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हनी ट्रैप का रुख गांवों की ओर : भाग 2

तीनों सलाहमशविरा कर के रावतसर पुलिस स्टेशन पहुंच गए. थाने में मौजूद सीआई अरुण चौधरी को पीडि़त पक्ष ने अपनी व्यथा सुना दी. सीआई के आदेश पर पुलिस पार्टी ने सादे कपड़ों में होटल पर दबिश दे कर ब्लैकमेलर विपिन शर्मा, उस की पत्नी रितु शर्मा, गोरेधन मीणा, बाबूलाल और मूलचंद मीणा को हिरासत में ले लिया.

पुलिस ने उन के पास से नकदी, चैक, शपथपत्र वगैरह बरामद कर के उन से पूछताछ की. उन लोगों ने सागर शर्मा को ब्लैकमेल करने की बात स्वीकार कर ली. पुलिस ने पांचों आरोपियों से पूछताछ कर उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में धान का कटोरा माने जाने वाली एक तहसील है टिब्बी. घाघर नदी का बहाव क्षेत्र रही यहां की भूमि श्रेष्ठतम उपजाऊ है. इसी तहसील का एक गांव है पीर कामडि़या. अख्तर उर्फ अकरम इसी गांव का बाशिंदा था. वह 16 सितंबर, 2019 को हनुमानगढ़ के जिला स्वास्थ्य केंद्र में दवा लेने आया हुआ था. मरीजों की लाइन में लगे अख्तर के आगे सोमप्रकाश खड़ा था.

दोनों में बातचीत शुरू हुई तो उन्होंने एकदूसरे को अपनेअपने बारे में बताया. सोमप्रकाश ने बताया कि उस का हनुमानगढ़ में जूतेचप्पलों का शोरूम है. तब अख्तर ने सोम से कहा, ‘‘भैया, मेरे एक जानकार के पास पीरकामडि़या गांव में एक काउंटर व एक अलमारी पड़ी है. दोनों ही बहुत बढि़या हालत में हैं. आप के फायदे का सौदा है. आधे दाम में आप को दिला दूंगा.’’

सोम का मन ललचा गया. फिर दोनों ने एकदूसरे को अपने मोबाइल नंबर दे दिए थे, ताकि बात हो सके.

अगले दिन सोमप्रकाश अपनी बाइक से पीरकामडि़या गांव पहुंच गया. फोन करने पर अख्तर आ गया. अख्तर सोम को रशीदा बीबी के घर ले गया. उस के कहने पर वह अलमारी व काउंटर देखने के लिए एक कमरे में घुस गया. तभी वहां मोमन खां व 2 महिलाएं, जो परदे के पीछे थीं, अचानक आ गईं. सभी ने सोम के साथ मारपीट कर उसे निर्वस्त्र कर दिया.

कमरे में मौजूद महिलाएं भी नंगधड़ंग हो गईं. अख्तर ने सोम व महिलाओं की उसी अवस्था में वीडियो बना ली. इस के बाद मोमन खां ने सोम को छुरा दिखाते हुए धमकाया कि अगर उस ने उन का कहा नहीं माना तो वह उसे हलाल कर देंगे. आरोपियों का मंतव्य भांपते ही सोम को जैसे सांप सूंघ गया. वह वैसा ही करता गया, जैसा उन्होंने कहा.

वीडियो बनाने के बाद मोमन खां ने उसे धमकाया, ‘‘देख सोम, तूने 2 महिलाओं का रेप किया है. अब 10 लाख रुपयों की व्यवस्था कर हमें दे दे, नहीं तो तेरे खिलाफ बलात्कार का मुकदमा दर्ज करवाएंगे.’’

अख्तर ने राजीनामे की बात कह कर सोम को मामूली सी राहत की किरण दिखाई.

‘‘अरे भैया, मैं ने किसी का रेप नहीं किया. क्यों झूठी तोहमत लगा रहे हो. आप दोनों भी उस समय कमरे में मौजूद थे.’’ सोम गिड़गिड़ाया.

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‘‘सोम, हम दोनों की मौजूदगी ही तुझे बलात्कारी साबित करेगी. हमारे बयान तेरे खिलाफ होंगे.’’ अख्तर ने उसे फिर डपट दिया.

‘‘भैया, 10 लाख रुपयों का इंतजाम तो मेरी सात पुश्तें भी नहीं कर पाएंगी. हां, 5-7 हजार रुपयों का इंतजाम मैं जरूर कर लूंगा.’’ जैसे सोम ने अपना दिल खोल कर रख दिया.

सभी ने मिल कर सोम को 30 हजार रुपए अदा करने का फरमान सुना दिया. उन्होंने सोम की बाइक भी अपने पास रख ली. फिर सोम को अपने पास से किराया दे कर अगले दिन 30 हजार रुपए लाने के लिए पाबंद कर भगा दिया.

निढाल हुआ सोम जैसेतैसे टिब्बी पुलिस थाने पहुंचा और सीआई मोहम्मद अनवर को आपबीती सुनाई. उस की व्यथा सुनने के बाद सीआई ने आरोपियों को गिरफ्तार करने की योजना बना ली. अगले दिन निर्धारित समय पर सोम पीरकामडि़या गांव पहुंच गया.  उस ने अपने आने की सूचना फोन से अख्तर को दे दी थी.

सभी आरोपी रशीदा बीबी के घर इकट्ठे हो गए थे. सोम रुपए ले कर घर में घुसा तो सादे कपड़ों में आए पुलिसकर्मियों ने पांचों को हिरासत में ले लिया.

थाने में पांचों आरोपियों अकरम उर्फ अख्तर, मोमन खां, अनारा बीबी, रशीदा बीबी और अनीश बीबी से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

हनीट्रैप की तीसरी घटना भी हनुमानगढ़ की ही है. इसी जिले की जिला जेल में तैनात जेल वार्डन निहाल सिंह 9 सितंबर, 2019 को अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद बैरक में आराम कर रहे थे. तभी उन के मोबाइल की घंटी बजी.

उन्होंने काल रिसीव की तो दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘निहाल साहब हैं क्या?’’

‘‘हां, मैं बोल रहा हूं.’’ निहाल सिंह बोले.

‘‘साहब, प्लीज एकांत में आइएगा, आप से खास बात करनी है.’’ दूसरी तरफ से आवाज आई.

निहाल सिंह ने बाहर आ कर कालबैक की तो वह बोला, ‘‘साहब, मैं यूनुस खान बोल रहा हूं. पहचान गए न, लखुवाली निवासी यूनुस उर्फ मिर्जा. आप के यहां कई महीने जेल में रहा था.’’

‘‘अरे याद आया, तू अनवर उर्फ लंबा के साथ जेल में रहा था.’’ निहाल सिंह को याद आ गया.

‘‘साहब, हमारा जेल आनेजाने का क्रम लंबे समय से चल रहा है. अभी पिछले दिनों जमानत पर बाहर आए हैं. आप का अच्छा व्यवहार हमें बहुत पसंद आया था. हम आप को पार्टी देना चाहते हैं. देखो साहब, मना मत करना.’’ युनूस ने कहा, ‘‘साहब, हम ने आज का ही प्रोग्राम बना लिया है. अनवर भी मेरे साथ है. साथसाथ बैठेंगे तो आनंद आएगा.’’

मनचाहा पांसा फेंक यूनुस और अनवर प्रफुल्लित थे. वहीं दूसरी ओर निहाल सिंह भी आनंदविभोर थे. आज उन के अच्छे व्यवहार के सच्चे पारखी मिल गए थे. यूनुस ने कहा कि वह अनवर के साथ बाइक ले कर किला के पास उन का इंतजार कर रहा है.

आधे घंटे में निहाल सिंह वहां पहुंच गए. दोनों निहाल सिंह को बाइक पर बिठा कर गाहड़ू गांव की एक ढाणी में ले गए. वहां मौजूद 2 लोग और एक महिला निहाल सिंह की आवभगत में लग गए.

उन लोगों ने जेल वार्डन को कोल्डड्रिंक पीने को दी. कोल्डड्रिंक पीते ही निहाल सिंह पर नशा छा गया. महिला ने निहाल सिंह को नंगा कर दिया और खुद भी नंगी हो गई. दूसरे लोगों ने निहाल सिंह और महिला का आपत्तिजनक वीडियो बना लिया.

इस के बाद निहाल के साथ मारपीट कर उन्हें डरायाधमकाया गया. दोनों आरोपी हनुमानगढ़ पुलिस थाने के हिस्ट्रीशीटर थे. यूनुस के खिलाफ 32 मामले दर्ज थे तो अनवर के खिलाफ भी दरजनों मुकदमे दर्ज थे.

निहाल सिंह का नशा उतरने के बाद यूनुस बोला, ‘‘देख निहाल, तूने एक महिला का रेप किया है. यह हम नहीं, मोबाइल में सेव वीडियो कह रहा है. अगर अपनी नौकरी व मिलने वाले फंड को बचाना चाहता है तो हमें 3 लाख रुपए दे दे, अन्यथा नौकरी तो जाएगी ही साथ में जेल में भी सड़ना पड़ेगा.’’

यह सुन कर निहाल को कंपकंपी आ गई, ‘‘देखो भैया, मेरे पास अब कुछ भी नहीं है. आप ने मेरे विश्वास की हत्या की है. मैं ने किसी का रेप नहीं किया.’’ निहाल सिंह हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाया.

‘‘देखो साहब, विश्वास को मारो गोली. सीधेसपाट शब्दों में सुन लो, हमें 3 लाख रुपए चाहिए तो चाहिए. तुम कैंटीन वाले पप्पू को फोन कर के अपनी चैकबुक हनुमानगढ़ बसस्टैंड पर मंगवा लो. वहां से चैकबुक अनवर ले आएगा. बस इतनी मोहलत मिल सकती है तुम्हें.’’

बचने का कोई रास्ता न देख निहाल ने जेल की कैंटीन में काम करने वाले पप्पू को फोन कर चैकबुक मंगाई और अनवर को देने को कह दिया.

आधे घंटे में अनवर पप्पू से चैकबुक ले कर ढाणी में आ गया. निहाल ने 2 चैक में डेढ़डेढ़ लाख रुपए की धनराशि भर कर चैक यूनुस खां को दे दिए. आरोपियों ने उस की जेब में पड़ी नकदी भी छीन ली थी. बाद में यूनुस निहाल को हनुमानगढ़ छोड़ गया था.

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10 सितंबर, 2019 को जेल वार्डन निहाल सिंह ने थाना हनुमानगढ़ जा कर सीआई नंदराम भादू को अपना दुखड़ा सुनाया. निहाल सिंह ने रिपोर्ट दर्ज कर मामले की जांच एएसआई जसकरण सिंह को सौंप दी. दोनों हिस्ट्रीशीटर आरोपी अनवर व यूनुस खां फरार हो गए थे. पुलिस उन के पीछे लगी थी.

करीब 20 दिनों बाद जांच अधिकारी जसकरण सिंह ने मुखबिर की सूचना पर यूनुस खान को गिरफ्तार कर लिया. रिमांड की अवधि में यूनुस ने चैक अपने सहयोगियों के पास होना बताया. अदालत के आदेश पर यूनुस को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

लगभग एक महीने में पुलिस के सामने हनीट्रैप के 3 मामले आए. संभव है, कुछ मामले पुलिस तक पहुंचे ही न हों. सभ्य समाज के लिए यह शुभ संकेत नहीं है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सेम सैक्स ग्रुपिज्म से निकलें लड़कियां

लड़के और लड़कियां 2 अलग जैंडर हैं जिन का व्यवहार, पर्सनैलिटी, पसंदनापसंद और सोचविचार सभी इसी जैंडर पर निर्भर करते हैं. निर्भर इसलिए करते हैं क्योंकि बचपन से ही उन के चुनाव इसी जैंडर से प्रभावित होते हैं. लड़की है तो पिंक, लड़का है तो ब्लू, लड़की है तो बार्बी डौल, लड़का है तो एयरोप्लेन, लड़की है तो घरघर, लड़का है तो चोरपुलिस. बस, इसी के चलते 2 अलग जैंडर हमेशा के लिए अलग हो कर रह जाते हैं.

लड़कियों की पहचान इसी कारण शीतल, सौम्य और लड़कों की उत्तेजक? व गुस्सैल की बनी हुई है. यह पहचान उम्रभर साथ रहती है. बच्चे बचपन से ही अपने लैंगिक दोस्त बनाते हैं, और जब यही बच्चे बड़े होतेहोते इन्हीं लैंगिक गु्रप्स में रहते हैं तो उन के विचार, हावभाव, सोच और नजरिया सिर्फ इस एक जैंडर के अनुसार होता है.

लड़कियों के ग्रुप का हाल

लड़कियों का यदि एक गु्रप है जो हमेशा ही साथ रहता है, उस गु्रप की लड़कियां लड़केलड़कियों के मिक्स गु्रप की लड़कियों से बेहद अलग होंगी. उन की बातें हमेशा इस रहस्य से भरी हुई होंगी कि लड़के आपस में क्या बातें करते होंगे, उस लड़की ने कब कौन सी ड्रैस पहनी थी, कौन से मेकअप प्रोडक्ट्स मार्केट में नए आए हैं आदि. जबकि दूसरी यानी मिक्स गु्रप में रहने वाली लड़कियों की बातें दोनों लिंगों के आधार पर होंगी, जिन के विचार और बातें मुक्त होंगी न कि जैंडर बेस्ड.

17 वर्षीया ख्याति दिल्ली के नामी कालेज में पढ़ती है. इंग्लिश औनर्स में उस का प्रथम वर्ष है. ख्याति के कालेज में वैसे तो लड़केलड़कियां दोनों साथ पढ़ते हैं लेकिन उस के गु्रप में केवल लड़कियां ही हैं जिस का एक कारण तो यह भी है कि उस की 54 बच्चों की क्लास में केवल 12 ही लड़के हैं. कालेज के पहले महीने में ही ख्याति और उस की 5 सहेलियों का एक गु्रप बन चुका था.

कालेज के बीते 7 महीनों में ही ख्याति को अब इस गर्ल्स गु्रप से चिढ़ महसूस होने लगी है. हो भी क्यों न, जो मौजमस्ती वह अपनी कालेज लाइफ में करना चाहती थी वह उसे मिल जो नहीं रही.

उस की सहेलियां हर वक्त या तो लड़कों से संबंधित बातें करने में व्यस्त रहती हैं या फिर फैशन से. कालेज आ कर क्लास लेती हैं और कुछ देर कैंटीन में खापी कर घर को निकल जाती हैं. कैंटीन में मयंक जोकि ख्याति का क्रश है अकसर बैठा रहता है. लेकिन ख्याति उस के आसपास उस के दोस्तों को देख कर कभी उस से ‘हाय’ कहने की हिम्मत ही नहीं कर पाती.

उस के मन की यह झिझक पहाड़ बनती जा रही थी जिसे काटने का रास्ता सिर्फ यह था कि वह इस कुएं का मेढक बनना छोड़ नए दोस्त बनाए और लड़कों से बात करना सीखे. नहीं तो होगा यही कि वह सब मजा यों ही हमेशा मिस करती रहेगी और पछताती रहेगी.

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मिक्स ग्रुप के फायदे हैं बहुत

जब गु्रप में विविधता होती है तो साथ ही गु्रप की गतिविधियों में भी विविधता देखने को मिलती है. मिक्स गु्रप में जहां लड़के व लड़कियां दोनों ही साथ होते हैं, उस में विचारों का प्रवाह उन्मुक्त व खुला होता है. साथ ही, इस से अनेक फायदे मिलते हैं जो सेमसैक्स गु्रप में नहीं होता.

गौसिप से बढ़ कर भी बहुत कुछ

लड़कियां जब एक गुट बना कर रहने लगती हैं तो बातें कम और चुगलियां ज्यादा करने लगती हैं. जबकि लड़कों को इस तरह की चुगलियों में खासा इंटरैस्ट नहीं होता. जब लड़केलड़कियां एक साथ एक गु्रप में होते हैं तो उन की बातें अलगअलग तरह की होती हैं. वे सोसाइटी, राजनीति, विज्ञान व अन्य विषयों पर बढ़चढ़़ कर हिस्सा लेते हैं.

रिलेशनशिप्स पर असर

हमेशा लड़कियों से घिरी रहने वाली लड़कियां लड़कों से बात करने में झिझकने लगती हैं. उन्हें लड़के दूसरा जैंडर कम, रहस्यमयी जैंडर ज्यादा लगने लगते हैं. वे किसी लड़के को पसंद भी करती हैं तो उन से अपने दिल की बात कहने से डरती हैं और कभीकभी तो कहती भी नहीं हैं. सैक्स उन के लिए टैबू बन कर रह जाता है. लड़कों के साथ हैंगआउट करने वाली लड़कियों के विचार इस मामले में खुले हुए होते हैं. उन्हें लड़कों से बात करने में किसी प्रकार की नर्वसनैस नहीं होती और वे अपनी बात सामने से कहने में घबरातीं नहीं. वे अपने मन के अनुसार जिसे चाहे उसे डेट करती हैं.

फनफैक्टर का होना

लड़कियों से घिरी लड़कियां भी मजा करती हैं परंतु जो फनफैक्टर लड़कों की मौजूदगी में होता है वह कहीं और नहीं. अब किसी ऐतिहासिक किले में घूमने ही चले जाइए. जहां एकतरफ लड़कियां सैल्फी लेने में बिजी होती हैं वहीं लड़के उछलकूद करते रहते हैं.

इतना ही नहीं, ऐसे भी काम हैं जो लड़कियां करने में झिझकती हैं पर लड़के बड़े आराम से कर लेते हैं, जैसे किले के चारों तरफ बने पार्क में रोमांस करते प्रेमियों को परेशान करने के लिए बारबार उसी ओर जाते रहना. इन सब हरकतों में मजा खूब आता है.

माइंडसैट जानना

दूर से अटकलें लगाते रहने से होता तो कुछ नहीं है. बस, ‘लड़के ऐसे हैं,’ ‘लड़के वैसे हैं,’ ‘उन की सोच ऐसी है,’ ‘वे लड़कियों को ऐसा समझते हैं,’ वाली बातें ही होती रहती हैं. असल में जो लड़कियां लड़कों को जानती हैं, वे वह हैं जो उन की दोस्त हैं, उन के साथ उठतीबैठती हैं और उन्हें समझती हैं. लड़के जब खुद के दोस्त हों तभी पता चलता है कि उन का माइंडसैट कैसा है.

सुरक्षा की भावना

हालांकि लड़कियां लड़कों से कम नहीं हैं और खुद का ध्यान रखना भी बहुत अच्छी तरह जानती हैं लेकिन सुरक्षा से तात्पर्य केवल शारीरिक सुरक्षा ही नहीं होता. लड़केलड़कियों के गु्रप में रहने वाली लड़कियां लड़कों की पहचान करना सीख जाती हैं.

इन लड़कियों पर कोई भी लड़का यों ही ट्राई मारने से पहले 10 बार सोचता है, क्योंकि उसे पता है कि इस लड़की के बाकी लड़के दोस्त इस लड़के को सबक सिखाने से पहले सोचेंगे नहीं. वहीं, केवल लड़कियों के गु्रप में रहने वाली लड़कियों से अकसर ही मनचले आशिक टकराते रहते हैं.

लड़कों को साथ देख कर कोई भी लड़का किसी भी तरह के कमैंट पास करने से कतराता है जबकि सिर्फ लड़कियां साथ हों तो उन्हें अकसर ही राह चलते अजीबोगरीब कमैंट्स सुनने को मिल जाते हैं.

लाइफ में स्पोर्ट्स की ऐंट्री

लड़कियों के गु्रप में सभी अकसर अपनी चालढाल पर खूब ध्यान देतीं हैं. खेलनाकूदना तो दूर, भागती हुई भी नहीं दिखतीं. मिक्स गु्रप का सब से बड़ा फायदा तो यह है कि स्पोर्ट्स से भागने वाली लड़कियों की लाइफ में खेलकूद की एक अलग ही ऐंट्री हो जाती है. लेकिन यह खेल केवल क्रिकेट, फुटबौल या कबड्डी नहीं है.

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असल में लड़के हमेशा अपनी फीमेल दोस्तों से लड़तेझगड़ते रहते हैं, कभी उन का कोई सामान ले कर भाग जाते हैं तो कभी उन्हें परेशान करते रहते हैं. लड़कियों को भी हमेशा ही या तो उन के पीछे या उन से भागते रहना पड़ता है. तो हुई न लाइफ में स्पोर्ट्स की ऐंट्री.

नए दृष्टिकोण की तरफ बढ़ना

जब 2 व्यक्तियों का दृष्टिकोण एकसा नहीं होता तो भला 2 अलग लिंगों का दृष्टिकोण एकसा कैसे होगा. इसलिए मिक्स गु्रप्स में लड़केलड़की दोनों को ही दूसरे लिंग के व्यक्ति का दृष्टिकोण जानने का मौका मिलता है जो सेमसैक्स गु्रप में उन्हें नहीं मिलता. लड़कियों का जीवन बहुत सी सामाजिक जंजीरों से घिरा हुआ होता है, उन्हें अनेक नियमकानूनों में बांधने की कोशिश की जाती है.

दूसरी ओर लड़कों का जीवन बहुत अलग होता है. उन की परेशानियां लड़कियों से बेहद अलग होती हैं. दोनों यदि साथ मिल कर एकदूसरे के दृष्टिकोण जानेंगे तो इस समाज में जो कुरीतियां हैं, जो विकृत सोच है उसे बदलने में वे सक्षम होंगे.

विपरीत अनुभव जानना

लड़कियों के अनुभव लड़कों से हर तरह से अलग होते हैं. लड़कियों के लिए जहां किसी के सामने हलका सा धक्का लग कर गिरना बेहद शर्म की बात हो जाती है, वहीं लड़कों को इन छोटीमोटी चीजों से फर्क नहीं पड़ता. वे अपने जीवन के ऐसे ही मजेदार और कुछ सीरियस अनुभव बता कर यह एहसास करा देंगे कि आप की यह परेशानी तो उन के साथ हुए वाकए से लाख गुना बेहतर है.

मिक्स ग्रुप में अनुभवों की चर्चा एक रोमांचकारी सफर पर जाने जैसा लगता है.

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झारखंड : भाजपा की हार

झारखंड विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के अंदाजे पहले से ही लग रहे थे. देश में नए बनाए गए नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के दौरान इस हार का परिणाम आया. ऐसा लगा है मानो देश की जनता ने पौराणिक परंपरा को थोपने वाली सरकार को फिलहाल सबक सिखाने का मन बना लिया है. हालांकि झारखंड के मतदान कई चरणों में हुए और नागरिकता संशोधन कानून लाए जाने से पहले ही मतदान हो रहा था पर आज दोनों को मिला कर ही देखा जाएगा.

झारखंड में हालांकि पहले की तरह भाजपा को खासे वोट मिले पर कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोरचा के बीच समझौता होने के कारण दोनों को 81 में 47 सीटें मिल गईं. भारतीय जनता पार्टी 25 पर सिमट गई. भाजपा के मुख्यमंत्री रघुबर दास भी अपनी सीट नहीं बचा पाए.

महाराष्ट्र में मिले धक्के के बाद झारखंड में हुई हार से भाजपा का एकछत्र राज करने का सपना टूट रहा है. इस के पीछे कारण वही है जो उस की जीत के पीछे था – धर्म पर आधारित राजनीति. भाजपा दरअसल अपने शासन की नीतियां नहीं परोस रही, वह कोरे धर्मराज की स्थापना को परोस रही है और वह धर्म भी ऐसा जैसा पुराणों में वर्णित है, जिस में ज्यादा से ज्यादा लोग पूजापाठ, अर्चना में लगे रहें, सेवा करते रहें और कुछ मौज मनाते रहें.

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इस देश के कर्मठ लोगों और उपजाऊ जमीन की देन है कि धर्म के मर्म पर पैसा और समय देने की गुंजाइश बहुत रहती है. धर्म के नाम पर सदियों से यहां विशाल मंदिर, पगपग पर ऋषियोंमुनियों के आश्रम बनते रहे हैं. लोग अपनी अंधश्रद्धा के गुलाम बने हुए हैं. इस अंधश्रद्धा को बढ़ाने व भुनाने के लिए एक खास वर्ग सदियों से मुफ्त की खाता रहा है और असल में शासन भी करता रहा है. भारतीय जनता पार्टी उसे ही दोहराना चाह रही थी.

देश के सामने आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक व सामाजिक समस्याओं का अंबार है. लेकिन सरकार को किसी भी समस्या को सुलझाने की फुरसत नहीं है. वह राममंदिर पर सुप्रीम कोर्ट को मनवाने, कश्मीर से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 370 पर, बंगलादेश से आए गरीब मुसलमानों, मजदूरों को भगाने के बहाने सभी मुसलमानों को कठघरों में खड़ा करने, बैकडोर से आरक्षण खत्म करने में लगी रही है.

झारखंड में ही नहीं, हरियाणा व महाराष्ट्र और बहुत से उपचुनावों में यह साफ हुआ है कि सरकार की टैक्स नीतियां भी अमान्य हैं, शासकीय भी. फिर भी भारतीय जनता पार्टी को लग रहा था कि नरेंद्र मोदी की करिश्माई छवि व अमित शाह की कूटनीति से वह जनता को बहकावे में रखने में कामयाब रहेगी.

पौराणिक सोच वालों ने रामायण और महाभारत के युद्धों में जीत के प्रसंग तो बहुत पढ़े हैं पर दोनों महाकाव्यों के नायकों का बाद में क्या हुआ, यह कम ही को मालूम है और यही जनता अब बिना पुराण पढ़े समझने लगी है.

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नहीं टूटा मिथक, तीन-तीन मुख्यमंत्रियों को जेल पहुंचाने वाले सरयू राय ने रघुवर दास को दी मात

झारखंड विधानसभा चुनावों के रिजल्ट आ चुके हैं और इसी के साथ भाजपा के पाले से एक और राज्य खिसक गया. भाजपा की हार से तमाम पार्टियों ने राहत की सांस ली है. कांग्रेस ने तो ऐसा जश्न मनाया मानों केंद्र की सत्ता हासिल कर ली हो. लेकिन यहां मायने ये नहीं रखता कि जीत कितनी बड़ी है बड़ी बात ये है कि ये एक नई हार नहीं है. झारखंड में बीजेपी ने 25, जेएमएम ने 30, कांग्रेस ने 16, जेवीएम (पी) 3, आरजेडी (1), बाकी अन्य के खाते में चार सीटें गईं. 2014 में भाजपा ने यहां आजसू के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई थी.

इस चुनाव में सबसे ‘हौट सीट’ जमशेदपुर (पूर्वी) विधानसभा क्षेत्र बनी हुई थी. जहां से मुख्यमंत्री रघुवर दास चुनाव मैदान में उतरे थे. मिथक है कि राज्य में जितने भी मुख्यमंत्री बने हैं, उन्हें चुनाव में हार का स्वाद चखना पड़ा है. इसलिए सबके मन में यह सवाल आ रहा था कि क्या दास इस मिथक को तोड़ पाएंगे?

रघुवर दास की पहचान झारखंड में पांच साल तक मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की है. बिहार से अलग होकर झारखंड बने 19 साल हो गए है परंतु रघुवर दास ही ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने लगातार पांच साल तक मुख्यमंत्री पद पर काबिज रहे. यही कारण है कि मुख्यमंत्री पर हार का मिथक तोड़ने को लेकर भी लोगों की दिलचस्पी बनी हुई थी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. और एकबार फिर मिथक की जीत हुई. रघुवर दास को सरयू राय ने चुनाव हरा दिया. जबकि इसी जमशेदपुर (पूर्वी) सीट से रघुवर दास पांच बार लगातार विधानसभा चुनाव जीत चुके थे.

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कौन हैं सरयू राय

भ्रष्टाचार के खिलाफ हमेशा आवाज बुलंद करने वाले और तीन मुख्यमंत्रियों लालू प्रसाद, जगन्नाथ मिश्र और मधु कोड़ा को जेल की सलाखों के पीछे भिजवाने में अहम भूमिका निभाने वाले सरयू राय झारखंड विधानसभा चुनाव में एक मिसाल कायम किया है. आखिर किस बात को लेकर वह झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास से भिड़ गए और क्यों उन्होंने मंत्री पद के साथ ही भाजपा छोड़ दी?

सरयू राय से जब पूछा कि क्या रघुबर दास चौथे मुख्यमंत्री होंगे जिन्हें वे जेल भिजवाएंगे ? इस पर उन्होंने कहा था, “खनन विभाग के मसले पर मैं मुख्यमंत्री जी से कह चुका हूं कि यह रास्ता मधु कोड़ा का रास्ता है और इस पर चलने वाला वहीं पहुंचता है जहां मधु कोड़ा गए थे. मैं नहीं चाहता कि चौथा मुख्यमंत्री मेरे हाथ से जेल जाए. क्योंकि मुझे बहुत तकलीफ होती है जब मैं लालू जी की हालत देखता हूं, मधु कोड़ा की हालत देखता हूं. लालू जी हमारे मित्र रहे हैं. मधु कोड़ा हमारे अच्छे राजनीतिक कार्यकर्ता रहे हैं. इसलिए मैं बार-बार कहता हूं कि उस रास्ते पर मत चलिए.”

साल 2017 में 28 सितंबर को सिमडेगा के कारीमाटी की 11 वर्षीया संतोष कुमारी की भूख से हुई मौत के बाद भी सरयू राय ने तत्कालीन प्रमुख सचिव और सीएम रघुबर दास के करीबी अधिकारी के खिलाफ मोर्चा खोला था. भात खाने के इंतजार में संतोषी की मौत के पीछे आधार कार्ड को राशन की सरकारी दुकान के पीओएस मशीन नहीं जुड़े होने को कारण बताया गया था. सरकार ने तब ऐसे हजारों राशन कार्ड को रद्द कर दिया था. राय इसे मुद्दा बनाते हुए सरकार पर हमलावर हो गए थे. उनका यह कदम भी रघुबर से उनकी तल्खी की एक बड़ी वजह माना जाता है.

भारतीय राजनीति में सबसे चर्चित घोटालों में से एक पशुपालन घोटाले को उजागर करने वाले नेता का नाम सरयू राय है. उन्होंने 1994 में पशुपालन घोटाले का भंडाफोड़ किया था. घोटाले के दोषियों को सजा दिलाने के लिए उन्होंने हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक संघर्ष किया. इस मामले में आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव समेत कई नेताओं और अफसरों को जेल जाना पड़ा.

भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए हमेशा झंडा बुलंद करने वाले सरयू राय ने ही बिहार में अलकतरा घोटाले का भंडाफोड़ किया था. झारखंड के खनन घोटाले को उजागर करने में भी राय की महत्वपूर्ण भूमिका रही. सरयू राय ने 1980 में किसानों को दिए जाने वाले घटिया खाद, बीज और नकली कीटनाशकों का वितरण करने वाली सहकारिता संस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाई थी.

बीजेपी के बागी नेता सरयू राय झारखंड में कैबिनेट मंत्री रहे हैं. जमशेदपुर पूर्व सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मुख्यमंत्री रघुबर दास को पराजित कर जीत दर्ज की है. सरयू राय के ट्वीटर हैंडल पर कवर फोटो में लिखा है- ‘अहंकार के खिलाफ चोट, जमशेदपुर करेगा वोट.’ तो क्या अहंकार ने रघुबर दास की नैया डुबोई ? इससे पहले जमशेदपुर पूर्वी से रघुबर दास लगातार पांच बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं. 2014 में रघुबर दास ने कांग्रेस के आनंद बिहारी दुबे को लगभग 70 हजार वोटों से हराया था, लेकिन इस बार वह अपने पुराने सहयोगी से मात खा गए.

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सरयू राय ने जमशेदपुर पश्चिम सीट से 2014 के चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार बन्ना गुप्ता को 10,517 वोटों के अंतर से हराया था. जुझारू सामाजिक कार्यकर्ता और नैतिक मूल्यों की राजनीति करने वाले सरयू राय ने अविभाजित बिहार में अपने जीवन का काफी लंबा हिस्सा बिताया और झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद उन्होंने इसे अपनी कर्मभूमि बना लिया.

रघुबर दास की कैबिनेट में खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री सरयू राय ने इस साल 20 नवंबर को झारखंड मंत्री परिषद से इस्तीफा दिया था. चारा घोटाले पर सरयू राय की लिखी हुई पुस्तक चारा चोर, खजाना चोर चर्चित रही है. मधु कोड़ा लूटकांड भी सरयू राय ने किताब लिखकर घोटालों को उजागर किया था. सरयू राय पर्यावरणविद् भी हैं. उन्होंने दामोदर नदी को प्रदूषण मुक्त करने में कामयाबी पाई थी

साइंस कौलेज, पटना के मेधावी छात्र रहे सरयू राय लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं. 1962 में वह अपने गांव में संघ की शाखा में मुख्य शिक्षक थे. चार साल बाद 1966 में वह जिला प्रचारक बनाए गए. 1975 में देश में जिस वक्त आपातकाल लगा, उस दौरान सरयू को जेल भी जाना पड़ा. संघ ने उन्हें 1977 में राजनीति में भेजा. फिर कुछ सालों तक राजनीति से अलग रहे. जेपी विचार मंच बनाकर किसानों के बीच काम किया. बाद में जब 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ, उसके बाद बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के कहने पर पार्टी में आए. यहां उन्हें प्रवक्ता और पदाधिकारी बनाया गया. इसके बाद उन्होंने एमएलसी, विधायक, मंत्री तक तक की जिम्मेदारी संभाली.

नागरिकता कानून के मसले पर दिए गए बयान पर कंगना को मिला मनीष सिसोदिया का तगड़ा जवाब

सोमवार ,23 दिसंबर को अपनी फिल्म‘‘पंगा’’के ट्रेलर लौंच के मौके पर नागकिरता कानून का विरोध व हिंसा करने वालों के संदर्भ में कंगना ने कहा था- ‘‘इस मामले में मेरी राय तो इतनी लंबी-चौड़ी है कि यहां बताना शुरू करूंगी तो सुबह हो जाएगी. लेकिन इस समय उतना ही कहूंगी, जिससे मेरी फिल्म के ट्रेलर लौन्च इवेंट पर फर्क न पड़े. जब भी आप किसी भी चीज को लेकर प्रदर्शन करते हैं, तो यह ध्यान रखें कि आप हिंसा न करें. हमारे देश की जो जनसंख्या है, उसमें सिर्फ 3 से 4 प्रतिशत लोग ही टैक्स देते हैं, बाकी सबको उसी टैक्स के भरोसे रहना पड़ता है. ऐसे में यह अधिकार आपको कौन देता है कि आप बस और ट्रेन जलाकर देश का माहौल खराब करें. इस बारे में हमें ध्यान रखना होगा, एक-एक बस 90-90 लाख की होती है और यह कोई छोटा अमाउंट नहीं है. इस समय देश की जो हालत है. ऐसे में इस तरह की हिंसा की जरूरत नहीं है. लोग भुखमरी से मर रहे है. लोकतंत्र के नाम पर हम यह सब क्या कर रहे हैं.’’

कंगना ने आगे कहा था-‘‘जब हमारा देश अंग्रेजों के अधीन था, तब इस तरह की आगजनी और प्रदर्शन को कूल समझा जाता था. आज जो आपके लीडर हैं, वह जापान या इटली से तो नहीं हैं, वह आपके ही बीच के इंसान हैं, जो छोटी जगह से उठ कर अपने दम पर लीडर बनें हैं, आज 10-15 साल से वह लीडर हैं,यह उनकी खासियत है. देश के लीडर ने अपने मेनोफेस्टो में जो बात कही थी और उसके बाद उनको सत्ता मिली, वही काम तो वह पूरा कर रहे हैं… अब क्या यह डिमौक्रेसी नहीं है.’’

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फिल्म‘‘पंगा’’के ट्रेलर लौंच के मौके पर नागकिरता कानून का विरोध करने वालों को लेकर दिए गए कंगना रानौट के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर कईयों ने विरोध जताया. तो वहीं दिल्ली के उपमुख्यमंत्री व वित्त मंत्री मनीष सिसोदिया ने मंगलवार कंगना की नींद की है. मनीष सिसोदिया ने एक ट्वीट करते हुए लिखा- ‘‘हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना हर स्थिति में गलत है. यह मानवता और कानून के खिलाफ है.लेकिन यह देश सिर्फ तीन फीसदी लोगों के कर पर आश्रित नहीं हैं. देश का हर व्यक्ति कर देता है, एक दिहाड़ी मजदूर से लेकर अरबपति तक.‘’

मनीष सिसोदिया ने कंगना रानौट की निजी आमदनी में दिहाड़ी मजदूर के योगदान की याद दिलाते हुए कहा-‘‘और हां! यहां तक कि एक मजदूर जब सिनेमा देखने जाता है तो वह फिल्म स्टार की तिजोरी में योगदान देता है और देश के लिए मनोरंजन टैक्स का भुगतान करता है. अब सोचिए कि कौन किस पर निर्भर है.‘’

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ज्ञातब्य है कि जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी में नागरिका कानून के विरोध में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान काफी मात्रा में हिंसा हुई थी. पुलिस पर छात्रों के साथ बर्बरता के साथ पेश आने के आरोप भी लगे थ.इसके बाद स्वरा भास्कर,  सुशांत सिंह, ऋचा चड्ढा, फरहान अख्तर, मोहम्मद जीशान अय्यूब, तिग्मांशु धूलिया, आलिया भट्ट,सौरभ शुक्ला, दिया मिर्जा,  हंसल मेहता, विकी कौशल, भूमि पेडनेकर, परिणीति चोपड़ा,  हुमा कुरैशी,  निमरत कौर,  मनोज बाजपेयी सहित कई बड़ी फिल्मी हस्तियों ने नागरिकता कानून का विरोध कर रहे छात्रों के समर्थन में सामने आए थे.

महाराष्ट्र : पिछड़ी शिवसेना ने पछाड़ा भाजपा को

महाराष्ट्र का घटनाक्र्रम केवल एक राजनीतिक ड्रामा नहीं था बल्कि इस में इतिहास की भी झलक साफसाफ दिखी. अब सारे सूत्र उस वर्ग के हाथ में हैं जो सदियों से पंडापुरोहितवाद से त्रस्त है. उस वर्ग ने महाराष्ट्र में भाजपा के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा रोक लिया है.

‘अंत भला तो सब भला’ की तर्ज पर महाराष्ट्र का सियासी ड्रामा आखिरकार 28 नवंबर की शाम खत्म हुआ, जब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र के 18वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. लेकिन यह अंत एक ऐसा प्रारंभ ले कर भी आता दिख रहा है जिस का गहरा संबंध महाराष्ट्र के इतिहास, जातिगत लड़ाइयों और समाज के अलावा धर्म से भी है.

यह ड्रामा, दरअसल, इतिहास का दोहराव भी है और इस मिथक को भी तोड़ गया कि सत्ता हमेशा सवर्णों या ब्राह्मणों के हाथ में ही रहेगी और जैसा पंडेपुजारियों और पुरोहितों को पूजने वाले चाहेंगे, इस बार या हर बार वैसा ही होगा.

क्या था ड्रामा, क्या थे इस के माने और कैसे विपरीत विचारधारा वाले 3 दल शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने एकसाथ आ कर सब को चौंका दिया, इस सवाल का जवाब महाराष्ट्र के इतिहास से मिलता है.

छत्रपति शिवाजी को महाराष्ट्र के लोग भगवान की तरह पूजते हैं जिन से संबंधित यह तथ्य हर कोई जानता है कि वे हिंदू शासन की नींव रखने वाले पहले शासक थे जिन्होंने पहले मुगलों और फिर अंगरेजों के खिलाफ कई अहम युद्ध कर हिंदू समाज के सभी तबकों को एकजुट किया था.

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लेकिन शासक होने के बाद भी वे तत्कालीन ब्राह्मणों की नजर में राजा नहीं थे क्योंकि ब्राह्मण उन्हें शूद्र मानते थे. तब समाज पर ब्राह्मणवादी ताकतों का दबदबा था और उन की मरजी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था. रूढि़यां, कुरीतियां, अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव और शोषण चरम पर थे और खुद को ईश्वरीय दूत और पूजनीय बताने वाले ब्राह्मणों की हरदम, मुमकिन कोशिश इन्हें बनाए और बढ़ाए रखने की होती थी जो उन की रोजीरोटी थी और जातिगत तौर पर उन्हें दूसरों से श्रेष्ठ साबित भी करती थी.

महाराष्ट्र और शिवाजी में दिलचस्पी रखने वाले बेहतर जानते हैं कि वे पहले मराठा थे जिस ने मुगल शासक औरंगजेब को पराजित कर अपना एक स्वतंत्र राज्य स्थापित किया था, लेकिन दिक्कत यह थी कि उन का विधिवत राज्याभिषेक नहीं हो पा रहा था. वह सिर्फ इसलिए कि ब्राह्मण उन्हें शूद्र या पिछड़ा, कुछ भी कह लें, मानते थे और यह बात शास्त्रसम्मत नहीं थी कि कोई छोटी जाति वाला राजा बने. अगर ऐसा हो जाता तो उन की दबंगई मिट्टी में मिल जाती.

समाज ब्राह्मणों का मुहताज था, इसलिए शिवाजी को हिंदू मान्यताओं व परंपराओं के मुताबिक राजा नहीं माना जा रहा था. ब्राह्मणों ने उन का राजतिलक करने से मना कर दिया था. शिवाजी बहादुर ही नहीं, बल्कि बुद्धिमान भी थे. सो, उन्होेंने ब्राह्मणों को ही हथियार बना कर खुद का राज्याभिषेक उन्हीं से करवा लिया. जातिवादी व्यवस्था से निकलने और तोड़ने का इस से कारगर व बेहतर रास्ता कोई और था भी नहीं.

शिवाजी ने काशी के जानेमाने पुरोहित गागाभट्ट को बुलावा भेजा जिन्होंने यह साबित कर दिया कि शिवाजी शूद्र या पिछड़े नहीं, बल्कि राजस्थान के सिसोदिया वंश के वंशज हैं जोकि एक क्षत्रिय जाति है. इस के बाद समारोहपूर्वक पूरे धूमधड़ाके से शिवाजी का राज्याभिषेक हो गया. ब्राह्मणों को इफरात से दानदक्षिणा मिल गई थी.

शिवाजी की जाति को ले कर विवाद आज भी होते रहते हैं. साल 2016 में सतारा के साहित्य सम्मेलन में एक दलित लेखिका प्रज्ञा पवार ने शिवाजी को शूद्र कहा था. तब खासा बवाल मचा था और प्रज्ञा को सम्मेलन बीच में छोड़ कर जाना पड़ा था. इसी तरह इसी साल जून में अभिनेत्री पायल रोहतगी ने भी शिवाजी की जाति पर टिप्पणी करते उन्हें शूद्र किसान परिवार का बताया था, तब भी बवंडर मचा था. इन पंक्तियों पर भी कुछ को आपत्ति हो सकती है पर इतिहास को अपनी मरजी से तोड़ामरोड़ा भी नहीं जा सकता.

इन और इस तरह के फसादों से जाहिर होता है कि जातिवाद अभी भी खत्म नहीं हुआ है. बात जहां तक शिवाजी की जाति की है, तो उस पर अब विवाद के कोई माने नहीं. वैसे  इतिहासकार भी इस संवेदनशील मुद्दे पर दोफाड़ हैं. एक इतिहासकार प्रोफैसर अब्दुल कादिर मुकद्दस के मुताबिक, शिवाजी के दौर में मराठा प्रभुत्वशाली समुदाय था, लेकिन ज्यादातर लोग निजामशाही में काम करते थे. उन से पहले मराठा समुदाय में किसी ने राजा बनने की कोशिश नहीं की थी.

1857 के स्वाधीनता संग्राम और विनायक दामोदर सावरकर के इतिहास पर लिखने वाले प्रोफैसर शेषराव मोरे के मुताबिक, पहले वर्ण को व्यवसाय के तौर पर बांटा गया, पर बाद में 2 ही वर्ण माने गए. एक था ब्राह्मण और दूसरे तीनों को एक श्रेणी में शूद्र माना गया.

यही तो अब हुआ था

विवादों से परे एक बात शीशे की तरह साफ है कि ब्राह्मणवाद पहले भी शबाब पर था और आज के लोकतांत्रिक युग में भी है. फर्क इतनाभर आया है कि लोकतंत्र के चलते अब गैरब्राह्मणों की आवाज पहले की तरह कुचली नहीं जा सकती और न ही पहले की तरह उन्हें धर्मग्रंथों के आधार पर दबा कर रखा जा सकता है.

महाराष्ट्र का इतिहास ही नहीं बल्कि वर्तमान भी इस बात की पुष्टि करता है कि अब शिक्षित होते और मुख्यधारा में आते पिछड़ों की जागरूकता को आप चुनौती नहीं दे सकते, बल्कि उसे स्वीकार कर लेना ही एकमात्र विकल्प देश के आकाओं के पास बचा है.

24 अक्तूबर को जब महाराष्ट्र विधानसभा के नतीजे आए तो भाजपा शिवसेना गठबंधन ने 288 में से 161 सीटों पर जीत हासिल की. भाजपा को 105 और शिवसेना को 56 सीटें मिलीं. एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटें मिलीं.

उम्मीद की जा रही थी कि भाजपा व शिवसेना का गठबंधन सरकार बना लेगा, लेकिन विवाद उस वक्त उठ खड़ा हुआ जब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने साफ कर दिया कि गठबंधन के 50-50 के फार्मूले के तहत मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा. इधर भाजपा उस के ब्राह्मण चेहरे देवेंद्र फडणवीस के नाम पर अड़ गई थी कि मुख्यमंत्री वही होंगे और उस ने ऐसा कोई वादा नहीं किया था जैसा कि उद्धव ठाकरे कह रहे हैं.

इस विवाद को शुरू में मराठा राजनीति के सर्वमान्य चेहरे और एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने खामोशी से देखा व सम झा. मीडिया के पूछने पर बारबार वे यही कहते रहे कि उन्हें विपक्ष में बैठने का आदेश जनता ने दिया, इसलिए वे  विपक्ष में बैठेंगे.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अब तक बेफिक्र थे जो बाद में उन की बड़ी गलतफहमी, जिसे नादानी कहना ज्यादा ठीक होगा, साबित हुई कि उद्धव ठाकरे भाजपा के बगैर सरकार नहीं बना पाएंगे, कुछ दिनों में ही उन की ठसक निकल जाएगी और फिर वे उन की शरण में आ जाएंगे. चाणक्य और सरकार बनाने व गिराने के पंडित माने जाने वाले अमित शाह को उस वक्त  झटका लगा जब शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के साथ आ कर सरकार बनाने की चर्चा शुरू हुई.

शिवसेना पर उस के जन्म से ही कट्टर हिंदूवादी होने का ठप्पा लगा है. लिहाजा, यह बात किसी के भी गले नहीं उतर रही थी कि ऐसा भी हो सकता है. बिलाशक, यह पूरब और पश्चिम के मिलने जैसी बात थी. मामला अधर में लटका रहा. भाजपा और उद्धव ठाकरे दोनों अपनीअपनी जिद पर अड़े रहे.

भाजपा की तरफ से यह दावा किया जाता रहा कि वह ही सरकार बनाएगी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ही होंगे. इसी तरह उद्धव ठाकरे भी अड़ गए थे कि चाहे कुछ भी हो जाए, मुख्यमंत्री तो कोई शिवसैनिक ही होगा.

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यों बिगड़ी बात

बात एक नवंबर से तब बिगड़ी थी जब शिवसेना सांसद संजय राउत ने यह कहा कि शिवसेना अपने दम पर सरकार बना लेगी. इस के पहले शिवसेना भाजपा की वह पेशकश ठुकरा चुकी थी कि उसे उपमुख्यमंत्री पद दे दिया जाएगा.

2 नवंबर को महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि देशभर में हलचल हुई जब उद्धव ठाकरे ने फोन पर शरद पवार से बात की. फिर दूसरे ही दिन 3 नवंबर को संजय राउत ने यह दावा कर डाला कि उन के पास 170 विधायकों का समर्थन है. इस बयान को गंभीरता से लिया जाता, इस के पहले ही शरद पवार ने यह बयान दे डाला कि जिन के पास संख्या बल है उन्हें ही सरकार बनानी चाहिए.

यहीं से शरद पवार की भूमिका शक के दायरे में आने लगी कि आखिर वे चाहते क्या हैं. राजनीतिक विश्लेषकों ने उन्हें चाणक्य, चालबाज और खिलाड़ी कहना शुरू कर दिया. 5 नवंबर को शिवसैनिकों ने मुंबई में उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने के पोस्टर लगा दिए. यह बात, हालांकि 24 अक्तूबर से ही कही जा रही थी इसलिए लोगों ने सम झा यही कि पुत्रमोह उद्धव की जिद की वजह है.

6 नवंबर को शरद पवार ने फिर से पलटी मारते यह बयान दे डाला कि हम विपक्ष में बैठेंगे, जनता ने भाजपा व शिवसेना को सरकार बनाने का जनादेश दिया है.

बिलाशक, शरद पवार सियासी चालें ही चल रहे थे जिन का मकसद यह नापातोली करना भी था कि उद्धव ठाकरे वाकई गंभीर हैं या फिर भाजपा को हड़काने के लिए उन के नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं. यानी, वे शिवसेना प्रमुख को ठोकबजा कर परख रहे थे और उकसाने के साथ तरसा भी रहे थे. तजरबेकार और सयाने इस नेता की यह आशंका अपनी जगह ठीक थी कि कहीं उद्धव ठाकरे हिंदुत्व के नाम पर जज्बाती हो कर भाजपा की बात न मान लें या फिर भाजपा ही उन्हें रोकने के लिए उद्धव ठाकरे की मांग न मान ले.

खेल अब किसी जासूसी उपन्यास जैसा दिलचस्प और सस्पैंसभरा हो चला था क्योंकि 8 नवंबर को सरकार का कार्यकाल खत्म हो रहा था. उस दिन तक आम लोग यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि उद्धव ठाकरे कोई और रास्ता न निकलते देख भाजपा की बात मान लेंगे और गठबंधन दूसरी बार सरकार बना लेगा.

7 नवंबर को संजय राउत ने यह कहते इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया कि भाजपा को ऐलान कर देना चाहिए कि वह सरकार बनाने में सक्षम नहीं है. सदन में पता चल जाएगा कि हमारे पास क्या आंकड़े हैं.

8 नवंबर को  देवेंद्र फडणवीस ने मन मारते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया तो तसवीर साफ हो गई कि शिवसेना-भाजपा गठबंधन सरकार नहीं बना रहा है. संवैधानिक औपचारिकता निभाते हुए राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने बहैसियत सब से बड़ा दल भाजपा को सरकार बनाने का आमंत्रण दिया.

भाजपा ने सरकार बनाने से इनकार कर दिया. इस के बाद राज्यपाल ने शिवसेना और एनसीपी को भी सरकार बनाने का न्योता बारीबारी से दिया. लेकिन, चूंकि 144 का आंकड़ा किसी के पास नहीं था, इसलिए सभी ने सरकार बनाने में असमर्थता जाहिर कर दी. 12 नवंबर को उम्मीद के मुताबिक राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.

फिर यों बनी बात

अनिश्चितता का माहौल और गहरा हो उठा लेकिन भीतर ही भीतर एक नया विचार और गठबंधन लगभग आकार ले चुका था. 15 नवंबर को पहली बार यह बात सामने आई कि शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस मिल कर सरकार बनाएंगे और इस बाबत फार्मूला तैयार हो चुका है कि मुख्यमंत्री शिवसेना का ही होगा.

?लेकिन शरद पवार अभी भी पूरी तरह निश्ंिचत और आश्वस्त नहीं थे. लिहाजा, उन्होंने शिवसेना से एनडीए से अलग होने को कहा तो किसी भी कीमत पर सरकार बनाने की जिद लिए बैठे उद्धव ठाकरे ने उन की यह बात भी मान ली. 16 नवंबर को संजय राउत ने घोषणा कर डाली कि अब सरकार बनाने की औपचारिकताएं ही शेष रह गई हैं.

अब तक की उठापटक में कांग्रेस की भूमिका एक तटस्थ दर्शक की सी थी. लेकिन गठबंधन के आकार लेते ही वह सक्रिय हो गई. यह वह वक्त था जब शरद पवार उद्धव ठाकरे को ले कर पूरी तरह निश्ंिचत और आश्वस्त हो चुके थे. लेकिन वे यह भी सम झ रहे थे कि भाजपा इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं. लिहाजा, वे भागेभागे सोनिया गांधी के पास पहुंचे. अब गेंद सोनिया गांधी के पाले में थी. महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार बनाने की उन्होंने इजाजत या सहमति, कुछ भी कह लें, दे दी तो बात आगे बढ़ी. पर तमाम चर्चाएं हां और न के बीच लटकी रहीं या शरद पवार ने जानबू झ कर लटकाए रखी, एक ही बात है.

इसी बीच, शरद पवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मिले तो सस्पैंस और गहरा उठा. सारे देश ने एक स्वर में स्वीकारा कि शरद पवार 2 तरफ खेल रहे हैं और वे कभी भी भाजपा को समर्थन दे कर उस के साथ सरकार बना सकते हैं.

हालांकि अब तक गठबंधन सरकार के तमाम फार्मूले तैयार हो चुके थे लेकिन इस मुलाकात ने शरद पवार को फिर कठघरे में ला खड़ा कर दिया. इस में कोई शक नहीं कि शरद पवार नरेंद्र मोदी के पास मौसम का मिजाज पूछने नहीं गए होंगे. इस बात में दम है कि वे अपनी बेटी सुप्रिया सुले को केंद्र में मंत्री पद दिलाना चाहते थे जिस से उन के भतीजे अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति संभाले रहें और परिवार में फूट न पड़े.

भगवा खेमे ने तो प्रचार भी शुरू कर दिया कि भाजपा ही सरकार बनाएगी और एनसीपी उस का हिस्सा होगी. लेकिन 22 नवंबर को फिर सभी को चौंकाते हुए शरद पवार ने शिवसेना और कांग्रेस के नेताओं के साथ मीटिंग कर सरकार के गठन का खाका खींचने का ऐलान भी कर दिया कि सारी बातें तय हो चुकी हैं और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ही होंगे.

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तय यह हुआ कि 23 नवंबर को तीनों दलों के नेता राज्यपाल के पास जा कर सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे लेकिन 23 नवंबर की ही सुबह उस वक्त न केवल मुंबई और महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश में सनाका खिंच गया जब अलस्सुबह लोगों को मालूम हुआ कि देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री और शरद पवार के भतीजे व एनसीपी विधायक दल के नेता अजित पवार को राज्यपाल ने उपमुख्यंत्री पद की शपथ दिला कर उन्हें 30 नवंबर तक बहुमत सिद्ध करने का समय दिया है.

चोरीचोरी चुपकेचुपके

यह देश के लोकतंत्र का बेहद शर्मनाक नजारा और काला दिन था जिस में संविधान की धज्जियां खुलेआम पूरी बेशर्मी से उड़ाई गईं. बहुमत न होने पर भी देवेंद्र फडणवीस द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने पर भाजपा की खूब छीछालेदर हुई. एक बार फिर भक्तों ने मोदीशाह की जोड़ी को सरकार बनाने का वैद्यहकीम कह कर प्रचारित किया.

इस रात किसी दुश्मन देश ने सीमा पार से हमला नहीं किया था और न ही देश के अंदर कहीं आतंकियों ने बम फोड़े थे, बल्कि आधी रात को राज्यपाल ने राष्ट्रपति से महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटाने के लिए पत्र लिखा और देररात ‘जाग’ रहे राष्ट्रपति ने इसे तड़के मंजूरी भी दे दी और सुबह गुपचुप तरीके से शपथ भी हो गई. यह जान कर महसूस हुआ कि शायद हालात इमरजैंसी से भी बदतर हो गए हैं और सत्तारूढ़ भाजपा मनमानी व तानाशाही पर उतारू हो आई है.

अजित पवार ने क्यों भाजपा से हाथ मिलाया, यह राज शायद ही कभी उजागर हो लेकिन आफत फिर से शरद पवार की आ गई जिन पर तरहतरह की उंगलियां उठने लगी थीं. शरद पवार ने सफाई दी लेकिन उन पर सिवा उद्धव ठाकरे के किसी ने यकीन नहीं किया. निस्संदेह इस भीषण वक्त में भी उद्धव ने पर्याप्त सम झदारी और धैर्य का परिचय दिया.

बाजी फिल्मी स्टाइल में एक बार फिर पलट गई और हर किसी ने मान लिया कि अब भाजपा बहुमत साबित कर देगी क्योंकि एनसीपी में नंबर 2 की हैसियत रखने वाले अजित पवार कम से कम 15-20 विधायकों को तो फोड़ ही ले जाएंगे. बाकी का इंतजाम भाजपा कर लेगी. बात में दम इस लिहाज से था कि अजित पवार भी 4 दशकों से जमीनी राजनीति कर रहे थे और शरद पवार उन पर आंख बंद कर भरोसा करते रहे थे. इतिहास इस तरह के छलप्रपंचों से भरा पड़ा है कि रातोंरात पारिवारिक षड्यंत्र रचे गए और सत्ता बदल गई.

शिवसेना ने संभाला मोरचा

इस में शक नहीं कि राज्य महाराष्ट्र न होता और सामने शिवसेना नहीं होती तो अमित शाह अक्तूबर में ही भाजपा सरकार बनवा चुके होते. ठीक वैसे ही जैसे कभी कर्नाटक, गोवा और मणिपुर में बनाई थी.

एक बार फिर तीनों दलों की मीटिंग हुई जिस में सभी ने विकट की द्यएकजुटता दिखाई. तीनों दलों ने अपनेअपने विधायकों को मैनेज किया जिस से भाजपा के इस मंसूबे पर पानी फेरा जा सके कि सत्ता के लालच में विधायक उस की तरफ खिंचे चले आएंगे. विधायकों को ऐसे नाजुक मौकों की परंपरा के मुताबिक होटलों में नजरबंद कर रखा गया. शिवसैनिकों ने भाजपा को किसी भी दल के विधायक के पास फटकने नहीं दिया.

कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो उन्हें न्याय और राहत दोनों मिले. सुप्रीम कोर्ट ने देवेंद्र फडणवीस को बहुमत साबित करने के लिए 28 नवंबर का वक्त दिया लेकिन नाटकीय तरीके से उन्होंने 27 नवंबर को ही इस्तीफा दे दिया. उन के पहले अजित पवार ने भी राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया था.

इस से साबित हो गया कि भाजपा अंधेरे में तीर चला रही थी लेकिन साबित यह भी हुआ कि उद्धव ठाकरे और शिवसेना के जमीनी खौफ और बाहुबल के आगे उस की एक न चली. एक भी विधायक इधर से उधर भाजपा नहीं कर पाई तो यह उद्धव की फुरती थी और उन का मकसद भी था.

देवेंद्र फडणवीस के इस्तीफे के पहले दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कार्यकारी अध्यक्ष जे पी नड्डा ने मीटिंग की और यह तय किया था कि तमाम चालें उलटी पड़ रही हैं. ऐसे में भलाई और सम झदारी इसी में है कि चुपचाप पांव वापस खींच लिए जाएं ताकि और जगहंसाई न हो.

अब ताबड़तोड़ तरीके से तीनों दलों ने एकजुटता व सम झदारी दिखाई और राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश कर हारी हुई बाजी शानदार तरीके से जीत ली. जबकि तिलमिलाते भाजपाई महाराष्ट्र की सत्ता हाथ से जाते देखते रह गए.

देखते ही देखते माहौल बदला, रंगत बदली और लोगों के सोचने का नजरिया भी बदला कि क्यों नहीं शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस जैसी विपरीत विचारधारा वाली पार्टियां सरकार बना और चला सकतीं. महाविकास अघाड़ी बना और उस ने अपना न्यूनतम सा झा प्रोग्राम यानी एजेंडा भी जारी कर दिया जो धर्मकर्म की राजनीति से परहेज करता हुआ ही दिखाई दे रहा है. अघाड़ी मराठी शब्द है, इसे हिंदी में गठबंधन कहते हैं.

28 नवंबर की शाम मुंबई का शिवाजी पार्क गुलजार था जहां एक नई इबारत लिखी गई. स्टेज को जानबू झ कर शिवाजी के दरबार जैसा सजाया गया था और इस के पीछे एक मैसेज भी था.

शिवाजी, पिछड़े और लोकतंत्र

मैसेज यह था कि सही माने में देश में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की नींव शिवाजी ने ही रखी थी जिन के शासन में सभी वर्गों व धर्मों के लिए बराबर की जगह व महत्त्व मिला हुआ था.

ऊपर उन की जाति का जिक्र यह बताने के लिए किया गया है कि पंडेपुरोहितों को यह बरदाश्त नहीं हो रहा था कि कोई गैरब्राह्मण शासक बने. भाजपा ब्राह्मण देवेंद्र फडणवीस को थोपते यही कोशिश कर रही थी लेकिन लोकतंत्र में चूंकि राज्याभिषेक पुरोहित नहीं, बल्कि जनता करती है, इसलिए भाजपा मात खा गई.

इतिहास यह भी बताता है कि शिवाजी ने कभी पंडों के पांव नहीं धोए, कर्मकांड नहीं किए, धार्मिक पाखंड नहीं किए. इसलिए, ब्राह्मण उन्हें बहिष्कृत करते रहे. लेकिन जब उन्हें यथोचित दक्षिणा मिल गई तो उन्होंने शिवाजी को क्षत्रिय भी घोषित कर दिया.

सीधेसीधे कहा जाए तो उद्धव ठाकरे ने शरद पवार की मदद से बिना पंडों के अपना राज्याभिषेक करवा लिया है और इस में जागरूक होती पिछड़ी जाति वालों का खासा साथ और योगदान रहा है.

उद्धव ठाकरे ने खुद का तो लोकतांत्रिक अभिषेक कराने के साथ ही नरेंद्र मोदी के चक्रवर्ती सम्राट बनने के राजसूई यज्ञ का घोड़ा महाराष्ट्र में पकड़ उन की अधीनता स्वीकारने से मना कर दिया और उन्हें पराजित भी कर दिया.

चुनाव के पहले ही सभी दल पिछड़ों को साधने में जुट गए थे. खासतौर से शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने इस चुनाव में पिछड़ों की अहमियत सम झी थी और चुनाव के ठीक पहले वे धनगर, घुमंतु, कुनबी, बंजारा, तेली, माली और दूसरी पिछड़ी जाति के प्रतिनिधियों से मिले थे और उन्हें आश्वस्त किया था कि उन के स्वाभिमान और आत्मसम्मान का वे पूरा खयाल  रखेंगे. ये वे जातियां हैं जो सदियों से ब्राह्मणों के शोषण और अत्याचारों का शिकार रही थीं. धर्मग्रंथ इन्हें शूद्र बताते थे, लेकिन लोकतंत्र में इन की गिनती पिछड़ों में की जाने लगी है.

उलट इस के, भाजपा इस मुगालते में रही कि उसे तो पिछड़े वर्ग के वोट महज इस आधार पर मिलेंगे कि नरेंद्र मोदी पिछड़ी जाति के हैं और नरेंद्र मोदी ने चुनावी सभाओं में खुद के पिछड़ा होने की दुहाई दे कर भी वोट मांगे थे.

लेकिन हकीकत यह थी कि भाजपा के पास कोई वजनदार पिछड़ा नेता था ही नहीं. कभी भाजपा के लिए गोपीनाथ मुंडे ने पिछड़ों को पार्टी से जोड़ा था लेकिन उन के निधन के बाद उन की बेटी पंकजा मुंडे पिछड़े वर्ग को साध नहीं पाईं. भाजपा केवल एक ब्राह्मण चेहरे के सहारे लड़ी और उस ने एकनाथ खड़से और विनोद ताबड़े जैसे जमीनी पिछड़े नेताओं को हाशिए पर ला पटका था.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस बात को सम झ नहीं पाए कि पिछड़े अब जागरूक हो चुके हैं, इसलिए वे उन के इस  झांसे में नहीं आए कि विपक्षी सरकारें पिछड़ों के लिए कुछ नहीं कर पाईं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार पिछड़ों के लिए कुछ नहीं कर पाई. हालांकि मोदी ने ही संवैधानिक ढांचे के जरिए पिछड़े वर्ग के लोगों की समस्याओं के लिए ओबीसी आयोग का गठन किया.

दलितों का भरोसा खो चुकी भाजपा अब पिछड़ों का भी भरोसा खो रही है.  इस की वजह पिछड़ों की छटपटाहट है कि भाजपा बातों के बताशे तो बहुत फोड़ती है लेकिन पिछड़ों के लिए कुछ ठोस नहीं करती. सवर्णों से ज्यादा पिछड़े वर्ग के नौजवान रोजगार के लिए तरस रहे हैं. पिछड़ा आयोग और आरक्षण  झुन झुना साबित हो रहे हैं क्योंकि सरकार के पास देने को नौकरियां ही नहीं हैं और प्राइवेट सैक्टर नोटबंदी व जीएसटी के बाद से तंगी, बदहाली के दौर से गुजर रहा है.

लोकसभा चुनाव में पिछड़े वर्ग ने भाजपा का साथ महाराष्ट्र में भी दिया था, लेकिन विधानसभा ने उस से मुंह फेर लिया. इस से जाहिर है उस का पुरोहितों की इस पार्टी से मोहभंग हो रहा है और इसी का नतीजा है कि अक्तूबर 2018 में देश के 70 फीसदी हिस्से पर राज करने वाली भाजपा नवंबर 2019 में 40 फीसदी हिस्से पर सिमट गई है. दिल्ली और  झारखंड में भी पिछड़े भाजपा से यों ही बिदके रहे तो भगवा ग्राफ और भी गिरेगा.

महाराष्ट्र में पिछड़ों की कोई 356 जातियां हैं जिन में से 15 फीसदी को ही आरक्षण का लाभ मिल रहा है. वोटों के लिहाज से देखें तो इस राज्य में 40 फीसदी पिछड़े वोट हैं जो विधानसभा चुनाव में बड़ी तादाद में एनसीपी और शिवसेना के साथ आए. राजनीति से हट कर देखें तो यह सवर्ण और पंडों की पार्टी भाजपा से विद्रोह ही नजर आता है. महाराष्ट्र में भाजपा ने कभी ब्राह्मण प्रमोद महाजन को खूब भुनाया था. फिर उसे लगा कि पिछड़ों के बगैर काम नहीं चलना, तो वह इस वर्ग के गोपीनाथ मुंडे को आगे ले आई. इस चुनाव में पंकजा मुंडे की हार में देवेंद्र फडणवीस का रोल देखा जा रहा है, तो बात कतई हैरत की नहीं.

भाजपा ने सत्ता के लिए पिछड़ों का खूब इस्तेमाल किया और फिर उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका. कल्याण सिंह और उमा भारती इस की जीतीजागती मिसाल हैं. यही अब मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह जैसों के साथ हो रहा है.

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद यादव सत्ता की छत पर अपनीअपनी जाति के वोटों के दम पर पहुंचे थे, लेकिन भाजपा ने दूसरी पिछड़ी जातियों का हाथ थाम कर इन कद्दावर नेताओं का जो हाल किया वह किसी से छिपा नहीं है. हरियाणा में जाटों ने भाजपा का भरोसा नहीं किया तो महाराष्ट्र से मराठा समुदाय जो उस पर शिवाजी के वक्त से ही भरोसा नहीं करता.

एक दिलचस्प समीकरण महाराष्ट्र में यह भी देखने में आया कि दलित और मुसलिम समुदाय वापस कांग्रेस की तरफ लौट रहा है यानी राजनीति अपने परंपरागत ढर्रे पर आ रही है जिस में भाजपा के खाते में सवर्ण और संपन्न पिछड़े ही बच रहे हैं.

शरद पवार ने सामाजिक वजहों के चलते उद्धव ठाकरे का साथ ज्यादा दिया लगता है और इस बाबत सोनिया गांधी को मनाने में भी वे कामयाब रहे हैं जिन का मकसद भी भाजपा को कमजोर करना है.

महाराष्ट्र से एक नई शुरुआत तो हुई है कि विपरीत विचारधारा वाले दल साथ आएं, यह बात स्वागतयोग्य होनी चाहिए. महा विकास अघाड़ी कितना चलेगा, यह बात कतई महत्त्वपूर्ण नहीं है. महत्त्वपूर्ण यह है कि महाराष्ट्र में धर्म और जाति की राजनीति की नई परिभाषा गढ़ी जा रही है. बात सिर्फ विकास की हो रही है जो इस अघाड़ी की मजबूरी भी हो जाएगा.

छोटी सरदारनी : क्रिसमस पर मेहर लाएगी परम के चेहरे पर खुशी, क्या करेगी हरलीन ?

सीरियल छोटी सरदारनी में जहां एक तरफ हरलीन मेहर को अपने फैसले के बचे हुए दिन याद दिला रही है तो वहीं दूसरी तरफ परम को धीरे-धीरे मेहर से दूर करने की कोशिश करने में जुट गई है, लेकिन मेहर क्रिसमस के मौके पर परम के चेहरे पर खुशी लाने वाली है. आइए आपको बताते हैं शो में क्या होगा आगे…

कुलवंत मांगेगी माफी

पिछले एपिसोड में आपने देखा कि सरब मेहर की मां कुलवंत कौर को टीचर पर हाथ उठाने के लिए माफी मांगने को कहता है, जिसके बाद कुलवंत कौर स्कूल जाकर टीचर से माफी मांगने को तैयार हो जाती है.

छोटी सरदारनी : फूटा हरलीन का गुस्सा, क्या परम से दूर हो जाएगी मेहर ?

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परम को क्रिसमस पर सरप्राइज देगी मेहर

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अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि मेहर कहीं गायब हो जाएगी, जिससे पूरी फैमिली मेहर को ढूंढने में लग जाएगी. वहीं मेहर, परम के चेहरे पर खुशी लाने के लिए क्रिसमस के मौके पर सांता क्लॉस बनते हुए नजर आएगी.

परम को खुश करने की कोशिश करेगी मेहर

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क्रिसमस के मौके पर मेहर, परम के लिए सांता क्लॉस के लुक में दिखेगी. इसी के साथ वह परम की मदद कैसे करेगी ये देखना भी दिलचस्प होगा.

अब देखना ये है कि क्रिसमस पर परम के लिए मेहर का सरप्राइज क्या बदल देगा हरलीन का रवैया? क्या मेहर परम और यूवी को फिर से स्कूल में दाखिला दिलवाने में कामयाब हो पाएगी? जानने के लिए देखते रहिए ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवार, रात 7:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

हनी ट्रैप का रुख गांवों की ओर : भाग 1

पिछले कुछ सालों में हनीट्रैप के तमाम मामले सामने आए हैं, लेकिन इन में ज्यादातर मामले बड़े शहरों और पैसे वाले लोगों से जुड़े थे. लेकिन अब लगता है कि हनीट्रैप के पांव गांवों की ओर भी बढ़ चले हैं. यहां हम 3 ऐसी ही…

बदलते परिवेश में एक तरफ जहां महिलाओं के प्रति अपराध बढ़े हैं, वहीं दूसरी ओर अपराधों में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है. इस की वजह जो भी हो, लेकिन कुछ महिलाएं मोटी कमाई के चक्कर में अपना जमीर तक बेच देती हैं.

ऐसी महिलाएं किसी व्यक्ति को अपने आकर्षणपाश में फांस कर उसे ब्लैकमेल करती हैं और मोटी रकम वसूलती हैं. उन के लिए यह मोटी कमाई का आसान जरिया होता है.

प्रस्तुत कथा ऐसे ही अलगअलग गिरोहों की है, जिन में महिलाएं भी शामिल थीं. गैंग के सदस्य शिकार को अपने जाल में इतनी आसानी से फांसते थे कि उस का उन के चंगुल से निकलना मुश्किल हो जाता था. इन की पहली चाल शुरू हो जाती थी ब्लैकमेलिंग से.

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14 अगस्त, 2019 को सिद्धमुख (चुरू) गांव में डेयरी पर नौकरी करने वाले सागर शर्मा के घर विपिन शर्मा अपनी पत्नी रितु शर्मा को ले कर पहुंचा. 6 महीने पहले वह पत्नी के साथ उसी डेयरी पर बने कमरे में किराए पर रहता था और सिद्धमुख गांव में गोलगप्पे की रेहड़ी लगाता था. बाद में वह कमरा खाली कर जयपुर चला गया था. सागर शर्मा ने दोनों की आवभगत की. फिर सागर और विपिन में इधरउधर की बातें होने लगीं.

उसी दौरान चाय का घूंट लेते हुए विपिन ने सागर से कहा, ‘‘भैया, मुझे रुपयों की सख्त जरूरत है. प्लीज, एक लाख रुपए उधार दे दो. अगर आप के पास नहीं हैं तो किसी से उधार ले कर दे दो. मैं अगले महीने सूद सहित लौटा दूंगा.’’

‘‘देखो विपिन, तुम्हें तो पता ही है कि मैं विनोद सेठ की दूध डेयरी पर नौकरी करता हूं. मेरे लिए यह बहुत बड़ी है. अगर तुम्हें 2-4 हजार की जरूरत हो तो मालिक से ले कर दे सकता हूं.’’ सागर ने कहा.

सागर के इस जवाब पर विपिन व रितु मुंह लटका कर वहां से चले गए. अगले दिन 16 अगस्त की सुबह सागर के मोबाइल पर विपिन की काल आई. उस ने काल रिसीव की तो विपिन ने उसे गालियां देते हुए कहा, ‘‘तू बड़ा कमीना निकला सागर. तूने दोस्ती की आड़ में मेरे साथ दगा किया है. मेरी बीवी के साथ गलत काम करते हुए कुछ तो शरम कर लेता.’’

इतना सुन कर सागर के होश उड़ गए. वह बोला, ‘‘अरे भैया, यह तुम क्या कह रहे हो. तुम भी तो भाभी के साथ थे. यह सरासर झूठ है.’’

‘‘देख सागर, तेरे कहने से कुछ नहीं होगा. जब रितु थाने जा कर तेरे खिलाफ बलात्कार का मुकदमा दर्ज करवाएगी तो तुझे दिन में तारे दिखाई दे जाएंगे.’’ विपिन ने सागर को धमकी दी.

सागर बालबच्चेदार था. बात झूठ थी फिर भी जलालत की सोच कर उस की रूह कांप गई. विपिन उसे फिर से गाली देते हुए बोला, ‘‘अब जल्दी से 25 लाख रुपयों का इंतजाम कर ले. नहीं तो तुझे जेल जाने से कोई नहीं बचा सकता.’’

विपिन के साथी गौरधन मीणा ने उस से फोन ले कर सागर को घुड़का. उस ने कहा, ‘‘जैसा विपिन कह रहा है, मान ले. विपिन को राजी कर ले, नहीं तो जेल में सड़ेगा.’’

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सागर ने उसे बताया कि उस के पास इतने पैसे नहीं हैं, जो बन सकेंगे, वह दे देगा.

‘‘ठीक है, अब मैं बाद में बात करूंगा.’’ कह कर विपिन ने काल डिसकनेक्ट कर दी.

अचानक आई इस मुसीबत से सागर घबरा गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि वह इस परेशानी से कैसे बाहर निकले. उसी रात विपिन ने सागर को फिर फोन किया.

वह बोला, ‘‘देख सागर, तेरे लिए 25 लाख का इंतजाम करना संभव नहीं है तो तू 15 लाख का इंतजाम कर ले. इतने में मामला सैटल हो जाएगा नहीं तो कल मीडिया में तेरी काली करतूत सामने आएगी तो तू जरूर आत्महत्या कर लेगा.’’

इस धमकी से सागर और भी ज्यादा डर गया. चूंकि विपिन पहले डेयरी मालिक विनोद अग्रवाल के यहां किराए पर रहता था, इसलिए विपिन को समझाने के लिए सागर ने अपने मालिक की विपिन से बात कराई. लेकिन विपिन नहीं माना.

2 दिनों बाद विपिन ने विनोद अग्रवाल को फोन कर कहा कि अगर 15 लाख का इंतजाम न हो पा रहा हो तो 10 लाख का जुगाड़ कर लो. इतने पैसों में मामला रफादफा कर देंगे. विपिन ने यह भी विश्वास दिलाया कि रकम मिलने पर रितु स्टांप पेपर पर लिख कर सागर को क्लीन चिट दे देगी.

अगले दिन सागर के पास फिर विपिन का फोन आया. वह बोला, ‘‘देख सागर रितु की बुआ रावतसर में रहती है. तू कल रकम ले कर रावतसर आ जा. 8 लाख से काम चल जाएगा. कल अगर सारे पैसों की व्यवस्था न हो पाए तो अगले दिन के चेक दे देना.’’

‘‘ठीक है, मैं पहुंच जाऊंगा.’’ सागर ने उस से कहा.

11 सितंबर को विपिन, रितु, बाबूलाल कीर, गोरेधन मीणा व मूलचंद मीणा को ले कर रावतसर आ गया. सागर भी रावतसर आ गया था. वे लोग रावतसर से 7 किलोमीटर दूर चाइया गांव के पास एक होटल में रुके. विपिन ने फोन कर सागर को भी वहीं बुला लिया था.

वहां पहुंचते ही सब लोग सागर को एक सुनसान जगह पर ले गए. उसे डराधमका कर उन लोगों ने सागर की जेब से 60 हजार रुपए निकाल लिए. बकाया रकम के लिए उन्होंने आईसीआईसीआई बैंक के 7,40,000 के 2 चैक ले लिए.

सागर को साथ ले कर वे लोग रावतसर के तहसील कार्यालय पहुंच गए. रितु ने 50 रुपए को स्टांप पेपर पर लिख कर दे दिया कि अब उसे सागर शर्मा से कोई शिकायत नहीं है.

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उस की एक फोटोकौपी उस ने सागर को दे कर बाकी रकम अगले दिन तक देने को कह दिया. इस के बाद सागर घर लौट गया. विपिन भी गिरोह के साथ रिश्तेदारी में चला गया.

सागर को बाकी की रकम देने की चिंता थी. उधर विपिन ने विनोद सेठ को फोन कर रकम का तकाजा कर दिया था. अगले दिन सागर विपिन के बताए अनुसार उसी होटल पर पहुंच गया. दूसरी तरफ विनोद ने विपिन को फोन कर रावतसर पहुंचने की सूचना दे दी थी. विनोद अपने एक दोस्त के साथ पहले ही रावतसर पहुंच गया था.

अग्निपरीक्षा : भाग 2

अग्निपरीक्षा : भाग 1

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राज ने स्मिता को समझाया था, ‘व्यावहारिक बनो स्मिता, यही जिंदगी की वास्तविकता है. क्या करें, हर किसी को अपनी मंजिल नहीं मिलती, यही सोच कर तसल्ली दो अपने मन को. मैं तुम्हें ताउम्र प्यार करता रहूंगा, कभी शादी नहीं करूंगा. तुम शांत मन से शादी करो, भुवन बहुत अच्छा लड़का है, अच्छा कमाता है, तुम्हें बहुत खुश रखेगा,’ यह कहते हुए डबडबाई आंखों से राज ने स्मिता का माथा चूमा था और चला गया था.

स्मिता की शादी की तैयारियां जोरशोर से चल रही थीं. सुरभि ने भाई से साफसाफ कह दिया था, ‘राज, मुझ से एक वादा करो, स्मिता की शादी तक तुम घर नहीं आओगे. स्मिता को अपने सामने देख तुम सामान्य नहीं रह पाओगे तथा बेकार में लोगों को बातें करने का मौका मिल जाएगा.’

‘दीदी, मेरे साथ इतना अन्याय मत करो,’ राज गिड़गिड़ाता हुआ बोला, ‘मैं कसम खाता हूं, शादी होने तक मैं किसी के सामने स्मिता से एक शब्द नहीं बोलूंगा. उस की शादी का काम कर के मुझे बहुत आत्मिक संतोष मिलेगा. प्लीज दीदी, तुम ने मुझ से सबकुछ तो छीन लिया, अब यह छोटा सा सुख तो मत छीनो.’

भाई की यह हालत देख सुरभि का मन पसीज उठा था. लेकिन वह भी परिस्थितियों के हाथों मजबूर थी. मुंह मोड़ कर भर आई आंखों को भाई से छिपाते हुए उस ने राज से कहा था, ‘ठीक है, तू शादी का काम संभाल ले, पर इस बात का ध्यान रखना कि स्मिता से कभी बोलेगा नहीं?’ और राज सिर हिलाते हुए वहां से चला गया था.

आखिरकार स्मिता और भुवन की शादी हो गई थी. विदाई के समय रोते हुए राज को सामने देख कर स्मिता अपनेआप पर काबू नहीं रख पाई और बेहोश हो गई. होश आने पर उसे ऐसा महसूस हुआ था जैसे उस की दुनिया उजड़ गई हो.

खैर, टूटा हुआ दिल ले कर स्मिता भुवन के साथ अपनी ससुराल आ गई थी. सुहागरात को उस ने टूटे मन से रोते हुए भुवन के सामने समर्पण किया था. उन क्षणों में उस के अंतर्मन का सारा संताप उस के चेहरे पर आ गया था, जिसे भुवन ने संकोच और घबराहट समझा था.

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भुवन एक बहुत ही अच्छे स्वभाव का, सज्जन युवक था. उस ने स्मिता को अपना पूरा प्यार दिया था, उसे टूट कर चाहा था.

शुरू में राज के बिना स्मिता बहुत बेचैन और उदास रही थी. जबजब भुवन उसे छूता, वह छटपटा उठती. लेकिन धीरेधीरे भुवन के सरल सहज बेशुमार प्यार की छांव में स्मिता सहज होने लगी, तथा उस के मन में भुवन के लिए चाहत पैदा होने लगी. वक्त गुजरने के साथ वह धीरेधीरे राज को भूलने भी लगी थी. हां, जब भी वह भैयाभाभी के घर आती, तो पुराने घाव हरे हो जाते.

भुवन के साथ रोतेहंसते कब 2 साल बीत गए, पता तक न चला था. स्मिता राज को एक हद तक भूल चुकी थी तथा भुवन के साथ अपनी नई जिंदगी में कुछकुछ रमने लगी थी.

राज की शादी भी उस की जाति की एक धनाढ्य परिवार की सुशिक्षित सुंदर लड़की से हो गई थी. राज अपनी शादी का कार्ड देने स्मिता के घर आया था. राज की शादी में जाने के लिए भुवन ने उस से कहा तो वह सिरदर्द का बहाना बना कर शादी में नहीं गई. उस दिन राज सारे दिन उसे बहुत याद आता रहा था तथा वह राज के साथ बिताए पलों को दोबारा जेहन में जीती रही थी. बाद में उस ने भाभी से सुना था कि राज ने यह शादी बहुत मुश्किल से की थी. उस की मां ने बहुत मिन्नतों- खुशामदों के बाद उसे शादी के लिए राजी किया था.

इधर कुछ दिनों से स्मिता कुछ परेशान चल रही थी. उस की शादी हुए 2 वर्ष हो चुके थे लेकिन उस की गोद भरने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे. उस की परेशानी देख कर भुवन उसे डाक्टर के पास ले गया था. पूरी जांच करने के बाद डाक्टर ने उसे बताया कि आप की पत्नी में गर्भधारण की क्षमता सामान्य से कुछ कम है, लेकिन सही उपचार के बाद वह गर्भधारण कर सकती है.

डाक्टर की इस बात ने भुवन और स्मिता को हिला कर रख दिया था. उस दिन स्मिता फूटफूट कर रोई थी. रोतेरोते उस ने भुवन से कहा था, ‘भुवन, मैं बहुत बदनसीब हूं. विधाता ने बचपन में ही मेरी मां छीन ली. जिंदगी भर मैं मांबाप के प्यार से वंचित रही और अब मुझे बच्चे का सुख नहीं दिया?’

स्मिता की गर्भधारण क्षमता में कमी की बात सुन कर भुवन भी बहुत मायूस हो गया था. खैर, स्मिता का उपचार शुरू हो गया. स्मिता की शादी को 4 वर्ष पूरे होने को आए लेकिन उस को मातृत्व का सुख मिलने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे.

बच्चों की कमी से उबरने के लिए भुवन ने अपनेआप को पूरी तरह अपने व्यापार में डुबो दिया था. बढ़ते व्यापार की वजह से वह स्मिता को बहुत कम वक्त देने लगा था. उन दोनों के बीच धीरेधीरे शून्य पसरता जा रहा था. इधर व्यापार के सिलसिले में वह अकसर नेपाल जाया करता और 2-2 महीने में वहां से वापस घर आया करता.

उस दिन सुबह ही भुवन नेपाल चला गया तो स्मिता को समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे वह अपना वक्त काटे? शाम को यों ही वह भैयाभाभी से मिलने उन के घर चली गई थी. अचानक वहां राज भी आ गया. एक लंबे अर्से बाद राज और स्मिता में बातचीत हुई थी. लौटते वक्त राज ने स्मिता से कहा था, ‘चलो, गाड़ी से तुम्हें घर छोड़ देता हूं.’

सुरभि भाभी ने भी राज से कहा था, ‘हांहां, तू इसे गाड़ी से इस के घर छोड़ दे. अकेली कहां जाएगी.’

स्मिता राज के साथ उस की गाड़ी में बैठ गई थी. अपने घर उतरते वक्त उस ने औपचारिकतावश राज को घर पर कौफी पीने का आमंत्रण दिया था, जिसे राज ने स्वीकार कर लिया था और वह स्मिता के घर आ गया था.

एक मुद्दत बाद राज और स्मिता एकांत में मिले थे. स्मिता की समझ में नहीं आ रहा था कि राज के साथ बात कहां से शुरू की जाए. तभी मौन तोड़ते हुए राज ने स्मिता से कहा था, ‘स्मिता, सुना है आजकल भुवन लंबे वक्त के लिए नेपाल जाया करते हैं. इस बार कितने दिनों के लिए नेपाल गए हैं?’

‘इस बार भी 2 महीने के लिए वह नेपाल गए हैं,’ स्मिता ने जवाब दिया था.

‘तो तुम 2 महीने यहां अकेली रहोगी?’

‘रहना ही पड़ेगा और कोई चारा भी तो नहीं है.’

‘स्मिता, तुम खुश तो हो?’

जवाब में स्मिता की आंखों से आंसू टपक पड़े थे, जिन्हें देख कर राज छटपटा उठा था और स्मिता के आंसू पोंछते हुए उस ने उस से कहा था, ‘बताओ स्मिता, क्या बात है? मेरा दिल बैठा जा रहा है. मैं सबकुछ देख सकता हूं लेकिन तुम्हारी आंखों में आंसू नहीं देख सकता. बताओ स्मिता, बताओ…’

जवाब में स्मिता ने उसे अपने गर्भधारण में अक्षमता, इस की वजह से भुवन का अपने व्यापार में ज्यादा से ज्यादा समय देने तथा उसे अकेला छोड़ कर नेपाल में महीनों रहने की बात सुनाई, जिसे सुन कर राज का जी कसक उठा और उस ने अचानक उठ कर स्मिता को अपनी बांहों में समेट लिया और बोला, ‘स्मिता, तो तुम भुवन के साथ सुखी नहीं हो. मैं भी शोभा के साथ बिलकुल सुकून नहीं महसूस करता. मैं उसे अपने जीवन में वह जगह नहीं दे पा रहा हूं जो कभी तुम्हारे लिए सुरक्षित थी. स्मिता, मैं अभी तक तुम्हें पूरी तरह भूल नहीं पाया हूं. क्या तुम मुझे भूल पाई हो? बोलो स्मिता, जवाब दो?’

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यह कह कर राज ने स्मिता को जोर से अपने आलिंगन में भींच लिया था. राज की बांहों में स्मिता कसमसा उठी थी और उस ने राज की बांहों के बंधन से अपने को मुक्त करने का प्रयास करते हुए कहा था, ‘राज, यह तुम क्या कर रहे हो? यह गलत है राज, मैं शादीशुदा हूं. तुम भी शादीशुदा हो. राज, प्लीज, तुम चले जाओ यहां से.’ लेकिन राज ने स्मिता को अपनी बांहों के घेरे से मुक्त नहीं किया, उसे चूमता ही चला गया. भावुकता के उन क्षणों में स्मिता भी कमजोर पड़ गई थी. उस रात वे सारे बंधन तोड़ बैठे थे तथा कमजोरी के उन क्षणों में उस रात वह हो गया था जो नहीं होना चाहिए था.

उस रात राज करीब 1 बजे अपने घर लौटा था.

राज के जाने के बाद स्मिता आत्मग्लानि से भर उठी थी. वह सोच रही थी, छि:छि:, वह यह क्या कर बैठी? उस ने भुवन जैसे सीधेसच्चे पति से विश्वासघात किया, नहींनहीं, अब वह दोबारा राज का मुंह तक नहीं देखेगी. उस प्रण ने उस के दिमाग को थोड़ा सुकून दिया था.

लेकिन अगले ही दिन रात को राज फिर उस के घर आया था. राज के आते ही स्मिता ने उस से कहा था, ‘राज, तुम अभी इसी वक्त अपने घर वापस चले जाओ. कल रात जो कुछ हुआ वह बहुत गलत था. हमें वापस अपनी गलती नहीं दोहरानी चाहिए.’

क्या होती है रेव पार्टी ?

बीते महीनो कई  रेव पार्टी में पकड़े गये. सवाल उठता है कि आखिर यह रेव पार्टी होती क्‍या है. आइये हम आपको बताते हैं कि इस गैरकानूनी काम में दरअसल चल क्‍या रहा होता है .

रेव पार्टी शराब, ड्रग्‍स, म्‍यूजिक, नाच गाना और सेक्‍स का कौकटेल होता है . ये पार्टियां बड़े गुपचुप तरीके से आयोजित की जाती हैं और जिनको बुलाया जाता है वे लोग पार्टी के बारे में वे ‘सर्किट’ के बाहर के लोगों को जरा भी भनक नहीं लगने देते . नशे के सौदागर अपना माल खपाने के लिए ऐसी पार्टियां अरेंज करते हैं. पार्टियों में लोगों को बुलाने के लिए कोड वर्ड्स और सीक्रेट मैसेजेज का इस्तेमाल होता है. पर अब तो पार्टियां न सिर्फ इंटरनेट पर भी तय होने लगी हैं, बल्कि इसे दूसरे सेलिब्रेशन के साथ जोड़ कर आयोजित किया जा रहा है, ताकि पुलिस से सुरक्षित रहा जा सके.

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नशीले पदार्थ बेचने वालों के लिए ये रेव पार्टियां धंधे की सबसे मुफीद जगह बन गई हैं. मुंबई, पुणे, खंडाला, पुष्‍कर और दिल्‍ली के आसपास के इलाके इन रेवियों के लिए बड़ी मुफीद जगह हैं. इन पार्टियों में आम लोगों के लिए कोई जगह नहीं है. धनकुबेरों के आवारा लड़के लड़कियों की कुत्सित वासनाएं पूरा करने के लिए रात के अंधेरों में इन पार्टियों का आयोजन किया जाता है. महानगरों के युवक युवतियों में रेव के प्रति आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है. इन पार्टियों में दो गैरकानूनी ड्रग्‍स चलते हैं एसिड और इक्सटैसी. इसे लेने के बाद युवा लगातार 8 घंटे तक डांस कर सकते हैं. ये ड्रग्स उनमें लगातार नाचने का जुनून पैदा करते हैं. जिनके पास पैसे होते हैं वे एसिड व इक्सटेसी जैसे महंगे ड्रग लेते हैं. जिनके पास उतना पैसा नहीं होता वे  हशीश या गांजा से ही काम चला लेते हैं.

माना जाता है कि इनमें सिर्फ ऊंचे तबके के लोग और रईसजादे ही शामिल होते हैं, पर पिछले कुछ सालों में मध्यम वर्ग भी इसकी ओर आकर्षित हुआ है. इन पार्टियों में दो गैर-कानूनी ड्रग्स चलते हैं एसिड और इक्सटैसी. इसे लेने के बाद युवा लगातार आठ घंटे तक डांस कर सकते हैं. ये ड्रग्स उनमें लगातार नाचने का जुनून पैदा करते हैं.

रेव पार्टियों में कोकीन ही नहीं चरस, गांजे जैसे सस्ते नशे से लेकर हेरोइन, हशीश, ब्राउन शुगर, स्मैक, एक्सटेसी की गोलियां और कैलीफौर्निया ड्रौप जैसे महंगे नशे भी मौजूद होते हैं, जिनका इंतजाम नशे के सौदागर करते हैं. जिनके पास पैसे होते हैं, वे एसिड व इक्सटेसी जैसे महंगे ड्रग लेते हैं. जिनके पास उतना पैसा नहीं होता, वे हशीश या गांजा या  हुक्का से ही काम चला लेते हैं.

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इन पार्टियों  में लड़कों के अनुपात में लड़कियों की संख्या में कमी होने का रोना रोते हों लेकिन इन रेव पार्टियों के मामले में लड़कियों ने लड़कों को काफी पीछे छोड़ दिया है. सौ रेवियों में लड़कियों की संख्या 60 होती ही है.

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