Download App

अपने अपने समलैंगिक

इस पूरे मामले में दिखने को तो यही दिलचस्प है कि कट्टरवादी हिन्दू नेता वीर सावरकर समलैंगिक थे और अब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी भगवा खेमे द्वारा समलैंगिक करार दिये जा चुके हैं. जिसे सियासी पंडित घटियापन करार दे रहे हैं वह दरअसल में समलैंगिकता को लेकर जिज्ञासा, भड़ास और पूर्वाग्रह ज्यादा है, जो सावरकर और राहुल गांधी के बहाने व्यक्त हो रहे हैं. इसे अगर सार्थक बहस की शक्ल में लिया जाये बजाय दिमागी दिवालियेपन के तो एक बेहतर निष्कर्ष पर पहुंचना आसान हो जाएगा .

संक्षेप में विवाद इतना भर है कि मध्यप्रदेश कांग्रेस सेवादल के भोपाल शिविर में एक बुकलेट शीर्षक, वीर सावरकर कितने वीर बांटी गई जिसमें एक जगह लिखा था कि वीर सावरकर एक समलैंगिक थे और इसमें उनके पार्टनर महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूरम गोडसे थे. इस बुकलेट में सावरकर पर और भी गंभीर आरोप लगाए हैं. मसलन वे अल्पसंख्यक यानि मुस्लिम महिलाओं के बलात्कार के लिए लोगों को उकसाते थे और अंग्रेजों से माफी मांगते रहते थे वगैरह वगैरह.

भगवा पर बवाल : पीछे छोड़ गये मूल सवाल

बात भगवा खेमे के लिए स्वभाविक तौर पर अपाच्य थी सो उन्होंने इसे कांग्रेसी साजिश करार दिया. लेकिन हिन्दू महासभा के अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि कुछ ज्यादा ही आहत हो गए और उन्होंने कहा, सुना है राहुल गांधी समलैंगिक हैं और उनके पार्टनर ज्यातिरादित्य सिंधिया हैं . बौखलाए स्वामी जी ने राहुल गांधी के वर्जिनिटी टेस्ट की भी सलाह दे डाली.

देहाती लिहाज से तो हिसाब यहीं बराबर हो गया. माना जाना चाहिए कि तुमने हमारे आदर्श को समलैंगिक कहा तो हमने भी तुम्हारे नायक को भी उसी श्रेणी में ला खड़ा कर दिया . सावरकर और गोडसे को लेकर 2 साल से कुछ ज्यादा ही हल्ला ही मचा हुआ है. भगवा खेमे की कोशिश यह है कि गांधी की हत्या की उन वजहों से लोग सहमत हो जाएं जो उन्होंने और उनके भाई गोपाल गोडसे ने गांधी वध क्यों में लिखी हैं. ज्यादा तो नहीं एकाध लोग सहमत हो भी रहे थे कि भोपाल में कांग्रेस ने बहस और मुद्दा समलैंगिकता को बनाने में सफलता हासिल कर ली .

कांग्रेस चालाकी दिखाते यह दलील दे रही है कि ऐसा वह अपनी तरफ से नहीं कह रही कि सावरकर और गोडसे के बीच शारीरिक संबंध थे बल्कि यह बात तो डामिनिक लेपियर और लैरी कालिन की चर्चित किताब फ्रीडम एट मिड नाइट में कुछ इस तरह लिखी है कि ब्रह्मचर्य धारण करने से पहले नाथूरम गोडसे के एक ही शारीरिक संबंध का ब्योरा मिलता है. यह समलैंगिक संबंध थे. उनका पार्टनर था उनका राजनैतिक गुरु वीर सावरकर .

लेकिन चक्रपाणि यह नहीं बता पा रहे कि राहुल गांधी के बारे में ऐसा कहां उन्होंने पढ़ लिया इसलिए कांग्रेस जैसा कोई उद्धरण वे दे भी नहीं पाये. गौरतलब है कि भगवा खेमा आजादी के बाद से यह प्रचार लगातार पूरी निष्ठा से करता रहा है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू हिन्दू नहीं बल्कि मुसलमान थे, इस नाते पूरा नेहरू गांधी खानदान आधा मुस्लिम और आधा ईसाई है. सोनिया गांधी एक बार डांसर थीं जिनसे राजीव गांधी ने शादी कर ली. चूंकि राजीव के पिता फिरोज मुसलमान थे इसलिए यह पूरा परिवार ही गैर हिन्दू और वर्ण संकर है.

ये भी पढ़ें- नक्सली और भूपेश बघेल आमने-सामने

अगर यह प्रचार जायज है तो हक तो कांग्रेस का भी बनता है कि वह हिंदूवादी नेताओं के बारे में कुछ भी कहे अब तो इसमें समलैंगिकता जैसे वर्जित विषय का भी तड़का लग गया है लेकिन पूरा भगवा खेमा एकजुट होकर कांग्रेस को नहीं घेर पा रहा क्योंकि महाराष्ट्र में शिवसेना की अगुवाई बाली सरकार में कांग्रेसी हिस्सेदारी है. शिवसेना कांग्रेस का विरोध जरूर सावरकर को लेकर कर रही है लेकिन उसके तेवर बेहद औपचारिक हैं.

बहरहाल हो हल्ले के बाद लोगों की दिलचस्पी गोडसे, सावरकर और राहुल गांधी से हटकर समलैंगिक सम्बन्धों में फिर से बढ़ रही है कि ये कैसे और क्यों होते हैं. इसके पहले 6 सितंबर 2018 को जब सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर रखते समलैंगिकों के सम्मान और स्वाभिमान की बात कही तो थी तो पहली बार लोगों को महसूस हुआ था कि वे अब तक किस आधार पर समलैंगिकों और समलैंगिकता से घृणा करते रहे थे. तब कोई स्पष्ट जवब उन्हें नहीं सूझा था और न ही आज सूझ रहा.

सभी धर्म समलैंगिक संबंधो के विरोधी हैं क्योंकि ये संबंध व्यक्तिगत स्वतन्त्रता वाले होते हैं और धर्म गुरुओं की दुकानदारी खराब करते हैं. एक कड़वा सच यह भी है कि इन्हीं लोगों के बीच इस तरह के संबंध ज्यादा पनपते हैं. इस लंबी चौड़ी बहस में न पड़ा जाये तो भी दो टूक कहा जा सकता है कि अगर सावरकर समलैंगिक थे तो क्या और राहुल गांधी भी हैं तो भी क्या.

जानबूझ कर इस व्यक्तिगत आनंददायक संबंध को शर्मनाक और गंदा बताने का मौका नेताओं को मिल गया है तो वे इसे चूक भी नहीं रहे. उल्टे इन्हें तो अब कहना यह चाहिए कि समलैंगिक संबंध शारीरिक होने के साथ साथ भावनात्मक भी होते हैं और ये शर्म की नहीं बल्कि फख्र की बात है.

बिग बौस 13 : इस हफ्ते ये कंटेस्टेंट हो सकते हैं घर से बाहर

कलर्स टीवी पर प्रसारित होने वाला विवादित शो ‘बिग बौस 13’ वीकेंड का वार  इस हफ्ते बेहद धमाकेदार होने वाला है. सलमान खान कंटेस्टेंट की क्लास लगाने वाले हैं, तो वहीं एक कंटेस्टेंट घर से बेघर भी होगा. खबरों के अनुसार, शेफाली बग्गा इस हफ्ते घर से बाहर होंगी. लेकिन इसकी कोई औफिशियल जानकारी नहीं मिली है.

इस हफ्ते ‘बिग बौस 13’ वीकेंड का वार  देखने से ही पता चलेगा कि कौन- से कंटेस्टेंट घर से बेघर होंगे. आपको बता दें कि इस बार 6 कंटेस्टेंट नौमिनेट हुए थे. इनमें रश्मि देसाई, शेफाली जरीवाला, मधुरिमा तुली, विशाल आदित्य सिंह,  माहिरा शर्मा, शेफाली बग्गा का नाम शामिल था. शहनाज गिल ने खुद को मिले स्पेशल पावर का इस्तेमाल करते हुए रश्मि देसाई को नौमिनेट किया था.

ये भी पढ़ें- सुष्मिता सेन ने बेटियों के साथ किया धमाकेदार डांस,  देखें ये वीडियो

इस शो में शेफाली बग्गा ने वाइल्ड कार्ड कंटेस्टेंट के तौर पर एंट्री ली थी. इससे पहले भी वो एक बार घर में आई थीं. लेकिन एक महीने बाद ही वो घर से बाहर हो गई. फिर दोबारा मधुरिमा तुली संग शेफाली ने एंट्री ली. आपको बता दें, इस वीकेंड का वार में सलमान खान रश्मि को घर से बाहर जाने के लिए भी कहेंगे. इसके साथ ही सिद्धार्थ और असीम को भी जमकर खरी खोटी सुनाएंगे.

https://www.instagram.com/p/B63GCj2Bz_N/?utm_source=ig_web_copy_link

ये भी पढ़ें- ‘सब कुशल मंगल’ : अच्छे विषय पर कमजोर फिल्म

बच्चों की आपराधिक मानसिकता को कैसे पता करें ?

“बच्चे मन के सच्चे”, ये हम सब कहते सुनते आए हैं .अपनी निश्छल मुस्कान और मासूमियत से सबका मन मोह लेने वाले बच्चे सभी को भाते हैं लेकिन कभी कभी यही बच्चे कुछ ऐसा कर गुजरते हैं कि हम सब सोचते रह जाते हैं कि बालमन में ऐसी आपराधिक मानसिकता कैसे जन्मी पता ही नहीं चला .

बदलते समय के साथ अब बहुत जरूरी हो गया है कि माता पिता और परिवार के बुजुर्ग सभी बच्चे की गतिविधियों पर नजर रखे.. बच्चे का सामान्य से हटकर कुछ अलग व्यवहार आने वाली परेशानी का संकेत हो सकता है .

बच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए पारिवारिक वातावरण का अच्छा और सुमधुर होना बहुत जरूरी होता है. बड़ों की आपस की बातें भी कभी कभी बच्चों को परेशान कर सकती है जिसका असर उनके विकास पर पड़ सकता है जैसे कि माता पिता या बड़े बुजुर्गों के बीच कोई मतभेद है तो उस पर बच्चों के सामने कहा सुनी न करें, साथ ही आपस में बात करते समय भी शब्दों का चुनाव भी बेहतर करें . क्यू कि बच्चें जो देखते सुनते हैं वैसा ही आचरण करते हैं केवल स्कूल का बेहतर माहौल उनके व्यक्तित्व का निमार्ण नहीं कर सकता है.

ये भी पढ़ें- प्रीवैडिंग इन्क्वायरी दोनों पक्षों के हित में

बच्चें जहां और जिनके बीच खेलते और बातचीत करते हैं उनके संबध में भी जानकारी रखे और खुद बच्चों से सीधे पूछताछ भी करते रहे . केवल बातचीत करके आप आराम से बच्चों के बारें में जानकारी जुटा सकती है, बच्चों का दोस्त बनकर बात करना, उनकी समस्या हल करना बहुत जरूरी हो गया है .

2017 में गुरुग्राम के रेयान पब्लिक स्कूल में जिस अबोध बच्चे की हत्या हुई थी उसके पीछे का कारण जानकर तो हम सबको बहुत हैरानी हुई थी.. केवल एक्जाम, PTM टालने के लिए एक बच्चे ने दूसरे की हत्या का सहारा लिया . जिस बच्चे को एक्जाम का डर था वो अपनी मां और टीचर से भी बात कर सकता था, अपनी परेशानी कह सकता था अगर उससे टीचर और माता पिता का दोस्ताना व्यवहार होता तो . साथ ही सोचने वाली बात ये भी थी कि उसके मन में हत्या का विचार और प्लान कैसे आया..? ऐसी सोच और विचार एक दो दिन में नहीं पनपते हैं.. घर, स्कूल के दोस्त या कोई TV सीरियल से सम्भवतः प्रेरित हुआ हो . उसके व्यवहार में परिवर्तन भी दिखने लगा होगा अगर घर से कोई भी नोटिस करता तो बच्चा अपराधी बनने से बच जाता है और दूसरा बच्चा जीवित होता.

ये भी पढ़ें- जानिए, कैसे बचाएं बालों को पतला होने से

ऐसी छोटी छोटी बातों का बालमन पर मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है.. पहले के समय में झाड़ फूक, टोना टोटका से लोग इलाज़ की कोशिश करते थे, लेकिन अब चाइल्ड psycho.ogy  के लिए अलग से स्टडी की जाती है और बच्चे को समझ कर उन्हें counse.ing द्वारा बेहतर करने का प्रयास किया जाता है . अगर बच्चों में कभी भी कोई बदलाव या चिड़चिड़ापन दिखे तो उनसे बात करें और समस्या न समझ आये तो डौक्टर की मदद ले.

बच्चों में स्वस्थ आदतों का विकास करें, उन्हें पौष्टिक खाना की आदत डाले, पढ़ाई के साथ साथ खेलकूद के लिए भी समय दे . कुछ समय खुद भी उनके साथ बिताए और उस समय उनके बारें में, दोस्त, टीचर, स्कूल और पसंद नापसंद पर उन्हें बिना टोके उनकी बात सुनें.

हमदर्द : भाग 4

‘यह घटना तो सोच के बाहर की है. पढ़ने, सुनने और देखने में यही आता है कि बहू को घर से निकाला गया है पर पत्नी को घर में रख कर पति घर छोड़ गया, ऐसी घटना तो कभी देखी या सुनी नहीं.’ जशोदा चाय का पानी रखते हुए बड़बड़ा रही थी, ‘बेचारा करेगा भी क्या? यह औरत है ही पूरी मर्दमार.’

कावेरी ने डांटा, ‘‘चुप कर. यह मर्दमार हो या न हो पर वह पूरा शैतान है.’’

‘‘यह उस का घर है, वह क्यों जाएगा घर छोड़ कर. तुम इसे निकालो घर से तब भैया लौटेगा. न रंग, न रूप, न अदब न कायदा…आसमान पर पैर धर कर चलती है.’’

‘‘अब तू चुप भी करेगी या नहीं? कुछ खाया इन लोगों ने?’’

‘‘नहीं, पहले लड़ते रहे फिर भइया चला गया.’’

‘‘चाय बना कर खाना तैयार कर. 11 बजने को हैं. चाय 2 कप बनाना.’’

टे्र में 2 प्याली चाय ले कर कावेरी अंदर आई और स्टूल पर टे्र रख दी. कावेरी को देखते ही रीटा ने सिर झुका लिया. आज कावेरी ने इतने दिनों में पहली बार बहू को नजर भर देखा. इतने दिन मन में इतना विराग था कि मुंह देखने की इच्छा ही नहीं हुई. आज मैक्सी पहने, सिर झुका कर बैठी बहू बड़ी असहाय और मासूम लग रही थी. कावेरी के मन में टीस उठी. कुछ  भी हो, कैसे भी घर की बेटी हो पर उस का बेटा इसे पत्नी का दर्जा दे कर घर लाया है, उस की पुत्रवधू है और यह परिचय समाज ने स्वीकार भी कर लिया है तो कितनी भी अलगथलग रहे, है तो उस के परिवार का हिस्सा ही…और चूंकि वह इस परिवार की मुखिया है तो परिवार के हर सदस्य के सुखदुख का दायित्व उस का ही है.

कावेरी ने पहली बार बहू के सिर पर अपना हाथ रखा और नरम स्वर में बोली, ‘‘चाय पी लो, बेटी.’’

उस की आंखें डबडबा गईं. रुलाई रोकने के लिए दांतों तले होंठ दबाया, पर चाय उठा ली और धीरेधीरे पीने लगी. कावेरी ने अपना कप उठा लिया और उस के पास बिस्तर पर बैठ गई और बहू की तरह पैर लटका कर वह भी चाय पीने लगी. चाय समाप्त कर दोनों ने कप टे्र में रख दिए. तब कावेरी बोली, ‘‘बताओगी कि तुम दोनों का झगड़ा क्या है?’’

यह सुन कर उस का सिर और झुक गया.

‘‘चिंता मत करो,’’ कावेरी ने बहू को समझाते हुए कहा, ‘‘ऐसा कभीकभी हो जाता है. बिल्लू को गुस्सा जल्दी आता है तो उतर भी जल्दी जाता है. देखना कल ही आ जाएगा.’’

वह इतना सुन कर सुबक उठी और बोली, ‘‘अब वह नहीं आएगा.’’

‘‘ऐसा क्यों कह रही हो?’’ चौंकी कावेरी, ‘‘लौटेगा क्यों नहीं?’’

‘‘झगड़ा तलाक को ले कर हो रहा था.’’

‘‘तलाक, पर क्यों?’’

‘‘वह मांग रहा था और मैं दे नहीं रही थी इसलिए.’’

‘‘क्या कह रही हो? तुम दोनों ने तो अपनी पसंद से शादी की थी. क्या तुम्हारे बीच प्यार नहीं था?’’

‘‘प्यार तो था तभी तो भरोसा किया था. पर उस के आफिस में एक नई रिसेप्शनिस्ट आई है और अब बिल्लू उसे पसंद करने लगा है. कह रहा था कि मुझ से तलाक ले कर उस से शादी करेगा.’’

यह सुन कर जलभुन गई कावेरी.

‘‘शादी मजाक है क्या और मेरा घर भी होटल नहीं कि जब जिसे चाहे ले कर आ जाए. अब गया कहां है.’’

‘‘तलाक नहीं मिला तो किराए पर एक फ्लैट लिया है. वे दोनों वहीं लिव टू गेदर करेंगे.’’

कावेरी के पैरों के नीचे से धरती खिसक गई.

‘‘बिना विवाह किए ही साथ रहेंगे?’’

‘‘आजकल बहुत से युवकयुवतियां इस तरह साथ रह रहे हैं.’’

दोनों देर तक चुप रहीं. फिर रीटा बोली, ‘‘आप से एक प्रार्थना है.’’

‘‘बोलो.’’

‘‘आप मां हैं पर मैं ने आप को कभी सम्मान नहीं दिया. मां कहने का अधिकार भी नहीं लिया पर आप से विनती है कि कुछ दिन मुझे अपने घर रहने देंगी?’’

‘‘यह…यह तुम क्या कह रही हो?’’

‘‘मांजी, मेरे पास रहने के लिए कोई जगह नहीं है. खोजने में थोड़ा समय लगेगा…तब तक…’’

‘‘तुम्हारे मातापिता?’’ कावेरी ने बीच में उस की बात काटते हुए पूछा.

‘‘मैं अनाथ आश्रम में पली हूं. मातापिता कौन हैं? हैं भी या नहीं, मुझे नहीं पता. आश्रम अच्छे स्तर का था. मैं पढ़ने में बहुत अच्छी थी तो ट्रस्ट ने मुझे पढ़ाया. स्कालरशिप भी मिलती थी. बी.एससी. के बाद कंप्यूटर की डिगरी ली. चाहती थी डाक्टर बनना पर ट्रस्ट ने इतनी लंबी पढ़ाई की जिम्मेदारी नहीं ली. इस के बाद मुझे यह नौकरी मिल गई. मुझे 20 हजार रुपए तनख्वाह मिलती है सो कहीं भी किराए पर घर ले सकती हूं पर डर लगता है सुरक्षा कौन देगा. मैं लड़कियों के किसी होस्टल की तलाश में हूं, मिलते ही चली जाऊंगी. बस, तब तक…’’

‘‘कैसी बातें कर रही हो. तुम इस घर में ब्याह कर आई हो. इस घर की बहू हो तो मेरे रहते तुम अकेले किराए के घर में रहोगी?’’

इतनी देर में झरझर रो पड़ी रीटा. कावेरी का मन ममता से भर उठा. उसे लगा कि वह उस की अपनी बेटी है. उस ने रीटा को स्नेह से सीने से लगा लिया और बोली, ‘‘रोना नहीं. कभी मत रोना. आंसू औरत को कमजोर करते हैं और कमजोर पर पूरी दुनिया हावी हो जाती है, चाहे वह पति हो या बेटा. मैं तुम्हारे साथ हूं. तुम मेरे पास ही रहोगी, कहीं नहीं जाओगी.’’

रीटा ने आंसू पोंछे और बोली, ‘‘अगर बिल्लू लौट आया और घर छोड़ने को बोला तो?’’

‘‘बेटी, यह घर मेरा है, उस का नहीं. इस में कौन रहेगा कौन नहीं रहेगा इस का फैसला मैं करूंगी. हां, शराफत के साथ लौटे और हमारे साथ समझौता कर के रहना चाहे तो वह भी रहे.’’

‘‘मांजी, मैं उसे कभी तलाक नहीं दूंगी, यह तो तय है.’’

‘‘कभी मत देना. देखो, उस ने मेरा बहुत अपमान, अनादर किया है पर मैं ने उसे घर से नहीं निकाला. जानती हो क्यों? वह इसलिए कि 2 प्राणियों का परिवार, एक गया तो बचेगा क्या? अब वह खुद घर छोड़ गया है. अब लौटना है तो हमारी शर्तों पर लौटेगा नहीं तो जाए.’’

‘‘पर वह जबरदस्ती…’’

‘‘घर में फोन है और पुलिस थाना भी दो कदम पर है. चलो उठो, नहाधो कर खाना खाओ.’’

रीटा अपनी सास से लिपट गई. आज उसे पहली बार महसूस हुआ कि मां का प्यार व स्नेह क्या होता है.

 

हमदर्द : भाग 3

सासबहू दोनों उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के निवासी हैं तो निकटता आएगी कहां से? जो भी हो समय रुकता नहीं, हर रात के बाद तारीख बदलती है और हर महीने के बाद पन्ना पलट जाता है. कलर बदल कर दूसरा लगा और उस के भी कई पन्ने बदल गए. तभी अचानक एक दिन कावेरी को लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ है. जो गाड़ी सीधी सपाट पटरी पर दौड़ रही थी वह अब झटके खाने लगी है.

जशोदा कमरे में थाली दे आती है. बेटा तो अब भी घूमने निकल कर जाता तो रात में खा कर आता है पर बहू घर में ही रहती है. कभीकभार गई तो जशोदा से बोल जाती है कि उस का खाना न रखे. बहू में कोई भी अच्छाई नहीं थी, औरतों में जो सहज गुण होते हैं वह भी उस में नहीं थे पर एक बात अच्छी थी जो कावेरी को पसंद थी. वह यह कि बहू बहुत मीठा बोलती थी. एक तो वह बोलती ही कम थी, कभी पति या जशोदा से बोली भी तो इतनी धीमी आवाज में कि अगले को सुनने में कठिनाई हो. पर अब कभीकभी बंद दरवाजे के उस पार से उस की आवाज बाहर आ कर कावेरी के कानों से टकराती. शब्द तो समझ में नहीं आते पर वह उत्तेजित है, गुस्से में है यह समझ में आता है. यह झल्लाहट भरा स्वर सीधेसीधे मनमुटाव का संकेत है. कावेरी इतना अवश्य जान जाती.

कावेरी चिंता में पड़ गई. शादी को थोड़े दिन ही हुए हैं और अभी से आपसी झगड़ा. यह कोई अच्छी बात तो नहीं है. बेटा बदमिजाज के साथ स्वार्थी भी है यह तो जानती है पर मां के साथ जैसा किया वैसा पत्नी के साथ नहीं चल सकता, इतनी सी बात वह न समझे इतना तो मूर्ख नहीं.

अरे, मां से जन्म का बंधन है, हजार अपमान सह कर भी बेटे को छोड़ कर जाने के लिए उस के पैर नहीं उठेंगे लेकिन पत्नी तो औपचारिकता के बीच बंधा रिश्ता है, जब चाहे तोड़ लो. उस पर अपना रौबदाव चलाने का प्रयास करेगा तो वह क्यों सहेगी, उस पर बराबर की कमाने वाली पत्नी.

गलती बहू की ही है यह कौन जाने? और जान कर होगा भी क्या? उन का जीवन वे जी रहे हैं, अपना जीवन कावेरी जी रही है. यही तर्क दे कर अपने मन को शांत करती. पर यह एक कांटा उस के मन को चुभता रहता कि पल्ला झाड़ लेने से समस्या का समाधान नहीं होता…बहू सुंदर एकदम नहीं, उसे पसंद भी नहीं, चेहरामोहरा जैसा भी हो कावेरी को उस की आंखें पसंद थीं. बड़ीबड़ी 2 उजली आंखों में जीवन का सपना भरा रहता था. अब वह आंखें बुझीबुझी सी हो गई हैं. ऐसा क्यों हुआ? यह तो प्रेमविवाह है. एकदूसरे को जांचपरख, समझबूझ कर दोनों विवाह तक पहुंचे हैं. थोपी हुई शादी नहीं थी कि एकदूसरे को समझने का अवसर नहीं मिला. फिर ऐसा क्यों हुआ? 2 साल भी नहीं हुए एकदूसरे के प्रति आकर्षण ही समाप्त हो गया. अभी तो सामने पूरा जीवन पड़ा है. ऐसे क्या ये सारा जीवन काटेंगे. अपनीअपनी धुन पर चलने लगे तो जीवन की गाड़ी चलेगी कैसे? विराग, विद्वेष का कारण क्या है पता चले तो समझाया भी जा सकता है पर अंधेरे में वह तीर चलाएगी किधर?

जशोदा से कुछ कहना बेकार है. वह तो पहले से ही जलीभुनी बैठी है. रोज एक बार यह जरूर कहती है कि आंटी, इन को अपने घर से भगाओ. इन से तो किराएदार भले जो किराया भी देंगे, देखभाल भी करेंगे.

पहले ही दिन से उस ने बहू से एक दूरी बना ली थी और उसे बराबर बना कर रखा था. सोचा था नई बहू है, दूरी को मिटाने के लिए पहल करेगी पर नहीं, अब तक उस ने दूरी मिटाने की पहल करना तो दूर उस दूरी की दीवार पर पक्के पलस्तर की परत चढ़ा दी. लेकिन हालात ने करवट ली, बहू की दूरी मिटाने के लिए उसी को पहल करनी पड़ी. वह रोज सुबह पार्क से घंटे भर में टहल कर लौट आती है पर उस दिन पार्क के लिए श्रमदान का कार्यक्रम चल रहा था इसलिए लौटने में 3 घंटे लग गए. घर के अंदर पैर रखते ही मन धक्क सा कर उठा, एक अनजान आशंका से पीडि़त हो उठी वह. वैसे तो उस का घर शांत ही रहता है पर आज उसे घर के अंदर अजीब सा सन्नाटा लगा.

बेटे के कमरे का दरवाजा पूर्व की भांति बंद है पर जशोदा का पता नहीं कि वह कहां है.

पहले कावेरी ने कमरे में जा कर कपड़े बदले फिर चाय के लिए जशोदा को खोजती हुई पीछे के बरामदे में आई तो देखा जशोदा वहां छोटी चौकी पर सिर पकड़े बैठी थी. उसे देखते ही वह रो पड़ी, ‘‘घर बरबाद हो गया, मांजी.’’

सन्न रह गई कावेरी.

‘‘क्या हुआ? रो क्यों रही है?’’

‘‘भैया घर छोड़ गया.’’

‘‘क्या? क्या दोनों चले गए?’’

‘‘नहीं…केवल भैया गया है. वह रानीजी तो कमरे में सो रही हैं. आंटी, आप के जाने के बाद दोनों में खूब झगड़ा हुआ. भैया अपने कपड़े 2 अटैचियों में भर कर गाड़ी स्टार्ट कर चला गया.’’

अब कावेरी भी उसी चौकी पर बैठ गई.

हमदर्द : भाग 2

‘‘रहने दे, मेरा मन नहीं है. तू कुछ खा ले फिर भैया का कमरा ठीक से साफ कर दे, आता ही होगा.’’

‘‘फिर कुछ हुआ? अरे, बिना खाए मर भी जाओ तो भी बेटा पलट कर नहीं देखने या पूछने वाला. तुम इतनी बीमार पड़ीं पर कभी बेटे ने पलट कर देखा या हाल पूछा?’’

‘‘बात न कर के कमरा साफ कर… आता ही होगा.’’

‘‘कहां गया है?’’

‘‘ब्याह करने.’’

इतना सुनते ही जशोदा धम से फर्श पर बैठ गई.

‘‘जल्दी कर, रजिस्ट्री में समय ही कितना लगता है…बहू ले कर आता होगा.’’

‘‘बेटा नहीं दुश्मन है तुम्हारा. कब से सपने देख रही हो उस के ब्याह के.’’

‘‘सारे सपने पूरे नहीं होते. उठ, जल्दी कर.’’

‘‘कौन है वह लड़की?’’

‘‘मैं नहीं जानती, नौकरी करती है कहीं.’’

‘‘तुम भी आंटी, जाने क्यों बेटे के इशारे पर नाचती हो? अपना खाती हो अपना पहनती हो…उलटे बेटे को खिलातीपहनाती हो. सुना है मोटी तनख्वाह पाता है पर कभी 10 रुपए तुम्हारे हाथ पर नहीं रखे और अब ब्याह भी अपनी मर्जी का कर रहा है. ऐसे बेटे के कमरे की सफाई के लिए तुम मरी जा रही हो.’’

गहरी सांस ली कावेरी ने और बोली, ‘‘क्या करूं, बता. पहले ही दिन, नई बहू सास को बेटे से गाली खाते देख कर क्या सोचेगी.’’

‘‘यह तो ठीक कह रही हो.’’

जब बड़ी सी पहिए लगी अटैची खींचते बिल्लू के साथ टाइट जींस और टीशर्ट पहने और सिर पर लड़कों जैसे छोटेछोेटे बाल, सांवली, दुबलीपतली लावण्यहीन युवती को ले कर आया तब घड़ी ठीक 12 बजा रही थी. एक झलक में ही लड़की का रूखा चेहरा, चालचलन की उद्दंडता देख कावेरी समझ गई कि उसे अब पुत्र मोह को एकदम ही त्याग देना चाहिए. यह लड़की चाहे जो भी हो उस की या किसी भी घर की बहू नहीं बन सकती. पता नहीं बिल्लू ने क्या सोचा? बोला, ‘‘रीटा, यह मेरी मां है और मां यह रीटा.’’

जरा सा सिर हिला या नहीं हिला पर वह आगे बढ़ गई. कमरे में जा कर बिल्लू ने दरवाजा बंद कर लिया. हो गया नई बहू का गृहप्रवेश. और नई चमचमाती जूती के नीचे रौंदती चली गई थी वह कावेरी के वे सारे सपने जो जीवन की सारी निराशाओं के बीच बैठ कर देखा करती थी. सुशील बहू, प्यारेप्यारे पोतेपोती के साथ सुखद बुढ़ापे का सपना.

जशोदा लौट कर रसोई की चौखट पर खड़ी हुई और बोली, ‘‘आंटी, यह औरत है या मर्द, समझ में नहीं आया.’’

जशोदा इतनी मुंहफट है कि उस की हरकतों से डरती है कावेरी. पता नहीं नई बहू के लिए और क्याक्या कह डाले. पहले दिन ही वह बहू के सामने बेटे से अपमानित नहीं होना चाहती. पर यह तो सच है कि अब उस को कुछ सोचना पड़ेगा. देखा जाए तो बेटे का जो बरताव उस के साथ रहा उस से बहुत पहले ही उस को अलग कर देना चाहिए था पर अनजान मोह से वह बंध कर रह गई.

‘‘अब तो मां के सहारे की उसे कोई जरूरत नहीं…अब क्यों साथ रहना.’’

जशोदा ने खाना बना कर मेज पर लगा दिया. न चाहते हुए भी कावेरी ने थोड़ी खीर बनाई. जशोदा फिर बौखलाई.

‘‘अब ज्यादा मत सिर पर चढ़ाओ.’’

‘‘नई बहू है, उसे तो पूरी खिलानी चाहिए. मीठा कुछ मंगाया नहीं, थोड़ी खीर ही सही.’’

‘‘अब तुम रहने दो. कहां की नई बहू? पैंट, जूता, बनियान में आई है, सास के पैर छूने तक का ढंग नहीं है. लगता है कि घाटघाट का पानी पी कर इस घाट आई है.’’

कंधे झटक जशोदा चली गई. थोड़ी देर में दोनों अपनेआप खाने की मेज पर आ बैठे. बेटा तो कुरतापजामा पहने था. बहू घुटनों से काफी ऊंचा एक फ्राक जैसा कुछ पहने थी और ऊपर का शरीर आधा नंगा था.

बेटे से एक शब्द भी बोले बिना कावेरी ने बहू को पारखी नजर से देखा. दोनों चुपचाप खाना खा रहे थे. उस के मुख पर भले घर की छाप एकदम नहीं थी और संस्कारों का तो जवाब नहीं. सास से एक बार भी नहीं कहा कि आप भी बैठिए. और तो और, खाने के बाद अपनी थाली तक नहीं उठाई और दरवाजा फिर से बंद हो गया.

घर का वातावरण एकदम बदल गया. यह स्वाभाविक ही था. घर में जब बहू आती है तो घर का वातावरण ही बदल जाता है. उसे भोर में उठने की आदत है. फ्रेश हो कर पहले चाय बनाती, आराम से बैठ कर चाय पीती, तब दिनचर्या शुरू होती. तब कभीकभी बेटा भी आ बैठता और चाय पीता, दोचार बातें न होती हों ऐसी बात नहीं, मामूली बातें भी होतीं पर अब तो साढ़े 8 बजे जशोदा चाय की टे्र ले कर दरवाजा पीटती तब दरवाजा खोल चाय ले कर फिर दरवाजा बंद हो जाता. खुलता 9 बजने के बाद फिर तैयार हो, नाश्ता करने बैठते दोनों और फौरन आफिस निकल जाते.

दोपहर का लंच आफिस में, शाम को लौटते, ड्रेस बदलते फिर निकल जाते तो आधी रात को ही लौटते. बाहर ही रात का खाना खाते तो नाश्ता छोड़ घर में खाने का और कोई झंझट ही नहीं रहता. छुट्टी के दिन भी कार्यक्रम नहीं बदलता. नाश्ता कर दोनों घूमने चले जाते…रात खापी कर लौटते.

बहू से परिचय ही नहीं हुआ. बस, घर में रहती है तो आंखों में परिचित है, संवाद एक भी नहीं. खाना खाने के बाद ऐसे उठ जाती जैसे होटल में खाया हो. न थाली उठाती न बचा सामान समेट फ्रिज में रखती. कावेरी हैरान होती कि कैसे परिवार में पली है यह लड़की? संस्कार दूर की बात साधारण सी तमीज भी नहीं सीखी है इस ने और यह सब छोटीमोटी बातें तो बिना सिखाए ही लड़कियां अपनी सहज प्रवृत्ति से सीख जाती हैं. इस में तो स्त्रीसुलभ कोई गुण ही नहीं है…पता नहीं इस के परिवार वाले कैसे हैं, कभी बेटी की खोजखबर लेने भी नहीं आते?

कावेरी ने अब अपने को पूरी तरह समेट लिया है. जो मन में आए करो, मुझ से मतलब क्या? कुछ इस प्रकार के विचार बना लिए उस ने. सोचा था घर छोड़ ‘हरिद्वार’ जा कर रहेगी पर इस घर की एकएक चीज उस की जोड़ी हुई, सजाई हुई है. बड़ी ममता है इस सजीसजाई गृहस्थी के प्रति, फिर यह घर भी तो उस के नाम है…वह क्यों अपना घर छोड़ जाएगी…जाना है तो बहूबेटे जाएंगे.

जशोदा भी यही बात कहती है. इस समय उस का अपना कोई है तो बस, जशोदा है. महीने का वेतन और रोटीकपड़े पर रहने वाली जशोदा ही एकमात्र अपनी है…बहुत दिनों की सुखदुख की गवाह और साथी.

बेटे ने घर के लिए कभी पैसा नहीं दिया और आज भी नहीं देता है. कावेरी ने भी यह सोच कर कुछ नहीं कहा कि ये लोग घर पर केवल नाश्ता ही तो करते हैं. बहू तो कमरे से बाहर आती ही नहीं है. कभीकभी चाय पीनी हो तो बेटा रसोई में जा कर चाय बना लेता है. 2 कप कमरे में ले जाते हुए मां को भी 1 कप चाय पकड़ा जाता है. बस, यही सेवा है मां की.

हमदर्द : भाग 1

कावेरी सन्न रह गई. लगा, उस के पैरों की शक्ति समाप्त हो गई है. कहीं गिर न पड़े इस डर से सामने पड़ी कुरसी पर धम से बैठ गई. 27 साल के बेटे को जो बताना था वह बता चुका  था और अब मां की पेंपें सुनने के लिए खड़े रहना उस के लिए मूर्खता छोड़ और कुछ नहीं था. फिर मां के साथ इतना लगाव, जुड़ाव, अपनापन या प्यार उस के मन में था भी नहीं जो अपनी कही हुई भयानक बात की मां के ऊपर क्या प्रतिक्रिया है उस को देखने के लिए खड़ा हो कर अपना समय बरबाद करता.

कावेरी ने उस की गाड़ी के स्टार्ट होने की आवाज सुनी और कुरसी की पुश्त से टेक लगा कर निढाल सी फैल गई. जीतेजागते बेटे से यह बेजान लकड़ी की बनी कुरसी उस समय ज्यादा सहारा दे रही थी. काम वाली जशोदा आटा पिसवाने गई थी. अत: जब तक वह नहीं लौटती अकेले घर में इस कुरसी का ही सहारा है.

पति का जब इंतकाल हुआ तो बेटा 8वीं में था. कावेरी को भयानक झटका लगा पर उस में साहस था. सहारा किसी का नहीं मिला, मायके वालों में सामर्थ्य ही नहीं थी, ससुराल में संपन्नता थी पर किसी के लिए कुछ करने का मन ही नहीं था.

वह समझ गई थी कि अब अपनी नाव को आप ही खींच कर किनारे पर लाना है. पति के फंड का पैसा ले कर मासिक ब्याज खाते में जमा किया. बीमा का जो पैसा मिला उस से आवासविकास का यह घर खरीद लिया. ब्याज जितना आता खाना और बेटे की पढ़ाई हो जाती पर कपड़ा, सामाजिकता, बीमारी आदि सब कैसे हो? उस का उपाय भी मिल गया. पड़ोस में एक प्रकाशक थे, पाठ्यक्रम की किताबें छापते थे. उन से मिल कर कुछ अनुवाद का काम मांग कर लाई. उस से जो आय होती उस का काम ठीकठाक चल जाता. अब अभाव नहीं रहा.

जशोदा को पूरे समय के लिए रख लिया. गाड़ी पटरी पर आ कर ठीकठाक चलने लगी. उस ने सोचा जीवन ऐसे ही कट जाएगा पर इनसान जो सोचता है उस के विपरीत करना ही नियति का काम है तो कावेरी के सपने भला कैसे पूरे होते.

अपने सपने पूरे नहीं होंगे इस का आभास तो बेटे के थोड़ा बडे़ होते ही कावेरी को होने लगा था. बेटा वैसे तो लोगों की नजरों में सोने का टुकड़ा है. पढ़ने में सदा प्रथम, कोई बुरी लत नहीं, बुरी संगत नहीं, रात में कभी देर से नहीं लौटता, पैसा, फैशनेबुल कपड़े या मौजमस्ती के लिए कभी मां को तंग नहीं करता पर जैसेजैसे बड़ा होता जा रहा था कावेरी अनुभव करती जा रही थी कि बेटे का रूखापन उस के प्रति बढ़़ता जा रहा था.

कोई लगाव, प्यार तो मां के प्रति बचा ही नहीं था. तेज बुखार में भी उठ कर बेटे को खाना बनाती और बेटा चाव से खा कर घर से निकल जाता. भूल कर भी यह नहीं पूछता कि मां, कैसी तबीयत है.

कावेरी इन बातों को कहे भी तो कैसे? ऊपर को मुंह कर के थूको तो थूक अपने मुंह पर आ कर गिरता है. दुश्मन भी यह जान कर खुश होंगे कि बेटा उस के हाथ के बाहर है. दूसरी बात यह थी कि उस के मन में भय भी था कि पति का छोड़ा यह घर उन के पीछे बिना बिखरे टिका  हुआ है. लड़ाईझगड़ा करे और बेटा घर छोड़ कर चला जाए तो एक तो घर घर नहीं रहेगा, दूसरी और बड़ी बात होगी कम उम्र की कच्ची बुद्धि ले घर से निकल वह अपना ही सर्वनाश कर लेगा.

बेटा कैसा भी आचरण क्यों न करे वह तो मां है. बेटे को सर्वनाश के रास्ते में नहीं धकेल सकती, अवहेलना अनादर सह कर भी नहीं. इन सब परिस्थितियों के बीच भी एक आशा की किरण टिमटिमा रही थी कि बेटा बिल्लू एम.बी.ए. कर एक बहुत अच्छी कंपनी में उच्च पद पर लग गया है. सुना है ऊंचा वेतन है. हां, यह जरूर है कि वेतन का बेटे ने एक 10 का नोट भी उस के हाथ पर रख कर नहीं कहा, ‘मां, यह लो, अपने लिए कुछ ले लेना.’

घर जैसे पहले वह चलाती थी वैसे ही आज भी चला रही है. अब तो बड़ेबड़े घरों से अति सुंदर लड़कियों के रिश्ते भी आ रहे हैं. कावेरी खुशी और गर्व से फूली नहीं समा रही. इन में से छांट कर एक मनपसंद लड़की को बहू बना कर लाएगी तो घर का दरवाजा हंस उठेगा. बहू उस के साथसाथ लगी रहेगी. बेटे से नहीं पटी तो क्या? पराई बेटी अपनी बेटी बन जाएगी पर बेटे ने उस की उस आशा की किरण को बर्फ की सिल्ली के नीचे दफना दिया और वह खबर सुना कर चला गया था जिस से उस के शरीर में जितनी भी शक्ति थी समाप्त हो गई थी और बेजान कुरसी ने उसे सहारा दिया.

आज कावेरी को पहली बार लगा कि जीवन उस के लिए बोझ बन गया है क्योंकि इनसान जीता है किसी उद्देश्य को ले कर, कोई लक्ष्य सामने रख कर. जिस समय पति की मृत्यु हुई थी तब भी उसे लगा था कि जीवन समाप्त हो गया पर उस को जीना पड़ेगा, सामने उद्देश्य था, लक्ष्य था, बेटा छोटा है, उस को बड़ा कर उस का जीवन प्रतिष्ठित करना है, उस का विवाह कर के घर बसाना है. मौत भी आ जाए तो उस से कुछ सालों की मोहलत मांग बेटे के जीवन को बचाना पड़ेगा पर आज तो सारे उद्देश्य की समाप्ति हो गई, जीवन का कोई लक्ष्य बचा ही नहीं पर बुलाने से ही मौत आ खड़ी हो इतनी परोपकारी भी नहीं.

जशोदा लौटी. आटे का कनस्तर स्टोर में रख कर साड़ी झाड़ती हुई आ कर बोली, ‘‘आंटी, नाश्ता बना लूं? भैया चला गया क्या? बाहर गाड़ी नहीं है.’’

विज्ञान : कैसा होगा भविष्य का इंसान ?

पिछली सदी के 1970-80 के सब्जी बाजारों की तुलना आज की सब्जी मंडियों से करें तो न्यूयौर्क, पेरिस या लंदन की सब्जी मंडियां ही नहीं, न सिर्फ दिल्ली और मुंबई के सब्जी बाजार, बल्कि लुधियाना और मेरठ तक के सब्जी बाजार तब के मुकाबले आज बहुत बदलेबदले नजर आएंगे. आखिर 1970-80 की सब्जी मंडियों में कहां थे- लाल, पीले और बैगनी रंग की शिमलामिर्च? 1970-80 की सब्जी मंडियों में कहां थे 4 किस्मों के टमाटर, 5-6 किस्मों के बैगन, कई किस्मों के बेर, दर्जनों किस्मों की फलियां और न जाने क्याक्या?

कहने का मतलब यह कि पिछले 4-5 दशकों में सब्जियों की दुनिया में बहुत सारे बदलाव हुए हैं. हर सब्जी की न केवल कईकई किस्में बाजार में आ गई हैं, बल्कि इन के साथ अब मौसमों और महीनों की बंदिशें भी खत्म हो गई हैं.

आज 4 दशकों पहले के मुकाबले हर सब्जी न केवल तमाम नईनई किस्म में मौजूद है बल्कि ये किस्में, किसी भी पुरानी किस्म के मुकाबले कहीं ज्यादा उपयोगी, स्वादिष्ठ और आकर्षक हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि इन्हें कोशिश कर के ऐसा बनाया गया है.

ये भी पढ़ें- शिक्षकों की भर्ती : सच या ख्वाब

लेकिन जरा रुकिए, यह सम झने के लिए कि यह बदलाव सिर्फ सब्जियों या फलों तक ही सीमित नहीं और न ही सीमित रहेगा. यह बदलाव और विकास इंसान की काया के संबंध में भी हो रहा है, कुछ अपनी तरफ से और बहुतकुछ कोशिशन. वास्तव में भविष्य में इंसान ऐसा ही नहीं होगा, जैसा आज है.

भविष्य के इंसान के शरीर में बहुत सारी मशीनरी की हिस्सेदारी होगी. सच तो यह है कि इस की अच्छीखासी शुरुआत हो चुकी है. ब्रिटिश रोबोटिक्स इंजीनियर केविन वारविक दुनिया के पहले ऐसे इंसान थे जो यह सम झने के लिए कि इंसान का नर्वस सिस्टम किसी बाहरी मशीन के साथ कैसे संगति करता है या आपस में मिलने पर कैसी प्रतिक्रिया करता है, उन्होंने अपनी बांह के नीचे एक सैंसर या कहें इलैक्ट्रौनिक डिवाइस इंप्लांट कराई थी. उन्हें दुनिया का पहला सायबोर्ग या अर्धमशीनी मानव होने का श्रेय हासिल है.

उड़ भी सकेगा मानव

यूनाइटेड किंगडम में रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस के अध्येता केविन वारविक, जोकि मौजूदा समय में कोवैंट्री यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर हैं, बहुत साफ शब्दों में कहते हैं, ‘‘कल का इंसान आज के जैसा बिलकुल नहीं होगा.’’ हम सब ने स्कूल की किताबों में पढ़ा है कि हमारे पूर्वजों के एक जमाने में, भले यह 10,000 साल पहले की बात हो, पूंछ हुआ करती थी. लेकिन कालांतर में वह गायब हो गई. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इंसान के लिए उस की कोई उपयोगिता नहीं बची.

उपयोगिता का यही सिद्धांत आने वाले दिनों में इंसान के और बहुत से अंगों पर लागू होगा और तमाम ऐसे अंगों की जरूरत पर भी लागू होगा जोकि मौजूदा लाइफस्टाइल के हिसाब से भविष्य में चाहिए होंगे. मसलन, इंसान के जीवन में रफ्तार की जरूरत दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. इसलिए, विकासक्रम का विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिकों को लगता है कि भविष्य का इंसान उड़ भी सकता है.

इंसान के लिए उड़ने की बात कहते हुए वैज्ञानिक अभी भी बहुत सारे किंतुपरंतु का सहारा ले रहे हैं, लेकिन बंदरों को ले कर वे काफी विश्वसनीयता से ऐसा कह रहे हैं तो क्या भविष्य तथाकथित हनुमान के उड़ने को सच साबित करने जा रहा है? शायद हां, लेकिन हालफिलहाल में नहीं, बहुत सालों बाद, बल्कि हजारों साल बाद.

ये भी पढ़ें- वर्कप्लेस में विविध ड्रैस कोड देगा आप को नई सोच

दरअसल इस उम्मीद का आधार इंसान का क्रमागत विकास का इतिहास है, जिस के मुताबिक, शरीर के जिन अंगों की जरूरत हमें नहीं थी, वे स्वमेव खत्म हो गए और जिन की जरूरत थी लेकिन वे नहीं थे, धीरेधीरे विकसित हो गए. चूंकि पहले तो महज जरूरत ही एकमात्र कैटेलिटिक एजेंट थी, जिस के चलते ये जरूरी बदलाव और विकास हुए, जबकि अब तो इस जरूरत को विकास के लिए पंख देने हेतु विकसित विज्ञान भी है. ऐसे में क्यों न यह अनुमान लगाने की कोशिश की जाए कि भविष्य में इंसान का बहुत काल्पनिक हद तक विकास होगा.

आज के जैसा नहीं होगा जीवन

वैसे भी माना जाता है कि प्रकृति के विकास का पहिया हमेशा घूमता रहता है. इस प्रक्रिया के चलते भी इंसान के रंगरूप, आकार और गतिविधियों में कई किस्म के चौंकाने वाले बदलाव वैज्ञानिक कल्पना कर पा रहे हैं. बीबीसी भविष्य सीरीज के तहत छपे एक शोधलेख के मुताबिक, ‘आने वाले समय में पूरी कायनात में ऐसे परिवर्तन होंगे कि धरती पर रहने वाला कोई भी जीव आज के जैसा नजर नहीं आएगा.’

वर्ष 1980 में लेखक डुगल डिक्सन ने एक किताब लिखी थी, ‘आफ्टर मैन : ए जूलौजी औफ द फ्यूचर.’ इस किताब में उन्होंने लाखों साल बाद नजर आने वाली ऐसी दुनिया की कल्पना की है जिस पर यकीन कर पाना मुश्किल है. इस किताब में उड़ने वाले बंदर, चिडि़यों की शक्ल वाले ऐसे फूल जिन पर शिकार खुद आ कर बैठता है और उड़ने वाले ऐसे सांपों का जिक्र है जो हवा में ही अपना शिकार कर लेते हैं. किसी आम इंसान के लिए यह दुनिया किसी सनकी लेखक के दिमाग की उपज से ज्यादा कुछ नहीं. यह पूरी तरह मनगढ़ंत है. लेकिन, रिसर्चर इस किताब में भविष्य की तमाम संभावनाएं देखते हैं.

क्रमिक विकास के जीव वैज्ञानिक जोनाथन लोसोस के मुताबिक, ‘करीब 54 करोड़ साल पहले जब कैम्ब्रियन विस्फोट हुआ था, तो धरती कई तरह के अजीब जीवों से फट पड़ी थी. इस दौर के हैलोसेजिन्या नाम के एक जीव के जीवाश्म मिले हैं, जिस के पूरे शरीर पर हड्डियों का ऐसा जाल था जैसा कि हमारी रीढ़ की हड्डी में देखने को मिलता है. इस बात की पूरी संभावना है कि निकट भविष्य में ऐसे ही कुछ और जीव पैदा हो जाएं.’

जोनाथन जिस तरह की कल्पना से एक अर्धमानवों के विकास की बात कर रहे हैं वह बात विज्ञान के दायरे में भले पहली बार हो रही हो लेकिन माइथोलौजी के दायरे में इस तरह की जीव प्रजातियों के बारे में बातें ही नहीं, बल्कि उन के तमाम जीवन कौशलों का विस्तृत लेखाजोखा दुनिया की तमाम सभ्यताओं के पास है. हिंदू माइथोलौजी तो इस का भंडार है. इस में अनेक ऐसे राक्षसों का जिक्र है. जिन की आज भी किसी हाइब्रिड विज्ञान में कल्पना मुश्किल लगती है. लेकिन, रोमन और ग्रीकन माइथोलौजी में भी ऐसी जीव प्रजातियां हैं जो जलचर, नभचर और थलचर एकसाथ हैं.

ये भी पढ़ें- चिकित्सा का बाजारीकरण

कुल मिला कर इंसान का तेज रफ्तार विकास उस तरफ जा रहा है जहां जल्द ही वह अपनी कोई नई पहचान हासिल करेगा. लेकिन इस नई पहचान पाने का समय कोई 10-20 या 50-100 साल की सीमा नहीं है, बल्कि यह सैकड़ों साल आगे की संभावनाओं का खाका है.

प्यार की कीमत : 3 लाशें

परेशानी की हालत में हरमन सिंह कुएं के चारों ओर चक्कर लगाते हुए गहरी सोच में डूबा हुआ था.

नवनीत कौर उर्फ बेबी कुएं की मुंडेर पर बैठी थी. उस के चेहरे पर भी चिंता के बादल मंडरा रहे थे. दोनों ही सोच में डूबे थे पर किसी से कुछ कह नहीं पा रहे थे. अचानक हरमन रुका और उस ने बेबी के नजदीक जा कर कहा, ‘‘हमारे पास इस समस्या का और कोई इलाज नहीं है, सिवाय इस के कि हम घर से भाग कर शादी कर लें. बाद में जो होगा, देखा जाएगा.’’

‘‘नहीं हरमन, हम ऐसा नहीं कर सकते.’’ चिंतित बेबी ने डरते हुए कहा. अपनी बात जारी रखते हुए उस ने आगे बताया, ‘‘मैं ने अपनी मां से अपनी शादी के बारे में बात की थी. मां ने वादा किया था कि वह बापू को मना लेगी. मेरे खयाल से हमें कुछ दिन और इंतजार करना चाहिए.’’

‘‘मैं ने भी अपने बापू को सब कुछ बता दिया है. शायद वह राजी हो जाएं. पर समस्या यह है कि तेरे बापू ने तेरे लिए जो लड़का ढूंढा है, जिस से अगले हफ्ते तेरी सगाई हो रही है. उस वक्त हम कुछ नहीं कर पाएंगे.’’ हरमन ने चिंतातुर होते हुए कहा.

‘‘मैं फिर कहती हूं कि हमें कुछ दिन और इंतजार करना चाहिए. अगर कोई चारा न बचा तो हम घर से भाग कर शादी कर लेंगे.’’ बेबी ने इतना बता कर बात खत्म कर दी. इस के बाद  दोनों अपनेअपने रास्ते चले गए. यह बात 2 अगस्त, 2019 की है.

भारतपाक सीमा पर स्थित तरनतारन के गांव नौशेरा के निवासी थे सरदार जोगिंदर सिंह. वह खेतीबाड़ी का काम करते थे. उन के 4 बच्चे थे, 2 बेटे और 2 बेटियां. सब से बड़ी बेटी सरबजीत कौर की शादी उन्होंने कर दी थी. उस से छोटा बेटा 22 वर्षीय हरमन अपने पिता के साथ खेतों में काम करता था.

हरमन से छोटी थी 19 वर्षीय प्रभदीप कौर, जिस की शादी के लिए वर की तलाश की जा रही थी. इन सब से छोटा 16 वर्षीय पवनदीप सिंह था. यह परिवार अपने आप में मस्त मगन रहने वाला शांत स्वभाव का था.

4 साल पहले जोगिंदर सिंह की पत्नी अमरजीत कौर की मृत्यु हो गई थी. उस समय गांव के ही बीर सिंह ने जोगिंदर सिंह और उस के परिवार का बड़ा ध्यान रखा था. बीर सिंह भले ही छोटी जाति का मजहबी सिख था, पर बीर सिंह और जोगिंदर सिंह की आपस में बड़ी गहरी दोस्ती थी.

पूरा गांव उन की दोस्ती की मिसाल देता था. दोनों एकदूसरे को भाई मानते थे, पर यह बात कोई नहीं जानता था कि आगे चल कर उन की दोस्ती एक ऐसे मुकाम पर जा पहुंचेगी कि जिस की कीमत लहू दे कर चुकानी पड़ेगी.

बीर सिंह भी नौशेरा ढाला गांव का निवासी था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे और 2 बेटियां थीं. बड़ी बेटी की उस ने शादी कर दी थी और बाकी बच्चे अभी अविवाहित थे. बीर सिंह और जोगिंदर के आपस में अच्छे संबंध होने के कारण दोनों परिवारों का एकदूसरे के घर काफी आनाजाना था.

ये भी पढ़ें- उत्तर प्रदेश : अपराध का अधर्म राज

इसी आनेजाने के दौरान जोगिंदर के बेटे हरमन की आंखें बीर सिंह की बेटी नवनीत कौर उर्फ बेबी से लड़ गईं. दोनों बचपन से साथ खेलेबढ़े थे, युवा होने पर जब दोनों ने एकदूजे को देखा तो अपनाअपना दिल हार बैठे.

गांव के बाहर खेतों में किसी न किसी बहाने से दोनों की मुलाकातें होने लगीं. दिन पर दिन उन का प्यार परवान चढ़ने लगा और फिर अंत में वह दिन भी आ गया, जिस की दोनों ने कल्पना भी नहीं की थी.

बीर सिंह ने अपनी बेटी बेबी के लिए लड़का खोज लिया था और वह जल्द ही उस के हाथ पीले करना चाहता था. हरमन और बेबी के प्रेम संबंधों की दोनों परिवारों को भनक तक नहीं थी. बहरहाल, बेबी के कहने पर उस की मां ने अपने पति बीर सिंह से जब हरमन के रिश्ते की बात की तो उस ने साफ और कड़े शब्दों में इनकार कर दिया.

इस के बाद हरमन और बेबी के पास शादी करने के लिए घर से भागने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा था. सो आपस में सलाह कर वे दोनों अगस्त के पहले सप्ताह में घर से भाग गए. हरमन ने अपनी बड़ी बहन की सहायता से गुरुद्वारा साहिब में बेबी से शादी कर ली.

दोनों ने जाति की दीवार तोड़ कर एक साथ जीनेमरने की कसमें खाते हुए शादी तो कर ली, पर उन्हें क्या पता था कि इस की कीमत हरमनजीत सिंह के पूरे परिवार को चुकानी पड़ेगी.

बीर सिंह और उस के बेटों को जब इस बात का पता चला तो उन का खून खौल उठा. उन्होंने हरमन और बेबी को तलाशने की बहुत कोशिश की पर वे नहीं मिले. इस बीच गांव वालों के सामने बलबीर सिंह बीरा, उस के बेटों वरदीप सिंह, अर्शदीप सिंह, सुखदीप सिंह की ओर से हरमन और उस के परिवार को धमकाया जा रहा था.

शादी के बंधन में बंध जाने के बाद घर की जिम्मेदारी के चलते हरमन कोई भी विवाद नहीं चाहता था. इसी कारण लगभग डेढ़ महीने पहले विवाह के तुरंत बाद वह गांव छोड़ कर चला गया था.

29 जुलाई, 2019 को बीर सिंह और उस के बेटों को खबर मिली कि हरमन बेबी के साथ 2 दिनों से अपने घर आया हुआ है. यह खबर मिलने के बाद वे लोग पूरी तैयारी के साथ रात होने का इंतजार करने लगे. इस से पहले बीर सिंह के बेटे वरदीप सिंह, अर्शदीप सिंह, सुखदीप सिंह हाथों में नंगी तलवारें ले कर जोगिंदर के घर के आसपास मंडराते रहे थे.

खतरे का अंदेशा भांप कर हरमन ने चुपके से अपनी पत्नी बेबी को अपने घर से निकाला और बहन के गांव पहुंचा दिया. घटना वाली रात 29 तारीख को रात का खाने के बाद हरमन अपने पिता जोगिंदर सिंह के साथ छत पर सोने चला गया. उस का छोटा भाई पवनदीप सिंह और बहन प्रभदीप कौर नीचे कमरे में सो गए थे.

रात करीब डेढ़ बजे हरमन को अपने घर की चारदीवारी के पास कुछ आहट सुनाई दी. उस ने नीचे झांक कर देखा तो दंग रह गया. बीर सिंह अपने बेटों और कुछ अन्य लोगों के साथ घर की चारदीवारी फांदने की कोशिश कर रहा था.

यह देख वह घबरा गया और उस ने अपने पिता को जगा कर सचेत किया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे संकट में वह अपने परिवार को बचाने के लिए क्या करे. तब तक बीर सिंह अपने लोगों के साथ चारदीवारी फांद कर घर के आंगन में दाखिल हो चुका था.

हरमन ने छत से गली में छलांग लगाई और ‘बचाओ बचाओ’ का शोर मचाते हुए अपने ताया बलकार सिंह के घर की तरफ दौड़ा. तब तक कुछ और गांव वाले भी उठ कर अपने घरों से बाहर निकल आए और हरमन को भागते हुए देखा पर किसी की समझ में यह बात नहीं आई कि हरमन क्यों भाग रहा है.

हरमन ने अपने ताया को जा कर पूरी बात बताई. वह अपने छोटे भाई और बेटों के साथ तुरंत भाई जोगिंदर सिंह के घर की ओर दौड़े पर जब वह वहां पहुंचे तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

बीर सिंह अपने बेटों, दामाद और अपने साथियों के साथ हरमन के परिवार की लाशें बिछा कर जा चुका था. शोर सुन कर पड़ोसी भी जमा हो गए थे. हरमन के ताऊ चाचा और पड़ोसियों ने पूरे गांव में बीर सिंह और उस के बेटों की तलाश की, पर वे गांव से फरार हो गए थे. बीर सिंह ने छत पर सो रहे जोगिंदर सिंह तथा नीचे कमरे में सो रहे पवनदीप सिंह और प्रभदीप कौर की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी थी.

सुबह जैसेजैसे दिन का उजाला फैलता गया, गांव में दहशत का माहौल बनता गया. इस तिहरे हत्याकांड ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया था. घटना की सूचना मिलते ही एसपी हरजीत धारीवाल, डीएसपी कमलजीत सिंह औलख और थाना सराय अमानत खां के प्रभारी इंसपेक्टर प्रभजीत सिंह क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम सहित मौकाएवारदात पर पहुंच गए.

ये भी पढ़ें- एक रोटी के लिए हत्या

शुरुआती जांच में सामने आया कि किसी तेज धार और नुकीले हथियारों से इस वारदात को अंजाम दिया गया था. सब से अधिक घाव जोगिंदर सिंह के सीने और गरदन में पाए गए जबकि बेटी प्रभदीप कौर की छाती और पेट पर वार किए गए थे.

16 वर्षीय मासूम पवनदीप सिंह के सिर के पीछे गहरे घाव पाए गए. तीनों लाशों का पंचनामा कर उन्हें पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भेज दिया गया.

पुलिस को बयान दर्ज करवाते समय हरमनजीत सिंह इस कदर सहमा हुआ था कि करीब से मौत को देखने के बाद उसे अपने व अपनी पत्नी बेबी के भविष्य की चिंता सता रही थी. वह बारबार सुरक्षा के लिए पुलिस अधिकारियों के समक्ष हाथपांव जोड़ रहा था.

हरमन और उस की पत्नी बेबी की सुरक्षा के लिए पुलिस ने उन्हें 2 गनमैन दिए. हरमन के बयानों पर थाना सराय अमानत खां में आरोपियों के खिलाफ 30 जुलाई को 11 आरोपियों बलबीर सिंह उर्फ बीरा, अर्शदीप सिंह, सुखदीप सिंह, गोविंदा, हैप्पी, मनी, बिक्रम सिंह, बिचित्र सिंह, जोगा सिंह व 3 अज्ञात लोगों पर मुकदमा दर्ज कर के गिरफ्तारी के लिए छापेमारी शुरू कर दी गई.

तीनों शवों का पोस्टमार्टम सिविल अस्पताल तरनतारन में 3 डाक्टरों के पैनल से करवाया गया. डीएसपी कमलजीत सिंह औलख की अगुवाई में बनाई गई विशेष टीम द्वारा दिनरात एक कर दिया गया. जिस के चलते 2 अगस्त, 2019 को इस हत्याकांड से जुड़े 3 आरोपी बीर सिंह, उस का दामाद जोबनजीत सिंह और बेटा वरदीप सिंह पुलिस के हाथ लग गए.

इस हत्याकांड का मास्टरमाइंड बीर सिंह का दामाद जोबनजीत सिंह था. नाबालिग वरदीप सिंह को जुवेनाइल एक्ट के तहत अदालत में पेश कर के बाल सुधार गृह फरीदकोट भेज दिया गया. जबकि बीर सिंह व उस के दामाद को 2 दिन के रिमांड पर ले कर पूछताछ की गई.

गिरफ्तारी के बाद पूछताछ के दौरान बीर सिंह ने बताया कि उस का रिश्ता जोगिंदर सिंह के साथ भाइयों जैसा था. लेकिन जोगिंदर के बेटे ने हमारी इज्जत खराब कर दी. जिस की वजह से वह समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रह गया था. तब मजबूरी में उसे अपराध के लिए मजबूर होना पड़ा था.

बीर सिंह और उस के दामाद जोबन सिंह की निशानदेही पर पुलिस ने वह तेजधार चाकू और हथियार बरामद कर लिए, जिन से जोगिंदर सिंह और उस के परिवार को मौत के घाट उतारा गया था. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद बीर सिंह और जोबन को अदालत में पेश कर जिला जेल भेज दिया गया था.

कथा लिखे जाने तक पुलिस बाकी फरार आरोपियों की तलाश में जुटी थी. इस मामले से जुड़े अभी 11 आरोपी अर्शदीप सिंह, सुखदीप सिंह, गोविंदा, हैप्पी, मनी, बिक्रम सिंह, बिचित्र सिंह, जोगा सिंह व 3 अज्ञात लोगों का कथा लिखने तक सुराग नहीं लग पाया था.

ये भी पढ़ें- एक थप्पड़ के बदले 2 हत्याएं : भाग 2

दूसरी ओर हरमनजीत सिंह के साथ प्रेम विवाह करने वाली नवनीत कौर बेबी का कहना है कि अभी केवल मेरे पिता की ही गिरफ्तारी हुई है. पुलिस को चाहिए कि इस मामले से जुड़े सभी आरोपियों को पकड़ कर जेल में डाले.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें