शातिर बहू की चाल: भाग 1

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आखिरी भाग

सतनाम कौर ने पूरी बिरादरी में हरजोत और उस के बच्चों, जो कि उन के पोतापोती थे को बदनाम कर रखा था. इस घटना से 2 सप्ताह पहले हरजोत कौर यह शिकायत ले कर अपने मामा ससुर यानी सतनाम कौर के भाई राजिंदर सिंह के पास गई थी कि वह अपनी बहन को समझाएं.

वह उसे और उस के बच्चों को बेवजह बदनाम करना छोड़ दें. नहीं तो वह जहर खा कर आत्महत्या कर लेगी. राजिंदर सिंह ने सतनाम कौर को समझाया भी था, लेकिन सतनाम कौर अपनी आदत से बाज नहीं आई थीं. इसलिए हरजोत कौर ने अपनी सास को ही रास्ते से हटाने की योजना बना ली थी.

अपनी योजना को अमली जामा पहनाने के लिए उस ने ये सारी बातें विक्रमजीत को बताईं. विक्रम नशे का आदी था. सो थोड़ा सा नशा करने के बाद वह हरजोत का साथ देने के लिए तैयार हो गया. रिमांड के दौरान दिए गए अपने बयान में हरजोत ने बताया कि उस ने पति के जीवित रहते 2 साल पहले अपनी सास की कोठी की रेकी कर ली थी.

अब ताजा स्थिति में उस ने आदर्श नगर जा कर यह देखा था कि सतनाम कौर की कोठी तक पहुंचने के लिए रास्ते में किनकिन सीसीटीवी कैमरों का सामना करना पड़ सकता है. नए हिसाब से उस ने नई योजना तैयार की थी.

घटना वाले दिन 29 मार्च को वह अपनी एक्टिवा पर सवार हो कर विक्रम के साथ सतनाम पुरा पहुंची. विक्रम ने उस से 500 रुपए मांगे और पैसे ले कर पहले नशा किया. इस दौरान वह एक दुकान पर बैठ कर बर्गर खाती रही. इस के बाद दोनों सतनाम कौर की आदर्श नगर स्थित कोठी पर पहुंचे.

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सतनाम कौर उसे देखते ही भड़क उठी और दोनों को वहां से चले जाने को कहा, लेकिन कोई जरूरी बात करनी है. बोल कर दोनों सतनाम के बेडरूम में बैठ गए. फिर मौका पाते ही विक्रम ने अपने गले में डाला हुआ काले रंग का साफा सतनाम के गले में डाल दिया, फिर दोनों ने मिल कर उस की हत्या कर दी.

आदर्शनगर, सतनामपुरा इलाके में सतनाम कौर कोठी नंबर 534 बी की ऊपरी मंजिल पर अकेली रहती थी. जबकि कोठी की नीचली मंजिल पर संदीप शर्मा व रामशरण 2 लोग किराए पर रहते थे. दिनांक 29 मार्च की सुबह किराएदार अपने काम पर चले गए थे, और देर रात घर लौटे थे. आ कर दोनों सो गए थे.

30 तारीख की सुबह जब किराएदार अध्यापक संदीप शर्मा ऊपर गया तो सतनाम कौर को आवाजें लगाने पर भी जब कोई आवाज नहीं आई, तो उसे शक हुआ. उस ने ऊपर जा कर देखा तो सतनाम कौर को मरा पाया और पुलिस को सूचना दे दी.

पुलिस ने दोनों आरोपियों की निशानदेही पर काले रंग का साफा बरामद कर लिया, जिस से उन्होंने सतनाम कौर का गला घोंट कर हत्या की थी. पुलिस ने आननफानन में 24 घंटे के भीतर सतनाम कौर के हत्यारों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.

आरोपियों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. पर एक बात अभी तक पुलिस को हजम नहीं हो रही थी कि हरजोत कौर ने बिना किसी विरोध के साथ अपना अपराध स्वीकार कैसे कर लिया.

जबकि हत्या जैसा संगीन अपराध कोई भी आरोपी इतनी आसानी से कबूल नहीं करता. पुलिस ने पूरे मामले की दोबारा गहनता से जांच की तो कई चौंकाने वाले खुलासे हुए. 2 दिन बाद इस मामले में अचानक एक नया मोड़ आ गया.

पुलिस ने इस केस की एक और अभियुक्त  अंजू को हिरासत में ले लिया. पूछताछ के दौरान उस ने स्वीकार किया कि उस ने हरजोत के कहने पर विक्रम के साथ जा कर सतनाम कौर की हत्या की थी.

हरजोत कौर तो मौकाएवारदात पर गई ही नहीं थी. दरअसल सीसीटीवी फुटेज को बारीकी से चेक करने पर पुलिस को पता चला था कि एक्टिवा पर सवार औरत की कद काठी और उस समय पहने हुए कपड़े हरजोत से मेल नहीं खा रहे थे.

जब हरजोत से दोबारा सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने सब सच उगल दिया. वह और विक्रम अब तक पुलिस से झूठ बोलते आए थे. दरअसल, पुलिस को गुमराह करने और जांच की दिशा भटकाने के लिए यह हरजोत की चाल थी.

अंजू कई सालों से हरजोत के घर काम करती थी और उसी गांव की रहने वाली थी. हरजोत ने उसे अपनी बातों के जाल में फंसा कर इस काम के लिए राजी किया था. अंजू के अनुसार उस ने यह काम पैसों या किसी अन्य लालच में नहीं किया था.

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वह हरजोत को अपनी बड़ी बहन जैसी मानती थी. हरजोत ने इसी बात का फायदा उठाया था. घटना वाले दिन 29 मार्च को अंजू, विक्रम और हरजोत तीनों एक साथ सतनामपुरा आए थे. हरजोत बर्गर की एक दुकान पर रुक गई थी और अंजू विक्रम के साथ हरजोत की एक्टिवा पर घटना को अंजाम देने सतनाम कौर के घर पहुंच गई.

सतनाम की हत्या करने के बाद हरजोत की योजना अनुसार वे दोनों अपने गांव दादूवाल लौट गए थे. गांव पहुंच कर अंजू ने अपना पहना हुआ सूट जला दिया था. ऐसा करने के लिए उस से हरजोत ने ही कहा था. पुलिस ने अंजू की निशानदेही पर वह अधजला सूट भी बरामद कर लिया.

3 अप्रैल को अंजू, विक्रम और हरजोत को पुन: अदालत में पेश किया गया. उस दिन विक्रम और हरजोत का रिमांड समाप्त हो गया था, इसलिए उन दोनों को जेल भेज दिया गया. जबकि अंजू को 5 अप्रैल तक पुलिस रिमांड पर लिया गया.

बाद में रिमांड अवधि समाप्त होने पर अंजू को भी जेल भेज दिया गया. पुलिस जांच भटकाने के पीछे हरजोत का मकसद यह था कि जरूरत पड़ने पर वह यह साबित कर सकती है कि घटना के समय वह मौका ए वारदात पर मौजूद नहीं थी. और अगर वह पकड़ी भी गई तो उस के बच्चों की देखभाल अंजू कर लेगी. दोनों हालातों में एक औरत का बाहर रहना तय था, पर पुलिस जांच में हरजोत की पोल खुल गई और उस के साथ अंजू भी पुलिस की गिरफ्त में आ फंसी.

सौजन्य: मनोहर कहानियां

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