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जम्मू-कश्मीर विवाद: आखिर क्या है धारा 370, जानें यहां

स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में छोटी -छोटी रियासतों को भारतीय संघ में शामिल किया गया. उस समय जम्मू-कश्मीर रियायत के महाराज हरि सिंह थे जो किसी भी पक्ष में जाने को तैयार नहीं थे(मतलब न भारत के साथ और न ही पाकिस्तान के साथ) किन्तु कश्मीर की भौगोलिक स्थिति ऐसी नही थी कि वो एक स्वतन्त्र देश बन कर रह सके.

इसके अलावा ये एक मात्र रियासत थी जहां के राजा हिन्दू थे और अधिकांश प्रजा मुस्लिम थी जिसका की रूझान पाकिस्तान की तरफ था. महाराज हरि सिंह कुछ निर्णय ले पाते कि उससे पहले ही उन पर पाकिस्तान समर्थित कबिलाईयों ने हमला कर दिया.  महाराजा का मरता क्या न करता वाला हाल हो चुका था . मन मार कर उन्होने भारत में विलय का प्रस्ताव रखा….

तब इतना समय नहीं था या कह लो कि राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी के कारण “गोपाल स्वामी आयंगर” ने संघीय संविधान सभा में “धारा 306 ए” जो कि बाद में “धारा 370 “बनी का प्रारूप पेश किया.

इस तरह से राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी की वजह से जम्मू कश्मीर को अन्य राज्यों से अलग अधिकार मिल गए. जम्मू कश्मीर के भारत में विलय के बाद वहां “मुख्यमंत्री” की बजाय “प्रधानमंत्री” और “राज्यपाल” की जगह “सदर-ए-रियासत” होता था.

“जवाहर लाल ने शेख अब्दुल्ला” को वहां का “प्रधानमंत्री” बना दिया यह सिलसिला “1965” तक चला. फिर धारा 370 में बदलाव किया गया उसके बाद वहां पर भी अन्य भारतीय राज्यों की तरह राज्यपाल और मुख्यमंत्री होने लगे.

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अब लगे हाथ ये भी जान लेते है कि क्या अधिकार उन्हें मिलें:-

  • भारत के अन्य राज्यों के लोग जम्मू कश्मीर में जमीन जायदाद नही खरीद सकते जबकि जम्मू कश्मीर के निवासी पूरे भारत में जहां चाहे जमीन-जायदाद खरीद सकते हैं.
  • वितीय आपातकाल लगाने वाली धारा 360 भी जम्मू कश्मीर में लागू नहीं होती.
  • जम्मू कश्मीर का अपना अलग झंडा है. वहाँ पर भारतीय तिरंगे को जलाने पर किसी सजा का प्रावधान नहीं है .
  • भारतीय संसद जम्मू कश्मीर में रक्षा,विदेश,वित्त और संचार के अलावा और कोई अन्य कानुन नही बना सकती .
  • धारा 356 लागू नही,राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नही…इसे ऐसे समझा जा सकता है कि “21 जुन 2018 को भाजपा पीडीपी” गठबंधन टूटने के बाद राज्य में राज्यपाल शासन लगा दिया गया..

देश के अन्य सभी राज्यों में राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था है जबकि जम्मू कश्मीर कें संविधान में राज्यपाल शासन का प्रावधान है. यह छह माह के लिए लगाया जाता है. यदि स्थिति बहाल नहीं होती तो इस व्यवस्था की मियाद को बढ़ाया जा सकता है .

ये एकमात्र ऐसा राज्य है जिसके पास अपना संविधान और अधिनियम है .

  • कश्मीर की कोई लड़की किसी दुसरे राज्य के व्यक्ति से शादी करती है तो उसकी जम्मू कश्मीर राज्य की नागरिकता छिन जाएगी.
  • धारा 370 के अंतर्गत जो सबसे अजीब बात है वो है अगर कोई पाकिस्तानी नागरिक किसी कश्मीरी युवती से विवाह कर ले तो उसे भारतीय नागरिकता मिल जाती है जबकि वहां की युवती जब भारतीय गणराज्य के किसी युवक से शादी करती है तो उसके सारे अधिकार छिन जाते हैं.
  • रिसासत में पांच वर्ष के शासन की जगह छह वर्ष का शासन होता है.

अब आते हैं धारा 35a पर

क्या है धारा 35a:-

वर्ष 1956 में यानि के कश्मीर के भारत में विलय होने के पश्चात तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा धारा 370 को थोड़ा सा परिवर्तित किया गया और कश्मीर प्रशासन को विशिष्ट नागरिक चयन का अधिकार दिया गया, इस धारा के अंतर्गत कश्मीर सरकार यह तय कर सकती है कि कौन कश्मीरी नागरिक है और कौन नहीं.

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इसको एक उदाहरण द्वारा समझाने की कोशिश करती हूं.

कश्मीर में भारत के अन्य हिस्सों से वाल्मीकि समाज को लाकर बसाया गया था.., जैसे कि उस समय वो लोग अपना सफाई का कार्य कर रहे थे उन्हें अन्य राज्यों से लाकर कश्मीर में वही काम करने के लिए बसा दिया गया .अब तो इस घटना की चार पीढ़िया बीत चुकी है मगर वह वाल्मीकि समाज आज भी वहां प्रवासी भारतीय कहलाता है उन्हें वहां के विधान सभा एव पंचायत चुनावो मे हिस्सा लेने का भी अधिकार नहीं है.. अर्थात इस समुदाय के लोग देश के प्रधानमंत्री पद तक जा सकते हैं मगर कश्मीर के किसी गाँव के प्रधान नहीं बन सकते .साथ साथ इस समुदाय के बच्चे चाहे कितने भी होशियार क्यों न हो कश्मीर के किसी भी सरकारी शिक्षण संस्थान मे पढ़ भी नहीं सकते .

पुलवामा हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. राष्ट्रीय नेतृत्व से धारा 370 और 35ए को खत्म करने की अपेक्षा की जा रही है…

इससे कश्मीर में शांति व्यवस्था की अस्थाई समस्या उत्पन्न होगी.

लेकिन इससे स्थायी समाधान का एक रास्ता खुलेगा. नीतियां राष्ट्रहित की वाहक होती है किंतु हमारी ढुलमुल नीतियों के कारण धारा 370 के संशोधन और सम्पूर्ण कश्मीर के एकीकरण के नीतिगत फैसले से ही समाप्त होगा .

परपीड़ा सुख: 3 तलाक और 370

एक शूर्पनखा थी लेकिन वैसी कुरूप और वीभत्स नहीं थी जैसी कि भक्तों के दिलोदिमाग में बैठा दी गई है बल्कि वह एक निहायत ही खूबसूरत स्त्री थी. शूर्पनखा की नाक कटने का प्रसंग हर कोई जानता है कि उसे लक्ष्मण ने काटा था. शूर्पनखा एक स्वतंत्र माहौल में पली बढ़ी युवती थी. राक्षस कुल में आर्यों जैसी बन्दिशें औरतों पर नहीं थीं और न ही वे ब्राह्मणों और ऋषि मुनियों के इशारे पर नाचने वाली जाति के थे. उनमें व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का बड़ा महत्व था ठीक वैसा ही जैसा आज यूरोप के लोगों में दिखता है. बहरहाल शूर्पनखा वनवासी भाइयों राम और लक्ष्मण पर रीझ गई और उसने बेहद विनम्रता से उनसे प्रणय निवेदन कर डाला.

इन दोनों को पूरा हक था कि वे उसका प्रस्ताव ठुकरा देते लेकिन इन शूरवीर क्षत्रियों ने उसकी नाक ही काट डाली. सुनसान जंगल में एक अबला की नाक काट डालना दो पुरुषों के लिए कोई बहादुरी बाला या मुश्किल काम नहीं था और इन आर्य पुत्रों ने ऐसा ही किया. इसके बाद की रामायण भी हर कोई जानता है.

राम और लक्ष्मण को जो पर पीड़ा सुख मिला था वही आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित करोड़ों हिन्दुओ को मिल रहा है कि देखो पिछले श्रावण सोमवार तीन तलाक कानून बनाया था और इस सोमवार तो कश्मीर समस्या हमेशा के लिए सुल्टा या सुलझा दी. इसमें देश का और हिंदुओं का कोई भला नहीं है. हां कश्मीर के मुसलमान जरूर अब तमाम दुश्वारियों से घिरने वाले हैं ठीक वैसे ही जैसे बस्तर के आदिवासी सालों से घिरे हुये हैं उनके एक तरफ सेना है तो दूसरी तरफ नक्सली हैं, जो उन्हें न तो उन्हें सुकून से जीने देते हैं और न ही चैन से मरने देते हैं.

जिन 10-12 फीसदी शिक्षित और भरे पेट हिंदुओं को शूर्पनखा के प्रसंग का उद्धरण कश्मीर पर देने से हैरत हो रही हो. उन्हें प्रतिक्रिया देने से पहले एक बार किसी इतिहासकार से फोन कर पूछ लेना चाहिए कि क्या वाकई वे भारत के मूल निवासी हैं… और नहीं हैं तो कौन हैं और कैसे यहां के राजा बन बैठे.

यह एक लंबी बहस की बात है लेकिन यह स्थापित तथ्य है कि यह देश जिसमें हम रह रहे हैं जिसे गर्व से हम हमारा कहते हैं. वह मूलतः उन आदिवासियों का है जो आज भी जंगलों में जानवरों सी जिंदगी जी रहे हैं. यकीन माने और चाहें तो अपने स्रोतों और संपर्कों के जरिये तसल्ली भी कर लें कि आदिवासी इलाकों में कश्मीर से धारा 370 को हटाये जाने को लेकर कोई जश्न नहीं मन रहा है, न वहां मिठाइयां बंट रही हैं और न ही वे भूखे नंगे अभावग्रस्त लोग कश्मीर में प्लौट खरीदने की सोच रहे हैं. वे तो खुद अपनी जमीनों पर मजदूरी कर रहे हैं.

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यह हंसी ठिठोली 10-12 करोड़ ऊंची जाति वाले कथित हिन्दू कर रहे हैं और वे ठीक ही कह रहे हैं कि 303 सीटें कोई कबबड़ी खेलने नहीं दी थीं. जिस मकसद से दूसरी बार नरेंद्र मोदी और भाजपा को भारी बहुमत से चुन कर भेजा था वह एक चौथाई पूरा हो गया है. बाकी रह गए हैं राम मंदिर निर्माण और जातिगत आरक्षण खत्म कर वर्ण व्यवस्था बहाल करना तो वे भी 2024 नहीं तो 2029 तक पूरे हो ही जाएंगे. यानि देश पूरे तौर पर हिन्दू राष्ट्र हो जाएगा जो आरएसएस का सालों पुराना सपना है.

एक उत्तेजना और रोमांच पूरे देश में फैला हुआ है. लोग बहादुर मोदी और शाह को सलाम कर रहे हैं कि जो वे कर सकते हैं वह किसी और के बस की बात है भी नहीं. रावण जैसे ताकतवर शासक की बहन की नाक राम और लक्ष्मण के अलावा कोई और काट भी नहीं सकता था. 370 को लेकर कुछ हिन्दू ग्लानि से भी भरे हुए हैं जिसे दूर करने वे तरह तरह की दलीलें भी दे रहे हैं कि अब कश्मीर में यह हो जाएगा और वह भी हो जाएगा मसलन वहां आतंक राज खत्म हो जाएगा. वहां के लोगों यानि मुसलमानों की गरीबी दूर हो जाएगी. नए नए उद्योग धंधे चालू होंगे और कारखाने बनेंगे. कालेज और विश्वविदयालय खुल जाएंगे बगैरह बगैरह.

ये मुट्ठी भर हिन्दू किस बात की सांत्वना खुद को दे रहे हैं और क्यों दे रहे हैं इस सवाल का जवाब बेहद साफ है कि वे दरअसल में इस बात से सहमत नहीं कि शूर्पनखा की नाक काटी जाना जरूरी भी नहीं था. रावण को मारने बाल्मीकि कोई दूसरा मिथक भी गढ़ सकते थे. सार ये कि हिन्दू सिर्फ इस बात से खुश हैं कि मोदी शाह की जोड़ी ने मुसलमानों को सबक सीखा दिया.

यह अगर खुशी या जश्न मनाने वाली बात है तो पूरे मुसलमानों को पाकिस्तान भेज देने का आइडिया या एजेंडा भी हर्ज की बात नहीं लेकिन अहम सवाल यह कि इसके बाद क्या ज्योमेट्री की तरह मान भी लिया जाये कि पूरे देश से मुसलमानों को खदेड़ दिया गया है तो अब करने को क्या बचा.

आलीशान ड्राइंग रूमों में बैठे हिंदुओं यानि मुख्यधारा के निशाने पर अब क्या है यह ऊपर बताया जा चुका है. पिछले पखवाड़े देश की अर्थव्यवस्था और जीडीपी कितने पायदान लुढ़के यह इनकी चिंता का विषय नहीं. उन्नाव का विधायक कैसे गुंडाराज चला रहा था यह सोचने वाली बात भी नहीं. सोचने वाली बात यह है कि अब कब कलयुग के महादेव ऐसी व्यवस्था करते हैं कि हमारे बाल बच्चे एशों आराम से जिए. कब दलित दोबारा हमारे घर के सामने से निकले तो जूते उतारकर अपने सर पर रखे. उसकी यह हीनता ही हमारी श्रेष्ठता है. यह बात संविधान में लिखी न लिखी हो लेकिन मनु महाराज तो अपनी स्मृति में लिख गए हैं.

तो ये जो जश्न मन रहा है वह पर पीड़ा सुख का है, बेकसूर शूर्पनखा की नाक कटने का है.

हिन्दू बड़े फख्र से कह रहे हैं कि मोदी जी ने नेहरू का पाप धो दिया या गलती सुधार दी. लेकिन मनु स्मृति की गलतियां कौन सुधारेगा इसका जबाब वे बड़ी मासूमियत से यह कह देते हैं कि छुआछूत जातिगत भेदभाव बगैरह अब कहां हैं. अब तो सब बराबर हैं उल्टे आरक्षण के चलते हमारे बच्चे पिछड़ रहे हैं यानि इसे भी तीन तलाक और 370 की तरह खत्म किया जाये क्योंकि मुसलमानों की तरह दलितों का भी कोई सियासी रहनुमा नहीं बचा है. और कहने को  जो मायावती बची थीं वे भी मनुवादियों के साथ हो लीं है. जो गलती महबूबा मुफ्ती ने भाजपा से हाथ मिलाकर की थी वही मायावती कर रही हैं.

यहां यह सवाल उठना स्वभाविक है कि 370 का दलितों और आरक्षण से क्या कनेकशन , कनेकश्न यह है कि हिंदूवादी भाजपा हिन्दुत्व के अपने एजेंडे को अमल में लाने उतारू हो आई है और उसे रोकने वाला कोई है नहीं. मुख्यधारा बाले हिन्दू कहते हैं और बड़े भोलेपन से कहते हैं कि देश अगर हिंदूराष्ट्र हो भी जाये तो क्या हर्ज है. बात सच है हर्ज तो इसमें भी नहीं कि आप मुसलमानो को देश से खदेड़ दें, हर्ज तो इस बात में भी नहीं कि दलितों से आरक्षण छीन लिया जाकर उन्हें फिर सदियों पहले ढकेल दिया जाये. अभी बमुश्किल 2 फीसदी दलित भी सरकारी नौकरियों में नहीं हैं और न ही उनके पास कोई करोड़ों अरबों का कारोबार है. वे आज भी सड़कों पर झाड़ू लगा रहे हैं, चमड़े के छोटे मोटे कारोबार में लगे हैं और गौ तस्करी के आरोप में पिटते मरते भी रहते हैं. तेली बदस्तूर तेल निकालने में मशगूल है और काछी सब्जी भाजी उगा रहे हैं. नाई भी अभी हजामत ही बना रहा है धोबी, घाट पर कपड़े धो रहा है. बसोड बांस के आइटम बेचकर जैसे तैसे पेट भर रहा है, केवट नाव चलाकर और मछलियों के पुश्तेनी कारोबार में लगा है. अब इनमे से भी जो मुट्ठी भर सरकारी नौकरी हासिल कर पैसे वाले बन गए हैं. उन्हें गले लगा लो और दान दक्षिणा भी लो, जिससे ये अगले जन्म में फिर शूद्र योनि में पैदा न हों.

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यह सब मुख्यधारा वाले हिंदुओं को नहीं दिखता और न ही वे इसे देखने और दिखाने देना चाहते. वे कहते हैं सब ठीक ठाक है. ये पुरानी बातें हैं और थोड़ा बहुत कुछ हो भी रहा है तो उस पर हाय हाय बेवजह की और नाम कमाऊ और हिन्दुत्व विरोधी बात है. हम सभी को इस पुरानी मानसिकता से उबरना चाहिए. ये लोग बेहतर जानते हैं कि शहरों के फुटपाथ और झुग्गियों में जानवरों सी ज़िंदगी जी रही बड़ी आबादी कोई ब्राह्मण, क्षत्रियों, बनियों या कायस्थ जैसी ऊंची और दूसरी ब्राह्मण पूजक जातियों की नहीं है. इसलिए पूरे दमखम से कहो कि अब दलित हैं कहां और जो हैं वे तो बाबू और साहब बने हमारी छाती पर मूंग दल रहे हैं.

इन झूठों और दोगुलों का कोई इलाज नहीं है जो खुद एक सिमटे दायरे में रहते हैं और कोशिश यह करते हैं कि सभी इसी दायरे में आ जाएं और जो आने से इंकार करे उसे तरह तरह से बहिष्कृत, तिरस्कृत करो जैसे भी उसकी हिम्मत तोड़ो ताकि ब्राह्मण राज कायम करने में कोई अड़ंगा पेश न आए.

370 हटाये जाने पर पहली बार आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने नरेंद्र मोदी को बधाई दी, तो लगा ऐसा मानो कोई वशिष्ठ या विश्वामित्र राम को आशीर्वाद दे रहा हो कि पुत्र लगे रहो अभी तो कई ऐसे यज्ञ और अनुष्ठान हमें करने हैं. तुम्हारी भूमिका तो निमित्त है. प्रजा हमारे अनुकूल है लिहाजा अगले आदेश की प्रतीक्षा करो. वह शुभ दिन निकट है जब आदिवासियों और वनवासियों का प्राकृतिक संपदाओं से सम्पन्न यह देश पूरी तरह हम आर्यों का होगा.

देवेंद्र से देविका बनने की दर्द भरी दास्तां

मुसीबत और परेशानियां ऐसी थीं कि देवेंद्र को उनका कोई हल नहीं सूझ रहा था और जो सूझा वह हैरान कर देने वाला है. साल 2017 तक एक एनजीओ में काम करने बाला यह हट्टा कट्टा  युवा आम लड़कों की तरह ही रहता था लेकिन अब औपरेशन के जरिये लड़की यानि ट्रांसजेंडर बनकर अपने ही शहर भोपाल में किन्नरों की टोली में तालियां बजाता नजर आता है .

आमतौर पर कोई भी लड़का ट्रांसजेंडर तभी बनने की सोचेगा जब उसमें बचपन से ही लड़कियों जैसे लक्षण हों या फिर वह खुद को सेक्स कर पाने में असमर्थ पाये पर देवेंद्र के साथ ऐसा कुछ नहीं था, बल्कि उसकी कहानी दिल को छू जाने वाली है. खासतौर से उस वक्त जब रक्षा बंधन का त्योहार आने वाला है. देवेंद्र अपनी बहन के लिए देविका बना था जिसका उसे कोई मलाल भी नहीं है, उल्टे वह खुश है कि बलात्कार के झूठे आरोप में फंसने से भी बच गया.

देवेंद्र अपनी बहन को बहुत चाहता था और उसकी विदाई 20 मई 2016 को इन दुआओं के साथ उसने की थी कि बहन ससुराल जाकर खुशहाल ज़िंदगी जिये लेकिन भगवान कहीं होता तो उसकी सुनता. हुआ यूं कि शादी के कुछ दिनों बाद ही बहन की ससुराल वालों ने उस पर तरह तरह के जुल्मों सितम ढाने शुरू कर दिये ठीक वैसे ही जैसे फिल्मों और टीवी सीरियलों में दिखाये जाते हैं. दहेज के लालची ससुराल वालों ने उसकी बहन को इतना सताया कि वह खून के आंसू रो दी .

अब देवेंद्र ने वही गलती की जो आमतौर पर दहेज के लिए सताई जाने वाली लड़कियों के घर वाले करते हैं. यह गलती थी ससुराल वालों के हाथ पैर जोड़ना और अपनी पगड़ी उनके चरणों में रख देना. ऐसे फिल्मी टोटकों से तो फिल्मों में भी बात नहीं बनती फिर यह तो सामने से होकर गुजर रही हकीकत थी. देवेंद्र ने मध्यस्थता करते हर मुमकिन कोशिश की कि जैसे भी हो बगैर किसी झगड़े फसाद विवाद या कोर्ट कचहरी के बहन की ज़िंदगी में खुशियां आ जाएं पर कोई कोशिश कामयाब नहीं हुई तो उसने भी थकहार कर वही रास्ता पकड़ा जो सभी पकड़ते हैं.

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ननद की धमकी

लेकिन थाने जाने से पहले उसने बहन की ससुराल बालों को आगाह करना या धोंस देना कुछ भी समझ लें जरूरी समझा कि शायद इससे उनमें अक्ल आ जाए. आमतौर पर ससुराल वाले इस बात से डरते हैं कि अगर बहू या उसके घर वालों ने रिपोर्ट दर्ज करा दी तो कभी कभी जमानत के भी लाले पड़ जाते हैं. यही इस मामले में भी हुआ, शुरू में तो बहन के ससुराल वाले डरे लेकिन जल्द ही बहन की चालाक ननद ने इस का भी तोड़ निकाल लिया और ऐसा निकाला कि देवेंद्र की सारी हेकड़ी तो हेकड़ी मर्दानगी भी हमेशा के लिए हवा हो गई.

इस ननद ने उसे ही यह धमकी देना शुरू कर दिया था कि अगर वह थाने गया तो वह भी थाने जाकर देवेंद्र के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखा देगी. इस धमकी का उम्मीद के मुताबिक असर हुआ और देवेंद्र ने बहन की ससुराल जाना बंद कर दिया. लेकिन इससे बहन का कोई भला या मदद नहीं हो पा रही थी इसलिए एक दिन उसने जी कडा करते बचाव का रास्ता ढूंढ़ ही लिया कि अगर वह मर्द ही न रह जाये तो बहन की ननद क्या खाकर उसके खिलाफ बलात्कार की झूठी रिपोर्ट लिखाएगी .

नवंबर 2017 में देवेंद्र ऑपरेशन करा कर लड़की बन गया और अपना नया नाम रखा देविका . अब उसे ननद का डर नहीं रह गया था लिहाजा उसने बहन को बचाने पुलिसिया और कानूनी काररवाई शुरू कर दी . मामला जब विधिक सेवा प्राधिकरण पहुंचा तो उसने बेहिचक सारे पत्ते सचिव आशुतोष मिश्रा के सामने खोलते अपने  मेडिकल दस्तावेज़ भी दिखाये  और बताया कि बहन की ननद की धमकियों से आजिज़ आकर उसने यह फैसला लिया था .

देखते ही देखते बहन को तलाक मिल गया और वह ससुराल नाम की जेल से आजाद हो गई . लेकिन डर के चलते और बहन की सलामती के लिए देविका बन गए देवेंद्र को बहुत बड़ी क़ुर्बानी देनी पड़ी जिसकी मिसाल शायद ही ढूंढे से मिले. साड़ी और सलवार सूट पहने देविका माथे पर बिंदी और बड़ा सा टीका भी लगाती है और चूड़ियां भी पहनती है. उसका मेकअप भी लड़कियों जैसा तड़क भड़क भरा होता है .

देवेंद्र, देविका बनकर खुश है और अब ट्रांसजेंडर्स के भले के लिए काम करना चाहता है . मुमकिन है जल्द ही उसकी ज़िंदगी और बहन के लिए त्याग पर कोई फिल्म निर्माता फिल्म बनाए जिसमें भरपूर मसाला और जायका होगा लेकिन देवेंद्र की ज़िंदगी में जरूर कोई जायका नहीं रह गया है. बेहतर तो यह होगा कि वह फिर से आपरेशन कराके पहले की तरह लड़का बन जाये और ज़िंदगी का भरपूर लुत्फ उठाए.

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रुठे साथी को कैसे मनाएं

दो दिन पहले मेरी सहेली ने मुझे फोन किया और अपने घर मिलने को बुलाया. मैं खुशी-खुशी मिलने गई, लेकिन वहां तो मामला ही उल्टा निकला. मेरे हाल-चाल पूछने पर वो रोने लग गई. मैं तो घबड़ा गई कि क्या हो गया, लेकिन फिर पता चला, मैडम एक छोटी-सी बात पर पति से लड़ाई कर मायके आ गई है. और अब वापस ना जाने की जिद्द पकड़ कर बैठी है.

आज की भाग-दौड़ वाली जिदंगी में जब आप अपने पति या ब्वायफ्रेंड को पूरा समय नहीं दे पातीं और आपसी मन-मुटाव हो जाये तो ये जरुरी है कि अपनी गलती का एहसास किया जाए और अपने अहम को भूलकर सुलह कर ली जाए. कभी-कभी खुद की गलती हो न हो फिर भी ये जरुरी होता है कि रिश्ते को बचाने के लिए आप अपने अहम को किनारे रखकर सुलह की पहल करें. अक्सर होता ये है कि नाराज होने पर दोनों ही पक्ष बात करना छोड़ देते है. माफी मांगने के लिए “पहले मैं क्यों, मैं क्यों” की जिद्द रिश्ते का गला घोंट देती है. आत्मसम्मान कब अहंकार में बदल जाता, पता ही नही चलता.

कुछ ऐसा ही हुआ था मेरी सहेली के साथ भी, जो अपने रुठे पिया को मनाने की जगह मायके चली आई थी. मैंने उसे समझाया कि ऐसे एक-दूसरे से दूर हो जाने में कहां की समझदारी है? जरुरी है कि कोई एक भी अपने अहम को किनारे रखकर रिश्ते को बचाने की कोशिश करे. ताकि इस खूबसूरत रिश्ते की डोर में कोई गाठ ना आये.

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लेकिन मेरी सहेली के पास भी समस्याएं कम नही थी. खुद के बनाये हुए बहानों में वो इतनी उलझ गई थी कि अपने अहंकार से ऊपर उठकर उसे कुछ दिख नहीं रहा था. कभी ये सोचना कि वो ही पहले क्यों बात करें? कभी ये कि उसका पहल करना उसे गलत साबित कर देगा. पति का सर और ऊंचा हो जाएगा फिर वो बात-बात पर उसे ताने ना दें. अपनी इन्हीं कठिनाइयों में उलझ कर वो अपने रिश्ते को बीच मझधार में छोड़ना ज्यादा सही समझ रही थी. मेरे बहुत समझाने पर उसे थोड़ी अक्ल आई. अब जब उसने अपने अहम का साथ छोड़ा तो उसे ये नहीं समझ में आ रहा था कि अपने रुठे पिया को मनाये कैसे? अब सहेली है तो उसकी मदद करना तो बनता है. इसलिए मैंने उसे कुछ तरीके बताये जिससे वो अपने पिया को मना सके.

ये तरीके आप भी जान लीजिए, हो सकता है ये तरीके अपना कर आप अपने पिया की और प्यारी बन जाए और आपके बीच फिर कभी मनमुटाव हो ही न.

जरुरी है बात करनाः

कहते है बातें करने से मन की गाठ खुल जाती है. तो जरुरी है कि जब कभी आपका साथी आपसे किसी बात पर नाराज हो जाये तो आप चुपचाप परिस्थिति को वैसे ही छोड़ने के जगह नाराजगी की वजह जानें. अपना पक्ष रखें, अपने अहम को दीवार ना बनने दें. कभी-कभी ऐसी लड़ाईयां हार जाने में ही जीत होती है. इस बारे में एक शायर ने क्या खूब कहा है –

जिन्दगी का ये हुनर भी आजमाना चाहिए.

जंग जब अपनों से हो तो हार जाना चाहिए….

कोशिश करें कि शांतिपूर्वक और प्यार से बात करके सारी गलतफहमियां दूर की जा सकें.

सरप्राइज डेट प्लान करे

अगर आपके ब्वायफ्रेंड या पति आपसे किसी बात पर नाराज हो जाये तो उन्हें मनाने के लिए एक सरप्राइज डेट प्लान करें. उनका शेड्यूल जानकर कहीं घूमने जाने के लिए उन्हें मनाएं या कौफी के लिए ही चले जाएं. ताकि आपस में बात करने का वक्त मिल सके. घर पर रहने से कभी-कभी बातें ठीक से हो नहीं पातीं. हो सकता है आपके इस प्रयास से ही आपका साथी मान जाये.

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सौरी नोट के साथ मनपसंद फूलों की खुशबू

सौरी और फूलों का मेल बहुत ही खूबसूरत होता है. कभी-कभी जो काम आप नहीं कर पातीं वो फूलों की खुश्बू में लिपटा हुआ सौरी का कार्ड कर देता है.

पेट से दिल तक का रास्ता

ये कहावत बहुत सही कही गई है कि मर्दों के दिल का रास्ता पेट से होकर गुजरता है. तो फिर देर किस बात की, आप भी इसी रास्ते को मंजिल बनाइये. और अपने पिया के मनपंसद खाने से उनके दिल की चाभी फिर से पा लीजिए. आपके प्यार का तड़का लगा स्वादिष्ट भोजन आपके पति की नाराजगी छू-मंतर कर देगा.

रोमांटिक नाईट

लाइफ में रोमांस हो तो नाराजगी की जगह नहीं बचती. इस फंडे को अपनाकर आप अपने पति के मूड को फिर से सही कर सकती है. बेडरुम को फूलों और कैंडल लाइट से सजाकर पति के गले में बाहें डाल कर सॉरी कह दें, पति के होठों पर मुस्कान ना आ जाये तो कहना.

अपनों का साथ

कभी-कभी चीजें इतनी खराब हो जाती हैं कि आपस में बातें करने से भी ठीक नहीं होती. ऐसे में जरुरी होता है कि कोई ऐसा हो जो आप दोनों के बीच गंभीरता से सुलह का रास्ता बनाने में मदद करें. अपने पति या ब्वायफ्रेंड के किसी ऐसे खास दोस्त की सहायता लें, जो आप दोनों का सच्चा राजदार हो ऐसा व्यक्ति न हो जो आपके मन-मुटाव का फायदा उठाए या मजाक बनाएं. बल्कि आपके साथी के साथ बात कर के उनका दिल हल्का करने में मदद करे.

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वंदे मातरम् पर देश की लाइन

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का ‘वंदे मातरम’ हमारे देश की प्रज्ञा को उदबुद करता रहा है.और ओजस्विता का प्रतीक बन चुका है. यह एक लंबा गीत है बांग्ला और संस्कृत में लिखे इस गीत को राष्ट्र को समर्पित किया गया है और इसी भाव भूमि पर लिखा गया है वंदे मातरम, अर्थात भारत माता तुम्हें प्रणाम है.

विवाद आगे के पदों में हैं-जिसमें दुर्गा मां की आराधना है. और इस पर स्वाभाविक रूप से मुस्लिम समुदाय  प्रारंभ से ही अपनी आपत्ति दर्ज करा चुका है. और देश के शीर्ष विवेक ने मुस्लिम समुदाय की आपत्ति को कभी भी खारिज नहीं किया. तब भी जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था और कांग्रेस के अधिवेशनों में गाया जाता था. तब भी जब देश आजाद हुआ और संविधान में वंदे मातरम के सिर्फ  दो पदों को रखने की सहमति बनी . फिर जब मामला देश के सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा वहां भी एक तरह से यही माना गया कि आप सम्मान करते हैं यही पर्याप्त है गीत गाना अनिवार्य नहीं है. हां , हिंदूवादी सोच बारंबार यह मामला उठाती है क्या सोच है क्या लक्ष्य यह सारा देश जानता है. आज वंदे मातरम के कुछ अनछुए पहलुओं पर इस आलेख मैं हम चर्चा करते हुए आपको नए तथ्य नई सोच देने का प्रयास करेंगे .

दुर्गा माता की आराधना

आनंद मठ अट्ठारह सौ बयासी में प्रकाशित हुआ .कथानक है मुस्लिम शासकों के खिलाफ संतान सैना की लड़ाई और इसी दौरान ‘वंदे मातरम’ का गान. मुसलमानों के प्रति इस उपन्यास में गुस्सा, जुगुप्सा, घृणा है और लेखक ने इसे खुल कर शब्दों में पिरोया है.आपको आश्चर्य होगा इस महान उपन्यास में जहां मुसलमानों के प्रति रोष है वही अंग्रेजों के प्रति अतिरिक्त श्रद्धा दिखाई देती है.

कहने का सार यह है कि यह महान कृति आनंदमठ, लेखक बंकिम चंद्र चटर्जी की एक गल्फ कथा है. और अंग्रेजों को प्रसन्न करने का माध्यम. आप स्मरण करे वह समय जब अंग्रेजों का वर्चस्व भारत पर हो चुका था और बकिम चंद्र स्वयं अंग्रेज सरकार में डिप्टी कलेक्टर पद पर शोभायमान थे. ऐसे में उनके हाथ बंधे हुए थे वे भारत देश की गंगा जमुनी संस्कृति के बिल्कुल विपरीत धारा में इस उपन्यास के कथानक की रचना करते हैं और एलान करते हैं की मुस्लिम शासकों से अच्छे अंग्रेज शासक हैं .उपन्यास में अंग्रेज शासकों की स्तुति है और मुस्लिम शासकों को के प्रति रोष.स्मरण रहे शासकों के प्रति गुस्सा है…

संतान सेना शासकों के खिलाफ हथियार उठाती है मुसलमानों के खिलाफ नहीं .और वंदे मातरम में खुलकर माता… दुर्गे मात ! की आराधना है.

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अंग्रेज भी नाराज थे वंदे मातरम से…..!

देखिए आनंद मठ में अंग्रेजों की प्रशंसा है. फिर भी, जब वंदे मातरम गुंजायमान हुआ तो उसकी भावना को अंग्रेज सरकार समझ गई और इस पर प्रतिबंध लगाने की सोचने लगी .बंकिम बाबू की कलम का चमत्कार है की यह गीत एक तरफ किसी को अपना लगता है तो एक तरफ दूसरे को नाराज करता है अंग्रेज जिस वंदेमातरम को अंततः प्रतिबंध नहीं कर पाए क्या वह आजाद भारत में सम्मान नहीं प्राप्त करता ? आजादी के पश्चात 24 जनवरी 1950 को संविधान में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने इसे राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार करने संबंधी जानकारी दी जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया.

वंदे मातरम जहां अंग्रेजों के खिलाफ एक बुलंद नारा बन गया. वहीं कांग्रेस ने रविंद्र नाथ ठाकुर, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू सहित सभी महान विभूतियों ने इस गीत के प्रथम दो पदों को स्वीकार करने में कभी कोताही नहीं की परिणाम स्वरुप यह देश की अस्मिता बन गया है.

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में ही वंदे मातरम संबंधी एक याचिका में फैसला दिया है की यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का सम्मान तो करता है पर उसे गाता नहीं तो इसका मतलब यह नहीं की वो इसका अपमान कर रहा है. इसलिए नहीं गाने पर किसी को दंडित नहीं किया जा सकता. जबरदस्ती गाने के लिए मजबूर करने पर भी यही कानून का नियम लागू है .

आनंदमठ का यह एक सच

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के ऐतिहासिक ‘आनंद मठ’ में एक जगह आता है –

“कप्तान साहब ! हम तुम्हें मारेंगे नहीं, अंग्रेज हमारे शत्रु नहीं हैं तुम क्यों मुसलमानों की सहायता करने आए हो ? हम तुम्हारे प्राण बख्शते हैं लेकिन अभी तुम हमारे बंदी रहोगे, अंग्रेजों की जय हो… हम तुम्हारे शुभचिंतक हैं .”

” प्रभो ! यदि हिंदू राज्य स्थापित नहीं होगा तो कौन सा राज्य होगा ? क्या फिर मुस्लिम राज्य होगा ?”

कुल मिलाकर आनंद मठ में बंकिम बाबू ने अंग्रेजों के प्रति जो श्रद्धा समर्पण स्थापित किया है और मुसलमान शासकों के प्रति रोष ! ऐसे में यह कहना कि लेखक अंग्रेजों के प्रति समर्पण रखता था गलत नहीं होगा . इसका सबसे बड़ा कारण अंग्रेजों की नौकरी और सख्त कानून था बंकिम बाबू जानते थे ऐसा नहीं करने का क्या परिणाम हो सकता है.

विगत जुलाई 2019 में उच्च न्यायालय दिल्ली ने वंदे मातरम की प्रतिष्ठा संबंधी याचिका खारिज कर दी. जैसा कि स्पष्ट है याचिकाकर्ता भाजपा का प्रवक्ता है अधिवक्ता है नाम है अश्वनी उपाध्याय . याचिकाकर्ता ने फरियाद की थी की वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान दर्जा दिया जाए मुख्य न्यायाधीश डी.एन पटेल और न्यायमूर्ति सी . हरि शंकर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहां की हम इस याचिका पर विचार करने का कोई कारण नहीं देख पा रहे हैं.

याचिका में अश्वनी उपाध्याय ने विद्यालयों में जन गण मन और वंदे मातरम गाए जाने का सरकार से सुनिश्चित कराने के लिए उचित कदम उठाए जाने के दिशानिर्देश का अनुरोध किया था.

दरअसल यह हिंदूवादी सोच है जो चाहती है वंदे मातरम को एक समुदाय विशेष पर लाद दिया जाए जिसे आजादी के पश्चात ही देश की संविधान सभा और प्रथम सरकार ने समझ लिया था और नार काट दी थी. मगर बावजूद इसके इस मसले को एन-केन प्रकरण एक सोच विशेष के तहत उठाया जाता है यही कारण है कि वंदे मातरम पर मध्य प्रदेश में बवाल उठा और कमलनाथ ने हर माह  की 1 तारीख को राज्य मंत्रालय में गाए जाने की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है.

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ऐसे बनाएं कड़ाही सब्जी पास्ता

पास्ता तो सबको पसंद होता है पर कई लोग हेल्थ की वजह से इसे खाना नहीं चाहते. लेकिन आज आपको कड़ाही सब्जी पास्ता की रेसिपी बताएंगे जिससे आपको हेल्थ की टेंशन खत्म हो सकती है. आप अपनी फैमिली के साथ टेंशन फ्री होकर पास्ता का आनंद ले सकते हैं.

सामग्री

– 1 बड़ा चम्मच तेल

– 1 छोटा चम्मच जीरा

– 1 बड़ा चम्मच अदरक-लहसुन बारीक कटा

– 1 बड़ा चम्मच धनियापत्ती बारीक कटी

– 1 छोटा प्याज कटा

– 1 कप हरी-पीली शिमला मिर्च ट्राइऐंगल में कटी

– 1 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर

– 1/2 छोटा चम्मच धनिया पाउडर

– 1/2 छोटा चम्मच जीरा पाउडर

– 1 कप मशरूम कटे

– 1/4 छोटा चम्मच गरममसाला

– 2 कप पानी

– 1 कप पास्ता

– 1/4 कप पनीर मसला

– नमक स्वादानुसार

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 बनाने की विधि

एक पैन में तेल गरम कर के जीरा भूनें और फिर इस में अदरक-लहसुन डाल कर भून लें.

अब धनियापत्ती, प्याज और नमक डाल कर प्याज मुलायम होने तक भूनें. फिर लालमिर्च पाउडर, धनिया पाउडर व जीरा पाउडर डाल कर भूनें.

अब मशरूम और शिमलामिर्च डाल कर कुछ देर भूनें और इस में पास्ता व पानी डाल कर पास्ता पक जाने तक ढक कर पकाएं. धनियापत्ती से सजा कर सर्व करें.

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यहां होती है रोमांस की क्लास

अक्सर स्कूल और कौलेज में आपको पढ़ाई और अनुशासन ही सिखाया जाता है.  और जीवन में एक अच्छा नागरिक कैसे बनें, इसकी शिक्षा दी जाती है. लेकिन दुनिया में एक ऐसी जगह है, जहां प्यार की पाठशाला भी लगती है. तो चलिए आज आपको एक ऐसी यूनिवर्सिटी के बारे में बताते हैं जहां पर पढ़ाई के साथ-साथ प्यार की क्लास भी लगाई जाती है.

दरअसल, चीन के तियानजिन यूनिवर्सिटी में रोमांस की क्लास भी होती है. इस क्लास का नाम है थ्योरी इन लव एंड डेटिंग. दरअसल इस क्लास के पीछे का उद्देश्य क्लास के बच्चों के बीच रिश्तों को और मजबूत बनाना है. इस क्लास से कई बच्चों के रिश्तों में सुधार भी देखा गया है. यह छात्रों के लिए वैकल्पिक विषय होता है लेकिन इसे कोई भी छात्र छोड़ता नहीं है.

इस क्लास में छात्रों को प्यार और डेटिंग के तरीकों को बताया जाता है और सही साथी चुनने के लिए कहा जाता है. जो छात्र अपने साथी को चुनने में कामयाब हो जाता है उसे 100 में से 100 मार्कस दिए जाते हैं.

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स्मोकिंग करने वालों से भी रहें दूर

धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक तो होता ही है, पर हाल की एक स्टडी में ये बात सामने आई कि स्वस्थ रहने के लिए केवल धूम्रपान से ही नहीं बल्कि धूम्रपान करने वालों से भी हमें दूर रहने की जरूरत है. एक रिपोर्ट में ये बात सामने आई कि हर हफ्ते में कम से कम एक घंटे धूम्रपान के संपर्क में रहने से सांस की समस्याएं हो सकती हैं. जानकारों की माने तो धूम्रपान करने वालों के संपर्क में रहने से भी स्वास्थ संबंधित समस्याएं हो सकती हैं.

इसके अलावा जो लोग कम मात्रा में धूम्रपान करने वाले लोगों को भी इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. इन समस्याओं में जरूरी नहीं कि केवल श्वसन संबंधित परेशानियां हो, बल्कि समग्र रूप से स्वास्थ्य में कमी शामिल हो सकती है.

आपको बता दें कि अमेरिका में हुई इस स्टडी में करीब 7300 धूम्रपान ना करने वाले लोगों को शामिल किया गया था. स्टडी में ये बात सामने आई कि केवल धूम्रपान करने वाले लोगों के संपर्क में रहने से इन सैंपल्स को परेशानियां हुई. सैंपल्स को व्यायाम करने में डेढ़ गुना अधिक मुश्किल पाई गई है और व्यायाम के दौरान या बाद में दोगुना तेज-तेज सांस लेने की समस्या दिखी.

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होमकेयर टिप्स: अलमारी को दें स्मार्ट लुक

घर की अलमारी में आप अपनी सभी जरूरत की चीजों को संभाल कर रखती हैं. ऐसे में आपकी जरूरतों के हिसाब से अलमारी डिजाइन का अच्छा होना भी बहुत जरूरी है. तो चलिए आज हम आपको अलमारी के लेटेस्ट डिजाइन के बारे में बताते हैं. लेटेस्ट फैशन डिजाइन्स की यह अलमारीयां आपके जरूरत और इंटीरियर स्पेस के लिए बिल्कुल परफेक्ट है.

प्रिंटेड वार्डरोब –  यह लेटेस्ट डिजाइन की प्रिंटेड अलमारी भी आजकल काफी ट्रेंड में है. इस तरह की अलमारी से आप अपने बेडरूम की शोभा को बढ़ा सकती हैं. यह अलमारी आपके रूम को स्टाइलिश के साथ-साथ ब्यूटीफुल लुक भी देगी.

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वुडेन वार्डरोब –  यह फैंसी डिजाइन की वुडन अलमारी हर बेडरूम के लिए परफेक्ट है. इस अलमारी में आप अपना हर सामान कम्फर्टेबली रख सकते हैं और अपने बेडरूम की सुन्दरता को बढ़ा सकती हैं.

ज्योमेट्रिकल फौर्म  वार्डरोब –  इस डिजाइन्स की अलमारी देखने में बेहद ही खूबसूरत व ट्रेंडी लगती है. यह अलमारी आपके रूम को स्टाइलिश और मौर्डन लुक देगी. आप इसे अपने बेडरूम के लिए बनवा सकती हैं.

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अपना बेटा : मामाजी को देख क्यों परेशान हो उठे अंजलि और मुकेश

मुकेश यह जान कर हैरान हो गया. सालों पहले जिस मामाजी ने उस से रिश्ता तोड़ लिया था वे अचानक यहां क्यों आ रहे हैं. क्या उन्हें हम से कोई काम है या उन के दिमाग में फिर से टूटे हुए रिश्तों को जोड़ने की बात आ गई है. इसी उधेड़बुन में पड़ा वह अतीत की यादों में खो गया.

मुकेश को याद आया कि जब इंजीनियरिंग का कोर्स करने के लिए उसे दिल्ली जाना पड़ा था तो मम्मीपापा ने होस्टल में रखने के बदले उसे मामा के यहां रखना ज्यादा बेहतर समझा था. उस समय मामाजी की शादी को 2 साल ही बीते थे. उन का एक ही बच्चा था.

मुकेश ने इंजीनियरिंग पास कर ली थी. उस की भी शादी हो गई. अब तक मामाजी के 3 बच्चे हो चुके थे जबकि मुकेश के शादी के 5 साल बाद तक भी कोई बच्चा नहीं हुआ और मामी अगले बच्चे की तैयारी में थीं.

मुकेश एक बच्चे को गोद लेना चाहता था और मामाजी चाहते थे कि उन के आने वाले बच्चे को वह गोद ले ले. मामा के इस प्रस्ताव में मुकेश के मातापिता की भी सहमति थी लेकिन मुकेश व अंजलि इस पक्ष में नहीं थे कि मामा के बच्चों को गोद लिया जाए. इस बात को ले कर मामा और भांजे के बीच का रिश्ता जो टूटा तो आज तक मामा ने अपनी शक्ल उन को नहीं दिखाई.

मुकेश अपने एहसान का बदला चुकाने के लिए या समझो रिश्ता बनाए रखने के बहाने से मामा के बच्चों को उपहार भेजता रहता था. मामा ने उस के भेजे महंगे उपहारों को कभी लौटाया नहीं पर बदले में कभी धन्यवाद भी लिख कर नहीं भेजा.

अतीत की यादों से निकल कर मुकेश तैयार हो कर अपने दफ्तर चला गया. शाम को लौटा तो देखा अंजलि परेशान थी. उस के चेहरे पर अजीब सी मायूसी छाई थी. दोनों बेटों, गगन और रजत को वहां न पा कर वह और भी घबरा सा गया. हालांकि मुकेश समझ रहा था, पर क्या पूछता? जवाब तो वह भी जानता ही था.

अंजलि चाह रही थी कि वह दोनों बेटों को कहीं भेज दे ताकि मामाजी की नीयत का पता चल जाए. उस के बाद बेटों को बुलाए.

मुकेश इस के लिए तैयार नहीं था. उस का मानना था कि बच्चे जवान हो रहे हैं. उन से किसी बात को छिपाया नहीं जाना चाहिए. इसीलिए अंजलि के लाख मना करने के बाद भी मुकेश ने गगन- रजत को बता दिया कि कल यहां मेरे मामाजी आ रहे हैं. दोनों बच्चे पहले तो यह सुन कर हैरान रह गए कि पापा के कोई मामाजी भी हैं क्योंकि उन्होंने तो केवल दादाजी को ही देखा है पर दादी के भाई का तो घर में कभी जिक्र भी नहीं हुआ.

इस के बाद तो गगन और रजत ने अपने पापा के सामने प्रश्नों की झड़ी लगा दी कि मामाजी का घर कहां है, उन के कितने बच्चे हैं, क्याक्या करते हैं, क्या मामाजी के बच्चे भी आ रहे हैं आदिआदि.

मुकेश बेहद संभल कर बच्चों के हर सवाल का जवाब देता रहा. अंजलि परेशान हो बेडरूम में चली गई.

अंजलि और मुकेश दोनों ही रात भर यह सोच कर परेशान रहे कि पता नहीं मामाजी क्या करने आ रहे हैं और कैसा व्यवहार करेंगे.

सुबह अंजलि ने गगन और रजत को यह कह कर स्कूल भेज दिया कि तुम दोनों की परीक्षा नजदीक है, स्कूल जाओ.

इधर मुकेश मामाजी को लेने स्टेशन गया उधर अंजलि दोपहर का खाना बनाने के लिए रसोई में चली गई. अंजलि ने सारा खाना बना लिया लेकिन मामाजी को ले कर वह अभी तक लौटा नहीं. वह अभी यही सोच रही थी कि दरवाजे की घंटी घनघना उठी और इसी के साथ उस का दिल धक से कर गया.

मुकेश ही था, पीछेपीछे मामाजी अकेले आ रहे थे. अंजलि ने उन के पांव छुए. मामाजी ने हालचाल पूछा फिर आराम से बैठ गए और सामान्य बातें करते रहे. उन्होंने चाय पी. खाना खाया. कोई लड़ाई वाली बात ही नहीं, कोई शक की बात नहीं लग रही थी. ऐसा लगा मानो उन के बीच कभी कोई लड़ाई थी ही नहीं. अंजलि जितना पहले डर रही थी उतना ही वह अब निश्चिंत हो रही थी.

खाना खा कर बिस्तर पर लेटते हुए मामाजी बोले, ‘‘पता नहीं क्यों कुछ दिनों से तुम लोगों की बहुत याद आ रही थी. जब रहा नहीं गया तो बच्चों से मिलने चला आया. सोचा, इसी बहाने यहां अपने राहुल के लिए लड़की देखनी है, वह भी देख आऊंगा,’’ फिर हंसते हुए बोले, ‘‘आधा दर्जन बच्चे हैं, अभी से शादी करना शुरू करूंगा तभी तो रिटायर होने तक सब को निबटा पाऊंगा.’’

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अंजलि ने देखा कि मामाजी की बातों में कोई वैरभाव नहीं था. मुकेश भी अंजलि को देख रहा था, मानो कह रहा हो, देखो, हम बेकार ही डर रहे थे.

‘‘अरे, तुम्हारे दोनों बच्चे कहां हैं? क्या नाम हैं उन के?’’

‘‘गगन और रजत,’’ मुकेश बोला, ‘‘स्कूल गए हैं. वे तो जाना ही नहीं चाह रहे थे. कह रहे थे मामाजी से मिलना है. इसीलिए कार से गए हैं ताकि समय से घर आ जाएं.’’

‘‘अच्छा? तुम ने अपने बच्चों को गाड़ी भी सिखा दी. वेरी गुड. मेरे पास तो गाड़ी ही नहीं है, बच्चे सीखेंगे क्या… शादियां कर लूं यही गनीमत है. मैं तो कानवेंट स्कूल में भी बच्चों को नहीं पढ़ा सका. अगर तुम मेरे एक को भी…पढ़ा…’’ मामाजी इतना कह कर रुक गए पर अंजलि और मुकेश का हंसता चेहरा बुझ सा गया.

अंजलि वहां से उठ कर बेडरूम में चली गई.

‘‘कब आ रहे हैं बच्चे?’’ मामाजी ने बात पलट दी.

‘‘आने वाले होंगे,’’ मुकेश इतना ही बोले थे कि घंटी बज उठी. अंजलि दरवाजे की तरफ लपकी. गगनरजत थे.

‘‘मामाजी आ गए…’’ दोनों ने अंदर कदम रखने से पहले मां से पूछ लिया और कमरे में कदम रखते ही पापा के साथ एक अजनबी को बैठा देख कर उन्हें समझते देर नहीं लगी कि यही हैं मामाजी.

‘‘नमस्ते, मामाजी,’’ दोनों ने उन के पैर छू लिए. मुकेश ने हंस के कहा, ‘‘मामाजी, मेरे बेटे गगन और रजत हैं.’’

‘‘वाह, कितने बड़े लग रहे हैं. दोनों कद में बाप से ऊंचे निकल रहे हैं और शक्लें भी इन की कितनी मिलती हैं,’’  इस के आगे मामाजी नहीं बोले.

‘‘मामाजी, मैं आप के लिए आइसक्रीम लाया हूं. मम्मी, ये लो ब्रिक,’’ गगन ने अंजलि को ब्रिक पकड़ा दी.

‘‘अच्छा, तुम्हें कैसे पता कि मामाजी को आइसक्रीम अच्छी लगती है?’’ मुकेश ने पूछा.

‘‘पापा, आइसक्रीम किसे अच्छी नहीं लगती,’’ गगन बोला.

अंजलि ने सब को प्लेटों में आइसक्रीम पकड़ा दी. उस के बाद मामाजी ने दोनों बच्चों से पूछना शुरू किया कि कौन सी क्लास में पढ़ते हो? क्याक्या पढ़ते हो? किस स्कूल में पढ़ने जाते हो? वहां क्याक्या खाते हो?

‘‘बस, मामाजी, अब आप आराम कर लें,’’ अंजलि ने उठते हुए कहा, ‘‘गगनरजत, तुम दोनों कपड़े बदल लो, मैं तुम्हारे कमरे में ही खाना ले कर आती हूं.’’

‘‘मामाजी, आप अभी रहेंगे न हमारे साथ?’’ गगन ने उठतेउठते पूछा.

‘‘हां, 3-4 दिन तो रहूंगा ही.’’

अंजलि के साथ गगन और रजत अपने बेडरूम की तरफ बढ़े.

अंजलि रसोई में जाने लगी तो मामाजी ने मुकेश से पूछा, ‘‘गगन को ही एडोप्ट किया था न तुम ने…’’ मुकेश सकपका गया.

‘‘दोनों को देखने पर बिलकुल नहीं लगता कि इन में एक गोद लिया है,’’ मामाजी ने फिर बात दोहराई थी.

‘‘मामाजी, यह क्या बोल रहे हैं?’’ मुकेश ने हैरत से मामाजी को देखा, ‘‘आप को ऐसा नहीं बोलना चाहिए. वह भी बच्चों के सामने?’’

बच्चे मामाजी की बात सुन कर रुक गए थे. अंजलि के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. गगन तो सन्न ही रह गया. रजत को जैसे होश सा आया.

‘‘मम्मी, मामाजी किस की बात कर रहे हैं? कौन गोद लिया है?’’

अंजलि तो मानो बुत सी खड़ी रह गई थी. सालों पहले कहे गए मामाजी के शब्द, ‘गैर, गैर होते हैं अपने अपने, मैं ऐसा साबित कर दूंगा,’ उस की समझ में अब आ रहे थे. तो इतने सालों बाद मामाजी इसलिए मेरे घर आए हैं कि मेरा बसाबसाया संसार उजाड़ दें.

गगन अभी तक खामोश मामाजी को ही देख रहा था. अंजलि को जैसे होश आया हो, ‘‘कुछ नहीं, बेटे, किसी और गगन की बात कर रहे हैं. तुम अपने कमरे में जाओ.’’

मुकेश के पांव जड़ हो रहे थे.

‘‘अरे, अंजलि बेटे, तुम ने गगन को बताया नहीं कि इस को तुम अनाथाश्रम से लाई थीं. उस के बाद रजत पैदा हुआ था…’’ मामाजी रहस्यमय मुसकान के साथ बोले.

‘‘यह क्या कह रहे हैं, मामाजी?’’ मुकेश विचलित होते हुए बोला.

‘‘देखो मुकेश, आज नहीं तो कल किसी न किसी तरह गगन को सच का पता चल ही जाएगा तो फिर तुम क्यों छिपा रहे हो इस को.’’

गगन जहां खड़ा था वहीं बुत की तरह खड़ा रहा, पर उस की आंखें भर आईं, क्योंकि मम्मीपापा भी मामाजी को चुप कराने की ही कोशिश कर रहे थे. यानी वह जो कुछ कह रहे हैं वह सच… रजत हैरानपरेशान सब को देख रहा था. गगन पलट कर अपने बेडरूम में चला गया. रजत उस के पीछेपीछे चला आया. पूरे घर का माहौल पल भर में बदल गया था. कपड़े बदल कर गगन सो गया. उस ने खाना भी नहीं खाया.

‘‘मम्मी, गगन रोए जा रहा है, आज वह दोस्तों से मिलने भी नहीं गया. पहले कह रहा था कि मुझे एक पेपर लेने जाना है.’’

अंजलि की हिम्मत नहीं हुई गगन से कुछ भी पूछे. रात के खाने के लिए अंजलि ने ही नहीं चाहा कि गगन व रजत मामाजी के पास बैठ कर खाना खाएं. मामाजी टीवी देखने में मस्त थे. ऐसा लग रहा था कि उन का मतलब हल हो गया. मुकेश भी ज्यादा बात नहीं कर रहा था. उसे ध्यान आ रहा था उस झगड़े का, जो मम्मीपापा, मामामामी ने उस के साथ किया था. दरअसल, वे चाहते थे कि हमारा बच्चा नहीं हुआ तो मामी के छोटे बच्चे को गोद ले लें. पर अंजलि चाहती थी कि हम उस बच्चे को गोद लें जिस के मातापिता का पता न हो, ताकि कोई चांस ही न रहे कि बच्चा बड़ा हो कर अपने असली मातापिता की तरफ झुक जाए. वह यह भी चाहती थी कि जिसे वह गोद ले वह बच्चा उसे ही अपनी मां समझे.

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मुकेश यह भी समझ रहा था कि मामाजी की नजर उस के और अंजलि के पैसों पर थी. उन्हें लग रहा था कि उन का एक बच्चा भी अगर मेरे घर आ गया तो बाकी के परिवार का मेरे घर पर अपनेआप हक हो जाएगा. उसे आज भी याद है जब मामाजी की हर चाल नाकाम रही तो खीज कर वह चिल्ला पड़े थे, ‘अपने लोगों को दौलत देते हुए एतराज है पर गैरों में बांट कर खुश हो, तो जाओ आज के बाद हमारा तुम से कोई वास्ता नहीं.’

मामाजी जब अंतिम बार मिले तो बोले थे, ‘कान खोल कर तुम दोनों सुन लो, गैर गैर होते हैं, अपने अपने ही. और मैं यह साबित कर दूंगा.’

‘और आज यही साबित करने आए हैं. लगता है गगन को गैर साबित कर के ही जाएंगे, लेकिन मैं मामाजी की यह इच्छा पूरी नहीं होने दूंगा,’ सोचता हुआ मुकेश करवट बदल रहा था.

इधर अंजलि की आंखों से नींद जैसे गायब थी. जब रहा नहीं गया तो उठ कर वह गगन के कमरे की तरफ चल दी. उस का अंदाजा सही था, गगन जाग रहा था. रजत भी जागा हुआ था.

‘‘तू पागल है, गगन,’’ रजत बोला, ‘‘मामाजी ने कहा और तू ने उसे सच मान लिया. मामाजी हमारे ज्यादा अपने हैं या मम्मीपापा.’’

अंजलि के पीछे मुकेश भी आ गए. दोनों गगन के कमरे में अपराधियों की तरह आ कर बैठ गए. अंजलि ने गगन को देखा. उस की आंखें भरी हुई थीं.

‘‘गगन, तू ने खाना क्यों नहीं खाया?’’

गगन कुछ बोला नहीं. बस, मां की नजरों में देखता रहा.

‘‘ऐसे क्या देख रहा है? मैं क्या गैर हूं?’’ अंजलि रो पड़ी. उस के शब्दों में अपनापन और रोब दोनों थे, ‘‘मम्मी हूं मैं तेरी…कोई भी उठ कर कुछ कह देगा और तू मान लेगा? मेरी बात पर यकीन नहीं है? उस की बात सुन रहा

है जो सालों बाद अचानक उठ कर चला आया.

‘‘बेटे, अगर हम तेरे मातापिता न होते तो क्या तुम्हें इतने प्यार से रखते? क्या तुम्हें कभी महसूस हुआ कि हम ने तुम्हें रजत से कम चाहा है,’’ अंजलि के आंसू रुक ही नहीं रहे थे. फिर मुकेश की तरफ देख कर बोली, ‘‘तुम्हारे मामा को किसी का बसता घर देख खुशी नहीं होती. कहीं भी उलटीसीधी बातें बोलने लगते हैं. मालूम नहीं कब जाएंगे.’’

गगन नजरें झुकाए आंसू टपकाता रहा. उस का चेहरा बनबिगड़ रहा था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये अचानक तूफान कहां से आ गया. कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जीवन में इस तरह के किसी तूफान का सामना करना पड़ेगा.

‘‘बेटे, मैं कभी तुम्हें नहीं बताता पर आज स्थिति ऐसी है कि बताना ही पड़ेगा,’’ मुकेश ने कहा, ‘‘अगर हम तुम्हें पराया जानते तो मैं अपनी वसीयत में सारी प्रापर्टी, बैंकबैलेंस सबकुछ, तुम तीनों के नाम न करता.’’

‘‘और मैं ने भी अपनी वसीयत में अपने हिस्से की सारी प्रापर्टी तुम दोनों के नाम ही कर दी है, ताकि कभी भी झगड़ा न हो सके. हमारे किसी बेटे का, अगर कभी दिल बदल भी जाए तो कानूनी फैसला न बदले,’’ अंजलि बोली, ‘‘तुम मामाजी की बातों पर ध्यान मत दो, बेटे.’’

गगन खामोशी से दोनों की बातें सुन रहा था. उसे लगा कि अगर वह कुछ भी बोला तो सिर्फ रुलाई ही बाहर आएगी.

सुबह अंजलि ने रजत को झकझोरा तो उस की नींद खुली.

‘‘गगन कहां है?’’ अंजलि की आवाज में घबराहट थी.

‘‘कहां है, मतलब? वह तो यहीं सो रहा था?’’ रजत बोला.

‘‘बाथरूम में होगा न?’’ रजत ने अधमुंदी आंखों से कहा.

‘‘कहीं नहीं है वह. पूरा घर छान लिया है मैं ने.’’

अंजलि लगभग चीख रही थी, ‘‘तू सोता रहा और तेरी बगल से उठ कर वह चला गया. बदतमीज, तुझे पता ही नहीं चला.’’

‘‘मम्मी, मुझे क्या पता… मम्मी, आप बेकार परेशान हो रही हैं, यहीं होगा, मैं देखता हूं,’’ रजत झटके से बिस्तर से उठ गया पर मन ही मन वह भी डर रहा था कि कहीं मम्मी की बात सच न हो.

‘‘कहीं घूमने निकल गया होगा, आज रविवार जो है? आ जाएगा,’’ मुकेश ने अंजलि को बहलाया. पर वह जानता था कि वह खुद से भी झूठ बोल कर तसल्ली दे रहा है.

अंजलि का देर से मन में रुका गुबार सहसा फूट पड़ा. वह फफक पड़ी. उस का मन किया कि मामाजी को कहे कि हो गई तसल्ली? पड़ गई दिल में ठंडक? साबित कर दिया तुम ने. अब जाओ, यहां से दफा हो जाओ? पर प्रत्यक्ष में कुछ कह नहीं पाई.

‘‘दोपहर हो चुकी है. एक फोन तक नहीं किया उस ने जबकि पहले कभी यों बिना बताए वह कहीं जाता ही नहीं था,’’ मुकेश भी बड़बड़ाए. उन की आंखों से भी अनजानी आशंका से नमी उतर रही थी.

हर फोन पर मुकेश लपकता. अंजलि की आंखों में एक उम्मीद जाग जाती पर फौरन ही बुझ जाती. इस बीच मामाजी अपने घर वालों से फोन पर लंबी बातें कर के हंसते रहे. साफ लग रहा था कि वह इन दोनों को चिढ़ा रहे हैं.

अंधेरा हो गया, रजत लौटा, पर खाली हाथ. उस का चेहरा उतर गया था. वह सोच रहा था कि गगन कितना बेवकूफ है. कोई कुछ कहेगा तो हम उसे सच मान लेंगे?

तभी मामाजी की आवाज सुनाई दी, ‘‘आजा, आजा, मेरे बेटे, आजा…बैठ…’’

अंजलि, मुकेश और रजत बाहर के दरवाजे की तरफ लपके. गगन मामाजी के पास बैठ रहा था.

‘‘कहां रहा सारा दिन? कहां घूम के आया? पानी पीएगा? अंजलि बेटे, इसे पानी दे, थकाहारा आया है,’’ मामा की आवाज में चटखारे लेने वाला स्वर था.

अंजलि तेजी से गगन की तरफ आई और उसे बांह से पकड़ कर मामाजी के पास से हटा दिया.

‘‘कहां गया था?’’ अंजलि चीखी थी, ‘‘बता के क्यों नहीं गया? ऐसे जाते हैं क्या?’’ और गुस्से से भर कर उसे थप्पड़ मारने लगी और फिर फफक- फफक कर रो पड़ी.

‘‘गगन, तेरा गुस्सा मम्मी पर था न, तो मुझे क्यों नहीं बता कर गया,’’ रजत बोला, ‘‘मैं ने तेरा क्या बिगाड़ा था?’’

‘‘ऐसे भी कोई चुपचाप निकलता है घर से, हम क्या इतने पराए हो गए?’’ मुकेश की आवाज भी भर्राई हुई थी.

सभी की दबी संवेदनाएं फूट पड़ी थीं.

‘‘मामाजी, आप कुछ कह रहे थे. कहिए न…’’ गगन ने अपने आंसू पोंछे… पर अंजलि ने पीछे से गगन को खींच लिया. पागल सी हो गई थी अंजलि, ‘‘कुछ नहीं कह रहे थे. तू जा अपने कमरे में. जो कुछ सुनना है मुझ से सुन. मैं तेरी मां हूं, ये तेरे पिता हैं और ये तेरा भाई.’’

मुकेश अंजलि को पकड़ रहा था.

‘‘मामाजी, आप कह रहे थे मैं इन का गोद लिया बेटा हूं, है न…’’

‘‘नहीं, तुम मेरे बेटे हो,’’ अंजलि ने गगन को जोर से झटक दिया.

गगन अंजलि के कंधे को थाम कर बोला, ‘‘मम्मी, मैं तो मामाजी को यही समझा रहा हूं कि मैं आप का बेटा हूं. मम्मी, अपने पैदा किए बच्चे को तो हर कोई पालता है, पर एक अनाथ बच्चे को इतना ढेर सारा प्यार दे कर तो शायद ही कोई औरत पालती होगी. उस से बड़ी बात तो यह है कि आप ने रजत और मुझ में कोई फर्क नहीं रखा, तो मैं क्यों मानूं मामाजी की बात.

‘‘आप ही मेरी मां हैं,’’ गगन ने अंजलि को अपनी बांहों में समेट लिया और मामाजी से कहा, ‘‘मामाजी, आप ने क्या सोचा था कि मुझे जब पता चलेगा कि मैं अनाथाश्रम से लाया गया हूं तो मैं अपनी असली मां को ढूंढ़ने निकल पड़ूंगा? मामाजी, क्यों ढूंढं़ ू मैं उस औरत को जिस को मेरी जरूरत कभी थी ही नहीं. उस ने मुझे पैदा कर के मुझ पर एहसान नहीं किया बल्कि मम्मीपापा ने मुझे पालापोसा, मुझे नाम दिया, मुझे भाई दिया, मुझे एक घर दिया, समाज में मुझे एक जगह दी. इन का एहसान मान सकता हूं मैं. वरना आज मैं सड़ रहा होता किसी अनाथाश्रम के मैलेकुचैले कमरों में.’’

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रजत ने खुशी से गगन का हाथ दबा दिया. मुकेश ने गगन के सिर पर हाथ फिराया. अंजलि, मुकेश और रजत की आंखों में आंसू छलक आए. सब ने तीखी नजरों से मामाजी को देखा.

अंजलि तो नहीं बोली पर मुकेश से रहा नहीं गया. बोले, ‘‘क्यों मामाजी, आप तो गैर को गैर साबित करने आए थे न? और आप, आप तो मेरे अपने थे, तो आप ने गैरों सी दुश्मनी क्यों निभाई?’’

गगन अंजलि के गले से लिपट गया. अंजलि के आंसू फिर निकल आए.

अंजलि जानती थी अब उसे मामा जैसे किसी व्यक्ति से डरने की कोई जरूरत नहीं है. अब सच में उस के दोनों बेटे अपने ही हैं.

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