उन दिनों मैं अपनी नई जौब को लेकर बड़ी खुश थी. ग्रेजुएशन करते ही एक बड़े स्कूल में मुझे ऑफिस असिस्टेंट के रूप में काम मिल गया था. छोटे शहर में एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की के लिए यह उपलब्धि बहुत बड़ी थी. जहां आमतौर पर ग्रेजुएशन करते ही लड़कियों को शादी कर ससुराल भेजने की रवायत हो, वहां मुझे सुबह-सुबह तैयार होकर बैग लटका कर रिक्शे से नौकरी पर जाता देख मोहल्ले में कईयों के सीने पर सांप लोट जाता था. औरतें मेरी मां के कान भरतीं. लड़की हाथ से निकल जाएगी… बाहर की ज्यादा हवा लगी तो लड़का मिलना मुश्किल हो जाएगा, वगैरह, वगैरह. बहुतेरे थे जो मेरे पापा को ताना मारने से भी नहीं चूकते थे कि अब बेटी की कमाई खाओगे भइया…? मगर पापा ऐसे लोगों की बातों को हंसी में उड़ा देते थे.

पापा मुझसे बड़ा प्यार करते थे. मेरी हर बात में उनकी रजामंदी होती थी. मैं उनकी इकलौती दुलारी बेटी जो थी. मां मुझे डांट दें तो पापा उनको खूब सुनाते थे. बीए करने के बाद से ही मां को मेरी शादी की चिंता खाए जाती थी. हर वक्त पापा को टोकती रहतीं कि उम्र ज्यादा हो गयी तो ढंग का लड़का नहीं मिलेगा इसके लिए. यही नहीं, मां मुझे ससुराल में रहने के तौर-तरीके सिखाने की कोशिशें भी करती रहती थीं. आठ घंटे की नौकरी के बाद जब मैं शाम को थकी-हारी घर आती तो मां चाहती थीं कि मैं रसोई भी बनाऊं. इस बहाने से वे चाहती थीं कि मैं कुछ अच्छे पकवान बनाना सीख लूं. इतवार की छुट्टी होती तो वे सिलाई मशीन निकाल कर बैठ जातीं कि बिटिया जरा मेरे लिए एक ब्लाउज सिल दे, या पेटिकोट बना दे, या मेजपोश पर फूल काढ़ दे. और मैं इतवार की छुट्टी दिन भर सो कर गुजारना चाहती थी, ताकि हफ्ते भर की थकान उतर जाए. मुझे गृहस्थी के इन कामों से बड़ी चिढ़ मचती थी. कामचलाऊ चीजें तो मुझे आती थीं. इससे ज्यादा सीख कर क्या करूंगी, ऐसा कहकर मैं मां से पीछा छुड़ाती थी. मगर मां की कवायतें चलती रहती थीं. वह किसी न किसी तरह मुझे गृहस्थी के काम में निपुण बनाना ही चाहती थीं. जब वे नहीं मानतीं तो मैं सिरदर्द या बुखार का बहाना मार कर सो जाती. इससे मां को बड़ी कोफ्त होती मगर पापा से शिकायत करने पर उन्हें उल्टे डांट ही खानी पड़ती थी. पापा कहते, ‘तुमने शादी से पहले दुनियाभर की मिठाइयां और केक बनाने सीखे थे क्या? यहां आकर कभी जरूरत पड़ी बनाने की? जब मीठा खाना होता है तो नुक्कड़ वाले हलवाई से ही मंगवाती हो न? कपड़े सारे दर्जी से सिलवाती हो. फिर हर वक्त उसके पीछे क्यों पड़ी रहती हो? उसको करने दो जो वो करना चाहती है.’

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कई दफा दोनों में मुझे लेकर गम्भीर बहस भी छिड़ जाती थी. लेकिन मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मुझे पता था कि पापा मेरी ही साइड लेंगे. उन दिनों आॅफिस में नए-नए कंप्यूटर लगे थे, जिन्हें सीखने और चलाने में मुझे बड़ा आनंद आ रहा था. जानकारी भी खूब बढ़ रही थी. अकाउंट्स का काफी काम मैंने सीख लिया था, टाइपिंग स्पीड तो पहले ही काफी तेज थी, अब कंप्यूटर पर भी हाथ आजमाने लगी थी. स्कूल के मालिक मुझ पर बड़ा भरोसा करते थे. वे जानते थे कि मैं आलराउंडर हूं. इसलिए मुझे अतिरिक्त काम भी देने लगे थे और इन कामों में मुझे मजा भी खूब आता था. स्कूल में होने वाले विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों की देखरेख भी मैं करने लगी थी. महज तीन सालों में मैं पूरे स्कूल की सुपरवाइजर हो गयी थी. धीरे-धीरे स्कूल के सारे काम मुझसे पूछ कर ही होने लगे थे.

दिन महीनों में और महीने सालों में बदलते चले गये. मेरे लिए कई रिश्ते आये, मगर कहीं बात नहीं बनी. कभी मैं लड़के में कोई खोट निकाल देती तो कभी लड़के वालों की ओर से मेरे में खोट निकाल दी जाती. कोई मुझे नौकरी छोड़ने को कहता तो मैं खड़े-खड़े मुंह पर रिश्ते के लिए ना बोल देती. जिस जगह मालिक के बाद सिर्फ मेरे आर्डर चलते हों, ऐसी नौकरी को छोड़ कर किसी चारदीवारी में बंद हो जाने को मैं बेवकूफी मानती थी.

आज बीस साल हो गये हैं. वो स्कूल जो सिर्फ बारहवीं तक था, मेरी मेहनत से अब कौलेज में तब्दील हो चुका है. कौलेज की नई बिल्डिंग में मेरा औफिस किसी बड़े अधिकारी के औफिस की तरह लकदख दिखता है. बड़ी सी गाड़ी में मैं कौलेज आती हूं. हेड मिस्ट्रेस के तौर पर शहर भर में मेरी खूब इज्जत है. बड़े-बड़े अधिकारी अपने बच्चों के एडमिशन के लिए मेरे पास नाक रगड़ने आते हैं. शहर के बड़े-बड़े फंक्शन्स में मैं चीफ गेस्ट बन कर जाती हूं. पापा अब नहीं रहे. अब घर में सिर्फ मां हैं और मैं. हम दोनों खुश हैं, आराम से हैं. किसी बात की कमी नहीं है.

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मेरी शादी नहीं हुई तो क्या, अब हमारे पास अपना बड़ा सा घर है, दो नौकर, एक धोबी, रसोइया और ड्राइवर है. सोचती हूं अगर मां की जिद पर नौकरी छोड़ कर पकवान बनाना सीखती, कपड़े सीना और झाडृू-पोंछा लगाना आ जाता तो मैं किसी से शादी करके उसके घर में बस यही काम कर रही होती. न आजाद होती, न आर्थिक रूप से सम्पन्न, न मुझ में निर्णय लेने की क्षमता होती और न इज्जत और शोहरत मिलती. बस एक नौकरानी की तरह ससुराल वालों की सेवा करती रहती, बच्चे पालती, पति की डांट खाती, अकेले में अपनी किस्मत को कोसती और रोती रहती, जैसा कि मेरी कई सहेलियों के साथ होता रहा है. मां भी मेरे बिना किसके सहारे जीतीं? आज उनकी देखभाल के लिए मैं उनके साथ हूं. अगर ससुराल की जेल में होती तो कैसे हो पाती उनकी देखभाल? आज अपने पापा पर मुझे गर्व होता है. उनके कारण मैं इस काबिल बन पायी. उनकी वजह से मैं अपने पैरों पर खड़ी हो पायी. उनकी वजह से मुझे इतनी इज्जत और पद-प्रतिष्ठा मिली. पापा की जिद्द और लड़ाई का नतीजा है कि आज मां बुढ़ापे की दहलीज पर अकेली और लाचार नहीं हैं. दूरदृष्टि रखने वाले मेरे पापा आई लव यू…

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