अदित मिश्रा (बिहार)

ये बात है पिछली दीवाली की, जब मेरी नौकरी रांची (झारखंड) में जनसंपर्क अधिकारी के तौर पर लगी. पहली बार अपने परिवार, अपने घर से दूर गया था और इस बात का एहसास मुझे तब ज्यादा हुआ जब रोशनी और खुशियों से भरपूर दिवाली का त्योहार नजदीक आया. वैसे तो जब भी मैं दीवाली में घर पर रहा तो हर काम, चाहे बाजार का हो या घर का दोनों ही बहुत ही आनंद से करा. लेकिन इस दीवाली मैं बाहर था, औफिस में काम ज्यादा होने के कारण मुझे छुट्टी  नहीं मिली. बहुत बुरा भी लगा रहा था कि इस बार घर का दीपक अपने घर के आगे दीपक भी नहीं जला पाएगा लेकिन मजबूरी भी थी.

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