जिन ज्ञानियों और ऋषिमुनियों टाइप के विद्वानों को यह शक हो गया था कि अब भाजपा सत्ता में नहीं आ पाएगी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे उन में एक चौंका देने वाला नाम योगगुरु और कारोबारी बाबा रामदेव का भी था जिन्होंने अपनी इन भड़कती भावनाओं को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने की चूक भी कर दी थी. अब बाबा पछता रहे हैं और रंगमहल में घुसने के लिए अपने साइज का छेद ढूंढ़ रहे हैं जिस से पतंजलि के कथित बढ़ते घाटे को मुनाफे में बदला जा सके.

नरेंद्र मोदी को खुश करने वालों की लाइन में लगे योगगुरु ने एक बासी सी सलाह यह दे डाली कि जो लोग 2 से ज्यादा बच्चे पैदा करें उन से (यानी मुसलमानों से) वोट देने वगैरह के अधिकार छीन लेने चाहिए. बात है तो राजा को प्रसन्न करने वाली लेकिन बाबा यह भूल गए कि इस परम सत्य को नरेंद्र मोदी 80 के दशक में ही प्राप्त कर चुके थे जब वे आरएसएस के स्कूल में भरती हुए थे. देश को हिंदू राष्ट्र बनाने का कोई और नया आइडिया रामदेव दें, तो शायद उन पर नजर-ए-इनायत हो जाए.

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वैभवहीन गहलोत

23 मई की आंधी में अच्छेअच्छे वटवृक्ष उखड़ गए तो फिर नन्हेमुन्ने पौधों की बिसात क्या थी. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पूरे धूमधड़ाके से अपने बेटे वैभव को एक प्रोडक्ट की तरह जोधपुर सीट से लौंच किया था लेकिन नतीजे आए तो वैभव भी उन 25 पराजितों में शामिल थे जिन के दम पर विधानसभा चुनाव के नतीजों को दोहराने का सपना रेगिस्तान में देखा गया था. सदमे में आ गए बुजुर्ग और तजरबेकार अशोक गहलोत को समझ नहीं आ रहा कि अब क्या करें क्योंकि परेशानियां सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही हैं.

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