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जन्मपत्री

बूआ ने भरसक प्रयास किया कि रश्मि की शादी ऐसे लड़के से हो जिस की जन्मपत्री रश्मि की जन्मपत्री से मेल खाती हो और उन के 32 गुण मिलते हों. बूआ अपने प्रयास में जुटी रहीं पर अचानक कुछ ऐसा हुआ कि बूआ के सारे मनसूबों पर पानी फिर गया. पढि़ए, डा. प्रणव भारती की कहानी.

‘‘ये  लो और क्या चाहिए…पूरे

32 गुण मिल गए हैं,’’

गंगा बूआ ने बड़े गर्व से डाइनिंग टेबल पर नाश्ता करते हुए त्रिवेदी परिवार के सामने रश्मि की जन्मपत्री रख दी.

‘‘आप हांफ क्यों रही हैं? बैठिए तो सही…’’ चंद्रकांत त्रिवेदी ने खाली कुरसी की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘‘चंदर, तू तो बस बात ही मत कर. जाने कौन सा राजकुमार ढूंढ़ कर लाएगा बेटी के लिए. कितने रिश्ते ले कर आई हूं…एक भी पसंद नहीं आता. अरे, नाक पर मक्खी ही नहीं बैठने देते तुम लोग… बेटी को बुड्ढी करोगे क्या घर में बिठा कर…?’’ गोपू के हाथ से पानी का गिलास ले कर बूआ गटगट गटक गईं.

चंद्रकांत, रश्मि और उस का भाई विक्की यानी विकास मजे से कुरकुरे टोस्ट कुतरते रहे. मुसकराहट उन के चेहरों पर पसरी रही पर चंद्रकांत त्रिवेदी की पत्नी स्मिता की आंखें गीली हो आईं. आखिर 27 वर्ष की हो गई है उन की बेटी. पीएच.डी. कर चुकी है. डिगरी कालेज में लेक्चरर हो गई है. अब क्या…घर पर ही बैठी रहेगी?

चंद्रकांत ने तो जाने कितने लड़के बताए अपनी पत्नी को पर स्मिता जिद पर अड़ी ही रहीं कि जब तक लड़के के पूरे गुण नहीं मिलेंगे तब तक रश्मि के रिश्ते का सवाल ही नहीं उठता. जो कोई लड़का मिलता स्मिता को कोई न कोई कमी उस में दिखाई दे जाती. चंद्रकांत परेशान हो गए थे. वे शहर के जानेमाने उद्योगपति थे. स्टील की 4 फैक्टरियों के मालिक थे. उन की बेटी के लिए कितने ही रिश्ते लाइन में खड़े रहते पर पत्नी थीं कि हर रिश्ते में कोई न कोई अड़ंगा लगा देतीं और उन का साथ देतीं गंगा बूआ.

गंगा बूआ 80 साल से ऊपर की हो गई होंगी. चंद्रकांत ने तो अपने बचपन से उन्हें यहीं देखा था. उन के पिता शशिकांत त्रिवेदी की छोटी बहन हैं गंगा बूआ. बचपन में ही बूआ का ब्याह हो गया था. ब्याह हुआ और 15 वर्ष की उम्र में ही वह विधवा हो गई थीं. मातापिता तो पहले ही चल बसे थे, अत: अपने इकलौते भाई के पास ही वे अपना जीवन व्यतीत कर रही थीं.

घर में कोई कमी तो थी नहीं. अंगरेजों के जमाने से 2-3 गाडि़यां, महल सी कोठी, नौकरचाकर सबकुछ उन के पिता के पास था. फिर शशिकांत इतने प्रबुद्ध निकले कि जयपुर शहर के पहले आई.ए.एस. अफसर बने. उन के ही पुत्र चंद्रकांत हैं. चंद्रकांत की पत्नी स्मिता वैसे तो शिक्षित है, एम.ए. पास हैं पर न जाने उन के और गंगा बूआ के बीच क्या खिचड़ी पकती रहती है कि स्मिता की हंसी ही गायब हो गई है. उन्हें हर पल अपनी बेटी की ही चिंता सताती रहती है. चंद्रकांत ने अपनी बूआ के साथ अपनी पत्नी को हमेशा खुसरपुसर करते ही पाया है.

गंगा बूआ के मन में यह विश्वास पत्थर की लकीर सा बन गया है कि उन का वैधव्य उन की जन्मपत्री न मिलाने के कारण ही हुआ है. उन के पिता व भाई आर्यसमाजी विचारों के थे और कुंडली आदि मिलाने में उन का कोई विश्वास नहीं था. शशिकांत के बहुत करीबी दोस्त सेठ रतनलाल शर्मा ने अपने बेटे संयोग के लिए गंगा बूआ को मांग लिया था और फिर बिना किसी सामाजिक दिखावे के उन का विवाह संयोग से कर दिया गया था. शर्माजी का विचार था कि वे अपनी पुत्रवधू को बिटिया से भी अधिक स्नेह व ममता से सींचेंगे और उस को अच्छी से अच्छी शिक्षा देंगे, लेकिन विवाह के 8 दिन भी नहीं हुए थे कि कोठी के बड़े से बगीचे में नवविवाहित संयोग सांप के काटने से मर गया. जुड़वां भाई सुयोग चीखें मारमार कर अपने मरे भाई को झंझोड़ रहा था. पल भर में ही पूरा वातावरण भय और दुख का पर्याय बन गया था.

गंगोत्तरी ठीक से विवाह का मतलब भी कहां समझ पाई थी तबतक कि वैधव्य की कालिमा ने उसे निगल लिया. कुछ दिन तक वह ससुराल में रही. सेठ रतनलाल के परिवार के लोगों ने गंगोत्तरी का ध्यान रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी परंतु वहां वह बहुत भयभीत हो गई थी. मस्तिष्क पर इस दुर्घटना का इतना भयानक प्रभाव पड़ा था कि रात को सोतेसोते भी वह बहकीबहकी बातें करने लगी. थक कर इस शर्त पर उसे उस के मातापिता के पास भेज दिया गया कि वह उन की अमानत के रूप में वहां रहेगी.

गंगोत्तरी की पढ़ाई फिर शुरू करवा दी गई. कुछ सालों बाद शर्माजी ने संयोग के जुड़वां भाई सुयोग से उस का विवाह करने का प्रस्ताव रखा. कुछ समय तक सोचनेसमझने के बाद त्रिवेदी परिवार ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया परंतु गंगोत्तरी ने जो ‘न’ की हठ पकड़ी तो छोड़ने का नाम ही नहीं लिया.

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बहुत समझाया गया उसे पर तबतक वह काफी समझदार हो चुकी थी और उसे विवाह व वैधव्य का अर्थ समझ में आने लगा था. उस का कहना था कि एक बार उस के साथ जो हुआ वही उस की नियति है, बस…अब वह पढ़ेगी और शिक्षिका बन कर जीवनयापन करेगी. फिर किसी ने उस से अधिक जिद नहीं की. इस प्रकार मातापिता की मृत्यु के बाद भी गंगोत्तरी इसी घर में रह गई. चंद्रकांत से ले कर उन के बच्चे, घर के नौकरचाकर, यहां तक कि पड़ोसी भी उन्हें प्यार से गंगा बूआ कह कर पुकारने लगे थे.

यद्यपि गंगा बूआ अब काफी बूढ़ी होे गई हैं, फिर भी घर की हर समस्या के साथ वे जुड़ी रहती हैं. उन्होंने स्मिता को अपना उदाहरण दे कर बड़े विस्तार से समझा दिया था कि घर की इकलौती लाड़ली रश्मि का विवाह बिना जन्मपत्री मिलाए न करे. बस, स्मिता के दिलोदिमाग पर गंगा बूआ की बात इतनी गहरी समा गई कि जब भी उन के पति किसी रिश्ते की बात करते वे गंगा बूआ की ओट में हो जातीं. उन्होंने ही गंगा बूआ को हरी झंडी दिखा रखी थी कि वे स्वयं जा कर पीढि़यों से चले आ रहे पंडितों के उस परिवार के श्रेष्ठ पंडित से जन्मपत्रियों का मिलान करवाएं जिसे बूआ शहर का श्रेष्ठ पंडित समझती हैं. वैसे स्मिता का विवाह भी तो बिना जन्मपत्री मिलाए हुआ था और वह बहुत सुखी थीं पर रश्मि के मामले में गंगा बूआ ने न जाने उन्हें क्या घुट्टी पिला दी थी कि बस…

आज गंगा बूआ सुबह ही नहाधो कर ड्राइवर को साथ ले कर निकल गई थीं. बूआ बेशक विधवा थीं, पर सदा ठसक से रहती थीं. ड्राइवर के बिना घर से बाहर न निकलतीं. उन के पहनावे इतने लकदक होते जो उन के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देते थे. कहीं भी बिना जन्मपत्री मिलाए विवाह की बात होती तो वे अपना मंतव्य प्रकट किए बिना न रहतीं.

घर के सदस्य बेशक गंगा बूआ की इस बात से थोड़ा नाराज रहते पर कोई भी उन का अपमान नहीं कर सकता था. सब मन ही मन हंसते, बुदबुदाते रहते, ‘आज फिर गंगा बूआ रश्मि की जन्मपत्री किसी से मिलवा कर लाई होंगी…’ सब ने मन ही मन सोचा.

गोपू ने बूआ के सामने नाश्ते की प्लेट रख दी थी और टोस्टर में से टोस्ट निकाल कर मक्खन लगा रहा था, तभी बूआ बोलीं, ‘‘अरे, गोपू, मैं किस के दांतों से खाऊंगी ये कड़क टोस्ट, ला, मुझे बिना सिंकी ब्रेड और बटरबाउल उठा दे और हां, मेरा दलिया कहां है?’’

गोपू ने बूआ के सामने उन का नाश्ता ला कर रख दिया. आज बूआ कुछ अलग ही मूड में थीं.

‘‘क्यों स्मिता, तुम क्यों चुप हो और तुम्हारा चेहरा इतना फीका क्यों पड़ गया है?’’ बूआ ने एक चम्मच दलिया मुंह में रखते हुए स्मिता की ओर रुख किया.

स्मिता कुछ बोली तो नहीं…एक नजर बूआ पर डाल कर मानो उन से आंखों ही आंखों में कुछ कह डाला.

‘‘देखो चंदर, मैं ने इस लड़के के परिवार को शाम की चाय पर बुला लिया है…’’ उन्होंने अपने बैग से लड़के का फोटो निकाल कर चंद्रकांत की ओर बढ़ाया.

‘‘पर बूआ आप पहले रश्मि से तो पूछ लीजिए कि वह शाम को घर पर रहेगी भी या नहीं,’’ चंद्रकांत ने धीरे से बूआजी के सामने यह बात रख दी, ‘‘और हां, यह भी बूआजी कि उसे यह लड़का पसंद भी है या नहीं,’’

‘‘देखो चंदर, आज 3 साल से लड़के की तलाश हो रही है पर इस के लिए कोई अच्छे गुणों वाला लड़का ही नहीं मिलता. और ये बात तो तय है कि बिना कुंडली मिलाए न तो मैं राजी होऊंगी और न ही स्मिता, क्यों स्मिता?’’ एक बार फिर बूआ ने स्मिता की ओर नजर घुमाई.

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स्मिता चुप थीं.

नाश्ता कर के सब उठ गए और अपनेअपने कमरों में जाने लगे.

‘‘मैं जरा आराम कर लूं…थक गई हूं,’’ इतना बोल कर बूआ ने भी अपना बैग समेटा, ‘‘स्मिता, बाद में मेरे कमरे में आना.’’ बूआजी का यह आदेश स्मिता को था.

तभी चंद्रकांत ने पत्नी की ओर देख कर कहा, ‘‘स्मिता, तुम जरा कमरे में चलो. तुम से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

स्मिता आंखें नीची कर के बूआ की ओर देखती हुई पति के पीछे चल दीं. बूआ को लगा, कुछ तो गड़बड़ है. वातावरण की दबीदबी खामोशी और स्मिता की दबीदबी चुप्पी के पीछे मानो कोई गहरा राज झांक रहा था.

वे सुबह से उठ कर, नित्य कर्म से निवृत्त हो कर बाहर निकलने में ऐसी निढाल हो गई थीं कि कुछ अधिक सोचविचार किए बिना उन्होंने अपने कमरे में जा कर स्वयं को पलंग पर डाल दिया. आज वैसे भी रविवार था. सब घर पर ही रहने वाले थे. थोड़ा आराम कर के लंच पर बात करेंगी. शाम को आने का न्योता तो दे आई हैं पर ‘मीनूवीनू’ तो तय करना होगा न. बूआजी बड़ी चिंतित थीं.

गंगा बूआ पूरे जोशोखरोश में थीं. उत्साह उन के भीतर पंख फड़फड़ा रहा था पर थकान थी कि उम्र की हंसी उड़ाने लगी थी. पलंग पर पहुंचते ही न जाने कब उन की आंख लग गई. जब वे सो कर उठीं तो दोपहर के साढ़े 3 बजे थे.

‘कितना समय हो गया. मुझे किसी ने उठाया भी नहीं,’ बूआ बड़बड़ाती हुई कपड़े संभालती कमरे से बाहर निकलीं.

‘‘अरे, गोपू, कमली…कहां गए सब के सब…और आज खाने पर भी नहीं उठाया मुझे,’’ बूआ नौकरों को पुकारती हुई रसोईघर की ओर चल दीं. उन्हें गोपू दिखाई दिया, ‘‘गोपू, मुझे खाने के लिए भी नहीं उठाया. और सब लोग कहां हैं?’’

‘‘जी बूआ, आज किसी ने भी खाना नहीं खाया और सब बाहर गए हैं,’’ गोपू का उत्तर था.

‘बाहर गए हैं? मुझे बताया भी नहीं,’ बूआ अपने में ही बड़बड़ाने लगी थीं.

‘‘बूआजी, मैं महाराज को बोलता हूं आप का खाना लगाने के लिए. आप बैठें,’’ यह कहते हुए गोपू रसोईघर की ओर चला गया.

कुछ अनमने मन से बूआ वाशबेसिन पर गईं, मुंह व आंखों पर पानी के छींटे मारते हुए उन्होंने बेसिन पर लगे शीशे में अपना चेहरा देखा. थकावट अब भी उन के चेहरे पर विराजमान थी. नैपकिन से हाथ पोंछ कर वे मेज पर आ बैठीं. गोपू गरमागरम खाना ले आया था.

खाना खातेखाते उन्हें याद आया कि वे पंडितजी से कह आई थीं कि घर पर चर्चा कर के वे लड़के वालों को निमंत्रण देने के लिए चंदर से फोन करवा देंगी. आखिर लड़की का बाप है, फर्ज बनता है उस का कि वह फोन कर के लड़के वालों को घर आने का निमंत्रण दे. खाना खातेखाते बूआ सोचने लगीं कि न जाने कहां चले गए सब लोग…अभी तो उन्हें सब के साथ बैठ कर मेहमानों की आवभगत के लिए तैयारी करवानी थी.

‘खाना खा कर चंदर को फोन करूंगी,’ बूआ ने सोचा और जल्दीजल्दी खाना खा कर जैसे ही कुरसी से खड़ी हुईं कि उन की नजर ने ‘ड्राइंगरूम’ के मुख्यद्वार से परिवार के सारे सदस्यों  को घर में प्रवेश करते हुए देखा.

और…यह क्या, रश्मि ने दुलहन का लिबास पहन रखा है? उन्हें आश्चर्य हुआ और वे उन की ओर बढ़ गईं. स्मिता के अलावा परिवार के सभी सदस्यों के चेहरे पर हंसी थी और आंखों में चमक.

‘‘लो, बूआजी भी आ गईं,’’ चंद्रकांत ने एक लंबे, गोरेचिट्टे, सुदर्शन व्यक्तित्व के लड़के को बूआजी के सामने खड़ा कर दिया.

‘‘रश्मिज ग्रैंड मदर,’’ चंद्रकांत ने कहा तो युवक ने आगे बढ़ कर बूआ के चरणस्पर्श कर लिए.

गंगा बूआ हकबका सी गई थीं.

‘‘बूआजी, यह सैमसन जौन है. आज होटल ‘हैवन’ में इस की रश्मि से शादी है. चलिए, सब को वहां पहुंचना है.’’

‘‘पर…ये…वो जन्मपत्री…’’ बूआजी हकबका कर बोलीं, फिर स्मिता पर नजर डाली. उस का चेहरा उतरा हुआ था.

‘‘अरे, बूआजी, जन्मपत्री तो इन की ऊपर वाले ने मिला कर भेजी है. चिंता मत करिए. चलिए, जल्दी तैयार हो जाइए. सैमसन के मातापिता भी होटल में ठहरे हैं. उन से भी मिलना है. फिर वे लोग अमेरिका वापस लौट जाएंगे.’’

चंद्रकांत बड़े उत्साहित थे. फिर बोले, ‘‘देखिएगा, किस धूमधाम से भारतीय रिवाज के अनुसार शादी होगी.’’

बूआजी किंकर्तव्यविमूढ़ सी खड़ी रह गई थीं. उन की नजर में रश्मि की जन्मपत्री के टुकड़े हवा में तैर रहे थे.

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इस मौनसून हेयर फौल को कहें बाय-बाय

मौसम में बदलाव तो होता रहता है और इस बदलाव का सबसे ज्यादा असर आपके त्वचा और बालों पर पड़ता है. मौनसून में उमस और नमी के कारण बालों की जड़ें कमजोर हो जाती है. जिससे बाल टूटने की समस्या शुरू हो जाती है. इसलिए ऐसे मौसम में बालों को खास केयर की जरूरत होती है. आइए जानते है कुछ ऐसी टिप्स जिससे आप मौनसून में हेयर फौल से बच सकती हैं.

मौनसून में ऐसे करें बालों की देखभाल

प्याज और नारियल तेल

बालों को हेल्दी रखने लिए प्याज और नारियल तेल दोनों ही बेहतरीन माने जाते हैं. प्याज में सल्फर अधिक मात्रा में पाया जाता हैं जो बालों के लिए लाभदायक माना जाता है. इसके इस्तेमाल से बालों का टूटना बंद हो जाता है.

इसका इस्तेमाल करने के लिए सबसे पहले प्याज का रस निकाल लें. इसके बाद नारियल तेल और प्याज के रस को मिलाकर मिश्रण बना लें. इस मिश्रण को आप बालों में 20 मिनट लगाकर छोड़ दें और उसके बाद सिर्फ पानी से बाल धो लें. अगले दिन आप शैम्पू कर सकती हैं.

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नींबू और दही

एक कटोरी में दही लें उसमें एक नींबू का रस मिलाएं और एक चम्मच चने का आटा मिला कर मिश्रण तैयार कर लें. यह मिश्रण शैम्पू की तरह काम करता है. इस मिश्रण को बालों में एक घंटे के लिए लगे रहने दें. एक घंटे बाद सिर धो लें. इसके इस्तेमाल से बाल टूटना बंद हो जाएगा.

मेथी से लहराते बाल

मेथी को पूरी रात पानी में भिगो दें फिर सुबह उसे दही में मिलाकर बालों और जड़ों में लगाएं. मेथी में निकोटोनिक एसिड और प्रोटीन पाया जाता है, जो बालों के जड़ों तक पोषण पहुंचता है. मेथी से बालों में चमक बरकरार रहती हैं, बाल टूटना बंद हो जाते हैं,  इससे रूसी जैसी दिक्कत से भी छूटकारा मिल जाता हैं.

अंडा और दही

अंडे के इस्तेमाल से बाल मजबूत, चमकदार और हेल्दी रहते है. बालों में अंडे का इस्तेमाल करने के लिए अंडा, दही, एक चम्मच जैतून और नारियल का तेल मिलाकर मिश्रण बनाएं. अब मिश्रण को बाल और जड़ों में अच्छे से लगाएं. करीब आधे घंटे बाद बाल धो लें.

कढ़ी पत्ता की चंपी

कढ़ी पत्ता में औषधीय गुण पाए जाते हैं जो बालों के झड़ने की समस्या से दूर कर उन्हें मुलायम और चमकदार बनाता है. कढ़ी पत्ता को नारियल तेल में उबाल लें. अब इस तेल को बालों के जड़ो में लगा लें.

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 इन बातों का भी रखें ध्यान

  • मानसून में रोजाना हेयर वाश न करें.
  • गीले बालों को न बांधे
  • बालों में केमिकल इस्तेमाल करने के बाद तेल से चंपी करके हेयर वाश करें.
  • गीले बालों में कंघी न करें.
  • बारिश के पानी से बचें

साकी गर्ल नोरा फतेही के डांस मूव्स का है जलवा

डांसिग क्वीन और साकी गर्ल के नाम से मशहूर एक्ट्रेस नोरा फतेही के जबरदस्त डांस और दिलकश अंदाज के सभी दीवाने है. इस समय नोरा का एक डांस वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. इस वीडियो में नोरा के डांसिंग स्किल्स को देख कर आप भी दंग रह जाएंगे.

नोरा के अंग्रेजी डांस का वीडियो हुआ वायरल

हाल ही में नोरा फतेही ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट से एक वीडियो शेयर किया है. इस वीडियो में नोरा अंग्रेजी गाने पर डांस करती नजर आ रही हैं. डांस वीडियो को पोस्ट करते हुए नोरा फतेही ने कैप्शन भी काफी मजेदार लिखा है. नोरा फतेही के इस वीडियो पर फैन्स भी खूब कमेंट कर रहे हैं और उनके डांस की जम कर  तारीफ कर रहे हैं.

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डांस का चैलेंज किया एक्सेप्ट

कुछ समय पहले नोरा अपनी  फिल्म ‘बाटला हाउस’ के प्रमोशन के लिए कलर्स टीवी के शो ‘खतरा-खतरा  पर पहुंची थीं. इस दौरान जैसे ही इस शो  में लड़की बने एक कौमेडियन ने नोरा फतेही को डांस का चैलेंज दिया, नोरा ने उसे हाथ से जाने नहीं दिया. उसका चैलेंज स्वीकार किया और  अपने डांस के जलवे दिखाएं. उनका ये वीडियो भी खूब वायरल हो रहा है.

फिल्म की जान है नोरा का डांस

जौन अब्राहम की फिल्म ‘बाटला हाउस’ का गाना ओ साकी साकी रे, रिलीज हो गया है. ये गाना इस फ़िल्म का  एक स्पेशल आइटम सौन्ग है. नोरा इस गाने में एक छोटे से बार में नाच रही हैं. आपको बता दे  2004 में आई फिल्म मुसाफिर के गाने साकी साकी के रीमेक में नोरा फतेही ने बेहतरीन डांस किया है. साल 2008 में दिल्ली के बाटला हाउस एनकाउंटर पर आधारित इस कहानी में जौन अब्राहम एक पुलिस अफसर की भूमिका निभा रहे हैं. नोरा फतेही का डांस और गाना इस फिल्म की जान है, जो आपके दिल में जरूर उतर जाएगा. साल 2004 में आई फिल्म मुसाफिर का गाना साकी साकी अपने समय का सुपरहिट गाना था, जिसने फैंस के दिलों में जगह बनाई थी. इस गाने में संजय दत्त और एक्ट्रेस कोएना मित्रा थे. एक्ट्रेस कोएना मित्रा ने इस गाने पर नाराजगी जताई थी. उनका कहना था कि इस रीमेक में ओरिजिनल गाने को खराब कर दिया गया है. साथ ही उन्होंने नोरा फतेही के डांस और मूव्स की तारीफ की थी.

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डांस से हुई फेमस

नोरा फतेही बिग बौस के सीजन 9 से काफी फेमस हुई थीं. शो में उनके डांस की खूब तारीफ हुई थी, जिसके बाद बौलीवुड की कई फिल्मों में नोरा फतेही ने स्पेशल सौन्ग किए. नोरा ने ‘सत्यमेव जयते में ‘दिलबर सौन्ग पर अपने जबरदस्त डांस से काफी तारीफें बटोरी थीं. जिसके बाद उन्होंने एक के बाद एक कई स्पेशल सौन्ग किए. इन दिनों नोरा फतेही वरुण धवन और श्रद्धा कपूर की फिल्म ‘स्ट्रीट डांसर’ की शूटिंग में व्यस्त हैं. ये फिल्म अगले साल रिलीज होगी.

अगर आप नोरा फतेही के मस्त डांस के साथ उनकी एक्टिंग को भी देखना चाहते हैं तो 15 अगस्त को रिलीज हुई मूवी ‘बाटला हाउस’ जरूर देखें.

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संक्रमण सताए तो कया करें ?

एलर्जी एक लाइलाज बीमारी है. एलर्जी यानी शरीर द्वारा कुछ विशेष तत्त्वों, जिन्हें एलर्जन कहते हैं, के प्रति अतिसंवेदनशील प्रतिक्रिया है. जो लोग एलर्जी से पीडि़त हैं उन के लिए सब से बेहतर उपाय यही है कि वे उन कारकों (एलर्जन) से बचें, जिन से एलर्जी है. एलर्जन अपने आप में हानिकारक नहीं होते हैं. कई लोगों को इन एलर्जन से कोई समस्या नहीं होती. लेकिन अतिसंवेदनशील लोगों में इन एलर्जन से कई लक्षण नजर आते हैं, जिन में से कई तो जानलेवा भी होते हैं.

अगर आप को एक चीज से एलर्जी है तो जरूरी नहीं है कि किसी अन्य को भी उसी चीज से एलर्जी हो. एलर्जी के कई कारक हैं. एलर्जी से पीड़ित व्यक्ति को अपने अनुभव के आधार पर यह खोजने की कोशिश करनी चाहिए कि उसे किस विशेष वस्तु का उपयोग करने से एलर्जी होती है.

जानवरों से एलर्जी

जानवरों की लार, मृत त्वचा, फर और यूरिन में जो प्रोटीन होता है वह एलर्जन कहलाता है. उस से कई लोगों में एलर्जिक रिऐक्शन या अस्थमा की समस्या बढ़ जाती है. इस के अलावा जानवरों के फर में पराग, धूल के कण और दूसरे एलर्जन भी भर जाते हैं, जिस से एलर्जी और गंभीररूप धारण कर लेती है.

एलर्जी से पीडि़त कुल लोगों में से 15-30 प्रतिशत लोगों को बिल्ली और कुत्ते जैसे पालतू जानवरों से एलर्जी होती है. अगर आप के घर में पालतू जानवर है और उसे कभी अपने पास भी नहीं आने देते, तब भी आप को एलर्जी हो सकती है.

आधुनिक शोधों से पता चला है कि जब जानवर खुद को चाटते हैं तो लार में मौजूद प्रोटीन भी फर से चिपक जाता है. और जब यह सूख जाता है तो हवा में उड़ता है. जानवरों से निकलने वाले एलर्जन कारपेट, कालीन और फर्नीचर में इकट्ठा हो जाते हैं और वहां वे 4 से 6 सप्ताह तक सक्रिय अवस्था में रहते हैं. इस के अलावा, ये एलर्जन पालतू जानवर को घर से निकालने के बाद भी कई महीनों तक हवा में मौजूद रहते हैं.

बिल्लियां, कुत्तों से ज्यादा एलर्जी करती हैं क्योंकि वे खुद को ज्यादा चाटती हैं और कुत्तों के मुकाबले लोग बिल्लियों को ज्यादा पकड़ते व प्यार करते हैं.

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क्या हैं लक्षण

  • पलकों और नाक की त्वचा का लाल हो जाना, सूजन आना और उस में खुजली होना.
  • जिन लोगों को पहले से ही अस्थमा है, बिल्ली के संपर्क में आने पर उन में अस्थमा के अटैक का खतरा 20-30 प्रतिशत बढ़ जाता है.

ऐसे बचें

  • पालतू जानवर के सीधे संपर्क में आने पर अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह से साफ कर लें.
  • आप अपने पालतू जानवर से जितना भी प्यार करते हो, उन्हें अपने बैडरूम में न आने दें.
  • पालतू कुत्ते और बिल्ली को नियमितरूप से नहलाएं. इस से उनके शरीर पर एलर्जन के पनपने की आशंका कम हो जाती है.
  • पालतू जानवरों को हमेशा घर से बाहर बंद और खुले स्थानों पर रखें.

धूल से एलर्जी

भारत में सब से अधिक लोग धूल यानी डस्ट एलर्जी से पीडि़त हैं. एक अनुमान के अनुसार, एलर्जी के शिकार लोगों में से करीब 80 प्रतिशत लोगों को धूल से एलर्जी जरूर होती है. इसलिए इस के उपचार के लिए जरूरी है कि धूल से बचा जाए.

क्या हैं लक्षण

–       आंखें लाल होना, उन में खुजली होना और पानी बहना.

–       नाक बहना और उस में खुजली होना.

–       सांस लेते हुए सूसू की आवाज आना.

–       लगातार छींकना.

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ऐसे बचें

  • जिन लोगों को धूल से एलर्जी है, उन्हें उस जगह नहीं जाना चाहिए.
  • ऊनी कपड़ों को जाड़े के मौसम के खत्म होने पर अच्छी तरह से धो कर अलमारी में रख लिया जाए क्योंकि इन के छेदों में धूल भर जाती है.
  •   जिन लोगों को धूल से एलर्जी है वे सुबह और रात को सोने से पहले गुनगुने पानी से नहाएं ताकि धूल के कण निकल जाएं.
  • वैक्यूम क्लीनर से सफाई करते समय हमेशा मास्क पहनें क्योंकि कारपेट और कालीन पर बहुत से धूल के कण इकट्ठे हो जाते हैं.
  • कारपेट, कालीन, चटाइयां, बैडशीट्स, तकिए के गिलाफ आदि एलर्जी करने वाले कारकों के पनपने की जगहें हैं, इसलिए इन की सफाई का विशेष ध्यान रखें.

हेयरडाई से एलर्जी

हेयरडाई के साइड इफैक्ट्स के बावजूद इन का उपयोग पूरे संसार में किया जाता है. यह एलर्जी उन लोगों में ज्यादा आम होती है जिन की त्वचा अतिसंवेदनशील होती है. उन की त्वचा उन रसायनों के प्रति संवेदनशीलता दिखाती है जो अधिकतर हेयरकलर्स में होते हैं. लेकिन फिर भी लोग हेयरडाई का इस्तेमाल करना बंद नहीं करते.

कई कंपनियां संवेदनशील त्वचा के लिए ऐसी डाई बना रही हैं, जिन में कम से कम रसायन हों. लेकिन कोई भी ऐसी डाई उपलब्ध नहीं है जिस में कोई भी रसायन मौजूद न हो. इस का परिणाम यह होता है कि जो लोग हेयरडाई

का उपयोग करते हैं, उन में एलर्जी के साथ ही त्वचा के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है.

लक्षण पहचानें

  • त्वचा में जलन, पलकों, कान के ऊपरी किनारे, चेहरे, गरदन, पीठ या छाती की त्वचा का लाल पड़ जाना, सूज जाना और उस में दर्द होना.
  • ज्यादा गंभीर लक्षणों में चेहरे पर सूजन और खोपड़ी का लाल हो जाना, पलकों पर सूजन, सांस लेने में तकलीफ होना आदि.
  • कई मामलों में स्किन पैच टैस्ट के बाद भी कई लोगों में एलर्जी के लक्षण दिखाई देते हैं.

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सावधानी बरतें

99 प्रतिशत हेयरडाई में पीपीडी यानी पैराफेनाइलीन डायामीन या पीफिनाइलीन डायमीन होता है. यहां तक कि कई काली मेंहदी, लिपस्टिक और टैटू बनाने वाली स्याही में भी यह रसायन होता है.

स्वास्थ्य को होने वाले खतरों को देखते हुए कुछ यूरोपीय देशों में पीपीडी पर बैन लगा दिया गया है. लेकिन कोई भी हेयरडाई ऐसी नहीं होती जिस में हानिकारक रसायनों का उपयोग नहीं होता हो. जिन में पीपीडी नहीं होता, उन में पैराबेंस और प्रोप्लीन ग्लायकोल होता है. इसलिए इन के संभावित खतरों से बचने के लिए हेयरडाई का उपयोग करने से पहले पैच टैस्ट जरूर करें और यदि फिर भी एलर्जी के लक्षण नजर आएं, तो इस्तेमाल से बचें.

अन्य चीजों से एलर्जी

एंटीबायोटिक : 15 में से 1 व्यक्ति को एंटीबायोटिक से एलर्जी है विशेषरूप से पेनिसिलीन और सेफैलोस्पोरिन से. अधिकतर मामलों में एलर्जिक रिऐक्शन अधिक गंभीर नहीं होता है. त्वचा पर रैशेज पड़ जाते हैं जिन में खुजली होती है, कभीकभी त्वचा पर मधुमक्खी जैसे छत्ते बन जाते हैं. कई लोगों को जी मचलाना, पेटदर्द, दस्त लगना, डायरिया की समस्या हो जाती है. एंटीबायोटिक से होने वाली एलर्जी से बहुत ही कम मामलों में लक्षण इतने गंभीर होते हैं कि पीडि़त व्यक्ति की मृत्यु हो जाए.

एनेस्थिसिया : बहुत ही कम मामलों में देखा जाता है कि एनेस्थिसिया के कारण एलर्जिक रिऐक्शन होता है. यह एलर्जी भी एनेस्थेटिक फैक्टर्स के अलावा दूसरे कारकों से होती है. न्युरोमस्क्युलर ब्लौकिंग एजेंट्स, प्राकृतिक रबर लेटेक्स और एंटीबायोटिक्स सर्जरी के दौरान गंभीर एलर्जिक रिऐक्शन के सब से सामान्य कारण हैं.

स्थायी उपचार नहीं

एलर्जी का स्थायी उपचार नहीं है. लेकिन जिन चीजों से आप को एलर्जी हो, उन कारकों से बचा जाए तो आप पूरी तरह सामान्य जीवन जी सकते हैं.

उदाहरण के लिए कुछ लोगों को पालतू जानवरों से एलर्जी होती है, फिर भी डाक्टर के सख्त निर्देश के बावजूद वे अपने पालतू जानवरों को अपने घर से बाहर नहीं करते. जिन्हें धूल से एलर्जी होती है, वे बिना अपनी नाक को ढक कर ही बाहर निकल जाते हैं. यही सब से प्रमुख कारण होता है कि लोगों की एलर्जी ठीक नहीं हो पाती.

एलर्जी की समस्या को लोग गंभीरता से नहीं लेते. ठीक समय पर दवाइयां नहीं लेते हैं, इस से भी समस्या बढ़ती जाती है.

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जानलेवा एलर्जी

एलर्जी के लक्षण मामूली से ले कर गंभीर तक हो सकते हैं. इन्हें कई लोग हलके में ले लेते हैं. नतीजतन, बात हद से ज्यादा बढ़ जाती है और निदान मुश्किल हो जाता है. इसलिए किसी भी तरह की एलर्जी को अनदेखा न करें. एलर्जी के लक्षण कभीकभी जीवन के लिए खतरा भी हो सकते हैं जिसे एनाफाइलैक्सिस कहते हैं. एनाफाइलैक्सिस एक मैडिकल इमरजैंसी है जिस में तुरंत चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है.

(लेखक बीएलके सुपर स्पैशलिटी अस्पताल के इंटर्नल मैडिसिन विभाग के निदेशक हैं).

15 अगस्त के मौके पर लखनऊ में हुई “रीडिंग मेला” की शुरुआत

उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी स्कूलों में बच्चो में पढ़ने की आदत का विकास करने के लिए 73 वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर “रीडिंग मेला” की शुरूआत की. इस अवसर पर शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने अलग अलग स्कूलों में ‘रीडिंग मेला’ में हिस्सा लिया. बच्चो की प्रिय पत्रिका “चंपक” ने लखनऊ के स्कूटर इंडिया के पास दरोगा खेड़ा के प्राथमिक विद्यालय में सहभागिता की. बच्चो ने ‘चंपक’ पढ़ कर कहानियां सुनाई.
इस अवसर पर अपर निदेशक ललिता प्रदीप सहित शिक्षा विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए. बच्चो ने भी कहानी सुनाई और कहानी का मंचन भी किया. इस अवसर पर बच्चो की प्रिय पत्रिका “चंपक” बच्चो को वितरित की गई. ग्राम प्रधान और पंचायत के दूसरे पदाधिकारी मौजूद रहे.

“चंपक क्रिएटिव चाइल्ड कौन्टेस्ट”

दूसरी तरफ 14 और 15 अगस्त को ‘स्ट्रॉबेरी फील्ड स्कूल’ और बच्चों की प्रिय पत्रिका ‘चंपक’ के द्वारा लखनऊ में “चंपक क्रिएटिव चाइल्ड कौन्टेस्ट” और फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. इसके साथ बच्चो ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का प्रदर्शन करते डान्स और सिंगिग से लोगों को खुश कर दिया.
‘स्ट्राबेरी फील्ड’ स्कूल की डायरेक्टर अरुणा सक्सेना और मुख्य अतिथि के रूप में लखनऊ की मेयर संयुक्ता भाटिया ने विजेता बच्चो को प्रमाणपत्र, चंपक और उपहार देकर सम्मानित करेगी. इस मौके पर माधुरी सक्सेना, वंदना सिंह, फरयाल फातिमा, तमन्ना जी, संजय जी उपस्थित थे. कार्यक्रम का संचालन नन्ही सी बच्ची सबूरी सक्सेना ने किया.

राहुल गांधी कश्मीर आपको बुला रहा है!

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी और अमित शाह ने देखते ही देखते चंद दिनों में कश्मीर का मसला हल कर के राजनीतिक साहस का परिचय दिया है.

लोकसभा और राज्यसभा में आर्टिकल 370 को निर्मूल कर दिया गया है. ऐसे में कांग्रेस  के समक्ष दो रास्ते से एक या तो सरकार का समर्थन किया जाता या फिर विरोध अथवा प्रतिकार .

कांग्रेस ने दूसरा रास्ता अपनाया. आर्टिकल 370 पर भाजपा और राजग सरकार की नीति के खिलाफ अलग स्टैंड अपनाकर जहां तक हो सका कांग्रेस ने विरोध किया. मगर इतने व्यापक मसले पर कांग्रेस को जैसे तेवर दिखाने चाहिए थे वह नहीं दिखाए . परिणाम स्वरूप विपक्ष जब कमजोर पड़ा नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बन आई देश में खिलाफत करने वाला कोई नहीं रहा तो कई बड़ी खामियां भी सरकार की ढक छुप गई अब शनै: शनै: यह तथ्य सामने आ रहे हैं जिन पर चर्चा करना और समीक्षा आज की जरूरत है क्योंकि आर्टिकल 370 का मसला राष्ट्र से जुड़ा है और साथ ही दुनिया इस पर नजर रखे हुए हैं .

 राहुल क्यों नहीं गए कश्मीर !

आर्टिकल 370 का मसला देश दुनिया को हिल्लोरने वाला है यह सभी जानते हैं. 5 अगस्त अब वह ऐतिहासिक दिन बन चुका है जब राज्यसभा में गृहमंत्री बतौर अमित शाह ने अपना प्रस्ताव पेश किया . मगर उससे एक सप्ताह पूर्व से ही कश्मीर को लेकर गतिविधियां प्रारंभ हो गई थी और यह कयास आम आदमी भी लगा रहा था की अमरनाथ यात्रा बीच में रोकना सरकार द्वारा एडवाइजरी जारी करना 10हजार सैन्य बल कश्मीर भेजना यह सब अकारण नहीं है.

कश्मीर के हालात धीरे-धीरे गर्म हो रहे थे कश्मीर के बड़े नेता फारूक अब्दुल्ला, अमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती सभी चिंतित थे और उन्हें अहसास हो गया था कि सरकार क्या करने जा रही है .यही कारण है की यह सब नेता प्रधानमंत्री, और जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक से भी मिले और शंका निवारण का आग्रह किया. मगर कश्मीर के नेताओं को कुछ भी नहीं बताया गया .क्या यह उचित था ? सवाल है ऐसे समय में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी कहां थे ?उस दरम्यान कश्मीर क्यों नहीं पहुंचे. आर्टिकल 370 पारित होने के बाद ही गुलाम नबी आजाद को कश्मीर भेजा गया प्रियंका और राहुल कश्मीर क्यों नहीं गए.

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कांग्रेस की रणनीति है यह

अर्थात यह कांग्रेस की रणनीति थी या कमजोर नेतृत्व के कारण चूक ? देश मे छोटी-छोटी बातों में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तत्काल मौके पर पहुंच जाते हैं पिछले दिनों प्रियंका गांधी सोनभद्र मसले पर उत्तर प्रदेश पहुंच गई जब सरकार ने रोका तो अड़ गई. फिर कश्मीर जैसे मसले पर जिस पर यह फैसला हो चुका था की कांग्रेस इस गंभीर राष्ट्रीय मसले पर सरकार के साथ नहीं है तब इस पर सरकार को घेरा क्यों नहीं गया कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला सांसद सदस्य हैं . संसद में उपस्थित नहीं थे कांग्रेस इस पर अमित शाह की बोलती बंद कर सकती थी. कांग्रेस हल्ला कर सकती थी की पहले फारूक अब्दुल्ला साहब को संसद में बुलाया जाए ! कह सकती थी की उन्हें कैद कर रखा गया है मगर कांग्रेस मौन रही… चूक गई.

कश्मीर बुला रहा है…..

नि:सन्देह भाजपा और मोदी सरकार का कश्मीर को लेकर उठाया कदम राष्ट्रवाद से प्रेरित है देश में आवाम ने खुले ह्रदय से आर्टिकल 370 हटाए जाने का स्वागत किया है. मगर यह भी सत्य है की कश्मीर के हालात अच्छे नहीं हैं.

फारूक अब्दुल्ला, अमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती सहित सैकड़ों कश्मीरी नेताओं की आवाज दबा दी गई है. प्रेस पर प्रतिबंध है. इंटरनेट आदि बंद करा दिया गया है. ऐसे में कांग्रेस अपना दायित्व कहां निभा रही है ?

देश में कहीं भी अत्याचार, दमन होता है राहुल प्रियंका एवं सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष विपक्ष होने के नाते पहुंचते हैं और मीडिया के माध्यम से उपस्थिति दर्ज करा कर एक संदेश प्रसारित किया जाता है. मगर जम्मू कश्मीर के मसले में ऐसा क्यों नहीं हो रहा?

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टैक्स तो डुबकी और पंडे पुजारियों पर भी लगना चाहिए

पश्चिम बंगाल की राजनीति में फिर बवाल मचा हुआ है इस बार वजह पूजा पर कथित तौर पर ही सही टैक्स का लगना है और हैरानी की बात यह है कि विरोध भाजपा नहीं बल्कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई में सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी कर रही है. हुआ इतना भर है कि आयकर विभाग ने पूजा करने वाली दुर्गा पूजा समितियों को एक नोटिस भेजा है. जिसका मसौदा हालांकि अभी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हुआ है. लेकिन यह अंदाजा गलत नहीं है कि नोटिस चंदे , आमदनी और खर्चों का हिसाब मांगने बाबत ही है .

देखा जाए तो इसमें गलत कुछ नहीं है लेकिन इसके खिलाफ धरने पर बैठकर ममता बनर्जी एक बार फिर भगवा खेमे के बिछाए धर्म जाल में फंसती नजर आ रही हैं जिनका कहना यह है कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार दुर्गा पूजा समितियों को डराने धमकाने के इरादे से उन्हें उसके सामने हथियार डालने मजबूर कर रही है. बक़ौल ममता, हकीकत में भाजपा पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा आयोजन को रोकने की कोशिश कर रही है. यह राजनैतिक तौर पर दोहरा मापदंड है .

पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने ममता के बयान में छोंका लगाते हुये कहा कि शुरू में भाजपा की कोशिश इन समितियों पर अपना शिकंजा कसने की थी लेकिन वह नाकाम रही इसलिए अब आयकर विभाग के जरिये उन्हें डराने की कोशिश कर रही है. अधिकतर पूजा समितियां स्थानीय लोगों से सहयोगवव (जाहिर है चंदा) व विज्ञापनों के माध्यमों से मंजूरी मंशा (आर्थिक सहयोग) लेती हैं. यह बात समझ से परे है कि इसका आयकर विभाग से क्या लेना देना है. इधर सुबोध मलिक चौक पर टीएमसी की महिला शाखा बंग जननी ब्रिगेड को लेकर धरने पर बैठी ममता बनर्जी का यह भी कहना है कि त्योहारों को कर वसूली से छूट मिलनी चाहिए जैसे कि उनकी सरकार ने गंगा सागर मेले के वार्षिक उत्सव को टेक्स फ्री कर दिया था.

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किसकी मंशा क्या है यह तो राम और दुर्गा काली कहीं हों तो वही जानें लेकिन यह बात किसी सबूत की मोहताज नहीं कि धर्म देश और दुनिया का सबसे बड़ा कर मुक्त कारोबार है जिसमें रोज अरबों रु श्रद्धालु चढ़ाते हैं जो सीधा पंडे पुजारियों की पाकेट में जाता है. सरकार को इसमें से ढ़ेला भी नहीं मिलता उल्टे उसे अरबो खरबो रु धार्मिक आयोजनो के इंतजाम में खर्च करना पड़ते हैं जो एक तरह की फिजूलखर्ची ही जनता के पैसों की है. सबसे बड़े धार्मिक आयोजन  कुम्भ की व्यवस्था में ही सरकारी खजाने का बड़ा हिस्सा फुंक जाता है.

देश भर में हर दूसरे दिन कोई छोटा बड़ा धार्मिक आयोजन कहीं न कहीं हो रहा होता है. इन आयोजनों का एक बड़ा मकसद पंडे पुजारियों को मुफ्त की खीर पूरी का इंतजाम करना होता है. इन आयोजनों में कितना चढ़ावा और दक्षिणा आई इसका हिसाब न कोई मांगता और न कोई देता. यानि हाल मुफ्त का चंदन घिस मेरे नन्दन सरीखा है. पंडे पुजारियों की यह मुफ्त की कमाई पूरी तरह टैक्स फ्री होती है. जिस पर न तो उन्हें इनकम टैक्स देना पड़ता और न ही पूजा पाठ के कारोबार पर कोई जीएसटी या दूसरा टैक्स लगता .

इन धार्मिक आयोजनों से इधर देखें तो लगता है कि देश में पैसों की कोई कमी नहीं है उल्टे पैसा जरूरत से ज्यादा है लेकिन वह ब्रांडेड मंदिरों की चल अचल संपत्ति में तब्दील हो चुका है और रोज रोज होता है. तिरुपति, वैष्णोदेवी, शिर्डी और पुरी जैसे सकड़ों हजारो मंदिरों में ही रोज अरबों रु चढ़ते हैं. चढ़ावे का यह पैसा ट्रस्ट को जाता है और उन लाखों पंडे पुजारियों के घर भी इसी से चलते हैं. जो इनमे वैतनिक या अवैतनिक पूजा पाठ करते हैं. इसके बाद भी हम हंगर इंडेक्स में 118 बे नंबर पर हैं तो इसकी वजह चढ़ावे की शाश्वत प्रवृति है. जिसे बनाए रखने और बढ़ाने बड़े जोर शोर और जोश खरोश से दुर्गा पूजा, राम नवमी, जन्माष्टमी और दशहरे जैसे त्योहारों का खर्च साल दर साल बढ़ता जा रहा है .

इस खर्चे पर कोई सरकारी या गैर सरकारी नियंत्रण नहीं है क्योंकि यह धर्म और भगवान का मामला है. देश के 30 करोड़ लोग बुनियादी सहूलियतों से वंचित हैं इस पर सोचा विचारी या सर खपाने की जहमत कोई अक़्लमंद नहीं उठाता कि मंदिरों में सड़ रहा जमा पैसा और संपत्ति इन दरिद्र नारायनों के भले के लिए लगा दी जाये तो जरूर हम विश्व की नम्बर एक अर्थ व्यवस्था होंगे और सही मानों में विश्व गुरु बन सकते हैं.

लेकिन धर्म और उसके दुकानदार ऐसा नहीं चाहते क्योंकि वे गरीब और गरीबों का डर दिखाकर ही लोगों को लूटते हैं कि देखो अगर दान नहीं करोगे तो अगले या इसी जन्म में इसी या किसी और मंदिर के बाहर भूखे अधनंगे खड़े होकर भीख मांगते नजर आओगे. कोई भी खुद को ऐसी स्थिति में नहीं देखना चाहता इसलिए डर के चलते दान दक्षिणा देता है.  यहां ओ माई गौड फिल्म का आखिरी दृश्य बरबस ही याद हो आता है जिसमें सन्यासी बने मिथुन चक्रवर्ती बड़ी धूर्तता से मुसकुराते हुये कह रहे हैं कि यह आस्थावानों की नहीं बल्कि भगवान से डरे हुए लोगों की भीड़ है .

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पाप, पुण्य, मुक्ति, मोक्ष, स्वर्ग, नर्क और पुनर्जन्म बगैरह का हौवा इतने गहरे तक लोगों के दिलो दिमाग में बैठा हुआ है कि वे हकीकत जानते हुये भी तर्क करने से डरते हैं. यह निश्चित रूप से निराशाजनक बात है कि चौबीसों घंटे चलने बाला धर्म का धंधा अब भगवान भी कहीं हो तो बंद नहीं करवा सकता क्योंकि खुद ईश्वर एक परिकल्पना और डर की उपज है.

ऐसे में पूजा पाठ पर टैक्स एक सार्थक पहल है इससे कम से कम वे खरबों रुपए तो बचेंगे जो सरकार धार्मिक आयोजनों पर खर्चती है. आयकर विभाग को चाहिए कि पहले तो वह मंदिरों की आमदनी का हिसाब ले और फिर उस पर टेक्स भी ले. देश के हर पंडे पुजारी से इनकम टैक्स रिटर्न भरवाया जाए. इस एक छोटी सी पहल से साबित हो जाएगा कि टैक्स चोर आम लोग और कारोबारी या उद्दयोगपति कम बल्कि पंडे पुजारी ज्यादा हैं .

पूजा समितियां कितना चंदा इकट्ठा कर कितना कहां खर्च करती हैं यह भी किसी को नहीं मालूम रहता इनसे हिसाब मांगना शेर के जबड़े में हाथ डालने जैसी बात है. आधी वामपंथी और आधी कांग्रेसी रहीं ममता बनर्जी को इनकम टेक्स विभाग की हिम्मत बढ़ानी चाहिए, शायद इससे उनका विधानसभा चुनाव में बेड़ा पार लग जाये क्योंकि न केवल बंगाल बल्कि देश भर के लोग धर्म के मकड़जाल से आजादी चाहते हैं और इसकी पहल कोई नहीं करता तो वे और डरकर इन धार्मिक समितियों दुकानदारों और सरकारों को ही हफ्ता देने में अपनी भलाई समझते हैं.

पश्चिम बंगाल में हो वही रहा है जो भाजपा चाहती है कि वहां भी शेष देश की तरह कट्टर हिन्दुत्व फैले जिससे उसे सत्ता हथियाने में आसानी रहे. लोकसभा चुनाव नतीजे इस लिहाज से उसके लिए उत्साहजनक रहे थे. अब दूसरे तरीके से भाजपा वही खेल खेल रही है कि जितना ममता बनर्जी धर्म और धार्मिक आयोजनो की पैरवी करेंगी उतने ही घाटे में रहेंगी. राहुल गांधी इसका बेहतर उदाहरण हैं जिनहे पूजा पाठ करने के बाद भी कोई फल नहीं मिला क्योंकि वे भी  धर्म के खेल के कच्चे खिलाड़ी हैं .

मुद्दे की बात पूजा पर टैक्स लगने की है तो इसे लगना ही चाहिए और केवल पूजा पाठ ही नहीं बल्कि हरेक धार्मिक कृत्य पर लगना चाहिए. यहां तक कि धार्मिक डुबकी पर भी लगना चाहिए क्योंकि नदियां सरकारी संपत्ति हैं. जब सुलभ काम्प्लेक्स इस्तेमाल करने तक के लोग 10 रुपए दे रहे हैं तो उनसे पूजा पाठ, यज्ञ हवन, और तंत्र मंत्र बगैरह पर भी कर वसूला जाना चाहिए क्योंकि इसी पैसे से उनकी भलाई होगी.

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हमेशा सुर्खियों में रही श्वेता तिवारी

छोटे पर्दे की मशहूर एक्ट्रेस श्वेता तिवारी अक्सर सुर्खियो में रही, कभी अपनी निजी जिंदगी को लेकर कभी अपनी दूसरी शादी को ले कर. आपको बता दें. श्वेता की पहली शादी से उन्हें बेटी है, जिसका नाम पलक है. और दूसरी शादी से उन्हें एक बेटा हुआ है, लेकिन अब  श्वेता तिवारी  ने अपने पति के खिलाफ केस दर्ज कराया है और कई गंभीर आरोप भी लगाए हैं. श्वेता तिवारी के आरोप उनकी बेटी पलक  से जुड़े हुए हैं.

क्या है आरोप

श्वेता तिवारी के साथ ऐसा दूसरी बार हो रहा है. 2007 में श्वेता तिवारी ने राजा चौधरी से घरेलू हिंसा और मारपीट के कारण ही तलाक लिया था, जिसके बाद उन्होंने 2013 में अभिनव कोहली से शादी की थी.अब एक बार फिर श्वेता तिवारी घरेलू हिंसा के शिकार होने की बात कह रही हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब एक साल से श्वेता तिवारी और उनके पति के बीच कई विवाद चल रहे थे, लेकिन हाल ही में हुए झगड़े में अभिनव ने श्वेता की बेटी पलक को थप्पड़ मार दिया, जिसके बाद श्वेता तिवारी चुप नहीं रहीं. श्वेता तिवारी ने अपने पति अभिनव कोहली के खिलाफ अपनी बेटी पलक (अभिनव की सौतेली बेटी) को गंदी गालियां देने और अश्लील टिप्पणी करने के आरोप में पुलिस में केस दर्ज कराया है. अभिनेत्री की शिकायत के अनुसार आईपीसी की धारा 323, 504, 506, 509 और अन्य आईटी एक्ट के तहत अभिनव कोहली के खिलाफ समता नगर पुलिस स्टेशन में केस दर्ज कर लिया गया, जिसके बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया था.

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श्वेता की सास का बयान

इन सब के बीच श्वेता तिवारी की सास यानी अभिनव की मां का भी बयान आया है. उन्होंने एक पोर्टल से बातचीत करते हुए कहा कि वो चाहती हैं कि श्वेता और अभिनव के बीच सबकुछ फिर से ठीक हो जाए. उन्होंने कहा, “अभिनव का बेटा रेयांश अभी बहुत छोटा है. मैं नहीं चाहती कि उसके दिमाग पर बुरा असर पड़े. अभिनव ने अपने बेटे के लिए बहुत कुछ किया है और आगे भी करना चाहता है. एक दिन सच जरूर सामने आएगा और सबको पता चलेगा कि अभिनव ने अपने दोनों बच्चों के लिए क्या कुछ किया है .” वो आगे कहती हैं, “श्वेता और अभिनव के बीच पिछले दो साल से कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है  अभिनव सबकुछ ठीक करने की बहुत कोशिश कर रहा है. वो श्वेता और रेयांश के साथ रहना चाहता है. वो अपने दोनों बच्चों को एक ही छत के नीचे देखना चाहता है. बहुत कोशिश के बावजूद कुछ ठीक नहीं हो रहा. अभिनव पलक का तबसे ख्याल रख रहा है जब वो बच्ची थी और राजा चौधरी उसे छोड़कर चला गया था. जब श्वेता बिग बौस शो में थी तो भी अभिनव ने ही पलक का ध्यान रखा. उसका स्कूल में एडमिशन करवाया, पैरेंट्स मीटिंग में गया. उसने सब कुछ किया. वो सबकुछ भूल गई और मेरे बेटे पर गंदे और झूठे आरोप लगा दिए. वो बस अभिनव से अलग होना चाहती है. वो अभिनव से तलाक चाहती है.  इससे ज्यादा मैं इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहती हूं.” बता दें कि पलक, श्वेता और राजा चौधरी की बेटी हैं.

पहले पति का बयान

इस पूरे घटनाक्रम पर राजा चौधरी का बयान भी आया है उन्होंने कहा कि, मैं अपनी बेटी पलक के संपर्क में हूं, आज सुबह ही मेरी बात हुई. उसने कहा चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है , मै ठीक हूं. एक पिता के तौर पर मेरे लिए यह बहुत परेशान करने वाली बात है.”

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बेटी पलक का बयान

अब श्वेता की बेटी पलक तिवारी ने आखिरकार पूरे मामले पर अपनी चुप्पी तोड़ी है और इंस्टाग्राम पर जारी अपने आधिकारिक बयान में इस स्थिति के बारे में पूरी सच्चाई का खुलासा किया है. पलक ने सबसे पहले उन सभी का शुक्रिया अदा किया जो इस मामले में उनके करीब रहे और उनके प्रति अपनी चिंता व्यक्त कीं. पलक ने उन रिपोर्ट्स के बारे में जिक्र करते हुए स्पष्ट किया जो इंटरनेट पर सामने आई हैं.
उन्होंने स्पष्ट किया कि पलक के सौतेले पिता ने कभी “शारीरिक रूप से छेड़छाड़ नहीं की” या “उन्हें अनुचित तरीके से नहीं छुआ”.हालांकि, पलक ने कहा, “उन्होंने लगातार अनुचित और परेशान करने वाली टिप्पणी की, जो केवल मेरी मां और मुझे पता है.” पलक ने लिखा, ”अगर कोई भी महिला अपनी जिंदगी के किसी भी पड़ाव पर इन बातों को सुनती है तो वह बहुत शर्मिंदा होगी. ये बातें उसे उकसाएंगी. ऐसे शब्द भी हैं जो कोई भी महिला की स्थायी गरिमा पर सवाल उठाएंगे, जिसे आप किसी भी पुरुष से सुनने की उम्मीद नहीं करेंगे, खासकर अपने ‘पिता’ से तो बिल्कुल नहीं.”अपनी मां के पक्ष लेते हुए पलक ने कहा कि यह उनकी मां के साथ खड़े होने का समय है. पलक लिखती हैं- वह (श्वेता तिवारी) सबसे मजबूत व्यक्ति हैं जिन्हें मैं जानती हूं और हम सभी में से मैं एकमात्र ऐसी हूं जिसने उनके संघर्ष के दिन देखे हैं, मेरी राय केवल यही है जो उनके लिए वाकई मायने रखता है.”

पलक ने उन झूठी अफवाहें फैलाने और तथ्यात्मक रूप से गलत खबरों को लिखने वालों की निंदा की है.

इन बौलीवुड स्टार्स के भाई-बहन हैं टीवी के स्टार्स

बौलीवुड में अभी ऐसा समय चल रहा है कि सभी पुराने स्टार्स के बच्चे बौलीवुड में आ रहे हैं, कुछ समय पहले तक कुछ अभिनेताओं के भाई-बहन ने भी बौलीवुड में खूब नाम कमाया. लेकिन कुछ स्टार्स के भाई-बहनों ने बड़े पर्दे को छोड़ कर छोटे पर्दे पर अपना हुनर दिखाया है.

अमृता राव-प्रीतिका राव

‘अब के बरस’ (2002) से डेब्यू करने वाली अमृता ने ‘इश्क विश्क’, ‘विवाह’, ‘मैं हूं न’, ‘जौली एलएलबी’, ‘सत्याग्रह’ जैसी फिल्मों में काम किया. जहां अमृता कई पौपुलर फिल्मों के जरिए दर्शकों की फेवरेट बनीं. वही, उनकी छोटी बहन प्रीतिका टीवी का चर्चित चेहरा हैं उन्होंने 2013 में पॉपुलर शो ‘बेइंतहा’ से डेब्यू किया था, जो खासा मशहूर हुआ. वैसे, इंडस्ट्री में ऐसे कई सेलेब्स हैं, जिनके भाई-बहन टीवी या बॉलीवुड में काम करते हैं.

अनुपम खेर- राजू खेर

400 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके अनुपम खेर के भाई राजू टीवी एक्टर और डायरेक्टर हैं. राजू ने ‘ये कहां आ गए हम’, ‘कहां से कहां तक’, ‘जाने भी दो यारों’, ‘तमन्ना’ जैसे कई टीवी शोज में काम किया है.

तुषार कपूर- एकता कपूर

2001 में फिल्म ‘मुझे कुछ कहना है’ से डेब्यू करने वाले तुषार कपूर का नाम ‘गोलमाल’, ‘क्या कूल हैं हम’ जैसी फिल्में हैं. उनकी बहन एकता कपूर को टीवी इंडस्ट्री की क्वीन माना जाता है. एकता ने ‘ये हैं मोहब्बतें’, ‘कुमकुम भाग्य’, ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’, ‘कहानी घर घर की’ जैसे कई टीवी शोज प्रोड्यूस किए हैं.

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गौहर खान- निगार खान

गौहर खान ने 2009 में रिलीज रणबीर कपूर की फिल्म ‘रॉकेट सिंह: सेल्समेन औफ द ईयर’ से डेब्यू किया था. फिल्मों में आइटम नंबर के साथ वे कई टीवी रियलिटी शोज में भी हिस्सा ले चुकी हैं. वहीं, गौहर की बहन निगार खान ने टीवी सीरीज ‘लिपस्टिक’ से अपने करियर की शुरुआत की थी. वे ‘बिग बौस -8’, ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ जैसे कई टीवी शोज में नजर आई हैं.

शरमन जोशी- मानसी जोशी

रंग दे बसंती (2006), 3 इडियट्स (2009) जैसी कई पौपुलर फिल्मों का हिस्सा रहे शरमन जोशी की बहन मानसी टीवी एक्ट्रेस हैं. मानसी ने ‘कुसुम’, ‘साया’ और ‘घरवाली-बाहरवाली’ जैसे टीवी शोज में काम किया है.

कृष्णा अभिषेक- आरती सिंह

कई टीवी शो होस्ट कर चुके कृष्णा अभिषेक ने “बोल बच्चन (2012)”, “एंटरटेनमेंट (2014)” जैसी कुछ फिल्मों में काम किया. इसी साल उनकी सोली फिल्म ‘फुलटू जुगाडू’ रिलीज होने वाली है. वहीं, कृष्णा की बहन आरती सिंह टीवी का जाना माना चेहरा हैं. आरती को धारावाहिक ‘परिचय’ में निभाए भाभी के किरदार के लिए जाना जाता है. उन्होंने टीवी शो “मायका” (2007-14) से डेब्यू किया था.

रोनित रौय-रोहित रौय

रोनित रौय ने अपने करियर की शुरुआत फिल्म “जान तेरे नाम” (1992) से की थी. वे ‘उड़ान’, ‘2 स्टेट्स’ जैसी फिल्मों के साथ ‘कसौटी जिंदगी की’, ‘कसम से’, ‘अदालत’ जैसे कई टीवी शोज में नजर आए हैं. रोनित के भाई रोहित रौय पौपुलर टीवी एक्टर हैं. हालांकि, उन्होंने कुछ फिल्मों में स्पेशल अपीयरेंस भी दी है.

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आलोक नाथ- विनीता मलिक

‘हम आपके हैं कौन’, ‘हम साथ-साथ हैं’, ‘ताल’ समेत 50 से ज्यादा फिल्मों में आलोक नाथ ने काम किया है. वे फिल्मों के साथ-साथ टीवी की दुनिया में भी पौपुलर रहे हैं. आलोक नाथ की बहन विनीता मलिक टीवी एक्ट्रेस हैं. इन दिनों वे स्टार प्लस के शो ‘ये रिश्ता क्या कहलाता हैं’ में दादी का किरदार निभा रही हैं.

गुटकू

गुटकू के साथ मेरा रिश्ता बहुत रूहानी है. कभी नहीं लगा कि वह एक जानवर है और मैं इनसान. गुटकू को अगर कोई कुत्ता कह दे तो मुझे बड़ी कोफ्त होती है. दरअसल वह कुत्ता भी नहीं, बल्कि कुत्ती है. जब उसको पहली बार अस्पताल ले जाते वक्त मैंने ‘गुटकू’ कह कर पुकारा था, तब मुझे उसके लिंग के बारे में पता नहीं था. पर एक बार जो नाम उसके लिए मुंह से निकल गया, वह फिर बदल नहीं पायी. हालांकि बाद में आस-पड़ोस के बच्चों ने उसके कई नाम रख दिये. कोई उसे चिंकी कहता, कोई जूली तो कोई ओरियो, मगर मेरे लिए वह गुटकू ही रही. स्ट्रीट डॉग्स के बारे में मेरी कोई खास जानकारी नहीं थी. न ही मैंने कभी सड़क पर घूमने वाले कुत्तों की तरफ ध्यान दिया था. मगर उस दिन वह नन्हा सा जीव एक गाड़ी के नीचे आकर चोट खा गया था. ये तो अच्छा हुआ कि कार का पहिया उसके ऊपर नहीं चढ़ा, लेकिन फिर भी उसकी पीठ काफी छिल गयी थी. मैं ऊपर अपने फ्लैट की खिड़की से गाड़ी को उसके ऊपर से निकलते देख चीख पड़ी थी. दोपहर का वक्त था, सड़क पर सन्नाटा पसरा था कि अचानक उसकी कें-कें चारों ओर गूंजने लगी. मैं भागी-भागी नीचे गयी तो देखा कि वह सड़क के किनारे नाली से चिपकी बड़ी मरियल सी आवाज में दर्द से कराह रही थी. मैंने झपट कर उसे उठाया. मेरी गोद में आकर वह मेरे सीने से चिपक गयी. मैंने उसका सिर सहलाया तो उसको कुछ राहत मिली. शायद डर कुछ कम हुआ होगा. वह मेरी गोद में थोड़ा और सिकुड़ गयी. मुझसे रहा नहीं गया. उसकी पीठ पर खून छलछला आया था. मैंने आसपास उसकी मां को तलाशा, मगर वह मुझे कहीं नजर नहीं आयी. उस नन्हीं सी जान को सड़क पर ऐसे छोड़ना मुझे ठीक नहीं लगा, फिर उसे चोट भी लगी हुई थी. मैंने रिक्शा लिया और उसे जानवरों के अस्पताल ले गयी. रास्ते भर वह खुद को मेरी गोद में सुरक्षित महसूस कर रही थी और अपनी भूरी-भूरी आंखें उठा कर बार-बार मेरी ओर देख रही थी. उस दिन उस छोटी सी हाथ भर की बच्ची को मैंने नाम दिया था ‘गुटकू’. अस्पताल में डॉक्टर ने उसको इंजेक्शन लगाया और घाव को साफ करके दवा लगा दी. एक दवा की ट्यूब भी मुझे दी कि दिन में दो बार घाव पर लगा देना. मैं गुटकू को लेकर वापस आ गयी. देखा कि मेरे घर के नीचे उसकी मां उसको तलाशती घूम रही थी. मेरी गोद में उसको देख कर वह मेरे पास आकर पूंछ हिलाने लगी. मैंने उसको पुचकारा और बच्चे को उसके पास छोड़ दिया. वह बड़ी देर तक उसे चाटती रही. फिर वहीं लेट कर उसे दूध पिलाने लगी. मैं मां-बेटी को सड़क के किनारे छोड़ कर ऊपर आ गयी, यह सोचते हुए कि गुटकू अपनी मां के साथ सुरक्षित है.

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गुटकू की मां ने चार पिल्ले दिये थे, हमारे घर के नीचे. जिसमें से उसके तीन बच्चे एक-एक कर गाड़ियों के नीचे आकर मर गये. गुटकू अकेली ही बची थी. गुटकू की मां बड़ी दुबली पतली थी, शायद उसको भरपेट खाना नहीं मिलता था. मिलता भी कैसे? दिल्ली की इन कॉलोनियों में साफ-सफाई का इतना ध्यान रखा जाता है कि कोई अपने घर से बासी खाना बाहर फेंकता ही नहीं है. छोटे शहरों में तो गाय या कुत्ते के लिए लोग अपने घर का बासी खाना रात को सड़क के किनारे रख आते हैं, मगर यहां तो सुबह-सुबह नगर निगम की गाड़ियां आकर घर-घर से सारा कूड़ा इकट्ठा करके ले जाती हैं. लिहाजा जानवरों को भोजन की तलाश में अपने इलाके से दूर-दूराज के क्षेत्रों में जाना पड़ता है. यही समस्या गुटकू की मां के सामने भी थी. मां बनने के बाद वह और ज्यादा दुबली हो गयी थी. यहां उसे पेटभर खाना भी नहीं मिलता था. खाने की तलाश में वह अपने बच्चों को छोड़ कर दूर निकल जाती थी. उसके बच्चे लावारिस से सड़क पर घूमते थे. उन्हें आनेजाने वाले वाहनों से बचना भी नहीं आता था. लिहाजा एक-एक कर दुनिया से कूच कर गये. अब अकेली गुटकू ही बची थी. वो भी अपनी मां के जाने के बाद सड़क पर इधर से उधर घूमती रहती थी. शामि को जब उसकी मां आती तो दूध पीने को लेकर मां-बेटी में बड़ी खींचतान होेती थी. मैं अपनी खिड़की से देखती रहती थी. वह बड़ी मुश्किल से उसे दूध पिलाती थी. एक दिन शाम को जब बड़ी देर तक गुटकू की मां नहीं लौटी तो मैंने एक कटोरे में थोड़ा दूध डाल कर नीचे उसके सामने रख दिया. गुटकू जैसे सात जनम की भूखी थी, लपालप सारा दूध पी गयी और मुंह उठाकर मेरी तरफ ऐसे देखने लगी जैसे कह रही हो कि थोड़ा और दो. खैर, उस दिन के बाद से मैं सुबह-शाम कटोरे में दूध भर कर उसको देने लगी. कभी-कभी उसमें ब्रेड डाल कर रख आती और गुटकू दो मिनट में कटोरा खाली कर देती थी. एक मिट्टी के बर्तन में पानी भर कर सड़क के किनारे रख दिया और एक कार्डबोर्ड के बड़े डिब्बे में अपने कुछ पुराने कपड़े बिछा कर एक कोने में रख आयी. शाम को देखा तो गुटकू उस डिब्बे में बड़ी आराम से पसरी हुई थी. शायद उसमें उसे मेरी खुश्बू आ रही होगी. यह खुश्बू शायद उसे सुरक्षा का अहसास करा रही थी. उस दिन से गुटकू ने उस डिब्बे को अपना घर बना लिया. अब वह सारा दिन सड़क पर घूमने के बजाए ज्यादा समय उस डिब्बे में ही बैठी रहती थी.

एक सुबह मैं अपनी खिड़की पर आकर खड़ी हुई तो देखा कि नगर पालिका की गाड़ी गुटकू की मां को हमारे पड़ोसी की कार के नीचे से खींच कर निकाल रही है. रात में शायद वह इसी गाड़ी के नीचे पड़ी-पड़ी मर गयी थी. दुबली-पतली बीमार सी थी. शायद उस रात उसने जीवन से हार मान ली. पड़ोसी ने फोन करके नगर पालिका की गाड़ी बुलवायी थी. नन्ही गुटकू नगर पालिका की गाड़ी के पीछे दूर तक भागती गयी, जिसमें उसकी मां की लाश जा रही थी. मैं नीचे जाकर उसको बुला कर वापस लायी. बड़ी देर तक वह मेरी गोद में रही. उसकी आंख से आंसू नहीं बह रहे थे, लेकिन फिर भी उसका दुख अथाह था, जो मैं समझ रही थी. बेचारी तब तक सिर्फ डेढ़ महीने की ही हुई थी. हाय! उसका पूरा परिवार खत्म हो गया. भाई-बहन तो पहले ही गाड़ियों के नीचे आकर मर गये थे, आज मां भी जाती रही. नन्ही गुटकू उस चलती हुई सड़क पर बिल्कुल अकेली रह गयी थी. अभी तो वह सड़क पर रहना और चलना भी नहीं सीख पायी थी. उसको अपना खाना ढूंढना भी नहीं आता था. फिर दूसरे कुत्ते उस अकेली बच्ची के साथ कैसा व्यवहार करें, क्या पता. कहीं उसको अकेला पाकर नोच ही न डालें. ये सारी बातें सोच-सोच कर मैं परेशान थी.

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उस रोज के बाद से गुटकू की सारी जिम्मेदारी मैंने ले ली. उसे समय से खाना देना, दवाई पिलाना, समय समय पर उसके सारे इंजेक्शन लगवाना, उसके रहने के लिए छोटा सा घर बनाना, सर्दियों में उसके लिए कपड़े खरीद कर लाना और सुबह शाम उसको लाड करना. आसपास के लोग भी मेरा उसके प्रति इतना मोह देखकर उसका ख्याल रखने लगे थे. वह कई लोगों से हिलमिल गयी थी. खासतौर पर बच्चों से, जो शाम को अक्सर उसके साथ सड़क पर खेलते थे. सब गुटकू को प्यार करने लगे थे. अब कभी मैं दो-तीन रोज के लिए बाहर जाती तो सब मिलकर उसका ख्याल रखते. कोई दूध दे देता, कोई बिस्कुट तो कोई उबला अंडा या पनीर भी खिला जाता था. आज गुटकू पूरे तीन साल की हो गयी है. अन्य कुत्तों के मुकाबले ज्यादा हेल्दी और खूबसूरत दिखती है. रहती वह आज भी उसी सड़क पर है मगर उसका मेरा रिश्ता मां बेटी जैसा है. मैं नीचे उतर कर उसके पास जाती हूं तो वह मेरे पैरों में लोट-लोट कर अपना प्यार जताती है. मैं वापस लौटने को होती हूं तो अपने आगे के दोनों पैर मेरे सीने तक चढ़ा कर खड़ी हो जाती है कि अभी मत जाओ. फिर मुझे काफी देर तक उसके सिर पर हाथ फिरा कर समझाना पड़ता है कि घर के कई काम पड़े हैं, उन्हें भी तो करना है. मैं उससे बातें करती हूं तो लगता है जैसे मेरी सारी बातें वह अच्छे से समझ रही है. मैं जानती हूं स्ट्रीट डॉग्स की उम्र मात्र सात या आठ साल ही होती है. मगर मुझे लगता है कि मेरा और गुटकू का रिश्ता शायद जनमों का है. मेरे प्रति उसका प्यार अथाह है. वह बेजुबान मेरा इशारा, मेरी आहट, मेरी इच्छा, मेरी बातें जिस तरह समझती है, ऐसे तो कोई मेरा अपना भी कभी नहीं समझ पाया. मैं दुआ करती हूं कि अगले जनम में मेरी गुटकू सड़क पर नहीं, बल्कि मेरे घर में मेरी कोख से पैदा हो, मेरी बेटी बन कर.

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