Download App

पति-पत्नी का परायापन

पंकज मिश्रा उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) के गांव भंगेल में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी शैली मिश्रा उर्फ निधि और एक 7 साल का बेटा था. पेशे से इलैक्ट्रिशियन पंकज नोएडा के ही सेक्टर-135 में स्थित जेपी कौसमोस सोसायटी में नौकरी करता था.

20 जून, 2019 की सुबह 8 बजे पंकज घर से काम पर जाने के लिए साइकिल पर निकला. कुछ देर बाद जब वह सेक्टर-132 स्थित एक आईटी कंपनी के नजदीक सुनसान जगह से गुजर रहा था, तभी मोटरसाइकिल से 2 लोग उस के पास पहुंचे और उन्होंने पंकज को रुकने का इशारा किया.

पंकज ने साइकिल रोक दी. इस से पहले कि पंकज बाइक सवारों को समझ पाता, उन में से एक ने पंकज पर गोली चला दी. गोली लगते ही पंकज साइकिल सहित वहीं गिर पड़ा. वहां से गुजर रहे किसी राहगीर ने इस की सूचना 100 नंबर पर पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी.

चूंकि यह इलाका नोएडा के एक्सप्रैसवे थाने के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना एक्सप्रैसवे थाने को दे दी गई. सूचना मिलते ही नोएडा एक्सप्रैसवे थाने के थानाप्रभारी भुवनेश कुमार एसआई अनूप कुमार यादव, दिनेश कुमार सोलंकी, गुरविंदर सिंह के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस पंकज को नजदीक के एक प्राइवेट अस्पताल ले गई, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. पुलिस ने मृतक के कपड़ों की तलाशी ली तो जेब में पहचान का कोई कागज नहीं मिला. जेब में सिर्फ एक मोबाइल मिला. उस की शिनाख्त के लिए पुलिस ने मोबाइल फोन में मौजूद नंबरों पर काल करनी शुरू की.

इसी प्रयास में शारदा प्रसाद मिश्रा नाम के व्यक्ति से बात हुई. उस ने बताया कि यह नंबर उस के भाई पंकज मिश्रा का है जो नोएडा के भंगेल गांव में रहता है. पुलिस ने उसे अस्पताल बुला लिया ताकि लाश की शिनाख्त हो सके. शारदा प्रसाद अस्पताल पहुंच गया. पुलिस ने जब उसे उस युवक की लाश दिखाई तो उस ने उस की शिनाख्त अपने छोटे भाई पंकज मिश्रा के तौर पर कर दी.

उस ने पूछताछ के दौरान थानाप्रभारी भुवनेश कुमार को बताया कि पंकज जेपी कौसमोस सोसायटी में इलैक्ट्रिशियन का काम करता था और घटना के समय अपने काम पर जा रहा था. शिनाख्त हो जाने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए राजकीय अस्पताल भेज दी गई. इस के बाद थानाप्रभारी भुवनेश कुमार फिर से वारदात वाली जगह सेक्टर-132 पहुंचे. उन्होंने आसपास के लोगों से पूछताछ की तो कुछ लोगों ने बताया कि बाइक सवार 2 लोगों ने साइकिल सवार युवक को गोली मारी थी.

थानाप्रभारी भुवनेश कुमार ने शारदा प्रसाद मिश्रा की शिकायत पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ पंकज मिश्रा की हत्या का मामला दर्ज कर लिया. एसएसपी वैभवकृष्ण के निर्देश पर थानाप्रभारी भुवनेश कुमार टीम के साथ केस की जांच करने में जुट गए.

ये भी पढ़ें- पकड़ा गया शिकारी चाचा

केस की गुत्थी सुलझाने के लिए उन्होंने जांचपड़ताल शुरू की. क्योंकि बदमाशों ने उस से किसी प्रकार की लूटपाट नहीं की थी, इसलिए इस संभावना को बल मिल रहा था कि शायद पंकज से किसी की कोई पुरानी रंजिश रही होगी, जिस के कारण मौका ताड़ कर उसे मौत के घाट उतार दिया गया.

पंकज भंगेल में एक किराए के मकान में रहता था. थानाप्रभारी पूछताछ के लिए उस के घर पर पहुंच गए. घर पर मृतक पंकज की पत्नी शैली मिश्रा मिली. थानाप्रभारी ने शैली मिश्रा से पंकज की दुश्मनी के बारे में पूछा तो उस ने किसी भी व्यक्ति के साथ रंजिश से साफ इनकार कर दिया.

मृतक के भाई शरदा प्रसाद मिश्रा से भी किसी से रंजिश आदि के बारे में पूछा गया. उस ने भी ऐसी किसी दुश्मनी से अनभिज्ञता जाहिर की. यह सब देख कर पुलिस ने हत्यारों तक पहुंचने के लिए अन्य संभावित कारणों के बारे में जांचपड़ताल की.

मृतक पंकज की पत्नी शैली मिश्रा से थानाप्रभारी ने और भी कई तरह के सवाल किए तो उस के बयानों में कुछ विरोधाभास मिला. इस पर पुलिस ने पंकज और शैली मिश्रा के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर गहन जांचपड़ताल की. पता चला कि शैली मिश्रा की एक मोबाइल नंबर पर अकसर बातें होती थीं.

जब उस मोबाइल नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई गई तो वह सुरेश सिधवानी नाम के एक युवक का निकला जो नोएडा के सेक्टर-82 में रहता था. पुलिस ने शैली से कुछ नहीं कहा, बल्कि सुरेश सिधवानी को पूछताछ के लिए उस के घर से उठा लिया. थाने में उससे सख्ती से उस के और शैली मिश्रा के बारे में पूछा गया तो उस ने सारा सच उगल दिया.

उस ने बताया कि पिछले 2 सालों से उस के और शैली मिश्रा के बीच गहरी दोस्ती है, जो अवैध संबंधों में बदल गई थी. उस ने और शैली ने योजना बना कर पंकज को रास्ते से हटाया है.

इस के बाद पुलिस ने शैली मिश्रा को भी भंगेल स्थित उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. वहां उस ने पहले से हिरासत में लिए गए सुरेश सिधवानी को देखा तो उस के चेहरे का रंग उतर गया. अब उस के सामने सच बोलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. लिहाजा पूछताछ में शैली ने भी स्वीकार कर लिया कि पंकज की हत्या उसी के इशारे पर की गई थी.

दोनों से विस्तार से पूछताछ करने पर पंकज की हत्या की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार निकली—

मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला अयोध्या का रहने वाला पंकज मिश्रा पिछले कई सालों से अपनी पत्नी शैली और 7 साल के बेटे के साथ नोएडा के भंगेल गांव में रह रहा था. वह कौसमोस सोसायटी में इलैक्ट्रिशियन का काम करता था. वहां से उसे जो तनख्वाह मिलती थी, उस से उस के परिवार का गुजारा मुश्किल से हो पाता था.

घरगृहस्थी चलाने में आ रही दुश्वारियों से दोनों हमेशा परेशान रहते थे. शैली सुंदर होने के साथसाथ कुछ पढ़ीलिखी भी थी. उस ने सोचा कि बेटे को स्कूल छोड़ने के बाद वह दिन भर घर में अकेली पड़ीपड़ी बोर होती रहती है, इसलिए उसे कहीं पर दिन की नौकरी मिल जाए तो काफी कुछ दुश्वारियां कम हो जाएंगी.

उस दिन जब पंकज कौसमोस सोसायटी से ड्यूटी करने के बाद घर लौटा तो शैली ने उस से अपने मन की बात कही. शैली की बात सुन कर पंकज सोच में डूब गया. उस का दिल इस बात की गवाही नहीं दे रहा था कि शैली घर की दहलीज लांघ कर कहीं नौकरी करने जाए. लेकिन घर की परिस्थितियां इस बात की ओर इशारा कर रही थीं कि उस की तनख्वाह में घर बड़ी मुश्किलों से चलता है. कई बार मुश्किलें आने पर उसे अपनी जानपहचान वालों से रुपए उधार मांगने पड़ते हैं, जिन्हें बाद में चुकाना भी काफी कठिन हो जाता है.

शैली को एकटक देखते हुए उस ने कहा, ‘‘शैली, मैं चाहता तो नहीं हूं कि तुम कहीं काम करो, लेकिन हालात को देखते हुए तुम से नौकरी करने के लिए कहना पड़ रहा है. अगर तुम्हें नौकरी करनी ही है तो कहीं पास में ही नौकरी तलाश करो.’’

पति को चिंतित देख शैली ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘तुम मेरी चिंता मत करो, अपना अच्छाबुरा अच्छी तरह जानती हूं.’’

इस के बाद वह अगले दिन से ही अपने लिए नौकरी की तलाश में जुट गई. थोड़ी कोशिश के बाद उसे एक बिल्डर के यहां नौकरी मिल गई. अब वह भी नौकरी पर जाने लगी. पत्नी के नौकरी करने से पंकज की आर्थिक स्थिति ठीक हो गई. पैसे आए तो दोनों के चेहरों पर खुशी की लाली थिरकने लगी.

कुछ महीने तक तो पंकज के घर में सब कुछ ठीक था, परंतु एक साल गुजरने के बाद शैली के रंगढंग में काफी कुछ बदलाव आ गया. उस के रहनसहन और पहनावे को देख कर लगता था कि वह मौडर्न घराने से ताल्लुक रखती है. औफिस से घर आने में वह कई बार लेट भी हो जाती थी. पंकज ने इस दौरान महसूस किया था कि शैली की चालढाल अब वैसी नहीं रही जैसी पहले थी. अब उस के पास महंगा मोबाइल फोन आ गया था, जिस पर वह हमेशा व्यस्त रहती थी.

ये भी पढ़ें- नशेड़ी बेटे की करतूत

एक दिन पंकज शैली के मोबाइल का वाट्सऐप देख रहा था. उसे वहां कुछ ऐसे फोटो देखने को मिले, जिस में वह एक अपरिचित आदमी के साथ काफी खुश नजर आ रही थी. उस फोटो के बारे में पूछने के लिए पंकज ने शैली को अपने पास बुलाया तो उस के चेहरे की रंगत उड़ गई.

वह कहने लगी कि यह औफिस में ही काम करने वाला व्यक्ति है. मगर पंकज को उस की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. इस के बाद उन दोनों के बीच किसी न किसी बात को ले कर नोकझोंक होने लगी. अब तक पंकज को पूरी तरह यकीन हो गया था कि शैली फोटो में जिस व्यक्ति के साथ है, उस से उस के अवैध संबंध होंगे.

एक दिन तो हद ही हो गई. उस रात शैली देर से घर लौटी थी. पंकज ने उस पर आरोप लगाया कि वह अपने प्रेमी के साथ गुलछर्रे उड़ा रही होगी, तभी घर आने में देर हो गई. पंकज ने उस समय उसे काफी भलाबुरा कहा था. शैली भी कहां चुप रहने वाली थी. उस ने भी कह दिया कि तुम मेरे ऊपर इतना शक करते हो तो मुझे तलाक दे दो. मेरी तुम्हारे साथ अब नहीं निभ सकती.

शैली की बात सुन कर पंकज सन्न रह गया. उसे उम्मीद नहीं थी कि शैली कभी उसे छोड़ कर सदा के लिए उस से दूर जाने का इरादा बना लेगी. लड़झगड़ कर उस रात दोनों सो गए. लेकिन उस दिन के बाद शैली हर 2-4 दिनों के बाद पंकज से तलाक ले कर अलग रहने पर दबाव बनाने लगी.

दरअसल, शैली जहां नौकरी करती थी, उस की बगल में सेक्टर-82 निवासी सुरेश सिधवानी की दुकान थी. सुरेश सिधवानी मूलरूप से राजस्थान का रहने वाला था. वह शादीशुदा था लेकिन अपनी पत्नी से अधिक शैली को प्यार करता था. जब उस की पत्नी को शैली के साथ उस के अवैध संबंधों की जानकारी हुई तो उस ने उसे रोकने की कोशिश की.

लेकिन सुरेश सिधवानी के सिर पर शैली के इश्क का भूल चढ़ा था, इसलिए उस ने पत्नी की बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दिया. आखिर वह सुरेश को छोड़ कर चली गई. पत्नी के घर छोड़ चले जाने के बाद सुरेश ने शैली को अपने पति से तलाक लेने पर जोर डालना शुरू कर दिया, ताकि दोनों हमेशा के लिए एक हो कर रह सकें. लेकिन पंकज मिश्रा इस के लिए राजी नहीं हुआ. उसे अपने बेटे और खानदान की इज्जत अधिक प्यारी थी.

जब शैली को लगा कि पंकज उसे तलाक नहीं देगा तब उस ने सुरेश से कहा, ‘‘सुरेश, अगर तुम मुझे सच में प्यार करते हो और हमेशा के लिए अपना बनाना चाहते हो तो पहले पंकज को खत्म करना होगा.’’

सुरेश भी यही चाहता था, इसलिए उस ने कहा कि तुम अब परेशान मत होना, मैं इस का इंतजाम कर दूंगा.

सुरेश सिधवानी के पास नंगला चरणजीतदास का रहने वाला मोटर मैकेनिक इंद्रजीत आता रहता था. वह उस का विश्वासपात्र भी था. सुरेश ने पंकज की हत्या के बारे में उस से बात की. साथ ही यह भी कहा कि इस काम के एवज में वह उसे 10 लाख रुपए देगा.

इतनी बड़ी रकम के लालच में इंद्रजीत तैयार हो गया. उस ने पंकज की हत्या करने के लिए 50 हजार रुपए की पेशगी भी ले ली.

पंकज की हत्या करने की सुपारी लेने के बाद इंद्रजीत इस काम के लिए अपने दोस्त ककराला फेज-2 निवासी मोनू से मिला. उस ने मोनू से सारी बात तय कर के उसे .32 बोर की एक पिस्तौल तथा 3 गोलियां सौंप दीं.

मोनू ने गेझा, नोएडा निवासी अपने दोस्त सूरज तंवर को अपने साथ लिया. इस के बाद वे सभी पंकज की रेकी करने लगे. उन्होंने पता लगा लिया कि पंकज अपनी ड्यूटी के लिए किस रास्ते से आताजाता है. पूरी योजना बनाने के बाद 20 जून, 2019 को ये लोग पंकज का पीछा करने लगे. जैसे ही पंकज एक सुनसान जगह पर पहुंचा तो उसे रोकने के बाद गोली मार दी, जिस से घटनास्थल पर ही पंकज की मृत्यु हो गई.

पुलिस ने उन से पूछताछ के बाद इंद्रजीत, मोनू और सूरज भी गिरफ्तार कर लिया. उन की निशानदेही पर वारदात में इस्तेमाल पिस्तौल और बिना नंबर प्लेट वाली मोटरसाइकिल भी बरामद हो गई.

थानाप्रभारी भुवनेश कुमार ने पंकज हत्याकांड के पांचों आरोपियों सुरेश सिधवानी, शैली मिश्रा, इंद्रजीत, मोनू और सूरज तंवर को गौतमबुद्धनगर की अदालत में पेश किया, जहां से सभी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

ये भी पढ़ें- हवस का शिकार पति

सूरज तंवर की उम्र 19 साल है और वह गेझा गांव के स्कूल में 12वीं का छात्र है. वह अपनी गर्लफ्रैंड की जरूरतों को पूरा करने के लालच में इस हत्याकांड में शामिल हुआ था. पंकज की हत्या और शैली मिश्रा के जेल चले जाने के बाद पंकज का 7 वर्षीय बेटा अपने चाचा के पास था.

शादी के बाद एक्ट्रेस बनीं थीं विद्या सिन्हा, जानें कुछ दिलचस्प बातें

‘‘रजनीगंधा’’, छोटी सी बात’, ‘इंकार’, ‘मुक्ति’, ‘पति पत्नी और वो’ जैसी कई सफलतम फिल्मों और ‘काव्यांजली’, ‘जारा’,‘हारजीत’,‘कुल्फी कुमार बाजेवाला’ जैसे हिट सीरियलों की अदाकारा विद्या सिन्हा का 71 वर्ष की उम्र में 15 अगस्त, गुरूवार को मुंबई के जुहू इलाके के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. वह फेफड़े की बीमारी से पीड़ित थी और पिछले चार दिनों से वह अस्पताल में वेंटीलेटर पर थी.

नाना ने पाला पोसा

विद्या सिन्हा पूरी जिंदगी कई तरह के झंझावतों से ही जूझती रही. फिल्मी माहौल में परवरिश पाने वाली विद्या सिन्हा ने 18 साल की उम्र में ही ‘मिस बांबे’ का खिताब जीत लिया था. विद्या सिन्हा के पिता राणा प्रताप सिंह फिल्म निर्माता थे, जबकि विद्या सिन्हा के नाना मोहन सिन्हा फिल्म निर्देशक थे. विद्या सिहा के जन्म के साथ ही उनकी मां का निधन हो गया था. तब उनके पिता राणा प्रताप ने दूसरी शादी कर ली थी. और विद्या सिन्हा की परवरिश उनके नाना मेाहन सिन्हा ने की. विद्या सिन्हा के पिता और नाना दोनों चाहते थे कि विद्या सिन्हा फिल्मों से दूर रहें. इसी के चलते विद्या सिन्हा के अभिनय करियर की शुरूआत उनकी शादी के पांच साल बाद हुई थी. वैसे शादी करते समय ही विद्या सिंहा ने कह दिया था कि वह फिल्मों में अपना करियर बनाना चाहेंगी. उनके ससुराल पक्ष को एतराज नहीं था.

शादी के बाद फिल्मों में अभिनेत्री बनी

मगर ‘मिस बांबे’ का खिताब जीतते ही उनके पास विज्ञापन फिल्मों की कतार लग गयी थी. पर उनके फिल्मी करियर की शुरूआत 1974 में फिल्मकार बासु चटर्जी द्वारा साहित्यकार मन्नू भंडारी की कहानी ‘‘यही सच है’’ पर बनी फिल्म ‘‘रजनीगंधा’’ में अमोल पालेकर के साथ हुई थी. इस फिल्म में विद्या सिन्हा ने दीपा का किरदार निभाया था, जो कि दो लड़कों संजय (अमोल पालेकर) और नवीन (दिनेश ठाकुर) से अलग अलग वजहों से प्यार करती है, पर अंत में संजय से शादी करती हैं. फिल्म‘‘रजनीगंधा’ ने कई पुरस्कार बटोरने के साथ साथ बौक्स आफिस पर अच्छी कमायी की और फिर विद्या सिंहा स्टार बन गयी थी. जबकि बौलीवुड मे यह समय ग्लैमरस हीरोईन का माना जाता था. लेकिन दर्शकों ने पहली बार विद्या सिन्हा के सादगी पूर्ण व स्वाभाविक अभिनय को पसंद किया था.

पहली फिल्म के लिए दस हजार रूपए पारिश्रमिक राशि     

विद्या सिन्हा ने एक बार हमसे बातचीत करते हुए कहा था- ‘‘फिल्मों में हीरोईन बनने से पहले मेरी शादी हो चुकी थी. मेरी पहली फिल्म दो लाख रूपए के बजट में बनी थी, जिसके लिए मुझे दस हजार रूपए पारिश्रमिक राशि के तौर पर मिले थे. जबकि मुझे फिल्म व अभिनय के बारे में कुछ नहीं पता था. लेकिन निर्देशक बासु चटर्जी जी ने मुझे सब कुछ सिखाया था. वह मेरे मेंटर थे. अमोल पालेकर की भी यह पहली फिल्म थी.’’

फिल्म‘‘रजनीगंधा’के सफल होते ही विद्या सिन्हा को फिल्में मिलने लगी. विद्या सिन्हा ने राजेश खन्ना, शबाना आजमी, संजीव कुमार, शशिकपूर, विनोद खन्ना सहित उस वक्त के कई मशहूर कलाकारों के साथ फिल्में की.

ये भी पढ़ें- फिल्म रिव्यू: बाटला हाउस

सत्यम शिवम सुंदरम करने से किया था इंकार

अपने समय के मशहूर फिल्म निर्देशक व अभिनेता राज कपूर और विद्या सिन्हा के नाना मोहन सिन्हा अच्छे दोस्त थे. राज कपूर ने मोहन सिंहा के निर्देशन में 1947 में फिल्म ‘‘दिल की रानी’’ में अभिनय किया था. इससे पहले राज कपूर के  पिता पृथ्वीराज कपूर भी विद्या सिन्हा के नाना के साथ 1945 में फिल्म ‘‘श्री कृष्णार्जुन युद्ध’’ में काम किया था. वक्त बदला और जब राज कपूर ने फिल्म ‘‘सत्यम शिवम सुंदरम’ बनाने का निर्णय लिया, तो वह अपनी फिल्म ‘‘सत्यम शिवम सुंदरम’’ में जीनत अमान की बजाय विद्या सिन्हा को लेना चाहते थे. लेकिन विद्या सिन्हा के मना करने पर राज कपूर ने जीनत अमान को लेकर यह फिल्म बनायी थी. 2015 में एक मुलाकात के दौरान इस बारे में विद्या सिन्हा ने हमसे कहा था- ‘‘राज जी ने फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ का आफर दिया था, पर मैंने मना कर दिया था. क्योंकि मैं उस तरह के कपड़े नही पहनना चाहती थी, जिस तरह के कपड़े जीनत अमान ने इस फिल्म में पहना था. इस निर्णय को करते हुए मैं दुखी भी हुई थी. क्योंकि मैं हमेशा उनके साथ काम करना चाहती थी.’’

दिलीप कुमार के साथ काम करने का सपना रहा अधूरा

विद्या सिन्हा का सपना था कि उन्हे दिलीप कुमार के साथ फिल्म करने का अवसर मिले. मगर उनका यह सपना पूरा न हो पाया. जबकि फिल्मकार नासिर हुसैन दोनों को लेकर एक फिल्म बनाना चाहते थे, मगर फिल्म शुरू होने से पहले ही डिब्बे में बंद हो गयी थी.

संजीव कुमार की प्रशंसक थी विद्या सिन्हा

विद्या सिन्हा बचपन से ही संजीव कुमार की फैन थी. और उनका सपना था कि संजीव कुमार के साथ फिल्म करने का अवसर मिले. उनका यह सपना पूरा हुआ था. विद्या सिन्हा ने ‘‘मुक्ति”,‘‘पति पत्नी और वो’’ तथा ’’तुम्हारे लिए’ फिल्मों में संजीव कुमार के साथ अभिनय किया था. संजीव कुमार का जिक्र छिड़ने पर विद्या ने कहा था- ‘‘संजीव कुमार बहुत ही विनम्र इंसान थे. उन्होंने कभी भी हीरो या स्टार की तरह मेरे साथ व्यवहार नहीं किया था. उनका व्यवहार दोस्ताना होता था. वह हमें जोक्स सुनाकर सेट पर हंसाया करते थे.’’

1987 से 2005 तक अभिनय से दूरी की गलती

सीरियल ‘‘इश्क का रंग सफेद’’ के सेट पर विद्या सिन्हा ने हमसे बातचीत करते हुए कुबूल किया था कि बीच मे जब उनका करियर उंचाई पर था, उस वक्त अभिनय से दूरी बनाना उनकी गलती थी. उन्होंने कहा था- ‘‘जब मेरा करियर उंचाई पर था. तब मुझे लगा कि बहुत काम कर लिया, अब आराम किया जाए. यह मेरी गलती थी. जबकि उन दिनों अभिनय को अलविदा कहने की मेरे पास कोई वजह भी नहीं थी. मुझे बीच में अभिनय को अलविदा कहने का हमेशा गम रहा. बिना काम के घर पर बैठे रहने फ्रस्टेशन भी आने लगा था. इसीलिए मैंने दुबारा टीवी सीरियलों में अभिनय करना शुरू किया था. मैं हर औरत से कहना चाहूंगी कि उन्हे अस्सी साल की उम्र मे भी काम करते रहना चाहिए. ’’शायद यही वजह रही कि वह बाद में अपने अंतिम दिनों तक लगातार अभिनय करती रहीं.

वैसे फिल्म उद्योग को अलविदा कहने से पहले विद्या सिन्हा ने दूरदर्शन के लिए टीवी सीरियल ‘‘सिंहासन बत्तीसी’’और ‘‘दरार’’ के अलावा मराठी भाषा में फिल्म ‘‘बिजली’’ तथा गुजराती भाषा में फिल्म ‘‘जीवी रबरन’ का निर्माण भी किया था.

ये भी पढ़ें- साकी गर्ल नोरा फतेही के डांस मूव्स का है जलवा

नेगेटिव किरदार निभाने का सपना नहीं हुआ पूरा

‘इश्क का रंग सफेद’ के ही सेट पर विद्या सिन्हा ने कहा था कि उनकी तमन्ना नेगेटिव किरदार निभाने की है, पर उनका यह सपना पूरा न हो सका.

1969 में विद्या सिन्हा ने अपने पड़ोसी, प्रेमी और तमिल ब्राम्हण वेंकटेशवरन अय्यर से 19 साल की उम्र में विवाह रचाया. 1986 में उन्होंने जान्हवी को बेटी के तौर पर गोद लिया. जिंदगी में बेटी के आते ही विद्या सिहा ने अभिनय को अलविदा कह दिया. उसके बाद उनकी जिंदगी बेटी जान्हवी की परवरिश और बीमार पति की देखभाल में गुजरी. अंततः 1996 में उनके पति का देहांत हो गया. उसके बाद वह अपनी दत्तकपुत्री जान्हवी के साथ सिडनी, आस्ट्रेलिया चली गयी. 2001 में उनकी औन लाइन डा. नेताजी भीमराव सालुंके से दोस्ती हुई और चंद दिनों में ही दोनों ने शादी कर ली. मगर यह उनकी जिंदगी का दुःखद अध्याय रहा. अपनी दूसरी शादी से खुशी नही मिली. 2004 में वह वापस मुंबई आ गयी. 2005 में उन्होंने पुनः अभिनय की तरफ कदम बढ़ाते हुए टीवी सीरियल ‘‘काव्यांजली’’ से करियर की दूसरी पारी शुरू की. उन्होंने 2011 में सलमान खान व करीना कपूर के  साथ फिल्म ‘बौडीगार्ड’ भी की. यही उनके करियर की अंतिम फिल्म रही. कई अन्य सीरियल किए. 2018 में उन्होंने सीरियल ‘‘कुल्फीकुमार बाजेवाला’ में अभिनय किया, जो कि उनके करियर का अंतिम सीरियल रहा.

अंततः अपने दूसरे पति द्वारा दी जा रही यातनाओ से तंग आकर 9 जनवरी 2009 को विद्या सिन्हा ने अपने पति के खिलाफ पुलिस में शारीरिक और मानसिक यातना की शिकायत दर्ज करायी. मामला अदालत पहुंचा और अंततः दोनों ने तलाक ले लिया. मगर विद्या सिन्हा हर बार अपनी दूसरी शादी और दूसरे पति को लेकर बात करने से इंकार करती रही. तलाक के बाद भी इस बारे में विद्या सिन्हा ने कभी बात नहीं की.

टीवी कलाकारों ने प्रकट किया शोक

टीवी सीरियल निर्माता व निर्देशक राजन साही के अलावा टीवी इंडस्ट्री से जुड़े तमाम कलाकारों ने विद्या सिन्हा के निधन पर दुःख व शोक प्रकट किया है.

ये भी पढ़ें- इन बौलीवुड स्टार्स के भाई-बहन हैं टीवी के स्टार्स

थाईलैंड का मनमोहक समुद्रीतट

थाईलैंड एक बेहद खूबसूरत देश है. विश्व भर के पर्यटकों को रिझाने वाला पटाया समुद्र तट राजधानी बैंकौक से 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यह चौन बूरी प्रांत के एंफोए बांग लामुंग क्षेत्र का हिस्सा है. प्राकृतिक खूबसूरती के साथ ही पटाया नाइटलाइफ के लिए विश्वप्रसिद्ध है. यहां के मदिरालय, जिन्हें गोगो कहा जाता है, रात के समय ग्राहकों से ठसाठस भरे रहते हैं. दरअसल, ये मदिरालय वास्तव में वेश्यावृत्ति का अड्डा होते हैं. यहां बार गर्ल्स और कोयोटे डांसर्स की दुनिया सरगर्म रहती है. कहा जाता है कि पटाया की नाइटलाइफ संस्कृति मात्र 30 वर्ष पुरानी है. गोगो मदिरालयों के आगेपीछे की सड़कों को वाकिंग स्ट्रीट कहा जाता है जहां दिन ढले ही वेश्याओं का जमावड़ा लगना शुरू हो जाता है. यहां प्रतिवर्ष 70 से 80 लाख सैलानी आते हैं. इन में विवाहित जोड़े अधिक होते हैं. अकेले या अविवाहित लोग पटाया की नाइटलाइफ एंजौय करने आते हैं.

नाइटलाइफ के 2 क्लब सर्वाधिक चर्चित हैं, पहला, ‘अल्कतराज’ और दूसरा, ‘ऐंजलविच’. नाइटलाइफ के लिए पटाया ही नहीं, बांग लामुंग, चौन बूरी और थाईलैंड भी मशहूर हैं.

शहर और शहरवासी

पटाया शहर की आबादी मात्र डेढ़ से 2 लाख के बीच है. यहां रहने वाले अधिकांश लोग थाईचाइनीज मूल के हैं. पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो जाने के कारण आसपास के सर्वाधिक निर्धन क्षेत्र ईसान के ढेरों लोग यहां कामधंधे की तलाश में आ बसे. बीतते समय के साथ पटाया की मुख्य जनसंख्या में सेवानिवृत्त विदेशी लोगों की काफी वृद्धि हुई. थाईलैंड ऐसे अप्रवासी सेवानिवृत्त लोगों को विशेष वीजा उपलब्ध कराता है जो 50 वर्ष से अधिक आयु के होते हैं और थाईलैंड का किसी भी रूप में हिस्सा बन कर वहां रहना चाहते हैं.

ये भी पढ़ें- मांगुआ: ईको टूरिज्म का नया ठौर

यह क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से यातायात के विभिन्न साधनों से जुड़ा है. सड़क मार्ग, रेलमार्ग, विशेष बस मार्ग, टैक्सी और विमान सेवाओं से पूरी तरह जुड़ा हुआ है पटाया शहर. यातायात की इतनी सुविधाओं के रहते पटाया पहुंचना मुश्किल काम नहीं.

सामान्य जीवन

पटाया का सामान्य जीवन अत्यंत सीधासादा है, जैसा आम शहरों में होता है लेकिन यहां की नाइटलाइफ बहुत महंगी है. हर छोटी से छोटी चीज और छोटे से छोटे काम के लिए पैसा देना होता है. नाइटलाइफ यहां के पर्यटन व्यवसाय का मानो हिस्सा है जहां से सरकार को मोटी कमाई होती है.

दर्शनीय स्थल

रिवर क्वाई ब्रिज, जिसे ले कर प्रसिद्ध हौलीवुड फिल्म भी बनाई गई थी, जिस में जापानी युद्धबंदी शिविर का वर्णन था.

वाट समन, गणेश की लेटी हुई विशाल प्रस्तर प्रतिमा.

वाट सुवान खुहा, गौतम बुद्ध की लेटी हुई विशाल स्वर्ण प्रतिमा.

सुखावाड़ी पटाया, विशाल शाही महल.

हाटयाई, आधुनिक बाजार.

वाट फ्रौ काओ, स्वर्ण जडि़त गुंबदों वाला विशाल मंदिर.

लांफुन टेंपल, वास्तुशास्त्र का अद्भुत उदाहरण.

इन के अलावा भी बहुत कुछ है पटाया और थाईलैंड में देखने को जैसे, द मिलियन ईयर्स स्टोन्सपार्क, पटाया क्रोकोडाइल फार्म, पटाया पार्क बीच रिजौर्ट वाटर पार्क, फनी लैंड एम्यूजमैंट पार्क, सिरीपौर्न और्किड फार्म, सिल्वर लेक वाइनरी और अंडरवाटर वर्ल्ड (एक्वेरियम).

सैंचुअरी औफ ट्रुथ : लकड़ी के स्तंभाकार ढांचे थाईलैंड में लेइम रेचावेट समुद्री तट पर स्थित हैं. वे इस बात का सांकेतिक प्रमाण हैं कि मानवता का विकास किस प्रकार हुआ था.

मिनी वर्ल्ड एम्यूजमैंट पार्क : जिस प्रकार हौलैंड में एक कलाकार द्वारा बनाई गई शहर की लघु प्रतिकृति, जिसे विश्वभर से लोग देखने जाते हैं, की लोकप्रियता को देखते हुए पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए थाईलैंड में एक मिनीवर्ल्ड की स्थापना की गई है, जहां लंदन का टावर ब्रिज, फ्रांस का एफिल टावर, अमेरिका का स्टैच्यु औफ लिबर्टी और टे्रवी फाउंटैन की लघु प्रतिकृतियां बहुत खूबसूरती से उकेरी गई हैं.

अन्य आकर्षण

थाईलैंड रंगबिरंगे आकर्षक रंगों का त्योहारी देश भी है. लोग बहुत उत्साह के साथ विभिन्न त्योहारों को मनाते हैं. यहां मनाए जाने वाले बहुत से त्योहार ठीक भारतीय त्योहारों की तरह उत्साहपूर्वक मनाए जाते हैं.

सांगक्रौन : इसे स्थानीय भाषा में वानकाई भी कहा जाता है. यह रंगों का त्योहार है और भारत में खेली जाने वाली होली ही की तरह रंगों और पानी से सराबोर करने वाला त्योहार है. यह हर वर्ष अप्रैल माह के मध्य में मनाया जाता है.

चाइनीज न्यू ईयर : जनवरी के अंत से ले कर फरवरी के मध्य तक मनाया जाने वाला यह त्योहार विशेष रूप से पटाया में रहने वाले थाई-चाइनीज लोग मनाते हैं. सारे शहर को दुलहन की तरह कंदीलों और प्रकाश झालरों से सजाया जाता है. लोग ढोल जैसे वाद्य के साथ नृत्य करते हैं और गले मिलते हैं.

इंटरनैशनल म्युजिक फैस्टिवल : प्रत्येक वर्ष मार्च के महीने में पटाया में विश्वभर से आए संगीत कलाकार जुटते हैं और अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं. इस फैस्टिवल में भारत की भागीदारी को विशेष महत्त्व दिया जाता है. भारत से 10 से 15 दल इस में हिस्सा लेते हैं.

मिस टिफनी यूनिवर्स ब्यूटी पेजैंट : यह एक अनूठी सौंदर्य प्रतियोगिता है जो केवल पटाया में प्रत्येक वर्ष मई के महीने में आयोजित की जाती है. इस प्रतियोगिता की विशेषता है कि इस में केवल उभयलिंगी हिस्सा लेते हैं. इन के अतिरिक्त समलिंगी लोग भी हिस्सा ले सकते हैं.

फूड फैस्टिवल : सितंबर माह में 9 दिन चलने वाला फूड फैस्टिवल मनाया जाता है. इस में विशुद्ध शाकाहारी खाद्य पदार्थों को ही शामिल किए जाने की इजाजत होती है. इन 9 दिनों में लोग जहां तक संभव हो सके, केवल शाकाहारी भोजन ही करते हैं.

बाजार : थाईलैंड के बाजार अंतर्राष्ट्रीय स्तर की वस्तुओं की खरीदफरोख्त के लिए जाने जाते हैं. दुनियाभर से भ्रमण पर निकले पर्यटक, विशेष रूप से वे जो थाईलैंड घूमने गए हैं, वहां के बाजारों का लोभ संवरण नहीं कर सकते. स्थानीय, चीनी, अमेरिकी, जापानी और अन्य देशों के उत्पादों से ठसाठस भरे बाजार अपनेआप में आकर्षण का केंद्र हैं. हालांकि पटाया समुद्रतटीय आकर्षण है फिर भी यहां के बाजार भी शहरी बाजार से कम नहीं.

यहां बाजारों को उन की गुणवत्ता, विषय और बिक्री दरों के अनुरूप 3 श्रेणियों में बांटा गया है–लोकल मार्केट, सुपर  मार्केट और हाइपर मार्केट. लोकल मार्केट में पर्यटक कम ही रुचि लेते हैं क्योंकि वहां सिर्फ स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की वस्तुओं की ही बहुतायत रहती है. उन का आकर्षण होते हैं सुपर मार्केट और हाइपर मार्केट जहां से वे अपनी मनपसंद वस्तुएं खरीद सकते हैं.

ये भी पढ़ें- सीपियों का द्वीप है फडिऊथ

भाषा और धर्म

यहां की आधिकारिक भाषा थाई है. वैसे यहां कई भाषाएं बोली जाती हैं यानी चाइनीज, इंगलिश और हर उस देश की भाषा जिस मूल का नागरिक वहां रहता है.

थाईलैंडपटाया में मुख्यधर्म है बौद्ध धर्म. थाईलैंड में 94.6 प्रतिशत लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं और 4.6 प्रतिशत मुसलिम हैं. 0.7 प्रतिशत ईसाई और शेष हिंदू व सिख हैं.

भोजन व्यवस्था

जैसा कि हम पहले बता चुके हैं कि थाईलैंड में थाईचाइनीज मूल के लोगों की बहुतायत है, इसलिए कहना अनावश्यक होगा कि प्रमुख भोजन में नूडल्स, प्रौन और नौनवेज भोजन प्रमुखता से लिया जाता है लेकिन चूंकि थाईलैंड में भारतीय भी रहते हैं, भारतीय भोजन के लिए कई रेस्तरां भी उपलब्ध हैं. यह बात अलग है कि भारतीय रेस्तरां ढूंढ़ने में थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है.

यातायात

थाईलैंड का यातायात काफी अस्तव्यस्त रहता है (भारत के पुराने शहरों की तरह). थ्रीव्हीलर्स, स्कूटर, मोटरसाइकिल, साइकिल व पैदल सभी भीड़ के रूप में सड़कों पर नजर आते हैं.

रेल : थाईलैंड में मीटरगेज की रेल 4,070 किलोमीटर रास्ता तय करती है. इस के अलावा बैंकौक मैट्रो और बैंकौक स्काई ट्रेन उपलब्ध हैं.

ये भी पढ़ें- धरती का स्वर्ग है ‘जम्मू कश्मीर’

आखिर कैसे निकलें टौक्सिक रिलेशनशिप से

आजकल लगभग हर लड़का लड़की रिलेशनशिप में हैं. रिलेशनशिप भी कई तरह के हैं, कोई एक साथ भविष्य की प्लानिंग कर रहा है तो कोई फिलहाल वर्तमान में जीने की कोशिश… कोई अपने रिलेशनशिप में बहुत खुश है तो कोई बहुत दुखी. जो खुश हैं वे रिलेशनशिप निभा रहे हैं और जो दुखी हैं वे बस ब्रेकअप से एक कदम दूर हैं या शायद किसी मजबूरी के कारण इस रिलेशनशिप में हैं.

लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस खुशी दुखी के पैमाने को समझने में चूक रहे हैं. कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें यह तो समझ आता है कि उनका रिलेशनशिप ठीक नहीं, लेकिन वह इस से निकलना नहीं चाहते. वह रिलेशनशिप जिसमें व्यक्ति दो पल की खुशी के कारण हजार पलों के दुख झेल कर भी सब कुछ नौर्मल समझे, असल में टौक्सिक रिलेशनशिप है. टौक्सिक रिलेशनशिप आप को खुश नहीं रहने देती, आगे नहीं बढ़ने देती और न ही इसे खत्म करने देती है. टौक्सिक रिलेशनशिप में आप का बौयफ़्रेंड या गर्लफ्रेंड आप को ढ़ेरों रेड फ्लैग्स दिखाता है, फिर भी आप इस ”प्यार” के चलते इस नेगेटिव पार्टनर से दूर होने से डरते हैं. टौक्सिक रिलेशनशिप से बाहर निकलना बेहद जरूरी है क्योंकि यह आप की ज़िन्दगी को विभिन्न तरीकों से प्रभावित करती है और आपके सुख, चैन और सुकून को छीन लेती है.

ये भी पढ़ें- RAKHI SPECIAL: भाई-बहन के रिश्ते में ऐसे लाएं मिठास, अटूट होगा ये बंधन

टौक्सिक रिलेशनशिप को पहचानना

प्रज्ञा कालेज के फर्स्ट ईयर में अंकित से मिली थी. अंकित उसी की क्लास में था. हालांकि दोनों की बात नार्मल दोस्तों जैसी ही होती थी लेकिन उस दिन सब बदल गया जब अंकित ने प्रज्ञा को बताया कि वह उसे कितनी ज्यादा खूबसूरत लगती है. अंकित के मुंह से यह तारीफ़ प्रज्ञा के लिए बहुत ही अनएक्सपेक्टेड थी क्योंकि उस ने अंकित को कभी किसी लड़की को कौम्पलिमेंट देते नहीं सुना था. उस दिन से प्रज्ञा के मन में अंकित ठहरने लगा था. वे दोनों रातरात भर बातें करने लगे. वह दिन भी दूर नहीं था जब अंकित ने प्रज्ञा को प्रोपोज़ किया. अबतक दोनों के बीच जो भी बातचीत हुई थी उस बारे में प्रज्ञा और अंकित ने किसी को कुछ नहीं बताया था, अपने बाकी दोस्तों को भी नहीं. लेकिन जब प्रज्ञा ने अंकित को हां कहा और वे रिलेशनशिप में आए तो अंकित ने उसे किसी को भी कुछ भी बताने से मना कर दिया.

अंकित का कहना था कि उन के बाकि दोस्त अंकित को खासा पसंद नहीं करते और उन्हें इन दोनों के रिलेशनशिप के बारे में पता चलेगा तो हो सकता है वे मजाक उड़ाएं जो कि अंकित नहीं चाहता. प्रज्ञा अंकित की यह बात मान गई और दोनों सीक्रेट रिलेशनशिप में आ गए. अंकित प्रज्ञा अब क्लोज आने लगे थे, मेंटली भी और फिजिकली भी. लेकिन, वक्त बीतने के साथ ही बाकि सभी चीजे भी बदलने लगीं. अंकित कालेज में प्रज्ञा के सामने बाकी लड़कियों से खूब फ़्लर्ट करता और प्रज्ञा बस देखती रह जाती. फोन पर वह उसे बताता कि यह सब बस मजाक है, आखिर, प्यार तो उसे बस प्रज्ञा से ही है.

अंकित अब प्रज्ञा को ना टाइम दे रहा था न अटेंशन. प्रज्ञा अंदर ही अंदर घुटने लगी थी. वह पूरी रात अंकित के मैसेज का इंतजार करती लेकिन अंकित औनलाइन हो कर भी उसे मैसेज नहीं करता. प्रज्ञा ने जब अंकित से यह शिकायत की कि वह इस रिलेशनशिप में खुश नहीं है तो अंकित उसे प्यार भरी बातें कर बहलाता, वह अपनी जिन्दगी में कितना परेशान है यह बताता. प्रज्ञा हर बार उस की बातों के आगे झुक जाती. वे दोनों कौलेज में बात तक नहीं करते थे, हाय हेलो भी नहीं. प्रज्ञा के लिए यह रिलेशनशिप ख़ुशी का कम बल्कि हर समय इनसिक्योर रहने का जरिया ज्यादा हो गई थी.

प्रज्ञा हर समय परेशान रहती थी. न किसी को इस रिलेशनशिप के बारे में बता पा रही थी न इसे खत्म कर पा रही थी. वह अंकित से बहुत प्यार करती थी, इतना कि अंकित का एक मैसेज उसका दिन बना या बिगाड़ सकता था. प्रज्ञा एक दिन यूं ही अंकित से किसी बात को ले कर शिकायत कर रही थी कि अंकित ने कह दिया कि ब्रेकअप कर लेते हैं. प्रज्ञा मान गई. वह दिन रात रोती रहती, घर में रहती तो ओवर थिंकिंग और एंग्जायटी उसे जीने न देती, कालेज जाती तो अंकित की एक झलक उस के घावों पर नमक का काम करते. दो महीने उस ने इसी तरह गुजारे. फिर एक दिन अंकित का मैसेज आ गया. वह उसे बताने लगा कि उस के लिए भी ऐसे जीना मुश्किल है. उस ने एक बार फिर प्रज्ञा की जिन्दगी में आना चाहा और प्रज्ञा ने उसे फिर से स्वीकार भी कर लिया.

प्रज्ञा एक दिन अंकित के घर गई थी जब उस के घर में कोई नहीं था. वह दोनों इंटिमेट हुए, बातें की  और ज़िन्दगी में आगे एकसाथ बढ़ने की इच्छा भी जताई. प्रज्ञा ने बातों ही बातों में अंकित से यह पूछ लिया कि वह सेक्स के लिए हमेशा ही इतना आतुर रहता है तो यदि उसे कभी कोई लड़की वन नाईट स्टैंड के लिए पूछेगी तो वह क्या करेगा. इस पर अंकित का जवाब था कि वह उस वन नाईट स्टैंड के लिए हां कह देगा क्योंकि उस के लिए खुद को कंट्रोल करना मुश्किल है. इतना सुनने के बाद भी प्रज्ञा वहां से उठ कर जा नहीं पाई.

घर आने के बाद प्रज्ञा को एहसास हुआ कि जिस इंसान से उसे इतना प्यार है उस के मन में उस के लिए प्यार तो दूर की बात, शायद इज्जत भी नहीं है. प्रज्ञा अपने ही ख्यालों में डूबी थी कि अंकित का मैसेज आ गया. उस ने कितना चाहा कि इग्नोर कर दे, पर कर नहीं पाई. प्रज्ञा को एहसास हो गया था कि वह अंकित के साथ रहकर खुद की पहचान खत्म कर रही है पर उस से दूर होने की हिम्मत उस में नहीं थी.

कौलेज के तीन साल भी इसी बीच खत्म हो गए. अंकित और प्रज्ञा अब भी तीन महीने में एक बार ही मिलते थे. दोनों मैसेज पर बात करते भी तो ना के बराबर. दोनों का इन तीन सालों में कई बार ब्रेकअप भी हुआ था पर हर बार अंकित अपनी बातों से प्रज्ञा को मना लेता था. प्रज्ञा ने यह तीन साल रो रोकर काटे थे फिर भी अंकित से दूर नहीं हो पाई थी.

आखिरी बार दोनों कब मिले थे प्रज्ञा को याद नहीं लेकिन जब अंकित का मैसेज आया तो उस से मिलने से वह खुद को रोक नहीं पाई. वह अंकित से मिलने कैफे पहुंची तो अंकित उस से बातें करने की बजाए लगातार किसी से फोन पर चैटिंग कर रहा था. प्रज्ञा को यह देख कर बहुत गुस्सा आया, उस ने अंकित से कहा कि फोन में लगे रहने की बजाए वह प्रज्ञा से बात भी कर सकता है. इस पर अंकित ने यह कह दिया कि जब वह बात करेगी तो अंकित फोन रख देगा. प्रज्ञा ने मन ही मन सोचा कि क्या वही इतनी बेवकूफ है जो उस से बात करने के लिए मर रही है और उसे फर्क तक नहीं पड़ता. प्रज्ञा कुछ बोली नहीं. दोनों वहां से 2 घंटे में ही निकल गए.

प्रज्ञा को लगा कि उस ने एक बार फिर अपनी सेल्फ रिस्पेक्ट और सेल्फ एस्टीम खो दी है. वह आखिर समझ गई कि यह रिलेशनशिप एक टौक्सिक रिलेशनशिप से ज्यादा कुछ नहीं थी. अंकित जैसा लड़का उसे कभी वो रिस्पेक्ट और प्यार दे ही नहीं सकता, जो वह डिजर्व करती है. एक बार फिर प्रज्ञा टूट चुकी थी.

ये भी पढ़ें- RAKHI SPECIAL: मुंहबोले भाई बहन समय की जरूरत

टौक्सिक रिलेशनशिप से निकलना

पहली बात जो हर किसी को जान लेना बहुत जरूरी है, यह है कि किसी भी रिलेशनशिप के खत्म होने के बाद दुख और दर्द होना लाजिमी है. खुद को बिखरा हुआ और दिल टूटा हुआ लगना स्वाभाविक है. सिर्फ इस डर से कि यह दर्द झेलना मुश्किल होगा या इस इंसान से बात किए बिना जीना मुश्किल होगा, टौक्सिक रिलेशनशिप में रहना गलत है. यह बात हर किसी को अपने मन में बैठा लेने कि जरूरत है कि आप किसी रिश्ते में खुश नहीं हैं तो उसे खत्म करना ही आप के और आप के आने वाले भविष्य के लिए सही है. और वो कहते हैं न किसे के चले जाने से ज़िन्दगी खत्म नहीं हो जाती, बिलकुल सही है.

खुद की वैल्यू समझें

हर इंसान के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि अगर वह खुद खुश नहीं है तो ऐसी रिलशनशिप में रहना उस के लिए सही नहीं है. फिल्मो में त्याग और प्यार को एक साथ जोड़कर हम यह तो सीख गए हैं कि सामने वाले की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूंढ़नी चाहिए, पर यह नहीं समझे की जबतक हम खुद खुश नहीं रहेंगे तो अपने पार्टनर को भी खुश नहीं रख पाएंगे. टौक्सिक रिलेशनशिप तो दिल में चुभे कांटे की तरह है जो हमेशा दर्द ही देगी. इसे अपने जीवन से निकालकर ही आप खुश रह पाएंगे. अपनी सेल्फ रिस्पेक्ट को गंवाने का एहसास बहुत बुरा है और प्यार के नाम पर खुद की नजरों में गिरना उस से भी बुरा.

स्पष्टतौर पर ब्रेकअप करें

टौक्सिक रिलेशनशिप में अक्सर लोग एक दूसरे से दूर रहने की कोशिश तो करते हैं लेकिन स्पष्ट तौर पर ब्रेकअप करने की बजाए बस चुप्पी साध लेते हैं और इंतजार करते हैं कि उन का पार्टनर एक बार फिर आएगा, उनसे बात करेगा और सबकुछ नौर्मल हो जाएगा. लोग खुद अपने पार्टनर को मौका देते हैं कि वह आए और आकर उन का टाइम वेस्ट करे. यही सबसे बड़ा कारण है कि लोग दूर रहने के बावजूद भी अपने पार्टनर से मूव औन नहीं कर पाते और इस टौक्सिक रिलेशनशिप को झेलते रहते हैं. इसलिए जरूरी है कि आप स्पष्टतौर पर ब्रेकअप करें जिस से आपके पार्टनर को भी एक बार फिर वापिस आने का मौका ही न मिले.

इस प्यार को कमजोरी बनाएं

‘प्यार है तो काफी है फिर चाहे जान ही क्यों न चली जाए’ वाली जो सोच है न, असल मुसीबत की जड़ वही है. किसी से आप को कितना ही प्यार क्यों न हो, उस प्यार का तब तक कोई मतलब नहीं जबतक वह आप की इज्जत न करे और आप को प्यार न दे. अब ‘कुछ कुछ होता है’ की अंजली और राहुल को ही देख लीजिए. अंजली ने अपने इस प्यार की खातिर क्या नहीं किया, पर क्या हुआ? राहुल ने किया वही जो उस के लिए फायदेमंद था. उस ने तो अपनी ज़िन्दगी जी ली, शादी की और बच्ची भी हो गई. जब आखिर में उसे अपनी बच्ची के लिए मां की जरुरत थी तो उसे अंजली दिख गई जोकि अब खूबसूरत भी लगने लगी थी. पर अंजली को क्या मिला? अपना भूला बिसरा प्यार जिसने उसे इतने साल घुट घुट के जीने पर मजबूर किया? इन फिल्मों से सीखी प्यार की बातों को अपने असल जीवन में अपनाकर पछताने की बजाए असल लौजिक पर अमल किया जाए तो बेहतर है.

ये भी पढ़ें- अगर आप भी आइडिअल कपल बनना चाहते हैं तो पढ़ें ये खबर

“ज़िन्दगी में प्यार एक बार होता है और शादी भी,” जैसी बातों पर विश्वास करने की कोई जरुरत नहीं है. खुद इस डायलौग को कहने वाले ने ही दो दो शादियां की थीं, तो आप तो दो बार क्या तीन बार भी प्यार कर ही सकते हैं. अपनी टौक्सिक रिलेशनशिप से निकलें, खुद पर फोकस करें, खुद की ख़ुशी को अपनी प्राथमिकता बनाएं, नए लोगों से मिलें, नई चीज़ें सीखें और किसी भी तरह के नेगेटिव इंसान को अपने पास भी न भटकने दें.

फिल्म रिव्यू: बाटला हाउस

रेटिंग:साढ़े तीन

निर्माताः भूषण कुमार, किशन कुमार, दिव्या खोसला कुमार, मोनिशा अडवाणी, मधु भोजवानी, जौन अब्राहम,संदप लेजेल

लेखकःरितेश शाह

निर्देशकः निखिल अडवाणी

संगीतकारः रोचक कोहली, तनिष्क बागची, अंकित तवारी

कलाकारः जौन अब्राहम, मृणाल ठाकुर, राजेश शर्मा, रवि किशन, मनीष चैधरी, सोनम अरोड़ा, क्रांति प्रकाश झा, चिराग कटरेजा, नोरा फतेही व अन्य.

अवधिः दो घंटे 27 मिनट

2013 में घटित दिल्ली के बहुचर्चित ‘‘बाटला हाउस इनकांउटर’’ सत्य घटनाक्रम पर निखिल अडवाणी एक्शन व रोमांचक फिल्म ‘‘बाटला हाउस’’ लेकर आए हैं जिसे देश प्रेम के जज्बे को बढ़ाने वाली फिल्म कहा जा सकता है. फिल्म की शुरूआत में ही फिल्मकार ने दावा किया है कि यह फिल्म ‘बाटला हाउस इनकाउंटर’ के मुखिया रहे डीएसपी संजीव कुमार यादव व उनकी पत्नी से प्रेरित है.

कहानीः

फिल्म की कहानी शुरू होती है 13 सिंतबर 2008 को दिल्ली के डीसीपी संजय कुमार यादव (जौन अब्राहम) के घर से जहां उनकी पत्नी व पत्रकार नंदिता यादव (मृणाल कुलकर्णी) नाराज है और वह घर छोड़कर जाना चाहती हैं. नंदिता की शिकायत है कि संजय कुमार घर व उन पर ध्यान देने की बजाय सिर्फ देश के लिए सोचते हैं और पुलिस विभाग की नौकरी को ही समय देते हैं. संजय यादव अपनी पत्नी से कह देते हैं कि वह उन्हें छोड़कर जा सकती है. पर वह अपने देश के लिए काम करते रहेंगे. उसके बाद वह बाटला हाउस के लिए रवाना होते हैं, जहां उनकी टीम पहले से उनका इंतजार कर रही है.

वास्तव में दिल्ली में हुए सीरियल बम धमाकों की जांच के सिलसिले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के अफसर  के.के (रवि किशन) और डीएसपी संजय कुमार यादव (जौन अब्राहम) अपनी टीम के साथ बाटला हाउस एल 18 नंबर की इमारत की तीसरी मंजिल पर पहुंचते हैं. वहां पर पुलिस की इंडियन मुजाहिद्दीन के संदिग्ध आतंकियों से मुठभेड़ होती हैं. इस मुठभेड़ में दो संदिग्धों की मौत हो जाती है. एक पुलिस अफसर के घायल होने के साथ साथ पुलिस अफसर की मौत होती है. पर एक संदिग्ध आतंकी आदिल मौके वारदात से भागने में सफल हो जाता है. जबकि पुलिस ताफेल नामक युवा आतंकी को पकड़ने में सफल होती है. इस इनकाउंटर के बाद देश भर में राजनीतिक और आरोप प्रत्यारोपों का माहौल गरमा जाता है. आतंकी आदिली भागकर उत्तर प्रदेश चला जाता है.

उस वक्त केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनो जगहों पर अलग अलग राजनीतिक दलों की सरकारें थी. उत्तर प्रदेश की सरकार मारे गाए युवकों के साथ खड़ी नजर आती है. एक राजनीतिक दल मारे गए आतंकियों को विद्दार्थी बताते हुए इसे पुलिस का फर्जी इनकाउंटर कहता है. विभिन्न राजनीतिक पार्टियों और मानवाधिकार संगठनों द्वारा संजय कुमार यादव की टीम पर बेकसूर विद्यार्थियों को आतंकी बताकर फर्जी इनकाउंटर करने के गंभीर आरोप लगने पर संजय कुमार यादव को पुलिस विभाग व केंद्रीय गृहमंत्रालय की अंदरूनी चालों का भी सामना करना पड़ता है. परिणामतः वह पोस्ट ट्रामेटिक डिसआर्डर जैसी मानसिक बीमारी से जूझते हैं. जांच को आगे बढ़ाने और खुद को निर्दोश साबित करने के सिलसिले में उसके हाथ बांध दिए जाते हैं. ऐसे कठिन वक्त में संजय यादव की पत्नी व पत्रकार नंदिता यादव (मृणाल कुलकर्णी)  उसका साथ देती है. छह बार गेलेंट्री अवार्ड्स से सम्मानित जाबांज और ईमानदार पुलिस अफसर अपनी व अपनी टीम को बेकसूर साबित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देता है. यह मामला अदालत भी पहुंचता है.

ये भी पढ़ें- साकी गर्ल नोरा फतेही के डांस मूव्स का है जलवा

लेखनः

पटकथा लेखक रितेश शाह ने कहानी को कई परतों के साथ पेश किया है. इसमें उन्होंने इनकाउंटर संपन्न होने के बाद जो हालात पैदा हुए थे, उन सभी को यथार्थ रूप में पेश किया है. इसमें पुलिस की जांबाजी, अपराध बोध, बेबसी, राजनीतिक दलों की चिरपरिचित कार्यशैली,  मानवाधिकार संगठनों का गुस्सा, समाचार टीवी चैनलों की टीआरपी की दौड़ के चलते लिए जाने वाले निर्णय, धार्मिक कट्टरता सहित हर पक्ष को बड़ी खूबी से परदे पर उतारा है. फिल्म में कुछ संवाद बहुत उत्कृष्ट बन पड़े हैं. मसलन-फिल्म में जौन अब्राहम का एक संवाद है- ‘‘एक आतंकी को मारने के लिए सरकार जो रकम देती है, उससे ज्यादा तो एक टाफिक हवलदार एक हफ्ते में कमा सकता है.’’

निर्देशनः

कई वर्ष पहले आतंकवाद पर बेहतरीन एकशन व रोमांचक फिल्म दे चुके निखिल अडवाणी ने  एक बार फिर अपने कुशल निर्देशन का परिचय दिया है. पुलिस स्टेशन में जब संजय यादव, तुफेल से पूछताछ करते हुए उसे जिस तरह से कुरान की आयतों को समझाते हैं, वह दृश्य बहुत ही बेहतरीन बना है. दिग्विजय सिंह, एल के अडवाणी, अमर सिंह और अरविंद केजरीवाल जैसी राजनीतिक हस्तियों के उस वक्त के बयानों के रीयल फुटेज का उपयोग करने के साथ ही फिल्म को बहुत यथार्थपरक अंदाज में बनाया है. लेकिन निखिल अडवाणी बड़ी चालाकी से ठोस राजनीतिक बयान देने से बचते नजर आए हैं.

फिल्म की लंबाई जरुर कुछ बड़ी हो गयी है. ‘डी डी’ से सबक सीखते हुए निखिल अडवाणी ने ‘‘बाटला हाउस’’ में गीत संगीत भी पिरोया है, जिससे लोगों को मनोरंजन मिल सके और वह बोर न हो. इसके बावजूद फिल्म कई जगह बहुत भारी हो गयी है.

कैमरामैन सौमिक मुखर्जी की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है

अभिनयः

डीसीपी संजय यादव के किरदार में जौन अब्राहम ने एक बार फिर उत्कृष्ट अभिनय का परिचय दिया है. एक इमानदार पुलिस अफसर पर जब उंगली उठे और वह खुद को तथा अपनी टीम को निर्दोष साबित करने में विफल हो रहा हो, उस वक्त की बेबसी, अपराध बोध, मानसिक अंतद्र्वंद को बड़ी सहजता से परदे पर उकेरा है, मगर कुछ दृश्यों में वह अपने आपको दोहराते हुए भी नजर आए हैं. नंदिता यादव के किरदार में मृणाल ठाकुर ने शानदार परफार्मेंस दी है. रवि किशन की प्रतिभा को जाया किया गया है. पुलिस के खिलाफ अदालत में पेश होने वाले वकील के किरदार में राजेश शर्मा अपनी छाप छोड़ जाते हैं. आदिल अमीन के किरदार में क्रांति प्रकाश झा अपनी छाप छोड़ जाते हैं.

ये भी पढ़ें- हमेशा सुर्खियों में रही श्वेता तिवारी

सयुंक्त परिवार में प्यार रहेगा बरकरार

लंच टाइम में पुनीता के लंच का डब्बा खुलते ही औफिस में सभी खुश हो जाते. उस का लंचबौक्स सारी महिलाओं के लिए आकर्षण का केंद्र बिंदु हुआ करता था क्यों कि में हमेशा तरहतरह की स्वाददार चीज़ें होती. सब चकित रह जाते कि वह सुबह सुबह इतना सब कुछ कैसे बना लेती है.

तब एक दिन पुनीता ने इस का राज खोलते हुए कहा कि यह सब वह नहीं बनाती बल्कि उस की बहन बनाती है. औरतों में सुगबुगाहट शुरू हो गई. विभा ने तो सीधा सवाल ही दाग दिया,” क्या बहन तेरे साथ ससुराल में रहती है?”

मुस्कुराते हुए पुनीता ने जवाब दिया; “अरे नहीं वह मेरी असली बहन नहीं बल्कि देवरानी है जो बहन से भी बढ़ कर है. वही बनाती है रोज मेरे और बच्चों के लिए टिफ़िन. ”

ये भी पढ़ें- लव मैरिज के लिए पैरेंट्स को ऐसे करें राजी

सुन कर सब चकित रह गए. ” उस के पास इतना समय होता है? क्या वह जौब नहीं करती? ”

“हां जी वह जौब नहीं करती मगर पूरा घर संभालती है. हम सब की दुलारी है. वह नहीं होती तो शायद इतनी आसानी से जौब नहीं कर पाती मैं. ”

“वाह, यह तो बड़ी अच्छी बात है. आज के समय में कौन करता है किसी दूसरे के लिए इतना.”विभा ने कहा.

“दूसरा या अपना क्या होता है? जिसे अपना मान लो वही सब कुछ है.एक बहन मायके में है तो एक ससुराल में भी तो होगी न ” कह कर पुनीता मुस्कुराई.

वस्तुतः पुनीता सयुंक्त परिवार में रहती थी और अपनी देवरानी के साथ उस के अच्छे सम्बन्ध थे. पुनीता के पति की मौत हो चुकी थी मगर इस घर में कभी उसे अकेला रह जाने का अहसास भी नहीं हुआ. पूरा परिवार उस का साथ देता था.

हो सकता है सुनने में यह सब कुछ अजीब लगे मगर ऐसा संभव है. यदि आप रिश्तों को बाँध कर चलें तो वही रिश्ते आगे जा कर आप के जीवन में प्यार और सुकून के फूल खिलाते हैं.

आज भले ही ज्यादातर एकल परिवार ही नजर आते हैं मगर यदि आप एक बार सयुंक्त परिवार में रह जाएँ तो कभी अकेले रहने की जिद नहीं करेंगे. वैसे आज लोग परिस्थिति वश अकेले रहने लगे हैं. मेट्रोज में तो परिवार का मतलब पतिपत्नी और बच्चे से ही लगाया जाता है मगर कहीं न कहीं एक भरे पूरे परिवार की कमी का दंश उन्हें सालता रहता है.

ये भी पढ़ें- बेवजह शक के ये हैं 5 साइड इफैक्ट्स

संयुक्त परिवार बनाम एकल परिवार

पिछले दिनों फिल्म डायरेक्टर शुजीत सरकार के एक ट्वीट ने संयुक्त परिवार बनाम एकल परिवार की बहस को तेज कर दिया था जब उन्होंने अपने एक ट्वीट में लिखा, ‘हमें अपने रहने के पुराने सिस्टम यानी कि संयुक्त परिवार की ओर वापस लौटना चाहिए. सभी तरह की मानसिक असुरक्षा, अकेलेपन और डिप्रेशन से बचने का अब शायद यही एकमात्र तरीका बचा है. परिवार नामक छाता हमारे मन को सुरक्षा की भावना देता है.’

शुजीत के इस ट्वीट पर मीटू एक्टिविस्ट और पत्रकार रितुपर्णा चटर्जी ने लिखा, ‘यह मेरा निजी अनुभव है. मैं ने बहुत करीब से संयुक्त परिवार को देखा है जिस में महिलाओं के श्रम का शोषण होता है. महिलाएं ही एकदूसरे के खिलाफ खड़ी होती हैं, महिलाओं को पितृसत्तात्मकता का सामना करना पड़ता है.’

जाहिर है किसी भी चीज़ में अच्छाई और बुराई दोनों होती है. यदि हमें भरेपूरे परिवार का सुरक्षा और प्यार चाहिए तो कुछ कोम्प्रोमाईज़ करने के लिए भी तैयार होना ही होगा. वैसे ओवरआल देखा जाए तो ऐसे परिवारों में रहने के फायदे नुक्सान से कहीं अधिक होते हैं. जब घर में इतने सारे लोग रहेंगे तो सामान्य बात है कि नोकझोंक होना और खुद को अच्छा साबित करने की प्रतिस्पर्धा काफी बढ़ जाती है. मगर इस के बदले मन की जो खुशियां मिलती हैं उन की तुलना किसी से नहीं की जा सकती. परिवार में महिलाओं की स्थिति क्या होगी और उन का शोषण होगा या नहीं यह काफी हद तक महिलाओं की आर्थिक स्थिति और दूसरी महिलाओं के रुख पर भी निर्भर करता है.

ये भी पढ़ें- बच्चों को डिप्रैशन से कैसे बाहर निकाले?

अगली कड़ी में पढ़ें,  संयुक्त परिवार में रहने के लाभ

मुझे एक लड़की से प्यार हो गया है और इस वजह से मैं नहीं पढ़ रहा हूं. मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं 12वीं क्लास में पढ़ता हूं. मुझे एक लड़की से प्यार हो गया है. वह भी मुझे बेहद चाहती है. वह रोज फोन पर मुझ से 4-5 घंटे बातें करती है और ढेरों एसएमएस करती है. इस प्यार से मेरी पढ़ाई में बहुत बाधा आ रही है, पर वह मानती नहीं.  मैं क्या करूं?

जवाब

प्यार, दोस्ती, फोन व एसएमएस, सभी एक सीमा तक ठीक होते हैं. आप दोनों ने इन्हीं सब को जीवन बना  लिया है. उसे प्यार से समझा दें कि अभी पढ़ाई आप के लिए ज्यादा अहम है. पढ़ कर कुछ बनने के बाद ही प्यार परवान चढ़ता है. सिर्फ उसे ही न समझाएं, बल्कि खुद पर भी काबू रखें व पढ़ाई पर पूरी तरह ध्यान दें.

ये भी पढ़ें- मैं पिछले एक साल से एक लड़की से प्यार करता हूं. मैं कैसे पता करूं कि वह मुझसे प्यार करती है या नहीं?

ये भी पढ़ें- मेरा भाई मुझसे नफरत करता है. मैं क्या करूं?

जन्मपत्री

बूआ ने भरसक प्रयास किया कि रश्मि की शादी ऐसे लड़के से हो जिस की जन्मपत्री रश्मि की जन्मपत्री से मेल खाती हो और उन के 32 गुण मिलते हों. बूआ अपने प्रयास में जुटी रहीं पर अचानक कुछ ऐसा हुआ कि बूआ के सारे मनसूबों पर पानी फिर गया. पढि़ए, डा. प्रणव भारती की कहानी.

‘‘ये  लो और क्या चाहिए…पूरे

32 गुण मिल गए हैं,’’

गंगा बूआ ने बड़े गर्व से डाइनिंग टेबल पर नाश्ता करते हुए त्रिवेदी परिवार के सामने रश्मि की जन्मपत्री रख दी.

‘‘आप हांफ क्यों रही हैं? बैठिए तो सही…’’ चंद्रकांत त्रिवेदी ने खाली कुरसी की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘‘चंदर, तू तो बस बात ही मत कर. जाने कौन सा राजकुमार ढूंढ़ कर लाएगा बेटी के लिए. कितने रिश्ते ले कर आई हूं…एक भी पसंद नहीं आता. अरे, नाक पर मक्खी ही नहीं बैठने देते तुम लोग… बेटी को बुड्ढी करोगे क्या घर में बिठा कर…?’’ गोपू के हाथ से पानी का गिलास ले कर बूआ गटगट गटक गईं.

चंद्रकांत, रश्मि और उस का भाई विक्की यानी विकास मजे से कुरकुरे टोस्ट कुतरते रहे. मुसकराहट उन के चेहरों पर पसरी रही पर चंद्रकांत त्रिवेदी की पत्नी स्मिता की आंखें गीली हो आईं. आखिर 27 वर्ष की हो गई है उन की बेटी. पीएच.डी. कर चुकी है. डिगरी कालेज में लेक्चरर हो गई है. अब क्या…घर पर ही बैठी रहेगी?

चंद्रकांत ने तो जाने कितने लड़के बताए अपनी पत्नी को पर स्मिता जिद पर अड़ी ही रहीं कि जब तक लड़के के पूरे गुण नहीं मिलेंगे तब तक रश्मि के रिश्ते का सवाल ही नहीं उठता. जो कोई लड़का मिलता स्मिता को कोई न कोई कमी उस में दिखाई दे जाती. चंद्रकांत परेशान हो गए थे. वे शहर के जानेमाने उद्योगपति थे. स्टील की 4 फैक्टरियों के मालिक थे. उन की बेटी के लिए कितने ही रिश्ते लाइन में खड़े रहते पर पत्नी थीं कि हर रिश्ते में कोई न कोई अड़ंगा लगा देतीं और उन का साथ देतीं गंगा बूआ.

गंगा बूआ 80 साल से ऊपर की हो गई होंगी. चंद्रकांत ने तो अपने बचपन से उन्हें यहीं देखा था. उन के पिता शशिकांत त्रिवेदी की छोटी बहन हैं गंगा बूआ. बचपन में ही बूआ का ब्याह हो गया था. ब्याह हुआ और 15 वर्ष की उम्र में ही वह विधवा हो गई थीं. मातापिता तो पहले ही चल बसे थे, अत: अपने इकलौते भाई के पास ही वे अपना जीवन व्यतीत कर रही थीं.

घर में कोई कमी तो थी नहीं. अंगरेजों के जमाने से 2-3 गाडि़यां, महल सी कोठी, नौकरचाकर सबकुछ उन के पिता के पास था. फिर शशिकांत इतने प्रबुद्ध निकले कि जयपुर शहर के पहले आई.ए.एस. अफसर बने. उन के ही पुत्र चंद्रकांत हैं. चंद्रकांत की पत्नी स्मिता वैसे तो शिक्षित है, एम.ए. पास हैं पर न जाने उन के और गंगा बूआ के बीच क्या खिचड़ी पकती रहती है कि स्मिता की हंसी ही गायब हो गई है. उन्हें हर पल अपनी बेटी की ही चिंता सताती रहती है. चंद्रकांत ने अपनी बूआ के साथ अपनी पत्नी को हमेशा खुसरपुसर करते ही पाया है.

गंगा बूआ के मन में यह विश्वास पत्थर की लकीर सा बन गया है कि उन का वैधव्य उन की जन्मपत्री न मिलाने के कारण ही हुआ है. उन के पिता व भाई आर्यसमाजी विचारों के थे और कुंडली आदि मिलाने में उन का कोई विश्वास नहीं था. शशिकांत के बहुत करीबी दोस्त सेठ रतनलाल शर्मा ने अपने बेटे संयोग के लिए गंगा बूआ को मांग लिया था और फिर बिना किसी सामाजिक दिखावे के उन का विवाह संयोग से कर दिया गया था. शर्माजी का विचार था कि वे अपनी पुत्रवधू को बिटिया से भी अधिक स्नेह व ममता से सींचेंगे और उस को अच्छी से अच्छी शिक्षा देंगे, लेकिन विवाह के 8 दिन भी नहीं हुए थे कि कोठी के बड़े से बगीचे में नवविवाहित संयोग सांप के काटने से मर गया. जुड़वां भाई सुयोग चीखें मारमार कर अपने मरे भाई को झंझोड़ रहा था. पल भर में ही पूरा वातावरण भय और दुख का पर्याय बन गया था.

गंगोत्तरी ठीक से विवाह का मतलब भी कहां समझ पाई थी तबतक कि वैधव्य की कालिमा ने उसे निगल लिया. कुछ दिन तक वह ससुराल में रही. सेठ रतनलाल के परिवार के लोगों ने गंगोत्तरी का ध्यान रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी परंतु वहां वह बहुत भयभीत हो गई थी. मस्तिष्क पर इस दुर्घटना का इतना भयानक प्रभाव पड़ा था कि रात को सोतेसोते भी वह बहकीबहकी बातें करने लगी. थक कर इस शर्त पर उसे उस के मातापिता के पास भेज दिया गया कि वह उन की अमानत के रूप में वहां रहेगी.

गंगोत्तरी की पढ़ाई फिर शुरू करवा दी गई. कुछ सालों बाद शर्माजी ने संयोग के जुड़वां भाई सुयोग से उस का विवाह करने का प्रस्ताव रखा. कुछ समय तक सोचनेसमझने के बाद त्रिवेदी परिवार ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया परंतु गंगोत्तरी ने जो ‘न’ की हठ पकड़ी तो छोड़ने का नाम ही नहीं लिया.

ये भी पढ़ें- गुटकू

बहुत समझाया गया उसे पर तबतक वह काफी समझदार हो चुकी थी और उसे विवाह व वैधव्य का अर्थ समझ में आने लगा था. उस का कहना था कि एक बार उस के साथ जो हुआ वही उस की नियति है, बस…अब वह पढ़ेगी और शिक्षिका बन कर जीवनयापन करेगी. फिर किसी ने उस से अधिक जिद नहीं की. इस प्रकार मातापिता की मृत्यु के बाद भी गंगोत्तरी इसी घर में रह गई. चंद्रकांत से ले कर उन के बच्चे, घर के नौकरचाकर, यहां तक कि पड़ोसी भी उन्हें प्यार से गंगा बूआ कह कर पुकारने लगे थे.

यद्यपि गंगा बूआ अब काफी बूढ़ी होे गई हैं, फिर भी घर की हर समस्या के साथ वे जुड़ी रहती हैं. उन्होंने स्मिता को अपना उदाहरण दे कर बड़े विस्तार से समझा दिया था कि घर की इकलौती लाड़ली रश्मि का विवाह बिना जन्मपत्री मिलाए न करे. बस, स्मिता के दिलोदिमाग पर गंगा बूआ की बात इतनी गहरी समा गई कि जब भी उन के पति किसी रिश्ते की बात करते वे गंगा बूआ की ओट में हो जातीं. उन्होंने ही गंगा बूआ को हरी झंडी दिखा रखी थी कि वे स्वयं जा कर पीढि़यों से चले आ रहे पंडितों के उस परिवार के श्रेष्ठ पंडित से जन्मपत्रियों का मिलान करवाएं जिसे बूआ शहर का श्रेष्ठ पंडित समझती हैं. वैसे स्मिता का विवाह भी तो बिना जन्मपत्री मिलाए हुआ था और वह बहुत सुखी थीं पर रश्मि के मामले में गंगा बूआ ने न जाने उन्हें क्या घुट्टी पिला दी थी कि बस…

आज गंगा बूआ सुबह ही नहाधो कर ड्राइवर को साथ ले कर निकल गई थीं. बूआ बेशक विधवा थीं, पर सदा ठसक से रहती थीं. ड्राइवर के बिना घर से बाहर न निकलतीं. उन के पहनावे इतने लकदक होते जो उन के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देते थे. कहीं भी बिना जन्मपत्री मिलाए विवाह की बात होती तो वे अपना मंतव्य प्रकट किए बिना न रहतीं.

घर के सदस्य बेशक गंगा बूआ की इस बात से थोड़ा नाराज रहते पर कोई भी उन का अपमान नहीं कर सकता था. सब मन ही मन हंसते, बुदबुदाते रहते, ‘आज फिर गंगा बूआ रश्मि की जन्मपत्री किसी से मिलवा कर लाई होंगी…’ सब ने मन ही मन सोचा.

गोपू ने बूआ के सामने नाश्ते की प्लेट रख दी थी और टोस्टर में से टोस्ट निकाल कर मक्खन लगा रहा था, तभी बूआ बोलीं, ‘‘अरे, गोपू, मैं किस के दांतों से खाऊंगी ये कड़क टोस्ट, ला, मुझे बिना सिंकी ब्रेड और बटरबाउल उठा दे और हां, मेरा दलिया कहां है?’’

गोपू ने बूआ के सामने उन का नाश्ता ला कर रख दिया. आज बूआ कुछ अलग ही मूड में थीं.

‘‘क्यों स्मिता, तुम क्यों चुप हो और तुम्हारा चेहरा इतना फीका क्यों पड़ गया है?’’ बूआ ने एक चम्मच दलिया मुंह में रखते हुए स्मिता की ओर रुख किया.

स्मिता कुछ बोली तो नहीं…एक नजर बूआ पर डाल कर मानो उन से आंखों ही आंखों में कुछ कह डाला.

‘‘देखो चंदर, मैं ने इस लड़के के परिवार को शाम की चाय पर बुला लिया है…’’ उन्होंने अपने बैग से लड़के का फोटो निकाल कर चंद्रकांत की ओर बढ़ाया.

‘‘पर बूआ आप पहले रश्मि से तो पूछ लीजिए कि वह शाम को घर पर रहेगी भी या नहीं,’’ चंद्रकांत ने धीरे से बूआजी के सामने यह बात रख दी, ‘‘और हां, यह भी बूआजी कि उसे यह लड़का पसंद भी है या नहीं,’’

‘‘देखो चंदर, आज 3 साल से लड़के की तलाश हो रही है पर इस के लिए कोई अच्छे गुणों वाला लड़का ही नहीं मिलता. और ये बात तो तय है कि बिना कुंडली मिलाए न तो मैं राजी होऊंगी और न ही स्मिता, क्यों स्मिता?’’ एक बार फिर बूआ ने स्मिता की ओर नजर घुमाई.

ये भी पढ़ें- RAKHI SPECIAL: साहिल ने कैसे निभाया अपने भाई होने का फर्ज

स्मिता चुप थीं.

नाश्ता कर के सब उठ गए और अपनेअपने कमरों में जाने लगे.

‘‘मैं जरा आराम कर लूं…थक गई हूं,’’ इतना बोल कर बूआ ने भी अपना बैग समेटा, ‘‘स्मिता, बाद में मेरे कमरे में आना.’’ बूआजी का यह आदेश स्मिता को था.

तभी चंद्रकांत ने पत्नी की ओर देख कर कहा, ‘‘स्मिता, तुम जरा कमरे में चलो. तुम से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

स्मिता आंखें नीची कर के बूआ की ओर देखती हुई पति के पीछे चल दीं. बूआ को लगा, कुछ तो गड़बड़ है. वातावरण की दबीदबी खामोशी और स्मिता की दबीदबी चुप्पी के पीछे मानो कोई गहरा राज झांक रहा था.

वे सुबह से उठ कर, नित्य कर्म से निवृत्त हो कर बाहर निकलने में ऐसी निढाल हो गई थीं कि कुछ अधिक सोचविचार किए बिना उन्होंने अपने कमरे में जा कर स्वयं को पलंग पर डाल दिया. आज वैसे भी रविवार था. सब घर पर ही रहने वाले थे. थोड़ा आराम कर के लंच पर बात करेंगी. शाम को आने का न्योता तो दे आई हैं पर ‘मीनूवीनू’ तो तय करना होगा न. बूआजी बड़ी चिंतित थीं.

गंगा बूआ पूरे जोशोखरोश में थीं. उत्साह उन के भीतर पंख फड़फड़ा रहा था पर थकान थी कि उम्र की हंसी उड़ाने लगी थी. पलंग पर पहुंचते ही न जाने कब उन की आंख लग गई. जब वे सो कर उठीं तो दोपहर के साढ़े 3 बजे थे.

‘कितना समय हो गया. मुझे किसी ने उठाया भी नहीं,’ बूआ बड़बड़ाती हुई कपड़े संभालती कमरे से बाहर निकलीं.

‘‘अरे, गोपू, कमली…कहां गए सब के सब…और आज खाने पर भी नहीं उठाया मुझे,’’ बूआ नौकरों को पुकारती हुई रसोईघर की ओर चल दीं. उन्हें गोपू दिखाई दिया, ‘‘गोपू, मुझे खाने के लिए भी नहीं उठाया. और सब लोग कहां हैं?’’

‘‘जी बूआ, आज किसी ने भी खाना नहीं खाया और सब बाहर गए हैं,’’ गोपू का उत्तर था.

‘बाहर गए हैं? मुझे बताया भी नहीं,’ बूआ अपने में ही बड़बड़ाने लगी थीं.

‘‘बूआजी, मैं महाराज को बोलता हूं आप का खाना लगाने के लिए. आप बैठें,’’ यह कहते हुए गोपू रसोईघर की ओर चला गया.

कुछ अनमने मन से बूआ वाशबेसिन पर गईं, मुंह व आंखों पर पानी के छींटे मारते हुए उन्होंने बेसिन पर लगे शीशे में अपना चेहरा देखा. थकावट अब भी उन के चेहरे पर विराजमान थी. नैपकिन से हाथ पोंछ कर वे मेज पर आ बैठीं. गोपू गरमागरम खाना ले आया था.

खाना खातेखाते उन्हें याद आया कि वे पंडितजी से कह आई थीं कि घर पर चर्चा कर के वे लड़के वालों को निमंत्रण देने के लिए चंदर से फोन करवा देंगी. आखिर लड़की का बाप है, फर्ज बनता है उस का कि वह फोन कर के लड़के वालों को घर आने का निमंत्रण दे. खाना खातेखाते बूआ सोचने लगीं कि न जाने कहां चले गए सब लोग…अभी तो उन्हें सब के साथ बैठ कर मेहमानों की आवभगत के लिए तैयारी करवानी थी.

‘खाना खा कर चंदर को फोन करूंगी,’ बूआ ने सोचा और जल्दीजल्दी खाना खा कर जैसे ही कुरसी से खड़ी हुईं कि उन की नजर ने ‘ड्राइंगरूम’ के मुख्यद्वार से परिवार के सारे सदस्यों  को घर में प्रवेश करते हुए देखा.

और…यह क्या, रश्मि ने दुलहन का लिबास पहन रखा है? उन्हें आश्चर्य हुआ और वे उन की ओर बढ़ गईं. स्मिता के अलावा परिवार के सभी सदस्यों के चेहरे पर हंसी थी और आंखों में चमक.

‘‘लो, बूआजी भी आ गईं,’’ चंद्रकांत ने एक लंबे, गोरेचिट्टे, सुदर्शन व्यक्तित्व के लड़के को बूआजी के सामने खड़ा कर दिया.

‘‘रश्मिज ग्रैंड मदर,’’ चंद्रकांत ने कहा तो युवक ने आगे बढ़ कर बूआ के चरणस्पर्श कर लिए.

गंगा बूआ हकबका सी गई थीं.

‘‘बूआजी, यह सैमसन जौन है. आज होटल ‘हैवन’ में इस की रश्मि से शादी है. चलिए, सब को वहां पहुंचना है.’’

‘‘पर…ये…वो जन्मपत्री…’’ बूआजी हकबका कर बोलीं, फिर स्मिता पर नजर डाली. उस का चेहरा उतरा हुआ था.

‘‘अरे, बूआजी, जन्मपत्री तो इन की ऊपर वाले ने मिला कर भेजी है. चिंता मत करिए. चलिए, जल्दी तैयार हो जाइए. सैमसन के मातापिता भी होटल में ठहरे हैं. उन से भी मिलना है. फिर वे लोग अमेरिका वापस लौट जाएंगे.’’

चंद्रकांत बड़े उत्साहित थे. फिर बोले, ‘‘देखिएगा, किस धूमधाम से भारतीय रिवाज के अनुसार शादी होगी.’’

बूआजी किंकर्तव्यविमूढ़ सी खड़ी रह गई थीं. उन की नजर में रश्मि की जन्मपत्री के टुकड़े हवा में तैर रहे थे.

ये भी पढ़ें- RAKHI SPECIAL: मुंहबोली बहनों से रोहन ने क्यों दी रिश्ता खत्म करने की धमकी

इस मौनसून हेयर फौल को कहें बाय-बाय

मौसम में बदलाव तो होता रहता है और इस बदलाव का सबसे ज्यादा असर आपके त्वचा और बालों पर पड़ता है. मौनसून में उमस और नमी के कारण बालों की जड़ें कमजोर हो जाती है. जिससे बाल टूटने की समस्या शुरू हो जाती है. इसलिए ऐसे मौसम में बालों को खास केयर की जरूरत होती है. आइए जानते है कुछ ऐसी टिप्स जिससे आप मौनसून में हेयर फौल से बच सकती हैं.

मौनसून में ऐसे करें बालों की देखभाल

प्याज और नारियल तेल

बालों को हेल्दी रखने लिए प्याज और नारियल तेल दोनों ही बेहतरीन माने जाते हैं. प्याज में सल्फर अधिक मात्रा में पाया जाता हैं जो बालों के लिए लाभदायक माना जाता है. इसके इस्तेमाल से बालों का टूटना बंद हो जाता है.

इसका इस्तेमाल करने के लिए सबसे पहले प्याज का रस निकाल लें. इसके बाद नारियल तेल और प्याज के रस को मिलाकर मिश्रण बना लें. इस मिश्रण को आप बालों में 20 मिनट लगाकर छोड़ दें और उसके बाद सिर्फ पानी से बाल धो लें. अगले दिन आप शैम्पू कर सकती हैं.

ये भी पढ़ें- रक्षाबंधन 2019: इस राखी पर ट्राई करें ये मेहंदी डिजाइन्स

नींबू और दही

एक कटोरी में दही लें उसमें एक नींबू का रस मिलाएं और एक चम्मच चने का आटा मिला कर मिश्रण तैयार कर लें. यह मिश्रण शैम्पू की तरह काम करता है. इस मिश्रण को बालों में एक घंटे के लिए लगे रहने दें. एक घंटे बाद सिर धो लें. इसके इस्तेमाल से बाल टूटना बंद हो जाएगा.

मेथी से लहराते बाल

मेथी को पूरी रात पानी में भिगो दें फिर सुबह उसे दही में मिलाकर बालों और जड़ों में लगाएं. मेथी में निकोटोनिक एसिड और प्रोटीन पाया जाता है, जो बालों के जड़ों तक पोषण पहुंचता है. मेथी से बालों में चमक बरकरार रहती हैं, बाल टूटना बंद हो जाते हैं,  इससे रूसी जैसी दिक्कत से भी छूटकारा मिल जाता हैं.

अंडा और दही

अंडे के इस्तेमाल से बाल मजबूत, चमकदार और हेल्दी रहते है. बालों में अंडे का इस्तेमाल करने के लिए अंडा, दही, एक चम्मच जैतून और नारियल का तेल मिलाकर मिश्रण बनाएं. अब मिश्रण को बाल और जड़ों में अच्छे से लगाएं. करीब आधे घंटे बाद बाल धो लें.

कढ़ी पत्ता की चंपी

कढ़ी पत्ता में औषधीय गुण पाए जाते हैं जो बालों के झड़ने की समस्या से दूर कर उन्हें मुलायम और चमकदार बनाता है. कढ़ी पत्ता को नारियल तेल में उबाल लें. अब इस तेल को बालों के जड़ो में लगा लें.

ये भी पढ़ें- पार्लर क्यों जाना जब रसोई में है खजाना

 इन बातों का भी रखें ध्यान

  • मानसून में रोजाना हेयर वाश न करें.
  • गीले बालों को न बांधे
  • बालों में केमिकल इस्तेमाल करने के बाद तेल से चंपी करके हेयर वाश करें.
  • गीले बालों में कंघी न करें.
  • बारिश के पानी से बचें

साकी गर्ल नोरा फतेही के डांस मूव्स का है जलवा

डांसिग क्वीन और साकी गर्ल के नाम से मशहूर एक्ट्रेस नोरा फतेही के जबरदस्त डांस और दिलकश अंदाज के सभी दीवाने है. इस समय नोरा का एक डांस वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. इस वीडियो में नोरा के डांसिंग स्किल्स को देख कर आप भी दंग रह जाएंगे.

नोरा के अंग्रेजी डांस का वीडियो हुआ वायरल

हाल ही में नोरा फतेही ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट से एक वीडियो शेयर किया है. इस वीडियो में नोरा अंग्रेजी गाने पर डांस करती नजर आ रही हैं. डांस वीडियो को पोस्ट करते हुए नोरा फतेही ने कैप्शन भी काफी मजेदार लिखा है. नोरा फतेही के इस वीडियो पर फैन्स भी खूब कमेंट कर रहे हैं और उनके डांस की जम कर  तारीफ कर रहे हैं.

ये भी पढ़ें- हमेशा सुर्खियों में रही श्वेता तिवारी

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Nora Fatehi (@norafatehi) on

 

डांस का चैलेंज किया एक्सेप्ट

कुछ समय पहले नोरा अपनी  फिल्म ‘बाटला हाउस’ के प्रमोशन के लिए कलर्स टीवी के शो ‘खतरा-खतरा  पर पहुंची थीं. इस दौरान जैसे ही इस शो  में लड़की बने एक कौमेडियन ने नोरा फतेही को डांस का चैलेंज दिया, नोरा ने उसे हाथ से जाने नहीं दिया. उसका चैलेंज स्वीकार किया और  अपने डांस के जलवे दिखाएं. उनका ये वीडियो भी खूब वायरल हो रहा है.

फिल्म की जान है नोरा का डांस

जौन अब्राहम की फिल्म ‘बाटला हाउस’ का गाना ओ साकी साकी रे, रिलीज हो गया है. ये गाना इस फ़िल्म का  एक स्पेशल आइटम सौन्ग है. नोरा इस गाने में एक छोटे से बार में नाच रही हैं. आपको बता दे  2004 में आई फिल्म मुसाफिर के गाने साकी साकी के रीमेक में नोरा फतेही ने बेहतरीन डांस किया है. साल 2008 में दिल्ली के बाटला हाउस एनकाउंटर पर आधारित इस कहानी में जौन अब्राहम एक पुलिस अफसर की भूमिका निभा रहे हैं. नोरा फतेही का डांस और गाना इस फिल्म की जान है, जो आपके दिल में जरूर उतर जाएगा. साल 2004 में आई फिल्म मुसाफिर का गाना साकी साकी अपने समय का सुपरहिट गाना था, जिसने फैंस के दिलों में जगह बनाई थी. इस गाने में संजय दत्त और एक्ट्रेस कोएना मित्रा थे. एक्ट्रेस कोएना मित्रा ने इस गाने पर नाराजगी जताई थी. उनका कहना था कि इस रीमेक में ओरिजिनल गाने को खराब कर दिया गया है. साथ ही उन्होंने नोरा फतेही के डांस और मूव्स की तारीफ की थी.

ये भी पढ़ें- इन बौलीवुड स्टार्स के भाई-बहन हैं टीवी के स्टार्स

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Nora Fatehi (@norafatehi) on

 

डांस से हुई फेमस

नोरा फतेही बिग बौस के सीजन 9 से काफी फेमस हुई थीं. शो में उनके डांस की खूब तारीफ हुई थी, जिसके बाद बौलीवुड की कई फिल्मों में नोरा फतेही ने स्पेशल सौन्ग किए. नोरा ने ‘सत्यमेव जयते में ‘दिलबर सौन्ग पर अपने जबरदस्त डांस से काफी तारीफें बटोरी थीं. जिसके बाद उन्होंने एक के बाद एक कई स्पेशल सौन्ग किए. इन दिनों नोरा फतेही वरुण धवन और श्रद्धा कपूर की फिल्म ‘स्ट्रीट डांसर’ की शूटिंग में व्यस्त हैं. ये फिल्म अगले साल रिलीज होगी.

अगर आप नोरा फतेही के मस्त डांस के साथ उनकी एक्टिंग को भी देखना चाहते हैं तो 15 अगस्त को रिलीज हुई मूवी ‘बाटला हाउस’ जरूर देखें.

ये भी पढ़ें- शमिता शेट्टी ने किया अपने जीजा के निर्देशन में पंजाबी म्यूजिक

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें