारीरिक रूप से स्वस्थ हों. रिवर राफ्टिंग ,बंजी जंपिंग, हैलीस्कीइंग ,स्नोर्कलिंग, साइकिल ट्रैकिंग ,स्काई डाइविंग ,स्कूबा डाइविंग जैसी एक्टिविटीज  एडवेंचर टूरिज्म का हिस्सा हैं जिन में जोखिम भी होता है और भरपूर रोमांच भी.

कुछ हट कर और रोचक करने की चाह रखने वाले साहसी प्रवृति के लोग एडवेंचर टूरिज्म का रुख करते हैं जब कि अनायास बिना श्रम दैवी कृपा से सब कुछ पाने की चाह रखने भीरु प्रवृति वाले तीर्थ यात्रा को निकलते है.

ऐसी मान्यता है कि तीर्थयात्रा यानी चारों धाम और ज्योतिर्लिंगों के दर्शन, भजनपूजन, अर्चन करने से धर्मलाभ होता है और इंसान के सारे संकट दूर होते हैं. मनचाही मुराद पूरी होती है. इन तीर्थों में लाखोंकरोड़ों की संख्य%

जानें, बिना तकिया लगाए क्यों सोना चाहिए?

मुलायम तकिया सोने में आराम देता है, इसलिए हम सभी को सिर के नीचे तकिया लगाकर सोने की आदत होती है. लेकिन क्या आपको पता है कि तकिया लगाकर सोना आपके सेहत के लिए काफी हानिकारक है. इससे आपको रीढ़ संबंधी समस्याओं के अलावा कील-मुहांसों और झुर्रियों तक की समस्या हो सकती है.

बिना तकिया लगाए सोने की सलाह आपने कई बार सुनी होगी लेकिन ऐसा करने से आपको क्या क्या फायदे हो सकते हैं इसके बारे में हम आज आपको विस्तार से बताने जा रहे हैं.

ये भी पढ़ें- क्यों जरूरी है चबा कर खाना?

बिना तकिया लगाए सोने के फायदे

  1. पीठ दर्द रोकने में मददगार

जब हम बिना तकिए के सोते हैं तब हमारी रीढ़ बेहद ही आराम की मुद्रा में होती है और शरीर प्राकृतिक वक्रता में होता है. ऐसे में मोटे तकिए के साथ सोने पर पीठ और गर्दन में दर्द होने की समस्या हो सकती है. अगर आपके साथ पीठ दर्द की समस्या है तो तत्काल ही तकिए का प्रयोग बंद कर दें, इससे कुछ ही दिनें में आपको बेहतर परिणाम मिलेगा.

2. याद्दाश्त बढ़ाए

जब हम सोते हैं तब हमारा दिमाग आराम की स्थिति में होता है. सुबह जब हम मानसिक रूप से तरोताजा होकर उठते हैं तो हमारी मेमोरी सेहतमंद रहती है. इससे याद्दाश्त दुरुस्त रहता है. लेकिन ऐसा तभी संभव है हम जब हमारे सोने की पोजिशन सही हो. सही पोजिशन में सोने के लिए सर के नीचे से तकिया हटाना बेहद ही जरूरी है.

3. नींद की क्वालिटी सुधरती है

अगर आप सोचते हैं कि सोते समय मखमली तकिया आपके गर्दन और सिर को सपोर्ट करता है, उन्हें आराम देता है और आपकी नींद को बेहतर बनाता है तो आप गलत हैं. एक शोध में बताया गया है कि बिना तकिए के सोने से न कि केवल नींद की क्वालिटी सुधरती है बल्कि इन्सोम्निया जैसी नींद न आने वाली समस्याओं से भी छुटकारा मिलता है.

ये भी पढ़ें- ‘अस्थमा’: सावधानी हैं जरुरी…

4. मुहांसे और झुर्रियां रोकने में मददगार

तकिए के कवर पर काफी मात्रा में धूल-गंदगी और बैक्टीरिया होते हैं जो चेहरे की त्वचा पर चिपककर मुहांसों आदि का कारण बनते हैं. इसके अलावा तकिए पर हमारे चेहरे की त्वचा काफी आराम की स्थिति में होती है. इससे चेहरे पर झुर्रियों के आने का खतरा भी 30 प्रतिशत तक बढ़ जाता है. ऐसें में अगर आप मुहांसों और कम उम्र में ही झुर्रियों की समस्या से निजात पाना चाहती हैं तो आज ही से तकिए को कहे बाय बाय.

ये भी पढ़ें- डायबिटीज: अपने खाने में जरूर शामिल करें ये 4 चीजें

आलू और दाल की टिक्की रेसिपी

आज आपको आलू और साबूदाने की टिक्की के रेसिपी के बारे में बताने जा रहे हैं. जो खाने में बहुत टेस्टी और बनाने में भी बेहद आसान है. तो चलिए जानते हैं, आलू और दाल की टिक्की रेसिपी.

सामग्री

आलू (500 ग्राम उबलाकर मैश किए हुए)

ब्रेड स्लाइस (3)

नमक  (स्वादानुसार)

लाल मिर्च (आवश्यकतानुसार)

गरम गसालि

जीरा पाउडर (1/2 टी स्पून)

धनिया पाउडर (1/2 टी स्पून)

1/2 कप चना दाल (हल्की उबली हुई)

हरी मिर्च (बारीक कटा हुआ)

नींबू का रस (कम मात्रा में)

हरा धनिया (बारिक कटी हुई)

ये भी पढ़ें- घर पर बनाएं चौकलेट फान्डू

बनाने की वि​धि

ब्रेड के स्लाइस को क्रम्बल कर लें.

इसमें मैश किए हुए आलू, चना दाल, हरा धनिया, नींबू का रस और हरी मिर्च डालें.

इसमें जीरा पाउडर, धनिया पाउडर, गरम मसाला, नमक और कुछ बूंदें तेल की डालें.

इसे अच्छी तरह से मिला लें.

इस मिश्रण से गोलाकार की टिक्की बना लें और इसे गोल्डन ब्राउन होने तक फ्राई करें.

ये भी पढ़ें- ऐसे बनाएं चिली फिश

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें