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जानें क्यों इम्तियाज अली ने ‘‘लव आज कल’’’ से काटे थे इस एक्टर के सीन?

जब कोई गैर फिल्मी परिवार और छोटे शहर से बौलीवुड में कदम रखता है, तो उसे बौलीवुड की कार्यशैली और फिल्म निर्माण कला की कोई जानकारी नहीं होती है. सिख परिवार के मंजोत सिंह ने तो कभी स्कूल में भी किसी नाटक में अभिनय नहीं किया था. उन्होने अपने दोस्त से मजाक के चलते फिल्म ‘‘ओए लक्की लक्की ओए’’ के लिए औडीशन दिया और उन्हे महज सोलह साल की उम्र में अभय देओल के बचपन यानी यंग लविंदर उर्फ लक्की का किरदार निभाने का मौका मिल गया. फिल्म की शुरूआत उन्ही से होती है और पूरे पंद्रह मिनट तक वह फिल्म में छाए रहते हैं. इस फिल्म के लिए उन्हे सर्वश्रेष्ठ उभरते कलाकार का फिल्मफेअर अवार्ड भी मिल गया था, जबकि मंजोत सिंह ने आज तक अभिनय की कोई ट्रेनिंग नहीं ली है. लोग मानते हैं कि इस फिल्म का महत्वपूर्ण हिस्सा तो यही पंद्रह मिनट हैं. उसके बाद मंजोत सिंह ने ‘‘उड़ान’, ‘स्टूडेंट आफ द ईअर’, ‘फुकरे’, ‘फुकरे रिटर्न’, ‘जब हैरी मेट सेजल’, ‘सोनचिरैया’ और ‘अर्जुन पटियाला’ सहित करीबन दस ग्यारह फिल्में करते हुए अपनी एक अलग पहचान बना ली है. इन दिनों मंजोत सिंह तेरह सितंबर को प्रदर्षित होने वाली फिल्म ‘‘ड्रीम गर्ल’’ को लेकर उत्साहित हैं.

इसलिए किया ‘लव आज कल-2’ में काम…

मगर बहुत कम लोगों को पता है कि दिबाकर बनर्जी के निर्देशन में फिल्म ‘‘ओए लक्की लक्की ओए’’ की शूटिंग खत्म करने के बाद मंजोत सिंह को अभिनय करना अच्छा लगने लगा. जबकि वह अभी भी फिल्म निर्माण प्रक्रिया से पूरी तरह अनभिज्ञ थे. पर मंजोत सिंह ने इस फिल्म के प्रदर्शन का इंतजार किए बिना ही इम्तियाज अली की फिल्म ‘‘लव आज कल’’ में महज इसलिए अभिनय करना स्वीकार कर लिया कि वह अपने मित्रों को बता सकें कि उसने दो फिल्मों अभिनय कर लिया. जबकि इस फिल्म में वह महज भीड़ का हिस्सा थे.

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मुझे ना कोई संवाद दिया गया था और ना ही मुझसे कुछ करने को कहा जाता था…

जी हां! एक खास एक्सक्लूसिव बातचीत के दौरान मंजोत सिंह ने खुद हमें पूरी दास्तान बताते हुए कहा- ‘‘मैंने अपने एक दोस्त की बातें सुनकर फिल्म ‘ओए लकी लकी ओए’ के लिए औडीशन दिया था, फिल्म मिल गई थी व मैंने काम कर लिया था. फिल्म के प्रदर्शन से पहले मैंने सोचा कि दूसरी फिल्म की जानी चाहिए. उस वक्त मुझे औडीशन के ही द्वारा इम्तियाज अली की फिल्म ‘‘लव आज कल’’ मिल गई. मैंने बहुत खुश होकर अपने दोस्तो को बताया कि मुझे दो फिल्में मिल गई. करीबन 15 दिन मैंने ‘‘लव आज कल’’ के लिए शूटिंग की. हर दिन मैं सेट पर जाता था. निर्देशक की बताई जगह पर खड़ा हो जाता था. मुझे ना कोई संवाद दिया गया था और ना ही मुझसे कुछ करने को कहा जाता था. मेरे दिमाग में बार-बार सवाल आता था कि अभी कुछ दिन पहले मैंने दिबाकर बनर्जी के साथ एक फिल्म ‘ओए लक्की लक्की ओए’ की है, जिसमें मेरे संवाद थे.

इस बात से था परेशान…

निर्देशक मुझे समझाते थे कि मुझे क्या करना है. लेकिन यहां तो कोई संवाद नहीं है कैमरा भी मेरे ऊपर नहीं आता. पर फिर मैं यह कह कर अपने दिमाग को शांत किया करता था कि अरे तुझे क्या पता कि फिल्म कैसे बनती है? यह निर्देशक अलग तरीके से फिल्म बना रहे हैं. फिल्म पूरी हो गई, उसके बाद मुझे अहसास हुआ कि मैंने तो बैकग्राउंड में खड़े रहने वाले यानी कि भीड़ का हिस्सा बना हूं. अब मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था. क्योकि ‘लव आज कल’ की शूटिंग खत्म हुई, उसके दो दिन बाद ही ‘ओए लक्की लक्की ओए’ के निर्देशक दिबाकर बनर्जी ने मेरे पिता जी से फोन पर कहा कि मंजोत ने इस फिल्म में जो काम किया है, उसे देखकर वह भी दंग रह जाएंगे. मैं सोच मे पड़ गया कि ‘ओए लक्की लक्की ओए’ के प्रदर्शन के बाद जब ‘लव आज कल’ प्रदर्शित होगी, तो मेरे दोस्त क्या कहेंगे? पर मैं चुप रहा. मैंने किसी से कुछ नहीं कहा.’’

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डायरेक्टर का शुक्रगुजार हूं…

मंजोत सिंह ने आगे बताया- ‘‘पर मैं निर्देशक इम्तियाज अली का जीवन भर शुक्रगुजार रहूंगा. वास्तव में जैसे ही बौलीवुड के अंदर फिल्म ‘ओए लक्की लक्की ओए’ मे मेरे काम की चर्चा चली, तो फिल्म ‘लव आज कल’ के निर्देशक इम्तियाज अली को भी पता चला कि मंजोत ने उनकी फिल्म से पहले दिबाकर बनर्जी की फिल्म ‘ओए लक्की लक्की ओए’ में बहुत अच्छा काम किया है. उसके बाद बिना कुछ कहे उन्होंने अपनी फिल्म ‘लव आज कल’ से मेरे सारे सीन काट दिए और जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो फिल्म देख कर मैं बहुत खुश हुआ. क्योंकि फिल्म में मैं कहीं नजर नहीं आ रहा था. मैं इम्तियाज अली साहब का बहुत शुक्रगुजार हूं.

उन्होंने एक कलाकार के तौर पर मेरे सम्मान को बचाए रखा. यदि इम्तियाज अली चाहते तो फिल्म के मेरे सारे सीन रखकर फिल्म रिलीज कर सकते थे. इससे शायद मेरे करियर को नुकसान होता. पर जब उन्हें मेरे काम के बारे में पता चल गया, तो उन्होने वह कदम उठाया, जिससे कलाकार के तौर पर मुझे नुकसान नहीं हो पाया. इम्तियाज अली टैलेंट की कद्र करते हैं. उन्हें जब मेरे टैलेंट के बारे में पता चला, उन्होंने सोचा कि कलाकार का भविष्य उज्ज्वल है. मैं क्यों इसे खराब करू. इम्तियाज अली ने उन सभी दृश्यों को अपनी फिल्म से हटा दिया, जिनमें मैं नजर आ रहा था. मेरे दृश्य हटने से उनकी फिल्म पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. पूरी फिल्म में कहीं नहीं हूं. मैं इम्तियाज अली जी का शुक्रगुजार हूं. अन्यथा कोई भी निर्देशक अपना फ्रेम खराब नहीं करना चाहता.’’

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एडिट बाय- करण मनचंदा

मन्नो बड़ी हो गई है

सुनीता कपूर

‘‘भाभी, चाय पी लो,’’ नीचे से केतकी की चीखती आवाज से उस की आंख खुल गई. घड़ी देखी, सिर्फ 7 बजे थे और इतने गुस्सेभरी आवाज.

करण पास ही बेखबर सोया था. वह भी उठते हुए यही बोला, ‘‘अरे, 7 बज गए, उठोउठो. केतकी ने चाय बना ली है.’’

‘‘एक चाय ही तो बनाई है. बाकी घर के सारे काम मैं ही तो अकेले करती हूं.’’

‘‘सुबहसुबह तुम बहस क्यों करने लग जाती हो. तुम्हें उठा रहे हैं तो उठ जाओ,’’ करण उनींदी में बोला और फिर चादर तान कर सो गया.

अंदर तक सुलग गई मैं. जब रात में अपनी इच्छापूर्ति करनी होती है तब नहीं सोचते कि इसे सोने दूं, क्योंकि सुबह इसे उठना है. तब तो कहते हैं, अभी तो हमारी शादी को कुल 2 महीने ही हुए हैं. रात की बात सुबह जगाते समय कभी याद नहीं रहती. रोजाना की तरह नफरत दिल में लिए नाइटी संभाल कर मैं सीधा बाथरूम में घुस गई. बंदिशें इतनी कि बिना नहाएधोए, साफ सूट पहने बिना सास के पास नहीं जा सकती.

जल्दीजल्दी नहाधो कर नीचे पहुंची. सास के पांव छुए. वे ?बजाय आशीर्वाद देने के, घड़ी देखने लगीं. गुस्सा तो इतना आया कि घड़ी उखाड़ कर फेंक दूं या सास की गरदन मरोड़ दूं. शुरूशुरू में मायके में मेरी भाभी जब 8 बजे उठ कर नीचे आती थीं तो कभीकभार मम्मी कह देती थीं, ‘बेटा, थोड़ा जल्दी उठने की आदत डालो.’ इस पर भाभी का खिसियाया चेहरा देख कर, एक दिन मैं बोल पड़ी थी, ‘मम्मी, भाभी को गुस्सा आ रहा है. इन्हें कुछ मत कहो.’ भाभी हड़बड़ा गई थीं. तब मुझे भाभी पर व्यंग्य करने में मजा आया था और अपनी मम्मी की नरमी पर गुस्सा.

‘‘क्यों भाभी, मम्मी को इस तरह देख रही हो, मानो खा ही जाओगी,’’ मैं केतकी के व्यंग्य पर चौंकी. वह लगातार मेरा चेहरा ही देखे जा रही थी.

अचानक मेरी भाभी मुझ में आ गईं. मेरे शब्द गले में ही अटक गए. भाभी को भी ऐसी ही बेइज्जती महसूस होती रही होगी मेरे व्यंग्यों पर.

‘‘चाय पी लो, केतकी झाड़ू लगा चुकी है,’’ सास का स्वर शुष्क था. साथ ही, केतकी ने ठंडी चाय मेरे हाथ में पकड़ा दी. मैं चाय को तेजी से सुड़क कर उस के पीछे रसोई में लपकी. अगर मैं ऐसा नहीं करती तो सास बोलतीं, ‘देख, कैसे मजे लेले कर पी रही है, ताकि केतकी दोतीन काम और निबटा ले तथा इस महारानी को कोई काम न करना पड़े.’

केतकी परात में आटा छान रही थी. चाय का कप सिंक में रखते हुए मैं ने कहा, ‘‘दीदी, तुम तैयार हो जाओ. मैं नाश्ता बनाती हूं,’’ मेरे शब्द मुंह से निकलते ही केतकी परात छोड़ कर रसोई से निकल गई, मानो मुझ पर एहसान कर दिया हो. मैं ने चाय पी या नहीं, यह पूछना तो दूर की बात है.

‘शुरू से ही सारा काम थमा दो. आदत पड़ जाएगी,’ ऐसी नसीहतें अकसर रिश्तेदार व पड़ोसिनें दे जाया करतीं. मेरी मम्मी को भी मिली थीं. पर मेरी मम्मी ने कभी अमल नहीं किया था. अगर थोड़ाबहुत अमल किया था, तो मैं ने. पर यहां तो शब्ददरशब्द अमल किया जा रहा है.

जितनी तेजी से मेरा दिमाग अतीत में घूम रहा था उतनी ही तेजी से मेरे हाथ वर्तमान में चल रहे थे. आटा गूंधा, आलू उबाले, चाय बनाई तथा दूध गरम किया. इतने में केतकी नहाधो कर तैयार हो गई थी.

सास बिस्तर पर बैठेबैठे ही चिल्लाने लगी थीं, ‘‘नाश्ता न मिले तो यों ही चले जाओ. देर मत करना. इस के घर में तो सोते रहने का रिवाज होगा. बता दो इस को कि यहां मायके का रिवाज नहीं चलेगा.’’

जल्दीजल्दी दूध गिलासों में डाला. आलू में मसाला डाल कर उन के परांठे बनाने लगी. दूध व परांठे ले कर जैसे ही कमरे में पहुंची, केतकी मुझे देखते ही पर्स उठा कर जाने की तैयारी करने लगी.

‘‘दीदी, नाश्ता.’’

‘‘देर हो चुकी है.’’

एक तीखी निगाह मुझ पर डाल कर वह तेजी से निकल गई. मेरी निगाह अचानक घड़ी पर पड़ गई. आधा घंटा पहले ही?

‘‘घड़ी क्या देख रही है,’’ सास ने घूरती निगाहों से देखा. मेरा मन घबराने लगा कि अभी करण को पता चलते ही वह सब के सामने मुझ पर बरस पड़ेगा. मैं निकल गई. दूसरे कमरे में महेश खड़ा था. सास की बड़बड़ाहट जारी थी, ‘सुबह तक सोती रहती है. कितनी बार कहा है कि सवा 6 बजे तक नहाधो कर नीचे आ जाया कर. पड़ीपड़ी सोती रहती है महारानियों की तरह.’ सुबहसुबह सास के तीखे व्यंग्यबाणों को सुन कर दिमाग भन्ना गया.

‘‘भाभी, नाश्ता बना हो तो दे दो,’’ महेश के शांत स्वर से मुझे राहत मिली.

‘‘हांहां, लो न,’’ मैं ने केतकी वाली प्लेट उसे थमा दी.

‘‘केतकी ने नाश्ता नहीं…’’ मेरी उतरी शक्ल देख उस ने बात पलट दी, ‘‘छोड़ो, एक मिरची वाला परांठा बना दोगी, जल्दी से. पर, मां को मत बताना कि ज्यादा मिरची डाली है,’’ महेश हाथ में प्लेट लिए मुसकराता हुआ सास के पास चला गया.

‘‘अभी लाती हूं,’’ मैं खुश हो गई.

परांठा बना कर ले गई तो सास ने मेरी आहट सुनते ही बड़बड़ाना शुरू कर दिया, ‘देर नहीं हो रही है. जल्दी ठूंस और ठूंस के जा.’

‘‘नाश्ता तो आराम से करने दो, मम्मी. लाओ भाभी, धन्यवाद. बस, और मत बनाना.’’

मैं वापस जाने लगी तो सास के शब्द कानों में पड़े, ‘‘परांठे के लिए धन्यवाद बोल रहा है, पागल है क्या?’’ पर मुसकराते हुए महेश के नम्र शब्दों के आगे मेरे लिए सास के तीखे शब्दों के व्यंग्यबाण निरस्त हो गए थे. क्या घर के बाकी लोग भी ऐसे नहीं हो सकते थे?

मुझे याद है, जब एक दिन भाभी मम्मी को दवा दे कर हटीं तो मम्मी बोली थीं, ‘जाओ, जा कर सो जाओ. तुम थक गईर् होगी,’ मैं ने मम्मी से पूछा था, ‘दवा देने से वे थक कैसे जाती हैं? तुम इस तरह बोल कर भाभी को सिर चढ़ाती हो.’

मेरी नादानी पर मम्मी हंसी थीं. फिर बोलीं, ‘हम बूढ़े लोग तन से थकते हैं और तुम जवान लोग मन से थक जाते हो. प्यार के दो बोल मन नहीं थकने देते. जब तू बड़ी हो जाएगी, तेरी शादी हो जाएगी, तब अपनेआप समझ जाएगी.’ मम्मी की बातों पर मैं चिढ़ जाती थी कि वे मुझे बेवकूफ बना रही हैं.

पर नहीं, तब मम्मी ठीक ही कहती थीं. समझ शादी के बाद ही आती है. महेश के प्यारभरे दो शब्द सुन कर मेरे हाथ तेजी से चलने लगते हैं. वरना दिल करता है कि चकलाबेलन नाले में फेंक दूं. 10 मिनट खाना लेट हो जाए तो पेट क्या रोटी हजम करने से मना कर देता है? क्या सास को पता नहीं कि शादी के तुरंत बाद कितना कुछ बदल जाता है. उस में तालमेल बैठाने में वक्त तो चाहिए न. पर क्या बोलूं? बोली, तो कहेंगे कि अभी से जवाब देने लगी है. जातेजाते महेश शाम को ब्रैड रोल्स खाने की फरमाइश कर गया. मुसकरा कर उस का यह आग्रह करना अच्छा लगा था.

‘क्या करण ऐसा नहीं हो सकता?’ मन ही मन सोचते हुए मैं सास को नाश्ता देने गई. वहां पहुंची तो करण जमीन पर बैठे हुए पलंग पर बैठी सास के पांवों पर सिर रखे, अधलेटा बैठा था. देख कर मैं भीतर तक सुलग सी गई.

‘‘नाश्ता…’’ मैं नाश्ते की प्लेट सास के आगे रख कर चुपचाप वापस जाने लगी.

‘‘मैडमजी, एक तो केतकी को समय पर नाश्ता नहीं दिया, ऊपर से मुंह सुजा रखा है. देख कर मुसकराईं भी नहीं,’’ अपनी मां के साथ टेढ़ी नजर से देखते हुए करण ने कहा.

‘‘नहीं तो, ऐसा तो नहीं है. चाय पिएंगे आप?’’ जबरदस्ती मुसकराई थी मैं.

‘‘ले आओ,’’ करण वापस यों ही पड़ गया. मुसकराहट का आवरण ओढ़ना कितना भारी होता है, आज मैं ने महसूस किया. मैं वापस रसोई में आ गई. मुझे बरबस मां की नसीहत याद आने लगी.

मम्मी ने एक दिन भैया से कहा था कि सुबह की पहली चाय तुम दोनों अपने कमरे में ही मंगा कर पी लिया करो. मम्मी की बात सुन कर मैं झुंझलाई थी कि क्यों ऐसे पाठ उन्हें जबरदस्ती पढ़ाती हो. तब मां ने बताया था कि उठते ही मां के पास लेट जाने या बैठने से पत्नी को ऐसे लगता है कि मानो उस का पति रातभर अपनी पत्नी नहीं, मां के बारे में ही सोचता रहा हो. ऐसी सोच बिस्तर पर ही खत्म कर देनी चाहिए. तभी पत्नी पति की इज्जत कर सकती है. मां तो मां ही है. पत्नी लाख चाहे पर बेटे के दिल से मां की कीमत तो कम होगी नहीं. पर ऐसे में बहू के दिल में सास की इज्जत भी बढ़ती है.

करण को सास के पैरों पर लिपटा देख, मम्मी की बात सही लगने लगी. मुझे यही महसूस हुआ जैसे करण सास से कह रहा हो, ‘मां, बस, एक तुम्हीं मुझे इस से बचा सकती हो.’

करण के साथ जब मैं नाश्ता कर रही थी तो सास बोलीं, ‘‘अच्छी तरह खिला देना, वरना मायके में जा कर कहेगी कि खाने को नहीं पूछते.’’

करण अपनी मां की बातों को सुन कर हंसने लगा और मेरा चेहरा कठोर हो गया. खानापूर्ति कर के मैं पोंछा लगाने उठ गई. सारे कमरों में पोंछा लगा कर आई तो देखा करण सास के साथ ताश खेल रहा है. मैं हैरान रह गई. मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘काम पर नहीं जाना है?’’

‘‘मुझे नहीं पता है?’’ करण गुस्से से देख कर बोला. मैं समझ नहीं पाई कि आखिर मैं ने ऐसा क्या कह दिया था.

‘‘तुम्हें जलन हो रही है, हमें एकसाथ बैठे देख कर?’’

‘‘बेटा, तुम जाओ, यह तो हमें इकट्ठा बैठा नहीं देख सकती,’’ सास ताश फेंक कर बिस्तर पर पसर गईं.

करण ने सास को मनाने के प्रयास में मुझे बहुत डांटा. मैं खामोश ही बनी रही.

उस दिन भैया से भी भाभी ने पूछा था, ‘कहां चले गए थे. शादी में नहीं जाना क्या?’ तब मुझे गुस्सा आ गया था कि भैया मेरे काम से बाजार गए हैं, इसलिए भाभी इस तरह बोली हैं. भैया भी भाभी पर बिगड़े थे. मुझे अच्छा लगा था कि भैया ने मेरी तरफदारी की. कभी यह सोचा भी न था कि भाभी भी तो हम लोगों की तरह ही हैं. उन्हें भी तो बुरा लगता होगा. ऐसा उन्होंने क्या पूछ लिया, जिस का मैं ने बतंगड़ बना दिया था. आज महसूस हो रहा है कि तब मैं कितनी गलत थी.

करण दूसरे कमरे से झांकताझांकता मेरे पीछे स्नानघर में घुस गया.

‘‘तुम्हें बोलना जरूरी था. मम्मी को नाराज कर दिया. चुप नहीं रहा जाता,’’ करण जानबूझ कर चिल्लाने लगा ताकि उस की मां सुन लें. दिल चाहा कि करण का गिरेबान पकड़ कर पूछूं कि मां को खुश करने के लिए मुझे जलील करना जरूरी है क्या?

कुछ भी कह नहीं पाई. चुपचाप आंगन में झाड़ू लगाती रही. आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. करण ने देखा भी, पर एक बार भी नहीं पूछा कि रो क्यों रही हो. कमरे से किसी काम से निकली तो करण को सास के साथ हंसता देख कर मेरा दम घुटने लगा. मैं और परेशान हो गई. उठ कर रसोई में आ दोपहर का खाना बनाने लगी. बारबार मम्मी व भाभी की बातें याद आने लगीं. मम्मी कहती थीं कि जब घर में किसी का मूड ठीक न हो तो फालतू हंसा नहीं करते. नहीं तो उसे लगता है कि हम उस पर हंस रहे हैं. और भाभी, वे तो हमेशा मेरा मूड ठीक करने की कोशिश किया करतीं. तब कभी महसूस ही नहीं हुआ कि इन छोटीछोटी बातों का भी कोई अर्थ होता है.

ये लोग तो मूड बिगाड़ कर कहते हैं कि तुरंत चेहरा हंसता हुआ बना लो. मानो मेरे दिल ही न हो. इन से एक प्रश्न पूछो तो चुभ जाता है. मुझे जलील भी कर दें तो चाहते हैं कि मैं सोचूं भी नहीं. क्या मैं इंसान नहीं? मैं कोई इन का खरीदा हुआ सामान हूं?

दोपहर का खाना बनाया, खिलाया, फिर रसोई संभालतेसंभालते 3 बज गए. तभी ध्यान आया कि महेश को ब्रैड रोल्स देने हैं. सो, ब्रैड रोल्स बनाने की तैयारी शुरू कर दी. आलू उबालने को रख कर कपड़े धोने चली गई. कपड़े धो कर जब वापस आई तो करण व्यंग्य से बोला, ‘‘मैडमजी, कहां घूमने चली गई थीं. पता नहीं कुकर में क्या रख गईं कि गैस बंद करने के लिए मम्मीजी को उठना पड़ा.’’

हद हो गई. गैस बंद करना भी इन की मां के लिए भारी काम हो गया. और मेरी कोई परवा ही नहीं है. मैं रसोई में ही जमीन पर बैठ कर आलू छीलने लगी. तभी करण आ गया.

‘‘क्या कर रही हो? 2 मिनट मम्मी के पास बैठने का, उन का मन बहलाने का वक्त नहीं है तुम्हारे पास. जब देखो रसोई में ही पड़ी रहती हो.’’

खामोश रहना बेहतर समझ कर मैं खामोश ही रही.

‘‘जवाब नहीं दे सकतीं तुम?’’ करण झुंझलाया था.

‘‘काम खत्म होगा तो आ जाऊंगी,’’ मैं बिना देखे ही बोली.

‘काम का तो बहाना है. हमारी मम्मी ने तो जैसे कभी काम ही न किया हो,’ बड़बड़ाते हुए वह निकल गया.

कितना फर्क है मेरी मम्मी और सास में. मेरी मम्मी मुझ से कहती थीं कि भाभी का हाथ बंटा दे, खाना रख दे. बरतन उठा दे. फ्रिज में पानी की बोतल रख दे. सब को दूध पकड़ा दे. साफ बरतन संभाल दे. इन छोटेछोटे कामों से ही भाभी को इतना वक्त मिल जाता कि वे मम्मी के पास बैठ जातीं.

इन्हीं कामों के लिए भाभी कभी मेरी तारीफ करतीं तो मैं सोचती कि भाभी अपने को ऊंचा साबित करने की कोशिश कर रही हैं. पर नहीं, भाभी ठीक कहती थीं. यहां पर पानी का गिलास भी सब को बिस्तर पर लेटेलेटे पकड़ाओ. फिर नौकर की तरह खड़े रहो खाली गिलास ले जाने के लिए. अगर एक कप व एक बिस्कुट चाहिए तो नौकरों की तरह ट्रे में हाजिर करो. वरना बेशऊरी का खिताब मिलता है और मायके वालों को गालियां.

करण और सास को चाय व ब्रैड रोल्स दे कर हटी तो महेश आ गया. महेश को चाय दे कर हटी तो केतकी आ गई. वह आते ही सो गई. बिस्तर पर ही उसे चायपानी दिया. केतकी के तो औफिस में एक बौस होगा. यहां तो मेरे 4-4 बौस हैं. किसकिस की सेवा करूं. मैं रात का खाना बनाती, खिलाती रही. इन सब का ताश का दौर चलता रहा. रात साढ़े 10 बजे ठहाकों और खुशी से ताश का दौर रुका तो केतकी ने सास के लिए एक गिलास दूध देने का आदेश दिया और सास ने केतकी को देने का. मुझे किसी ने सुबह भी नहीं पूछा था कि दूध लिया या नहीं.

मेरी तो इतनी हिम्मत भी नहीं थी कि सवा 10 बजे सब को खाना खिला कर मैं बिस्तर पर सो सकती. सुनने को मिल जाता, ‘देखो तो, जरा भी ढंग नहीं है. मांबाप ने सिखाया नहीं है. हम तो यहां बैठे हैं, यह सोने चली गई.’

बिस्तर पर पहुंचतेपहुंचते 11 बज गए. बिस्तर पर लेटी तो पूरा बदन चीसें मार रहा था. तभी करण बोला, ‘‘जरा पीठ दबा दो. बैठेबैठे मेरी पीठ दुख गई,’’ और करण नंगी पीठ मेरी तरफ कर के सो गया.

मन किया कि करण की पीठ पर एक मुक्का दे मारूं या बोल दूं कि जिस मां का मन बहलाने के लिए पीठ दुखाई है, उसी मां से दबवा भी लेते.

बस, यही एक काम बचा था न मेरे लिए? मन ही मन मोटी सी भद्दी गाली दे दी. दिल भी किया कि तीखा जवाब दे दूं. पर याद आया कि कल मायके जाना है. अगर इस का मुंह सूज गया तो यह अपनी मां के आंचल में छिप जाएगा और मैं अपनी मम्मी का चेहरा देखने को भी तरस जाऊंगी. 15 दिनों से भी ज्यादा हो गए मम्मी को देखे हुए.

‘‘कल मायके ले जाओगे न?’’ मैं ने पीठ दबाते हुए कहा.

बड़ी देर के बाद करण के मुंह से निकला, ‘‘ठीक है, दोपहर का खाना जल्दी बना लेना. फिर वापस भी आना है.’’

मैं जलभुन गई यह उत्तर सुन कर. सिर्फ 4 घंटे में आनाजाना और मिलना भी. मजबूरी थी, समझौता कर लिया.

घर पहुंची तो जैसे मम्मी इंतजार कर रही थीं.

‘‘क्या बात है? यह तो जैसे हमें भूल ही गई,’’ भाभी ने प्यार से कहा.

‘‘होना भी चाहिए. आखिर वही घर तो इस का अपना है,’’ करण ने अकड़ कर कहा.

मम्मीभाभी के सामने आते ही आंसू आने लगे थे, मगर मैं रोक लगा गई.

‘‘क्या हुआ???,’’ दोनों हैरान रह गईं मेरी सूरत देख कर.

‘‘कुछ भी नहीं,’’ मैं अपनेआप को रोक रही थी. यहां के लोग मेरे चेहरे से मेरे मन के भाव पढ़ लेते हैं, ससुराल वाले क्यों नहीं पढ़ पाते?

सब ने बहुत आवभगत की. करण को बहुत मान दे रहे थे. मुझे लगा कि करण इन के मान के काबिल नहीं है. लेकिन मजबूरी, मैं कह भी नहीं सकती थी. वापस लौटते वक्त भाभीजी ने बताया कि अच्छा हुआ तुम आज आ गईं. कल वे भी 2 दिनों के लिए मायके जा रही हैं. इस पर करण बोला, ‘‘भाभीजी, शादी से पहले आप इतने साल मायके में ही थीं, फिर मायके क्यों जाती हैं बारबार? अब आप इस घर को ही अपना घर समझा करें.’’ भाभी का चेहरा उतर गया. पता नहीं क्यों, भाभी का उतरा चेहरा मेरे दिल में तीर की तरह वार कर गया.

‘‘आप इतने बड़े नहीं हो कि मेरी बड़ी भाभी को सलाह दे सको. ससुराल को अपना घर समझने का यह मतलब तो नहीं कि भाभी की मम्मी, मम्मी नहीं हैं? उन का अपनी मम्मी के पास बैठने का दिल नहीं करता? दिल सिर्फ लड़कों का ही करता है? लड़कों को हम लोगों की तरह अपना सबकुछ एकदम छोड़ना पड़े तो दर्द महसूस हो.’’

इस अप्रत्याशित जवाब से करण का चेहरा फक हो गया. मेरे भीतर जाने कब का सुलगता लावा बाहर आ गया था. खामोशी छा गई. भाभी मेरा चेहरा देखती रह गईं. मम्मी के चेहरे पर पहले हैरानगी, फिर तसल्ली के भाव आ गए.

बाहर आ कर करण स्कूटर स्टार्ट कर चुका था. मैं मम्मी के गले मिली तो लगा, मैं जाने कब से बिछुड़ी हुई हूं. ममता का एहसास होते ही मेरी आंखों से पानी बाहर आ गया.

मम्मी प्यार से बोलीं, ‘‘मन्नो, बड़ी हो गई है न?’’

मुझे लगा, मैं ने वर्षों बाद अपना नाम सुना है.

भाभी ने भी आज पहली बार ममता भरे आलिंगन में मुझे भींच लिया और रो पड़ी थीं. उन के आंसू मेरे दिल को भिगो रहे थे. मेरे भैया और पापा की आंखों में भी प्रशंसा थी. मुझे उन की ममता और प्यार की ताकत मिल गई थी. स्कूटर पर बैठ कर भी अब मैं सिर्फ भाभी और मम्मी के आंसुओं के साथ थी. बच्चों के मुखसे हमारी 5 वर्षीय पोती अरबिया के सिर में जुएं थीं. उस के सिर से उस की मम्मा जुएं निकाल रही थी. पहली जूं निकालते ही उस ने पूछा, ‘‘यह क्या है मम्मा?’’ उस की मम्मा बोलीं, ‘‘जूं है.’’ दूसरी पर भी उस ने वही सवाल किया. उस की मम्मा ने वही जवाब दोहराया, ‘‘जूं है.’’ तीसरी पर जब उस ने पूछा, ‘‘यह क्या है?’’ तो उस की मम्मा बोलीं, ‘‘लीख है.’’

‘‘लीख क्या होती है?’’ भोलेपन से उस ने अपनी मम्मा से पूछा.

‘‘जूं की बेबी,’’ मम्मा के इस उत्तर पर अरबिया तपाक से पूछ बैठी, ‘‘मम्मा, जूं को बेबी हुई तो उस की मम्मा की डिलीवरी हुई होगी. डिलीवरी हुई तो डाक्टर भी होंगे. तो क्या मेरा सिर अस्पताल है?’’

उस की बात पर हम सब ठहाके मारमार कर हंसने से खुद को नहीं

रोक सके.   शब्बीर दाऊद (सर्वश्रेष्ठ)

मेरा 8 वर्षीय बेटा अर्चित काफी बातूनी है. वह जब भी बाथरूम में जाता तो वहां का दरवाजा बहुत अधिक टाइट होने के कारण उस से मुश्किल से ही बंद हो पाता था. ऐसे ही एक दिन एक बार फिर जब वह दरवाजा उस से ठीक से नहीं बंद हुआ तो कहने लगा, ‘‘मैं जब बड़ा हो कर अपना घर बनाऊंगा तो पूरे घर में स्क्रीन टच दरवाजे लगवाऊंगा ताकि वे बिना हाथ लगाए ही खुल जाएं.’’

उस की बात सुन कर हम सभी को बड़ी हंसी आई और उस की होशियारी अच्छी भी लगी. मेरी पत्नी नीता गैस्ट्रिक की वजह से कुछ अस्वस्थ व परेशान सी दिख रही थी. पूछने पर बोली, ‘‘गैस निकालने की कोशिश कर रही हूं जिस से पेट हलका हो कर सामान्य सा हो जाए.’’ यह सुन कर मेरा 3 वर्षीय बेटा हर्षित तपाक से बोला, ‘‘सिलैंडर कई दिनों से खाली पड़ा है, तो फिर आप उस में गैस भर दीजिए न.’’

दरअसल, उन दिनों गैस की काफी किल्लत हो रही थी. यह सुन कर हम लोग काफी देर तक हंसते रहे. फिर बाद में उसे समझाया.

बदमाश बस वाले

दिल्ली आये मुझे अभी तीन महीने ही हुए थे. नया शहर, नया औफिस, नयी नौकरी. अभी ठीक से सेटल भी नहीं हो पायी थी कि अचानक एक दिन सुबह-सुबह लखनऊ से भाई का फोन आया कि पापा का एक्सीडेंट हो गया है, तुरंत आ जाओ. तुम्हें बार-बार याद कर रहे हैं. घर से पांच सौ किलोमीटर दूर मैं यह खबर सुन कर बदहवास सी हो गई. अब अचानक न तो ट्रेन का रिजर्वेशन मिल सकता था और न मैंने कभी हवाई सफर किया था. ट्रेन का टिकट लेकर बैठ भी जाती तब भी दूसरे दिन ही पहुंचती. सिर घूमने लगा कि क्या करूं. अचानक तय किया कि बस पकड़ो और निकल जाओ. मैंने फटाफट एक बैग में दो जोड़ी कपड़े डाले और औटो रिक्शा लेकर दिल्ली आईएसबीटी की ओर भागी. दिल यह सोच-सोच कर धड़क रहा था कि पता नहीं पापा किस कंडीशन में हैं. भाई तो कह रहा था कि खतरे से बाहर हैं, मगर क्या पता कितनी चोट लगी है. भाई ने बताया था कि सुबह मौर्निंग वाक पर निकले थे कि पीछे से एक बाइक वाले ने जोर की टक्कर मारी थी. बुढ़ापे का शरीर, पता नहीं चोट कितनी गहरी पहुंची होगी.

बस अड्डे पर पहुंच कर मैं राज्य परिवहन की बस में जा बैठी. मगर जब बस काफी देर तक नहीं चली तो मैंने कंडक्टर से पूछा. वह बोला कि जब पूरी भर जाएगी तब चलेगी. मैंने सिर घुमा कर देखा, पीछे सारी सीटें खाली पड़ी थीं. इसे भरने में तो घंटा भर लग जाएगा. मै परेशान हो गयी. बाहर प्राइवेट बसों के चालक जोर-जोर से आवाज लगा रहे थे – सात घंटे में सफर पूरा करें… आइये सात घंटे में सफर पूरा करें… लखनऊ-कानपुर-गोरखपुर… आइये… आइये… . मैं सरकारी बस से उतरी और एक बस चालक से पूछा, ‘लखनऊ कब तक पहुंचा दोगे?’ वह बोला, ‘शाम सात बजे तक.’ मैं तुंरत प्राइवेट बस में चढ़ गयी. सरकारी बस का कंडक्टर मुझे रोकता रह गया, ‘बोला, गलती कर रही हो मैडम, उससे पहले सरकारी बस पहुंच जाएगी. वह ज्यादा किराया लेंगे.’ मगर मुझे तो जल्दी से जल्दी पहुंचने की धुन लगी थी. प्राइवेट बस पूरी तरह भरी हुई थी. जल्दी ही चल पड़ेगी. मैं बैग लिये खट-खट उस पर चढ़ गयी.

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अन्दर ज्यादातर ग्रामीण इलाके के लोग नजर आ रहे थे. टिकट दर भी सरकारी बस से तीन गुना ज्यादा थी, मगर मुझे संतोष था कि यह बस मुझे अपने पापा के पास जल्दी पहुंचा देगी. मैंने बस में बैठते ही फोन करके भाई को खबर कर दी कि बस ले ली है, शाम तक पहुंच जाऊंगी.

तीन घंटे के सफर के बाद यह बस हाईवे के एक ढाबे पर रुकी. सवारियां उतर कर खाने-पीने के लिए ढाबे में जाने लगीं. मगर मेरी तो भूख-प्यास सब मिटी हुई थी. मैं चुपचाप अपनी सीट पर बैठी रही. थोड़ी देर में बाहर कुछ शोर सा उभरा. बस कंडक्टर चिल्ला रहा था कि किसी ने उसके कमर में बंधे फेंटे में से पांच हजार रुपए निकाल लिए हैं. मैंने खिड़की से झांक कर बाहर देखा तो सभी यात्रियों को लाइन में खड़ा करके तलाशी लेने का काम शुरू होने वाला था. मुझे कोफ्त हो रही थी कि यह क्या नया तमाशा खड़ा हो गया. यहां जल्दी पहुंचने की धुन लगी है और इन लोगों ने यह नया खेल शुरू कर दिया है. मैंने देखा बस ड्राइवर और कंडक्टर के साथ ढाबा मालिक भी जोर-जोर से बोल रहा था कि सब लोग अपनी-अपनी तलाशी दो. सारे ग्रामीण हैरान-परेशान खड़े थे. हर आदमी कुछ बोले बिना तलाशी देने के लिए लाइन में लगा जा रहा था. महिलाएं बच्चे सब. एक लड़का मेरी खिड़की के पास आकर चिल्लाया, ‘मैडम आप भी नीचे आ जाओ और तलाशी दो.’

मेरे सिर पर गुस्सा सवार हो गया. मैं चिल्ला कर बोली, ‘तुम लोग कौन होते हो किसी की तलाशी लेने वाले? पैसा चोरी हुआ है तो बस को पास के किसी थाने में ले लो, वहां होगी कार्रवाई. यहां किसी महिला को हाथ न लगाना वरना तुम्हारी ऐसी की तैसी कर देंगे.’

बस ड्राइवर, कंडक्टर और ढाबे वाला हकबका कर मेरा चेहरा ताकने लगे. मेरी हिम्मत देखकर कुछ लोगों में हिम्मत आयी. एक-एक कर सबने बोलना शुरू किया, ‘हां, हां, बस को थाने पर ले लो… वहीं देंगे तलाशी….’

ड्राइवर, कंडक्टर ढाबे वाले के साथ एक तरफ को होकर कुछ मशवरा करने लगे. थोड़ी देर में ढाबे वाले ने आकर कहा, ‘देखों भाइयों, इसका बड़ा नुकसान हो गया है. थाने जाएंगे तो और देर लगेगी, ऐसा करो तुम सब दो-दो सौ रुपए देकर इसका नुकसान पूरा कर दो.’

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मैं फिर आगे आयी, बोली, ‘क्या सबूत कि इसका नुकसान हुआ है? सवारियों से पैसा एंठने का अच्छा धंधा बना रखा है तुम लोगों ने… और तू क्या इनका वकील है? इनके साथ मिला हुआ है? सीधे तरीके से बस को थाने ले चल वरना बैठ यहीं, न कोई तलाशी देगा और न कोई एक पैसा देगा.’

लोगों ने मेरी हां में हां मिलायी. कई महिलाएं आकर मेरे साथ खड़ी हो गयीं. सब कहने लगे कि अब तो बस को थाने ही ले चलो. कोई घंटा भर खराब करने के बाद बस ड्राइवर ने आकर कहा, ‘चलो, चलो, बस में बैठो सब… ’ और वह उचक कर ड्राइवर सीट पर बैठ गया. परेशान यात्री झटपट बस में चढ़ गये. कंडक्टर ने खा जाने वाली नजर से मेरी ओर देखा और जाकर आगे वाली सीट पर बैठ गया. बस रात के एक बजे लखनऊ पहुंची. घर पहुंची तो पापा मुझे देखकर मुस्कुरा दिये. खतरे से बाहर थे मगर सिर और घुटनों पर पट्टियां बंधी हुई थीं. मुझे अपने पास पाकर उनको बड़ी राहत महसूस हो रही थी. मैंने बदमाश बस ड्राइवर-कंडक्टर की कारस्तानी घरवालों को बतायी और दूसरे दिन थाने जाकर एक शिकायत भी दर्ज करवायी. मेरी शिकायत पर कोई कार्रवाई तो क्या ही हुई होगी, मगर सोचती हूं कि अगर मैंने हिम्मत न दिखायी होती तो वह बदमाश अनपढ़ और गरीब ग्रामीण यात्रियों से कितना पैसा वसूलते. ये तो उनका रोज का धंधा ही होगा. रोजाना ये लोग यात्रियों को ऐसे ही परेशान करते होंगे. अगर सचमुच कंडक्टर की जेब कटी होती तो थाने जाने में उसे क्यों संकोच होता? मैंने तय किया कि आगे से कभी इन प्राइवेट बसों में नहीं बैठूंगी, अपनी सरकारी खटारा बसें ही ठीक हैं.

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बढ़ती उम्र में भी रहेगी खूबसूरती बरकरार, जानें कैसे

करिश्मा कपूर, रेखा और मलाइका अरोड़ा जैसी एक्ट्रेसेस का ग्लैमरस लुक देख कर यही एहसास होता है कि उम्र बढ़ने पर भी इन की खूबसूरती और भी निखरती जा रही है. ‘हुंह, यह तो सर्जरी का कमाल है.’ यह बात सच होते हुए भी पूरी तरह सच नहीं है, क्योंकि तस्वीर का एक पहलू सर्जरी है तो दूसरा सही मेकअप, हेयरस्टाइल और ड्रैस सैंस.

आप सर्जरी के बिना भी सही मेकअप तकनीक अपना कर फ्रैश, यंग और ब्यूटीफुल नजर आ सकती हैं. आइए, जानिए कि इस के लिए आप को किन बातों पर ध्यान देना होगा-

रौंग मेकअप हैबिट

मेकअप चेहरे की खूबसूरती बढ़ाने के लिए ही किया जाता है. लेकिन हैवी मेकअप और गलत हेयर कट व हेयरस्टाइल से आप अपनी उम्र से ज्यादा नजर आती हैं. जबकि सही हेयर कट व हेयरस्टाइल और हलके व सही मेकअप से आप अपनी उम्र से कम, फ्रैश, यंग और गौर्जियस नजर आती हैं.

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यूज करें टिंटेड मौइश्चराइजर

मेकअप करने से पहले आमतौर पर अपना चेहरा साफ तो हर कोई कर लेता है, लेकिन चेहरे को मौइश्चराइज करना नजरअंदाज कर देता है. जबकि क्लींजिंग व टोनिंग के बाद मौइश्चराइजिंग बेहद जरूरी है ताकि मेकअप पैची नजर न आए. इस के लिए थोड़े से टिंटेड मौइश्चराइजर को हलके हाथों से चेहरे पर नीचे से ऊपर की तरफ ब्लैंड करें.

कंसील डार्क सर्कल्स विद राइट शेड

उम्र के साथसाथ मानसिक तनाव, नींद की कमी, खाना खाने की आदत सही न होना यानी फास्ट फूड वगैरह में दिलचस्पी और काम का तनाव आंखों के आसपास काले घेरे बनने का कारण बनता है, जो आप को अपनी उम्र से बड़ा दिखाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

ज्यादा गहरे ब्लू टोन डार्क सर्कल्स को यलो और पीच टिंटेड कंसीलर से और लाइट सर्कल्स को स्किन टोन से लाइट शेड से ब्रश या उंगली के पोरों की मदद से कंसील करें और ज्यादा कवरेज के लिए और लंबे समय तक उस का प्रभाव बनाए रखने के लिए उसे पाउडर से लौक करें.

Karisma-Kapoor

पतले लिप्स और उन के आसपास की लूज स्किन आप की बढ़ती उम्र की चुगली करती है. अकसर महिलाएं डार्क कलर की लिपस्टिक या डार्क लिप पैंसिल से अपने होंठों को शेप दे कर जवां दिखाने की कोशिश करती हैं जबकि डार्क कलर के इस्तेमाल से आप उम्र से और ज्यादा बड़ी नजर आ सकती हैं, क्योंकि उस शेड के इस्तेमाल से पतले होंठ और ज्यादा पतले नजर आते हैं और पार्टी वगैरह में खानेपीने के बाद लिपस्टिक के स्मज हो जाने के कारण आसपास की स्किन भद्दी नजर आने लगती है.

लिप्स को प्लंपिंग इफैक्ट देने के लिए आउटर लाइनिंग से भर कर खूबसूरत आकार दें और होंठों के बीच में लिपग्लौस का डौट लगाएं.

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क्रीमी ब्लशर

उम्र को कैद करने के लिए क्रीमी ब्लशर का इस्तेमाल करें, क्योंकि पाउडर ब्लशर के इस्तेमाल से फाइन लाइंस और रिंकल्स ज्यादा नजर आते हैं और स्किन टोन भी डल लगता है. इसलिए अपनी स्किन टोन (लाइट, मीडियम और डार्क) के अनुसार क्रीमी ब्लशर का इस्तेमाल करें. यह आप को ज्यादा नैचुरल ग्लोइंग चीक्स इफैक्ट देने में मदद करेगा, वह भी बिना हैवी लुक के.

ऐंटीऐजिंग आई मेकअप

बढ़ती उम्र का सब से ज्यादा असर आंखों और उस के आसपास की त्वचा पर दिखाई पड़ता है. जैसे हारमोंस असंतुलन के कारण लैशेज का हलका होना, रिंकल्स के कारण आईब्रोज का ढलकाव और डार्क सर्कल्स व आंखों की सिकुड़न आदि. इस के लिए आप यह करें:

आईब्रोज शेप: आई मेकअप से पहले आईब्रोज को पौइंट आर्च शेप में बनवाएं और ध्यान रखें कि जितना हो सके आईब्रोज की शेप मोटी ही रहे ताकि आप उम्र से कम नजर आएं.

आईब्रोज मेकअप: इस के लिए ब्राउन कलर के आईशेड या पैंसिल से आईब्रोज को शेप देते हुए ट्रासपैरेंट मसकारा से आईब्रोज को सैट जरूर करें.

लैशेज कर्ल: आंखों को उठा हुआ व जवां दिखाने के लिए आईलैशेज को कर्ल करना बेहद जरूरी है, क्योंकि एक अंतराल के बाद आईलिड ढलकी व लैशेज फ्लैट नजर आने लगती हैं. इसीलिए हंसीं व जवां नजर आने के लिए मसकारे के 2 कोट (एक के सूखने के बाद दूसरा लगाएं) के साथ लैशेज को कर्ल करना न भूलें. ध्यान रखें. मार्केट में वाल्यूमाइजिंग मसकारा उपलब्ध है. उसे बेहतर रिजल्ट के लिए अप्लाई करें.

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परफैक्ट हेयर कट व कलर

आप का हेयर कट भी आप को जवान या बुजुर्गों की श्रेणी में खड़ा कर सकता है. इसलिए ढर्रे वाली चोटी या जूड़े से अलग हट कर कुछ नया ट्राई करें. मसलन, रूटीन हेयरस्टाइल से हट कर एक अच्छा हेयर कट कराएं. यह आप को और ज्यादा निखारने में मदद करेगा.

जरूरी नहीं कि हेयर कट में आप अपने खूबसूरत लंबे केशों को तिलांजलि दे दें. लंबे केशों के साथ भी आप खूबसूरत हेयर कट ले सकती हैं. जैसे, पिरामिड लेयर, फ्यूजन मल्टीपल लेयर्स, इनोवेटिव फैदर्स टच आदि.

इस के अलावा गे्र हेयर मेहंदी लगाने से आप की उम्र को छिपाने की जगह जाहिर करते हैं. इसलिए मेहंदी की जगह हेयर कलर व हाईलाइटर का इस्तेमाल करें, ताकि आप गौर्जियस ब्यूटी लुक पा सकें.

बौयफ्रेंड को याद कर फिर इमोशनल हुईं संजय दत्त की बेटी, कुछ महीने पहले हुआ था निधन

कुछ महीने पहले ही बौलीवुड एक्टर संजय दत्त की बेटी त्रिशाला दत्त के एक पोस्ट ने सबको हैरान परेशान कर दिया. दरअसल, इस पोस्ट के जरिए उन्होंने सबको बताया था कि उनके बौयफ्रेंड की एक रोड एक्सिडेंट में डेथ हो गई है. जिससे उनके सभी फैंस को बड़ा झटका लगा. इन सब के चलते त्रिशाला काफी दुखी थीं. वे अपने बौयफ्रेंड को बेहद प्यार करती थीं और उनकी पुरानी फोटोज देख कर ये साफ पता चलता है कि उनका बौयफ्रेंड भी उनका काफी ख्याल रखता था. तभी त्रिशाला ने एक बार फिर अपने प्यार को याद करते हुए एक इमोशनल पोस्ट लिखी है.

फिर आई बौयफ्रेंड की याद…

त्रिशाला की इस पोस्ट से ये साफ पता चलता है कि वो अभी भी अपने बौयफ्रेंड की डेथ के सदमे से बाहर नही आ पा रहीं है. त्रिशाला ने अपने बौयफ्रेंड की फोटो शेयर करते हुए लिखा है कि, “मेरा दिल टूट गया. तुम्हारा बहुत शुक्रिया मेरा इतना ख्याल रखने के लिए. तुमने मुझे बहुत खुशियां दी हैं. मैं बहुत खुशकिस्मत हूं जो मै तुमसे मिली और तुम्हारी बन गई. तुम हमेशा मेरे अंदर जिंदा रहोगे.”

इससे पहले भी त्रिशाला दत्त ने अपने जन्मदिन के अवसर पर भी अपने बौयफ्रेंड के साथ फोटो शेयर करते हुए उन्हें याद किया था.

 

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??? #iloveyou #imissyou ?

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नाना-नानी के साथ अमेरिका में रहती हैं त्रिशाला

बौलीवुड में बाबा के नाम से पहचान बनाने वाले बेहतरीन एक्टर और प्रोड्यूसर संजय दत्त अपनी फिल्मों से ज्यादा अपनी पर्सनल जिंदगी की वजह से सुर्खियों में रहते हैं. संजय दत्त ने तीन शादियां की है पहली शादी से संजय की एक बेटी त्रिशाला दत्त है. त्रिशाला के पैदा होने के कुछ साल बाद ही उनकी मां ऋचा शर्मा का ब्रेन ट्यूमर के चलते देहांत हो गया और तब से ही त्रिशाला अपने नाना-नानी के साथ अमेरिका में रहती हैं.

कुछ समय पहले ही त्रिशाला दत्त ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए अपने रिलेशनशिप में होने का खुलासा किया था. उन्होने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक पोस्ट शेयर कर सबको इस बात की जानकारी दी थी कि वे एक इटैलियन शख्य के साथ रिलेशन में हैं. इस पोस्ट को देख उनके फैंस काफी खुश हुए और उनको इस रिलेशनशिप की शुभकामनाएं भी दी थी. लेकिन उनकी ये खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह पाई. जिससे उनके फैंस भी काफी दुखी हैं.

बता दें, खबरों के अनुसार त्रिशाला दत्त और संजय दत्त में नाराज़गी का सिलसिला चल रहा है और फिलहाल उनके बीच दूरियां आई हुईं हैं. संजय दत्त मुंबई में अपनी तीसरी पत्नी मान्यता दत्त और अपने दोनों बच्चों के साथ रहते हैं.

Written By- Karan Manchanda

बेनकाब हो रहा भाजपा का मुस्लिम और दलित विरोधी चेहरा

ये स्क्रीन शौट एक व्हाट्स एप पोस्ट के हैं जो नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद तेजी से वायरल हुई थी और अभी भी हर कभी होती रहती है. इसमें जो कहा गया है उसकी मंशा एकदम साफ है कि मुसलमान अगर इसी रफ्तार से अपनी आबादी बढ़ाते गए तो एक दिन फिर से देश में मुगलों की हुकूमत कायम हो जाएगी और हिंदुओं का नामोनिशान मिट जाएगा. इसलिए जनसंख्या नियंत्रण कानून बनना चाहिए.

यही बात बेहद सधे हुये और आभिजात्य ढंग से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले से अपने भाषण में बिना मुसलमानों का नाम लिए कही कि जनसंख्या विस्फोट से बचने लोग 2 से कम बच्चे पैदा करें और बच्चे को दुनिया में लाने से पहले देख लें कि वे उसकी परवरिश बगैरह के लिए तैयार हैं या नहीं. भाजपा की नजर में देश भक्त वही है जो 2 से कम बच्चे पैदा करे. यानि जो 2 से ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं वे देशद्रोही और गद्दार हैं.

जानते सब हैं और समझ भी सभी रहे हैं कि 3 तलाक कानून खत्म करने और जम्मू कश्मीर से  धारा 370 हटाने के बाद भाजपा का यह तीसरा बड़ा मुस्लिम और इस्लाम विरोधी कदम है जो जल्द ही कानून की शक्ल में सामने आए तो बात कतई हैरानी की नहीं होगी. सीधे कोई यह मानने तैयार नहीं होगा कि उक्त पोस्ट भगवा एजेंडे की अगली तैयारी है. कहा यही जा रहा है कि भाजपा तो देश के भले की बात कर रही हैं इसमें भी मुसलमानों का विरोध ढूंढना पूर्वाग्रह वाली बात है.

ये है वो स्क्रीनशौट जो वायरल हो रहा है….

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जबकि हकीकत में पूर्वाग्रह वाली बात तो यह होगी कि ऐसी पोस्टों को मुसलमान और इस्लाम विरोधी न माना जाये. सीधे सीधे भाजपा मुसलमानों को धौंस दे दी है कि वे मजहब और अल्लाह की नियामत के नाम पर 2 से ज्यादा बच्चे पैदा करना बंद करें नहीं तो सरकार इसके लिए भी कानून लाने से हिचकेगी नहीं क्योंकि भाजपा को 303 सीटें कबड्डी खेलने नहीं मतदाता ने दी हैं.

हर कोई जानता है कि आमतौर पर मुसलमान परिवार नियोजन नहीं अपनाते हैं लेकिन हिन्दू अपनाते हैं. हालत तो यह है कि नए हिन्दू कपल 2 तो क्या एक बच्चा पैदा करने से पहले भी हजार बार सोचते हैं और महानगरों के हिन्दू कपल तो इस एक में भी यकीन नहीं करते.

यह हिंदूवादी संगठनों की बड़ी चिंताओं में से एक है इसलिए वे हर कभी हिंदुओं से ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने कहा करते हैं. उलट इसके इस्लामिक संगठन कभी मुसलमानों से यह नहीं कहते कि कम बच्चे पैदा करो. मुसलमानों की बढ़ती आबादी को एक बड़े खतरे के रूप में दिखा कर डराया जाता है. उक्त पोस्ट को बारीकी से पढ़ने के बाद इस मसले पर ज्यादा सोचने समझने की जरूरत नहीं रह जाती.

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यह सच है कि अब सौ में से छह हिन्दू दंपत्ति भी ऐसे नहीं मिलेगे जो 2 से ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हों. इतना ही सच यह भी है कि सौ में से छह मुस्लिम दंपत्ति भी ऐसे नहीं मिलेगे जो 2 से कम बच्चे पैदा कर रहे हों. यानि आनुपातिक रूप से मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है और हिंदुओं की घट रही है. लाख टके का सवाल यह कि क्या देश हित के नाम पर मुसलमानों से या किसी और से कानून बनाकर यह हक छीना जाना चाहिए.

इस बाबत चीन का उदाहरण दिया जाता है कि वहां ज्यादा बच्चे पैदा करना कानूनन जुर्म है लेकिन यह दलील देने बाले शायद ही यह बता पाएं कि क्या चीन में भारत के मुक़ाबले रत्ती भर भी धार्मिक उन्माद या कट्टरवाद है. वहां तो 50 फीसदी से भी ज्यादा लोग अपना धर्म नास्तिक बताने लगे हैं. वहां के शासकों को कभी यह इशारा करने की जरूरत महसूस नहीं हुई कि वे किसी धर्म या समुदाय विशेष को निशाने पर लेते कम बच्चे पैदा करने की बात करें या कहें.

भाजपा की यह खूबी है कि वह पहले मीडिया और सोशल मीडिया के जरिये अपनी मंशा के मुताबिक माहौल बनाती और बनवाती है और फिर भले और देश हित की दुहाई देते बहुमत यानि हिंदुओं को खुश करने के लिए कानून ले आती है. 3 तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं और बहनों के भले की बात की गई तो 370 पर आतंकवाद खत्म करने और देश की अखंडता का राग अलापा गया. यह जनसंघ का नारा था कि कौन करेगा देश अखंड–जनसंघ जनसंघ.

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ऐसी वायरल होती पोस्टों में कहीं बढ़ती बेरोजगारी और विकराल होती महंगाई का जिक्र नहीं  होता उल्टे यह जताने की कोशिश की जाती है कि ये फसाद बढ़ती आबादी की वजह से हैं. सरकार, उत्पादन और रोजगार के मौके बढ़ाने क्या कुछ कर रही है इस पर भाजपा कुछ नहीं गिना पाती तो मंशा साफ है कि उसके न्यू इंडिया का मतलब हिन्दू राष्ट्र निर्माण यानि  मुसलमानों की आबादी रोकना है और इसके लिए भी उसने माहौल बनाना शुरू कर दिया है.

देशी विदेशी मीडिया यह जानने बेहद उत्सुक था कि 3 तलाक और 370 के बाद मोदी सरकार की प्राथमिकता क्या होगी. अधिकांश का अंदाजा था कि अब राम मंदिर निर्माण की बारी है, लेकिन भाजपा ने नया शिगूफ़ा छेड़ और छोड़ दिया है कि 2 से ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले देश भक्त नहीं हैं. देश भक्ति का यह नया पैमाना उन गद्दारों के लिए है जो दो से ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं. यानि अधिकतर बहुसंख्यक हिन्दू देश भक्त हैं और अधिकतर अल्पसंख्यक मुसलमान देश भक्त नहीं हैं.

फिर आएगी आरक्षण की बारी

देश भक्ति के नए मापदण्डों का सर्टिफिकेट पाकर हिन्दू हमेशा की तरह भाजपा से खुश हैं और मानने लगे हैं कि जनसंख्या नियंत्रण कानून बनना चाहिए. भाजपा के लिए अब कोई भी कानून बनाना मुश्किल काम नहीं रह गया है. वह राष्ट्र हित के नाम पर कुछ भी कर गुजरने का माद्दा रखती हैं शेर और शंकर कहे जाने वाले नरेंद्र मोदी तो उसका प्यादा भर हैं.

अब कभी भी यह सुनने हर किसी को तैयार रहना चाहिए कि जातिगत आरक्षण रिजर्व कोटे के लोगों का बड़ा दुश्मन है जिसके चलते उनकी काबिलियत पर अंगुली उठाई जाती है उन्हें मारा पीटा और प्रताड़ित किया जाता है. हमारे दलित भाई किसी से उन्नीस नहीं हैं वे बिना आरक्षण के भी अपनी योग्यता साबित कर सकते हैं इसलिए उनके हित में आरक्षण खत्म किया जा रहा है. (उसकी अहमियत तो खत्म की ही जा रही है)

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सवर्ण इस पहल का भी स्वागत करेंगे क्योंकि वे भी नहीं चाहते कि नाकाबिलियत के चलते उनके दलित भाई बेइज्जत हों बल्कि वे तो चाहते हैं कि दलित प्रतिस्पर्धा में बराबरी से आकर खुद को साबित करें. रही बात धर्म की तो दलित प्रताड्ना का उससे कोई लेना देना नहीं. धर्म एक अलग विषय है और सभी को बराबरी की नजर से देखता है इसलिए सवर्णों से भेदभाव करता और मौके छीनता संवैधानिक आरक्षण खत्म होना चाहिए. दलितों में अगर प्रतिभा होगी तो वे डौक्टर, इंजीनियर और कलेक्टर वगैरह बन ही जाएंगे.

जिस तरह आबादी और देश भक्ति को एक तराजू पर तौलते हाट लूटी जा रही है वैसे ही  आरक्षण के मुद्दे पर भी वाहवाही बटोरी जा सकती हैं और संभव है कुछ मुसलमानों की तरह कुछ दलित भी उनकी हां में हां मिलाते नजर आयें क्योंकि भगवान न तो कभी झूठ बोलता और न ही मानव मात्र में भेदभाव करता. रही बात लोकतन्त्र और तानाशाही में फर्क की तो मान लेने में हर्ज नहीं कि वे भी मानसिक अवस्थाएं हैं.

दीपिका पादुकोण ने क्यों कहा पति रणवीर को ‘डैडी”?

बौलीवुड एक्टर रणवीर सिंह  और दीपिका पादुकोण अक्सर सोशल मीडिया पर अपनी क्यूट हरकतों से फैंस को चौंकाते हैं. चाहे वो एक-दूसरे के पोस्ट पर कमेंट करना हो या फिर एक-दूसरे के बारे में पोस्ट करना. इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ, जी हां  जब रणवीर सिंह ने फैंस के साथ इंस्टाग्राम पर लाइव सेशन रखा. रणवीर के लाइव जाते ही फैंस के कमेन्ट्स की बौछार आने लगी. और इसमें दीपिका पादुकोण का कमेंट भी मौजूद था.

दीपिका के कमेंट में लिखी बात चौंकाने वाली थी. दीपिका ने रणवीर के लाइव वीडियो पर कमेंट किया, ‘हाय डैडी’. इस कमेंट का मतलब आखिर क्या हो सकता है. रणवीर सिंह ने पति के कमेंट के जवाब में हाय बेबी भी चिल्लाया. दीपिका के बाद  अर्जुन कपूर ने लिखा-Baba Bhabi gonna give u one.

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अब इस कमेंट से तो यही कयास लगाए जा रहे है, शायद दीपिका प्रेग्नेंट हैं. प्रेग्नेंट होने की खबर सच है या नहीं ये तो दीपिका और रणवीर ही जानते हैं. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक दीपिका ने रणवीर सिंह के बारे में बात की थी. उन्होंने बताया कि उन्हें रणवीर संग फिल्म 83 में काम करना कैसा लग रहा है और ये भी बताया कि कैसे उन्होंने रणवीर को डिप्रेशन से अपनी लड़ाई के बारे में नहीं बताया था.

उन्होंने ये भी बताया कि रणवीर को क्या पसंद है,  ‘कपड़ें, वैनिटी’ रणवीर सिंह को काफी पसंद है. अब रणवीर सिंह के फैशन के प्रति प्यार और फंकी स्टाइल को देखा जाए तो उन्होंने हमेशा से ही ये बात साफ रखी है कि उन्हें अलग-अलग कपड़ों से कितना प्यार है.

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अजब गजब: इस पत्थर को खाते हैं लोग

दुनिया में कई अजीबो गरीब चीज है जिसे आप अंजान होते हैं. इन चीजों के खूबियों के बारे में जानकर आप दंग रह जाते हैं. तो चलिए आपको एक ऐसे पत्थर के बारे में बताते हैं, जिसके बारे में जानकर आप आश्चर्यचकित हो जाएंगे.

क्या आप जानते हैं, दुनिया में एक ऐसा पत्थर है जिसे लोग खाना पसंद करते हैं. यह पत्थर चिली और पेरू के समुद्री तलों में बड़ी संख्या में  पाए जाते हैं. आपने पेड़ों को काटने पर खून निकलने की बातें खूब सुनी और देखी होंगी. लेकिन क्या आपने पत्थर से खून निकलते हुए देखा है.

जी हां,  इस पत्थर से खून भी निकलता है.  और  इन पत्थरों को लेग बहुत शौक से खाते हैं. यह पत्थर देखने पर सामान्य पत्थर की तहर ही नजर आते है.  इसे पत्थर को पायुरा चिलियांसिस के नाम से जाना जाता है. इसके अलावा इसे पीरियड रौक भी कहते  है.

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जानें, घर पर कैसे बनाएं वेज मोमोज

आप घर पर आसानी से मोमोज बना सकती हैं तो झट से घर पर आसानी से वेज मोमोज बनाएं. और फैमिली को ईवनिंग में सप्राइज दें.

सामग्री

– 200 ग्राम मैदा

– एक चुटकी नमक

– गुनगुना पानी

– 50 ग्राम तेल

स्टफिंग के लिए

– 250 ग्राम सब्जियां(बंदगोभी, प्याज, गाजर, शिमला मिर्च आदि)

– बारीक कटा लहसुन

– 2 हरे प्याज

– 1 इंच अदरक का टुकड़ा

– 1 टी स्पून अजीनोमोटो

– 1 टेबल स्पून सिरका

– 3-4 बारीक कटी हरी मिर्च

– नमक स्वादानुसार

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बनाने की विधि

मैदे में नमक मिलाएं और गुनगुने पानी से गुंथ लें.

आधे घंटे के लिए ढककर रखें.

दोबारा गुंथे और पतली-पतली पूरियों के आकार में गुथे हुए मैदे को बेल लें.

स्टफिंग की सब्जियों को आपस में मिक्स कर लें.

अब हर पूरी पर एक टेबल स्पून स्टफिंग रखें और गुझिया या मोमोज के ही शेप में रोल कर लें.

थोड़ा तेल लगाएं. एक भगोने में पानी उबालने रखें. एक छलनी को चिकना करके रखें.

इसमें सभी मोमोज को रख दें. एक प्लेट उल्टी कर ढंक दें. तकरीब 20 मिनट तक भाप दें. सौस और मेयोनिज के साथ गर्मागरम सर्व करें.

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अदालतों से मांगें हिंदू औरतें तुरंत तलाक

‘‘भारत का संविधान महिलाओं की गरिमा का ध्यान रखता है, तब मुसलिम महिलाओं को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार क्यों न मिले? मुसलिम महिलाओं को तीन तलाक की प्रताड़ना से मुक्ति दिलाने का वादा भाजपा ने अपने घोषणापत्र में किया था. जनता ने हमें तीन तलाक पर रोक लगाने का आदेश दिया है, तब हम अपना फर्ज निभाने से पीछे क्यों हटें?’’

उक्त वक्तव्य कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बीती 21 जून को लोकसभा में तीन तलाक बिल पर बहस के दौरान दिया था. इस विधेयक पर उम्मीद के मुताबिक जम कर बवाल मचा और बहस भी हुई. तीन तलाक के समर्थक और विरोधियों ने अपनेअपने तर्करखे, लेकिन किसी एक ने भी यह सोचने

और कहने की जहमत नहीं उठाई कि तलाक के मुकदमे के दौरान किसी भी महिला को किनकिन पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक प्रताड़नाओं व यंत्रणाओं से हो कर गुजरना पड़ता है.

भारतीय संसद और सांसदों से यह उम्मीद भी बेकार की बात होगी कि कोई बहस के दौरान यह कहता कि पहले यह तो देख लीजिए कि हिंदू महिलाओं को अदालतों से तलाक मिलने में कितना वक्त लगता है और इस लंबे वक्त में उन की दिमागी हालत कैसी होती है.

किसी के पास कोई आंकड़ा नहीं है कि तलाक का एक मुकदमा औसतन कितने साल अदालतों में चलता है और वह ‘बेचारी’ वैवाहिक जीवन से मुक्ति पाने के लिए पथराई आंखों से अदालती कार्यवाही को निहारते अपने को व उस वक्त को कोसती रहती है जब उस ने तलाक का मुकदमा दायर किया था या उस पर तलाक का मुकदमा दायर किया गया था.

कभी किसी चुने गए जनप्रतिनिधि ने किसी जिला अदालत में जा कर नहीं देखा होगा कि एक तलाक लेने या देने वाली महिला पर क्या गुजरती है. कानून मंत्री और उन की सरकार हिंदू वोट पाने के लिए मुसलिम तीन तलाक को एक तलाक में तबदील करने में आखिरकार कामयाब हो गए क्योंकि 30 जुलाई को तीन तलाक का बिल राज्यसभा से भी पारित हो गया. इस के पक्ष में 99 और विरोध में 84 मत पड़े.

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दर्द एक गरिमा का

इत्तफाक से भोपाल की इस पीडि़ता का नाम भी गरिमा है जो 4 साल से तलाक का मुकदमा लड़ रही है. 32 वर्षीया गरिमा अपने पति और ससुराल वालों की ज्यादती का शिकार थी. उस के साथ आएदिन मारपीट होती थी और ताने भी कसे जाते थे. एक प्राइवेट स्कूल में मैथ्स की इस टीचर से जब यह सब सहन नहीं हुआ तो 4 साल पहले वह सीधे अदालत जा पहुंची.

तब गरिमा का इरादा था कि वह अभी जवान है और बच्चे भी नहीं हुए हैं, लिहाजा, दूसरा कोई भला आदमी देख कर शादी कर लेगी, जिस से बाकी जिंदगी वह आम महिलाओं की तरह चैन से गुजार सके. अब गरिमा ने यह इरादा त्याग दिया है. खुद के ही दायर किए गए मुकदमे से वह इतनी तंग आ गई है कि उस में जिंदगी जीने तक की इच्छा नहीं बची है. और दोबारा शादी कर बच्चे पैदा कर मातृत्व व स्त्रीत्व को हासिल करना तो उसे डराने लगा है.

गरिमा बताती है, ‘‘तलाक एकाध साल में हो जाता, तो मेरी हिम्मत नहीं टूटती. आप या कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि मैं 4 साल से रोज तिलतिल कर मर रही हूं. और संसद में तीन तलाक पर हुई बहस को सुन कर मेरे मन में खयाल आया कि किसी ने यह क्यों नहीं कहा कि अगर तुरंत तीन तलाक वाला रिवाज गलत है तो कोई औरत तलाक के लिए अदालतों में सालोंसाल एडि़यां रगड़ती रहे, यह कहां का इंसाफ है?’’

गरिमा की कहानी तलाक का मुकदमा लड़ रही लाखों पत्नियों सरीखी है. जब उस ने यह फैसला लिया तो सब से पहले भाईभाभी ने ही यह कहते मुंह फेर लिया कि तुम जानो और तुम्हारा पति जाने, हमारे हिस्से का काम तो था तुम्हारा कन्यादान करना और वह हम कर चुके हैं. इस जवाब की उम्मीद उसे थी, लिहाजा, कोई झटका उसे नहीं लगा. लेकिन जब वकील के पास गई तो तब से अब तक उसे झटके पर झटके लग रहे हैं.

खैर, मुकदमा दायर हुआ. वकील का आश्वासन था कि उस की पूरी कोशिश रहेगी कि तलाक जल्द हो जाए और पति को उस के किए की सजा भी मिले. पहली तारीख पर गरिमा जब अदालत पहुंची तो हैरान रह गई. वहां सब व्यस्त थे. जो फुरसत में थे वे उसे एक खास निगाह से घूरे जा रहे थे और आपस में फुसफुसा कर बातें कर रहे थे.

वकील साहब ने उस से सारी बातें पूछ कर लंबाचौड़ा वादपत्र तैयार किया जिस में पति और ससुराल वालों को हैवान और इंसानियत के दुश्मन साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. वादपत्र देख कर गरिमा को भी उम्मीद बंधी थी कि उसे न्याय मिलेगा और जल्द मिलेगा. उस ने तो अखबार में वैवाहिक विज्ञापन भी देखने शुरू कर दिए थे कि कितने प्रस्तावों में बगैर बच्चे वाली तलाकशुदा चाही गई है. सोच तो उस ने यहां तक भी डाला था कि तीसरीचौथी पेशी तक जब तलाक की प्रक्रिया आखिरी चरण में होगी तब वह खुद भी विज्ञापन दे देगी.

लेकिन जब तीसरी, चौथी पेशी तक नोटिस, समन और वारंट का रोल चलता रहा, तो वह मायूस हो उठी कि यह कैसा कानून है जिस में प्रतिवादी का अतापता ही नहीं है और वह रोज शान से अपनी खटारा कार में बैठ कर दफ्तर जाता है. वकील उसे हिम्मत बंधाता रहा कि शुरूशुरू में ऐसा होता है, लेकिन उसे आज नहीं तो कल झक मार कर आना ही पड़ेगा, फिर देखना 2 पेशियों में ही वह ढीला हो जाएगा.

आखिरकार, 5वीं पेशी पर पति आया. लेकिन यह देख कर गरिमा हैरान रह गई कि उस के चेहरे पर डर या शिकन नाम की कोई चीज नहीं थी. उलटे, वह खूंखार तरीके से उसे घूरे जा रहा था.

गरिमा बताती है, ‘‘एक पल को तो मैं डर गई थी कि कहीं यह राक्षस मुझे यहीं अदालत में भी मारना शुरू न कर दे क्योंकि वहां पुरुष ही पुरुष थे.’’

इस तारीख पर भी कुछ खास नहीं हुआ. पति हाजिरी लगा कर शान से चला गया. उस की तरफ से उस के वकील ने भी लंबाचौड़ा जवाब अदालत में पेश कर दिया था, जिस की प्रति चौथे दिन वकील ने उसे दी. इस जवाब को घर आ कर गरिमा ने पढ़ा तो उस का खून खौल उठा. जवाब में उसे ही झगड़ालू बताया गया था, जो सिवा कलह मचाए रखने के कुछ और नहीं करती. उस के तमाम आरोप इस जवाब में झुठला दिए गए थे और यह बात भी प्रमुखता से कही गई थी कि वाकई में अगर उस के साथ ससुराल में किसी तरह की मारपीट या हिंसा होती थी तो वह कभी पुलिस थाने रिपोर्ट लिखाने क्यों नहीं गई?

इस बात का जवाब पहले ही वह काउंसलर को फैमिली कोर्ट में दे चुकी थी कि वह पुलिस थाने वगैरह के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती और उस की मंशा जल्द तलाक की है, न कि बेवजह के पचड़ों में पड़ कर वक्त जाया करने की.

गरिमा कहती है, ‘‘यही वे कानून व वजहें हैं जो कहने को तो औरतों के भले के लिए बने हैं लेकिन हकीकत में देर इन की वजह से ही होती है. किसी पत्नी का इतना कह देना काफी क्यों नहीं माना जाता कि अब वह अपने पति के साथ स्वाभाविक तरीके से नहीं रह सकती और अस्वाभाविक तरीके से रहना एक मुश्किल काम है?’’

गरिमा की यह दलील कानूनी प्रक्रिया और तलाक के कानून पर सवालिया निशान लगाती हुई है कि उस में इतनी पेचीदगियां व उलझनें क्यों हैं और क्यों कानून व सरकारी एजेंसियां पतिपत्नी को समझाइश देते रहते हैं कि तलाक मत लो, साथ रहने की कोशिश करो, वक्त के साथसाथ सब ठीक हो जाता है?

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कुछ ठीक नहीं होता

यह बात भी तलाक का मुकदमा लड़ रही महिलाओं की हालत देख पूरे आत्मविश्वास से कही जा सकती है कि कुछ ठीक नहीं होता, उलटे, अधिकांश मामलों में बात बनने के बजाय बिगड़ती ही जाती है. गरिमा की ही मानें तो हुआ यह कि जैसे ही स्कूल प्रबंधन को यह बात पता चली कि वह तलाक का केस दायर कर चुकी है तो उसे बहाने बना कर नौकरी से चलता कर दिया गया. स्कूल चूंकि नामी था, इसलिए प्रबंधन को डर था कि ऐसी टीचर्स का बच्चों पर गलत प्रभाव पड़ेगा.

गरिमा जैसी महिलाओं की हालत कटी पतंग सरीखी है. इस हालत का जिम्मेदार कौन है? जवाब साफ है, कानूनी प्रक्रिया, जिस के चलते पत्नी तलाक का मुकदमा चलने के दौरान पारिवारिक व सामाजिक रूप से उपेक्षा की शिकार हो कर धीरेधीरे बहिष्कृत होती जाती है. हास्यास्पद बात यह भी है कि इस बारे में कोई सोचने को तैयार नहीं है.

एक तलाक बनाम तीन तलाक

गरिमा जैसी महिलाएं कहीं की नहीं रह जातीं, न घर की न घाट की. अब उन की जमात में तलाक मिलने की आस लगाए मुसलिम महिलाएं भी शामिल हो जाएंगी. तब उन्हें समझ आएगा कि उन की गरिमा की रक्षा सरकार ने किस तरह की है. उन में भी न आत्मसम्मान, आत्मविश्वास रह जाएगा और न उन का ही स्वाभिमान बचेगा. दोटूक कहा जाए तो हिंदू औरतों की तरह उन के भी औरत होने के माने खत्म हो जाएंगे और वे भी सालोंसाल तलाक के लिए गरिमा जैसी भटकती रहेंगी. तब शायद उन्हेें एहसास होगा कि इस से बेहतर तो तीन तलाक ही था.

यहां मंशा तीन तलाक कानून की वकालत न करना हो कर सीधेसीधे यह कहने की है कि तलाक कानून में ऐसा प्रावधान जरूरी है, जिस में तलाक की समयसीमा तय हो और यह एक साल से ज्यादा न हो क्योंकि इस के बाद महिला की दुर्दशा होनी शुरू हो जाती है जबकि पुरुष का कुछ नहीं बिगड़ता.

गरिमा और कई गरिमाओं की तरह हिंदू महिलाएं अगर तुरंत तलाक चाहती हैं तो कानून और सरकार को उन की परेशानियां समझनी चाहिए कि तलाक का लंबा खिंचता मुकदमा महिला की जिंदगी खत्म कर देता है. यह न्याय नहीं है बल्कि निर्दोष महिलाओं को उस अपराध की सजा देना है जो, दरअसल, उन्होंने किया ही नहीं होता.

इन से तो बेहतर वो थे

तीन तलाक पर गरमाती सियासत पर दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं पर दिक्कत यह है कि दोनों ही कट्टरवादी हैं और अपनी जिद के चलते खासतौर से महिलाओं का भला या हित नहीं देख पा रहे हैं. मुसलमानों के ठेकेदार कहते हैं कि यह उन के मजहब में दखल है तो हिंदू कट्टरवादी यह सोचसोच कर खुश हो रहे हैं कि उन की चुनी सरकार मुसलमानों को सबक सिखा रही है.

इस सबक को सियासी आईने से देखें तो अक्स बेहद भयावह नजर आता है. 6 दिसंबर, 2018 को संसद में इसी मसले पर बहस के दौरान केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने तैश में आ कर यह कहा था कि जब सतीप्रथा और बालविवाह पर कानून बन सकता है तो तीन तलाक पर क्यों नहीं बन सकता?

जोशजोश में और जानेअनजाने में स्मृति ईरानी ने भी यह तो मान ही लिया था कि हिंदू महिलाओं के भले और अधिकार के तमाम कानून कांग्रेस सरकारों की देन हैं यानी उन की और भाजपा की नजर में उस कांग्रेस यानी नेहरूगांधी परिवार की देन है जिस ने लंबे समय तक देश पर राज किया.

स्मृति ईरानी और रविशंकर जैसे मंत्रियों से यह सुनने की उम्मीद कोई नहीं करता कि जब हिंदू महिलाओं को तलाक और बराबरी का हक नेहरू ने दिया था तो मुसलिम महिलाओं को तीन तलाक का हक हम क्यों नहीं दे सकते और जिस तरह हिंदू महिलाओं की गरिमा की रक्षा नेहरू ने की थी तब हम क्यों नहीं मुसलिम महिलाओं की गरिमा की रक्षा कर सकते.

आज की पीढ़ी शायद ही इस तथ्य से परिचित होगी कि आजादी के बाद एक महिला तो महिला, पुरुष तक को भी तलाक लेने का कानूनी अधिकार नहीं था. पुरुषों को 2-3 शादियां करने और पत्नी को छोड़ देने की छूट हासिल थी.

अंगरेजों के शासनकाल में हिंदू महिलाओं के हित में कानून बनाने की बात उठती रहती थी लेकिन फुस्स हो कर रह जाती थी. तब कट्टरवादी हिंदुओं की दलील भी यही रहती थी कि अंगरेज होते कौन हैं हमारे धर्म और रीतिरिवाजों में दखल देने वाले.

आजादी मिली और पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने महिलाओं के हक में ताबड़तोड़ कानून बनाए. इस पर हिंदूवादियों ने उन का जम कर विरोध किया. लेकिन स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र स्थापित हो चुका था और संसद में बहुमत कांग्रेस के पास था, लिहाजा, उस ने इस विरोध का लिहाज नहीं किया. इस दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य को इस तरीके से समझा जा सकता है.

11 अप्रैल, 1947 को कांग्रेस सरकार ने संविधान सभा के सामने हिंदू कोड बिल पेश किया. यह कोड पूरी तरह हिंदुओं में फैले भेदभाव और स्त्री शोषण के खिलाफ था. साफसाफ कहें तो वर्णव्यवस्था पर प्रहार करता हुआ था, जिस के तहत स्त्री को पैर की जूती और दलित जानवर समझा व माना जाता था.

तब ऊंची जाति वाले और कट्टरवादी यह सोचसोच कर खुश थे कि अंगरेजों के जाने के बाद समाज पर उन का दबदबा बरकरार रहेगा और फिर से वर्णव्यवस्था बहाल हो जाएगी. लेकिन हिंदू कोड बिल के ये प्रावधान देख मानो भूचाल आ गया कि –

मृतक की विधवा, पुत्री और पुत्र को उस की जायदाद का बराबर हिस्सा मिलेगा.

पुत्रियों को उन के पिता की संपत्ति में अपने भाइयों से आधा हिस्सा मिलेगा.

हिंदू पुरुष एक से ज्यादा शादी नहीं कर सकेंगे. और पत्नी को छोड़ नहीं सकेंगे. यानी महिलाओं को भी तलाक देने का अधिकार होगा.

ऐसे कई और प्रावधान उस बिल में थे जो पुरुषों की मनमानी पर रोक लगाते हुए थे और सवर्णों की भी मुश्कें कसते हुए थे. पहली बार देश में महिलाओं को समानता का अधिकार दिया जा रहा था.

आज जैसे तीन तलाक बिल पर मुसलिम कट्टरपंथियों ने बवाल मचाया, ठीक वैसे ही तब संघ समर्थकों और कांग्रेसी हिंदू कट्टरपंथियों ने उक्त बिल का हर स्तर पर जोरदार विरोध किया था. उन्हें जवाहरलाल नेहरू से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वे सब से पहले कुरीतियों पर ही प्रहार करेंगे. लिहाजा, परंपराओं और रीतिरिवाजों का हवाला देते विरोध शुरू हो गया था.

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सनातन धर्मावलंबियों के साथसाथ हैरतअंगेज तरीके से सुधारवादी माने जाने वाले आर्यसमाजी भी इस विरोध में शामिल थे. हिंदूवादी दलों जनसंघ और हिंदू महासभा ने इस का सड़क से संसद तक विरोध करते कहा कि सरकार को इस विधेयक को पारित कराने का कोई हक नहीं. इस बाबत अहम दलील यह दी गई थी कि चूंकि संसद के सदस्य जनता द्वारा चुने हुए नहीं हैं, इसलिए सरकार को विधेयक पारित करने का नैतिक अधिकार नहीं है.

हिंदू कट्टरवादियों का एक बड़ा एतराज पुरुषों से एक से ज्यादा शादियां करने का अधिकार छिनना भी था. इस बाबत उन का कहना था कि बहुविवाह की परंपरा तो सभी धर्मों में है, इसलिए इस कानून को सभी पर लागू किया जाना चाहिए. अर्थात समान नागरिक संहिता होनी चाहिए. यह तर्क किसी भी लिहाज से सुधारवादी नहीं था, जिस में मांग यह की जा रही थी कि दोनों पक्षों को गुनाह करने का हक बराबरी से दिया जाए.

संसद के बाहर हिंदू महासभा और जनसंघ का साथ कांग्रेस का हिंदूवादी धड़ा भी दे रहा था. इस में एक चौंका देने वाला नाम डाक्टर राजेंद्र प्रसाद का भी था. करपात्री महाराज, जिन का असली नाम हरिहरानंद था, तब हिंदुओं के सर्वमान्य धर्मगुरु थे. करपात्री महाराज ने एक कट्टर हिंदूवादी पार्टी राम राज्य परिषद की स्थापना की थी. वे यह मानते थे कि हिंदू कोड बिल हिंदू रीतिरिवाजों, परंपराओं और धर्मशास्त्रों के विरुद्ध है. इतना ही नहीं, उन्होंने इस मसले पर जवाहरलाल नेहरू को वादविवाद यानी शास्त्रार्थ करने की खुली चुनौती भी दी थी.

तब विरोध इतना उग्र था कि आरएसएस ने दिल्ली में दर्जनों सभाएं आयोजित कीं और देशभर में सभी कट्टर हिंदूवादियों ने हाहाकार मचा कर रख दिया, मानो औरतों को बराबरी के हक मिल गए तो कयामत आ जाएगी. जबकि असल बात यह थी कि मर्दों की मनमानी पर अंकुश लगाया जा रहा था जो परिवारों, समाज और देश की तरक्की के लिए जरूरी भी था. वह बिल मूलतया स्त्री और दलित शोषण के खिलाफ था, जिस से धर्मावलंबी तिलमिलाए हुए थे.

चूंकि तब पहले आम चुनाव सिर पर थे, इसलिए जवाहरलाल नेहरू को लगा कि यह उग्र विरोध सत्ता जाने की वजह भी बन सकता है, इसलिए उन्होंने इसे टरका दिया.

जवाहरलाल नेहरू की मंशा न समझ पाने वाले पहले कानून मंत्री भीमराव अंबेडकर ने पद से इस्तीफा दे दिया था. जवाहरलाल नेहरू ने समझदारी या चालाकी, कुछ भी कह लें, से काम लिया और इस बिल को कई हिस्सों में तोड़ दिया.

1955 में महिला हितों की रक्षा करता हुआ पहला कानून हिंदू मैरिज एक्ट 1955 बना, जिस में तलाक को कानूनी दर्जा दिया गया, अंतर्जातीय विवाह को मान्यता दी गई और एक बार में एक से ज्यादा शादियों को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया.

1955 में ही हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम अस्तित्व में आया, जिस में हिंदू दत्तक ग्रहण और भरणपोषण कानून के अलावा हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम भी लागू हुए. इसी के जरिए पहली बार हिंदू महिलाओं को संपत्ति में हक मिला और लड़कियों को गोद लेने की व्यवस्था हुई.

जवाहरलाल नेहरू की ही वजह से आज महिलाएं उस मुकाम पर हैं जिस की 50 और 60 के दशकों में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. वे आज शिक्षित हो रही हैं, कार चला रही हैं, हवाई जहाज तक उड़ा रही हैं, तो इस सब के पीछे हाथ जवाहरलाल नेहरू का है, जो हिंदू कट्टरवादियों के सामने झुके नहीं और महिलाओं को उन के अधिकार दिला कर ही दम लिया. अगर ऐसा न होता तो आज महिलाओं और देश की हालत क्या होती, इस का सहज अंदाजा हर कोई लगा सकता है.

अभी तक है मलाल

साल 2014 के और 2019 के चुनावप्रचार की एक खास बात यह थी कि इस में नरेंद्र मोदी ने नेहरूगांधी परिवार को निशाने पर रखा जबकि राहुल गांधी को मुसलमान व ईसाई साबित करने की कसर आरएसएस सहित दूसरे हिंदूवादियों ने नहीं छोड़ी, जो जवाहरलाल नेहरू को भी आधा ईसाई और आधा मुसलमान कहते थे.

इस की असल वजह यह है कि जवाहरलाल नेहरू और उन के बाद इंदिरा, राजीव और सोनिया गांधी ने महिलाओं के हक में कानून बनाने की जिद नहीं छोड़ी. कांग्रेस के 55 साल के शासनकाल को कोसने की अहम वजह यही है कि उन्होंने पुरुषों के दबदबे को तोड़ते महिलाओं की उन्नति और आजादी का रास्ता खोला, जिस से वर्णव्यवस्था और पुरुषों की सत्ता कानूनन खत्म सी हो गई.

जाहिर है हिंदूवादियों को यह मलाल अब तक साल रहा है कि वे नेहरूगांधी खानदान को इस बाबत रोक नहीं पाए और महिलाएं मुख्यधारा से जुड़ती चली गईं. 2014 में भाजपा ने इस का बदला ले लिया. अब वह पूरी कोशिश कर रही है कि महिला हित का कोई कानून न बने. मोदी सरकार का पहला कार्यकाल इस बात का गवाह भी है क्योंकि 5 वर्षों में महिलाओं के हितों से संबधित कोई कानून नहीं बना.

कानून बन भी रहा है तो तीन तलाक पर जो हर्ज या एतराज की बात इस लिहाज से है कि कट्टरवादी तीन तलाक का तो विरोध कर रहे हैं लेकिन विलंबित तलाक पर कोई मुंह नहीं खोल रहा कि इस से महिलाओं को कई दुश्वारियां झेलनी पड़ती हैं.

इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने दहेज कानून में संशोधन किए और दहेज को गैरजमानती अपराध घोषित करते दोषियों को सजा के भी प्रावधान किए. ये संशोधन भी हिंदूवादियों को रास नहीं आए लेकिन वे तब यानी 80 के दशक में भी मजबूर थे क्योंकि उन के विरोध के कोई माने नहीं थे. हिंदूवादी कांग्रेसी भी सिर झुका कर इंदिरा, राजीव और सोनिया गांधी की बातें मानने को मजबूर थे.

लेकिन अब तक षड्यंत्रकारी प्रचार करते ये लोग इस परिवार को हिंदू विरोधी साबित कर चुके थे और इन के पूजापाठ करने और मंदिरों में जाने पर भी एतराज जताते रहते थे.

गुजरे कल की इन बातों का गहरा संबंध तलाक की आज की कानूनी परेशानियों, झमेलों, उलझनों और पेचीदगियों से है जिन के चलते गरिमा जैसी लाखों औरतें कानूनी ज्यादतियों के सामने कराह रही हैं, लेकिन उन की पीड़ा हिंदूवादी सरकार समझने को तैयार नहीं. क्योंकि वह तो नाच ही उन लोगों के इशारे पर रही है जो कैसे भी हो, वर्णव्यवस्था थोप कर देश को हिंदू राष्ट्र बनते देखना चाहते हैं जिस में औरत का दर्जा शूद्र सरीखा होता है.

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लाख टके का सवाल यह भी है कि क्यों समझाइश के नाम पर महिलाओं को उस पति और ससुराल में रहने को बाध्य किया जाता है जहां वे घुटन महसूस करती हैं, पिटती हैं और तरहतरह की अमानवीय क्रूरता का शिकार भी होती रहती हैं. इसे महिलाओं को फिर पीछे धकेलने की कोशिश या साजिश कहा जा सकता है.

दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा और बलात्कारों का विरोध आएदिन विभिन्न महिला संगठन सड़कों पर करते रहते हैं क्योंकि ये समस्याएं उन्हें दिखती हैं. नहीं दिखते तो तलाक के सालोंसाल चलते रहने के मुकदमे, जिन के तले दबकर महिला की इच्छा, आत्मविश्वास, स्वाभिमान, स्वतंत्रता और सम्मान दम तोड़ रहे होते हैं. रोज लाखों महिलाओं की ‘मर्यादा’ अदालत में तारतार हो रही होती है और कानून मंत्री कहते हैं कि सरकार को महिलाओं की मर्यादा का पूरा खयाल है.

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