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ऐसे बनाएं टेस्‍टी कश्‍मीरी साग

अगर आप कोई ऐसी डिश ढूंढ रहे हैं, जो झट से तैयार हो जाए तो आपको कश्‍मीरी साग जरुर ट्राई करनी चाहिये. कश्‍मीरी साग प्रेशर कुकर में सिर्फ एक सीटी में बनती है. इसके लिये आपको ना तो साग को काटने की जरुरत है और ना ही कोई स्‍पेशल मसाला तैयार करने की आवश्‍यकता.

आप कश्‍मीरी साग को प्‍लेन चपाती या राइस के साथ सर्व कर सकती हैं. इसके साथ आपको दाल भी बनाने की जरुरत नहीं है. तो अब देर किस बात का आइये देखते हैं कश्‍मीरी साग बनाने की रेसिपी.

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सामग्री

7 चम्‍मच सरसों का तेल

3 बड़ी इलायची

10 कश्‍मीरी साबुत मिर्च

25 साबुत लहसुन

250 ग्राम साबुत पालक

नमक, स्‍वादानुसार

बनाने की विधि

एक प्रेशर कुकर में तेल गरम करें, फिर उसमें बड़ी इलायची, कश्‍मीरी मिर्च, लहसुन और पालक तथा थोड़ा सा नमक और पानी मिला कर 1 या 2 सीटी आने तक पका लें.

आपका कश्‍मीरी साग तैयार है, इसे गरमा गरम चावल या रोटी के साथ सर्व करें.

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मां : भाग 2

‘‘मम्मीजी…’’ आवाज की तरफ नजर उठी तो दरवाजे पर खड़ी गुड्डी को देखते ही वह चौंक गईं. आज तो जैसे वह पहचान में ही नहीं आ रही है. 3 महीने में ही शरीर भर गया था, रंगरूप और निखर गया था. कानोें में लंबेलंबे चांदी के झुमके, शरीर पर काला चमकीला सूट, गले में बड़ी सी मोतियों की माला…होंठों पर गहरी लिपस्टिक लगाई थी. और किसी सस्ते परफ्यूम की महक भी वातावरण में फैल रही थी.

‘‘मम्मीजी, बच्चों को देखने आई हूं.’’

‘‘बच्चों को…’’ यह कहते हुए सुमनलता की त्योरियां चढ़ गईं, ‘‘मैं ने तुम से कहा तो था कि तुम अब बच्चों से कभी नहीं मिलोगी और तुम ने मान भी लिया था.’’

‘‘अरे, वाह…एक मां से आप यह कैसे कह सकती हैं कि वह बच्चों से नहीं मिले. मेरा हक है यह तो, बुलवाइए बच्चों को,’’ गुड्डी अकड़ कर बोली.

‘‘ठीक है, अधिकार है तो ले जाओ अपने बच्चों को. उन्हें यहां क्यों छोड़ गई थीं तुम,’’ सुमनलता को भी अब गुस्सा आ गया था.

‘‘हां, छोड़ रखा है क्योंकि आप का यह आश्रम है ही गरीब और निराश्रित बच्चों के लिए.’’

‘‘नहीं, यह तुम जैसों के बच्चों के लिए नहीं है, समझीं. अब या तो बच्चों को ले जाओ या वापस जाओ,’’ सुमनलता ने भन्ना कर कहा था.

‘‘अरे वाह, इतनी हेकड़ी, आप सीधे से मेरे बच्चों को दिखाइए, उन्हें देखे बिना मैं यहां से नहीं जाने वाली. चौकीदार, मेरे बच्चों को लाओ.’’

‘‘कहा न, बच्चे यहां नहीं आएंगे. चौकीदार, बाहर करो इसे,’’ सुमनलता का तेज स्वर सुन कर गुड्डी और भड़क गई.

‘‘अच्छा, तो आप मुझे धमकी दे रही हैं. देख लूंगी, अखबार में छपवा दूंगी कि आप ने मेरे बच्चे छीन लिए, क्या दादागीरी मचा रखी है, आश्रम बंद करा दूंगी.’’

चौकीदार ने गुड्डी को धमकाया और गेट के बाहर कर दिया.

सुमनलता का और खून खौल गया था. क्याक्या रूप बदल लेती हैं ये औरतें. उधर होहल्ला सुन कर जमुना भी आ गई थी.

‘‘मम्मीजी, आप को इस औरत को उसी दिन भगा देना था. आप ने इस के बच्चे रखे ही क्यों…अब कहीं अखबार में…’’

‘‘अरे, कुछ नहीं होगा, तुम लोग भी अपनाअपना काम करो.’’

सुमनलता ने जैसेतैसे बात खत्म की, पर उन का सिरदर्द शुरू हो गया था.

पिछली घटना को अभी महीना भर भी नहीं बीता होगा कि गुड्डी फिर आ गई. इस बार पहले की अपेक्षा कुछ शांत थी. चौकीदार से ही धीरे से पूछा था उस ने कि मम्मीजी के पास कौन है.

‘‘पापाजी आए हुए हैं,’’ चौकीदार ने दूर से ही सुबोध को देख कर कहा था.

गुड्डी कुछ देर तो चुप रही फिर कुछ अनुनय भरे स्वर में बोली, ‘‘चौकीदार, मुझे बच्चे देखने हैं.’’

‘‘कहा था कि तू मम्मीजी से बिना पूछे नहीं देख सकती बच्चे, फिर क्यों आ गई.’’

‘‘तुम मुझे मम्मीजी के पास ही ले चलो या जा कर उन से कह दो कि गुड्डी आई है…’’

कुछ सोच कर चौकीदार ने सुमनलता के पास जा कर धीरे से कहा, ‘‘मम्मीजी, गुड्डी फिर आ गई है. कह रही है कि बच्चे देखने हैं.’’

‘‘तुम ने उसे गेट के अंदर आने क्यों दिया…’’ सुमनलता ने तेज स्वर में कहा.

‘‘क्या हुआ? कौन है?’’ सुबोध भी चौंक  कर बोले.

‘‘अरे, एक पागल औरत है. पहले अपने बच्चे यहां छोड़ गई, अब कहती है कि बच्चों को दिखाओ मुझे.’’

‘‘तो दिखा दो, हर्ज क्या है…’’

‘‘नहीं…’’ सुमनलता ने दृढ़ स्वर में कहा फिर चौकीदार से बोलीं, ‘‘उसे बाहर कर दो.’’

सुबोध फिर चुप रह गए थे.

इधर, आश्रम में रहने वाली कुछ युवतियों के लिए एक सामाजिक संस्था कार्य कर रही थी, उसी के अधिकारी आए हुए थे. 3 युवतियों का विवाह संबंध तय हुआ और एक सादे समारोह में विवाह सम्पन्न भी हो गया.

सुमनलता को फिर किसी कार्य के सिलसिले में डेढ़ माह के लिए बाहर जाना पड़ गया था.

लौटीं तो उस दिन सुबोध ही उन्हें छोड़ने आश्रम तक आए हुए थे. अंदर आते ही चौकीदार ने खबर दी.

‘‘मम्मीजी, पिछले 3 दिनों से गुड्डी रोज यहां आ रही है कि बच्चे देखने हैं. आज तो अंदर घुस कर सुबह से ही धरना दिए बैठी है…कि बच्चे देख कर ही जाऊंगी.’’

‘‘अरे, तो तुम लोग हो किसलिए, आने क्यों दिया उसे अंदर,’’ सुमनलता की तेज आवाज सुन कर सुबोध भी पीछेपीछे आए.

बाहर बरामदे में गुड्डी बैठी थी. सुमनलता को देखते ही बोली, ‘‘मम्मीजी, मुझे अपने बच्चे देखने हैं.’’

उस की आवाज को अनसुना करते हुए सुमन तेजी से शिशुगृह में चली गई थीं.

रघु खिलौने से खेल रहा था, राधा एक किताब देख रही थी. सुमनलता ने दोनों बच्चों को दुलराया.

‘‘मम्मीजी, आज तो आप बच्चों को उसे दिखा ही दो,’’ कहते हुए जमुना और चौकीदार भी अंदर आ गए थे, ‘‘ताकि उस का भी मन शांत हो. हम ने उस से कह दिया था कि जब मम्मीजी आएं तब उन से प्रार्थना करना…’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं, बाहर करो उसे,’’ सुमनलता बोलीं.

सहम कर चौकीदार बाहर चला गया और पीछेपीछे जमुना भी. बाहर से गुड्डी के रोने और चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं. चौकीदार उसे डपट कर फाटक बंद करने में लगा था.

‘‘सुम्मी, बच्चों को दिखा दो न, दिखाने भर को ही तो कह रही है, फिर वह भी एक मां है और एक मां की ममता को तुम से अधिक कौन समझ सकता है…’’

सुबोध कुछ और कहते कि सुमनलता ने ही बात काट दी थी.

‘‘नहीं, उस औरत को बच्चे बिलकुल नहीं दिखाने हैं.’’

आज पहली बार सुबोध ने सुमनलता का इतना कड़ा रुख देखा था. फिर जब सुमनलता की भरी आंखें और उन्हें धीरे से रूमाल निकालते देखा तो सुबोध को और भी विस्मय हुआ.

‘‘अच्छा चलूं, मैं तो बस, तुम्हें छोड़ने ही आया था,’’ कहते हुए सुबोध चले गए.

सुमनलता उसी तरह कुछ देर सोच में डूबी रहीं फिर मुड़ीं और दूसरे कमरों का मुआयना करने चल दीं.

2 दिन बाद एक दंपती किसी बच्चे को गोद लेने आए थे. उन्हें शिशुगृह में घुमाया जा रहा था. सुमन दूसरे कमरे में एक बीमार महिला का हाल पूछ रही थीं.

तभी गुड्डी एकदम बदहवास सी बरामदे में आई. आज बाहर चौकीदार नहीं था और फाटक खुला था तो सीधी अंदर ही आ गई. जमुना को वहां खड़ा देख कर गिड़गिड़ाते स्वर में बोली थी, ‘‘बाई, मुझे बच्चे देखने हैं…’’

उस की हालत देख कर जमुना को भी कुछ दया आ गई. वह धीरे से बोली, ‘‘देख, अभी मम्मीजी अंदर हैं, तू उस खिड़की के पास खड़ी हो कर बाहर से ही अपने बच्चों को देख ले. बिटिया तो स्लेट पर कुछ लिख रही है और बेटा पालने में सो रहा है.’’

‘‘पर, वहां ये लोग कौन हैं जो मेरे बच्चे के पालने के पास आ कर खडे़ हो गए हैं और कुछ कह रहे हैं?’’

जमुना ने अंदर झांक कर कहा, ‘‘ये बच्चे को गोद लेने आए हैं. शायद तेरा बेटा पसंद आ गया है इन्हें तभी तो उसे उठा रही है वह महिला.’’

‘‘क्या?’’ गुड्डी तो जैसे चीख पड़ी थी, ‘‘मेरा बच्चा…नहीं मैं अपना बेटा किसी को नहीं दूंगी,’’ रोती हुई पागल सी वह जमुना को पीछे धकेलती सीधे अंदर कमरे में घुस गई थी.

सभी अवाक् थे. होहल्ला सुन कर सुमनलता भी उधर आ गईं कि हुआ क्या है.

उधर गुड्डी जोरजोर से चिल्ला रही थी कि यह मेरा बेटा है…मैं इसे किसी को नहीं दूंगी.

झपट कर गुड्डी ने बच्चे को पालने से उठा लिया था. बच्चा रो रहा था. बच्ची भी पास सहमी सी खड़ी थी. गुड्डी ने उसे भी और पास खींच लिया.

‘‘मेरे बच्चे कहीं नहीं जाएंगे. मैं पालूंगी इन्हें…मैं…मैं मां हूं इन की.’’

‘‘मम्मीजी…’’ सुमनलता को देख कर जमुना डर गई.

‘‘कोई बात नहीं, बच्चे दे दो इसे,’’ सुमनलता ने धीरे से कहा था और उन की आंखें नम हो आई थीं, गला भी कुछ भर्रा गया था.

जमुना चकित थी, एक मां ने शायद आज एक दूसरी मां की सोई हुई ममता को जगा दिया था.

फिट रहने के लिए रोटी चाहिए साहब

हौकी के जादूगर ध्यानचंद के जन्मदिन यानी 29 अगस्त खेल दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिटनैस को मुहिम की शक्ल दी तो इस से आगे का काम केंद्रीय खेलमंत्री किरण रिजिजू ने संभाल लिया. 2 अक्तूबर को किरण रिजिजू अपने दलबल के साथ सुबह दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में फिट इंडिया की टीशर्ट पहन कर लोगों को फिट रहने के गुर सिखा रहे थे. इस में भारी संख्या में युवकयुवतियां, डाक्टर, बच्चे और जवान पेरैंट्स मौजूद थे. वे पढ़ेलिखे ठीकठाक कमाने वाले लोग थे. खैर, यह अच्छी बात है कि इन्हें फिटनैस की चिंता है. पर एक वर्ग ऐसा भी है जिसे फिट रहने के लिए रोटी की चिंता है.

किरण रिजिजू ने 2 अक्तूबर गांधी जयंती पर दिल्ली से कई घोषणाएं भी कर डालीं जिन का सिलसिला प्रधानमंत्री की मंशा के मुताबिक साल 2023 तक चलने की पूरी उम्मीद है. किरण रिजिजू ने देश के उद्योगपतियों से भी इस मुहिम में शामिल होने की अपील की. बाकी कई सैलिब्रिटीज तो बिना किसी अपील के ही देश को फिट करने और रखने के इस अभियान से बिना किसी आमंत्रण के ही जुड़ गए हैं.

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इस में कोई शक नहीं कि फिटनैस को ले कर जागरूकता बेहद जरूरी है क्योंकि फिट लोग ही देश को आगे ले जा सकते हैं और स्वस्थ और फिट रहें तो खुद भी आगे बढ़ सकते हैं लेकिन जिस तरह इस मुहिम को परवान चढ़ाया जा रहा है उस से कई सवाल भी उठ खड़े हो रहे हैं जिन पर फिटनैस के कर्ताधर्ताओं और मीडिया का कोई ध्यान ही नहीं जा रहा है कि आखिर यह है किस के लिए?

बेशक यह मुहिम उन लोगों के लिए है जिन के पेट भरे हुए हैं और भूख जिन के लिए समस्या नहीं है. फिटनैस की चर्चा के पहले हमें विनम्रतापूर्वक यह स्वीकार करने की हिम्मत दिखानी चाहिए कि हमारा देश एक गरीब और भूखा देश है जिस में रोज लगभग 19 करोड़ लोग भूखे पेट सोते हैं.

साल 2019 के ग्लोबल हंगर इंडैक्स यानी जीएचआई की रिपोर्ट को देखें तो भारत 117 देशों की सूची में 102वें स्थान पर है जबकि 5 वर्ष पूर्व वह 105वें स्थान पर था. यह गंभीर बात है. भूखों के लिए खेलो इंडिया या फिट इंडिया का कोई महत्व नहीं है. इन्हें तो पेट भरने के लिए रोटी चाहिए, जिसे नजरअंदाज करना बड़ी ज्यादती होगी.

आइए फिटनैस का राग अलापने से पहले कुछ ऐसी खबरों पर भी एक नजर डाल लें जो इस हकीकत को बयां करती हुई हैं कि हमें फिट रहने के लिए पहले रोटी चाहिए जिस से शरीर संचालित होता है और मस्तिष्क सक्रिय रहता है.

इसी साल मई के महीने में कर्नाटक के चिक्काबल्लापुर जिले में एक बच्ची की मिट्टी खाने से मौत हो गई थी. वेन्नेला नाम की इस बच्ची के मांबाप नागमनी और महेश रोज मजदूरी की तलाश में घर यानी  झुग्गी से निकल जाते थे और शाम को वापस लौटते थे. चूंकि उन के यहां खाने को अनाज का दाना भी नहीं होता था इसलिए भूख से बिलबिलाती वेन्नेला मिट्टी खा कर पेट भर लेती थी जिस के चलते उस की मौत हो गई. इस के 6 महीने पहले ही उस के भाई संतोष की मौत भी इसी तरह यानी कुपोषण से हुई थी.

बीते साल जुलाई में ऐसी ही दिल दहला देने वाली घटना देश की राजधानी दिल्ली में हुई थी. पूर्वी दिल्ली के मंडावली इलाके की 3 बच्चियों मानसी, शिखा और पारुल जिन की उम्र 8, 4 और 2 साल थी, की पोस्टमार्टम रिपोर्ट नवंबर में उजागर हुई थी जिस में उन के भूख से ही मरने की पुष्टि अधिकृत तौर पर हुई थी. इस शर्मनाक हादसे पर खूब हल्ला मचा था. वजह कोई और भी हो सकती है. बिसरा रिपोर्ट के मुताबिक इन तीनों के पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं था और मौत की चिकित्सीय वजह कुपोषण और भूख ही थी. इन का पिता मंगल हल्ला मचने पर गायब हो गया था.

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उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में सितंबर 2018 में एक महिला और उस के 2 बच्चों की मौत भूख से हुई थी. इस पर भी हल्ला मचा तो पता चला कि इस जिले में भूख से मौतें आम बात हैं. यह और बात है कि सरकार सच छिपा जाती है कि मौतें भूख से नहीं बल्कि टीबी की बीमारी से हुई हैं. मुसहर जाति बाहुल्य इस इलाके के लोगों ने मीडिया के सामने सच उधेड़ कर रख दिया था कि भूख नाम की यह बीमारी और इस से मौतें आएदिन होती रहती हैं.

इन चर्चित थोड़े पुराने मामलों का जिक्र बेहद जरूरी था. अब नए हालिया समाचारों पर गौर करें तो 1 अक्तूबर को जब किरण रिजिजू फिटनैस पर व्याख्यान दे रहे थे तब मध्य प्रदेश के बडबानी जिले में 8 साल का एक बच्चा भूख से दम तोड़ रहा था. इस बच्चे के मांबाप भी दिहाड़ी मजदूर थे और जिस दिन काम नहीं मिलता था उस दिन उन्हें भूखे ही सोना पड़ता था.

9 अक्तूबर को गुमला जिले में एक 75 वर्षीया वृद्धा ने मौत से दम तोड़ दिया. हल्ला मचा तो अधिकारी उस के घर पहुंचे और पाया कि सोमरी नाम की इस बुजुर्ग के यहां अनाज नहीं था.

भूख से मौतों की खबरें हर कभी हर कहीं से आती रहती हैं लेकिन जो नहीं आ पातीं उन की संख्या का तो अंदाजा ही नहीं लगाया जा सकता क्योंकि प्रशासन का काम भूखों को रोटी मुहैया कराने का नहीं बल्कि भूख से हुई मौतों को ढकने का ज्यादा रहता है जिस से सरकार की बदनामी न हो.

अब सरकार फिटनैस के जरिए नाम कमा रही है कि देखो हमें लोगों की फिटनैस की कितनी चिंता है. सरकार फिटनैस की चिंता करे, कोई हर्ज नहीं लेकिन सरकार भूख से मरने वालों की चिंता न करे यह चिंता के साथसाथ एतराज की भी बात है क्योंकि आखिरकार फिट वही रहेगा जिस के पेट में रोटी होगी, और न होगी तो फिट इंडिया एक ड्रामा ही कहा जाएगा.

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परिणीति चोपड़ा ने क्यों छोड़ी अजय देवगन की ये फिल्म

बौलीवुड एक्ट्रेस परिणीति चोपड़ा बैडमिंटन प्लेयर साइना नेहवाल की बायोपिक फिल्म शूट करने  की तैयारियों में लगी हुई हैं. जी हां, साइना की बायोपिक परिणीति चोपड़ा करने वाली है. वैसे उनके पास कई  फिल्में हैं. आपको बता दें कि परिणीति साइना की बायोपिक का शूटिंग खत्म करने के बाद वे “द गर्ल औन द ट्रेन” के रीमेक में काम करेंगी.

इसी बीच खबर आई है  कि परिणीति चोपड़ा ने अजय देवगन स्टारर फिल्म “भुज: द प्राइड औफ इंडिया” को मना कर दिया है. वैसे  इसके पहले परिणीति इस फिल्म में काम करने के लिए काफी एक्साइटेड थीं. खबर के मुताबिक दूसरे प्रोजेक्ट्स की वजह से परिणीति इस फिल्म के लिए समय नहीं निकाल पा रही हैं. इस कारण से परिणीति ने इस फिल्म को छोड़ना बेहतर समझा.

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आपको बता दें  कि “भुज” में अजय देवगन के साथ संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा अहम किरदार में नजर आने वाले हैं. यह फिल्म 1971 में हुए इंडो-पाक वार पर आधारित होगी.

परिणीति चोपड़ा की वर्क फ्रंट की बात करे तो हाल ही में  वो सिद्धार्थ मल्होत्रा संग ‘जबरिया जोड़ी’ में नजर आई थीं. ये फिल्म बुरी तरह फ्लौप हुई थी. परिणीति चोपड़ा ने साइना नेहवाल की बायोपिक के लिए काफी तैयारियां की हैं. बता दें कि परिणीति करीब चार महीने तक बैडमिंटन ट्रेनिंग ली. वो गेम की भी प्रेक्टिस कर रही हैं.

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सर्दियों के मौसम में हरा चना खाने के ये हैं 3 फायदे

सर्दी के मौसम में सब्जियों के विकल्प अधिक हो जाते हैं. खाने पीने का लुत्फ उठाने के लिए सर्दी सबसे अच्छा मौसम होता है. इसके अलावा इन सब्जियों को हम कई तरह से इस्तेमाल भी कर सकते हैं. खासतौर पर सर्दियों में मिलने वाली सब्जियों में  ब्रोकली, हरा चना, पालक, मटर, मेथी, बथुआ, गाजर, चुकंदर, गंजी जैसी चीजों में कैलोरी भी कम होती है और स्वाद में भी मजेदार होता हैं.

हरा चना सर्दी की डाइट में शामिल करने के लिए काफी हेल्दी फूड है. अगर अभी तक आपने हरे चने को अपने खाने में शामिल नहीं किया है तो जरूर ट्राई कीजिए. हरे चने को कच्चा भी खाया जा सकता है और इसकी सब्जी भी बनायी जा सकती है. इस खबर में हम आपको हरे चने से होने वाले फायदों के बारे में बताएंगे.

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खूब मिलता है प्रोटीन

मटर की ही तरह हरा चना भी प्रोटीन से भरपूर होता है. मांसपेशियों के लिए ये बेहद लाभकारी होता है.

विटामिन का भी प्रमुख स्रोत

हरे चने में विटामिन ए और विटामिन सी प्रचुर मात्रा में होता है जो सर्दियों के लिहाज से बेहद जरूरी है. इनमें एंटीऔक्सिडेंट गुण मौजूद होते हैं जिससे आपकी इम्युनिटी सिस्टम और स्किन दोनों ही सही रहती है.

फोलेट से भरपूर

हरा चना फोलेट का प्रमुख स्रोत होता है. ये तत्व हमारे दिमाग के लिए काफी अहम होता है. तनाव के मरीजों के लिए ये बेहद महत्वपूर्ण तत्व होता है.

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सजा किसे मिली : भाग 1

नन्ही अल्पना के मातापिता के पास अपनी मासूम बेटी के लिए समय नहीं था. ऊपर से उन के द्वारा लगाई गई पाबंदियां थीं, सो अलग. अकेलेपन की शिकार अल्पना के बालमन में धीरेधीरे अपने मातापिता के प्रति नफरत के बीज अंकुरित होने लगे.

अल्पना की आंखें खुलीं तो खुद को अस्पताल के बेड पर पाया. मां फौरन उस के पास आ कर बोलीं, ‘‘कैसी है, बेटी. इतनी बड़ी बात तू ने मुझ से छिपाई… मैं मानती हूं कि अच्छी परवरिश न कर पाने के कारण तू अपने मातापिता को दोषी मानती है पर हैं तो हम तेरे मांबाप ही न…तुझे दुखी देख कर भला हम खुश कैसे रह सकते हैं…’’

‘‘प्लीज, आप इन से ज्यादा बातें मत कीजिए…इन्हें आराम की सख्त जरूरत है,’’ उसी समय राउंड पर आई डाक्टर ने मरीज से बातें करते देख कर कहा तथा नर्स को कुछ जरूरी हिदायत देती हुई चली गई.

अल्पना कुछ कह पाती उस से पहले ही नर्स आ गई तथा उस ने उस के मम्मीपापा से कहा, ‘‘इन की क्लीनिंग करनी है, कृपया थोड़ी देर के लिए आप लोग बाहर चले जाएं.’’

नर्स साफसफाई कर रही थी पर अल्पना के मन में उथलपुथल मची हुई थी. वह समझ नहीं पा रही कि उस से कब और कहां गलती हुई…उसे लगा कि मातापिता को दुख पहुंचाने के लिए ऐसा करतेकरते उस ने खुद के जीवन को दांव पर लगा दिया…अतीत की घटनाओं के खौफनाक मंजर उस की आंखों के सामने से

वह एक संपन्न परिवार से थी. मातापिता दोनों के नौकरी करने के कारण उसे उन का सुख नहीं मिल पाया था. जब उसे मां के हाथों का पालना चाहिए था तब दादी की गोद में उस ने आंखें खोलीं, बोलना और चलना सीखा. वह डेढ़ साल की थी कि दादी का साया उस के ऊपर से उठ गया. अब उसे ले कर मम्मीपापा में खींचतान चलने लगी, तब एक आया का प्रबंध किया गया.

एक दिन ममा ने आया को दूध में पानी मिला कर उसे पिलाते तथा बचा दूध स्वयं पीते देख लिया. उस की गलती पर उसे डांटा तो उस ने दूसरे दिन से आना ही बंद कर दिया…अब उस की समस्या उन के सामने फिर मुंहबाए खड़ी थी. दूसरी आया मिली तो वह पहली से भी ज्यादा तेज और चालाक निकली. उसे अकेला छोड़ कर वह अपने प्रेमी के साथ गप लड़ाती रहती…पता लगने पर ममा ने उसे भी निकाल दिया…

वह 2 साल की थी, फिर भी उस के जेहन में आज भी क्रेच की आया का बरताव अंकित है. उस के स्वयं खाना न खा पाने पर डांटना, झल्लाना, यहां तक कि मारना…पता नहीं और भी क्याक्या… दहशत इतनी थी कि जब भी मां उसे क्रेच में छोड़ने के लिए जातीं तो वह पहले से ही रोने लगती थी पर ममा को समय से आफिस पहुंचना होता था अत: उस के रोने की परवा न कर वह उसे आया को सौंप कर चली जाती थीं.

जब वह पढ़ने लायक हुई तब स्कूल में उस का नाम लिखवा दिया गया. स्कूल की छुट्टी होती तो कभी ममा तो कभी पापा उसे स्कूल से ला कर घर छोड़ देते तथा उस से कहते कि उन के अलावा कोई भी आए तो दरवाजा मत खोलना और न ही बाहर निकलना. देखने के लिए दरवाजे में आई पीस लगवा दिया था.

एक दिन वह पड़ोस में रहने वाले सोनू की आवाज सुन कर बाहर चली गई तथा खेलने लगी तभी ममा आ गईं. खुला घर तथा उसे बाहर खेलते देख वह क्रोधित हो गईं…दूसरे दिन से वह उसे बाहर से बंद कर के जाने लगीं…एक दिन उसे न जाने क्या सूझा कि घर की पूरी चीजें जो उस के दायरे में थीं, उस ने नीचे फेंक दीं…उस दिन उस की खूब पिटाई हुई और मम्मीपापा में भी जम कर झगड़ा हुआ.

ममा की परेशानी देख कर सोनू की मम्मी ने स्कूल के बाद उसे अपने घर छोड़ कर जाने के लिए कहा तो वह बहुत खुश हुई…साथ ही मम्मीपापा की समस्या भी हल हो गई. 4 साल ऐसे ही निकल गए. पर तभी सोनू के पापा का तबादला हो गया. फिर वही समस्या.

बड़ी होने के कारण अब उस के स्कूल का समय बढ़ गया था तथा अब वह पहले से भी ज्यादा समझदार हो गई थी. उस ने अपनी स्थिति से समझौता कर लिया था, ममा के आदेशानुसार वह उन के या पापा के आफिस से आने पर उन की आवाज सुन कर ही दरवाजा खोलती, किसी अन्य की आवाज पर नहीं. एकांत की विभीषिका उसे तब भी परेशान करती पर जैसेजैसे बड़ी होती गई उसे पढ़ाने और होमवर्क कराने को ले कर मम्मीपापा में तकरार होने लगी.

अभी वह 10 वर्ष की ही थी कि उसे बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया गया. वहां मम्मीपापा हर महीने उस से मिलने जाते, उस के लिए अच्छीअच्छी गिफ्ट लाते, पूरा दिन उस के साथ गुजारते पर शाम को उसे जब होस्टल छोड़ कर जाने लगते तो वह रो पड़ती थी. तब ममा आंखों में आंसू भर कर कहतीं, ‘बेटा, मजबूरी है. जो मैं कर रही हूं वह तेरे भविष्य के लिए ही तो कर रही हूं.’

वह उस समय समझ नहीं पाती थी कि यह कैसी मजबूरी है. सब के बच्चे अपने मम्मीपापा के पास रहते हैं फिर वह क्यों नहीं…पर धीरेधीरे वह अपनी हमउम्र साथियों के साथ घुलनेमिलने लगी क्योंकि सब कीव एक सी ही कहानी थी…वहां अधिकांशत: बच्चों को इसलिए होस्टल में डाला गया था क्योंकि किसी की मां नहीं थी तो किसी के घर का माहौल अच्छा नहीं था, किसी के मातापिता उस के मातापिता की तरह ही कामकाजी थे तो कोई अपने बच्चों के उन्नत भविष्य के लिए उन्हें वहां दाखिल करवा गए थे.

छुट्टी में घर जाती तो मम्मीपापा की व्यस्तता देख उसे लगता था कि इस से तो वह होस्टल में ही अच्छी थी. कम से कम वहां बात करने वाला कोई तो रहता है. धीरेधीरे उस के मन में विद्रोह पैदा होता गया. उसे मम्मीपापा स्वार्थी लगने लगे. जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिए उसे पैदा तो कर दिया पर उस की जिम्मेदारी उठाना नहीं चाहते.

आखिर एक बच्चे को अच्छे कपड़ों, अच्छे खिलौनों के साथसाथ और भी तो कुछ चाहिए, यह साधारण सी बात वह क्यों नहीं समझ पा रहे हैं या जानतेबूझते हुए भी समझना नहीं चाहते हैं. एक बार उस ने पूछ ही लिया, ‘मैं आप की ही बेटी हूं या आप कहीं से मुझे उठा तो नहीं लाए हैं.’

उस की मनोस्थिति समझे बिना ही ममा भड़क कर बोलीं, ‘कैसी बातें कर रही है…कौन तेरे मन में जहर घोल रहा है?’

मम्मा आशंकित मन से पापा की ओर देखने लगीं. पापा भी चुप कहां रहने वाले थे. बोल उठे, ‘शक क्यों नहीं करेगी. कभी प्यार के दो बोल बोले हैं. कभी उस के पास बैठ कर उस की समस्याएं जानने की कोशिश की है…तुम्हें तो बस, हर समय काम ही काम सूझता रहता है.’

‘तो तुम क्यों नहीं उस से समस्याएं पूछते…तुम भी तो उस के पिता हो. क्या बच्चे को पालने की सारी जिम्मेदारी मां को ही निभानी पड़ती है.’

दोनों में तकरार इतनी बढ़ी कि उस दिन घर में खाना ही नहीं बना. ममा गुस्से में चली गईं. लगभग 10 बजे पापा हाथ में दूध तथा ब्रैड ले कर आए और आग्रह से खाने के लिए कहने लगे पर उसे भूख कहां थी. मन की बात जबान पर आ ही गई, ‘पापा, अगर किसी को मेरी आवश्यकता नहीं थी तो मुझे इस दुनिया में ले कर ही क्यों आए? मेरी वजह से आप और ममा में झगड़ा होता है…मुझे कल ही होस्टल छोड़ दीजिए. मेरा यहां मन नहीं लगता.’

पापा ने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘ऐसा नहीं कहते बेटा, यह तेरा घर है.’

‘घर, कैसा घर, पापा…मैं पूरे दिन अकेली रहती हूं. आप और ममा आते भी हैं तो सिर्फ अपनीअपनी समस्याएं ले कर. मेरे लिए आप दोनों के पास समय ही नहीं है.’

प्रेम तर्पण : भाग 1

डाक्टर ने जवाब दे दिया था, ‘‘माधव, हम से जितना बन पड़ा हम कर रहे हैं, लेकिन कृतिकाजी के स्वास्थ्य में कोईर् सुधार नहीं हो रहा है. एक दोस्त होने के नाते मेरी तुम्हें सलाह है कि अब इन्हें घर ले जाओ और इन की सेवा करो, क्योंकि समय नहीं है कृतिकाजी के पास. हमारे हाथ में जितना था हम कर चुके हैं.’’

डा. सुकेतु की बातें सुन कर माधव के पीले पड़े मुख पर बेचैनी छा गई. सबकुछ सुन्न सा समझने न समझने की अवस्था से परे माधव दीवार के सहारे टिक गया. डा. सुकेतु ने माधव के कंधे पर हाथ रख कर तसल्ली देते हुए फिर कहा, ‘‘हिम्मत रखो माधव, मेरी मानो तो अपने सगेसंबंधियों को बुला लो.’’ माधव बिना कुछ कहे बस आईसीयू के दरवाजे को घूरता रहा. कुछ देर बाद माधव को स्थिति का भान हुआ. उस ने अपनी डबडबाई आंखों को पोंछते हुए अपने सभी सगेसंबंधियों को कृतिका की स्थिति के बारे में सूचित कर दिया.

इधर, कृतिका की एकएक सांस हजारहजार बार टूटटूट कर बिखर रही थी. बची धड़कनें कृतिका के हृदय में आखिरी दस्तक दे कर जा रही थीं. पथराई आंखें और पीला पड़ता शरीर कृतिका की अंतिम वेला को धीरेधीरे उस तक सरका रहा था. कृतिका के भाई, भाभी, मौसी सभी परिवारजन रात तक दिल्ली पहुंच गए. कृतिका की हालत देख सभी का बुरा हाल था. माधव को ढाड़स बंधाते हुए कृतिका के भाई कुणाल ने कहा, ‘‘जीजाजी, हिम्मत रखिए, सब ठीक हो जाएगा.’’

तभी कृतिका को देखने डाक्टर विजिट पर आए. कुणाल और माधव भी वेटिंगरूम से कृतिका के आईसीयू वार्ड पहुंच गए. डा. सुकेतु ने कृतिका को देखा और माधव से कहा, ‘‘कोई सुधार नहीं है. स्थिति अब और गंभीर हो चली है, क्या सोचा माधव तुम ने ’’ ‘‘नहींनहीं सुकेतु, मैं एक छोटी सी किरण को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता. तुम्हीं बताओ, मैं कैसे मान लूं कि कृतिका की सांसें खत्म हो रही हैं, वह मर रही है, नहीं वह यहीं रहेगी और उसे तुम्हें ठीक करना ही होगा. यदि तुम से न हो पा रहा हो तो हम दूसरे किसी बड़े अस्पताल में ले जाएंगे, लेकिन यह मत कहो कि कृतिका को घर ले जाओ, हम उसे मरने के लिए नहीं छोड़ सकते.’’

सुकेतु ने माधव के कंधे को सहलाते हुए कहा, ‘‘धीरज रखो, यहां जो इलाज हो रहा है वह बैस्ट है. कहीं भी ले जाओ, इस से बैस्ट कोई ट्रीटमैंट नहीं है और तुम चाहते हो कि कृतिकाजी यहीं रहेंगी, तो मैं एक डाक्टर होने के नाते नहीं, तुम्हारा दोस्त होने के नाते यह सलाह दे रहा हूं. डोंट वरी, टेक केयर, वी विल डू आवर बैस्ट.’’

माधव को कुणाल ने सहारा दिया और कहा, ‘‘जीजाजी, सब ठीक हो जाएगा, आप हिम्मत मत हारिए,’’ माधव निर्लिप्त सा जमीन पर मुंह गड़ाए बैठा रहा. 3 दिन हो गए, कृतिका की हालत जस की तस बनी हुई थी, सारे रिश्तेदार इकट्ठा हो चुके थे. सभी बुजुर्ग कृतिका के बीते दिनों को याद करते उस के स्वस्थ होने की कामना कर रहे थे कि अभी इस बच्ची की उम्र ही क्या है, इस को ठीक कर दो. देखो तो जिन के जाने की उम्र है वे भलेचंगे बैठे हैं और जिस के जीने के दिन हैं वह मौत की शैय्या पर पड़ी है. कृतिका की मौसी ने हिम्मत करते हुए माधव के कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘‘बेटा, दिल कड़ा करो, कृतिका को और कष्ट मत दो, उसे घर ले चलो.

‘‘माधव ने मौसी को तरेरते हुए कहा, ‘‘कैसी बातें करती हो मौसी, मैं उम्मीद कैसे छोड़ दूं.’’

तभी माधव की मां ने गुस्से में आ कर कहा, ‘‘क्यों मरे जाते हो मधु बेटा, जिसे जाना है जाने दो. वैसे भी कौन से सुख दिए हैं तुम्हें कृतिका ने जो तुम इतना दुख मना रहे हो,’’ वे धीरे से फुसफुसाते हुए बोलीं, ‘‘एक संतान तक तो दे न सकी.’’ माधव खीज पड़ा, ‘‘बस करो अम्मां, समझ भी रही हो कि क्या कह रही हो. वह कृतिका ही है जिस के कारण आज मैं यहां खड़ा हूं, सफल हूं, हर परेशानी को अपने सिर ओढ़ कर वह खड़ी रही मेरे लिए. मैं आप को ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता इसलिए आप चुप ही रहो बस.’’

कृतिका की मौसी यह सब देख कर सुबकते हुए बोलीं, ‘‘न जाने किस में प्राण अटके पड़े हैं, क्यों तेरी ये सांसों की डोर नहीं टूटती, देख तो लिया सब को और किस की अभिलाषा ने तेरी आत्मा को बंदी बना रखा है. अब खुद भी मुक्त हो बेटा और दूसरों को भी मुक्त कर, जा बेटा कृतिका जा.’’ माधव मौसी की बात सुन कर बाहर निकल गया. वह खुद से प्रश्न कर रहा था, ‘क्या सच में कृतिका के प्राण कहीं अटके हैं, उस की सांसें किसी का इंतजार कर रही हैं. अपनी अपलक खुली आंखों से वह किसे देखना चाहती है, सब तो यहीं हैं. क्या ऐसा हो सकता है

‘हो सकता है, क्यों नहीं, उस के चेहरे पर मैं ने सदैव उदासी ही तो देखी है. एक ऐसा दर्द उस की आंखों से छलकता था जिसे मैं ने कभी देखा ही नहीं, न ही कभी जानने की कोशिश ही की कि आखिर ये कैसी उदासी उस के मुख पर सदैव सोई रहती है, कौन से दर्द की हरारत उस की आंखों को पीला करती जा रही है, लेकिन कोईर् तो उस की इस पीड़ा का साझा होगा, मुझे जानना होगा,’ सोचता हुआ माधव गाड़ी उठा कर घर की ओर चल पड़ा. घर पहुंचते ही कृतिका के सारे कागजपत्र उलटपलट कर देख डाले, लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला. कुछ देर बैठा तो उसे कृतिका की वह डायरी याद आई जो उस ने कई बार कृतिका के पास देखी थी, एक पुराने बकसे में कृतिका की वह डायरी मिली. माधव का दिल जोरजोर से धड़क रहा था.

कृतिका का न जाने कौन सा दर्द उस के सामने आने वाला था. अपने डर को पीछे धकेल माधव ने थरथराते हाथों से डायरी खोली तो एक पन्ना उस के हाथों से आ चिपका. माधव ने पन्ने को पढ़ा तो सन्न रह गया. यह पत्र तो कृतिका ने उसी के लिए लिखा था :

फिल्म समीक्षाः ‘झलकी’

रेटिंगःढाई स्टार

निर्माताःब्रम्हानंद एस सिंह और आनंद चैहाण

निर्देशकः ब्रम्हानंद एस सिंह और तनवी जैन

कलाकारः बोमन ईरानी,तनिष्ठा चटर्जी, संजय सूरी, जौयसेन गुप्ता, दिव्या दत्ता, गोविंद नाम देव,यतिन कर्येकर, अखिलेंद्र मिश्रा, बचन पचेरा, बाल कलाकार आरती झा और गोरक्षा सकपाल व अन्य.

अवधिः 1 घंटा 59 मिनट

‘बचपन बचाओ’ का संदेश देने के लिए नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी के कार्यों से प्रेरित होकर ब्रम्हानंद एस सिंह और तनवी जैन फिल्म ‘‘झलकी’’ लेकर आए हैं. निर्देशक ने एक बाल मजदूर जैसे अति गंभीर विषय पर अपनी तरफ से गंभीर प्रयास किया है, मगर विषयवस्तु को लेकर सीमित सोच के चलते फिल्म अपना प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहती है.

कहानीः

फिल्म की कहानी गौरया नामक चिड़िया की एक पुरानी लोककथा के एनपीमेान मे काध्यम से शुरू होती है. गौरैया, जिसका एक दाना बांस की खोल में फंस जाता है, जिसे पाने के लिए वह बढ़ई, राजा, उसकी रानी, सांप,एक छड़ी, आग, समुद्र और एक हाथी तक गुहार लगाती है. हाथी तक पहुंचने से पहले सभी उसे भगा देते हैं. मगर जब हाथी उसकी मदद के लिए उसके साथ चलता है, तो सभी मदद के लिए तैयार हो जाते हैं और गौरैया को उसका दाना मिल जाता है.

फिर मूल कहानी शुरू होती है. कहानी है उत्तर प्रदेश के एक गांव से रामप्रसाद(गोविंद नामदेव) नियमित रूप से बच्चों को श्रम के लिए शहर में ले जाता है. इसके लिए वह बच्चों के गरीब माता पिता को एलईडी टार्च या एफएम रेडियो अथवा कुछ पैसे देकर उनकी भलाई का नाटक करता है. पर उसी गांव की एक नौ साल की लड़की झलकी( बेबी आरती झा) को रामप्रसाद पसंद नहीं. वह हर हाल में अपने छोटे भाई सात साल के बाबू (गोरक्षक सकपाल) को रामप्रसाद से बचाकर रखना चाहती है. पर हालात कुछ इस तरह बदलते है कि राम प्रसाद के साथ झलकी और उसका भाई बाबू मिर्जापुर शहर पहुंच जाते है, जहां रामप्रसाद बड़ी चालाकी से उसके भाई बाबू को बाल मजदूरी के लिए दूसरों के हाथ बेच देते हैं और झलकी को किसी अन्य के हाथ वेश्यावृत्ति के लिए बेचते हैं. झलकी अपने भाई बाबू से अलग हो जाती है, पर वह भागकर खुद को बचा लेती है. फिर वह अपने भाई बाबू की तलाष षुरू करती है. कारपेट बनाने वाली फैक्टरी के मालिक चकिया (अखिलेंद्र मिश्रा) के यहां बाबू कारपेट बनाने के काम में लग जाता है.

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अपने भाई बाबू की तलाश के लिए झलकी गौरैया की कहानी को याद कर अपने काम पर लग जाती है.उसे सबसे पहले रिक्श चालक रहीम चाचा (बचन पचेहरा) का साथ मिलता है. जलेबी बेचने वाले दुकानदार को सच पता है, पर वह कुछ बताने को तैयार नही. तब झलकी राजा यानी कि जिले के कलेक्टर संजय (संजय सूरी) के पास पहुंचती है, संजय उसे भगा देते हैं. तब वह नाटकीय तरीके से रानी यानी कि कलेक्टर की पत्नी  सुनीता (दिव्या दत्ता) से मिलती है. सुनीता उसे अपने घर ले जाकर अपने साथ रहने के लिए कहती है और आष्वस्त करती है कि वह जल्द उसके भाई को ढुंढ़वा देंगी.पर संजय ख्ुाद को असमथर्थ बताते हैं. रहीम चाचा की मदद से झलकी को यह पता चल जाता है कि उसके भाई बाबू से कारपेट बनाने वाली कंपनी के मालिक चकिया बाल मजदूरी करा रहे हैं. एक दिन जब वह छिपकर कंपनी के अंदर पहुंचती है तो वह कलेक्टर संजय के ज्यूनियर और एसडीएम अखिलेश(जौयसेन गुप्ता) को चकिया से घूस लेते देख लेती है. पर संजय चुप रहते हैं. उसके बाद नाटकीय तरीके से पत्रकार प्रीति व्यास (तनिष्ठा चटर्जी) और बच्चों को छुड़वाने काम कर रहे समाज सेवक (बोमन ईरानी) की मदद से झलकी अपने भाई व गांव के अन्य बच्चों का बाल मजदूरी से मुक्त कराकर अपने गांव पहुचती है.

कहानी खत्म होने के बाद कैलाश सत्यार्थी का लंबा चैड़ा भाषण और उनके द्वारा 86 हजार बच्चों को छुड़ाए जाने के दौरान के उनके कार्यां के वीडियो भी आते हैं.

लेखन व निर्देशनः

मूलतः डाक्यूमेंट्री फिल्मकार ब्रम्हानंद एस सिंह की बतौर निर्देशक यह पहली फीचर फिल्म है, जिसमें उनके साथ निर्देशन में सहयोगी के रूप में तनवी जैन भी जुड़ी हुई हैं. ब्रम्हानंद एस सिंह ने संगीतकार आर डी बर्मन और गजल गायक जगजीत सिंह लंबी डाक्यूमेंट्री बना चुके हैं. जिसका असर फिल्म में इंटरवल से पहले नजर आता है. इंटरवल से पहले जिस तरह से दृष्य व पार्श्व में गाने पिरोए गए हैं, उससे फीचर फिल्म् की बजाय डाक्यमेंट्री का अहसास होता है. इंटरवल के बाद घटनाक्रम घटित होते हैं. पर पटकथा में कुछ झोल के साथ निर्देशन में कुछ कमियां है. फिल्म बेवजह लंबी खींची गयी है.

फिल्म में बच्चो के यौन शोषण को भी बहुत हलके फुलके से दिखाया गया है. फिल्मकार के रूप में ब्रम्हानंद ने बाल मजदूरी के साथ जुड़े हर इंसान को बेनकाब करने का प्रयास किया है. फिल्म में भाई कही तलाश में जुटी झलकी के अंदर के गहरे डर का भी बेहतरीन चित्रण है. कालीन बुनाई के लघु उद्योग में किस तरह छोटे छोटे बच्चे काम कर रहे है और उन्हें किस हालात में रखा जाता है, उसका यथार्थ चित्रण है.मिर्जापुर में घरेलू उद्योगों की लंबी श्रृंखला में कालीन की बुनाई उद्योग है.जहां बाल तस्करी का नेक्सस बड़ा और शक्तिशाली है. मगर फिल्मकार ने इसका बहुत सतही चित्रण किया है.

अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो झलकी के किरदार में बाल कलाकार आरती झा अपने शानदार अभिनय से मन मोह लेती हैं. गोरक्षा सकपाल ने भी बाबू के किरदार के साथ न्याय किया है.यह दोनो भाई-बहन के रूप में एक अद्भुत, वास्तविक बंधन बनाते हैं.फिल्म में बेहतरीन कलाकारों की लंबी चैड़ी फौज है, मगर पटकथा लेखन व निर्देशकीय कमजोरी के चलते यह कलाकार बंधे से नजर आते हैं. कोई भी खुलकर अपनी प्रतिभा को सामने नहीं ला पाया.

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कैसे शुरु हुई दीपिका रणवीर की लव स्टोरी, ऐसी थी पहली मुलाकात

बौलीवुड के एक्टर रणवीर सिंह और एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण फिल्म इंडस्ट्री के सबसे पौपुलर और रोमांटिक कपल में उनकी जोड़ी शुमार है. जी हां, आज यानी 14 नवंबर को उनकी पहली मैरिज एनिवर्सरी है. इस मौके पर आपको इस दिलकश कपल की लव स्टोरी के बारे में बताते हैं. तो चलिए जानते है उनकी पहली मुलाकात कैसे हुई.

आपको बता दें, रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण कई फिल्मों में साथ काम किया है. जैसे: रामलीला, पद्मावत और बाजीराव मस्तानी.  इन दोनो की बहुत ही दिलचस्प लव स्टोरी है. क्या आप जानते हैं, ये दोनो पहली बार कब मिले थे. इनकी पहली मुलाकात जी सिने अवाडर्स में हुई थी. इस अवाडर्स  समारोह में रणवीर ने पहली बार दीपिका को सामने से देखा था और रणवीर का कहना है कि वह उन्हें देखते ही फिदा हो गए थे.

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दोनों को साथ में ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताने के लिए जरूरी था कि वे साथ में काम करे और इसके  लिए उन्हें ये मौका दिया  फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली ने. फिल्म का नाम था “गोलियों की रासलीला – रामलीला”.

इस फिल्म में दोनों के बीच कमाल की कैमिस्ट्री देखने को मिली और इस तरह की खबरें आनी शुरू हो गईं कि दोनों के बीच कुछ चल रहा है. दोनों अपनी रिलेशनशिप को दुनिया की नजरों से बचाने की बहुत कोशिश कर रहे थे लेकिन इनकी तस्वीरें सब कुछ  बता  रही थीं.

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खबर तो ये भी आई थी कि फिल्म “रामलीला” में एक रोमांटिक सीन के दौरान दोनों को किस करना था और निर्देशक के कट बोलने के बाद भी दोनों एक दूसरे को किस करते रहे.

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ब्रेकफास्ट में बनाएं बनाना पेस्ट्री

आज आपको बनाना पेस्ट्री बनाने की रेसिपी के बारे में बताते हैं. जो आप आसानी से ब्रेकफास्ट में बना सकते हैं. इसे बनाना भी बेहद आसान है. तो चलिए जानते हैं बनाना पेस्ट्री बनाने की रेसिपी.

सामग्री

– 2 केले

– 2 बड़े चम्मच नारियल पाउडर

– 2 बड़े चम्मच चीनी

– 10-12 किशमिश

– 1 कप मैदा

– 2 बड़े चम्मच मक्खन

– 1/2 छोटा चम्मच बेकिंग पाउडर

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बनाने की विधि

मैदे में बेकिंग पाउडर व मक्खन मिला कर गूंध लें.

एक पैन में चीनी पिघला कर केला, किशमिश व नारियल पाउडर मिला कर 1-2 मिनट पकाएं.

गुंधे मैदा के छोटेछोटे पेड़े बना कर बेल लें.

एक पूरी पर केले का मिश्रण रखें व दूसरी पूरी से ढक कर सील करें.

इस तरह सभी तैयार कर 1800 पर गरम ओवन में 8-10 मिनट तक बेक करें.

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