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गुड़ : सर्दी में होने वाली परेशानियों की एक दवा

गन्ने के रस से बने गुड़ के कई फायदे हैं. ठंड में गुड़ और भी ज्यादा लाभकारी हो जाता है. ये हमारे शरीर में खून की कमी नहीं होने देता. इसके अलावा ये एक प्रभावशाली ऐंटीबायोटिक है. ठंड के मौसम में गुड़ का सेवन करना सभी उम्र के लोगों के लिए फायदेमंद रहता है.

इस खबर में हम आपको गुड़ से होने वाले फायदों के बारे में बताएंगे

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  • गुड़ एक प्रभावशाली ऐंटीऔक्सिडेंट है. गले और फेफड़ों में होने वाले इंफेक्शन में ये काफी लाभकारी होता है और उन्हें स्वस्थ रखने में मदद करता है.
  • जिन लोगों को नाक के एलर्जी की शिकायत है उनके लिए गुड़ का सेवन बेहद असरदार होता है. एलर्जी के मरीज सुबह भूखे पेट 1 चम्मच गिलोय और 2 चम्मच आंवले के रस के साथ गुड़ का सेवन करें. ऐसा रोजाना करने से नाक की एलर्जी में फायदा मिलता है.
  • सर्दी के मौसम में होने वाले स्वास्थ संबंधी शिकायतों में गुड़ काफी लाभकारी होता है. इन समस्‍याओं से छुटकारा पाने के लिए गुड़ की चाय पीना लाभदायक साबित होता है. ठंड के दिनों में गुड़, अदरक और तुलसी के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीना भी आपको कई बीमारियों से बचाता है.
  • गुड़ और तिल की बर्फी खाने से सर्दी और जुकाम में काफी आराम मिलता है. इन्हें खाने से शरीर में गर्मी बनी रहती है.

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रोमा के कई रंग : भाग 1

अगर मरने और मारने वाले दोनों के अवैध संबंध किसी एक महिला से हों तो दोनों को जलन तो हो सकती है, पर मारनेमरने की स्थिति नहीं आती. लेकिन रोमा ने एक अवैध संबंध वाले को दूसरे से मरवा दिया. कैसे…

8सितंबर, 2019 का दिन था. उस समय सुबह के करीब पौने 9 बजे थे. तभी जिला हरिद्वार के रुड़की स्थित थाना सिविललाइंस के थानाप्रभारी अमरजीत सिंह के पास शेरपुर गांव के पूर्वप्रधान अनुज का फोन आया.

उस ने बताया कि शेरपुर बाजुहेड़ी मार्ग पर एक आदमी की लाश पड़ी है, जो खून से लथपथ है. लाश मिलने की खबर सुनते ही थानाप्रभारी सबइंसपेक्टर अंकुर शर्मा, सिपाही अरविंद व आशुतोष को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

उन्होंने इस मामले की सूचना सीओ चंदन सिंह बिष्ट, एसपी (देहात) नवनीत सिंह भुल्लर तथा एसएसपी सेंथिल अवूदई कृष्णराज एस. को दे दी. घटनास्थल कोतवाली से मात्र 2 किलोमीटर दूर था. इसलिए वह 10 मिनट में ही मौके पर पहुंच गए.

लाश गांव के मुखिया दयाराम सैनी के गन्ने के खेत में पड़ी थी. अच्छी बात यह थी कि पुलिस के आने से पहले ही मृतक की शिनाख्त हो चुकी थी. शव मिलने की सूचना पर जब गांव शंकरपुरी के लोग मौके पर पहुंचे तो उन्होंने उस की शिनाख्त शंकरपुरी निवासी बोरवैल ठेकेदार सुदेश पाल के रूप में कर दी.

तब तक वहां मृतक सुदेश पाल की पत्नी देशो देवी भी पहुंच गई थी. देशो देवी ने थानाप्रभारी को बताया कि आज सुबह 8 बजे सुदेश मोबाइल पर किसी व्यक्ति से बात करते हुए घर से बाहर चले गए थे. इस के बाद गांव के कुछ लोगों ने सुदेश को 2 युवकों के साथ बाइक पर बैठ कर शेरपुर गांव की ओर जाते देखा था.

इसी बीच सीओ चंदन सिंह बिष्ट भी घटनास्थल पर पहुंच गए. दोनों अधिकारियों ने जब सुदेश पाल के शव का गहन निरीक्षण किया तो पाया कि हत्यारों ने सुदेश का गला किसी धारदार हथियार से रेता था. लाश की स्थिति देखनेसमझने के बाद सीओ चंदन सिंह ने वहां मौजूद देशो देवी व अन्य लोगों से सुदेश के बारे में पूछताछ की.

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घटनास्थल की काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने सुदेश की लाश को पोस्टमार्टम के लिए राजकीय अस्पताल भेज दिया.

सुदेश पाल की हत्या से उस के परिवार में  कोहराम मच गया था. गांव वाले भी इस बात से हैरान थे कि उस की हत्या आखिर किस ने की. इस हत्या के विरोध में सैकड़ों गमजदा ग्रामीण थाना सिविललाइंस पहुंच गए. थानाप्रभारी से मुलाकात कर उन्होंने हत्यारों को तत्काल गिरफ्तार कर कड़ी सजा दिलवाने की मांग की.

पुलिस ने सुदेश पाल की पत्नी देशो देवी की ओर से आईपीसी की धारा 302 के अंतर्गत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू कर दी. पोस्टमार्टम के बाद दोपहर बाद सुदेश पाल का शव उस के परिजनों को सौंप दिया गया.

उसी शाम एसपी (देहात) नवनीत सिंह ने सुदेश पाल की हत्या के खुलासे के लिए सीओ चंदन सिंह बिष्ट के नेतृत्व में एक टीम का गठन किया, जिस में थानाप्रभारी अमरजीत सिंह सहित एसएसआई प्रमोद चौधरी, थानेदार अंकुर शर्मा व संजय नेगी सहित अपराध अन्वेषण यूनिट प्रभारी रविंद्र कुमार, एएसआई देवेंद्र भारती, जाकिर, अशोक, महीपाल, रविंद्र खत्री आदि को शामिल किया गया. जांच टीम ने सब से पहले घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज चैक किए.

इस के बाद पुलिस टीम ने मुखबिरों से क्षेत्र में सुरागरसी कराई. मृतक के परिजनों से भी व्यापक पूछताछ की गई. पूछताछ के दौरान टीम को जानकारी मिली कि सुदेश सीधासादा व्यक्ति था.

वह बोरवैल का ठेकेदार था. गांव में उस की किसी से दुश्मनी भी नहीं थी. उस के छोटे भाई अर्जुन की पत्नी रोमा के पास विकास नाम के युवक का आनाजाना था, जिस का सुदेश अकसर विरोध करता था.

विकास मूलरूप से गांव मांडला थाना पुरकाजी, जिला मुजफ्फरनगर का रहने वाला था. मगर वह पिछले 8 सालों से हरिद्वार के थाना रानीपुर क्षेत्र के गांव रावली महदूद में रह रहा था. यह जानकारी मिलते ही जांच टीम के शक की सुई विकास की ओर घूम गई. पुलिस ने जब विकास से संपर्क करने का प्रयास किया तो पता चला कि वह सुदेश की हत्या के बाद से ही घर से गायब है.

इस से पुलिस को पक्का यकीन हो गया कि सुदेश की हत्या के तार अवश्य ही विकास से जुड़े हुए हैं. इस के बाद जांच टीम ने विकास को गिरफ्तार करने के लिए मुखबिरों को सुरागरसी पर लगा दिया.

पुलिस को सुदेश की जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली थी, उस में उस की मौत का कारण गला घोंटना व धारदार प्रहारों के कारण शरीर से ज्यादा खून बहना बताया गया था.

11 सितंबर, 2019 को थानाप्रभारी अमरजीत सिंह सुबह 11 बजे अपने कार्यालय में बैठे थे, तभी उन के खास मुखबिर ने सूचना दी कि सुदेश पाल की हत्या का आरोपी विकास थोड़ी देर पहले अपने एक साथी के साथ पल्सर बाइक पर बहादराबाद क्षेत्र में देखा गया था. यह सूचना महत्त्वपूर्ण थी.

अमरजीत सिंह ने तत्काल एसएसआई प्रमोद चौधरी, एसआई संजय नेगी, अंकुश शर्मा, सीआईयू प्रभारी रविंद्र कुमार, एएसआई देवेंद्र भारती व सिपाही जाकिर, अशोक, महीपाल, रविंद्र खत्री, नीरज राणा व सचिन अहलावत को साथ लिया और 15 मिनट में बहादराबाद पहुंच गए.

वहां पहुंच कर उन्होंने पुलिस की 2 टीमें बनाईं. अमरजीत सिंह ने पुलिस की एक टीम को सिडकुल-सलेमपुर रोड पर वाहन चैकिंग के लिए लगाया और दूसरी टीम को बहादराबाद हाइवे पर काले रंग की पल्सर बाइक की तलाश में लगा दिया.

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लगभग 2 घंटे बाद पुलिस टीम को काले रंग की पल्सर बाइक सिडकुल सलेमपुर रोड पर आती दिखाई दी. बाइक पर 2 युवक सवार थे. पुलिस ने जब उन्हें रुकने का इशारा किया, तो वे सकपका गए.

ट्रांसजैंडर : समाज के साथ मिला रहे कदम से कदम

पढ़ेलिखे और सम झदार लोगों को किन्नर, हिजड़े जैसे शब्द अब चुभते हैं. कानून भी अब इन्हें ट्रांसजैंडर मानता है. हर तरह के कानूनी अधिकार इन्हें प्राप्त हैं. अब ये हवाईजहाज से सफर करते हैं. सभ्य समाज के साथ कदम से कदम मिला कर चलने का प्रयास करते हैं. सरकार की तमाम योजनाओं के प्रचारप्रसार में अपना योगदान देते हैं. इन का व्यवहार भी अब पहले जैसा नहीं रहा.

किन्नर समाज के ऐसे लोग केवल समाज के साथ ही कदमताल नहीं कर रहे बल्कि अपने समाज में भी लोगों को बदल रहे हैं. यह भी देखा गया है कि जो किन्नर पढ़ेलिखे हैं वे ज्यादा सम झदार हैं. शिक्षा ही किन्नर समाज को आगे बढ़ने का रास्ता दिखा सकती है. ये फैशन के साथ कदमताल तो मिला ही रहे हैं, सोशल मीडिया पर भी पूरी तरह से अपने को अपडेट रखते हैं.

किन्नरों की दुनिया हमेशा से रहस्यमय नजर आती रही है. पहले ये खुद को समाज से जोड़ने का प्रयास नहीं करते थे, जिस की वजह से समाज भी इन से उपेक्षा का व्यवहार करता था. अब धीरेधीरे दोनों तरफ से एकदूसरे के करीब आने के प्रयास हो रहे हैं. ‘आओ साथ चलें हम’ कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए किन्नर समाज के प्रमुख लोगों से बात करने का मौका मिला.

किन्नर से ट्रांसजैंडर तक का सफर कैसे तय हुआ इस पर काजल मंगलमुखी से बातचीत करने का मौका मिला, जो वैसे तो चंडीगढ़ में रहती हैं पर रहने वाली मैसूर के एक गांव की हैं.

काजल जन्म से ही लड़की की तरह रहती थीं. परिवार गरीब था. परिवार में पैसे और शिक्षा दोनों का ही अभाव था. गांव के लोग अपने घरेलू कामों जैसे रसोई के बरतन साफ करना और नहाने के लिए नदी के पानी का प्रयोग करते थे. नदी गांव के पास थी. एक दिन काजल भी वहां अपनी सहेलियों के साथ नहा रही थी. ऐसे में उस ने अपनी सहेली के जननांगों को देखा तो उसे लगा कि उस की और उस की सहेली की शारीरिक बनावट में फर्क है.

यह बात उस ने अपनी मां को बताई तो उन्होंने चुप रहने के लिए कह कर बात को टाल दिया. धीरेधीरे काजल भी इस बात को भूल गई. समय बीतता गया. काजल को अब अपने अंदर अधिक बदलाव महसूस हो रहा था.

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बचपन में हुआ शारीरिक शोषण

जब वह कक्षा 8 में पढ़ रही थी तो उसे मोहन नाम के एक लड़के से प्यार हो गया. वह एक दिन लवलैटर लिख रहा था. काजल को लगा कि मोहन उस के लिए लवलैटर लिख रहा है. उसे लगा कि यह लैटर वह उसे देगा. जब मोहन ने लवलैटर उसे नहीं दिया तो पूछने पर मोहन ने कहा, ‘‘तु झ से प्यार क्यों करूंगा? तू तो खुद लड़का लगती है.’’

उस दिन काजल बहुत रोई. एक दिन रिश्ते के एक अंकल उसे बहलाफुसला कर अपने घर ले गए. वहां एकांत में जब उन्होंने काजल को लड़की नहीं पाया तो भी लड़कों की तरह उस का शारीरिक शोषण किया. जब यह बात काजल ने घर में बताई तो मां ने उसे ही बुराभला कहा.

इस घटना के बाद एक तरह से काजल अपने घरपरिवार और समाज से कट गई. उस के पिता ने घर की जमीन बेच दी. पूरा परिवार गरीबी में रहने लगा. ऐसे में काजल को एक दिन मां ने घर से निकाल दिया. वह बस स्टेशन पर बैठ कर रात काटने लगी.

इसी बीच काजल की मुलाकात एक महिला से हुई जो उसे कामधंधा दिलाने के नाम पर मैसूर से मुंबई ले आई. उस औरत ने काजल को कुछ रुपयों के बदले मुंबई के रैड लाइट एरिया में बेच दिया. यहां काजल का काम देहधंधे में आए लोगों से पैसे छीन कर भगा देने का था. सैक्स संबंधों की चाह में लोग किन्नर लड़कियों के पास आते थे. ये लोग उन के पैसे छीन कर उन्हें भगा देते थे.

मुंबई में देखी देहधंधे की दरिंदगी

काजल मुंबई में समाज के भूखे भेडि़यों से वाकिफ हुई. काजल जिस खोली में रहती थी वहीं पर एक बूढ़ी दादी भी रहती थीं. वह उन की सेवा करती थी. काजल को लोगों से पैसे छीनना बुरा लगता था. एक दिन यही बात वह उन बूढ़ी दादी को बता रही थी. तब उन्होंने बताया कि तुम तो गनीमत समझो हालत तो इन लड़कियों की खराब है जिन के मांबाप ने इन्हें देहधंधे के लिए बेच दिया.

7-8 साल की लड़कियों को इस बारे में कुछ भी पता नहीं होता, बावजूद इस के सैक्स के भेडि़ए इन के शरीर को नोचते. छोटी लड़कियों को सैक्स के लिए तैयार करने के लिए तमाम उपाय और मारपीट की जाती है. लड़कियों के अंगों को बड़ा करने के लिए उन्हें नोचा जाता है. उन के जननांगों में नीबू डाल दिया जाता है ताकि जगह बन सके और फिर आदमी सैक्स कर सके.

यह सुन कर काजल को लगा कि वह लोगों को लूट कर सही कर रही है. काजल यहां आने वालों के पर्स निकाल लेती थी. उन में केवल इतने पैसे छोड़ती थी कि वे अपने घर चले जाएं. काजल को अपने जैसे कुछ अच्छे लोग भी मिले, जिन्होंने सम झाया कि किन्नर 3 तरह से अपना जीवनयापन कर सकते हैं- एक देहधंधा कर, दूसरा भीख मांग कर और तीसरा बधाई दे कर. काजल को बधाई देने वाला धंधा पसंद आया.

इस के लिए उस ने बात की तो पता चला कि उसे औपरेशन कर के लड़की बनना होगा. औपरेशन 2 तरह से होता था-एक डाक्टर सर्जरी कर के करते थे और एक दुर्गा मां के सामने होता था. दोनों का खर्च अलगअलग था. डाक्टर 10 हजार रुपए लेता था और दुर्गा मां के सामने 3 हजार रुपए में होता था. दूसरे में मरने का खतरा होता था. यही वजह है कि दुर्गा मां के सामने पूजा के साथ एक अलग गड्ढा था. अगर कोई औपरेशन के बाद सैप्टिक होने से मर जाता था तो उसे उसी गड्ढे में दफन कर देते थे.

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मरने से बची तो आगे बड़ी

काजल दुर्गा के सामने औपरेशन को तैयार हो गई. काजल बताती है, ‘‘पूजा के समय मेरे सारे कपड़े उतार दिए गए. पूजा करने के लिए फूलमाला पहना कर तैयार किया गया. इस के बाद एक चाकू टाइप धारदार औजार से मेरे जननांग को काट दिया गया. दर्द की पीड़ा आज भी याद कर के शरीर कांप जाता है.

‘‘मरणासन्न अवस्था में देशी दवाओं के सहारे 40 दिन बीत गए. मेरी जान नहीं गई. इस के बाद जलसा हुआ और मु झे किन्नर समाज में शामिल कर लिया गया. अब मैं बधाई मांगने लगी थी. मु झे यह पता चल चुका था कि किन्नरों को कमाई के 3 रास्ते ही होते हैं – देहधंधा, अपराध और बधाई मांगना. मु झे बधाई मांगना ही सब से आसान रास्ता लगा. इस में गाने गा कर हम बधाई मांगने लगे. यहीं से मेरी जिंदगी भी बदली.

‘‘एक दिन हम लोग एक वकील साहब के यहां बधाई मांगने गए तो वहां उन की बूढ़ी मां मिलीं. उन्होंने कहा कि ऐसे मांगमांग कर कब तक काम चलाओगी. कोई नौकरीधंधा करो. हम ने उन से कहा कि हमें नौकरी कौन देगा? वे बोलीं कि पढ़ोलिखो, अपने अधिकार जानो, संविधान ने तुम्हें अधिकार दिए हैं. उस दिन हमें लगा कि अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए.

‘‘1995 से हम ने अपनी संस्था ‘मंगलमुखी ट्रांसजैंडर सोसाइटी’ का गठन किया और अपने अधिकारों की लड़ाई शुरू की. इस के बाद चंडीगढ़ में ‘चंडीगढ़ ट्रांसजैंडर वैलफेयर बोर्ड’ की सदस्य भी बनी. हम ने वहां लोगों को तैयार किया और कानूनी लड़ाई लड़ी. ‘भारतीय जन सम्मान पार्टी’ बनाई और 2019 में हरियाणा विधानसभा में चुनाव लड़ने के लिए अपने प्रत्याशी उतारे.’’

वे आगे कहती हैं, ‘‘बधाई मांगने जाने वाले अपने लोगों को मैं यह सम झाती हूं कि वे लोगों की आर्थिक हालत देख कर ही बधाई मांगें, जबरदस्ती बधाई न मांगें. बधाई देने वाले हमारे जजमान होते हैं. उन्हें कष्ट दे कर हम सुखी नहीं रह सकते हैं.

‘‘आज हम अपने समाज को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं. हम भी चाहते हैं कि हमारे समाज के लोग भी पढ़लिख कर अफसर बनें. हम लोग बचपन में जिन मुसीबतों से गुजरे उन से किसी और को न गुजरना पड़े, इस के लिए हम अपने समाज को जागरूक कर रहे हैं. मैं बहुत सारे ट्रांसजैंडरों और सामान्य बच्चों को स्कूल में पढ़ा रही हूं.’’

बिहार सरकार की प्रचार योजना में सहभागिता

26 वर्षीय सुमन मित्रा बिहार के पटना जिले की रहने वाली है. स्कूल के दिनों में जैसेजैसे वह बड़ी होने लगी तो साथियों ने उस के हावभाव देख कर उसे चिढ़ाना शुरू कर दिया. सुमन अपने घर वालों को कुछ बता नहीं पा रही थी. जैसेजैसे वह बड़ी होती गई उसे यह लगने लगा कि वह नौर्मल लड़की नहीं है. स्कूल के साथी उसे ‘फिफ्टीफिफ्टी’ बुलाते थे. धीरेधीरे यह क्रम बढ़ता गया और ग्रैजुएशन तक आतेआते सभी को पता चल गया कि वह लड़की नहीं है.

सुमन के लिए यह खुशी की बात थी कि कम से कम उस के घर वाले साथ थे. घर वाले सुमन को ले कर चेन्नई के मैडिकल कालेज गए. वहां तमाम तरह के टैस्ट हुए. औपरेशन और हार्मोंस की दवाओं के बाद सुमन पूरी तरह से लड़की बन गई.

सुमन कहती है, ‘‘इस के बाद धीरेधीरे समाज ने मु झे स्वीकार कर लिया. जिन लोगों को दिक्कत है भी, उन की हम परवाह नहीं करते.’’

सुमन अपने परिवार के साथ रहती है. देखने में वह स्लिम और फिट, सांवले रंग वाली टैनिस खिलाड़ी दिखती है. सुमन को वैस्टर्न कपड़े पहनने पसंद हैं. इस के साथ ही वह बिहार सरकार की प्रचार योजनाओं में भी हिस्सा ले रही है. सुमन अपने गानों के जरिए नशामुक्ति, भ्रूण हत्या, दहेज और बालविवाह के खिलाफ लोगों को जागरूक कर रही है.

सुमन कहती है, ‘‘अब ट्रांसजैंडरों को ले कर लोगों की राय बदल रही है. मैं हवाईजहाज से ले कर हर तरह का सफर कर रही हूं. हर बड़े होटल में रुकती हूं. समाज के हर वर्ग के साथ उठतीबैठती हूं पर मु झे कोई हिचक नहीं होती है. अगर हम तुलना करें तो स्कूल के दिनों में ज्यादा परेशानी होती थी. वहां मेरा नाम ही ‘फिफ्टीफिफ्टी’ पड़ गया था. अब मैं ब्यूटीशियन का काम करती हूं. मैं गाने गाती हूं, जिन में से कई गाने बिहार सरकार की प्रचार योजनाओं में बजते हैं. हम समाज को कुरीतियों के खिलाफ जागरूक करने के लिए नुक्कड़ नाटक भी करते हैं.’’

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शादी उस से जो हमें समझ सके

सुमन बताती है, ‘‘हर लड़की की तरह ही मेरे दिल में भी शादी को ले कर खयाल आता है. मैं शादी ऐसे लड़के से करना चाहती हूं जो मु झे सम झ सके. शादी एक जीवन का गुजरबसर करने का जरिया है. ऐसे में जब तक आपसी सहमति नहीं होगी, आपस में सामंजस्य नहीं होगा शादी सफल नहीं होगी. कुछ अरसा पहले छत्तीसगढ़ सरकार ने 11 ट्रांसजैंडर जोड़ों की शादियां कराई हैं. इस तरह से हर सरकार और समाज को काम करना चाहिए ताकि ट्रांसजैंडर भी आपस में शादी कर साथ रह सकें.’’

सुमन 6 ट्रांसजैंडर बच्चों का पालनपोषण कर रही है. वे सभी लड़कियां ही हैं. वह कहती है कि हर काम के लिए सरकार से ही उम्मीद नहीं करनी चाहिए. समाज को खुद भी अपने काम करने चाहिए.

सुमन आगे कहती है,  ‘‘हमारे अंदर की फीलिंग्स लड़कियों वाली हैं. कई बार लोगों को यह लगता है कि ट्रांसजैंडरों में भावनाएं नहीं होती हैं, ऐसा नहीं है. ट्रांसजैंडर मेल या फीमेल जो भी होते हैं, उन में भी भावनाएं होती हैं.

‘‘आज मैडिकल युग में ट्रांसजैंडर भी मैडिकल सुविधाओं को ले कर समाज के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकते हैं. जरूरत केवल जागरूक होने की है. हम इस बात को बताने के लिए फैशन शोज, सोशल मीडिया हर जगह खुद को रखते हैं ताकि हमें देख कर हम जैसे दूसरे लोगों में भी आत्मविश्वास बढ़ सके. आज मु झे अपने जैसे तमाम लोग मिलते हैं जो ट्रांसजैंडर होते हुए भी समाज के साथ कदम से कदम मिला कर चल रहे हैं.’’

जानिए, कैसे हटाएं प्यूबिक हेयर

बौडी के बाकी अंगों की तरह प्राइवेट पार्ट्स की भी साफ-सफाई भी बहुत जरूरी है. पर इस पर आप ज्यादा चर्चा नहीं कर पाते. यह आपके ग्रूमिंग का भी अहम हिस्सा है. आप हमेशा इस बात को लेकर कन्फ्यूज रहते हैं कि प्यूबिक पार्टस पर कौन-सा हेयर रिमूवल इस्तेमाल करें कि इसका परिणाम बेस्ट हो. अक्सर आप इसके लिए शेविंग, ट्रिंमिंग, वैक्स, हेयर रिमूवर वगैरह इस्तेमाल करते हैं. तो आइए जानते हैं इसके लिए कुछ जरूरी टिप्स.

सबसे पहले आपको बता दें, प्यूबिक हेयर प्राइवेट पार्ट्स के प्रटेक्शन के लिहाज से जरूरी होते हैं. ये बैक्टीरिया, इनफेक्शंस, सेक्शुअली ट्रांसमिटेड डिजीज और बाहरी फ्रिक्शन वगैरह से बचाते हैं. इसलिए इनको पूरी तरह से हटाना ठीक नहीं लेकिन साफ-सफाई का ध्यान देना जरूरी है.

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एक्सपर्ट्स की मानें तो प्यूबिक हेयर हटाने के लिए हेयर रिमूवर का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना चाहिए. यह काफी नुकसान पहुंचाते हैं. इनमें मौजूद केमिकल नाजुक स्किन पर काफी खराब असर डालते हैं, जिनसे घाव और इन्फेक्शंस तक हो सकते हैं.

रेजर इस्तेमाल करते हैं तो ध्यान रखें कि अपना रेजर किसी से शेयर न करें. इसके अलावा रेजर जल्दी-जल्दी बदलते रहें. एक ही रेजर ज्यादा दिन इस्तेमाल करेंगे तो इसकी धार खराब हो जाएगी और बाल सही से नहीं निकलेंगे. अगर आप ताकत के साथ इस्तेमाल करेंगे तो कटने का खतरा बढ़ जाएगा.

कई लोग प्यूबिक हेयर हटाने के लिए रेजर का इस्तेमाल भी करते हैं लेकिन इसमें भी सावधानी बरतनी चाहिए. रेजर से कटने का खतरा होता है. अगर रेजर इस्तेमाल ही कर रहे हैं तो बाल हटाने का सही डायरेक्शन सही रखें. ग्रोथ वाली दिशा में बाल निकालें इससे कटने का खतरा कम रहता है.

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घर पर बनाएं तवा आलू मसाला

आज आपको तवा आलू मसाला बनाने की रेसिपी बता रहे हैं. इसे बनाने में ज्यादा समय भी नहीं लगता है और बनाने में भी काफी आसान है.  तो आइए जानते हैं तवा आलू मसाले की रेसिपी.

सामग्री

जीरा – 1/2 टीस्पून

प्याज – 70 ग्राम

अदरक पेस्ट – 1/2 टीस्पून

लहसुन पेस्ट – 1/2 टीस्पून

टमाटर पूरी – 180 ग्राम

गर्म मसाला पाउडर – 1/2 टीस्पून

तेल – जरूरत अनुसार

उबले आलू – 500 ग्राम

नमक – 1 टीस्पून

हल्दी – 1/4 टीस्पून

लाल मिर्च पाउडर – 1/2 टीस्पून

धनिया पाउडर – 1 टीस्पून

चाट मसाला पाउडर – 1/2 टीस्पून

मेथी – 1/2 टीस्पून

धनिया – गार्निशिंग के लिए

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बनाने की विधि

सबसे पहले एक कड़ाई में तेल डालकर मध्यम आंच पर गर्म करें.

इसके बाद इसमें उबले हुए आलू, हल्दी, धनिया मसाला, चाट मसाला, नमक और लाल मिर्च पाउडर डालकर अच्छे से पकाएं.

जब आलू का रंग सुनहरा हो जाए तो इसे आंच से हटा लें. अब एक पैन में तेल डालकर मध्यम आंच पर गर्म होने दें. फिर इसमें जीरा, लहसुन, अदरक और प्याज डालकर फ्राई कर लें.

इसके बाद इसमें टमाटर प्यूरी डालकर 2 मिनट तक पकाएं. अब इसमें फ्राई किए हुए आलू, मेथी और गर्म मसाला डालकर कुछ मिनट तक कम आंच में पकाते रहें.

आपका तवा आलू मसाला बनकर तैयार है. इसे धनिये के साथ गार्निश कर सर्व करें.

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तुम से मिल कर : भाग 3

पटना पहुंच कर रीना ने सब से पहले अपने लिए एक नौकरी ढूंढ़ी. उसे एक प्राइवेट नर्सिंग होम में डाइटीशियन की नौकरी जल्दी मिल भी गई. फिलहाल उस के लिए इतना काफी था. मां, पिताजी के साथ उस का बेटा टीटो पलने लगा.

उस शाम रीना नर्सिंग होम से घर के लिए निकल ही रही थी कि एक अनजान नंबर से कौल आई. उस के रिसीव करते ही उस ने इतना ही कहा, ‘‘अपना पता दे सकोगी अभी?’’

अरे, यह अनंत है. उसे अच्छा ही लगा. फिर भी स्त्रीसुलभ विरोध दर्शाते हुए पूछा, ‘‘क्या?’’

‘‘अमेरिका के राष्ट्रपति पूछ रहे हैं, इसलिए.’’

‘‘अच्छा, तुम मजाक भी कर सकते हो. मैं तो सम झ रही थी कि तुम बस ऊंचानीचा, भेदभाव ही कर सकते हो.’’

‘‘माफ करो, इसलिए तो आना चाहता हूं तुम्हारे पास, बहुतकुछ सीखना चाहता हूं तुम से. जीवन को सुंदर तरीके से जीना चाहता हूं. कुएं से बाहर निकलना चाहता हूं. पहली बार एहसास हुआ कि इंसान कितना प्यारा हो सकता है. पता दो न, प्लीज.’’

एक घंटे में अनंत रीना के दरवाजे पर खड़ा था. घर में उस की भरपूर  आवभगत की गई. लेकिन खानेपीने के मामले में चाह कर भी किसी ने पहल नहीं की. अनंत ने आखिर रीना से पानी मांग ही लिया.

रीना ने भेदभरी निगाहें रख उस से पूछा, ‘‘सच? पानी?’’

वह शर्मिंदा सा होता हुआ बोला, ‘‘हां, दो न, हो सके तो चाय भी.’’

दरअसल, ज्यादा पढ़ालिखा न होने की वजह से उस में आत्मविश्वास कम था और अभिव्यक्ति भी. 12वीं के बाद से वह पिता का कारोबार ही संभाल रहा था.

बाजार इलाके में उस के पिता की लाइन से 30 दुकानें किराए पर थीं. उन पैसों की उगाही का काम अनंत के जिम्मे था. पैसे का हिसाब लगाना और जातिबिरादरी के बीच उठनाबैठना, बस, इतनी ही जिंदगी थी उस की. उम्र निकलती जा रही थी, मगर ब्याह को बाबूजी मान नहीं रहे थे. बिरादरी में सब से ऊंचा दहेज देने वाला कोई परिवार हो, तो बात बने. लेकिन इतना दहेज का औफर अब तक अनंत के लिए कोई ला न पाया था कि जिस से बाबूजी संतुष्ट हो पाते.

अब रीना की वजह से अनंत में काफी बदलाव आ गया था. बेवजह दोनों मिलते. धीरेधीरे दूरियां कम होने लगी थीं.

रीना की मां वैसे चाहती तो थीं कि बेटी का घर फिर से बस जाए. पर अनंत के घर में रीना निभा सकेगी, इस पर उन्हें पूरा शक था. उन की सीधी सोच थी कि वे लोग तो सिर्फ सेवा के लिए बने हैं, बराबरी कैसे कर सकते हैं उन से.

एक रोज शाम की चाय के वक्त अनंत ने अपने घर में बात छेड़ी. रूही अपने पति और सालभर की बेटी के साथ वहीं थी. अनंत ने सीधे कहा, ‘‘बाबूजी, मैं रीना से शादी करूंगा. वह प्राइवेट नर्सिंग होम में डाइटीशियन है, काफी पढ़ीलिखी है.’’

‘‘पढ़ीलिखी होने से क्या, जाति क्या है?’’ बाबूजी ने तल्खी से कहा. मन ही मन उन्हें दहेज की भी चिंता थी.

‘‘पढ़ेलिखे होने से हमारी विरासत के लिए अच्छा होगा. नई पीढ़ी ज्यादा सम झदार होगी,’’ अनंत सम झाने की कोशिश में था.

रूही बीच में कूद पड़ी, ‘‘बाबूजी, यह रीना जाटव है.’’ जाटव पर जोर था. रूही ने आगे जोड़ा, ‘‘विधवा है, एक बच्चे की मां.’’ यह सुनते ही अम्मा भी बुराभला कहने लगीं. बाबूजी तो हतप्रभ थे. बेटा इतना बिगड़ चुका है कि जाटव को घर की बहू बनाएगा. वह भी विधवा. उन्होंने आखिरकार अपनी चप्पल अनंत पर दे मारी.

अनंत ने उस के बाद इतना ही कहा, ‘‘रूही, इसी रीना जाटव ने तुम्हारी और तुम्हारी बेटी की जान बचाई थी.’’

अम्मा बोल पड़ीं बीच में, ‘‘उस से क्या होता है, कुजात लड़की को इस वजह से सिर पर बिठा लें?’’

‘‘इस तरह की लड़कियों को तो हम रास्ते से उठा कर ला कर रातभर रख कर सुबह छोड़ आते थे. बुरा हो इस आरक्षण का कि ये सिर पर बैठने लगीं,’’ बाबूजी बोले.

‘‘यानी आप लोग मानोगे नहीं,’’ अनंत हताश हो चुका था.

जीजा को छोड़ लगभग सभी ने एक सुर में कहा, ‘‘कभी नहीं, शादी हमारी पसंद से होगी.’’

अनंत जीजा को रीना से मिलवा चुका था. वह कहीं से भी अनपढ़ या असभ्य नहीं लगती थी. आखिर उस के पिता, भाई सब अच्छी नौकरियों में थे. पैसे की किल्लत नहीं थी. बस, जाति का मतभेद था.

अनंत सब छोड़छाड़ घर से निकल गया. उस ने रीना से कोर्ट मैरिज करने का फैसला कर लिया. कोर्ट

में साथ में थे रीना के मातापिता और अनंत के जीजा सार्थक.

टीटो नानानानी के साथ ही पल रहा था. पर अनंत ने कह दिया था कि टीटो को जब चाहे रीना अपने पास ला सकती है.

रूही के अपने पति के पास दूसरे शहर वापस चले जाने के बाद अनंत के मातापिता अकेले ही रह गए.

गुमान के सिंहासन से खुद को बांध इस बुजुर्ग दंपती ने हमेशा ही आसपड़ोस से खुद को अलग रखा. खुद की श्रेष्ठता के मान ने उन्हें दूसरों के छू जाने तक से डरा कर रखा. जाति और कुल का गौरव इन के लिए इतना बड़ा था कि इंसानी रिश्ते इन से दूर होते गए. अब 2 साल से अनंत भी रीना से शादी करने की वजह से दूर कर दिया गया था. अनंत उन लोगों के लिए अछूत हो गया था. उन्होंने मान लिया था कि वंशनाश हो गया है.

जिंदगी एकसी कब चली है और वह भी मनमुताबिक? अम्मा की गठिया की बीमारी ने इतना भयावह रूप धारण किया कि वे बिस्तर से उठने के लायक न रहीं. बेटी दूर शहर से साल में हफ्तेभर के लिए आती. उस के सहारे जिंदगी कैसे चले? बाबूजी का शरीर भी अब गिरने पर  था.

आखिर अम्माजी ने अनंत को फोन लगाया. अनंत का गुस्सा उतरा नहीं था. उस ने जाने से साफ मना कर दिया. लेकिन रीना कहां उपेक्षा कर सकती थी. वह उसी दिन उन के पास दौड़ी गई. वहां पहुंच कर उस ने बड़ी दयनीय स्थिति देखी. बिस्तर पर पड़ेपड़े अम्मा का जातधरम का गुमान छूट चुका था. खाना बाइयां ही बनातीं. घर की अव्यवस्था और अम्माजी की स्थिति देख रीना की आंखें नम हो गईं. वह बिस्तर के पास खड़ी थी. अम्मा ने उस का हाथ पकड़ बिस्तर पर बिठा लिया.

रीना के हाथों को अपने हाथों में ले कर अम्मा ने कहा, ‘‘काम न आया वह ?जातधरम. आखिरी वक्त में इंसान का प्रेम ही काम आता है. बाई नेहा को मैं ने ‘मत छू, मत छू’ कह कर कितना दुत्कारा था. आज वह कितना प्यार लुटाती है. दिल से काम करती है बेचारी. ऊंचनीच के भ्रम में किसी के घर तक नहीं जाती थी मैं. किसी की मदद भी मैं ने कभी नहीं की. यह सोचा करती थी कि उन के पास जाना पड़ेगा तो उन्हें छूना पड़ेगा और जात चली जाएगी.’’

रीना को याद आया, ट्रेन में एक वृद्धा के सूटकेस हटाने के अनुरोध को अनंत ने किस तरह अनसुना कर दिया था. अच्छा, तो इसी शिक्षा की वजह से. वह तो तब सम झ भी नहीं पाई थी कि इतना निर्दयी कैसे है यह इंसान.

रीना ने अम्मा को गले लगाते हुए कहा, ‘‘मैं आ गई हूं न, मां, हमेशा के लिए. मैं देखूंगी सब को. बेटे को भी जल्दी ले आऊंगी, आप चिंता न करो.’’

अम्मा आंसू पोंछती सी बोलीं, ‘‘तूने मेरी बेटी और उस की बच्ची की जान बचाई, जानबू झ कर जात के नाम पर तु झे हम ने आयागया कर दिया. अब फिर से तू आ गई हमें तारने. सच में इंसानियत जिसे कहते हैं वह तो ऐसी ही होती है.’’

मिलन की इस बेला में विचारों में जमी बर्फ पिघलने लगी थी. हवाओं में स्नेहिल ताजगी महसूस हो रही थी. अब तो अनंत भी वापस आ गया था. अम्मा की सेवा करती रीना की आंखों में अनंत देखता और उस की आंखें प्रेम से लबालब हो जातीं. दिल में उस के एक ही बात गूंजती रहती, ‘रीना, तुम से मिल कर…’

इंटीमेट सींस को मर्यादित तरीके से दिखाने की जरूरत : अनुप्रिया गोयनका

मौडलिंग से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री अनुप्रिया गोयनका कानपुर की हैं. विज्ञापनों में काम करते हुए उन्हें कई भूमिकाएं मिलीं जिन में फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’, ‘पद्मावत’ और ‘वार’ में उन की भूमिका को लोगों ने सराहा. विनम्र और हंसमुख स्वभाव की अनुप्रिया जो भी काम मिले उसे अच्छी तरह करना पसंद करती हैं. उन की जर्नी शुरू हुई ही है और अभी उन्हें कई फिल्मों और वैब सीरीज के औफर भी मिल रहे हैं.

फिल्म ‘वार’ की सफलता आप के लिए कितनी माने रखती है? पूछने पर अनुप्रिया कहती हैं, ‘‘इस का फायदा मिला है, क्योंकि यह एक बड़ी फिल्म है. इसे बहुत लोगों ने देखा और मेरी भूमिका बहुत अच्छी रही. बड़ा रोल 2 हीरो के बीच में मिलना आसान नहीं होता. मेरे लिए एक ऐक्शन फिल्म में काम करना सब से बड़ी उपलब्धि है. मेरे लिए एक एजेंट की भूमिका निभाना आसान नहीं था. लुक अलग था. मैं ने इंटैंस रोल किया है. यह रोल अलग था इसलिए मु झे काम करने में अच्छा लगा. मेरी भूमिका स्ट्रौंग थी जो मेरे लिए बड़ी बात रही.’’

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आप ने अबतक अच्छे चरित्र निभाए हैं, उस हिसाब से देखें तो आप के पास फिल्मों की संख्या कम है. इस सवाल पर उन का मानना है, ‘‘मैं हमेशा से क्वालिटी वर्क करने के पक्ष में रही हूं. भूमिका छोटी हो या बड़ी, इस बात पर मैं ने कभी अधिक जोर नहीं दिया. मेरे लिए चरित्र और जिन के साथ काम कर रही हूं उन का अच्छा होना बहुत जरूरी है. जहां मुझे लगता है कि मैं कुछ उन से सीखूंगी, नया चरित्र है, काम करने में मजा आएगा, वहां मैं काम करना पसंद करती हूं. मैं रोमांटिक, ग्रामीण और कौमेडी फिल्में करना चाहती हूं. इस के अलावा मु झे पीरियड फिल्में बहुत पसंद हैं. मेरे पास जो स्क्रिप्ट आती है उन में से मैं अच्छी भूमिका को खोज कर काम करती हूं.’’

जब भी आप को कुछ नया करने का मौका मिलता है तो आप उसे कैसे करती हैं. इस पर अपनी राय देते हुए अनुप्रिया कहती हैं, ‘‘हर फिल्म की एक खास जरूरत होती है जैसे फिल्म ‘वार’ के लिए शारीरिक रूप से फिट महिला चाहिए थी, तो उस के लिए मैं ने काफी वर्कआउट किया, कई क्लासेज भी लीं. अगर फिल्म ऐक्शन वाली हो, तो उस के लिए फिटनैस की जरूरत होती है. ‘पद्मावत’ फिल्म में मैं ने रानी नागमती की भूमिका के लिए बहुत रिसर्च की थी.

‘‘मैं खुद भी राजस्थान से हूं इसलिए वहां के रीतिरिवाज से परिचित थी. फिर भी मैं ने संवाद बोलने के तरीके को अच्छी तरह से सीखा. इस तरह से मैं ने हर किरदार के साथ पूरी तरह से न्याय करने की कोशिश की है. इस के लिए जो भी जरूरी हो उसे अवश्य करती हूं ताकि भूमिका सजीव लगे.’’

सफलता पाने के लिए हर कोई संघर्ष करता है. आप भी संघर्ष कर रही हैं. इस पर आप क्या सोचती हैं. इस सवाल के जवाब में वे कहती हैं, ‘‘मु झे यहां इंडस्ट्री में कोई जानने वाला नहीं है, ऐसे में मेरे लिए कोई कहानी लिखी नहीं जाएगी. मु झे काम ढूंढ़ना पड़ा और सबकुछ सीखना पड़ा. ‘टाइगर जिंदा है’ और ‘पद्मावत’ फिल्म के बाद औडिशन देने की संख्या कम हो गई है. यह मेरे लिए सब से अधिक राहत है. इस के अलावा अभी भी आगे काम के लिए निर्देशकों से मिलना पड़ता है. मैं फिल्मों के अलावा विज्ञापनों में भी काम करती हूं. आउटसाइडर कलाकार का लर्निंग पीरियड हमेशा चलता ही रहता है.’’

आगे क्या कर रही हैं, के जवाब में वे कहती हैं, ‘‘अभी मैं निर्मातानिर्देशक प्रकाश  झा के साथ एक वैब सीरीज कर रही हूं. उस का अनुभव बहुत अच्छा रहा.

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इस के अलावा अरशद वारसी के साथ एक साइकोलौजिकल थ्रिलर वैब पर काम चल रहा है.’’

वैब सीरीज की आजादी को ले कर आप का क्या मानना है, इस सवाल पर वे गंभीर होते हुए कहती हैं, ‘‘कोई भी चीज जब दबी हो तो एकदम से उसे आजादी मिलने पर बहुतकुछ बाहर निकल कर आता है, जो ठीक नहीं होता लेकिन समय के साथ उस में बदलाव होता है. आज कई नई और अच्छी कहानियां वैब सीरीज के द्वारा कही जा रही हैं जिन में क्राइम, गैंग्स्टर जैसी कहानियां मुख्य नहीं हैं. यह आगे धीरेधीरे दर्शकों की पसंद के अनुसार बदलने की उम्मीद है.’’

इंटीमेट सींस के लिए आप कितनी कंफर्टेबल महसूस करती हैं. इस सवाल के जवाब में अनुप्रिया का मानना है, ‘‘मैं बहुत सहज हूं, लेकिन सींस के उस कहानी के साथ जाने की जरूरत होनी चाहिए. महिलाओं की कामुकता को, उस की गहराई को दिखाए बिना छोटेपन के लिहाज से दिखाया जाए, तो उस में मैं सहज नहीं. ऐसे सीन करना भी नहीं चाहूंगी. ऐसे दृश्य को बहुत ही मर्यादित तरीके से दिखाए जाने की जरूरत है.’’

किस तरह के सामाजिक कार्य और अभिनय करना पसंद करती हैं. इस पर उन का कहना है, ‘‘मैं ने अभिनय से पहले गरीब बच्चों की शिक्षा को ले कर कुछ काम किया है, पर अब ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर काम करना चाहती हूं जो हमारे देश में बहुत जरूरी है. वक्त मिलता है तो डांसिंग, सिंगिंग के साथसाथ पेंटिंग और गाने सुनती हूं. इस के अलावा मैं अपने परिवार के साथ समय बिताना पसंद करती हूं.’’

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कई हिट फिल्में देने के बाद उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर की अनुप्रिया गोयनका बौलीवुड में फेमस चेहरा बन चुकी हैं. फिल्मों का सफल होना और उन में काम की सराहना होना कितना जरूरी है, इस पर उन्होंने एक बातचीत में अपनी बेबाक राय रखी.

नवाबों की नगरी में खास लोगों के बीच मनेगा इस एक्ट्रेस का बर्थडे

बौलीवुड की एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण इन दिनों काफी चर्चा में है कभी अपनी अपकमिंग फिल्म ‘छपाक’ को लेकर तो कभी इसी फिल्म के प्रमोशन में पहने गए अपने आउटफिट को लेकर खूब चर्चा बटोर रही है. इन सबके अलावा अब वह अपने बर्थडे को लेकर भी चर्चा में छाई हुई है कि वो अपना बर्थडे कहां सेलिब्रेट करेंगी जो 5 जनवरी को है.

आपको बता दे दीपिका पादुकोण  अपना 34 वां जन्म दिन का प्लान बहुत खास और यादगार होगा क्योंकि दीपिका 5 जनवरी को अपना 34वां बर्थडे लखनऊ नगरी में एसिड अटैक विक्टिम्स के साथ मनाएंगी. इसके लिए वह लखनऊ के शीरोज कैफे में वक्त बिताएंगी. शीरोज कैफे एक बेहद खास कैफे है जिसे एसिड अटैक सर्वाइवर द्वारा चलाया जाता है.  दीपिका के प्लान शीरोज कैफे में वक्त बिताने के बाद कुछ और लोगों से भी मिलने की है, लखनऊ के बाद वह दिल्ली पहुंचेंगी और रविवार की शाम से ही फिल्म के प्रचार का काम शुरू कर देंगी.

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सभी को पता है कि दीपिका पादुकोण एसिड सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल की बायोपिक कर रही हैं. फिल्म में वह खुद एसिड सर्वाइवर का किरदार करने के साथ ही उनके हक की लड़ाई लड़ती नजर आएंगी. वो अपना पूरा दिन उन्हीं के साथ बिताएंगी. आस-पास के शहरों के एसिड अटैक विक्टिम इसका हिस्सा होंगे.’

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‘छपाक’ फिल्म को मेघना गुलजार ने डायरेक्ट किया है. जो 10 जनवरी को रिलीज होगी. इस फिल्म में दीपिका पादुकोण के अलावा एक्टर विक्रांत मैसी खास रोल में हैं. ‘छपाक’ के पहले दीपिका आखिरी बार फिल्म ‘पद्मावत’ में नजर आई थीं. इस फिल्म में रणवीर सिंह और शाहिद कपूर भी अहम रोल में थे.

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शादी के बाद ‘छपाक’ दीपिका की पहली फिल्म है. इस फ़िल्म का दीपिका जम कर प्रमोशन कर रही है. दीपिका फिल्म छपाक के बाद मार्च में अपनी नई फिल्म की शूटिंग शुरू करने वाली है, जिसमें वह गली बौय के मशहूर कलाकार सिद्धांत चतुर्वेदी के साथ दिखेंगी. इस फिल्म में अनन्या पांडे भी खास किरदार निभा रही हैं.

बिहाइंड द बार्स : भाग 7

‘सुना है यह जेलर रिटायर होने वाला है और इसकी जगह कोई लेडी जेलर आने वाली है’ मृणालिनी ने यूं ही बातों-बातों में बैरक के पास से गुजरते जेल अधिकारी से पूछ लिया.

‘हां, नई मैडम सर आने वाली हैं. परसों इनका विदायी समारोह है जेल नंबर चार में… शाम को तुम लोगों को भी उधर बुलाया जाएगा.’ जेल अधिकारी ने मृणालिनी के धुले-चमकीले जिस्म पर गहरी नजरें जमाते हुए कहा, ‘कुछ रंगारंग कार्यक्रम भी होगा… तुम लोग कुछ करना चाहो तो बताना’ जेल अधिकारी कामुक नजरों से देखता हुआ आगे बढ़ गया.

‘हां, हां… हम भी कुछ जरूर करेंगे…’ मृणालिनी ने पीछे से तेज आवाज में जवाब दिया. उसने पलट कर देखा तो मृणालिनी खड़ी मुस्कुरा रही थी. मृणालिनी को मुस्कुराते देख जेल अधिकारी अचम्भित हो गया. अब तक तो उसने मृणालिनी को सिर्फ गालियां बकते और लड़ते-झगड़ते ही देखा था. उसको मुस्कुराता देख वह भी मुस्कुरा दिया. मछली जाल में फंस गयी थी. अब बस तार खींचने की जरूरत है. मृणालिनी सोच कर हंस पड़ी और नोरा के बेटे को हवा में उछालते हुए खिलाने लगी.

दूसरे दिन मौका पाते ही वह उसी जेल अधिकारी के पास पहुंच गयी. दिसम्बर की 22 तारीख थी. ठंडी हवाएं जिस्म को काट रही थीं. वह अपने ऑफिस के बाहर कुर्सी डाले मजे से बैठा धूप सेंक रहा था.

‘उधर कल क्या-क्या होना है साहब?’ मृणालिनी सीधा सवाल दागते हुए उसके पास ही जमीन पर बिछी हरी-हरी घास पर पसर गयी. जेल अधिकारी ने उसके सुन्दर मुखड़े पर छायी लाली को निहारा. आज पहली बार मृणालिनी को इस तरह अपने पास देख उसे भयमिश्रित खुशी महसूस हो रही थी. वरना वह तो किसी अधिकारी को भाव ही नहीं देती थी. उसके सवाल पर वह जल्दी से बोला, ‘अधिकारी लोग भाषण-वाषण देंगे, कुछ नाचगाना होगा, एक छोटी सी नाटिका खेली जा रही है. चार नंबर वालों ने तैयार की है. फिर चाय-नाश्ता होगा.’

‘तो क्या हमारी जेल के सारे कैदी उधर जाएंगे?’ मृणालिनी ने दूसरा सवाल दागा.
‘नहीं, सब नहीं, दस-पंद्रह औरतें और कुछ सेवादार जाएंगी, जिन्हें हम चुनेंगे. तू चलेगी क्या?’ जेल अधिकारी ने जिज्ञासा जतायी.

‘हां, जरूर चलूंगी, मैं भी तो देखूं नई मैडम सर कैसी हैं. इसी बहाने मिल लूंगी, वरना जेलर तक हम कहां पहुंच पाते हैं, हमें तो आप जैसों के भरोसे ही रहना पड़ता है.’ उसने खींसे निपोरते हुए ताना मारा.
‘हां, हां, जरूर मिल लेना… बस हमारी शिकायत-विकायत न कर देना… तेरे गुस्से का भरोसा नहीं है, कब कहां निकल पड़े.’ जेल अधिकारी सशंकित सा होता हुआ बोला. सोच रहा था कि मृणालिनी को चलने को बोले या न बोले. आखिर पंद्रह-बीस कैदी चुन कर उधर भीड़ बढ़ाने के लिए उसे ही ले जाने थे. वह चाहता था कि कुछ पढ़ी-लिखी, साफ-सुथरी महिला कैदियों को छांट ले. ऐसी जो ज्यादा बक-बक न करती हों, या किसी अधिकारी के खिलाफ नई जेलर से कोई शिकायत-चुगली न लगाएं.

उसके डर को देखकर मृणालिनी खिलखिला कर हंस पड़ी. बोली, ‘क्या साहब, आप मुझे पागल समझते हैं क्या? यूं ही शिकायतें करती फिरती हूं? कोई बड़ी बात होती है तभी शिकायत करती हूं. वरना आप बताओ, मुझसे अच्छी कैदी कोई है इस जेल में? कैसे अनुशासन में रखती हूं सबको, ढीठ से ढीठ कैदियों के हेकड़ी मिनटों में गायब हो जाती है. आपको कोई मेहनत करनी पड़ती है क्या?’

‘हां, हां वह तो है… तेरा ही राज चलता है यहां…’ वह हंसने लगा. मृणालिनी की बातों से वह कुछ सहज हो गया. बोला, ‘अच्छा बता, किस-किस को ले चलूं… लिस्ट मुझे ही देनी है. जिसे तू कहेगी उसे गाड़ी में बिठा देंगे. बस साफ-सुथरी और ठीक-ठाक बात करने वाली होनी चाहिएं.’

‘उसकी चिंता मेरे पर छोड़ दो साहब, शाम तक आपको बता दूंगी. एक गाने का कार्यक्रम हमारी तरफ से भी होगा नई जेलर के स्वागत में. ढोलकी मंगवा देना, हम रिहर्सल करके कल सुबह सुना देंगे.’
‘ठीक है. तुमने तो मेरी चिन्ता दूर कर दी. कुछ और काम हो तो बताना.’ जेल अधिकारी खुश होकर बोला.
‘काम तो है, पर तुमसे होगा नहीं साहब…’ मृणालिनी ने धीमे स्वर में चुनौती सी दी.

‘ऐसा क्या काम है…?’ जेल अधिकारी ने फुसफुसाते स्वर में पूछा.
‘है कुछ…’ मृणालिनी कहते हुए उठने को हुई तो अधिकारी ने उसका हाथ पकड़ कर रोक लिया. हाथ तो पकड़ लिया मगर फिर मारे डर के झटके से छोड़ भी दिया. बोला, ‘बता न, क्या बात है?’ वह घिघियाया.
उसकी लपलपाहट को मृणालिनी खूब समझ रही थी. वह क्यों मरा जा रहा था उसका काम करने के लिए यह वह बहुत अच्छी तरह जानती थी. ‘है तो साला मर्द जात ही… अपनी हवस से बाहर कैसे निकले’ उसने सोचा, ‘पर अभी इसे थोड़ा और तपाना पड़ेगा. जब पूरे ताप पर होगा तभी चोट देना ठीक रहेगा’, उसने मन ही मन सोचा और उठ खड़ी हुई. बोली, ‘कल बताऊंगी साहब…’

मृणालिनी झटके से खड़ी हुई और कमर मटकाती चल पड़ी. जेल अधिकारी हक्का-बक्का सा उसे जाते देखता रहा. शाम को उसने कई मर्तबा उसके बैरक की तरफ चक्कर लगाये, मगर वहां मृणालिनी ने उस पर नजर भी नहीं डाली. शाम को मृणालिनी ने जेल के एक सेवादार के हाथों उन महिला कैदियों की लिस्ट जेल अधिकारी को भिजवा दी, जिन्हें कल के कार्यक्रम में शामिल करने के लिए उसने चुना था. उनमें एक नाम नोरा और उसके बच्चे का भी था.

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