पश्चिम बंगाल की राजनीति में फिर बवाल मचा हुआ है इस बार वजह पूजा पर कथित तौर पर ही सही टैक्स का लगना है और हैरानी की बात यह है कि विरोध भाजपा नहीं बल्कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई में सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी कर रही है. हुआ इतना भर है कि आयकर विभाग ने पूजा करने वाली दुर्गा पूजा समितियों को एक नोटिस भेजा है. जिसका मसौदा हालांकि अभी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हुआ है. लेकिन यह अंदाजा गलत नहीं है कि नोटिस चंदे , आमदनी और खर्चों का हिसाब मांगने बाबत ही है .

देखा जाए तो इसमें गलत कुछ नहीं है लेकिन इसके खिलाफ धरने पर बैठकर ममता बनर्जी एक बार फिर भगवा खेमे के बिछाए धर्म जाल में फंसती नजर आ रही हैं जिनका कहना यह है कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार दुर्गा पूजा समितियों को डराने धमकाने के इरादे से उन्हें उसके सामने हथियार डालने मजबूर कर रही है. बक़ौल ममता, हकीकत में भाजपा पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा आयोजन को रोकने की कोशिश कर रही है. यह राजनैतिक तौर पर दोहरा मापदंड है .

पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने ममता के बयान में छोंका लगाते हुये कहा कि शुरू में भाजपा की कोशिश इन समितियों पर अपना शिकंजा कसने की थी लेकिन वह नाकाम रही इसलिए अब आयकर विभाग के जरिये उन्हें डराने की कोशिश कर रही है. अधिकतर पूजा समितियां स्थानीय लोगों से सहयोगवव (जाहिर है चंदा) व विज्ञापनों के माध्यमों से मंजूरी मंशा (आर्थिक सहयोग) लेती हैं. यह बात समझ से परे है कि इसका आयकर विभाग से क्या लेना देना है. इधर सुबोध मलिक चौक पर टीएमसी की महिला शाखा बंग जननी ब्रिगेड को लेकर धरने पर बैठी ममता बनर्जी का यह भी कहना है कि त्योहारों को कर वसूली से छूट मिलनी चाहिए जैसे कि उनकी सरकार ने गंगा सागर मेले के वार्षिक उत्सव को टेक्स फ्री कर दिया था.

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किसकी मंशा क्या है यह तो राम और दुर्गा काली कहीं हों तो वही जानें लेकिन यह बात किसी सबूत की मोहताज नहीं कि धर्म देश और दुनिया का सबसे बड़ा कर मुक्त कारोबार है जिसमें रोज अरबों रु श्रद्धालु चढ़ाते हैं जो सीधा पंडे पुजारियों की पाकेट में जाता है. सरकार को इसमें से ढ़ेला भी नहीं मिलता उल्टे उसे अरबो खरबो रु धार्मिक आयोजनो के इंतजाम में खर्च करना पड़ते हैं जो एक तरह की फिजूलखर्ची ही जनता के पैसों की है. सबसे बड़े धार्मिक आयोजन  कुम्भ की व्यवस्था में ही सरकारी खजाने का बड़ा हिस्सा फुंक जाता है.

देश भर में हर दूसरे दिन कोई छोटा बड़ा धार्मिक आयोजन कहीं न कहीं हो रहा होता है. इन आयोजनों का एक बड़ा मकसद पंडे पुजारियों को मुफ्त की खीर पूरी का इंतजाम करना होता है. इन आयोजनों में कितना चढ़ावा और दक्षिणा आई इसका हिसाब न कोई मांगता और न कोई देता. यानि हाल मुफ्त का चंदन घिस मेरे नन्दन सरीखा है. पंडे पुजारियों की यह मुफ्त की कमाई पूरी तरह टैक्स फ्री होती है. जिस पर न तो उन्हें इनकम टैक्स देना पड़ता और न ही पूजा पाठ के कारोबार पर कोई जीएसटी या दूसरा टैक्स लगता .

इन धार्मिक आयोजनों से इधर देखें तो लगता है कि देश में पैसों की कोई कमी नहीं है उल्टे पैसा जरूरत से ज्यादा है लेकिन वह ब्रांडेड मंदिरों की चल अचल संपत्ति में तब्दील हो चुका है और रोज रोज होता है. तिरुपति, वैष्णोदेवी, शिर्डी और पुरी जैसे सकड़ों हजारो मंदिरों में ही रोज अरबों रु चढ़ते हैं. चढ़ावे का यह पैसा ट्रस्ट को जाता है और उन लाखों पंडे पुजारियों के घर भी इसी से चलते हैं. जो इनमे वैतनिक या अवैतनिक पूजा पाठ करते हैं. इसके बाद भी हम हंगर इंडेक्स में 118 बे नंबर पर हैं तो इसकी वजह चढ़ावे की शाश्वत प्रवृति है. जिसे बनाए रखने और बढ़ाने बड़े जोर शोर और जोश खरोश से दुर्गा पूजा, राम नवमी, जन्माष्टमी और दशहरे जैसे त्योहारों का खर्च साल दर साल बढ़ता जा रहा है .

इस खर्चे पर कोई सरकारी या गैर सरकारी नियंत्रण नहीं है क्योंकि यह धर्म और भगवान का मामला है. देश के 30 करोड़ लोग बुनियादी सहूलियतों से वंचित हैं इस पर सोचा विचारी या सर खपाने की जहमत कोई अक़्लमंद नहीं उठाता कि मंदिरों में सड़ रहा जमा पैसा और संपत्ति इन दरिद्र नारायनों के भले के लिए लगा दी जाये तो जरूर हम विश्व की नम्बर एक अर्थ व्यवस्था होंगे और सही मानों में विश्व गुरु बन सकते हैं.

लेकिन धर्म और उसके दुकानदार ऐसा नहीं चाहते क्योंकि वे गरीब और गरीबों का डर दिखाकर ही लोगों को लूटते हैं कि देखो अगर दान नहीं करोगे तो अगले या इसी जन्म में इसी या किसी और मंदिर के बाहर भूखे अधनंगे खड़े होकर भीख मांगते नजर आओगे. कोई भी खुद को ऐसी स्थिति में नहीं देखना चाहता इसलिए डर के चलते दान दक्षिणा देता है.  यहां ओ माई गौड फिल्म का आखिरी दृश्य बरबस ही याद हो आता है जिसमें सन्यासी बने मिथुन चक्रवर्ती बड़ी धूर्तता से मुसकुराते हुये कह रहे हैं कि यह आस्थावानों की नहीं बल्कि भगवान से डरे हुए लोगों की भीड़ है .

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पाप, पुण्य, मुक्ति, मोक्ष, स्वर्ग, नर्क और पुनर्जन्म बगैरह का हौवा इतने गहरे तक लोगों के दिलो दिमाग में बैठा हुआ है कि वे हकीकत जानते हुये भी तर्क करने से डरते हैं. यह निश्चित रूप से निराशाजनक बात है कि चौबीसों घंटे चलने बाला धर्म का धंधा अब भगवान भी कहीं हो तो बंद नहीं करवा सकता क्योंकि खुद ईश्वर एक परिकल्पना और डर की उपज है.

ऐसे में पूजा पाठ पर टैक्स एक सार्थक पहल है इससे कम से कम वे खरबों रुपए तो बचेंगे जो सरकार धार्मिक आयोजनों पर खर्चती है. आयकर विभाग को चाहिए कि पहले तो वह मंदिरों की आमदनी का हिसाब ले और फिर उस पर टेक्स भी ले. देश के हर पंडे पुजारी से इनकम टैक्स रिटर्न भरवाया जाए. इस एक छोटी सी पहल से साबित हो जाएगा कि टैक्स चोर आम लोग और कारोबारी या उद्दयोगपति कम बल्कि पंडे पुजारी ज्यादा हैं .

पूजा समितियां कितना चंदा इकट्ठा कर कितना कहां खर्च करती हैं यह भी किसी को नहीं मालूम रहता इनसे हिसाब मांगना शेर के जबड़े में हाथ डालने जैसी बात है. आधी वामपंथी और आधी कांग्रेसी रहीं ममता बनर्जी को इनकम टेक्स विभाग की हिम्मत बढ़ानी चाहिए, शायद इससे उनका विधानसभा चुनाव में बेड़ा पार लग जाये क्योंकि न केवल बंगाल बल्कि देश भर के लोग धर्म के मकड़जाल से आजादी चाहते हैं और इसकी पहल कोई नहीं करता तो वे और डरकर इन धार्मिक समितियों दुकानदारों और सरकारों को ही हफ्ता देने में अपनी भलाई समझते हैं.

पश्चिम बंगाल में हो वही रहा है जो भाजपा चाहती है कि वहां भी शेष देश की तरह कट्टर हिन्दुत्व फैले जिससे उसे सत्ता हथियाने में आसानी रहे. लोकसभा चुनाव नतीजे इस लिहाज से उसके लिए उत्साहजनक रहे थे. अब दूसरे तरीके से भाजपा वही खेल खेल रही है कि जितना ममता बनर्जी धर्म और धार्मिक आयोजनो की पैरवी करेंगी उतने ही घाटे में रहेंगी. राहुल गांधी इसका बेहतर उदाहरण हैं जिनहे पूजा पाठ करने के बाद भी कोई फल नहीं मिला क्योंकि वे भी  धर्म के खेल के कच्चे खिलाड़ी हैं .

मुद्दे की बात पूजा पर टैक्स लगने की है तो इसे लगना ही चाहिए और केवल पूजा पाठ ही नहीं बल्कि हरेक धार्मिक कृत्य पर लगना चाहिए. यहां तक कि धार्मिक डुबकी पर भी लगना चाहिए क्योंकि नदियां सरकारी संपत्ति हैं. जब सुलभ काम्प्लेक्स इस्तेमाल करने तक के लोग 10 रुपए दे रहे हैं तो उनसे पूजा पाठ, यज्ञ हवन, और तंत्र मंत्र बगैरह पर भी कर वसूला जाना चाहिए क्योंकि इसी पैसे से उनकी भलाई होगी.

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