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रात्रि भोज : भाग 2

लेकिन दूसरे दिन जब राजा बाबू ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने की घोषणा की थी तो दद्दा तिलमिला कर रह गए थे. घंटों अपने कमरे के  बाहर राजा को प्रतीक्षा करवाने वाले दद्दा साहब ने राजा बाबू को बारबार निमंत्रण भेजा था पर वह नहीं आए थे.

राजा बाबू की चुनौती को स्वीकार कर कौशल बाबू ने अपने दामाद रामाधार के साथ चुनाव क्षेत्र में ही डेरा डाल दिया था. दल की मशीनरी का साथ होने पर भी रामाधार की जमानत जब्त हो गई थी. राजा बाबू को पहले ही जनतांत्रिक दल से निष्कासित कर दिया गया था.

जब ढोलनगाड़ों की थाप पर राजा बाबू का विजय रथ जनतांत्रिक दल के कार्यालय के सामने से निकला था, दल के नेतागण मन मसोस कर रह गए थे.

सरकार बनाने की कोशिश शुरू होते ही स्वतंत्र विधायकों की बन आई थी. दोनों पक्षों में कांटे की टक्कर थी, अत: हर पक्ष उन्हें अधिक से अधिक प्रलोभन देना चाहता था.

दद्दा साहब राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी थे. कब कैसे पैंतरा बदला जाए वह भली प्रकार जानते थे. दल के  दिग्गजों ने जब सातों स्वतंत्र विधायकों को रात्रिभोज के लिए बुलाया तो उन सभी ने राजा बाबू को अपना नेता घोषित कर दिया था.

बातचीत का दौर प्रारंभ हुआ तो सातों को तरहतरह के प्रलोभन दिए जाने लगे.

‘‘आज्ञा हो तो मैं भी कुछ कहूं,’’ स्वतंत्र गुट की ओर से राजा बाबू बोले थे.

‘‘हां, बोलो बेटा, हमें भी तो पता चले कि आप लोग चाहते क्या हैं,’’ दद्दा साहब बोले थे.

‘‘अवश्य बताएंगे पर पहले भोजन कर लीजिए. इतना अच्छा भोजन सामने है, ऐसे में रंग में भंग डालने का हमारा कोई इरादा नहीं है,’’ स्वतंत्र विधायकों में से एक बंसी बाबू बोले थे.

हासपरिहास के बीच रात्रिभोज समाप्त हुआ था. स्वादिष्ठ आइसक्रीम के साथ सभी सोफों पर जा विराजे थे.

‘‘चलिए, अब काम की बात कर ली जाए,’’ कौशल बाबू और दद्दा समवेत स्वर में बोले थे, ‘‘क्या मांग है आप की?’’

‘‘हमारी तो एक ही मांग है. मुझे मुख्यमंत्री बनाया जाए और मेरे अन्य मित्रों को मंत्रिमंडल में स्थान मिले,’’ राजा बाबू गंभीर स्वर में बोले थे.

‘‘क्या?’’ जनतांत्रिक दल के दिग्गज नेताओं को मानो सांप सूंघ गया था.

‘‘तुम जानते हो न राजा बेटे कि तुम क्या कह रहे हो?’’ अंतत: मौन दद्दा साहब ने तोड़ा था.

‘‘जी हां, भली प्रकार से जानता हूं.’’

‘‘देखो राजा, दल में अनेक वयोवृद्ध नेताओं को छोड़ कर तुम्हें मुख्यमंत्री बनाएंगे तो दल में असंतोष फैल जाएगा. वैसे भी यह क्या कोई आयु है मुख्यमंत्री बनने की? इस गरिमापूर्ण पद पर तो कोई गरिमापूर्ण व्यक्तित्व ही शोभा देता है,’’ कौशल बाबू ने अपनी ओर से प्रयत्न किया था.

‘‘मैं ने आप को अपनी शर्तों के बारे में सूचित कर दिया है. अब गेंद आप के पाले में है. जैसे चाहें खेल को संचालित करें,’’ बंसी बाबू बोले थे.

‘‘राजा, कुछ देर के लिए मैं तुम से एकांत में विचारविमर्श करना चाहता हूं,’’ दद्दा साहब ने राजा बाबू को साथ के कक्ष में बुलाया था.

‘‘आप को जो कहना है हम सब के सामने कहिए. हम सब एक हैं. कहीं कोई दुरावछिपाव नहीं है,’’ बंसी बाबू ने राजा को रोकते हुए कहा था.

‘‘ठीक है, हम आपस में विचारविमर्श कर के आते हैं. फिर आप को सूचित करेंगे,’’ कहते हुए दद्दा साहब, कौशल बाबू और जनतांत्रिक दल के अन्य दिग्गज नेता उठ कर साथ के कमरे में चले गए थे.

‘‘समझता क्या है अपनेआप को? कल तक तो दरी बिछाने और लोगों को पानी पिलाने का काम करता था, आज मुख्यमंत्री बनने का स्वप्न देखने लगा है?’’ कौशल बाबू बहुत क्रोध में थे.

‘‘मत भूलिए कि सत्ता की चाबी अब उन के हाथ में है,’’ दद्दा साहब ने समझाया था.

‘‘इस का अर्थ यह तो नहीं है कि सारा राज्य इन नौसिखियों के हवाले कर दें.’’

‘‘सोचसमझ कर निर्णय लीजिए. नहीं तो गणतांत्रिक दल वाले तैयार बैठे हैं इन्हें लपकने को,’’ अंबरीष बाबू बोले थे.

‘‘निर्णय लेने को अब बचा ही क्या है? या तो उन की शर्तें माननी हैं या नहीं माननी हैं,’’ कौशल बाबू झुंझला गए थे.

बहुत बेमन से सभी दिग्गज नेता एकमत हुए थे. शायद वे समझ गए थे कि सत्ता में बने रहने का यही एकमात्र तरीका था.

दूसरे दिन जब एक साझी प्रेस कानफें्रस में जनतांत्रिक दल के स्वतंत्र विधायकों से गठबंधन की घोषणा की गई और राजा बाबू के नाम की घोषणा भावी मुख्यमंत्री के रूप में हुई तो सभी आश्चर्यचकित रह गए.

राजा बाबू ने कैमरों की फ्लैश- लाइटों के बीच दद्दा साहब के पैर छू कर आशीर्वाद लिया तो दद्दा साहब ने उन्हें गले से लगा लिया. वह समझ गए थे कि परिवर्तन की आंधी को रोकना अब उन के वश में नहीं था.

छिपकली : भाग 2

कविता ने चैन की सांस ली और काम में लग गईं. अगले दिन सुबह कविता चाय बनाने जब रसोई में गईं तो बिजली का बटन दबाते ही सब से पहले उसी छिपकली के दर्शन हुए जो गैस के चूल्हे के पास स्वच्छंद घूम रही थी. कविता को लगा वह फिर से चिल्लाएं…पर चुप रह गईं क्योंकि सुबह सब मीठी नींद में सो रहे थे. कविता ने उस छोटी सी छिपकली को झाड़ू से भगाया तो वह तेजी से रसोई की छत पर चढ़ गई.

अब कविता जब भी रसोई में जातीं तो उन का पूरा ध्यान छिपकली के बच्चे की ओर लगा रहता. खानेपीने का सब सामान वह ढक कर रखतीं. धीरेधीरे वह छिपकली का बच्चा बड़ा होने लगा और 10-15 दिनों के भीतर ही पूरी छिपकली बन गया.

मां के तनाव को देख कर संजू बोला, ‘‘मां, मैं इस छिपकली को मारने के लिए दवाई लाता हूं. रात को गैस के पास डाल देंगे और सुबह तक उस का काम तमाम हो जाएगा.’’

‘‘तुम्हें क्या कह रही है छिपकली जो तुम उस को मारने पर तुले हो,’’ जूही बोली, ‘‘अरे, छिपकली घर में रहेगी तो घर साफ रहेगा. वह कीड़ेमकोड़े और काकरोच आदि खाती रहेगी.’’

‘‘तुम छिपकली के पक्ष में क्यों बात करती हो? क्या पुराने जन्म का कोई रिश्ता है?’’ संजू ने चुटकी ली.

‘‘कल एक पुजारी भी मुझ से कह रहा था कि छिपकली को नहीं मारना चाहिए. छिपकली रहने से घर में लक्ष्मी का आगमन होता है,’’ दीप बोले.

‘‘पापा, आप भी अपनी बहू के सुर में सुर मिला रहे हैं…आप दोनों मिल कर छिपकलियां ही पाल लो. इसी से यदि घर में जल्दी लक्ष्मी आ जाए तो मैं अभी से रिटायर हो जाता हूं,’’ संजू बोला.

उन की इस बहस में छिपकली कहीं जा कर छिप गई. जूही बोली, ‘‘देखो, आज सुबहसुबह ही हम सब ने छिपकली को देखा है. देखें आज का दिन कैसा बीतता है.’’

सारा दिन सामान्य रूप से बीता. शाम को जब जूही आई तो दरवाजे से ही चिल्ला कर बोली, ‘‘मां, एक बहुत बड़ी खुशखबरी है. मैं आज बहुत खुश हूं, बताओ तो क्यों?’’

‘‘प्रमोशन मिल गया क्या?’’

‘‘नहीं. इस से भी बड़ी.’’

‘‘तुम्हीं बताओ.’’

‘‘मां, एक तो डबल प्रमोशन और उस पर सिंगापुर का एक ट्रिप.’’

‘‘देखा, सुबह छिपकली देखी थी न,’’ दीप बोले.

‘‘बस, पापा, आप भी. अरे, जूही का प्रमोशन तो होने ही वाला था. सिंगापुर का ट्रिप जरूर एक्स्ट्रा है,’’ संजू बोला.

‘‘मां, देखो कुछ तो अच्छा हुआ,’’ जूही बोली, ‘‘आप इस छिपकली को घर में ही रहने दो.’’

‘‘अरे, आज इसी विषय पर पार्क में भी बात हो रही थी. मेरे एक परिचित बता रहे थे कि घर में मोरपंख रख दो तो छिपकली अपनेआप ही भाग जाती है,’’ दीप बोले.

‘‘चलो, कल को मोरपंख ला कर रख देना तो अपनेआप छिपकली चली जाएगी,’’ कविता बोलीं.

दूसरे दिन ही दीप बाजार से ढूंढ़ कर मोरपंख ले आए और एक खाली गुलदस्ते में उसे सजा दिया गया. पर छिपकली पर उस का कोई असर नहीं हुआ. वह पहले की तरह ही पूरे घर में घूमती रही. हर सुबह कविता को वह गैस के पास ही बैठी मिलती.

एक दिन दीप बहुत सारे आम ले आए और आइसक्रीम खाने की इच्छा जताई. कविता ने बड़ी लगन से दूध उबाला, उसे गाढ़ा किया, उस में आम मिलाए और ठंडा होने के लिए एक पतीले में डाल कर रख दिया. वह उसे जल्दी ठंडा करना चाहती थीं. इसलिए पतीला ढका नहीं बल्कि वहीं खड़ी हो कर उसे कलछी से हिलाती जा रही थीं और रसोई के दूसरे काम भी कर रही थीं. तभी फोन की घंटी बजी और वह उसे सुनने के लिए दूसरे कमरे में चली गईं.

अमेरिका से उन के छोटे बेटे का फोन था. वह बहुत देर तक बात करती रहीं और फिर सारी बातें दीप को भी बताईं. इसी में 1 घंटा बीत गया.

कविता वापस रसोई में गईं तो दूध ठंडा हो चुका था. उन्होंने पतीले को वैसे ही उठा कर फ्रीजर में रख दिया. रात को खाने के बाद कविता ने आइसक्रीम निकाली और संजू और जूही को दी. दीप ने रात में आइसक्रीम खाने से मना कर दिया और खुद कविता ने इसलिए आइसक्रीम नहीं खाई कि उस दिन उन का व्रत था. संजू और जूही ने आइसक्रीम की तारीफ की और सोने चल दिए. आधे घंटे के बाद ही उन के कमरे से उलटियां करने की आवाजें आनी शुरू हो गईं. दोनों ही लगातार उलटियां किए जा रहे थे. कविता और दीप घबरा गए. एक मित्र की सहायता से दोनों को अस्पताल पहुंचाया. डाक्टर बोला, ‘‘लगता है इन को फूड पायजिनिंग हो गई है. क्या खाया था इन दोनों ने?’’

‘‘खाना तो घर में ही खाया था और वही खाया था जो रोज खाते हैं. हां, आज आइसक्रीम जरूर खाई है,’’ कविता बोलीं.

‘‘जरूर उसी में कुछ होगा. शायद आम ठीक नहीं होंगे,’’  दीप बोले.

डाक्टर ने दोनों को भरती कर लिया और इलाज शुरू कर दिया. 2 घंटे बाद दोनों की तबीयत संभली. तब दीप बोले, ‘‘कविता, तुम घर जाओ. मैं रात भर यहीं रहता हूं.’’

घर आते ही कविता ने सब से पहले आइसक्रीम का पतीला फ्रिज से बाहर निकाला और सोने के लिए बिस्तर पर लेट गईं. 5 बजे आंख खुली तो उठ गईं. जा कर रसोई में देखा तो आइसक्रीम पिघल कर दूध बन चुकी थी. कविता ने पतीला उठा कर सिंक में उड़ेल दिया. जैसे ही सारा दूध गिरा वैसे ही उस में से मरी हुई छिपकली भी गिरी. छिपकली को देखते ही कविता का दिल जोरजोर से धड़कने लगा और हाथ कांपने लगे. वह धम से जा कर सोफे पर बैठ गईं.

तभी दीप भी घर आ गए. उन्हें देखते ही कविता का रोना छूट गया. उन्होंने रोतेरोते पूरी बात बताई.

‘‘चलो, जो होना था हो गया,’’ दीप सांत्वना देते हुए बोले, ‘‘अब दोनों बच्चे ठीक हैं और 1 घंटे में डाक्टर उन्हें घर वापस भेज देगा.

‘‘संजू ने तो पहले ही दिन कहा था कि उसे मार दो. तुम और तुम्हारी बहू ही उसे पूज रहे थे.’’

‘‘अच्छा बाबा, गलती हो गई मुझ से. अब बारबार उस की याद मत दिलाओ.’’

मम्मीपापा की बातें सुन कर संजू जोर से हंसा और बोला, ‘‘हां, तो पापा, कितनी लक्ष्मी घर से चली गई… अस्पताल का बिल कितने का बना?’’

संजू का व्यंग्य भरा मजाक सुन कर सभी खिलखिला कर हंस पड़े.

वंश बेल : भाग 2

‘‘गुरुजी, कई दिनों से एक बात हम लोगों को विचलित कर रही है. वैसे हम उसे कहना नहीं चाहते थे पर लोगों का मुंह भी कैसे रोकें इसलिए मजबूर हो कर आप से पूछना पड़ रहा है. आप के नाम का यश और कीर्ति निरंतर फैलती जा रही है, भक्तों की भी निरंतर वृद्धि हो रही है, किंतु…’’

‘‘किंतु क्या? शंका एवं समस्या क्या है?’’ महाराज बोले, ‘‘आप को इतनी बड़ी भूमिका बांधनी पड़ रही है.’’

‘‘इस वंश बेल को संभालने के लिए भी तो कोई चाहिए…यदि एक बेटा होता तो…आप तो जानते ही हैं कि कई बार लोग कैसे बेहूदे सवाल करते हैं. कहते हैं, यदि बेटा होने का कोई मंत्र या दवा होती तो महाराज का अब तक बेटा क्यों नहीं हुआ. महाराज, इस से पहले कि आप की छवि धूल में मिल जाए कुछ तो कीजिए. आप समझ रहे हैं न, मैं क्या कह रहा हूं.’’

महाराज निशब्द हो गए…जैसे किसी ने उन की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. बात सच भी थी. आखिर इतनी बड़ी संस्था को चलाने के लिए कोई तो अपना होना चाहिए था. महाराज की बेटे की चाहत में पहले से ही 3 बेटियां थीं और इस उम्र में बेटा पैदा करने का रिस्क वह लेना नहीं चाहते थे. महाराजजी देर तक शून्य में देखते रहे फिर कुछ सोच कर बोले, ‘‘सोचा तो मैं ने भी बहुत है पर अब क्या हो सकता है?’’

‘‘क्यों नहीं हो सकता, महाराज. आप की उम्र ही अभी क्या है. फिर पहले के ऋषिमुनि भी तो यही तरीका अपनाते थे.’’

‘‘कौन सा तरीका?’’ सबकुछ जानते हुए भी अनजान बन कर पूछा महाराजजी ने.

‘‘दूसरा विवाह. आप का काम भी हो जाएगा और लोगों का मुंह भी बंद हो जाएगा.’’

महाराज धीरे से मुसकराए. दूसरे विवाह की कल्पना मात्र से ही वह पुलकित हो उठे थे इसलिए खुल कर मना भी न कर सके.

बेटा न होने का सारा दोष महाराजजी ने अपनी पत्नी सावित्री के सिर मढ़ दिया था. यही नहीं, बेटा पाने की चाह में 2 बार सावित्री का वह गर्भपात भी करा चुके थे.

अब फिर शिष्यों के कहने पर उन की सोई चाहत फिर से बलवती हो उठी. एक तो बेटे की चाहत और उस से भी बड़ी खूबसूरत, छरहरी अल्प आयु की पत्नी पाना. महाराज का रोमरोम खिल उठा.

शिष्यों ने महाराज को कई सुंदर युवतियां दिखाईं और उन में से एक को महाराज ने पसंद कर लिया.

महाराज के शिष्य इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि यह विवाह उन की प्रतिष्ठा एवं चरित्र पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है. इसलिए वे कोई ठोस धरातल और उपयुक्त मौके की तलाश में थे और वह मौका उन्हें जल्द मिल गया.

शिष्यों ने पहले तो इस बात की चर्चा फैला दी कि एक शराबी पति ने अपनी पत्नी पर लांछन लगा कर उसे घर से निकाल दिया है. बेचारी अनाथ, बेसहारा लड़की अब महाराज की शरण में आ गई है. इस के अलावा वह गर्भवती भी है वरना तो उसे नारी निकेतन भेज देते.

पूर्वनियोजित ढंग से शिष्यों ने एक सभा के दौरान महाराज से पूछा कि अब इस स्त्री का भविष्य क्या है?

‘‘इस शरण में आई अबला का आप लोगों में से कोई हाथ थाम ले तो मैं समझूंगा कि मेरा कार्य सार्थक हो गया,’’ महाराज ने बेबस हो कर याचना की.

‘‘ऐसी स्त्री का कौन हाथ पकडे़गा. यदि यह गर्भवती न होती तो शायद कोई सोचता भी.’’

‘‘फिर मैं समझूंगा कि मेरी वाणी और विचारों का आप लोगों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. हमें पुरानी रूढि़यां तोड़ कर नए समाज का निर्माण तो करना ही है और हम वचनबद्ध भी हैं.’’

‘‘कहना बहुत सरल है, महाराज, पर कौन देगा ऐसी स्त्री को सहारा? क्या आप दे सकेंगे? भीड़ में से एक स्वर तेजी से उभरा.

सभा में खामोशी छा गई. कई सौ निगाहें उस व्यक्ति पर जा टिकीं.

उस ने फिर अपना प्रश्न दोहराया, ‘‘कहिए महाराज, आप चुप क्यों हैं?’’

‘‘हां, मैं इसे अपनाने के लिए तैयार हूं,’’ कह कर महाराज ने सब को हैरानी में डाल दिया.

चारों तरफ महाराज की जयजयकार होने लगी. महाराज ने देखा, सबकुछ वैसा ही हुआ जैसा उन्होंने चाहा था.

सावित्री को जब इस बात का पता चला तो वह बेहद नाराज हुई. घर में तनाव का वातावरण पैदा हो गया. पर महाराज ने इस ओर ध्यान न दे कर उस स्त्री को दूसरे आश्रम में स्थान दे दिया. सावित्री की नाराजगी को दूर करने के लिए महाराज ने एक दिन विशाल सभा में उस के त्याग और प्रेम की बेहद प्रशंसा की और बोले कि यदि सावित्री का साथ न होता तो शायद मैं कभी इस स्थान पर न पहुंचता. और उस दिन के बाद सावित्री को ‘गुरु मां’ का दरजा मिल गया.

समय चक्र तेजी से घूमने लगा. उधर गुरु मां स्थानस्थान पर सभाओं और समारोहों का उद्घाटन करने में व्यस्त रहने लगीं, इधर महाराजजी अपनी नई दुलहन सुनीता के साथ अति व्यस्त रहने लगे. एक दिन उन्हें यह जान कर बेहद खुशी हुई कि पत्नी सुनीता का पांव भारी है.

महाराजजी खुद सुनीता को ले कर एक प्राइवेट नर्सिंग होम में गए. डाक्टर साहब उन के शिष्य थे इसलिए व्यक्तिगत रूप से उस का चेकअप करने लगे. बात जब अल्ट्रासाउंड की आई तो डाक्टर साहब ने उन्हें डेढ़ माह बाद आने को कहा.

डेढ़ माह महाराजजी के लिए जैसे डेढ़ युग के बराबर गुजरा. निर्धारित दिन को महाराज अपनी लंबी विदेशी गाड़ी में खुद सुनीता को ले कर उसी डाक्टर के पास पहुंचे. अल्ट्रासाउंड के बाद महाराज और डाक्टर साहब दूसरे कमरे में चले गए. सुनीता बाहर बैठी थी, तभी उस का ध्यान अचानक अपनी चेन और कंगनों पर गया जो उस ने मशीन के पास उतारे थे. वह तेजी से भीतर गई तो उन दोनों की बातें सुन कर क्षण भर के लिए वहां रुक गई.

‘‘महाराज, यह बात तो आप भी जानते हैं कि लिंगभेद बताना गलत है फिर भी आप इतना आग्रह कर रहे हैं तो बता दूं कि आप के घर लक्ष्मी का प्रवेश हो रहा है.’’

‘‘ओह,’’ कहते हुए महाराज निढाल हो गए.

‘‘क्या हुआ, महाराज? सब ठीक तो है न,’’ डाक्टर साहब ने तुरंत खडे़ हो कर पूछा, ‘‘आप तो अंतर्यामी हैं. आप की भी यही कामना रही होगी.’’

‘‘अब क्या बताऊं आप को,’’ महाराज बेहद उदास स्वर में बोले, ‘‘मेरी पहले से ही 3 बेटियां हैं.’’

‘‘परंतु महाराज, आप तो लोगों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. कितने ही भक्तों ने आप के आशीर्वाद से पुत्र प्राप्त किए हैं और आप अपने लिए कुछ न कर पाए, यह मैं नहीं मानता,’’ डाक्टर ने अपनी शंका सामने रखी.

‘‘डाक्टर, यह तो आप भी जानते हैं कि मंत्रों, टोनेटोटकों से कुछ नहीं होता. इन से ही यदि पुत्र प्राप्त होते तो आज मेरे घर बेटियां न होतीं. मैं तो बस, विश्वास बनाए रखता हूं. कोई मनोरथ सिद्ध हो जाता है तो श्रेय मुझ को जाता है अन्यथा कर्मों का वास्ता दे कर मैं चुप हो जाता हूं.’’

डाक्टर साहब बड़ी हैरानी से यह सब बातें सुनते रहे. उन्हें महाराज का यह बदला हुआ रूप बड़ा अजीब लगा.

‘‘डाक्टर, इस कन्या के आने से मेरे घर में काफी रोष उत्पन्न हो जाएगा. आप इस का तत्काल अबार्शन कर दीजिए, नहीं तो भक्तों का मुझ पर से विश्वास ही उठ जाएगा.’’

‘‘यह क्या कह रहे हैं आप, महाराज. इस स्त्री का यह पहला बच्चा है और हम पहले बच्चे का गर्भपात नहीं करते. मैं तो कहूंगा कि…’’

‘‘आप अपनी राय अपने पास ही रखिए,’’ महाराज तिलमिला उठे, ‘‘मेरे पास तुम जैसे शिष्यों की कमी नहीं है. यह काम तो मैं कहीं भी करा लूंगा.’’

मरजावां फिल्म रिव्यू: जानें फिल्म में क्या है खास

रेटिंगः डेढ़ स्टार

निर्माताः निखिल अडवाणी, मेानिशा अडवाणी, मधु भोजवाणी, भूषण कुमार, किशन कुमार, दिव्या खोसला कुमार

लेखक व निर्देशकः मिलाप मिलन झवेरी

कलाकारः सिद्धार्थ मल्होत्रा,रितेश देशमुख, रकुल प्रीत सिंह, तारा सुतारिया, रवि किशन, शाद रंधावा.

अवधिः दो घंटे 16 मिनट

अस्सी व नब्बे के लार्जर देन लाइफ वाले सिनेमा के शौकीन रहे लेखक व निर्देशक मिलाप मिलन झवेरी ‘सत्यमेव जयते’के सफल होने के बाद लार्जर देन लाइफ कथानक वाली फिल्म ‘‘मरजावां’’ लेकर आए हैं, मगर वह एक दमदार मसाला फिल्म बनाने में बुरी तरह से असफल रहे हैं.

कहानीः

मुंबई में पानी के टैंकर माफिया अन्ना(नासर)ने गटर के पास पड़े एक लावारिस बच्चे रघु को अपनी छत्र छाया में पाल पोस कर उसे बड़ा किया.अब वही लड़का रघु (सिद्धार्थ मल्होत्रा)अन्ना के अपराध माफिया के तमाम काले कारनामों और खून-खराबे में अन्ना का दाहिना हाथ बना हुआ है.अन्ना के कहने पर रघु दशहरा के दिन एक दूसरे टैंकर माफिया गायतोंडे के बेटे को मार देता है.रघु,अन्ना के हर हुक्म की तामील हर कीमत पर करता है. इसी के चलते अन्ना उसे अपने बेटे से बढ़कर मानते हैं.मगर इस बात से अन्ना का अपना बेटा विष्णु (रितेश देशमुख) को रघु से नफरत है. शारीरिक तौर पर बौना होने के कारण विष्णु को लगता है कि अन्ना का असली वारिस होने के बावजूद सम्मान रघु को दिया जाता है.पूरी बस्ती रघु को चाहती है. बार डांसर आरजू (रकुल प्रीत) भी रघु की दीवानी है.रघु के खास तीन दोस्त हैं.पर जब नाटकीय तरीके से कश्मीर से आई गूंगी लड़की जोया(तारा सुतारिया) से रघु की मुलाकात होती है, तो उसमें बदलाव आने लगता है. जोया, रघु को एक वाद्ययंत्र देती है. फिर संगीत प्रेमी जोया, पुलिस अफसर रवि यादव (रवि किशन) के कहने पर रघु को अच्छाई के रास्ते पर बढ़ने के लिए प्रेरित करने लगती है.मगर विष्णु अपनी चाल चलता है,जिसमें फंसकर रघु को अपने प्यार जोया को अपने हाथों गोली मारनी पड़ती है और रघु जेल पहुंच जाता है. जोया के जाने के बाद जेल में रघु जिंदा लाश बनकर रह जाता है.जबकि  बस्ती पर विष्णु का जुल्म बढ़ता जाता है. अहम में चूर विष्णु, रघु को अपने हाथों मारने के लिए चाल चलता है और अदालत रघु को बाइज्जत बरी कर देती है. फिर कहानी में मोडत्र आता है. अंततःएक बारा फिर रावण दहन होता है.

लेखन व निर्देशनः

फिल्म ‘‘मरजावां’’ के प्रदर्शन से पहले मिलाप झवेरी ने खुद बताया था कि कहानी व पटकथा उन्होने ही लिखी थी,पर पहले इस फिल्म को कोई दूसरा निर्देशक निर्देशित करने वाला था,मगर पटकथा पढ़ने के बाद उस निर्देशक ने इस फिल्म से खुद को अलग कर लिया था,तब मिलाप झवेरी ने खुद ही इसके निर्देशन की जिम्मेदारी स्वीकार की. फिल्म देखने के समझ में आया कि पहले वाले निर्देशक ने इसे क्यों नहीं निर्देशित किया.कुछ दृश्यों को जोड़कर बेसिर पैर की कहानी का निर्देशन करने से अच्छा है,घर पर खाली बैठे रहे.प्यार-मोहब्बत, बदला, भावनाएं,मारधाड़,कुर्बानी आदि पर सैकड़ों फिल्में बन चुकी हैं.

सफल फिल्म ‘‘बाहुबली’’ के मार्केटिंग वाले संवाद‘बाहुबली को कटप्पा ने क्यो मारा’ की तर्ज पर  अपनी फिल्म ‘मरजावां’ में इंटरवल से पहले ही हीरो के हाथ हीरोईन को मरवा कर फिल्म को सफल बनाने का उनका प्रयास विफल नजर आ रहा है. अतिकमजोर पटकथा, उथले व अविश्वसनीय किरदारों के चलते फिल्म संभल नही पायी.पानी के माफिया टैंकर को तो अब मुंबई वासी भी भूल चुके हैं. मिलाप को यह भी नहीं पता कि पानी टैंकर माफिया के पास उस तरह की सशस्त्र सेना नही होती है, जैसी की विष्णु के पास है.फिल्म में रकुल प्रीत के किरदार आरजू को कोठेवाली बताया जा रहा है, पर वह बार डांस में नाचती नजर आती है. फिल्मकार को बार डांस व कोठे का अंतर ही नहीं पता? एक्शन के तमाम दृश्य अविश्वसनीय लगते हैं. व्हील चेअर पर बैठे शाद रंधावा एक भारी भरकम व छह फुट कद के इंसान को रामलीला मैदान से उठाकर ऐसा फेंकते हैं कि वह सीधे मस्जिद में जाकर गिरता है. फिल्म में इमोशन या रोमांस तो ठीक से उभरता ही नहीं.

अभिनयः

सिद्धार्थ मल्होत्रा बुरी तरह से निराश करते हैं. रितेश देशमुख ने जरुर अच्छा अभिनय किया है.तारा सुतारिया छोटे किरदार में भी अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रही हैं. रकुल प्रीत सिंह के हिस्से सुंदर दिखने के अलावा कुछ खास करने को रहा ही नही. रवि किशन की प्रतिभा को जाया किया गया.

मोतीचूर चकनाचूर फिल्म रिव्यू: पढ़ें यहां

रेटिंगः ढाई स्टार

निर्माताः राजेश भाटिया,किरण भाटिया और वायकौम 18

निर्देशकः देबामित्रा बिस्वास  

कलाकारः नवाजुद्दीन सिद्दिकी, आथिया शेट्टी,नवनी परिहार,विभा छिब्बर.

अवधिः दो घंटे 15 मिनट

दहेज कुप्रथा के साथ  वर्तमान पीढ़ी की लड़कियों की विदेशी दूल्हों संग शादी करने की बढ़ती महत्वाकांक्षा पर कटाक्ष करने के साथ साथ छोटे शहरों में रहने वाली कंुठाओं को हास्य व्यंग के साथ फिल्मकार देबामित्रा विस्वास ने फिल्म ‘‘मोतीचूर चकनाचूर’’में पेश करने का प्रयास किया है.मगर फिल्म कई जगह बहुत ढीली होकर रह गयी है.

कहानीः

          यह कहानी है बुंदेलखंड इलाके के निवासी परिवारों की, जो कि भोपाल में बसे हुए हैं. अवस्थी परिवार की बेटी एनी उर्फ अनीता (आथिया शेट्टी) से उसके माता इंदू (नवनी परिहार) व पिता बहुत परेशान हैं. एनी के सिर पर शादी करके विदेश में बसने का भूत सवार है. उसे ऐसे युवक से शादी करना है, जो कि लंदन, अमरीका या सिंगापुर सहित किसी देश में रह रहा हो. वह सोशल मीडिया पर अपने पति के साथ विदेशी धरती पर खींची गयी सेल्फी पोस्ट करना चाहती हैं. इसी के चलते ऐनी अब तक दस लड़कों को ठुकरा चुकी है.लंदन में रहने वाले लड़के के परिवार वालों को अपमानित करके भगा देती है, क्योंकि वह लड़का शादी के बाद पत्नी को अपने साथ लंदन नहीं ले जाएगा. तो वहीं अवस्थी परिवार के पड़ोस में त्यागी परिवार रहता है. जिसकी बड़ी बेटी हेमा से ऐनी की अच्छी दोस्ती है. दोनों परिवारों के बीच काफी आना जाना है. इस परिवार में दो बेटे व एक बेटी हैं. परिवार का बड़ा लड़का पुशपिंदर त्यागी (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) दुबई में नौकरी करता है. 36 साल की उम हो गयी, पर अब तक उसकी शादी नहीं हुई.पुशपिंदर की मां(विभा छिब्बर) को बेटे की शादी में दहेज 25 से तीस लाख रूप चाहिए. क्योंकि उनका बेटा दुबई मंे नौकरी करता है.बेटे की शादी मंे जो कुछ मिलेगा,वह सब वह बेटी हेमा की शादी में देना चाहती हैं. एक अति मोटी लड़की के साथ पुशंपिंदर शादी करने के लिए तैयार हो जाते हैं. क्योंकि अब उम्र के इस पड़ाव पर लड़की को लेकर उनकी कोई पसंद नहीं है.पर सगाई के बाद जैसे ही पुशपिंदर की मां दहेज की रकम बताती हैं, शादी टूट जाती है. इससे पुशंपिंदर बहुत दुःखी हो जाते हैं.

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उधर पुशपिंदर को देखकर ऐनी की मौसी (करूणा पांडे) उसे समझाती है कि पुशंपिंदर में एक अच्छा चरित्रवान व दुबई मे रहने वाला लड़का है. दुबई भी विदेश ही है. उसके बाद ऐनी बिना अपने माता पिता को बताए, पुशंपिंदर के सामने प्रेम का इजहार कर चुपचाप मंदिर में शादी कर लेती है,जिससे पुशपिंदर की मां विघ्न न डाल पाए.घर पहुंचने पर दोनों परिवार हक्के बक्के रह जाते हैं. बहरहाल, किसी तरह वह मान जाते हैं. पर समाज की नजरों में दोनो की पुनः रीतिरिवाज के साथ शादी होती है. मगर सुहागरात से पहले ही त्यागी परिवार के साथ ऐनी को भी पता चल जाता है कि पुशंपिंदर की दुबई की नौकरी छूट गयी है और उसे अब भोपाल में ही नौकरी मिल गयी है. फिर कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः पुशपिंदर की मां और ऐनी को भी बहुत कुछ समझ में आ जाता है.

लेखन व निर्देशनः

          कथानक के स्तर पर नवीनता न होते हुए भी फिल्म की प्रस्तुतिकरण कमाल की है.फिल्म में छोटे शहरों और संयुक्त परिवार के जीवन मूल्यों को बेहतरीन भी उकेरा गया है. फिल्म में ह्यूमर के साथ साथ दहेज व वैवाहिक जीवन को सफल बनाने सहित कई सामाजिक संदेश भी अच्छे ढंग से बिना भाषणबाजी के परोसे गए हैं. मगर इंटरवल तक फिल्म की गति काफी धीमी है. इंटरवल के बाद फिल्म तेज गति से दर्शकों को अपने साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास करती है, मगर यहां भी कुछ ज्यादा ही खींच दिया गया. क्लायमेक्स में नवाजुद्दीन सिद्दिकी और आथिया शेट्टी के बीच एक दूसरे से मिलने के उतावले पन के दृश्य को इस कदर खींचा गया कि दर्शक कह उठता है कि अब बस भी करो. फिल्म को एडीटिंग टेबल पर कसने की जरुरत थी.

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अभिनयः

          गंभीर किस्म की भूमिकां निभाने में महारत रखने वाले नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने इसमें हलकी फुलकी भूमिका में बेहतरीन अभिनय किया है. वह भावनात्मक दृश्यों में छा जाते हैं. आथिया शेट्टी ने ऐनी के किरदार में जान डाल दी है. पहली फिल्म ‘हीरो’ की असफलता का दंश झेल रही आथिया शेट्टी के करियर को इस फिल्म से नई गति मिलेगी. नवनी परिहार, विभा छिब्बर व करूणा पांडे ने भी ठीक ठाक अभिनय किया है.

आजकल की लड़कियां

आपने अक्सर सुना होगा कि प्रेमी प्रेमिका को खुश करने के लिए  कई तरह से महंगे गिफ्ट देता है,सोने की अंगूठी,चांदी की पायल,जाने क्या क्या! लेकिन इस मामले में अब चौंकाने वाली खबरें भी आ रही हैं . अब तो उल्टी गंगा भी बहने लगी है.  प्रेमी  की जगह अब प्रेमिका गिफ्ट  देती है और यही नहीं, प्रेमी  लड़के को आकर्षित करने के लिए  अपने ही घर में  सेंध लगा देती है  चोरी करने से भी बाज नहीं आती. ऐसा ही एक मामला छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के भनपुरी थाना क्षेत्र  में  घटित हुआ है. एक लड़की ने अपने बौयफ्रेंड  को खुश  करने की कोशिश कुछ इस तरह की,  की अपने ही घर में अपराध कर डाला… और यह क्राइम उसे इतना   भारी पड़ गया की उस पर पुलिस ने  अपराध  दर्ज कर लिया . दरअसल, नाबालिग लड़की अपने प्रेमी को उसके जन्मदिन पर एक बाइक गिफ्ट करना चाहती थी. मगर उसके पास पैसे नहीं थे. फिर लड़की ने अपने ही घर चोरी  की और पैसे युवक को दे दिए. जब प्रेमी को नाबालिग लड़की ने लगभग पौने दो लाख रुपए बाइक के लिए गिफ्ट दिए तब प्रेमी ने पूछा भी कि यह पैसे कहां से लाई हो तो उसने अपनी कसम देकर प्रेमी को रुपए थमा दिए और कहा इसके बारे में कुछ भी न पूछो. अजीबो गरीब अपराध और प्रेम की कहानी बिल्कुल सच्ची है.

ऐसे  हुआ  पुलिस  को लड़की  पर शक

घरवालों ने जब मामले की शिकायत पुलिस  मे की तो जांच शुरू हुई. भनपुरी पुलिस ने मामला  दर्ज होने के पश्चात  घर के प्रत्येक सदस्य  एवं नौकरों से  पूछताछ करनी प्रारंभ कर दी  लड़की से  नाबालिक होने के कारण  पूछताछ  अंतिम समय में की गई  जब पुलिस ने लड़की को तलब किया  तो वह  पसीना पसीना हो गई  तब जांच अधिकारी  रमाकांत साहू को  लड़की पर शक हुआ  उन्होंने  बड़े ही  पुलिसिया अंदाज में  लड़की से सच  कबूल करवा लिया.  लड़की ने  रोते हुए  पुलिस के सामने सारी सच्चाई बयां कर दी.जांच में पुलिस का शक नाबालिग लड़की सबसे  अंतिम समय  मे गया . पूछताछ में लड़की ने पुलिस के सामने अपना जुर्म कबूल कर लिया.  पुलिस ने आरोपी युवक को नगद  राशि के साथ गिरफ्तार कर लिया,  उससे भी पूछताछ की तो सारी सच्चाई आईने की तरह साफ हो गई. लड़की ने बताया कि वह  प्रेमी को खुश करना चाहती थी इसके लिए उसने घर में ही चोरी करने की योजना बना ली थी.

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अपने तरह का अजीबोगरीब मामला

राजधानी रायपुर के खमतराई थाना क्षेत्र के भनपुरी इलाके में हुए तकरीबन 1.73 लाख रुपए के चोरी के मामले का खुलासा पुलिस ने कर दिया है.

और यह बड़ा  खुलासा हो गया है कि प्रेमी को उसके जन्मदिन के मौके पर गिफ्ट देने के फेर  में नाबालिग लड़की ने अपने ही घर चोरी की थी. इन दिनों इस तरह की अनेक घटनाएं घटित हो रही है जो हमें चौकाती है और बताती है कि प्रेम  के इस नये रंग लडकियों  क्या  गुल  खिला  सकती है.

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कायाकल्प : भाग 2

अब सिर्फ अपने परिवारजनों की मौजूदगी में सुमित्रा ने अपने मनोभावों को शब्द देना जारी रखा, ‘‘समीर और रितु, तुम दोनों अपनी भाभी को इस पल से पूरा मानसम्मान दोगे. रीना के साथ तुम ने गलत व्यवहार किया तो उसे मैं अपना अपमान समझूंगी.’’

‘‘मम्मी, आप को मुझ से कोई शिकायत नहीं होगी,’’ रितु उठ कर रीना की बगल में आ बैठी और बड़े प्यार से भाभी का हाथ अपने हाथों में ले लिया.

‘‘मेरा दिमाग खराब नहीं है जो मैं किसी से बिना बात उलझूंगा,’’ समीर अचानक भड़क उठा.

‘‘बेटे, अगर तुम्हारा रवैया नहीं बदला तो रीना को साथ ले कर एक दिन मैं इस घर को छोड़ जाऊंगी.’’

सुमित्रा की इस धमकी का ऐसा प्रभाव हुआ कि समीर चुपचाप अपनी जगह सिर झुका कर बैठ गया.

‘‘सुमित्रा, तुम सब तरह की चिंताएं अपने मन से निकाल दो. रीना और पल्लवी के भविष्य को सुखद बनाने के लिए हम सब मिल कर सहयोग करेंगे,’’ राजेंद्रजी से ऐसा आश्वासन पा कर सुमित्रा धन्यवाद भाव से मुसकरा उठी थीं.

कमरे से जब सब चले गए तब सुमित्रा ने रीना से साफसाफ पूछा, ‘‘बहू, तुम्हें मेरे मुंह से निकली बातों पर क्या विश्वास नहीं हो रहा है?’’

‘‘आप ऐसा क्यों सोच रही हैं, मम्मी. आप लोगों के अलावा अब मेरा असली सहारा कौन बनेगा?’’ रीना का गला भर आया.

‘‘मैं तुम्हें कभी तंग नहीं करूंगी, बहू. बस, तुम यह घर छोड़ कर जाने का विचार अपने मन में कभी मत लाना, नहीं तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘नहीं, मम्मी. मैं आप के पास रहूंगी और आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’

‘‘देख, पल्लवी के नाम से मैं ने 1 लाख रुपए फिक्स्ड डिपोजिट करने का फैसला कर लिया है. आने वाले समय में यह रकम बढ़ कर उस की पढ़ाई और शादी के काम आएगी.’’

‘‘जी,’’ रीना की आंखों में खुशी की चमक उभरी.

‘‘सुनो बहू, एक बात और कहती हूं मैं,’’ सुमित्रा की आंखों में फिर से आंसू चमके और गला रुंधने सा लगा, ‘‘करीब 4 साल पहले तुम ने इस घर में दुलहन बन कर कदम रखा था और मैं वादा करती हूं कि उचित समय और उचित लड़का मिलने पर तुम्हें डोली में बिठा कर यहां से विदा भी कर दूंगी. जरूरत पड़ी तो पल्लवी अपने दादादादी के पास रहेगी और तुम अपनी नई घरगृहस्थी…’’

‘‘बस, मम्मीजी, और कुछ मत कहिए आप,’’ रीना ने उन के मुंह पर अपना हाथ रख दिया, ‘‘मुझे विश्वास हो गया है कि पल्लवी और मैं आप दोनों की छत्रछाया में यहां बिलकुल सुरक्षित हैं. मुझ में दूसरी शादी करने में जरा भी दिलचस्पी कभी पैदा नहीं होगी.’’

रीना अपने सासससुर के लिए जब चाय बनाने चली गई तो राजेंद्रजी ने सुमित्रा का माथा चूम कर उन की प्रशंसा की, ‘‘सुमि, आज जो मैं ने देखासुना है उस पर मुझे आश्चर्य हो रहा है, साथ ही गर्व भी कर रहा हूं. एक बात पूछूं?’’

‘‘पूछिए,’’ सुमित्रा ने पति के कंधे पर सिर टिकाते हुए कहा और आंखें मूंद लीं.

‘‘तुम्हारी सोच, तुम्हारा नजरिया… तुम्हारे दिल के भाव अचानक इस तरह कैसे बदल गए हैं?’’

‘‘आप मुझ में आए बदलाव का क्या कारण समझते हैं?’’ आंखें बंद किएकिए ही सुमित्रा बोलीं.

‘‘मुझे लगता है संजीव की असमय हुई मौत ने तुम्हें बदला है, पर फिर वैसा ही बदलाव मेरे अंदर क्यों नहीं आया?’’

‘‘संजीव इस दुनिया में नहीं रहा, ये जानने से पहले मुझे एक और जबरदस्त सदमा लगा था. क्या आप को उस की याद है?’’

‘‘हां, जो लड़का बुरी खबर लाया था वह संजीव का जूनियर था और तुम समझीं कि वह कोई मेरा छात्र है और मेरी न रहने की खबर लाया है.’’

‘‘दरअसल, गलत अंदाजा लगा कर मैं बेहोश हो गई थी. फिर मुझे धीरेधीरे होश आया तो मेरे मन ने काम करना शुरू किया.

‘‘सब से पहले असहाय और असुरक्षित हो जाने के भय ने मेरे दिलोदिमाग को जकड़ा था. मन में गहरी पीड़ा होने के बावजूद अपनी जिस जिम्मेदारी का मुझे ध्यान आया वह रितु की शादी का था.

‘‘कैसे पूरी करूंगी मैं यह जिम्मेदारी? मन में यह सवाल कौंधा तो जवाब में सब से पहले संजीव और रीना की शक्लें उभरी थीं. उन से मेरा लाख झगड़ा होता रहा हो पर मुसीबत के समय मन को उन्हीं दोनों की याद पहले आई थी,’’ अपने मन की बातों को सुमित्रा बड़े धीरेधीरे बोलते हुए पति के साथ बांट रही थीं.

राजेंद्रजी खामोश रह कर सुमित्रा के आगे बोलने का इंतजार करने लगे.

सुमित्रा ने पति की आंखों में देखते हुए भावुक लहजे में आगे कहा, ‘‘मेरे बहूबेटे मुसीबत में मेरा मजबूत सहारा बनेंगे, अगर मेरी यह उम्मीद भविष्य में पूरी न होती तो मेरा दिल उन दोनों को कितना कोसता.’’

एक पल रुक कर सुमित्रा फिर बोलीं, ‘‘असली विपदा का पहाड़ तो रीना के सिर पर टूटा था. मेरी ही तरह क्या उस ने भी उन लोगों का ध्यान नहीं किया होगा जो इस कठिन समय में उस के काम आएंगे?’’

‘‘जरूर आया होगा,’’ राजेंद्रजी बोले.

‘‘अगर उस ने हमें विश्वसनीय लोगों की सूची में नहीं रखा होगा तो यह हमारे लिए बड़े शर्म की बात है और अगर हमारे सहयोग और सहारे की उसे आशा है और हम उस की उम्मीदों पर खरे न उतरे तो क्या वह हमें नहीं कोसेगी?’’

‘‘तुम्हारे मनोभाव अब मेरी समझ में आ रहे हैं. तुम्हारे कायाकल्प का कारण मैं अब समझ सकता हूं,’’ राजेंद्रजी ने प्यार से पत्नी का माथा एक बार फिर चूमा.

‘‘हमारा बेटा संजीव अब बहू और पोती के रूप में अपना अस्तित्व बनाए हुए है और ये दोनों हमें कोसें ऐसा मैं कभी नहीं चाहूंगी. इन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए ही मैं ने अपने को बदल डाला है. कभी मैं राह से भटकूं तो आप मुझे टोक कर सही राह दिखा देना,’’ सुमित्रा ने अपने जीवनसाथी से हाथ जोड़ कर विनती की.

‘‘उस की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि तुम्हारा यह कायाकल्प दिल की गहराइयों से हुआ है.’’

अपने पति की आंखों में अपने लिए गहरे सम्मान, प्रशंसा व प्रेम के भावों को पढ़ कर सुमित्रा हौले से मुसकराईं.

9 टिप्स: ऐसे दूर करें स्किन पिग्मेंटेशन

हर महिला एक साफ और दमकती हुई त्वचा पाने की चाहत रखती है. लेकिन कभी-कभी स्‍किन पिग्मेंटेशन जैसी समस्या के कारण ऐसा नही हो पाता. स्‍किन पिग्मेंटेशन की वजह से आपके चेहरे की रौनक कहीं खो सी जाती है. अगर आप इस समस्या से परेशान हैं तो अपनाइए ये  खास टिप्स.

  1. विटामिन सी

कद्दूकस की गई गाजर में मुलतानी मिट्टी को डालकर उसका मिश्रण तैयार करें. अब इस मिश्रण में विटामिन सी की एक गोली पीसकर डालें. इसे पूरी तरह अपने चेहरे पर लगाएं, 20 मिनट के लिए रहने दें और फिर अपने चेहरे को पानी से धोलें. इसे हफ्ते में एक बार लगाएं.

2. दूध

4 चम्मच दूध के पाउड़र में थोड़ा सा हाइड्रोजन पेरोक्साइड़ को मिलाकर एक मिश्रण तैयार करें. अब इस में ग्लिसरीन मिलाकर इसे रंजित क्षेत्र पर लगाएं. इसे 15-20 मिनट के लिए रहने दें और फिर ठंड़े पानी से धोलें. हाइड्रोजन पेरोक्साइड़ और ग्लिसरीन किसी भी स्थानीय केमिस्ट की दुकान पर आसानी से मिल जाएंगी.

3. आलू

एक आलू छीलें और उसकी सतह पर थोड़ा सा पानी छिड़कें, उसे अपने काले धब्बों से भरी त्वचा पर रगड़ें. आलू का रस त्वचा के दाग, धब्बों को कम करने में मदद करता है.

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4. तुलसी के पत्‍ते

तुलसी के पत्तों को नींबू के रस के साथ मिलाकर अपनी रंजित त्वचा पर लगाएं, इससे आपकी त्वचा पर पड़े सारे काले धब्बें मिट जाएंगे.

5. दूध और पपीता

कच्चे दूध में कच्चा पपीता मिलाएं और इससे 10 मिनट के लिए अपने चेहरे की मालिश करें. यह मिश्रण चेहरे के धब्बों पर काफी असरदार साबित होगा.

6. छाछ

काले धब्बों को कम करने के लिए अपने चेहरे को छाछ के साथ धोएं.

7. चीनी

चीनी को जैतून के तेल में मिलाकर अपने शरीर पर रगड़ें. चीनी के पूरे घुलने तक अपने शरीर पर रगड़ें. इसे अपने हाथों, पैरों, गर्दन तथा शरीर के अन्य सांवले अंगों पर लगा सकते हैं.

8. शहद

1 चम्मच नींबू के रस में 1 चम्मच शहद और बादाम का तेल मिलाएं. एक दमकती हुई त्वचा पाने के लिए इस मिश्रण से 15 मिनट के लिए अपने चेहरे की मालिश करें.

9. खूब पानी पियें

ज्यादा पानी पिएं, पानी आपके शरीर में मौजूद विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है तथा आपको त्वचा से संबंधित सारी समस्याओं से मुक्त करता है.

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इसके अलावा आपको क्या करना चाहिए?

अपनी त्वचा को सूरज की तेज किरणों से बचाएं. हर रोज अपनी त्वचा पर न्यूनतम 30 एसपीएफ वाली सनस्क्रीन लगाएं. अगर आप बाहर खुले में घूम रहे हैं, तो हर तीन घंटे के बाद अपनी त्वचा पर सनस्क्रीन लगाएं. रात को नियमित रुप से अपनी त्वचा को साफ करें तथा ट्रैटिनाइन या कौजिक एसिड से युक्त क्रीमों का इस्तेमाल करें.

टूटे हुए रिश्ते में ऐसे जगाएं प्यार

दुनिया का सबसे खूबसूरत एहसास प्यार है. इस खूबसूरत एहसास से कोई भी व्यक्ती वंचित नहीं है. जिससे आप प्यार करते हैं उससे जुड़ी सारी चीज आपको अच्छी लगती है. और जब आप उस इंसान के साथ होते हैं तो जिंदगी और भी ज्यादा हसीन लगने लगती है. लेकिन ये जरूरी नहीं कि आपका प्यार हमेशा कायम रहे, रिश्ते में मनमुटाव होने के कारण आपके बीच का प्यार कम हो जाता है या रिश्ते टूट जाते है. ऐसे में आपको कुछ टिप्स बताते हैं, जिससे आप अपने टूटे हुए रिश्ते में फिर से प्यार को जगा सकते हैं.

कुछ नया करने की प्लानिंग करें

कुछ समय के लिए किसी के साथ रहने से आप इस हद तक ऊब सकते हैं कि आपके और आपके पार्टनर के बीच रूखापन आ सकता है. ऐसा कुछ करें, जिससे चीजों में बदलाव आए. एक्सपर्ट के अनुसार वे दंपत्ति, जो साथ मिलकर डांसिंग या हाइकिंग जैसे नई गतिविधियों के साथ वक्त बिताते हैं वह उन दंपत्ति की तुलना में ज्यादा खुश रहते हैं.

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साथ मिलकर हंसने का प्रयास करें

जैसा कि आप जानते हैं कि ऐसा जबरन नहीं किया जा सकता है लेकिन ऐसी चीजों को करने का प्रयास करें, जिससे आप दोनों को खुशी मिलें. एक्सपर्ट के अनुसार हंसना रिश्ते की गुणवत्ता और पार्टनर के बीच करीबी का संकेत देता है.

एक दूसरे की बातों को समझने का प्रयास करें

रिश्ते अक्सर आपके और आपके पार्टनर के बीच सहमति व आपसी समझ पर टिके होते हैं. अक्सर छोटी-छोटी बातों पर पति-पत्नी के बीच झगड़े होते हैं इसलिए अपने पार्टनर की बातों को समझने का प्रयास कीजिए की वह क्या कहना चाहते हैं. जब एक दूसरे की बातों को समझने लगेंगे तो झगड़े खुद ब खुद कम हो जाएंगे.

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चने की नई उन्नत किस्म से ऐसे फायदा पाएं

दलहनी फसलों में चने की खेती अपना खास स्थान रखती है. भारत दुनिया का सब से ज्यादा चना पैदा करने वाला देश है. चने की तकरीबन 70-75 फीसदी पैदावार हमारे देश में होती है. उत्तर से मध्य व दक्षिण भारत के राज्यों में चना रबी फसल के रूप में उगाया जाता है. चना उत्पादन की नई उन्नत तकनीक व उन्नतशील किस्मों का इस्तेमाल कर किसान चने का उत्पादन और भी बढ़ा सकते हैं.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, अखिल भारतीय समन्वित चना अनुसंधान परियोजना ने हाल ही में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची (झारखंड) में आयोजित अपने 24वें वार्षिक बैठक में जीनोमिक्स की मदद से विकसित चना की 2 बेहतर किस्मों ‘पूसा चिकपी -10216’ और ‘सुपर एनेगरी 1’ को जारी किया है, जो चने की दूसरी किस्मों से कहीं बेहतर है.

पूसा  चिकपी 10216

* चना की यह एक खास किस्म है. इसे डाक्टर भारद्वाज चेल्लापिला, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के नेतृत्व में चिकपी ब्रीडिंग ऐंड मोलेकुलर ब्रीडिंग टीम द्वारा डाक्टर वार्ष्णेय के. राजीव, इक्रिसैट के नेतृत्व वाली जीनोमिक्स टीम के सहयोग से विकसित किया गया है.

* इस किस्म को आणविक मार्करों की मदद से ‘पूसा 372’ की आनुवांशिक पृष्ठभूमि में आनुवांशिक ‘क्यूटीएल हौटस्पौट’ के बाद विकसित किया गया है.

* ‘पूसा 372’ देश के मध्य क्षेत्र, उत्तरपूर्व मैदानी इलाकों और उत्तरपश्चिम मैदानी इलाकों में उगाई जाने वाली चना की एक खास किस्म?है. इस का इस्तेमाल लंबे समय यानी देर से बोई जाने वाली स्थितियों के लिए राष्ट्रीय परीक्षणों में मापक (नियंत्रण किस्म) के रूप में किया जाता रहा?है. इस किस्म का विकास साल 1993 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा तैयार किया गया था. हालांकि इस का उत्पादन कम हो गया था.

* इस को प्रतिस्थापित करने के लिए साल 2014 में चना के ‘आईसीसी 4958’ किस्म में ‘सूखा सहिष्णुता’ के लिए पहचाने गए जीनयुक्त ‘क्यूटीएल हौटस्पौट’ को आणविक प्रजनन विधि से ‘पूसा 372’ के आनुवांशिक पृष्ठभूमि में डाल कर विकसित किया गया है.

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* नई किस्म की औसत पैदावार 1447 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर?है. भारत के मध्य क्षेत्र में नमी कम होने की स्थिति में यह किस्म ‘पूसा 372’ से तकरीबन 11.9 फीसदी ज्यादा पैदावार देती है.

* इस किस्म के पकने की औसत अवधि 110 दिन?है. दाने का रंग उत्कृष्ट होने के साथसाथ इस के 100 बीजों का वजन तकरीबन 22.2 ग्राम होता है.

* खास रोगों मसलन फुसैरियम विल्ट, सूखी जड़ सड़ांध और स्टंट के लिए यह किस्म मध्यम रूप से प्रतिरोधी है और इसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाकों में खेती के लिए चुना गया है.

डाक्टर भारद्वाज चेल्लापिला ने बताया है कि ‘पूसा चिकपी 10216’ भारत में चना की वाणिज्यिक खेती के लिए पहचानी जाने वाली खास सहिष्णुतायुक्त पहली आणविक प्रजनन किस्म बन गई है.

सुपर एनेगरी 1

* इस किस्म को कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, रायचूर (कर्नाटक) और इक्रिसैट के सहयोग से विकसित किया गया है.

* इस किस्म को चना के ‘डब्लूआर 315’ किस्म में फुसैरियम विल्ट रोग के लिए पहचाने गए प्रतिरोधी जीनों को आणविक प्रजनन विधि से कर्नाटक राज्य की प्रमुख चना किस्म एनेगरी 1 की आनुवांशिक पृष्ठभूमि में डाल कर विकसित किया गया है.

* इस किस्म की औसत पैदावार 1898 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है और यह एनेगरी किस्म से तकरीबन 7 फीसदी अधिक पैदावार देती है. साथ ही, दक्षिण भारत में उपज कम करने वाले कारक फुसैरियम विल्ट रोग के लिए बेहद प्रतिरोधी है.

* यह किस्म औसतन 95 से 110 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस के 100 बीजों का वजन तकरीबन 18 से 20 ग्राम तक होता है.

* इस किस्म को आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात में खेती के लिए चुना गया है.

उपयुक्त जलवायु

चने की खेती तकरीबन 78 फीसदी असिंचित इलाकों और 22 फीसदी सिंचित इलाकों में की जाती है. सर्दी में फसल होने के कारण चना की खेती कम बारिश वाले इलाकों और कम ठंडक वाले इलाकों में की जाती?है. फूल आने की दशा में यदि बरसात हो जाए तो फूल झड़ने के कारण फसल को बहुत नुकसान होता है.

चने के अंकुरण के लिए कुछ अधिक तापमान की जरूरत होती है, जबकि पौधों की सही बढ़वार के लिए आमतौर पर ठंडे मौसम की जरूरत होती?है.

उपयुक्त जमीन

चने की खेती बलुई से ले कर दोमट और मटियार मिट्टी में की जा सकती है. इस के अलावा चने की खेती के लिए भारी दोमट और मडुआ, पड़आ, कछारी जमीन, जहां पानी जमा न होता हो, वह भी ठीक मानी जाती है.

काबुली चने की खेती के लिए मटियार दोमट और काली मिट्टी, जिस में पानी की सही मात्रा धारण करने की कूवत होती है, उस में सफलतापूर्वक खेती की जाती?है. लेकिन जरूरी यह है कि पानी के भरने की समस्या न हो. जल निकासी का सही प्रबंध होना चाहिए.

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खेत की तैयारी

चने की खेती के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या डिस्क हैरो से करनी चाहिए. इस के बाद एक क्रास जुताई हैरो से कर के पाटा लगा कर जमीन समतल कर लें.

फसल को दीमक व कटवर्म के प्रकोप से बचाने के लिए आखिरी जुताई के समय उस की रोकथाम का पुख्ता इंतजाम करना चाहिए. जमीन की पैदावार कूवत बनाए रखने और फसल से अधिक पैदावार लेने के लिए फसल चक्र अपनाना चाहिए.

बोआई का उचित समय

उत्तर भारत के असिंचित इलाकों में चना की बोआई अक्तूबर माह के दूसरे पखवारे में करें और सिंचित इलाकों में नवंबर माह के पहले पखवारे में करनी चाहिए.

पछेती बोआई दिसंबर माह के पहले हफ्ते कर लेनी चाहिए. देश के मध्य भाग में अक्तूबर का पहला और दक्षिण राज्य में सितंबर के आखिरी हफ्ते से अक्तूबर का पहला सप्ताह चने की बोआई के लिए उचित है.

बीजोपचार : चने की खेती में कई तरह के कीट और रोगों से बचाव के लिए बीज को उपचारित कर के बोआई करनी चाहिए. बीज को उपचारित करते समय ध्यान रखें कि सब से पहले उसे फफूंदीनाशी, फिर कीटनाशी और आखिर में राइजोबियम कल्चर से उपचारित करें.

जड़ गलन व उकटा रोग की रोकथाम के लिए बीज को कार्बंडाजिम या मैंकोजेब या थाइरम की 1.5 से 2 ग्राम मात्रा द्वारा प्रति किलोग्राम बीज दर से उपचारित करें.

दीमक और दूसरे जमीनी कीटों की रोकथाम के लिए क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी या इंडोसल्फान 35 ईसी की 8 मिलीलिटर मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोआई करनी चाहिए.

बीजों को उपचारित कर के एक लिटर पानी में 250 ग्राम गुड़ को गरम कर के ठंडा होने पर उस में राइजोबियम कल्चर व फास्फोरस घुलनशील जीवाणु को अच्छी तरह मिला कर उस में बीज उपचारित करना चाहिए. उपचारित बीज को छाया में सुखा कर शीघ्र बोआई कर देनी चाहिए.

उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी जांच के मुताबिक करें तो ज्यादा अच्छा होगा. वैसे, सामान्य तौर पर 20-25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-60 किलोग्राम फास्फोरस, 20 किलोग्राम पोटाश और 20 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि असिंचित अवस्था में 2 फीसदी यूरिया या डीएपी का फसल पर छिड़काव करने से अच्छी पैदावार मिलती है.

सिंचाई प्रबंधन : चने की खेती मुख्यत: असिंचित अवस्था में की जाती?है, जहां पर सिंचाई के लिए सीमित पानी मुहैया हो, वहां फूल आने के पहले (बोआई के 50-60 दिन बाद) एक हलकी सिंचाई करें. सिंचित इलाकों में दूसरी सिंचाई फली बनते समय जरूर करें.

सिंचाई करते समय यह ध्यान दें कि खेत के किसी भी हिस्से में पानी जमा न होने दें, वरना फसल को नुकसान हो सकता है. फूल आने की स्थिति में सिंचाई नहीं करनी चाहिए.

खरपतवार पर नियंत्रण 

खरपतवार चने की खेती को 50 से 60 फीसदी तक नुकसान पहुंचाते?हैं इसलिए खरपतवार नियंत्रण जरूरी है.

खरपतवार नियंत्रण के लिए पैंडीमिथेलिन 30 ईसी को 3 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लिटर पानी में घोल कर बोआई के 48 घंटे के अंदर छिड़काव यंत्र द्वारा छिड़काव करना चाहिए. फसल में कम से कम 2 बार निराईगुड़ाई करें. पहली गुड़ाई फसल बोने के 35-40 दिन बाद और दूसरी गुड़ाई 50-60 दिनों बाद कर देनी चाहिए.

कीट नियंत्रण : चने की खेती में मुख्य रूप से फली?भेदक कीट का हमला ज्यादा होता है. देर से बोआई की जाने वाली फसलों में इस का प्रकोप अधिक होता है.

फली भेदक के नियंत्रण के लिए इंडोसकार्ब (2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) या स्पाइनोसैड (0.4 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) या इमामेक्टीन बेंजोएट (0.4 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) का छिड़काव करें. एनपीवी उपलब्ध होने पर इस का 250 लार्वा समतुल्य 400 से 500 लिटर पानी में घोल कर 2-3 बार छिड़काव कर सकते?हैं. इसी तरह 5 फीसदी नीम की निबौली के सत का प्रयोग भी इस के नियंत्रण के लिए कारगर है.

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रोग नियंत्रण : चने की खेती में मुख्य रूप से उकटा और शुष्क मूल विगलन रोग होता है. फसल को इन से बचाने के लिए बोआई से पहले बीज को फफूंदीनाशक जैसे 1.0 ग्राम बीटावेक्स और 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. जिन इलाकों में इन रोगों का अधिक प्रकोप हो, वहां पर उकटा और शुष्क मूल विगलन रोगरोधी किस्में बोएं.

इस के अलावा चने की फसल में कीट रोगों का भी प्रकोप होता है. इस का समयसमय पर खात्मा करना जरूरी है. चने की फसल में खासतौर से फली भेदक कीट का प्रकोप अधिक होता है जो शुरुआती दौर में पत्तियों को खाता है, बाद में फली बनने पर छेद बना कर उस में घुस जाता है और दानों को खोखला कर देता है.

इस के अलावा झुलसा रोग, उकटा रोग वगैरह फसल में आते?हैं जिन की समय से रोकथाम जरूरी?है और अपनी रोगग्रस्त फसल को कृषि विशेषज्ञ को दिखा कर कीट बीमारी पर काबू पाया जा सकता है.

पाले से बचाव : पाले से भी फसल को बहुत अधिक नुकसान होता है. पाला पड़ने की संभावना दिसंबर माह से जनवरी माह में अधिक होती है. पाले के प्रभाव से फसल को बचाने के लिए फसल में गंधक के तेजाब की 0.1 फीसदी मात्रा यानी एक लिटर गंधक के तेजाब को 1,000 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. पाला पड़ने की संभावना होने पर खेत के चारों ओर धुआं करना भी लाभदायक रहता है.

फसल की कटाई और गहाई : चने की फसल की पत्तियां व फलियां पीली व भूरे रंग की हो जाएं और पत्तियां गिरने लगें और दाने सख्त हो जाएं तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिए. काटी गई फसल जब अच्छी तरह सूख जाए, तो थ्रेशर द्वारा दाने को भूसे से अलग कर लेना चाहिए और पैदावार को सुखा कर भंडारित करना चाहिए.

काबुली चना की नई किस्म एसआर 10

हाल ही में काबुली चना की नई किस्म एसआर 10 विकसित की गई है. इस किस्म से 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार मिल सकेगी. इस किस्म के 100 दानों का वजन तकरीबन 50 ग्राम से अधिक होगा. इस की बोआई नवंबर के पहले हफ्ते में कर सकते?हैं. यह फसल मार्च तक पक कर तैयार हो जाती है.

राजस्थान में विकसित चना किस्म एसआर 10 का कृषक पौध अधिकार प्राधिकरण, नई दिल्ली द्वारा पंजीकृत किया गया है.

हरा चना की किस्म आरएसजी 991

किस्म आरएसजी 991 रोग प्रतिरोधी होने के साथ प्रसंस्करण के लिए भी बेहतर है. राजस्थान के झुंझुनूं, टोंक और राज्य के अन्य जिलों में इस किस्म को उगा कर किसान बाजार से अच्छी आमदनी ले रहे?हैं.

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसान मटर की तरह इस के हरे दानों को बेच सकते हैं. यह हरे चने की एक किस्म है. इस की कटाई के बाद हरे दानों का वैज्ञानिक विधि से भंडारण भी कर सकते?हैं. भंडारित उपज से समय के मुताबिक हरे छोले तैयार कर बाजार में बेच सकते?हैं. हरे छोले तैयार करने के लिए इन्हें रातभर पानी में भिगोना होता है और उस के बाद सुबह पानी निकाल कर इन को बाजार में बेचा जा सकता?है.

हरे चने की यह किस्म सिंचित और असिंचित दोनों ही इलाकों के लिए सही मानी गई है, जो 135 से 140 दिन में पक कर तैयार हो जाती है.

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