Download App

खराब बालों को रिपेयर करें एलोवेरा से

यदि आपके बाल कमजोर हो गए हों, बहुत झड़ रहे हों या फिर बालों में रूसी हो गई हो तो आप एलोवेरा की सहायता से इस समस्या से निजात पा सकती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि एलोवेरा ना सिर्फ  आपके बालों के लिये अच्‍छा है बल्‍कि इसे लगाने से चेहरे के मुंहासे भी दूर भाग जाते हैं. आज हम आपको एलोवेरा का फायदा बालों के लिये बताएंगे, तो अगर बालों को चमकदार और स्‍वस्‍थ्‍य बनाना है तो एलोवेरा का प्रयोग जरुर कीजिये.

हेयर मास्क

एलोवेरा विटामिन ई से भरा होता है इसलिये आप इसे अंडे,नींबू के रस या अपने हेयर औइल के साथ मिक्स कर के बालों में लगा सकती हैं.

ये भी पढ़ें- घर पर ही करें पार्लर जैसा मेकअप

हेयर कंडीशनर

बाल चाहे जितने भी मजबूत हों,लेकिन फिर भी उनमें कंडीशनर जरुर लगाना चाहिये. सिर को शैंपू से धो लें,फिर उस पर एलोवेरा जैल सिर से टिप तक लगाएं और 15 मिनट तक छोड़ दें. इससे आपको अच्छा रिजल्ट मिलेगा.

हेयर स्प्रे

एक स्प्रे बोतल में 1 कप डिस्टिल्लड वाटर को 1 चम्मच एलोवेरा जैल के साथ मिक्स करें. इसे अपने बालों पर स्प्रे करें. आप पाएंगी कि आपके बाल बाउंस कर रहे होगें और उनमें एक नई चमक पैदा हो गई होगी.

ये भी पढ़ें- मेकअप टिप्स: 20 मिनट में ऐसे हो पार्टी के लिए तैयार

धर्म के नाम पर राष्ट्रप्रेम

असम में नागरिकता को ले कर चल रहे विवादों में सैकड़ों परिवारों को अधर में लटका दिया गया है. गृहमंत्री अमित शाह चाहे चिल्लाते रहें कि वे एक भी विदेशी को भारत की भूमि पर नहीं रहने देंगे, सरकार कहती रहे कि भारत शरणार्थियों का देश नहीं बनेगा, पर यह पक्का है कि आदमियों, औरतों और बच्चों को जानवरों की तरह न हांका जा सकता है, न हिटलर के तानाशाही कारनामों की तरह गैस चैंबरों में ठूंसा जा सकता है.

इस विवाद के चलते और कट्टरपंथियों की बढ़ती हिम्मत के कारण अब गोलाबारी, बलात्कार, अपहरण, छीनाझपटी आम हो गई है और इन के शिकार लोगों के अपने गुस्से को इजहार करने पर भी आपत्ति की जाने लगी है.

असम पुलिस ने एक कवि को गोली, भाला, त्रिशूल चलाने पर नहीं, एक साधारण सी कविता लिखने पर अरैस्ट वारंट जारी कर दिया. पोइट्री लिखने के आरोप में डाक्टर हाफिज अहमद सहित 8 अन्य रेहाना सुलताना, अब्दुर रहीम, अशरफुल हुसैन, अब्दुल कलाम आजाद, काजी सरोवर हुसैन, बनमल्लिका चौधरी, सलीम एम. हुसैन, करिश्मा हजारिका व फरहाद भुईयां के खिलाफ मुकदमे दर्ज कर लिए.

ये भी पढ़ें- नाइट फिवर के माया जाल : डूबता युवा संसार

इतने नाम इसलिए लिखे जा रहे हैं कि एक कविता पर पुलिस ने इतनों के खिलाफ कैसे प्राथमिकी दर्ज की.

मामला भारतीय दंड विधि की धाराओं 153ए, 295ए पर दर्ज किया गया. कविता में कवि या पढ़ने वालों के खिलाफ एक हिंदू ने मामला दर्ज किया और पुलिस आननफानन में गिरफ्तारी करने पहुंच गई. उच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी पर रोक तो लगा दी पर थानों और अदालतों के चक्करों से अभी मुक्ति नहीं दी. शिकायतकर्ता घर पर बैठ कर बांसुरी बजाएगा, क्योंकि उसे अब न थाने में जाने की जरूरत है न अदालत में. वह गवाह न भी बने तो भी मामला वर्षों चलता रहेगा.

धर्म के नाम पर इस तरह का अत्याचार व अनाचार सदियों से हो रहा है और आज भी बंद नहीं हुआ है. धर्म के दुकानदारों को हर समय लगता है कि उन की पोल न खुल जाए इसलिए वे ईशनिंदा के खिलाफ बने कानूनों का इस्तेमाल करते रहते हैं. इस कविता में धर्म को तो नहीं लपेटा पर धर्म के आधार पर बने नैशनल सिटिजनशिप रजिस्टर के प्रति रोष जताया गया है. इस बात को कहना भी कट्टरवादियों को नहीं सुहाया और वे पुलिस की धमकियों का इस्तेमाल करने लगे हैं. वे नहीं चाहते हैं कि नागरिकता के एकतरफा कानून की कोई बात भी करे.

यही औरतों के हकों पर करा जाता है. जहां कोई औरतों पर धार्मिक अत्याचारों की बात करता है धर्म के धंधेबाजों को खतरा महसूस होने लगता है.

धर्म के नाम पर औरतों को रातरातभर जगाया जाता है. उन को नचवाया जाता है. सिर पर घड़े रख कर सड़कों पर चलवाया जाता है. उबाऊ तीर्थयात्राओं में हांका जाता है. आग के सामने बैठ कर घंटों तपाया जाता है. हर बार कहा जाता है कि यह करो वरना समाज से बाहर हो जाओ, घर में दुत्कार सहो. जो इन की पोल खोलने और निरर्थकता की बात करता है उसे देशद्रोही या टुकड़ेटुकड़े गैंग का हिस्सा घोषित कर दिया जाता है. रातदिन संदेश दिया जा रहा है कि किसी भी धर्म के हों चलेगी तो तिलक व दुपट्टाधारियों की ही.

ये भी पढ़ें- समाज सेवा, सुनहरा भविष्य !

समाज का पुनर्निर्माण आज पहली आवश्यकता है पर हम अब फिर धर्म, जाति व भाषा की दड़बों सी जेलों में बंद होने लगे हैं. चाहे हमारी जेल एक ही हो पर अंदर हम सब सिर्फ अपनों की बैरकों में सुरक्षित हैं, यह समझाना शुरू कर दिया गया है. खुली बहस, नई सोच, आलोचनाओं, आपत्तियों, पुरानी मान्यताओं के खोखलेपन की कोई बात भी न करे. देश का विवेक और देश की बुद्धि कुछ हाथों में सिमट रही है. न दूसरे धर्मों, न दूसरी जातियों और न दूसरी पार्टियों के लोग अब आजादी महसूस कर सकते हैं. औरतों को ज्यादा नुकसान होगा जो उन की नौकरियों में घटती संख्या और पाखंड में बढ़ते दखल के रूप में दिखने लगा है.

सभ्यता औरतों के हकों के खिलाफ क्यों

आज भी किसी औरत से मिलते हुए पहला नहीं तो दूसरा सवाल यही होता है कि आप के पति क्या करते हैं? आज भी औरतों का अकेले होना न समाज को स्वीकार है और न ही कानून को. कानून भी बारबार पूछता है कि आप के पति कौन हैं, कौन थे और अगर नहीं तो पिता कौन हैं? एक आदमी से कभी नहीं पूछा जाता कि आप की पत्नी कौन है, क्या करती है?

इस मामले ने हमेशा ही औरतों को अकेला रखा है मानो यदि पति न हो तो पत्नी की सुरक्षा हो ही नहीं सकती. यह तब है जब निर्भया कांड में बलात्कार की शिकार के साथ एक पुरुष मित्र था यानी पुरुष का सान्निध्य औरत की शारीरिक सुरक्षा की गारंटी नहीं है. आजकल सोशल मीडिया पर सैकड़ों वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिन में 3-4 भगवा गमछाधारियों ने लड़केलड़की को पकड़ कर लड़की का लड़के के सामने बलात्कार किया और लड़का कुछ न कर पाया.

घरों में चोरी होने पर अकसर ऐसे मामले ही ज्यादा होते हैं जब औरतों के साथ पूरा परिवार होता है. औरतों के साथ किसी पुरुष का होना कोई सुरक्षा की गारंटी नहीं है. सदियों से दलितों की औरतों का उन के पतियों के सामने अपहरण किया जाता रहा है. यहां तक कि हमारी धार्मिक कहानियों में सीता का अपहरण विवाहित होने के बावजूद हुआ था. इस के मुकाबले तो शूर्पणखा अच्छी थी जो अकेले जंगल में राम और लक्ष्मण के साथ प्रेम निवेदन कर सकी थी या हिडिंबा भीम के समक्ष अपनी इच्छानुसार बिना शर्म के संबंध बना सकी थी.

आज अकेली औरतों की संख्या निरंतर बढ़ रही है पर समाज का दृष्टिकोण नहीं बदल रहा और कानून भी बहुत धीरेधीरे बदल रहा है. काफी जद्दोजहद के बाद कानूनी दस्तावेजों में पिता के स्थान पर मां का नाम लिखने की अनुमति मिली है पर अभी भी पत्नी की पहचान पति से ही हो रही है.

विवाह न औरतों की खुशी के लिए होता रहा है न उन की इच्छा पर. यह तो समाज का दबाव है कि पिता बेटी से छुटकारा पाना चाहता है. यदि समाज का दबाव न हो तो पिता बेटी को जिस से मरजी शादी की अनुमति दे देता पर भारत से ले कर तुर्की, इजिप्ट और यहां तक कि चीन और अमेरिका में भी पिताओं को यह चिंता रहती है कि कहीं बेटी का मनचाहा उन के परिवार व स्तर का नहीं हुआ तो क्या होगा.

ये भी पढ़ें- बंदूक : जान बचाने का नहीं, जान लेने का हथियार

आदमियों को छूट है कि वे कुछ दिन खिलवाड़ कर लें किसी भी लड़की के साथ और कहते रहें कि वे सीरियस नहीं हैं पर अगर लड़की किसी के साथ 4 बार चाय भी पी ले तो मांबाप पीछे पड़ जाते हैं कि लड़का शादी लायक मैटीरियल है या नहीं? अकेली औरतों का वजूद ही नहीं है.

जेम्स बौंड की सीरीज में अब तक जेम्स बौंड 007 केवल गोरा पुरुष होता था. अब बदलाव की हवा को देखते हुए एक अश्वेत युवती को जेम्स बौंड की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे हमारे देश में नाडिया को कालीसफेद फिल्मों के युग में एक बार किया गया था.

अकेली औरतों की दुर्दशा सभ्य समाजों में ज्यादा हुई है. दुनियाभर में आदिवासी समाजों में औरतों को बराबर के हक मिले हैं. सभ्यता औरतों के हकों और उन के व्यक्तित्व पर भारी पड़ी है, जहां वे गुलाम और खिलौना बन कर रह गई हैं.

सरकार मंदिरों के चढ़ावे का भी हिसाब ले जगन्नाथपुरी, तिरुपति बालाजी, पद्मनाभस्वामी जैसे मंदिरों की संपत्ति कितनी है, इस के बारे में केवल अंदाजा ही लगाया जा सकता है. किसी को अनुमति ही नहीं है कि उसे आंकने की कोशिश करे. वैसे भी गिनती कर के करना क्या है, क्योंकि यह सारी संपत्ति चंद पुजारियों की है जो खुद नहीं जानते कि वे इस बिना कमाई के पैसे का क्या कर सकते हैं.

मंदिरों को आज से नहीं हजारों सालों से भरपूर चंदा मिलता रहा है. धर्म की सफलता ही इस बात में रही है कि इस ने घरों से, औरतोंबच्चों के मुंह से निवाला छीनने में कसर नहीं छोड़ी. मिस्र के विशाल मंदिर और पिरामिड इस बात के सुबूत हैं कि घरों की मेहनत को निठल्ले पुजारियों के कहने पर राजाओं ने निरर्थक चीजों पर बरबाद कर दिया.

आज हम इन मंदिरों को देख कर आश्चर्य प्रकट कर लें पर सवाल उठता है कि इतनी मेहनत कराई क्यों गई थी? इस से जनता को क्या मिला?

जैसे तब के मंदिरों को जम कर लूटा गया और हर राजा विशाल और विशाल मंदिर बनाता रहा कि उस में चोरी न हो पाए ऐसे ही आज के मंदिरों में चोरियों का डर लगा रहता है. किसी भी मंदिर में चले जाएं, वहां बढि़या से बढि़या तिजोरी मिलेगी जिस पर 8-8, 10-10 ताले लगे होंगे. मोटी स्टील की बनी इन हुंडियों में डाले पैसे पर न तो चोरों से भरोसा है न पुजारियों से. आज भी हर मंदिर चढ़ावे का हिसाब देने से कतराता है.

जगन्नाथपुरी मंदिर के रत्न भंडार की चाबियां सालभर से गायब हैं और उच्च न्यायालय व सरकार दोनों माथापच्ची कर रहे हैं कि चाबियां कौन ले गया, क्यों ले गया और कैसे डुप्लिकेट चाबियों से काम चलाया जा रहा है जबकि डुप्लिकेट चाबियां होनी ही नहीं चाहिए.

ये भी पढ़ें- इन्टर कास्ट मैरिज: फायदे ही फायदे

होना तो यह चाहिए कि मंदिर अगर सचमुच में किसी भगवान का केंद्र है तो वहां न संपत्ति होनी चाहिए और न ही कोई निर्माण. अगर प्रकृति का निर्माता हजारोंलाखों दूसरी चीजें बना सकता है तो अपने बनाए इंसान से अपनी पूजा करवाने के लिए मंदिर क्यों बनवाता है? मंदिर तो सदियों से चली आ रही धार्मिक चाल का परिणाम हैं जहां लोगों को इकट्ठा कर के खुशीखुशी लूटा जाता है. लोगों को कच्चे घरों में भूखा रख कर पक्के मंदिरों में भरपूर खाने के साथ ला कर सिद्ध किया जाता है कि देखो, मंदिर कितना शक्तिशाली है.

औरतों को इसीलिए धर्म का अंधा बनाया जाता है ताकि वे अपना और बच्चों का पेट काट कर मंदिर में तनमन और धन तीनों दें. इस का हिसाब कोर्ट न ले.

जब पत्नी हो प्रैगनेंट तो क्या करे पति

आज के दौर में ज्यादातर पतिपत्नी अकेले रहते हैं. ऐसे में गर्भावस्था के दौरान पत्नी की देखभाल और प्रसव यानी डिलिवरी बाद नवजात की देखभाल कठिन काम हो जाता है. इस हालात से निबटने के लिए पति को मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए. उसे प्रसव के दौरान की कुछ जानकारी भी होनी चाहिए. इस बारे में लखनऊ के मक्कड़ सैंटर की डाक्टर रेनू मक्कड़ ने कुछ टिप्स दिए. आंकड़े बताते हैं कि जिन औरतों के मामलों में गर्भावस्था के दौरान सावधानी नहीं बरती जाती, समय पर इलाज नहीं कराया जाता उन औरतों में प्रसव के दौरान रिस्क बहुत बढ़ जाता है. गर्भावस्था के दौरान औरतों के शरीर में तमाम तरह के बदलाव होते हैं, जिस से शरीर में भी कई तरह के बदलाव होते हैं. समय पर इन बदलावों को डाक्टर से बता कर सलाह लेनी चाहिए.

आने वाले संकट का मुकाबला करने के लिए शरीर को तैयार कर लिया जाए ताकि शरीर किसी भी गंभीर बीमारी के जाल में न फंसे. खतरे से न घबराएं

गर्भावस्था के दौरान कुछ लक्षण कभी नजरअंदाज नहीं करने चाहिए. योनि, गुदा और निपल से थोड़ा सा भी खून रिसता दिखाई दे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अगर चेहरे और हाथों में सूजन हो या किसी तरह का कोई उभार हो तो डाक्टर से जरूर बात करें. तेज सिरदर्द भी गर्भावस्था में किसी न किसी गंभीर बीमारी का संकेत देता है. अगर आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है या फिर धुंधला दिखाई देता है तो इसे भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. पेट में तेज दर्द, कंपकंपी और बुखार भी खतरनाक संकेत माने जाते हैं.

ये भी पढ़ें- लव सेक्स और धोखा के दलदल में फंसता यंगिस्तान

योनि से तरल पदार्थ का निकलना भी खतरे का संकेत है. पेट में बच्चे का घूमना पता न चले तो भी मामला खतरनाक हो सकता है. जब हो जाए बच्चा

कई बार ठीकठाक प्रसव होने के बाद भी कुछ परेशानियां हो जाती हैं. प्रसव के बाद औरत को सामान्य होने में कुछ समय लगता है. सब से बड़ी समस्या योनि से खून का बहना होता है. आमतौर पर यह सामान्य बात होती है मगर कभीकभी इस में किसी दूसरी बीमारी के लक्षण भी छिपे होते हैं.

इसलिए प्रसव के बाद भी अगर इस तरह की कोई परेशानी आए तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

शिशु का जन्म औपरेशन से हो या फिर सामान्य रूप से शरीर प्रसव के बाद गैरजरूरी म्यूकस, प्लेसैंटल टिशूज और खून को बाहर कर देता है. इसे लोकिया कहा जाता है. यह प्रसव के 2-3 सप्ताह तक चलता है. कभीकभी

6 सप्ताह तक भी चलता है. इस परेशानी को कम करने के लिए आराम करें. खड़े रहने और चलने से परहेज करें. खून को सोखने के लिए पैड्स का प्रयोग करें. यह अपनेआप ठीक हो जाता है. अगर खून काफी मात्रा में बहता हो, बुखार और ठंड लगे, डिस्चार्ज में कोई गंध हो तो डाक्टर से संपर्क करें. पोस्टपार्टम हैमरेज प्रसव के बाद की गंभीर किस्म की बीमारी होती है, जिस में सामान्य से अधिक खून बह जाता है. इस का कारण प्लेसैंटा का पूरी तरह से बाहर न निकलना, उसे जबरन बाहर खींचा जाना, प्रसव के दौरान गर्भाशय, सर्विक्स या योनि पर चोट लगने से ऐसा होता है. हमारे देश में प्रसव के चलते होने वाली मौतों में 10 फीसदी इसी कारण से होती है.

पोस्टपार्टम हैमरेज का पता चलते ही डाक्टर को अपनी परेशानी के बारे में बताना चाहिए. इस दौरान शरीर की सफाई का खास खयाल रखें. लगातार बुखार बना रहे तो यह किसी इन्फैक्शन का कारण ही होता है. इसे नजरअंदाज न करें. स्तन में गांठ या दूध पिलाने में दर्द हो तो भी डाक्टर से सलाह लेनी होती है. अनचाहे गर्भ को रोकने के लिए गर्भनिरोधक साधनों का इस्तेमाल करें. यह न सोचें कि जब तक बच्चे को दूध पिलाएंगी तब तक गर्भ नहीं ठहरेगा.

ये भी पढ़ें- फैमिली: मां की डांट, बेटी का गुस्सा

नागरिकता कानून : विरोध का साया, क्रिसमस के बाद नये साल पर भी छाया

नागरिकता कानून के विरोध से बिगड़े माहौल से शौपिंग और पार्टीज का उल्लास क्रिसमस पर नजर नही आया. अब नये साल का उल्लास और विंटर शौपिंग भी खतरे में नजर आ रही है. क्रिसमस से नये साल के बीच चलने वाला विंटर फेस्टिवल सीजन भी बिजनेस के लिए अच्छा नहीं दिख रहा है. मौल्स से लेकर दुकान तक सब खाली है. होटल और लाउंज नाममात्र की पार्टी कर रहे है. जिनको लेकर लोगों में उल्लास नहीं दिख रहा है.

नागरिकता कानून के विरोध के आन्दोलन की छाया क्रिसमस के बाद अब नए साल के उल्लास को भी फीका करेगी. उत्तर प्रदेश में 19 दिसम्बर के बाद 27 दिसम्बर तक केवल कुछ ही घंटों के लिये इंटरनेट की सुविधा बहाल की गई है. ऐसे में क्रिसमस की तमाम पार्टी और आयोजन प्रभावित हुये. प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 80 फीसदी से अधिक कार्यक्रम स्थगित हो गये. जो कार्यक्रम आयोजित हुये उनमें भी लोगों की उपस्थित बेहद कम रही. 25 दिसबर से इंटरनेट बहाल हुआ तो लोगों को लगा कि अब हालात सामान्य हो जायेंगे जिससे वह नया साल उल्लास पूर्वक मना पायेंगे. 26 दिसम्बर से ही फिर से इंटरनेट बंद हो गया जिसकी वजह से लोगों में दहशत का माहौल कायम हो गया है. अब लोग मान रहे हैं कि नये साल पर भी सुरक्षा का हवाला देकर इंटरनेट सेवायें बाधित होती रहेगी. इसका असर केवल आपसी बातचीत पर ही नहीं पड़ता लोगों में मानसिक रूप से प्रभाव पड़ता है.

ये भी पढ़ें- नक्सली और भूपेश बघेल आमने-सामने

नये साल पर पार्टियों का आयोजन करने वाले लोग डरे हुये है कि लोग रात में पार्टी में हिस्सा लेने आयेगे भी या नहीं. ऐसे में बड़े होटल और लाउंज में नये साल को लेकर कोई बड़े आयोजन का प्लान नहीं बन रहा है. आमतौर पर क्रिसमस से लेकर नये साल के बीच एक उल्लास का महौल बन जाता था. जिसमें कई आयोजन होते रहते थे. बड़े होटलों की पार्टियों में फिल्म स्टार से लेकर बड़े बड़े सेलेब्रेटी हिस्सा लेने आते थे. इसका प्रबंध पहले से शुरू हो जाता था. आज के दौर में होटल बड़े आयोजन की जगह पर केवल हल्काफुल्का सेलीब्रेशन ही प्लान कर रहे है. आयोजक कहते हैं कि हमें यह नहीं पता कि नये साल के समय कैसा माहौल रहेगा ? दूसरे जनता के मन में डर है. क्रिसमस के आयोजन केवल खानापूर्ति भर रहे. वैसे ही नये साल पर भी आयोजन के नाम पर खाना पूर्ति ही होगी.

असल में दशहरा से दीवाली तक के फेस्टिवल सीजन के बाद क्रिसमस से नये साल के बीच दूसरा फेस्टिवल सीजन आता है. कारोबारियों को भी उम्मीद होती है कि लोग इसमें उल्लास पूर्वक रहेंगे. जिसमें बाजार में खरीददारी बढ़ेगी. विंटर सीजन की सेल से लोगों को मुनाफा हो जाता था. नागरिकता कानून के विरोध में जब आन्दोलन शुरू हुये और उसको दबाने के लिये सरकार ने जिस तरह से धरपकड, जुर्माना वसूली और पुलिस के साथ मारपीट का जो माहौल बना उससे लोग दहशत में आ गये हैं.

ये भी पढ़ें- महाराष्ट्र : पिछड़ी शिवसेना ने पछाड़ा भाजपा को

उसके उपर इंटरनेट की बंदी ने डर को हवा दे दी है. ऐसे में मौल्स और दुकानों में लोगों के जाने वालों की संख्या घट गई है. क्रिसमस में यह माहौल बना रहा. अब नये साल के रंग में भी भंग पड़ रहा है. बाजार के लोग मान रहे हैं कि क्रिसमस की ही तरह नये साल का उल्लास भी नागरिकता कानून की भेंट चढ़ जायेगा.

नक्सली और भूपेश बघेल आमने-सामने

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार आने भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री बनने की शपथ  के साथ “छत्तीसगढ़ सरकार और नक्सली आमने-सामने हैं ” एक तरफ छत्तीसगढ़ सरकार की मंशा नक्सलवाद को समूल नष्ट करने की है दूसरी तरफ नक्सलवाद बुझते दिए की तरह कुछ ज्यादा ही फड़फड़ाने लगा है. अब तो यह समय ही बताएगा कि नक्सलियों की देशभर में सबसे बड़ा संघात सहने वाली कांग्रेस पार्टी, छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने के बाद क्या नक्सलवाद को खत्म कर पाएगी या नक्सलवाद अजेय बन करदेश की राजनीति को भी आंख दिखाता रहेगा. सनद रहे कि कांग्रेस ने झीरम घाटी कांड में नक्सलियों के हाथों अपने बड़े नेताओं को खोया है  मई 2014 का वह समय  था जब झीरम घाटी में एक तरह से कांग्रेसी नेताओं को नक्सलियों ने चारों तरफ से घेर कर बुरी तरह गोलियों से भून डाला था. शायद यह देश की एक सबसे बड़ी घटना थी. जिसमें कांग्रेस पार्टी ने अपने प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल उनके पुत्र दिनेश पटेल, विद्याचरण शुक्ल जैसे कद्दावर नेता जो कभी नेहरू और इंदिरा गांधी के साथ काम कर चुके थे. साथ ही महेंद्र कर्मा जिन्हें बस्तर टाइगर कहा जाता है और जो सलवा जुडूम के प्रवर्तक थे जैसे लोगों को नक्सलियों ने मार डाला था. वह दंश क्या कांग्रेस भूल सकती है? ऐसे में लाख टके का सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार बनने के बाद भूपेश बघेल ने नक्सलवाद को खत्म करने का संकेत दिया है?
नक्सलवाद अंतिम सांसे ले रहा!

जिस तरह छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद पनपा है वह आश्चर्यजनक है.उससे भी बड़ी बात यह है कि आने वाले दिनों में नक्सलवाद नाम की कोई चिड़िया भी कभी थी यह भी लोग सवाल पूछने लगेंगे. क्योंकि जैसी परिस्थितियां बन रही है उससे स्पष्ट आभास मिलता है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने एक अल्टीमेटम जारी कर दिया है कि नक्सलवाद को समाप्त कर दिया जाए नक्सलियों को छत्तीसगढ़ में पूरी तरीके से कुचला जा रहा है इधर नक्सलवादी भी अपने उफान पर आ गए हैं और अपनी जान बचाने के लिए बारंबार हमले घात प्रतिघात  कर रहे हैं. सरकार की बंदूक और नक्सलियों के बंदूक चल रही है अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में क्या नक्सलवाद सरकार के सामने घुटने टेक देगा या सरकार उसका प्रतिरोध के साथ समूल नष्ट कर देगी. क्योंकि भूपेश बघेल सरकार किसी भी हालत में नक्सलवाद को छत्तीसगढ़ में फूटी आंख भी देखना नहीं चाहती जो दंश, जो दर्द, जो त्रासदी   कांग्रेस पार्टी ने सही है उसे कांग्रेस भला कैसे बढ़ा सकती है? यही कारण है कि आए दिन नक्सली मारे जा रहे हैं या फिर नक्सलियों से अब समर्पण  कराया जा रहा है.दूसरी तरफ नक्सली भी लगातार हमले कर रहे हैं और इस हमलों में अनेकों लोग मारे जा रहे हैं.

ये भी पढ़ें- नहीं टूटा मिथक, तीन-तीन मुख्यमंत्रियों को जेल पहुंचाने वाले सरयू राय ने रघुवर

खंदक की लड़ाई जारी है
“बने पुलिस मित्र, तो मिलेगी मौत.”
नक्सल भमरागड़ एरिया कमेटी ने  एक हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए पर्चा भी फेंका . जिसमें ग्रामीण को पुलिस का मित्र बताया है और कहा है कि पुलिस के बहकावे में मत आए. वरना सभी को मौत की सजा मिलेगी. हालांकि नक्सल पर्चा कॉपी वाले पेपर पर लिखकर फेंका गया है, जिससे फर्जी नक्सल हत्या भी हो सकती है. लेकिन अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है. इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल नक्सलियों का गढ़ है और यहां सरकार की बंदूक और नक्सलियों की बंदूक आमने-सामने हैं एक तरह से खंदक की लड़ाई चल रही है लेकिन कुल मिलाकर ही कहा जा सकता है कि सरकार की बंदूक के सामने नक्सली कहीं नहीं टिकेंगे  और अंततः अगर इसमें कोई बड़ी राजनीति नहीं हुई तो नक्सलियों का समाप्त होना तय है. यह खंदक की लड़ाई,सूत्रों के अनुसार एक तरह से अंतिम मोड़ पर है. नक्सली अब हत्याएं करने लगे हैं और लोगों को आगाह कर रहे हैं कि पुलिस का मुखबिर बनना तुम्हारे लिए कितना खतरनाक हो सकता है उलिया  गांव  के  रंजीत तिग्गा की मौत ऐसे ही कई प्रश्न खड़े करती है.
इस संदर्भ में  बस्तर के पखांजूर एएसपी राजेन्द्र जायसवाल का कथन समझने के लिए पर्याप्त है-” उलिया गांव के रहने वाले रंजीत तिग्गा की नक्सलियों ने हत्या कर दी. घटना की जानकारी मिलने पर बांदे पुलिस की टीम उलिया गांव के लिए रवाना हो गई  घटना में शामिल लोगों की पहचान कर कड़ी कार्रवाई की जाएगी.” एएसपी का कहना है कि मृतक रंजीत तिग्गा का पुलिस से कोई लेना देना नहीं था, निर्दोष ग्रामीण की हत्या कर नक्सली उसे पुलिस का आदमी बता देते हैं.

इधर उलिया गांव में नक्सली वारदात से ग्रामीणों में दहशत का माहौल है. वहीं मृतक के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है.

ये भी पढ़ें- महाराष्ट्र : पिछड़ी शिवसेना ने पछाड़ा भाजपा को

ग्रामीणों को नक्सली भयभीत कर रहे
नक्सलियों ने ग्रामीण को पुलिस मित्र बताकर दर्दनाक मौत दी है. दरअसल इसके पीछे नक्सलियों का यह मनोविज्ञान है कि लोगों में नक्सलियों के खिलाफ व्यापक भय फैल जाए और कभी भी  गांववाले  पुलिस की सहायता ना करें इससे नक्सलियों को एक सुरक्षा कवच मिलने की संभावना है. घटना के बाद इलाके के बीच सड़क में ग्रामीण की भीड़ इकठ्ठा हो गई . साथी ग्रामीण की हत्या से गांव के लोग आक्रोशित हो उठे . मृतक ग्रामीण का नाम रंजीत तिग्गा  (24 वर्ष) है ऐसी अनेक घटनाओं के बाद यह कहा जा सकता है कि नशा बाद अब अपनी समाप्ति के मुहाने पर खड़ा है अगर छत्तीसगढ़ सरकार एक दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ती है तो छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा.

Salman Khan Birthday: कभी सब्जियां बेचता था सलमान का ये फैन, अब बना सिंगर

यूं तो सलमान खान के कई फैन हैं, लेकिन उनका एक फैन ऐसा है जिसने सलमान के बर्थडे के मौके पर कुछ स्पेशल करके अपने फेवरेट हीरो को जन्मदिन की बधाई दी है. हम बात कर रहे हैं अरुण कुमार निकम की जो सलमान खान के बहुत बड़े फैन हैं.

कभी सब्जियां बेचते थे अरुण…

सूरत की सड़कों पर सब्जियां बेचने से लेकर गायक बनने तक उनकी जर्नी सबके लिए मिसाल है. बॉलीवुड के सुपरस्टार सलमान की अदाकारी ही हैं जो उनके सपने को आगे बढ़ाने में सबसे बड़ा जरिया बनी. हाल ही में अरुण कुमार ने अपना दूसरा म्यूजिकल वेंचर ‘कैसे मिलू मैं’ लॉन्च किया हैं, जो उन्होंने अपने पसंदीदा स्टार के जन्मदिन के एक दिन पहले उनको डेडीकेट किया है.

अरुण कुमार निकम का जन्म जलगांव में  एक मध्यम वर्गीय महाराष्ट्रीयन परिवार में हुआ. एक गायक-लेखक बनने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पडा.

सलमान की वजह से हुए थे 12वीं में फेल…

जब सलमान खान पर आरोप लगाया गया था और लोगों ने दावा किया था कि वह एक अपराधी है तब अरुण बुरी तरह परेशान हो गए थे. उन्होंने बताया, “तब मैं 12 वीं की परीक्षा मे फेल हो गया था क्योंकि मैं पढ़ाई में  बिल्कुल भी ध्यान केंद्रित नहीं कर सका. लोग भाईजान के बारे में गलत गलत बातें कह रहे थे.” अरुण निकम के परिवार के सदस्य उनसे बिल्कुल खुश नहीं थे, क्योंकि उन्होंने उनकी शिक्षा पर जो भी पैसा बचाया था, वह सब बेकार हो रहा था. जब सब चीजें उनके लिए काम करना बंद हुई तो वह सूरत में सेटल होने और नए सिरे से काम शुरू करने के लिए मजबूर हो गये.

SALMAN KHAN BDAY

ये भी पढ़े- बिग बौस 13 : चुपके-चुपके रोमांस कर रहे हैं ये कंटेस्टेंट

जब हुई सलीम खान से मुलाकात…

“जब मैं पहली बार सूरत गया, तब मुझे कुछ समझ नही आ रहा था की मुझे क्या करना चाहिए ? फिर किसी तरह मैंने सब्जियां बेचना शुरू कर दिया. “2001 से यह संघर्ष भरी कहानी शुरू हुई तब में महज 15 साल का था. उन्होंने सलमान के पिता सलीम खान के साथ एक भेट को याद करते हुए कहा, “मैं सलीम सर से मिला और उनको अपनी इच्छाएं भी बताई कि मैं एक कहानी लिख रहा हूं जिसमें भाई का मुख्य किरदार होगा.” जिससे भी उस दौरान अरुण कुमार मिले उन्होंने कहा “आप लेखक बनने के लिये अभी बहुत छोटे हो. मैं भारत के नामचीन प्रोडक्शन हाउस में भी गया, लेकिन उन्होंने कहा यह मेरे लिए बहुत जल्दी होगा.” 15 साल के होने नाते तब कुछ नहीं हुआ ऐसा उनका मानना है. हालांकि सलमान से मिलने के अपने सपने को नहीं छोड़ते हुए, उन्होंने सप्ताह के दिनों में सूरत में सब्जियां बेचते और हर सप्ताह के अंत में सारी कमाई अपनी किस्मत आजमाई खर्च करते रहे.

14 साल के स्ट्रगल के बाद जब हुई सलमान से मुलाकात…

14 साल तक संघर्ष करते हुए अरुण कभी यह नहीं जानते थे कि वह सलमान से मिलेंगे या नहीं, पर उनका मानना था कि उनकी किस्मत चमक रही थी. उसी दौरान उन्हें संगीत निर्देशक निखिल कामथ के साथ काम करने का एक मौका मिला और अरुण निकम का पहला संगीत प्रोजेक्ट शुरू हुआ. इस पहले प्रोजेक्ट का शीर्षक था ‘वाह तेरी बेवफाई’. “इससे मुझे वह आत्मविश्वास हासिल हुआ जो मैं हमेशा से करना चाहता था जो है सलमान सर के लिए एक कहानी. फिर प्रेम रतन धन पायो ’के सेट पर, मेरा सपना पूरा हुआ. मैं अंत में अपनी आइडल से मिला.”

arun-1

जब भिखारियों के साथ गुजारी रात…

उन्होंने यह भी कहा कि उन कठिन समय के दौरान जब उन्होंने सलमान से मिलने की कोशिश की तो उनके पास पैसे समाप्त हो गए और ऐसी स्थिति हो गई कि वह अक्सर सड़क पर भिखारियों के साथ भोजन करते थे. उस दौरान के कुछ पलो को याद करते हुए उन्होंने कहा, “मैंने खुद से पूछा था कि मैं कैसे निकलूंगा. तब भीतर से एक आवाज उठी, ‘कैसे मिलूं मैं ? ’कुछ इस तरह इस गाने का जन्म हुआ.”

ये भी पढ़े- नागरिकता कानून के मसले पर दिए गए बयान पर कंगना को मिला मनीष सिसोदिया का जवाब

यह मेरा आखिरी मौका है…

अरुण कुमार निकम सलमान से दोबारा मिलना चाहते हैं. सिर्फ इसलिए नहीं कि वह भाई के बहुत बड़े फैन हैं बल्कि इसलिए क्योंकि वह एक अच्छे लेखक है और उनके लिए एक विशेष कहानी भी लिखी है. “मुझे सलमान भाई से सिर्फ एक दिन चाहिए. क्योंकि यह मेरे पास आखिरी मौका है. अगर इसके बाद कुछ नहीं हुआ, तो जाहिर है मुझे फिर से सब्जियां बेचने के लिए वापस जाना होगा. मेरे परिवार ने बहुत समय पहले ही मुझे छोड़ दिया था, हालांकि उस एक एल्बम के लॉन्च के बाद से, हम फिर से बात करने लगे. क्योंकि वे जानते हैं कि मैं अब में स्थिर हूं, ”यह जानते हुए कि वह अपने जीवन में कुछ कर रहा हूं. कठोर परिश्रम ने मेरे लिए यह संभव कर दिया है.”, जुनूनी प्रशंसक अरुण कुमार निकम ने कहा.

arun

लॉन्च में शामिल हुए ये सितारे…

मुंबई के आलीशान सहारा स्टार के सिनेथेक्यु में आयोजित कार्यक्रम में मुकेश ऋषि, सुदेश भोसले, पवन शंकर, संतोष शुक्ला, अभिनव गौतम और अर्शी खान के साथ अरुण कुमार निकम के अन्य टीम मेंबर जिन्होंने हर घड़ी उनका साथ दिया जिनमे अभिनेता विनोद सोनी, निर्माता दीपिका सोनी, ख्याति भट्ट, जय तिलेकर और जेठमल सोनी, वीडियो निर्देशक सागर सहाय, संगीत निर्देशक गौरव कुमार, दोस्त और समर्थक अशोक हदिया, मनोज राठौड़ और अजय सोनी, सुनील मेवावाला, मोहन दास, लेखक-निर्देशक अनुशा श्रीनिवासन अय्यर, सुरेश मिश्रा और अन्य भी इस कार्यक्रम में उपस्थित थे. अनूप जलोटा द्वारा ‘कैसे मिलू मैं ..?’

एडिट बाय- निशा राय

बिग बौस 13 : चुपके-चुपके रोमांस कर रहे हैं ये कंटेस्टेंट

कलर्स पर प्रसारित होने वाला रियलिटी शो  ‘बिग बौस 13’ में कंटेस्टेंट के बीच टकराव के साथ प्यार  भी देखने को मिल रहा है. इस शो में रिश्ते बनते भी है बिगड़ते भी है. जी हां, हम बात कर रहे हैं, कंटेस्टेंट मधुरिमा तुली और विशाल आदित्य सिंह की जोड़ी के बारे में. उन्हें ‘कबीर सिंह’ की जोड़ी के नाम से जाना जाता है. ये दोनों एक दूसरे से जितना प्यार करते हैं लड़ाई उससे कहीं ज्यादा करते हैं.

आपको बता दें, इन दोनों को बिग बौस के घर में कई बार एक दूसरे से लड़ते हुए देखा गया है.  लेकिन कुछ एपिसोड्स से मधुरिमा तुली और विशाल आदित्य सिंह के बीच का रिश्ता काफी तेजी से बदल रहा है.तभी तो घर में दोनों अब एक दूसरे का सपोर्ट करते नजर आए.

ये भी पढ़ें- ‘‘हमारी फिल्म ‘गुड न्यूज’, ‘आई वी एफ’ तकनीक पर है’’ : राज मेहता

दरअसल काम न करने की वजह से पूरा घर मधुरिमा को निशाना बनाता रहा  तो विशाल आदित्य सिंह ने सबको करारा जवाब दिया था.  तो उधर वहीं मधुरिमा भी विशाल के खिलाफ एक शब्द सुनना पसंद नहीं करती है.

हाल ही में दोनों की किसिंग वीडियो काफी वायरल हुई थीं.  पिछले एपिसोड में सुबह बिग बौस ने गाना बजा कर सारे घरवालों को उठाया. इस दौरान मधुरिमा तुली और विशाल आदित्य सिंह एक दूसरे को कंबल में छिप कर किस करते नजर आए.

वैसे आजकल मधुरिमा तुली और विशाल आदित्य सिंह दोनों एक ही बेड शेयर करते हैं. बात करते हुए विशाल आदित्य सिंह ने मधुरिमा तुली से पूछा कि, जब हम रिलेशनशिप में थे तब तुम कभी अपना प्यार क्यों जाहिर नहीं किया. जैसे हमेशा मैं अपने प्यार का इजहार करता हूं. इस शो के अपकमिंग एपिसोड में इस जोड़ी की कैमेस्ट्री और भी ज्यादा दिलचस्प होना वाला है.

ये भी पढ़ें- छोटी सरदारनी : हम सबमें बसती है एक ‘मेहर’

‘‘हमारी फिल्म ‘गुड न्यूज’, ‘आई वी एफ’ तकनीक पर है’’ : राज मेहता

व्यवसायी परिवार में जन्में राज मेहता का फिल्मों के प्रति रूझान बचपन से ही होने लगा था.जब वह उच्च शिक्षा के लिए अमरीका के न्यूयार्क शहर पहुंचे, तो उन्होेने वहां के फिल्म स्कूल से फिल्म विधा की शिक्षा गृहण की और फिर अभिनेता व निर्माता निर्देशक त्रिलोक मलिक की मदद से मुंबई आकर प्रकाश झा से मिले.उसके बाद उन्होेंने कुछ फिल्मेंं बतौर सहायक निर्देशक, कुछ फिल्में बतौर एसोसिएट निर्देशक की.

प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के अंश..

फिल्मों के प्रति रूझान कैसे और कब हुआ ?

मैं दिल्ली में ‘सिरीफोर्ट औडीटोरियम में फिल्मों के प्रीमियर्स व फेस्टिवल्स के वक्त जाा करता था. सिरीफोर्ट औडीटोरियम में ही फिल्म ‘‘सौदागर’’ के प्रीमियर के वक्त  दिलीप कुमार,राजकुमार साहब और मनीषा कोइराला वगैरह आए थे. मुझे याद है मैं अपने चाचा के साथ गया था. तो धीरे धीरे फिल्मों के प्रति रूचि बढ़ती रही. फिर जब मैं उच्च शिक्षा के लिए सात आठ साल अमरीका में रहा, तो वहां पर फिल्म पत्रिकाएं ही पढ़ा करता था. मैं पढ़ाई के बीच मे वहां रिलीज होने वाली हर हिंदी फिल्म देखता था. उन दिनों वहां पर हिंदी फिल्मों के दो थिएटर ही थे. तो बौलीवुड का शौक शुरू से ही रहा है. उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद मैने न्यूयार्क फिल्म स्कूल से फिल्म विधा की भी शिक्षा हासिल की.उसके बाद मुंबई पहुंच गया.

आप मुंबई कब आए और मुंबई में यात्रा किस तरह से शुरु हुई ?

मैं मुंबई फिल्म निर्देशक बनने की इच्छा लेकर ही आया था. लेकिन मुंबई में मैं किसी को जानता नहीं था. लेकिन न्यूयॉर्क में अप्रवासी भारतीय फिल्मकार त्रिलोक मलिक से मेरे अच्छे संबंध थे.उन्होंने ही फिल्म निर्देशक प्रकाश झा से मेरे लिए बात की थी.मुंबई पहुॅचने के डेढ़ माह बाद ही मैंने प्रकाश झा के साथ फिल्म‘आरक्षण’में बतौर सहायक निर्देशका काम करने लगा था.वह एक अलग किस्म का फिल्म स्कूल था.क्योंकि मैंने प्रकाश झा के साथ काम करते हुए जो कुछ सीखा,वह किसी भी फिल्म स्कूल में कोई नहीं सिखा सकता.काम करने का तरीका और उसकी बारीकियां यह सब मैने ‘आरक्षण’के सेट पर काम करते हुए सीखा.मैं उस अनुभव का बहुत-बहुत शुक्रगुजार हूं कि मुझे प्रकाश सर के साथ काम करने का मौका मिला और बहुत कुछ सीखने को मिला.उसके बाद मंैंने ‘यशराज फिल्मस’में बतौर सहायक निर्देशक दो फिल्में की.फिर मैंने शशांक खेतान के साथ बतौर एसोसिएट निर्देशक फिल्म‘‘ हम्टी शर्मा की दुल्हनिया’’की.यह धर्मा प्रोडक्शन की फिल्म थी.उसके बाद ‘कपूर एंड संस’और ‘बद्रीनाथ की दुल्हनियां’की.इस बीच मैने ख्ुाद  दो तीन फिल्मों की पटकथाएं लिखीं.करण जोहर सर से भी अच्छे संबंध बन चुके थे.मैं करण सर का शुक्रगुजार हूं कि उन्होेने मुझे ‘गुड न्यूज’के निर्देशन की जिम्मेदारी दी.

ये भी पढ़ें- ग बौस 13 : सिद्धार्थ शुक्ला के खिलाफ रश्मि देसाई ने घरवालों के भरे कान

आप निर्देशक बनना चाहते थे,तो फिर लिखने का शौक कैसे हो गया ?

फिल्म स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही मेरे अंदर फिल्म पटकथा को लेकर एक समझ विकसित हुई.वैसे तो हम स्कूल की पत्रिका के लिए भी कुछ न कुछ लिखता रहा हॅूं. मगर कहानी लिखना और उसको रोमांचक बनाना,मेरे ख्याल से बहुत ही मुश्किल काम है.फिल्में तो कागज पर ही पहले बनती हैं,उसके बाद सेट पर हम उसको थोड़ा बदलते हैं.यदि कागज पर फिल्म अच्छी नही बनी यानी कि यदि पटकथा अच्छी नही है,तो फिर अच्छी फिल्म बनना मुश्किल है.मुझे अभी भी लगता है कि मैं अच्छा लेखक नही हूं. मैंने कई लेखकों को देखा है, जो ऐसा कुछ लिखते हैंं कि मैं सोच नहीं सकता. मैंने खुज पटकथा लिखी हैं पर मैं दूसरों के लेखन को पढ़ता रहता हूं. मैंने अक्षय कुमार से भी काफी कुछ सीखा.

फिल्म‘‘गुड न्यूज’’के निर्देशन की जिम्मेदारी कैसे मिली ?

मैंने अपनी एक पटकथा करण जौहर सर को पढ़ने के लिए दी थी. उन्हें वह पसंद आयी और उन्होंने उस पर फिल्म बनाने की सोची. फिर मैं खुद भी कई कलाकारों से मिला.करण जौहर ने भी कुछ कलाकारों से बात की, पर बात नहीं बनी. इसी बीच ज्योति कपूर ने ‘गुड न्यूज’ की कहानी दी. हमने इस पर काम किया. करण जौहर को भी यह पसंद आयी और अब यह फिल्म बन गयी.

ज्योति कपूर की कहानी में आपको किस बात ने उत्साहित किया ?

मेरी सोच यह रही है कि कैरियर की पहली फिल्म बहुत ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए. क्योंकि उसी के बलबूते पर आपका कैरियर आगे चलेगा या नहीं चलेगा, यह सब कुछ निर्भर करता है. मैं बतौर एसोसिएट काम कर ही रहा था. इसलिए कुछ भी नहीं बनाना था. ज्योति कपूर की कहानी की आइडिया मुझे बहुत अच्छी लगी. इसकी आइडिया, आईवीएफ तकनीक की जो है, उसने काफी इंस्पायर किया. इसके अलावा दो अलग स्वभाव के दंपति जब आईवीएफ तकनीक से माता पिता बनने के लिए अस्पताल पहुंचे और उनके स्पर्म के अदला बदली का कांड हो जाए तो उनकी जिंदगी में क्या होगा, इस बात ने मुझे इस पर काम करने के लिए उकसाया. जिसके चलते अब फिल्म दर्शकों के सामने आने जा रही है. मैं मूलतः पंजाबी हूं. मुझे इसमें ह्यूमर का स्कोप बहुत नजर आया. निजी जिंदगी में भी मुझे हंसी मजाक करने का शौक है. कहानी में स्पर्म की अदला बदली दुःखद तो है, पर ह्यूमर व हंसी का स्कोप भी बहुत है. इसमें सेंसलेस ह्यूमर नही है. ह्यूमर के साथ कहानी व शिक्षा भी है. मेरा मानना है कि फिल्म देखकर सिनेमा घर से दशक यदि किसी न किसी इमोशन के साथ बाहर निकलता है, तो ही सफलता है. सिर्फ दो घंटे हंसने वाली बात नहीं होनी चाहिए. जब दर्शक अपने साथ कोई इमोशन ले जाता है, तो वह ज्यादा अच्छा लगता है. उसे फिल्म याद रह जाती है. मुझे इसमें यह सब नजर आया.फिर मैने करण जोहर से इस पर चर्चा की. करण जोहर को भी कहानी पसंद आयी.उसके बाद ढाई माह तक मैने ज्योति व रिषभ शर्मा के साथ मिलकर इसकी पटकथा पर काम किया.

आईवीएफ तकनीक के असफल होने का सबसे बड़ा सदमा शारीरिक और मानसिक रूप से औरत को ही झेलना पड़ता है.क्या इस पर आपकी फिल्म कुछ कहती हैं?

नही..हमारी फिल्म का कौंसेप्ट पूरी तरह से ह्यूमरस है. इसलिए कहानी जिस तरह से आगे बढ़ती है, उसमें यह कहीं नही आता.क्योंकि हमारी फिल्म की कहानी जब दो दंपतियों के स्पर्म की अदला बदली हो जाती है, उसके बाद इन दोनो दंपतियों की यात्रा है.इसलिए नेच्युरल कहानी में आई वीएफ तकनीक के असफल होने का औस्पेक्ट नहीं आता है. पर मैं आपकी बात से सहमत हूं कि आई वीएफ तकनीक का प्रोसेस सौ प्रतिशत सफल नही होता है. असफल होने की संभावना होती है. मैं कुछ कपल्स को जानता हूं, जो कि इस तकनीक का आठ से दस बार उपयोग कर चुके हैं. पर नब्बे प्रतिशत सफल हैं. मुझे किसी ने बताया कि इस वक्त आठ मिलियन बच्चे ‘आई वीएफ’ तकनीक की मदद से जन्म ले चुके हैं.कहने का अर्थ यह कि जो कपल्स नेचुरल तरीके सेे माता पिता नही बन सकते, उनके लिए ‘आई वीएफ’ तकनीक मददगार है.

ये भी पढ़ें- शल मीडिया पर वायरल हुई ‘नागिन’ की अदाएं

सरोगेसी पर कानून बनने के बाद आपकी फिल्म‘‘गुड न्यूज’’आ रही है?

हमारी फिल्म सरोगेसी के बारे में कम, आईवीएफ के बारे में ज्यादा है. यह पूरी तरह से आईवीएफ पर ही है.ट्रेलर में भी आईवीएफ के बारे में ही बात की गई.आईवीएफ ऐसी तकनीक है, जिसके संबंध में कुछ लोग जानते है,पर हम इसे ज्यादा लोगो तक पहुंचाना चाहते हैं. मैने अपने शोध के दौरान पाया कि मुंबई व दिल्ली जैसे बड़े शहरों में लोग ‘आई वीएफ ’तकनीक के बारे में जानते हैं,मगर छोटे शहर व गांव के लोेग इससे अनभिज्ञ हैं.

फिल्म देखने के बाद दर्शक अपने साथ क्या लेकर जाएगा ?

मैं यह दावा नही करता कि यह संदेशप्रद फिल्म है. यह एक बहुत ही सिंपल प्यारी कहानी है. लोग इंज्वाय करेंगे. इसमें इमोशंस भी हैं. इसमें गर्भधारण के दौरान एक औरत किन चीजों से गुजरती है, वह सब दर्शक अपने साथ लेकर जाएगा. इसमें कोई बहुत तगड़ा संदेश नहीं है.पर उम्मीद है कि जब दर्शक सिनेमाघर से बाहर निकलेंगे,तो कुछ तो अपने साथ लेकर जाएंगे.

छोटी सरदारनी : क्या मेहर की वजह से हरलीन कर देगी घर का बटवारा ?

सीरियल छोटी सरदारनी में हरलीन का मेहर और सरब के लिए गुस्सा कम होने का नाम ही नही ले रहा है. वहीं परम के स्कूल से निकाले जाने के मामले से हरलीन का गुस्सा नफरत में बदल गया है. आइए आपको बताते हैं क्या होगा अब शो में आगे…

मेहर के लिए बढ़ती हरलीन की नफरत

क्रिसमस के मौके पर जहां मेहर, परम को खुश करती है तो वहीं यूवी और परम के स्कूल से निकाले जाने की प्रौब्लम को भी खत्म कर देती है. पर हरलीन को मेहर का परम के मामले में आना पसंद नही आता.

ये भी पढ़ें- शुभारंभ : क्या अनगिनत अड़चनों के बावजूद हो पाएगी राजा रानी की शादी?

choti-sardarrni

 

सरब और हरलीन के बीच पड़ी दरार

harleen

पिछले एपिसोड में आपने देखा कि सरब, परम के साथ मेहर के बच्चे का नाम भी प्रौपर्टी में जोड़ने के लिए कहता है, जिससे हरलीन गुस्से में आ जाती है. वहीं मेहर, सरब से कहती है कि उसे आने वाले बच्चे के नाम प्रौपर्टी करने की कोई जरूरत नही है, लेकिन सरब, मेहर की बात नही मानता.

क्या हरलीन का फैसला बन जाएगा मेहर के लिए मुसीबत

sarab

अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि हरलीन, सरब से बटवारे के लिए कहेगी. वहीं तरकश, मेहर से कहेगा कि वो कैसे भी करके ये बटवारा रोक ले, लेकिन मेहर तरकश से कहेगी कि अब कुछ नही हो सकता, जिसे सुनकर हरलीन सहित सभी घरवाले चौंक जाएंगे.

ये भी पढ़ें- छोटी सरदारनी : फूटा हरलीन का गुस्सा, क्या परम से दूर हो जाएगी मेहर ?

अब देखना ये है कि क्या घर के बटवारे के बीच क्या सरब और हरलीन का रिश्ता फिर सही हो पाएगा? अब आगेे क्या मोड़ लेेेेगी मेेेहर की जिंदगी जानने के लिए देखते रहिए ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवार, रात 7:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

कैसे समझें अकेलापन को सच्चा दोस्त

आज की युवापीढ़ी सब से ज्यादा अकेलापन महसूस करती है. लेकिन स्मार्टफोन और तरहतरह के गैजेट्स के जमाने में युवा कैसे खुद को अकेला महसूस कर सकते हैं, यह सोच कर ही हमें हैरानी होती है. हमारी जानकारी में तो बुजुर्ग ज्यादा अकेलेपन के शिकार होते हैं. लेकिन, एक रिसर्च पर गौर करें तो आज युवा और किशोर सब से ज्यादा अकेलेपन के शिकार हैं.

विश्व स्वास्थ संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 16 से 24 आयुवर्ग के करीब 40 फीसदी युवा अकेलेपन के कारण डिप्रैशन के शिकार हैं. एक शोध में पता चला है कि इंसान का अकेलापन और सामाजिक रूप से अलगथलग रहने की उस की प्रवृत्ति के कारण उस में दिल की बीमारी का खतरा 29 फीसदी और स्ट्रोक का खतरा 32 फीसदी बढ़ जाता है.

ब्रिटेन में तो इस समस्या से निबटने के लिए अकेलापन मंत्रालय का गठन किया गया है. ब्रिटिश रैड क्रौस की मानें तो ब्रिटेन की कुल आबादी करीब 65 मिलियन यानी 650 लाख है. इन में से करीब 9 मिलियन यानी 90 लाख से ज्यादा लोग अकसर या कभीकभी अकेलापन महसूस करते हैं, लेकिन क्या सच में अकेलापन बहुत खतरनाक है और लोगों को इस से बच कर रहना चाहिए?

कुछ लोगों का मानना है कि अकेलापन काफी भयावह होता है और उन्हें अकेलेपन से डर लगता है. लेकिन कुछ लोग इस की पैरवी करते हैं. कहते हैं कि अकेलापन उन की लाइफ का सब से अच्छा समय होता है, क्योंकि यही वह वक्त होता है जब वे अपने बारे में गहराई से कुछ सोच सकते हैं, अपने अनुसार जी सकते हैं और जो मन में आए कर सकते हैं.

ये भी पढ़ें- अंधविश्वास: पुलिस को भूत का भय

सुकून, अपनी मरजी, रोकटोक नहीं

इसी बात पर बैंक में जौब कर रही 27 साल की प्रकृति, जोकि अपने परिवार से दूर दूसरे शहर में रहती है, का कहना है कि वह अकेले रह कर बहुत खुश है. क्योंकि उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं है. वह कहती है कि अपने सारे काम निबटा कर वह बैंक चली जाती है और जब वापस आती है तो घर में एक अजीब सा सुकून पाती है. फिर जैसे चाहे वैसे ड्रैसअप हो कर आराम से टीवी देखती है, अपनी मनपसंद किताबें पढ़ती है, जो मन हो बना कर खाती है या फिर बाहर से और्डर कर के मंगवा लेती है. वह किसी की परवा नहीं करती कि कौन उस के बारे में क्या सोचता है.

वह कहती है, ‘‘लगता है जिन के साथ पहले मेरे पंख बंधे हुए थे, अब खुल गए हैं और मैं आजाद आसमान में उड़ रही हूं.’’ उस के गिनेचुने ही दोस्त हैं जिन के साथ क्वालिटी टाइम बिताती है. जरूरी नहीं कि जब वह फ्री हो, उस के दोस्त भी फ्री हों, इसलिए खुद अकेली ही फिल्म देखने निकल पड़ती है. भीड़भाड़ और शोरशराबे से दूर उसे अकेले रहना ज्यादा अच्छा लगता है.

वहीं, 21 साल का प्रदीप, जो अपने परिवार से दूर दूसरे शहर में रह कर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है, पूछने पर कि परिवार से दूर अकेले रहते उसे कैसा लगता है, तो हंसमुख मिजाज का प्रदीप कहता है, ‘‘अकेले हैं तो क्या गम है, चाहें तो हमारे बस में क्या नहीं.’’ फिर कहता है कि उसे अकेले रहने में ज्यादा मजा आ रहा है, क्योंकि यहां वह अपनी मरजी से जो चाहे कर सकता है, जो मन हो खा सकता है और जब मन हो तब सो कर उठता है. सब से बड़ी बात कि यहां उसे अपनी मम्मी की डांट खाने को नहीं मिलती है और न ही कोई रोकनेटोकने वाला ही है. वहीं, उस के ही दोस्त निश्चय का कहना है, ‘‘हां, कभीकभी अकेलापन खलने लगता है. तब म्यूजिक सुनने लगता हूं. दोस्तों से, परिवार से बातें कर लेता हूं या बाहर घूमने निकल जाता हूं.’’

20 साल की उन्नति का कहना है कि उसे अकेले में बहुत अच्छा लगता है. वैसे तो वह अभी अपने परिवार के साथ रहती है, लेकिन अकेले में ज्यादा मजा है, क्योंकि आप बेरोकटोक अपनी मरजी से जी सकते हैं, अपने मन की कर सकते हैं.

सिर्फ यही लोग नहीं, और भी कई युवाओं ने अकेले रहने की वकालत की है. उन का मानना है कि अकेले में हम अपने बारे में सोच सकते हैं. कोई फैसला ले सकते हैं. अपनी बुराई और अच्छाई को भी परख कर उसे सुधार सकते हैं. सब से बड़ी बात यह है कि हर बात के लिए पेरैंट्स को जवाब नहीं देना पड़ता है. इसलिए अकेले रहने के बहुत से फायदे हैं.

ये भी पढ़ें- सावधान! पिछले एक पखवाड़े से जल रहा है दुनिया का फेफड़ा

खुद पर ज्यादा फोकस

अमेरिकी लेखिका एनेली रुफुस ने तो बाकायदा ‘पार्टी औफ वन : द लोनर्स मैनिफैस्टो’ नाम से किताब लिख डाली है. वे कहती हैं कि अकेले रहने के बहुत से मजे हैं.

जैसे :

आप खुद पर फोकस कर पाते हैं.

अपनी क्रिएटिविटी को बढ़ा पाते हैं.

लोगों से मिल कर फुजूल बातें करने या झूठे हंसीमजाक में शामिल होने से बेहतर है अकेले वक्त बिताना.

वहीं, अमेरिका की सैंट जोंस यूनिवर्सिटी के ग्रेगरी फिस्ट का कहना है कि  खुद के साथ वक्त बिताने से आप की क्रिएटिविटी को काफी बूस्ट मिलता है. अकेले रहने से आप में आत्मविश्वास बढ़ता है. आजाद सोच पैदा होती है. नए खयालात का खुल कर आप स्वागत करते हैं. जब आप अकेले कुछ वक्त बिताते हैं तो आप का जेहन सुकून के पलों का बखूबी इस्तेमाल करता है. शोरशराबे से दूर तनहा बैठे हुए आप का जेहन सोचनेसमझने की ताकत को मजबूत करता है.

55 साल की भगवंती के पति का 11 साल पहले देहांत हो चुका है. उन के 2 बच्चे हैं. एक अमेरिका में सैटल्ड है और दूसरा अहमदाबाद में. वे अकेली रहती हैं. पूछने पर कि क्या आप को कभी अकेलापन नहीं सताता? खुश हैं आप अकेले? तो कहने लगीं, ‘‘खुशी तो अपने अंदर होती है. अगर आप खुश हैं, तो अकेले भी खुश रह सकते हैं और दुखी हैं, तो भीड़ में भी दुखी ही रहेंगे.’’ रोज वे व्यायाम करती हैं. सैर पर जाती हैं. जरूरतमंदों का खयाल रखती हैं. बैंक से ले कर वे अपने सारे काम खुद ही करती हैं. वे सिर्फ खुद का ही नहीं, बल्कि हमउम्र औरतों को भी, जो अपने जीवन में अकेली रह गई हैं, खुश रहना सिखाती हैं. जरूरत पड़ने पर वे उन्हें डाक्टर के पास भी दिखाने ले कर जाती हैं.

एक शोध के मुताबिक, लंबे समय तक अकेले रहने वाले लोग खुद में ऐसी क्षमता को खोज लेते हैं जो आम लोगों में शायद ही होती है.

अपने पर काबू पाएं

अकेलापन अभिशाप नहीं, बल्कि वरदान हो सकता है आप के लिए, अगर आप चाहें तो. सोचिए कि जिंदगी ने आप को एक मौका दिया है, सिर्फ अपने बारे में सोचने का. पढ़ाई, नौकरी या पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण जो सपने आप के अधूरे रह गए, उन्हें आप पूरा कर सकते हैं. लेकिन, अगर अकेलापन बहुत ज्यादा हावी होने लगे तो कुछ उपायों को अपना कर आप अपने पर काबू पा सकते हैं.

भावनाओं पर काबू रखें : अकेलेपन का सब से बड़ा कारण है मन पर काबू न होना. कई बार मन ऐसी दिशा में बहने लगता है जहां हम खुद को बेहद अकेला महसूस करने लगते हैं. इसलिए अपने मन पर काबू रखें और अपने विचारों को अच्छी बातों पर केंद्रित करें.

कहीं दूर निकल जाएं : जब भी आप बहुत ज्यादा अकेलापन महसूस करें, कहीं दूर घूमने निकल जाएं. इस से आप को अच्छा लगेगा.

ये भी पढ़ें- पूजापाठ नहीं मेहनत से पैसे कमाए

खुद से प्यार करें : अकेलेपन से दूर रहने का सब से अच्छा तरीका है खुद से प्यार करें. आप अपनेआप को सब से बेहतर तरीके से जानते हैं. इसलिए अपनी अच्छीबुरी आदतों पर गौर करें और जरूरत पड़ने पर उन में बदलाव लाने की कोशिश करें. आप की जिंदगी और वक्त, दोनों अनमोल हैं, इसलिए इन का पूरा ध्यान रखें. जिंदगी में खुश रहें, मजे करें. सब बढि़या है, ऐसा सोचें.

क्रिएटिव बनें : अकेलापन यानी आजादी का यह मतलब नहीं कि बस खातेपीते, सोते और टीवी देखते रहें. वक्त मिला है, तो अपने अंदर की कला को बाहर निकालें. हर इंसान में कुछ न कुछ खूबी होती ही है, उसे आप पहचानने की कोशिश करें. शांत बैठ कर सोचें कि आप में क्या विशेषता है.

अकेलेपन का दोस्त हंसी : हंसने से शरीर में एंडोर्फिन नामक हार्मोन निकलता है और इस हार्मोन से गुस्से को कम करने में मदद मिलती है. इसलिए जब कभी अकेलापन महसूस हो, तब मजेदार चुटकुले पढ़ कर खूब हंसें. अपने स्कूलकालेज के दोस्तों के संग जो आप ने चुहलबाजी की थी, उन पलोें को याद कर ठहाके लगा कर हंसिए.

म्यूजिक थेरैपी : जब भी अकेलापन गहराने लगे, अपना मनपसंद संगीत सुनिए. पसंदीदा संगीत सुनने से दिमाग में डोपामाइन हार्मोन हमें खुश करने के लिए उत्साहित भी करता है और प्रेरित भी. इसलिए, मधुर आवाज वाले संगीत को अकेलेपन का दोस्त बनाइए.

पालतू जानवर पालें : यह बात तो आप जानते ही हैं कि जानवर सब से वफादार साथी होता है. इसलिए अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए कुत्ता या बिल्ली पाल लें.

जिज्ञासु न बनें : जरूरी नहीं कि आप के आसपास के लोग, उन की बातें, वहां का माहौल आप को खुशी ही दें. इसलिए उन के बारे में ज्यादा न सोचें. बस, खुश रहें.

अकेलापन दूर करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा ठीक नहीं. एक रिसर्च बताती है कि सोशल मीडिया पर ज्यादा वक्त बिताने वाले लोग ज्यादा अकेलेपन के शिकार होते हैं. आज सोशल मीडिया के कारण ही लोग एकदूसरे से दूर होते चले जा रहे हैं. जरूरी है कि आप अपने मोबाइल, कंप्यूटर के बाहर की दुनिया से संपर्क साधें. लोगों से मिलें जुलें. परिवार, दोस्त और समाज के बीच ज्यादा वक्त बिताएं. कभी आप पर अकेलापन हावी नहीं होगा.

ये भी पढ़ें- सावधान: जानलेवा बन रहा है मोबाइल

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें