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सिगरेट पीना है बेहद खतरनाक…

सिगरेट के पैकेटों पर स्वास्थ्य संबंधी खतरों की चेतावनी छपी होने के बावजूद धूम्रपान करने वालों की संख्या में कमी नहीं हो रही. सो, सिगरेट की खपत बढ़ती जा रही है. इस से सिगरेट बनाने वाली कंपनियों के मुनाफे में खासा इजाफा हो रहा है. आजकल अधिकांश पश्चिमी देशों में सार्वजनिक स्थानों, कार्यालयों, रेलवे स्टेशनों, प्लेटफौर्मों, ट्रेनों, बसों, शिक्षण संस्थानों आदि में धूम्रपान पर कानूनन रोक लगा दी गईर् है. इस के बावजूद लोगों की धूम्रपान की आदत में कमी नहीं हो रही.

धूम्रपान करने वालों के संबंध में जो सर्वे किए गए हैं उन से पता चलता है कि 10 से 18 प्रतिशत लोग प्रतिदिन 5 या इस से कम सिगरेट पीते हैं. यूनिवर्सिटी कालेज, लंदन के प्रोफैसर रौबर्ट वेस्ट ने अपने सहयोगी पीटर हाजेक के साथ धूम्रपान संबंधी जो अध्ययन किया था उस से पता चला कि अकसर धूम्रपान करने वाले लोग मध्यवर्ग के होते हैं. वे शिक्षित होते हैं और धूम्रपान इसलिए करते हैं कि उस से समाज में सभा व सोसाइटियों में मिलनेबैठने में आसानी होती है.

कभीकभी धूम्रपान करने वालों में 80 प्रतिशत लोगों ने बतलाया कि उन्होंने धूम्रपान बंद करने की कोशिश की, पर वे असफल रहे. तो क्या इसे लत कहा जा सकता है?

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कभीकभी धूम्रपान के खतरे

कभीकभी धूम्रपान करने वाले लोग एकजैसे नहीं होते. इन में यदि कुछ लोग पहले 20 सिगरेट प्रतिदिन पीने वाले होते हैं जो धूम्रपान बंद करने की कोशिश कर रहे होते हैं, तो दूसरे लोग वे भी होते हैं जो कुछ ही समय बाद 20 सिगरेट प्रतिदिन पीने लगते हैं.

प्रतिदिन धूम्रपान करने से कभीकभी नियमित धूम्रपान की स्थिति तक पहुंचना संभव है. अधिकांश धूम्रपान करने वाले उसी प्रकार ऐसा नहीं कर पाते जिस प्रकार नियमित मद्यपान करने वाले अधिकांश लोग कभीकभी मद्यपान करने की स्थिति तक नहीं पहुंच पाते यानी या तो पूरी तरह या बिलकुल नहीं. फिर भी कुछ लोग कभीकभी धूम्रपान करते रह सकते हैं, उन की धूम्रपान करने की मात्रा न तो बढ़ती है न घटती है.

सर्वे से पता चला है कि अमेरिका में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है. पर क्यों? इस का पता नहीं चल सका. ऐसे लोगों की धूम्रपान करने की आदत इस सीमा तक क्यों नहीं बढ़ती कि वे उस पर निर्भर हो जाएं? इस के पारिवारिक कारण हो सकते हैं, आनुवंशिक कारण भी हो सकते हैं और उन का शैक्षणिक स्तर भी इस का कारण हो सकता है.

कभीकभी धूम्रपान करने वालों की बात बिलकुल दूसरी है. उन के स्वास्थ्य के लिए क्या खतरे हैं? स्पष्ट है उन्हें प्रतिदिन धूम्रपान करने वालों की अपेक्षा कम खतरे हैं लेकिन इतने कम नहीं जैसा कि आमतौर पर समझा जाता है.

धूम्रपान से कई तरह की बीमारियां होती हैं. इन में मुख्य हैं कैंसर और हृदय रोग. कैंसर तो धूम्रपान की मात्रा पर निर्भर है. प्रोफैसर वेस्ट के अनुसार, धूम्रपान नहीं करने वाले की अपेक्षा प्रतिदिन धूम्रपान करने वाले को कैंसर का खतरा 15 गुना अधिक होता है.

स्मोकर संग रहना भी खतरनाक

हृदय रोग की स्थिति इस से अलग है. धूम्रपान की मात्रा के अनुपात में हृदय रोग के खतरे का अनुपात नहीं मिलाया जा सकता. यह खतरा एक या दो सिगरेट पीने वालों को भी बहुत ज्यादा है. धूम्रपान नहीं करने वाले को धूम्रपान करने वाले से प्राप्त धुएं से खतरा रहता है.

अटलांटा के सैंटर फौर डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रिवैंशन की मानें तो धूम्रपान नहीं करने वाले लोग यदि धूम्रपान करने वालों के साथ

30 मिनट भी रह जाएं तो उन्हें हृदयाघात का खतरा रहता है. इस अनुपातहीन खतरे के संबंध में वैज्ञानिकों को खुद आश्चर्य है कि एक या दो सिगरेट प्रतिदिन पीने वाले व्यक्ति के साथ यदि कोई धूम्रपान नहीं करने वाला व्यक्ति रहता है तो उसे धूम्रपान करने वाले की अपेक्षा एकतिहाई खतरा है, हालांकि धूम्रपान के धुएं से उसे केवल एक प्रतिशत ही साबका पड़ता है.

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लैबोरेटरी में परिणाम के बाद पता चला है कि इस का मुख्य कारण यह है कि धूम्रपान के धुएं में जो जीवविष होते हैं वे धूम्रपान के संपर्क में कम आने वालों में बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं. इस से खून के जमने की शक्ति बढ़ जाती है और इस से धमनियों में ज्वलनशीलता होने लगती है. इसी से हृदयाघात का मुख्य कारण रक्तनलिका में गांठ पड़ने की संभावना का खतरा बढ़ जाता है.

अब सभी कंपनियों ने यह तो मान लिया है कि धूम्रपान और कैंसर का संबंध है पर वे अभी भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि धूम्रपान नहीं करने वालों को भी धूम्रपान करने वालों के संपर्क से कैंसर और दूसरी बीमारियां हो सकती हैं.

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जो बात धूम्रपान न करने वालों के संबंध में कही गई है वही बात कभीकभी धूम्रपान करने वालों के संबंध में होती है. लाखों लोगों के रक्त में इस प्रकार गांठ पड़ने की मात्रा बढ़ने का साफ मतलब यह है कि औसत के नियमानुसार कुछ लोगों को तो हृदयाघात होना ही है. सो, ऐसा होने के पहले ही उन्हें डाक्टरी सलाह ले कर आवश्यक जांचें करानी चाहिए.

विकलांग बच्चों की ऐसे करें देखभाल

शारीरिक रूप से विकलांग न जाने कितने लोग आज अपनेअपने क्षेत्रों में अगर कामयाब हैं तो इस के पीछे उन के मातापिता और परिवार वालों की मेहनत व कोशिशें हैं. उन्होंने उन में आत्मविश्वास भरा और जीवन के प्रति उन की सोच को सकारात्मक बनाए रखा. सच है कि बच्चे पालना कोई बच्चों का खेल नहीं. जन्म से ले कर युवावस्था तक मातापिता अपने बच्चों की देखरेख में जरा सी भी कसर बाकी नहीं रखते. बच्चे तो गीली मिट्टी के समान होते हैं, मातापिता जैसा आकार दें, वे वैसा हो जाते हैं.  जब बात आती है शारीरिक या मानसिक रूप से विशेष बच्चों की देखभाल की तो मातापिता की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं. ऐसे बच्चे को न सिर्फ मानसिक रूप से सकारात्मक रखने की बल्कि शारीरिक रूप से भी मजबूत बनाए रखने की जरूरत होती है. ऐसे में यदि मातापिता जरा सी भी लापरवाही दिखाते हैं तो बच्चे पर बुरा असर पड़ सकता है और वह खुद को समाज के अन्य बच्चों की तुलना में हीन समझने लगता है.

मानसिक रूप से अपंग बच्चों के पालनपोषण में न सिर्फ उन को शारीरिक रूप से सहयोग देने की जरूरत होती है बल्कि उन के अधूरे मानसिक विकास के कारण हर समय उन के साथ रहने की जरूरत होती है, जो बेहद ही जिम्मेदारी भरा काम है. विकलांगता 2 प्रकार की  हो सकती है, शारीरिक और मानसिक. दोनों ही स्थितियों में विकलांग बच्चे की देखरेख में विशेष लालनपालन करने की जरूरत होती है.  आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाएं  : शारीरिक रूप से अपंग बच्चे को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास आप बचपन से ही शुरू कर दें. बच्चे को किसी के ऊपर निर्भर रहने का आदी बनाने के बजाय उस को अपने काम खुद करने की आदत डलवाएं.

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ऐसे करने से उस में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और वह परिवार वालों पर खुद को बोझ समझने की जगह अपने सारे काम खुद करने में सक्षम होगा. इस के लिए आप को छोटी उम्र से ही उस में आत्मनिर्भरता के गुण भरने की कोशिश शुरू कर देनी चाहिए. बच्चे को धीरेधीरे अपने सभी काम खुद करना सिखाएं व उस में जिम्मेदारी की भावना भरें.

किसी से तुलना करना ठीक नहीं: शारीरिक और मानसिक रूप से अविकसित या कमजोर बच्चों को अकसर दया का पात्र व मुख्यधारा से कटा हुआ माना जाता है. जबकि सचाईर् यह है कि उन को किसी की दया की नहीं, बल्कि आप के सहयोग व प्रेम की जरूरत होती है. इस में पेरैंट्स व परिवार के सदस्यों की अहम भूमिका होती है. अपंग बच्चे की तुलना न तो सामान्य बच्चों से करें और न किसी अन्य बच्चे से. यदि आप का बच्चा वह काम करने के लिए कदम बढ़ाना चाहता है जो उस के साथी बच्चे करते हैं तो उस को रोकें नहीं. दूसरे बच्चों से तुलना करने की जगह उस की आंतरिक क्षमताओं को पहचान कर उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा दें क्योंकि हर व्यक्ति में कोई न कोई विशेष गुण होता है. उस के इसी गुण को उभारें और उसे हतोत्साहित करने के बजाय उस के प्रयासों की सराहना करें.

क्षमता के अनुरूप ही आशाएं रखें:  बच्चों की क्षमताओं से ज्यादा की उम्मीद रखने से निराशा हाथ लगती है. इसलिए यह जांच लें कि आप के बच्चे में कितनी क्षमता है, इसी के आधार पर यह निर्णय लें कि वह कहां तक सफल हो सकता है. ज्यादा उम्मीदें लगाना या बच्चे पर उस की क्षमता से अधिक करने का दबाव डालने से आप का बच्चा डिप्रैशन का शिकार हो सकता है.

अपंग व सामान्य बच्चों में अंतर न करें :  यदि घर में एक बच्चा अपंग हो और बाकी सामान्य हों तो ऐसी स्थिति में ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है. कई बार भाईबहन भी नादानी या शैतानी के चलते अपंग भाई या बहन को उसी की शारीरिक कमजोरी को ले कर टिप्पणी करते हैं. इस से अपंग बच्चे के मन को आघात पहुंचता है. इसलिए मातापिता का यह दायित्व बनता है कि वे अपने सभी बच्चों को आपस में मिलजुल कर रहने की सीख दें. साथ ही, उसे यह भी एहसास न होने दें कि विकलांग होने की वजह से उस की देखभाल ज्यादा हो रही है. यदि आप हर कदम पर अपने अपंग बच्चे की मदद के लिए खड़े रहेंगे तो इस से उसे अपनी शारीरिक कमी का एहसास होगा और वह इस से चिड़चिड़ा हो सकता है. इसलिए उस के अधिकांश काम उस को खुद करने दें.

सहानुभूति दर्शाने वालों को दूर रखें:  पीतमपुरा में रहने वाली कविता का कहना है कि 21 वर्षीय मेरा बड़ा बेटा एक पैर से अपाहिज है. पढ़नेलिखने में हमेशा वह अव्वल रहता है. हम ने उस को कभी इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि वह शारीरिक रूप से पूर्र्ण नहीं है.  एक दिन मेरी पड़ोसिन हमेशा की तरह मेरे घर आई और बोली कि मैं आप के बेटे के लिए एक बहुत अच्छा रिश्ता लाई हूं. मेरे दोनों बेटे उस दिन घर में ही मौजूद थे. पड़ोसिन ने छोटे बेटे की तरफ देखते हुए कहा कि इसे तो वे देखते ही पसंद कर लेंगे. इस पर मेरे बड़े बेटे ने सिर झुका लिया और अपने कमरे में चला गया. इस तरह कई बार रिश्तेदार या पड़ोसी आदि कुछ इस तरह की बातें बोल देते हैं जिस से बच्चे के दिल को ठेस पहुंचती है. इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि यदि आप किसी के घर जा रहे हैं या कोई आप के घर आ रहा है तो इस तरह की कोई बात न हो जिस का संबंध बच्चे की शारीरिक कमियों से हो.

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हीनभावना न पनपने दें :  सुषमा के 5 बच्चों में सब से बड़े के एक पैर में पोलियो और छोटी बेटी के दोनों पैरों में पोलियो के कारण वे चलनेफिरने में असमर्थ हैं. सुषमा का कहना है कि घर में बड़ी संतान होने के नाते मेरे बेटे ने बिना इस बात की परवा किए कि वह एक पैर से लाचार है, अपने सारे कर्तव्य पूरे किए. उस ने न सिर्फ एमए तक पढ़ाई कर के अच्छी नौकरी हासिल की बल्कि अपनी अपंग बहन को रोजाना स्कूल और कालेज लाने, ले जाने का काम भी उस  ने पूरा किया. नतीजा यह हुआ कि मेरी बेटी बेशक अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती, लेकिन उस ने बीएड तक पढ़ाई पूरी की और एक हैंडीकैप्ट बच्चों के स्कूल में अध्यापिका के पद पर सेवारत है. आज ये जिस मुकाम पर हैं वहां पहुंचने में इन बच्चों को अन्य सामान्य बच्चों की तुलना में कई गुणा ज्यादा मेहनत करनी पड़ी, लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी. इस के पीछे वजह थी कि हम ने उन में कभी हीनभावना नहीं पनपने दी.

हर समय देखरेख की जरूरत  होती है:  रोहिणी निवासी काजल का 15 वर्षीय बेटा जन्म से ही विकलांग है. काजल का कहना है कि जब उस का बेटा पैदा हुआ था उसी समय डाक्टरों ने बताया कि इस के दिमाग का एक हिस्सा काम नहीं कर रहा है. इस के कारण वह बोल पाने में तो असमर्थ है ही, चलफिर भी नहीं सकता. हमारे बच्चे में ये सब दोष हैं, यह सोच कर दुख तो हुआ लेकिन हम ने अपने बेटे के लालनपालन व उस की देखभाल में कोई कमी  नहीं छोड़ी.

मुझे और मेरे पति को हर समय अपनी सभी इंद्रियां खुली रखनी पड़ती हैं, पलपल अपने बच्चे का ध्यान रखना पड़ता है. उस को रोजाना स्पीच थेरैपी के लिए और मनोचिकित्सक के पास ले कर जाते हैं. वहीं, घर में उस से बात करने की कोशिश करते हैं. दरअसल, वह सुनता और समझता तो सबकुछ है लेकिन बोलने में असमर्थ है. इसलिए हम उस की हर तरह से देखभाल करते हैं.  मनोचिकित्सक डा. आर सी जिलोहा इस बारे में बताते हैं कि अपंगता 2 तरह से होती है, एक मानसिक विकलांगता और दूसरी शारीरिक. दोनों ही परिस्थितियों में विकलांग बच्चे की जरूरतें अलगअलग होती हैं. उसी आधार पर मातापिता को देखना चाहिए कि उन के बच्चे को किस तरह की देखभाल की जरूरत है. मसलन, बच्चा मानसिक रूप से विकलांग है तो उस की क्या जरूरतें हैं और उस की किस तरह से देखभाल करनी है और शारीरिक रूप से विकलांग है तो उस की क्या जरूरतें हैं.

मानसिक रूप से विकलांग बच्चों की समझ थोड़ी कमजोर होती है. ऐसे बच्चों को छोटी से छोटी बातें भी पेरैंट्स को सिखानी पड़ती हैं, जैसे उन को किस तरह से साफसुथरे रहना है, किस तरह से खाना खाना है, किस तरह से अपने सामान को रखना चाहिए आदि. ये हर रोज की जिम्मेदारियां होती हैं मातापिता के कंधों पर. डा. जिलोहा आगे बताते हैं कि शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों की जरूरतें अलग होती हैं. शारीरिक रूप से विकलांगता कई तरह से हो सकती है जैसे पैरों से अपाहिज होना या देखनेसुनने व बोलने में असमर्थ होना आदि. इन बच्चों में हालांकि सामान्य बच्चों जैसी सारी बातें होती हैं लेकिन वे किसी न किसी रूप में शारीरिक तौर पर अपंग होते हैं. ऐसे बच्चे हीनभावना के शिकार बहुत जल्दी हो जाते हैं.

पेरैंट्स को इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि वे विशेष बच्चों को आम बच्चों की तरह से ही ट्रीट करें और उन को आगे बढ़ने का हौसला देते रहें. साथ ही, विशेष बच्चों की सीमा से ज्यादा उन से उम्मीदें लगाना ठीक नहीं है. जितना वे कर रहे हैं या कर सकते हैं उसी में मातापिता संतुष्ट रहें. उन में जो गुण मौजूद है उन को वे पहचानें और उसी आधार पर उन का कैरियर बनाने में उन की मदद करें.

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 बाबाजी का मशवरा

जिन ज्ञानियों और ऋषिमुनियों टाइप के विद्वानों को यह शक हो गया था कि अब भाजपा सत्ता में नहीं आ पाएगी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे उन में एक चौंका देने वाला नाम योगगुरु और कारोबारी बाबा रामदेव का भी था जिन्होंने अपनी इन भड़कती भावनाओं को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने की चूक भी कर दी थी. अब बाबा पछता रहे हैं और रंगमहल में घुसने के लिए अपने साइज का छेद ढूंढ़ रहे हैं जिस से पतंजलि के कथित बढ़ते घाटे को मुनाफे में बदला जा सके.

नरेंद्र मोदी को खुश करने वालों की लाइन में लगे योगगुरु ने एक बासी सी सलाह यह दे डाली कि जो लोग 2 से ज्यादा बच्चे पैदा करें उन से (यानी मुसलमानों से) वोट देने वगैरह के अधिकार छीन लेने चाहिए. बात है तो राजा को प्रसन्न करने वाली लेकिन बाबा यह भूल गए कि इस परम सत्य को नरेंद्र मोदी 80 के दशक में ही प्राप्त कर चुके थे जब वे आरएसएस के स्कूल में भरती हुए थे. देश को हिंदू राष्ट्र बनाने का कोई और नया आइडिया रामदेव दें, तो शायद उन पर नजर-ए-इनायत हो जाए.

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वैभवहीन गहलोत

23 मई की आंधी में अच्छेअच्छे वटवृक्ष उखड़ गए तो फिर नन्हेमुन्ने पौधों की बिसात क्या थी. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पूरे धूमधड़ाके से अपने बेटे वैभव को एक प्रोडक्ट की तरह जोधपुर सीट से लौंच किया था लेकिन नतीजे आए तो वैभव भी उन 25 पराजितों में शामिल थे जिन के दम पर विधानसभा चुनाव के नतीजों को दोहराने का सपना रेगिस्तान में देखा गया था. सदमे में आ गए बुजुर्ग और तजरबेकार अशोक गहलोत को समझ नहीं आ रहा कि अब क्या करें क्योंकि परेशानियां सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही हैं.

बेहतर तो यह होता कि वे बेटे को सियासी अखाड़े में उतारने से पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ से टिप्स ले लेते जो जैसेतैसे ही सही, अपने बेटे नकुल नाथ को छिंदवाड़ा सीट से जिता ले गए वरना झाड़ू तो वहां भी लग चुकी थी.

रजनीकांत का राजनीतिक ज्ञान

जिन 3 राज्यों में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रवाद पर लोगों ने कतई गौर नहीं किया उन में तमिलनाडु सब से बड़ा और प्रमुख है जहां भाजपा का खाता भी नहीं खुला और कांग्रेस व डीएमके मिल कर 38 में से 31 सीटें ले गए. अपनी नई पार्टी रजनी मंदरम बना चुके अभिनेता रजनीकांत ने नरेंद्र मोदी की तारीफ की या उन्हें आईना दिखा दिया. इस पर भगवा खेमे से किसी प्रतिक्रिया की उम्मीद बेकार है क्योंकि रजनीकांत ने मोदी के करिश्मे को जवाहरलाल नेहरू और राजीव गांधी जैसा करार दिया है.

इस तुलना के 2 ही मतलब होते हैं, पहला यह कि नेहरूगांधी के राज सरीखा माहौल और भ्रष्टाचार अभी भी है और दूसरा यह कि औसत भारतीय की तरह रजनीकांत का राजनीतिक ज्ञान भी नेहरूगांधी से ही शुरू होता है. गांधी परिवार को कोसते रहने वाले नरेंद्र मोदी ने चुनावप्रचार में राजीव गांधी को भ्रष्टाचारी नंबर वन बताया था. इस लिहाज से तो भाजपा और रजनी मंदरम का संभावित गठबंधन मुश्किल में है लेकिन मुमकिन है तमिलनाडु में भी पांव पसारने के लिए भाजपा इस बयान को मानवीय त्रुटि या अज्ञानता मानते हुए नजरंदाज करने में भलाई समझे.

गौतम का बुद्धत्व

बात मामूली और रोजमर्राई सी ही थी कि गुरुग्राम में एक मुसलिम नवयुवक के साथ दुर्व्यवहार हो गया. इस पर क्रिकेटर से भाजपा सांसद बने गौतम गंभीर इतने दुखी हो गए कि उन्होंने इस ज्यादती के खिलाफ ट्वीट कर मारा. राजनीति की नर्सरी में दाखिल हुए इस गौतम को ज्ञान का पाठ अभिनेता अनुपम खेर ने पढ़ाया कि मीडिया के एक खास वर्ग में लोकप्रिय होने के लिए इस तरह की हरकतें मत करो क्योंकि वह घटना सांप्रदायिक नहीं थी. इस गौतम की गलती इतनीभर थी कि वे आदर्शवादी और कांग्रेसी छाप राजनीति कर रहे थे कि हिंदूमुसलिम भाईभाई हैं और हम एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैं. मूलरूप से निष्कासित कश्मीरी पंडित अनुपम खेर ने जो भगवाई संस्कार उन्हें दिए उन की जरूरत लगभग सौ और भाजपा सांसदों को भी है जो पहली बार संसद में पहुंचे हैं.

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अर्जुन कपूर के घर में नहीं हैं पंखे, जानें क्यों

बौलिवुड एक्टर अर्जुन कपूर का आज जन्मदिन है. इन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में एक दशक के अंदर ही अपना स्टारडम जमा लिया है. अर्जुन दर्शकों के चहेते बनते जा रहे हैं. अर्जुन के फैंस इनके अभिनय के कायल हैं. आपको बता दें, अर्जुन कपूर का जन्म 26 जून, 1985 को मुंबई में हुआ था. इनके जन्मदिन पर इनके बारे में आपको कुछ अनसुने किस्से बताते हैं.

क्या आप जानते हैं, फिल्म इंडस्ट्री में आने से पहले अर्जुन कपूर अपने हेल्थ पर काफी काम किया हैं, एक समय ऐसा था जब अर्जुन काफी मोटे थे. अर्जुन इस बारे बता चुके हैं, जब उन्होंने स्कूल छोड़ दिया था और घर में रहने लगे थे… इस कारण वे काफी मोटे हो गए थे.

अर्जुन का निक नेम नाम फुबु था. इस नाम का जिक्र करते हुए अर्जुन ने ‘फुबु’ का कारण भी बताया था. उन्होंने कहा था कि ‘फुबु’ कपड़ों की एक अमेरिकन ब्रांड का नाम है जो बड़े साइज के कपड़े बनाती है. मुझे रंगीन कपड़े पहनना पसंद था मगर नौर्मल कपड़े कभी भी मुझमे फिट नहीं आते थे. फुबु ब्रांड फुटबौल की जर्सीज बनाती थी. मैं उस तरह की जर्सीज पहनना पसंद करता था. मुझे स्पोर्ट्स खेलने का शौक था पर मैं मोटापे की वजह से खेल नहीं पाता था.

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आपको बता दें कि एक बार अर्जुन कपूर डिप्रेशन में चले गए थे. इसकी वजह उनके माता-पिता का अलग होना था. जब बोनी कपूर ने दूसरी शादी श्रीदेवी से कर ली थी. उस दौरान अर्जुन, उनकी मां(मोना) और बहन अंशुला को काफी संघर्ष करना पड़ा था.

अब आपको अर्जुन की सबसे दिलचस्प बात बताते हैं, उन्हें सीलिंग फैन से काफी डर लगता है. इस वजह से उनके घर में कहीं भी सीलिंग फैन नहीं है.

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आलिया भट्ट अपने फैंस को देंगी फैशन-फिटनेस टिप्स, जानें कैसे

बौलीवुड की सफल आभिनेत्रियों में आलिया भट्ट का नाम शामिल हैं. सोशल मीडिया पर भी आलिया काफी एक्टिव रहती हैं. सोशल मीडिया पर आलिया अपने ग्लैमरस फोटो और वीडियो फैंस के साथ शेयर भी करती हैं. मीडिया रिपोर्टस के अनुसा आलिया भट्ट अपना यूट्यूब चैनल लौन्च करने वाली हैं. इस चैनल के जरिए आलिया फैंस के साथ अपना, फैशन, मेकअप, फिटनेस टिप्स और शेड्यूल शेयर करेंगी.

सूत्रों के मुताबिक, आलिया अपने फैंस से निजी जिंदगी की बातें भी शेयर करना चाहती हैं, फिल्मों के अलग- अलग लुक्स के बारे में बात करेंगी. इसलिए वे यूट्यूब चैनल लौन्च करने जा रही हैं. आलिया को नई चीजें ट्राई करना बहुत पसंद है. इसलिए वो इंस्टाग्राम और ट्विटर के बाद अब यूट्यूब पर भी एक्टिव रहने का सोच रही हैं.

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आलिया मानती है कि वीडियो के जरिए फैंस तक अपनी बात पहुंचाना एक अच्छा औप्शन है. यूट्यूब चैनल में आलिया के जिंदगी से जुड़े हर पहलू के बारे में बताया जाएगा. आज ही यानि 26 जून को आलिया अपना यूट्यूब चैनल लौंच कर सकती हैं.

आपको बता दें, इन दिनों आलिया फिल्म ब्राह्मस्त्र की शूटिंग में व्यस्त हैं. इस फिल्म में आलिया के साथ रणबीर कपूर भी नजर आएंगे.

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ये हैं भारत के 10 रोमांटिक हनीमून डेस्टिनेशन

प्यार, खुशी, छेड़छाड़ और मस्ती के अनगिनत लमहों का एहसास है हनीमून. इन लमहों को कुछ इस तरह से संजोएं कि जब भी याद आएं तो तन मन गुदगुदा जाए. ऐसे में किसी भी जोड़े के लिए यह एक मुश्किल सवाल होता है हनीमून के लिए सबसे दिलचस्प जगह कौन सी है जहां वह अपने साथी के साथ यादगार लम्हें बिता सकेगा या सकेगी. तो आपकी इस परेशानी का हल निकालते हुआ हम आपको भारत के सबसे खूबसूरत और रोमांटिक हनीमून स्पौट्स के बारे में बताते हैं.

  1. मनाली

मनाली, भारत के सबसे दिलकश डेस्टिनेशंस में शुमार है. मनाली को हमेशा ही एक रोमांटिक और हनीमून के लिए परफेक्ट स्थल का दर्जा दिया गया है. यहां की खुशनुमा वादियां आपके हनीमून में चार चांद लगा देंगी. यहां आप बर्फ से ढकी चोटियां, कल कल बहती व्यास नदी, ऊंचे ऊंचे वृक्ष, ठंडी हवाएं, प्राकृतिक दिलकश नजारे आदि का जी भर के लुत्फ उठा सकती हैं.

मनाली, कुल्‍लु जिले का एक हिस्‍सा है जो हिमाचल की राजधानी शिमला से 250 किमी. की दूरी पर स्थित है. हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, मनाली का नाम मनु से उत्‍पन्‍न हुआ है. यदि बात यहां के पर्यटन की हो तो आपको बता दें कि हनीमून पर आये कपल यहां ऐसा बहुत कुछ देख सकते हैं जो शायद ही उन्होंने कभी देखा हो. मनाली की यात्रा पर यहां आने वाले पर्यटक व्‍यास कुंड, हडिम्‍बा मंदिर, रोहतांग पास, सोलांग घाटी, भरीगु झील, क्लब हाउस, फ्रैंडशिप चोटी, जगन्‍नाथ मंदिर, जगतसुख गांव जैसे स्थानों की यात्रा करना बिलकुल न भूलें.

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2. उदयपुर

अगर आप अपने हनीमून को महलों और झीलों के बीच बिताना चाहती हैं तो उदयपुर एक बेहतर विकल्प है. उदयपुर ‘झीलों के शहर’ के रूप में भी जाना जाता है. इस खूबसूरत जगह पर आप राजसी ठाठ के साथ सुंदर नजारों का लुत्फ उठा सकती हैं. यह जगह भारत का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है और अपनी समृद्ध संस्कृति और परंपरा के लिए विख्यात है.

यदि बात इस शहर में पर्यटन की हो तो यहां आने वाले कपल सहेलियों की बाड़ी, बड़ा महल, गुलाब बाग, महाराणा प्रताप स्मारक, लक्ष्मी चौक, दिल कुशल, गोल महल के अलावा यहां मौजूद अलग अलग संग्रहालयों और गैलरियों की यात्रा अवश्य करें.

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3. गोवा

भारत में लोगों को गोवा काफी पसंद हैं. गोवा अपने समुद्र तटों, वॉटर स्पोटर्स एडवेंचर, चर्च और नाइट लाइफ के लिए जाना जाता है. वहां पर ऐसी कई सुंदर और आकर्षक जगह हैं जो आपका मन मोह लेगी गोवा को अगर हनीमून डेस्टिनेशन कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा. गोवा है ही प्रेमी जोड़ों की पसंद जहां वह समुद्र की लहरों के साथ अपने प्रेम को भी अठखेलियां करने का आंनद लेते हैं.

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4. नैनीताल

नैनीताल भारत के उत्तराखण्ड राज्य का एक प्रमुख पर्यटक स्थल है. आप यहां आकर नैनीताल की रंगीन वादियों में अपने पार्टनर के साथ और मजबूत रिश्ता बना सकती हैं. बर्फ से ढ़के पहाड़ों के बीच बसा यह स्‍थान झीलों से घिरा हुआ है. इनमें से सबसे प्रमुख झील नैनी झील है जिसके नाम पर इस जगह का नाम नैनीताल पड़ा है. इसलिए इसे झीलों का शहर भी कहा जाता है. नैनीताल अपने खूबसूरत परिदृश्यों और शांत परिवेश के कारण पर्यटकों के स्वर्ग के रूप में जाना जाता है.

नैनीताल की सुदरंता पर्यटक और हनीमून पर आये कपल को बेहद ही सुखनुमा अनुभव प्रदान करती हैं. यहां आने वाले कपल स्नो व्यू, टिफिन टॉप, चाइना पीक किलबरी, खुर्पाताल, लैंडस-एंड, मॉल रोड जैसे स्थानों की यात्रा अवश्य करें और अपने हनीमून को यादगार बनाएं.

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5. धर्मशाला

धर्मशाला को ‘पहाड़ों की रानी’, ‘सौंदर्य की देवी’, ‘भारत में एक मिनी ल्हासा’ जैसे कई नामों से संबोधित किया जाता है. धर्मशाला कांगड़ा के उत्तर-पूर्व में 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक प्रमुख पर्यटन स्थल है. यह शहर चंडीगढ़ से 239 किलोमीटर, मनाली से 252 किलोमीटर, शिमला से 322 किलोमीटर और नई दिल्ली से 514 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

कांगड़ा घाटी में हिमालय की घौलाधार पहाडि़यों पर बसे इस बेहद ख़ूबसूरत शहर की तरफ लोग बस यूंही खिंचे चले आते हैं. हिमायल की दिलकश, बर्फ से ढ़की चोटियां, चारों ओर हरे भरे खेत, हरियाली और कुदरती सुन्दरता,चाय बागानों, चीड के जंगलों और देवदार के पेड़ों से घिरा धर्मशाला है ही इतना रोमांटिक और खूबसूरत जो आने वाले किसी भी कपल का मन मोह सकता है.

बात यदि एक कपल के लिए यहां मौजूद पर्यटक स्थलों की हो तो यहां आने के बाद कपल डल झील, हरिपुर- गुलेर, मछिरल, ततवानी हॉट स्प्रिंग, त्रिउंड, सेंट जान चर्च, हनुमान का टिब्बा, करेरी जैसे स्थानों की यात्रा अवश्य करें और अपने हनीमून को हमेशा के लिए यादगार बनाएं.

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6. अंडमान निकोबार द्वीप

अगर आप अपने पार्टनर के साथ शोरगुल से दूर अकेले में सुकुन के साथ समय बिताना चाहती हैं तो यह आपके लिए बेस्ट जगह है. आपके लिए इस जगह से अच्छी कोई रोमांटिक जगह नहीं होगी.

7. श्रीनगर

बात अगर हनीमून डेस्टिनेशंस की हो, और कश्मीर की खूबसूरत वादियोँ का जिक्र ना हो ऐसा तो मुमकिन ही नहीं है. कश्मीर जिसे धरती के स्वर्ग के नाम से जाना जाता है. तभी तो कोई भी जोड़ा हो उसकी पहली पसंद श्रीनगर ही होती है जहाँ वह अपनी ज़िन्दगी का एक खूबसूरत फलसफा शुरू करना चाहते हैं. तो चलिए हनीमून को यादगार बनाने के लिए श्रीनगर की दिलकश वादियों में. जहां आप बेहद आकर्षक नजारों को देखने के साथ साथ शिकारे का आंनद भी उठा सकती हैं. ये प्रेम-लीन जोड़ों का पसंदीदा स्थान है. यह शहर अपनी नगीन और डल जैसी खूबसूरत झीलों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है. यहां के निशात बाग, शालीमार बाग, अच्‍छाबल बाग, चश्‍मा शाही और परी महल काफी प्रसिद्ध हैं.

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8. मसूरी

कुदरत का अनमोल खजाना मसूरी जिसे ‘पहाड़ों की रानी’ के नाम से भी जाना जाता हैं. उत्तराखंड राज्य में स्थित मसूरी देहरादून से 35 किमी की दूरी पर अवस्थित हैं जहां लोग बार बार आना पंसद करते हैं. मसूरी अपने पर्यटन के लिए काफी प्रसिद्ध हैं. मसूरी की छोटी-छोटी सड़कों से जब गाड़ियां घूमकर जाती है तो पहाड़ियों का नजारा बहुत ही सुंदर दिखाई देता है.

बात यदि एक कपल के लिए यहां मौजूद पर्यटक स्थलों की हो तो यहां आने के बाद कपल चाइल्डर्स लॉज, मसूरी झील, संतरा देवी मंदिर, गन हिल, केम्पटी फॉल, लेक मिस्ट जैसे स्थानों की यात्रा अवश्य करें और अपने हनीमून को हमेशा के लिए यादगार बनाएं.

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9. शिमला

अगर आप अपने हनीमून को कुछ रोमांटिक के साथ-साथ रोमांच से भरपूर देना चेहते है तो इससे अच्छी फिर कोई जगह नहीं है. यह अपनी खूबसूरती के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्ध है. यह एक ऐसी जगह है जहां पर पूरे विश्व से पर्यटक आते रहते है. यहां की चांदनी रात अपने में ही एक अलग है.

यहां पर सर्दियों के मौसम को ‘लौंग मून नाइट्स’ यानी लम्बी चांदनी रातों का मौसम कहते हैं. यहां की हरी भरी पहाड़ियां, निर्मिल झरने, शांत झीलों, ऊंची चोटियां सैलानियों को अपने मोहपाश में ऐसे बांध लेती हैं कि उनसे दूर होने का मन ही नहीं होता हैं.

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10. गुलमर्ग

गुलमर्ग जम्‍मू और कश्‍मीर का एक खूबसूरत हिल स्‍टेशन है. इसकी सुंदरता के कारण इसे धरती का स्‍वर्ग भी कहा जाता है. यह देश के प्रमुख पर्यटन स्‍थलों में से एक हैं. फूलों के प्रदेश के नाम से मशहूर यह स्‍थान बारामूला जिले में स्थित है. समुद्र तल से 2730 मी. की ऊंचाई पर बसे गुलमर्ग में सर्दी के मौसम के दौरान यहां बड़ी संख्‍या में पर्यटक आते हैं.

प्राकृतिक नजारों से भरपूर गुलमर्ग में कहीं पहाड़ियों पर दूर तक जमी बर्फ तो कहीं धरती पर चादर की तरह फैले फूल मन को हर्षित कर जाते हैं, और हनीमून कपल्स को अपनी ओर खींचते हैं. या यूं कहें, बर्फ से ढ़के पहाड़ों के बीच बसा यह स्‍थान हनीमून कपल्स के लिए बेस्टम बेस्ट जगह है. यंहा आने वाले कपल गोल्‍फ कोर्स, स्‍कींग रिजॉर्ट, खिलनमर्ग, अलपाथर झील, निंगली नल्‍लाह जैसे स्थानों की यात्रा अवश्य करें और अपने हनीमून को यादगार बनाएं.

नास्तिकता की ओर बढ़ती रूचि

ईश्वर, अल्लाह, खुदा एक ऐसी परिकल्पना है, जिस के होने या न होने की कोई सटीक जानकारी इंसान को कभी उपलब्ध नहीं हुई है. इंसान हमेशा से अपनी ऊर्जा, धन, समय और जीवन उस चीज के लिए खपा रहा है जिस के बारे में यह गारंटी आज तक नहीं मिली है कि सचमुच में वह है भी, या नहीं.

ईश्वर, अल्लाह, खुदा एक ऐसी परिकल्पना है, जिस के होने या न होने की कोई सटीक जानकारी इंसान को कभी उपलब्ध नहीं हुई. फिर भी इस परिकल्पना में विश्वास रखने वाले लोग अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा उस से जुड़े विभिन्न अनुष्ठानों, धार्मिक क्रियाकलापों, व्रत, त्योहार, तीर्थयात्राओं, दानपुण्य इत्यादि में व्यतीत कर देते हैं. अधिकांश चीजें तो हम इस डर से करते हैं कि न किया तो लोग क्या कहेंगे? इन चीजों में इंसान का बहुत सारा धन, समय और संसाधन लगते हैं. इंसान हमेशा से अपनी ऊर्जा, धन और जीवन उस चीज के लिए खपा रहा है, जिस के बारे में यह गारंटी आज तक नहीं मिली कि सचमुच में वह है भी, या नहीं. हम बात कर रहे हैं ‘ईश्वर’ की.

विज्ञान मानता है कि धरती पर इंसान की तरह का प्राणी 20 लाख साल से है. जबकि सभ्यता तकरीबन 20 हजार साल पुरानी है. मगर इस लंबे समयकाल में एक भी ऐसी प्रामाणिक घटना सामने नहीं आई जब किसी मनुष्य ने ईश्वर से मुलाकात की कोई सटीक जानकारी दी हो. न जन्म ले कर आने वाले किसी मनुष्य ने कहा कि वह ईश्वर से मिल कर आ रहा है और न मृत्यु के बाद किसी ने लौट कर बताया कि उस ने ईश्वर को या उस के सदृश्य किसी को देखा.

ईश्वर है या नहीं, इस पर सदियों से संशय बना हुआ है. उस के बारे में असंख्य सवाल हैं कि वह है तो कैसा है? वह कहां है? उस ने सृष्टि की रचना क्यों की? उस ने मनुष्य की रचना क्यों की? उस ने दूसरे जीवों की रचना क्यों की? जीवन और मृत्यु का रहस्य क्या है? ईश्वर के नाम पर जो धार्मिक कर्म हम करते हैं क्या उन्हें करने का आदेश ईश्वर ने स्वयं दिया है? दिया तो कब और किस को दिया? अगर हम उस आदेश का पालन न करें तो क्या वह हमें दंडित करता है?

इस धरती पर सिर्फ मनुष्य ही ईश्वर के नाम पर आराधना, भक्ति, पूजापाठ, दानपुण्य, लड़ाईझगड़ा, जंग या कत्लेआम क्यों करता है, जीवजंतु ईश्वर के नाम पर ये सारे कर्म क्यों नहीं करते? क्या उन को यह छूट ईश्वर ने प्रदान की है? आदि, आदि.

ईश्वर का नाम ले कर कोई जीव दूसरे जीव से नहीं लड़ता. उन के बीच धर्म के नाम पर कोई बंटवारा नहीं होता. उन के बीच लड़ाई सिर्फ भोजन, सैक्स और इलाके पर अपने वर्चस्व को ले कर ही होती है जो जीवन को जीने के सिद्धांत पर आधारित है.

आस्था ने फैलाई नफरत

दुनिया का हर धर्म और संप्रदाय खंगाल लीजिए, उन में मूल बातें लगभग एकजैसी ही हैं. मुख्य बात यह है कि हर धर्मग्रंथ कहता है कि ईश्वर एक है. जब ईश्वर एक है तो दुनिया में धर्म भी एक ही होना चाहिए था, मगर ऐसा नहीं है. सैकड़ों धर्म और हजारों संप्रदाय हैं और हरेक ने अपनेअपने ईश्वर गढ़ रखे हैं. यानी, धार्मिक और आस्थावान लोग धर्मग्रंथों में कहीं इस मूल बात को ही नहीं मानते कि ‘ईश्वर एक है.’

यही नहीं, अलगअलग धर्म और संप्रदाय के मानने वाले लोग अपनेअपने ईश्वर को ले कर दूसरे धर्म व संप्रदाय के लोगों से सदियों से लड़ते आए हैं. दुनिया की अब तक की तमाम लड़ाइयां धर्म के नाम पर ही हुई हैं. यहूदियों, ईसाईयों और मुसलमानों के बीच जो जंग सदियों से चली आ रही है उस के मूल में सिर्फ धर्म है. हिंदू और मुसलमानों के बीच लड़ाई का कारण धर्म है. करोड़ोंअरबों लोग धर्म के नाम पर कत्ल कर दिए गए. सच पूछें तो धर्म और ईश्वर ने सदा से इंसान की इंसान से जंग करवाई है.

धर्म ने इंसान के अंदर डर, कट्टरता, उन्माद, नफरत, नकारात्मक सोच और हिंसा पैदा की है. यानी, धर्म एक विध्वंसकारी तत्त्व है, जो सृष्टि का नाश कर रहा है, न कि विकास. सोचिए, अगर धर्म और ईश्वर जैसी अवधारणा इस धरती पर न होती तो न तो धरती के इतने टुकड़े होते और न इंसान बंटते.

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मुझे बचपन की घटना याद आती है. डा. जुनैद आलम का परिवार तब हमारे पड़ोस के घर में रमजान के महीने में शिफ्ट हुआ था. ईद वाली सुबह मैं सिवइयों का कटोरा ले कर उन के घर पहुंची कि उन की अम्मा को सिवइयां दे आऊं, तो जुनैद भाई को घर पर देख कर मैं ने हैरानी जताई. दरअसल, वह नमाज का वक्त था और तमाम घरों के पुरुष महल्ले की मसजिद में ईद की नमाज अदा करने के लिए गए हुए थे, मगर ये जनाब हाफपैंट पहने पानी की ट्यूब हाथ में लिए अपने कुत्ते को नहलाने में जुटे थे. मैं ने पूछा कि आप नमाज के लिए नहीं गए, तो हंसते हुए बोले, ‘नहीं, मेरी इबादत अलग ढंग की है. क्यूपिड (उन का पालतू कुत्ता) के साथ मुझे ज्यादा सुकून मिलता है. यही मेरी इबादत है.’

ईद के रोज कोई मुसलमान नमाज न पढ़े, यह बहुत बड़ा गुनाह था, ऐसा मुझे हमेशा से बताया गया था और इस पर मैं गहरा विश्वास करती थी, मगर उस दिन जुनैद भाई के जवाब ने मेरे विश्वास को बहुत धक्का पहुंचाया. एक मुसलमान ईद के रोज नमाज अदा न करे, यह बात मेरे गले से नहीं उतर रही थी. मगर जैसेजैसे मैं उन के विचारों से रूबरू होती गई, ऐसे बहुत से सवाल मेरे जेहन में उभरने लगे जिन का कोई सही जवाब किसी मुल्ला, किसी पंडित या किसी धर्मगुरु के पास मैं ने नहीं पाया.

जुनैद का कहना था, ‘अव्वल तो मैं यह मानता ही नहीं हूं कि अल्लाह जैसी कोई चीज मौजूद है और अगर मान लूं कि है, और मरने के बाद उस से भेंट होनी है, तो एक बार भेंट हो जाए फिर मैं उस से ही पूछ लूंगा कि नमाज पढ़ना, हज करना, रोजा रखना जरूरी है, या नहीं और अगर जरूरी है तो क्यों है?’ वे कहते, ‘मैं उस चीज पर विश्वास करता हूं जिसे मैं अपनी आंखों के सामने देखता हूं, जिसे मैं महसूस करता हूं, जिसे मैं छू सकता हूं और जिस से मैं अपनी भावनाओं को बांट सकता हूं. जैसे, मेरा यह क्यूपिड जिस का साथ मुझे हमेशा प्यार और सुकून से भर देता है.’

जुनैद भाई मैडिकल की पढ़ाई के बाद आज एक सफल सर्जन हैं. उन्होंने एक दलित डाक्टर लड़की से शादी की और अपने 2 बच्चों के छोटे से परिवार में बेहद खुश हैं. वे और उन की पत्नी दोनों नास्तिक हैं और बेहद सुखी हैं. उन का सारा समय मानवता की भलाई में गुजरता है.

जुनैद भाई के सान्निध्य ने मेरे सामने यह बात आईने की तरह साफ कर दी कि हम धर्म और ईश्वर के नाम पर ताउम्र जो कुछ भी करते रहते हैं, उन का कोई मतलब नहीं है. हम अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा और बड़ा पैसा बेमतलब की चीजों में गंवा रहे हैं.

मैं नास्तिक क्यों हूं

वीर क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह ने अपनी मौत से पहले लाहौर सैंट्रल जेल में कैद के दौरान एक लेख लिखा था – ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’. इस लेख का प्रथम प्रकाशन लाहौर से छपने वाले अखबार ‘द पीपल’ में 27 सितंबर, 1931 में हुआ था. यह लेख भगत सिंह के द्वारा लिखित साहित्य के सर्वाधिक चर्चित और प्रभावशाली हिस्सों में गिना जाता है और बाद में इस का कई बार प्रकाशन हुआ. तब भगत सिंह की दाढ़ीमूंछ नहीं थी. यह बाद में सिख धर्म ने जबरन उन्हें उन की तसवीरों को पहना दी. इस लेख में भगत सिंह ने ईश्वर की उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किए हैं और इस संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथसाथ संसार में मनुष्य की दीनता, उस के शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है.

उन्होंने मनुष्य द्वारा ईश्वर की परिकल्पना के संबंध में लिखा है – ‘‘विश्वास कष्टों को हलका कर देता है. यहां तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है. ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सांत्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है. उस के बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर करना पड़ता है. तूफान और झंझावात के बीच अपने पांवों पर खड़े रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है.’’

उन्होंने आगे लिखा, ‘‘ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिंदू पुनर्जन्म होने पर राजा होने की आशा कर सकता है. एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनंद की तथा अपने कष्टों व बलिदान के लिए पुरस्कार की कल्पना कर सकता है. किंतु मैं क्या आशा करूं? मैं जानता हूं कि जिस क्षण रस्सी का फंदा मेरी गरदन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख्ता हटेगा, वह पूर्णविराम होगा. वह अंतिम क्षण होगा. मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जाएगी.’’

और भी हैं नास्तिक

शहीद भगत सिंह ही नहीं, तर्क की कसौटी पर धर्म और आस्था को कसने वाले और उसे हर लिहाज से कमजोर पाने वाले बुद्धिजीवियों की बात करें तो इस फेहरिस्त में बड़ेबड़े नाम शामिल हैं, जिन्होंने ईश्वर, धर्म और कर्मकांडों को अपने जीवन से पूरी तरह खारिज कर दिया.

इरोड वेंकट नायकर रामासामी ‘पेरियार’ (1879-1973) 20वीं सदी के तमिलनाडु के प्रमुख राजनेता थे. भारतीय तथा विशेषकर दक्षिण भारतीय समाज के शोषित वर्ग के लोगों की स्थिति सुधारने में इन का योगदान है. स्वसम्मान आंदोलन के इस नास्तिक और बुद्धिवादी नेता ने जस्टिस पार्टी का गठन किया, जिस का सिद्धांत रूढि़वादी हिंदुत्व का विरोध था. उन का मानना था कि अगर जातिव्यवस्था से नजात पानी है तो धर्म जैसी चीज का अंत होना आवश्यक है.

पेरियार का जन्म 17 सितंबर, 1879 को पश्चिमी तमिलनाडु के इरोड में एक संपन्न, परंपरावादी हिंदू परिवार में हुआ था. 1885 में उन्होंने एक स्थानीय प्राथमिक विद्यालय में दाखिला लिया. कोई 5 साल से कम की औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद ही उन्हें अपने पिता के व्यवसाय से जुड़ना पड़ा. उन के घर पर भजन तथा उपदेशों का सिलसिला चलता ही रहता था. बचपन से ही वे इन उपदशों में कही बातों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते रहते थे. हिंदू महाकाव्यों तथा पुराणों में कही गई परस्पर विरोधी तथा बेतुकी बातें उन की तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती थीं. वे बालविवाह, देवदासीप्रथा, विधवा पुनर्विवाह के विरुद्ध अवधारणा, स्त्रियों तथा दलितों के शोषण के पूर्ण विरोधी थे. उन्होंने हिंदू वर्णव्यवस्था का भी बहिष्कार किया था.

विनायक दामोदर सावरकर (1883-1966) को कौन नहीं जानता. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रख्यात हिंदू राष्ट्रवादी नेता के बारे में यह बात कम लोग जानते हैं कि सावरकर पूरी तरह नास्तिक और एक कट्टर तर्कसंगत व्यक्ति थे. वे रूढि़वादी हिंदू विश्वास के घोर विरोधी थे. गाय की पूजा को घोर अंधविश्वास मानते थे.

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सत्येंद्र नाथ बोस (1894-1974) एक भौतिक विज्ञानी थे, जो गणितीय भौतिकी में विशेषज्ञता रखते थे. जरमनी के ख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन और सत्येंद्र नाथ बोस ने मिल कर बोस-आइंस्टीन स्टैटिस्टिक्स की खोज की थी. अपने वैज्ञानिक योगदान के लिए याद किए जाने वाले बोस पूरी तरह नास्तिक व्यक्ति थे.

मेघनाद साहा (1893 – 1956) एक नास्तिक खगोल-भौतिकवादी थे. ये साहा समीकरण के विकास के लिए याद किए जाते हैं, जो सितारों में रासायनिक और भौतिक स्थितियों का वर्णन करता था.

जवाहरलाल नेहरू (1889 -1964) भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, जो भी कुछ हद तक नास्तिक थे. उन्होंने अपनी आत्मकथा, ‘टुवर्ड फ्रीडम’ (1936) में धर्म और अंधविश्वास पर अपने विचारों के बारे में लिखा था.

गोपाराजू रामचंद्र राव (1902-1975) जिन का उपनाम ‘गोरा’ था और अपने उपनाम से ही अधिक विख्यात हुए. वे एक समाज सुधारक, जातिविरोधी कार्यकर्ता और नास्तिक थे. उन की पत्नी सरस्वती गोरा (1912-2007) भी नास्तिक और समाज सुधारक महिला थीं. उन्होंने वर्ष 1940 में बाकायदा एक नास्तिक केंद्र की स्थापना की. इस नास्तिक केंद्र ने सामाजिक परिवर्तन के लिए उल्लेखनीय कार्य किए. गोरा ने वर्ष 1972 में लिखी अपनी किताब में सकारात्मक नास्तिक के बारे में विस्तार से लिखा. उन्होंने 1972 में पहले विश्व नास्तिक सम्मेलन का भी आयोजन किया. इस के बाद नास्तिक केंद्र ने विजयवाड़ा और अन्य स्थानों में कई विश्व नास्तिक सम्मेलनों के आयोजन किए.

सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर (1910-1995) खगोल भौतिकीविद थे, जो सितारों की संरचना और विकास पर अपने सैद्धांतिक काम के लिए जाने जाते हैं. उन्हें 1983 में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. चंद्रशेखर पूरी तरह नास्तिक थे. उन का ईश्वर या धर्म जैसी किसी बात पर विश्वास नहीं था.

खुशवंत सिंह (1915-2014) सिख निष्कर्षण के प्रमुख और विपुल लेखक, स्पष्टरूप से गैरधार्मिक थे. उन की किसी भी धर्म में आस्था नहीं थी. वे देश के प्रमुख बुद्घिजीवियों में से एक थे.

बौद्ध धर्म काल्पनिक ईश्वर में विश्वास नहीं करता

बौद्ध धर्म दुनिया का एकमात्र धर्म है जो मानवीय मूल्यों और आधुनिक विज्ञान का समर्थक है. बौद्ध अनुयायी काल्पनिक ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं. अल्बर्ट आइंस्टीन, डा. भीमराव अंबेडकर, बट्रैंड रसल रसेल जैसे कई प्रतिभाशाली, बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक लोग बौद्ध धर्म को विज्ञानवादी धर्म मानते हैं.

चीन की आबादी में 91 प्रतिशत से अधिक लोग बौद्ध धर्म से प्रभावित हैं. कहना गलत न होगा कि दुनिया में सब से अधिक नास्तिक लोग चीन में हैं. चीनी मान्यता में इंसान और भगवान के बीच श्रद्धा का कोई सिद्धांत नहीं है. वहां अपने महान पूर्वजों की शिक्षा का अनुसरण करने वालों के नाम पर ही ताओइज्म या कन्फूशियनिज्म की परंपरा है. गैलप सर्वे में करीब 61 फीसदी चीनियों ने किसी ईश्वर के अस्तित्व को नकार दिया. वहीं 29 फीसदी ने खुद को अधार्मिक बताया.

स्वीडन (76 फीसदी)

इस स्कैंडिनेवियन देश में हाल के सालों में सैक्युलरिज्म तेजी से बढ़ा है. स्वीडन के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, केवल 8 फीसदी स्वीडिश नागरिक ही किसी धार्मिक संस्था से नियमित रूप से जुड़े हैं. शायद इसीलिए 31 अक्तूबर, 2016 को प्रोटेस्टैंट रिफौर्मेशन की 500वीं वर्षगांठ मनाने के लिए पोप फ्रांसिस ने स्वीडन को चुना था.

चेक गणराज्य (75 फीसदी)

करीब 30 प्रतिशत चेक नागरिक खुद को नास्तिक कहते हैं. वहीं इसी देश के सब से अधिक लोगों ने अपनी धार्मिक मान्यताओं के बारे में कोई भी उत्तर देने से मना कर दिया. कुल आबादी का केवल 12 फीसदी हिस्सा ही कैथोलिक या प्रोटेस्टैंट चर्च से जुड़ा है.

ब्रिटेन (66 फीसदी)

करीब 53 प्रतिशत ब्रिटिश लोगों ने खुद को अधार्मिक बताया और करीब 13 फीसदी ऐसे थे जो अपनेआप को नास्तिक मानते हैं. पश्चिमी यूरोप में यूके के बाद नीदरलैंड्स के निवासी नास्तिकता में सब से आगे हैं.

हौंगकौंग (62 फीसदी)

पूर्व ब्रिटिश कौलोनी और फिर चीन को वापस किए गए हौंगकौंग की ज्यादातर आबादी पर चीनी परंपराओं का असर है. बाकी कई लोग ईसाई, प्रोटेस्टैंट, ताओइज्म या बौद्ध धर्म के मानने वाले हैं. गैलप सर्वे में करीब 43 फीसदी हौंगकौंगवासियों ने माना कि वे किसी भी ईश्वर को नहीं मानते हैं.

जापान (62 फीसदी)

चीन की ही तरह जापान की लगभग सारी आबादी किसी ईश्वर के बजाय जापान के स्थानीय शिंतो धर्म का अनुसरण करती है. श्ंितोइज्म के मानने वाले ईश्वर जैसे किसी दिव्य सिद्धांत में विश्वास नहीं रखते हैं. गैलप के आंकड़ों के मुताबिक, करीब 31 फीसदी जापानी खुद को नास्तिक बताते हैं.

जरमनी (59 फीसदी)

मुख्यरूप से ईसाई धर्म के मानने वाले जरमन समाज में इसलाम समेत कई धर्म प्रचलित हैं, लेकिन 59 फीसदी अब किसी ईश्वर को नहीं मानते. स्पेन, आस्ट्रिया में भी किसी ईश्वर को न मानने वालों की बड़ी संख्या है. धर्मनिरपेक्षता का गढ़ माने जाने वाले फ्रांस की आधी आबादी ने खुद को अधार्मिक बताया.

धर्म से उचट रहा मन धर्म ने समाज में लोगों के बीच ऊंचनीच की ऐसी दीवारें खड़ी कर दी हैं जिन की वजह से अनेक बुराइयां और अपराध पनप रहे हैं. बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग धर्म और ईश्वर को मानवता का सब से बड़ा दुश्मन मानता है. यही नहीं, अब तो बच्चे तक यह समझने लगे हैं कि धर्म उन को बांटने और आपस में लड़वाने का मुख्य कारक है. यही वजह है कि अब स्कूल के फौर्म में ज्यादातर धर्म और जाति के कौलम खाली दिखाई देते हैं. बीते वर्ष मार्च महीने में केरल के 1.24 लाख छात्रछात्राओं ने कहा कि उन का कोई जाति और धर्म नहीं है. उन्होंने स्कूल में दाखिले के लिए जमा कराए गए अपने नामांकनपत्र में धर्म और जाति वाला कौलम खाली छोड़ दिया.

9,000 स्कूलों से जमा किए गए आंकड़े

केरल विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान वामनपुरम से सीपीएम के विधायक डी के मुरली ने सरकार से पूछा कि राज्य में ऐसे कितने विद्यार्थी हैं जो सरकारी या निजी स्कूलों में दाखिला लेते समय नामांकनपत्र में अपनी जाति या धर्म के कौलम को नहीं भरते हैं. यह संख्या पहली और 10वीं कक्षा में दाखिला लेने वाले छात्रछात्राओं की है. जबकि इसी प्रकार से 11वीं और 12वीं के बच्चे भी नामांकन के दौरान अपनी जाति व धर्म के बारे में नहीं बताना चाहते हैं. 11वीं में 278 और 12वीं में 239 बच्चे इस सूची में शामिल हैं.

2011 की जनगणना के मुताबिक, करीब 29 लाख लोगों ने ‘धर्म का जिक्र नहीं’ श्रेणी को तवज्जुह दी थी. इसे कुल जनसंख्या का 0.2 प्रतिशत माना जा सकता है. 2001 की जनगणना में महज 7 लाख लोग ऐसे थे जिन्होंने धर्म का जिक्र नहीं किया था. इस संख्या में अब चारगुना से ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है.

इस का मतलब साफ है कि जो लोग धर्म का जिक्र नहीं करना चाहते उन की संख्या तेजी से बढ़ रही है. धर्म का जिक्र नहीं करने वालों की कुल संख्या

29 लाख में से 16.44 लाख लोग ग्रामीण इलाकों से हैं, जबकि 12.24 लाख लोग शहरी इलाके से हैं. मेरी कोई जाति भी नहीं. तमिलनाडु में वेल्लोर के तिरुपत्तूर की निवासी 35 साल की एक वकील एम ए स्नेहा ने अपने धर्म के साथ जाति का जिक्र कभी नहीं किया. उन के जन्म और स्कूल के सर्टिफिकेट्स में भी जाति और धर्म के कौलम खाली हैं. स्नेहा को हाल ही में तमिलनाडु सरकार ने एक सर्टिफिकेट जारी किया है, जो कहता है कि इन की कोई जाति या धर्म नहीं है. इन्हें भारत का पहला ऐसा नागरिक माना जा सकता है, जिन्हें आधिकारिक तौर पर अनुमति मिली है. यह सर्टिफिकेट पाने के लिए स्नेहा को 9 साल लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है.

उन्होंने वर्ष 2010 में ‘नो कास्ट, नो रिलिजन’ के लिए आवेदन किया था और 5 फरवरी, 2019 को कई मुश्किलें पार करने के बाद उन्हें यह सर्टिफिकेट मिला है. अब स्नेहा पहली ऐसी शख्स हैं जिन के पास यह प्रमाणपत्र है. स्नेहा खुद ही नहीं, बल्कि उन के मातापिता भी बचपन से ही अपने आवेदनपत्रों में जाति और धर्म का कौलम खाली छोड़ते थे. वे अपनी 3 बेटियों के फौर्म में भी जाति व धर्म के कौलम खाली छोड़ती हैं.

सामाजिक परिवर्तन की दिशा में स्नेहा का यह कदम बहुत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है. खुद ऐक्टर कमल हासन ने स्नेहा और उन के प्रमाणपत्र की फोटो ट्विटर पर शेयर की. स्नेहा नास्तिक हैं और उन का कहना है कि जब जाति और धर्म के मानने वालों के लिए प्रमाणपत्र होते हैं तो हम जैसे नास्तिक लोगों के लिए क्यों नहीं? स्नेहा को बिना जाति और धर्म के खुद की एक अलग पहचान चाहिए थी, जो उन्हें हासिल हो चुकी है. स्नेहा के इस कदम की हर तरफ तारीफ हो रही है.

एक समस्या भी

धर्म को न मानने वाले या नास्तिकों की संख्या हालांकि बढ़ रही है, लेकिन कानूनी मामलों में उन की पहचान विवादों के दायरे में है क्योंकि नास्तिक लोगों का कोई पर्सनल कानून नहीं है. कानूनी मामलों में उन के जन्म के आधार पर धर्म तय किया जाता है. साल 2012 में श्रीरंग बलवंत खंबेटे नाम के वकील ने ठाणे की सैशन कोर्ट में खुद को गैरधार्मिक घोषित करने की मांग की थी. कोर्ट ने कहा कि उन्हें अपना धर्म त्यागने की अनुमति है. उन्हें ‘गैरधार्मिक’ की श्रेणी दी जा सकती है. मगर इस में यह भी खतरा है कि इस से उन के परिवार के सदस्यों के लिए स्थिति जटिल हो सकती है, उन की संपत्ति और संस्कारों को ले कर कानूनी पेंच आ सकते हैं. भारत में विवाह, संपत्ति के बारे में स्पैशल मैरिज एक्ट और इंडिया सक्सैशन एक्ट हैं जिन में गैरधार्मिक लोगों के लिए नियम हैं.

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 फ्रैंडशिप टिप्स: नए दोस्त बनाने के लिए अपनाएं ये 4 टिप्स

कई बार आप दोस्त बनाना चाहते हैं, पर आप किसी को दोस्त नहीं बना पाते.  और आप इस बात को लेकर दुखी रहते हैं. कई बार अकेलेपन के कारण आप जिंदगी से निराश होने लगते हैं. तो चलिए जानते हैं, नए दोस्त बनाने के लिए आप क्या करें.

अनजाने लोगों की मदद करें

अगर आप अपने लिए जीते हैं और अपनी ही परवाह करते हैं, तो कोई आपको क्यों दोस्त बनाएगा? इसलिए हर रोज कुछ अनजाने या जान-पहचान के लोगों की मदद करें. कभी-कभी आप दूसरों के लिए छोटी सी चीज करके उनके दिल में बड़ी जगह बना लेते हैं. आप हर किसी के लिए सब कुछ नहीं कर सकते हैं लेकिन कुछ लोगों के लिए छोटी-छोटी चीजें करके उन्हें खुश तो कर ही सकते हैं.

जो जैसा है उसे वैसा स्वीकार करें

हर किसी की पर्सनैलिटी आदतें और बात करने का तरीका अलग होता है. कई बार ऐसा होता है कि आपकी जिंदगी में शामिल लोगों की आदतें आपको पसंद नहीं आतीं. ऐसे में आप उन्हें बदलने की जगह उन्हें वैसे ही स्वीकार करें. लेकिन ऐसे लोगों से खुद को बचाना ना भूलें. अगर आप लोगों को वैसा ही स्वीकार करेंगे, जैसे वे हैं, तो दोस्ती आसानी से हो जाएगी.

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माफ करना सीखें

जब आप किसी से नफरत करते हैं तो सामने वाले से ज्यादा खुद को तकलीफ देते हैं. ऐसे में जो भी आपको दुख पहुंचाता है उसे माफ करें और आगे बढ़ें. माफ करने का मतलब यह नहीं है कि जो कुछ भी हुआ आप उसे भूल चुके हैं. इसका मतलब यह कि आप इस घटना से सीख ले चुके हैं और माफ करके आगे बढ़ने में यकीन रखते हैं.

सबका सम्मान करें

आप हर किसी के साथ सम्मान दें. यहां तक कि जो आपके साथ बुरा व्यवहार करते हैं, उनके प्रति भी करुणा का भाव रखें. इसलिए नहीं कि वे बहुत अच्छे हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि आप बहुत अच्छे हैं. किस तरह के लोग इज्जत के काबिल हैं इसके लिए सीमाएं बनाना थोड़ा मुश्किल है. इसलिए हर किसी के साथ अच्छे से और प्यार से बात करें.

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उम्र के अनुसार ऐसे निखारें अपनी खूबसूरती

उम्र बढ़ने के साथ-साथ खूबसूरती कम होने लगती है. पर कुछ लोगों की खूबसूरती उम्र से पहले ही ढलने लगती है. तो आइए जानते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ खूबसूरती को कैसे बरकरार रखा जा सकता है.

नरम क्‍लींजर लगाएं

रूखी त्‍वचा के लिये क्रीम युक्‍त और औइली त्‍वचा के ओइल फ्री क्‍लींजर अच्‍छा होता है. अगर आपकी त्‍वचा संवेदनशील है तो अपने डौक्‍टर से इस बारे में बात करें. चेहरे को हल्‍के गरम या ठंडे पानी से धोएं. गरम पानी आपके चेहरे को और ज्‍यादा रूखा बना सक‍ता है. चेहरे को रगड़ कर ना पोछे.

अगर आपका चेहरा औइली हो या फिर उस पर पिंपल निकला हो,  आप एक अच्‍छा सा आइलफ्री मौइस्‍चराइजर लगा सकती हैं. अगर स्‍किन रूखी है तो दिन में दो बार मौइस्‍चराइजर लगाएं. घर के बाहर और अंदर दोनों ही जगहें सनस्‍क्रीन लगाएं.

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इन बातों का भी रखें ख्याल

आपकी स्‍किन को अगर नियमित रूप से विटामिन सी और ई का डोज दिया जाए तो आपकी स्‍किन और भी ज्‍यादा निखर सकती है. आप इन्‍हें या तो आहार से या फिर क्रीम से पा सकती हैं. विटामिन ए या B3 सूरज की किरणों से होने वाले नुकसान से बचाती है.

क्‍लीजिंग और एक्‍सफोलियेटिंग फेशियल करवाने से चेहरे पर एलर्जी या रिएक्‍शन हो सकता है. अगर आपकी त्‍वचा संवेदनशील है तो सोंच समझ कर ही फेशियल चुनें नहीं तो अच्‍छा है कि आप घर पर ही इसे करें. खूब सारे फल, सब्‍जियां और साबुत अनाज खाएं. रोजाना व्‍यायाम करें, तनाव और तेज धूप से दूर रहें.

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5 अगस्त को आएगी अनुपम खेर की आत्मकथा, खुलेंगे कई राज

बौलीवुड अभिनेता अनुपम खेर सिर्फ अभिनेता ही नहीं है. वह एक्टिंग टीचर, मोटीवेशनल लेक्चरर और एक बेहतरीन लेखक भी हैं. उन्होने 2012 में एक किताब ‘‘द बेस्ट थिंग अबाउट यू इज यू’’ लिखी थी, जो कि पिछले छह साल से ‘बेस्ट सेलर’ बनी हुई है. 2018 में इसका 21वां संस्करण प्रकाशित हुआ था. इसका 22वां संस्करण छप रहा है. इसका छह भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.

5 अगस्त को आएगी अनुपम की आत्मकथा…

अब अनुपम खेर ने स्वयं अपनी आत्मकथा लिखी है. जिसका नाम है- ‘‘लेसन लाइफ टौट मी अननोइंगली’’. इसके प्रकाशक हैं-पेंग्विन रैंडम हाउस. अनुपम खेर लिखित उनकी यह आत्मकथा वाली किताब 5 अगस्त को बाजार में आएगी. किताब के प्रकाशक ‘‘पेंग्विन रैंडम हाउस’’ के प्रवक्ता ने कहा है- ‘‘यह पुस्तक असाधारण, उत्साहवर्धक और ईमानदारी से बयां किए गए घटनाओं का दस्तावेज है.

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अनुपम ने किए हैं कई खुलासे…

इसमें अनुपम खेर ने कई खुलासे किए है. अनुपम खेर ने अपनी जिंदगी द्वारा सिखाए गए कुछ दुर्लभ तथ्यों को भी इसमें साझा किया है. यह सब किसी भव्य मसाला बाक्स आफिस हिट फिल्म से कम नहीं है.’’

क्लर्क के बेटे हैं अनुपम…

एक फारेस्ट विभाग के क्लर्क के बेटे अनुपम खेर अब तक सौ से अधिक नाटकों, 515 बौलीवुड फिल्मों के अलावा कुछ इंटरनेशनल फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं. हाल ही में वह अमरीकन सीरीज ‘‘न्यू अम्सर्टडम’’ की शूटिंग करके लौटे हैं. जबकि उनकी एक इंटरनेशनल फिल्म ‘‘होटल मुंबई’’ जुलाई माह में रिलीज होने वाली है. इसके अलावा 5 जुलाई को उनकी एक ज्वलंत मुद्दे पर आधारित अशोक नंदा निर्देशित फिल्म ‘‘वन डे जस्टिस डिलिवर’’ रिलीज होने वाली है.

एडिट बाय- निशा राय…

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