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बिहाइंड द बार्स : भाग 4

मृणालिनी स्नानागार से नहा-धोकर लौटी तो उसका संगमरमर सा तराशा जिस्म चमक मार रहा था. गुलाबी चेहरे पर गजब की आभा थी और बालों में पानी की बूंदे मोतियों की तरह चमक रही थीं. जेल की लाल पट्टी वाली सफेद साड़ी में भी उसकी जवानी नये ताजे गुलाब सी खिली नजर आती थी. उसके इस रूप-लावण्य पर जेल के कई अधिकारी मोहित थे. मृणालिनी को देखते ही उनकी लार टपकती थी. मगर उसकी ओर हाथ बढ़ाने की हिमाकत अभी तक कोई नहीं कर पाया था. कई तो उसकी दबंगई पर ही फिदा थे. उसकी गालियों को संत का प्रसाद समझते थे. लेकिन मृणालिनी को छेड़ दें, ऐसी हिम्मत किसी में नहीं थी. जेल में पहले ही दिन से मृणालिनी ने नाक पर मक्खी नहीं बैठने दी. उस पर क्या, उसकी बैरक के आसपास की किसी भी कैदी औरत पर अगर कोई अधिकारी बुरी नजर डालता था, तो वह खड़े-खड़े उसकी इज्जत की बखिया उधेड़ देती थी. मां-बहन की गालियों से ऐसा नवाजती थी कि फिर वह भागता ही नजर आता था. एक बार तो उसने पेशी के दौरान अदालत पहुंचने पर एक अधिकारी की शिकायत जज साहब से कर दी थी और उसकी शिकायत को जज ने गम्भीरता से लेते हुए अधिकारी पर कार्रवाई के आदेश दे डाले थे. मृणालिनी की शिकायत के चलते वह अधिकारी लंबे समय तक सस्पेंड रहा और विभागीय जांच का सामना करता रहा.

इस घटना से कैदियों के बीच मृणालिनी की इज्जत काफी बढ़ गयी थी. वह जेल की लेडी डॉन बन गयी थी. दरअसल देह की धंधे से लंबे समय तक जुड़ी रही मृणालिनी को पुरुषों की कामुक दृष्टि, उनकी लालसा, औरत को देखकर बदलने वाली उनकी गतिविधियां, हाव-भाव, बातें और इशारों की गहरी समझ थी. कोई पुरुष किसी स्त्री को किस दृष्टि से देख रहा है, वह उसके साथ किस हद तक फ्री होना चाहता है, वह हिम्मती है या डरपोक, अपनी इच्छा की पूर्ति कर पाएगा या नहीं, महिला उसकी ओर आकर्षित है या नहीं, यह तमाम बातें मृणालिनी पलक झपकते समझ जाती थी. जेल की किस महिला अधिकारी का टांका किस पुरुष अधिकारी से भिड़ा हुआ है, कौन सी कॉन्स्टेबल रात के अंधेरे में किस अधिकारी की अंकशायिनी बनती है, किस कैदी औरत की शारीरिक जरूरत संभाले नहीं संभल रही है, यह सब मृणालिनी की नजर से छिपता नहीं है.

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मृणालिनी को एक-एक कैदी औरत की हिस्ट्री मालूम है. बातों-बातों में वह इन औरतों से ऐसी बातें भी निकलवा लेती है जो पुलिस के डंडे नहीं निकलवा पाते. इसलिए इस जेल में मृणालिनी की धाक भी है.

हां, नोरा के प्रति मृणालिनी की सोच अन्य कैदियों से बिल्कुल अलग है. औरतों के स्वभाव और हरकतों के बारे में मृणालिनी का अनुभव नोरा के बारे में कुछ और राय कायम करता है. वह नोरा को अपराधी नहीं मानती है. नोरा जिस दिन से इस जेल में आयी है, मृणालिनी उसको पढ़ रही है. अपराधी औरतों के हावभाव ऐसे नहीं होते जैसे नोरा के हैं. नोरा सभ्रांत परिवार की सीधी और डरपोक लड़की लगती है. चुपचुप रहने वाली, रातों में आंसू बहानेवाली और भविष्य के प्रति एक आशंकित लड़की.

मृणालिनी जब औरतों की खरीद-फरोख्त का धंधा चलाती थी, तब उसके पास बरगला कर लायी गयी लड़कियां, खुद अपनी मर्जी से आने वाली लड़कियां, किडनैप करके लायी गयी लड़कियां, गांव-देहात की लड़कियां, शहर की चंचल लड़कियां,  नाबालिग बच्चियां और नेपाल से पैसा कमाने की लालसा में आने वाली लड़कियों की अच्छी खासी फौज होती थी, जिन्हें वे आॅर्डर्स पर बड़े-बड़े होटलों, क्लबों, फार्म हाउस या नेताओं-अधिकारियों की ऐशगाह में भेजा करती थी. यह तमाम लड़कियां स्वभाव और रहन-सहन में एक दूसरे से भिन्न होती थीं. भिन्न परिवेश, भिन्न आर्थिक और सामाजिक हालातों से आयी हुई होती थीं. कुछ को डरा-धमका कर, जोर-जबरदस्ती से धंधे पर लगाना होता था, तो बहुतेरी अपनी मर्जी से यह काम करना चाहती थीं. कुछ ऐसी थीं जो मृणालिनी के जरिए से बड़े ग्रहकों के पास जाना चाहती थीं. इन तमाम औरतों का मनोविज्ञान मृणालिनी भलीभांति समझती थी, लेकिन नोरा का मनोविज्ञान उन सभी से भिन्न था. जेल की अन्य कैदी औरतों से अलग थी वह. सात महीने पहले जब वह यहां आयी थी, तो बहुत टूटी हुई थी. बैरक के कोने में सिमटी-सिकुड़ी बैठी रहती थी. ज्यादातर खामोश रहती थी. ऐसा लगता था जैसे उसे कोई बड़ा आघात लगा था. कोई गहरा छल हुआ था उसके साथ.

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छल ही हुआ था. यह छल उसके अपने ने किया था. उसके फ्रेडरिक ने. जिसे उसने अपना सबकुछ समझा था. जिसे उसने अपनी आत्मा की गहराईयों से चाहा था, प्यार किया था. जिसके सिवा इस पूरी कायनात में नोरा को कोई भी नहीं था. उस फ्रेडरिक ने नोरा के साथ छल किया था.

हालांकि यह बात नोरा स्वीकार ही नहीं करना चाहती कि उसके फ्रेडरिक ने उससे छल किया है. लेकिन मृणालिनी ने जब से उसकी जिन्दगी की कहानी सुनी तब से वह एक बात कहती थी कि तुझे तेरे पति ने ही धोखा दिया है. अब तू माने या न माने, वह तुझे इस जेल से निकलवाने कभी नहीं आएगा. और नोरा इस इंतजार में थी कि एक दिन वह जरूर आएगा. हाय रे मोहब्बत….

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अग्निपरीक्षा : भाग 1

स्मिता की जिंदगी में प्यार की कमी को पूरा किया था राज ने. यही वजह थी कि भुवन से विवाह के बाद राज का साथ पा कर जज्बातों में बह गई थी. लेकिन ऐसी गलती कर के स्मिता का मन बारबार उसे कचोट रहा था.

स्मिता आज बहुत उदास थी. उस की पड़ोसिन कम्मो ने आज फिर उसे टोका था, ‘‘स्मिता, यह जो राज बाबू तुम्हारे घर रोजरोज आते हैं और तुम्हारे पास बैठ कर रात के 12-1 बजे घर जाते हैं, पड़ोस में इस बात की बहुत चर्चा हो रही है. कल रात सामने वाले वालियाजी इन से पूछ रहे थे, ‘यह स्मिता के घर रोज रात को जो आदमी आता है, उस का स्मिता से क्या रिश्ता है? अकेली औरत के पास वह 2-3 घंटे क्यों आ कर बैठता है? स्मिता उसे अपने घर रात में क्यों आने देती है? क्या उसे इतनी भी समझ नहीं कि पति की गैरहाजिरी में अकेले मर्द के साथ रात के 12 बजे तक बैठना गलत है.’ ’’

कम्मो के मुंह से यह सब सुन कर स्मिता का चेहरा उतर गया था. उफ, यह पासपड़ोस वाले, किसी के घर में कौन आताजाता है, सारी खोजखबर रखते हैं. उन्हें क्या मतलब अगर कोई उस के घर में आता भी है तो. क्या ये पासपड़ोस वाले उस का अकेलापन बांट सकते हैं? वे क्या जानें कि बिना एक मर्द के एक अकेली औरत कैसे अपने दिन और रात काटती है? फिर राज क्या उस के लिए पराया है? एक वक्त था जब राज के बिना जिंदगी काटना उस के लिए कल्पना हुआ करती थी और यह सब सोचतेसोचते स्मिता कब बीते दिनों की भूलभुलैया में उतर आई, उसे एहसास तक नहीं हुआ था.

स्मिता की मां बचपन में ही चल बसी थी. उस के बड़े भाई उसे पिता के पास से अपने घर ले आए थे. तब वह 7 साल की थी और तभी से वह भाईभाभी के घर रह कर पली थी. भैयाभाभी के 2 बच्चे थे और वे अपने दोनों बच्चों को बहुत लाड़दुलार करते थे. उन के मुंह से निकली हर बात पूरी करते लेकिन स्मिता की हमेशा उपेक्षा करते. भाभी स्मिता के साथ दुर्व्यवहार तो नहीं करतीं, लेकिन कोई बहुत अच्छा व्यवहार भी नहीं करतीं. उन को यह एहसास न था कि स्मिता एक बिन मां की बच्ची है. इसलिए उसे भी लाड़प्यार की जरूरत है.

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भाई भी स्मिता का कोई खास खयाल न रखते. भाई के बेटाबेटी स्मिता की ही उम्र के थे. अकसर कोई विवाद उठने पर भाईभाभी स्मिता की अवमानना कर अपने बच्चों का पक्ष ले बैठते. इस तरह निरंतर उपेक्षा और अवमानना भरा व्यवहार पा कर स्मिता बहुत अंतर्मुखी बन गई थी तथा उस में भावनात्मक असुरक्षा घर कर गई थी.

राज भाभी का भाई था जो अकसर बहन के घर आया करता. उसे शुरू से सांवलीसलोनी, अपनेआप में सिमटी, सकुचाई स्मिता बहुत अच्छी लगती थी और वह जितने दिन बहन के घर रहता, स्मिता के इर्दगिर्द बना रहता. उस की स्मिता से खूब पटती तथा अकसर वे दुनिया जहान की बातें किया करते.

स्मिता को जब भी कोई परेशानी होती वह राज के पास भागीभागी जाती और राज उसे उस की परेशानी का हल बताता. वक्त बीतने के साथ स्मिता व राज की मासूम दोस्ती प्यार में बदल गई थी तथा वे कब एकदूसरे को शिद्दत से चाहने लगे थे, वे खुद जान न पाए थे.

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लगभग 3 साल तक तो उन के प्यार की खबर स्मिता के भैयाभाभी को नहीं लग पाई और वे गुपचुप प्यार की पेंग बढ़ाते रहे थे. अकसर वे अपने हसीन वैवाहिक जीवन की रूपरेखा बनाया करते. लेकिन न जाने कब और कैसे उन की गुपचुप मोहब्बत का खुलासा हो गया और भैयाभाभी ने राज के स्मिता से मिलने पर कड़ी पाबंदी लगा दी थी और स्मिता के लिए लड़का ढूंढ़ना शुरू कर दिया.

राज और स्मिता ने भैयाभाभी से लाख मिन्नतें कीं, उन की खुशामद की कि उन का साथ बहुत पुराना है, उन को एकदूसरे के साथ की आदत पड़ गई है और वे एकदूसरे के बिना जिंदगी काटने की कल्पना तक नहीं कर सकते, लेकिन इस का कोई अनुकूल असर भाई व भाभी पर नहीं पड़ा.

स्मिता की भाभी का परिवार शहर का जानामाना खानदानी रुतबे वाला अमीर परिवार था तथा भाभी सुरभि के मातापिता को राज के विवाह में अच्छे दानदहेज की उम्मीद थी. इसलिए उन्होंने सुरभि से साफ कह दिया था कि वे राज की शादी स्मिता से किसी हालत में नहीं करेंगे. इसलिए उन्हें स्मिता का विवाह जल्दी से जल्दी कोई सही लड़का ढूंढ़ कर कर देना चाहिए.

राज के मातापिता ने राज से साफ कह दिया था कि यदि उस ने स्मिता से अपनेआप शादी की तो वे उस को घर के कपड़े के पुराने व्यापार से बेदखल कर देंगे और उस से कोई संबंध भी नहीं रखेंगे. राज के परिवार की शहर के मुख्य बाजार में कपड़ों की 2 मशहूर दुकानें थीं. राज महज 12वीं पास युवक था और अगर वह मातापिता की इच्छा के विरुद्ध स्मिता से शादी करता तो कपड़ों की दुकान में हिस्सेदारी से बाहर हो जाता.

इधर स्मिता के भैयाभाभी ने उस से साफ कह दिया था कि अगर उस ने अपनेआप शादी की तो वह न तो उस की शादी में एक फूटी कौड़ी लगाएंगे, न ही शादी में शामिल होंगे. इस तरह राज और स्मिता ने देखा था कि यदि वे घर वालों की इच्छा के विरुद्ध शादी कर लेते हैं तो उन का भविष्य अंधकारमय होगा.

स्मिता के पास भी कोई ऐसी शैक्षणिक योग्यता नहीं थी जिस के सहारे वह अपने परिवार का खर्च उठा पाती. अत: बहुत सोचसमझ कर वह दोनों अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि उन्हें अपने प्यार का गला घोंटना पड़ेगा तथा अपने रास्ते जुदा करने पड़ेंगे. उन के सामने बस, यही एक रास्ता था.

सुरभि स्मिता के लिए जोरशोर से लड़का ढूंढ़ने में लगी हुई थी. आखिरकार सुरभि की मेहनत रंग लाई. उसे स्मिता के लिए एक योग्य लड़का मिल गया था. लड़के का अपना स्वतंत्र जूट का व्यवसाय था तथा वह अच्छा कमा खा रहा था. लड़के का नाम भुवन था तथा उस ने पहली ही बार में स्मिता को देख कर पसंद कर लिया था. उन की शादी की तारीख 1 माह बाद ही निश्चित हुई थी.

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शादी तय होने के बाद जब स्मिता राज से मिली तो उस के कंधों पर सिर रख कर फूटफूट कर रोई थी. उस ने राज से कहा था, ‘राज, 15 तारीख को तुम्हारी स्मिता पराई हो जाएगी. किसी गैर को मैं अपनेआप को कैसे सौंपूंगी? नहीं राज नहीं, मैं यह शादी हर्गिज नहीं करूंगी.’

CHRISTMAS 2019 : अनूठा क्रिसमस केक

क्रिसमस की याद आते ही क्रिसमस केक की याद आती है. क्रिसमस केक का स्पेशल केक तीन माह पहले बनना शुरू हो जाता है. लखनऊ के होटल हयात रेजेंसी में ‘क्रिसमस केक मेकिंग सेरेमनी’ और ‘क्यूलिनेरी चैलेंज’ का आयोजन किया गया. इसमें स्वंयसेवी संस्था, एनजीओ में पढ़ाई कर रहे बच्चों और लखनऊ के कुछ समाजसेवियों को भी शामिल किया गया. हयात रेजेंसी होटल के डायरेक्टर फूड एंड वेज, वाल्टर परेरा ने कहा कि हयात होटल ने अपने क्रिसमस के अतिथियों को क्रिसमस के दिन स्पेशल केक खिलाने के लिये तैयारी शुरू कर दी है. यह केक रम, फलों के रस, गरम मसालों, मेवा, बादाम, चैरी, डायफ्रूटस, किशमिश को मिलाकर तैयार होता है.

how to prepare christmas cake

होटल हयात रेजेंसी के जनरल मेनेजर कुमार शोभन ने बताया कि हम लोगों की पंसद की डिश उनके सहयोग से ही तैयार करने में यकीन रखते हैं. इसके लिये ऐसे आयोजन होते हैं जिनसे यह पता चल सके कि लोग किस तरह के खाने में यकीन रखते हैं. खाने में अपनी पंसद का खाना हमारा अधिकार होता है.

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हम अपने स्पेशल कार्यक्रमों के जरीये समाज के हर वर्ग को आपस में जोड़ना चाहते हैं. जिसकी वजह से एनजीओ के जरीये हमने गरीब वर्ग के बच्चों को इसमें शामिल किया.

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3 माह पहले से केक तैयार करने के लिये रम, फलों का रस, गरम मसाले, मेवा, बादाम, चैरी, डायफ्रूटस, किशमिश को मिलाकर रख दिया जाता है. इसके बाद क्रिसमस के समय इसको तैयार किया जायेगा. इतने समय मिक्स करके रखने से केक बहुत स्वादिष्ठ हो जाता है. प्लम केक की खासियत इसका अलग स्वाद ही होता है.

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न करें रिश्ते में ये 4 गलतियां

जब आप अपने रिश्ते को लेकर सिरियस नहीं रहती हैं तो आप कुछ ऐसी गलतियां कर बैठती हैं जिसके कारण आपका रिश्ता टूट भी सकता है. लेकिन अगर आप अपने रिश्ते को लेकर गंभीर हैं तो अपने साथी की भावनाओं के बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है.

अगर आपका साथी आपको शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान कर रहा है तो आपको उस रिश्ते से बाहर आने की जरूरत है और ये भी समझने की जरूरत है कि आप एक गलत रिश्ते में फंसे हुए हैं.

  1. तरह तरह के सवाल करना

हर चीज में अगर आपका पार्टनर आपसे सवाल करता है तो इसका मतलब ये है कि उसे आप पर भरोसा नहीं है. किसी भी रिश्ते में प्यार के साथ-साथ भरोसे की भी जरूरत होती है. इसलिए अगर आपका पार्टनर आपके हर एक कदम पर सवाल उठाता है तो आपकी उस रिश्ते को खत्म कर देने में ही भलाई है क्योंकि ऐसे में वह आपके रिश्ते को खोखला कर देगा.

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2. भावनाओं की कद्र न करना

अगर आपका साथी हमेशा ये कहकर आपकी भावनाओं को अनदेखा कर देता है कि आप बहुत संवेदनशील हैं तो इसका मतलब साफ है कि उसे आपकी भावनाओं की कद्र नहीं है, और जिस रिश्ते में आपकी भावनाओं की कद्र नहीं है, वैसे रिश्ते में होने से अच्छा है कि उस रिश्ते को खत्म कर दें.

3. बातें छुपाना

अगर आपका पार्टनर आपसे बातें छुपाने लगा है तो आपको अपने रिश्ते को लेकर फिर से सोचने की जरूरत है, क्योंकि जहां झूठ होता है वहां प्यार नहीं होता है. अगर आप अपने पार्टनर को सच नहीं बता सकते हैं तो आपको अपने रिश्ते को खत्म कर देना चाहिए. ऐसा होना आपको ये संकेत दे रहा है कि आप एक गलत रिश्ते में फंसे हुए हैं जो आपके रिश्ते को भी धीरे-धीरे कमजोर कर रहा है.

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4. हर काम में गलती निकालना

अगर आपका साथी आपकी हर समय आपकी निंदा करता रहता है और आपको नीचा दिखाते रहता है तो आप एक गलत रिश्ते में हैं, क्योंकि अगर वो आपकी इज्जत नहीं कर सकता है तो आपसे प्यार भी नहीं कर सकता है. जब भी आप दोनों के बीच कोई परेशानी हो तो हमेशा आपकी ही गलती गिनवाए तो आपको उस रिश्ते से बाहर निकलने की जरूरत है.

औरों से आगे : भाग 1

यों सिद्धांत रूप में तो अम्मां अंतर्जातीय विवाह के विरुद्ध नहीं थीं परंतु जब अपने घर में ऐसे विवाहों की बात उठी तो पूर्वाग्रहों से ग्रस्त वह सहर्ष अपनी स्वीकृति देने में हिचकिचा रही थीं.

‘‘अंतर्जातीय विवाहों से हमारे आचारविचार में छिपी संकीर्णता खत्म हो जाती है. अंधविश्वासों व दकियानूसीपन के अंधेरे से ऊपर उठ कर हम एक खुलेपन का अनुभव करते हैं. विभिन्न प्रांतों की संस्कृति तथा सभ्यता को अपनाकर भारतीय एकता को बढ़ावा देते हैं…’’ अम्मां किसी से कह रही थीं.

मैं और छोटी भाभी कमरे से निकल रहे थे. जैसे ही बाहर बरामदे में आए तो देखा कि अम्मां किसी महिला से बतिया रही हैं. सुन कर एकाएक विश्वास होना कठिन हो गया. कल रात ही तो अम्मां बड़े भैया पर किस कदर बरस रही थीं, ‘‘तुम लोगों ने तो हमारी नाक ही काट दी. सारी की सारी बेटियां विजातियों में ब्याह रहे हो. तुम्हारे बाबूजी जिंदा होते तो क्या कभी ऐसा होता. उन्होंने वैश्य समाज के लिए कितना कुछ किया, उन की हर परंपरा निभाई. सब बेटाबेटी कुलीन वैश्य परिवारों में ब्याहे गए. बस, तुम लोगों को जो अंगरेजी स्कूल में पढ़ाया, उसी का नतीजा आज सामने है.

‘‘अभी तक तो फिर भी गनीमत है. पर तुम्हारे बेटेबेटियों को तो वैश्य नाम से ही चिढ़ हो रही है. बेटियां तो परजाति में ब्याही ही गईं, अब बेटे भी जाति की बेटी नहीं लाएंगे, यह तो अभी से दिखाई दे रहा है.’’

बड़े भैया ने साहस कर बीच में ही पूछ लिया था, ‘‘तो क्या अम्मां, तुम्हें अपने दामाद पसंद नहीं हैं?’’

‘‘अरे, यह…यह मैं ने कब कहा. मेरे दामाद तो हीरा हैं. अम्मांअम्मां कहते नहीं थकते?हैं, मानो इसी घर के बेटे हों.’’

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‘‘तो फिर शिकायत किस बात की. यही न कि वह वैश्य नहीं हैं?’’

2 मिनट चुप रह कर अम्मां बोलीं, ‘‘सो तो है. पर ब्राह्मण हैं, बस, इसी बात से सब्र है.’’

‘‘अगर ब्राह्मण की जगह कायस्थ होते तो?’’

‘‘न बाबा न, ऐसी बातें मत करो. कायस्थ तो मांसमछली खाते हैं.’’

धीरेधीरे घर के अन्य सदस्य भी वहां जमा होने लगे थे. ऐसी बहस में सब को अपनाअपना मत रखने का अवसर जो मिलता था.

‘‘क्या मांसमछली खाने वाले आदमी नहीं होते?’’ छोटे भैया के बेटे राकेश ने पूछा.

अम्मां जैसे उत्तर देतेदेते निरुत्तर होने लगीं. शायद इसीलिए उन का आखिरी अस्त्र चल गया, ‘‘मुझ से व्यर्थ की बहस मत किया करो. तुम लोगों को न बड़ों का अदब, न उन के विचारों का आदर. चार अक्षर अंगरेजी के क्या पढ़ लिए कि अपनी जाति ही भूलने लगे.’’

ऐसे अवसरों पर मझले भैया की बेटी स्मिता सब से ज्यादा कुछ कहने को उतावली दिखती थी, जो समाजशास्त्र की छात्रा थी. आखिर वह समाज के विभिन्न वर्गों को भिन्नभिन्न नजरिए से देखसमझ रही थी.

भैया भले ही कम डरते थे, पर भाभियां तो अपनेअपने बेटेबेटियों को आंखों के इशारों से तुरंत वहां से हटा कर दूसरे कामों में लगा देने को उतारू हो जाती थीं. जानती?थीं कि आखिर में उन्हें ही अम्मां की उस नाराजगी का सामना करना पड़ेगा. भाभियों के डर को भांपते हुए मैं ने सोचा, ‘आज मैं ही कुछ बोल कर देखूं.’

‘‘अम्मां, यह तो कोई बात न हुई कि उत्तर देते न बन पड़ा तो आप ने कह दिया, ‘व्यर्थ की बहस मत करो.’ राकेश ने तो सिर्फ यही जानना चाहा है कि क्या मांसमछली खाने वाले भले आदमी नहीं होते?’’

अम्मां हारने वाली नहीं थीं. उन्हें हर बात को अपने ही ढंग से प्रस्तुत करना आता था. हारी हुई लड़ाई जीतने की कला में माहिर अम्मां ने झट बात बदल दी, ‘‘अरे, दुनिया में कुछ भी हो, मुझे तो अपने घर से लेनादेना है. मेरे घर में यह अधर्म न हो, बस.’’

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मेरा समर्थन पा कर राकेश फिर पूछ बैठा, ‘‘अम्मां, जो लोग मांसमछली खाते हैं, उन्हें आप वैश्य नहीं मानतीं. यदि कोई दूसरी जाति का आदमी वैश्य जैसा रहे तो आप उसे क्या वैश्य मान लेंगी?’’

‘‘फिर वही बहस. कह दिया, हम वैश्य हैं.’’

कमरे में बैठी अपने स्कूल का पाठ याद करती रीना दीदी की 6 वर्षीय बेटी बोल उठी, ‘‘नहीं, नानीजी, हम लोग हिंदुस्तानी हैं.’’

अम्मां ने उसे पास खींच कर पुचकारा. फिर बोलीं, ‘‘हां बेटा, हम हिंदुस्तानी हैं.’’

अम्मां को समझ पाना बहुत कठिन था. कभी तो लगता था कि अम्मां जमाने के साथ जिस रफ्तार से कदम मिला कर चल रही हैं वह उन की स्कूली शिक्षा न होने के बावजूद उन्हें अनपढ़ की श्रेणी में नहीं रखता. औरों से कहीं आगे, समय के साथ बदलतीं, नए विचारों को अपनातीं, नई परंपराओं को बढ़ावा देतीं, अगली पीढ़ी के साथ ऐसे घुलमिल जातीं मानो वह उन्हीं के बीच पलीबढ़ी हों.

लेकिन कभीकभी जब वह अपने जमाने की आस्थाओं की वकालत कर के उन्हें मान्यता देतीं, अतीत की सीढि़यां उतर कर 50 वर्ष पीछे की कोठरी का दरवाजा खोल देतीं और रूढि़वादिता व अंधविश्वास की चादर ओढ़ कर बैठ जातीं तो हम सब के लिए एक समस्या सी बन जाती. शायद हर मनुष्य दोहरे व्यक्तित्व का स्वामी होता है या संभवत: अंदर व बाहर का जीवन अलगअलग ढंग से जीता है.

पिताजी उत्तर प्रदेश के थे और इलाहाबाद शहर में जन्मे व पलेबढ़े थे. बाद में नौकरी के सिलसिले में उन्होंने अनेक बार देशविदेश के चक्कर लगाए थे. कई बार अम्मां को भी साथ ले गए. लिहाजा, अम्मां ने दुनिया देखी. बहुत कुछ सीखा, जाना और अपनी उम्र की अन्य महिलाओं से ज्ञानविज्ञान व आचारविचारों में कहीं आगे हो गईं.

पिताजी विदेशी कंपनी में काम करते थे. ऊंचा पद, मानमर्यादा और हर प्रकार से सुखीसंपन्न, उच्चविचारों व खुले संस्कारों के स्वामी थे. अम्मां उन की सच्ची जीवनसंगिनी थीं.

वर्षों पहले हमारे परिवार में परदा प्रथा समाप्त हो गई थी. स्त्रीपुरुष सब साथ बैठ कर भोजन करते थे. यह सामान्य सी बात थी, पर 35-40 वर्ष पूर्व यह हमारे परिवार की अपनी विशेषता थी, जिसे कहने में गर्व महसूस होता था. हमें लगता था कि हमारी मां औरों से आगे हैं, ज्यादा समझदार हैं. परदा नहीं था, पर इस का तात्पर्य यह नहीं था कि आदर व स्नेह में कमी आ जाए.

भाभियों को घूमनेफिरने की पूरी स्वतंत्रता थी. यहां तक कि उन का क्लब के नाटकों में भाग लेना भी मातापिता को स्वीकार था.

इतना सब होते हुए भी अपने समाज के प्रति पिताजी कुछ ज्यादा ही निष्ठावान थे. ऐसा नहीं था कि वह देश या अन्य जातियों के प्रति उदासीन थे, पर शादीब्याह के मामले में उन्हें अंतर्जातीय विवाह उचित नहीं लगे. हम सब को भी उन्हीं के विचारों के फलस्वरूप अपने समाज के प्रति आस्था जैसे विरासत में मिली थी. शायद अम्मां ने तो कभी अपना विचार या अपना मत जानने की कोशिश नहीं की.

समय के साथ सभी मान्यताएं बदल रही थीं. फिर भी मेरा मन मानता था, ‘यदि आज पिताजी जिंदा होते तो शायद उन की पोतियां स्वयं वर चुन कर गैरजाति में न ब्याही जातीं.’ लेकिन यह भी लगता?था, ‘यदि उन्हें दुख होता तो यह उन की संकीर्णता का द्योतक होता है,’ और हो सकता है, जिस रफ्तार से वह समय के साथसाथ चले और समय के साथसाथ बदलने की वकालत करते रहे थे, शायद ऐसे विवाहों को सहर्ष स्वीकर कर लेते. आज वह नहीं हैं. अम्मां का अपना मत क्या है, वह स्वयं नहीं जानतीं. जो हो रहा?है, उन्हें कहीं अनुचित नहीं लग रहा. परंतु पिताजी का खयाल आते ही इन विवाहों को ले कर उन का मन कहीं कड़वा सा हो जाता है.

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प्रतिक्रियास्वरूप उन के अंतर्मन का कहीं कोई कोना उन्हें कचोटने लगता है. शायद वह उन की अपनी प्रतिक्रिया भी नहीं है, बल्कि पिताजी के विचारों के समर्थन का भावनात्मक रूप है. 5-6 बरस पहले कनु का सादा सा ब्याह और अब रिंकू के ब्याह का उत्सव कैसा विपरीत दृश्य था. कनु ने जब कहा था, ‘‘मैं सहपाठी राघवन से ब्याह करूंगी और वह भी अदालत में जा कर.’’ अम्मां सन्न रह गई थीं. जब उन का मौन टूटा तो मुंह से पहला वाक्य यही निकला?था, ‘‘आज तुम्हारे पिताजी जिंदा होते तो क्या घर में ऐसा होता? उन्हें बहुत दुख होता. जमाने की हवा है. मैं तो तभी जान गई थी जब तुम ने इसे बाहर पढ़ने भेजा. लड़कियों की अधिक स्वतंत्रता अच्छी नहीं.’’ यह अम्मां की विशेषता थी कि उन्हें हर बात पहले से ही पता रहती थी. पर वह घटना घटने के बाद ही कहती थीं. अम्मां ही क्या, कई लोग इस में माहिर होते हैं. अम्मां के प्रतिकूल रवैए से बड़े भैया का मन भी अशांत हो उठा था. किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वैश्य परिवार की लाड़ली, भोलीभाली एवं प्रतिभाशाली कन्या ऐसा कदम उठाएगी, जबकि परिवार के लोग घरवर खोजने में लगे थे. वह तो एकाएक विस्फोट सा लगा. पर जब शुद्ध दक्षिण भारतीय राघवन से परिचय हुआ तो उस सौम्यसुदर्शन चेहरे के सम्मोहन ने कहीं सब के मन को छू लिया.

ओरोबैंकी से बचाएं सरसों की फसल

ओरोबैंकी सेरेनुआ इस की एक दूसरी किस्म है, जो बिहार इलाके में सरसों की फसल पर परजीवी है. सरसों की फसल में इस के प्रकोप से 10 से 70 फीसदी तक का नुकसान होता है. यह परजीवी सरसों उगाए जाने वाले सभी इलाकों जैसे राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल व ओडिशा में पाया जाता है.

ओरोबैंकी से ग्रस्त सरसों के पौधे छोटे रह जाते हैं और कभीकभी मर भी जाते हैं. ओरोबैंकी के चूपकांग यानी हास्टोरिया सरसों की जड़ों में घुस कर पोषक तत्त्व हासिल करते हैं. पौधों को उखाड़ कर देखें, तो ओरोबैंकी की जड़ें सरसों की जड़ों के अंदर घुसी हुई दिखती हैं. सरसों के पौधों के नीचे मिट्टी से निकलते हुए ओरोबैंकी परजीवी दिखाई पड़ते हैं.

ओरोबैंकी का तना गूदेदार होता है और इस की लंबाई 15 से 50 सैंटीमीटर होती है. तना हलका पीला या बैगनीलालभूरे रंग का होता है, जो पतली भूरी पत्तियों की परतों से ढका रहता है. फूल पत्तियों के कक्ष से निकलते हैं, जो सफेद नली के आकार के होते हैं.

यह अंडाकार बीजयुक्त फलियां बनाता है, जो तकरीबन 5 सैंटीमीटर लंबा होता है व जिन में सैकड़ों की संख्या में छोटेछोटे काले बीज होते हैं. ये बीज मिट्टी में कई सालों तक जिंदा रहते हैं.

ओरोबैंकी के बीज मिट्टी में 10 साल से भी ज्यादा समय तक जिंदा रह सकते हैं. इस के बीजों का जमाव तभी होता है, जब सरसों कुल के पौधों की जड़ें सरसों की जड़ों की ओर बढ़ती हैं व करीबी संबंध बना कर उन से जुड़ जाती हैं. इस से ओरोबैंकी फसल द्वारा बनाए गए भोजन को ले कर अपनी बढ़वार करता है. वह तकरीबन एक महीने तक मिट्टी में ही बढ़वार कर अंगूठे के आकार के जमीनी तने में भोजन इकट्ठा करता रहता है.

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इस के बाद सरसों की 50 से 60 दिन की अवस्था के दौरान यह मिट्टी से बाहर निकल कर बढ़ता है. बाहर आने के बाद भी यह हरे पत्ते नहीं बना कर परजीवी ही बना रहता है. इस के बाद इस में फूल आ जाते हैं और अनगिनत छोटेछोटे बीज बन जाते हैं. यह सारी प्रक्रिया तनों के उगने से ले कर बीज बन कर बिखरने तक 2 महीने में पूरी हो जाती है.

रोकथाम के उपाय

*नए इलाकों में ओरोबैंकी के बीज का प्रवेश नहीं होने देना चाहिए और परजीवी के बीजरहित सरसों के शुद्ध बीज का इस्तेमाल करना चाहिए.

*ओरोबैंकी परजीवी को हाथ से उखाड़ कर या निराईगुड़ाई द्वारा जमीन के ऊपर के तने को काट कर बीज बनने से पहले ही खत्म कर देना चाहिए.

*  यदि बीज बन गए हों, तो पौधों को सावधानी से निकालना चाहिए, जिस से बीज मिट्टी में नहीं मिलें.

* जिन इलाकों में बहुत ज्यादा हमला होता है, वहां सरसों की फसल टै्रप क्रौप के रूप में बोनी चाहिए. 30 से 40 दिन में परजीवी के पौधे बाहर निकलते दिखाई दें, तो गहरी जुताई कर के सरसों सहित इस के जमीनी तने को खत्म कर इस के बाद दूसरी फसल बो दें.

*जब तक ओरोबैंकी पर पूरी तरह काबू नहीं हो जाता, सरसों की जगह पर अरंडी की फसल बोएं, क्योंकि अरंडी एक सालाना फसल है. इस से परजीवी को रोकने में मदद मिलेगी.

* कुछ पौधों, जैसे मिर्च को बोने से ओरोबैंकी के बीजों का जमाव हो जाता है, लेकिन मिर्च की फसल को इस परजीवी से कोई नुकसान नहीं होता है. इस तरह मिट्टी में मौजूद ओरोबैंकी के बीजों को जमा कर इस फसल का टै्रप फसल के रूप में इस्तेमाल कर परजीवी के पौधों को खत्म किया जा सकता है. इस तरह मिर्चसरसों का फसल चक्र अपनाने से इस परजीवी पर कुदरती तौर पर काबू पाया जा सकता है.

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* लंबे समय तक फसल चक्र अपना कर इस की ज्यादती को रोका जा सकता है.

* पौधों की मिट्टी की सतह के पास 25 फीसदी ताम्रघोल का छिड़काव कर के यह परजीवी खत्म किया जा सकता है.

* ओरोबैंकी पौधों पर सोयाबीन के तेल की 2 बूंदें डाल देने से पौधा मर जाता है.

*  सरसों की रोगरोधी किस्म दुर्गामणि की बोआई करें.

‘नोटबंदी’ से भी बड़ी है त्रासदी ‘नेटबंदी’

नागरिकता कानून के विरोध प्रदर्शन को नियंत्रण करने के लिये प्रदेश सरकार उत्तर प्रदेश में धारा 144 लागू कर दिया. 19 दिसम्बर से 23 दिसम्बर तक मोबाइल नेट बंद कर दिये. नोटबंदी के दौरान केन्द्र सरकार ने दावा किया था कि नोटबंदी से तीन प्रमुख लाभ है इससे आतंकवाद खत्म होगा, देश की आर्थिक हालत मजबूत होगी और देश में भ्रष्टाचार खत्म होगा. नोटबंदी के जरिये कैशलेस इकोनौमी को बढ़ावा भी दिया गया. नेटबंदी के दौरान यही कैशलेश इकोनौमी लोगों के लिये परेशानी का सबब बन गया है.

मल्टीनेशनल कपंनी में काम करने वाले अनिल कुमार गुप्ता को शहर से बाहर जाना था. कैशलेस इकोनौमी पर यकीन करने वाले अनिल कुमार पेट्रोल पंप पर अपनी कार में दो हजार रूपये का पेट्रोल लेने गये. पेट्रोल का पेमेंट कार्ड से करना था. मोबाइल नेट बंद होने से कार्ड से पेमेंट नहीं हो पाया. अनिल के पा नकद केवल पांच सौ रूपये थे. ऐेसे में पेमेंट होना संभव नहीं था. पास लगा बैंक का एटीएम भी नहीं चल रहा था. अनिल को अपने घर फोन करके नकद पैसे मंगाने पड़े. ऐेसे में आधे घंटे से अधिक का समय लग गया ओर अनिल की फलाइट छूट गई. सरकार ने 19 दिसम्बर की रात से मोबाइल नेट बंद कर दिया था तो अनिल को सुबह इसकी कोई जानकारी ही नहीं थी.

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नेटबंदी से ऐसी तमाम परेशानियों से लोगों को रूबरू होना पड़ा. आईआईएस लखनऊ में पुराने छात्रो का एक कार्यक्रम था. बाहर से कई लोग इसमें हिस्सा लेने आये थे. एयर पोर्ट से बाहर खड़े होकर जब वह ओला और उबर जैसी गाडियां बुक कर रहे थे तो नेट बंद होने से यह सुविधा उनको नहीं मिली और उनको परेशान होना पड़ा. ऐसे ही मोबाइल से बुक किये जाने वाले ई-टिकट नहीं बुक हो पा रहे थे. शहर में अनजान लोगों को लोकेशन ट्रेस करने में दिक्कत आने लगी. खाना मांगने के लिये फूड एप बंद हो गये. इस तरह से पूरे कारोबार को करोड़ों का चूना लग गया. होटल, औनलाइन शौपिंग, ट्रैवल जैसे तमाम बिजनेस में 50 फीसदी की कमी आई.

असल में नोटबंदी के बाद लोगों ने कैशलेस इकोनौमी से जुड़ने का काम किया. नेटबंदी के दौरान ऐसे लोग बहुत परेशान हुये. सोशल मीडिया के बंद होने से झगड़ों पर कितना प्रभाव पड़ा यह तो सही जानकारी नहीं मिल पा रही है. नेट बंद होने के बाद भी पूरे प्रदेश में हालात कठिन बने गये. उत्तर प्रदेश में लोगों के मरने की खबरे आती रही. नेटबंदी से झगड़े पर प्रभाव पड़ा या नहीं पर कारोबार और लोगों की सुविधाओं पर बहुत प्रभाव पड़ा है.

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बिग बौस 13 : सिद्धार्थ- रश्मि की लड़ाई में जजमेंट से खुश नहीं ये एक्स सेलेब्स

कलर्स टीवी पर प्रसारित होने वाला विवादित शो ‘बिग बौस 13’ में आए दिन कंटेस्टेंट के बीच  हाईवोल्टेज ड्रामा और ड्रामैटिक सीन चलता रहता है. जिससे इस शो के दर्शकों का भरपूर मनोरंजन होता है. इस सीजन में तो कंटेस्टेंटस ने लड़ाई की सारी हदें पार कर दी हैं.

‘बिग बौस’ के सीजन में ऐसा पहली बार हुआ है, जब कंटेस्टेंट्स ने झगड़े में एक-दूसरे पर चाय फेंकी हो,  कपड़े फाड़े हो और सलमान खान के भी सामने गाली-गलौच की हो. आपको बता दें, सिद्धार्थ-रश्मि की लड़ाई में सलमान ने किसी का भी सपोर्ट नहीं किया. सलमान ने ने दोनों की बात सुनी, अपना पक्ष रखने का मौका दिया. फिर रश्मि को बात को तूल देने पर डांट लगाई.

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सलमान खान के इस जजमेंट से शो के दो एक्स कंटेस्टेंट्स खुश नहीं हैं. जी हां, किश्वर मर्चेंट और गौहर खान दोनों ने ट्विट कर लिखा है.  गौहर खान ने लिखा, गंदा बोला है. बोला है बोला है. सफाई देने का अच्छा अवसर दिया गया. सिर्फ एक ही इंसान बोलता है. इस ट्वीट को शो की कंटेस्टेंट देवोलीना भट्टाचार्जी ने रीट्वीट किया है.

किश्वर मर्चेंट ने लिखा, अगर बुराईयां करने के बाद असीम रश्मि का सगा बनकर घूम रहा है. तो सिद्धार्थ भी पारस माहिरा का बुराईयां करने के बाद उनका सगा बनकर घूम रहा है.तो उधर दूसरी तरफ शो के एक्स कंटेस्टेंट विंदू दारा सिंह और काम्या पंजाबी ने सिद्धार्थ शुक्ला का सपोर्ट किया है. सलमान खान के कहने के बाद रश्मि-सिद्धार्थ का झगड़ा अभी के लिए खत्म हो चुका है. अब इस हफ्ते देखना दिलचस्प होगा कि दोनों के बीच क्या क्या नए मोड़ आते हैं.

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छोटी सरदारनी : फूटा हरलीन का गुस्सा, क्या परम से दूर हो जाएगी मेहर ?

‘छोटी सरदारनी’ में मेहर जहां इस बात से परेशान है कि वह हरलीन की शर्त यानी अपने पेट में पल रहा बच्चा या परम और सरब के साथ जुड़ा ये नया रिश्ता, इनमें से किसे चुनें. वहीं अब हरलीन ने मेहर और उसके परिवार को परम से दूर रहने की चेतावनी भी दे दी है. आइए आपको बताते हैं हरलीन के बर्ताव की क्या है वजह…

यूवी का साथ बना परम के लिए मुसीबत

पिछले एपिसोड में हमने देखा कि यूवी की बदमाशी के कारण परम भी फंस जाता है, जिसकी वजह से स्कूल टीचर यूवी की दादी कुलवंत कौर को बुलाती है.

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कुलवंत कौर ने मारा स्कूल टीचर को थप्पड़

 

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#Precap of Monday episode. Haha Kulwant face when Sarabjeet said she will have to say sorry for her wrong deeds??? Sarabjeet my hero u simply rock?????????? This should hv been done long back but everytime Sarabjeet had overlooked or ignored Kul’s mistakes (email hack issue, etc) Now KK has done a big crime of slapping teacher which I cant accept at all as I myself is a teacher…not only a plain sorry but something more needs to b done to stop this ego of KK cz she commits crime in every seconds, ruining her own family peace, destroying Yuvi’s life?????? Reposted from @chotisarrdaarni – Precap #ChotiSarrdaarni #ColorsTV #avineshrekhi #chotisarrdaarni #colorstv #colorstvserial #sarabjeetgill #chotisardarni #kulwant #drama @cs_sarabjeet_fan

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यूवी की गलती होने के बावजूद कुलवंत कौर टीचर को थप्पड़ मार देती है, जिसकी वजह से परम और यूवी को स्कूल से निकाल दिया जाता है. वहीं इस बात की भनक जब हरलीन को लग जाती है तो वह और ज्यादा गुस्से में आ जाती है.

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मेहर को कूसूरवार ठहराएगी हरलीन

अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि हरलीन, सरब और मेहर, परम को स्कूल में वापस भेजने के लिए कोशिश करते नजर आएंगे तो वहीं हरलीन मेहर को चेतावनी देगी कि वह परम के मामले में न पड़े क्योंकि परम की मुसीबत का कारण वो और उसका परिवार है.

अब देखना ये है कि क्या मेहर हरलीन की चेतावनी के बावजूद परम को स्कूल वापस भेजने के लिए अपनी कोशिशें जारी रखेगी? क्या मेहर और हरलीन के रिश्ते की खटास बढती जाएगी? जानने के लिए देखते रहिए ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवार, रात 7:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

‘चेहरे’ की शूटिंग के दौरान निर्माता आनंद पंडित और बिग बी के बीच का बौंड हुआ और मजबूत

अपनी फिल्म (चेहेरे) के अंतिम चरण के लिए दिग्गज निर्माता आनंद पंडित स्लोवाकिया पहुंचे ताकि शूटिंग के दौरान महानायक अमिताभ बच्चन का अच्छी तरह से ख्याल रखा जा सके. अब फिल्म की शूटिंग पूरी होने वाली है, आनंद पंडित खुश हैं कि उन्होंने मध्य यूरोप में बिग बी के साथ रहने का फैसला किया.

लगातार हो रही बर्फबारी ने कुछ स्थानों पर शूटिंग को काफी मुश्किल बना दिया था लेकिन सीनियर बच्चन की प्रोफेशनलिज्म और बाकी कलाकारों के सहयोग की वजह से  शूटिंग अच्छी तरह से पूरी हो गई.

इस बारे में बताते हुए निर्माता आनंद पंडित कहते हैं, ” फिल्म चेहरे की इस शूटिंग ने हमें कभी न भूलने वाली यादें दी हैं. शूटिंग खत्म होते वक्त हम सभी भावुक हो गए. यह हम सबके लिए बेहद खास रहा है और इसकी कई वजहें हैं. उन कठिन हालात में भी, जब हम लोग सोच रहे थे कि शूटिंग करना संभव नहीं होगा, बच्चन साब सेट पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति होते थे. उनकी प्रतिबद्धता सेट पर हम सभी के लिए एक प्रेरणा जैसी थी. मैं चाहता था कि वह फिल्म के लिए कुछ सीन का निर्देशन करें क्योंकि उनके विशाल अनुभव ने उन्हें फिल्ममेकिंग की गहराई की अंतर्दृष्टि दी है. उन्होंने कुछ सीन्स को डायरेक्ट (निर्देशन) किया. मुझे उनकी जंजीर, दीवार, और त्रिशूल जैसी यादगार फिल्मों की यादें ताजा हो गईं. ”

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इस दिग्गज निर्माता ने अमिताभ बच्चन की सभी फिल्में देखीं हैं. उन्होंने जंजीर और त्रिशूल में उनकी फूर्ती भी देखी है और उनका मानना है कि बिग बी की वैसी ही तेजी इस फिल्म में भी दिखेगी. आनंद पंडित के लिए यह बिग बी को ज़ंजीर के अंतिम सीन से सीधे अपने फ्रेम में देखने जैसा था.

इससे भी बड़ी बात, अमिताभ बच्चन ने पर्दे के पीछे के कुछ सीन्स को भी आनंद पंडित के साथ साझा किया और इससे फिल्म के ओवरऔल इंपैक्ट में मदद मिली. आनंद पंडित, अमिताभ बच्चन के हर इनपुट को पसंद करते थे और इसी वजह से उन्होंने बिग बी से फिल्म के अंतिम सीन का निर्देशन करने के लिए कहा.

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