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वनटाइम पार्टनर जब पीछे पड़ जाए

घटना दिल्ली के नामी कालेज की है. अजय और निया एक ही कालेज में थे. दोनों के कोर्सेस अलग थे लेकिन अन्य सोसाइटी के दोस्तों की तरह ही उन दोनों की मुलाकात हुई. मुलाकात सुट्टा पौइंट से शुरू हुई और आधीआधी रात साथ घूमने तक पहुंच गई. अजय कालेज के होस्टल में रहता था तो आसानी से गार्ड को बहलाफुसला कर निकल जाता था.

दूसरी ओर निया सहेली के यहां जाने का कह कर घर से निकल जाती. दोनों की बातें मिनटों और मिनटों से घंटों में बदल गईं. निया अकसर अजय को अपने घर भी बुलाती थी. लेकिन वह उसे घर तब बुलाया करती जब घर पर कोई और नहीं होता था. अजय को ज्यादा देर नहीं लगी निया को सैक्स के लिए अप्रोच करने में.

जब अजय ने निया से सैक्स के लिए पूछा तो वह झट से मान गई. अजय की तरफ से निया के लिए कुछ खास फीलिंग्स नहीं थीं लेकिन निया शायद अजय को चाहने लगी थी. उन दोनों ने सैक्स किया जिस के एकदो दिनों बाद तक तो सब ठीकठाक ही चल रहा था. दोनों की शारीरिक जरूरत भी पूरी हो गई और कालेज में किसी को इस बारे में भनक भी नहीं लगी. निया अब अजय को अलग ही नजर से देखने लगी थी. उस से गर्लफ्रैंड जैसा व्यवहार करने लगी थी, हर समय उस से ही बात करने को कहती.

परेशानी तब शुरु हुई जब अजय ने अचानक से ही निया को इग्नोर करना शुरू कर दिया. वह निया को देखता, ‘हाय’ कहता और वहां से चल देता. अब वह उस की कौल भी पिक नहीं कर रहा था न ही उस से घंटों चैटिंग कर रहा था. अजय का ऐसा करने का कारण निया का उस का जरूरत से ज्यादा पीछे पड़ना था.

आखिर, वे दोनों कभी रिलेशनशिप में आए जो नहीं थे. अजय बस निया को फ्रैंड्स विद बैनिफिट्स या कहें वन नाइट स्टैंड समझता था, लेकिन निया का उस से उम्मीदें लगाना, दूसरी लड़कियों से बात करने से रोकना और उस की लाइफ को कंट्रोल करने की कोशिश करना अजय को खटक रहा था.

लेकिन आगे जो हुआ वह तो खुद अजय ने भी नहीं सोचा था. निया ने अपने और अजय के दोस्तों से जा कर कहा कि वह प्रैग्नैंट है और इस बच्चे का बाप अजय है, जिस ने उस के साथ सैक्स कर उसे छोड़ दिया है. धीरेधीरे जंगल में आग की तरह यह बात कालेज में फैल गई.

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अजय और निया के दोस्तों के साथसाथ उन्हें जानने व न जानने वालों को भी उन दोनों के बारे में सबकुछ पता चल गया. सभी के सामने अजय की छवि एक धोखेबाज और लड़कीबाज लड़के की बन गई. सभी अजय को मैसेज और कौल कर कहने लगे कि आखिर उस ने ऐसा क्यों किया, यह सब करने की वजह क्या थी. कुछ ने तो उसे उलटीसीधी बातें भी कहीं और गालियां भी दीं. यह सब अजय के लिए असहनीय हो गया. वह खुद को कमरे में बंद कर के रहने लगा. उस ने अपने दोस्तों से बातचीत बंद कर दी. अजय अब डिप्रैस्ड हो चुका था. वह कालेज जाना छोड़ चुका था.

फिजिकल होने से पहले

किसी भी लड़की या लड़के से बात करने या एकदो बार मिलनेजुलने भर से वह आप के पीछे नहीं पड़ जाता. पर परेशानी तब आती है जब आप दोनों फिजिकली करीब आते हैं. फिजिकली क्लोज होने से पहले यह जान लें कि सामने वाला भी इस क्लोजनैस को उसी तरह से ले रहा है जिस तरह आप ले रहे हैं या नहीं. हो सकता है यह आप के लिए केवल एक फ्लिंग हो, टाइमपास हो लेकिन दूसरे व्यक्ति के लिए एक सीरियस रिलेशनशिप की तरफ बढ़ना हो.

खुद से पूछें कि आप जिस के साथ फिजिकल हो रहे हैं उस के साथ आप सेफ फील कर रहे हैं या नहीं क्या आप उसे रिलेशनशिप के लिए नहीं कह सकते हैं? आप जो चाहते हैं वह साफ शब्दों में पूछ सकते हैं या नहीं जवाब यदि ‘नहीं’ हो तो दूर हट जाएं और चीजों को उसी वक्त खत्म करें. दूर इसलिए क्योंकि अगर सामने वाला व्यक्ति आप से फिजिकल के साथसाथ इमोशनल कनैक्टिविटी भी चाहता है जोकि आप देना नहीं चाहते तो यकीनन ही चीजें आगे चल कर कौंप्लिकेटिड हो जाएंगी.

यदि आप को अपने फिजिकल पार्टनर से इस तरह की वाइब्स आएं कि वह आप दोनों के बीच हुई एक्टिविटीज के बारे में किसी को बता सकता है या पहले भी ऐसा कुछ कर चुका है तो अपनी इमेज की खातिर ही उस से बच कर रहें.

पीछा छुड़ाएं ऐसे

पीछा किस तरह छुड़ाएं, इस से पहले यह जान लेना जरूरी है कि पीछा किस तरह न छुड़ाएं. अजय ने निया से पीछा छुड़ाने के लिए उसे एकदम से ही इग्नोर करना शुरू कर दिया, जोकि एक गलत फैसला या कहें गलत तरीका था. किसी को भी एकदम से इग्नोर होना न पसंद है और न ही उस से यह सहन होता है. अगर आप को किसी से बात करना अब नहीं पसंद तो उसे एकदम से इग्नोर करनेके बजाय धीरेधीरे बात करना कम करें.

किसी भी इंसान को इस कन्फ्यूजन में रहना नहीं पसंद कि वह किसी की जिंदगी में कहां स्टैंड करता है या क्या माने रखता है. हमेशा अपनी फीलिंग्स और सोच व्यक्ति के सामने साफ शब्दों में रखें. अगर आप फिजिकल रिलेशनशिप से ज्यादा कुछ नहीं चाहते या अब उस पार्टनर के साथ किसी भी तरह का कोई रिलेशन नहीं चाहते तो उसे यह बात आराम से बैठ कर समझाइए बजाय उसे इग्नोर करने के.

आप की तरफ से चाहे उस पार्टनर के लिए कुछ न हो मगर उस की तरफ से है, तो उन फीलिंग्स की रिस्पैक्ट कीजिए. लेकिन, इस चक्कर में ‘लेट्स बी जस्ट फ्रैंड्स’ वाली गलती मत कीजिए. फिजिकल रिलेशनशिप के बाद सिर्फ दोस्त बन कर रहना मुश्किल या कहें बेहद मुश्किल है. कोशिश करें कि एकदूसरे से टकराएं कम और अपनेअपने अलग रास्तों पर चलें.

फेसबुक या इंस्टाग्राम पर अपनी नई गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड की तसवीर लगा कर या किसी और तरीके से उस पार्टनर को चिढ़ाने की या जलाने की कोशिश न करें. ऐसी चीजें व्यक्ति को आपराधिक प्रवृत्ति अपनाने को उकसाती हैं. उस पार्टनर को अपने अकाउंट्स से ब्लौक कर दें.

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दिशा की दृष्टीभ्रम

खुशी से दिशा के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. फ्रैंड्स से बात करते हुए वह चिडि़यों की तरह चहक रही थी. उस की आवाज की खनक बता रही थी कि बहुत खुश है. यह स्वाभाविक भी था. मंगनी होना उस के लिए छोटी बात नहीं थी.

मंगनी की रस्म के लिए शहर के नामचीन होटल को चुना गया था. रात के 9 बज गए थे. सारे मेहमान भी आ चुके थे. फ्रैंड्स भी आ गई थीं. लेकिन मानस और उस के घर वाले अभी तक नहीं आए थे.

देर होते देख उस के पापा घबरा रहे थे. उन्होंने दिशा को मानस से पूछने के लिए कहा तो उस ने तुरंत उसे फोन लगाया. मानस ने बताया कि वे लोग ट्रैफिक में फंस गए हैं. 20-25 मिनट में पहुंच जाएंगे.

दिशा ने राहत की सांस ली. मानस के आने में देर होते देख न जाने क्यों उसे डर सा लगने लगा था. वह सोच रही थी कि कहीं उसे उस के बारे में कोई नई जानकारी तो नहीं मिल गई. लेकिन उस ने अपनी इस धारणा को यह सोच कर पीछे धकेल दिया कि वह आ तो रहा है. कोई बात होती तो टै्रफिक में फंसा होने की बात क्यों बताता.

अचानक उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. उस ने ‘हैलो’ कहा तो परिमल की आवाज आई, ‘‘2 दिन पहले ही जेल से रिहा हुआ हूं. तुम्हारा पता किया तो जानकारी मिली कि आज मानस से तुम्हारी मंगनी होने जा रही है. मैं एक बार तुम्हें देखना और तुम से बात करना चाहता हूं. होटल के बाहर खड़ा हूं. 5 मिनट के लिए आ जाओ, नहीं तो मैं अंदर आ जाऊंगा.’’

दिशा घबरा गई. जानती थी कि परिमल अंदर आ गया तो उस की फजीहत हो जाएगी. मानस को सच्चाई का पता चल गया तो वह उस से मंगनी नहीं करेगा.

उसे परिमल से मिल लेने में ही भलाई नजर आई. लोगों की नजर बचा कर वह होटल से बाहर चली गई.

गेट से थोड़ी दूर आगे परिमल खड़ा था. उस के पास जा कर दिशा गुस्से में बोली, ‘‘क्यों परेशान कर रहे हो? बता चुकी हूं कि मैं तुम से किसी भी हाल में शादी नहीं कर सकती.’’

‘‘तुम ने मेरी जिंदगी बरबाद की है, फिर भी मैं तुम्हें परेशान नहीं कर सकता. मैं तो तुम से सिर्फ यह जानना चाहता हूं कि मेरी दुर्दशा करने के बाद तुम्हें कभी पछतावा हुआ या नहीं?’’

दिशा ने रूखे स्वर में जवाब दिया, ‘‘कैसा पछतावा? जो कुछ भी हुआ उस में सारा दोष तुम्हारा था. मैं ने तो पहले ही आगाह किया था कि मुझे बदनाम मत करो. आज के बाद अगर तुम ने मुझे फिर कभी बदनाम किया तो याद रखना पहली बार 3 साल के लिए जेल गए थे. अब उम्र भर के लिए जाओगे.’’

अपनी बात कह कर दिशा बिना परिमल का जवाब सुने होटल के अंदर आ गई. उस की फ्रैंडस उसे ढूंढ रही थीं. एक ने पूछ लिया, ‘‘कहां चली गई थी? तेरे पापा पूछ रहे थे.’’

स्थिति संभालने के लिए दिशा ने बाथरूम जाने का बहाना कर दिया. पापा को भी बता दिया. फिर राहत की सांस ले कर सोफे पर बैठ गई.

उसे विश्वास था कि परिमल अब कभी परेशान नहीं करेगा और वह मानस के साथ आराम की जिंदगी गुजारेगी.

परिमल से दिशा की पहली मुलाकात कालेज में उस समय हुई थी, जब वह बीटेक कर रही थी. परिमल भी उसी कालेज से बीटेक कर रहा था. वह उस की पर्सनैल्टी पर मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकी थी. लंबी चौड़ी कद काठी, आकर्षक चेहरा, गोरा रंग, स्मार्ट और हैंडसम.

मन ही मन उस ने ठान लिया था कि एक न एक दिन उसे पा कर रहेगी, चाहे कालेज की कितनी भी लड़कियां उस के पीछे पड़ी हों.

दरअसल, उसे पता चला था कि कई लड़कियां उस पर जान न्योछावर करती हैं. यह अलग बात थी कि उस ने किसी का भी प्रेम प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया था.

प्यारमोहब्बत के चक्कर में वह अपनी पढ़ाई खराब नहीं करना चाहता था. पढ़ाई में वह शुरू से ही मेधावी था.

एक ही कालेज में पढ़ने के कारण दिशा उस से पढ़ाईलिखाई की ही बात करती थी. कई बार वह कैंटीन में उस के साथ चाय भी पी चुकी थी.

एक दिन कैंटीन में परिमल के साथ चाय पीते हुए उस ने कहा, ‘‘इन दिनों बहुत परेशान हूं. मेरी मदद करोगे तुम्हारा बड़ा अहसान होगा.’’

‘‘परेशानी क्या है?’’ परिमल ने पूछा.

‘‘कहते हुए शर्म आ रही है पर समाधान तुम्हें ही करना है. इसलिए परेशानी तो बतानी ही पडे़गी. बात यह है कि पिछले 4-5 दिनों से तुम रातों में मेरे सपनों में आते हो और सारी रात जगाए रहते हो.

‘‘दिन में भी मेरे दिलोंदिमाग में तुम ही रहते हो. शायद इसे ही प्यार कहते हैं. सच कहती हूं परिमल तुम मेरा प्यार स्वीकार नहीं करोगे तो मैं जिंदा लाश बन कर रह जाऊंगी.’’

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परिमल ने तुरंत जवाब नहीं दिया. उस ने कुछ सोचा फिर कहा, ‘‘यह तो पता नहीं कि तुम मुझे कितना चाहती हो, पर यह सच है कि तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो.’’

दिशा के चेहरे की मुसकान का सकारात्मक अर्थ निकालते हुए उस ने आगे कहा, ‘‘मैं भी तुम्हारा प्यार पाना चाहता हूं. लेकिन मैं ने इस डर से कदम आगे नहीं बढ़ाए कि तुम अमीर घराने की हो. तुम्हारे पापा रिटायर जज हैं. भाई पुलिस में बड़े अधिकारी हैं. धनदौलत की कमी नहीं है.’’

दिशा उस की बातों को बडे़ मनोयोग से सुन रही थी. परिमल ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘मैं गरीब परिवार से हूं. पिता मामूली शिक्षक हैं. ऊपर से उन्हें 2 जवान बेटियों की शादी भी करनी है. यह  सच है कि तुम अप्सरा सी सुंदर हो. कोई भी अमीर युवक तुम से शादी कर के अपने आप को भाग्यशाली समझेगा. तुम्हारे घर वाले तुम्हारा हाथ भला मेरे हाथ में क्यों देंगे?’’

दिशा तुरंत बोली, ‘‘इतनी सी बात के लिए डर रहे हो? मुझ पर भरोसा रखो. हमारा मिलन हो कर रहेगा. हमें एक होने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती. तुम केवल मेरा प्यार स्वीकार करो, बाकी सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दो.’’

दिशा ने समझाया तो परिमल ने उस का प्यार स्वीकार कर लिया. उस के बाद दोनों को जब भी मौका मिलता कभी पार्क में, कभी मौल में तो कभी किसी रेस्तरां में जा कर घंटों प्यारमोहब्बत की बातें करते.

सारा खर्च दिशा की करती थी. परिमल खर्च करता भी तो कहां से? उसे सिर्फ 50 रुपए प्रतिदिन पौकेट मनी मिलती थी. उसी में घर से कालेज आनेजाने का किराया भी शामिल था.

2 महीने में ही दोनों का प्यार इतना अधिक गहरा हो गया कि एकदूसरे में समा जाने के लिए व्याकुल हो गए. अंतत: एक दिन दिशा परिमल को अपनी फ्रैंड के फ्लैट पर ले गई.

दिशा का प्यार पा कर परिमल उस का दीवाना हो गया. दिनरात लट्टू की तरह उस के आगेपीछे घूमने लगा. नतीजा यह हुआ कि पढ़ाई से मन हट गया और उसे दिशा के साथ उस की फ्रैंड के फ्लैट पर जाना अच्छा लगने लगा.

सहेली के मम्मीपापा दिन में औफिस में रहते थे. इसलिए उन्हें परेशानी नहीं होती थी. फ्रैंड तो राजदार थी ही.

इस तरह दोनों एक साल तक मौजमस्ती करते रहे. फिर अचानक दिशा को लगा कि परिमल के साथ ज्यादा दिनों तक रिश्ता बनाए रखने में खतरा है. वजह यह कि वह उस से शादी की उम्मीद में था.

दिशा ने परिमल से मिलनाजुलना बंद कर दिया. उस ने परिमल को छोड़ कर कालेज के ही एक छात्र वरुण से तनमन का रिश्ता जोड़ लिया. वरुण बहुत बड़े बिजनैसमैन का इकलौता बेटा था.

सच्चाई का पता चलते ही परिमल परेशान हो गया. वह हर हाल में दिशा से शादी करना चाहता था. लेकिन दिशा ने उसे बात करने का मौका ही नहीं दिया था. दिशा का व्यवहार देख कर परिमल ने कालेज में उसे बदनाम करना शुरू कर दिया. मजबूर हो कर दिशा को उस से मिलना पड़ा.

पार्क में परिमल से मिलते ही दिशा गुस्से में चीखी, ‘‘मुझे बदनाम क्यों कर रहे हो. मैं ने कभी कहा था कि तुम से शादी करूंगी?’’

‘‘अपना वादा भूल गईं. तुम ने कहा था न कि हमारा मिलन हो कर रहेगा. तभी तो तुम्हारी तरफ कदम बढ़ाया था.’’ परिमल ने उस का वादा याद दिलाया.

‘‘मैं ने मिलन की बात की थी, शादी की नहीं. मेरी नजरों में तन का मिलन ही असल मिलन होता है. मैं ने अपना सर्वस्व तुम्हें सौंप कर अपना वादा पूरा किया था, फिर शादी के लिए क्यों पीछे पड़े हो? तुम छोटे परिवार के लड़के हो, इसलिए तुम से किसी भी हाल में शादी नहीं कर सकती.’’

परिमल शांत बैठा सुन रहा था. उस के चेहरे पर तनाव था और मन में गुस्सा. लेकिन उस सब की चिंता किए बगैर दिशा बोली, ‘‘तुम अच्छे लगे थे, इसीलिए संबंध बनाया था. अब हम दोनों को अपनेअपने रास्ते चले जाना चाहिए. वैसे भी मेरी जिंदगी में आने वाले तुम पहले लड़के नहीं हो. मेरी कई लड़कों से दोस्ती रही है. मैं सब से थोड़े ही शादी करूंगी? अगर आज के बाद मुझे कभी भी परेशान  करोगे तो तुम्हारे लिए ठीक नहीं होगा. बदनामी से बचने के लिए मैं कुछ भी कर सकती हूं.’’

दिशा का लाइफस्टाइल जान कर परिमल को बहुत गुस्सा आया. इतना गुस्सा कि उस के वश में होता तो उस का गला दबा देता. जैसेतैसे गुस्से को काबू कर के उस ने खुद को समझाया. लेकिन सब की परवाह किए बिना दिशा उठ कर चली गई.

दिशा ने भले ही परिमल से बुरा व्यवहार किया, लेकिन उस ने उस की आंखों में गुस्से को देखा था, इसलिए उसे डर लग रहा था. उसे लगा कि परिमल अगर शांत नहीं बैठा तो उस की जिंदगी में तूफान आ सकता है.  वह बदनाम नहीं होना चाहती थी. इसलिए उस ने भाई की मदद ली. उस का भाई पुलिस में उच्च पद पर था, उसे चाहता भी था.

नमक मिर्च लगा कर उस ने परिमल को खलनायक बनाया और भाई से गुजारिश की कि परिमल को किसी भी मामले में फंसा कर  जेल भिजवा दे. फलस्वरूप परिमल को गिरफ्तार कर लिया गया. उस पर इल्जाम लगाया गया कि उस ने कालेज की एक लड़की की इज्जत लूटने की कोशिश की थी.

अदालत में सारे झूठे गवाह पेश कर दिए गए. पुलिस का मामला था, सो आरोपी लड़की भी तैयार कर ली गई. अदालत में उस का बयान हुआ तो 2-3 तारीख पर ही परिमल को 3 वर्ष की सजा हो गई.

परिमल हकीकत जानता था, लेकिन चाह कर भी वह कुछ नहीं कर सकता था. लंबी लड़ाई के लिए उस के पास पैसा भी नहीं था. उस ने चुपचाप सजा काटना मुनासिब समझा.

इस से दिशा ने राहत की सांस ली. साथ ही उस ने अपना लाइफस्टाइल भी बदलने का फैसला कर लिया. क्योंकि वह यह सोच कर डर गई थी कि परिमल जैसा कोई और उस की जिंदगी में आ गया तो वह घर परिवार और समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी.

उस के दुश्चरित्र होने की बात पापा तक पहुंच गई तो वह उन की नजर में गिर जाएगी. पापा उसे इतना चाहते थे कि हर तरह की छूट दे रखी थी. उस के कहीं आनेजाने पर भी कोई पाबंदी नहीं थी. यहां तक कि उन्होंने कह दिया था कि अगर उसे किसी लड़के से प्यार हो गया तो उसी से शादी कर देंगे, बशर्ते लड़का अमीर परिवार से हो.

मम्मी थीं नहीं, 7 साल पहले गुजर गई थीं. भाभी अपने आप में मस्त रहती थीं.

दिशा जब 12वीं में पढ़ती थी तो एक लड़के के प्रेम में आ कर उस ने अपना सर्वस्व सौंप दिया था. वह नायाब सुख से परिचित हुई तो उसे ही सच्चा सुख मान लिया.

वह बेखौफ उसी रास्ते पर आगे बढ़ती गई. नएनए साथी बनते और छूटते गए. वह किसी एक की हो कर नहीं रहना चाहती थी.

पहली बार परिमल ने ही उस से शादी की बात की थी. जब वह नहीं मानी तो उस ने उसे खूब बदनाम भी किया था.

वह बदनामी की जिंदगी नहीं जीना चाहती थी. इसलिए परिमल के जेल में रहते परिणय सूत्र में बंध जाना चाहती थी. तब उस की जिंदगी में वरुण आ चुका था.

परिमल के जेल जाने के 6 महीने बाद दिशा ने जब बीटेक कर लिया तो उस ने वरुण से अपने दिल की बात कही, ‘‘चोरीचोरी प्यार मोहब्बत का खेल बहुत हो गया. अब शादी कर के तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं.’’

वरुण दिशा की तरह इस मैदान का खिलाड़ी था. उस ने शादी से मना कर दिया, साथ ही उस से रिश्ता भी तोड़ दिया.

दिशा को अपने रूप यौवन पर घमंड था. उसे लगता था कि कोई भी युवक उसे शादी करने से मना नहीं करेगा. वरुण ने मना कर दिया तो आहत हो कर उस ने शादी से पहले अपने पैरों पर खड़ा होने का निश्चय किया.

पापा से नौकरी की इजाजत मिल गई तो उस ने जल्दी ही जौब ढूंढ लिया. जौब करते हुए 2 महीने ही बीते थे कि एक पार्टी में उस का परिचय रंजन से हुआ, जो पेशे से वकील था. उस के पास काफी संपत्ति थी. शादी के ख्याल से उस ने रंजन से दोस्ती की, फिर संबंध भी बनाया. लेकिन करीब एक साल बाद उस ने शादी से मना कर दिया.

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रंजन से धोखा मिलने पर दिशा तिलमिलाई जरूर लेकिन उस ने निश्चय किया कि पुरानी बातों को भूल कर अब विवाह से पहले किसी से भी संबंध नहीं बनाएगी.

दिशा ने घर वालों को शादी की रजामंदी दे दी तो उस के लिए वर की तलाश शुरू हो गई. 4 महीने बाद मानस मिला. वह बहुत बड़ी कंपनी में सीईओ था. पुश्तैनी संपत्ति भी थी. उस के पिता रेलवे से रिटायर्ड थे. मम्मी हाईस्कूल में पढ़ाती थीं.

मानस से शादी होना तय हो गया तो दिशा उस से मिलने लगी. उस ने फैसला किया था कि शादी से पहले किसी से भी संबंध नहीं बनाएगी. लेकिन अपने फैसले पर वह टिकी नहीं रह सकी. हवस की आग में जलने लगी तो मानस से संबंध बना लिया.

2 महीने बाद जब मानस मंगनी से कतराने लगा तो दिशा ने पूछा, ‘‘सच बताओ, मुझ से शादी करना चाहते हो या नहीं?’’

‘‘नहीं.’’ मानस ने कह दिया.

‘‘क्यों?’’ दिशा ने पूछा. वह गुस्से में थी.

कुछ सोचते हुए मानस ने कहा, ‘‘पता चला है कि मुझ से पहले भी तुम्हारे कई मर्दों से संबंध रहे हैं.’’

पहले तो दिशा सकते में आ गई, लेकिन फिर अपने आप को संभाल लिया और कहा, ‘‘लगता है, मेरे किसी दुश्मन ने तुम्हारे कान भरे हैं. मुझ पर विश्वास करो तुम्हारे अलावा मेरे किसी से संबंध नहीं रहे.’’

मानस ने सोचने के लिए दिशा से कुछ दिन का समय मांगा, लेकिन उस ने समय नहीं दिया. उस पर दबाव बनाने के लिए दिशा ने अपने घर वालों को बताया कि मानस ने बहलाफुसला कर उस से संबंध बना लिए हैं और अब गलत इलजाम लगा कर शादी से मना कर रहा है.

उस के पिता और भाई गुस्से में मानस के घर गए. उस के मातापिता के सामने ही उसे खूब लताड़ा और दिशा की बेहयाई का सबूत मांगा.

मानस के पास कोई सबूत नहीं था. मजबूर हो कर वह दिशा से मंगनी करने के लिए राजी हो गया. 15 दिन बाद की तारीख रखी गई. आखिर वह दिन आ ही गया. मानस उस से मंगनी करने आ रहा था.

एक सहेली ने दिशा की तंद्रा भंग की तो वह वर्तमान में लौट आई. सहेली कह रही थी, ‘‘देखो, मानस आ गया है.’’

दिशा ने खुशी से दरवाजे की तरफ देखा. मानस अकेला था. उस के घर वाले नहीं आए थे. उस के साथ एक ऐसा शख्स था जिसे देखते ही दिशा के होश उड़ गए. वह शख्स था डा. अमरेंदु.

मानस को अकेला देख दिशा के भाई और पापा भी चौंके. उस का स्वागत करने के बाद भाई ने पूछा, ‘‘तुम्हारे घर वाले नहीं आए?’’

‘‘कोई नहीं आएगा.’’ मानस ने कहा.

‘‘क्यों नहीं आएगा?’’

‘‘क्योंकि मैं दिशा से शादी नहीं करना चाहता. मुझे उस से अकेले में बात करनी है? वह सब कुछ समझ जाएगी. खुद ही मुझ से शादी करने से मना कर देगी.’’

भाई और पिता के साथ दिशा भी सकते में आ गई. उस की भाभी उस के पास ही थी. उस की बोलती भी बंद हो गई थी.

दिशा के पिता ने उसे अकेले में बात करने की इजाजत नहीं दी. कहा, ‘‘जो कहना है, सब के सामने कहो.’’

मजबूर हो कर मानस ने लोगों के सामने ही कहा, ‘‘दिशा दुश्चरित्र लड़की है. अब तक कई लड़कों से संबंध बना चुकी है. 2 बार एबौर्शन भी करा चुकी है. इसीलिए मैं उस से शादी नहीं करना चाहता.’’

भाई को गुस्सा आ गया. उस ने मानस को जोरदार थप्पड़ मारा और कहा, ‘‘मेरी बहन पर इल्जाम लगाने की आज तक कभी किसी ने हिम्मत नहीं की. अगर तुम प्रमाण नहीं दोगे तो जेल की हवा खिला दूंगा.’’

‘‘भाईसाहब, आप गुस्सा मत कीजिए अभी सबूत देता हूं. जब मेरे शुभचिंतक ने बताया कि दिशा का चरित्र ठीक नहीं है, तभी से मैं सच्चाई का पता लगाने में जुट गया था. अंतत: उस का सच जान भी लिया.’’

मानस ने बात जारी रखते हुए कहा, ‘‘मेरे साथ जो शख्स हैं, उन का नाम डा. अमरेंदु है. दिशा ने उन के क्लिनिक में 2 बार एबौर्शन कराया था. आप उन से पूछताछ कर सकते हैं.’’

डा. अमरेंदु ने मानस की बात की पुष्टि करते हुए कुछ कागजात दिशा के भाई और पिता को दिए. कागजात में दिशा ने एबौर्शन के समय दस्तखत किए थे.

दिशा की पोल खुल गई तो चेहरा निष्प्राण सा हो गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था  कि अब उसे क्या करना चाहिए. भाई और पापा का सिर शर्म से झुक गया था. फ्रैंड्स भी उसे हिकारत की नजरों से देखने लगी थीं.

दिशा अचानक मानस के पास जा कर बोली, ‘‘तुम ने मेरी जिंदगी तबाह कर दी. तुम्हें छोडूंगी नहीं. तुम्हारे जिंदगी भी बर्बाद कर के रख दूंगी. तुम नहीं जानते मैं क्या चीज हूं.’’

‘‘तुम्हारे साथ जो कुछ भी हो रहा है वह सब तुम्हारे लाइफस्टाइल की वजह से हो रहा है. इस में किसी का कोई दोष नहीं है. जब तक तुम अपने आप को नहीं सुधारोगी, ऐसे ही अपमानित होती रहोगी.’’

पलभर चुप रहने के बाद मानस ने फिर कहा, ‘‘आज की तारीख में तुम इतना बदनाम हो चुकी हो कि तुम से कोई भी शादी करने के लिए तैयार नहीं होगा.’’

वह एक पल रुक कर बोला, ‘‘हां, एक ऐसा शख्स है जो तुम्हें बहुत प्यार करता है. तुम कहोगी तो खुशीखुशी शादी कर लेगा.’’

‘‘कौन?’’ दिशा ने पूछा.

‘‘परिमल…’’ मानस ने कहा, ‘‘गेट पर उस से मिल कर आने के बाद तुम उसे भूल गई थीं, पर वह तुम्हें नहीं भूला है. होटल के गेट पर अब तक इस उम्मीद से खड़ा है कि शायद तुम मुझ से शादी करने का अपना फैसला बदल दो. कहो तो उसे बुला दूं.’’

‘‘तुम उसे कैसे जानते हो?’’ दिशा ने पूछा.

मानस ने बताया कि वह परिमल को कब और कहां मिला था.

कार पार्क कर मानस डा. अमरेंदु के साथ होटल में आ रहा था तो गेट पर परिमल मिल गया था. न जाने वह उसे कैसे जानता था. उस ने पहले अपना परिचय दिया फिर दिशा और अपनी प्रेम कहानी बताई.

उस के बाद कहा, ‘‘तुम्हें दिशा की सच्चाई भविष्य में उस से सावधान रहने के लिए बताई है. अगर उस से सावधान नहीं रहोगे तो विवाह के बाद भी वह तुम्हें धोखा दे सकती है.’’

मानस ने परिमल को अंदर चलने के लिए कहा तो उस ने जाने से मना कर दिया. कहा, ‘‘मैं यहीं पर तुम्हारे लौटने का इंतजार करूंगा. बताना कि तुम से मंगनी कर वह खुश है या नहीं?’’

कुछ सोच कर मानस ने उस से पूछा, ‘‘मान लो दिशा तुम से शादी करने के लिए राजी हो जाए तो करोगे?’’

‘‘जो हो नहीं सकता, उस पर बात करने से क्या फायदा? जानता हूं कि वह कभी भी मुझ से शादी नहीं करेगी.’’ परिमल ने मायूसी से कहा.

मानस ने परिमल की आंखों में देखा तो पाया कि दिशा के प्रति उस की आंखों में प्यार ही प्यार था. उस ने चाह कर भी कुछ नहीं कहा और डा. अमरेंदु के साथ होटल में चला आया.

मानस ने दिशा को सच्चाई से दोचार करा दिया तो उसे भविष्य अंधकारमय लगा. परिमल के सिवाय उसे कोई नजर नहीं आया तो वह उस से बात करने के लिए व्याकुल हो गई.

उस का फोन नंबर उस के पास था ही, झट से फोन लगा दिया. परिमल ने फोन उठाया तो उस ने कहा, ‘‘तुम से कुछ बात करना चाहती हूं. प्लीज होटल में आ जाओ.’’

कुछ देर बाद ही परिमल आ गया और दिशा ने उस का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो, परिमल. मैं तुम्हारा प्यार समझ नहीं पाई थी, लेकिन अब समझ गई हूं. मैं तुम से शादी करना चाहती हूं. अभी मंगनी कर लो, बाद में जब कहोगे शादी कर लूंगी.’’

कुछ सोचने के बाद परिमल ने कहा, ‘‘यह सच है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं. पर तुम आज भी मुझ से बेवफाई कर रही हो. सच नहीं बता रही हो. सच यह नहीं है कि मेरा प्यार तुम समझ गई हो, इसलिए मुझ से शादी करना चाहती हो. सच यह है कि आज की तारीख में तुम इतना बदनाम हो गई हो कि तुम से कोई भी शादी नहीं करना चाहता. मानस ने भी शादी से मना कर दिया है. इसीलिए अब तुम मुझ से शादी कर अपनी इज्जत बचाना चाहती हो.

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‘‘तुम से शादी करूंगा तो प्यार की नहीं, समझौते की शादी होगी, जो अधिक दिनों तक नहीं टिकेगी. अत: मुझे माफ कर दो और किसी और को बलि का बकरा बना लो. मैं भी तुम्हें सदैव के लिए भूल कर किसी और से शादी कर लूंगा.’’

परिमल रुका नहीं. दिशा की पकड़ से हाथ छुड़ा कर दरवाजे की तरफ बढ़ गया. वह देखती रह गई. किस अधिकार से रोकती?

कुछ देर बाद मानस और डा. अमरेंदु भी चले गए. दिशा के घर वाले भी चले गए. सहेलियां चली गईं. महफिल खाली हो गई, पर दिशा डबडबाई आंखों से बुत बनी रही.

कहानी सौजन्य: मनोहर कहानी

कमीशन

आकाशवाणी में कार्यक्रमों को देने के एवज में मिले पारिश्रमिक में वहां के अधिकारियों द्वारा मांगे जाने वाले हिस्से को ले कर दीया की मां ऐसी नाराज हुईं कि उन्होंने कार्यक्रम देने से तौबा कर ली लेकिन जब उन्हें पता चला कि दीया ने भी आकाशवाणी पर कार्यक्रम देना शुरू कर दिया है तो उन का गुस्सा सांतवें आसमान पर पहुंच गया.

अंकल की कोशिशों से आखिर मुझे आकाशवाणी के कार्यक्रमों में जगह मिल ही गई. एक वार्ता के लिए कांट्रेक्ट लेटर मिलते ही सब से पहले अंकल के पास दौड़ीदौड़ी पहुंची तो मुझे बधाई देने के बाद पुन: अपनी बात दोहराते हुए उन्होंने मुझ से कहा, ‘‘बेटी, तुम्हारे इतना जिद करने पर मैं ने तुम्हारे लिए जुगाड़ तो कर दिया है, लेकिन जरा संभल कर रहना. किसी की भी बातों में मत आना, अपनी रिकार्डिंग के बाद अपना पारिश्रमिक ले कर सीधे घर आ जाना.’’

‘‘अंकल, आप बिलकुल चिंता मत कीजिए. कोई भी मुझे बेवकूफ नहीं बना सकता. मजाल है, जो प्रोग्राम देने के बदले किसी को जरा सा भी कोई कमीशन दूं. मम्मी ही थीं, जो उन लोगों के हाथों बेवकूफ बन कर हर कार्य- क्रम में जाने का कमीशन देती रहीं और फिर एक दिन बुरा मान कर पूरा का पूरा पारिश्रमिक का चेक उस डायरेक्टर के मुंह पर मार आईं. शुरू में ही मना कर देतीं तो इतनी हिम्मत न होती किसी की कि कोई उन से कुछ उलटासीधा कहता.’’

मेरे द्वारा मम्मी का जिक्र करते ही अंकल के चेहरे पर टेंशन साफ झलकने लगा था लेकिन अपने कांट्रेक्ट लेटर को ले कर मैं इतनी उत्साहित थी कि बस उन्हें तसल्ली सी दे कर अपने कमरे में आ कर रिकार्डिंग के लिए तैयारी करने लगी. उस में अभी पूरे 8 दिन बाकी थे, सो ऐसी चिंता की कोई बात नहीं थी. हां, कुछ अंकल की बातों से और कुछ मम्मी के अनुभव से मैं डरी हुई जरूर थी.

दरअसल, मेरी मम्मी भी अपने समय में आकाशवाणी पर प्रोग्राम देती रहती थीं. उस समय वहां का कुछ यह चलन सा बन गया था कि कलाकार प्रोग्राम के बदले अपने पारिश्रमिक का कुछ हिस्सा उस स्टेशन डायरेक्टर के हाथों पर रखे. मम्मी को यह कभी अच्छा नहीं लगा था. उन का कहना था कि अपने टैलेंट के बलबूते हम वहां जाते हैं, किसी भी कार्यक्रम की इतनी तैयारी करते हैं फिर यह सब ‘हिस्सा’ या ‘कमीशन’ आदि क्यों दें भला. इस से तो एक कलाकार की कला का अपमान होता है न. ऐसा लगता है कि जैसे कमीशन दे कर उस के बदले में हमें अपनी कला के प्रदर्शन का मौका मिला है. मम्मी उस चलन को ज्यादा दिन झेल नहीं पाईं.

उन दिनों उन्हें एक कार्यक्रम के 250 रुपए मिलते थे, जिस में से 70 रुपए उन्हें अपना पारिश्रमिक पाने के बदले देने पड़ जाते थे. बात पैसे देने की नहीं थी, लेकिन इस तरह रिश्वत दे कर प्रोग्राम लेना मम्मी को अच्छा नहीं लगता था जबकि वहां पर इस तरह कार्यक्रम में आने वाले सभी को अपनी इच्छा या अनिच्छा से यह सब करना ही पड़ता था.

मम्मी की कितने ही ऐसे लोगों से बात होती थी, जो उस डायरेक्टर की इच्छा के भुक्तभोगी थे. बस, अपनीअपनी सोच है. उन में से कुछ ऐसा भी सोचते थे कि आकाशवाणी जैसी जगह पर उन की आवाज और उन के हुनर को पहचान मिल रही है, फिर इन छोटीछोटी बातों पर क्या सोचना, इस छोटे से अमाउंट को पाने या न पाने से कुछ फर्क थोड़े ही पड़ जाएगा. प्रोग्राम मिल जाए और क्या चाहिए.

पता नहीं मुझे कि उस समय उस डायरेक्टर ने ही यह गंदगी फैला रखी थी या हर कोई ही ऐसा करता था. कहते हैं न कि एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है. मम्मी तो बस फिर वहां जाने के नाम से ही चिढ़ गईं. आखिरी बार जब वे अपने कार्यक्रम की रिकार्डिंग से लौटीं तो पारिश्रमिक के लिए उन्हें डायरेक्टर के केबिन में जाना था. चेक देते हुए डायरेक्टर ने उन से कहा, ‘अब अमाउंट कुछ और बढ़ाना होगा मैडम. इधर अब आप लोगों के भी 250 से 350 रुपए हो गए हैं, तो हमारा कमीशन भी तो बढ़ना चाहिए न.’

मम्मी को उस की बात पर इतना गुस्सा आया और खुद को इतना अपमानित महसूस किया कि बस चेक उस के मुंह पर मारती, यह कहते हुए गुस्से में बाहर आ गईं कि लो, यह लो अपना पैसा, न मुझे यह चेक चाहिए और न ही तुम्हारा कार्यक्रम. मैं तो अपनी कहानियां, लेख पत्रपत्रिकाओं में ही भेज कर खुश हूं. सेलेक्ट हो जाते हैं तो घरबैठे ही समय पर पारिश्रमिक आ जाता है.

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उस के बाद मम्मी फिर किसी आकाशवाणी या दूरदर्शन केंद्र पर नहीं गईं. मैं उन दिनों यही कोई 10-11 साल की थी. उस वक्त तो ज्यादा कुछ समझ नहीं पाई थी लेकिन जैसेजैसे बड़ी होती गई, बात समझ में आती गई. मम्मी के लिए मेरे मन में बहुत दुख था. मम्मी कितनी अच्छी वक्ता थीं कि बता नहीं सकती. एक तो कुछ उन की जल्दबाजी और दूसरे वहां के ऐसे माहौल के कारण एक प्रतिभा अंदर ही अंदर दब कर रह गई.

कहते हैं न कि एक कलाकार की कला को यदि बाहर निकलने का मौका न मिले तो वह दिल ही दिल में जिस तरह दम तोड़ती है, उस का अवसाद, उस की कुंठा कलाकार को कहीं का नहीं छोड़ती. मम्मी ने भी उस घटना को दिल से लगा लिया था. कुछ दिन तो वह काफी बीमार रहीं फिर पापा के अपनत्व और स्नेह से किसी तरह जिंदगी में लौट पाईं और पुन: लेखन में लग गईं. मम्मी के ये गुण मुझ में भी आ गए थे. मेरा भी लेखन वगैरह के प्रति झुकाव समय के साथ बढ़ता ही चला गया. साथ ही एक अच्छे वक्ता के गुणों से भी स्कूल के दिनों से ही मालामाल थी. वादविवाद प्रतियोगिता हो, गु्रप डिस्कशंस हों या कुछ और, सदा जीत कर ही आती थी. मगर इस से पहले कि मैं इस फील्ड में अपना कैरियर तलाशती, गे्रजुएशन के साथ ही पापा के ही एक खास मित्र के लड़के, जोकि मर्चेंट नेवी में था, ने एक पार्टी में मुझे पसंद कर लिया और बस चट मंगनी, पट ब्याह हो कर बात दिल की दिल में ही रह गई.

इस के बाद अभिमन्यु के साथ 4-5 साल मैं शिप पर ही रहती रही. वहीं मेरी बेटी हीरामणि का भी जन्म हुआ. यों तो डिलीवरी के लिए मैं मम्मीपापा के पास मुंबई आ गई थी, मगर हीरामणि के कुछ बड़ा होने के बाद पुन: अभिमन्यु के पास शिप पर ही चली गई थी.

अब तक तो सब ठीकठाक चलता रहा, लेकिन अब बेटी के स्कूल आदि शुरू होने को थे, सो शिप पर इधरउधर रहना मुमकिन नहीं था. इस बार यह घर अभिमन्यु ने हमारे लिए खरीद दिया था ताकि मम्मीपापा का भी साथ मिलता रहे. वे लोग भी यहीं मुंबई में थे. हीरामणि की पढ़ाई बेरोकटोक चलती रहे, ऐसा प्रयास था. अब अभिमन्यु तो सिर्फ छुट्टियों में ही घर आ सकते थे न. अब की जब 9 महीने का शिपिंग कंपनी का अपना कांट्रेक्ट पूरा कर के हम लोग आए तो 3 महीने की पूरी छुट्टियां घर तलाशने और उसे सेट करने में ही निकल गई थीं.

घर वाकई बहुत खूबसूरत मिल गया था. मकान मालिक की पत्नी का देहांत कुछ समय पहले हो गया था. उन के एक बेटा था, जो अमेरिका में ही शादी कर के बस गया था. उन्हें अब इतने बड़े घर की जरूरत ही नहीं थी सो इसे हमें सेल कर दिया. अपने लिए सिर्फ एक कमरा रखा, जिस में अटैच्ड बाथरूम वगैरह था. इस से ज्यादा उन्हें चाहिए ही नहीं था. थोड़े ही दिनों में वे हम से खुल गए थे. हम भी उन्हें घर के एक बुजुर्ग सा ही मान देने लगे थे. हीरामणि का दाखिला भी अच्छे स्कूल में हो गया था. अभिमन्यु सब तरह से संतुष्ट हो कर अपनी ड्यूटी पर चले गए. उन के जाने के बाद तो अंकल और अपने लगने लगे थे. वे मुझे और हीरामणि को अपना बच्चा ही समझते थे. हीरामणि तो उन्हें दादाजी भी कहने लगी थी. बच्चे तो वैसे भी कोमल मन और कोमल भावनाओं वाले होते हैं, जहां प्यार और स्नेह देखा, बस वहीं के हो कर रह गए.

पहले अंकल ने टिफिन भेजने वाली लेडी से कांट्रेक्ट कर रखा था. दोनों समय का खानापीना वह ही पैक कर के भेज देती थी. नाश्ते में अंकल सिर्फ फल और टोस्ट लेते थे. उन की बेरंग सी जिंदगी देख कर कभीकभी बुढ़ापे से डर लगने लगता था. कितना भयानक होता है न बुढ़ापे का यह अकेलापन.

थोड़े दिनों में जब दिल से दिल जुड़े और अपनत्व की एक डोर बंधी तो मैं ने उन का बाहर से वह टिफिन बंद करवा कर अपने साथ ही उन का भी खाना बनाने लगी. अब हम एकदूसरे के पूरक से हो गए थे. बिना अभिमन्यु के हमें भी उन से एक बड़े के साथ होने की फीलिंग होती थी और उन्हें भी हम से एक परिवार का बोध होता.

इसी बीच बातोंबातों में एक दिन पता चला कि अंकल कभी आकाशवाणी केंद्र में एक अच्छे ओहदे पर हुआ करते थे. पता नहीं क्यों उन्होंने समय से पहले ही वहां से रिटायरमेंट ले लिया था. शायद उन्हें नौकरी करने की कोई जरूरत नहीं थी या फिर वहां के काम से बोर हो गए थे. खैर, जो भी हो, मैं तो बस तब से ही उन के पीछे पड़ गई थी कि मेरा भी कभीकभी कुछ आकाशवाणी में प्रोग्राम वगैरह करवा दें. उन की तो काफी लोगों से जानपहचान होगी. तब उन्होंने बताया कि वह यू.पी. के एक छोटे से आकाशवाणी केंद्र में थे. अब तो छोड़े हुए भी उन्हें काफी समय हो गया, कोई जानपहचान वाला मिलेगा भी या नहीं, लेकिन मैं थी कि बस लगी ही रही उन के पीछे.

उन्होंने मुझे बहुत समझाया कि इन जगहों पर असली टैलेंट की कोई कद्र नहीं होती. बस, सब अपनेअपने सगेसंबंधियों और जानपहचान वालों को मौका देते रहते हैं और कमीशन के नाम पर उन्हें भी नहीं बख्शते. वे अपनी कहते रहे तो मैं भी बस उन से यही कहती रही, ‘‘अंकल, आज के समय में यह कोई बड़ी बात थोड़े ही है और कमीशन बताइए अंकल कि कहां नहीं है. मकान खरीदो तो प्रोपर्टी डीलर कमीशन लेता है, सरकारी आफिस में कोई टेंडर निकलवाना हो तो अफसरों को कमीशन देना पड़ता है, यहां तक कि पोस्टआफिस में भी किसी एजेंट के द्वारा कोई पालिसी खरीदो तो जहां उसे सरकार कमीशन देती है, तो उस से कुछ कमीशन पालिसीधारक को भी मिलता है. और भी क्याक्या गिनाऊं, हर जगह यही हाल है अंकल, जिस को जहां जरा सा भी मौका मिलता है वह उसे हर हाल में कैश करता ही है, तो अगर यहां भी यही हाल है तो उस में बुरा ही क्या है.

‘‘ठीक है, वह आप को, आप के टैलेंट को, आप के हुनर को बाहर निकलने का मौका दे कर बदले में अगर कुछ ले रहे हैं तो ठीक है न, फिर इस में इतना हाईपर होने की क्या बात है. उन का हक बनता है भई. गिव एंड टेक का जमाना है सीधा- सीधा. इस हाथ दो तो उस हाथ लो. इन सब से बड़ी बात तो यह है अंकल कि आप की आवाज इतने लोग सुन रहे हैं, इस से बड़ी बात और क्या हो सकती है.’’

मेरी बात सुन कर अंकल हैरत से मुझे देखते हुए बोले, ‘‘काफी प्रैक्टिकल और सुलझी हुई हो बेटी तुम. काश, उस वक्त भी तुम्हारे जैसी सोच वाले लोग होते…’’ इतना कह कर अंकल उदास हो गए तो मैं ने पूछ ही लिया, ‘‘अंकल, बुरा न मानें तो मुझे बताइए कि आप ने आकाशवाणी की इतनी मजेदार नौकरी क्यों छोड़ दी?’’

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कुछ पल वे यों ही सोचते रहे, फिर खोएखोए से बोले, ‘‘बस, बेटी, इसी लेनदेन को ले कर एक स्कैंडल खड़ा हो गया था, फिर मन ही नहीं लगा पाया वहां. आ गया सब छोड़ कर.’’

इस से ज्यादा न उन्होंने कुछ बताया और न ही मैं ने पूछा. पता नहीं क्यों दिल में ऐसा आभास हो रहा था कि कहीं मम्मी और अंकल एक ही इश्यू से जुड़े तो नहीं हैं.

मम्मी भी न…बस, अरे, उस डायरेक्टर के मुंह पर चेक फेंकने का क्या फायदा हुआ आखिर. उन का ही तो नुकसान हुआ न. इस घटना के बाद उन की रचनात्मक प्रवृत्तियां खत्म सी हो गई थीं. उन का मन ही नहीं करता था कुछ. उन की अपनी एक खास पहचान बन गई थी. सब खत्म कर दिया अपनी ऐंठ और नासमझी में. मैं तो इसे नासमझी ही कहूंगी.

कांट्रेक्ट लेटर हाथ में आते ही कल जब उन्हें फोन पर बताया तो सब से पहले वे बिगड़ने लगीं कि दीया, तुम ने मेरी बात नहीं मानी आखिर. कहा था न कि इन सब झंझटों से दूर रहना, मगर…खैर, अब जा ही रही हो तो ध्यान रखना, कोई तुम्हें जरा सा भी बेवकूफ बनाने की कोशिश करे तुम उलटे पैर लौट आना. मैं ने तो सुना था कि मुझे परेशान करने वाले उस डायरेक्टर ने तो नौकरी ही छोड़ दी थी.’’

अब मुझे बिलकुल भी शक नहीं था कि अंकल ही वह शख्स थे जिन्होंने मम्मी की वजह से नौकरी छोड़ दी थी.

खैर, अब उन से भी क्या कहती. मम्मी थीं वह मेरी. यही कहा बस, ‘‘मम्मी, मैं आप की बात का ध्यान रखूंगी. आप परेशान मत होइए.’’

मगर मन ही मन मैं ने सोच लिया था कि किसी की भी नहीं सुनूंगी. समय की जो डिमांड होगी वही करूंगी और फिर मैं कोई पैसा कमाने या कोई इश्यू खड़ा करने नहीं जा रही हूं वहां. पैसा तो अभिमन्यु ही मर्चेंट नेवी में खूब कमा लेते हैं. मुझे तो उन के पीछे बस अपना थोड़ा सा समय रचनात्मक कार्यों में लगाना है. हीरामणि के साथ मैं कहीं नौकरी कर नहीं सकती, अभिमन्यु के पीछे वह मेरी जिम्मेदारी है. बस, कभीकभी आकाश- वाणी पर कार्यक्रम मिलते रहें, लेखन चलता रहे…और इस से ज्यादा चाहिए भी क्या. समय इधरउधर क्लब, किट्टी पार्टी में गंवाने से क्या हासिल.

आकाशवाणी पहुंची तो सब से पहले उन महोदय से मिली जिन से अंकल ने मुलाकात करवाई थी. उन्होंने खुद चल कर मेरी वार्ता की रिकार्डिंग करवाई और मेरे अच्छा बोलने पर मुझे बहुत सराहा भी. मुझे तो वे बड़े अच्छे लगे. उम्र यही कोई 40 के आसपास होगी. रिकार्डिंग के बाद वे मुझे अपने केबिन में ले गए. मेरे लिए चाय भी मंगवाई, शायद इसलिए कि अंकल को जानते थे. अंकल ने मेरे सामने ही उन से कहा था कि मेरी बेटी जैसी ही है. इस का ध्यान रखना.

चाय आ गई थी और उस के साथ बिस्कुट भी. उन्होंने मुझे बड़े अदब से चाय पेश की और मुझ से बातें भी करते रहे. बोले, ‘‘चेक ले कर ही जाइएगा दीयाजी. हो सकता है कि थोड़ी देर लग जाए. बहुत खुशी होती है न कुछ करने का पारिश्रमिक पा कर.’’

और तब मैं सोच रही थी कि शायद अब यह मतलब की बात करें कि बदले में मुझे उन्हें कितना कमीशन देना है. मैं तो बिलकुल ही तैयार बैठी थी उन्हें कमीशन देने को. मगर मुझ से उन्होंने उस का कुछ जिक्र ही नहीं किया. मैं ने ही कहा, ‘‘सर, मैं तो आकाशवाणी पर बस प्रोग्राम करना चाहती हूं. बाकी पारिश्रमिक या पैसे में मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं है. मेरी रचनात्मक प्रवृत्ति का होना ही कुदरत की तरफ से दिया हुआ मुझे सब से बड़ा तोहफा है जो हर किसी को नहीं मिलता है. सर, यह यहां मेरा पहला प्रोग्राम है. आप ही की वजह से यह मुझे मिला है. यह मेरा पहला पारिश्रमिक मेरी तरफ से आप को छोटा सा तोहफा है क्योंकि जो मौका आप ने मुझे दिया वह मेरे लिए अनमोल है.’’

कहने को तो मैं कह गई, लेकिन डर रही थी कि कहीं वे मेरे कहे का बुरा न मान जाएं. सब तरह के लोग होते हैं. पता नहीं यह क्या सोचते हैं इस बारे में. कहीं जल्दबाजी तो नहीं कर दी मैं ने अपनी बात कहने में. मेरे दिलोदिमाग में विचारों का मंथन चल ही रहा था कि वे कह उठे, ‘‘दीयाजी, आप सही कह रही हैं, यह लेखन और यह बोलने की कला में माहिर होना हर किसी के वश की बात नहीं. इस फील्ड से वही लोग जुड़े होने चाहिए जो दिल से कलाकार हों. मैं समझता हूं कि सही माने में एक कलाकार को पैसे आदि का लोभ संवरण नहीं कर पाता. आप की ही तरह मैं भी अपने को एक ऐसा ही कलाकार मानता हूं. मैं भी अच्छे घर- परिवार से ताल्लुक रखता हूं, जहां पैसे की कोई कमी नहीं. मैं भी यहां सिर्फ अपनी रचनात्मक क्षुधा को तृप्त करने आया हूं. आप अपने पारिश्रमिक चेक को अपने घर पर सब को दिखाएंगी तो आप को बहुत अच्छा लगेगा. यह बहुत छोटा सा तोहफा जरूर है, लेकिन यकीन जानिए कि यह आप को जिंदगी की सब से बड़ी खुशी दे जाएगा.’’

उन की बात सुन कर मैं तो सचमुच अभिभूत सी हो गई. मैं तो जाने क्याक्या सोच कर आई थी और यह क्या हो रहा था मेरे साथ. सचमुच कुछ कह नहीं सकते किसी के भी बारे में, कहीं के भी बारे में. हर जगह हर तरह के लोग होते हैं. एक को देख कर दूसरे का मूल्यांकन करना निरी मूर्खता है. जब हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं तो…यह तो मेरा वास्ता कुछ ऐसे शख्स से पड़ा, कहीं वह मेरी इसी बात का बुरा मान जाता तो. सब शौक रखा रह जाता आकाशवाणी जाने का.

घर आ कर अंकल को यह सब बताया तो उन्हें भी मेरी बात पर विश्वास नहीं हुआ. मम्मीपापा तो यूरोप भ्रमण पर चले गए थे. उन से बात नहीं हो पा रही थी जबकि मैं कितनी बेचैन हो रही थी मम्मी को सबकुछ बताने को.

अब तो कई बार वहां कार्यक्रम देने जा चुकी हूं. कभी कहानी प्रसारित होती है तो कभी वार्ता. बहुत अच्छा लगता है वहां जा कर. मुझे एकाएक लगने लगा है कि जैसे मैं भी कितनी बड़ी कलाकार हो गई हूं. शान से रिकार्डिंग करने जाती हूं और अपने शौक को यों पूरा होते देख खुशी से फूली नहीं समाती. अपने दोस्तों के दायरे में रिश्तेदारों में, अगलबगल मेरी एक अलग ही पहचान बनने लगी है और इन सब के लिए मैं दिल से अंकल की कृतज्ञ थी, जिन्होंने अपने अतीत के इतने कड़वे अनुभव के बावजूद मेरी इतनी मदद की.

इस बीच मम्मीपापा भी यूरोप घूम कर वापस आ गए थे. कुछ सोच कर एक दिन मैं ने मम्मी और पापा को डिनर पर अपने यहां बुला लिया. जब से हम ने यह घर खरीदा था, बस, कभी कुछ, कभी कुछ लगा रहा और मम्मीपापा यहां आ ही नहीं पाए थे. अंकल से धीरेधीरे, बातें कर के मेरा शक यकीन में बदल गया था कि मम्मी और अंकल अतीत की एक कड़वी घटना के तहत एक ही सूत्र से बंधे थे.

मम्मी को थोड़ा हिंट मैं ने फोन पर ही दे दिया था, ताकि अचानक अंकल को अपने सामने देख कर वे फिर कोई बखेड़ा खड़ा न कर दें. कुछ इधर अंकल तो बिलकुल अपने से हो ही गए थे, सो उन्हें भी कुछ इशारा कर दिया. एक न एक दिन तो उन लोगों को मिलना ही था न, वह तो बायचांस यह मुलाकात अब तक नहीं हो पाई थी.

और मेरा उन लोगों को सचेत करना ठीक ही रहा. मम्मी अंकल को देखते ही पहचान गईं पर कुछ कहा नहीं, लेकिन अपना मुंह दूसरी तरफ जरूर फेर लिया. डिनर के दौरान अंकल ने ही हाथ जोड़ कर मम्मी से माफी मांगते हुए कहा, ‘‘आप से माफी मांगने का मौका इस तरह से मिलेगा, कभी सोचा भी नहीं था. अपने किए की सजा अपने लिए मैं खुद ही तय कर चुका हूं. मुझे सचमुच अफसोस था कि मैं ने अपने अधिकार, अपनी पोजीशन का गलत फायदा उठाया. अब आप मुझे माफ करेंगी, तभी समझ पाऊंगा कि मेरा प्रायश्चित पूरा हो गया. यह एक दिल पर बहुत बड़ा बोझ है.’’

मम्मी ने पहले पापा को देखा, फिर मुझे. हम दोनों ने ही मूक प्रार्थना की उन से कि अब उन्हें माफ कर ही दें वे. मम्मी भी थोड़ा नरम पड़ीं, बोलीं, ‘‘शायद मैं भी गलत थी अपनी जगह. समय के साथ चल नहीं पाई. जरा सी बात का इतना बवंडर मचा दिया मैं ने भी. हम से ज्यादा समझदार तो हमारे बच्चे हैं, जिन की सोच इतनी सुलझी हुई और व्यावहारिक है,’’ मम्मी ने मेरी तरफ प्रशंसा से देखते हुए कहा. फिर बोलीं, ‘‘अब सही में मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं है. मेरी बेटी की इतनी मदद कर के आप ने मेरा गुस्सा पहले ही खत्म कर दिया था. अब माफी मांग कर मुझे शर्मिंदा मत कीजिए. दीया की तरह मेरा भी प्रोग्राम वहां करवा सकते हैं क्या आप? मैं आप से वादा करती हूं कि अब कुछ गड़बड़ नहीं करूंगी.’’

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मम्मी ने माहौल को थोड़ा सा हल्काफुल्का बनाने के लिए जिस लहजे में कहा, उसे सुन हम सभी जोर से हंस पडे़.

क्योंकि मैं डिब्बा नहीं बन सकता

हम अक्सर देखते हैं कि सबकुछ होने के बाद भी लोग अपनी छोटी-छोटी कमियों को लेकर रोते रहते हैं, दूसरों को सुखी देख कर दुखी रहते हैं, भले अपने पास सबकुछ क्यों न हो उन्हें कभी तृप्ति नहीं होती. ऐसे लोग कभी यह नहीं देखते कि दुनिया में कितने ही लोग हैं जो बेहद अभावों में भी खुशी-खुशी अपनी जिन्दगी जी रहे हैं. मुझे भी इस बात का अहसास उस दिन ही हुआ जब मैंने अपने घर के सामने खेलते उस छोटे से गरीब और गंदे बच्चे से बात की. उस दिन उसकी बातें सुन कर मैं अचम्भित हो गयी. सोचने को मजबूर हो गयी कि वह अपनी गरीबी में भी कैसा खुश था.

दरअसल मेरे घर के सामने वाली बिल्डिंग में काफी दिन से कंस्ट्रक्शन वर्क चल रहा था. सामने की सड़क के किनारे उस बिल्डिंग में काम करने वाले मजदूरों ने अपनी झुग्गियां डाल ली थीं. उनकी औरतें भी बिल्डिंग में मजदूरी करती थीं और शाम को सड़क किनारे ही उनकी रसोई बनती थी.

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शाम को आॅफिस से आने के बाद मैं अक्सर अपने गार्डन में ही बैठ कर चाय पीती हूं. उस दिन भी मैं गार्डन में बैठी चाय की चुस्कियां ले रही थी. सामने सड़क पार मजदूरों के नंग-धड़क बच्चे खेल रहे थे. चाय पीते-पीते मैं उनके खेल में मगन हो गयी. उनके खेल में मुझे आनन्द आने लगा. वह एक दूसरे के पीछे लगे लम्बी ट्रेन बना कर दौड़ते-हंसते, सीटी बजाते कभी बिल्डिंग के अन्दर घुस जाते, कभी बरगद के बड़े से पेड़ का चक्कर लगाकर मेरे घर के गेट तक आ जाते थे.

मैं उनके खेल में मजा लेने लगी. दूसरे दिन भी, तीसरे दिन भी, चौथे दिन भी चाय की चुस्कियों के बीच मैं उनके खेल में रमी रही. इन चार दिनों में मैंने एक बात नोटिस की कि वे तीन से छह साल तक के नन्हे बच्चे थे. फटेहाल, काले, भद्दे, गंदे मगर बिल्कुल मस्त. वे एक दूसरे की शर्ट पकड़ कर रेल बनाते थे. पांच-छह बच्चे रेल के डिब्बे बन जाते और एक बच्चा इंजन बनता. मगर उस ग्रुप में एक बच्चा जो सबसे छोटा था और जिसके बदन पर सिर्फ एक गंदी सी चड्डी थी, वह हाथ में एक छोटा सा गंदा कपड़ा हिला-हिला कर गार्ड की भूमिका निभाता था. मैं कई दिन से उन बच्चों का खेल देख रही थी. हर दिन डिब्बे वाले बच्चे बदल जाते थे. इंजन भी बदल जाता था. कभी कुछ नये बच्चे भी इस रेलगाड़ी में जुड़ जाते थे, तो कभी कुछ कम भी हो जाते, मगर मैं चार दिन से देख रही थी कि गार्ड वाला बच्चा वही था. गंदे बदन पर एक फटी सी चड्डी पहने पूरी मस्ती से अपना छोटा सा कपड़ा हिला-हिला कर रेल को चलता करता और रेल को रोकता था. उसकी उम्र तीन साल से ज्यादा न होगी. पांचवे दिन मैं चाय का प्याला लेकर अपने गार्डन से उठ कर गेट पर आ कर खड़ी हो गयी. बच्चों की रेलगाड़ी जब सीटी बजाती बरगद के पेड़ की तरफ मुड़ी तो मैंने उस बच्चे को इशारे से अपने पास बुलाया. वह रेलगाड़ी के लौटने का इंतजार करता अपनी चड्डी संभाले खड़ा था.

मेरे बुलाने पर वह भागा-भागा मेरे पास चला आया. मैंने गेट खोला और गार्डन में आकर ट्रे में रखे बिस्कुट में से दो उठा कर उसकी ओर बढ़ाये. पहले तो वह थोड़ा सकुचाया, मगर फिर मुस्कुराते हुए ले लिये.

मैंने उससे नाम पूछा तो उसने बड़ी खुशी-खुशी बताया, ‘हंसमुख’. वह बिल्कुल अपने नाम के अनुरूप ही था, हंसता-खिलखिलाता. मैंने दो बिस्कुट प्लेट से और उठा कर उसे दिये और दूसरा सवाल दाग दिया, ‘तुम रोज अपनी रेलगाड़ी के गार्ड ही क्यों बनते हो? बाकी बच्चे तो डिब्बा और इंजन भी बनते हैं. तुम क्यों नही बनते?’

इसके बाद उसका जवाब सुन कर मैं अवाक रह गयी.

वह बोला, ‘बाकी सबके पास कमीज है न, मेरे पास नहीं है, फिर मेरे पीछे वाला मुझे पकड़ेगा कैसे? इसीलिए मैं गार्ड बनता हूं.’

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उसके जवाब ने मुझे भीतर तक हिला दिया. वह अपनी गरीबी में भी खुश है. हंसता है. मुस्कुराता है. जिन्दगी से एडजेस्ट करता है. उसे किसी से कोई शिकायत नहीं है.

उसी दिन मैंने बाजार जाकर उसके लिए चार जोड़ी पैंट शर्ट खरीदे और लाकर उसको दिये. दूसरे दिन मैंने उसे उस रेलगाड़ी में चमचमाता इंजिन बने देखा तो मेरा मन खुशी से झूम उठा. वह पूरी गाड़ी खींचता हुआ बार-बार पलट कर मेरी ओर देखता और मुस्कुरा देता. उसकी मुस्कुराहट मेरे दिल को कितना सुकून पहुंचा रही थी, यह मैं यहां शब्दों में बयां नहीं कर सकती.

क्यों तेजी से बढ़ रहा है लंग कैंसर?

हरियाणा के एक छोटे से गांव परधानीपुरा के रहने वाले रामपाल गुर्जर की उम्र सिर्फ 41 साल है. वह एक रंग कारखाने में सुपरवाइजर हैं. रामपाल ने जीवन में कभी शराब-सिगरेट या हुक्के का सेवन नहीं किया. सात्विक भोजन करते हैं. अनुशासन में रहते हैं. दूध-दही के शौकीन हैं. रामपाल को अचानक खांसी की बीमारी लग गयी. तमाम दवाएं खा लीं, कफ सिरप पी लिये, मगर खांसी नहीं गयी. खांसी महीनों बनी रही. फिर सीने में दर्द की शिकायत भी रहने लगी. काम करते वक्त या चलते वक्त कमजोरी महसूस होने लगी. कारखाने में जब सांस लेने में दिक्कत होती तो वह कारखाने से निकल कर बाहर खुले में आ जाते. एक दिन रामपाल ने बलगम थूका तो साथ में खून का थक्का गिरा. रामपाल घबरा गये. डौक्टर के पास पहुंचे. जांच में पता चला कि उनको लंग कैंसर है. रामपाल तो जैसे टूट ही गये. घर में कमाने वाले अकेले व्यक्ति, तीन बच्चे, बीवी, बूढ़ी मां की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी. रामपान यह सोच कर हलकान थे कि जीवन में कभी बीड़ी-सिगरेट को हाथ नहीं लगाया, फिर उनको फेफड़े का कैंसर कैसे हो गया? दरअसल रामपाल व्यवसायिक कैंसर की चपेट में आ गये, जो उनको रंग फैक्टरी से उड़ने वाले रसायन के कारण मिला. रसायन पेंट इंडस्ट्री में काम करने वाले अधिकांश श्रमिक और सुपरवाइजर अनुवांशिक क्षति और व्यवसायिक कैंसर की चपेट में आ जाते हैं.

रामपाल बीते पांच साल से कैंसर का इलाज करा रहे हैं. डौक्टर ने तसल्ली दी है कि वे पूरी तरह कैंसर मुक्त हो जाएंगे, मगर इस बीच उनके दो बड़े औपरेशन हो चुके हैं और इससे उनके शरीर की ताकत बहुत घट गयी है. इलाज और औपरेशन में जमापूंजी खर्च हो चुकी है और घर का खर्च चलाने के लिए अब उनकी पत्नी को रंग कारखाने में बतौर मजदूर काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

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महानगरों में प्रदूषित हवा, धूम्रपान के कारण फेफड़ों और श्वास सम्बन्धी तमाम रोगों के साथ कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी भी इंसान को अपना शिकार बना रही है. ईंट-भट्टे पर काम करने वाले, सीमेंट, कोयला, शीशे की फैक्टरी जैसी जगहों पर बिना मास्क के काम करने वाले लोग, रसायन और रंग फैक्ट्रियों में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर वर्ग के लोग तीस पैंतीस साल की उम्र में ही लंग कैंसर के शिकार हो रहे हैं. भारत में हर साल लंग कैंसर के करीब 90 हजार नये मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें 48 हजार से ज्यादा पुरुष और 19 हजार से ज्यादा महिलाएं शामिल हैं. इस रोग की वजह से हर साल हजारों लोगों की मौत हो रही है. स्तन, गर्भाशय ग्रीवा और मुंह के कैंसर के बाद फेफड़े का कैंसर चौथे स्थान पर है. एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल फेफड़े के कैंसर से मरने वालों की संख्या साठ हजार से ज्यादा है.

भारत में लगभग 90 फीसदी फेफड़े के कैंसर के मामले सिगरेट, बीड़ी या हुक्का से जुड़े हैं. फेफड़ों के कैंसर के लिए धूम्रपान सबसे बड़ा कारक है. आजकल मनोरंजन के नाम पर जगह-जगह यूथ हुक्का बार खुल गये हैं. राजस्थान, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में तो हाईवे के किनारे शराब बार के साथ-साथ तमाम हुक्का बार चल रहे हैं. युवा यहां कुछ घंटे के मनोरंजन के लिए इकट्ठा होते हैं और अपने साथ लंग कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का तोहफा समेट कर ले जाते हैं. वहीं गांव-कस्बों में बीड़ी, तम्बाकू और हुक्के के आदी अधिकांश ग्रामीणों में यह बीमारी तेजी से अपने पैर पसार रही है. महानगरीय पर्यावरण में कैंसरकारी तत्वों की मौजूदगी भयावह है. गाड़ियों से निकलने वाला धुआं, फैक्ट्रियों से निकलने वाला पेंट, रसायन और धुआं, कीटनाशक, जलावन का धुआं ये सारे तत्व श्वास और फेफड़ों के लिए जहर साबित हो रहे हैं.

फेफड़ों का कैंसर है क्या?

हमारे शरीर में दो फेफड़े होते हैं. इनमें से किसी एक की भी कोशिकाओं में असामान्य वृद्धि होने के कारण टिश्यूज प्रभावित होने लगते हैं, जिससे लंग कैंसर होता है. फेफड़े शरीर को सांस पहुंचाने का काम करते हैं. इसके खराब होने पर शरीर में कई अन्य तरह की बीमारियां भी पैदा होने लगती हैं, इसलिए समय रहते कैंसर के लक्षणों को पहचानना और उसका इलाज करवाना बहुत जरूरी है.

लंग कैंसर के लक्षण

फेफड़ों का कैंसर होने के कई लक्षण हैं. अगर लम्बे समय तक खांसी बनी हुई है तो इसको नजरअंदाज करना खतरनाक है क्योंकि यह कैंसर का लक्षण हो सकता है. खांसी के साथ खून आना, जल्दी सांस फूलना, घबराहट होना, भूख न लगना, जल्दी थकावट हो जाना, हर वक्त कमजोरी महसूस करना, बार-बार संक्रमण का होना, हड्डियों में दर्द और चेहरे, हाथ या गर्दन में सूजन ये सब कैंसर के लक्षण हो सकते हैं. फेफड़े में होने वाला कैंसर शुरुआती चरण में नहीं पहचाना जा सकता है, क्योंकि शुरुआती वक्त में इसके स्पष्ट लक्षण दिखायी नहीं देते हैं, लेकिन कुछ लक्षणों के सामने आने पर ही यदि समय से जांच करवा ली जाए तो कैंसर को उसके शुरुआती दौर में ही खत्म किया जा सकता है और इंसानी जान बचायी जा सकती है. अपने शरीर में आने वाले बदलावों पर नजर रखें और निम्न में कोई भी लक्षण आपको दिखे तो तुरंत डौक्टर से सम्पर्क करें –

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  1. अगर सांस लेते वक्त आपको हल्की सीटी जैसी आवाज फेफड़ों से आती सुनायी दे, तो तुरंत डौक्टर से सम्पर्क करें. यह आवाज कई तरह की समस्याओं की ओर इशारा करती है, साथ ही यह फेफड़ों से जुड़ी समस्या का स्पष्ट इशारा है.
  2. अगर आप गहरी या लंबी सांस लेने में तकलीफ महसूस करते हैं, तो यह अवरोध सीने में तरल पदार्थ के जमा होने के कारण हो सकता है जो फेफड़ों में कैंसर के कारण पैदा होता है.
  3. यदि आप सीने के साथ-साथ पीठ और कंधों में भी दर्द महसूस करते हैं, तो इसे गंभीरता से लें. यह लसिकाओं के स्थानांतरण के कारण हो सकता है. भले ही आप खुद को स्वस्थ महसूस करें, मगर यह गंभीर रोग की चेतावनी है, इसलिए डॉक्टर से तुरंत मिलें.
  4. यदि सीने में कफ हो रहा है और यह समस्या 2-3 सप्ताह से भी ज्यादा समय तक बनी हुई है, तो यह संक्रमण हो सकता है. इसके अलावा कफ संबंधी अन्य समस्याएं जैसे थूक के साथ रक्त का आना गंभीर बीमारी का लक्षण है. इसको नजरअंदाज न करें.
  5. फेफड़ों के कैंसर का असर बढ़ने पर मस्तिष्क की कोशिकाएं भी इसकी चपेट में आ सकती हैं. ऐसी स्थिति में लगातार सिर में दर्द बना रहता है. कभी-कभी ट्यूमर उत्पन्न हो जाने से उन शिराओं में दबाव पड़ता है जो शरीर के ऊपरी हिस्से में रक्त को संचारित करती है. इससे मस्तिष्क प्रभावित होता है.
  6. चेहरे और गले में सूजन होना भी लंग कैंसर का लक्षण है. अगर अचानक से गले और चेहरे में सूजन या कोई बदलाव दिखायी दे तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें.
  7. हड्डियों में दर्द, जोड़ों, पीठ, कमर और शरीर के अन्य भागों में दर्द को इग्नोर न करें. यह लंग कैंसर के लक्षण हो सकते हैं. हड्डियों में फ्रैक्चर भी इसकी वजह से हो सकता है.
  8. न्यूरोलौजीकल लक्षण के अन्तर्गत नर्वस सिस्टम और न्यूरोलॉजीकल फंक्शन में बदलाव आने से सिरदर्द, चक्कर आना, दौरे आना और पैर व कंधे में अकड़न हो सकती है.
  9. कई बार शरीर में कैल्शियम की मात्रा अधिक हो जाती है, जिससे खून जमना शुरू हो जाता है. यह भी लंग कैंसर के कारण ही होता है.
  10. लगातार थकान रहना या थोड़ा सा चलने पर भी सांस फूलने लगे तो यह भी लंग कैंसर के कारण हो सकता है.

जुर्म सामने आ ही गया

मेरी तैनाती एक ऐसे कस्बे में थी, जो अब बहुत बड़ा शहर बन चुका है. थाने में रिपोर्ट आई कि एक जवान आदमी की लाश खेत में पड़ी है. उस का बाप और बड़ा भाई 2 आदमियों को साथ ले कर थाने आए थे. उन्होंने मृतक का नाम कादिर बताया. रिपोर्ट लिखवा कर मैं घटनास्थल के लिए चल दिया. कस्बा जहां खत्म होता था, वहां से खेत शुरू हो जाते थे. मार्च का आखिरी सप्ताह था. खेतों में फसल खड़ी थी.

लाश मेंड़ से 7-8 कदम फसल के अंदर पड़ी थी. मेंड़ के पास बहुत सारी फसल टूटी पड़ी थी. इस से साफ लगता था कि वहां 2 या 2 से अधिक आदमियों की लड़ाई हुई थी. वहां से खेत के अंदर 2-4 कदम तक फसल टूटी हुई थी. इस का मतलब था कि लाश को थोड़ी दूर घसीट कर ले जाया गया था. लोगों के वहां जाने से पैरों के निशान मिट गए थे. मेंड़ पर भी कोई निशान नहीं था.

मृतक कादिर की उम्र करीब 28 साल थी. पता चला वह जिले के शहर में एक सरकारी दफ्तर में काम करता था. शहर कस्बे से 21 मील दूर था. मृतक 5 दिनों की छुट्टी पर आया हुआ था. मैं ने लाश उलटपलट कर देखी, कपड़े हटा कर शरीर को देखा, लेकिन कहीं भी कोई चोट का निशान नहीं था.

उस के गले में एक गज की रस्सी पड़ी थी, जिस में एक हलकी सी गांठ बंधी थी. अनुमानत: रस्सी उस के गले में डाल कर पीछे की ओर खींचा गया था. मृतक मर गया तो हत्यारे रस्सी गले में ही छोड़ भागे थे. इस में कोई शक नहीं था कि यह हत्या का मामला था.

मैं ने उस की जेब की तलाशी ली तो उस में करीब 100 रुपए निकले. साथ ही एक फोटो भी जिस में उस लड़के के साथ एक सुंदर सी लड़की का फोटो था. मृतक की एक अंगुली में सोने की अंगूठी और हाथ में घड़ी थी. मैं ने उस के पिता से पूछा तो उस ने बताया कि यह लड़की इस की पत्नी है.

फोटो मृतक की अपनी पत्नी से प्रेम की निशानी थी. इसीलिए वह उस का फोटो अपने बटुए में रखे घूम रहा था. बटुए में पैसे, अंगुली में सोने की अंगूठी और कलाई में घड़ी. ये इस बात का सबूत था कि हत्या लूट के लिए नहीं की गई थी और यह काम रहजनों का भी नहीं था. रहजन कैसे लूटते हैं और जरूरत होने पर कैसे हत्या करते हैं, मैं अच्छी तरह जानता था.

मैं ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और मृतक के मोहल्ले में चला गया. वहां मुझे एक सरकारी रिटायर्ड कर्मचारी के घर बिठाया गया. घर के रखरखाव से पता लगता था कि वह किसी अच्छे शिक्षित व्यक्ति का घर है.

मैं ने उस घर में मौजूद लोगों से वे सब बातें पूछीं जो जरूरी होती हैं. मैं ने उन से कहा, ‘‘क्या आप मेरी मदद करेंगे? मरने वाले के घर वालों का व्यवहार कैसा है, इन की किसी के साथ कोई दुश्मनी है या नहीं, आप मुझे सब कुछ बता दें.’’

‘‘जी हां, मैं इसी मोहल्ले का रहने वाला हूं. मैं मृतक कादिर को उस के पिता को, उस के भाई को और उस के घर की औरतों को जानता हूं. पूरा परिवार शरीफ है. कादिर भी शरीफ था. उस के घर की औरतें भी बेहद शरीफ हैं.’’

‘‘मृतक की किसी से दुश्मनी थी?’’

‘‘जहां तक मुझे पता है उस की किसी से दुश्मनी नहीं थी. लेकिन अगर उस के दफ्तर में किसी से दुश्मनी हो तो मैं कह नहीं सकता.’’

मैं ने कहा, ‘‘अगर ऐसा होता तो उसकी हत्या उसी शहर में होती, यहां नहीं.’’

‘‘मैं तो जो जानता हूं, आप को बता रहा हूं. यह देखना आप का काम है. एक मामूली सी दुश्मनी तो है लेकिन उस में हत्या नहीं हो सकती. दरअसल, कादिर की पत्नी एक साल से अपने घर बैठी है. ये लोग उसे बुलाते भी नहीं और तलाक भी नहीं देते.’’

‘‘इस का कारण क्या था?’’

उस ने कहा, ‘‘जहां तक मुझे पता है, कादिर की मां बहुत सख्त है. बहू से हमेशा लड़ती रहती थी. ये लोग कहते हैं कि लड़की ठीक नहीं थी और उन लोगों का कहना है कि लड़की और कादिर में बहुत प्रेम था, जो उस की मां को पसंद नहीं था.’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘कादिर के बटुए से जो लड़की का फोटो निकला है, उस से तो यही लगता है कि कादिर को लड़की से बहुत प्यार था. आप बताइए, लड़की का चालचलन कैसा था?’’

‘‘मैं क्या बता सकता हूं,’’ उस ने कहा, ‘‘आप खुद तफ्तीश कर लीजिए. सुनीसुनाई बात तो मैं आप को बता सकता हूं. मैं ने सुना है कि लड़की एक महीने से घर से गायब है.’’

‘‘गायब है? लेकिन मेरे पास उस के गुम होने की रिपोर्ट नहीं आई.’’

‘‘हो सकता है, बात गलत हो. मैं ने कहा न कि मैं सुनीसुनाई बात कह रहा हूं. जब से वह घर बैठी है, तब से तरहतरह की बातें सुनने को मिलने लगीं. सुना है, लड़की को रात में कहीं आतेजाते देखा गया है.’’

उस की सुनीसुनाई बात पर मैं यकीन नहीं कर सकता था, लेकिन एकदो इशारे मिल गए थे, जिन पर मुझे काम करना था. मैं ने मृतक के पिता को बुलाया. मैं ने उस से पहला सवाल यही किया कि क्या आप की किसी से दुश्मनी थी?

उस ने रोते हुए जवाब दिया, ‘‘हमारी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है, साहब.’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘देखो, मुझे तुम्हारे बेटे के हत्यारे को पकड़ना है, इसलिए जो बात भी मैं पूछूं, उस का ठीकठीक जवाब देना, कोई बात छिपाना नहीं. यह बताओ, क्या लड़के की ससुराल वालों से तुम्हारा झगड़ा चल रहा है?’’

‘‘उन की बेटी मेरे बेटे के साथ नहीं रह सकी. शादी के 6 महीने तक वह हमारे घर रही, फिर अपने घर चली गई और उस के बाद वापस नहीं आई.’’

‘‘मुझे इस से कोई मतलब नहीं कि लड़की को घर बिठाने में किस की गलती है, मुझे केवल इतना बता दो कि क्या लड़की वालों से तुम्हारी दुश्मनी इतनी बढ़ गई कि उन्होंने तुम्हारे बेटे की हत्या कर दी?’’

उस ने कहा, ‘‘मेरे जवान बेटे की हत्या हो गई है. मैं तो हर किसी को दोषी बता दूंगा. शुरू में तो उस के सालों पर शक था, लेकिन बाद में मैं ने बहुत सोचा कि अगर उन्हें हत्या ही करनी होती तो काफी दिन पहले कर चुके होते, क्योंकि बहू को मायके में एक साल हो गया.’’

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‘‘उन के पास कारण तो है, आप उन की बेटी को तलाक देना नहीं चाहते. उन की बेटी जवान है, सुंदर है. हो सकता है, उन्होंने सोचा हो कि लड़के को रास्ते से हटा दें, उस के बाद अपनी बेटी की शादी कर देंगे.’’

‘‘कौन सी बेटी की शादी करेंगे?’’ उस ने कहा, ‘‘वह तो एक महीने से लापता है.’’

‘‘आप को पूरा यकीन है?’’

‘‘सारे मोहल्ले की औरतें कहती हैं, पहले वह आतीजाती दिखाई दे जाती थी, लेकिन अब बिलकुल नहीं दिखती.’’

मैं ने पूछा, ‘‘लड़की के कितने भाई हैं, उस के पिता का आचरण कैसा है?’’

‘‘पैसे के मामले में तो खुशहाल हैं, पिता होशियार आदमी है. काफी असर रखता है. 3 बेटे हैं, 2 बड़े बेटे तो ठीक हैं, लेकिन छोटा ठीक नहीं है. उस की उम्र 16-17 साल है, वह बदमाश लड़कों में बैठता है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘एक बात बताओ, लड़की को कौन तलाक नहीं देना चाहता था, आप, लड़का या उस की मां?’’

‘‘मेरा बेटा कादिर,’’ वह दहाड़ें मार कर रोने लगा, ‘‘वह तो अपनी पत्नी को अपने साथ रखना चाहता था और मैं भी यही चाहता था. लेकिन मेरी पत्नी बहुत खराब है. उस ने कह दिया था कि तलाक देनी ही है. बहुत जिद्दी और झगड़ालू औरत है. मेरे काबू में नहीं है. मैं ने दोनों बेटों से कह दिया था कि इस औरत के साथ रहना है तो आंख और कान बंद कर के रहना.’’

‘‘क्या कादिर के ससुराल वालों को पता था कि कादिर लड़की को रखना चाहता है?’’

उस ने कहा, ‘‘यह बात तो कादिर ही बता सकता था. मुझे तो इतना पता है कि वे लोग तलाक के लिए कहते रहे और मेरी पत्नी जवाब देती रही.’’

‘‘क्या लड़की अब कुछ खराब हो गई थी?’’

‘‘बातें कुछ ऐसी ही सुनी हैं.’’ मृतक के पिता ने कहा, ‘‘यह भी सुना है कि उसे रात को कहीं आतेजाते देखा गया था.’’

‘‘क्या तुम्हें पता है कि वह किस के पास जाती थी?’’

‘‘यह तो पता नहीं किस के पास जाती है लेकिन अब पता करूंगा.’’ उस ने जवाब दिया.

इस बातचीत के बाद मैं ने मृतक के पिता को भेज दिया और लड़की के पिता को बुलाया. उस के आते ही मैं ने उस से सवाल किया कि लड़की कहां है. वह चुप रहा. मैं ने फिर पूछा तो वह इधरउधर देखने लगा. जब मैं ने उसे थानेदार वाले अंदाज में डांट कर पूछा तो वह बोल पड़ा, ‘‘वह तो यहा नहीं है.’’

‘‘मुझ से इज्जत कराना चाहते हो तो सचसच बताओ, वह कहां गई है और किस तरह गई है?’’

‘‘बस जी…’’ उस के कहने के अंदाज से लग रहा था कि वह सब कुछ बताना नहीं चाह रहा था. उस ने कहा, ‘‘एक रात वह सोई थी और सुबह को देखा तो गायब थी. उस की अटैची भी नहीं थी. कुछ जेवर, कीमती सामान, अच्छे कपडे़ और 2 जोड़ी सैंडिल ले गई.’’

‘‘क्या आप जाहिल आदमी हैं, थाने में रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवाई?’’

‘‘नहीं…बिलकुल साफ मामला था. अटैची, कपड़े, जेवर, जूते ले जाने का अर्थ था कि वह अपनी मरजी से गई थी. अगर कोई जबरदस्ती ले जाता तो यह सब कुछ न ले जाती. रिपोर्ट अपनी इज्जत के लिए नहीं लिखवाई.’’

‘‘कहीं तलाश किया था? उस की ससुराल जा कर पता करते.’’ मैं ने कहा.

‘‘ससुराल से क्यों पूछते, उन से तो उस की बोलचाल भी बंद थी.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘आप की बेटी रातों को किस से मिलती थी,’’ मैं ने पूछा, ‘‘आप को पता तो होगा?’’

‘‘नहीं सर, ऐसा नहीं है. यह उसे बदनाम करने के लिए उस की सास द्वारा उड़ाई हुई बात है. इस से वह यह साबित करना चाहती है कि उस का चालचलन खराब था इसलिए उस के बेटे ने उसे घर से निकाल दिया.’’

उस से मैं ने बहुत बातें पूछीं लेकिन कोई काम की बात पता नहीं लगी. मैं ने लड़की की मां को बुला कर पूछा कि लड़की कहां है तो उस ने भी वही जवाब दिया जो उस के पिता ने दिया था.

पोस्टमार्टम के बाद लाश घर आ गई. मरने का कारण सांस का रुकना लिखा था. सांस रस्सी से रोकी गई थी. मरने का समय रात के 10, साढ़े 10 बजे का लिखा था. मैं ने मुखबिरों का जाल बिछा दिया था. वे अपनी रिपोर्ट ले कर आ रहे थे. कोई कुछ और कोई कुछ बता रहा था, लेकिन एक आदमी ने जो खबर दी, उस से मेरी कुछ हिम्मत बढ़ी.

उस ने बताया कि एक आदमी जो उसी कस्बे में रहता है, मृतक का मित्र था, कस्बे में मनिहार की सब से बड़ी दुकान उसी की थी. वह जवान और सुंदर था. 2 मुखबिरों ने बताया कि उस लड़की को रात के समय उस के घर से निकलते देखा है. उन दोनों मुखबिरों में से एक ने बताया कि एक बार शाम के बाद एक गली में दोनों को खड़े देखा था. जब मैं उधर से गुजरा तो मुझे देख कर वह लड़की तेजी से अपने घर की ओर चली गई.

मैं ने अगले दिन थाने में कई लोगों को बुलवाया, जिन में मृतक की मां और मृतक का वह मित्र भी था. मैं ने उसे अलग बुला कर पूछा कि क्या मृतक की पत्नी तुम से मिलने आती थी?

उस ने कहा, ‘‘जी, मेरे पास आ कर वह क्या करती, मैं तो उसे अपनी बहन मानता था. हां, वह 2-3 बार मेरे पास आई और कहने लगी कि वह अपने पति के घर जाना चाहती है. यह बात आप कादिर को कह दें. आप यकीन करें, मेरी और मृतक की दोस्ती दिल की गहराइयों में उतरी हुई थी. लड़की को जो लोग बदनाम करते हैं, वह सब बकवास है. वह बेचारी तो अपने पति के पास जाने के लिए तड़पती थी.’’

वह इस तरह की बातें करता रहा और अपने मित्र को याद कर के रोता रहा. उस ने बहुत सी बातें कीं लेकिन एक बात का जवाब वह ठीक से नहीं दे सका. मैं ने उस से पूछा था कि लड़की कहां गायब हुई है?

उस ने कहा, ‘‘उस के लापता हो जाने से मैं उसे खराब नहीं कहूंगा. वह इतनी नीच नहीं है कि जिस पति के साथ रहना चाहती थी, उसे धोखा दे. अगर वह जिंदा है तो जरूर वापस आएगी.’’

‘‘क्या बात करते हो,’’ मैं ने कहा, ‘‘वह तो घर से बहुत सामान ले कर गई है. कैसे वापस आएगी?’’

‘‘मुझे उस पर पूरा भरोसा है, वह जरूर आएगी.’’

मैं ने कहा, ‘‘ये बातें कह कर मुझे शक में डाल रहे हो. साफ कहूं तो मुझे लगता है कि तुम मुझ से कुछ छिपा रहे हो.’’

‘‘सर, मैं आप को यह बताने वाला था कि कादिर के साले मेरे पास भी आते थे. उन से दोस्ती तो नहीं थी, लेकिन दूर से दुआसलाम थी. फिर अचानक ऐसा न जाने क्या हुआ कि जो भाई भी मिलता, वह कादिर को गालियां देता. वे कहते थे कि हम पूरे खानदान को बरबाद कर देंगे. छोटा भाई तो यहां तक कहता था कि कादिर और उस की मां अब 2-3 दिन के मेहमान हैं. मैं हैरान था कि ये लोग अब ऐसी बातें क्यों कह रहे हैं, जबकि इन की बहन को ससुराल से गए एक साल हो गया है. 2-3 दिन बाद पता लगा कि उन की बहन घर से भाग गई है.’’

‘‘सुना है, कादिर के छोटे साले का गुंडों से याराना है और वह अपने आप को बहुत बड़ा बदमाश समझता है.’’

‘‘आप ने ठीक सुना है, वह बहुत छिछोरा लड़का है.’’

इस आदमी से मुझे बहुत काम की बातें पता चलीं. मैं ने उसे जाने दिया.

मुझे बताया गया कि कादिर की पत्नी की 2 सहेलियां और उन के पिता आए हैं. मैं ने उन्हें बुलाया और उन के पिताओं से कहा कि आप निश्चिंत रहें, ये मेरी बहनों के बराबर हैं. मैं केवल इन से कादिर की पत्नी के बारे में पूछूंगा.

मैं ने एक लड़की को बुलाया और उस से कुछ सवाल किए. फिर दूसरी को बुला कर कुछ सवाल पूछे. दोनों ने एक ही बात बताई. उन्होंने बताया कि वह लड़की बहुत हिम्मत वाली और चरित्रवान थी और अपने पति के अलावा किसी और का नाम नहीं लेती थी.

उन लड़कियों को भेजने के बाद मैं ने कादिर के बड़े साले को बुलाया. मैं ने उस से कहा, ‘‘अपना इकबाली बयान दे दो और मुझ से फायदा हासिल कर लो. मैं तुम्हें बरी भी करवा सकता हूं. मेरी तुम्हारी कोई दुश्मनी नहीं और जो मारा गया वह मेरा रिश्तेदार नहीं लगता था.’’

उस ने घबरा कर कहा, ‘‘हम ने कोई हत्या नहीं की है. अगर हमें हत्या करनी होती तो उसी दिन कर देते, जिस दिन उस ने हमारी बहन को ले जाने से मना कर दिया था.’’

दूसरे नंबर के भाई ने भी यही बयान दिया. तीसरे नंबर का भाई मेरे कमरे में ऐसे झूमता हुआ आया, जैसे कोई माना हुआ गुंडा हो. मैं ने उसे कुरसी पर बिठा कर कहा, ‘‘तुम्हें देख कर मैं बहुत खुश हुआ. सुना है, तुम्हारी इस शहर में बहुत इज्जत है और दबदबा भी. लोग तुम से डरते हैं.’’

उस ने झूम कर कहा, ‘‘किसी की हिम्मत नहीं जो मेरे सामने बोल सके.’’

मैं ने उस के अंदर इतनी हवा भरी कि वह गुब्बारे की तरह फूलता चला गया. उस का नाम आबिद था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘एक बात बताओ, तुम्हारी बहन कहां चली गई?’’

उस ने कहा, ‘‘अगर उस का पता लग जाता तो क्या वह आदमी और मेरी बहन जिंदा रहते?’’

‘‘तुम्हारी यह बात सुन कर मुझे बहुत खुशी हुई,’’ मैं ने उस से इस तरह बात की जैसे मैं थानेदार नहीं उस का दोस्त हूं. मैं ने आगे कहा, ‘‘तुम्हारे जैसे भाई अपनी इज्जत के लिए अपनी जान की भी परवाह नहीं करते. पर एक बात मेरी समझ में नहीं आई कि तुम्हारे जीजा को किस ने मारा?’’

‘‘यह तो मैं भी नहीं बता सकता. वैसे एक बात है, ऐसे आदमी का अंत ऐसा ही होना चाहिए था. किसी की बहनबेटी का घर उजाड़ देना ठीक नहीं है. पुलिस और कानून के पास इस की भले ही कोई सजा न हो, लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि ऐसे आदमी का कुछ न किया जा सके.’’

‘‘तुम ने उस की मां को क्यों माफ कर दिया, उसे भी उड़ा देना चाहिए था. असली कुसूरवार तो वही है.’’ मैं ने कहा.

‘‘अब उसी की बारी है,’’ उस ने ऐसे कहा जैसे नशे में हो.

‘‘बरी कराना मेरा काम है,’’ मैं ने उस के कंधे पर हाथ रख कर दोस्तों की तरह कहा.

वह अपना हाथ बढ़ा कर मेरा हाथ पकड़ते हुए बोला, ‘‘वादा रहा.’’

‘‘तुम वास्तव में शेर हो, अब देखना कादिर की हत्या से मैं तुम्हें कैसे बरी कराता हूं. एक दिन की भी सजा नहीं होने दूंगा. मैं भी 2 बहनों का भाई हूं. तुम ने मेरा दिल खुश कर दिया.’’

फिर मैं ने उस की ओर झुक कर उस के कान में कहा, ‘‘वैसे तुम अकेले थे या…’’

‘‘नहीं,’’ उस के मुंह से एकदम निकल गया, ‘‘मैं अकेला नहीं था.’’

यह कह कर वह एकदम चौंक पड़ा, जैसे नींद से जाग गया हो. वह घबरा गया. उस ने दाएंबाएं देख कर मेरी ओर देखा. उस के चेहरे का रंग पीला पड़ गया था. फिर आहिस्ताआहिस्ता उस के मुंह से आवाजें निकलने लगीं, ‘‘मैं ने उस की हत्या नहीं की…नहीं जी…आप यकीन करें, खुदा कसम मैं ने किसी की हत्या नहीं की.’’

मैं चुपचाप उस के मुंह की ओर देख रहा था. उस के मुंह से ऐसे शब्द निकल रहे थे, जिस का कोई अर्थ नहीं था.

थानेदार के सामने अपराध स्वीकार करने की कोई वैल्यू नहीं होती. क्योंकि बाद में लोग मजिस्ट्रैट के सामने अपने बयान से पलट जाते हैं. केस के लिए सुबूत और गवाहों की जरूरत होती है.

‘‘तुम बोलबोल कर थक गए हो,’’ मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम इकबाली बयान दे दो. मैं तुम्हें साफ बचा लूंगा.’’

‘‘मैं ने कहा न,’’ बड़ी मुश्किल से उस के मुंह से शब्द निकले, ‘‘आप मेरे ऊपर विश्वास करें, मैं ने कोई हत्या नहीं की.’’

‘‘तुम ने नहीं की तो तुम्हारे किसी दोस्त ने की होगी. तुम ने तो केवल उस के हाथ पकड़े होगे, गले में रस्सी तो तुम्हारे दोस्त ने डाली होगी. तुम उस का नाम बता दो, मैं तुम्हें सरकारी गवाह बना दूंगा और तुम छूट जाओगे.’’

वह अपने आप को निर्दोष बताने में लगा रहा. मैं ने उसे चेतावनी दी कि अगर उस ने अपराध स्वीकार नहीं किया तो फिर मैं बहुत बुरा सलूक करूंगा.

मैं ने एक कांस्टेबल को बुला कर कहा कि उसे हवालात में बंद कर दे. वह हवालात में जाने को तैयार नहीं था. मेरे कमरे में कूदकूद कर अपने आप को छुड़ा रहा था. कांस्टेबल उसे घसीट कर हवालात में ले गया.

थाने में जितने लोग थे, मैं ने उन्हें जाने के लिए कह दिया. मैं ने एक कांस्टेबल और एएसआई को यह पता करने के लिए लगा दिया कि आबिद के कौनकौन दोस्त हैं. मैं ने उन से कहा कि मैं घर जा रहा हूं और रात को 11 बजे आ कर आबिद से पूछताछ करूंगा.

मैं घर चला गया. अभी बैठा ही था कि एक कांस्टेबल ने आ कर बताया कि वह लड़की अपने घर आ गई है और सीधी मृतक के घर गई है. वहां जा कर उस ने रोनापीटना शुरू कर दिया है. उस ने जाते ही अपनी सास को गालियां देनी शुरू कर दीं. औरतों ने उसे पकड़ लिया.

मैं ने कांस्टेबल से कहा कि तुम लड़की के बाप के पास जाओ और उसे कहो कि लड़की को तुरंत थाने में पेश करे. मैं खाना खा कर थाने पहुंच कर उस लड़की की प्रतीक्षा करने लगा.

कुछ देर बाद लड़की मेरे कमरे में लाई गई. उस ने अपने मुंह पर हाथ मारमार कर चेहरा लाल कर लिया था. बालों को नोचा था, इसलिए बाल बिखरे हुए थे. आंखें लाल हो रही थीं, मैं ने उस के बाप और भाई को बाहर भेज दिया. मैं ने उसे कुरसी पर बिठा कर पानी पिलाया और उस के पति के मरने का अफसोस जताया. मैं ने उसे हर तरह से सांत्वना दी.

‘‘न थाने से डरो न मुझ से.’’ मैं ने कहा, ‘‘समझो, तुम मेरी छोटी बहन हो. मैं तुम से केवल यह पता करना चाहता हूं कि तुम्हारे पति की हत्या किस ने की है.’’

‘‘उस की मां ने…’’ उस ने मेरी ओर देखते हुए कहा.

यह पहली बात थी, जो उस के मुंह से निकली थी. वह चुपचाप बैठी फटीफटी आंखों से मुझे देख रही थी.

वह थोड़ा पानी पी कर बोली, ‘‘उस चुड़ैल ने अपने ही बेटे को खा लिया है.’’

मैं ने उसे बोलने दिया ताकि उस के दिल का बोझ हलका हो जाए.

उस ने आगे कहा, ‘‘मैं तो कहती हूं, मेरे पति की मेरे बाप और मेरे भाइयों ने भी हत्या की है. मैं उन से कहती थी कि जिस तरह से कादिर का बड़ा भाई अपने घर से अलग हो कर उसी हवेली में रह रहा है, उसी तरह कादिर को भी मैं अलग कर लूंगी. लेकिन मेरा बाप और भाई कहते थे कि कादिर पर यकीन मत करो, वह अपनी मां जैसा है. वह एक कहता है तो तुम 10 सुनाओ. आप नहीं जानते कादिर को. वह मुझ से कितना प्यार करता था.’’ इतना कह कर वह इतना रोई कि मुझे भी हिला दिया.

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कुछ देर बाद जब उस ने रोना बंद किया तो मैं ने उस से पूछा, ‘‘यह बताओ, तुम चली कहां गई थी?’’

‘‘अपने पति के पास गई थी.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘क्या?’’

इस के बाद उस ने जो बयान दिया, वह अपने शब्दों में सुनाता हूं.

उस लड़की का नाम खदीजा था. उस के मांबाप ने उसे घर बिठा लिया था. कादिर खदीजा को तलाक नहीं देना चाहता था और न ही वह तलाक लेना चाहती थी. कादिर की मां उसे तंग करने के लिए तलाक नहीं दिलवाना चाहती थी. लेकिन कादिर और उस की पत्नी खदीजा की सोच कुछ और थी. वे एकदूसरे से अलग हो कर तड़प रहे थे.

कुछ महीने बाद कादिर ने अपने दोस्त जलील से बात की. जलील ने अपनी पत्नी की मदद से दोनों को मिलवाने का प्रबंध कर दिया. जलील की पत्नी ने खदीजा से जा कर कहा कि कादिर उस से मिलना चाहता है. वह उस के घर आ गई. उस ने एक कमरे में दोनों को मिलवा दिया.

कादिर जिस शहर में काम करता था, वह उन के कस्बे से 20-22 किलोमीटर दूर था. रविवार की छुट्टी हुआ करती थी. कादिर हर शनिवार की शाम को घर आ जाता था और वहां से जलील के घर चला जाता, जहां खदीजा से उस की मुलाकात हो जाती थी. जलील की पत्नी ने खदीजा से गहरी दोस्ती कर ली थी. खदीजा के मातापिता जलील की पत्नी पर विश्वास करते थे. वह हर शनिवार को आ कर उन से कह कर खदीजा को ले जाया करती थी.

जलील और उस की पत्नी ने खदीजा के मिलने का प्रबंध तो कर दिया था, लेकिन इस में खतरा यह था कि कभी न कभी यह राज खुल सकता था. इसलिए वह उन्हें एक सप्ताह छोड़ कर मिलवाती थी.

एक दिन कादिर ने यह फैसला किया कि खदीजा अपना घर छोड़ कर हमेशा के लिए आ जाए और कादिर उसे अपने सा िशहर ले जा कर रख ले. वे दोनों फिर कभी इधर नहीं आएंगे. और अगर उन के मातापिता को पता लग गया तो वह इस शर्त पर वापस आएंगे कि आपसी झगड़े खत्म करो और हमें चैन से रहने दो.

एक रात कादिर शहर से आया. उस के घर वालों को पता नहीं था. खदीजा ने दिन के समय अपने वे कपड़े और जेवर जो उस ने अपने साथ ले जाने थे, चोरीचोरी एक अटैची में डाल लिए. रात को जब सब सोए हुए थे, वह चुपके से घर से निकल गई. कादिर और जलील खेत में खड़े थे. वे दोनों जलील के घर गए और सुबहसुबह कादिर और उस की पत्नी शहर जाने वाली बस में सवार हो कर शहर चले गए. वहां कादिर ने एक मकान किराए पर लिया हुआ था. वहां दोनों चैन से रहने लगे.

कादिर ने किसी वजह से दफ्तर से 4-5 दिन की छुट्टी ले ली थी. उस के घर का कोई काम था. वह खदीजा को शहर में अकेला छोड़ आया था और उस ने अपने 2 मित्रों से घर की देखभाल के लिए कह दिया था. खदीजा ने मुझे बताया कि कादिर ने तय किया था कि वह एक महीने बाद अपने मातापिता को बता देगा कि खदीजा उस के पास है और वह कभी वापस नहीं आएगा.

‘‘क्या तुम कादिर की हत्या की बात सुन कर आई हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हां जी,’’ उस ने कहा, ‘‘जलील भाईजान ने अपने एक आदमी को यह कह कर कादिर के दफ्तर भेजा था कि वह कादिर के दोस्त को कह दे कि उस की हत्या हो गई है. उस दोस्त ने घर आ कर मुझे बताया और उसी ने मुझे बस में बिठाया था. अगर किसी को शक है कि मैं झूठ बोल रही हूं तो आप किसी को मेरे साथ भेज दें, मैं उसे वह मकान दिखाऊंगी जिस में हम दोनों रहते थे. कादिर के और मेरे कपड़े व जेवर अभी भी उस मकान में पड़े हैं. चलिए, मैं चल कर दिखाती हूं.’’

यह लड़की जिसे मैं कुछ और समझ रहा था, मेरी नजरों में बहुत ऊंचे कैरेक्टर की हो गई. मैं ने एक कांस्टेबल को जलील को लाने के लिए भेज दिया.

मैं ने खदीजा से पूछा, ‘‘तुम्हारा शक किस पर है? ऐसा तो नहीं कि तुम्हारे भाइयों को तुम्हारे जाने का पता लग गया हो और उन्होंने इस में अपनी बेइज्जती समझी हो.’’

‘‘मैं क्या बताऊं, यह हो तो सकता है लेकिन इस के लिए पहले वे मेरे पास आते और पूरी बात पता करते, मुझ से घर चलने के लिए कहते.’’

मैं ने उसे यह नहीं बताया कि उस का छोटा भाई हवालात में बंद है. मैं ने खदीजा से और कुछ नहीं पूछा और उस के बाप को बुला कर खदीजा को उस के हवाले कर दिया. मैं ने उस से कह दिया कि यह अपने पति के घर गई थी, लोगों से कह दो कि इसे बदनाम न करें.

जलील मेरे पास आया और मैं ने उस से पूछा कि तुम ने खदीजा के बारे में क्यों नहीं बताया? क्या तुम नहीं जानते कि तफ्तीश के दौरान कोई भी बात पुलिस से नहीं छिपाना चाहिए?

उस ने कहा, ‘‘मैं जानता था या नहीं, मैं ने यह बात छिपाई. आप जो भी चाहें मेरे खिलाफ कानूनी काररवाई कर सकते हैं. मैं ने अपना फर्ज पूरा किया है, आप अपना फर्ज पूरा करें.’’

मुझे उम्मीद थी कि वह डर जाएगा, लेकिन वह तो बहुत निडर निकला. मैं ने उस से पूछा कि उस ने कौन सा फर्ज पूरा किया है.

वह बोला, ‘‘दोस्ती का फर्ज पूरा किया है. मुझे कादिर ने कुछ भी बताने से मना कर दिया था. खदीजा ने भी मना कर रखा था. खदीजा मेरी बहन लगती है, उस से किया हुआ वादा मैं नहीं तोड़ सकता था. मैं ने आप की नजरों में अपराध किया है, आप जो चाहे, मुझे सजा दे सकते हैं.’’

वैसे उस ने कोई अपराध नहीं किया था, क्योंकि खदीजा के गुम होने की मेरे पास कोई रिपोर्ट नहीं आई थी. इसलिए अगर उस ने कोई बात छिपाई तो वह कानून की नजरों में अपराध नहीं थी. मैं तो उस से खदीजा के बयान की पुष्टि चाहता था.

जलील ने कहा, ‘‘मैं आप को एक बात बताता हूं. जिस समय कादिर की हत्या हुई थी, उस से आधे घंटे पहले एक आदमी ने खदीजा के भाई को एक आदमी के साथ खेत की मेंड़ पर बैठे देखा था. उन दोनों की उस आदमी के साथ दुआसलाम भी हुई थी. कादिर उस रास्ते से मेरे घर आया करता था. गलियों से आने में रास्ता लंबा पड़ता है. आप चाहें तो उस आदमी को बुला सकते हैं.

‘‘जो आदमी आबिद के साथ बैठा था, मैं उसे जानता हूं. वह एक बार का सजायाफ्ता सलीम था. उस ने किसी को चाकू मारा था. वह तो बच गया लेकिन चाकू मारने वाले को दफा 307 में 3 साल की सजा हुई थी.’’

मैं ने एक कांस्टेबल को सलीम को बुलाने के लिए भेजा.

मैं ने आबिद को हवालात से निकलवा कर अपने कमरे में बुलाया. उसे बिठा कर मैं ने कहा, ‘‘हां भई आबिद, कुछ सोचा? अपराध स्वीकार कर लो, फायदे में रहोगे.’’

उस ने मना कर दिया और छोड़ने के लिए मिन्नतें करने लगा.

मैं ने उस से कहा, ‘‘अच्छा यह तो बताओ, सलीम के साथ खेत में बैठे तुम क्या बातें कर रहे थे?’’

उस ने कहा, ‘‘कब?’’

‘‘अपने जीजा की हत्या करने से आधे घंटा पहले.’’

‘‘यूं ही बातें कर रहे थे.’’

‘‘इतनी ठंडी रात में तुम्हें बात करने के लिए वही जगह मिली थी. लोग घरों में दरवाजेखिड़की बंद कर के लिहाफ में लेटे हुए थे. तुम दोनों को गरमी लग रही थी. सलीम से क्या बातें हुई थीं, सोच लो अगर झूठ बोलोगे तो मैं सलीम से पूछ लूंगा. फिर तुम्हारा झूठ खुल जाएगा.’’

‘‘सच्ची बात है जी, मैं अपनी बहन और जीजा के बारे में बात कर रहा था. उस ने हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी थी. सलीम मेरे जीजा और उस की मां को गालियां दे रहा था.’’

‘‘फिर कादिर आ गया और तुम्हारी बातें रुक गईं.’’

‘‘कादिर नहीं आया था जी,’’ उस ने कहा.

मैं ने उस के मुंह पर जोरदार थप्पड़ मारा. वह रोने लगा. मैं उस से पूछता रहा, वह झूठ बोलता रहा. मैं हर झूठ पर उसे थप्पड़ मार रहा. मैं ने उस से कहा कि पिटाई के और भी बहुत से तरीके हैं मेरे पास. अगर वह पिटाई से मर भी गया तो उस की लाश गायब कर दी जाएगी.

एक कांस्टेबल ने आ कर बताया, ‘‘सलीम आ गया है.’’

मैं ने उसे अंदर बुलाया और आबिद से पूछा, ‘‘यही था न उस वक्त तुम्हारे साथ?’’

उस ने हां कर दी.

मैं उसे कमरे में छोड़ कर सलीम को हवालत के एक खाली कमरे में ले गया और उस से पूछा, ‘‘तेरे यार ने सब कुछ बक दिया है. तू तो गुरु आदमी है, तूने यह क्या गलती की, इतने कच्चे आदमी के साथ जा कर उस का काम तमाम कर दिया.’’

पलभर रुक कर मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम ने हमारी बहुत मदद की है. मैं तुम्हें बचाना चाहता हूं. अगर तुम ने सच नहीं बोला तो थाने में तुम्हारा पूरा रिकौर्ड मौजूद है. मैं उसे अदालत में पेश कर दूंगा और तुम सीधे फांसी चढ़ जाओगे.’’

उस ने कहा, ‘‘मुझे सरकारी गवाह बना लो.’’

‘‘अरे तुम बयान तो दो, यह मेरे ऊपर छोड़ दो. देखो मैं क्या करता हूं.’’

मैं ने उस से कई तरह की बातें कर के उस का बयान ले लिया. उसे संक्षेप में सुनाता हूं.

आबिद और सलीम की दोस्ती थी. सलीम पक्का बदमाश था और आबिद तो बदमाशी में मुंह मारता ही था. उसे घर से पैसे मिल जाया करते थे. वह घर में पैसों की चोरी भी कर लिया करता था. सलीम और दूसरे दोस्तों ने आबिद को जुए का चस्का भी लगा दिया था.

आबिद की बहन ससुराल से आ कर घर बैठ गई थी. उस की सास उस के साथ जो सलूक करती थी, वह घर आ कर सुनाती थी. सुन कर आबिद को गुस्सा आता था. उस ने सलीम से कहा कि वह बदला लेना चाहता है. सलीम उसे रोकता था. कुछ दिन बाद आबिद की बहन घर से गायब हो गई. घर वालों ने इस बात को छिपा कर रखा. लेकिन धीरेधीरे सब को पता लग गया.

आबिद अपने आप को बहुत बड़ा बदमाश समझता था. उसे यह वहम था कि सारा कस्बा उस से डरता है. एक दिन उस की किसी से लड़ाई हो गई तो उस ने उसे ताना दिया, ‘‘जा पहले अपनी बहन को तो ढूंढ, जो तुम्हारे मुंह पर थूक कर अपने यार के साथ चली गई.’’

आबिद को अपनी बहन की बजाय कादिर पर गुस्सा आया. अगर उस की बहन को कादिर अपने घर रहने देता तो वह घर से क्यों भागती. उसे इस बात पर भी गुस्सा था कि कादिर उस की बहन को तलाक नहीं दे रहा था.

उन्हीं दिलों सलीम को कुछ पैसे की जरूरत पड़ गई. आबिद ने उस के आगे अपने घर का रोना रोया और कादिर की हत्या करने का इरादा जाहिर किया. उस ने सलीम से कहा कि वह उस की मदद करे. सलीम को पैसों की जरूरत थी. उस ने कहा कि अगर उसे एक हजार रुपए मिल जाएं तो उस की जरूरत पूरी हो सकती है.

आबिद ने उस से कहा, ‘‘मैं तुम्हें अभी तो एक हजार नहीं दे सकता. 2-3 दिन में 5 सौ रुपए दे सकता हूं. बाकी बाद में दे दूंगा. तुम कादिर की हत्या करने में मेरी मदद करो. यह रकम तुम से वापस भी नहीं लूंगा.’’

उस जमाने के एक हजार आज के 50 हजार के बराबर होते थे. सलीम तुरंत तैयार हो गया. वे दोनों कादिर की हत्या करने की योजना बनाने लगे. वे चाहते थे कि काम भी हो जाए और उन का नाम भी न आए. दोनों इस काम के लिए शहर गए, जिस से कि कादिर की हत्या वहां की जा सके. सलीम ने यह काम अपने ऊपर ले लिया कि वह शहर जा कर कादिर से उस का पता ले लेगा और फिर आसानी से उस की हत्या उस के घर में ही कर दी जाएगी.

संयोग से कादिर छुट्टी ले कर घर आया और उसे आबिद ने देख लिया. आबिद ने देखा कि कादिर जलील के घर खेतों से हो कर जाता है. हत्या की रात आबिद ने कादिर को जलील के घर जाते देख लिया, उस ने सलीम को बताया और उसे 3 सौ रुपए भी दे दिए. सलीम अपने घर से रस्सी ले आया और दोनों कादिर के रास्ते में घात लगा कर बैठ गए.

कादिर वापस आया तो दोनों धीरेधीरे उस के पीछे चलने लगे, जिस से कि कादिर को शक न हो और वह उन्हें पहचान न सके.

कादिर ने अंधेरे के कारण उन्हें नहीं पहचाना. वह अभी कुछ ही दूर गया होगा कि आबिद ने उसे पीछे से जकड़ लिया और सलीम ने पीछे से उस के गले में रस्सी डाल कर एक गांठ लगा दी. आबिद ने कादिर को छोड़ कर रस्सी का एक सिरा पकड़ लिया. दूसरा सिरा सलीम ने पकड़ा और दोनों ने रस्सी को अपनीअपनी ओर खींचा. कादिर गिरा तो दोनों उसे खींच कर खेतों के अंदर ले गए. सलीम ने उस के दिल और कलाई पर हाथ रख कर देखा, वह मर चुका था.

मैं ने यह बयान आबिद को बताया और उसे चकमा दिया कि मौके का कोई गवाह नहीं है, इसलिए वह बच जाएगा. उस ने भी अपना बयान दे दिया. मैं ने दोनों के बयान जुडीशियल मैजिस्ट्रैट के सामने करा कर दोनों को जुडीशियल लौकअप में भेज दिया.

मैं ने मुकदमा बहुत मेहनत से तैयार किया. कोई भी खाना खाली नहीं छोड़ा. दोनों अभियुक्तों को मृत्युदंड मिला. सैशन में अपील की गई तो वह भी निरस्त हो गई. रहम की अपील भी. दोनों को फांसी दे दी गई.  ?

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किचन में सीलन से बचने के लिए अपनाएं ये टिप्स

अगर आपके किचन में सीलन की  समस्या है तो इसका सबसे ज्यादा असर रसोई में रखे खानें की सामग्री पर पड़ता है. इसलिए इससे बचने के लिए कुछ सावधानियां बरतनी जरुरी है.

सीलन से बचने के लिए आप ये उपाय अपना सकती हैं-

  • ड्राई-फ्रूटस को भी एयरटाइट कन्टेनर में रखें. यदि सील गए हों, तो माइक्रोवेव में थोड़ा गर्म कर लें, ताकि इसकी नमी खत्म हो जाए.
  • पापड़ को हल्का सेंककर उसे जिप लौक पैकेट में रख लें, ताकि लंबे समय तक वह करारा रह सकें.
  • सूजी को भूनकर एयरटाइट डिब्बे में डालकर फ्रिज में रखा जा सकता है. मैदे या बेसन को भी अच्छे से  पैक करके आप फ्रिज में रख सकती हैं. बेसन का स्वाद खराब न हो, तो बेसन में आप लौंग या तेजपत्ता भी रख सकती हैं.
  • हरे प्याज को धोकर, सुखाकर फ्रीजर में रख सकती हैं.
  • अदरक को ज्यादा दिन तक फ्रेश रखना चाहती हैं, तो इसे फ्रीजर में रखें.इसी तरह आप मशरूम को कागज के लिफाफे में रखकर फ्रीज में रख सकती हैं. बहुत दिनों तक ये खराब नहीं होंगे.
  • आटे को नमी से बचाने के लिए उसमें एक तेजपत्ता डाल दें.
  • आलू और प्याज को कभी भी एक साथ न रखें. इससे आलू शीघ्र खराब होने लगते हैं.
  • साबुत लाल मिर्च को एक मिनट से भी कम माइक्रोवेव में गर्म करके स्टोर कर सकती हैं.
  • मिर्च पाउडर में लौंग डाल दें, उसमें फंगस नहीं लगेगी.
  • प्याज को कपड़े में लपेटकर यदि लटका दिया जाए, तो वो अधिक समय तक चलते हैं.
  • काली मिर्च, इलायची, साबुत धनिया, जीरे आदि में तेजपत्ता डालकर रखें, तो नमी वाले मौसम में भी ये सुरक्षित रहते हैं. इन्हें एयरटाइट कन्टेनर में डालकर यदि फ्रीज में रखें, तो भी वे लंबे समय तक खराब नहीं होते.

जम्मू कश्मीर धारा 370: जानें बौलीवुड सेलेब्स का रिएक्शन

देश की संसद में सरकार द्वारा लाए गए आर्टिकल 370 पर जहां राजनीति में उबाल आ गया है. राजनीतिक दल आमने-सामने हैं. वही फिल्मी दुनिया में भी इस मसले पर जबरदस्त खींचतान देखने को मिली है.जहां दिग्गज कलाकार शाहरुख खान, सलमान, आमिर खान इस मसले पर मौन हैं. अमिताभ बच्चन अक्षय कुमार जो अक्सर ट्विटर पर अपनी बात कहने में जरा भी देर नहीं करते मौन है. वहीं दूसरी तरफ़ कंगना रानावत, माहिरा खान कैसी कुछ अभिनेत्रियों ने खुलकर अपने विचार रखे हैं. महत्वपूर्ण बात तो यह है कि कंगना ने पुलवामा अटैक के बाद प्रधानमंत्री से आग्रह किया था कि धारा 370 को तत्काल हटा दिया जाना चाहिए इस आलेख में हम कश्मीर के आर्टिकल 370 पर फिल्मी दुनिया के हस्तियों के रुख़ को बताने का प्रयास कर रहे है –

आर्टिकल 370 संसद में प्रस्तुत होते ही,  फिल्मी दुनिया के सितारे अनुपम खेर, परेश रावल जो कि भाजपा के चेहरे हैं ने खुलकर मोदी सरकार की प्रशंसा की. और आर्टिकल 370 के पक्ष में अपने विचार व्यक्त किए हैं. मगर सेल्यूलाइट के चमकते सितारे आमिर खान, शाहरुख खान, सलमान खान यह तीनों खान बंधु आश्चर्यजनक रूप से मौन हैं. देश के इस बड़े मसले पर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उन्होंने अपनेविचार साझा नहीं किए हैं जो कि अपने आप में चर्चा का विषय बना हुआ है.

कंगना ने संभाला मोर्चा

कंगना रनौत ने जैसे ही संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने आर्टिकल 370 का मसला रखा अपना पक्ष रखने में देर नहीं की लिखा, ” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिर्फ एक दूरदृष्टा नेता नहीं हैं बल्कि उनके पास जरूरी साहस और क्षमता भी है जो उसे हकीकत बना सकती है जिसे आप सोच भी नहीं सकते. मैं जम्मू कश्मीर समेत पूरे भारत को बधाईयां देती हूं. हम साथ में एक उज्जवल भविष्य की ओर देख रहे हैं.”

कंगना की बहन रंगोली  ने कंगना का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया है और अपनी बहन के बारे में तारीफों के पुल बांध दिए  हैं.रंगोली ने लिखा, ” कंगना  सच्ची कलाकार है और एक वास्तविक रोल मौडल.” वीडियो बहुत पुराना है जिसमें रंगोली कह रही हैं, “मैं अपने प्रधानमंत्री से निवेदन करती हूं कि जो आर्टिकल 370 है उसे पूरी तरह हटा दिया जाना चाहिए. मुझे लगता है कि कोई भी राज्य हमारे देश में ऐसा नहीं होना चाहिए जिसके बारे में आज भी ये कनफ्यूजन है कि वो लोग बिलौन्ग कहां करते हैं. कंगना ने कहा था, आजाद देश में आर्टिकल 370 की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए”

विवेक ने भी देर नहीं की

वहीं पीएम नरेंद्र मोदी की बायोपिक में उनकी भूमिका  करने वाले अभिनेता  विवेक ओबेरॉय ने ट्विटर पर लिखा, “यह उन बहादुर जवानों को तोहफा है जिन्होंने अखंड भारत का सपना देखा. पीएम नरेंद्र मोदी, अमित शाह और हर राष्ट्रवादी भारतीय का दिल से सम्मान और बहुत-बहुत शुक्रिया.” विवेक के अलावा एक्टर परेश रावल ने भी धारा 370 से जुड़े नए फैसले पर अपने विचार व्यक्त किए . फिल्मी दुनिया के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर और भाजपा से जुड़े परेश ने लिखा, “आज हमारी मातृभूमि का वास्तविक मायने में और संपूर्ण स्वतंत्रता दिवस है. आज सही मायनों में भारत एक हो गया है.”

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पाकिस्तानी एक्ट्रेस माहिरा खान कश्मीर पर बोलकर  ट्रोल  हुई

सोमवार 5 अगस्त को गृहमंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 में विशेषाधिकार खत्म करने का संकल्प राज्यसभा में पेश किया अमित शाह की घोषणा के बाद सोशल मीडिया पर भारत समेत पाकिस्तान के सितारे भी रिएक्शन आने लगे. इनमें मारी फिल्मी दुनिया के बादशाह कहे जाने वाले शाहरुख खान के साथ पाकिस्तान की अभिनेत्री माहिरा खान का स्टेटमेंट सबसे ज्यादा गर्म रहा.

माहिरा ने कश्मीर में मौजूदा हलचल को लेकर ट्वीट किया और चिंता जताई . माहिरा ने लिखा, “जिस पर हम चर्चा नहीं करना चाहते हैं,  उस पर हमें बहुत ही आसानी से खामोश कर दिया गया है. ये रेत पर लकीर खींचने की तरह है… जन्नत जल रही है और हम खामोशी से आंसू बहा रहे हैं.’ फिल्म रईस में शाहरुख खान के साथ एक्ट्रेस रही

माहिरा के इस ट्वीट के बाद  लोग उन्हें ट्रोल कर रहे हैं. अनुच्छेद 370 के चाहने वाले लोगों ने माहिरा को सलाह दी कि कश्मीर का मसला आप हमारे लिए छोड़ दें, आप बस अपना पाकिस्तान देखें.

पाकिस्तान की रहने वाली माहिरा खान, रणबीर कपूर की दोस्त भी हैं. रणबीर के साथ एक स्मोकिंग फोटो के कारण माहिरा को सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल किया गया था.

माहिरा खान से  पहले बौलीवुड में काम कर चुकी पाकिस्तान की एक्ट्रेस वीना मलिक ने भी कश्मीर पर चिंता जाहिर करते हुए भारतीय सेना पर निशाना साधा था. एक्ट्रेस जायरा वसीम ने सोमवार को ट्वीट में लिखा, “ये वक्त भी गुजर जाएगा.”

जैसा कि आपको खबर है गृहमंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करने संकल्प राज्यसभा में पेश करने के अलावा राज्य पुनर्गठन विधेयक को भी पेश किया है. इसके तहत जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को अलग कर दिया गया है. लद्दाख को बिना विधानसभा केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया है.

सरकार के इस फैसले के बाद अनुपम खेर, परेश रावल, निर्देशक अशोक पंडित, कंगना रनौत और कमाल खान सहित कई स्टार्स ने ट्वीट कर बधाई दी. मगर फिर भी दुनिया में बातें करने में आगे  आगे रहने वाले गीतकार जावेद अख्तर उनकी धर्मपत्नी शबाना आजमी सहित अनेक कलाकार इस मसले पर मौन हैं और शायद समय का इंतजार कर रहे हैं.

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लखनऊ की सैर

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ घूमने के लिहाज से बहुत साफसुथरी और ऐतिहासिक जगह है. नवाबी और अंगरेजी शासनकाल में बनी यहां की इमारतें वास्तुकला का बेजोड़ नमूना हैं. 1775 से 1856 तक लखनऊ अवध राज्य की राजधानी था. नवाबीकाल में अवध की अदब और तहजीब का विकास हुआ. लखनऊ की रंगीनियों और शानोशौकत के किस्से भी खूब चटखारे ले कर सुने और सुनाए जाते हैं. लखनऊ का इतिहास बहुत पुराना है. समय के साथसाथ इस का नाम और पहचान भी बदलती रही है. पहले इस का नाम लक्ष्मणपुरी फिर लखनपुरी और बाद में लखनऊ हो गया. लखनऊ में पश्चिमी से ले कर देशी खाने तक का अद्भुत स्वाद लिया जा सकता है. यहां तेजी से बड़े रेस्तरां और मिठाइयों की दुकानें खुली हैं. ‘मधुरिमा’, ‘रामआसरे’, ‘छप्पन भोग’, ‘राधे लाल परंपरा’ इन में से खास हैं.

लखनवी अंदाज की मिठाइयां लखनऊ आने वालों को खूब लुभाती हैं. खाने के लिए चाट, समोसे, कचौड़ी व कुलफी का आनंद लिया जा सकता है. ‘टुंडे कबाब’ के यहां कबाब और बिरयानी का स्वाद चखा जा सकता है. लखनऊ फलों में दशहरी आम और मिठाई में गुलाब रेवड़ी के लिए मशहूर है. हजरतगंज यहां का बहुत मशहूर बाजार है. अब तो यहां कई शौपिंग मौल व मल्टीप्लैक्स भी खुल गए हैं. घूमने और खरीदारी के लिए लखनऊ में हर तरह के बाजार हैं. इन में अमीनाबाद, हजरतगंज, निशांतगंज, आलमबाग और चारबाग प्रमुख हैं. चिकनकारी के कपड़े यहां की खासीयत हैं. आनंदी वाटर पार्क, ड्रीमवर्ल्ड अंडररूफ वाटर पार्क और ड्रमीवैली में घोड़ा, ऊंट और बैलगाड़ी की सवारी के साथ देशी खाने का स्वाद लिया जा सकता है.

दर्शनीय स्थल

लखनऊ जो भी घूमने आता है सब से पहले वह बड़ा इमामबाड़ा (भूलभुलैया) जरूर देखना चाहता है. यह लखनऊ की सब से मशहूर इमारत है. चारबाग रेलवे स्टेशन से लगभग 6 किलोमीटर दूर बना इमामबाड़ा वास्तुकला का अद्भुत नमूना है. 1784 में इस को नवाब आसिफुद्दौला ने बनवाया था. इस इमारत का पहला अजूबा 49.4 मीटर लंबा और 16.2 मीटर चौड़ा एक हौल है. इस में किसी तरह का कोई खंभा नहीं है. इस के एक छोर पर कागज फाड़ने जैसी हलकी आवाज को भी दूसरे छोर पर सहजता से सुना जा सकता है. इस इमारत का दूसरा अजूबा 409 गलियारे हैं. ये सब एकजैसे दिखते हैं और समान लंबाई के हैं. ये सभी एकदूसरे से जुड़े हुए हैं.

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इन में घूमने वाले रास्ता भूल जाते हैं. इसीलिए इस को भूलभुलैया भी कहा जाता है. इमामबाड़े में नहाने के लिए एक बावड़ी बनी है, जिस में गोमती नदी का पानी आता है. सुरक्षा की दृष्टि से यह कुछ ऐसी बनी है कि इस के अंदर नहा रहा आदमी बाहर वाले को तो देख सकता है, लेकिन बाहर वाला अंदर वाले को नहीं देख पाता. बड़े इमामबाड़े से 1 किलोमीटर आगे छोटा इमामबाड़ा है. मुगल स्थापत्यकला के इस बेजोड़ नमूने का निर्माण अवध के तीसरे नवाब मोहम्मद अली शाह द्वारा 1840 में कराया गया था. दूर से यह इमामबाड़ा तामजहल जैसा दिखता है. यहां नहाने के लिए एक खास किस्म का हौद बनाया गया था, जिस में गरम और ठंडा पानी एकसाथ आता था. इस इमारत में लगे शीशे के झाड़फानूस भी बहुत ही खूबसूरत हैं.

बड़े इमामबाड़े और छोटे इमामबाड़े के बीच के रास्ते में कई ऐतिहासिक इमारतें हैं. इन को पिक्चर गैलरी, घड़ी मीनार और रूमी दरवाजा के नाम से जाना जाता है. इन सब जगहों पर घूमने के लिए टिकट इमामबाड़ा से एकसाथ मिल जाता है.

इमामबाड़ा के बाहर बने दरवाजे को रूमी दरवाजा कहा जाता है. इस के नीचे से सड़क निकलती है. इस दरवाजे के निर्माण की खास बात यह है कि इस को बनाने में किसी तरह के लोहे या लकड़ी का प्रयोग नहीं किया गया है.

रूमी दरवाजे से थोड़ा आगे चलने पर घड़ी मीनार बनी है. 221 फुट ऊंची इस मीनार का निर्माण 1881 में हुआ था. इस में लगा घड़ी का पैंडुलम 14 फुट लंबा है. 12 पंखडि़यों वाला डायल खिले फूल की तरह दिखता है. इस के पास ही बनी पिक्चर गैलरी में अवध के नवाबों के तैलचित्र लगे हुए हैं. इस से नवाबी संस्कृति का पता चलता है. लखनऊ का ला मार्टिनियर भवन यूरोपीय स्थापत्यकला का बेजोड़ नमूना है. यहां पर ला मार्टिनियर स्कूल चलता है. महलनुमा बनी इस इमारत में एक झील है. इमारत को फानूस और पेंटिंग से सजाया गया है. वर्ष 1800 में क्लायड मार्टिन की मृत्यु के बाद उसे यहां दफनाया गया था.

रैजीडैंसी का निर्माण अवध के नवाब आसिफुद्दौला ने 1780 में शुरू कराया था. 20 साल में यह बन कर तैयार हो गई थी. यह इमारत हजरतगंज बाजार से 3 किलोमीटर दूर है. 1857 की लड़ाई में अंगरेजों ने इस पर अपना कब्जा कर के इस को अपने रहने की जगह बना लिया था. इस कारण इस का नाम रैजीडैंसी पड़ गया. इस की दीवारों पर आज भी आजादी की लड़ाई के चिह्न मौजूद हैं. यहां बना खूबसूरत लौन इस की खूबसूरती को बढ़ाता है. रैजीडैंसी के करीब ही शहीद स्मारक बना हुआ है. 1857 में शहीदों की याद में इस को गोमती नदी के किनारे बनवाया गया था. यहां नौकाविहार का मजा भी लिया जा सकता है. विधानसभा भवन भी बहुत आकर्षक है. मिर्जापुरी पत्थर से इस इमारत का निर्माण 1922 में बटलर द्वारा कराया गया था. इस इमारत को बनने में 6 साल का समय लगा था. लखनऊ का चिडि़याघर बहुत आकर्षक है. जानवरों और पक्षियों के अलावा यहां सांपों और मछलियों के रहने के लिए भी अलगअलग घर बने हुए हैं. बच्चों को घुमाने के लिए छोटी रेलगाड़ी का इंतजाम है. यहां एक राज्य संग्रहालय भी है, जिस में ऐतिहासिक सामान रखा गया है.

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लखनऊ को बागों और पार्कों का शहर भी कहा जाता है. यहां पर कई अच्छे पार्क बने हैं. सब से अच्छा बौटोनिकल गार्डन पार्क है. यहां गुलाब सहित तमाम दूसरे फूलों की कई किस्में देखने को मिलती हैं. इस के अलावा हाथी पार्क, गौतम बुद्ध पार्क, नदिया किनारे पार्क, पिकनिक स्पौट, लोहिया पार्क और डा. अंबेडकर पार्क भी घूमने के लिहाज से अच्छी जगह हैं. लखनऊ का जनेश्वर मिश्रा पार्क एशिया का सब से बड़ा पार्क है.

आखिर किस बौलीवुड एक्टर ने दुखाया अक्षय कुमार का दिल ?

बौलीवुड में अक्षय कुमार उन कलाकारों में से हैं, जो कि अब तक 22 नए निर्देशकों व बीस के करीब नए कलाकारों के साथ अभिनय कर चुके हैं. अक्षय कुमार ने मल्टीस्टारर फिल्मों में छोटे किरदार निभाने से भी परहेज नहीं किया. फिल्म ‘‘मिशन मंगल’’ में उन्होंने पांच हीरोईन व तीन हीरों के साथ अभिनय किया है. जबकि वे इस फिल्म के निर्माता भी हैं. मगर वह इन दिनों एक नवोदित कलाकार की एक मांग से काफी आहत हैं.

हाल ही में जब अक्षय कुमार से हमारी एक्सक्लूसिव बातचीत हुई और फिल्म ‘‘मिशन मंगल’’ में पांच हीरोईन के साथ एक छोटा किरदार निभाने की चर्चा चली, तो अक्षय कुमार ने अपने दिल का दर्द बयां कर ही दिया. अक्षय कुमार ने कहा- ‘‘यह मेरी सोच नहीं है. मेरी राय में यदि कोई फिल्म ‘ग्रेट’ फिल्म है, मैं बड़ी फिल्म की बात नहीं कर रहा, यदि फिल्म की कहानी की ग्रेटनेस है, तो मुझे उस फिल्म में एक छोटा सा किरदार करने से भी परहेज नही है. मैं यह नहीं देखता कि फिल्म में मेरा किरदार लंबा है या छोटा. मैंने अतीत में भी कई ऐसी फिल्में की हैं, जिन्हें करने से लोग कतरा सकते थे. क्योंकि उनके किरदार छोटे थे. पर मैंने की थी. मेरी जो सोच है, वह हौलीवुड के कलाकारों की तरह है. हौलीवुड का कोई भी कलाकार हमेशा कहानी व चरित्र के महत्व पर गौर करता है. वह किरदार की लंबाई पर ध्यान नही देता. यही मेरी सोच है.’’

अक्षय कुमार आगे कहते हैं- ‘‘मसलन, राज कुमार संतोषी निर्देशित फिल्म ‘खाकी’ को लें. इस फिल्म में इंटरवल के बाद मेरे किरदार शेखर वर्मा की मौत हो जाती है. लेकिन जब राजकुमार संतोषी साहब ने मुझे यह फिल्म सुनायी, तो कहानी सुनते ही मैंने कहा कि यह कमाल की कहानी है. और मैं शेखर वर्मा का किरदार करना चाहूंगा. जबकि राजकुमार संतोषी ने यह किरदार परेश रावल के लिए लिखा था. मेरी बात सुनकर राजकुमार संतोषी जी ने आश्चर्य चकित होते हुए मुझसे पूछा, ‘क्या बात करते हैं. आप इस किरदार को करना चाहेंगे. और मैंने यह किरदार निभाया था.’

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इसके बाद अक्षय कुमार ने रहस्योद्घाटन सा करते हुए एक नवोदित कलाकार की आहत करने वाली मांग को लेकर कहा- ‘‘खैर, मेरे छोटे किरदार निभाने की बात अलग है. मैं आपसे दो चार दिन पहले की घटना का जिक्र करना चाहूंगा,  मगर कलाकार का नाम नहीं लूंगा. आपके सवाल ने ही मुझे यह घटना फिर से याद दिला दी. एक दो हीरो की बेहतरीन कहानी वाली फिल्म पर काम हो रहा है. इस फिल्म के लिए एक नए हीरो से बातचीत हुई. यह नया लड़का है. अभी तक इसने 5 -6 फिल्में की हैं, जिसमें से उसकी 2-3 फिल्मों ने कुछ ज्यादा ही सफलता हासिल कर ली. तो इस कलाकार ने मांग रखी है कि, ‘‘सबसे पहले मेरा सोलो पोस्टर आएगा. उसके बाद हम दोनों का एक साथ वाला पोस्टर आएगा.’’ मैं उसकी यह मांग सुनकर हैरान हो गया. मुझे लगा कि आखिर उसके दिमाग में इस तरह की सोच आयी कहां से कि पहले उसका सोलो पोस्टर आएगा. जबकि हम सभी जानते हैं कि सिर्फ पोस्टर से कुछ होना नही है. मगर उसकी यह सोच है. अब आप खुद सोच लें कि यह कलाकार ‘मिशन मंगल’ जैसी फिल्म तो जिंदगी में नहीं करेगा, जिसमें पांच महिला किरदार हैं. यह कलाकार तो अपनी पूरी जिंदगी में 3 हीरो वाली या 2 हीरो व 2 हीरोईन वाली फिल्म भी नहीं कर सकता.’’

वे आगे कहते हैं- ‘‘शायद उसको लगता है कि जब उसका पहला सोलो पोस्टर आएगा, तो वे बहुत बड़ी उंचाई पर नजर आएंगे. और उसके साथ वाला हीरो उससे कमतर होगा. अब ऐसा कलाकार अपनी इस सोच के कारण कहां जाएगा, मैं कुछ कहना नही चाहता.’’

अक्षय कुमार ने शायद इस नवोदित कलाकार को कुछ समझाने के मकसद से अभिनेता जीतेंद्र का जिक्र करते हुए कहा- ‘‘मुझे तो जीतेंद्र साहब की कार्यशैली व उनकी सोच हमेशा पसंद आयी. मैंने तो जीतेंद्र साहब की तमाम फिल्में देखी हैं. जब मैं उनके करियर पर गौर करता हूं, तो पाता हूं कि उन्होंने कभी भी किरदार की लंबाई के बारे में नहीं सोचा. मजेदार बात यह हैं कि वह तो तमाम नारीप्रधान फिल्मों में हीरो बनकर आए. फिल्म का नाम ज्योति, कहानी ज्योति पर लेकिन हीरो जीतेंद्र होते थे. इसी तरह फिल्म का नाम ‘आशा’ और हीरो जीतेंद्र. मैंने देखा कि उन्होंने इस तरह की फिल्में धनाधन की हैं. उन्होंने कभी भी निर्माता से यह नहीं कहा होगा कि फिल्म का नाम ‘ज्योति’ से बदलकर जौन कर दो. पर आज के इस कलाकार ने तो मुझे हैरत में डाल दिया.’’

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