उन दिनों मैं अपनी नई जौब को लेकर बड़ी खुश थी. ग्रेजुएशन करते ही एक बड़े स्कूल में मुझे ऑफिस असिस्टेंट के रूप में काम मिल गया था. छोटे शहर में एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की के लिए यह उपलब्धि बहुत बड़ी थी. जहां आमतौर पर ग्रेजुएशन करते ही लड़कियों को शादी कर ससुराल भेजने की रवायत हो, वहां मुझे सुबह-सुबह तैयार होकर बैग लटका कर रिक्शे से नौकरी पर जाता देख मोहल्ले में कईयों के सीने पर सांप लोट जाता था. औरतें मेरी मां के कान भरतीं. लड़की हाथ से निकल जाएगी... बाहर की ज्यादा हवा लगी तो लड़का मिलना मुश्किल हो जाएगा, वगैरह, वगैरह. बहुतेरे थे जो मेरे पापा को ताना मारने से भी नहीं चूकते थे कि अब बेटी की कमाई खाओगे भइया...? मगर पापा ऐसे लोगों की बातों को हंसी में उड़ा देते थे.

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