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#coronavirus Effect: इन दिनों हाई रिस्क पर हैं सफाई कर्मी

38 साला मीरा बाई अलसुबह उठ जाती है , घर के कामकाज करती है , पति और चारों बच्चों का नाश्ता और दोपहर का खाना बनाकर अपनी ड्यूटी बजाने 7 बजे घर से निकल पड़ती है . भोपाल में भी पूरे देश की तरह लाक डाउन है लिहाजा उसे कोई 8 किलोमीटर पैदल ही चलकर जेपी अस्पताल पहुँचना पड़ता है . रास्ते में 2-3 जगह पुलिस बालों से वास्ता पड़ता है जहां औरत होने का फायदा उसे मिलता है , मामूली सी पूछताछ के बाद पुलिस बाले उसे जाने देते हैं . चारों तरफ सन्नाटा है , सूरज की किरणे फूटने लगी हैं , इक्का दुक्का लोग आते जाते दिखते हैं तो मीरा को अच्छा लगता है नहीं तो शहर उसे शमशान सा पिछले एक हफ्ते से उसे लग रहा है .

मीरा उस तबके की है जो आज भी समाज के सबसे पिछड़े और निचले पायदान पर खड़ा है उसकी माँ बाप भी सफाईकर्मी थेऔर ससुराल आई तो यहाँ भी वही माहौल मिला जो उसे उसकी हैसियत का एहसास कराता रहा . कभी उसके कदम तेज हो जाते हैं तो कभी धीमे लेकिन मीरा जल्द अपनी आमद देकर काम पर लग जाना चाहती है .

उसे मालूम है कि जमाने भर का कूड़ा करकट मसलन इंजेक्शन , सुइयां , इस्तेमाल कर फेके गए मास्क , प्लास्टर , खून से सनी पट्टियाँ और हेंड ग्लोब यहाँ तक कि सेनेटरी पेड्स तक उसका इंतजार कर रहे हैं . कोरोना के कहर और कर्फ़्यू के चलते साफ सफाई खासा ज़ोर और ध्यान दिया जा रहा है . उसकी तरह भोपाल के कोई 7 हजार सफाईकर्मियों को अब 12-14 घंटे तक काम करना पड़ रहा है . इसके बाद भी कोई शिकायत आती है तो खिंचाई जमकर होती है.

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मीरा मास्क नहीं पहनती है और न ही सेनेटाइजर से हाथ धोती है, यही हाल अधिकतर सफाईकर्मियों का है जो मास्क और सेनेटाइजर को बड़े लोगों का चोंचला मानते हैं. कोरोना के बारे में इन्हें पता है लेकिन ये उसका लिहाज नहीं करते . आखिर क्यों इन्हें अपनी जान की परवाह नहीं जब इस सवाल का जबाब ढूँढने की कोशिश इस प्रतिनिधि ने की तो और भी कई दिलचस्प लेकिन चिंतित कर देने बाली बातें सामने आईं जिनहे देख लगता है कि एक बहुत बड़ी गड़बड़ हो रही है और किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जा रहा कि जमाने भर की गंदगी ढोने बाले सफाईकर्मी एक बहुत बड़े जोखिम को भी जाने अनजाने में ढो रहे हैं. कुछ अपनी मर्जी से तो कुछ प्रशासन की अनदेखी के चलते .

अखिल भारतीय सफाई मजदूर ट्रेड यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष मगन झांझोट ने हालांकि बातचीत में माना कि ऐसे संकर्मण के वक्त में सफाईकर्मियों का मास्क न पहनना गलत है लेकिन क्या यह बात ऊंचे पदों पर बैठे जिम्मेदार लोगों और सरकार को नहीं दिख रही कि वे किस हाल में काम कर रहे हैं क्या इन्हें मास्क और सेनेटाइजर मुहैया कराये जा रहे हैं ?

गलती दोनों तरफ से हो रही है मगन बताते हैं , अगर सफाईकर्मी खुद एहतियात नहीं बरत रहे हैं तो उन्हें समझाइश दी जानी चाहिए और अगर सरकार ये चीजें मुहैया नहीं करा रही है या नहीं करा पा रही है तो उसे तुरंत इस पर एक्शन लेना चाहिए .

सफाई कर्मियों के कर्फ़्यू में रोल को सेल्यूट मारने बाले मगन चाहते हैं कि अब वक्त है कि सरकार इनके बारे में संजीदगी से सोचे , चौबीसों घंटे समाज की गंदगी दूर करने बाले इन कर्मियों के इलाज के लिए कोई खास या अलग से इंतजाम नहीं हैं जबकि सबसे ज्यादा जोखिम यही लोग उठा रहे हैं इन्फेक्शन का खतरा सबसे ज्यादा इन्हीं को है और हैरानी की बात यह है कि सबसे ज्यादा अनदेखी इन्ही की होती है .

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क्या इसके पीछे वजह इनका छोटी जाति का होना है इस पर मगन तल्ख लहजे में कहते हैं यह तो नपा तुला सच है ही पर अशिक्षा और गंदगी ढोने को ही किस्मत मान चुके सफाईकर्मियों की कोई इज्जत समाज में नहीं है . इनके प्रति लोगों का नजरिया बदला नहीं है जनता कर्फ़्यू बाले दिन सफाईकर्मियों का जिक्र न के बराबर हुआ . लोग डाक्टरों , पुलिसकर्मियों और मीडिया बालों के लिए ही ताली थाली बजाते नजर आए . क्या आपने किसी न्यूज़ चेनल पर इनकी कोई तस्वीर देखी क्या किसी फिल्मी हस्ती ने इन्हें याद किया और किस अखवार ने इनकी फोटो छापी ?

यह बहुत अफसोसजनक हालत और बात है वे कहते हैं एक एक्ट्रेस का अगर घर में झाड़ू लगाते वीडियो वायरल हो जाये तो लोगो में उसे शेयर करने के लिए होड सी मच जाती है और मिसाल भोपाल की ही लें तो यहाँ कोई साढ़े तीन हजार औरतें रोज सड़कों पर आपकी गंद ढोते मिल जाएंगी क्या वे इंसान नहीं , क्या वे शाबाशी की हकदार नहीं . आप सोच भी नहीं सकते कि एक सफाईकर्मी कैसे अपने काम को अंजाम देता है वह 8-10 फुट गहरे गटर में उतर कर सफाई करता है . इस बदबू और गंदगी की कल्पना भर से लोगों का कलेजा हलक में आ जाता है .

और एवज में इन्हें दूसरे मुलाजिमों की तरह भारी भरकम पगार नहीं मिलती है मगन बताते हैं परमानेंट सफाईकर्मी को 25 – 30 हजार ही महीने के मिलते हैं जबकि रोजनदारी पर काम करने बालों को महज 12 हजार रु महीने ही मिलते हैं . नए भर्ती हुये सफाईकर्मी को तो 6 हजार भी नहीं मिलते . इसमें कोई शक नहीं कि काम के मुक़ाबले यह काफी कम है वह भी उस सूरत में जब अधिकतर सफाईकर्मी 55 की उम्र के बाद तरह तरह की बीमारियों के शिकार होने लगते हैं इनमें चमड़ी के रोग इन्हें ज्यादा घेरते हैं . इलाज में ही ज़िंदगी भर की कमाई लग जाती है फिर इनके पास बचता क्या है बस यह कोफ्त कि हमने ज़िंदगी गंदगी के नर्क की सफाई में गुजार दी और आज उसका नतीजा भी भुगत रहे हैं .

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बात में दम है और पीड़ा भी है कि आज सच में कोई अगर देश सेवा कर रहा है तो वह सफाईकर्मी है जो लाक डाउन में आम शहरियों की तरह वक्त नहीं काट रहा है बल्कि उनका वक्त इतमीनान और बेफिक्री से कटे इसलिए इन्फेक्शन की परवाह न करते मुस्तैदी से अपने काम को अंजाम दे रहा है लेकिन कोई उसकी हौसलाफजाई नहीं कर रहा कोई उसका शुक्रिया अदा नहीं कर रहा .

इस हालत पर बरबस ही दो सीन याद आते हैं पहला संजय दत्त की फिल्म मुन्ना भाई एमबीबी एस है जिसमें संजय दत्त को एक बूढ़े सफाईकर्मी को थेंकयू बोलते दिखाया गया है और इससे ज्यादा अहम वह नजारा है जिसमें 24 फरबरी 2019 को प्रयागराज में कुम्भ के मेले के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सफाईकर्मियों के पाँव समारोहपूर्वक धोये थे . क्या यह सब फिल्मों और राजनीति तक ही सिमटा रहेगा या हकीकत में हम सफाईकर्मियों को एक जोरदार सलाम दिल से ठोकेंगे .

#coronavirus: अमेरिका का हाल चीन से बदतर

अमेरिका में कोरोना वायरस के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। कल यानी 26 मार्च को यहां 16,000 से अधिक मामलों की पुष्टि हुई. इसके साथ ही अमेरिका में कोविड-19 के मरीजों की संख्या बढ़कर 85,088 हो गई जो किसी भी देश के लिए सबसे अधिक है.दुनिया भर में कोरोना वायरस ने कोहराम मचा रखा है.

चीन जहां इस महामारी से निकलने की राह पर है वहीं अमेरिका में कोरोना वायरस का संक्रमण थमने का नाम नहीं ले रहा है.कल एक ही दिन में यहाँ 16,000 से अधिक मामलों की पुष्टि इस रोग की भयावहता को दर्शा रही है.संयुक्त राज्य अमेरिका ने कोरोनवायरस से संक्रमित लोगों की संख्या के मामले में चीन (81,285) और इटली (80,589) को भी पीछे छोड़ दिया है.कोरोना वायरस पर आंकड़े मुहैया कराने वाली वेबसाइट वर्ल्डोमीटर के अनुसार, अमेरिका में कल रात तक संक्रमण के कुल 85,088 मामले सामने आ चुके हैं जिनमें से 16,877 मामले एक ही दिन में सामने आए. एक हफ्ते पहले संक्रमित लोगों की संख्या 8,000 थी.एक हफ्ते में ही यह संख्या खतरनाक रूप से 10 गुना बढ़ गई है.

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अमेरिका में अब तक कोरोना वायरस बीमारी से 1,290 लोगों की मौत हो चुकी है. संक्रमित मामलों के साथ ही मरने वाले लोगों की संख्या आने वाले दिनों में और ज़्यादा बढ़ने की आशंका है.कोरोना वायरस के केंद्र रहे चीन में इस वैश्विक महामारी से 3,287 लोगों की मौत हुई जबकि इटली में 8,215 लोग मारे गए.अमेरिका में कोरोना वायरस के कहर को देखने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि संक्रमित मामले बढ़ने के पीछे बड़े पैमाने पर इस बीमारी की जांच करना बताया.उन्होंने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि यह हमारी जांच का नतीजा है.

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कोई नहीं जानता कि चीन में असल संख्या क्या है.’’व्हाइट हाउस कोरोना वायरस कार्य बल की संयोजक डॉक्चर देबोराह ब्रिक्स का कहना है, “सभी नए मामलों में करीब 55 फीसदी न्यूयॉर्क से आ रहे हैं.इनमें न्यूजर्सी भी शामिल है.साथ ही में 50 में से 19 राज्यों में मामले कम हुए हैं.अब तक अमेरिका 5,50,5000 लोगों की जांच कर चुका है”

#coronavirus: औनलाइन एजुकेशन में इंटरनेट ही आड़े, बच्चे हैं परेशान तो करें ये काम

कोरोना महामारी के चलते पूरा देश ही 14 अप्रैल तक लौकडाउन है. इस दौरान न तो निजी औफिस खुलेंगे, न ही ट्रेनें, मैट्रो चलेंगी.  यहां तक कि मौल, सिनेमा, क्लब, मल्टीप्लेक्स तक बंद हैं. बौर्डर सील हैं. सड़कें सुनसान हैं. इक्कादुक्का लोग ही सड़क पर नजर आए. बस के लिए स्टैंड पर देर तक इंतजार करना पड़ता है. वहीं बस वाले भी उसी को बैठा रहे हैं, जिन के पास वैध कागजात हैं. इस दौरान पुलिस भी सख्ती बरत रही है. सड़क पर बेवजह घूमने वालों से उठकबैठक करा रही है, वहीं डंडे से पीट कर हिदायत भी दे रही है कि घर पर ही रहें, बाहर न घूमें.

इस लॉक डाउन की वजह से सभी स्कूल बंद हैं. वहीं सीबीएसई बोर्ड द्वारा आयोजित कराई जा रही बच्चों की परीक्षा भी टाल दी गई है.

बच्चे परेशान हैं कि अब कब परीक्षा होगी. वहीं बच्चों को पढ़ाने के लिए टीचरों पर अब घर से ही ऑनलाइन क्लास लेने पर जोर दिया जा रहा है.

बच्चे भी ऑनलाइन क्लास लेना चाहते हैं, टीचर भी पढ़ाना चाहते हैं, परंतु समस्या यह है कि गरीब तबकों के बच्चों की क्लास कैसे ली जाए, सोचने पर मजबूर करती है.

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वहीं अमीर घरों के बच्चे भी परेशान हैं. उन की परेशानी यह है कि इंटरनेट नहीं चल रहा. सर्वर पर अधिक लोड होने के कारण ब्राउजर पूरी तरह खुल नहीं पा रहा है. तमाम कोशिशों के बाद भी इंटरनेट पर ऑनलाइन क्लास लेना मुमकिन नहीं हो पा रहा.

गरीब को तो इस दौरान दोहरी मार पड़ी है. एक तरफ माली तंगी झेलनी पड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ घर से बाहर निकलने पर पाबंदी है. रोजीरोटी की समस्या तो है ही, वहीं पढ़ाई न होने से इन के बच्चे भी परेशान हैं.

दरअसल, गरमी की छुट्टियां मईजून में न हों, इस पर भी सोचाविचारी चल रही है.

यह प्रस्ताव कई स्कूल प्रशासन ने सीबीएसई बोर्ड को दिया है. साथ ही, कई स्कूल वाले भी यही चाहते हैं कि मईजून में पढ़ाई हो, अन्यथा बच्चे पढ़ाई में पिछड़ जाएंगे.

दिल्ली में द्वारका के जेएम इंटरनेशनल स्कूल की टीचर विजयलक्ष्मी ने बताया कि स्कूल बंद होने से कोर्स को पूरा करने की समस्या आएगी. बच्चे भी किस तरह अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे, जब तक उन्हें सही से बताया न जाए, समझाया न जाए. उन का मानना है कि अगर कोर्स पूरा कराना है तो मईजून में स्कूल का खोला जाना बहुत जरूरी है. हालांकि बच्चे पढ़ाई में पीछे न रहें, इस के लिए भी ऑनलाइन तैयारी चल रही है.

वहीं सीबीएसई बोर्ड ने कोर्स को कम करने का ज़िक्र किया है, पर अभी यह नहीं तय किया है कि कोर्स में क्या-क्या रहेगा.

इस तरह बच्चों पर भी दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है. एक ओर जहां पढ़ाई पूरी करने की जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी ओर समय पर कोर्स पूरा न होना. बच्चे कह रहे हैं कि जब समझ ही नहीं आ रहा है तो पढ़ें क्या. फोन पर भी बच्चे ठीक से समझ नहीं पा रहे, ऑनलाइन पढ़ नहीं पा रहे, इन बच्चों की परेशानी से परेशान मांबाप भी चुप हैं.

सीबीएसई बोर्ड तो बच्चों की परीक्षा लेगा, पर अभी तारीख तय नहीं है. लेकिन बच्चे भी कब तक घर में कैद हो कर रहें, इस पर कोई सटीक जवाब नहीं दे पा रहा. इतना तो तय है कि घर की देहरी लांघना, मतलब मुसीबत मोल लेना है.

ऐसे में समाजशास्त्री प्रोफेसर डाक्टर पीयूष कांत का यह सुझाव भी गौर करने वाला है कि अगर घर के बड़े या बुजुर्ग पड़ेपड़े बोर हो रहे हैं तो वे अपने बच्चों का मन बहलाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. निश्चित ही इस से बच्चों का मन लगेगा. वे  बच्चों के साथ लूडोकैरम खेलें, घर के कामों में हाथ बंटा कर मन हल्का करें. साथ ही, बच्चों को प्रेरित करने वाले किस्से, पुरानी यादें शेयर करें ताकि बच्चे भी अपने को अकेला महसूस न करें. अगर वे पढेलिखे हैं तो बच्चों को पढ़ाने में मदद करें. बच्चों को बार बार पढ़ाई के लिए डांटें नहीं, प्यार से पेश आएं. स्कूल खुलेंगे, तब ही पढ़ाई हो पाएगी. पढ़ाई की चिंता कदापि न करें.

मातापिता भी बच्चों को समझाएं कि घर में रह कर भी बहुतकुछ सीखा जा सकता है. मसलन, मैगी बनाने के अलावा खाने की दूसरी चीजें बनाना भी सीखें, सब्जी काटना, रोटी सेंकना, बरतन धोना, कपड़े तह लगाना वगैरह.

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सलाह है, बच्चे भी खाली समय को यों न बेजा जाने दें.  इंटरनेट नहीं चल रहा, कोई बात नहीं.  टीचर से पढ़ाई को ले कर बात करें.  उन की दी गई नसीहत को फोकस कर अपनी पढ़ाई जारी रखें. जिन बच्चों के पेपर अभी नहीं हुए हैं, उन किताबों को रिवाइज करें. जो परेशानी आए, फोन पर उन सब्जेक्ट की टीचर से पूछें. इतना ही नहीं, कभी कभी दोस्तों से फोन पर बात करने से मन हल्का रहेगा.

बच्चो, परेशान होना कोई हल नहीं. घर पर ही बड़ों के साथ रहिए, हंसिए, खेलिए. कुछ अपनी कहिए, कुछ उन की भी सुनिए. ऐसा मौका फिर न मिलेगा. दादा दादी से बात करने का, मम्मी पापा से हँसनेबोलने का. समझिए बच्चों की मानसिकता को, उन्हें डांटें नहीं, प्यार करें और समझाएं कि जब सरकार गंभीर है तो आप भी इन नियमों का सख्ती से पालन करें. कोरोना समस्या को और न बढ़ने देने के लिए अपने घर पर ही रहें.

#coronavirus: मेमसाहब बुलाएं तो भी ना जाना

कोरोना के भय से पूरा देश लौक डाउन में है. निम्न मध्यम वर्ग, उच्च वर्ग सब अपने अपने घरों में दुबके हुए हैं. पता नहीं कोरोना वायरस कब किसको चिपट जाए. सोसाइटीज के गेट्स पर ताले जड़ दिए गए हैं. मेहरियों, धोबी, प्रेस वाला, सब्ज़ी वाला, गाड़ी साफ़ करने वाला, माली, अखबार वाला किसी को भी कॉलोनियों में घुसने की इजाज़त नहीं है. जैसे कि ये तमाम लोग ही इस खतरनाक वायरस को अपने साथ लिए घूम रहे हों.

सच तो यह है कि पहली बार कोई महामारी ऐसी है जिसके उच्च तबके से निम्न तबके की ओर फैलने का अंदेशा है क्योंकि मध्यम और उच्च वर्ग के विदेशी रिश्तेदार, दोस्त, बिज़नेस पार्टनर्स जो कोरोना के वायरस को अपने साथ ले कर भारत आ रहे हैं वो माध्यम और उच्च वर्ग के लोगो को ही बीमारियां गिफ्ट कर रहे हैं. इसी तबके के लाखों बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं या विदेश यात्राएं कर रहे हैं. तो अगर निम्न वर्ग से ताल्लुक रखने वाली कामवाली, झाड़ूपोछें वाली, धोबी, ड्राइवर जैसे लोगों पर बड़ी बड़ी कोठियों, कॉलोनियों, सोइटियों में जाने पर बैन लगा है तो ये उनके लिए ही अच्छा है. यही निम्न वर्ग को इस महामारी से बचाये रखने का एक रास्ता है.

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प्लेग, चिकन पौक्स, पोलियो, दिमागी बुखार, चिकन गुनिया जैसी जानलेवा बीमारियां जहाँ निचले तबके से फैली, वहीँ पहली बार कोरोना वायरस अपर क्लास में तबाही मचाने निकला है. इससे गरीब तबके को जितना हो सके बचने की कोशिश करनी चाहिए. मेमसाहब फ़ोन करके भी बुलाएं, ज़्यादा पैसा देने का लालच दें तब भी उनके घर काम करने ना जाएँ. पता नहीं मेमसाहब का कौन विदेशी मेहमान उनके घर में बीमारी के कीटाणु छोड़ गया हो. क्या पता मेमसाहब और साहब खुद विदेश यात्रा से बीमारी का वायरस अपने जिस्म में छिपा कर ले आये हों.

इस वक़्त धनाढ्य वर्ग को चाहिए कि वे पूरी तरह आइसोलेशन में रहे. सड़कों पर तो हरगिज़ ना निकले. ताकि गरीब इस महामारी से सुरक्षित रहे. अमीरों के पास बड़े बड़े घर हैं जिनमे कई कई कमरे हैं. अगर उनके परिवार में किसी को कोरोना ने जकड़ा तो वो खुद को एक अलग कमरे में सीमित करके 14 दिन आइसोलेशन में रह सकता है और परिवार के अन्य सदस्यों को बीमारी की चपेट में आने से बचा सकता है मगर कल्पना कीजिये कि किसी गरीब को ये बीमारी लग गई तो क्या होगा ? जहाँ एक कमरे में आठ आठ, दस दस लोग इकट्ठे रहते हैं, जहाँ खुद को आइसोलेट करने की जगह ही नहीं है वहां अगर ये बीमारी पहुंच गई तो स्थिति कितनी विकट और भयावह होगी, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है. वहां तो इस खतरनाक वायरस को फैलने के लिए अपार सम्भावनाये हासिल हो जाएंगी.

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गरीब के पास ना तो पैसा है और न ही पहुंच कि अस्पताल में उसका इलाज होगा. कोरोना से तड़पते गरीब को तो कोई डॉक्टर या नर्स हाथ भी नहीं लगाएगा. गरीब तबके में अगर ये महामारी पहुंच गई तो गाँव के गाँव साफ़ हो जायेंगे. हर तरफ लाशें ही लाशें बिछ जाएँगी. देश में ना तो इतने अस्पताल है ना डॉक्टर या नर्स जो कोरोना से दम तोड़ते गरीबों की तीमारदारी करें और जो हैं उनकी मानवता अमीरों के प्रति ही दिखती है किसी गरीब के लिए नहीं. इसलिए बहुत अच्छा है की महानगरों और छोटे बड़े सभी शहरों में अमीरों की सोइटियों, कोठियों, कॉलोनियों पर ताले पद गए हैं. इन जगहों पर अब पुलिस का सख्त पहरा भी बिठा दिया जाना चाहिए और इस तबके को बाहर सड़क पर निकलने से पूरी तरह रोक दिया जाए. ताकि देश का गरीब ग्रामीण तबका सुरक्षित रहे.

#coronavirus: दिहाड़ी मजदूरों का दर्द “भूखे मरने से अच्छा है बीमारी से मर जाएं ?”

जयपुर के सांगानेर इलाके में रहने वाली महिला राजवती ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा, ‘हमारे पास खाने का एक भी दाना नहीं है, जिसकी वजह से बिना खाए ही रहना पड़ रहा है. अभी तक पानी आता था लेकिन अब पानी भी नहीं मिल रहा है. उन्होंने सरकार से गुहार लगाई कि हमें या तो हमारे गांव भिजवाया जाए या फिर हमें साधन मुहैया कराया जाए.
  कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिए सरकार की ओर से लगातार जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं. इसी के मद्देनजर देशभर में 21 दिन का लॉकडाउन किया गया है.लोगों से लगातार अपील की जा रही है कि वो अपने घरों से नहीं निकलें. हालांकि लॉकडाउन की वजह से लाखों दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, गरीबों की जिंदगी मुश्किलों से घिर गई है. सरकार की ओर से इनकी मुश्किलों का हल खोजने की हर कोशिश की जा रही है.लेकिन कई लोग ऐसे हैं जिन्हें खाने-पीने की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.जयपुर राजस्थान में दिहाड़ी मजदूरी का काम करने वाली कुछ महिलाओं ने बताया कि उन्हें लॉकडाउन में कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.
खाने का एक भी दाना नहीं, भूखे रहने को हैं मजबूर :
 जयपुर के सांगानेर इलाके में रहने वाली महिला राजवती ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा, ‘हमारे पास खाने का एक भी दाना नहीं है, जिसकी वजह से बिना खाए ही रहना पड़ रहा है. अभी तक पानी आता था लेकिन अब पानी भी नहीं मिल रहा है.इसके अलावा मकान मालिक भी उनसे किराए की मांग कर रहा है, बिजली का बिल भी देना पड़ता है.’ राजवती ने कहा कि हमारी परेशानी बढ़ गई है, उन्होंने सरकार से गुहार लगाई कि हमें या तो हमारे गांव भिजवाया जाए या फिर हमें साधन मुहैया कराया जाए.राजवती ने आगे कहा कि भूखे मरने से अच्छा है कि हम इस बीमारी से ही मर जाएं.राजवती ने बताया कि वो दिहाड़ी मजदूरी का काम करती हैं. उनका नाम सांगानेर की वोटर लिस्ट में भी है. हालांकि उन्हें लॉकडाउन के बाद काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.उन्होंने सरकार से मदद के साथ-साथ उनके घर भेजने की गुहार भी लगाई है.
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सहायता नहीं दे सकते तो हमें गांव भेज दें :
 बिहार की शमीमा भी सांगानेर में ही रहती हैं. उन्होंने बताया कि हमारे बच्चे बिना खाए-पीए पिछले दो दिनों से हैं. वो बस पानी पीकर ही गुजारा कर रहे हैं.वो जिस घर में रह रहे हैं उसके मकान मालिक उनसे लगातार किराए की मांग कर रहे हैं. शमीमा ने सरकारे से मदद की गुहार लगाई है, साथ ही कहा कि अगर सरकार कोई सहायता नहीं दे सकती है तो उन्हें उनके गांव भेज दे.
‘हमरो आंसू नईखे रुकत’, लॉकडाउन में फंसे बिहारियों का दर्द
कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने की खातिर किए गए लॉकडाउन से गरीब तबका बुरी तरह प्रभावित हुआ है. सबसे ज्‍यादा परेशान वो लोग हैं जो दूसरे राज्‍य में जा कर मजदूरी कर रहे थे. इन लोगों में बड़ी संख्‍या बिहार के दिहाड़ी मजदूरों की है.कई जगहों से रिपोर्ट्स हैं कि ये लोग पैदल ही अपने घरों की ओर निकल पड़े हैं.कुछ वीडियोज भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिन में परेशान हो कर लोग रो पड़ते हैं.
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 बिहार की पूर्व मुख्‍यमंत्री राबड़ी देवी ने केंद्र और राज्‍य सरकार से हाथ जोड़कर अपील की है कि वे  बाहर फंस गए बिहार के लोगों के रहने और खाने का इंतजाम करें.उन्‍होंने ट्विटर पर कहा कि ‘इन गरीबों के आंसू देखकर मेरे आंसू भी रुक नहीं रहे हैं.’ उन्होंने स्थानीय भाषा में कहा कि हम केन्द्र और राज्य सरकार से निहोरा कर रहल बानि की भगवान के ख़ातिर जे भी हमार बिहारी भाई, बहिन, बच्चा और गरीब-गुरबा लोग बाहर फँस गईल बा ऊ लोगन के रहे और खाए के इंतज़ाम करीं.गरीब-गुरबा के आँसू देख के हमरो आँसु नईखे रुकत.
ये दोहरापन क्यों
 अमीर हो या गरीब… हर किसी का अपनी मिट्टी से जुडाव होता है.. लगाव होता है … परदेश हमेशा पराया होता है.. अपना  गाँव/देश अपना ही होता है.. अपनी मिट्टी की हक ही अलग होती है… भले ही आदमी दो पैसे कमाने परदेश चला जाये पर अंत में वह मरना अपने देश में ही चाहेगा … अपनी मिट्टी में ही विलीन होना चाहेगा.यही वजह है सेंकड़ों पुरूषों/महिलाओं के जथ्थे .. सर पर सामान की गठरी गोद में बच्चे लिये… सेंकड़ों किलोमीटर पैदल चल रहे हैं… ना कुछ खाने को है… सुरत से राजस्थान के लिये… दिल्ली से बिहार/झारखण्ड के लिये… भूखे प्यासे बस दिन रात चलना ही चलना है। कोरोना का डर नहीं है.. डर है तो पेट की भूख का… माननीय प्रधानमंत्री जब आप… आज रात 12 बजे से … कोई भी चीज लागू क़र देते हैं तो क्या आपको इन लोगों का जरा भी ख्याल नहीं आता कि ये रात 12 बजे से पहले कैसे अपने गाँव/घर पहुँचेंगे ? आप तो कहते हैँ मैं एक गरीब माँ का बेटा हूँ… क्या इनको पर्याप्त समय नहीं दे सकते थे अपने गाँव तक पहुँचने का ?
 विदेशों में जो भारतीय फंसे हैं उनको एयरलिफ्ट किया जा रहा है … क्यों ? क्योंकि वो अमीर हैं… इंडियन एम्बेसी से सीधे सम्पर्क करते हैं… उनको वापिस ना लाया जाये तो विदेशों में हमारी छवि खराब होती है… उनको  वापिस इंडिया लाना हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है.. उनकी नागरिकता प्रथम श्रेणी की है… जबकि वही रिच क्लास इस महामारी को इंडिया में लाने के लिये ज़िम्मेदार है.
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जब विदेश से भारतीय नागरिक को एयरलिफ्ट करके इंडिया लाना सरकार की ज़िम्मेदारी है तो देश के किसी दूसरे हिस्से में रह रहे भारतीय को उसके गाँव/घर पहुँचाना सरकार की नैतिकता जिम्मेदारी क्यों नहीं है ? जबकी संक्रमण का खतरा विदेश से आने वाले नागरिक से ज्यादा… अमीर और गरीब के लिये अलग अलग कानून क्यों ? कोई भी फरमान जारी करने से पहले नागरिकों को उचित वक्त दिया जाना सरकार का कर्तव्य है ताकि वो उस फरमान के लिये अपने आपको तैयार करले… एक लाखों सत्तर हजार करोड़ के पेकेज में क्या कहीं कोई प्रावधान नहीं हैं कि रात दिन पैदल पलायान कर रहे इन लोगों को इनके घर पहुँचा दिया जाये.
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#coronavirus: lockdown के दौरान एक चिट्ठी जो मुझे डरा रही है

आदरणीय अंकल जी,

प्रणाम

पिछले पांच दिनों से पुणे के अपने फ्लैट में अकेले पड़े-पड़े मैंने काफी कुछ सोचा है, सोचा आपको बता दूं. उम्मीद है पत्र पूरा पढ़ने के बाद आप मुझे पागल नहीं समझेंगे. लॉक डाउन के चलते कंपनी में कामकाज ठप्प पड़ा है घर से ही प्रोजेक्ट पूरा कर रहा हूं लेकिन माहौल देखते काम में मन नहीं लग रहा है.

न जाने क्यों मुझे लग रहा है कि सब कुछ खत्म होने वाला है. अपनी 28 साल की छोटी सी ज़िंदगी में मैंने ऐसी दहशत कभी नहीं देखी. हमारे अपार्टमेंट के सभी दरवाजे बंद हैं लोग सनाके में हैं. अधिकतर फैमिली वाले हैं लेकिन कोई गाने नहीं सुन रहा, फिल्में नहीं देख रहा. कभी कभी सामने वाले मालेगांवकर अंकल के फ्लैट से टीवी की आवाज कानों में पड़ जाती है मुझे एक ही शब्द समझ आता है वह है कोरोना.

मैं मानता हूं कि पूरी दुनिया एक अजीब से संकट से घिर गई है जिससे उबरने की तमाम कोशिशें मुझे बेकार लगती हैं. यहां नौकरी जॉइन करने के बाद मैंने आपसे और दूसरे रिशतेदारों से कोई वास्ता नहीं रखा लेकिन जाने क्यों आज आप लोगों की याद बहुत आ रही है, मम्मी पापा भी खूब याद आ रहे हैं. मैं यह मानने में कतई नहीं हिचकिचा रहा कि मैं अव्वल दर्जे का खुदगर्ज आदमी हूं. मम्मी पापा की रोड एक्सीडेंट में मौत के बाद से ही मुझे लगने लगा था कि अब मुझे अकेले ही जीना है.

जी तो लिया लेकिन अब सोच रहा हूं कि क्या इसी दिन के लिए जिया था. मेरे कोई खास दोस्त भी नहीं हैं हकीकत मैं मेरा इस शब्द पर कभी भरोसा ही नहीं रहा. अब जब मेरे चारों तरफ तन्हाई है तब मुझे लग रहा है कि मुझे मर जाना चाहिए. इन डरे सहमे हुये लोगों के बीच जिंदा रहने से तो बेहतर है शांति से मर जाया जाये.

थोड़ी थोड़ी देर बाद मुझे महसूस होता है कि कोरोना ने मुझे और मेरे फ्लैट को घेर लिया है. करोड़ों की तादाद में ये वायरस मेरी तरफ बढ़ रहे हैं. कई तो वॉश बेसिन पर रखा सेनेटाइजर पीते ज़ोर ज़ोर से हंस रहे हैं. मेरा मास्क उन्होंने कुतर डाला है और बहुत से पिंडली से रेंगते हुये मेरे मुंह की तरफ बढ़ रहे हैं.

मैं उन्हें झटकता हूं फिर घबराहट में अपार्टमेंट के मेन गेट पर आकर केबिन में सिक्योरटी गार्ड के पास जाकर बैठ जाता हूं. उसका असली नाम पता नहीं लेकिन सभी उसे पांडू पांडू कहते हैं. वह भी डरा हुआ है मेरी तरफ देखता है फिर हथेली पर तंबाकू रगड़ने लगता है. मुझे लगता है इसे भी इन्फैक्शन है इसलिए वह मुझ से दूर भागता है. मुझे उस पर दया आती है कि इस बेचारे को इलाज नहीं मिला तो यह भी मर जाएगा और एक एक कर सारे लोग मर जाएंगे.

मैं फिर फ्लैट पर आ जाता हूं लेकिन लिफ्ट से नहीं बल्कि सीढ़ियों से क्योंकि लिफ्ट में वायरस मुझे गिरफ्त में ले सकते हैं. आठवे माले पर हांफते हुये चढ़ता हूं तो लगता है वायरस मेरा पीछा कर रहे हैं वे कभी भी मुझे जकड़ सकते हैं.

आपको याद है पापा एक गाना अक्सर गाते थे जीवन में तू डरना नहीं… डर डर के जीना नहीं …..

लेकिन मुझे लगता है डर से ज्यादा यह अकेलापन मुझे मार रहा है इसी डर के चलते मैं लैपटॉप और टीवी भी नहीं चला रहा क्योंकि वहां से कोरोना निकलकर घर में फैल जाएगा. खाने पीने का बहुत सा सामान रखा है जो बाजू बाली सिंह आंटी दे गईं थीं लेकिन दूर से मानों मैं संक्रमित होऊ. वे हालांकि एक अच्छी महिला हैं लेकिन सनकी सी भी हैं. पड़ोसी होने के नाते उनका फर्ज बनता है कि वे मेरी खबर लेती रहें पर वे भी स्वार्थी हैं, सब स्वार्थी हैं, आप भी स्वार्थी हैं.

कोरोना ने मुझे सिखाया है कि इस दुनिया में कोई किसी का सगा नहीं है सारे रिश्ते नाते यारी दोस्ती खुदगरजी पर टिकी है जिसका इम्तिहान अब हो रहा है और नतीजे भी सामने आ रहे हैं. सब के सब सभी के होते हुये अकेले हैं जो कोरोना और डर दोनों से मरेंगे. मैं भी.

चारों तरफ सन्नाटा है कोई हलचल नहीं है. सब बुज़दिलों की तरह घरों में दुबके आहिस्ता आहिस्ता आती मौत का इंतजार कर रहे हैं. वे कितने भी हाथ धोले बचेंगे नहीं. मैं तो नहा भी नहीं रहा क्या पता शावर से ही कोरोना बरसने लगे.

आप मेरी इन बातों को पागलपन समझ रहे होंगे लेकिन मेरा फलसफा समझने की कोशिश करें तो आपको लगेगा कि मैं गलत नहीं कह रहा था. मैं भगवान वगवान को नहीं मानता, मैं राजनीति के पचड़े में भी नहीं पड़ता बीटेक और एमबीए करने के बाद से मैं नौकरी कर रहा हूं, ऑफिस जाता हूं. 12 घंटे मन लगाकर काम करता हूं खाना खाता हूं फिर सो जाता हूं.

फैमिली सिस्टम में रहने वाले भी इसी तरह रहते हैं लेकिन दिखावा ज्यादा करते हैं वे बहुत शातिर और धूर्त होते हैं. ज़िंदगी भर एक दूसरे का शोषण करते हैं, एक दूसरे का इस्तेमाल करते हैं और इसकी कीमत का भी लेनदेन करते हैं. कोरोना इसकी पोल खोल रहा है अगर आज घर में वह किसी को लग जाये तो सभी संक्रमित से दूर भागेंगे जैसे कोढ़ के मरीज से भागते हैं.

आईसोलेशन के नाम पर उसे अलग पटक देंगे, छूना तो दूर की बात है उसकी तरफ देखने से भी सहमेंगे. मेरी भी हालत ऐसी ही है मैं अपने इस फ्लैट में पड़ा पड़ा यूं ही मर भी जाऊं तो मेरी लाश से उठती दुर्गंध से लोगों को पता चलेगा.

फिर लोग डरेंगे अपार्टमेंट छोड़ कर भागेंगे सरकारी अमला पूरी बिल्डिंग सेनेटाइज करेगा, टीवी वाले आएंगे सनसनी फैलाएंगे. मेरी जन्मपत्री खंगालेगे जब कुछ खास जानकारी हाथ नहीं लगेगी तो मुझे लावारिस घोषित कर किसी नई खबर की तरफ दौड़ पड़ेंगे. आप देखना ये भी मरेंगे जो नाम और पेशे के लिए जान हथेली पर लिए घूम रहे हैं बल्कि कहना चाहिए कि भटक रहे हैं.

खैर मुद्दे की बात ये कि मैं गंभीरतापूर्वक ख़ुदकुशी करने की सोच रहा हूं मुझसे पल पल की यह मौत सहन नहीं हो रही है. मुझे मालूम है आप मेरा मरा मुंह देखने या मिट्टी ठिकाने लगाने नहीं आएंगे, सच भी है कोई क्यों यह सरदर्दी मुफ्त में मोल ले.

हां मैं अगर यह वसीयत कर जाऊं कि मेरे मरने के बाद 1 करोड़ का यह फ्लैट और 20 -25 लाख की सेविंग आपकी होगी तो यकीन मानें आप सर के बल दौड़ कर आएंगे पुणे तक आने का कर्फ़्यू पास हाथों हाथ बनवा लेंगे, सरकारी अफसरों और पुलिस वालों के सामने घड़ियाली आंसू बहाएंगे कि भतीजा मर गया है आखिरी बार देखने और क्रियाकर्म करने जाने दीजिये.

आप सोच रहे होंगे बल्कि तय ही कर चुके होंगे कि मैं वाकई डिप्रेशन बर्दाश्त न कर पाने के कारण पागल हो गया हूँ तो आप गलत सोच रहे हैं. दरअसल, मेरी चिंता असहाय मानव जीवन है. आदमी खुद को ताकतवर कहते गर्व से फूला नहीं समाता लेकिन आज एक मामूली से वायरस के सामने कितना असहाय नजर आ रहा है सारी साइंस और टेक्नोलाजी महत्वहीन हो गई है कहा यह जा रहा कि सब्र रखो सब ठीक हो जाएगा रिसर्च चल रही है.

मैं कहता हूं कुछ नहीं हो रहा. आदमी न दिखने बाले इन कीड़े मकोड़ों की ताकत के सामने कुछ नहीं है. वह प्रकृति की सबसे कमजोर कृति है. एक कोरोना नाम के वायरस ने हजारो मार दिये और भी मरेंगे फिर जब कोरोना का प्रकोप खत्म हो जाएगा तो लैब से कोई दाढ़ी बाला वैज्ञानिक बाहर आएगा उसके हाथ में एक दवा कोरोना की होगी. लेकिन यह अंत नहीं होगा जल्द ही कोई नया वायरस पैदा होगा फिर हाहाकार मचेगा लाक डाउन होगा और मैं फिर कैद होकर रह जाऊंगा.

जबकि मैं काम करना चाहता हूं, जिंदा रहना चाहता हूं, खिलते हुये फूल देखना चाहता हूं, चहकते खेलते हुये बच्चे देखना चाहता हूं, खूबसूरत युवतियों का अल्हड़पन देखना चाहता हूं, खूब सी बियर पीना चाहता हूं, सिगरेट के धुंए के छल्ले बनाना चाहता हूं, व्हाइट सास के साथ पिज्जा खाना चाहता हूं, हिल स्टेशन जाकर छुट्टियां मनाना चाहता हूं, नए नए ब्रांड के आफ्टर शेव ट्राई करना चाहता हूं  और तो और मैं रेल की पटरियों के किनारे शौच करते हुये लोगों को भी देखना चाहता हूं.

मैं और भी बहुत कुछ करना चाहता हूं लेकिन यूं कैद नहीं रहना चाहता इसलिए मर जाने का यह बहादुरी भरा फैसला ले रहा हूं जिसे शातिर लोग बुज़दिली कहते हैं. कोरोना मेरे दिमाग में आ गया है.  मैं मजबूर हूं क्योंकि आधुनिकता की हकीकत मुझे समझ आ गई है.

न क्षणों में मुझे उपदेशकों और आशावादियों पर तरस आ रहा है ये लोग बहुत चालाक हैं जो चाहते हैं कि लोग जिंदा रहें दुनिया चलती रहे और ये अपना भोंथरा ज्ञान बघारते रहें. ये खुद मरने से डरते हैं इसलिए दूसरों को जिंदा रखना चाहते हैं.  मेरी ख़ुदकुशी इनके मुंह पर थप्पड़ होगी यह जरूर आप दुनिया को बताएं बाकी जिसे जो सोचना हो सोचे मुझे लग रहा है कोरोना दरवाजे के नीचे से दाखिल हो गया है और इस बार यह मन का वहम नहीं है.

चाची को प्रणाम और बच्चों को प्यार 

आपका भतीजा

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दुनियाभर में कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए केंद्र सरकार ने भी देशभर में 21 दिन के लॉक डाउन की घोषणा कर दी. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो लॉक डाउन के बाद से ही लोग अपने-अपने घरों रहकर सरकार के आदेश का पालन कर रहे हैं. यह महामारी इतनी भयावह है कि इसे रोकने के लिए जल्द ही कोई सख्त कदम उठाने की आवयश्कता थी. प्रधानमंत्री मोदी ने हर बार की तरह इस बार भी सख्त कदम उठाते हुए 3 हफ्ते के लिए लॉक डाउन की घोषणा तो कर दी. लेकिन इसे किस तरह से अमल में लाया जाएगा और लॉक डाउन के दौरान जनता को होनी वाली परेशानियों को दूर करने के लिए सरकार के क्या प्रयास होंगे.
ये सब बताना प्रधानमंत्री मोदी ने जरूरी नहीं समझा। ना ही प्रधानमंत्री मोदी ने ये सोचा कि 21 दिनों तक गरीब मजदूरों और किसानों के घर चूल्हा कैसे जलेगा. जिस तरह से मोदी सरकार ने नोटबन्दी और जीएसटी को आनन-फानन में लागू किया था और बाद में उनसे फैली अव्यवस्थाओं ने देश के आर्थिक ढांचे को तहस-नहस कर दिया था. लाखों लोगों का रोजगार छिन गया था. 21 दिन के लॉक डाउन की घोषणा करते समय प्रधानमंत्री मोदी ने असंगठित क्षेत्र के कामगारों और किसानों को होने वाली परेशानी के बारे में कोई बात नहीं की.
गुरुवार को वित्त मंत्री ने कोरोना से निपटने के लिए 1 लाख 70000 करोड़ के आर्थिक पैकज की घोषणा की. जिसमें भी कई खामियां हैं.सरकार फैसले लेने में जितनी तत्परता दिखाती है उतनी ही उसके सही ढंग से क्रियान्वयन करने और उनसे होने वाली अव्यवस्थाओं को दूर करने में नहीं दिखती है.
2012 की आर्थिक गणना के अनुसार भारत में 48.7 करोड़ मजदूर हैं. इस मामले में भारत का स्थान चीन के बाद विश्व में दूसरा है. इन मजदूरों में 94 फीसदी मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं.
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देश का लगभग 57 फीसदी उत्पादन असंगठित क्षेत्र के मजदूर ही करते हैं. साथ ही देश की 52 फीसदी आबादी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृषि, डेयरी और पशुपालन से जुड़ी हुई है. इन गरीबों को राहत देने के लिए वित्त मंत्री ने महिलाओं के जनधन खातों में प्रति माह 500 रुपये देने की घोषणा की है और यह 3 माह तक दिए जाएंगे। ऐसा लगता है या तो वित्त मंत्री को ज्ञान नहीं है या वह जनता को बेवकूफ समझती हैं.जनधन खातों की स्थिति से सभी भलीभांति अवगत हैं.
2014 में 15-15 लाख के लालच में करोड़ों गरीबों ने बैंकों में लाइन लगवाकर खाते खुलवाए थे.लेकिन जब कोई 15 लाख नहीं आये तो धीरे-धीरे खाते निष्क्रिय होने लगे। कुछ समय बाद जब बड़े कर्जदार उद्योगपतियों के कर्ज न चुकाने की वजह से बैंक घाटे में आ गए तो बैंकों ने अपना घाटा पूरा करने के लिए मिनिमम बैलेंस के नाम पर गरीबों के खातों से पैसे काटकर करोड़ों रुपये जुटा लिए.इस तरह बाकी जनधन खाते मिनिमम बैलेंस की भेंट चढ़ गए। जब गरीबों के अधिकतर जनधन खाते ही बंद हो गए तो सरकार आर्थिक मदद कहाँ भेजेगी.
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किसानों को गेहूं की फसलें खेतों में खड़ी हुई हैं जो कटाई के लिए तैयार हैं, कुछ लोगों ने फसलों को काट भी लिया था. उन फसलों की बिक्री कैसे होगी यह भी एक सवाल है. वित्त मंत्री ने कहा है कि 8.69 करोड़ किसानों को 2000 रुपए दिए जाएंगे। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की वेबसाइट पर लाभार्थी किसानों की संख्या 14.5 करोड़ है. 2019 कि चुनाव के समय 14.49 करोड़ किसानों को इस योजना के तहत लाभ भी दिया गया था. तो अब वित्त मंत्री में इस आपदा के समय बाकी 6 करोड़ किसानों को बाहर क्यों कर दिया, उन्हें 2000 की आर्थिक मदद क्यों नहीं दी जा रही है. साथ ही वित्त मंत्री का कहना है कि मनरेगा में मजदूरी करने वाले मजदूरों को 182 रुपये से बढ़ाकर 202 रुपये मजदूरी दी जाएगी. अब सवाल यह है कि लॉक डाउन में कोई श्रम कार्य तो हो नहीं रहा है फिर इन्हें मजदूरी कैसे दी जाएगी.
2010 के एक आकड़े के अनुसार देश की 1.36 करोड़ की आबादी पब्लिक सेक्टर में संगठित तौर पर कार्य कर रही थी। वहीं 68 लाख व्यक्ति प्राइवेट सेक्टर में कार्यरत थे.साथ ही लगभग 97.8 लाख व्यक्ति रोजगार रजिस्टर में पंजीकृत थे. इन सबको तो सरकार प्रत्यक्ष तौर पर राहत दे सकती है.लेकिन ऐसे दिहाड़ी मजदूर जिनका कहीं कोई पंजीकरण नहीं है उन्हें राहत कैसे पहुचाई जाएगी. सरकार ने घोषणा की है कि राशनकार्ड धारकों को 5 किलो गेहूं और चावल फ्री दिया जाएगा. पहले एपीएल कार्डधारकबएक व्यक्ति को 3 किलो गेहूं और 2 किलो चावल मिलता है अब उसे इसका दोगुना राशन दिया जाएगा लेकिन उसे पहले जितनी ही राशि देनी होगी.
साथ ही 1 किलो दाल भी देने की घोषणा की है। कोटे के राशन लेने वालों में अधिकतर रिक्शाचालक, दिहाड़ी मजदूर, घरों में काम करने वाली महिलाएं ही होती हैं. जब इनको घरों से बाहर निकलने पर लाठी पड़ रही है तो खरीदने कैसे जाएँगे और गरीबों की संख्या के हिसाब से अगर राशन की दुकान पर खरीदी कैसे होगी सोशल डिस्टेंस कैसे मेंटेन होगा. और जब सरकार राशन की दुकान पर आज तक सही समय और मात्रा में राशन नहीं पहुँचा पाई है, घर कैसे पहुँचाएगी.जो राशन वाला कभी पूरी मात्रा में राशन नहीं देता है, वह घर पहुँचाएगा यह सोचना भी बेमानी है.
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लॉक डाउन में सरकार और प्रशासन द्वारा अमीरों और गरीबों में भेदभाव की बातें भी सामने आ रही हैं।
बहुत से दिहाड़ी मजदूर जो अपने शहरों को छोड़कर दिल्ली, मुम्बई, अहमदाबाद, जयपुर जैसे महानगरों में मजदूरी कर रहे थे. उन्हें भी उनके कंपनी मालिकों और मकान मालिकों ने भागना शुरू कर दिया है.यातायात के सभी साधन बंद होने की वजह से वे लोग पैदल ही अपने गांवों की ओर पलायन कर रहे हैं.रास्ते में पुलिस उन्हें रोककर मुर्गा बना रही है, कहीं उनसे कछुआ दौड़ करवाई जा रही है और कहीं-कहीं तो उनकी डंडो से पिटाई की जा रही है. क्या उनकी गलती यह है कि वे भी अपने घरों पर जाना चाहते हैं. ये मजदूर पिछले 5-6 दिनों से पैदल चल रहे हैं इनके बारे में सरकार ने अभी तक क्यों कुछ नहीं सोचा. अगर देश का मजदूर तबका भूख प्यास और घरों पर पहुँचने की फिक्र में मर जायेगा तो इन अमीरों के कारखानों में काम कौन करेगा। सरकार और उद्योगपति ये भूल रहे हैं कि अगर गरीब मजदूर ही नहीं बचेगा तो इनकी बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों पर ताला पड़ जायेगा और देश की अर्थव्यवस्था ठप्प हो जाएगी.
जिस तरह से सरकार अमीरों को टैक्स भरने में छूट दे रही है उसी तरह सरकार को इन गरीबों को मोबाइल, मोटरसाइकिल, टैक्सी जैसी छोटी-छोटी चीज़ों की किश्तों को भरने में भी छूट देनी चाहिए. साथ ही उद्योगपतियों, फ़िल्म अभिनेताओं, खिलाड़ियों और नेताओं को भी आगे आकर गरीबों की मदद के लिए हाथ बढ़ाना चाहिए. सिर्फ ‘घर में रहे सुरिक्षत रहें’ कहने भर से काम नहीं चलेगा.साथ ही सरकार को जनता को ये आश्वासन देना चाहिए कि गरीब संक्रमित व्यक्ति का फ्री इलाज किया जाएगा.
अब सरकार ने कोरोना जांच के लिए प्राइवेट हॉस्पिटल की रेट 4500 रुपये और एक दिन का आइसोलेशन का चार्ज 3100 निर्धारित किया है.अगर किसी गरीब में इस बीमारी के लक्षण नजर भी आये तो वो जांच और इलाज का खर्चा कहाँ से वहन करेगा. झुग्गी झोपड़ियों और छोटे-छोटे घरों में रहने वाले गरीब तबके के लोग अपने घरों में कहां से खुदको कोरोनटाइन करेंगे.
यह बीमारी तो जनवरी में ही भारत में पांव पसार चुकी थी जब केरल में कोरोना का पहला मामला सामने आया था. उसके बाद भी सरकार उदासीन रही और 19 मार्च तक मास्क और सेनेटाइजर का धड़ल्ले से निर्यात करती रही.जब सरकार को इस महामारी की भयावता के बारे में जानकारी थी तो वह पहले उदासीन क्यों रही. सरकार की नीतियां और कार्यशैली लोगों के मन मे कई तरह के सवाल पैदा कर रही हैं.जिनका जवाब देने से सरकार बच रही है. अब देखना यह होगा कि सरकार सही मायनों में गरीब मजदूर और किसानों को कैसे राहत पहुचती हैं. अगर देश में कोरोना महामारी के अलावा किसी व्यक्ति की भूख से मौत होती है तो यह सरकार और देश के लिए बड़े शर्म को बात होगी.

#coronavirus: मिला अपनों का साथ

मेरा प्यारा सा परिवार , जिसमें मैं , मेरे हस्बैंड, मेरी मां जैसी सासू मां साथ रहते हैं. पिता सामान ससुर का देहांत हुआ काफी वर्ष हो गए थे. तक से माँ अकेली हो गई थी. मेरी शादी को अभी 3 साल ही हुए हैं , लेकिन परिवार से इतना प्यार मिला कि मुझे अपने मायके की कमी ही महसूस नहीं होती है. बस अफ़सोस इस बात का होता था कि माँ को छोड़कर जब हम नौकरी के लिए रोज़ाना घर से बाहर जाते थे तो वे भले ही कुछ नहीं कहती थी लेकिन उनकी आंखे व चेहरे के हावभाव साफ़ बताते थे कि जैसे वे कहना चाहती हो कि बेटा तुम जल्दी घर आ जाना. लेकिन सब की मजबूरियो व सब पर घर को चलाने की जिम्मेदारियों के चलते किसी को कुछ बोल नहीं पा रही थी. उनके अकेलापन को हम भी समझ रहे थे लेकिन चाहा कर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे. क्योंकि घर का लोन चुकाने के लिए दोनों का कमाना बहुत जरूरी था.

शाम को जैसे ही हम डोर बेल बजाते तो माँ दौरति हुई दरवाजे पर आती, उनके चेहरे पर आई मुस्कान को देखकर लगता जैसे वे कब से हमारी राह देख रही हो. आते ही गले लग जाती और कोई काम न करने देती. कहती कि तुम लोग थक कर आए हो थोड़ी देर आराम करो. तब मैं माँ को रूम में बैठाकर सबके लिए चाय बनाने चली जाती और फिर चाय के साथ उन्होंने पूरे दिन क्या किया, फ्रूट्स खाए , खाना पूरा खाया या नहीं सब पूछती. जब माँ यह सब बताने में बीच बीच में चुप हो जाती तो हमे समझ आ जाता कि माँ की आज तबियत ठीक नहीं है तभी माँ ने खाना खाने में आनाकानी की है. तब हम माँ को प्यार से डांटते हुए कहते कि माँ ऐसे कैसे चलेगा , आप ही तो हमारे लिए सब कुछ हो, अगर आप को कुछ हो गया तो हम कैसे रह पाएँगे , इसलिए आप अपना पूरा ध्यान रखो. कई बार माँ को ऐसे देख कर मैं ऑफिस भी नहीं जाती थी, क्योकि माँ की उदासी हमसे देखी जो नहीं जाता थी.

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फिर माँ यह कहकर हमें चुप करवा देती थी कि आगे से ऐसा नहीं होगा. यह सुन हमें भी तसल्ली होती. फिर मैं माँ को व इनको ऑफिस की ढेरों बातें बताती जैसे मैं अपनी माँ को बताती थी. इससे मेरा मन हलका हो जाता था. जिस दिन चुप रहती माँ समझ जाती कि मैं किसी कारन से परेशान हूँ। पूछती और मैं नहीं बताती तो बस यही कहती कि जीत हमेशा ईमानदारी और सच्चाई की होती है. बस काम के प्रति ईमानदार बनी रहना जीत तुम्हारी ही होगी. यह सुन में फिर से घर पर चहकती हुई दिखाई देने लगती.

घर में खाने वाली लगी होने के कारण हम 9 बजे तक सब खाना खा कर बातें करने बैठ जाते थे. माँ को बातें करते देख ऐसा लगता जैसे माँ पूरे दिन की कसर पूरी कर रही हो. यही तो हम भी चाहते हैं कि माँ हरदम खुश रहे, उन्हें कभी कुछ न हो. फिर अगली सुबह माँ को अकेला छोड़ कर जाने में दिल रोता था. लेकिन अब तो यह रूटीन सा बन गया था. लेकिन हम ऑफिस से माँ को कई कई बार फ़ोन करके उनका हालचाल पूछते रहते थे. इससे लगता था जैसे माँ साथ ही है.

फिर एक दिन जब हम साथ बैठकर खाना खा रहे थे तो समाचार में देखा कि जानलेवा कोरोना वायरस के कारण देश में लॉक डाउन हो गया है, जिसके चलते स्कूल, कॉलेज, प्राइवेट व गवर्नमेंट सेक्टर्स बंद कर दिए हैं , ट्रैन, मेट्रो, हवाईजहाज़ की रफ़्तार रोक दी गई है तो माँ यह सुनकर चिंतित हो गई और बोली कि मैं तुमे अब घर से बाहर नहीं जाने दूंगी. तब इन्होने माँ को समझाया कि अब हम घर से ही काम करेंगे इसलिए चिंतित न हो आप. यह सुन माँ मुसकरारे लगी. रोज़ हमारी पसंद का खाना बनाती और हमें घर का कोई काम न करने देती. इन दिनों वे इतना खुश रहती कि उन्हें देख ऐसा लगता जैसे हमें भी सब कुछ मिल गया हो. अभी सिर्फ 3 दिन के लिए ही लॉक डाउन हुआ था , लेकिन दुबारा से ये घोषणा हुई कि अब कोरोना की जंग को जीतने के लिए 21 दिन का लॉक डाउन जरूरी है. यह सुन माँ चिंतित भी हुई लेकिन उससे ज्यादा ख़ुशी उन्हें यह थी कि अब मेरे बच्चे कुछ दिन ही सही लेकिन हर समय मेरी नज़रों के सामने रहेंगे.

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वे मन से इतनी खुश थी कि इसे शब्दो में बयान करना आसान न था. वे हमें काम के टाइम डिस्टर्ब नहीं करती थी. लेकिन हम काम के बीच में से टाइम निकालकर उनके साथ बैठ जाते थे ताकि माँ को अकेला पन न लगे. . माँ कम चीज़ो में भी इतना अच्छा खाना बना लेती थी कि हम उंगलियां चाटते रह जाते थे. इन दिनों में हमने माँ के साथ भरपूर्ण समय बिताया. जिसने उनकी आधी बीमारियों को ठीक करने का काम किया. असल में अब हमने जीवन जिया है.

भले ही यह समय विश्व के लिए बड़ी मुश्किल का है लेकिन इस समय ने हमें एक भी किया है , हमें माँ के अकेलेपन को दूर करने में काफी मदद मिली. हमें समझ आ गया कि भले ही हम अपनी बेइंतिहाह इच्छाओं को पूरा करने के लिए भागते रहते है, लेकिन अगर हम चाहें और आज की तरह कम चीज़ों में जीना सीख लें तो हम न सिर्फ बचत करना सीख पाएँगे बल्कि अपनों के अकेलेपन को भी दूर कर पाएँगे. शायद माँ हमें काफी समय से यही समझाना चाहा रही थी जो आज कुदरत ने हमें सिखाया.

 

coronavirus: घर में रहें और स्वस्थ रहें

सरकार ने आपको कोरोना से बचने के लिए पुरे देश में लॉक डाउन लागू किया है । इस स्थिति में आपको यह तय करना होगा कि आप घर पर रहते हुए हर प्रकार से स्वास्थ्य रहे। इस स्थिति में अगर आपका मन नहीं लगता है तो आइये बताते है इस समय को मैसे आप सकारात्मक उपयोग कर सकते है  ।

–  आप किसी भी उम्र के देश देश दुनिया के बारे में जानने के लिए आपके पास उपयुक्त समय है। जरुरी नहीं दुनिया में जो भी देखे या सीखे वह करना के बारे में हो , इसे आलाव भी बहुत कुछ है , कोशिश करे कि किसी देश के बारे में संक्षित जानकारी इस लोक डाउन के दौरान आपके पास होना एकत्रित हो जाये ।

– आप गृहणी हो तो किचन में बहुत कुछ नया कुछ सीख सकती हैं। भारतीय पकवान के कई विधान है उसे आप इंटरनेट के मदद से समझ सकती है , विश्व के अन्य देशों के पकवानो को भी समझने का आपके पास उपयुक्त समय है। आप बेकरी और घर के तंदूर पकवान को भी आराम से समझ सकती है । जब तक लॉक डाउन ख़त्म होगा आपके किचन और पकवान ज्ञान में काफी वृद्ध हो चूका होगा , अगर समय हो तो इसे जरूर आजमाए

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– आपके बच्चों के लिए यह समय खास है , सभी लोग साथ है , इस दौरान आप अपने बच्चों पर विशेष ध्यान दे सकते है .बच्चों को नई नई चीजों का ज्ञान प्रदान कर सकते हैं। जरुरी नहीं है उसके रूचि के अनुसार ही आप उसे कुछ सिखाये या बताये , इस लॉक डाउन के दौरान आप अपने देश के बारे में जरूर समझा सकते है। देश , राज्य, जिला ,प्रखंड ,शहर और गांव तक आप उस से बात कर सकते है । कई बार देखा गया है कि आपके बच्चे पढ़ने में काफी तेज होते है लेकिन देश – दुनिया का ज्ञान उन्हें कम होता है , यही ज्ञान को आप प्रदान करे .

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– बूढ़े लोगों का विशेष ख्याल रख सकते हैं। नित्य समय पर उन से सकारात्मक बातें करते रहे.खाना खाते समय और खाना खाने के बाद विशेष सफाई का ध्यान दें. घर में साफ सफाई का विशेष ध्यान दें।

–  अधिक से अधिक आपस में बात करने से अच्छा है कुछ कुछ नया सीखे , छोटे-छोटे चीजों को समझे ज्ञानवर्धक चीजों को पढ़ें और समझे.

– मैगजीन और किताबें पढ़ने में अपने को  अधिक से अधिक अपने आप को व्यस्त रख सकते है .

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– अपने दैनिक जीवन नित्य नए  ज्ञानवर्धक चीजों को सीखने में बिताएं आप मनोरंजन के कई साधनों को अपना सकते हैं. आपकी रुचि जिस किसी में हो उस विषय पर विशेष ज्ञान अर्जित कर सकते हैं.

–  यह समय  आपको आगे की सोचने के लिए प्रदान करता है ना कि आप पीछे जाने के बारे में सोचें.

– आप हमेशा सकारात्मक सोच सकते हैं , सकारात्मक सोच आपको सेहतमंद रखेगा .

#coronavirus: फसल कटाई की बाट जोहते किसान

कृषि की बात करें तो तो देश में हरियाणा पंजाब राज्यों का नाम प्राथमिकता पर आता है. इन प्रदेशों में बड़े पैमाने पर आधुनिक तौर-तरीकों से खेती की जाती है . कृषि यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है और इन्हीं राज्यों में अनेक तरह के कृषि यंत्र भी बनाए भी जाते हैं ,जिनकी डिमांड देश के कोने कोने में है .अनेक नामीगिरामी कृषि यंत्र बनाने वाली कंपनियां यहां मौजूद हैं . लेकिन आज कोरोना की दहशत के चलते कृषि यंत्र जहां के तहां खड़े है.

देश में कृषि यंत्रों का इस्तेमाल खेत तैयार करने से लेकर फसल कटाई व गहाई और उसके स्टोरेज तक होता है .रबी की खास फसलें कटाई के मुहाने पर खड़ी है जिनमें गेहूं की खास फसल है.आपने देखा होगा कि पंजाब और हरियाणा से आने वाले अनेक रास्तों पर इन दिनों हार्वेस्टरों की आवाजाही शुरू हो जाती थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं दिख रहा. ज्यादातर हार्वेस्टरों के अगले हिस्से पर एक मोटरसाइकिल भी बंधी होती थी, जिसका इस्तेमाल वह जरूरत के समय या यंत्र में कुछ खराबी आने पर कहीं जाना पड़े , उसके लिए करते हैं . लेकिन इन दिनों सब तरफ अजीब सी खामोशी है सब कुछ शांत है सिवाय अस्पतालों में हलचल के . कोई आवाजाही नहीं , सब तरफ खामोशी , अजीब सा माहौल .किसान इस चिंता में है कि उसकी फसल की कटाई कैसे होगी.

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.इन कृषि यंत्रों के समय पर ना पहुंचने पर किसानों को चिंता सता रही है कि फसलों की कटाई समय से कैसे होगी. मजदूर भी खेत काटने को नहीं हैं. किसान की चिंता भी जायज है क्योंकि फसल को पकने के बाद समय से काटना भी जरूरी है ,नहीं तो सारी फसल चौपट हो सकती है .कृषि यंत्र तो आज नहीं तो कल बिक जाएंगे, लेकिन किसान की खड़ी फसल खेत में बर्बाद हुई तो उसका क्या होगा उसकी तो पूरी छमाही की कमाई डूब जाएगी .

वैसे समयसमय पर ऐसी आपदा आने पर किसानों को सरकारी मदद भी दी जाती है लेकिन वह मदद ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होती है. कई बार यह मदद किसान तक पहुंच ही नहीं पाती. किसानों के लिए सरकार ने बीमा कंपनियों को भी उतार रखा है लेकिन उसमें भी बीमा कंपनियां ही फायदे में रहती हैं. बीमा का फायदा केवल उन्हीं किसानों को मिलता है जिन्होंने अपनी फसल का बीमा कराया होता है . ज्यादातर किसान अपनी फसल का बीमा नहीं कराते ,जो किसान फसल बीमा कराते भी हैं तो उनको अपनी फसल खराब होने पर यह साबित करना भी कठिन हो जाता है कि उनका कितना नुकसान हुआ है.

क्या कहते हैं कृषि यंत्र निर्माता : हरियाणा के करनाल जिले में लगभग सवा सौ छोटे-बड़े कृषि यंत्र निर्माता हैं ,जिनमें कुछ तो कृषि यंत्र बनाते हैं, कुछ इन कृषि यंत्रों के पार्ट्स बनाते हैं. देश के अनेक हिस्सों में इनके द्वारा कृषि यंत्रों की सप्लाई होती है. लेकिन आज के हालात को देखते हुए लगता नहीं कि जल्दी ही सब कुछ ठीक होगा और किसानों के अच्छे दिन आएंगे.करनाल इंप्लीमेंट्स मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के महासचिव भावुक मेहता का कहना है कि इस समय दुनिया में भय जैसा माहौल है , सभी लोग चिंता में हैं, चाहे वह किसान हैं या कृषि यंत्र बनाने वाले लोग.

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अनेक कृषि यंत्र निर्माताओं का कहना है कि देश विदेशों से मशीनों के लिए जो आर्डर मिलते थे उनमें भी खासी कमी आई है .हरभजन सिंह मलिक सुपर एग्रीकल्चर करनाल का कहना है कि इस समय कृषि यंत्रों की खासी डिमांड होती थी , लेकिन अब ऐसा नहीं है गिरावट ही गिरावट के आसार लग रहे हैं.
झज्जर के कृषि यंत्र बेचने वाले हैं महेश एग्रो ने बताया कि इस समय सब कुछ बंद होने के कारण सारा काम बंद है जो हमारे पास माल पड़ा है उसके भी ग्राहक नहीं है .

नेशनल एग्रो इंडस्ट्रीज में बातचीत में बताया कि अभी तो सब कुछ ही बंद है हम किसानों तक मशीन पहुंचाएं भी तो कैसे अब तो यह आने वाला समय ही बताएगा कि कौन कहां किस किस स्थिति में पहुंचता है. कुल मिलाकर देखा जाए तो इसका खामियाजा भुगतेंगे तो सभी लेकिन किसानों को ज्यादा भुगतान होगा क्योंकि उसकी सारी उम्मीद फसल पर ही टिकी होती हैं, उसी के भरोसे वह बच्चों के शादीब्याह, साहूकार का कर्ज, लोगों की देनदारी निपटाता है. लेकिन अब तो उसे यही चिंता सताए जा रही है कि वह मौसम के प्रकोप से और इस समय आई आपदा के कैसे निपटे ? – भानु प्रकाश राणा

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